Nous Podcast· 09 May 2026· 1:32:34

BJP’s Rise in Bengal: Hindu Consolidation and Muslim Anxiety | Dr Mohammad Reyaz

Is West Bengal’s politics entering a new phase?

Full Transcript

व्हाई हुमायूं कबीर? मेरा क्वेश्चन यह है। क्या कहीं पर भी अगर कोई भी लीडर आकर यह कहे कि हम यहां पर बाबरी मस्जिद बनाने जा रहे हैं तो क्या मुसलमानों को कहीं पर भी बाबरी मस्जिद कबूल है? और बाबरी मस्जिद के नाम पे उन्हें वोट मिला। ये मैं चंदा तो दिया लोगों ने। नहीं चंदा दिया लेकिन अभी जो वोट मिला वो इसलिए मिला कि वो बाबरी मस्जिद बना रहे थे। वो तो उसके पहले भी एमएलए थे। क्योंकि मवा मोहतरा ने कहा ये बात कि मुसलमानों ने वोट नहीं किया। 16 के बाद वाला इलेक्शन में आप देखेंगे। स्पेशली अगर माइनिटीज की जो बात हम कर रहे हैं मुस्लिम की तो अगर उसकी बात करें कुछ नई पॉलिसी नहीं आई कोई नए स्कीम्स नहीं आए और बंगाली मुस्लिम्स में खासकर एक रिजेंटमेंट एक गुस्सा बनना शुरू हुआ आईएसएफ पार्टी बनी एक्चुअली पिछले इलेक्शन में और उन्होंने इस अच्छा खासा जो उनके उनके मोबिलाइजेशन वहां पे वो इसी की बात करते हैं कि आप सिक्योरिटी की बात तो कर रहे हो ठीक है लेकिन सिक्योरिटी के आगे क्या? यह कैसा उत्साह है लोगों का कि जो बीजेपी में प्रो इनकंबेंसी हो जाता है और अपोजिशन पार्टी कोई है या दूसरी पार्टी है बीजेपी के अलावा उसमें वो एंटी इनकंबेंसी हो जाता है। मुस्लिम अपीज़मेंट की बात होती है। पिछले 5 सालों में ममता बनर्जी का अगर एक एक्स्ट्रा अगर ये उन्होंने भी सॉफ्ट हिंदू जो कांग्रेस 2014 के बाद जो उन्होंने एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश करी तो ममता बनर्जी ने चार ग्रैंड टेंपल बनाए। हिंदुओं में एक तरह का [नाक से की जाने वाली आवाज़] यह एक नैरेटिव बन रहा था कि शी इस फेवरिंग मुस्लिम्स अपीज़मेंट कर रही हैं और मुसलमानों में एक नैरेटिव ये बन रहा था दैट शी इस गोइंग टुवर्ड्स सॉफ्ट हिंदुत्व जो मिडिल क्लास बंगाली अर्बन जो दूसरे कम्युनिटीज हैं इंक्लूडिंग अपर कास्ट तो एक मैसिव हिंदू वोट कंसोलिडेशन इन फेवर ऑफ बीजेपी देखा गया जो सब्र इंस्टट्यूट के जिनसे मैंने इंटरव्यू किया उन्होंने कहा कि मेरे पास कुछ इस तरह की खबरें भी है कि शायद कुछ डिटेंशन सेंटर के लिए कुछ जगहें जो है वह चिन्हित भी कर दी गई हैं। तो मेरा सवाल यह है कि मुसलमान जहां कहीं ना कहीं एक तरह से वह पावर में रहे उनको उस तरह का डर वहां पर नहीं रहा। चाहे लेफ्ट रही या टीएमसी? अब उनको क्या डर सता रहा है? अब उनको क्या लग रहा है? नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें [संगीत] अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। पश्चिम बंगाल के नतीजे आ गए हैं और यूं तो चुनाव पांच राज्यों में हुए हैं। चार राज्य और एक यूनियन टेरिटरी। लेकिन सबसे ज्यादा जिक्र अगर किसी एक स्टेट का हो रहा है तो वो है पश्चिम बंगाल। क्योंकि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार चली गई है और पहली बार भारतीय जनता पार्टी अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो पा रही है। जाहिर सी बात है यह बहुत ही हिस्टोरिक है पश्चिम बंगाल के लिए भी, भारतीय जनता पार्टी के लिए भी, देश के लिए भी। अब सवाल यह उठ रहा है कि पश्चिम बंगाल किस तरह से बदलने जा रहा है? अगर हम हाल फिलहाल की बात करें जब से नतीजे सामने आए हैं हमारे उसके बाद से भी हम पूरे पश्चिम बंगाल में देख रहे हैं वायलेंस की जिस तरह की तस्वीरें आ रही हैं वीडियोस आ रही हैं खबरें आ रही हैं। लेनिन की जो मूर्ति है उसको किस तरह से तोड़ दिया गया। बुलडोजर की एंट्री हो गई है। जय श्री राम के नारे लगाए जा रहे हैं। नंगी तलवारें जो हैं वो लहराई जा रही हैं। कई हत्याएं हो चुकी हैं। और लगातार जो एक टेंशन है वो भी लगातार बनी हुई है। लेकिन इस सबके बीच जो एक सवाल है वो ये कि लगभग 30% जो मुसलमान हैं पश्चिम बंगाल में उनका फ्यूचर क्या है? वो इस बदलाव को किस तरह से देख रहे हैं? क्योंकि अभी तक हम पूरे पश्चिम बंगाल की अगर सियासत को हम देखें तो कहीं ना कहीं एक रिप्रेजेंटेशन मुसलमानों का रहा है। वो सत्ता में रहे हैं चाहे सिंबॉलिक ही सही लेकिन उनको वो रिप्रेजेंटेशन मिलता रहा है। लेकिन अभी फिलहाल वो जो भी जीत कर आए हैं वो अपोजिशन में बैठेंगे। यानी कि उस तरह से वो पावर में नहीं रहेंगे। इसको मुसलमान किस तरह से देख रहे हैं? जो उनके वहां पर इंस्टट्यूट्स हैं, जो उनके कारोबार हैं, जो एजुकेशनल इंस्टट्यूट्स हैं, क्या उन सबको लेकर भी इन्हें कोई खतरा दिख रहा है? क्या अपनी आइडेंटिटी को लेकर कोई उनको खतरा दिख रहा है? मैं आपको यह बता बता दूं बाकायदा तौर पर कुछ इदारों की तरफ से पोस्टर्स जारी किए गए हैं मुसलमानों को लेकर जिसमें यह कहा गया है कि आप अगर हो सके तो कुछ दिनों के लिए मुसलमानों के लिए कहा गया है कि कुछ दिनों के लिए आप अपने घरों से बाहर ना निकलें जब तक बेहद जरूरी ना हो। क्या वाकई में हालात इतने खराब हैं? क्या जो हम नॉर्थ में जिस तरह का कम्युनलिज्म हम देखते रहे हैं, हिंदुत्व का जो हम राइज देखते रहे हैं, क्या हमें वो पश्चिम बंगाल में देखने के लिए मिलेगा? और इसके साथ-साथ ममता बनर्जी का क्या फ्यूचर है? ममता बनर्जी कह रही हैं कि वो इंडिया गठबंधन को अब मजबूत करेंगी और अब वो एक आजाद पंछी हैं। वो यह भी कह रही हैं कि वो अब सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगी? क्या वाकई में सुप्रीम कोर्ट से उनको कुछ हाथ लगेगा? और सवाल यह भी कि क्या जो यह कहते कहने कहते हुए नजर आए थे शिवेंदु अधिकारी कि वो सिर्फ हिंदुओं के एमएलए हैं क्योंकि हिंदुओं ने उनको टिकट उनको वोट दिया है और इसके साथ-साथ उन्होंने यह भी कहा था मुसलमानों के लिए कि उनका वही हाल होना चाहिए जो इजराइल ने गाजा में किया है। क्या ऐसा शख्स पश्चिम बंगाल का मुख्यमंत्री क्या बनने जा रहा है या फिर कोई और बनेगा? ये तमाम हमारे अभी सवाल हैं, कुछ स्पेककुलेशंस हैं। बहुत सारी चीजें हैं जो अभी बंगाल में अनफोल्ड होनी बाकी हैं। आज इसी पर हम चर्चा करेंगे। इसी पर बात करेंगे इस खास पॉडकास्ट में। मेरे साथ बेहद खास मेहमान ऑल द वे फ्रॉम कोलकाता इन दिल्ली। मेरे साथ स्टूडियो में मौजूद हैं मोहम्मद रियाज साहब जो कि आलिया यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और फॉर्मर जर्नलिस्ट भी हैं वो और हम कह सकते हैं कि पॉलिटिकल एनालिस्ट भी हैं। वो। बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका। बहुत-बहुत [नाक से की जाने वाली आवाज़] शुक्रिया आपका। मेरा सवाल यह है रियाज साहब। शुरुआत अगर मैं करूं कि आप एक वोटर भी हैं और आप मुस्लिम भी हैं और आपने इन तमाम चीजों को बहुत बारीकी से आपने इनकी स्टडी भी की है कि कैसे पश्चिम बंगाल की सियासत बदली है, नई पार्टीज आई हैं। अभी यह जो रिजल्ट आया है, उसको आप कैसे देख रहे हैं? क्योंकि आगे मैं बात करूंगी मुसलमानों के हवाले से और दूसरी चीजों पर। लेकिन पहला आपका रिएक्शन यह जो रिजल्ट आए हैं उसको आप कैसे देख रहे हैं? देखिए इस पर तो ऑलरेडी दो-ती दिनों में बहुत सारे एनालिसिस आने लगे हैं। लेकिन जो एक मेन मेन जो मुद्दा है जो बात है कि वो यह है कि टीएमसी या बहुत सारे अपोजिशन पार्टी या जो सिविल सोसाइटी के बहुत सारे लोग हैं वो एक तरीके से पूरा ब्लेम एसआईआर को के ऊपर एक तरह से डाल डालने की कोशिश कर रहे हैं। एसआईआर का एक रोल इंपॉर्टेंट रहा है। इसको डिनाई नहीं कर सकते। बहुत सारी क्लोज शीट में देखा गया है कि जो टोटल डिलीशन मार्जिन से ज्यादा टोटल डिलीशंस है तो ये इसको हम एकदम से डिनाई नहीं कर सकते। एसआईआर के अलावा जो सेंट्रल बॉडीज जो भी है इनकम टैक्स, सीबीआई या इस तरह के उसके अब्यूज के भी जो एक्विजिशन है तो ये फैक्टर है। लेकिन ये कहना कि सिर्फ इसकी वजह से अदरवाइज जो ममता बनर्जी ने क्लेम किया कि वो 100 सीट्स कम से कम उनके जो मैनपुलेशन हुआ है। अदरवाइज वो वो जीतती सरकार। इसीलिए उन्होंने बोला कि वो उनका एक पॉलिटिकल उनकी पोस्टरिंग है। वो तो ठीक है। लेकिन यह पहली बार नहीं है। हर बार जब इलेक्शन रिजल्ट आता है तो खासकर जब बीजेपी जीतती है तो अपोजिशन पार्टी और उसके पहले एक्चुअली बीजेपी भी कहती थी कि वो ईवीएम को ब्लेम करती है। क्योंकि कोई भी पॉलिटिकल पार्टी इतनी बड़ी रिस्क तो नहीं लेंगे कि वोटर्स को ब्लेम करेंगे अपने हारने के लिए। तो इसीलिए ईवीएम या इस एसआईआर जो है एक एस्केप गोट की तरह उसको दिखाया जा रहा है। वो एक रीज़ है। मैं नहीं कह रहा हूं कि एसआईआर का कोई एसआईआर का कोई इफ़ेक्ट नहीं रहा है। लेकिन सिर्फ अगर एसआईआर ना नहीं होता तो क्या होता वो तो एक हाइपोथेटिकल क्वेश्चन है। लेकिन एसआईआर के बिना भी ऐसा ही अगर आउटकम होता वोटर टर्न आउट होने पे वेरी लाइकली कि टीएमसी तब भी हार जाती। बीजेपी तब भी जीत जीत जाती। शायद मार्जिन थोड़ा कम होता मतलब अच्छे नहीं होते तो उसकी वजह यह है कि जो सबसे जो मेन आउटकम है इस इलेक्शन का कि वी सॉ अ लार्ज स्केल मैसिव हिंदू वोट कंसोलिडेशन एस्पेशली एससी और एसटी सीट्स पे जो देखेंगे जो एससी और एसटी डोमिनेटेड सीट्स हैं वो तो ऑलमोस्ट बहुत सॉलिड कंसोलिडेशन है बट उसके अलावा और ये कंसोलिडेशन जो है ये ओवरनाइट नहीं है क्योंकि एससी एसटी जो पपुलेशन है उसमें मथुआ भी आ जाते हैं उसमें लेकिन उसमें पुरुलिया और जंगल महल का जो बाकुरा और वो जो डिस्ट्रिक्ट है जो आदिवासी डोमिनेटेड या दूसरे जो और कम्युनिटीज हैं उनको वो वाले जो डोमिनेटेड सीट्स हैं जंगल महल का एरिया हो या या फिर इवन नॉर्थ बंगाल ये सब सीट्स में बीजेपी ऑलमोस्ट ग्रीन स्वीप किया अलीपुर द्वार हुआ पुरुलिया है बाकुरा है पूर्व मेदनीपुर है कई ये सब कई सारे डिस्ट्रिक्ट हैं जहां ऑलमोस्ट सारी सीट बीजेपी जीती है तो ये एक मेन कॉस कंसोलिडेशन हुआ। प्लस जो मिडिल क्लास बंगाली अर्बन जो दूसरे कम्युनिटीज हैं इंक्लूडिंग अपर कास्ट तो एक मैसिव हिंदू वोट कंसोलिडेशन इन फेवर ऑफ़ बीजेपी देखा गया। कई लोग सरप्राइज हैं ऐसे कि जैसे ये कैसे हो गया जैसे ओवरनाइट हुआ। तो हम ये भूल जा रहे हैं कि 2021 में ऑलरेडी तो दे दे वर हाफ ऑलमोस्ट हाफ देयर। 77 सीट्स 77 सीट्स और वोट देखें तो 36 37% के आसपास वोट उनका तो ऑलरेडी अह दे वर ऑलरेडी देयर। हम पर सबको ये लग रहा था कि क्या 101% 10 12% का वोट क्या एक बार में शिफ्ट कर सकता है? वहां पे क्यों ये ऐसा क्यों लग रहा था? कई सारे एनालिसिस आए थे कि जैसे मददुल इस्लाम या इवन जो सी वोटर्स के देशमुख यशवंत देशमुख हैं उनका भी था कि बीजेपी हैज़ टू फाइट बिटवी इन 30 70% 30% मुस्लिम वोट्स मान के चल रहे हैं कि वो तो वहां से नहीं आना। तो यह था कि क्या इतना मैसिव कंसोलिडेशन हो सकता है। इसीलिए बहुत सारे लोग बहुत केयरफुल थे अपने मतलब बीजेपी का जो रिजल्ट है एक दो एनालिसिस छोड़ दे अगर एग्जिट पोल तो जितने एनालिसिस एग्जिट पोल ने दिए उससे ज्यादा उन्हें सीट आई है एक्चुअली तो दे वर आल्सो केयरफुल बिकॉज़ उन्हें दिख रहा था कि कंसोलिडेशन है। पर क्या इतना मैसिव कंसोलिडेशन है? ये नो वन वाज़ एक्सपेक्टिंग। और ये कंसोलिडेशन जो है ये सिर्फ मैं बोलूंगा कि सिर्फ हिंदुत्व और कम्युनल इस इशू पे कंसोलिडेशन नहीं है। इसमें एंटी इनकंबेंसी एक बड़ा फैक्टर है। इनफैक्ट मैंने इसके पहले भी एक दो इंटरव्यू में या डिस्कशंस में या सोशल मीडिया पोस्ट पे आर्टिकल तो मैं नहीं लिख पाया बट सोशल मीडिया पोस्ट में। मैंने ये चीज को हाईलाइट करने की कोशिश करी है कि आई मतलब आपने बोला फॉर्मर जर्नलिस्ट मैं 12 13 14 में दिल्ली में ही था और तब इलेक्शंस हमने अन्ना मूवमेंट के बाद से 2010 कॉमनव्थ के करप्शन के जो एलिगेशन लगे उसके बाद अन्ना मूवमेंट उसके बाद दिल्ली में और नेशनल लेवल पे जो चीजें हो रही थी आई सी अ लॉट ऑफ पैरेलल बिटवीन द टू कैंपस जो अच्छे दिन आएंगे एंड परिवर्तन का जो कैंपेन था वो बहुत ही मुझे सिमिलर लगता है मे बी इफ आई गेट टाइम सम डे आई लाइट अबाउट इट वहां यहां भी दिल्ली गैंग रेप के बाद दिल्ली में सिक्योरिटी वुमेन सिक्योरिटी को लेके बहुत ज्यादा एक नैरेटिव बनाने की कोशिश की गई। आरजी कौर और इन दोनों में आप बहुत पैरेलल में आपको मिलना और द फैक्ट कि उनकी मां खुद कैंडिडेट भी बनी और अब तो वो एमएलए भी बन गई हैं। तो उसके अलावा करप्शन को लेके तो उसी तरह से करप्शन का नैरेटिव जो वहां जिस खासकर पिछले कुछ जैसे मैं ये मैं बोल मैंने पब्लिकली ये बोला है कि नवंबर दिसंबर एसआईआर शुरू होने के पहले अगर कोई मुझसे पूछ पूछ रहा था तो मतलब देयर वाज़ नो कंपटीशन एज इफ इट अपीयर्ड। और ये मैं ऐसे ही नहीं बोल रहा हूं। बाय इलेक्शंस हुए कुछ इंसिडेंट हुए उसके बाद भी जो इलेक्शंस हुए उसमें बाय इलेक्शन खासकर देखा गया कि मतलब कोई कंपटीशन ही नहीं है। तो लग रहा था कि टीएमसी एकदम क्लियर विनर है। एसआईआर होने के बाद भी और यहां पे मुझे लगता है कि थोड़ी टीएमसी कंप्लेसेंट हो गई थी क्योंकि जब एसआईआर के फाइनल डिलीशन लिस्ट आने शुरू हुए हैं। एंड तो कहीं ना कहीं यह बहुत एनालिस्ट को लग रहा था। मैं टीएमसी को ब्लेम नहीं कर रहा हूं। पर आपको याद होगा कि जब नवंबर में जब एसआईआर प्रोसेस शुरू हुआ था तो ममता बनर्जी से लेकर अभिषेक बनर्जी के स्टेटमेंट है कि हम एक-एक वोटर जब तक इन उनका नाम नहीं आएगा हम इलेक्शन नहीं होने देंगे। अभिषेक बनर्जी ने बोला था 2 लाख या 5 लाख लोगों को लेकर हम दिल्ली का घेराव करेंगे और देखते हैं कैसे मतलब समथिंग लाइक दिस उन्होंने बंग में अपने स्पीचेस में बोला था। लेकिन जब एसआईआर की लिस्ट आई और जब खासकर जब ये लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी वाली जो अंडर एडजुडिकेशन की जो लिस्ट आई पहले लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी और बाद में उसमें अंडर एडजुडिकेशन जो जो लोगों की लिस्ट बनी तो उसके बाद स्पेशली मुसलमानों में कंसर्न मतलब देश दे मतलब जब एसआईआर शुरू हुआ था तो हर पार्टी मुस्लिम इदारे जमात इस्लामी दूसरे जो भी ऑर्गेनाइजेशन है या फिर टीएमसी सब ने कैंप लगाकर लोगों से फॉर्म भरवाए थे। एंड आपको आपने सब इंस्टट्यूट के उनका इंटरव्यू भी किया है साबिर अहमद का कि कैसे मैपिंग जब हुई जो मैपिंग जब फर्स्ट ड्राफ्ट लिस्ट आई तो मैपिंग में मुस्लिम की बहुत अच्छी मतलब मैपिंग हुई थी एंड देन दे फाउंड समवेयर ये लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का एक नया एक उन्होंने लेकर आए और जिसमें खासकर तो मुसलमानों को ये लगने लगा कि ओ ऑल दिस इज बीइंग डन टू एक्चुअली टारगेट