Nous Podcast· 11 Apr 2026· 42:47

50% Ceasefire, 50% War? Talks Begin: Kya War Rukegi? Bobby Naqvi | Bushra Khanum

West Asia once again stands on the edge of tension. A ceasefire has been announced, but on the ground, the conflict is still continuing.

Full Transcript

इजराइल ने जो है लेबनान के ऊपर हमले किए। स्टेट ऑफ़ हॉर्मोस अभी भी बंद है। 50% जो है वो सीज फायर जो है होल्ड कर रहा है और 50% नहीं कर रहा है। लगातार ईरान ये कह रहा है कि बिना लेबनान में भी सीज फायर हुए जो उन्होंने 10 पॉइंट्स दिए हैं उसमें ये बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है। ये बातचीत आगे नहीं होगी। एक ऐसा एजेंडा होगा जो ग्रेजुअल डीएस्केलेशन की के लिए कोशिश करेगा। मेरा सवाल यह है कि अगर उसी जज लॉबी या जाइनस लॉबी के दबाव में जंग में शामिल होने का फैसला नहीं चाहते हैं कि किसी भी तरह की सीज फायर की बातचीत कोई भी हो इसीलिए इन्होंने लेबनान पर इतना बड़ा हमला किया है। की तो देखिए हिस्ट्री रही है साइबोटाइज की और बैकस्टपिंग की। गजा में भी नए तरीके से कुछ हमले जो है वो शुरू हो सकते हैं। जो पॉइंट है सबसे इंपॉर्टेंट वो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोंस ही बनकर रह गया है। बिना सेफ्टी और सिक्योरिटी के तो ये तीनों चीजें जो है नहीं हो सकती हैं। ना तो इन्वेस्टमेंट आएगा, ना कोई टूरिस्ट आएगा, ना कोई टैलेंट आएगा। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। अभी पाकिस्तान में नेगोशिएशन को लेकर बातचीत होगी या नहीं होगी, किस तरह से होगी? इस पे एक बड़ा कंफ्यूजन जो है वो बना हुआ है। खबर यह आ रही है जिस वक्त मैं यह प्रोग्राम रिकॉर्ड कर रही हूं कि जेडी वैंस अमेरिका से निकल चुके हैं और वो इस्लामाबाद किसी भी वक्त पहुंच जाएंगे। लेकिन ईरान की तरफ से डेलीगेशन पहुंचेगा या नहीं पहुंचेगा इसको लेकर अभी पूरी कंफ्यूजन की जो एक स्थिति है वो बनी हुई है। अमेरिका की तरफ से यह कहा गया है कि ईरान किसी तरह का खेल ना खेले। यह एक ऐसे वक्त में यह बातचीत हो रही है या बातचीत होगी या नहीं होगी जब हम यह देख रहे हैं कि इजराइल ने लेबनान के ऊपर इतना बड़ा हमला किया है जिसमें कई सौ लोग जो हैं वो शहीद हो गए हैं। बड़ी तादाद में लोग जख्मी हैं और अभी भी इजराइल लगातार धमकियां दे रहा है। इस सबके बीच ईरान ने यह कहा है कि ऐसे वक्त में बातचीत करना बेहद मुश्किल है और सबसे पहले ईरान ने क्या किया? ईरान ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोंस को बंद कर दिया है और अमेरिका की पहली शर्त यही है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोनस जो है उसको खोल दिया जाए। अब जब इस तरह की पूरी सिचुएशन बनी हुई है तो क्या बातचीत वाकई में होगी और अगर बातचीत होगी तो क्या वाकई में इसका कोई नतीजा निकल पाएगा? सवाल यह भी है कि दो हफ्ते का अगर यह पॉज होता भी है तो फिर उसके बाद क्या वॉर जो पॉज से पहले की जो सिचुएशन थी क्या उसमें वापस चली जाएगा चली जाएगी ये पूरी सिचुएशन और क्या जंग दोबारा शुरू हो जाएगी एक अजीब तरह के मोड़ पर 40 दिन के बाद ये जंग आकर थम गई है। एक और खबर ये भी है कि सऊदी अरब की जो पाइपलाइन है उस पर हमला हुआ है। यूएई में भी हमला हुआ है। आईआरजीसी की तरफ से यह क्लेम किया गया है कि जब से यह बातचीत शुरू हुई है या इस वॉर में एक पॉज हुआ है फॉर्मेलिटी के लिए ही सही तब से ईरान की तरफ से जीसीसी कंट्रीज पर किसी तरह का कोई हमला नहीं हुआ है। यानी के वो फॉल्स फ्लैग की तरफ इशारा कर रहे हैं। क्या इजराइल ने यह हमला किया है? क्योंकि जब से ये बातचीत के जो ये शुरू हुई है बातचीत से मेरा मतलब जब से ये पॉज हुआ है तब से ही इजराइल की तरफ से जो हरकतें की जा रही हैं वो साफ तौर पर ये दिखाती हैं कि इजराइल नहीं चाहता है किसी भी कीमत पर। नितिन याू नहीं चाहते हैं किसी भी कीमत पर कि यह बातचीत हो और वो जिस तरह की हरकतें कर रहे हैं उससे उनका मौकफ भी यह साफ हो जाता है कि इस वॉर में वो अमेरिका को भी बने रहना चाहते हैं। मेरे साथ बेहद खास मेहमान जुड़ गए हैं। मेरे साथ गल्फ टाइम के फॉर्मर एडिटर सीनियर जर्नलिस्ट वेस्टीज या मामलों के जानकार बॉबी नकवी साहब मेरे साथ जुड़ गए हैं। बॉबी नकवी साहब बहुत-बहुत इस्तकबाल। वेलकम टू नाउज़ नेटवर्क। जी नमस्कार आदाब मोबिन नकवी साहब मेरा पहला सवाल आपसे यही कि आप क्या उम्मीद लगा रहे हैं क्योंकि जब हम ये कार्यक्रम जिस वक्त हम रिकॉर्ड कर रहे हैं हमें यह नहीं पता है कि ईरान से डेलीगेशन वहां पर पहुंचेगा या फिर नहीं और उन खबरों को नकार दिया गया है जो ये कहा जा रहा था कि गिलबाब से लेकर अराकची जो हैं वो अमेरिकन डेलीगेशन से पहले ईरान का डेलीगेशन वहां पर पहुंच गया है। इसको ईरान की तरफ से डिनाई कर दिया गया है। इस तरह की कंफ्यूजन इस तरह की ओहापोह की जो पूरी सिचुएशन है क्या आपको लग रहा है इसमें बातचीत होगी और अगर जेडी वैंस निकल गए हैं तो इसका मतलब क्या ये समझा जाए कि ईरान से भी डेलीगेशन पहुंच रहा होगा जी बशरा देखिए ईरान का डेलीगेशन अभी कुछ देर पहले इस्लामाबाद पहुंचा है और ऐसी रिपोर्ट्स आ रही हैं कि उस डेलीगेशन में ईरान के फॉरेन मिनिस्टर हैं बासरक्षी और ईरान की पार्लियामेंट के स्पीकर हैं मोहम्मद बगैर गालिब गालिब बाप तो ये दो लोगों का नाम तो आ रहा है कि वो लोग पहुंच चुके हैं और उनके साथ में ईरानियन एक बड़ी टीम है साथ में आई है। ऐसी भी रिपोर्ट्स आ रही है कि इनके इनके प्लेन को बाकायदा जो ईरान में बंदर अब्बास पोर्ट सिटी है वहां से एस्कॉट किया गया था पाकिस्तानी एयरफोर्स ने और एक तरह से काफी बड़ा एस्कॉट था क्योंकि पाकिस्तान कोई चांसेस नहीं लेना चाहता था कि किसी तरह का कोई साइबोटाच हो। तो वो उनका जहाज अभी कुछ देर पहले लैंड किया है इस्लामाबाद में। तो और वही खबर आ रही है कि जे डी वंस भी रवाना हो चुके हैं वाशिंगटन से इस्लामाबाद के लिए। मेरे ख्याल से देर रात को या अर्ली मॉर्निंग पहुंचेंगे वो। तो कल