Nous Shorts· 19 Jun 2026· 2:04

AIMIM & the Politics of Identity

"The parties led by Dalits and OBCs spoke about caste and social justice—not religion."

Full Transcript

आपने जिनका जिक्र किया वो जातिवाली पार्टियां हैं, जातिगत आधारित पार्टियां हैं, और एआईएमआईएम जो है वो मुसलमान, रिलिजन आधारित पार्टी है। वो अगर कम्युनिटी-बेस भी अपने आप को कहे तो शायद थोड़ा बेहतर उसके बारे में ओपिनियन बनेगी, और उसमें दूसरे लोग भी शामिल हों। जाति का जो सवाल है वो इस मुल्क में 5000 साल पुरानी बीमारी है, और उससे इस मुल्क में क्रिश्चियनिटी, इस्लाम और सिखिज़्म — जो तीनों धर्म जाति के खिलाफ हैं बुनियादी तौर पर — वो भी इससे अछूते नहीं हैं। आज ईसाइयों में भी दलित क्रिश्चियंस हैं, दलित मुस्लिम्स हैं, दलित सिख हैं। लेकिन हमारा कॉन्स्टिट्यूशन दलित सिख को तो एससी-एसटी के राइट्स देता है, लेकिन दलित मुसलमानों को और दलित क्रिश्चियंस को नहीं दिया जाता, उनके बारे में कहा जाता है कि यह इस देश के रिलिजन नहीं हैं, यह बाहर के रिलिजन हैं, और इन रिलिजन में जाति व्यवस्था नहीं है। तो मैं इसको कोई कन्विंसिंग आर्गुमेंट के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं, लेकिन मैं यह बता रहा हूं आपको कि जो 5000 साल से जिन लोगों के साथ शोषण हुआ है, ज़्यादतियां हुई हैं, जो दलित-वंचित समाज के लोग हैं, पिछड़े वर्ग के लोग हैं, उनके लिए कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविज़न भी है। आपने देखा कि पार्लियामेंट में और असेंबलियों में भी उनके लिए रिज़र्वेशन है, सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए रिज़र्वेशन है, और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद तो पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण मिला है। लेकिन उसके पीछे स्पिरिट यही थी कि यह लोग क्योंकि हज़ारों साल से दबाए गए हैं, कुचले हुए लोग हैं, इसलिए वह आगे लाए जाएं। और उसमें फिर जो पॉलिटिकल पार्टीज़ आती हैं वह जाति की बात करती हैं, धर्म की बात उनमें नहीं होती।

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