अस समथिंग लाइक आसाम विल हैपन और वो बहुत डेस्पिरेट सिचुएशन में हो गए एंड देन दिस वाज़ द पीरियड जब मतलब आई डोंट ब्लेम टीएमसी एंटायरली एज आई सेड बट दे बिकम लिटिल कॉम्प्लेसेंट आई फील के जिस तरह से अग्रेसिवली उन्होंने पहले बोला था वैसे इतने अग्रेसिव नहीं रहे शायद उनको ये डर था कि एक डर ये हमेशा रहा बंगाल में हर वक्त ये रमर रहा कि क्या प्रेसिडेंट रूल लगेगा तो उन्हें शायद ये डर था कि अगर प्रेसिडेंट रूल लगा के इलेक्शन हो अगर ऑप्शन क्या था अगर के वो इलेक्शन को नहीं होने देते कुछ भी करके धरना दे के ये करके तो प्रेसिडेंट रूल लग जाता क्योंकि 5 साल होने के बाद तो वो गवर्नमेंट होती नहीं तो फिर दे वर प्रोबेब्ली वरिड कि फिर तो और मुश्किल होगा। एंड आल्सो जो जो मैं मेन पॉइंट बोलना चाह रहा था कि एसआईआर के डिलीशन से ये लगा मुझे भी और जो डाटा एनालिसिस करते हैं सब इंस्टट्यूट या दूसरे लोगों को भी ये लगा कि 1520 सीटों पे इसका डायरेक्ट इंपैक्ट हो सकता है। मतलब मुस्लिम मेजॉरिटी जैसे शमशेरगंज है हाईएस्ट मेजोरिटी वो इसमें बहुत ही क्लोज मार्जिन से लेकिन टीएमसी फिर भी जीत गई तो वो या मटिया बुरजलक शहर में सबसे ज्यादा टॉप 10 में एक मटिया ब्रज कॉन्स्टिट्यूएंसी वो भी टीएमसी जीत गई तो यह लगा था कि डिलीट हुआ है बट जो 70% 76% मुस्लिम है अगर या 60 इस तरह से इतने ज्यादा मुस्लिम है कि इट विल नॉट इफेक्ट बहुत मैसिव स्केल में तो प्रोबेब्ली दे बिकम लिटिल कॉम्प्लेसेंट क्योंकि जिस तरह से आपने बोला था कि हम इलेक्शन नहीं होने देंगे आपने तो होने दिया ऑलदो आई गिव क्रेडिट टू देम जिस तरह से उन्होंने कोर्ट में गए और जिस तरह से उन्होंने फाइट किया लेकिन रियाज़ साहब जब आप ये बात बोल रहे हैं तो ये कहा जा रहा है कि कुछ सीटें जो जो टीएमसी को नहीं मिली जिसमें कांग्रेस को मिली मिली है और जिस तरह से हुमायूं कबीर को मिली हैं। यह तमाम सीटें इसलिए मिली है कि मुसलमान नाराज नाराज थे। एआईएमएम को भी कुछ000 कुछ मिले हैं उनको। हां। हालांकि उन्होंने सिर्फ डेंट ही लगाया है। तो मेरा सवाल ये है कि क्या मुसलमानों को ये ये लग रहा था उस वक्त में कि जिस तरह से एसआईआर जब हो रहा था और दर-दर की एक तरह से ठोकरें खा रहे थे। मुसलमान लाइनों में लग रहे थे, रो रहे थे। उनको लग रहा था कि और अभी भी सिचुएशन तो अभी भी वही है। सिर्फ इलेक्शन ही तो वो हुआ है। नाम तो उनका अभी भी नहीं है कि जिस तरह से लड़ना चाहिए था टीएमसी को उनके लिए वो शायद उस तरह से उनके लिए नहीं लड़ी। ये एक एक बात कही जा रही है। दूसरा कहा जा रहा है कि वफ के टाइम पर जब जब प्रोटेस्ट हो रहे थे तो ममता बनर्जी ने कहा यहां नहीं दिल्ली जाकर करो। और इसी तरह की एक दो चीजें और जिनका जिक्र किया जा रहा है कि मुसलमान मुसलमानों को ये लग रहा था कि एक तो वो उनके लिए लड़ती हुई नजर नहीं आ रही हैं और फॉर ग्रांटेड उनको लिया जा रहा है। तो ये जो एक शिफ्ट है जो इतने मुश्किल वक्त में जहां उनको ये लग रहा है कि यू नो 65% जो डिलीशन हुआ है सो मुसलमान है उनकी नागरिकता चली जाएगी। आसाम मॉडल लागू हो जाएगा। डिटेंशन सेंटर हो जाएंगे। ये सारे उस वक्त में भी ये मुसलमान वोट आखिर क्यों बटा? नहीं इसमें देखिए टीएमसी को और बहुत सारे पॉलिटिकल एनालिस्ट को टू टू बी ऑनेस्ट मुझे भी ऐसा लग रहा था कि एसआईआर के डर से जो मुसलमान मैसिवली जो वोट करेंगे वो ऑलमोस्ट 95% टाइप एक दो सीट को अगर छोड़ दे तो कंसोलिडेशन होगा जैसा आपने बोला टीएफसी के फेवर में लेकिन वो नहीं हुआ। इसमें आपने जो कहा जो वफ की बात कही की और उसके यह एसआईआर टू बी वेरी ऑनेस्ट टीएमसी ने एसआईआर के लिए जितना बोला है उतना और किसी पार्टी ने नहीं बोला इनफैक्ट राहुल गांधी ने डुप्लीके आपको याद होगा पहले उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की उन लोगों ने शुरू में स्टेटमेंट्स दिए ये दिए लेकिन उस तरह से कैंपेन नहीं किया वो बंगाल में बंगाल में राहुल गांधी का स्टेक ही नहीं था मैं वही बोल रहा हूं जिस तरह से टीएमसी ने जितने अग्रेसिवली एसआईआर मुद्दे को उठाया किसी पार्टी ने नहीं उठाया यह भी एक है लेकिन जो आपने जो जिसको मैं इसको ऐसे समझ ऐसा नहीं है कि यह वफ या एसआईआर की वजह से सिर्फ बंगाली मुस्लिम नाराज थे। ये खासकर बंगाल में आपने तो कई बार ट्रैवल किया है। वहां आपने इलेक्शंस भी कवर किए हैं। तो बंगाल में दो तरह के मुस्लिम है। एक तो है जो अर्बन एरियाज में है। जैसे कोलकाता में है। मैं उस कम्युनिटी से आता हूं जो उर्दू स्पीकिंग मुस्लिम है। मतलब बंगाली स्पीकिंग जिनका मदर टंग नहीं है। यूपी बिहार में जिनका ओरिजिन है। और एक है जो बंगाली स्पीकिंग मुस्लिम है। बंगाली स्पीकिंग मुस्लिम वास्ट मेजॉरिटी जो है वो रूरल बंगाल में है। और रूरल बंगाल के जो मुस्लिम है अब वह जो आपने कहा वह एंटी जब स्टेट में जब एंटी इनकंबेंसी बन रही थी बहुत सारे मुद्दे को लेके चाहे वो करप्शन को लेके हो स्टैग्नेशन को लेके हो जॉब को लेके हो तो वो सब में बन रही थी वो ये बोले हम कि सिर्फ मुसलमान ऑफ कोर्स सिक्योरिटी बहुत इंपॉर्टेंट है बट एक एक वक्त के बाद ये जो आपने कहा कि टेकन फॉर ग्रांटेड सिर्फ सिक्योरिटी के नाम पे आप कितनी बार सिर्फ ये पिछले बार भी सिक्योरिटी के नाम पे ही उन्हें मैसिव सपोर्ट सपोर्ट मिला था कि बीजेपी जीत जाएगी। लेकिन एक वक्त के बाद जब लोकल लेवल पे भी तो एंटी इनकंबेंसी होती है। लोकल एमएलए से आप नाराज हो या या लोकल और भी बहुत एमएलए के नीचे भी ब्लॉक लेवल पे डिस्ट्रिक्ट लेवल पे रिप्रेजेंटेटिव पंचायत लेवल पे बहुत रिप्रेजेंटेटिव होते हैं। तो एंटी इनकंबेंसी ये मैं इसको एंटी इनकंबेंसी की तरह देखता हूं। उसकी बहुत सारी वजह है। जब पहली गवर्नमेंट बनी थी टीएमसी की 2011 में तो उन्होंने बहुत प्रॉमिसिंग एक एक पॉलिसी लेकर आए थे। बहुत सारी बहुत सारी सबके लिए इंक्लूडिंग फॉर मुस्लिम्स जैसे ओबीसी रिजर्वेशंस में मुसलमानों को को बहुत फायदे उसमें हुए और वो दिखता है कोलकाता में अगर आप जाएंगे तो एक नया मिडिल क्लास एजुकेटेड प्रोफेसर्स डॉक्टर्स टीचर्स आपको देखने को मिलेंगे तो ओबीसी रिजर्वेशन का एक कंसीडरेबल फायदा हुआ इस पे मैंने 2017 में एक रिसर्च आर्टिकल भी लिखा है कि किस तरीके से ये इस इसको आई थिंक शी स्टार्टेड सम काइंड ऑफ़ मिशन इस्लामिया मिशन समथिंग मैं अगर मैं इफ आई एम नॉट रोंग उन्होंने नहीं शुरू किया था लेकिन उसके पहले से वो मिशन स्कूल चल रहे थे वो बहुत एक्सपेंड हुआ तो मुस्लिम गॉट अ फेवरेबल उस तरह से एक एनवायरमेंट और बहुत सारी चीजें हुई उनकी बहुत सारी पॉलिसीज आई आलिया यूनिवर्सिटी का एक्सपेंशन इंग्लिश मीडियम मदरसा मदरसा माने मदरसा स्कूल जो होते हैं वो मदरसा इंग्लिश मीडियम इस तरह की कई सारी उन्होंने प्रॉमिस किए थे और कई कुछ-कुछ चीजें हुई। लेकिन 2014 के इलेक्शन के बाद क्या हुआ कि नेशनल लेवल लेवल पे ही एक नैरेटिव चेंज हो गए ना। तो खासकर 2016 इलेक्शन के आसपास तब तक क्या हुआ था कि बाकी कांग्रेस और लेफ्ट 2011 में क्या था कि मेन अपोजिशन वहां कौन थे लेफ्ट और कांग्रेस तो अगर वो माइनॉरिटीज स्पेशली मुस्लिम के लिए कोई पॉलिसी या प्लान लेके आ अगर आते थे तो लेफ्ट या कांग्रेस के पास उसको अपोज करने का बहुत कुछ तो बचता बस मौका मिलता नहीं था। वो टेक्निकल ग्राउंड पे कुछ अपोज़ कर सकते थे। लेकिन डायरेक्टली तो कुछ अपोज़ नहीं कर पाते थे। लेकिन जब 14 के बाद जब एक नेशनल नैरेटिव चेंज होना शुरू हुआ और खासकर 2016 और 16 के बाद 2016 के असेंबली इलेक्शन और उसके बाद तो 16 के बाद वाला इलेक्शन में आप देखेंगे कुछ स्पेशली अगर मैं माइनॉरिटीज की जो बात हम कर रहे हैं मुस्लिम की तो अगर उसकी बात करें कुछ नई पॉलिसी नहीं आई। कोई नए स्कीम्स नहीं आए और बंगाली मुस्लिम्स में खासकर एक रिजेंटमेंट एक गुस्सा बनना शुरू हुआ। पिछले ही बार आईएसएफ पार्टी बनी एक्चुअली पिछले इलेक्शन में और उन्होंने इस अच्छा खासा जो उनके उनके मोबिलाइजेशन वहां पे वो इसी की बात करते हैं कि आप सिक्योरिटी की बात तो कर रहे हो ठीक है लेकिन सिक्योरिटी के आगे क्या मुस्लिम अपीज़मेंट की बात होती है पिछले 5 सालों में ममता बनर्जी का अगर एक एक्स्ट्रा अगर ये उन्होंने भी सॉफ्ट हिंदू जो कांग्रेस 2014 के बाद जो उन्होंने एक्सपेरिमेंट करने की कोशिश करी तो ममता बनर्जी ने चार ग्रैंड टेंपल बनाए और दिगघा में जगन्नाथ मंदिर कोलकाता के सब जो सबब है राजरहाट वहां पे एक बड़ी सी मंदिर बन रही है। नॉर्थ में सिलीगुड़ी में एक मंदिर बन रही है। एक और मंदिर कहीं पे बन रही है। मैं जगह याद नहीं आ रहा। तो लगता है सेकुलरिज्म तो शायद रह नहीं गया है। तो ये ये वो सेकुलरिज्म था बट मैं आई डोंट ब्लेम ममता बनर्जी फॉर दिस। उनका सेकुलरिज्म ये था कि सबको साथ में लेके चलना। तो वो ईद के दिन नमाज के में भी आती थी, इफ्तार में भी आती थी और वो क्रिसमस में भी जाती थी। वो वो जितने भी फेस्टिवल बुद्धिस्ट के जैन के सब में जाती थी। वो हिंदी स्पीकिंग जो हिंदूज हैं वहां उनके लिए हिंदी यूनिवर्सिटी बनाती थी। वो दलित एकेडमी बनाती थी। वो कुर्मी और इस तरह के जो कम्युनिटीज हैं उनके लिए डेवलपमेंट बोर्ड का अनाउंसमेंट किया था उन्होंने अभी रिसेंटली। तो वो सबके लिए करती लेकिन हाईलाइट क्या होता है कि मुस्लिम के लिए वो इमाम और मुअजिन को को मंथली उनको भत्ता दे दिया जा रहा है उन्हें या मुस्लिम के लिए जो चीजों को लेकर ऐसा लग रहा है कि हिंदुओं में एक तरह का ये एक नैरेटिव बन रहा था कि शी इस फेवरिंग मुस्लिम्स अपीज़मेंट कर रही हैं और मुसलमानों में एक नैरेटिव ये बन रहा था दैट शी इस गोइंग टुवर्ड्स सॉफ्ट हिंदुत्व जी एक्सक्ट्ली तो जो शुरू में उन्होंने जो किया तो ममता बनर्जी का सोशल मीडिया पे ये सब एक नाम है मुमताज बेगम वो जब 2011 101 में जब वो पावर में आई थी तो वो इफ्तार में कहीं बैठी है वो सर अच्छे से ढक के वो पे बैठी है तो वो फोटो उनका वायरल होता है इनफैक्ट मैं एक कमेंटेटर को सुन रहा था किसी न्यूज़ चैनल पे कि मैं एयरपोर्ट पे उतरा और मैंने देखा उनकी बड़ी सी होर्डिंग लगी हुई है वो हिजाब में तो ये क्या जरूरत बेसिकली हज के टाइम में हाजियों को वेलकम करने के लिए या सी ऑफ करने के लिए तो उनके पार्टी के लोग इस तरह से इनफैक्ट अभी वो एक एक रैली में थी जहां उन्होंने सारे अपने जो जो भी होता है उन्होंने सारे नारे बोले उन्होंने जय बंगाल ये सारे सारे रिलीजियस उसमें उन्होंने इंशा्लाह बोला और खुदा हाफिज बोला लेकिन ऑफ कोर्स आप मीडिया में क्या देखेंगे आप देखेंगे कि वो इंशाल्लाह और खुदा हाफ हां वो वाले वो वाले बाइट को कट करके वो चलाते हैं। ये होता रहता है। ये हिंदुत्व ग्रुप जो है बीजेपी जो है उन्होंने इसको यूज़ करा अपना नैरेटिव बनाने के लिए कि शी इज प्लेइंग लाइक मुस्लिम मैपजमेंट की बात तुष्टीकरण और इस तरह की बातें बट बंगाली खासकर मैं बता रहा हूं कि बंगाली मुस्लिम आप देखेंगे कोलकाते में जो वोटर है जो अर्बन मुस्लिम वोटर्स हैं जो उर्दू स्पीकिंग मुस्लिम वोटर्स हैं उन्होंने ऑलमोस्ट आई थिंक 90% के आसपास 80 80 वो वो उन्होंने वोट टीएमसी को किया मटिया ब्रुज हो गया पोर्ट एरिया दोनों जीते और जो जो लीड दिन में आप ममता बनर्जी का देख रहे थे वो एक्चुअली इन वोटर्स की वजह से ही था जो खिदरपुर का एरिया है। तो लेकिन जो बंगाली मुस्लिम है वहां पे ऐसा नहीं है कि मैं कह रहा हूं कि मुस्लिम बंगाली मुस्लिम ने वोट नहीं करा। डिस्पाइट एंटी इनकंबेंसी अगर के बीजेपी नहीं होती वहां पे पार्टी तो शायद उनको और कम वोट मिलते। बट डिस्पाइट एंटी इनकंबेंसी यह एसआईआर का फियर की वजह से वो मतलब हमारी और बहुत लोगों की ये एनालिसिस थी कि एसआई एंटीकेंसी तो बहुत ज्यादा है लेकिन एसआईआर के फियर में कंसोलिडेशन हो जाएगा जो कि हुआ है। ऐसा नहीं कि नहीं हुआ। उन्हें आप उनकी पार्टी में देखेंगे तो लगभग मेरे ख्याल से शायद 2930 एमएलए जो उनके जीते हैं वो वो मुस्लिम डोमिनेटेड एरिया से ही जीत मतलब मुस्लिम है और उन डोमिनेटेड एरिया से तो और भी एमएलए हैं। तो उनके लगभग अह आई थिंक अराउंड 40% एमएलए उनके जो जीत के आए हैं वो वो वो मुस्लिम एमएलए ही जीत के आए। तो दैट शोज़ कि टीएमसी को वोट मिला है। बट टीएमसी वाज़ होपिंग कि 99% हमें मिल जाएगा। नौशाद सिद्दीकी भी हार जाएंगे। शौकत मुल्ला को उनके अगेंस्ट में खड़ा कर उनके अगेंस्ट में ले आए। क्योंकि मवा मोहथरा ने कहा ये बात कि मुसलमानों ने वोट नहीं। लेकिन मुसलमानों ने तो ऑलमोस्ट मुझे लगता है लेकिन जो टीएमसी प्रोबब्ली सोच रही थी कि 100% या 99% [गला साफ़ करने की आवाज़] मिलेगा। उन्हें शायद 80 80 प्लस 84 83% के आसपास वोट मिला होगा। कुछ वोट बटा कांग्रेस में के जैसे दो सीट और ये चार पांच तो जीते आईएसएफ कांग्रेस हुमायूं कबीर दो जगह से जीत गए बट हुमायूं कबीर का दो जगह से जितनातना ये बताता है कि किस लेवल पे एक तरह से गुस्सा था आपको कुछ उनके स्टेटमेंट हुमायूं कबीर पे आऊंगी क्योंकि दैट इज वै इंटरेस्टिंग एंड इट इज वेरी यू नो डिसहार्टनिंग टू कि मुसलमान क्या सोच रहा है ये मतलब ये बहुत बड़ा एक एक क्वेश्चन है मैं इस पे आऊंगी लेकिन उससे पहले जो हम एंटी इनकंबकेंसी की हम बात बार-बार कर रहे हैं पश्चिम बंगाल में। मेरा सवाल यह है कि यह बिहार में प्रो इनकंबेंसी हो जाती है और यही पश्चिम बंगाल में एंटी इनकंबेंसी हो जाती है। यह कैसा गुस्सा है लोगों का कि जो बीजेपी में प्रो इनकंबेंसी हो जाता है और अपोजिशन पार्टी कोई है या दूसरी पार्टी है बीजेपी के अलावा उसमें वो एंटी इनकंबेंसी हो जाता है। इस पे मेरी एक अपनी थ्योरी है। बस थ्योरी के पहले जो आपने बात बोला रूही तिवारी जो एक जर्नलिस्ट है सीनियर उन्होंने एक ट्वीट किया था जब रिजल्ट आया कि बेस्ड ऑन हर ट्रेवल टू आसाम एंड बंगाल उन्होंने बोला ये क्लियर था कि वहां प्रो डेवलपमेंट प्रो गवर्नमेंट जैसा आपने बताया प्रोंबंबेंसी वोट है और यहां पे एंटी इनकंबेंसी ये इसमें मेरी अपनी थ्योरी है। ये अभी तक मैं लिख नहीं पाया हूं। बट इस तरह के कहीं-कहीं जब मौका मिला है तो मैंने इसको आर्टिकुलेट करने की कोशिश करी है। मेरी अपनी ये थ्योरी है कि इंडिया में करप्शन एंटी इनकंबेंसी ये करप्शन ये सब एंटी इनकंबेंसी के ही अंडर है। ब्रॉडली अंडर एंटी इनकंबेंसी जिसमें करप्शन एक मेन मुद्दा है। प्लस ये सिक्योरिटी क्राइम्स इस तरह की जो चीजें होती हैं ये नॉन बीजेपी स्टेट्स में ही ये फैक्टर होती है। जो जैसा आपने बोला बिहार में या आसाम में जो बीजेपी रूल स्टेट्स है या आप हिस्ट्री देख लें इंडिया में। यह कांग्रेस के अगेंस्ट