बातचीत तो होने की उम्मीद है कि बातचीत शुरू होगी। हालांकि देखिए ये जो सीज फायर जो अनाउंस हुआ था और उसके बाद से आपने डेवलपमेंट जो डेवलपमेंट्स हुए हैं उसके बारे में आपने अपने इंट्रोडक्शन में बताया। कैसे इजराइल ने जो है लेबनान के ऊपर हमले किए और कुछ दूसरे जो है हमलों की बात सामने आई सऊदी अरेबिया में या दूसरी जगह पे सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें जो दो दो मेजर कॉमोनेंट है यानी स्टेट ऑफ हॉर्मोस का खुलना स्टेट ऑफ होमोस अभी भी बंद है और ऐसी रिपोर्ट्स आ रही है कि खाली सिर्फ ईरानियन पोर्ट से जो जहाज ओरिजनेट हुए थे वही स्टेट ऑफ हॉरर्मोस से उनको आगे आगे जाने दिया है और उसके अलावा जो लेबनान में जो झड़प हो रही थी इजराइल और हजबुल्ला के बीच में वो काफी चल रही है। आज भी चली है। कल तो इजराइल ने बहुत बड़ा हमला किया था सिविलियन एरियाज में करीब 250 से ज्यादा लोग वहां मारे गए और 1100 से ज्यादा वहां घायल है। तो एक तरह से कह सकते हैं कि 50% जो है वो सीज फायर जो है होल्ड कर रहा है और 50% नहीं कर रहा है। तो इन कंडीशंस पर कल बातचीत होगी। यह बातचीतेंस इंपॉर्टेंट इसलिए भी है कि देखिए ये मेरे ख्याल से 79 के बाद से पहली बार अमेरिका और ईरान के बीच में एक इतने बड़े सीनियर लेवल पे फेस टू फेस टॉक्स होंगी। तो जहां जे डी वांस जो अमेरिका के राष्ट्र उपराष्ट्रपति हैं डोनाल्ड ट्रंप के डेपुटी हैं वो और ईरानियन डेलीगेशन जो ईरानियन फॉरेन मिनिस्टर और ईरानियन पार्लियामेंट के स्पीकर हैं वो बातचीत करेंगे। तो ये एक सिग्निफिकेंट इवेंट है अपने आप में। अब देखना यह है कि पहले बातचीत के पहले राउंड में क्या होता है। जी जी बबिन साहब आपको नहीं लग रहा कि लगातार ईरान ये कह रहा है कि बिना लेबनान में भी सीज फायर हुए जो उन्होंने 10 पॉइंट्स दिए हैं उसमें ये बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है। ये बातचीत आगे नहीं होगी। अमेरिका की तरफ से ये कहा गया कि लेबनान कभी था ही नहीं सीज फायर की में और अमेरिका लेकिन पाकिस्तान की तरफ से ये कहा गया कि लेबनान भी शामिल था। यानी कि अगर सीज फायर ईरान में होगी तो लेबनान में भी होगी जिसको इजराइल ने तोड़ दिया और पूरी तरीके से एक मिसट्रस जो है वो साफ तौर पर देखा जा सकता है और ईरान के अगर हवाले से हम बात करें तो उनका एक मिसट्रस जो है वो जायज भी है क्योंकि 28 फरवरी को जब हमला हुआ तब भी बातचीत हो रही थी उससे पहले भी जब भी बातचीत हुई है हमने हमेशा देखा है कि ईरान को धोखा ही खाना पड़ा है अमेरिका और इजराइल की तरफ से तो अब ये जो बातचीत हो रही है उसे आप पिछली बातचीत से कितना मुख्तलिफ आप पा रहे हैं। क्या आपको लग रहा है जो 10 पॉइंट्स ईरान की तरफ से दिए गए हैं उनमें से कितने आपको रियल रियलिस्टिकली आपको पॉसिबल लग रहा है कि माने जा सकते हैं क्योंकि ये कहा गया जेरी वांस ने ये कहा कि भाई ये जो लिस्ट दी गई है वो पहले ही पढ़ते ही डोनाल्ड ट्रंप ने डस्टबिन में फेंक दी थी। देखिए बिल्कुल आपकी बात बहुत बिल्कुल सही है कि मिस ट्रस्ट काफी है। खासतौर पर से ईरान के पास देखिए अपनी वजह है मिस ट्रस्ट की। वो अमेरिका को ट्रस्ट नहीं करते क्योंकि अमेरिका ने दो बार उनकी पीठ पे छुरा भोका है। हाल ही में जब यह जंग शुरू हुई थी 28 फरवरी को उसके पहले तीन राउंड बातचीत ईरान और अमेरिका के बीच में हुई थी। पहला राउंड मस्कत में हुआ था। उसके बाद दो राउंड्स जिनेवा में हुए थे। 26 फरवरी को आखिरी राउंड हुआ था और उसके बाद फिर वो थर्सडे था। उसके बाद फिर वो चौथा राउंड मंडे को शुरू होना था। लेकिन सैटरडे को ये जंग की शुरुआत हो गई। एकदम से अचानक अमेरिका और इजराइल ने हमला कर दिया। इस उसके बाद से देखिए लेकिन एक 40 दिन की जंग भी हुई है। तो जब जंग होती है तो जाहिर है कि दोनों साइड जो है दोनों एडवर्सरीज अपनी ताकत को डेमोंस्ट्रेट भी करते हैं और दुश्मन की ताकत को देखते भी हैं, भापते भी हैं। तो अमेरिका और ईरान अपनीपनी ताकत दिखा चुके हैं। अपनी-अपनी जो उनकी जो स्ट्रेटेजिक एज है वो दिखा चुके हैं। ईरान प्रूव कर चुका है कि भाई यू नो यू कैन नॉट टेक अस स्लाइटली ईरान हैज़ प्रूवन इट। ये एक जो जंग शुरू हुई थी वो अमेरिका और इजराइल ने ईरान के ऊपर हमला बोला था। बहुत बुरी तरह हमला बोला था। जिसमें उनकी ईरान की पूरी लीडरशिप जो है डीकपिटेट हो गई थी। उसके बाद ईरान ने पलटवार किया और उस कॉन्फ्लिक्ट का जो पूरा कैनवस है वो काफी बहुत बड़ा फैला दिया। हॉरिजॉन्टली बहुत बड़ा फैला दिया। ना सिर्फ उन्होंने इजराइल के ऊपर पलटवार किया बल्कि बल्कि अमेरिका के जो 13 बेस है मिलिट्री बेसेस हैं उन पे भी हमला बोला। तो ये काफी छह सात कंट्रीज देखिए सात कंट्रीज में ये पूरा कैनवस जो है वो कॉन्फ्लिक्ट का फैल गया था। तो ईरान ने यह प्रूफ कर दिया कि देखिए उनके पास कैपेबिलिटी है कि दे कैन हिट यूएस बेसिस इन इन द मिडिल ईस्ट एंड एज वेल एस ईरान। सो दे कैन फाइट ऑन मल्टीपल फ्रंट्स। हम तो इसी बैक ड्रॉप में देखिए जब दुश्मन एक दूसरे की ताकत का अंदाजा लगा लेता है तो जाहिर बात है कि एक तरह से क्या कहना चाहिए कि एक एडवर्सरी के लिए एक थोड़ा सा वो रिस्पेक्ट कहना तो ठीक नहीं होगा लेकिन एक उसकी ताकत का अंदाजा हो जाता है। तो उस बैक ड्रॉप में जब दोनों टेबल पर बैठेंगे तो अब एक बेसिक फ्रेमवर्क है दोनों का उस पर एग्रीमेंट हुआ था जिस पर सीस फायर अनाउंस हुआ। उसी फ्रेमवर्क पर बातचीत होगी। मेरे ख्याल से जो क्रिटिकल इश्यूज हैं वो उस पर पहले डिस्कशन होगा। वो दो क्रिटिकल इश्यूज मेरे ख्याल से जो नंबर वन होगा स्टेट ऑफ ऑलमोस्ट अगर खोला जाना है तो किस सूरत में खोला जाएगा? उसका मोस्टली मॉनिटरिंग कौन करेगा? उसका कंट्रोल किसके पास रहेगा जो ईरान ने बहुत क्लियरली कह दिया है कि यह लेवरेज हम कभी नहीं छोड़ेंगे और इसको इसको कंट्रोल करते रहेंगे। दूसरा जो है वो देखिए सीज फायर जो आगे चलेगा यह 14 दिन का सीज फायर है। इसकी और इसको आगे बढ़ाने की बात हो सकती है। वाइल पेंडिंग इशज़ आर