Nous Podcast· 16 Sept 2026· 38:02

Babri Masjid: The Judgment and Its Wider Legal Consequences

The 2019 Supreme Court judgment on the Babri Masjid–Ram Janmabhoomi dispute remains one of the most consequential rulings in India’s constitutional history. The Court acknowledged the illegality of the 1992 demolition while awarding the disputed land to the Hindu side. This explainer examines the…

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9 नवंबर 2019 इंडिया की सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाती है। पांच जज, 1400 पन्ने और कई सालों की सुनवाई के बाद आया हुआ एक फैसला। मामला था अयोध्या की एक जमीन का। करीब 1500 स्क्वायरर्ड्स। इसी जमीन पर लगभग 5 सदियों तक एक मस्जिद खड़ी थी। बाबरी मस्जिद जो 1528 में मुगल [संगीत] एपरर बाबर के दौर में बनी थी। 6 दिसंबर 1992 को इस मस्जिद को गिरा दिया जाता है। पूरी तैयारी के साथ एक मोबिलाइज्ड भीड़ ने राम जन्मभूमि मूवमेंट की आईडियोलॉजी पर चलते हुए 2019 के अपने जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह डेमोलेशन रूल ऑफ लॉ का एक सीरियस वायलेशन था। और फिर उसी फैसले में वो डिस्प्यूटेड जमीन [संगीत] हिंदू साइट को दे दी गई। यही वो टेंशन है जिसके इर्दगिर्द यह पूरी कहानी घूमती है। एक लीगल रॉन्ग को मानना और उसके कॉन्सिक्वेंस को रिवॉर्ड कर देना। और यही वजह है कि आज भी बहुत से लोग [संगीत] बाबरी फैसले को एक ऐसे मोड़ के रूप में देखते हैं जिसके लीगल, पॉलिटिकल और सोशल असर कई हालिया इंसिडेंट्स तक ट्रेस किए [संगीत] जा सकते हैं जो इसके बाद सामने आए। 2026 में जमीयत उलमा-ए-ह हिंद की [संगीत] एक इनिशिएटिव जस्टिस एंड एंपावरमेंट ऑफ माइनॉरिटीज यानी जेम ने एक 107 पेज रिपोर्ट पब्लिश की। नाम था अ क्रिटिकल एनालिसिस ऑफ द बाबरी मस्जिद जजमेंट एंड द [संगीत] केस ऑफ द प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट 1991। डेढ़ साल पहले साथियों से डिस्कशन किया कि मुल्क में यह तासुर दिया जा रहा है। के जो जजमेंट हुआ है वो बहुत इंसाफ पर मनी और जरूरी था। तो जरूरी हुआ के इस जजमेंट के ऊपर इसका एक क्रिटिकल एनालिसिस हमारे पास होना चाहिए। बहुत सारे साथियों ने उस वक्त भी कहा कि क्रिटिकल एनालिसिस की अब क्या जरूरत है? तो हमने कहा तारीख में तो रहेगा महफूज कुछ भी फायदा ना हो तब भी हिस्ट्री के लिए तो जरूरी है बाद वाले उसको देख सके के एक कौम थी जो इस तरह भी देख रही थी इस जजमेंट को इस रिपोर्ट की दलील प्रिसाइज है कि यह वर्डिक्ट कोई अकेला फैसला नहीं था। यह एक 30 साल लंबे प्रोसेस का अंजाम था जिसमें इंडिया की सबसे बड़ी अदालत ने धीरे-धीरे [संगीत] हिंदुत्व की लॉजिक को अपनी कॉन्स्टिट्यूशनल रीजनिंग का हिस्सा बना लिया और इस दौरान मुस्लिम इबादतगाहों को मिलने वाले सेकुलर प्रोटेक्शंस को एक-एक करके कमजोर कर दिया गया। ये उसी कहानी को समझने की कोशिश है। तो मैं बजाय इसके कि मैं अपनी कुछ राय यहां जाहिर करूं। आप ही हजरात के हवाले कर दूं तो ज्यादा अच्छा होगा। तो मैं बस शुक्रिया अदा करके अपनी बात को पूरा करता हूं। यह जो रिपोर्ट बनाई गई है, मैं मौलाना बदरी साहब का शुक्रिया अदा करता हूं कि उन्होंने जिस हिम्मत के साथ ये रिपोर्ट निकाली है, हो सकता है इससे कुछ ऐसी भी चीजें हो जिससे हम लोग एक दूसरे से एग्री नहीं करते हो। लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि जिसने भी ये रिपोर्ट प्रिपेयर किया है बहुत मेहनत से और बड़ी ईमानदारी के साथ किया है। ये सिर्फ बाबरी मस्जिद के बारे में नहीं है। जी ये रिपोर्ट आपकी और मेरी है। मैं मानती हूं कि जो खास सवाल है इस रिपोर्ट में वो ये है कि एक डेमोक्रेटिक सोसाइटी में जज का रोल क्या होना चाहिए? ये बात तो वाज़ है बहुत साफ है कि ये माना गया कि जो इमारत थी बाबरी मस्जिद की। वहां पर अगर किसी का कब्जा था और किसी का हक था तो मुसलमानों का था और उनके साथ जो हुआ वो बहुत गलत था। सबसे बड़ा पॉइंट तो ये हुआ है कि राम टेंपल नहीं डिमोलिश हुआ। किसी संस्कृत इं्रिप्शन में है ही नहीं। 18वीं सदी से पहले किसी ने लिखा ही नहीं कि यहां कोई बहुत राम ग्रैंड राम टेंपल था। 2019 के फैसले को समझने के लिए पहले हमें उस कानून को समझना होगा जो [संगीत] ठीक इसीलिए बनाया गया था कि कोई दूसरा अयोध्या दोबारा ना हो। [संगीत] 1991 में राम जन्मभूमि एजिटेशन के बीच पार्लियामेंट ने एक कानून पास किया। द प्लेसेस ऑफ वरशिप स्पेशल प्रोविजंस एक्ट। [संगीत] इस कानून की बुनियादी सोच साफ थी। 1947 में आजादी के साथ एक नया सोवरन और सेकुलर हिंदुस्तान बना। [संगीत] 15th अगस्त 1947 को किसी भी इबादतगाह की जो धार्मिक पहचान थी [संगीत] वही उसकी स्थाई पहचान मानी जाएगी। ना कोई बदलाव ना नए दावे। ना इतिहास में वापस जाने की गुंजाइश। इस कानून ने यह माना कि मिडीवल पास्ट [संगीत] के दावों के आधार पर मस्जिद मंदिर के विवादों को फिर से खोलना कम्युनल टेंशन को गहरा कर सकता है। समाज को बांट सकता है। इसीलिए [संगीत] इसने एक कॉन्स्टिट्यूशनल लकीर खींची। इतिहास का इस्तेमाल प्रेजेंट को बदलने के लिए नहीं किया जाएगा। इस एक्ट में सिर्फ एक एक्सप्लसिट [संगीत] एक्सेप्शन था। बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि डिस्प्यूट। इसे अलग से सुलझाया जाना था। बाकी सभी इबादतगाहों को इस कानून के तहत प्रोटेक्शन दिया गया। और दिलचस्प बात यह है कि 2019 के अयोध्या फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी कानून की खुलकर तारीफ की। कोर्ट ने इसे इंडिया की सेकुलरिज्म को लागू करने वाली एक नॉन डेगबल ऑब्लिगेशन बताया और कहा कि हिस्ट्रीज रोंग्स शैल नॉट बी वेपनाइज्ड टू अप्रेस द प्रेजेंट। यानी इतिहास की गलतियों को आज के वक्त पर जुल्म का हथियार नहीं बनाया जाएगा। लेकिन उसी फैसले में उसी एक्ट के इकलौते एक्सेप्शन के जरिए वो डिस्प्यूटेड जमीन हिंदू साइट को दे दी गई। और यहीं कोर्ट ने इशारा कर दिया कि जुडिशियल रीजनिंग