या या अरविंद केजरीवाल के अगेंस्ट या या ममता बनर्जी के अगेंस्ट ही व्यापम के बाद भी मध्य प्रदेश में एंटी इनकंबेंसी करप्शन को लेके वो नैरेटिव नहीं बनता या या और भी दूसरे स्टेट में क्यों? उसमें जो मेरी अपनी ये थ्योरी है कि यह नैरेटिव तभी स्टैंड करती है जब लार्ज स्केल हिंदू वोट कंसोलिडेशन हो रहा होता है। तो खासकर जो लिबरल इलीट हिंदूज हैं वो ये तो नहीं बोलेंगे ना कि मैं कम्युनल हूं इसलिए मैं बीजेपी को वोट दे रहा हूं। तो वो वो यूजुअली बोलेंगे कि करप्शन बहुत ज्यादा है। डेवलपमेंट नहीं हो रही। इसीलिए मैंने आपको 2014 के कैंपेन से 2026 का बंगाल इलेक्शन कंपेयर किया क्योंकि मुझे यह नैरेटिव मैं अप्रैल के मिड में मुझे सडनली लगने लगा कि ये सरकार मतलब इट्स ऑन से कि मतलब बहुत टफ इलेक्शन होने वाला है। आई वास नॉट श्योर कि हार ही जाएंगे। बट ये लगने लगा था कि टफ है। इट्स नॉट सो इट्स नॉट गुड। क्यों? क्यों? क्योंकि मुझे सडनली लगा कि नैरेटिव जो है वो वही 2014 वाली मुझे दिखने लगी कि अनइंप्लॉयमेंट बढ़ रही है एंड स्टैग्नेशन है। यहां से लोग बाहर जा रहे हैं क्योंकि यहां पे जॉब नहीं है। यहां पे अपॉर्चुनिटीज नहीं है। फिर उसके बाद वुमेन सिक्योरिटी को लेकर तो ये जब लार्ज स्केल हिंदू वोट कंसोलिडेशन जब भी होता है तभी आप देखेंगे एंटीकेंसी की बात आती है। नहीं तो यहां पे मैं एक बात खत्म कर दूं। यहां पे दो चीज़ है। इसमें मैं बीजेपी को क्रेडिट देता हूं कि दे आर मास्टर एट बिल्डिंग नैरेटिव्स। एंड एट द सेम टाइम फेलियर ऑफ़ द अपोज़िशन अदर्स। कांग्रेस या जो भी पार्टी है वो उस उस हिसाब से नैरेटिव नहीं बना पा। हैव ऑल द मीडिया। दे कैप्चर सोशल मीडिया। दे हैव यू नो द एंटायर सो कॉल्ड मेन स्ट्रीम मीडिया। ये तो अभी है ना? ये तो अभी है लेकिन इसके पहले 2014 में तो कांग्रेस पावर में थी। फिर भी उन्होंने वो वो वो नैरेटिव नहीं बना पाए। इसीलिए मैं अपनी मेरी जो वो थ्योरी है जो मैं बोल रहा हूं कि व्हेन अपर कास्ट इट पीपल मेजरिटी इलिट ऑफ़ द मेजोरिटी डिसाइड्स के दे विल बी वोटिंग फॉर फॉर बीजेपी इसीलिए प्रोबेब्ली बहुत सारे जो सर्वेज़ हैं पोलस्टर माय एक्स इंडिया माय एक्सिस इंडिया जो प्रदीप गुप्ता एक्सिस माय इंडिया प्रदीप गुप्ता ने बोला कि बहुत से लोग साइलेंट है द बिकॉज़ दे हैड मेड देयर माइंड लेकिन दे कैन नॉट से कि वी वांट बीजेपी यहां बंगाल में आप देखेंगे बहुत सारे लोग खासकर जो एजुकेटेड के है वो यह नहीं बोल रहे होंगे कि हम बीजेपी को चाहते हैं। बट सब ने यह बोला कि ममता को जाना है। हम ममता हैज़ टू गो। तो ये वाला नैरेटिव जो है ना कि जो एकदम एंटी एंटी इनकंबेंसी मुझे लगता है कि छ महीने पहले उतना ज्यादा नहीं था जितना या तीन चार महीने पहले भी नहीं था। इनफैक्ट मार्च में आप देखेंगे बहुत सारे लोग एसआईआर को लेके बिजी बट जो भी जा रहा था ग्राउंड में वो ये कह रहा था कि ऐसा लग रहा है एक महीना इलेक्शन को है और मतलब लोगों में जैसे कोई एंथूजियाज्म ही नहीं है। ये दो वजह से हो सकती है। या तो लोगों ने डिसाइड कर लिया था कि इस बार ये और दे वर साइलेंट दे न्यू इट मे हैव सम रिएक्शंस वायलेंस हो सकती है या इस तरह की चीज़ या दूसरा ये है कि उसके बाद जो बीजेपी ने इस तरह से नैरेटिव बनाया कि दे वर सक्सेसफुल इन बिल्डिंग दिस नैरेटिव ऑफ़ एंटी इनकंबेंसी। यहां पे एक चीज़ और जो जोड़ना चाहूंगा कि बीजेपी के जो ग्रैंड सक्सेस ऑफ़ नैरेटिव हुआ वह स इट हैपेंड साइमलटेनियसली विथ द कोलैप्स ऑफ़ द टीएमसी नैरेटिव। दैट इज़ व्हेन एक्चुअली आई स्टार्टेड फीलिंग कि अब टीएमसी इज़ ऑन अ शेकी ग्राउंड। क्योंकि क्या हुआ जो आईपैक के एक डायरेक्टर को अरेस्ट किया प्रतीक जैन के घर पे भी शायद उनकी वाइफ को भी पूछताछ के लिए बुलाया। सडनली सोशल मीडिया पे आईपैक लगा जैसे कोलैप्स कर गया। हम दैट वी कुड फील इस तरह के भी ये रिपोर्ट्स आई कि वो आईपैक ने काम करना बंद कर दिया। ऑलदो टीएमसी डिनाइड लेकिन यह तो था कि ऑफिस में लोग नहीं जा रहे हैं और इस तरह तो सोशल मीडिया पे मिड अप्रैल ना सडनली आई स्टार्टेड फीलिंग कि टीएमसी इज़ वेरी वीक नाउ ऑन सोशल मीडिया तो आपको लगता है कि आई पैक पे जिस तरह से रेड हुई और ईडी ने जिस तरह हेल्ड बिकॉज़ बिकॉज़ बीजेपी अपनी नैरेटिव तो बना रही है। मैं एक बिकॉज़ आई आई फॉलो पॉलिटिक्स रेगुलरली इलेक्शन के न्यूज़ देख रहा हूं। मैं कोई भी वेबसाइट न्यूज़ का ओपन कर रहा हूं। तो ऑलमोस्ट जितने भी ऐड के स्पेसेस होते हैं एक वेबसाइट पे ऑलमोस्ट सब पे बीजेपी का ऐड है। लेकिन या सोशल मीडिया पे है वो न्यूज़पेपर में बीजेपी सो दे वर एवरीवेयर बट आईपैक सडनली कोलैप्स और ऑफ कोर्स उसके में बीजेपी के रिसोर्सेज से तो टीएमसी को हम कंपेयर नहीं कर सकते। वो भी एक रीज़न है। बट ये था कि मुझे लग ये मतलब आईपैक का पे जो अटैक होना और आई उस मतलब अटैक इन द सेंस कि दे द वे दे वर टारगेटेड। अह बट उसके वजह से सोशल मीडिया इनकम वीक। इसमें एक वजह और है कि खासकर पिछले इलेक्शन के बाद क्या हुआ था? इस पे नीलांजन सरकार ने एक आर्टिकल भी लिखा है हिंदुस्तान टाइम्स में बेस्ड ऑन हिज फील्ड वर्क के पिछले पांच सात सालों में टीएमसी वाज़ ओवर रिलायंट। तो ये बेसिकली अभिषेक बनर्जी का की जो स्ट्रेटजी थी कि जो पिछले इलेक्शन के वक्त से ही जब से आईपैक ने उनके लिए काम करना शुरू किया तो खासकर इलेक्शन के बाद से इलेक्शन के टाइम से मतलब मेरा मतलब 2021 वाले इलेक्शन के वक्त से ही आईपैक बिकम लाइक अ पार्टी एक्सटेंशन और आईपैक ही चीजें डिसाइड कर रहा था। इनफैक्ट मुझे कुछ लोगों ने इस तरह से भी ग्राउंड पे बोला कि 510 सीट तो टीएमसी इसलिए हार गई कि इन्होंने ग्राउंड का जो कैंडिडेट था उसे टिकट ना देके किसी और को टिकट दिया। लेकिन इसका एक एक ये भी कहा जा रहा था कि 77 आई थिंक 73 और 77 जो सिंग एमएलए थे उनका टिकट काट दिया गया। और यह कहा गया कि आई डोंट नो कितना सच है और कितना नहीं। बट मैंने बहुत जगहों पर जो एनालिस्ट है उनको कहते हुए सुना कि अमित शाह ने उन सब से इंडिविजुअली जो है वो मीटिंग की जो हार गए जिनको नहीं मिला जिनको नहीं मिला और क्योंकि जाहिर सी बात है उनको गुस्सा होगा कि उनको टिकट नहीं दिया गया उनका अपना एक वोट बैंक भी है उनका एक बेस भी है और इससे भी बड़े पैमाने पर टीएमसी को नुकसान हुआ है। सी बीजेपी माइक्रो मैनेज इलेक्शन में तो तो दे आर चैंपियंस ऑफ़ माइक्रो मैनेज इलेक्शन। उनके पास रिसोर्स भी है बट दे आर आल्सो लाइक इलेक्शन मशीन। वो 24 घंटे 24/7 इलेक्शन जब अमित शाह होम मिनिस्टर तीन हफ्ते से ज्यादा दिल्ली कोलकाता में थे तो वो तो वहां होटल में आराम करने के लिए नहीं थे। वो ऑब्वियसली माइक्रो मैनेज इलेक्शन कर रहे थे। हर लेवल पे कर रहे थे। तो माइक्रो मैनेज इलेक्शन का मतलब यही है कि कौन कैंडिडेट जो अगर मतलब द वे यहां पे एसआईआर का रोल भी इंपॉर्टेंट हो जाता है कि यू नो कि आपको एक जस्ट हाइपोथेटिकल एक नंबर लेके बोल रहा हूं कि 1 लाख में यू नो कि आपको 400 सीट आपको वोट्स आएंगे या 35000 आएंगे एंड यू नो कि उसको 45000 आ सकता है। सो नाउ वो 45000 में को मेरा मुझे मालूम है कि ये 400 से 42 जा सकता हूं मैं। मैं 45 नहीं जा सकता। तो द ओनली वे इज के 45 को कम करके तुम 35 पे ला दो ताकि आपसे कम हो जाए। उसके लिए आप क्या तो एसआईआर में कई हजार वोट डिलीट हुए ऑलमोस्ट हर ये खासकर मुस्लिम डोमिनेटेड कई 176 पे आई थिंक 176 सीटों पर 3000 3000 से ज्यादा ही तो एक तो यहां वोट कम हो रहा है। दूसरा जैसे आपने ये बताया कि इस तरह से वो जब माइक्रो मैनेज इलेक्शन कर रहे हैं कहीं पे जैसा आपने बताया जो कैंडिडेट को टिकट नहीं मिला वो हो सकते हैं। कहीं पे अह दूसरे पार्टी के जो कैंडिडेट जो उनको लगता है कि 5 10,000 वोट काट सकता है या 4000 वोट भी काट सकता है डिपेंडिंग। तो चाहे वो एमआईएम का कैंडिडेट हो, चाहे वो हुमायूं कबीर हो, चाहे आईएसएफ के आईएसएफ जीता एक जगह ही है। लेकिन उनको ये मलदा मुर्शिदाबाद में आईएसएफ इसने इस बार बहुत अग्रेसिवली कैंपेन की है फर्स्ट फज़ में। और क्योंकि सेकंड फज़ में भांगड़ में इलेक्शन था तो फर्स्ट फज़ में नौशाद सिद्दीकी ज्यादा नॉर्थ मालदा मुर्शिदाबाद उत्तर दिनाज़पुर उसी एरिया में ज्यादा रह रहे थे। एमआईएम ने कुछ जगह वोट काटे कुछ जगह आईएसएफ की पार्टी को आईएसएफ को कुछ वोट मिले या और भी इस तरह के कैंडिडेट तो ऐसी कई सारी सीट आप देखेंगे जहां पे नाम मैं नाम सडनली भूल रहा हूं असेंबली का लेकिन जाकिर हुसैन वहां से थ्री टाइम एमएलए टीएमसी के उन्होंने अपने एरिया में मेडिकल कॉलेज शुरू किया है और अभी इस तरह से फिलोथ्रोपिक चीजों में है तो पॉपुलर कैंडिडेट थे वो लेकिन उन वो हार गए इस बार और जो सेकंड कैंडिडेट है कांग्रेस का उसे करीब 35 36 हजार के आसपास वोट आई है और वो हारे कुछ 15 17 हजार वोटों से तो इस तरह से अगर आप एक-एक सीट देखेंगे तो ऐसा बहुत सारी सीट होगी कि जहां पे हार गए मैं तो मैं ये नहीं कह रहा हूं कि जो माइक्रो मैनेज जब हम इलेक्शन कहते हैं कि इलेक्शन को वो माइक्रो मैनेज करते ये उसमें कई सारी चीजें हैं। तो यह एक है वह जैसे उन्होंने से कोलकाता में इस तरह की रिपोर्ट आई कि जैसे जो अपार्टमेंट बड़े-बड़े हाई अह जो बड़े-बड़े इंक्लेव्स में रहते हैं और इस तरह के अपार्टमेंट्स में रहते हैं वो बहुत एग्रेसिवली वोट उतना करने नहीं जाते। तो इस बार खासकर कई सारे ऐसी जगह जहां पे ऐसे अपार्टमेंट जहां 300 से ज्यादा वोटर्स अगर है 300 तो वहां पे पोलिंग बूथ बना दी गई थी या लोग अपने जो इनके पन्ना प्रभारी जो बीजेपी का फेमस है कि पन्ना प्रभारी होते हैं उनके तो उनके पन्ना प्रभारी अग्रेसिवली जाके इन हाई राइज बिल्डिंग्स में भी कैंपेनिंग की इनफैक्ट लोगों को बाकायदा तौर पर ट्रेन में टिकट्स देकर पूरी पूरी ट्रेन बुक कर उनको भेजा गया है। फ्लाइट के टिकट्स भी दिए गए हैं। और एक तरह से मेट्रोपॉलिटन सिटीज जो है वहां पर क्राइसिस हो गया था लेबर का मेज का इन सब का क्योंकि उस तरह से वो गई है तो मुझे पता है कि किस तरह से क्या हुआ लेकिन एक सवाल यहां पर इंपॉर्टेंट ये है रियास साहब जब हम बात ये कर रहे होते हैं कि जो बीजेपी ने जो प्रॉमिससेस किए 12 साल से ऑलमोस्ट टीएमसी जो है वो सेंटर में है उसने 2 करोड़ नौकरियों की बात की थी ऑफ कोर्स नहीं दी किसानों की आय दुगनी की बात की थी ऑफ कोर्स नहीं दी 15 लाख तो चलिए जुमला था उसको आप छोड़ दीजिए। इसी तरह के उनके लगातार प्रॉमिससेस हैं जो स्टेट्स में वो करते रहे हैं और जो सेंटर में उन्होंने किए। अब फिर से उन्होंने यहां पर एक करोड़ नौकरियों की उन्होंने बात की है। यूसीसी की बात कर रहे हैं। लव जिहाद की बात कर रहे हैं और इसी तरह के तमाम उनके प्रॉमिससेस हैं। किसानों को लेकर भी किए हैं। बंगाल को तो एक इंटेलेक्चुअली साउंड स्टेट कहा जाता है और यह कहा जाता है कि भ उसे यूपी और बिहार समझने की गलती ना करें। बार-बार जो विश्लेषक हैं वो यही यही कहते हुए नजर आए कि भ आप वो बिहार उसको या फिर यूपी समझने की भूल ना करें। दे आर इंटेलेक्चुअली वेरी साउंड। दे नो कि उनको क्या चाहिए क्या नहीं चाहिए? तो क्या उन लोगों को यह नहीं दिख रहा था कि सेंटर में जो गवर्नमेंट है उसने 12 [नाक से की जाने वाली आवाज़] साल से क्या किया है? कहां है हमारी इकॉनमी? कहां है हमारी जीडीपी ग्रोथ? क्या उन्होंने किसानों के साथ किया है? क्या उन्होंने वुमेन के साथ किया है? कि जो बंगाल के लोग उस पर यकीन कर गए या फिर आपको लगता है यह सिर्फ एक दिखावा है। ये एक दिखावे की एक तस्वीर है। जो असल मसला है वो है जय श्री राम का। वो असल मसला है वो है हिंदुत्व का। देखिए ये जो मैं बार-बार 2014 से जो कंपेयर कर रहा हूं ये इसी वजह से कर रहा हूं कि इसमें दो चीज़ है। जो आपने बताया बंगाल के लिए गोखले ने कहा था और बंगाली बहुत प्राउडली कहते हैं कि व्हाट बंगाल थिंग्स टुडे रेस्ट ऑफ इंडिया डज़ टुमारो। तो यह अभी रिवर्स हो गया। जैसे आपने कहा कि जो 12 साल पहले यूपी बिहार ने किया था वो वो या पूरी नॉर्थ इंडिया ने किया था। 12 साल पहले या बिहार तो और पहले से तो वो वो अब बंगाली कर रहे हैं। ये हुआ है। अब इसमें जो कैंपेन को अगर आप देखेंगे तो जो मुझे लगता उन्होंने कोई चीफ मिनिस्टर कैंडिडेट बाय द वे अनाउंस नहीं किया। तो एक तो है कि हम जितना भी क्रिटिसाइज कर ले बट एक सर्टेन सेक्टर में हमें पता है कि मोदी इज लार्जर देन लाइफ उनके लिए उनका हीरो 294 पर खैर वो एक अलग कैंपेन स्टाइल है वो ममता बनर्जी भी कहती हैं इस बार नहीं पिछले बार भी बोला था उन्होंने और वो ममता बनर्जी भी कहती हैं तो लेकिन वो मोदी की एक लार्जर देन लाइफ एक वो एक वो हीरो हैं एक सर्टेन सेक्टर के लिए ये तो फैक्ट है ये तो हम जान लेकिन जो मेन मुद्दा है कि जैसे मैंने कहा 2014 में अच्छे दिन आएंगे का जो वादा था वो एक एक बोले तो मुखौटा जैसा था और उसमें आपने जैसे कहा कि लार्जर उनके बहुत सारे इश्यूज हिंदुत्व है या और भी उनके जो एजेंडा है वो सारी चीजें थी और व्हिच वाज़ प्लेइंग सेम थिंग अगर आप ग्राउंड पे अगर आपने आपको भी यह फील हुआ होगा या वही चीज इस बार यहां भी है कि ये एक मुद्दा है बट उन्होंने कैंपेन में खासकर अर्बन कोलकाता की बात करें तो जो अर्बन जो पपुलेशन है वहां पे जैसे जैसे आप देखिए रास बिहारी से जो कैंडिडेट थे वो स्वपन दास गुप्ता थे। स्वपन दास गुप्ता आइडियोलॉजिकली राइट है। ये सबको मालूम है। बट उन्होंने लेफ्ट में कभी शुरुआत की थी और अब राइट है। लेकिन वो एक ही कम्स फ्रॉम सर्टेन क्लास एंड सर्टेन सोफिस्टिकेशन वो जाने जाते हैं। एंड वो उनके इस तरह के वीडियो आए कि वो कैंपेन के दौरान लेफ्ट का जो कैंडिडेट है उनके एरिया से टीएमसी का कैंडिडेट है। सब साथ में चाय भी पी रहे हैं, मिल भी रहे हैं। तो, तो वह जो जो कैंपेन था वहां पे अह हिंदुत्व और स्पेशली यूपी बिहार ब्रांड ऑफ़ हिंदुत्व उतने आपको याद होगा कि कई सारे उनके कैंडिडेट मछली लेके घूमते हुए दिखते थे। तो वो यूपी बिहार या हेमंत विश्व शर्मा ने कई बार बोला कि 10 साल से भी वहां आसाम में सरकार है तो क्या वहां के लोग मछली नहीं खाते? और आपने देखा कि फिर सारे के सारे बीजेपी के जो अनुराग ठाकुर से लेकर सब खाते हुए बाकी सिर्फ लेके जा रहे थे। मंगलवार को बाकायदा तौर पर उन्होंने मछली खाई तिलक लगाकर यह बताने के लिए जी तो यह तो एक चीज़ है लेकिन जो मेरा मैं जो कहना चाह रहा था कि खासकर जो अर्बन जो खासकर कोलकाता की बात करें अगर तो कोलकाता में उनका फोकस बीजेपी के जीतने पे कम था कैंपेन में लोगों को कन्विंस करने में