डिस्कस्ड। तीसरी बात यह हो सकती है कि भाई कल अगर पहला राउंड है बातचीत का तो अगला राउंड कब होगा? क्या अगला राउंड अगला राउंड क्या फिर इस्लामाबाद में होगा या कहीं हो कहीं और होगा या फोन पे होगा? कैसे होगा? यह सारी चीजें जो है देखिए ये पहली मीटिंग है। यह पहली मीटिंग होना ही अपने आप में मुझे लगता है कि एक एक तरह की प्रोग्रेस है कि दोनों डेलीगेशंस आ रहे हैं। एक डेलीगेशन पहुंच चुका है। दूसरा डेलीगेशन ऑन रूट है। तो देखिए उम्मीद तो है कि कुछ ना कुछ इसमें हल निकलेगा। जेडी व साहब लेकिन एक एक यहां पर एक ज़हन में एक सवाल तो यह आता है कि मान लीजिए यह कॉन्वर्सेशन जो पहला राउंड है यह कामयाब रहता है। दूसरा राउंड भी होता है और एक तरह का जो यह कहा जा रहा है कि दो हफ्ते की सीज फायर क्योंकि अमेरिका की तरफ से भी ये कहा गया कि 10 दिन ही है। जेरी वेंस ने ये कहा 10 दिन का ही एक तरह का सीज फायर है। उन्होंने ये नहीं कहा कि बातचीत अभी शुरू हो रही है। फिर हम आगे देखते हैं किस तरह से चीजें अनफोल्ड होती हैं। अगर यह दो हफ्ते का ही रहता है। तो फिर उसके बाद क्या क्या यह नहीं है कि अमेरिका को एक इनफ टाइम दिया जा रहा है? क्या अमेरिका टाइम बोरो करना चाहता है? और क्या इस बीच ईरान को भी एक तरह से वक्त मिल रहा है और क्या इजराइल इसमें किसी तरह से एक भेदी का काम नहीं कर सकता है। ये तमाम सवाल जो है वो ज़हन में तो आते हैं जब जबकि ये कन्वर्सेशन भी शुरू हो रही है तब भी। देखिए जाहिर बात है कि जब यह जब जब सीज फायर जब अनाउंस करते हैं तो भाई कोई ना कोई तो मंशा रहती है। तभी तो आपकी सीज फायर आपने अनाउंस किया है। दोनों एडवर्सरीज जो है दोनों दोनों को इस बात का एहसास हुआ कि भाई सीज फायर होना चाहिए और उसके बाद फिर बातचीत होनी चाहिए। तो द वेरी फैक्ट दैट यू नो बोथ हैव डिसाइडेड टू स फेस टू फेस अक्रॉस द टेबल। ये ये भी एक प्रोग्रेस कही जाती है। प्रोग्रेस मानी जाती है। वो भी एक थर्ड वेन्यू में न्यूट्रल वेन्यू में बैठ के दोनों दोनों एडवर्सरीज बात करेंगे। दोनों दोनों साइड से बहुत हाई रैंकिंग ऑफिशियलल्स हैं। जैसे मैंने कहा कि अमेरिका के उपराष्ट्रपति वाइस प्रेसिडेंट जे डी वांस ये ये पहले ही पहला मौका है 79 के बाद से कि इतनी बड़े हाई रैंकिंग यूएस ऑफिशियल की किसी ईरानियन डेलीगेशन से फेस टू फेस बातचीत हो रही है। तो बातचीत होना ही अपने आप में मुझे लगता है एक प्रोग्रेस है। जाहिर बात है कि ये बहुत सारे कॉम्प्लेक्स इश्यूज हैं। जो जो इशूज़ एक दिन में या 2 दिन में नहीं सॉर्ट आउट किए जा सकते। बट आई एम श्योर कि इसमें कोई एक ऐसा एजेंडा होगा जो ग्रेजुअल डीएस्केलेशन की के लिए कोशिश करेगा। जेरीवांस ने ये कहा कि भई ये जो लिस्ट दी गई है वो पहले ही पढ़ते ही डोनाल्ड ट्रंप ने डस्टबिन में फेंक दी थी। से पहले तीन-चार इशूज़ हैं जिसप बात होगी। बट ऑब्वियसली ये इंटेंशन यह होगी कि ग्रेजुअली डी एस्केलेट किया जाए। देखिए रही बात इजराइल की तो इजराइल की तो देखिए हिस्ट्री रही है साइबोटाज की और बैकस्टबिंग की। इजराइल हमेशा यह कोशिश करेगा कि ये टॉक्स फेल हो जाए और अमेरिका वापस इस जंग के मैदान में आ जाए। देखिए मुझे ऐसा लगता है कि डोन्ड ट्रंप साहब जो है इस कॉन्फ्लिक्ट से एक तरह से बोर हो चुके हैं और वो अब उनके पास ज्यादा पेशेंस है नहीं। वो इसीलिए कोशिश ये करना है कि कोई ना कोई ऐसा एक मेजर उसमें एग्जिट रैंप मिल जाए जिससे वो सीज फायर को एक्सटेंड कर दिया जाए और उसके बाद फिर ये इसका अपना रोल खत्म कर दें। देखना यह है कि ईरानियन साइट देखिए ईरानियन साइट के पास लेवरेज है स्टेट ऑफ हार्मोस का। तो देखना यह है कि इसमें ईरानियन साइट क्या ऑफर कर सकता है अमेरिका को डोनल्ड ट्रंप को क्या चीज ऑफर कर सकता है इस मौके पे जो कि पहला राउंड होने जा रहा है कल सैटरडे को इस्लामाबाद में वो अगर ऐसी कोई अट्रैक्टिव इंसेंटिव है ऐसा कोई ऑप्शन है ऐसा कोई वो है जिससे डोनल्ड ट्रंप साहब राजी हो जाए और क्योंकि देखिए वो भी एक बिजनेसमैन है वो भी यह चाहेंगे कि हमको यू नो दे वुड लाइक टू गो बैक टू वाशिंगटन जेडी वुड लाइक टू रिटर्न टू वाशिंगटन विथ अ गुड स्टोरी। तो अगर उनको ऐसा कुछ ऑफर मिल जाता है कि जिससे यह सीज फायर को एक्सटेंड किया जा सके या एट द वेरी लीस्ट दे डिसाइड दे डिसाइड टू मीट अगेन एंड अनाउंस द डेट कल ही। तो मेरे ख्याल से यह प्रोग्रेस होगी। कल आई एम श्योर बाय बाय इवनिंग कोई ना कोई अनाउंसमेंट जरूर होगा और उसके बाद फिर अनाउंसमेंट के बाद अगर कोई एक नई डेट अनाउंस होती है तो मेरे ख्याल से वो एक बड़ी प्रोग्रेस होगी। जी जी दो क्वेश्चन है मेरे इसके साथ जुड़े हुए कि जब आपने कहा कि इजराइल की हमने देखा है कि वो सबटज करता रहता है या फिर उसका हमेशा से धोखा देने का एक तरह से रिकॉर्ड रहा है। मेरा सवाल यह है कि अगर उसी जज लॉबी या जाइनस लॉबी के दबाव में अमेरिका ने इतनी बड़ी जंग में शामिल होने का फैसला किया जो एक तरह से ईरान के ऊपर थोपी गई तो क्या आपको लगता है कि उस उस लॉबी का दबाव अभी डोन्ड ट्रंप पे नहीं होगा। अह दूसरा या पीटर हेग्सेस की बात करें या फिर कुशनर की हम बात करें। वह उनके कहने पर ही यह वॉर एक तरह से जिस तरह से डोन्ड ट्रंप ने कहा ये छेड़ी गई थी वो तो अभी भी वहीं पर है। उनका प्रभाव भी है। तो क्या उनका प्रभाव यह नहीं होगा? ऐसे दौर में आखिर हुआ ऐसा क्या है कि वो तमाम चीजें तो एक तरफ है ही। लेकिन फिर भी डोनल्ड ट्रंप ने यह फैसला किया कि दो हफ्ते की सीज फायर की जाए। क्योंकि जो खबरें हैं जिसको आप आप उनकी पुष्टि करिएगा, कंफर्म करिएगा। यह कहा गया कि अमेरिका की तरफ से ही पाकिस्तान को दरअसल पिक्चर में लाया गया और यह कहा गया कि वो सीज फायर या बातचीत आगे करना चाहते हैं और फिर पाकिस्तान ने ईरान से इस पर बात की और तब ये चीजें आगे बढ़ी हैं। कैसे देखते हैं आप इस पूरे पूरे सिनेरियो को? देखिए पाकिस्तान को इसलिए चुना गया क्योंकि बिकॉज़ पाकिस्तान को मेरे ख्याल से सऊदी अरेबिया का इसमें सपोर्ट था और