किस तरह मेजोरिटेरियन हिस्टोरिकल नैरेटिव्स पर टिके दावों को अपने अंदर जगह दे सकती है। और यह सवाल खुला छोड़ दिया कि आने वाले वक्त में ऐसे ही दावे कैसे फ्रेम किए जाएंगे। लिटिगेट किए जाएंगे और एडजुगेट किए जाएंगे। यही जेम रिपोर्ट अगला सवाल पूछती है। [संगीत] अब बाकी सब मस्जिदों का क्या होगा? और जैसा के नासिर अजीज साहब ने अभी यह बात कही बीच में के प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट का को उसका एक अलग ही तशरी कर दी गई है और वो सारा क्योंकि उस जमाने में जब बिल्कुल जजमेंट आने वाला था तो यह तासुर दिया गया था बिल्कुल सीनियर मोस्ट लोगों की तरफ से पूरे मुल्क में उसमें लीगल फ्रेटरनिटी भी शामिल थी कि भाई यह एक्ट मौजूद है। बस यह एक मामला है। इसको हो जाने दो, खत्म हो जाने दो। पर वो सिलसिला तो रुका नहीं जो भरोसा दिया गया था। [संगीत] 2019 का फैसला अचानक नहीं आया था। जेम रिपोर्ट इसकी जड़े 1994 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले तक ले जाती है। एम इस्माइल फारूकी वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया। हुआ यह था दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के डेमोलिशन के बाद सेंट्रल गवर्नमेंट ने एक कानून बनाया। द एक्विजिशन ऑफ सर्टेन एरिया एट अयोध्या एक्ट 1993 जिसके तहत डिस्प्यूटेड साइट और उसके आसपास की जमीन एक्वायर कर ली गई। कई मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशंस ने इस एक्ट की कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी को चैलेंज किया। सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार इस लेजिसलेशन को बरकरार तो रखा लेकिन ऐसा करते हुए उसने इंडिया के कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क में मस्जिद की लीगल समझ को ही बुनियादी तौर पर बदल दिया। अपनी मेजॉरिटी ओपिनियन में कोर्ट ने कहा कि मस्जिद इस्लाम की प्रैक्टिस का कोई एसेंशियल हिस्सा नहीं है और नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है। यहां तक कि खुले में भी और क्योंकि कांग्रेगेशनल प्रेयर मस्जिद के बाहर भी मुमकिन मानी गई इसलिए कोर्ट ने नतीजा निकाला कि मस्जिदों को स्टेट एक्विजिशन से कोई स्पेशल कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोटेक्शन हासिल नहीं है। यही दलील आगे चलकर मॉस्क एसेंशियलिटी आर्गुमेंट के नाम से जानी गई। लेकिन इस इंटरप्रिटेशन पर स्कॉलर्स, लीगल कमेंटेटर्स और मुस्लिम कम्युनिटीज की तरफ से लगातार सख्त एतराज रहा है। और यहां एक अहम बात है जिस पर रिपोर्ट ज्यादा डिटेल से बात नहीं करती है कि मस्जिद इस्लामिक रिलीजियस लाइफ, फियोलॉजी और हिस्ट्री में एक बेहद अहम मुकाम रखती है। इसकी अहमियत इस्लाम के सबसे शुरुआती दौर तक जाती है। जब पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहहु अलैहि वसल्लम ने हिजरत के दौरान मक्का से मदीना की तरफ माइग्रेशन किया तो उनके सबसे पहले कामों में से एक था मस्जिद कुबा की तामीर और उसके बाद अल मस्जिद अल नबवी यह सिर्फ इबादत की जगह नहीं थी बल्कि मुस्लिम कम्युनिटी का सोशल एजुकेशनल और एडमिनिस्ट्रेटिव मरकज भी थी। यहां एक और बात ध्यान देने लायक है। इस्लाम के शुरुआती दौर में मक्का में कोई मस्जिद कायम नहीं की गई थी। लेकिन इसकी वजह यह नहीं थी कि मस्जिद गैर जरूरी थी। वजह यह थी कि मुसलमान उस वक्त एक ऑप्रेस्ड कम्युनिटी के तौर पर जी रहे थे। और उन्हें अपनी सोशल लाइफ को खुलकर ऑर्गेनाइज करने की आजादी नहीं थी। जैसे ही मदीना में उन्हें एक सिक्योर माहौल मिला, मस्जिद उसकी बुनियाद बन गई। यानी मस्जिद सिर्फ नमाज की जगह नहीं बल्कि मुस्लिम कम्युनिटी को ऑर्गेनाइज करने वाला एक अहम इंस्टिट्यूशन भी था। तारीख में मस्जिदें हमेशा कलेक्टिव प्रेयर, रिलीजियस लर्निंग, चैरिटी और कम्युनिटी लाइफ की जगह रही हैं। इस्लामिक जरिस प्रूडेंस यह जरूर मानती है कि जरूरत पड़ने पर नमाज कहीं और भी पढ़ी जा सकती है। लेकिन यह फ्लेक्सिबिलिटी मस्जिद की रिलीजियस अहमियत को या मुस्लिम कम्युनल लाइफ में उसके मरकजी किरदार को कम नहीं करती। इसलिए बहुत से मुस्लिम्स के लिए कोर्ट की रीजनिंग ने मस्जिद को महज एक फिजिकल स्ट्रक्चर बना दिया और उसकी स्पिरिचुअल कम्युनल और हिस्टोरिकल अहमियत को नजरअंदाज कर दिया। क्रिटिक्स का कहना था कि यह तय करने का हक कि किसी मजहब में क्या एसेंशियल है अब बिलीवर्स के पास नहीं बल्कि जुडिशरी ने अपने हाथ में ले लिया। एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिससेस डॉक्ट्रिन को इस तरह लागू करके कोर्ट ने इंटरप्रेटिव अथॉरिटी रिलीजियस कम्युनिटीज से छीनकर जजेस को दे दी। अब अदालतें तय करेंग कि किसी मजहब का कौन सा हिस्सा कॉन्सिट्यूशनल प्रोटेक्शन का हकदार है। इसके दो मेजर इंप्लिकेशंस है। पहला तो ये क्योंकि नमाज खुले में पढ़ी जा सकती है इसलिए मॉस्क की जरूरत नहीं है। जिसको राजीव धवन ने बहुत वाज़ तौर पे एक्सप्लेन किया है कि इसका ये इम्लिकेशन है कि अब मॉस्क को आप कॉन्स्टिट्यूशनली प्रोटेक्ट नहीं कर सकते क्योंकि नमाज कहीं भी पढ़ी जा सकती है। ये एक इम्लेशन है। दूसरा इंप्लिकेशन इसका यह है कि क्योंकि मॉस्क नॉन एसेंशियल है इसलिए उसका रहना या ना रहना उसका कोई इंप्लिकेशन रिलीजन पे नहीं होगा। जेम रिपोर्ट इसी जरिस प्रडेंशियल मूव को अयोध्या लॉजिक की बुनियाद बताती है। लीगल रीजनिंग का एक ऐसा फ्रेमवर्क जो उसके मुताबिक सिस्टमैटिकली मुस्लिम रिलीजियस स्पेससेस की वैल्यू कम करता है और उन्हें स्टेट इंटरवेंशन के सामने ज्यादा कमजोर बना देता है। इस्माइल फारूकी के एक साल बाद 1995 में सुप्रीम कोर्ट ने एक सेट ऑफ इलेक्शन केसेस में कहा कि हिंदुत्व अपने आप में कोई रिलीजियस अपील नहीं है। बल्कि इसे एक वे ऑफ़ लाइफ भी माना जा सकता है। जिम रिपोर्ट इसे हिंदू नेशनलिज्म के लिए एक कॉन्स्टिट्यूशनल क्लीन चिट की तरह पढ़ती है। इस रीडिंग से आप सहमत हो या नहीं लेकिन इसका कानूनी असर साफ था। चुनाव प्रचार में हिंदुत्व का इस्तेमाल अब अपने आप में करप्ट रिलीजियस अपील नहीं माना जा सकता था। जस्टिस एएम अहमदी जिन्होंने इस्माइल फारूकी में माइनॉरिटी ओपिनियन लिखी असहमत थे। उनकी प्राइवेट राइटिंग्स जो बरसों बाद सामने आई उस इंस्टीिट्यूशनल दबाव को बयान करती हैं जो उन पर मेजॉरिटी के साथ जुड़ने के लिए डाला गया। जब उनसे एक ऐसा ड्राफ्ट साइन करने को कहा गया जो दिसंबर 1992 की इंसिडेंट को इंप्लसिटली जायज ठहरा देता उन्होंने इंकार कर दिया। जेम रिपोर्ट उन्हें कोर्ट करती है। आई डोंट केयर अबाउट बिकमिंग चीफ जस्टिस। आई वोंट डू इट। यानी मुझे चीफ जस्टिस बनने की कोई परवाह नहीं। मैं यह नहीं करूंगा। 