वो ममता बनर्जी या टीएमसी की सरकार कितनी बुरी है इस पे ज्यादा फोकस था करप्शन एंटी इनकंबेंसी स्टैग्नेशंस रोड नहीं बन रहे हैं। मैंने इस तरह के देखे उस लोगों को सोशल मीडिया पे जो बीजेपी के चेयर लीडर्स हैं उनको शेयर करते हुए कि भुवनेश्वर या कटक का एयरपोर्ट उनका के रेलवे स्टेशन की फोटो वहां के या दूसरे जो भी बीजेपी रूल स्टेट है वहां के मेट्रो की फोटो वो शेयर करके और उसको कंपेयर या एक बहुत वायरल हुआ था एक फोटो केक में भी ऐसी बसेस हैं। बटक में ऑब्वियसली जैसे कुछ पुरानी बसेस भी अलग-अलग एरिया में चलती हैं। जो पुराने बसेस की कोई बहुत ही जो खस्ता हालत में फोटो एक फोटो लेकर और दिल्ली के एसी जो रेड बस रेड कलर की बस है दोनों को साथ में लगाकर कि ये मतलब क्या होगा अगर सरकार आएगी तो यहां से ये ये बस दिल्ली कोलकाता में भी चलना चलनी शुरू हो जाएगी तो उनका जो मेन फोकस था वो इस पे था कि कोलकाता [नाक से की जाने वाली आवाज़] स्टैगनेट कर दे कर कर चुका है कोलकाता में आपको सैलरी कम मिलती है गवर्नमेंट एंप्लई को बहुत मतलब सब्सटेंशियली कम मिलती है क्योंकि डीए बहुत कम होता 53% % सेंट्रल गवर्नमेंट के एंप्लई को मिलता इंक्लूडिंग बिहार झारखंड के स्टेट एंप्लई को वहां 18% था और जस्ट मार्च अप्रैल में 22% तो सब्सटेंशियली से सेंट जो स्टेट गवर्नमेंट के एंप्लई है उनकी सैलरी कम होती स्टेट गवर्नमेंट के आपको याद होगा कि एक जो टीचर्स रिक्रूटमेंट में जो करप्शन की बात तो करप्शन स्टैग्नेशन अनइंप्लॉयमेंट जो एंप्लॉयड भी है गवर्नमेंट में वहां नौकरी कम ये सारे मुद्दों पे ज्यादा या आरजी कौर को लेकर वुमेन सिक्योरिटी मैंने बस स्टैंड्स पे कई जगह बस स्टॉप्स पे होर्डिंग्स देखे कि मतलब अगर आप डाटा देखेंगे तो वुमेन सिक्योरिटी में नॉट गेट कोलकाता इज़ वेरी गुड बट रिलेटिवली अगर बाकी मेट्रोपॉलिस से अगर कंपेयर करेंगे तो कोलकाता इज़ क्वाइट सेफ। एक्चुअली बड़ा ताज्जुब यह होता है कि आरजीकर की बात हुई लेकिन उन लोगों ने या तो मतलब टीएमसी वो नैरेटिव बनाने में कामयाब नहीं रही क्योंकि जाहिर सी बात है द एंटायर मीडिया इज़ हाईजैक्ड वो चाहे लोकल मीडिया हो या या फिर हम मेन स्ट्रीम मीडिया की जो हम बात कर रहे हैं। लेकिन सवाल मेरा यह है कि ज्यादातर आप यह देखें कि जो रेपिस्ट हैं वो बीजेपी जो भी केसेस आते हैं वो जेल में हैं चाहे बाहर हैं वो बीजेपी के ही एमएलए या एमपीज हैं वो हमें अलग-अलग नाम हम यहां पर ले सकते हैं। खासतौर पे कर्नाटका की हम बात कर रहे हैं। जहां पर 300 के करीब इस तरह के केसेस निकले थे। क्या लोगों को बंगाल के लोगों को क्या फिर मतलब आई फेल टू अंडरस्टैंड जो एक नैरेटिव उनके आसपास ये बनाया जाता है जो उनके बारे में कहा जाता है दे आर वेल एजुकेटेड इतना इतना पर्सन लिटरेसी है वहां तो बहुत इंटेलेक्चुअल है बहुत पढ़ने लिखने वाले लोग हैं तो जो पूरे पूरे देश में हो रहा है जिस तरह के केसेस आ रहे हैं क्या उसके बाद भी उन्हें बीजेपी के इस नैरेटिव पर यकीन हो रहा है कि कि आरजीकर वहां हुआ और बीजेपी आके सेव करेगी वहां पर औरतों को देखिए इसको ऐसा नहीं है कि बीजेपी जीत गई तो अब बंगाली जो है वो वो वो अब ये वो अब दे आर नॉट फॉरवर्ड थिंकिंग जो इलेक्शन जो इलेक्ट्रोल पॉलिटिक्स है जो फर्स्ट पास द पोल सिस्टम है वहां पे हमें ये समझने की जरूरत है कि आरएसएस बीजेपी के ये कोर वोटर्स तो है ही एक तो वो थे वो हमेशा से थे पहले भी थे पहले कम थे धीरे-धीरे जैसे-जैसे आ रहे थे जैसे मैंने पहले ही एक बोला आपको कि एससी एसटी कम्युनिटीज में इन्होंने ऑलमोस्ट स्वीप किया है वो स्वीप करने की वजह ये सोशल मीडिया नैरेटिव से नहीं रूरल रूरल खासकर जो यह है वहां एक महीने के नैरेटिव बनाने से चीज़ नहीं बदली है। वह ओवर अ पीरियड टाइम उन्होंने काम किया। आरएसएस के को मालूम है बहुत सारी बॉडीज होती है। जो सामाजिक न्याय सामाजिक बराबरी की जो लगातार जिसकी बात राहुल गांधी करते रहे और जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागीदारी की वो बात करते रहे। तो क्या ये तमाम चीजें एससी एसटी कम्युनिटी में पहुंचाने में नाकाम रही? कांग्रेस तो इस इलेक्शन की सी बात करें तो इन सब एरिया में तो कांग्रेस कैंपेन भी नहीं कर रही थी। कांग्रेस ने कैंपेन किया है। राहुल गांधी की तीन-चार रैली हुई है और इमरान प्रतापगरी और कुछ लीडर्स जो गए थे सेंट्रल मा मेरे [गला साफ़ करने की आवाज़] सेंट्रल लीडर्स की जो बात करें वह मेनली मालदा मुर्शिदाबाद रीजन में उत्तर दिनाजपुर रीजन में उनका फोकस था और कोलकाता में राहुल गांधी की एक मटिया बुरुज में एक या दो रैली हुई है उनकी एक मटिया ब्रुज में और एक शायद सेंट्रलक में तो वो ये वाले एरिया में इस बार तो फोकस भी नहीं कर रहे उनका फोकस था तो मेनली मुस्लिम डोमिनेटेड एरियाज में कांग्रेस का सीपीएम का भी आप देखेंगे उनके बहुत सारे यंग यूथ स्टार कैंडिडेट थे इस बार इलेक्शन में लेकिन उनका भी कहीं ना कहीं फोकस उनका एक एमएलए जो जीता वो फिर मुर्शिदाबाद में ही जीता। तो जो मैं पहले जो बात कह रहा था कि बीजेपी का एक सर्टेन वोट्स तो था ही और अभी भी 40% तो कांग्रेस तो सिर्फ टीएमसी को वोट है। उसके अलावा बाकी सबका वोट जोड़ेंगे। तो आप देखेंगे कि परसेंटेज वाइज अगर हम बोले तो मेजॉरिटी ऑफ़ द वोटर्स आर दोज़ हु हैव हु आर रिजेक्टिंग बीजेपीस आईडियोलॉजी। तो यह नहीं कह रहा मैं कि क्योंकि बीजेपी जीत गई है तो अब बंगाली लोग जो है वो अब लिबरल नहीं है और फॉरवर्ड थिंकिंग नहीं है। यह भी हमें ध्यान में रखने की जरूरत है। लेकिन ये वोट जो है वो 8 10% का उन्हें स्विच चाहिए था। 10 8 10% शिफ्ट करने के लिए क्या तो उन्होंने इन सब चीजों पे फोकस ही नहीं किया और एक एंटी इनकंबेंसी को इस तरीके से उन्होंने हाईलाइट किया। इस तरह से नैरेटिव बनाया कि जैसे मुझसे दो दिन पहले एक जर्नलिस्ट पूछ रहे थे कि यूपी बिहार जो बीजेपी को एक वेजिटेरियंस और उसकी पार्टी समझी जाती थी जो यूपी बिहार की पार्टी और वो कैसे बंगाली ने उनको एक्सेप्ट किया तो उसमें जो बात है कि ये 810% के वहां पे ये था कि ये टीएमसी की गवर्नमेंट इतनी ज्यादा करप्शन में इतनी ज्यादा इनके खिलाफ एंटी इनकंबेंसी है। ये इतनी करप्ट है। यहां कट मनी इतना ज्यादा हो गया है। सिक्योरिटी तो यह बनी बाकी तो 30% मैं मान के चल रहा हूं कि वह बीजेपी को उनको कुछ ना बोलते मोदी जी अगर ऐसे ही बोल दे कि वोट करो तो वो वोट करेंगे या या आरएसएस अपना जो काम करती है वो उनका उनको वोट आ जाता है जो ये शिफ्टिंग जो वोट जो फ्लोटिंग वोटर्स जिनको हम कहते हैं ये सारे नैरेटिव उनके लिए है बेसिकली उनके बनाने के लिए लेकिन जो मैं फिर से रिटेरिएट करना चाह रहा हूं कि 40 प्लस वोट तो सिर्फ टीएमसी का प्लस कांग्रेस और बाकी पार्टी मिला दे तो 12 14% वोट और है। 40 40 समथिंग ऑलमोस्ट 41 सॉरी 46% के आसपास वोट जो है बीजेपी को मिली है। तो अगर हम न्यूमेरिकली देखें तो मोर देन 50% अभी भी वो तो आप आप अगर लेकिन सेम सेम जी एक्सैक्ट्ली 204 में भी ऐसे ही हुआ था। तो यह है कि यह क्योंकि इंडिया इतनी डवर्स है कि वहां पे बहुत फॉरवर्ड लुकिंग लोग भी है बट बहुत ऐसे लोग हैं जिनको जिनके लिए प्रायोरिटीज कुछ और है। हम लेट मी जस्ट कम टू द क्वेश्चन ऑफ़ मुस्लिम्स नाउ। अ मेरा सवाल यह है कि इस बार उनके लिए ये नॉर्मल इलेक्शन नहीं था। ये असाधारण एक तरह का चुनाव था उनके लिए। इसलिए भी था कि उनकी शिनाख्त पर सवाल था। अह और उनको यह था कि ना सिर्फ उनका वोट छीना जा रहा है बल्कि उनकी नागरिकता उनके साथ चली जाएगी और एक आसाम मॉडल जो है वह वहां पर लागू कर दिया जाएगा जो सब इंस्टट्यूट के जिनसे मैंने इंटरव्यू किया उन्होंने कहा कि मेरे पास कुछ इस तरह की खबरें भी हैं कि शायद कुछ डिटेंशन सेंटर के लिए कुछ जगहें जो है वो चिन्हित भी कर दी गई हैं। उनको आइडेंटिफाई भी कर लिया गया है। तो वो वो है आपने भी देखा होगा कि किस तरह से वो रोते हुए गरीब मुसलमानों की वो तस्वीरें चाहे मुर्शिदाबाद चले जाएं आप तमाम जगहों पे चले जाएं क्योंकि उनको ये लग रहा है कि अब बस बोरिया बिस्तर हमारा पैक करा कर अब हमें भेज दिया जाएगा बांग्लादेश जैसे आसाम में जिस तरह से किया जाता है। मुसलमानों ने इस बार फिर बटकर क्यों वोट डाला? एक तो मेरा सवाल यह है और दूसरा मेरा सवाल इसी से जुड़ा यह है कि व्हाट फ्यूचर होल्ड्स फॉर देम इन बंगाल नाउ? [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए आपका जो पहला सवाल है उसका उसका जो शॉर्ट आंसर ये है कि हम अभी उसके लिए वन नीड्स टू गो एंड टॉक टू देम एंड मे बी डू सम रिसर्च इन इन इन इन अ ईयर और सो देयर विल बी सम स्टडीज प्रोबेब्ली कि पता चलेगा कि वो तब भी क्यों नहीं हुए लेकिन ये फैक्ट है के नहीं जिस तरह से टीएमसी होप कर रही थी कि एकदम से कंसोलिडेटेड वोट मिलेगा वो नहीं मिला। बट जो मैंने पहले भी बोला मैं फिर से रिटरेट करना चाह रहा हूं कि अच्छा खासा कंसोलिडेशन तब भी हुआ खासकर साउथ बंगाल में और आसपास के एरिया में के जो थोड़ा जो वोट बटा है वो स्पेशली मुर्शिदाबाद में हम और थोड़ा मालदा में कुछ सीटों पे और उत्तर दिनाजपुर में लेकिन आप देखेंगे जो करीब इस बार सबसे कम में मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन रीसेंट इयर्स में होगी 36 शायद मुस्लिम लीडरशिप होंगे और हाईएस्ट रिसेंट में 2011 में शायद 59 थे तो उस हिसाब से न्यूमेरिकली बहुत कम होंगे लेकिन सब के सब मुस्लिम लीडर्स अपोजिशन में बैठेंगे शायद अगर के टूट के कुछ उस तरफ ना अलायंस करें तो और ना तो बीजेपी को जरूरत है बीजेपी को जरूरत भी नहीं है लेकिन लेकिन जो ये है कि क्यों हुआ ये तो बोलना मुश्किल है बट एक जो स्पेकुलेशन की तरह अगर कह सकते हैं कि जो मैंने पहले बताया कि एक एंटी इनकंबेंसी मुसलमानों में बंगाली मुस्लिम में लेकिन हुमायूं और उसको खासकर हुमायूं कबीर और आईएसएफ जो इस तरह की जो पार्टी है या टू सम एक्सटेंड एमआईएम ऑल एमआईएम बहुत इफेक्टिव नहीं हुई लेकिन ये नैरेटिव की जो बात करते हैं ना ये लोगों के दिमाग में ये है कि जो आपने कहा कि ये सिक्योरिटी की बात थी बट यही सेम चीज 2021 में भी बना दी गई थी कि मुसलमान 2021 में मुस्लिम एरिया में मुर्शिदाबाद में जैसे ऐसी सीट जहां पे मुस्लिम 50% से ज्यादा है ऑलमोस्ट सारी सीट मेरे ख्याल से करीब ऐसी 32 सीट है वो 32 की 32 सीट टीएमसी जीत गई थी 2021 में इस बार जहां तक मुझे ध्यान में आ रहा है 23 सीट शायद जीती है 23 सीट तब भी जीत रही है तो ये हमें ध्यान में रखने की जरूरत है कि ऐसा नहीं है कि एकदम से फ्रैक्चर हो लेकिन आई एम नॉट सेइंग दैट दैट यू नो कि कंप्लीटली वो गया है लेकिन मैं ये कहना चाह रहा हूं कि अगर बीजेपी नहीं होती तो शायद और कम होते शायद 13 पे होते या और भी उससे भी कम हो सकते थे। तो जो वोट मिला है वो उस डर से ही मिला है। लेकिन व्हाई हुमायूं कबीर? मेरा क्वेश्चन ये है ये क्या कहीं पर भी अगर कोई भी लीडर आकर ये कहे कि हम यहां पर बाबरी मस्जिद बनाने जा रहे हैं तो क्या मुसलमानों को कहीं पर भी बाबरी मस्जिद कबूल है? और दूसरा सवाल मेरा कि जब उनका एक वीडियो सामने आ गया वायरल हो गया और यह भी पता है कि भई टीएमसी से उन्हें एक स्पेलेल ही इसीलिए किया गया। इट वाज़ ऑल प्लंड और वो पहले बीजेपी में रह चुके हैं। उनका वीडियो आ गया। 1000 करोड़ की बात हो गई। उसके बाद एमआईएम ने उनके साथ अपना रिश्ता खत्म कर दिया। उसके बाद भी वो दो सीटों से जीत जाते हैं। इसको ऐसे देखिए कि देखिए हुमायूं कबीर पहले से एमएलए वो सिटिंग एमएलए एक दो में से एक सीट पे वो एमएलए थे और जो दूसरा सीट भी है वो जस्ट पास वाले ही सीट है उनके। तो वो उस एरिया में एक वो वो पहले से वहां के एक लोकल इन्फ्लुएंशियल पॉलिटिशियन हैं। हम वो शायद इंडिपेंडेंट वो इंडिपेंडेंट जैसे ही खड़े हुए ना इस बार तो वो इंडिपेंडेंट उनका अपना एक बेस है। वो ऐसा नहीं था कि बहुत सारे टीएमसी में ऐसे लीडर हैं जो ममता दीदी के नाम पे जीतते जीत के आते हैं। बट वो उनका अपना एक बेस है। वो पहले से वहां एमएलए रह चुके हैं। और जैसा आपने बोला कि वो बीजेपी में पहले थे। हमें क्या मालूम अभी भी बीजेपी में है। वो तो रिजल्ट जब आया था तो वह तो बीजेपी को कांग्रेचुलेट कर रहे थे। तो हो सकता है कि वो ये भी एक वजह है कि वो जीते हो। इसको हम डिनाई नहीं कर सकते कि वो हो सकता है उनकी बीजेपी से कुछ अंडरस्टैंडिंग हो जो माइक्रो मैनेज की हम पहले बात कर रहे थे। हो सकता है वो है। लेकिन वोट जो लोगों ने किया देखिए ये सब जो हम जिस कांस्टीट्यूएंसी की बात कर रहे हैं ये सब बहुत ही रूरल कॉन्स्टिट्यूएंसी है। वह बाबरी मस्जिद के नाम पे उन्हें वोट मिला। ये मैं तो दिया लोगों ने। हां लोगों ने चंदा दिया लेकिन अभी जो वोट मिला वह इसलिए मिला कि वह बाबरी मस्जिद बना रहे थे। वह तो उसके पहले भी एमएलए थे। तो पहले एमएलए तो बाबरी मस्जिद की बात नहीं की थी तब भी एमएलए थे। और दूसरा इसको हम टीएमसी की जो लार्जर एंटीकेंसी है उससे भी जोड़ के देखने की जरूरत है। जो जैसा मैंने बताया कि एक बंगाली मुस्लिम्स में यह एक गुस्सा था कि कि ये सिक्योरिटी के नाम पे आप सिर्फ हमें आपने मुस्लिम अपीज़मेंट के नाम पे वोट लेते हो लेकिन बन तो जब जो जैसा आपने बताया बाबरी मस्जिद मैं उस आईडिया को सपोर्ट नहीं करता हूं। अगर मस्जिद ही बनानी थी सही में तो बना लेते। बाबरी मस्जिद नाम देने की क्या जरूरत है? लेकिन यह नरेटिव भी मैं बता दूं कि जब इसको फिराद हकीम को बजाप्ता जो एक्सपेल किया गया था पार्टी से तो वो प्रेस कॉन्फ्रेंस फिराद हकीम से कर करवाया गया था और फिराद हकीम ने और दूसरे लीडर्स ने जो है जब ये इस तरीके की बात बोली उनको एक्सपेल करते हुए तो सोशल मीडिया पे या बहुत सारे लोग खासकर गांव में जो है वो इस तरह की भी बात थी कि ये जो चार ग्रैंड टेंपल बन रहे हैं वो क्या है वो कौन सा सेकुलरिज्म है तो जैसा आप हमने पहले जो बात की ब्रीफली के टीएमसी जो है जब आप 15 साल पावर में रहते हो तो आप बहुत लोगों को नाराज करते हो या 10 साल या जो भी एंटीगमेंसी तो वहां बंगाल का तो एक नेचर रहा है बंगाल में आप यह देखें कि कितने साल तक लगभग तीन दशक से ज्यादा 34 इयर्स लेफ्ट थी तो वहां पर ऐसा नहीं है कि हर पांच साल बाद में सर देखिए लोग जो है पास्ट को देख के फ्यूचर स्पेकुलेट करते हैं लेकिन 34 साल सीपीएम थी तो इसलिए 34 साल टीएमसी रहेगी ऐसी तो कोई थ्योरी नहीं है ना लेकिन लेकिन जैसे अगर तमिलनाडु या दूसरे अगर हम राज्यों से कंपेयर करते हैं तो वहां हर 5 साल में एक एक वहां की एक टेंडेंसी