Nous Podcast· 05 Jun 2026· 1:11:56

Five Years After Covid: Jyoti Yadav on Migrants, Grief and State Failure

Journalist Jyoti Yadav joins Asad Ashraf for a compelling conversation on Faith and Fury, a deeply human account of India’s pandemic years. The book traces the journeys of migrant workers forced to walk hundreds of kilometers, the uncounted deaths that slipped through official records, and the im…

Full Transcript

किताब का जो आपका टाइटल है वो फेथ एंड फ्यूरी दोनों की बात करता है। तो किस तरह के फेथ की बात कर रही हैं और आप किस तरह के थ्यूरी की बात कर रही हैं? क्योंकि फ्रंटाइन वर्कर जब कोविड की हिस्ट्री लिखी जाएगी तो आप कहेंगे कि डॉक्टर्स ने बहुत अच्छा काम किया। वो कर रहे थे। एक सेल्फलेस सर्विस थी बट डॉक्टर्स की जो कास्ट क्लास लोकेशन है वो अलग एक ग्रुप है। हु गेट्स टू रिटन एज अ हीरो इज आल्सो यू नो सम हाउ लिंक्ड टू हु यू आर। एक ऐसे हालात में रहना कि आप किसी की मदद नहीं कर सकते हो। वो गिल्ट मुझे लगता है काफी स्ट्रांग होता होगा। 2019 में जब मैंने उनकी लाइफ देखी दे वर स्टिल अर्निंग ₹500 और आज जब मैं उनकी देख रही हूं गुजरात में वो सूरत में तो दे आर स्टिल अर्निंग ₹500 यू वर आल्सो अ वुमेन राइट एंड यू आल्सो शेयरर्ड एक्सपीरियंसेस ऑफ़ बीइंग अ वुमेन व्हाइल रिपोर्टिंग। फिर यह भी पता चला कि सरकार जो अंडर काउंटिंग कर रही है वो क्यों कर रही है? क्योंकि ऐसे पेशेंट थे जो अस्पताल पहुंचे ही नहीं थे। जिनकी कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट उनके मरने के बाद आई। कोविड जिहाद जैसे शब्द का भी इस्तेमाल किया गया था। तो आपको इस रिपोर्टिंग एक्सपीरियंस के दौरान ऐसा कुछ लगा? यू आर अ यंग रिपोर्टर। यू वांट टू प्रूव टू योर एडिटर्स टू योर कलीग्स इन द न्यूज़ रूम दैट यू आर कैपेबल ऑफ डूइंग इट। डिस्पाइट बीइंग अ वूमेन डेस्पाइट बीइंग हैरेस्ड। क्या ऐसी तैयारियां की है कि अगर वो सिचुएशन दोबारा से रिपीट हुई तो उसका मैनेजमेंट बेहतर हो पाएगा। किसी और कास्ट या क्लास के लोगों लोग करते इस तरह का काम तो उनको उनके काम को हम लोग कितना एकनॉलेज करते हैं एज अ सोसाइटी जो कि हम डोम समुदाय का काम को हमने नहीं किया। हेलो सलाम आदाब नाउस नेटवर्क के इस पॉडकास्ट में आप सबका खैरमकदम है। आज की गुफ्तगू सिर्फ एक किताब के बारे में नहीं है। यह उस दौर की याद है जहां पूरा मुल्क एक साथ डर, तनहाई, गुस्सा और उम्मीद के बीच जी रहा था। फेथ एंड फ्यूरी असल में कोविड की उस हिंदुस्तान की दास्तान है जो हेडलाइंस के नीचे दबी रह गई। मजदूर जो पैदल घर लौट रहे थे वो परिवार जो अस्पतालों के बाहर इंतजार करता रहा। आशा वर्कर्स जो सिस्टम को संभालने की कोशिश करती रही और वो लोग जिनके दुख को कभी ठीक से रिकॉर्ड ही नहीं किया गया। इस इंटरव्यू में हम पत्रकार ज्योति यादव से सिर्फ रिपोर्टिंग के तजुर्बे नहीं बल्कि याद, जिम्मेदारी, कास्ट, स्टेट फेलियर और जर्नलिज्म के मायने समझने की कोशिश करेंगे। ज्योति बहुत-बहुत शुक्रिया कि आपने हमें टाइम दिया और अपनी बहुत इंपॉर्टेंट किताब जो आपने लिखी है फेथ एंड थ्योरी जिसमें आपने अपने रिपोर्टिंग एक्सपीरियंस को डॉक्यूमेंट किया है कोविड के दौरान जब आप एक ऑर्गेनाइजेशन के लिए रिपोर्ट कर रही थी। इस बुक को आने में 5 साल लगे और 20202 का ये एक्सपीरियंस है आपका। वो आपको किस वक्त लगा कि इस रिपोर्टिंग एक्सपीरियंस को आपको किताब में कन्वर्ट करना चाहिए। जी पहले तो बहुत-बहुत शुक्रिया मेरी किताब के बारे में बात करने के लिए। ये किताब एक्चुअली बहुत पहले ही इसके बारे में सोचा गया था। जब पहली वेव आई थी जब मजदूर वापस अपने गांव में यूपी और बिहार में गए थे। तभी इस पर हमने काम करना शुरू किया था। तो जो वेस्टलैंड प्रकाशन है उन्होंने कहा था कि आपके अनुभव हम छापना चाहेंगे। लेकिन फिर उससे पहले ही जो है दूसरी वेव अगर कुछ किताब बढ़ पाती उससे पहले ही दूसरी वेव और उसी टाइमलाइन के आसपास मार्च अप्रैल मई में उसी तरह का फिर से हमें देखने को मिला तो फिर वो डिले होता चला गया। फिर 21 में आनी चाहिए थी। 21 में नहीं तो 22 में आनी चाहिए थी। लेकिन हम धीरे-धीरे उन्हीं शहरों में और उन्हीं लोगों से जुड़े रहे। यह देखने के लिए कि जो कोरोना है उन उसका उनकी लाइफ पर क्या इंपैक्ट पड़ा। क्योंकि उस वक्त अगर किसी के घर में कोई कोविड विक्टिम था या कोई मजदूर वापस आए थे तो उनकी लाइफ में क्या हो रहा था? तो ठीक-ठाक तीन-चार साल का समय दिया। लास्ट मैंने फॉलो अप उनकी लाइफ पर उन सबकीिंदगियों पर 204 में किया था और उसके बाद फिर 25 में एडिटिंग भी और 26 में ये किताब आ गई। बट इट शुड मतलब ये पहले ही इस पर काम चल रहा था। लेकिन राइट? एक तो आपने पहले यह डिसाइड किया था कि आपको इसको किताब के फॉर्म में लाना है। आई थिंक यह बहुत इंपॉर्टेंट डॉक्यूमेंटेशन है क्योंकि जिस तरह के हालात देश ने उस वक्त देखे थे और जिस तरह का माहौल देखा था उसके हिसाब से डॉक्यूमेंटेशन होना किताब की शक्ल में आई थिंक दिस इज अ वेरी एक दिस इज अ वेरीेंट वर्क दैट यू हैव डन और लेकिन ज्योति मैं यह भी समझने की कोशिश करूंगा कि किताब का जो आपका टाइटल है वो फेथ एंड फ्यूरी दोनों की बात करता है। इट टॉक्स अबाउट फेथ एंड इट टॉक्स अबाउट फ्यूरी आल्सो। तो किस तरह के फेथ की बात कर रही हैं और आप किस तरह के फ्यूरी की बात कर रही हैं? फॉर एन एग्जांपल किसी के लिए साइकिल फेथ बन जाता है कि वो साइकिल के जरिए लोगों को एक दूसरे एक दूसरे जगह से अपने गांव को ले जाता है। शहरों से अपने गांव में ले जाता है। एट द सेम टाइम शायद वो लोग फ्यूरियस भी हैं। आप ज्यादा अच्छे से इस पे रोशनी डाल पाएंगी। तो आप कैसे इसको डिस्क्राइब करती हैं? नहीं आपने बहुत अच्छा एक उदाहरण उससे किताब से लिया है