1:10Was Jauhar University Built for Muslims Only?I Azam Khan's Wife Responds
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Jauhar University has become the centre of a larger political and legal debate. In this conversation, former Rajya Sabha MP Dr. Tazeen Fatma joins senior journalist Bushra Khanum to discuss the controversy surrounding the university, the legacy of Azam Khan, and the response of the Samajwadi Part…
वो एक माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी है। सबके लिए है। यहां ऐसा नहीं है कि मतलब सिर्फ मुसलमानों के लिए बनी है। या आजम खान ने अपने परिवार के लिए बनाई है। बहुत सारे अब उनके वो जज्बाती बयान, जज्बाती उनके भाषण हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल है जब से ये नोटिस आया है। ये हर जगह बुलडोजर चल रहे हैं। हर जगह ये हो रहा है। ये एक तरह से देश का जो मतलब ढांचा है उसे ही बदलने की कोशिश है। अभी भी जिस जितने एक्टिव डिंपल यादव को जितना एक्टिव में अखिलेश यादव को या तमाम जो एमपीज हैं उनको मैं देख रही हूं वहां दिल्ली में मैं उनको यहां पर नहीं देख रही हूं। इसकी क्या वजह क्या आपको भी कोई शिकायत है? मेरा ख्याल है ये सारे सवालात तो आप पार्टी के एमपीज [संगीत] एमएलए से पूछे या पार्टी के एम से ये वही लोग बता सकते हैं कि वो यहां क्यों नहीं आए? शिकायत तो है आपकी। नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं है। क्यों? लेकिन क्यों? इसलिए मैंने [संगीत] इससे पहले और कुछ भी और मौकों पर भी देखा है, महसूस किया है। क्या आजम खान साहब की ये सिचुएशन पार्टी को भी सूट करती है? क्योंकि अगर वो होते तो उनका अपना एक खुतबा होता। आजम साहब को अरेस्ट करने के पीछे एक तो उन्हें अरेस्ट होना था। जेल जाना था। उन्हें अपमानित करने का भी एक तरह से इरादा था। जो समाजवादी पार्टी के एमपी हैं रामपुर से उनके बस एक मैंने न्यूज़ देखी कि वो यूनिवर्सिटी के गेट तक आए थे और उनको पुलिस ने एंटर नहीं होने दिया और उसके बाद वो चले गए तो क्या उनकी कोशिश पूरी हो गई है? तो मैं उनके बारे में कुछ कहना नहीं चाहती क्योंकि आजम साहब जब जेल गए थे तो उनके ये अल्फाज़ थे कि वो जेल नहीं गए हैं बल्कि सुधार गृह में गए। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता [संगीत] है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। अभी इस वक्त हम लोग आजम खान साहब के घर में मौजूद हैं और आपको पता है कि जिस तरह से उसी बुलडोजर कारवाही के तहत जो बुलडोजर सियासत पूरे देश भर में और खासतौर पर उत्तर प्रदेश में हमें देखने के लिए मिल रही है। जौहर यूनिवर्सिटी के 40 में से जो 38 भवन हैं उन्हें नोटिस देकर आरडीए की तरफ से या फरमान आप कहें दिया गया है कि 40 में से जो 38 भवन है वो इललीगल है और 15 दिन का नोटिस देकर उसे बुलडोज करने की बात कही गई है। यह कहा गया है कि या तो आप खुद उसे बुलडोज कर दीजिए। हम आपको वक्त दे रहे हैं और अगर आपने खुद बुलडोज नहीं किया तो हम आकर उसको बुलडोज करेंगे और पैसा भी यूनिवर्सिटी से ही लिया जाएगा। यानी कि एक शिक्षण संस्थान को तोड़ने की प्लानिंग की जा रही है। इसको लेके बहुत सारे सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या ये इसलिए हो रहा है क्योंकि यूनिवर्सिटी आजम खान साहब ने बनाई थी क्योंकि यूनिवर्सिटी का अगर हम कहें कि इसकी शुरुआत 2006 में हुई थी। 