चाइना का सपोर्ट था। दूसरी चीज जो जो अमेरिका के जो ट्रेडिशनल एलई है नेटो के नेटो कंट्रीज जो है नेटो मेंबर कंट्रीज उनसे जो खटपट हुई है इस जंग के दौरान जाहिर बात है कि कोई ऐसी कंट्री नहीं है जो आगे बढ़ के इसमें मीडिएशन कर पाती या इस पोजीशन में अभी कोई भी ऐसी कंट्री नहीं है। हालांकि ट्रेडिशनली ये देखा गया है कि कंट्रीज जैसे फ्रांस है या या यूके है। इन कंट्रीज ने काफी ऐसे इंटरनेशनल कॉन्फ्लिक्ट्स में अपना एक रोल अदा करते हैं। लेकिन इस मामले में नहीं कर पाए बिकॉज़ ऑफ यूनिक जो एक जो इश्यूज जो डेवलप हुए हैं डोन्ड ट्रंप की इंसिस्टेंस कि आप जंग जाइन करिए और नेटो एलआई ने मना कर दिया। तो अब ऑप्शन बचता था कि कोई ऐसा कंट्री जो एक जो जिसके जिसके रिलेशंस गल्फ कंट्रीज से भी हो, ईरान से भी हो, अमेरिका से भी हो। तो इस तरह से पाकिस्तान जो है एक मेरे ख्याल से इसलिए एक ऐसा वो ऐसा ऑप्शन उभरा जिस जिसको जो है जिसको बोथ एक न्यूट्रल ग्राउंड है और ईरान का नेबर भी है और गल्फ कंट्रीज से गल्फ से बहुत पास में है गल्फ से बिल्कुल तीन घंटे की फ्लाइट है वहां से तो मेरे ख्याल से इसीलिए उनको सेलेक्ट किया गया है। अब यह इसमें देखना यही है कि इसमें जो पूरा जो बातचीत का जो फॉर्मेट है वो क्या होता है? क्या इसमें जो बातचीत होगी इसमें दो डेलीगेशन के अलावा पाकिस्तानी डेलीगेशन भी मौजूद होगा? क्या इसमें पाकिस्तान से शाहबाज शरीफ या आसिम मुनीर मौजूद रहेंगे डिस्कशंस में नेगोशिएशंस में या ये सिर्फ दोनों के बीच में बातचीत होगी तो कई सारी चीजें हैं। मेरे ख्याल से ये डिटेल्स देर रात को या कल सुबह तक आएंगी कि फॉर्मेट कहां पे है? वेन्यू कहां पे है? एक कोई अभी एक होटल का नाम आ रहा है जो एक वेन्यू है इस्लामाबाद में वहां फॉरेन मिनिस्ट्री की बिल्डिंग के पास में कोई एक होटल है जिसमें यह बातचीत हो सकती है। तो अभी बहुत सारी चीजें हैं जो डिसाइड होनी है। इसमें सबसे बड़ी बात अभी क्लियर नहीं है कि एक्सजेक्टली बातचीत क्या होनी है। देखिए सीज फायर हो चुका है। एक वर्किंग एक फ्रेमवर्क अनाउंस हो चुका है। लेकिन अभी फरी तौर पे क्या ऐसी चीजें हैं सेटल करनी है जिनसे नंबर वन कॉन्फिडेंस बिल्डिंग थोड़ा सा हो सके दोनों साइड से जंग इसको डी कॉन्फ्लिक्ट को डीएस्केलेट किया जा सके कुछ एक दो लेवल और आगे की स्टेप्स के बारे में डिसाइड हो सके। बस यही तीन दो या तीन ऐसी चीजें हैं जिनके बारे में बातचीत हो सकती है। और मेरे ख्याल से कुछ घंटे बचे हैं। अब तो 24 घंटे से भी कम है। हमें बहुत जल्दी कुछ ना कुछ सुनने को मिलेगा। आपका दूसरा जो सवाल का दूसरा पार्ट था वो क्या था उसको दोहरा दीजिए। जी मैं ये कह रही थी कि जो जाइनिस लॉबी है या जस लॉबी जो है उसका असर जब जंग शुरू हुई थी तब भी था और वो अभी भी ऐसा तो है नहीं कि वो खत्म हो गया। तो अभी अचानक ऐसा क्या हुआ है कि डोनाल्ड ट्रंप जो है वो सीज फायर की बात कर रहे हैं। लेकिन नितिन याहू वही कर रहे हैं जो वो कर रहे थे और वो नहीं चाहते हैं कि किसी भी तरह की सीज फायर की बातचीत कोई भी हो। इसीलिए इन्होंने लेबनान पर इतना बड़ा हमला किया। देखिए जानेस लॉबी तो आप सही कह रही हैं कि जानेस लॉबी का बहुत बड़ा इनफ्लुएंस है और उन्होंने डोनल्ड ट्रंप को उनके कैंपेन को बहुत फंडिंग भी की थी और दूसरा नेतन्या से उनकी पर्सनल फ्रेंडशिप भी है और इसीलिए नेतान्या की बात उन्होंने डोनल्ड ट्रंप ने मानी बावजूद इसके कि उनके खुद एडवाइर्स और मिनिस्टरर्स जो हैं जो सीनियर हाई रैंकिंग ऑफिशियलल्स हैं इंक्लूडिंग द सीआईए डायरेक्टर एंड जेडी वां उन्होंने साफसाफ मना किया था इस जंग जंग को शुरू करने के लिए। बावजूद इसके डोन्ड ट्रंप साहब नेहू की बात मानी और ईरान के ऊपर अटैक किया। लेकिन उसके साथ-साथ देखिए ये सीज फायर भी अमेरिका की तरफ से ही इनिशिएट हुआ है। इसमें कई कंट्रीज इन्वॉल्वड थी। टर्की थी, इजिप्ट थी, सऊदी अरेबिया था, चाइना था। तो बैक एंड फोर्थ डिप्लोमेसी में देखिए इसमें काफी हुआ है। और जाहिर बात है कि एक जो व्यू है वो दैट दिस व्यू यू नो रेमेंडिंग अ सीज फायर एंड एंड गिविंग डिप्लोमेसी अ चांस आई थिंक दिस व्यू हैज़ प्रिवेल्ड इन वाइट हाउस फॉर द टाइम बीइंग अब आगे देखना है जाइनेस लॉबी का आप देखिए प्रेशर बरकरार है वो हमेशा बरकरार रहेगा लेकिन उसके साथ-साथ देखिए वाइट हाउस डोनल्ड ट्रंप साहब अमेरिका के भी राष्ट्रपति हैं उनको अपनी जिम्मेदारी के बारे में खूब पता है तो वह वो वो मेरे ख्याल से अगर समझदार होंगे तो वो अमेरिका के भी इंटरेस्ट के बारे में बात करेंगे। उनकी मिलिट्री के बारे में भी बात करेंगे या सोचेंगे। कल इत्तेफाक से संडे को संडे को संडे से नेताू साहब का ट्रायल भी शुरू हो रहा है करप्शन का। इजरयली कोर्ट्स ने नोटिफिकेशन दे दी है कि ये ट्रायल हम शुरू कर रहे हैं। शायद ये फास्ट ट्रैक ट्रायल होगा। हफ्ते में दो दिन हियरिंग होगी। तो ये एक ये भी एक नया डेवलपमेंट है जो इजराइल में शुरू होने जा रहा है। मेरे ख्याल से आने वाले दिन बड़े इंटरेस्टिंग रहेंगे। जी बिल्कुल ट्रायल होने जा रहा है और शायद इसीलिए भी नेतन याू चाहते हैं अपार्ट फ्रॉम यू नो व्हाट ही हैज़ ऑल ऑलवेज बीन स्टेटिंग कि ग्रेटर इसराइल की जो वो बात करते हैं जिस तरह से लेबनान पर उन्होंने हमला किया। ये भी कहा जा रहा है कि गजा में भी नए तरीके से कुछ हमले जो है वो शुरू हो सकते हैं। मैं इजराइल के एक मंत्री को सुन रही थी और इसके अलावा सीरिया में भी मोर्चा खोलने की बात हो रही है। ईरान में जो हो रहा है वो तो हम देख ही रहे हैं। तो क्या दुनिया में क्या कुछ हो रहा है और आगे क्या होने जा रहा है। बहुत ही खतरनाक इंटरेस्टिंग तो मैं नहीं कहूंगी। खतरनाक दिन है आने वाले कि कुछ अनफोल्ड हो सकते हैं। अगर ये जो वॉर है इसमें ये जो पॉज हुआ है ये जो सीज फायर हुई है अगर यह किसी तरीके से टूट जाती है। या फिर दो हफ्ते के बाद दोबारा से सिचुएशन जो है वो उसी तरीके से बैक टू स्क्वायर अगर आ जाती है। ऐसा लग रहा है बॉबी नकवी साहब कि