25 साल बाद जिस रीजनिंग को साइन करने से उन्होंने इंकार किया था वही 2019 के वर्डिक्ट की बुनियाद बन गई। वो डिसेंट जिंदा नहीं रहा। लेकिन जिस डॉक्ट्रिन के खिलाफ उन्होंने आगाह किया था वो रह गई। और अब आते हैं उस फैसले पर। 2019 का अयोध्या टाइटल सूट एम सिद्दीक डी वर्सेस महंत सुरेश दास। इसे एक प्रॉपर्टी डिस्प्यूट की तरह फ्रेम किया गया था। दोनों में से कोई भी पक्ष टाइटल डॉक्यूमेंट्स पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने यह बात मानी भी फिर भी पूरी जमीन हिंदू पक्ष को दे दी गई। आधार था पोजेसरी टाइटल यानी कोर्ट के मुताबिक हिंदू पक्ष उस जगह पर ज्यादा लगातार वरशिप करता रहा था। जजमेंट में जो उन्होंने कहा कि आपका व यूजर इसलिए नहीं है क्योंकि तारीख में तीन मर्तबा आपका यूजर ब्रेक हुआ है। तब जब एक जब शहर में दंगा हुआ था और उस मस्जिद का कब्जा हो गया था उसको एडमिनिस्ट्रेशन ने फिर आपकी शिकायत पर खाली करवा के आपको लौटाया वो आपके यूजर में ब्रेक नहीं है। वो आपके यूजर का इनफोर्समेंट है। जब एक जब एक निह सिंह ने वहां पे कब्ज़ा करके वहां पे अपना परचम लहरा दिया था तो फिर हमारी शिकायत पे उस उसको हटाके कब्जा में लौटाया गया। वो हमारे यूजर का ब्रेक नहीं है। वो हमारे यूज़ का रीइंफोर्समेंट है। और 1900 और 1858 में जब वहां पे झगड़ा हुआ था तो जब उस [संगीत] उस प्रॉपर्टी का जब विभाजन डिवीजन हो गया था। उसमें भी उन्होंने कहा कि आपकी एक वो वक्त ऐसा था जब 57 के बाद फिर से वो स्थापित एआर में नहीं थी लेकिन हमारा एआर हमको उस वक्त की साधना ब्रिटिश सरकार ने लौटाया वो हमारे यूजर का रिइफोर्समेंट था वो हमारे यूजर का ब्रेक नहीं था तो ये जजमेंट्स के लीगल क्लज़ है ये बात अगर कहेंगे कि 1857 से पहले आपका यूजर प्रूव नहीं कर पाए जिसका काफी इंपैक्ट था उस केस पर तो आज किसी भी टेंपल का टेंपल बाय यूजर और मॉस्क का मॉस्क बाय यूजर और किसी गिरजा घर का चर्च बाय यूजर कोई नहीं रहेगा सब खत्म हो जाएगा मैंने रिटन में उनको आर्गुममेंट सबमिट किया द बाबरी मस्जिद इज़ अ बाय डेडिकेशन ऑन अकाउंट ऑफ द प्ला दैट हंग आउटसाइड द मस्जिद व्हिच डेडिकेटेड द प्रॉपर्टी टू अल्लाह उस पूरे आर्गुममेंट का इस सात 800 पेज के जजमेंट में फिक्र तक नहीं है। जेम रिपोर्ट इस जजमेंट के अंदर ही चार बुनियादी खामियों की पहचान करती है। पहली एक एसिमेट्रिक एविडेंशियली स्टैंडर्ड। सबूतों के लिए अलग-अलग पैमाने। मुस्लिम पक्ष के हर क्लेम को एक-एक करके सख्ती से जांचा गया और खारिज किया गया। जबकि हिंदू क्लेम्स को उनके मेरिट्स परखा ही नहीं गया। तो ये ये जो मामला चल रहा है हमारे देश में हिंदू के लिए एक कानून और दूसरों के लिए दूसरा कानून ये हमें मंजूर नहीं है। मेरा मजहब कुछ भी हो लेकिन हम सब एक हैं। ये मैं कहना चाहती हूं। एक ये जो कॉन्स्टिट्यूशन में कोर्ट में हमारी सबकी इज्जत एक ही तरीके से होनी चाहिए। एक ही कानून लागू होना चाहिए। यह नहीं हो रहा है। दूसरी 1949 में मस्जिद के अंदर मूर्तियां गैरकानूनी तरीके से रखी गई। लेकिन कोर्ट ने उसी गैरकानूनी कारवाही से पैदा हुए धार्मिक मौजूदगी को प्रॉपर्टी के दावे का आधार मान लिया। यानी एक गैरकानूनी काम को ही बाद में कानूनी दावे की बुनियाद बना दिया गया। तीसरी एएसआई ने कभी यह कंक्लूजन नहीं निकाला कि मस्जिद किसी मंदिर को गिराकर बनाई गई थी और नीचे की अंडरलाइन स्ट्रक्चर और मस्जिद की तामीर के बीच चार सदियों का फासला था। सबसे बड़ा पॉइंट तो यह हुआ है कि राम टेंपल नहीं डिमोलिश हुआ। किसी संस्कृत इं्रिप्शन में है ही नहीं। 18वीं सदी से पहले किसी ने लिखा ही नहीं कि यहां कोई बहुत राम ग्रैंड राम टेंपल था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि एएसआई की रिपोर्ट [संगीत] यह साबित नहीं करती कि मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर बनाई गई थी। मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने के नाम पर उत्तर भारत में [संगीत] कितना बवाल मचा। लेकिन यह बात सुप्रीम कोर्ट में साबित नहीं हुई। इसी तरह आर्कियोलॉजिस्ट सुप्रिया वर्मा और जया मेनन जो वफ बोर्ड की तरफ से एक्सकवेशन ऑब्जर्व कर रही थी, उन्होंने मेथोडोलॉजिकल इर्रेगुलरिटीज यानी जांच करने के तरीके में खामियों की बात की। उनके मुताबिक यह काम एक न्यूट्रल इंक्वायरी की तरह नहीं बल्कि पहले से तय नतीजे को साबित करने की कोशिश जैसा लग रहा था। उनका कहना था कि एएसआई की फाइंडिंग्स किसी मंदिर के सबूत नहीं दिखाती। फिर भी वो आर्कियोलॉजी एक सिविलाइजेशनल बैकग्राउंड लेजिटिमेशन की तरह इस्तेमाल हुई। तो अब प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट तो अलग हो गया। अब एएसआई ये डिसाइड करेगा कि वो मस्जिद है या मंदिर है या या टेंपल है। तो एक तरह से मुझे ऐसा लग रहा है कि एएसआई एक्ट को एक टूल बना दिया गया है। अब प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट फुलफिल हो सेसाइड हो कोर्ट से ना हो लेकिन एएसआई एक्ट के जरिए अब वो काम होगा जो सिविल सूट के जरिए डिग्री होके होता था। अब वो शॉर्टकट वहां से हो सकता है। उसका रास्ता आज की जजमेंट ने हटा के और चौथी कोर्ट ने माना कि 1992 में मस्जिद गिराया जाना गैरकानूनी था। लेकिन फैसले का नतीजा यह नहीं निकला कि मस्जिद की जगह वापस की जाए। बल्कि कहीं और पांच एकड़ जमीन देना माना गया। रिपोर्ट इसे फॉर्मलाइजेशन ऑफ अ फेथ अकंप्लाई कहती है। यानी एक ऐसी हकीकत को कानूनी शक्ल दे देना जो जबरदस्ती थोप दी गई थी। यही रिपोर्ट एक और अहम बात की तरफ ध्यान दिलाती है। 