2017 के करीब ये पूरी यूनिवर्सिटी बनकर तैयार हो गई थी और अब 2026 है। तो सवाल ये उठ रहा है कि आखिर इतने दिन के बाद यह सुध क्यों आई है? वो आरडीए जो उस वक्त आरडीए नहीं था उस वक्त मौजूद ही नहीं था उसके बाद आरडीए बना है तो उसके तहत यह नोटिस क्यों भेजा गया है और क्या होगा उन 3000 से ज्यादा बच्चों का जो यहां पर तालीम हासिल कर रहे हैं मेरे साथ आजम खान साहब की जो पत्नी है तनजीम फातिमा साहिबा वो मेरे साथ हैं फिलहाल मैं आपको बताना चाहूंगी कि वो खुद राज्यसभा की मेंबर रह चुकी हैं वो एमएलए भी रह चुकी हैं और एक और चीज जो मैं यहां मेंशन करना चाहूंगी कि दो बार उनको भी जेल में रखा गया है। लगभग 18 महीने की जेल उन्होंने भी झेली है और वो इस वक्त 77 साल की हैं। तो आप समझ लीजिए कि एक परिवार के साथ क्या कुछ किया जा रहा है। तो तजीन फातिमा साहिबा मेरे साथ मौजूद हैं। आज हम उनसे बातचीत करेंगे और खासतौर पे मैं इस यूनिवर्सिटी के हवाले से उनसे बातचीत करना चाहूंगी। ताजी साहिबा बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका। थैंक यू सो मच। आपने वक्त निकाला और मेरा पहला सवाल आपसे यह है कि जिस वक्त आपके पास यह खबर आई यह नोटिस आया कि यूनिवर्सिटी को जिससे बहुत अरमान हसरत और बहुत सारे ख्वाबों को बुनकर आजम खान साहब ने बनाया था और उसको बुलडोज करने का नोटिस जब आपके पास आया और सिर्फ 15 दिन का नोटिस आपको दिया गया। सबसे पहली जो थॉट आपके ज़हन में आया वो क्या था? सबसे पहली बात तो ये है कि मैंने कभी यह सोच सोचा ही नहीं यूनिवर्सिटी को डिमोलिश कर दिया जाएगा। इसलिए पहली चीज मुझे अल्लाह ताला पर बेहद यकीन है। शायद सभी को होगा। लेकिन मुझे भी इस चीज पर पूरी पूरा यकीन है कि अगर कोई चीज बिल्कुल सच्चाई और ईमानदारी के साथ की जाए कोई काम तो यूनिवर्सिटी भी पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ बनाई गई है और ये इस यूनिवर्सिटी में ये जो इतना ज्यादा बच्चे हमारे आंदोलन कर रहे हैं तो स्टूडेंट्स भी बहुत ज्यादा इमोशनली अटैच है क्योंकि इसे बनाने में इन बच्चों का भी बहुत ज्यादा एक तरह से कंट्रीब्यूशन है। तेज तपती हुई धूपों में इन लोगों ने खुद ईंट सीमेंट और यह सारी चीजें कार सेवा की है और यूनिवर्सिटी को बनाया है। ये जो सवाल किया जाता है कि इतनी बड़ी-बड़ी बिल्डिंग्स बन गई। इसमें कितना पैसा लगा? क्या हुआ? तो इसमें बच्चों ने अपना खून पसीना भी लगाया है। बड़ी मेहनत करके उन्होंने इस यूनिवर्सिटी को तैयार किया। तो ये पूछा जा सकता है कि भाई बच्चे क्यों काम कर रहे थे उस यूनिवर्सिटी में? सब कार्य सेवा हुई थी। बच्चे भी शहर के लोग भी सभी लोग काम कर रहे थे क्योंकि यूनिवर्सिटी जो है वो किसी दौलतमंद आदमी ने तो नहीं बनाई है आजम साहब के पास या हम लोग भी इतने दौलतमंद तो नहीं थे कि हम यूनिवर्सिटी बना लेते जो चंदा आया लोगों ने और हमारे इसमें ये नहीं है कि सिर्फ मुसलमानों ने ही चंदा दिया है हमारे हिंदू भाइयों का सिख भाइयों का और सभी वर्ग के लोगों का इसमें बहुत बड़ा कंट्रीब्यूशन है। उन्होंने चंदा इकट्ठा करके ये बनवाई है। जी आजम खान साहब ने ये कहा था कि मैंने दामन फैलाकर इस यूनिवर्सिटी को बनाया है। लोग ये कह रहे हैं कि भ ये यूनिवर्सिटी तो सरकार के पैसे से बनी हुई है। लेजिस्लेचर में बदलाव किया गया। एक एक्ट पारित हुआ। उसके बाद ये यूनिवर्सिटी बनी। अब वो आजम खान की यूनिवर्सिटी कहलाई जाती है। नहीं आजम खान की यूनिवर्सिटी के नाम से पहचानी जाती है। लेकिन वो एक माइनॉरिटी यूनिवर्सिटी है। सबके लिए है। यहां ऐसा नहीं है कि मतलब सिर्फ मुसलमानों के लिए बनी है। या आजम खान ने अपने परिवार के लिए बनाई है। हमारे परिवार में तो अब कोई पढ़ने वाला है नहीं। और हम उस यूनिवर्सिटी से मैं या आजम साहब या मेरे परिवार वाला कोई एक पैसा भी नहीं लेता है। बल्कि हम अपना जो कुछ होता है वो उसमें लगा तो जरूर देते हैं लेकिन हम वहां से लेते नहीं। क्योंकि जिस मकसद के लिए बनाई गई है रामपुर तो एजुकेशन की फील्ड में बहुत ज्यादा पिछड़ा हुआ था। जो पुराने सर्वे आप देखेंगे वो यही था। आजम साहब के 10 बार यहां से एमएलए रहे हैं और फिर उसके बाद लोकसभा के सदस्य भी रहे हैं और मिनिस्टर भी रहे दो तीन बार तो उनके ज़हन में सबसे पहला यही ख्याल था कि हम यहां के लोगों को पहले एजुकेट करें। उसमें ट्रस्ट में यूनिवर्सिटी के साथ साथ दो तीन हमारे आरपीएस स्कूल भी एफिलिएट से रामपुर पब्लिक स्कूल जिन स्कूल जो कैबिनेट से पास किए गए थे उस वक्त की यहां