क्योंकि जो बहुत सारे मजदूर थे तो जब हम जा रहे थे दिल्ली से क्रॉस करके तो हमें रामपुर से पहले एक बस डिपो था वहां पर कम से कम नहीं तो 500 से 1000 साइकिलें ऐसे ही पड़ी हुई थी। लेकिन कुछ मजदूर ऐसे थे जो बसों में भी और ट्रक्स में भी अपनी साइकिल को वो नहीं छोड़ रहे थे। एक तो यह भी था कि एक जो मजदूर क्लास है जो वर्किंग क्लास है उसके पास साइकिल ही उसका इकलौता साथी है जो मोबिलिटी में उनके काम आता है तो वो फेथ तो था ही कि ये साइकिल उनको घर पहुंचा ही देगी तो उन्होंने अबेंडन नहीं किया अपनी साइकिलों को लेकिन अगर पूरे लार्जर नैरेटिव की बात करें तो एक दूसरे में अब बहुत पैराडॉक्सिकल भी है ये बात जब मैं कह रही हूं तो कि ह्यूमैनिटी में जो फेथ होता है जैसे आप देखेंगे कि गोपालगंज में जो यूपी बिहार का जो एकदम बॉर्डर है जहां पे एक यहां के मजदूर वहां एंट्री कर रहे थे तो वहां पर लंगर लगे हुए थे। वहां पर जो लंगर लगे हुए थे वहां हमें एक महिला मिली थी कोरोना की पहली वेव में तो वो खुद राशन पर आश्रित थी। सरकार के राशन पर आश्रित थी। तो वो भी अपने घर से कंट्रीब्यूट करने आई उस उस लंगर में कि जो मजदूर जा रहे हैं उनको खाना दिया जा सके। तो ये फेथ नहीं तो और क्या इसे कहा जाएगा? ऐसे ही जब हम रामपुर बरेली में हैं तो मजदूर क्योंकि हाईवे पर उनको पुलिस मिल रही थी नाकाबंदी थी तो उनको वापस 2530 किमी पीछे छोड़ दिया जाता था तो उनको फिर से वो दूरी तय करनी होती थी तो जो गांव के लोग थे जो किसान थे वो लोग उनको छाछ और पानी वो सब प्रोवाइड कर रहे थे अपने खेतों से उनको निकलने दे रहे थे तो हमने इस तरह के बहुत सारे उदाहरण देखे जब एक जब सरकार का पूरा जो सिस्टम कोलैप्स हो रहा था तो फेलो ह्यूमन बीइंग आपकी मदद कर मदद कर रहा था। तो क्राइसिस में हमें इतनी इससे उम्मीद भी बहुत मिली। एज अ रिपोर्टर एज अ ह्यूमन बीइंग हम भी उस चीज से बहुत वी वर मूव्ड। बट फ्यूरियस जब हम फ्यूरी की बात करते हैं वो थ्रूउ आपको दोनों जो प्रोलोंग वेव्स रही थ्रूउ आपको हर हर क्लास में आपको बेरिंग वन क्लास जो कि एक रूलिंग या इलिट क्लास है उसकी उसमें अगर नहीं नजर आती है। लेकिन अह फिर जो मिडिल क्लास से लेके लोअर मिडिल क्लास और जो वर्किंग क्लास है सब में आपको फ्यूरी दिखी होगी। चाहे वो ऑक्सीजन के क्राइसिस हो, चाहे उनको मजदूरों को निकलना पड़ा हो। श्रमिक ट्रेंस में हमें लगता है कि उन्होंने बहुत अच्छे से मैनेज कर लिया होगा। लेकिन आप पाएंगे कि एक पंजाब का एक फैमिली जो आया है उनको 4 घंटे का शॉर्ट नोटिस मिला और वो 4 घंटे में कितनी दूर से अपना सामान ड्रैग करते हुए 12 13 घंटे की जर्नी बिना पानी बिना खाने के वो उन्होंने निकाला और यह महीना ऐसा ही महीना था जब हीट वेव्स चल रही थी। गर्मी अपने चरम पे थी। तो हर आदमी के अंदर हमें वो जो फ्यूरी की जो बात कर रहे हैं वो नजर आया। तो आई थिंक ये किताब इसलिए फेथ एंड फ्यूरी इस वजह से हमें मोस्ट एप्रोप्रियट लगा और हमने कोविड को फिर इसके सबटाइटल में रखा क्योंकि मेरे पब्लिशर्स का भी ये मानना था कि क्योंकि किताब इतने साल बाद आ रही है। तो लेट्स नॉट हैव कोविड इन द टाइटल। क्योंकि हर जगह से मुझे सुनने को मिल रहा था कि कि कोरोना के बारे में कोई जानना नहीं चाहता। इट्स रिटन टू डेथ। इट्स डन टू डेथ। लेट्स नॉट टॉक अबाउट कोविड। मुझे लगा कि कहीं ना कहीं फटीग है तो ठीक है। फेथ लेट्स मतलब स्टिक टू फेथ एंड थ्योरी व्हिच वास द मोस्ट एप्रोप्रियट टाइटल फॉर द बुक। ओके ज्योति मेरा अगला सवाल आपसे यह है कि किताब में आपने यह कहा है और रिपोर्टिंग में भी बार-बार यह सामने आ रहा था कि जो एग्जोडस था माइग्रेंट्स का, माइग्रेंट वर्कर्स का वो कहीं ना कहीं स्टेट का फेलियर था। जो गवर्नमेंट मशीनरी है उसका फेलियर था और 5 साल हो गए हैं। आपको लगता है कि अभी तक गवर्नमेंट की कोई अकाउंटेबिलिटी है उस फेलियर को लेकर या एक कलेक्टिवली सब कुछ भूला जा चुका है समाज में। सब कुछ भूला जा चुका है गवर्नमेंट के स्तर पे। आपको लगता है कि पीपल हु लॉस्ट देयर लाइफ्स हैव बीन कंपनसेेटेड एडिक्वेटली। उनको कंपनसेशन मिला है नहीं मिला है या गवर्नमेंट जो है अपने आप को अकाउंटेबल मानती है आज के दौर में उस फेलियर के लिए या दे हैव कलेक्टिवली फॉरगॉटन इट कंप्लीटली जी क्योंकि हम माइग्रेंट्स की बात कर रहे हैं तो जो माइग्रेंट्स थे वो सबसे ज्यादा दे दे वर मोस्ट अफेक्टेड इन द फर्स्ट वेव उनका पूरा लाइवलीहुड उससे डिसरप्ट हुआ उनको एक लॉन्ग जर्नी अपने घर तक करनी पड़ी एंड इन द फॉलोइंग इयर्स उनकी जो उनका जो डिसरप्शन है वो कंटिन्यू रहा। आपको मैं एक उदाहरण मतलब साइड करना चाहूंगी। बबलू पासवान है वो मधुबनी जिले के एकदम और रिमोट विलेज में रहते हैं। इंडियन नेपाल बॉर्डर पर उनका गांव है। तो कोरोना में की पहली वेव में वो वापस लौटे और वही ट्रक में 4000 भाड़ा देकर एक दिन एक रात पैदल चले और आकर उनको क्वारेंटाइन में कर स्कूल में उनको क्वारेंटाइन कर दिया। जो सरकारी स्कूल थे वही क्वारेंटाइन सेंटर बन गए और फिर उनके पिछले चारप साल की जो लाइफ है वो पूरी डिसरप्शन से भरी रही है। वो पहले से ज्यादा गरीब हो गए हैं। उनके ऊपर बहुत ज्यादा कोरोना के काल का जो कर्जा है वो अभी तक उतर नहीं रहा है। फिर अभी जब गैस के क्राइसिस हुए कुकिंग गैस के तो वो फिर से जॉबलेस वो हो गए और अगेन उनको वही ट्रेनों में जैसे अभी लोग एकदम भेड़ बकरियों की तरह जैसे भरे जाते हैं उस तरह से वो उसी उसी तरह की एक जर्नी को एंडोर करते हुए फिर से घर आए। तो उनकी अगर हम लाइफ देखें तो जो आपने कहा कि क्या कोई अकाउंटेबिलिटी तय हुई या फिर हमने कुछ कुछ स्टेप्स लिए। सो आई वास वर्किंग ऑन ह स्टोरी एंड आई वास जस्ट चेकिंग वि द लेबर डिपार्टमेंट कि किसी यूपी या बिहार किसी भी स्टेट के पास। क्या उनके पास उन्होंने ये इंटरनल डेटा कलेक्ट