2019 के फैसले वाली पांच जजों की बेंच में शामिल रहे फॉर्मर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूर ने सितंबर 2025 में न्यूज़ ल्ड्री को दिए एक इंटरव्यू में 1528 में हुई बाबरी मस्जिद की तामीर को अ फंडामेंटल एक्ट ऑफ डेसीग्रेशन कहा। यानी बुनियादी तौर पर पवित्रता को भंग करने वाला काम। व्हाट अबाउट द फंडामेंटल एक्ट ऑफ डेसीग्रेशन, द वेरी इरेक्शन ऑफ़ द मॉस्क? वी फॉरगेट ऑल दैट हैपेंड? रिपोर्ट इस बयान को नोट करती है। वो छोटा फ्रेज कोट करते हुए एन एक्ट ऑफ डेसीग्रेशन। लेकिन उसकी इंप्लिकेशंस खुले छोड़ देती है। और यहीं एक अहम सवाल खड़ा होता है जो रिपोर्ट से भी आगे जाता है। इस जजमेंट को खुद चंद्रचूर ने कोऑथर किया था। वो तो ऐसे किसी नतीजे पर पहुंचा ही नहीं था। बल्कि उस वर्डिक्ट ने साफ-साफ नोट किया था कि एएसआई ने यह इस्टैब्लिश नहीं किया कि मस्जिद किसी मंदिर को गिराने के बाद बनी। उसने यह भी माना कि मस्जिद के नीचे की नॉन इस्लामिक स्ट्रक्चर बाबरी मस्जिद से कई सदियों पुरानी थी। यानी कोर्ट ने अपना फैसला टेंपल डिस्ट्रक्शन की किसी फाइंडिंग पर रखा ही नहीं था। लेकिन फिर भी छ साल बाद उसी जजमेंट के एक ऑथर ने पब्लिकली उस तामीर को फंडामेंटल एक्ट ऑफ डेक्रेशन कह दिया। एक ऐसा दावा जो कोर्ट की अपनी फाइंडिंग्स से भी आगे जाता दिखता है। जब इस इनकंसिस्टेंसी पर सवाल उठा तो चंद्रचूर ने बाद में सफाई दी कि उनकी बात कॉन्टेक्स्ट से बाहर ले ली गई और दोहराया कि फैसला फेथ नहीं एविडेंस पर बेस्ड था। फिर भी सवाल बना रहता है और यही सवाल ठीक उसी चीज को दिखाती है जिसे जिम रिपोर्ट अयोध्या लॉजिक कहती है। रीजनिंग का एक ऐसा तरीका जो कॉन्स्टिट्यूशनल प्रिंसिपल और एविडेंशियली स्टैंडर्ड से कम और सिविलाइजेशनल मेमोरी के बोझ से ज्यादा अफेक्टेड दिखती है। एक छोटा सा पॉज। अगर आपको लगता है कि ऐसे सवालों पर गहरी और रिसर्च बेस्ड बातचीत जरूरी [संगीत] है तो वीडियो को शेयर करें और चैनल को सब्सक्राइब करें। और अगर आप इस काम को मजबूत करना चाहते हैं तो स्क्रीन पर दिख रहे [संगीत] क्यूआर कोड के जरिए नाउ को सपोर्ट कर सकते हैं। आपकी छोटी सी मदद भी इंडिपेंडेंट रिसर्च और मीनिंगफुल पब्लिक डिस्कोर्स को आगे बढ़ाने में अहम किरदार अदा करते हैं। अब वापस आज के वीडियो पर लौटते हैं। अब सवाल यह नहीं रहा कि अयोध्या में क्या हुआ? तो सवाल यह है कि अयोध्या के बाद क्या हो रहा है? जेम रिपोर्ट इसे रीएनिमेशन ऑफ अयोध्या कहती है। यानी अयोध्या के टेंपलेट का धीरे-धीरे अलग-अलग साइट्स और डिस्प्यूट्स पर दोहराया जाना। यहां से कहानी रिपोर्ट से आगे बढ़ती है। आगे जिन केसेस का जिक्र होगा उनमें से कुछ केसेस जेम रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है। कुछ रिपोर्ट के पब्लिश होने से पहले के हैं और कुछ उसके बाद के। लेकिन इन्हें साथ रखकर देखने पर ऐसा पैटर्न सामने आता है जो रिपोर्ट के लॉजिक से मेल खाता दिखाई देता है और यह पैटर्न अब काफी जाना पहचाना लगने लगा है। एक पिटीशन दायर होती है। अक्सर एक टाइटल डिस्प्यूट की शक्ल में नहीं बल्कि एक सर्वे या किसी साइट के हिस्टोरिकल कैरेक्टर की इंक्वायरी की एप्लीकेशन की तरह अदालतें यह इंक्वायरी होने देती हैं। यह रीजनिंग देते हुए कि हिस्ट्री को एग्जामिन करना, किसी साइट के लीगल स्टेटस को बदलना नहीं है। फिर इंटेरिम ऑर्डर्स आते हैं। एक्सेस के नियम बदलते हैं। सर्वे में मिले सिंबल्स को प्रोटेक्शन मिलती है और धीरे-धीरे ये टेंपरेरी मेजर्स नया स्टेटस को बन जाते हैं। फैसले में इस बात की तो कम से कम तरजी हुई कि कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया था। लेकिन मैं जो बात कह रहा हूं कि अगर फर्ज कीजिए कि किसी मंदिर में किसी मस्जिद में मुगलों के जमाने में तोड़ के कोई मस्जिद बनाई गई तो क्या हमारा लीगल सिस्टम उस राइट को रिकग्नाइज करता है या नहीं? तो फिर क्यों आप उन सूट को एंटरटेन करके सर्वे ऑर्डर करते हैं एएसआई से ये खोद के देखने के लिए कि इसके नीचे आंखों में मूर्ति मिलती है या नहीं मिलती। जबकि हमारा लीगल सिस्टम उस मूर्ति को कोई ऐसा हक नहीं देता कि वो 500 साल पहले बात आके लिमिटेशन के बावजूद चेंज कर रहे होते हैं। तो ये है कि प्रोसेस बिकम द पनिशमेंट एंड दैट इज अ बिगेस्ट प्रॉब्लम टुडे इन द कम्युनिटी। और यह अयोध्या टेंपलेट अब सिर्फ कोर्ट रूम तक महदूद नहीं है। सर्वे पटिशंस और टाइटल क्लेम्स के साथ-साथ मुस्लिम रिलीजियस स्पसेस को अब एडमिनिस्ट्रेटिव एक्शंस के जरिए भी निशाना बनाया जा रहा है। एंटी एनक्रोचमेंट ड्राइव्स, लैंड एक्विजिशन की कारवाई, सिक्योरिटी मेजर्स और डेमोलेशन कैंपेन के जरिए। यह पैटर्न तब और साफ होता है जब हम इसे अलग-अलग केसेस में देखते हैं। संभल नवंबर 2024 यह वो रीसेंट केस है जिसे रिपोर्ट खुद एग्जामिन करती है। एक लोकल कोर्ट ने 500 साल पुरानी शाही जामा मस्जिद के सर्वे का आदेश पिटीशन मिलने के घंटों के अंदर दे दिया। उसी दिन जब सर्वे टीम दूसरी बार लौटी [संगीत] तो हिंसा भड़क उठी। पांच लोग मारे गए और पांचों मुस्लिम थे। इसके आगे के केसेस रिपोर्ट के दायरे से बाहर हैं। यह यहां इसलिए रखे जा रहे हैं क्योंकि यह उन्हीं ब्रॉडर डायनेमिक्स को दिखाते दिखते हैं। जिन्हें जेम रिपोर्ट आइडेंटिफाई करती है। हद्वानी फरवरी 2024 भबुलापुरा इलाके में एक मस्जिद और मदरसे को गिराने के कोर्ट आदेश के बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। पुलिस फायरिंग में छह लोगों की मौत हुई। कर्फ्यू लगा, शूट एट साइट ऑर्डर्स जारी हुए। इंटरनेट बंद कर दिया गया। वहां के रहने वाले ज्यादातर मुसलमानों का कहना था कि जिन स्ट्रक्चर्स को निशाना बनाया गया वो दशमों पुराने थे। जबकि मामले की अगली सुनवाई कुछ ही दिनों बाद होने वाली थी। ज्ञानवापी जनवरी 2024 एक वाराणसी कोर्ट ने मस्जिद के सदन सेलर में हिंदू