ईरान जो है वो स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस पर किसी भी तरीके से क्योंकि उसके लिए सबसे ज्यादा इंपॉर्टेंट पॉइंट है। वो मानने के लिए तैयार नहीं है। उसी बात को बार-बार कहा जा रहा है। मुस्तबा खामनाइन का भी जो बयान आया है आफ्टर 40 डज़ जो उन्होंने देश के नाम ईरान के नाम जो उन्होंने अपना मैसेज दिया है उसमें भी उन्होंने स्टेट ऑफ़ हॉर्मोस की बात की है। उन्होंने जीसीसी कंट्रीज को भी बात की बात की है। उन्होंने कहा है कि शैतानी ताकतों को वो पहचाने। ब्रदरहुड की उन्होंने बात की है। तो लेकिन स्टेट ऑफ हॉर्मोस उन्होंने उसमें शामिल किया है और अमेरिका का भी ट्रिगर पॉइंट यही है। तो क्या आपको लग रहा है कि घूम फिर के जो पॉइंट है सबसे इंपॉर्टेंट वो स्टेट ऑफ हॉर्मोस ही बनकर रह गया है। बाकी पॉइंट्स जो हैं वो सेकेंडरी या फिर बिल्कुल गैर जरूरी होते जा रहे हैं। जी जाहिर बात है कि देखिए स्टेट ऑफ़ हॉर्मोन्स जो है वो ग्लोबल इकॉनमी के लिए बहुत क्रिटिकल वो है। हम वहां से 20% ना सिर्फ तेल आता है बल्कि 20% नेचुरल गैस आती है। 33% फर्टिलाइजर आता है, सल्फर आता है, हीलियम आता है, 8% एलुमिनियम आता है। और बहुत बड़ा एक देखिए कॉमर्स का एक वो मेजर ट्रांजिट पॉइंट है। वो और शूस कैनाल जो है तो ये देखिए ये पूरा जाहिर बात है कि अगर वो बंद कर दिया जाता है तो उससे पूरी ग्लोबल इकॉनमी को बहुत बड़ा झटका पड़ेगा। इसका असर जो 40 दिन 40 दिन की जो जंग हुई है ऑलरेडी इसका असर हुआ है। तेल जो है महंगा हुआ है। और देखिए अभी जो पूरी तरह से इसका असर दिखना इसलिए भी नहीं शुरू हुआ था क्योंकि जब ये जंग 28 फरवरी को शुरू हुई थी तो उसके पहले के जो शिप्स जो वहां से निकल के गए थे ट्रांजिट में वो अब तीन-चार हफ्तों बाद अपने-अपने डेस्टिनेशंस पहुंच रहे होंगे। देखिए ये जो क्रूड के जो टैंकर्स होते हैं इनकी स्पीड बहुत कम होती है। ये अपनी-अपनी सप्लाई लेके अब पहुंच रहे होंगे। तो लेकिन अब अब उसके बाद से कोई सप्लाई नहीं पहुंचेंगी। तो ये क्राइसिस जो है यू नो ऑयल क्राइसिस अगर ये स्टेट ऑफ हॉलमोस्ट में ब्लॉकेट मेंटेन रहता है तो क्राइसिस विल विल स्लोली अनरवल यू नो इन द कमिंग डेज और आप देखेंगे कि तेल की कीमतें बहुत ज्यादा आगे बढ़ेंगी। तो कुल मिला के देखिए डोनल्ड ट्रंप साहब को भी मालूम है कि ये वो भले ही सेल्फ सफिशिएंट हो ऑयल ऑयल प्रोडक्शन में लेकिन जब ग्लोबली जब कीमतें बढ़ती है तो लैंडिंग प्राइस जो है वो वो चाहे वो अमेरिका हो चाहे या दूसरी कंट्री हो वहां पे लैंडिंग प्राइस हमेशा इफेक्ट करेगी। इसीलिए आपने देखा था कि जंग जब पीक पे पहुंची थी तो उस दौरान जो गैसलीन की जो प्राइसेस हैं अमेरिका में वो भी रिटेल प्राइसेस में काफी बदलाव आया था। काफी चेंज आया था। बढ़ गई थी। तो वो यह नहीं चाहते नवंबर इलेक्शन के पहले कि वो इस तरह का ऑयल की प्राइसेस बढ़े। दूसरी चीज जो इस इस जंग के लिए अमेरिका में डोमेस्टिक सपोर्ट जो है वो बहुत कम है। 20 24% है। तो ज्यादातर मेजॉरिटी लोग जो है वो जंग ये हम नहीं चाहते कि अमेरिका इस जंग में जंग को जारी रखे या कंटिन्यू रखे। तो ये सारी चीजें दूसरा उनको उनके पास उनके उनको उनके पास कोई एक क्लियर ऑब्जेक्टिव नहीं है इसके अलावा तो डोनल्ड ट्रंप साहब के पास यह बातचीत इसलिए भी है क्योंकि उनको एक ओपोरर्चुनिटी मिल रही है कि अगर स्टेट ऑफ होमोस्ट खुल सकता है भले ही वो ईरानियन कंट्रोल में रहे लेकिन अगर खोल दिया जाएगा तो कम से कम ऑयल का ट्रैफिक तो चलने लगेगा। बाकी जो उसके मैकेनिज्म है कि कितने दिनों तक ईरानियन कंट्रोल में रहेगा या ईरान कितना टोल वसूल करता है या गल्फ कंट्रीज को ये एक्सेप्टेबल होगा कि नहीं होगा तो ये सारी चीजें जो है ये बाद में डिसाइड की जा सकती हैं। आई थिंक उनके लिए प्रायोरिटी ये है कि किसी तरह से ट्रैफिक खोल दिया जाए। जी जी दो लास्ट क्वेश्चंस मेरे आपसे कि पाकिस्तान को आपको लग रहा है कि अचानक जो वर्ल्ड पॉलिटिक्स है उसमें एक तरह से सेंटर बनाकर खड़ा हो गया है और बहुत इसको पाकिस्तान में सेलिब्रेट भी किया जा रहा है कि देखिए इतनी बड़ा बड़ी जंग जिसमें पूरी दुनिया एक तरह से जाहरी तौर पर या फिर डायरेक्टली इनडायरेक्टली इनवॉल्व है उसमें नेगोशिएशन की जो बातचीत हो रही है उसके डेस्टिनेशन के तौर पर चुना गया है पाकिस्तान को और ये भी कहा गया कि जिस रात ये डर था कि कोई बहुत बड़ा हमला हो सकता है। उस रात चाइना और पाकिस्तान के बीच में बहुत कम से कम 20 से 22 कॉल्स हुई। तो ये बताया जा रहा है कि देखिए चाइना भी हमारे करीब है, अमेरिका भी हमारे करीब है, सऊदी अरब भी हमारे करीब है और ईरान भी हम पर भरोसा दिखा रहा है। तो सडनली ये दिखाया जा रहा है कि देखिए अमेरिका पाकिस्तान जो है वो कितना इंपॉर्टेंट है। सब उस पर यकीन करते हैं। और दूसरा ये सवाल भी उठाया जा रहा है कि अगर जंग से दो दिन पहले नरेंद्र मोदी ने इजराइल नहीं गए होते। वहां इस तरह का मैसेज नहीं दिया गया होता और उन्होंने एक अपनी साइड चुन ली तो हो सकता है कि पाकिस्तान ना होकर वो डेस्टिनेशन इंडिया भी हो सकता था क्योंकि हमेशा हमने इस तरह की बातों को आगे बढ़ाया है। हम हमेशा से पीस मेकर की भूमिका में रहे हैं। लेकिन क्या आपको लग रहा है वो चांस कंप्लीटली हिंदुस्तान ने खो दिया? और क्या एके आप नुकसान के तौर पर देखते हैं और दूसरा पाकिस्तान वाला मेरा सवाल। देखिए वो पाकिस्तान को आप एक क्रेडिट दे सकते हैं कि दे हैव मैनेज टू स्ट्राइक अ बैलेंस बिटवीन चाइना एंड यूएस। दोनों दोनों कंट्रीज से रिलेशंस जो है उन्होंने बना के रखे हैं और पिछले खासतौर पे से पिछले एक साल में तो देखिए कि जो उनके आर्मी चीफ है आसिम मुनीर साहब वो दो बार डोनल्ड ट्रंप से मिले भी हैं। तो वो बैलेंस उन्होंने बनाया है। दूसरी दूसरा जो उनके जो गल्फ कंट्रीज में जो रिलेशनशिप है खासतौर पे से सऊदी अरेबिया जिससे इन्होंने रिसेंटली एक सिक्योरिटी एग्रीमेंट भी साइन किया है। तो वो आई थिंक ऑल दिस है गॉन इन फेवर ऑफ पाकिस्तान। तब