किया आफ्टर द फर्स्ट वेव कि उनके कितने मजदूर बाहर गए हैं? क्या हमारे पास इस तरह का कोई लिविंग डॉक्यूमेंट या इस तरह के स्टैटिस्टिक्स हैं कि हम बता सकें कि कोरोना के बाद इतने लोग बाहर गए या वापस आए। बिना किसी एक सॉलिड डेटा सेट के आप किस तरह की पॉलिसीज को फ्रेम करेंगे या किस तरह से जो योजनाएं आप बनाएंगे वो मुझे बड़ा लैक ऑफ स्टैटिस्टिक्स दिखा। अनरिलायबल स्टैटिस्टिक्स। सो मैं उस पंचायत से तो पूछ सकती हूं कि आपके यहां 80% माइग्रेशन है। बट व्हेन इट कम्स टू द स्टेट एंड देयर रिस्पांसिबिलिटी। आई डोंट थिंक दे हैव लर्न एनी लेसन एंड दे हैव वर्क्ड ऑन फर्स्ट गैदरिंग डेटा जो कि बहुत उनके लिए तो बहुत आसान चीज होती है। अगर एक पत्रकार एक पंचायत से कलेक्ट करके ला सकता है तो दे हैव द मशीनरी एंड द मीन्स वो कर सकते हैं। लेकिन उनके पास किसी भी विभाग के पास आप जाएंगे आप यूपी में जाएं जहां जहां सबसे ज्यादा दो सबसे बड़े ये स्टेट्स हैं जो बाहर माइग्रेंट्स को भेजते हैं। बट अनरिलायबल स्टैटिस्टिक्स से रिपोर्टिंग तो प्रभावित होती ही है। लेकिन इन लोगों के लाइवलीहुड भी प्रभावित होते हैं जो मजदूर हैं उन उनके तो मैंने यह भी देखा कि उनकी जो मजदूरी थी वो कोरोना 2019 में जब मैंने उनकी लाइफ देखी दे वर स्टिल अर्निंग ₹500 डेली और आज जब मैं उनकी देख रही हूं गुजरात में वो सूरत में प्लाईवुड में अगर सिर्फ लोडिंग का काम कर रहे हैं तो दे आर स्टिल अर्निंग ₹500 और 2019 से लेके 2026 तक आप देखेंगे कि महंगाई कितनी बढ़ गई है तो इस तरह तरह की जो इन्वेस्टिगेशंस स्टेट को करनी चाहिए थी मुझे तो ग्राउंड पर नजर नहीं आई क्योंकि मैं फॉलोइंग इयर्स में क्योंकि किताब का एक हमारा एक इंटेंशन यही था कि देखना कि कोविड ने किन तरीकों से हमारी पॉलिसी स्टेट हमारी लाइफ्स को प्रभावित किया। सो अगर अगर आप माइग्रेंट एग्जोडस और उनकी लाइफ्स की बात करें तो देयर हैज़ नॉट बीन एनी चेंज पॉजिटिव चेंज इन देयर लाइफ्स। राइट ज्योति यू टॉकड अबाउट डाटा एंड यू मेंशंड दट द गवर्नमेंट वास नॉट रेडी टू अ वेलिंग टू प्रोवाइड एक्यूरेट डेटा द ऑफिशियल्स वेर नॉट विलिंग टू पॉप प्रोवाइड एक्यूरेट डेटा वन कैन अंडरस्टैंड द रीज़न्स बिहाइंड इट वन कैन अंडरस्टैंड दैट देयर वाज़ एक्यूट एक्यूट प्रेशर द गवर्नमेंट टू हाइड फैक्ट्स हाइड नंबर्स बट देन आई हैव आल्सो अह कम टू रियलाइज़ व्हाइल रीडिंग योर बुक दैट आपने कई बार अह डेड बॉडीज को काउंट करने की कोशिश की और फ्यूनरल्स को काउंट करने की कोशिश की। अह अह अह जहां-जहां फ्यूनरल्स हुए हैं, उसके बेसिस पे आपने नंबर्स पब्लिश किए। यह नंबर्स पब्लिश करना आपके लिए कितना चैलेंजिंग था उस वक्त? मतलब डू यू थिंक देयर वाज़ सम प्रेशर ऑन यू एस वेल? कि इस नंबर्स को पब्लिश ना करें या ऐसा कोई प्रेशर नहीं था आप पे एज अ जर्नलिस्ट कि इन नंबर्स को पब्लिश ना करें। और यू वर अलाउड टू डू दैट विदाउट एनी प्रेशर कमिंग फ्रॉम इदर योर ऑर्गेनाइजेशन और पीपल अबव इन द एडमिनिस्ट्रेशन या सरकार में बैठे लोग जी नहीं मतलब प्रिंट में जहां मैं काम करती थी वहां से उस तरह का प्रेशर बिल्कुल भी नहीं था। इनफैक्ट जब मैंने स्टोरी पिच की थी और जब इस तरह के विजुअल्स आने शुरू हो गए थे कि जिस तरह के मतलब फिगर्स हमारे हेल्थ बुलेटिन में आ रहे हैं वो शायद सही नहीं है क्योंकि हम जब एंबुलेंससेस जाते हुए देख रहे हैं और जब हमारे पास श्मशान घाट के जो विजुअल्स आ रहे हैं वो कुछ बहुत ही हॉरिफाइंग है। तो मैंने भी कहा कि जाकर देखते हैं। तो फिर मुझे कहा गया मेरे एडिटर ने कहा कि मतलब हाउ डू वी हाउ हाउ डू वी से दैट दीज़ मेनी पीपल हैव डाइड एंड देयर इज़ अ गैप। सो आपको गैप करने के लिए यू नीड टू हैव डाटा और वह जो डाटा था वही अनरिलायबल था। सो जो कमिश्नर जो नगर निगम के कमिश्नर होते हैं उनके पास एक अलग डाटा सेट है। हेल्थ बुलेटिन का अलग अलग डेटा सेट है। तो ये बहुत कंफ्यूजन भी क्रिएट करता है। तो उसको रियल गैप को एक तरह से एक्सपोज करने के लिए जरूरी था कि उस वक्त अगर आप एक या दो दिन या तीन दिन का आप डाटा गैदर कर लें मेजर श्मशान घाटों से और आप उसकी तुलना करें तो यू विल बी एबल टू हेल्ड समवन अकाउंटेबल विदाउट डेटा इट इज़ इजी टू डिसमिस अ रिपोर्ट बिकॉज़ मोस्टली आप लोगों के लिव्ड एक्सपीरियंसेस को कोट करेंगे फलाना नहीं कहा ढिमकाना नहीं कहा बट विदाउट स्टैटिस्टिक्स एंड प्रूफ आप कैसे कहेंगे कि अंडरकाउंटिंग हो रही है तो उसके लिए बहुत जरूरी था एंड इट वाज़ एक्चुअली वेरी वेरी चैलेंजिंग बिकॉज़ फर्स्टली एज अ वूमन कोरोना की पहली वेव में एक मैंने अंतिम संस्कार देखा था। लेकिन बरिंग दैट एक्सेप्शन मैंने कभी इस तरह से श्मशान घाट में मैं ना तो गई थी ना मैंने कभी अपनी पूरी लाइफ में अ क्या कहें उस तरह का अनुभव था ही नहीं तो बहुत कम अनुभव के साथ लेकिन मैं गई और यही वाला समय था जो हीट वेव वाला है तो क्योंकि वहां पे कोविड के पेशेंट भी आ रहे थे तो तीनचार चीजें हमने मैंने अपनी पर्सनल सेफ्टी के लिए रखा कि चार तीन लेयर ऑफ मास्क N95 भी लगा लिया सर्जिकल मास्क भी लगा लिया या फिर क्योंकि कहा गया कि बालों से भी कोरोना हो सकता है क्योंकि यह वायरस भी आप आप उस उस वक्त का याद हो तो हर वक्त कुछ ना कुछ नई चीज जुड़ती जाती थी कि नहीं ऐसे फैल रहा है ये इस इसको इस इस तरह से बचा जाए तो फिर मैं बैठी वहां पर और बहुत ही मतलब दर्दनाक सीन भी था और लोगों से पूछना भी कि आपके पेशेंट का क्या है? कोविड से डेथ हुआ है कि नहीं हुआ है? फिर वो बहुत ही एक तरह से मतलब अच्छा तो नहीं लगा था। वो एक्सपीरियंस बहुत खराब था। अच्छा एक्सपीरियंस तो नहीं था। बट फिर यह भी पता चला कि सरकार जो अंडर काउंटिंग कर रही है वो क्यों कर रही है। क्योंकि ऐसे पेशेंट थे जो अस्पताल पहुंचे ही नहीं थे। जिनकी कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट उनके मरने के बाद आई और सरकार जो डाटा हमें दिखा रही थी वो हॉस्पिटल्स में जो कोरोना से मरे थे उनका दिखा रही थी। तो ये इतना अपेरेंट हो गया कि जो अंडरकाउंटिंग है उसके रीजन भी उसी उसी श्मशान घाट की रिपोर्टिंग के दौरान ही सामने निकल कर आए कि ये अंडरकाउंटिंग किस हद तक की जा रही है और इसके मतलब कारण क्या है। अब सरकार जब आप सरकार से पूछेंगे जो कमिश्नर हैं या फिर जो इस तरह के डाटा गैदर करते हैं वो वो अपनी प्रॉब्लम्स बताएंगे कि हम किस तरह से करें। अब अब हम लैब से डाटा लें या जो होम आइसोलेशन में लोग हैं उनसे डाटा लें कि कैसे कलेक्ट करें। तो तो उस तरह का पूरा एक माहौल था। बट हमने छापा ये जो लखनऊ से मैंने ये अंडर काउंटिंग ऑफ डेड की स्टोरी छापी थी। एंड इट वास वन ऑफ द फर्स्ट स्टोरीज जिसमें हमने मतलब आंकड़े ही जो सामने थे निकाल कर ला दिए थे। एक तो मैं यह समझने की कोशिश करूंगा। कई बार आपकी किताब में कई इमोशनल मोमेंट्स हैं। एक मोमेंट ऐसा है जब आप यह कहती हैं कि आप एक गाड़ी में चल रही हैं और उस गाड़ी में जगह खाली है और कई सारे लोग आप देख रही हैं कि रोड पर चल रहे हैं। लेकिन बावजूद आप उसके आप कुछ मदद नहीं कर पा रही हैं। हालांकि वो जर्नलिस्ट का काम है भी नहीं। हम सब जर्नलिस्ट हैं और हमारा काम शायद रिलीफ का काम नहीं होता है। हम वहां पे कॉन्फ्लिक्टिंग आइडेंटिटीज में आ जाते हैं। हम एक इंसान भी हैं। लेकिन साथ-साथ हम एक पत्रकार भी हैं जो अपना काम कर रहे हैं। तो वहां पे उस गिल्ट को हाउ डू यू डील विद डू यू हैव दैट गिल्ट एंड हाउ डू यू डील विद दैट गिल्ट? नाउ? यू नो बिकॉज़ आई थिंक मेरे साथ भी पर्सनली जब कोविड का दौर था तो मेरे पिताजी का देहांत हुआ और बहुत सारी चीजें हुई और कई सारी चीजें मैंने देखी उस दौरान ऐसी देखी रोड पर लोगों को मरते देखा रोड पे लोगों को तड़प के मरते देखा तो आज तक उस ट्रॉमा को मैं लिव करता हूं। आज कई बार वो फ्लैशेस में आते हैं मेरे पास। इट कम्स बैक टू मी। बट यू वर मोर एक्टिव देन मी। आई वास मैं अपने पेरेंट्स को देख रहा था। आप रिपोर्ट कर रहे थे। आप सड़कों पर लोगों को देख रहे थे। आप सड़कों पे लोगों को पैदल चलते हुए देख रहे थे। और इस सिचुएशन में एक ऐसी हालात में एक ऐसे हालात में रहना कि आप किसी की मदद नहीं कर सकते हो। वो गिल्ट मुझे लगता है काफी स्ट्रांग होता होगा। आप क्या उसके बारे में थोड़ा हमें बताएंगी? जी। ये आप जिस मतलब वाक्य की बात कर रहे हैं वो हमारे साथ यूपी में जब हम लखनऊ क्रॉस करके जा रहे हैं तो वहां हुआ था और मतलब पूरा पूरा जो पूरी जो कोरोना फर्स्ट वेव का था उसमें हम हम लोग गाड़ी में थे हम लोग तीन लोग थे ड्राइवर थे मनीष जी और मेरे साथ मेरी कलीग बिस्म थी और हम थे और पीछे हमारे पूरा लगेज हमने एक बैक सीट में लगाया था तो मेरे बगल वाली जो सीट थी मैं पीछे बैठी थी उसमें थोड़ा हमने बिस्किट्स और कुछ हमारा जो किट था वीडियो किट था वो हमने रखा हुआ था लेकिन जैसे-जैसे आप उन मजदूरों को बाईपास कर रहे हैं आप देखिए बुजुर्ग लोग भी थे कुछ 60 साल के भी हैं बच्चे भी टोडलर्स भी थे दो-दो तीन-ती साल के बच्चे पिता ने यहां बिठाया हुआ है। महिलाओं ने ऐसे बोझा लिया हुआ है। तो जब हम उतर के उनसे पूछते थे तो वह बकायदा अपना सामान उतारते थे। जितने भी वो थके हो हमें बताते थे। हम पूछते थे आप कहां से आ रहे हो? कितने दिन आप रुके? आप क्यों निकल रहे हो? क्या आपकी जर्नी है? ये सारे सवाल एक कायदे से तो अगर वो नहीं भी बता मतलब दे कुड कुड हैव चोजन नोट टू स्पीक टू अस। बट उन सब ने अपनी पूरी मिजरी वो जो थी उनकी उस वक्त उन्होंने सबने पॉज किया। बहुत सारे लोगों ने बताया। लेकिन जैसे ही हम उनकी बात सुन के हम बैठते थे गाड़ी में और वो लोग मूव करते थे तो उनकी आंखें तो हमें घूरती थी और यह गिल्ट वाला ही मोमेंट होता था क्योंकि पत्रकार का काम इन गैदर करना और आपने दिल्ली भेज दिया वो तो है ही लेकिन एज अ ह्यूमन बीइंग आप देख रहे हो छोटा बच्चा है मास्क कपड़े के मास्क लगा के गर्मी से बचाने के लिए पेरेंट्स ने उनके अपर वाले क्लोथ हटा दिए थे तो बच्चे सिर्फ ऐसे चल रहे थे तो इमोशनल तो था ही और एक जगह आया भी जब एक एक ग्रुप ने हमसे कहा कि एक को तो बिठा लीजिए मतलब क्योंकि सिकनेस भी थी ना लोग बीमार भी पड़ रहे थे तो जैसेजैसे गाड़ी मूव करती थी वैसे-वैसे ही मैं और बिस्मि मतलब कई बार यू जस्ट ट्राई टू लुक अवे उधर देख लिया क्योंकि आप जैसे उनसे फिर कैसे नजरें मिलाएंगे और आपने बोला बात तो ठीक है कि ये तो पत्रकार का काम नहीं है और आप कितनों की मदद करते आपके पीछे एक समुद्र सा आ रहा है आपकी गाड़ी मूव कर रही है वो थ्रूउ ट्रिप रहा और अभी भी अब उनके चेहरे मतलब एक तरह से धूमिल हो गए हैं। मेमोरी में एकदम एकदम उभर के तो नहीं आ रहे हैं। बट एक कहीं ना कहीं मेमोरी में है। एंड सम हाउ मतलब आई थिंक वी हैव टक्ड अवे दैट मेमोरी समवेयर बट इट वाज़ ट्रोमेटिक एंड मोर मतलब मोर ट्रोमेटिक फॉर फॉर द माइग्रेंट्स। अगर हमें तो सिर्फ उसका इमोशनल बर्डन हुआ होगा। लेकिन आप उनकी जर्नी ज्यादा मुझे लगता है कि थी। सो हमने उसको अपने बारे में बनाना मतलब ठीक नहीं समझा। लेकिन ये बहुत उस तरह का रहा। हम सबके लिए ही रहा। ड्राइवर के लिए भी रहा, मनीष के लिए भी रहा। फिर हम आपस में बात भी करते थे कि अगर यह जो सीट है खाली हम किसको दे सकते हैं? कौन है जो सबसे ज्यादा नीडी है और आप देखेंगे कि हर आदमी ही नीडी है। किसी के पास बच्चा है, किसी के पास बीमार बुजुर्ग है तो चूज़ करना भी बहुत मुश्किल था। राइट? इट बिकम्स एक्सट्रीमली डिफिकल्ट कि आप एक सीट है। आप किसको बैठाएंगे और आप कैसे बैठाएंगे। अच्छा बैकग्राउंड में यह भी चल रहा था कि पत्रकारों पे आरोप भी लग सकता था कि यह कोरोना हमें भी तो कोरोना हो सकता था। तो ये जो उस वक्त अभी भी