प्रेयर्स दोबारा शुरू करने की इजाजत दे दी। एक ऐसी प्रैक्टिस जो कहा जाता है कि दशकों से बंद थी। सुप्रीम कोर्ट ने उस ऑर्डर पर रोक लगाने से इंकार कर दिया और दोनों कम्युनिटीज को वही इंतजाम बनाए रखने को कहा। एक इंटेरिम परमिशन एक बार फिर एक नया स्टेटस को बन गई। राजस्थान जून 2026 सबसे रीसेंट एग्जांपल बार डिस्ट्रिक्ट में छह मस्जिदों और मदरसों को एिक्शन नोटिसेस दिए गए। जिन पर तारीख थी 11 जून। लेकिन जो डिलीवर हुए 17 जून की शाम को और जवाब देना या जगह खाली करने के लिए सिर्फ अगले दिन तक का समय दिया गया। सिर्फ एक दिन। सिविल राइट्स ग्रुप्स ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की इस्टैब्लिश्ड गाइडेंस के मुताबिक डेमोलिशन और एिक्शन जैसे मामलों में लगभग 15 दिन का नोटिस ड्यू प्रोसेस की न्यूनतम शर्त माना जाता है। कुछ ही दिन बाद डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन, पुलिस और बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स की एक जॉइंट टीम ने बॉर्डर विलेजेस में उन स्ट्रक्चर्स को गिरा दिया। कारवाई को जीरो टॉलरेंस सिक्योरिटी पॉलिसी का हिस्सा बताया गया। एनक्रोचमेंट और नेशनल सिक्योरिटी यही जबान इस्तेमाल हुई लेकिन पैटर्न वही जाना पहचाना रहा। मुस्लिम रिलीजियस स्पसेस एक ऐसी प्रोसीजर जो इतनी कंप्रेस कर दी गई कि एक हियरिंग नामुमकिन हो जाए और ऑब्जेक्शन दर्ज होने से पहले ही स्ट्रक्चर हटा दिया जाए। ऐसे ही डेमोलेशन ड्राइव्स उत्तर प्रदेश, असम, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में भी देखने को मिली है। निशाने पर मस्जिदें, ईदगाहें, मदरसे और दरगाहें रही हैं। जस्टिफिकेशन कभी एनक्रोचमेंट का दिया गया, कभी अर्बन प्लानिंग का और कभी पब्लिक ऑर्डर का। वजह जो भी बताई जाए मुस्लिम रिलीजियस स्पसेस का यह सेलेक्टिव टारगेटिंग एक अनइक्वल इनफोर्समेंट की तस्वीर पेश करता है और एडमिनिस्ट्रेटिव एक्शन को रिलीजियस लैंडस्केप को नए सिरे से बदलने के एक मैकेनिज्म में बदल देता है। भोजशाला कमलमौला मॉस्क धर मई 2026। ठीक उसी दिन जिस दिन जेम रिपोर्ट रिलीज हुई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वो फैसला सुनाया जो शायद 2019 के अयोध्या वर्डिक्ट के बाद इस पूरी कहानी का सबसे कॉन्सिक्वशियल मोड़ है। कोर्ट ने अनाउंस किया कि कमल मौला मॉस्क एक 11वीं सदी की स्ट्रक्चर जो सदियों से एक मस्जिद की तरह काम करती रही है और 2003 से एक शेयर्ड यूज़ अरेंजमेंट के तहत चल रही थी। दरअसल देवी सरस्वती को समर्पित एक हिंदू टेंपल है। मुसलमानों को वहां नमाज पढ़ने से रोक दिया गया। अपने इस फैसले पर पहुंचने के लिए कोर्ट ने साफ-साफ 2019 के अयोध्या जजमेंट में रखे गए प्रिंसिपल्स का सहारा लिया। लेकिन अयोध्या और कमल मौला मॉस्क के मामलों में एक अहम फर्क भी है। अयोध्या में कोर्ट ने मस्जिद के लिए पांच एकड़ अल्टरनेटिव लैंड देने का आर्डर दिया था। यहां कोर्ट ने सिर्फ इतना कहा कि स्टेट चाहे तो कहीं और मस्जिद के लिए जमीन देने पर गौर कर सकती है। यानी एक तरफ मस्जिद की जमीन फौरन हाथ से निकल जाती है। जबकि दूसरी तरफ उसके एवज में जमीन मिलना अब कोई यकीनी हक नहीं बल्कि एक इमकान बनकर रह जाता है। इन तमाम मामलों को एक साथ रखकर देखें तो एक बड़ा सवाल सामने आता है। अगर अयोध्या फैसले ने एक नई कानूनी सोच की बुनियाद रखी थी तो क्या अब वही सोच दूसरे मामलों में भी दिखाई दे रही है? जेम रिपोर्ट पांच ऐसे पैटर्न की पहचान करती है जिन्हें वो मेथडोलॉजिकल पैरेलल कहती है और हालिया मामलों में भी यह पैटर्न बार-बार उभरते दिखाई देते हैं। पहला टाइटल डिस्प्यूट्स को सर्वे की शक्ल में फ्रेम करना ताकि प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट को बायपास किया जा सके। दूसरा एक पक्ष से दस्तावेजी सबूत मांगना। जबकि दूसरे पक्ष के आस्था आधारित दावों यानी फेथ बेस्ड क्लेम्स को एक्सेप्ट कर लेना। तीसरा मेजॉरिटी समुदाय के दावों के लिए प्रोसीजर्स को फ्लेक्सिबल बनाना और माइनॉरिटी पक्ष के लिए उसे सख्त रखना। चौथा जुडिशियल पैसिविटी यानी जमीन पर माहौल बदलता रहे लेकिन अदालतें हस्तक्षेप ना करें। और पांचवा लीगल रीजनिंग का इस्तेमाल हिस्टोरिकल रिवीजनिज्म को जायज ठहराने के लिए करना। जो अयोध्या में एक अकेले एक्सेप्शन की तरह पेश किया गया था वो अब एक दोहराए जा सकने वाले लीगल और एडमिनिस्ट्रेटिव स्ट्रेटजी की तरह दिखाई देने लगा है। और जब कुछ हिंदुत्व ग्रुप्स 400 मस्जिदों तक पर ऐतिहासिक दावे करने की बात करते हैं तो यह सवाल किसी एक मस्जिद या किसी एक मुकदमे का नहीं रह जाता। यह एक ऐसे मैकेनिज्म का सवाल बन जाता है जिसे बार-बार लगभग बिना किसी अंत के इस्तेमाल किया जा सकता है। यह जरूर अलग बात होगी कि वो अकेला और आखरी मामला होता आई वुड हैव बीन द फर्स्ट पर्सन टू स्टैंड एंड सी छोड़ो भूल जाओ जिसकी भी गलती हुई। लेकिन जब आपके सामने एक सीरीज हो डिस्प्यूट्स की तो कौन याद दिलाएगा सिस्टम को कि साहब हमारे साथ पहले भी गलत हुआ था [नाक से की जाने वाली आवाज़] और आज भी गलत हो रहा है और हम देख रहे हैं कि आने वाले वक्त में गलत होने वाला है। अब ये दबाव इंडिविजुअल कोर्ट केसेस से भी आगे बढ़ चुका है। 