है लेकिन बंगाल की ऐसी टेंडेंसी वजह यह है कि जैसे बंगाल में जो पहले बात इस तरह की बहुत सारे एकेडमिक चीजें हैं कि बंगाल में पॉलिटिकल सोसाइटी कहते हैं कि वहां पॉलिटिकल सोसाइटी बहुत इंपॉर्टेंट है। वहां गांव लेवल पे पार्टी की यूनिट होती है। शादी में भी पार्टी लेवल पे वो ये होती है कि तो इस तरीके की चीज़ है। प्लस एक लेकिन बंगाल में एक और चीज है कि जहां विनर टेक्स इट ऑल वाली चीज होती है। जब वो विनर होते हैं तो वो फिर मतलब कोई भी पार्टी एक बार सत्ता से बाहर चली जाए तो वो जल्दी वापस भी नहीं आ पाती। ये भी हमें ध्यान रखने की जरूरत है। पार्टी कोलैप्स कर जाती है वहां क्योंकि और एंड स्पेशली अगर हम बीजेपी के पर्सपेक्टिव में बात करें तो बीजेपी जहां एक बार सत्ता में आ जाती है खासतौर पे अभी वाली बीजेपी तो फिर उसको वो जल्दी हटती नहीं है। और बंगाल में एनीवे जो आते हैं वो 10 साल 15 साल तो ये थी उसके पहले वाले 34 साल थे। लेकिन देखिए एक चीज है कि लेफ्ट जो 34 साल थे पावर में उसकी एक वजह थी कि लेफ्ट एक आईडियोलॉजिकली बहुत स्ट्रांग पार्टी थी। टीएमसी में अभी दो दिन भी नहीं हुए तीन दिन हुए रिजल्ट को मैं कल रात में ही एक्चुअली दो दिन के बाद ही देख रहा था कि टीएमसी के कई सारे जो एक रिजू दत्ता उनके स्पोक्सपर्सन है वो ऑलरेडी वीडियो बनाने लगे हैं। ठीक है ना? माफ़ी मांग रहे हैं। दूसरी तरफ एक वो जो क्रिकेटर भी थे मनोज तिवारी वो उनको वो शायद दो बार एमएलए रह चुके हैं। मिनिस्टर थे वो वीडियो बना रहे हैं और भी वो पहले राज्यसभा एमपी थे। खैर वो बहुत दिन से ऑलरेडी क्रिटिसाइज कर रहे थे। जवाहर सरकार से लेके बाकी कई लोग जो है ऑलरेडी क्रिटिसाइज करते हैं। एंड आई वोंट बी सरप्राइज्ड। इस तरह के सोशल मीडिया पे मैं तो अभी दिल्ली में हूं लेकिन सोशल मीडिया पे मैंने फोटो देखा कि ऑटो यूनियन और इस तरह के लोग जो है ऑलरेडी उन्होंने टीएमसी का झंडा हटा के लेकिन अगर आप पिछली बार भी देखें जब 77 सीटें आई थी भारतीय जनता पार्टी को तो उसके बाद भी हमने देखा था एक भगदड़ सी मच गई थी टीएमसी में जाने की क्योंकि एक एक वहां का भी एक एक तरह का एक नेचर है कि वो पावर में रहना चाहते हैं वहां ये वहां की बात नहीं ये हर जगह ही जो है लेकिन बंगाल में ज्यादा देखने के लिए मिलती नहीं वो ये होता है कि कुछ लोग हर जगह ही इस तरह की चीजें देखने को मिलेगी एक्चुअली के जो कुछ लोग हैं वो ये लेफ्ट के साथ भी टुवर्ड्स द एंड हुआ लक्ष्मण सेठ और उनके जैसे कई सारे लीडर थे मतलब दे वर नॉट आईडियोलॉजिकली कम्युनिस्ट सो टू से और लेकिन वो पावर ये आप जैसेक में भी जो एलट जो है जो इंटेलेक्चुअल्स हैं या इस तरह के जो टीचर्स एसोसिएशन प्रोफेसर्स एसोसिएशन या इस तरह के जो या जर्नलिस्ट जो है कई सारे वो आप उनकी ट्वीट देखें उनके सोशल मीडिया पोस्ट देखें या उनकी पोस्टरिंग देखें ऑलरेडी अब थोड़ी-थोड़ी शिफ्ट होने लगी है क्योंकि प्रिविलेज लोग जो होते हैं ना अपनी प्रिविलेजेस को हमेशा सेफ गार्ड करते हैं। मैं तो खुद कहूंगी कि मैं जिन जर्नलिस्ट का इंटरव्यू पहले कर रही थी इलेक्शन से और जो उनकी बॉडी लैंग्वेज थी और जितना हार्श वो बीजेपी और सबके लिए बोल रहे थे और जब मैंने वो सडनली दे हैव चेंज्ड सडनली वो टीएमसी के बारे में वो तमाम तरह की बातें वो कह रहे हैं कि उनकी क्या खामियां थी क्या खराबियां थी लेकिन मैं अब आइडियोलॉजी पर आना चाहती हूं कि जब आप ये कहते हैं कि लेफ्ट की एक स्ट्रांग आईडियोलॉजी थी एंड दे रिमेन रिमेन देयर फॉर 34 इयर्स लेकिन वही वही तमाम लोग जो है बीजेपी में उस शिफ्ट हुए 2021 के इलेक्शन के कॉन्टेक्स्ट में 16 से 21 के बीच में इस पे बहुत बातें हुई है ऑलरेडी उसकी वजह जो है वो उसमें कई सारे हैं जो जैसा मैंने बताया कि जो गांव लेवल पे बहुत सारे लोग पार्टी करते थे पार्टी वर्कर्स थे वो इसलिए पार्टी में नहीं थे कि जैसे वो बहुत कम्युनिस्ट आईडियोलॉजी के मानने वाले हर कोई कुछ थे टीचर या बहुत सारे ऐसे लोग एजुकेटेड थे जो पार्टी की आईडियोलॉजी में मानते थे बट बहुत सारे अपने प्रिविलेजेस के लिए थे वो गांव के लेवल पे या जो भी हो वो पावर में रहने के लिए आप उस पार्टी में जो रूलिंग पार्टी है उसके साथ थे आप तो जब सत्ता से गए बंगाल में एक चीज़ है कि इलेक्शन बंगाल बहुत वायलेंट पॉलिटिकल स्पेशली पोस्ट पोल तो इस तरह के सोशल मीडिया पे आपने कई सारे विजुअल्स देखे होंगे कि कांग्रेस की ये ऑफिस 10 साल से बंद थी वो उसको कांग्रेस वाले जाके खोल रहे हैं। मैंने एक फोटो एक आज ही देख देखा एक वीडियो कि कांग्रेस का झंडा लेके कांग्रेस के वर्कर जो है हावरा में कहीं पे मिठाई बांट रहे हैं लोगों को। ठीक है? ठीक है या सीपीएम का कोई ऑफिस कई सालों से बंद था वो तो 2011 में जब टीएमसी पावर में आई टीएमसी पावर में आने के लिए उनका एक स्ट्रगल एक बहुत उनका बहुत ही मतलब स्ट्रगल बहुत डिफिकल्ट एक वो था ममता बनर्जी का पावर में आने का उनके ऊपर अटैक हुए हैं कई बार उनके वर्कर्स पे हुए उनके कई सारे वो पहले कांग्रेस में के वर्कर्स और बाद में टीएमसी को खासकर तो बंगाल में ये सी पहले सीपीएम वर्सेस कांग्रेस फिर सीपीएम वर्सेस कांग्रेस एंड सीपीएम वर्सेस टीएमसी कई सालों तक चला और उसमें सीपीएम की पूरी हरमदा थी जो मतलब लोगों को इस तरह से फूड सोल्जर्स बना रखे थे जो तो ये मारपीट और मर्डर्स इसकी लिस्ट लंबी है। उसमें एक बात खासकर नो्स पे हूं तो मैं एक बात और ऐड कर दूं कि चाहे कांग्रेस की तरफ से मरने वाले हो टीएमसी की तरफ से मरने वाले हो चाहे बीजेपी बीजेपी की तरफ से तो कम बट स्पेशली टीएमसी कांग्रेस और सीपीएम की मैं बात करूं तो उसमें पुरानी लिस्ट में देखेंगे तो अच्छे खासे वास्ट मेजॉरिटी ऑफ़ देम आर मुस्लिम्स। वो मरा कांग्रेस से हो या नॉट टू से कि ऑल ऑफ़ देम बट मेनी ऑफ़ देम। वो टीएमसी का वर्कर भी मुस्लिम ही था और सीपीएम का वर्कर भी मुस्लिम था। दोनों आपस में गांव में लड़ रहे। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] वहां पे जो जब टीएमसी पावर में आई तो बहुत सारे उन उन बहुत सारे अटैक हुए। मतलब कुछ फिगर्स हैं 30 या ऐसे लोगों के इमीडिएटली मरने की फिगर थी। बट अगले कई सालों तक ये चलता रहा स्ट्रगल। उनके ऑफिसिसेस मतलब बंद कर दिए। जो लोकल ऑफिस पार्टी का होता है वो बंद कर दिया। उन पे बहुत ज्यादा अटैक शुरू हुआ। एंड सीपीएम वाज़ बिकॉज़ बंगाल में विनर्स टेक्स इट टॉल है। पंचायत से लेके सब जगह टीएमसी हावी हो गई हर यूनियन में हर जगह। तो क्या था? सीपीएम वाज़ नॉट इन पोजीशन टू सपोर्ट देम। लाइक सेंट पार्टी स्टेट लीडरशिप जो थी वो कुछ ज्यादा कर नहीं सकती थी। वो फाइट करने में उनके लिए मुश्किल हो रहा था। तो बेसिकली जो था कि 2011 के बाद से जो शुरू हुआ और 16 आते-आते जो है वो एक टीएमसी एक हैज़िमेनिक पार्टी वहां की एक मेन पार्टी बन गई। जैसे सेंट्रल अभी हम देख रहे हैं बीजेपी है वैसे बन गई थी। तो एक बड़ा वैक्यूम बना कांग्रेस भी ऑलमोस्ट खत्म। आप यह देखिए कि कांग्रेस का बाय इलेक्शन में बरन विश्वास एक एमएलए बना था कुछ साल पहले उसको कुछ ही दिन में वो उसको वो पार्टी ज्वाइन कर लेता। वो आ जाता टीएमसी में। या पिछले बार जो 204 लोकसभा में अभिषेक बनर्जी के अगेंस्ट जो प्रतिकुलर रहमान सीपीएम से इलेक्शन लड़ा था वो जस्ट इलेक्शन के पहले वो सीपी टीएमसी में ज्वाइन कर लिया उसने। तो सी टीएमसी ऐसी पार्टी है कि वो सबको कोऑप्ट कर लेती थी अपने जैसे भी हो बाय फोर्स या बायको जैसे भी तो वो क्या हुआ जो वैक्यूम था उस वैक्यूम को बीजेपी ने फिल किया और वो फिल करने का ये था कि जैसे बाय चांस बीजेपी के किसी वर्कर पे अटैक हुआ या अगर डेथ हो गई तो सेंट्रल लीडरशिप सीधे ट्वीट करती थी और कई बार वो सेंटर से जब एक बार वह पावर में क्योंकि थे यहां से तो यहां से कोई सेंट्रल लीडर हम कोई सीनियर मिनिस्टर जो है वह चला जाता था या कोई सीनियर या अमित मालवीय अमित मालवीय ट्वीट कर देते थे। ठीक है? तो या और भी इस तरह तो इससे क्या हुआ जो लोकल वर्कर्स थे उनको लगा कि हमारे लिए ये Zee न्यूज़ में खबर या इस तरह के चैनल में खबर बनने लगती है। देयर टू समबडी इज़ देयर टू फाइट। तो दिस लेड टू वाइड स्प्रेड स्विच। तो जो जो सीपीएम ये जो हम जंगल महल की बात कर रहे हैं जो एकदम पुरुलिया, बांकुरा ये सारे सीट जो पूरी इस बार 100% ah बीजेपी को आई है। यही सब स्ट्रांग होल्ड था कभी सीपीएम का। मेरा सवाल यह है कि कुछ लोगों का ये कहना है कि ऑफ कोर्स हमें यह पता है कि इट्स एन आइडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर। आप इस तरफ हैं या इस तरफ हैं। अगर आप कोई बीच की लाइन लेते हैं। अब उसकी कोई जगह गुंजाइश बची नहीं है। बीजेपी ऑफ कोर्स हार्ड हिंदुत्व है। अगर आप सॉफ्ट हिंदुत्व जब जबजब करेंगे जब जब कांग्रेस ने भी कोशिश की है उससे कोई कामयाबी हासिल नहीं हुई है। और टीएमसी का भी अब हम हश्र देख रहे हैं। टीएमसी ऑफ कोर्स कांग्रेस से निकली हुई पार्टी है और कांग्रेस से निकली हुई जो पार्टियां हैं उनकी अपनी कोई आईडियोलॉजी नहीं है। और टीएमसी भी अपनी कोई एक तरह से कोई आईडियोलॉजी इस्टैब्लिश कर पाई हो वो भी नहीं है। जैसे हम केजरीवाल का एग्जांपल ले लें। केजरीवाल ने भी कभी नहीं कहा कि मेरी ये आईडियोलॉजी है। बल्कि उन्होंने पंजाब में तो गांधी की तस्वीर तक हटा दी थी। और फिर उसके बाद शायद अब उनको फिर से गांधी जी की याद आ रही है। और हमने देखा कि उनका क्या हाश्रू हो रहा है दिल्ली में और पंजाब में भी लग रहा है कि ऑलमोस्ट उनके हाथ से चला गया है या चला जाएगा। इस तरह की पूरी सिचुएशन वहां बनती हुई नजर आ रही है। क्या आपको लग रहा है कि अब इस तरह से एक पूरी सियासत इस तरफ आ गई है। चाहे वो सेंटर में हम बात करें या स्टेट में हम बात करें कि आपको एक स्ट्रांग आइडियोलॉजिकल स्टैंड लेना ही होगा। तभी आप सर्वाइव कर सकते हैं। आप यह कहें कि देखिए हम वेलफेयर स्कीम्स लाते हैं। आपको 5000 देंगे। इसके 10,000 ये देंगे। 2000 इस तरह से देंगे। आप ये ये करते रहें। इससे बेहतर केजरीवाल से बेहतर तो ये किसी ने नहीं किया होगा। देखिए ये आप पार्टी लेवल पे जो बात करेंगे शायद हां बीजेपी को चैलेंज करने के लिए ऐसे कुछ करने की जरूरत है। बट प्रॉब्लम ये है कि अभी जो इंडिया है अभी के इंडिया में इस तरह की आइडियोलॉजी तो राहुल गांधी करने की कोशिश कर रहे हैं। बट उनको कितना सक्सेस मिला ये भी तो आपको मालूम है। लेकिन लेकिन आप 24 में देखें जो उन्होंने मोहब्बत की दुकान की जो उन्होंने बात की। आई एम आई एम नॉट सेइंग आई नॉट अ स्पोक्सपर्सन ऑफ़ कांग्रेस। बट यू नो आई एम जस्ट गिविंग एज अ जर्नलिस्ट जस्ट गिविंग सम फेयर पॉइंट्स एंड वी शुड कि जो उन्होंने यात्रा निकाली और जो उन्होंने एक आइडियोलॉजिकल स्टैंड लिया जो कि पहले कभी कांग्रेस ने नहीं लिया। सामाजिक न्याय सामाजिक बराबरी की बात उन्होंने की। तमाम तरह के इस तरह के वो फंक्शनंस में इवेंट्स में वो उसका फायदा तो कांग्रेस को मिला 2024 में। वरना तो 400 पार की बात हो रही थी। और एक दलितों में एक ये हुआ कि वो आएंगे तो संविधान बदल देंगे। हां 24 में देखिए 24 के इलेक्शन पे राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इलेक्शन रीगिंग और इसकी भी बात करी है बट 24 वाज़ हां उसमें उसका उनको मिला लेकिन जो है कि वो जो थ्रेशहोल्ड है वो थ्रेशहोल्ड तो एंड ऑफ़ द डे क्रॉस नहीं कर पाए। दूसरी बात है कि उसमें अगर वो ब्लेम करना चाहते राहुल गांधी या जो भी पार्टी या अभी ममता बनर्जी कर रही हैं कि ईवीएम या एसआईआर या या इलेक्शन भी नहीं किया। नहीं मैं नहीं कह मैं डिनाई नहीं कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं अपोजिशन पार्टी प्रेस कॉन्फ्रेंस करती है उसके बाद वो अपने घर जाकर ममता बनर्जी इस प्रोबब्ली वन लीडर जो घर जाकर नहीं बैठेंगी वो शायद रोड पे आएंगी और ये करेंगी लेकिन मेरा ये कहना है कि उसके लिए एक पॉलिटिकल मूवमेंट जो मैं पहले करप्शन की बात कर रहा था ये कर रहा था कि इट इज आल्सो अपोजिशंस फेलियर एक तो है कि जो आपने कहा कि लार्जर अभी सोशल जस्टिस या इस तरह की एक आईडियोलॉजी बनाने की जरूरत है अगर बीजेपी को चैलेंज करना है तो बट अभी जो जो बीजेपी है और अभी की जो सोसाइटी है जो जिस तरह से उनको सपोर्ट है जैसा आपने पहले बताया कि 12 साल में अच्छे दिन तो नहीं आए हैं। गैस का दाम थ्री टाइम्स ऑलमोस्ट ऑलमोस्ट मोर दैन डबल है। थ्री टाइम्स नहीं बट मोर दैन डबल एलपीजी जो डोमेस्टिक एलपीजी सिलडर्स हैं उसके दाम हो गए या बाकी सारी चीजों। लेकिन वैसा गुस्सा या वैसा प्रोटेस्ट अपोज़िशन क्यों जिस तरह से स्मृति ईरानी रोज सिलेंडर लेके बैठती थी वैसे क्यों नहीं प्रियंका गांधी या दूसरे लीडर्स बैठते हैं तो ये भी एक बात है कि नैरेटिव मतलब प्रेस कॉन्फ्रेंस करना या इस तरह की चीजें अच्छी बात है लेकिन उसके अलावा वो कैंपेन एक सस्टेन जैसे आपने राहुल गांधी के जो उन्होंने यात्रा की थी उसकी बात की लेकिन फिर उसके बाद बिहार में भी आप देखिए वोट चोरी की यात्रा की उसमें उन्हें बड़ा एक हम कहें कि एक जनसम समर्थन उनको मिला लेकिन अगर हम जमीन पे देखें तो फायदा नहीं हुआ क्योंकि फिर उसके उसके वहां पर एसआईआर हुआ तो लेकिन बात है कि एसआईआर हुआ जिस तरह से ममता बनर्जी लड़ी उस तरह से तेजस्वी या या आरजेडी लड़ता नहीं दिखा या मान लीजिए कि अगर एसआईआर में उसमें यह हुआ इलेक्शन सरकार बनने के बाद क्या आरजेडी क्या कर रही है या कांग्रेस क्या कर रहा है तो बीजेपी की एक जगह कैंपेन खत्म होती है वो दूसरी जगह की तैयारी शुरू कर देते हैं और ये लोग बाकी जो अपोजिशन पार्टी है चाहे आरजेडी हो मैं सरप्राइज था एक्चुअली तेजस्वी को ममता बनर्जी के साथ वॉक करके देख देखकर कि वैसा वो मेहनत वैसी ही मेहनत उन्हें अगर बिहार में भी करें वो तो शायद कुछ मिले लेकिन जो मेरा मेरी अपनी जो लिमिटेड अंडरस्टैंडिंग है इंडियन अभी जो जो पॉलिटिकल एरीना को देख के कि अभी बीजेपी का इट्स देयर पीक टाइप अभी मतलब अनलेस यू आर यू आर राइट कि आइडियोलॉजिकली बहुत स्ट्रांग हो गए लेकिन आइडियोलॉजिकली स्ट्रांग से जो सबसे ज्यादा जरूरी है आपने पहले यह बात उठाई थी लेकिन वो बात रह गई कहीं के जो बोला इंडिया अलायंस को भी स्ट्रांग का स्ट्रेंथन करने की जरूरत है 2024 में मुझे लगता है कि अगर इंडिया अलायंस अच्छे से साथ में मिलके लड़ती तो शायद 2024 में जीत जाती बंगाल में इंडिया एयंस तो साथ में नहीं लड़ रही थी या और भी कई सारे स्टेट है जहां पे जैसे लेफ्ट फ्रंट अ विद ऑल इट्स सीए जैसे केरला में केरला में