देखना अब अगर ये जो बातचीत जो शुरू हुई है एंड दैट लीड्स टू सम काइंड ऑफ रेोल्यूशन जिसको एक कोर्ट अनकोट एक नाम दिया जा रहा है इस्लामाबाद अकॉर्ड का तो जाहिर बात है कि ये हिस्ट्री बुक्स में बहुत बड़ी मेजर एक पीस डील के बारे में के रूप में देखा जाएगा और जाहिर बात है कि इसमें पाकिस्तान का जो डिप्लोमेटिक प्रोफाइल है वो बढ़ेगा। अब रही बात मोदी जी के इजराइल जाने से और उसके बाद यू नो इंडिया लूजिंग दिस ओपोरर्चुनिटी। अब देखिए कुछ कहा नहीं जा सकता कि इंडिया को ये ओपोरर्चुनिटी मिलती कि ना मिलती। दैट इज अ सेपरेट इशू कि भाई मोदी जी को वहां जाना चाहिए था कि नहीं जाना चाहिए था। कंसेंस ये है कि दैट ट्रिप वाज़ अननेसेसरी। इट कुड हैव बीन अवॉयडेड और इट वास टू मच ऑफ़ अ कोइंसिडेंस कि वो जंग शुरू होने के ठीक दो दिन पहले जो है वहां पे मौजूद थे। तो ये अब इन हैंड साइड यू कैन ऑलवेज से कि भाई यू नो दैट दिस ट्रिप वाज़ अननेसेसरी बट ये भी कहना एक आई थिंक इट वुड बी फार फच कि अगर वहां नहीं जाते तो हो सकता है इंडिया को ये ओपोरर्चुनिटी मिल जाती। आई थिंक पाकिस्तान हैज़ मैनेज टू गेट दिस एस टू यू नो मैनेज टू हैव प्लेस इटसेल्फ इन लाइमलाइट ग्लोबल स्पॉटलाइट बिकॉज़ बिकॉज़ ऑफ़ इट्स यूनिक पोजीशन इन दिस इन दिस इन द करंट सरकमस्ट्ससेस कि वो एक ईरान के नेबर हैं। गल्फ कंट्रीज से उनके अच्छे रिश्ते हैं। सऊदी अरेबिया से अच्छे रिश्ते हैं। चाइना के बहुत करीब है और डोनल्ड ट्रंप के बहुत करीब है उनके आर्मी चीफ। आई थिंक ऑल दिस हैज़ वर्क्ड इन पाकिस्तान फेवर। अब अगर इसमें कोई 20 रेोल्यूशन कोई पॉजिटिव डेवलपमेंट इस बातचीत से निकल आता है तो जाहिर बात है कि पाकिस्तान विल बेनिफिट। जी जी बिल्कुल लास्ट मेरा सवाल आपसे जीसी कंट्रीज को आप कहां देख रहे हैं? इस जंग के दौरान की मैं बात कर रही हूं और अभी जो ये सीज फायर हुई है ये जो मिडिएशन हो रहा है इस सब के दौरान क्योंकि अगर मुस्तफा खामनाई ने फिर से ये आगाह किया हो और वो बात ये कर रहे हो कि अभी भी ब्रदरहुड की वो बात कर रहे हैं पड़ोसियों की वो बात कर रहे हैं वो ये भी कह रहे हैं कि आप उन शैतानी ताकतों को उनका इशारा जाहिर सी बात है इजराइल अमेरिका की तरफ है कि उनको आप पहचाने और जो 10 पॉइंट्स जो रखे गए हैं उन 10 पॉइंट्स में ये भी है कि जो अमेरिकन बेसिस हैं इन जीसीसी कंट्रीज में उनको भी हटाया जाए। उन पॉइंट्स में को में जो शुमार किया गया है। तो जीसीसी कंट्रीज की पोजीशन को आप कैसे देख रहे हैं? खासतौर पर मैं यहां पर बात यूएई और सऊदी अरब की खासतौर पे करूंगी क्योंकि उनको लेकर कई तरह की ये बातें कही गई। ये कहा जा रहा है। मैं इनको कंफर्म नहीं कर रही हूं। बट देयर आर न्यूज़ ऑन सोशल मीडिया एंड पीपल आर टॉकिंग अबाउट इट कि व्हेन दिस वॉर स्टार्टेड तब भी यह था कि यूएई और सऊदी अरब ने कहा कि नहीं उनकी तरफ से एक ग्रीन सिग्नल था। अभी भी यह कहा जा रहा है कि उनकी तरफ से यह कहना है कि नहीं नहीं यह वॉर जो है आखिर तक होनी चाहिए और और लगातार हमने यह भी देखा कि चाहे अमेरिकी जनरल हो या फिर अमेरिकी ऑफिशियल्स हो उन्होंने बाकायदा तौर पर मीडिया में आकर तमाम कंट्रीज का नाम लेकर क़तर, कुवैत, यूएई और बहरीन से लेकर सऊदी अरब सबका नाम लिया और कहा कि थैंक यू उनको बोला। तो कैसे देखते हैं आप इस इस पूरी सिचुएशन को? देखिए यह जंग जब खत्म होगी तो जाहिर बात है कि जो रीजन की जो कंट्रीज है दे विल दे विल लुक एट दिस देयर जियोपॉलिटिकल रिलेशंस डिप्लोमेटिक टाई मिलिट्री टाई आई थिंक आज यूएई के जो प्रेसिडेंशियल एडवाइजर हैं डॉक्टर अनवर गरगाश उनका एक स्टेटमेंट भी आया है कि हम वी विल रीक एट आवर टाई रीजनल एज वेल एस इंटरनेशनल टाई जब यह जंग खत्म होगी तो जाहिर बात है कि इन कंट्रीज को कुछ ना कुछ तो सोचना पड़ेगा। रही बात यह अमेरिका के मिलिट्री बेसिस का तो देखिए काफी बेसिस जो है वो डैमेज हुए हैं। अब सवाल पहला सवाल यही उठेगा कि नंबर वन क्या इन कंट्रीज को सोचना पड़ेगा कि भाई जब यह बेसिस थे तो हमको तो आप प्रोटेक्ट कर नहीं पाए। हमारी कंट्रीज के ऊपर आपके बेसिस की वजह से हमले हुए। दूसरा इन बेसिस को क्या अगर रिकंस्ट्रक्शन होना है तो इसका पैसा कौन देगा? इसमें से काफी बेससेस जो थे वो होस्ट कंट्रीज जो है वह मैनेज करती थी। वहां पर अमेरिकी फर्सेस जरूर मौजूद थे लेकिन वो दे मैनेज्ड बाय ऑपरेटेड बाय बाय द होस्ट कंट्रीज। तो अब यह भी देखना है कि क्या होस्ट कंट्रीज इतना पैसा खर्च करने के लिए तैयार होंगी। तो दिस इज समथिंग आई थिंक दैट जीसीसी एंड एंड द अमेरिकनंस विल हैव टू एक्चुअली डिसाइड गोइंग फॉरवर्ड कि अमेरिका का रोल क्या रहेगा। यह अमेरिका को खुद भी सोचना है कि जो मिलिट्री प्रेजेंस है, इतनी मिलिट्री प्रेजेंस इसकी अमेरिका को जरूरत है या नहीं है। अगर है तो किस शेप में की जा सकती है? गिवन दी इमर्जिंग सिने जियोपॉलिटिकल सिनेरियोस द राइज ऑफ़ ईरान। भाई ईरान देखिए अब अब आगे जो है अगर ईरान से एक बातचीत पॉजिटिव उस पर शुरू होती है और एक टजेबल रिलेशनशिप इस्टैब्लिश होती है बिटवीन ईरान एंड यूएस एंड बाय एक्सटेंशन टू बिटवीन द जीसीसी कंट्रीज एंड एंड ईरान आल्सो तो ये सारी चीजें आई थिंक एक जब एक रिलेशनशिप एक्टब्लिश कर लेते हैं तो उसके बाद फिर नई डायनेमिक्स और नए सरकमस्ट्ससेस पैदा होते हैं। ठीक है? उस इस उस सारे बैक ड्रॉप में सारे इश्यूज को देखा जाएगा। इंक्लूडिंग जो इजराइल की रिलेशनशिप है जीसीसी कंट्रीज से और द इशू ऑफ़ पलेन आल्सो। तो ये बहुत सारी चीजें हैं जो आने वाले महीनों और सालों में हमको नई चीजें देखने को मिलेंगी। अगर ये एक इफ दिस वॉर एंड्स ऑन अ पॉजिटिव नोट और किसी तरह का कोई एग्रीमेंट अमेरिका और अमेरिका और ईरान के बीच में हो जाता है। देखिए अमेरिका और ईरान के बीच में एक तरह की अगर कोई संधि होती कोई पीस फायर कोई सीज फायर होता है कोई पीस डील होती है तो मेरे ख्याल से ये इसके इसके बहुत फायदे लॉन्ग टर्म लॉन्ग टर्म में काफी बेनिफिशियल होगा दोनों कंट्रीज के लिए और रीजन