प्रोमिनेंटली होती है अगर कोई वही कोई कोई भी केस हो जाता उस वक्त था कि चिन्हित कर लिए गए थे लोग कि कौन-कौन है जो ग्राउंड पे अगर वो नेगेटिव जिस सो कॉल्ड नेगेटिव अगर रिपोर्टिंग कर रहे हैं तो उनको तो ये ट्रोलिंग हमेशा दिमाग में रहती थी कि हम किसी भी मजदूर के इतने पास ना जाए कि हमारा ही फोटो खींच के कोई कह दे कि इन्होंने ही कोरोना फैलाया हो तो यह बहुत ही डलेमा वाला भी चलता था। डलेमा था हमारे दिमाग में बहुत। इतना वोलेटाइल मोमेंट था वो कि उस वक्त मुझे लगता है कोई भी फैसला लेना बड़ा आसान फैसला नहीं होता होगा। और एज अ रिपोर्टर यू हैव मतलब आपके लिमिटेशंस हैं। शायद आप चाह के भी बहुत कुछ नहीं कर सकते हैं। कई बार हमें फील्ड पे जाते हैं। बहुत बुरा लगता है। लेकिन शायद हम कुछ कर नहीं सकते हैं। उसके बारे में राह दे हम लिख सकते हैं। उसके बारे में हम बोल सकते हैं। उसके अलावा हमको और आपने इस किताब को लिखा। मुझे लगता है उस जर्नी में एक बहुत इंपॉर्टेंट काम आपने किया। लेकिन ज्योति यू वर आल्सो अ वूमन राइट एंड यू आल्सो शेयरर्ड एक्सपीरियंसेस ऑफ़ बीइंग अ वुमेन व्हाइल रिपोर्टिंग। यू आल्सो शेयरर्ड दैट यू हैव कम अक्रॉस इंसिडेंसेस ऑफ़ सेक्सिज्म जहां पे आपको लोग एक अलग तरह से देख रहे थे। जहां पे आपके वुमेन होने पे एक दूसरे नजरिए से लोग आपको देखते थे। तो एक वुमेन के लिए इस माहौल में जहां पे कोई नहीं था जहां पर सड़कें सुनसान थी जहां पे लोग चले जा रहे थे फ्रस्ट्रेटेड थे एंगर थे एंगर एंगर था लोगों के अंदर सिस्टम को लेकर एंगर था अपनी जिंदगियों से लेके फ्रस्ट्रेशन था उस उस दौरान एक वुमेन के लिए वहां पे होना बहुत चैलेंजिंग अह सिचुएशन होगा अह क्या उसके बारे में थोड़ा आप हमें बताएंगे कि हाउ डिफिकल्ट वाज़ इट फॉर यू एज अ वुमेन टू बी ऑन देयर इन ऑन द ग्राउंड एट दैट पॉइंट ऑफ़ टाइम व्हाइल पीपल वर माइग्रेटिंग टुवर्ड्स देयर होम्स, देयर विलेजेस और बहुत रोश में माइग्रेट कर रहे थे। बहुत गुस्से में माइग्रेट कर रहे थे। बहुत दर्दनाक स्थिति में माइग्रेट कर रहे थे। मतलब ऑर्डिनरी टाइम्स में भी अगर आप एक अह फीमेल रिपोर्टर हैं। यू आर अ लोन अह फीमेल रिपोर्टर। इफ यू आर ट्रैवलिंग आफ्टर सनसेट और इफ आर ट्रैवलिंग ऑन अ डेजर्टेड अह रोड एनीवेर इन अह इन इंडिया। इट इज़ ऑलवेज अ चैलेंज टू नॉट गेट हैड। अह एंड विथ वुमेन जर्नलिस्ट वह एडेड होता है सेक्सुअल हैरेसमेंट। क्या चीज़ एस्केलेट होके आपको वह कर सकती है? यह हमेशा फियरफुल आप रहते हैं और एक्स्ट्रा मेजर्स लेते हैं अपनी सेफ्टी को लेकर। अगर आप ऐसी जगह पहली बार जा रहे हैं तो यू वुड शेयर योर लाइव लोकेशन विद योर फैमिली मेंबर्स। ये चीजें तो ज्यादातर महिला रिपोर्टर जो जाती हैं वो करती ही हैं। बट कोरोना में क्योंकि क्योंकि पुलिस सिर्फ कोविड को जैसे रेड ज़ोन बन गए थे, ग्रीन ज़ोन बन गए थे। वो लोग कोविड पेशेंट्स को गार्ड कर रहे थे। हॉस्पिटल्स में डिप्लॉय कर दिए गए थे। ऑक्सीजन प्लांट्स के बाहर उनका डिप्लॉयमेंट था। सो दे वर यू नो इंगेज्ड विद कोविड मैनेजमेंट। तो उसमें लॉ एंड ऑर्डर में क्या होता है कि किसी चौकी पे आपको आप एक्सपेक्ट करते हो कि यहां पुलिस होगी। बट समटाइ्स वो नहीं होती थी। तो ऐसे में मैं और मेरा ड्राइवर ही बच जाते थे जो इस तरह की सड़कों पर अकेले होते थे और कई बार मतलब एनकाउंटर हुआ भी जैसे मुझे सबसे ज्यादा जो डर लगा था ये बिहार में अररिया में जब मैं कोविड ऑर्फेंस की स्टोरी करने गई थी तो एक दो लड़कों से प्रोबेब्ली दे वर मतलब दे हैव टेकन ड्रग्स बाद में लेटर उनकी इन्वेस्टिगेशन की तो पता किया क्योंकि सीमांचल बिहार में ये ड्रग्स का अब तो पूरे बिहार में ही ये बहुत बड़ा प्रॉब्लम था उस वक्त और पीक पर जा रहा था जब मैं बाद में गई तो पता पता चला और एक ऐसे ही इसी किसी रिमोट ब्लॉक में जाना था। मेरी जो डिजायर गाड़ी थी वो बारिश की वजह से कहीं कुछ रोड बन रहा था तो एक कीचड़ दलदल जैसा हो गया था। तो डिजायर गाड़ी रोक दी। उन्होंने कहा अब आप बाइक से जाइए जिस गांव में वो शायद 12 16 कि.मी. दूर गांव था। तो मैं मैंने किसी ब्लॉक में से किसी को बुलाया। वो ऑफिशियल था या कोई भी था। मैं चेक नहीं कर सकती उस मोमेंट। मैं वनरेबल हूं और जब मैं उस 12 कि.मी. का जो स्ट्रेच मैं गांव से करते हुए जा रही थी तो मैं मतलब इतना डरी हुई थी क्योंकि मैंने सारे विजुअल्स देखे हैं। जेंडर क्राइम आप जब कवर करते हैं आप इतने वायरल वीडियो आते हैं। एक महिला अगर किसी आदमी के साथ बाइक पर किसी भी गांव की किसी भी सुनसान सड़क से अगर वो जा रही है तो कोई भी ग्रुप ऑफ मैन है, यंग है, ओल्डर है, जो भी हैं वो इतने अटैक के वीडियोस आते हैं। तो मैं उनके साथ बैठ के जब तक गांव नहीं पहुंच गई मैंने अपना मतलब आई वास जस्ट थैंकिंग गॉड मतलब मैं कुछ किसी को प्रे कर रही थी कि और मेरे दिमाग में वो सारे विजुअल्स चल रहे थे मतलब वर्स्ट सिनेरियो चल रहा था कि जो गांव में होता है ना कि कोरोना में पेड़ के नीचे बैठे हैं जैसे अपने गांव में आम के बगीचे के नीचे पांच लड़के बैठे हैं चार चारपाई पे जिस तरह से लोग घूरते हैं तो ये हमेशा से ही रहता है लेकिन कोरोना में वो थोड़ा सा ट्रिगर ज्यादा हो रहा था क्योंकि कि लोग ही नहीं थे बाहर। सड़कें खाली थी। लॉ इनफोर्समेंट कहीं और व्यस्त है। तो ऐसे में इजी टारगेट आप बन जाते हो। बट थैंकफुली दो-तीन एनकाउंटर्स के मतलब बावजूद आई वाज़ एबल टू मतलब फिनिश माय कवरेज टिल द एंड जब तक कोविड के केसेस कम नहीं होने लग गए। बट ये रहा है और इसको तो कैसे मतलब आर्टिकुलेट किया जाए? किन-किन शब्दों में बताया जाए कि अ जो हरासमेंट है वो लोन रिपोर्टर्स की वो बहुत अच्छा हमारे साथ क्या है कि हम लोग टीवी वाले एंकर्स भी नहीं है। जैसे अगर कई बार होता है कि उनके साथ पूरा क्रू चलता है। देयर इज़ अ वीडियो पर्सन देयर इज़ अ लोकल स्ट्रिंगर विद यू बट विद न्यू डिजिटल मीडिया हाउसेस दोज़ हु डोंट हैव अ लेगसी। तो वो सिर्फ फीमेल रिपोर्टर्स को अकेले भी भेज देते हैं। अब हैंडसाइट में जाके ये लगता है कि आई थिंक एक्स्ट्रा मेजर्स शुड हैव बीन टेकन बाय द सीनियर्स इन द ऑर्गेनाइजेशन। इफ यू आर सेंडिंग फीमेल रिपोर्टर्स ऑल बाय देमसेल्व्स देन आई थिंक यू नीड टू टेक केयर ऑफ देम क्योंकि गाड़ी कहां खराब हो गई किस रास्ते में किस आप Google के मैप से कितना जाएंगे तो आई शुड हैव बीन मे बी मोर केयरफुल और इस तरह का अब लगता है पांच छ साल बाद और उस वक्त लेकिन था कि कोरोना की कवरेज करनी है और यू नो यू वांट यू आर अ यंग रिपोर्टर यू वांट टू प्रूव टू योर एडिटर्स टू योर कलीग्स इन द न्यूज़ रूम दैट यू आर केबल ऑफ डूइंग इट डिस्पाइट बीइंग अ वुमेन डिस्पाइट बीइंग हैस सो आई आई डिडन्ट वांट टू कम बैक सो आई आई जस्ट टूक वन डे एट अ टाइम राइट ज्योति सो यू आल्सो बीन बैक टू दी पीपल हु यू कवर्ड बैक इन 20202 राइट यू वेंट बैक टू देयर विलेजेस यू स्पोक टू देम अगेन टिल 2024 एस यू मेंशंड अर्लियर कि आपने 2024 तक इस किताब पे काम किया है और आप उनके गांव वापस जाते हैं। आपने एक बड़ा प्रग्नेंट सा इंसिडेंट डिस्क्राइब किया है। जहां पर एक लड़की अपने फादर को बैठा के साइकिल पर घर ले जाती है। गांव ले जाती है। और बाद में शायद आपकी उनसे मुलाकात भी हुई है। अगर इफ आई कैन रिकॉल इट राइट आपने उनसे बाद में मिला मिली भी हैं आप और इन लोगों की जिंदगी में क्या बदलाव आया है? ज्योति मतलब क्या ये लोग जो उस वक्त जिस स्थिति में थे आज उससे बेहतर आपने पहले इस टॉक के इस इंटरव्यू के दौरान आपने बताया कि बहुत सारे लोग अभी भी सफर कर रहे हैं। बहुत सारे लोग दोबारा नौकरियां खो चुके हैं। एलपीजी सिलडर्स के वजह से आपने किसी का एग्जांपल दिया कि उनकी नौकरी जा चुकी हैं। लेकिन आज जिन सब्जेक्ट्स पे आप जिन सब्जेक्ट्स को आपने कवर किया था, जिन लोगों को आपने कवर किया था, उनके पास वापस गई जब आप लास्ट टाइम तो उनकी जिंदगी कैसी थी? क्या वो अपनी जिंदगी को रिहबिलिटेट कर पाए थे मैक्सिमम लोग या कहीं ना कहीं वो अभी भी कोविड की मार झेल रहे हैं और झेल रहे थे जब आपने लास्ट टाइम उनको कवर किया। जी आप ज्योति कुमारी की बात कर रहे हैं उसको गर्ल ऑफ बिहार के नाम से जानता है वो अपने बीमार पिता को लेकर दरभंगा तक पहुंची थी सात आठ दिन की जर्नी करके तो उस वक्त उनको आई थिंक पूरे पूरे कोविड नैरेटिव में नेशनल नैरेटिव में उनको बहुत ओवरवेल्मिंग तरीके से लिया गया बहुत लोग उनके रेिलियंस की तारीफ कर रहे थे इवांका ट्रंप उनको कुछ कह रही थी एव्री मिनिस्टर इन बिहार वांटेड टू हेल्प हर तेजस्वी यादव, चिराग पासवान दे सेड दे विल फंड हर एजुकेशन एंड पूरा एक इतना अटेंशन उनके ऊपर आ गया था और सम फिल्म मेकर ही स्टेप्ड इन एंड ही सेड आई विल मेक अ फिल्म ऑन हर लाइफ तो इस तरह की बातें की और बहुत उस वक्त उनको एक तरह से एक अंडरडॉग की कहानी जब आई तो लोग सब लोग मतलब पॉजिटिवली उसको ले रहे थे एंड शी राइटली डिर्व्ड दैट अटेंशन। लेकिन जब मैं 2021-22-23 में जब उनसे बात की तो उनकी फिल्म का आने की बातें होती रही होती रही तो 2021 में उनके पिता हार्ट स्ट्रोक उनको क्या बोलते हैं स्ट्रोक से उनका उनकी डेथ हो गई नॉट कोरोना विक्टिम नहीं थे वो लेकिन उनको दिल का कोई दौरा पड़ा और वो चले गए। उसके बाद जो ज्योति है शी वास एबल टू बिल्ड अ हाउस फॉर हर मदर बट मैंने फिर देखा कि उनको तो पढ़ाई करनी चाहिए थी क्योंकि बिहार के मिनिस्टर्स तो चाह रहे थे कि लड़की कॉलेज जाए और जब ज्योति से मैंने बात की थी तब उन्होंने भी कहा था कि मुझे तो अपने कॉलेज की पढ़ाई करनी है लेकिन जब मैं 24 में उनके पास जाती हूं तो वो तो अपने घर ही नहीं है। वो अपनी एक्सटेंडेड फैमिली मेंबर मौसी के यहां रहती हैं। तो कॉलेज का क्या हुआ? कॉलेज का तो कुछ भी नहीं हुआ। उन्होंने कभी एनरोल ही नहीं किया। तो कॉलेज में लड़की पहुंची ही नहीं। तो मैंने पूछा भी कि मतलब अब उनका फ्यूचर क्या है? क्योंकि उनको तो नरेंद्र मोदी पीएम मोदी से भी उनको पुरस्कार मिला था। अ इतनी अटेंशन के बाद कैसे कैसे वो फिर से उसी इनविज़िबिलिटी में स्लिप बैक हो गई। क्योंकि माइग्रेंट की बेटी हैं तो उनका जो मैक्सिमम जो उनका एक मतलब वो इमेजिन कर सकते हैं फ्यूचर वो अह है कि अच्छी जगह शादी। तो जब मैंने उनसे बात की तो शी वाज नॉट एबल टू एनरोल हरसेल्फ इन द हायर एजुकेशन दैट शी वांटेड टू। तो उनकी लाइफ में एक छोटा बदलाव उनके घर बनाने वाला हुआ जो कि उनके आसपास के घरों से बेहतर घर था। वो थैंक्स टू द कोविड कवरेज। लेकिन उसके बियों्ड कोई इंस्टीट्यूशनल चेंज या उस तरह के चेंज जो नेक्स्ट जनरेशन को आगे बढ़ा सके वो एजुकेशन के थ्रू या किसी जॉब के थ्रू होना चाहिए था। तो वैसा ज्योति कुमारी की लाइफ में कुछ भी नहीं हुआ। और वो जो मिनिस्टर्स की हेल्प थी जो बड़े-बड़े वायदे जब जब कोई इंसिडेंट रिपोर्ट होता है तो सब लोग चाहते हैं कि उससे जितना वो माइलेज ले सके तो किसी मिनिस्टर का इस तरह का कोई फंड उसके पास नहीं आया ज्योति कुमारी के पास और मिनिस्टरर्स चेंज भी हो गए बिहार में जो एजुकेशन मिनिस्टर थे वो नहीं रहे बिहार में जिस तरह की सरकारें बार-बार बदलती रही तो उस तरह का कोई एक जो सॉलिड बदलाव आप देखना चाहते हैं किसी अंडरडॉग की कहानी में वो फिर मुझे ज्योति की स्टोरी में नहीं मिला। सो एक स्टेप एक स्टेप आगे लिया तो वहीं पर वो रुक गई। लोग चाहते थे कि वो वो एक एक सक्सेसफुल केस स्टडी बने बट उस तरह का बना नहीं। राइट ज्योति एंड दिस इज अबाउट जस्ट वांटेड टू इंटरप्ट दैट द फिल्म आल्सो नेवर टूक ऑफ। आई डोंट नो फिल्म मेकर ने कहां से फंडिंग ली, कितना पैसा उठाया। ज्योति ट्रैवल भी कर रही थी और जब बात करती थी तो शी वाज़ वेरी होपफुल। क्योंकि इस