भी वह तो साथ में नहीं लड़ रहे थे ऑफकोर्स केरला में लेफ्ट और कांग्रेस साथ में नहीं लड़ पाएंगे अभी की सिचुएशन में बट वैसे ही क्योंकि इंडियन अलायंस बना ही था कि लोकसभा इलेक्शन के लिए लोकसभा इलेक्शन वहां यह था ही नहीं लेकिन मैं जो बात मैं जो बात कहना चाह लोकसभा इलेक्शन में भी उसमें भी बहुत सारे मतलब कंट्राडिक्शन थे पिटिकल अपने पॉलिटिकल एस्पिरेशंस थे तो जो है कि जब तक अभी भी बीजेपी मतलब डिस्पाइट देयर आईडियोलॉजी डिस्पाइट जो हम कह रहे हैं आइडियोल पिकक है जैसे 24 का ही देख लें जो उनके लिए बहुत ये लेकिन परसेंटेज ऑफ़ वोट्स या 24 के पहले 19 का भी आप देख लें परसेंटेज ऑफ़ वोट आप देखें कि अगर बाकी अपोजिशंस एक साथ मिलके सही में लड़े यूनाइटेड तो शायद बीजेपी को हरा सकते हैं या एटलीस्ट एक चैलेंज तो दे सकते हैं। देखिए ये कहा गया कि इलेक्शन से पहले कि ममता बनर्जी जो है शी इज़ अ फाइटर यू नो शी इज़ फाइटिंग लाइक अ लाइननेस और वो मोदी की जो सियासत है अगर उसको कोई चैलेंज कर सकता है उन्हीं की तरह से तो वो ममता बनर्जी हैं। यह राहुल गांधी अगर करते तो ऐसा हो जाता। पहले केजरीवाल के लिए भी यही कहा जाता था कि भ आम आदमी पार्टी है वो आप देखें चाहे सोशल मीडिया पर हो चाहे मीडिया पर हो पूरे नैरेटिव को कैप्चर करके रखती है। ये कहा गया अब आप ये देखें कि हश्र क्या हुआ है। मैं ये मैं एक रखना चाहती हूं कि जो लोग ये कह रहे थे वो आप देखें कि वो लड़ी वो बहुत जबरदस्त तरीके से लड़ी। इसमें कोई दो राय नहीं है। आई डू नॉट डिनाई दिस और उन्होंने एटलीस्ट पूरा नैरेटिव ये सब कुछ जो है वो दिखाने की पूरी वो कोशिश की। सब कुछ हुआ। लेकिन फिर भी भारतीय जनता पार्टी वहां पर बीजेपी वहां पर जीत गई। कामयाब हुई और ऐसे वैसे भी नहीं 206 सीटें उसको मिली हैं। अब फिर से ये कहा जा रहा है कि देखिए वो आपने भी बोला कि तेजस्वी की तरह उनकी तरह वो नहीं बैठेंगी। शी विल फाइट बैक। और यह भी कहा जा रहा था कि देखिए अगर ममता बनर्जी जीत जाती हैं तो फिर फेयर उनको मिलना चाहिए। उनका ड्यू और यू नो शी शुड बी द प्राइम मिनिस्टर प्राइम मिनिस्टर कैंडिडेट और राहुल गांधी को बैक सीट लेनी चाहिए। इनफैक्ट अखिलेश को या अरविंद केजरीवाल को या तेजस्वी यह वो बेसिकली वही लॉबी उसी का पार्ट था वो जहां पर वो कांग्रेस को साइडलाइन करना चाहते हैं और बाकी किसी को भी वो फ्रंट फेस बनाना चाहते हैं। हमने नीतीश कुमार का भी देखा था कि कैसे उनको कन्वीनर बनाना चाहते थे और फिर क्या हुआ? सवाल मेरा यह है कि क्यों यह लग रहा है कि ममता बनर्जी विल फाइट बैक? क्यों यह लग रहा है कि ममता बनर्जी किसी और लीडर की तरह चुप होकर नहीं बैठेंगी? व्हाई आर वी गेटिंग दिस दिस फीलिंग? देखिए ममता बनर्जी जो है वो इंप्रेशन की बात नहीं है। ममता बनर्जी फाइटर हैं। ये सब जानते हैं। वो पहले भी फाइट करती रही हैं और वो इसलिए और उन्होंने इसी ये उनकी फाइटिंग स्पिरिट ही देख लीजिए कि उन्होंने बोला मैं रिजाइन नहीं करूंगी। मैं जाऊंगी और बोलते बोलते चली गई कि इंटरनेशनल कोर्ट भी जाऊंगी। तो वो और बाद में बोला कि मैं फ्री बर्ड हूं और मैं कहीं भी जा सकती हूं। कहीं से लड़ सकती हूं। कहीं भी कंटेस्ट कर सकती हूं। और अब इंडिया गठबंधन को मजबूत मजबूत करने वही मेरा एक टारगेट तो यह है अह लेकिन तो वह फाइट करेंगी लेकिन एक चीज़ जो हमें ध्यान रखने की जरूरत है कि ममता बनर्जी 30 साल 40 साल की नहीं है वो 70 प्लस है तो कब तक फाइट कर सकेंगी ये सबका टेंशन एंड ऑफ़ द डे तो आई एम आई डोंट सी हर रिमेनिंग एक्टिव फॉर वेरी लॉन्ग टाइम क्या आपको लग रहा है अभिषेक बनर्जी में वो ज़ील है कि ममता बनर्जी अभिषेक बनर्जी में अभिषेक बनर्जी देखिए वो जो पुरानी अल थ्योरी है जो किंगडम बनने की इब्न खलदून की के थ्री स्टेजेस ऑफ़ जो कि ये होता है कि तो फर्स्ट स्टेज ममता थी वो खुद फाइटर थी। अभिषेक तो फाइट ग्राउंड से नहीं आया ना उन्हें तो सब कुछ मिला है ना तो वो बाबर या ये नहीं है वो उन्हें एक ऑलरेडी थाली में मिल रहा है। वो वो अकबर के बाद वाले जनरेशन के हैं। अगर हम वैसे कंपेयर करने की बात करें तो तो वो चीज है अभिषेक में। तो अभिषेक ने वैसा ग्राउंड टेस्ट किया नहीं है। हमें नहीं मालूम कि वो कर पाएंगे। जब पावर में थे तो भीड़ लग रही थी। आईपैक का पूरा सोशल मीडिया नैरेटिव था। पावर में नहीं है तो क्या तब भी कर पाएंगे? ये देखने की बात है। दूसरी चीज है कि करप्शन के एलगेशंस जैसे बहुत सारे हैं। तो अब तो पहले तो सिर्फ ईडी और सीबीआई थी। अब तो कोलकाता पुलिस और वेस्ट बंगाल पुलिस भी है। तो कितने लोग टीएमसी 80 जीते हैं। कब तक 80 रह पाएंगे? एक साल के बाद ही अगले साल ही बंगाल में कोलकाता में कॉरपोरेशन इलेक्शन है। उसके पहले कितने लोग स्विच करेंगे? मुस्लिम नॉन मुस्लिम क्या क्या आप पार्टी को टूटता हुआ देख रहे हैं? पार्टी फॉर्मली वर्टिकली टूटे कि नहीं इमीडिएटली मुझे लगता है जब तक ममता बनर्जी है शायद ना टूटे इमीडिएटली एटलीस्ट। लेकिन कई लोग शिफ्ट करेंगे। ये ये हमने जो पार्टी जीते नहीं है वो तो हमने पहले ही बात की सोशल मीडिया पे कई लोग दिखने लगे इस तरीके से। लेकिन विदिन एमएलए भी एक उनके लीडर हैं। उन्होंने तो जहां तक बोला है कि 2030 एमएलए हमारे टच में हैं। इंक्लूडिंग मुस्लिम एमएलए की भी बात करी है। तो ये इस तरह की खैर बहुत सारी रमर्स बनती रहती है। लेकिन फिर भी इसमें आई वोंट बी सरप्राइज्ड एंड द फैक्ट कि ममता बनर्जी खुद हार गई हैं। तो असेंबली के अंदर वो नहीं होंगी। अभिषेक भी नहीं होंगे। तो पार्टी का लीडर कौन बनेगा? जब शुभेंदु या इस तरह के लीडर जब छोड़ के गए थे। नंबर वन की लड़ाई नहीं थी। बात था कि जैसे ही अभिषेक को प्रमोट करना शुरू हुआ तो हुआ कि अच्छा नेक्स्ट लीडर अभिषेक होगा। शुभेंदु या मुकुल रॉय नहीं होंगे। दैट वाज़ द वन ऑफ द रीज़ंस व्हाई वो लोग खुश नहीं थे। साइड होने तो फिर अभी तो यह होगा कि अब असेंबली में किसको इस कौन लीडर होगा? और फिर उनको क्या सब मांगेंगे? तो ये सारी चीज़ 30 मुस्लिम एमएलए अगर जीत के आए हैं तो हो सकता है वहां से भी एक डिमांड हो। क्या डिप्टी को यह बनाए क्योंकि ममता एकदम से मुस्लिम वोटर्स को नहीं। फिर क्या पार्टी में जो यह जो 80 आए हैं वह कितने रहेंगे और सबको भी पावर में जो जैसा आपने पहले बताया कि आइडियोलॉजिकली तो बहुत स्ट्रांग नहीं है ना मोस्ट ऑफ़ देम आर आर देयर फॉर पावर। ठीक है ना? सेंट्रिस्ट सेंटर थोड़ा लाइफ लेफ्ट थोड़ा राइट कभी भी जा सकता है। तो सेंट्रिस्ट के लिए ये बहुत आसान है। फेंस सीटर बनना और या जिस तरफ मूव करना कर जाएंगे। तो आई वोंट बी सरप्राइज्ड अगर उसमें से कई सारे एमएलए जो है वो शिफ्ट करें ओवर अह पीरियड ऑफ़ टाइम या कुछ एमपी भी कर सकते हैं। अह अलदो अभी जरूरत नहीं है। लेकिन कई लोग को लग रहा है कि जैसे बीजेपी को नंबर की जरूरत नहीं है। बट राज्यसभा इलेक्शन के वक्त नंबर की जरूरत होती है। तब वहां पे एक-एक एमएलए एक-एक एमपी इंपॉर्टेंट हो जाता है। तो इसलिए आई वोंट बी सरप्राइज्ड अगर कुछ लोग स्विच करें अगले कुछ महीने में ही ये कह के कि मैं पीपल्स मैंडेट है उसको रेस्पेक्ट करना चाहिए और इस तरह की बातें। तो ये सारी चीजें हैं। क्या आम आदमी पार्टी जैसा हश्र तो आप देख रहे हैं क्या टीएमसी का हो सकता है? आम आदमी पार्टी फिर भी टू स्टेट में अब एक जगह से चल देखिए दो चीज़ है। पहला जो मैंने बोला कि बंगाल में विनर टेक्स इट ऑल। तो अगर कल बीजेपी धीरे-धीरे और खासकर बीजेपी जैसा आपने बोला एक बार पावर में आते तो वो बहुत आसानी से तो पावर से जाते नहीं है। और शुभेंदु अधिकारी ने बोला है कि 100 साल हम रहेंगे। तो 100 साल भले ना रहे लेकिन 10 साल अगर रहेंगे तो आई वोंट बी सरप्राइज। तो वैसे सिचुएशन में कुछ लोग अगर शिफ्ट करते हैं तो आई वोंट बी सरप्राइज। लेकिन क्या पार्टी पार्टी टीएमसी को तो वो तोड़ते बीजेपी अगर उन्हें जरूरत होती अभी तो वो दे आर इन वेरी कंफर्टेबल मेजॉरिटी तो उन्हें पार्टी तोड़ने की ऐसा जरूरत क्या है जिनको आना है वो आएंगे धीरे-धीरे ज्वाइन करेंगे वो वो करते रहेंगे क्योंकि तोड़ के आप लाओगे तो उन्हें कुछ देना भी तो होगा आप खुद से आओगे तो जो भी मिलेगा आप उसमें आपको आप मजबूरी में आए हो ना आप इसलिए आए हो कि ये सीबीआई का डर है आपको या ईडी का डर है आपको ठीक है ना और हमने इलेक्शन के कैंपेन के बीच में देखा है कि कई सारे लीडर्स के घर पे रेड्स हुए हैं तो खासकर ऐसे ऐसे लीडर चाहे वो जीते हो या ना भी जीते हो जिनके घर पे रेड हुआ है जिनके ऊपर कोई केसेस है करप्शन के केसेस है वो क्या करेंगे ये इसमें कोई दो राय भी नहीं है कि उन सबकी फाइलें खुलेंगी और जाहिर सी बात है कि अगर ममता बनर्जी ने खोली थी तो अब इनकी भी फाइलें खुल सकती हैं और खुलेंगी और वो सब तो डर तमाम लीडर्स को सता ही रहा है और मैं लास्ट क्वेश्चन मेरा जो पिछला अधूरा रह गया था जो मुसलमानों के हवाले से हम बात कर रहे हैं। मुसलमानों के लिए बंगाल में आप किस तरह का फ्यूचर देख रहे हैं? मैं जब बंगाल गई थी तो मेरे लिए एक तरह का एक शॉकिंग था बट मैंने देखा कि वहां पर खुलेआम जो मीट की शॉप्स थी बिल्कुल वहां पर खुलेआम थी और कोई आगे कोई चटाई या कुछ इस तरह की जो चीजें हम यूपी वगैरह में देखते क्योंकि आई एम फ्रॉम यूपी तो वहां जो देखते थे वो मैंने बंगाल में नहीं देखी और मैं काफी सरप्राइज थी क्योंकि वहां पर कहा गया कि नहीं यहां तो हिंदू मुसलमान सब ईसाई वगैरह सब यहां पर क्योंकि मीट खाते हैं और हर तरह का खाते हैं इसीलिए यहां पर इस तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं है। अ और दूसरा जो काफी जो कारोबार हैं वो जाहिर सी बात है मुसलमानों के यहां अभी मैं देख रही थी एक वीडियो कि जहां कुछ बिरयानी बिक रही थी वो पूरी तोड़फोड़ की गई है। वहां उनको परेशान किया गया है। तो मेरा सवाल यह है कि मुसलमान जहां कहीं ना कहीं एक तरह से वो पावर में रहे उनको उस तरह का डर वहां पर नहीं रहा। चाहे लेफ्ट रही या टीएमसी अब उनको क्या डर सता रहा है? अब उनको क्या लग रहा है? और वो लोग स्पेशली रियाज जो वोट नहीं दे पाए जो एजुडिकेशन में या फिर लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में या कंप्लीटली उनको हटा दिया गया है उनके लिए क्या है? क्योंकि यही सवाल मैंने बिहार के हवाले से भी पूछा था कि उन लाखों लोगों का क्या हुआ? वो कहां हैं? क्योंकि अगर आप वोटर नहीं है तो आपको जो गवर्नमेंट की जितनी पॉलिसीज हैं और ये सब हैं उसका भी आपको कोई फायदा सीधे तौर पर नहीं मिल पाएगा। देखिए एसआईआर के डिलीशन में जो है वह दो पार्ट है जो कई बार लोग नंबर्स के गेम में वो कंफ्यूज हो जाते हैं। 90 लाख डिलीट हुए हैं कि कितने लाख डिलीट हुए हैं। जैसे आपने बिहार का भी जिक्र किया तो इसलिए मैं वो कि एक है कि कुछ सही में जेन्युइन जैसे लोग कहते हैं 90 लाख लोग डिलीट हो गए। क्या 90 लाख जेन्युइन लोग हैं जिन डिलीट हुए। कुछ लाख ऐसे होंगे 40 लाख, 45 लाख, 50 लाख मुझे नहीं मालूम क्योंकि कोई फिगर है नहीं जो सही में मर गए होंगे या शिफ्ट हो गए होंगे या डुप्लीकेट थे या डिलीट जो भी इस तरह के रीज़ंस। तो अगर हम फिगर्स की बात करें तो आई एम वरिड अबाउट मुझे लगता है कि मोटा-मोटी 35 से 40 लाख लोग ये मैं नंबर ऐसे नहीं बोल रहा हूं जैसे 27 लाख तो जो अंडर एजुडिकेशन वाली जो डिलीटेड लिस्ट थी वो है प्लस जो ट्रिब्यूनल में केस गया है वो 34 लाख गया तो ये 34 लाख ऐसे लोग हैं जो जेन्युइन है जिनके पास डॉक्यूमेंट्स है और मैं मान लूं कि ऐसे क्योंकि मैं कुछ एक दो लोगों को ऐसा जानता हूं कि जिनको अभी तक समझ ही में नहीं आया खासकर जो मेड और इस तरह के लोग हैं कि उनको उनको उनके बीएलओ ने कहा है कि इलेक्शन के बाद जो है ना फॉर्म भरना तो उन्होंने अपील ही नहीं फाइल किया था। तो ऐसे मान लीजिए 2 4 लाख और लोग होंगे तो 34 है तो मान लीजिए 35 36 या शायद 40 लाख होंगे। अब मेरा जो वरी है इमीडिएट वरी कि ये जो 40 लाख या 35 लाख जो लोग हैं उनका क्या होगा? अभी तक करीब 2000 के आसपास दो हजार या 2200 के आसपास लोगों का ट्रिब्यूनल ने क्लियर किया है। जिसमें 90% लोगों का क्लियर हुआ है। उसमें 1900 में कुछ ऐसे कुछ लोगों का ही डिलीट हुआ है। ऑलमोस्ट 85 90% लोगों का नाम क्लियर कर दिया गया है। तो अगर जस्ट इसी आई जस्ट होप कि यही ट्रेंड रहेगा। तब भी आई फियर कि 5 सात लाख लोग ऐसे होंगे जो जैसे जो बहुत गरीब लोग हैं जो एक कम या नहीं पढ़े लिखे लोग हैं और जो जो डोमेस्टिक हेल्प की आपने बात करी मेड या इस तरह के मजदूर रिक्शा जो चलाते हैं लोग हैं उनके पास बेसिक डॉक्यूमेंट्स क्या होगी उनके पास जमीन नहीं है तो जमीन का कागज नहीं होगा उनके पास है वोटर कार्ड उनके पास है आधार कार्ड उनके पास है राशन कार्ड ये तीनों डॉक्यूमेंट एसआईआर में नहीं मान तो उनके पास और कोई डॉक्यूमेंट्स नहीं है या कुछ ऐसे होंगे जिनका सही में नाम में कुछ पहले के नाम में पप्पू लिखा हुआ था और अभी मोहम्मद रियाज लिखा हुआ है। इस तरह की कुछ डिस्क्रिपेंसी होती है। तो ऐसे लोगों के तो ऐसे 5 सात लाख अगर डिलीट ट्रिब्यूनल से भी क्लियर नहीं होंगे। मुझे नहीं मालूम मैं बस आई एम बीइंग ऑप्टिमिस्टिक एंड सेइंग कि सिर्फ 5 लाख होंगे। लेकिन वो शायद 10 लाख भी हो जाए शायद 12 लाख हो जाए। तो ये इन 10 12 लाख या 5 7 लाख जो भी हो नंबर उनका क्या होगा? नाउ टीएमसी की गवर्नमेंट अगर होती तो वन वुड हैव होप कि उनका कुछ एटलीस्ट डिटेंशन सेंटर में तो नहीं भेजते इमीडिएटली और उनके लिए कुछ नाउ इनके लिए देयर आर वरीज़ कि क्या होगा उनकी लड़ाई क्योंकि वो फॉर्म सिक्स भी नहीं पढ़ पाएंगे अगर डिलीट है तो जैसा खबर जैसी आ रही है उनको प्रोबेब्ली दे विल हैव टू गो टू कोर्ट नाउ ये एक दो लोगों की बात नहीं है वो जो कांग्रेस के जीते हैं एक एमएलए वो उनका नाम डिलीट था वो कोर्ट में जाके उन्होंने वो कराया बट कितने लोग ऐसे कोर्ट जा पाएंगे तो कई लाख लोग ऐसे होंगे होंगे क्या वो जो जैसे आसाम में डी वोटर्स बहुत सारे हैं। इस सोशल मीडिया पे इस तरह की एक लिस्ट सर्कुलेट हो रही थी। करीब आई एम श्योर वो उससे ज्यादा होगा। बट 64 लोगों की ऐसी लिस्ट है जो इलेक्शन ड्यूटी कर रहे थे क्योंकि वो सरकारी नौकरी में है, टीचर है या कुछ इस तरह के जॉब में है लेकिन वो उनका नाम डिलीट है तो वो और ज्यादा ऐसे लोग जो ऐसे हम जानते हैं कि आसाम में ऐसे बहुत सारे डी वोटर्स हैं जो गवर्नमेंट जॉब में भी है लेकिन वोट नहीं दे सकते या कुछ-कुछ ऐसे बहुत सारे केसेस आए हैं कि प्रेसिडेंट की फैमिली के लोग या आर्मी में