के लिए भी। अब देखना यही है कि इसमें जो जिओपॉलिटिकल एंबिशंस है रीजनल कंट्रीज के और इजराइल के खासतौर पे से वो उनमें कोई कॉन्फ्लिक्ट ना हो। हम हर कंट्री का अपना एक एंबिशन होता है। इजराइल की भी अपनी कंसर्न्स है और उनके एंबिशंस भी हैं। तो वो एंबिशन इफ दे आर इन कॉन्फ्लिक्ट विद व्हाट अमेरिका इस थिंकिंग अबाउट ईरान देन ऑब्वियसली ये ये टेंशन हमेशा बनी रहेगी। और अमेरिका और ईरान को और और दूसरी कंट्रीज जो यह चाहते हैं कि पीस हो। मेरे ख्याल से इनको यह सब नेविगेट करना पड़ेगा इसी टेंशन के बीच में कि कैसे ये आगे ये रिलेशनशिप इवॉल्व होती है। अभी अभी इस पे कोई कमेंट करना मेरे ख्याल से बहुत जल्दीबाजी होगी। हमें कल तक का इंतजार करना पड़ेगा कि आगे क्या होता है। अगले राउंड की बातचीत कब होती है? क्या यह अनाउंसमेंट कोई करते हैं? कल अह बातचीत का कोई मसौदा जिस पे कोई दोनों तरफ से एग्रीमेंट होता है कि भाई आगे बातचीत इस पे होगी। कोई दो या तीन ऐसे इशूज़ जिनको सेटल करके कल ये कोई अनाउंसमेंट करें। तो ये सारी चीजों के लिए थोड़ा हमें इंतजार करना पड़ेगा और उससे फिर आगे पता चलेगा कि आगे आने वाले दिनों में क्या होगा। सो जीसीसी कंट्रीज के हवाले से मेरा एक और आपसे सवाल है और मैं इसलिए भी पूछ रही हूं कि गल्फ न्यूज़ के आप एडिटर रह चुके हैं कि जब से ये जंग शुरू हुई है एक जो इमेज बनाई गई थी उसकी सेफ हेवन की वो भी कहीं ना कहीं से एक तरह से धराशाही हुई है। ये भी कहा जा रहा है कि बहुत सारे लोगों की जॉब्स जो हैं वहां पर जा रही हैं। खासतौर पे 1 करोड़ जो इंडियंस हैं लगभग जो पूरे इस इस ख्ते में रहते हैं उनके लिए भी एक बड़ा खतरा मंडरा रहा है। क्योंकि इसलिए मैं ये कह बात कह पा रही हूं कि कुछ मेरे मेरे पर्सनल मेरे खुद जाती मेरी फैमिली के जानने वाले लोग हैं। उनके भी कुछ एक्सपीरियंसेस हैं जो उन्होंने मेरे साथ शेयर किए हैं। आप कैसे देख रहे हैं इस सबको क्योंकि ये एक बड़ा खतरा ये भी है इसके साथ-साथ खासतौर पे यूएई जैसी जो कंट्रीज है कतर है यूएई जिनकी एक इस तरह की एक इमेज थी सेफ हेवन की वो भी कहीं ना कहीं से टूटी है। तो क्या ये कंट्रीज इस सबको लेकर भी ये सोच रही हैं कि आखिर अमेरिका और इजराइल की दोस्ती से हमें हासिल क्या हुआ है या फिर ये टायर्स जो है वो इतने डीप हैं कि ये तमाम बातें शायद उतनी मायने ना रखें। देखिए टू एन एक्सटेंट यस मतलब देखिए यह कंट्रीज जो है खासतौर पर से कतर यूएई और सऊदी अरेबिया इन इन द लास्ट डेकेड और सो यू नो दे हैव इमर्ज एस अ ग्लोबल दे हैव अट्रैक्टेड ग्लोबल टैलेंट ग्लोबल इन्वेस्टमेंट एंड ग्लोबल टेक ये सारी चीजें जो है एंड ग्लोबल फाइनेंस आल्सो तो ये एक एक तरीके से काफी मेजर जो है सेंटर्स के रूप में उभरे हैं इकोनमिक सेंटर्स एंड दे हैव क्रिएटेड जॉब्स इन्वेस्टेड इन टेक्नोलॉजी जो फ्यूचर प्रूफ इंडस्ट्रीज है उसमें काफी इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं और ये मेजर टूरिस्ट डेस्टिनेशन भी है जैसे खासतौर पे से यूएई है तो अब किसी भी कॉन्फ्लिक्ट में देखिए कि एक अगर कोई भी कंट्री इनवॉल्व होती है तो ऑब्वियसली सेफ्टी इशूज़ के बारे में जो है फिर वो सारा फोकस हो जाता है कि इज इट सेफ टू इन्वेस्ट इन द यूएई। अब आने वाले टाइम में आई एम श्योर कि ये कंट्रीज जो है अपनी ये सारी चीजों के ऊपर जो है व्हेन दे व्हेन दे एक्चुअली डसेक्ट द वर्ड एंड एंड ट्राई एंड अंडरस्टैंड हाउ द फ्यूचर आने वाले टाइम में कैसा होगा तो आई एम श्योर दे विल थिंक अबाउट यू नो बैलेंसिंग देयर जिओपॉलिटिकल एंबिशंस एज वेल एज रिस्की जिओपॉलिटिकल एंबिशंस एज वेल एज यू नो देयर इमेज एस अ सेफ हेवन फॉर ग्लोबल इन्वेस्टमेंट एंड टूरिज्म एंड एंड एंड टैलेंट क्योंकि बिना सेफ्टी और सिक्योरिटी के तो ये तीनों चीजें जो है नहीं हो सकती हैं। ना तो इन्वेस्टमेंट आएगा, ना कोई टूरिस्ट आएगा, ना कोई टैलेंट आएगा। तो ये आने वाले टाइम में मेरे ख्याल से ये सब सब चीजों के ऊपर ये कंट्रीज ध्यान रखेंगी और उम्मीद यही है कि यू नो पीस पीस आ जाए। वन थिंग दो आई वुड लाइक टू से इज दैट देखिए ये कंट्रीज जो है बहुत रेिलिएट रेिलिएंट कंट्रीज हैं। दे मूव वेरी फास्ट अगर पीस आने वाले हफ्तों में ये इफ दिस सीस फायर होल्ड्स एंड ये सीज फायर जो टेंपरेरी सीज फायर है अगर ये परमानेंट सीज फायर हो जाता है तो दे कैन यू नो मैनेज दिस क्राइसिस वेरी वेल। जहां तक देखिए इन्वेस्टमेंट का सवाल है इन्वेस्टमेंट इज़ यू नो इन्वेस्ट कैपिटल आउट फ्लो हो सकता है। द कैपिटल आउट फ्लो वही कैपिटल आउट फ्लो हो सकता है जो लिक्विड कैश होता है। जो इन्वेस्टेड या लॉक्ड कैपिटल होता है लॉक्ड इन्वेस्टमेंट होता है वो आउटफ्लो जल्दी इतनी जल्दी नहीं होता है। तो अगर यह क्राइसिस जल्दी खत्म हो जाता है तो दे कैन मिनिमाइज देयर लॉसेस। बट यस आने वाले टाइम में ग्लोबल इन्वेस्टर्स जो है वो जरूर पूछेंगे कि भाई इज इट स्टिल अ सेफ प्लेस। आई थिंक दिस इज बट आई थिंक दी कंट्रीज आर स्मार्ट इनफ दैट दे कैन मैनेज टू कन्वस द इंटरनेशनल कम्युनिटी जो इंटरनेशनल बिजनेस कम्युनिटी है इन्वेस्टर कम्युनिटी है उनको ये कन्वस कर देंगे क्योंकि ये बहुत रेिलिएट कंट्रीज है और बहुत बहुत स्मार्टली दे दे मूव दे बहुत स्मार्टली दे कम्युनिकेट दे कैन मैनेज दिस क्राइसिस मुझे ऐसी उम्मीद है कि दे कैन मैनेज इट जी ओके अब देखना होगा कि आने वाले वक्त में किस तरह से वो मूव करते हैं और किस किस तरह से वो मैनेज करते हैं। बहुत इंपॉर्टेंट होगा ये देखना क्योंकि बहुत सारे लोगों के फ्यूचर इससे जुड़े हुए हैं। लेकिन एट द सेम टाइम यह भी देखना है कि जो उन्होंने अपने आसपास जो दायरे बनाए हुए हैं अमेरिकन जो बेससेस हैं उन उनके बारे में भी उन्हें सोचना पड़ेगा कि आखिर उनसे हासिल उनको क्या हुआ है। जो ये पीस स्टॉक होने जा रही है। इस पर भी सबकी नजर रहेगी। लेकिन बहुत-बहुत शुक्रिया बॉबी नकवी साहब। आपने वक्त दिया। आप नाउ नेटवर्क के साथ जुड़े। बहुत-बहुत शुक्रिया। बहुत-बहुत शुक्रिया आदाब।