2025 में पार्लियामेंट ने द वक्फ अमेंडमेंट एक्ट पास किया। जिसने मुस्लिम रिलीजियस एंडमेंट्स की गवर्नेंस को रिस्ट्रक्चर किया और वफ बाय यूजर की उस पुरानी डॉक्ट्रिन को करेल कर दिया। जिसके तहत बहुत सी मस्जिदें शराइ, कब्रिस्तान और मदरसे फॉर्मल डॉक्यूमेंटेशन ना होने के बावजूद हिस्टोरिकली रिकॉग्नाइज्ड थे। क्रिटिक्स का कहना है कि यह बदलाव मुस्लिम रिलीजियस इंस्टीटशंस पर कम्युनिटी के कंट्रोल को कमजोर करते हैं और हजारों प्रॉपर्टीज को डिस्प्यूट के ज्यादा बड़े खतरे में डाल देते हैं। जो ओनरशिप है व प्रॉपर्टीज की मुस्लिम कम्युनिटी की वो मुसलमानों के हाथ से जा रही है इस वफ बिल के जरिए पहली बार एक ऐसा वफ तमीज बिल लाया गया है जो पूरे वफ के पैराडाइम को पूरे वफ को जो अब तक के सेफगार्ड मिले हुए थे उन सबको मलबेट करना चाहता है खत्म कर देना चाहता है और ठीक उसी वक्त खुद प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट भी सुप्रीम कोर्ट में कॉन्स्टिट्यूशनल चैलेंज का सामना कर रहा है। फिलहाल कोर्ट ने पेंडिंग मस्जिद मंदिर केसेस में फ्रेश सर्वेज़ और फाइनल ऑर्डर्स पर टेंपरेरी रोक लगा रखी है। लेकिन उसने इस कानून के खिलाफ दायर चैलेंजेस को खारिज नहीं किया है। इसलिए सवाल अब एक मस्जिद का नहीं रहा। अयोध्या का भी नहीं और ना ही कुछ गिनेचुने डिस्प्यूटेड साइट्स का। सवाल यह है कि हिस्ट्री का इस्तेमाल प्रेजेंट को दोबारा रीाइट करने से रोकने के लिए जो लीगल सेफ गार्ड्स बनाए गए थे क्या वो आगे भी कायम रहेंगे? ब्लेस वरशिप एक्ट का मकसद है कि तारीख के नासूरों को ना डाला जाए। तो जब वो और उसको उन्होंने बेसिक फीचर ऑफ़ द कॉन्सिट्यूशन का दर्जा दिया। तो फिर क्यों आज इन सूट्स को एंटरटेन करके एक और 20 साल की तकलीफ पैदा की जाती है। जब फिर उस नासूर को रोज कुरदा जाएगा। उसमें सर्वे होगा उसमें मूर्तियां निकलेंग उसको फ्रेश में दिखाया जाएगा। तो आखिर जिम रिपोर्ट क्या कहती है? रिपोर्ट एक प्रिसाइज और टेस्टेबल क्लेम करती है कि इंडिया की सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ अलग-अलग जजमेंट्स में लीगल एरर्स नहीं किए। वो एक स्ट्रक्चरल ट्रांसफॉर्मेशन से गुजरी है। हिंदू मेजोरिटेरियनिज्म के लॉजिक, उसकी जुबान और उसकी प्रायोरिटीज धीरे-धीरे कॉन्स्टिट्यूशनल डॉक्ट्रिन का हिस्सा बन गए हैं। ये किसी एक जज के बायस का दावा नहीं है। ये एक इंस्टीट्यूशन की क्यूमुलेटिव डायरेक्शन का दावा है। तो यह जो पूरी स्टोरी है जो आपकी स्टार्ट होती है जुडिशरी के हाथ से इस्माइल फारूकी से जो डेवलप होती है बाबरी मस्जिद राम जन्मभूमि डिस्प्यूट का जो जजमेंट है 2019 का और अब वो और फदर जजमेंट्स में जाएगी क्योंकि ये जो कैटेगरी है नॉन एसेंशियलिटी की ये ना ही 1991 के अगेंस्ट जाती है और ना ही बाबरी मस्जिद की जो कैटेगरी थी कि दोनों पार्टीज मिलके इसको रॉल्व करेंगे क्योंकि ये दोनों को ही वायलेट नहीं करता और ये एक तीसरा रूट है। दिस रूट इज गोइंग टू कंटिन्यू एंड द डेंजर इज कि और जो डिस्प्यूट्स हैं खासतौर पे मसाजिद को लेके या उसको और बड़े लेवल पे आप कहे खासतौर पे औकाफ को लेके आने वाले वक्त में उनको आप नॉन एसेंशियलिटी के थ्रू बहुत आसानी से अगेंस्ट द मुस्लिम इंटरेस्ट डिसाइड कर सकते हैं। एंड दिस इज गोइंग टू हैपन एट द हैंड्स ऑफ द जुडिशरी। अनफॉर्चूनेट रिपोर्ट कुछ मजबूत सुझाव भी देती है। जुडिशरी के लिए एसेंशियल रिलीजियस प्रैक्टिससेस डॉक्ट्रिन में सुधार। वफ की उस खास हैसियत की बहाली जो उसे एक इन एलियनेबल एंडमेंट बनाती है। और प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट को वैसे ही बरकरार रखना जैसे उसके फ्रेमर्स ने चाहा था। और मुस्लिम कम्युनिटी के लिए लीगल लिटरेसी बढ़ाना, आर्काइवल एविडेंस को संभाल कर रखना और दूसरे कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेट्स जैसे कि दलित, क्रिश्चियंस, प्रोग्रेसिव ग्रुप्स के साथ कोिशंस बनाना। क्योंकि यह सवाल कि इंडिया एक सेकुलर कॉन्स्टिट्यूशनल रिपब्लिक रहेगा या नहीं? सिर्फ मुस्लिम्स का सवाल नहीं है। बाबरी मस्जिद अब नहीं है। जमीन ट्रांसफर हो चुकी है। उसकी जगह एक राम मंदिर बन चुका है। केस फॉर्मली बंद हो चुका है। लेकिन 2019 का फैसला कभी सिर्फ एक मस्जिद के बारे में था ही नहीं। कोर्ट ने जो बनाया वो कोई सेटलमेंट नहीं था। वह एक मेथड था और एक मेथड सफर करता है और यही वह आयरनी है जो जेम रिपोर्ट हमारे सामने छोड़ जाती है। प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट ने एक लकीर खींची थी 1947 पर कि आजादी के दिन कोई प्लेस ऑफ वरशिप जो था वही रहेगा। खुद कोर्ट ने अयोध्या जजमेंट में इसी एक्ट को कहा था अ नॉन डेगबल ऑब्लिगेशन। एक ऐसा वादा कि हिस्ट्री में हुई या होने का दावा की जाने वाली नाइंसाफियों को प्रेजेंट यानी आज के खिलाफ हथियार नहीं बनाया जाएगा। बाबरी डिस्प्यूट उस एक्ट से निकाला गया इकलौता एक्सेप्शन था सिर्फ एक बार और वही एक एक्सेप्शन अब एक साइटेबल प्रेसिडेंट बन चुका है। मई 2026 में धार की एक अदालत में सदियों पुरानी कमल मौला मॉस्क को एक टेंपल करार दिया। और अपने ही शब्दों में अयोध्या जजमेंट में रखे गए प्रिंसिपल्स का सहारा लिया। बाबरी मस्जिद के फैसले में आखिर व बाय यूज़ को माना गया है ना। व बाय यूज़ को माना गया और उसको उसको एक जगह दी गई है। लेकिन व बाय यूज़ का जिक्र तक नहीं है। जो धार की मस्जिद का मसला है उसमें व बाय यूज़ का जिक्र तक नहीं है। जिस एक्सेप्शन को एक्ट ने सिर्फ एक बार इजाजत दी थी वो अब उसी तर्क का हिस्सा बनता दिखाई देता है जिसे रोकने के लिए यह एक्ट लिखा [संगीत] गया था। 1947 का मतलब इतिहास के नीचे एक लकीर खींचना था। लेकिन आज बहस सिर्फ पास्ट पर नहीं है। बहस इस बात पर है कि क्या हिंदुस्तान का प्रेजेंट और फ्यूचर कॉन्स्टिट्यूशन के उसूलों से तय होगा या मेजॉरिटी के दावों से। शायद यह बेहतर जजमेंट होता कि उसको बाबरी मस्जिद मानी जाती और या तो मुस्लिम कम्युनिटी से कहा जाता कि भ आप इसको दे दे अब तो वहां पे वो नहीं है। बिल्डिंग नहीं है। या फिर कोर्ट कह देती कि साहब हम 142 में देंगे। लॉ में एक अमेरिकन जज का बोलना है। सुप्रीम कोर्ट के अमेरिकन जज का वी आर सुप्रीम। नॉट बिकॉज़ वी आर इनफोलेबल। हम सुप्रीम है। इसलिए नहीं कि हमसे कोई गलती नहीं हो सकती। गलती तो हमसे भी हो सकती है लेकिन हम सुप्रीम इसलिए हैं क्योंकि हम फाइनल हैं। उम्मीद करता हूं कि जो इनजस्टिस इस जजमेंट ने मुसलमानों के साथ किया ऐसा इनजस्टिस कोई और जजमेंट नहीं करेगा। अगर आपको लगता है कि ऐसी स्टोरीज लोगों तक पहुंचनी जरूरी है तो इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें क्योंकि ऐसी आवाजें तभी आगे बढ़ती हैं जब आप उन्हें आगे बढ़ाते हैं और अगर आप हमें सपोर्ट करना चाहते हैं तो स्क्रीन पर दिख रहे क्यूआर कोड को स्कैन करें। शुक्रिया।