सर्व किए हुए लोगों को डिटेंशन कैंप में भेज दिया गया था। कई सारे ऐसे लोग तो वहां ऐसा क्या बंगाल में होगा आई फियर के ऐसा होगा लेकिन आसाम से बंगाल जो थोड़ा सा मुझे जो यह है कि आसाम में एक एसएमई बंगाली वाली जो इशू है वो एटलीस्ट बंगाल में नहीं है बट शायद अब थोड़ा बंगाली और इललीगल और घुसपैठिया ये वाला मुद्दा और गर्म होगा उनका क्या होगा मुझे नहीं मालूम बट ये एक कंसर्न की बात है। दूसरा जो आपने वहां की सोशल लाइफ़ की बात करी कि वहां रहते हैं। खासकर जो आपने गोश्त की दुकानों की बात करी वह मेनली कोलकाता का एक फ़िनोमिना है अर्बन या कुछ आसनसोल या इस तरह के जगह में जो मुस्लिम मोहल्ले हैं वहां पे ही इस तरह की चीज़ है और उसकी वजह जैसे आपने बताया कि जनरली अभी तक प्रॉब्लम नहीं हुई थी। लेकिन जैसा आपने बताया कि यूपी में कुछ कर्टेंस या कुछ चटाई या कुछ इस तरह के लगा के रखते हैं। अभी तो जाहिद साहब मुझे सुनने में आया कि कई सारे स्लॉटर हाउस और ये सब डर से अभी बंद है। जैसे आपने एक देखा होगा जबकि वो बीफ नहीं मटन शॉप था। न्यू मार्केट एरिया में एक बुलडोजर लेके पार्टी के वर्कर्स तोड़ने आ गए थे उसको। वो एक मटन शॉप था जो खैर उस टाइम वो शायद दुकान बंद थी जहां तक मुझे मालूम है। लेकिन वो उसको तोड़ने के लिए आ गए। तो इस तरह के इंस्टेंसेस या पूजा का टाइम है रामनवमी या इस तरह के इंस्टेंसेस ऐसी चीजें ये एक चीज और है कि इस तरह के जो वीडियो आते हैं ये ध्यान बंगाल में जैसा मैंने पहले मुस्लिम के बारे में बताया कि उर्दू स्पीकिंग मुस्लिम और बंगाली स्पीकिंग वैसे ही बंगाल में एक अच्छा खासा हिंदी स्पीकिंग हिंदू भी जो कि बीजेपी के फर्स्ट राउंड ऑफ सपोर्टर्स थे वो खासकर यही अर्बन एरिया में ज्यादा है आसनसोल हो ये इस तरह की फुटेज कई बार ना आपको ऐसे एरिया से मिलेगी बंगाली एरिया से फिर भी उतना ज्यादा नहीं मिलेगा आपको क्योंकि बंगाली बिरयानी बंगाली का सबसे पॉपुलर डिश अभी कोई अगर सेल में देखेंगे तो शायद बिरयानी खाने में है। एंड दे आर वेरी प्राउड अबाउट कि वह कोलकाता बिरयानी इज़ पार्ट ऑफ़ बंगाली खुशी। तो लेकिन जो इस तरह का एरिया है जैसा मैंने बताया जहां पे मिक्स है जहां पे हिंदू हिंदी स्पीकिंग लोग भी लोग हैं। जहां पे कई सारे ये जय श्री राम के नारे आप जैसे सुनेंगे ना उसको अगर आप गौर से पूरा वीडियो सुनेंगे तो आपको लगेगा ये हिंदी स्पीकिंग लोग हैं। वो हिंदी में बात कर रहे हैं। ये भी आपको वो वो वो इस तरीके की चीज मिलेगी। तो ये है कि अब आगे मुसलमानों के लिए इन जनरल जैसे मुझे मैं कोलकाता से हूं। ऑलदो मैं अभी दिल्ली में हूं। लेकिन मुझे जो कि वहां लोग कंसर्न है जैसा आपने शुरू में इंट्रोडक्शन में बताया कि इस तरह के कुछ इदारों ने अनाउंस किया है। मुझे मालूम है कि स्कूल कॉलेज में लोग बच्चे जो है घबराए हुए हैं। खास तौर पे जो विज़िबल मुस्लिम हां खासकर विज़िबल मुस्लिम खासकर लड़कियों के लिए है कि पीपल लड़की इस हफ्ते रुक जाओ एटलीस्ट 9 तारीख को गवर्नमेंट बन जाएगी। उसके बाद देखते हैं कैसा रहेगा। फिर जाना एक हफ्ते रुकने के लिए इस तरीके की बात हो रही है। तो एक कंसर्न है अभी बहुत सारे जगह पे क्योंकि इस तरह के नारेबाजी हो रही है। कहीं पे बुलडोजर लेकर आ रहे तो सिचुएशन थोड़ा टेंस भी है। तो ये है लेकिन बहुत मेजर लेवल पे अभी तक अल्लाह का शुक्र है वैसा कोई इंसिडेंट नहीं हुआ है। ऑलदो शुभेंदु अधिकारी के एमएलए को और कुछ दो चार दो तीन मर्डर की खबर ऑलरेडी आ गई है। काफी बड़ा मर्डर उनके पीए का [गला साफ़ करने की आवाज़] उनके पीए का भी मर्डर का हुआ है और उसके बाद बहुत ही प्रोवोकेटिव उन्होंने स्टेटमेंट भी दिया है। शुभेंदु अधिकारी ने बोला कि शायद जैसा क्लेम किया है कि नारा हिंदू मुस्लिम को अलग करके सेग्रगेट करके मारने की कोशिश करी। मुझे नहीं मालूम क्या हकीकत है। लेकिन इस तरीके से जो चीजें हुई है तो इनसे माहौल थोड़ा और खराब होगा। लेकिन अभी तक मुस्लिम कंसर्न है, टेंस है लेकिन वन होप्स के चीजें थोड़ी कंट्रोल में रहेगी क्योंकि ऑलरेडी हम ये देख रहे हैं कि पूरे देश भर में ही हम ये देख रहे हैं कि खासतौर पर जो काऊ बेल्ट है वहां पर क्या कुछ हो रहा है वो हम देख रहे हैं। कुछ स्टेट्स बचे थे जहां लग रहा था कि पीसफुली मे बी यू नो मुसलमान अपने काम, अपने कारोबार, अपनी चीजें, अपनी एजुकेशन ये सब हासिल कर रहे हैं। उसमें एक कोल एक वेस्ट बंगाल भी था। वेस्ट बंगाल भी अब हाथ से हाथ से एक तरह से चला गया है और हमें ये कहने की जरूरत नहीं है कि बीजेपी किस तरह की सियासत करती है या वो क्या कर रही है तो जाहिर सी बात है कि जो कंसर्न है वो है लेकिन अभी मुझे लग रहा है कि थोड़ा इंतजार करके चीजों को देखना होगा कि क्या पावर में आके भी ऐसा होता है और फिर वहां के जो सिविल सोसाइटी है वहां के जो कंसर्न लोग हैं जो खासतौर पर लिबरल हिंदूज हैं जो इस तरह के तमाम इथोस में सब में यकीन रखते हैं वो क्या करने जा रहे हैं ये देखना लिबरल हिंदूस वो इंपॉर्टेंट होगा देखने के लिए लेकिन एक चीज है कि कुछ चीजें बदलेंगी ऑफ कोर्स जैसा आपने कहा कि वो एक पावर शेयर कर रहे थे कुछ टू टू सम डिग्री एंड एक उनकी सोशल लाइफ थी जो क्योंकि ऐसा कभी हुआ नहीं माहौल तो एक तरीके के उसमें रह रहे थे तो थिंग्स विल नॉट रिमेन सेम फॉर श्योर चीजें बढ़ गई एक लास्ट क्वेश्चन मेरा रियाज़ कि लोगों को ये लगता है कि सडनली यू नो कम्युनल हो गया है बंगाल जो मैंने आपसे शुरू में भी मैंने कहा और अक्सर सर शायद इसको बहुत नैरो करके शायद इन चीजों इस इस पर्सपेक्टिव को देखा जाता है। लेकिन अगर हम पूरा इतिहास पूरी तारीख अगर हम देखते हैं बंगाल की बंगाल पार्टीशन से लेकर बंगाल में वर्स्ट राइट्स हमने देखे हैं और जो उस उस वक्त की जो जनरेशंस रही जिन्होंने ये सब कुछ देखा। जाहिर सी बात है कि उनके जहन में उनके दिमाग में उनके दिल में वो तमाम चीजें रही होंगी जो हो सकता है उन्होंने ओवर जनरेशन पास की हों। मैं ये भी मानती हूं कि जो नॉर्थ इंडिया का जो कम्युनलिज्म है और जो बंगाल का है उसमें एक फर्क है कि भले ही वो इस तरह से कहें कि नहीं वो बीजेपी को उन्होंने चुना है लेकिन हो सकता है कि वो तलवार लेकर मस्जिदों के सामने ना आए या आपको मारने पीटने ना लगे या हो सकता है कि लिंच ना करें लेकिन है तो वो भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ही या सांप्रदायिक तरह की सियासत यह कोई रीसेंट फ़िनोमिना तो तो नहीं है क्या आपको लग रहा है कि इसको सिर्फ बीजेपी ने एक आवाज देकर इसको बहुत सरफेस पर वोकली पेश कर दिया है और उसको एक पावर दे दी है। इट हैज़ ऑलवेज बीन देयर। वुड यू अग्री और नॉट? यस आई अग्री। उसमें चीज ये है कि देखिए मैंने 2017 में एक रिसर्च आर्टिकल लिखा था। वहां पे वो मैंने उस आर्टिकल का टाइटल मैं एग्जैक्ट तो अभी भूल रहा हूं। लेकिन कुछ इस तरह से है कि कैसे टीएमसी ने एक स्पेस दिया मुस्लिम को आइडेंटिटी असरशन का और वो कैसे कम्युनलिज्म को बढ़ा रहा है स्टेट में। ठीक है? और वहां पे मैंने कंपेयर किया था कि अभी का मतलब 2017 के वक्त बात की थी। अभी उसका समझ लीजिए 2026 पीक है 10 सालों में कि उसको मैंने 19 30ज एंड 40ज के बंगाल से कंपेयर किया था। हम के बंगाल जब वो जब जो आपने राइट्स की बात करी जो हिंदू मुस्लिम कम्युनल टेंशन जो हुए ये खासकर ये सब 1938 के बाद जो चीजें इस तरह की बदल वहां शुरू होती है बंगाल में। तो बंगाल का एक अपनी और द फैक्ट कि पार्टीशन का अगर हम बात करें जो दो सबसे ज्यादा अफेक्टेड स्टेट इंडिया में है वो पंजाब एंड बंगाल लेकिन दोनों में एक डिस्टिंशन है कि पंजाब में क्या हुआ ऑलमोस्ट डेमोग्राफिक शिफ्ट हुआ सिख मेजॉरिटी ऑफ़ देम इस तरफ आ गए वास्ट ऑलमोस्ट ऑल सिख एंड हिंदू एंड मुस्लिम इस तरफ से पंजाब से ऑलमोस्ट मेजॉरिटी चले गए तो वो नहीं था लेकिन बंगाल ऐसा नहीं हुआ बंगाल में एक तरह से पार्टीशन बहुत अह कॉम्प्लिकेटेड था 30% 27 28% 2011 के सेंस के हिसाब से मुसलमान बंगाल में अभी भी है और अह अच्छे खासे हिंदू हैं बंगाल में जो उस साइड से ईस्ट बंगाल से आए हैं और उनको वो पार्टीशन का जो पेन है वो ऑफ कोर्स है जो आपने कहा जो बीजेपी या इस तरह की पार्टी ने उसको यूज़ किया। लेकिन पार्टीशन के बाद क्या हुआ? पहले कांग्रेस की सरकार में और बाद में लेफ्ट की गवर्नमेंट में एंड टू सम एक्सटेंट फिर टीएमसी के भी गवर्नमेंट में अह उनको यह इतना स्पेस मिल मिला के चाहे वो उस साइड के हो या ओवरऑल जो हिंदू एलट है जो मेजॉरिटी है उनको इस उनको दे डिड नॉट नीड अ मतलब कई बार यह सवाल लोगों के मन में तो रहता है कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी के स्टेट में ही बीजेपी ज़ीरो पे या एक या दो या तीन तक पे सीट पे ही क्यों सिमटी हुई थी? उसकी वजह ये थी कि जो वहां की जो मिडिल क्लास है डिस्पाइट बीइंग जो आपने कहा कि सर्टेल कम्युनलिज्म एंड सिर्फ कम्युनलिज्म की बात ये नहीं है कि जो एक आईडियोलॉजिकल जो पार्टीशन की हिस्ट्री है लेकिन तब भी बंगाल बाय एंड लार्ज जो है स्टेबल था एंड पीसफुल था। उसकी वजह है कि वहां की जो गवर्नमेंट्स रही वो लेफ्ट की स्पेशली उसके लिए बहुत फेमस है। बट उसके पहले बीसी रॉय और कांग्रेस की जो गवर्नमेंट रही और लेफ्ट की ऑफ कोर्स ज्योति बासू के रिजीम में कि उनको अकोमोडेट किया गया। उनको स्पेस दिया गया जो उस तरफ से लोग आए थे। तो ये एक बाय एंड लार्ज और इस पे एक थ्योरी भी है कि मुस्लिम जो थे वो स्पेशली लेफ्ट रिजीम तक की अगर बात करें तो दे वर नॉट उनको कम्युनल लाइट की जरूरत नहीं पड़ी क्योंकि वो मार्जिनलाइज्ड ऑलरेडी थे। ठीक है? कुछ सिंबॉलिक रिप्रेजेंटेशन था ये था। ठीक थे। लेकिन उसके अलावा यह स्पेस नहीं था जो मैंने अपने आर्टिकल में आर्ग्यू किया था 2017 कि जब वो वंस दे स्टार्टेड कमिंग इनू पब्लिक स्पेस जब वो असर्ट करने लगे अपने को क्योंकि एक नया मिडिल क्लास बंगाल में बना मुसल मुसलमानों के बीच और उन्होंने असर्ट करना शुरू किया तो दैट लेड टू द काउंटर पोलर पोलराइजेशन आल्सो एंड उसका एक जो पूरा कंसोलिडेशन जो है जो हमें अब अभी देखने को मिलता है वो हुआ तो उस हिसाब से आई एम नॉट सरप्राइज्ड कई लोगों को सरप्राइजिंग लग रहा है अह कि बीजेपी कैसे आ गई बंगाल में। बट अगर वो ट्रेजजेक्टरी देखेंगे और खासकर आरएसएस जिस तरह से कंसिस्टेंटली वहां ग्रो कर रही थी काम कर रही थी। सो दिस इज़ नॉट अ वेरी सरप्राइजिंग रिजल्ट। बट फ्यूचर जो है वो एक सीइंग व्हाट हैज़ व्हाट इज़ हैपनिंग फॉर लास्ट 10 इयर्स इन आसाम। सीइंग व्हाट इज़ हैपनिंग इन अदर मेनी बीजेपी रूल स्टेट्स। जिस तरीके से कई बार इंसिडेंट्स होते हैं। वन इज दैट इज व्हाई बहुत सारे जगह जो आपने बताया टेंस है या लोग वरिड है कि जैसे बकरा ईद आने वाला है तो उस टाइम भी वन होप्स की चीजें कट क्योंकि तब तक तो इनकी सरकार बन जाएगी बट एक चीजें जो है वो मतलब थोड़ी कंसर्न की है और क्योंकि पहली बार बीजेपी पावर में आई है वहां पर तो जाहिर सी बात है जो उनका सप्रेस एक तरह का वोट बैंक रहा या फिर जो कार्यकर्ता रहा जो उतना वोकल नहीं बात कर पाता था टीएमसी के डर से लेफ्ट के डर से वो अब सब बिल्कुल एकदम खुलकर जैसे होता है ना कि वो आपको दिख रहा है वो सोशल मीडिया पे आप को दिख रहा है ट्रेन में बस में हर जगह वो जो है अपने को असर्ट कर रहे हैं उसको लोग सब्ट्रन हिंदूइज़्म बोल सकते हैं सब्ट्रन हिंदुत्व या इस तरह की आइडेंटिटी असरशन जो बोले वो वो दिखेगा बट जो जो रिजल्ट होगा कि उस अभी वो आइडेंटिटी असरशन जैसा हमने देखा है हैदराबाद में या दूसरे जगह कि जब होली का टाइम आता है तो मस्जिद में को ढक दिया जाता है या इस तरीके की चीज है तो आई वोंट बी सरप्राइज जब धीरे-धीरे इस तरह की चीजें सिचुएशन विल डिमांड कि जैसे आपने बताया कि मुस्लिम ने इदारों ने इस स्टेटमेंट दिया है कि थोड़ा कंट्रोल सी बात है मसलहतन ये तमाम ये मसलेतन मुसलमान सोचेंगे और अब उनको अपने आप को रिथिंक करना पड़ेगा और बहुत सारी चीजों को उनको दूसरे पर्सपेक्टिव से दूसरी तरीके से अब देखना पड़ेगा खासतौर पर मुसलमान वन लास्ट पॉइंट आई वांट वांट देयर इज़ अ सिल्वर लाइनिंग टू दिस क्योंकि पिछले 10 साल से या उसके पहले से ही बोले कि बंगाल में खासकर यह था कि बीजेपी आ जाएगी। वो जो बोलते हैं जैसे बच्चों को मां डराती है जब सोता नहीं कि सो जाओ नहीं तो शेर आ जाएगा गब्बर आ जाएगा या या या सेंट्रल एशिया पे मैं रिसर्च करता था तो चंगेज़ खान आ जाएगा। इस तरीके की जो बात होती है तो वो है कि ये 10 साल पिछले इलेक्शन में मुसलमानों को यही बोला गया था कि बीजेपी आ जाएगी। अभी भी इस बार भी वही बोला जा रहा था। तो अब जो है कि बीजेपी आ गई है। तो जो जब पूरा रेस्ट ऑफ इंडिया जिस तरीके से चैलेंजेस को नेविगेट कर रहा है वैसे बंगाल के भी सब लोग और इंक्लूडिंग मुस्लिम भी करेंगे। लेकिन एटलीस्ट ये डर तो नहीं है। तो ये वन होप्स कि इस तरह के सिचुएशन में जो एक सिल्वर लाइनिंग है। हम अगर दूसरे स्टेट में देखें कि एक अपनी कम्युनिटी से भी एक कम्युनिटी के जो इश्यूज है या उसको बोलने वाले जेन्युइन लीडरशिप कुछ इमर्ज होगी। जैसे नौशाद सिद्दीकी या आईएसएफ है या इस तरह की जो पार्टी है उनके ऊपर हमेशा यही इल्जाम लगाया जाता था ना या या और भी जो इस तरह के लीडर है कि तुम कुछ बोलो नहीं या कुछ डिमांड नहीं करो लेकिन है कि वो पिछले बार इलेक्शन में भी या इस बार के भी इलेक्शन में देख तो माइनॉरिटी के लिए टीएमसी ने कोई बहुत बड़े प्रॉमिससेस तो किए नहीं थे लेकिन फिर भी आप सिर्फ डर पे आप वोट मांग रहे थे तो वहां पे यह है कि अब हो सकता है कि टीएमसी को ही मुस्लिम वोट दें मैं नहीं कह रहा हूं लेकिन नाउ दे विल बी एट प्रोब्ली दे दे कैन बारगेन एंड देन नॉट सिक्योरिटी ये डर तो नहीं दिखा पाएंगे ना कि बीजेपी आ जाएगी। बिल्कुल तो ये मुझे लगता है कि मतलब जो होना है वो तो होगा ही मुसलमानों का लेकिन हर जगह ही बीजेपी है सेंटर में ऑलरेडी है बीजेपी तो बंगाल में भी अगर हो सकता है कि फिर कम्युनिटी लेवल पर वो अपने ऊपर और काम करना और इन तमाम चीजों पर शुरू करें। अभी देखना होगा। अभी तो बहुत बहुत शुरुआती दिन है। अभी ओथ सेरेमनी भी नहीं हुई है। देखते हैं किसको कमान दी जाती है। हु इस गोइंग टू बी द चीफ मिनिस्टर एंड देन वी विल सी हाउ थिंग्स विल अनफोल्ड। बट बहुत-बहुत शुक्रिया रियाज़ साहब आपका कि आई एम श्योर लोगों को इस पडकास्ट के जरिए जो हमारी ऑडियंस है उन्हें बहुत कुछ सीखने के लिए भी मिला होगा। तो बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। थैंक्स।