फिल्म से जैसे होम बाउंड फिल्म आई उनको और ज्यादा आई थिंक अटेंशन मिलती और मे बी उनकी लाइफ में पॉजिटिव बदलाव होते तो फिर वो फिल्म भी कहीं आई नहीं डायरेक्टर का भी कोई अता पता नहीं इस तरह का उनके केस के साथ हुआ राइट ज्योति एंड दिस इज अबाउट समवन हु हैज़ बीन इन मीडिया लाइमलाइट जिनको इतना सारा लाइमलाइट मिला जिनके बारे में इतनी सारी बातें हुई जिनको अवार्ड्स मिले अगर उनकी स्थिति ये है तो और लोगों की स्थिति क्या होगी जो मिलियंस ऑफ लोगों ने कोविड के दौरान सहा था। कोविड के दौरान जो परेशानियां बर्दाश्त की थी उनकी स्थिति क्या होगी? वन कैन ओनली इमेजिन द एक्सटेंट ऑफ़ दैट ग्रीफ एंड द टेरेबल सिचुएशन दैट दे माइट बी इन राइट नाउ? ज्योति डू यू थिंक दैट आज के दौर में मतलब 5 साल हो गए कोविड को और अभी हम फिर से एक दौर में हैं जहां पे अलग-अलग तरह के वायरस की बात हो रही है। डू यू थिंक गॉट फॉरबिड? अनफॉर्चूनेटली अगर फिर से वैसी स्थिति आती है तो क्या हमारी सरकार ने एज अ जर्नलिस्ट हु हैज़ कवर्ड कवर्ड दिस क्योंकि आपने कवर किया इसलिए मैं यह सवाल आपसे पूछ रहा हूं क्योंकि क्या हमारी सरकार ने कोई एहतियात लिया है? क्या ऐसी तैयारियां की हैं कि अगर वो सिचुएशन दोबारा से रिपीट हुई तो उसका मैनेजमेंट बेहतर हो पाएगा या इज इट गोइंग टू बी द सेम क्योस दैट वी सॉ इन 2020 एंड एंड 202 अ डू यू थिंक इट्स गोइंग टू बी अ रिपीट ऑफ़ दैट ऑर अ और देयर इज़ गोइंग टू ऑर द गवर्नमेंट इज़ बेटर प्रिपेयर टू डील विथ एनी सच क्राइसिस अह गॉट फॉरबिट इफ दैट कम्स अक्रॉस। राइट। सो, देयर वेर टू काइंड ऑफ़ क्राइसिस इन द पेंडेमिक। फर्स्ट द माइग्रेंट एक्सोडस एंड देन द कोलैप्स ऑफ द हेल्थ केयर इंस्टीटश। सो जो फर्स्ट आया तो आपने आपने इट इज़ फॉर एवरीवन टू सी कि जैसे ही ईरान ये मिडिल ईस्ट के वॉर के समय में सूरत या जिस तरह जो भी इंडस्ट्रियल हब्स हैं वहां से किस तरह से मजदूर सिमिलर हमें एक तरह से एक तरह की सिमिलरिटी दिखी। उस तरह के जो कस अभी फिर से रिकक्रिएट हुए। ऑलमोस्ट सिमिलर पुलिस वही डंडे हाक रही है। वही ट्रेनों में एटलीस्ट द ट्रेंस आर रनिंग दिस टाइम। बट सिमिलर वो जो हार्डशिप्स को फेस करके वापस आ रहे हैं। दे आर जॉबलेस। महंगाई बहुत है। तो ये पहला तो इसी से क्लियर हो जाता है कि हम कितने प्रिपेयर हैं किसी भी तरह के क्राइसिस जो मजदूरों से जुड़े हैं उससे डील करने के लिए। मैं भी बहुत समय से ये सोचती थी कि क्या हम बेटर प्रिपयर्ड हैं? क्या है हमारी सिचुएशन? दूसरा जब हेल्थ केयर का जो कोलैप्स है इंडिया में पिछले 10 साल में जैसे मेट्रो बनाने की एक होड़ है हर छोटे शहर में मेट्रो लाना है वैसे ही एम्स बनाने की भी होड़ है। हर स्टेट चाहता है कि उसके हर जिले में मेडिकल कॉलेजेस हो और मेरी किताब में आप पाएंगे कि मधेपुरा में एक शानदार एक इंफ्रास्ट्रक्चर है। बहुत बहुत अच्छी बिल्डिंग है। लेकिन उस उन हॉस्पिटल्स उन मेडिकल कॉलेजेस के पास के कितने एमबीबीएस डॉक्टर हैं। कितने उनके पास एएनएम जीएनएम है? कितने वार्ड बॉयज हैं? क्या उनके पास वेंटिलेटर चलाने वाले इनफ लैब टेक्नशियन हैं? अगर ये चीज अगर इस पर भी काम हो जाता तो हम कह सकते थे कि द स्टेट इज एंड एंड बाय स्टेट आई मीन द स्टेट गवर्नमेंट एंड द सेंटर। सो द स्टेट इज बेटर प्रिपयर्ड। बट इफ दे हैव नॉट वर्क इन दैट डायरेक्शन हम किस कॉन्फिडेंस से बोले कि दे आर बेटर प्रिपयर्ड। अ जब किसी भी आप डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल में जाइए अगर उन्होंने उन सारे गैप्स को फिल कर लिया है जो डॉक्टर टू पेशेंट का रेश्यो है इफ आई टॉक अबाउट बिहार वो स्लाइटली भी इंप्रूव होता दिखे तो हम कह सकते हैं कि सरकार ने उसके ऊपर काम किया लेकिन वो ज्यों का त्यों है अगर वर्स नहीं हुआ है बट वो ज्यों का त्यों है 5 साल में तो आई डू नॉट हैव द कॉन्फिडेंस टू से दैट वी आर वी आर बेटर प्रिपयर्ड और वी आर बेटर देन द कोविड इयर्स। राइट एंड दैट्स सो अनफॉर्चूनेट आई मीन 5 साल बाद भी हम इस स्थिति में हैं जहां पर हम अपनी तैयारी के साथ ऐसे किसी कठिनाई का सामना नहीं कर सकते हैं। [गला साफ़ करने की आवाज़] ज्योति कोविड के मिलियन वर्जनंस हैं। कई सारे वर्जन्स हैं। अलग-अलग तरह के लोगों को कोविड होता है उसके अलग-अलग वर्जन है। गरीबों को कोविड होता है उसके अलग वर्जन है। अमीरों को कोविड होता है उसके अलग वर्जन हैं। और उसके बाद आपको क्या लगता है कि इंडियन मीडिया ने किसी एक वर्जन पे फोकस किया था स्टोरी को उस वक्त या आपको लगता है कि वो एक ऐसा क्राइसिस था जहां पे सभी लोग एक तरह से हो गए थे और एवरीवन केम अंडर द सेम ब्रैकेट एंड देयर वाज़ नो आई मीन देयर इज़ अ कंट्रा कंट्राडिक्टरी क्वेश्चन दैट आई एम आस्किंग मैंने पहले बोला कई सारे वर्जन से लेकिन मैं अभी ये बोल रहा हूं कि क्या एक ऐसा समय बन गया था कोविड जहां पे कोविड कोविड कलेक्टिवली भी सबको एक समान ले आया था। गरीब भी एक हॉस्पिटल सरकारी हॉस्पिटल के लिए दौड़ रहे थे। अमीर भी सरकारी हॉस्पिटल के लिए दौड़ रहे थे। अगर पटना में मान लीजिए पटना में जहां आप रहती हैं वहां पे हॉस्पिटल्स अवेलेबल नहीं थे तो अमीर आदमी भी पीएमसीएच, एनएमसीएच जैसे अस्पताल को ढूंढ रहा था। गरीब आदमी भी पीएमसीएच, एनएमसीएच जैसे अस्पताल को ढूंढ रहा था। तो क्या इस क्राइसिस ने क्या इस आपदा ने गरीबी और अमीरी के जो गैप्स होते हैं जो इकोनॉमिक गैप्स होते हैं जो सामाजिक गैप्स होते हैं उसको कम करने की कोई उसको कम कर पाई थी। डू यू थिंक देयर वास सम ब्रिजिंग बिटवीन दैट? आपने जो कहा जो हॉस्पिटल बेड्स वाली बात है कि हॉस्पिटलाइजेशन में अगर कोविड ने इट वास अ ग्रेट इक्व इक्वलाइजर जैसा लोग कह रहे हैं तो उस वक्त डेस्प डेस्पिरेशन थी लेकिन उसको हम एक जनरली एक जनरल स्टेटमेंट के तौर पर नहीं कह सकते क्योंकि वो जो गैप है इनकलिटी