की जो खंडर पड़ी हुई सरकारी इमारत थी उन्हें ली पर लेकर आजम साहब ने उनकी बिल्डिंग्स बड़ी बड़ी खड़ी करवाई इतने खूबसूरत स्कूल है शायद आपने अभी देखे तो नहीं होंगे देख लेंगे तो उन स्कूलों में उन्होंने टेक ओवर कर दिया गवर्नमेंट ने और उनको स्कूलों से बच्चों को हटा दिया गया तो वो स्कूल तो बर्बाद कर दिए गए और वो स्कूल ऐसे थे जहां के सीबीएस से एफिलिएटेड सीबीएस से मान्यता उन्हें मिली हुई थी और वहां पर जो मतलब रामपुर के क्या कहीं के भी जो गरीब बच्चे होते थे जो अफस थे जो अनाथ थे या जैसे बीड़ी वर्कर्स के बच्चे थे मजदूरों के बच्चे थे उनसे मंथली फीस सिर्फ ₹ ली जाती और पढ़ते कोई अलग स्कूल के लिए नहीं था उन्हीं क्लासेस में पढ़ते थे तो ₹20 में कोई भी बता दे हिंदुस्तान में कि किसी सीबीएस स्कूल में किसी में भी ₹20 महीना पर पढ़ाई होती है। जी तो लेकिन आप जब ये कह रही हैं कि बच्चों को वहां से निकाल दिया गया। स्कूल को टेक ओवर कर लिया तो ये अब स्कूल का जो स्कू स्कूल की आप बात कर रही हैं रामपुर पब्लिक स्कूल की उनका स्टेटस अब क्या है? जो ये सब कैसे किया गया? इसके बारे में अगर आप थोड़ा तफसील से बता सके। यह सब बस कह दिया गया कोई ना किसी ना किसी बहाने से उनको ले लिया गया कि यह जो है यह स्कूल्स जो है गवर्नमेंट की बिल्डिंग्स में है। कैबिनेट डिसीजन को खत्म कर दिया गया। पहले तो पलट दिया गया। कि मतलब उस गवर्नमेंट ने लिया था ये डिसीजन। ये बिल्डिंग्स स्कूल के लिए इस्तेमाल हुई और अब हम उसे पलट देते हैं। आपको अभी जिस तरह से हम यह देख रहे हैं कि पूरे देश भर में खासतौर पर योगी सरकार के आने के बाद हम उत्तर प्रदेश में जो बुलडोजर की पूरी कारवाई देख रहे हैं। किसी भी मस्जिद को किसी के भी घर को ऐसा लगता है कि सब कुछ वो खुद ही तय कर रहे हैं और एक बुलडोजर की जो सियासत है उसके तहत उन्हें बुलडोज किया जा रहा है। क्या आपको ये डर नहीं है कि उसके तहत यूनिवर्सिटी के साथ भी ऐसा किया जा सकता है। अगर 100-100 साल पुरानी मस्जिदों के साथ ऐसा हो सकता है तो यूनिवर्सिटी के साथ भी ऐसा हो सकता है? अगर आपको ये लग रहा है कि किसी बदले की कारवाही के तहत ये किया जा रहा है। जी बदले की कार्यवाही से तो किया ही जा रहा है। एक तो आजम साहब जो है जाहिर है मुखालिफ पार्टी के हैं। इस वजह से भी और दूसरी चीज यह है एक आवाज ये भी उठ रही है कि क्या जहर यूनिवर्सिटी जो नाम है अगर इसका नाम बदल दिया जाए तो नाम की वजह से इस यूनिवर्सिटी को तोड़ा जा रहा है। तो अगर नाम की वजह से तोड़ा जा रहा है तो यह हमारे लिए और भी शर्म की बात है क्योंकि मौलाना मोहम्मद अली जौहर एक फ्रीडम फाइटर थे और उन्होंने कह दिया था कि मैं गुलाम हिंदुस्तान में अपनी मरना भी पसंद नहीं करूंगा। तो ऐसे फ्रीडम फाइटर के नाम पर बनी हुई यूनिवर्सिटी को अगर सिर्फ नाम की वजह से निशाना बनाया जा रहा है तो यह भी हमारे लिए शर्मनाक है। और दूसरी चीज यह है ये जो आप बता रही है कि हर जगह बुलडोजर चल रहे हैं। हर जगह यह हो रहा है। तो देखिए यह एक तरह से देश का जो मतलब ढांचा है उसे ही बदलने की कोशिश है। हमारे संविधान को ही कुचलने की कोशिश है। यह लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र तो जनता की सरकार होती है। जनता के लिए होती है। आज बच्चे जो है वो लाठियां खा रहे हैं। बच्चे जो है जंतरमंतर पर जब जा रहे हैं तो उनके पुलिस मार रही है। खून बह रहा है। तो ये लोकतंत्र तो नहीं है कि आप अपने ही लोगों को मार रहे हैं। जी जब ये नोटिस आया था तो क्या आपने आप जाहिर सी बात है मिलने जाती होंगी आजम खान साहब से जेल में। और मैं देख रही थी कि आपके घर से बहुत दूर नहीं है। जेल भी बिल्कुल एकदम करीब में ही है। और मैं जब आ रही थी तो मैंने उस पूरे जेल की हालत भी देखी और मुझे यकीन नहीं हुआ कि यहां पर आजम खान साहब है क्योंकि बाहर से उसे देखकर अंदाजा हो रहा था कि अंदर की हालत जो है वो क्या होगी और जिस तरह से लोग वहां पर लाइनों में लगे हुए थे उनको देखकर