Companion article

A Historic Defeat, and a Question Left Hanging

West Bengal's 2026 assembly election produced a result that even seasoned analysts had hedged against until the votes were counted: the Bharatiya Janata Party won power in the state for the first time, ending Mamata Banerjee's fifteen-year run as chief minister. In the days since, the state has been convulsed by the aftermath. Statues of Lenin have been pulled down, bulldozers have made public appearances, crowds have marched chanting "Jai Shri Ram" while brandishing swords, and multiple killings have been reported, including that of an aide to senior BJP leader Shubhendu Adhikari. Adhikari himself had said during the campaign that he considered himself an MLA "only of Hindus," because only Hindus had voted for him, and had separately suggested Muslims deserved the kind of treatment Israel meted out in Gaza.

Against this backdrop, journalist and host Bushra Khanam Fahad opened a conversation on the Nous Podcast with Dr Mohammad Reyaz, assistant professor at Kolkata's Aliah University, a former journalist and a long-time analyst of Bengal's politics, to unpack what the result means for the roughly 30 percent of Bengal's population that is Muslim. Some Muslim organisations, Fahad noted, had already circulated advisories urging community members to avoid stepping out of their homes unless absolutely necessary. For a community that had, under successive governments of different ideological stripes, always retained some seat at the table -- symbolic or otherwise -- the immediate reality now is that every Muslim legislator elected to the new assembly will sit in opposition. None will be part of the government.

Not Overnight: The Making of a Hindu Vote Consolidation

Reyaz's central argument is that the scale of the BJP's win, while startling to many, was not a sudden event triggered by any single cause. "We saw a large-scale Hindu vote consolidation," he said, pointing to the party's near-total sweep of Scheduled Caste and Scheduled Tribe-dominated seats -- Purulia, Bankura, Alipurduar, the Jangalmahal belt, Purba Medinipur and much of North Bengal all went overwhelmingly to the BJP, on top of a substantial consolidation among the urban, upper-caste Bengali middle class.

This, he stressed, was building well before this election. In 2021, the BJP had already won 77 seats and roughly 36-37 percent of the vote, making it in effect the principal opposition. Pollsters like Yashwant Deshmukh of C-Voter had framed the contest as a fight over a 30 percent Muslim vote bloc that was presumed unlikely to move toward the BJP, which is one reason so many analysts were cautious even as exit polls, in the end, undershot the BJP's actual tally. What surprised people, Reyaz said, was not that consolidation happened, but how complete it turned out to be -- and he was careful to add that it was not driven by communal sentiment alone. Anti-incumbency, he argued, was a real and significant factor layered on top of it.

"Anti-Incumbency" as a Coded Word

Pressed on why the same charge of corruption and non-performance produces "pro-incumbency" verdicts in BJP-ruled states like Bihar but "anti-incumbency" verdicts against non-BJP governments, Reyaz offered a theory he said he had been trying to articulate publicly for some time. Corruption and stagnation narratives, he argued, only seem to gain electoral traction against governments the BJP is trying to unseat -- Congress, Arvind Kejriwal's Aam Aadmi Party, or Mamata Banerjee's TMC -- and rarely stick to BJP-run states themselves, even where allegations exist, such as the Vyapam scandal in Madhya Pradesh. His explanation: the anti-incumbency narrative "stands" as a respectable public position precisely when a large-scale Hindu vote consolidation is already under way, because educated, liberal upper-caste voters are reluctant to say outright that they are voting on communal lines. Instead, he said, they frame it as concern over corruption or the absence of development.

He drew a direct parallel with the Bharatiya Janata Party's 2014 national campaign around "achhe din," pointing to strikingly similar ingredients this time: a narrative of rising unemployment and stagnation driving people out of the state for work, and a women's-safety narrative built around the RG Kar case that he compared to the aftermath of the 2012 Delhi gang-rape -- in both instances, he noted, a victim's mother went on to contest and win a seat. "They are masters at building narratives," he said of the BJP, adding that this was matched by a parallel failure of opposition parties, including the Congress, to construct a competing one even when they held power, as in 2014.

TMC's Own Alienation of Its Muslim Base

If Hindu consolidation explains one half of the result, Reyaz located the other half in a slow erosion of trust between the TMC and its Muslim voters. He traced it to roughly 2016, when, in his account, the flow of new welfare policies and schemes specifically benefiting Muslims -- expansion of Aliah University, English-medium madrasas, OBC reservation gains that had visibly created a new professional Muslim middle class in Kolkata -- began to slow after having been substantial in Banerjee's first term. Into that vacuum stepped the Indian Secular Front (ISF), formed ahead of the last election, whose pitch, as Reyaz summarised it, was pointed: "Security is fine, but what beyond security?"

Compounding this, he said, Banerjee spent the last five years pursuing what he called a form of "soft Hindutva" -- building four grand temples, including a Jagannath temple in Digha and others in Rajarhat and Siliguri -- even as her party publicised her attending Iftars, wearing a headscarf during Hajj send-offs, and paying monthly stipends to imams and muezzins. The effect, in Reyaz's telling, was to generate two contradictory narratives simultaneously: Hindu voters were told, and some came to believe, that she was engaged in Muslim "appeasement," while many Muslim voters concluded she was drifting toward what they, too, called "soft Hindutva." He pointed to the Waqf Act protests as a particular flashpoint, recalling that Banerjee had told protesters to take their agitation to Delhi rather than stage it in Bengal -- read by many Muslims, he said, as confirmation that they were being taken for granted.

A Fractured Vote: Humayun Kabir, ISF and a Diminished Bench

The consequence showed up starkly in the numbers. TMC strategists, Reyaz said, had been hoping for something close to total Muslim consolidation in their favour out of sheer fear of the electoral-roll revision process -- 99 or even 100 percent in some pockets. What they got instead was closer to 80-84 percent. The number of Muslim MLAs in the new assembly has fallen to roughly 36, well below the 2011 high of 59, even as they continue to make up around 40 percent of TMC's own winning legislators -- evidence, in Reyaz's reading, that TMC still holds a plurality of the Muslim vote, but not the near-monopoly it had counted on.

Some of that shortfall went to Congress, which picked up a handful of seats concentrated in Malda, Murshidabad and North Dinajpur, and to AIMIM, which Reyaz said had made only a "dent" rather than a breakthrough. The most striking case was Humayun Kabir, a sitting MLA who won from two seats after campaigning, in part, on a promise to build what he called a "Babri Masjid." Reyaz was unambiguous that he did not support the idea -- "if you wanted to build a mosque, just build one," he said, questioning the need to invoke that particular name -- and noted that Kabir had previously been associated with the BJP and was seen publicly congratulating the party after the results, raising questions about a possible understanding between them. But he cautioned against reading Kabir's win as an endorsement of that specific promise: Kabir was already a locally influential politician with his own base before he ran as an independent, and his victory reflected TMC's broader anti-incumbency problem as much as anything else.

Reyaz was equally insistent that the shift should not be overstated. Of the roughly 32 assembly seats where Muslims form more than half the electorate, TMC had swept all of them in 2021; this time it retained around 23. "That shows there is erosion, not collapse," he said, adding that without the BJP in the picture at all, the party would likely have won even fewer of the state's seats than it did -- the SIR-driven fear of disenfranchisement, he argued, actually held part of the Muslim vote together for TMC even as anti-incumbency pulled at it from another direction.

The Machinery Behind the Result

Much of the post-election commentary, Reyaz noted, has focused on the Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls, which TMC and civil society groups have blamed heavily for the defeat. He does not dismiss its effect -- in some of the closest Muslim-majority contests, deletions exceeded the eventual victory margin, and he estimated SIR could have directly swung perhaps 15 to 20 seats. But he was skeptical of treating it as the primary explanation, comparing it to parties reflexively blaming EVMs after a loss: no political party, he said, will readily blame its own voters. He also argued TMC had grown complacent once litigation began, having earlier promised aggressive resistance -- Abhishek Banerjee had spoken of surrounding Delhi with lakhs of protesters -- only to pursue a comparatively quieter legal route once the final SIR lists were published.

He also pointed to a parallel collapse in TMC's campaign infrastructure. Around mid-April, he said, he began noticing a marked weakening of the party's social media presence coinciding with an Enforcement Directorate raid connected to a director at IPAC, the election-management firm run for the party by Prashant Kishor's former outfit, with reports -- denied by TMC -- that its operations had effectively stalled. He cited a Hindustan Times field-reporting piece by journalist Nilanjan Sarkar describing how, since 2021, IPAC had become something close to a party extension under Abhishek Banerjee, deciding candidate selection to the point that tickets were reportedly denied to 73 to 77 sitting MLAs -- a decision Reyaz said Amit Shah moved to exploit directly, holding individual meetings with aggrieved, denied candidates.

That points to what Reyaz called the BJP's core strength: its capacity to "micro-manage" elections at a granular level. Amit Shah spent more than three weeks in Kolkata during the campaign, he noted, and the party dominated advertising space across websites, social media and newspapers simultaneously. He described BJP's "panna pramukh" (page in-charge) volunteers campaigning aggressively even inside high-rise apartment complexes that typically see low voter turnout, with reports of the party booking train and flight tickets to bring voters back to their constituencies to cast ballots -- a scale of resourcing, he said, that TMC simply could not match.

Roots Older Than This Election

Reyaz pushed back on the idea that Bengal's communal turn is a recent or sudden phenomenon, tracing it back to the Partition era and communal tensions that intensified in the state from around 1938 onward. Bengal and Punjab were the two states most affected by Partition, he noted, but unlike Punjab, which saw an almost total demographic separation along religious lines, Bengal retained a large Muslim population -- around 27-30 percent by the 2011 census -- alongside a substantial Hindu refugee population from East Bengal.

What kept communal politics from becoming electorally dominant for decades, in his account, was that successive governments -- B.C. Roy's Congress, more than three decades of Left Front rule under Jyoti Basu, and later the TMC -- gave the community enough symbolic and social accommodation that a distinct communal political identity did not need to assert itself. That, he argued, is why the BJP stayed confined to a handful of seats for decades even in the home state of its ideological forerunner, Shyama Prasad Mukherjee, despite the RSS steadily building grassroots networks there over that same period.

The shift, Reyaz said, is one he first argued in a 2017 research article: as a new, upwardly mobile Muslim middle class emerged in Bengal and began asserting its identity in public life, it produced what he called a "counter-polarisation" among Hindus. What is visible in 2026, in his framing, is roughly a decade's worth of that counter-polarisation reaching its peak. He was careful, though, to draw a distinction between this and North Indian-style communalism: Bengali Hindus who voted BJP, he suggested, are unlikely to march on mosques with swords or resort to lynching in the way seen elsewhere, but he agreed this is still a form of communal polarisation, simply expressed differently.

Fear on the Ground: What the Roll Revision Leaves Behind

Beyond the election result itself, Reyaz flagged the unresolved human toll of the SIR process as an immediate concern. Roughly 90 lakh names were deleted from Bengal's electoral rolls during the revision, a figure he cautioned should not be read at face value -- some proportion reflects genuinely deceased, duplicate or relocated voters. Based on tribunal disposal patterns so far, in which close to 2,000-2,200 cases have been resolved with roughly 85-90 percent of names restored, he estimated that somewhere between 34 and 40 lakh of the deletions likely involve genuine residents caught up in the process, a category distinct from those legitimately removed.

His deeper worry is for those who may never successfully appeal: poor, undocumented domestic workers, day labourers and rickshaw-pullers who hold voter ID, Aadhaar and ration cards -- none of which SIR accepts as standalone proof -- but lack land records, which the process effectively requires and which the landless poor never had reason to possess. Even on an optimistic reading, he estimated five to twelve lakh people statewide could be left without recourse. He cited reports of at least 64 government employees, including teachers on election duty, whose own names were deleted despite their employment status -- a pattern he likened to Assam's long-running "D-voter" phenomenon, where even army veterans and officials' relatives have been caught up in similar disputes.

He also described the more immediate social climate: in Kolkata, meat shops -- including a mutton shop in the New Market area that party workers arrived to demolish with a bulldozer -- have shut out of fear, something he said was previously unheard of in a city where, unlike parts of north India, such businesses had long operated openly. Muslim organisations have advised college students, particularly visibly identifiable Muslim women, to stay away from campuses for about a week until the new government is sworn in, and there is particular anxiety building around the upcoming Bakri Eid.

A Silver Lining, and an Open Question for the Opposition

Reyaz closed on a note that was, by his own description, counterintuitive. For roughly a decade, he said, Bengal's Muslim voters were mobilised chiefly through fear -- "the BJP is coming" functioned much like a bogeyman used to frighten children. Now that the BJP has actually arrived, he argued, that particular fear loses its political utility, potentially freeing Muslim voters from a purely defensive voting pattern and creating space for genuine community leadership -- of the kind ISF's Nawsad Siddique has tried to represent -- to bargain for real commitments rather than security alone.

On Mamata Banerjee's own political future, Reyaz was measured. Her combativeness is not in doubt -- she has vowed not to resign, threatened to approach international courts, and declared herself a "free bird" ready to contest from anywhere -- but he noted she is in her seventies, raising real questions about how long she can remain the party's active, singular force. He was more skeptical of Abhishek Banerjee's readiness to fill that role, noting he has never been tested at the grassroots the way his aunt was. With Bengal's police now under a BJP government, in addition to the CBI and Enforcement Directorate, Reyaz expects corruption investigations into TMC leaders to intensify, and predicted gradual defections from the party over the coming months -- driven partly by upcoming Rajya Sabha calculations, where every MLA's vote matters -- even if he does not expect a formal, immediate split so long as Banerjee remains active at the helm.

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