Companion article

On 9 November 2019, five judges of India's Supreme Court delivered a judgment running to roughly 1,400 pages, settling a land dispute in Ayodhya that had run through the courts for decades. The land itself was about 1,500 square yards. For nearly five centuries a mosque had stood on it — the Babri Masjid, built in 1528 under the Mughal emperor Babar. On 6 December 1992 a mobilised crowd, acting on the ideology of the Ram Janmabhoomi movement, tore it down. In its 2019 judgment, the Court held the demolition was “a serious violation of the rule of law.” In the same judgment, it awarded the disputed land to the Hindu parties. That is the tension the rest of the story turns on: a court naming a legal wrong, and then rewarding the outcome that wrong produced.

In 2026, the Jamiat Ulama-i-Hind's Justice and Empowerment of Minorities initiative, known as JEM, published a 107-page report titled A Critical Analysis of the Babri Masjid Judgment and the Case of the Places of Worship Act 1991. Its argument is that the 2019 verdict wasn't an isolated ruling but the outcome of a three-decade process in which the country's highest court gradually absorbed the logic of Hindutva into its own constitutional reasoning — steadily narrowing the secular protections Muslim places of worship had previously enjoyed.

The Law Written to Prevent Another Ayodhya

In 1991, in the middle of the Ram Janmabhoomi agitation, Parliament passed the Places of Worship (Special Provisions) Act. Its premise was simple: with independence in 1947, India became a new, sovereign, secular republic, and whatever religious character a place of worship held on 15 August 1947 would be its permanent character — no revisiting it, no fresh claims rooted in medieval history. The Act carved out exactly one explicit exception, the Babri Masjid-Ram Janmabhoomi dispute, to be resolved separately; every other place of worship was meant to be protected.

The irony, the report notes, is that the 2019 Ayodhya judgment itself praised this law, calling it a “non-derogable obligation” underpinning India's secularism and holding that “history's wrongs shall not be weaponised to oppress the present.” Yet in the same breath, through the Act's sole exception, the Court handed the disputed land to the Hindu side — showing how far judicial reasoning could still bend toward majoritarian historical narratives while affirming the very principle meant to prevent that.

How the Court Redefined What a Mosque Is

The report traces the roots of the 2019 verdict to a 1994 judgment, Ismail Faruqui v. Union of India, which arose after the government acquired the disputed site following the demolition. The Supreme Court upheld that acquisition — but in doing so, reshaped how mosques would be understood in Indian constitutional law. The majority held that a mosque is not an essential part of the practice of Islam, since prayer can be offered anywhere, even in the open, and concluded that mosques therefore carry no special constitutional protection against state acquisition — what became known as the mosque essentiality argument.