भी मुझे अंदाजा वहां पर हो रहा था। तो जब आपने जाकर उनसे यह बताया कि आप उनकी आपकी सबसे पहले यही पूछ लूं मैं आपसे कि क्या आपकी इसको लेकर बातचीत हुई है किस तरह का नोटिस आया है यूनिवर्सिटी को बुलडोज करने का आरडीए की तरफ से कोई आपकी उनसे कोई कोई देखिए आजम साहब से मिलना वैसे तो बहुत मुश्किल होता है हफ्ते में बस हफ्ते में नहीं महीने में चार मुलाकात होती है उसमें तीनती लोग जा सकते हैं और अक्सर तो ये होता है कि मैं जाती भी कम हूं क्योंकि मुलाकात के लिए और लोग जाते हैं जो मुकदमों में दौड़ भाग कर रहे हैं पैरवी कर रहे हैं जो उन्हें असली हालात क्या है वो बता सकते हैं मैंने उन्हें पूरा नोटिस भेज दिया था अंदर कि आप इसे पढ़ लीजिए और ऐसेसे नोटिस आया उसके बाद कोई बातचीत नहीं हुई उसके बाद अभी मैं गई ही नहीं हूं तकरीबन 10 दिन हो गए जी आप क्या क्या महसूस करें कि जब उन्होंने ये पढ़ा होगा तो क्योंकि आप तो उनकी आप तो उनकी शरीके हयात है आपने उनको को उनके थिक और थिन सब में आपने उन्हें देखा है और और सारी आपने उनके जद्दोजहद से लेकर उनका उरूज और ये तमाम जो तमाम चीजें हैं उसकी आप सबसे बड़ी साक्षी रही हैं। यही मेरा आपसे सवाल है कि किस उससे कैफियत से वो गुजर रहे होंगे क्योंकि बहुत सारे अब उनके वो जज्बाती बयान जज्बाती उनके भाषण हैं जो सोशल मीडिया पर वायरल है जब से ये नोटिस आया है जहां वो यूनिवर्सिटी के बारे में असेंबली के अंदर वो बात कर रहे हैं। पार्लियामेंट के अंदर वह बात कर रहे हैं और अलग-अलग जगहों पर हमने देखा कि वह बात कर रहे हैं अपनी स्पीचेस में। तो आपको क्या लग रहा है कि किस कैफियत से वह गुजर रहे होंगे? क्या उन्हें महसूस? इस कैफियत को सिर्फ मैं ही नहीं सभी लोग महसूस कर सकते होंगे कि एक ऐसा इंसान जो कि इतना ज्यादा इमोशनली अटैच हो एक शिक्षण संस्थान से, एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन से वो कैसा महसूस करेगा जब उससे यह कहा जाए कि इसे गिरा दिया जाए। आपको कोई डर नहीं है कि यह यूनिवर्सिटी को बुलडोज किया जा सकता है? कोई डर नहीं है आपको? मुझे डर मैंने शुरू में ही आपसे कहा कि मुझे अल्लाह पर पूरा भरोसा है। पूरा यकीन है। बच्चों से जब आप बात कर रही हैं वहां पर आप यूनिवर्सिटी जाती होंगी। मैंने देखी भी थी कि आप जब ये नोटिस आया था उसके बाद आप वहां पर गई थी। तो जब आप वहां जो छात्र हैं जब उनसे आप बात कर रही हैं तो उनकी कैफियत क्या है? वो क्या महसूस कर रहे हैं बच्चे? बच्चे तो बहुत ज्यादा मैं क्या कहूंगी? जोश में ही है और बच्चे पूरी तरह डटे हुए हैं। वहां कह रहे हैं कि हम आखरी दम तक संघर्ष करेंगे। हम आखरी वक्त तक लेकिन मुझे आप ये बताइए कि ये लगातार ये सवाल उठ रहा है और मैं भी आपसे ये पूछना चाहती हूं कि ये तब भी शिकायत रही जब आजम खान साहब जेल में रहे। अभी भी वो जेल में हैं। अभी जब बीच में छूट कर आए। उनसे भी इस तरह के सवाल लगातार पूछे जाते रहे कि पार्टी ने पार्टी की टॉप लीडरशिप ने इस उस तरह से साथ नहीं दिया जिस तरह से उन्हें देना चाहिए था एक ऐसे कद्दावर लीडर का जिसके बगैर हम ये कहें कि समाजवादी पार्टी जहां है वहां नहीं हो सकती थी और वो खुद कहते हैं कि मैंने इस पार्टी को अपने खून से सींचा है। खून पसीने से सींचा है। मेरा सवाल यह है कि इस मुश्किल दौर में जब एक तो मुश्किल दौर आपके लिए यह है कि आपके बेटे अब्दुल्ला आजम और खुद आजम खान साहब जेल में है और लगातार जिस तरह के केसेस दर केसेस उनके ऊपर लगे बाहर आते हैं फिर चले जाते हैं फिर आते हैं फिर चले आते हैं यही हम देख रहे हैं और दूसरी तरफ अब ये जौहर यूनिवर्सिटी को बुलडोज करने की बात अभी भी जिस तरह जितने एक्टिव डिंपल यादव को जितना एक्टिव मैं अखिलेश यादव को या तमाम जो एमपीज हैं उनको मैं देख रही हूं हूं वहां दिल्ली में मैं उनको यहां पर नहीं देख रही हूं। इसकी क्या वजह क्या आपको भी कोई शिकायत है? खासतौर पर लोग कह रहे थे कि रुचि वीरा की बात कर रहे थे। जिनको ये कहा गया कि लड़के आजम