Nous Shorts· 15 Jun 2026· 2:43

Delhi Pogrom vs 1984: What's Different Today?

"If one of the parties involved in the violence is itself engaged as a participant, then how can you expect justice?"

Full Transcript

दिल्ली पुलिस जब खुद इस पूरे राइट्स में एक पार्टी की हैसियत से इंगेज है, तो आप यह कैसे एक्सपेक्ट कर सकते हैं कि दिल्ली पुलिस एक ऐसी इन्वेस्टिगेशन करेगी जिसमें वो लोगों को सजा दिलाएगी। तो दिल्ली पुलिस तो खुद इसमें दंगा करने वालों में और कराने वालों में शामिल थी। मैं कोई दबी-छुपी बात नहीं कह रहा हूं। तो आप ये देखेंगे कि दिल्ली पुलिस का सारा जोर उस पे है कि जो लोग फाल्सली इंप्लिकेट किए गए हैं। कई सारे केसेस हैं जो अपने आप में नज़ीर बन चुके हैं इस बारे में। सिर्फ एफआईआर 59 की बात नहीं है, दूसरे

तमाम केसेस हैं, उनको वो निकलने नहीं देना चाहते। लेकिन जो एक्चुअल तरीके से जो लोग मारे गए हैं, उनको कौन आकर मार गया, उनके बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं है। तो दिल्ली पुलिस का कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं है, सिर्फ झूठी कहानी 59 और दूसरे केसेस में है। दिल्ली पुलिस खुद दंगा करने में शामिल थी। जब हम 1984 के जो दंगे हुए थे, जब हम उन कॉलोनीज़ में जाते हैं, वहां जब लोगों से बात करते हैं, वह बहुत ऑर्गेनाइज़्ड लगती है। एक-एक चीज़, एक-एक पेपर

वर्क, उनके पास फोटोग्राफ्स, तमाम चीज़ें उनके पास मौजूद होती हैं। लेकिन जब हम यही चीज़ दिल्ली दंगों में जाकर, उन विक्टिम्स से जाकर बात करते हैं या जब उनसे मिलते हैं, तो मुझे वो चीज़ें उतनी ऑर्गेनाइज़्ड नज़र नहीं आती। बिल्कुल ऐसा लगता है जैसे किसी को केस में इंटरेस्ट नहीं है, या उनका इकोनॉमिक बैकग्राउंड उस तरह का है, या फिर उनकी कोई पॉलिटिकल एजेंसी नहीं है, जिसकी वजह से ऐसा होता है। तो ये फर्क जो दिखता है, कि इतने सालों के बाद भी, यू नो, दे स्टिल हैव द पॉलिटिकल एजेंसी, लोग अभी भी जाकर उनके बारे में बात करते हैं। लेकिन

वही सेम चीज़ वहां नज़र नहीं आती। देखिए, एक तो डिफरेंस ये है, जैसे मैंने कहा, कि 90% इन पूरे केसेस में जो विक्टिम्स थे वो बिलो पावर्टी लाइन थे। ज़ाहिर सी बात है, बिलो पावर्टी लाइन होंगे तो अनएजुकेटेड भी होंगे। तो दोनों चीज़ें थीं। फिर जो यह पॉलिटिकल एनवायरनमेंट बिल्ड अप हुआ है, तो उनको लगता है कि जो हमारा बचा हुआ है, इस पूरी लड़ाई में कहीं वो भी हाथ से न निकल जाए। और ज़ाहिर सी बात है कि इस पूरे सेटअप में जब इतना बड़ा वायलेंस

1984 के बाद सिख कम्युनिटी ने कोई वायलेंस नहीं देखा है। बट ईच एंड एवरी डे वी आर फेसिंग, डे टू डे, एज़ एन एपीसीआर वेयर वी आर वर्किंग। तो वहां पर हम तकरीबन 2700 केसेस देख रहे हैं, जो हमारी हैसियत से ज़्यादा हैं, लेकिन रोज़ केसेस इनक्रीज़ हो रहे हैं। तो ज़ाहिर सी बात है कि जिस लेवल का अटैक है, जिस लेवल का ऑर्गेनाइज़्ड, सिस्टमैटिक अटैक हिंदुस्तानी मुसलमानों पर है, मुसलमानों की हैसियत उस लेवल के रिस्पॉन्स मैकेनिज़्म की नहीं है।

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