Companion article

A War That Paused, Not Ended

Forty days after Israel and the United States launched a sweeping military campaign against Iran, the fighting has slowed but not stopped. Discussing the state of play on Nous Network, host Bushra Khanum Fahad summed up the moment bluntly: roughly "50 percent" of the ceasefire was holding, and "50 percent" was not. Even as delegations prepared to meet for renewed talks, Israel struck Lebanon in a bombardment that, according to the discussion, killed more than 250 people and wounded over 1,100 — barely a day before negotiations were due to resume. The Strait of Hormuz, the narrow waterway through which a significant share of the world's energy trade passes, remained closed, with reports indicating that only tankers which had already departed from Iranian ports before the war began were being allowed through.

Fahad's guest for the conversation was Bobby Naqvi, the former editor of Gulf News and a senior journalist who has long tracked West Asian affairs. Their exchange, recorded as Iranian and American delegations converged on Islamabad, sought to answer the question hanging over the region: whether this fragile pause is becoming peace, or is simply an intermission before the war resumes.

A Historic First Since 1979

The Islamabad meeting carried unusual historical weight. According to Naqvi, it marked the first senior, face-to-face talks between American and Iranian officials since 1979 — the year diplomatic relations between the two countries broke down. On the American side was Vice President JD Vance, dispatched by President Donald Trump. Reports placed Iran's Foreign Minister and the Speaker of Iran's Parliament, Mohammad Baqer Ghalibaf, aboard the Iranian delegation's aircraft, which Pakistani air force jets reportedly escorted from Bandar Abbas to guard against any attempt at sabotage along the route. As the two hosts spoke, Iran's delegation had just landed in Islamabad, with Vance's own flight still en route from Washington.

Naqvi called the very fact that both sides had agreed to sit across the table a form of progress in itself, given how complex the outstanding issues were and how unlikely it was that they could be resolved in a day or two. He expected the opening session to focus on an agenda built around gradual de-escalation rather than a single decisive breakthrough — with the ceasefire's fourteen-day duration, its possible extension, and the timing of a second round among the first matters likely to be discussed.

Why Pakistan

Naqvi explained that Pakistan emerged as host largely because it retained working ties to every relevant party — a neighbour of Iran, close to the Gulf states, backed by both China and Saudi Arabia, and increasingly aligned with Washington through Army Chief Asim Munir's two meetings with Trump. Traditional mediators such as NATO members, he argued, were compromised because Trump had pressed them to join the war outright and they had refused, straining those relationships at precisely the moment a neutral broker was needed. Pakistan, by contrast, had recently signed a security agreement with Saudi Arabia and maintained functioning channels to both Beijing and Washington — reportedly exchanging twenty to twenty-two phone calls with Chinese counterparts on the night a major escalation was feared.

Naqvi suggested that if the talks eventually produce a settlement — already being informally floated as an "Islamabad Accord" — Pakistan's diplomatic profile would rise substantially, and the episode would be remembered as a major peace initiative brokered on its soil.

The Weight of Distrust

Much of the conversation returned to the deep mistrust separating Iran and the United States. Naqvi argued that Iran's suspicion was justified: by his account, three earlier rounds of talks had already taken place before the war — one in Muscat and two in Geneva — with a fourth round scheduled for the Monday after the final Geneva session. The war began instead on the preceding Saturday, catching Tehran off guard. He described this as the second time Washington had, in his words, stabbed Iran in the back during a negotiation process — a history he said explains why Iran no longer takes American assurances at face value.

That history colours the current dispute over Lebanon specifically. Iran has insisted that a ceasefire in Lebanon must accompany any broader agreement — a condition included among the ten points it has presented — while Washington maintains Lebanon was never part of the ceasefire arrangement to begin with. Pakistan, acting as broker, has said Lebanon was in fact included. Naqvi pointed to that very contradiction as evidence of the mistrust still dogging the process, compounded by continued Israeli strikes on Lebanese territory during the pause, which have deepened Iranian suspicion that Israel is trying to sabotage the talks altogether.

Everything Comes Back to the Strait of Hormuz

If one issue threatens to overshadow all others, both speakers agreed, it is the Strait of Hormuz. Iran shut the strait as the war began, and reopening it has become Washington's central precondition for progress. Naqvi laid out its economic stakes: roughly a fifth of the world's oil and natural gas passes through the strait, along with about a third of global fertiliser and sulphur shipments, significant volumes of helium, and eight percent of the world's aluminium supply. He warned that the full economic shock had not yet been felt, because tankers that departed before the war was still only now reaching their destinations after several weeks in transit; once that residual supply runs out, he said, the crisis will begin to unravel and oil prices will climb further.

That prospect worries Trump directly, Naqvi argued — not because the United States lacks oil self-sufficiency, but because a rise in global prices still affects domestic prices at home, and gasoline had already grown noticeably more expensive at the peak of the war, a politically costly dynamic ahead of elections in November. He added that domestic American support for continuing the war stood at only around 24 percent. For his part, Iran's Supreme Leader Ali Khamenei, in his first address after the forty-day war, reaffirmed that Tehran would not give up control of the strait, describing it as leverage Iran intends to keep, while also invoking Gulf "brotherhood" and warning listeners to recognise what he called "satanic forces" — an unmistakable reference to Israel and the United States.

Trump's Calculation, and Netanyahu's Shadow

Fahad pressed Naqvi on an apparent contradiction: pro-Israel lobbying pressure on Trump had not disappeared, so why was he now entertaining a ceasefire at all? Naqvi acknowledged the lobby's continuing influence, including its funding of Trump's campaign and Prime Minister Benjamin Netanyahu's personal friendship with him, noting that Trump had overruled even his own CIA director and Vance, both of whom had reportedly opposed launching the war in the first place. But Naqvi argued Trump now appears weary of the conflict and short on patience, seeking what he called a major exit ramp that would let him extend the ceasefire and step back from direct involvement. The ceasefire itself, he noted, was initiated through American diplomacy that also involved Turkey, Egypt, Saudi Arabia and China — suggesting that, for the time being at least, the view favouring diplomacy has prevailed inside the White House, even as lobby pressure persists in the background.

Israel's own incentives complicate the picture further. Naqvi was blunt about what he called Israel's history of sabotage and backstabbing, predicting Tel Aviv would keep trying to derail the talks and draw Washington back into direct fighting. He linked this partly to domestic politics: Netanyahu's corruption trial was set to begin on a fast-tracked schedule, with hearings twice a week, starting the Sunday right after this conversation was recorded — a fact both speakers suggested gives Netanyahu personal reasons to keep regional tensions elevated, alongside reports of new strikes being contemplated in Gaza and even a possible new front opening in Syria.

Pakistan's Rise, India's Missed Turn

Fahad raised a pointed counterfactual: had Prime Minister Narendra Modi not visited Israel two days before the war began, could India rather than Pakistan have become the venue for these talks? Naqvi called the Modi visit unnecessary and too much of a coincidence, though he cautioned it would be far-fetched to say India would definitely have won the mediator's role otherwise. What is clearer, he said, is that Pakistan has managed to balance relationships with both China and the United States simultaneously, secured a fresh security pact with Saudi Arabia, and leveraged its neighbourly ties to Iran — positioning it, under the current circumstances, as the only plausible neutral ground for talks of this magnitude.

The Gulf's Cracked Mirror

The conversation closed on the Gulf states, whose carefully cultivated image as a safe haven for investment, talent and tourism, Naqvi said, has been shaken to an extent by the war. He noted unverified claims circulating on social media that the UAE and Saudi Arabia had quietly given a green signal for the war at its outset, alongside the fact that American officials had publicly thanked Qatar, Kuwait, the UAE, Bahrain and Saudi Arabia by name during the conflict — remarks that have fuelled scrutiny of what these governments' true positions actually were. The UAE's presidential adviser, Dr Anwar Gargash, had already signalled a recalibration under way, stating that the UAE would recheck its regional and international ties once the war ends. Damaged American military bases raise further questions, Naqvi said, about who will pay for reconstruction and whether host nations still see value in hosting them — a concern sharpened by the roughly ten million Indian workers living across the region who now worry about their jobs and safety, an anxiety Fahad said she had heard directly from family acquaintances living there.

Naqvi expressed cautious optimism that Gulf economies, being resilient and fast-moving, could manage the crisis and rebuild investor confidence if the ceasefire holds — but stressed that it was too early to say anything definitive. The real test, both agreed, would come within hours of their conversation: whether the first round of talks in Islamabad produced any announcement of a follow-up date, a sign, in Naqvi's words, of whether this pause becomes a genuine off-ramp from war or merely a fourteen-day interval before the fighting resumes.

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