खान साहब ने मुरादाबाद से तमाम तरह की दुश्मनियां लेकर मुरादाबाद से उनको टिकट दिलवाया था और बहुत लोग नाराज हुए थे। वो वहां एक्टिव नजर आती है लेकिन वो यहां अभी तक क्यों नहीं आई? मुरादाबाद और रामपुर और दिल्ली में तो बहुत लंबा वक्त नहीं है। मैं भी सुबह चलकर यहां पर आ ही गई। जी मेरा ख्याल है ये सारे सवालात तो आप पार्टी के एमपीज एमएलए से पूछे या पार्टी के एम से ये वही लोग बता सकते हैं कि वो यहां क्यों नहीं एक्टिव शिकायत तो है आपकी नहीं मुझे कोई शिकायत नहीं है क्यों लेकिन क्यों इससे मैंने इससे पहले और कुछ भी और मौकों पर भी देखा है महसूस किया है लेकिन उनका एक मैसेज आया है कि वो एमपी और एमएलए वगैरह कल आएंगे यहां धरने पर लेकिन एमपीज एमएलए आएंगे लेकिन उसके बाद अखिलेश जी खुद भी आएंगे खुद भी आएंगे लेकिन इतना डिले इतना डिले क्यों है आप ये देख रही होंगी लगातार डिंपल यादव बहुत एक्टिव नजर आ रही हैं हमने देखा कि अच्छी बात है आप बच्चों के मसले हैं वहां उनको पीटा जा रहा है आप उठा रही हैं बहुत अच्छी बात है सब कुछ कल भी मैंने देखा कि अखिलेश यादव बहुत एक्टिव वहां पर नजर आए पार्लियामेंट का सेशन चल रहा है लगातार वहां पर भी उस मामले को उठा रहे हैं उनके तमाम जो पार्टी के कार्यकर्ताओं तमाम लोग लेकिन जो एक हुजूम दिखना चाहिए था कि भाई यह एक शिक्षण संस्थान है। यहां पर भी 3000 प्लस बच्चे पढ़ते हैं और आपको इलेक्शन तो उत्तर प्रदेश का ही लड़ना है। तो वो वो सारा जोश या वो तमाम जो कवायद है वो तो सब नहीं नजर आ रही है यहां पर। यहां उत्तर प्रदेश में तो नहीं नजर आ रहे हैं। हो सकता है उनका मकसद कुछ और हो। अब आगे बढ़कर हो सकता है वो प्राइम मिनिस्टर के लिए कोशिश कर रहे हो। अप्रोच कर रहे हो। पहले मुख्यमंत्री तो बन जाए वो दोबारा से। अभी जिस तरह से जो एसआईआर के के तहत जिस तरह से वोटर्स को काटा जा रहा है इंस्टीटश पर जिस तरह से कब्जा है वो खुद ही कहते हैं अखिलेश यादव ये तमाम बातों को तो पहले तो मुख्यमंत्री बन जाए प्रधानमंत्री तो अभी बहुत दूर की बात है वो तो 2019 में होने वाला है चुनाव उसके ता आपके सवाल का जवाब दे रही हूं कि आप कह रही वो वहां क्यों नजर आ रहे हैं एक्टिव तो मैंने सोचा हो सकता है कि वो अब मुख्यमंत्री बनने के बजाय प्राइम मिनिस्टर बनने का उनका मकसद हो आपके जो आप नहीं भी कह रही हैं वो एक तरह से आपके अल्फाज़ में वो कटाक्ष भी है, सरकाज्म भी है और आप आपकी तकलीफ भी है। वो भी उसमें झलकती है। क्या आपको नहीं लगता कि पार्टी लीडरशिप को आपके साथ उसी तरह से शाना बशाना आपके इस सबसे मुश्किल दौर में आपके साथ होना चाहिए था। हां मैं ये तो कहूंगी कि पार्टी लीडरशिप जो है इस परेशानी के वक्त में हमारे साथी ज्यादातर रही है। जी हमारे साथी लेकिन वो साथ रही है लेकिन उतनी दिखती नहीं है। यह यह तो आप किसी से भी अगर आप पूछेंगे तो शायद रामपुर का कोई भी शख्स अगर इससे मैं ऐसे रैंडम भी बात कर लूं तो तो भी वो यही बात करेगा कि शिकायत उन सबके चेहरों पर उन सब पर जो है वो साफ तौर पर नजर आती है। यहां तो मैंने देखा कि जो समाजवादी पार्टी के एमपी हैं रामपुर से उनके बस एक मैंने न्यूज़ देखी कि वह यूनिवर्सिटी के गेट तक आए थे और उनको पुलिस ने एंटर नहीं होने दिया और उसके बाद वो चले गए तो क्या उनकी कोशिश पूरी हो गई मैं उनके बारे में कुछ कहना नहीं चाहती क्योंकि आजम साहब जब जेल गए थे तो उनके यह अल्फाज थे कि वो जेल नहीं गए हैं बल्कि सुधार गृह में गए ये उन्होंने कहा था उन्होंने कहा कि वो सुधार गृह में गए ये उनके मतलब एहसासात थे। इसलिए मैं उनके बारे में तो कुछ कहना ही नहीं चाहती। तो जिस सुधार गृह की वो बात कर रहे हैं उसकी अगर मैं आपसे बात करना चाहूं लोगों को ये लगता है कि जब एक पॉलिटिशियन जेल में जाता है तो उसके पास शायद तमाम आजाइशें होती हैं। दिखाया जाता है कि जेल में है लेकिन अंदर उनको तमाम फैसिलिटीज मिल रही होंगी। अच्छा खाना भी हो सकता है मिल रहा हो। कूलर और एसी हो सकता है