Scholars and Muslim communities have objected ever since. Mosques hold a central place in Islamic religious life going back to its earliest period: among the Prophet Muhammad's first acts after migrating from Mecca to Medina was building the Quba mosque and then Masjid al-Nabawi, which served as a social, educational and administrative centre for the community, not merely a place of prayer. Islamic jurisprudence does allow that prayer can, when necessary, be offered elsewhere — but critics argue that flexibility does not diminish a mosque's religious significance. By ruling on what counts as essential to a religion, the Ismail Faruqui bench effectively transferred that interpretive authority from believers to the judiciary. The JEM report treats this move as the foundation of what it calls the “Ayodhya logic” — a framework that, in its reading, systematically devalues Muslim religious spaces and leaves them more exposed to state intervention.

A year later, in 1995, the Supreme Court held in a set of election cases that Hindutva was not, in itself, a religious appeal but could be understood as “a way of life” — which the report reads as a kind of constitutional clearance for using Hindutva in election campaigning. Justice A.M. Ahmadi, who wrote the dissenting minority opinion in Ismail Faruqui, later described, in private writings that surfaced years afterward, the institutional pressure he faced to join the majority. Asked to sign a draft that would have implicitly justified the events of December 1992, he refused: “I don't care about becoming Chief Justice. I won't do it.” A quarter-century later, the reasoning he refused to sign became the foundation of the 2019 verdict.

Four Flaws in the 2019 Verdict

The 2019 title suit, M. Siddiq v. Mahant Suresh Das, was framed as a property dispute in which neither side could produce title documents — a fact the Court itself acknowledged. It nonetheless awarded the entire plot to the Hindu parties, resting its decision on “possessory title”: the finding that Hindu worship at the site had been more continuous, treating breaks in Muslim use after riots in 1857, 1934 and 1858–00 as restorations of possession rather than genuine interruptions. One lawyer involved argued in writing that the Babri Masjid was waqf by dedication, citing a plaque that had hung outside dedicating the property to Allah — an argument the roughly 800-page judgment does not address.

The report identifies four core flaws. First, an asymmetric evidentiary standard: every Muslim claim was scrutinised and rejected one by one, while Hindu claims were not tested against comparable rigour. Second, idols placed inside the mosque unlawfully in 1949 were nonetheless treated as grounds for a religious-presence claim — an unlawful act converted into the basis of a legal one. Third, the Archaeological Survey of India never concluded the mosque had been built over a demolished temple, and there was a gap of roughly four centuries between the structure beneath the mosque and the mosque's own construction; archaeologists Supriya Verma and Jaya Menon, who monitored the excavation for the Waqf Board, pointed to methodological irregularities and argued the exercise resembled a search for a predetermined conclusion. No Sanskrit inscription and no writing before the eighteenth century supports the claim of a large Ram temple at the site, and the Supreme Court itself accepted the ASI report did not establish the mosque was built over one. Fourth, the Court held the 1992 demolition unlawful but did not order the mosque's restoration, awarding five acres of alternative land instead — what the report calls “the formalisation of a fait accompli.”

The report also flags a further discomfort. Former Chief Justice D.Y. Chandrachud, who sat on the 2019 bench, told Newslaundry in a September 2025 interview that the mosque's 1528 construction was itself “a fundamental act of desecration” — a claim the judgment he co-authored never made; that verdict explicitly found the ASI had not established the mosque was built by demolishing a temple. Chandrachud later said his remark had been taken out of context and reiterated that the verdict rested on evidence, not faith. The report simply notes the phrase and leaves its implications open.

The Reanimation of Ayodhya

The report calls what has followed the “reanimation of Ayodhya”: the gradual repetition of the same template at other sites. A petition is filed, often framed not as a title dispute but as a request for a survey or historical inquiry — courts allow it, reasoning that examining history is not the same as altering legal status. Interim orders follow, access rules change, and temporary measures harden into a new status quo.

In Sambhal, in November 2024, a local court ordered a survey of the roughly five-hundred-year-old Shahi Jama Masjid within hours of receiving the petition; when the survey team returned a second time the same day, violence broke out and five people were killed, all of them Muslim. In Haldwani, in February 2024, protests followed a court order to demolish a mosque and madrasa; police firing killed six people, and residents said the structures targeted were decades old. In Gyanvapi, in January 2024, a Varanasi court permitted Hindu prayers to resume in the mosque's southern cellar, reportedly closed for decades; the Supreme Court declined to stay the order. In Rajasthan's Bar district, in June 2026, eviction notices dated 11 June were delivered to six mosques and madrasas only on 17 June, giving recipients until the next day to respond, well short of the roughly fifteen days civil rights groups say due process normally requires; within days a joint team of the administration, police and Border Security Force demolished the structures. Similar drives have hit mosques, eidgahs, madrasas and dargahs in Uttar Pradesh, Assam, Gujarat, Madhya Pradesh and Uttarakhand, justified as encroachment removal, urban planning or public order.

The most consequential turn since 2019, the report suggests, came in Dhar, at the Kamal Maula Mosque in Bhojshala — on the very day the JEM report itself was released. The Madhya Pradesh High Court ruled that the roughly eleventh-century structure, which had functioned as a mosque for centuries and operated under a shared-use arrangement since 2003, was in fact a Hindu temple, barring Muslims from praying there, and explicitly invoked the principles of the 2019 Ayodhya judgment. One difference stands out: in Ayodhya, the Court ordered five acres of alternative land for the mosque; at Bhojshala, it merely said the state “may consider” providing land elsewhere.

A Repeatable Method

The JEM report identifies five recurring patterns it calls methodological parallels: framing title disputes as surveys to bypass the Places of Worship Act; demanding documentary evidence from one side while accepting faith-based claims from the other; flexible procedures for majority-community claims and strict ones for minority claims; judicial passivity as facts on the ground shift; and legal reasoning used to legitimise historical revisionism. What was presented in 1991 as a single, narrow exception has, in the report's account, become a repeatable strategy — relevant well beyond Ayodhya, given that some Hindutva groups have laid historical claim to as many as 400 mosques.

The pressure has also moved beyond individual court cases. In 2025, Parliament passed the Waqf Amendment Act, restructuring the governance of Muslim religious endowments and curtailing the older doctrine of “waqf by user,” under which many mosques, graveyards and madrasas were historically recognised despite lacking formal documentation. Critics argue this weakens community control over Muslim religious institutions and exposes thousands of properties to greater risk of dispute. Meanwhile the Places of Worship Act itself faces a constitutional challenge before the Supreme Court, which has for now stayed fresh surveys and final orders in pending cases but has not dismissed the challenges to the Act.

What the Report Concludes

The report's central claim is precise: India's Supreme Court did not simply make isolated legal errors across a series of judgments — it underwent a structural transformation, in which the logic, language and priorities of Hindu majoritarianism gradually became part of constitutional doctrine. That, it argues, is not a claim about any one judge's bias but about the cumulative direction of an institution. It calls for reform of the essential religious practices doctrine, restoration of waqf's status as an inalienable endowment, and preservation of the Places of Worship Act as its framers intended — alongside building legal literacy, preserving archival evidence, and forming coalitions with other constitutional democrats, on the grounds that whether India remains a secular constitutional republic is not a question for Muslims alone.

The Babri Masjid no longer exists. The land has been transferred, and a Ram temple now stands in its place; the case is formally closed. But the 2019 judgment, the report insists, was never only about one mosque. What the Court produced was not a settlement but a method — and a method travels. The Places of Worship Act drew a line at 1947, declaring that whatever a place of worship was on the day of independence, it would remain so; the Court itself, in the Ayodhya judgment, called that Act a “non-derogable obligation.” The Babri dispute was carved out of it as a one-time exception. In May 2026, a court in Dhar declared a centuries-old mosque a temple, invoking the Ayodhya judgment's own principles — the exception the Act allowed only once has become a citable precedent, travelling toward exactly the outcome it was written to prevent.

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