हो। बेड बेड वहां पड़ा हो। इस तरह की एक इमेज जाती है। मैं आपसे कह रही हूं एक तरह की एक इमेज जाती है कि भाई इतना बड़ा लीडर रहा है तो इतना सब कुछ तो वहां पर हो सकता है कि मिल ही रहा हो। आप मुझे बताएं कि आप जिस कंडीशन में रही और आजम खान साहब और अब्दुल्ला जिस कंडीशन में हैं उसके बारे में आप अगर कुछ बता कंडीशन तो मैं आपको बिल्कुल शुरू से बता रही हूं कि जब पहले दिन अरेस्ट हुए और वो चले गए जेल के अंदर तो उनका सामान बाहर ही था तो उनका सामान ले जाने के लिए शायद फरहान भी थे और भी कुछ लोग गए हैं जेल के बाहर कि हम इनका सामान पहुंचा दे तो मैं आपको यह बता रही हूं कि आजम साहब को अरेस्ट करने के पीछे एक तो उन्हें अरेस्ट छोड़ना था, जेल जाना था। उन्हें अपमानित करने का भी एक तरह से इरादा था। तो इन लोगों से कहा कि यह सामान ऐसे नहीं जाएगा। इस सामान को आप लोग या तो चादर में बांध लीजिए या किसी और थैलेव में अटैची अंदर नहीं जाएगी। तो हां यही होता था पहले भी मतलब कैदियों के साथ के सामान की तलाशी ली जाती थी और सामान अंदर भेज देते थे। ये थोड़ी करते थे कि जैसे बिल्कुल थैलों में भर के सामान बेचते हैं। सिर्फ थैलों में सामान गया। अभी नहीं सामान नहीं गया। आजम साहब अंदर से अड़ गए। उन्होंने कहा कि कुछ नहीं होगा ना खाना ना पीना ना कोई चीज जब तक कि हमारा सामान अंदर नहीं आता और हमारा सामान अंदर जाओ। तो अभी उनके पास कोई बेड है जमीन पे सोते हैं। नहीं बेड नहीं है। वो जमीन में सोते हैं और जमीन में भी इतने मच्छर काटते हैं। इतनी बता नहीं सकती हूं मैं कि इतनी कितनी तकलीफें हैं उन्हें। उसने बैठने में ही बहुत तकलीफें हैं। जाहिर सी बात है उम्र भी उनकी हो गई है। जी जी और उन्हें वहां वो सीट भी नहीं लगी हुई थी वाशरूम में ऊपर बैठकर इंग्लिश सीट नहीं लगी हुई थी। फिर वो अपने पास से लगवाई अपनी तरफ से लगवाई। तो जैसे अभी इतनी गर्मी है, शदीद गर्मी है तो वहां कूलर वगैरह का कोई इंतजाम कोई चीज कोई इंतजाम नहीं। कोई इंतजाम तो क्या आपको लगता है ये एक मैसेज है? यह मैसेज है कि हम आपके जिस नेता को आप यह सोचते थे खास मुसलमानों के हवाले से मैं बात कर रही हूं कि जिस नेता को आप यह सोचते थे कि देखिए आपका बहुत कद्दावर नेता जो टॉप पोजीशन पर रहा उत्तर प्रदेश में जिनकी एक वक्त में तूफी बोला करती थी लोग उसको एोगेंस भी बोलते थे उनके साथ हम ऐसा हश्र करेंगे ताकि कोई और बोलने के काबिल ना रहे। क्या आपको लगता है ये भी एक मैसेजिंग है इसमें? यकीनान रामपुर में तो यही मैसेज गया है। हमारे शहर में तो यही मैसेज गया है। जिस शहर में आजम साहब ने कितना एक तरह से विकास का कार्य करवाया है। यहां कॉलोनीज बनवाई हैं गरीबों के लिए जिसमें 8आ 10 हजार लोग रहते हैं और पानी की इतनी टंकियां बनवा दी है कि 100 साल तक भी यहां पानी की कमी नहीं रहेगी और तमाम रोड तो सड़कें तो आपने देखी ही है जैसी बनी हुई है। इसके अलावा उन्होंने हॉस्पिटल और इतनी हर चीज तारा मंडल यहीं पर है। बिलकुल करीब ही वह सब बनवाया है। इतना सब कुछ करवाने के बावजूद भी इस शहर में वो मतलब एक तरह से मुखालिफत नहीं हुई सरकार की जैसे कि होनी चाहिए थी। ये भी कहा जाता है कि देखिए जब वो अपने उूज पर थे तो वो किसी को अपने आगे समझते नहीं थे। वो बहुत एोगेंट थे। उन्होंने उस तरह से काम नहीं किया। ये तमाम इल्जाम लगते हैं और फिर लोग कहते हैं कि शायद उसकी भी कुछ सजा वो भुगत रहे हैं। क्या जवाब आप इसका देंगे? देखिए उन्होंने काम नहीं किया यह तो कोई कह ही नहीं सकता। काम करने के में तो उन्होंने अपनी फैमिली को तक को नजरअंदाज कर दिया था। उन्होंने जितना यहां विकास कार्य करवाया शायद अगर वह ना करवाते यह विकास कार्य और जैसे और एमएलए और एमपीज के यहां काम होते हैं वैसा ही काम करते तो शायद आज यह दिन भी ना होता कि आप क्यों पढ़ा रहे हैं लोगों को? क्यों पढ़ाना चाहते हैं? सवाल यह है कि आप क्यों पढ़ाना चाहते हैं? आप क्यों ये सड़कें बनवा रहे हैं? आप क्यों पानी का इंतजाम कर रहे हैं? आप तो वैसे रहिए जैसे सब रहते हैं। क्या आजम खान साहब की ये सिचुएशन पार्टी को भी सूट करती है? क्योंकि अगर वह होते तो उनका अपना एक रुतबा होता। अह जो लोग मुलायम सिंह के साथ रहे मैंने देखा चाहे शिवपाल यादव की बात करें, आजम खान साहब की बात करें या उस दौर के जो लगभग तमाम नेता रहे वो अभी या आजम खान साहब तो जेल में हैं। बाकी कोई छोड़कर चला गया है। कोई साइड लाइन हो गया है। तो आपको लग रहा है मौजूदा जो लीडरशिप है टॉप लीडरशिप समाजवादी पार्टी के और मैं सीधा बोलूंगी मैं अखिलेश यादव और टेंपल यादव और दूसरे जो नेता हैं जिनकी चलती है उनकी मैं बात कर रही हूं। तो क्या उनको ये सूट करता है फिलहाल? क्योंकि वो होते तो उनको वो पोजीशन वो तमाम चीजें उन्हें देनी होती क्योंकि आजम खान साहब ऐसे लीडर तो है नहीं कि वो चुप होकर बैठ जाते कि ठीक है जो आपने दे दिया वो वो हम ले रहे हैं। देखिए उन्होंने खुद कभी किसी से कुछ मांगा नहीं इस पार्टी लीडरशिप से ना आज ना पहले ना जब माननीय मुलायम सिंह यादव जी थे तब भी उन्होंने कुछ नहीं मांगा और अब भी कुछ नहीं मांगा है। आज जो कुछ भी हो वह है वह अपने काम की वजह से अपनी ईमानदारी की वजह से और जो उन्होंने जनता के लिए काम किए हैं उनकी वजह से जो कुछ भी उनका मतलब कद है आज वो इसी वजह से दो तीन दो मेरे साथ से आखरी सवाल क्या जो सियासी पूरी आपकी एक लेगसी थी कि आजम खान साहब फिर अब्दुल्ला आजम हमने देखा कि वो भी एमएलए बने क्या उसको पूरी तरीके से खत्म कर दिया गया है अब आपको लग रहा है कि अब आपकी बस ये ख्वाहिश है कि आपके शौहर आपका बेटा है जेल से छूट कर आ जाए और वो घर में सुकून आराम से रह रहे हैं। क्या बस यह ख्वाहिश रह गई है या या कुछ और आप सोचती हैं इसके बारे में? नहीं वो यकीनन यूनिवर्सिटी को भी देखेंगे। घर में सुकून से तो बैठने वाले नहीं है। जिस यूनिवर्सिटी के लिए उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी। उस यूनिवर्सिटी के मतलब एक तरह से फ्यूचर के लिए वो जरूर कोशिश करेंगे, मेहनत भी करेंगे। बहुत-ब शुक्रिया आपका बात करने के लिए। बहुत शुक्रिया।
Companion article
On a scorching week in Rampur, western Uttar Pradesh, a campus that took a decade of donated bricks, cement and labour to raise now sits under a demolition order. The Rampur Development Authority has told Mohammad Ali Jauhar University, founded by the veteran Samajwadi Party leader Azam Khan, that 38 of its 40 buildings are unauthorised construction. The notice gives the university fifteen days to tear the buildings down itself; if it does not, the authority says it will demolish them anyway and bill the institution for the cost of its own destruction.
Speaking at Azam Khan's Rampur residence, his wife Dr. Tazeen Fatma — a former Rajya Sabha member and MLA who has herself spent roughly eighteen months in jail across two separate terms, and who is now 77 — laid out what she believes lies behind both the notice and the run of prosecutions that have kept her husband and son cycling in and out of custody for years. The demolition threat, she argues, cannot be separated from an arrest four years ago that she says was designed less to secure a conviction than to humiliate a man the state could not otherwise diminish.
Fatma says her first reaction to the fifteen-day notice was disbelief, not because the threat seemed implausible but because she could not accept that something built, in her words, with complete honesty could be erased. That conviction, she says, rests on faith as much as on paperwork: the university and its 3,000-plus students had no reason to fear demolition because nothing about its construction was concealed.
She rejects the suggestion, aired by critics, that the university was effectively built with state money after a change in legislation gave it minority status. The institution, she says, is open to everyone, not reserved for Muslims or for the Khan family, and no relative of Azam Khan draws a salary from it. Funding came from donations — chanda — collected door to door, including, she stresses, from Hindu and Sikh residents of Rampur alongside Muslim ones. "These children gave their own blood and sweat too," Fatma said of the students who, she recalls, laid bricks and mixed cement themselves under a blazing sun during construction, a form of volunteer labour she describes as kar seva.
She extends the same argument to a linked controversy: Rampur Public School, a set of CBSE-affiliated schools the trust ran in restored government buildings under an earlier cabinet order. Those schools, she says, charged the children of daily-wage and beedi workers a nominal fee — twenty rupees a month — and were later reclaimed by the state after the cabinet decision that had allowed the trust to use the buildings was simply reversed, displacing students in the process.
When Azam Khan was first jailed, he told supporters he had not gone to a jail but to a sudhar grih — a reform home. Fatma declines to interpret the remark for him. But asked directly what she believes his 2019 arrest was meant to achieve, beyond a prosecution, she is unambiguous. "There was also, in a way, an intent to humiliate him," she said.
She points to what happened on the day of that first arrest as evidence. His belongings were left outside the jail because officials would not allow a suitcase inside; supporters, including a man named Farhan, were told the bags would have to be tied in a cloth bundle or a sack instead. Azam Khan, she says, refused food and water inside until his own luggage was let in on his terms — a small standoff, in her telling, over dignity rather than possessions.
Fatma pushes back hard against an assumption she says circulates widely: that a politician of Azam Khan's stature receives quiet privileges in custody — good food, a cooler, air conditioning, a proper bed. None of that, she says, describes the reality. He sleeps on the floor because there is no bed. Mosquitoes are a constant torment. Even sitting has become physically difficult given his age. The cell had no Western-style toilet seat when he arrived; one was eventually installed at his own expense. In the middle of a brutal Rampur summer, she says flatly, there is no cooler and no arrangement for the heat at all — "no arrangement, none at all," she repeated.
Access to him is tightly limited. Family visits are capped at four a month, with no more than three visitors at a time, and Fatma says she herself goes rarely, leaving those slots to people managing his ongoing court cases who can brief him on developments. She sent the demolition notice in for him to read but had not discussed it with him further by the time of this interview — roughly ten days since her last visit.
Fatma situates the university's notice inside what she calls a broader bulldozer politics that has swept Uttar Pradesh since the Yogi Adityanath government took office — mosques a century old and ordinary homes demolished, she says, on the state's own unilateral say-so. She calls it an attempt to reshape the structure of the country and to crush the constitution rather than uphold it, invoking recent images of students beaten with batons and bloodied at protests near Delhi's Jantar Mantar. "This is not democracy," she said of a government she accuses of turning force against its own citizens.
She also addresses a theory circulating locally: that the target is not the buildings but the name. The university honours Maulana Mohammad Ali Jauhar, a freedom fighter who once said he would not want to be buried in a still-colonised India. If the demolition is in fact aimed at erasing that name, Fatma says, it is more shameful still — an attack on a freedom fighter's memory carried out under the pretext of a planning dispute.
Pressed repeatedly on the Samajwadi Party's senior leadership, Fatma's frustration surfaces despite her initial reluctance to voice it. She notes that Akhilesh Yadav and Dimple Yadav have been highly visible on other causes, in Delhi and in Parliament, while remaining largely absent from Rampur through years of her husband's and son's imprisonment and now through the university crisis. Asked whether she resents this, she first deflects — "those are questions for the party's MPs and MLAs" — before conceding that she has felt the same absence before, on other occasions.
She declines to comment specifically on Rampur's own Samajwadi Party MP, who was reportedly turned back by police at the university gate and left without pressing further, tying her silence back to her husband's own reticence about the phrase sudhar grih. She notes that other party MPs and MLAs are expected to join a sit-in the following day, and that Akhilesh Yadav himself is expected to visit — eventually. The delay, set against his swift appearances elsewhere, draws a pointed, half-sardonic aside from Fatma: perhaps, she suggests, his ambitions now lie beyond the Uttar Pradesh chief ministership, toward national politics. She is careful, though, to separate the leadership's visibility problem from the party's rank and file, who she says have largely stood by the family even if that support does not always show.
Fatma's closing note returns to the register she opened with: faith that a project built honestly will not, in the end, be torn down, and to the resolve of the students themselves, who she says have vowed to fight until the last moment for a campus many of them helped build with their own hands. Asked whether her only remaining wish is a quiet family reunion — her husband and son home, and life returning to normal — she says no. Once free, she does not expect Azam Khan to rest. She expects him to return immediately to defending the university's future, the project to which she says he has given his entire life.
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11:27Following the demolition of the mosque inside the Saharanpur Collectorate, Saharanpur MP Imran Masood discusses the legal battle surrounding the site, the documents cited by the mosque committee, and the questions being raised over the demolition process.
11:27Following the demolition of the mosque inside the Saharanpur Collectorate, Saharanpur MP Imran Masood discusses the legal battle surrounding the site, the documents cited by the mosque committee, and the questions being raised over the demolition process.
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