जो है वह अभी भी एक्स उस वक्त भी एग्ज़िस्ट कर रही थी। हां लेकिन डेस्परेट सिचुएशनंस में डेस्परेट मेजर्स लोग ले रहे थे अगर प्राइवेट में नहीं मिल रहा क्योंकि प्राइवेट क्या कर रहे थे कि क्योंकि उनको सरकारी नियमों के तहत काम करना था तो बहुत सारे लोग बंद करके भी भाग गए थे अगर चलो फर्टिस खुला है या जो इलीट हॉस्पिटल्स हैं दे वर फंक्शनल बट इफ यू टॉक अबाउट स्मॉल टाउन हॉस्पिटल्स मेजॉरिटी ऑफ़ देम वर नॉट फंक्शनिंग एट दैट टाइम। सो सबका रिफ्यूज एक सरकारी अस्पताल ही बन गया था। उसमें गरीब भी था, अमीर भी था। उस उस लिहाज से अगर कोविड ने सबको एक पेज पर लाके खड़ा कर दिया हो तो किया था। लेकिन उसके बाद जो है इनकलिटी जो एकिस्ट कर रही थी किसी भी तरह की कर रही थी हेल्थ केयर में चाहे एक्सेस टू वर्क में वो सारी और ज्यादा डीपन ही हो गई हैं। जो गरीब थे और गरीब ही आपको दिखेंगे। दे आर पुर देन बिफोर एंड दे आर इन डे एंड जो हेल्थ केयर की जो दो जो दशा और दिशा है वह उसी तरह से है तो वो गैप कहीं कोविड ब्रिज नहीं कर पाया दोनों डिफरेंट वर्ल्ड्स को साथ में तो नहीं लेकर आ पाया और इसी वजह से कोविड हैज़ डिफरेंट वर्जनंस यू हैव एन अर्बन वर्जन जहां पे लोग कहेंगे कि मैंने यूके लिए देखा सीखा आई वास मेकिंग डिशेस आई वास वाशिंग डिशेस कोई झाड़ू लगा रहा था या समवन वास वाचिंग रामायण उस तरह के वर्जन भी हैं। लेकिन जैसे आप गांव में आएंगे तो आपको जो जैसे ही आप मतलब रूरल इंडिया में आते हैं किसी भी स्टेट में तो उनके अपने अलग हार्डशिप्स के हैं कि इसको हॉस्पिटल नहीं मिला। दैट पर्सन डाइड या फिर हमारे घर में यह ट्रेजडी हो गई थी या शादी इस तरह से पोस्टपोन हो गई थी। तो उनकी बहुत सारी हार्डशिप्स हैं। सो अभी भी विद इन मतलब ये कोई नेशनल नैरेटिव यून इस तरह का यूनिवर्सल एक्सपीरियंस नहीं है कोविड। मिलियन स्टोरीज हैं। मिलियन पीपल हैं तो मिलियन स्टोरीज हैं। बट कुछ स्टोरीज जैसे हॉस्पिटल में बेड ना मिलने की या मजदूरों की कुछ थीम्स उभर के आती हैं। तो किताब में उन्हीं थीम्स को कवर करने की कोशिश की गई है। जैसे अगर ऑक्सीजन के क्राइसिस थे तो दिल्ली में बैठा, राजस्थान में बैठा, बिहार में बैठा हर आदमी उसी तरह से जूझ रहा था। तो एक उनका एक अलग सेट ऑफ पीपल है। दे हैव देयर डिफरेंट वर्जन ऑफ़ कोविड। बट यस जो एक अलग तरह का जिनकी लाइफ थोड़ी सी स्टिल हो गई थी दे वर नॉट दे वर लिविंग द स्लो लाइफ वो वो लोग भी थे बट माय बुक इज अबाउट द द डिफरेंट सेट ऑफ पीपल जिन्होंने इस तरह के क्राइसिस को झेला राइट हिंदुस्तान में कोई भी आपदा हो कोई भी इमरजेंसी हो कोई भी ऐसा सिचुएशन हो जहां पे लोग परेशान हो जहां पे इनकलिटीज सरफेस करती हैं चाहे वो कोविड जैसे आप बता बता रही हैं कि वहां पे भी इनकिटी सरफेस कर रही है। वह आज तक इंपैक्ट कर रही है। तो कास्ट क्लास की बात तो हम करते हैं कई बार कि गरीब हैं, अमीर हैं। गरीब कैसे इंपैक्ट होते हैं? अमीर कैसे इंपैक्ट होते हैं? लेकिन जो सोशल आइडेंटिटीज हैं, जो कास्ट आइडेंटिटीज हैं, एक दलित समाज का आदमी, एक पिछड़ा समाज का आदमी, एक माइनॉरिटी समाज का आदमी वो किस तरह से अलग तरह से इंपैक्ट हुआ था इस पूरे क्राइसिस में जो थी और आपने इसके बारे में शायद बात की भी है अपनी किताब में अह कि किसको पैदल जाने का अवसर मिला, किसको गाड़ियां मिली। यह सब इस पे भी डिपेंड करता था कि उसका कास्ट लोकेशन क्या है? उसका सोशल लोकेशन क्या है? तो आई वुड लाइक यू टू पुट सम शड आई वुड लाइक यू टू सेड सम लाइट ऑन दैट प्लीज एंड एक्सप्लेन टू अस दैट व्हाट डू यू मीन बाय दैट एंड हाउ डू यू डेथपर। जी। सो जैसे कि एक ही एक ही एग्जांपल से समझ सकते हैं इसको। जैसे जब इतने ओवरवेल्मिंग नंबर में डेथ्स हो रिपोर्ट हो रही हैं तो उनको उनको या तो क्रिमेट या बरी करने के लिए आपको एक एक जो हिंदू कास्ट सोसाइटी में जो बना हुआ है कि डोम जो है जो बॉटम पे प्लेस कर दिए गए हैं। आप उनकी तरफ देखते हैं कि अब वही उन्हीं का काम है। आपने तो को कन्वेंशनली दिया हुआ है कि दे विल डील वि द डेड और कोविड में जैसा हो रहा था कि स्टिग्मा फियर सबकी वजह से कई बार लोगों की मोबिलिटी भी नहीं थी कि कोई दिल्ली में बैठा उसके पेरेंट्स अगर वाराणसी में गुजर गए कोविड से तो किस तरह से फ्लाइट्स चल नहीं रही थी ट्रेनें नहीं थी तो वो कैसे आके उनको क्रिमेट करेगा जो जो फाइनल राइट्स है उसको परफॉर्म करेगा तो इन सब तरह इस इन सब को करने के लिए जो एक ऐसी कास्ट है यूजुअली अगर आप शहरों गांव में जहां भी होंगे मोस्टली मोस्टली ली टू जनरल पब्लिक दे रिमेन इनविज़िबल। हम हमें पता ही नहीं चलेगा कि अच्छा ये डोम समुदाय का है। क्योंकि पहले के टाइम में उनको उनके जो ग्रैंड फादर्स की जो जनरेशन थी 70-80 के दशक में उनको चप्पल पहन के जाने की अनुमति नहीं थी। अगर वो क्रॉस कर रहे हैं किसी अप्पर कास्ट में अगर तो स्लीपर ऐसे लेकर जाते थे वो। फिर धीरे-धीरे बिहार में खासकर सामाजिक बदलाव हुए। जब यहां पर सोशलिस्ट लीडर्स आए नितीश लालू तो उन लोगों ने कम से कम स्कूल जाने पर उनके फोकस कराया तो डोम थोड़े बहुत पढ़ चुके हैं लेकिन और मैं डोम मतलब ये वर्ड उनकी कास्ट आइडेंटिटी से ले को लेकर नहीं कह रही जस्ट उनके काम को लेकर मैं समझ सकती हूं जी तो मैं तो मैंने उनका देखा कि वो तो बहुत काम कर रहे थे आप वाराणसी के जो का जो मणिकर्णिका घाट है तो मैं वहां गई देखने कि क्योंकि फ्रंटाइन वर्कर जब कोविड की हिस्ट्री लिखी जाएगी तो आप कहेंगे कि डॉक्टर डॉक्टर्स ने बहुत अच्छा काम किया। वो कर रहे थे। एक सेल्फलेस सर्विस थी। बट डॉक्टर्स की जो कास्ट क्लास लोकेशन है वो अलग एक ग्रुप है। फिर जो भी फ्रंटा लाइन वर्कर्स थे जो हमारे कोविड हीरो की जो फोटो आती है आपके दिमाग में डॉक्टर्स की आएगी या फिर ब्यूरोक्रेट्स हैं या पॉलिटिशियंस हैं जो भी उसको नैरेटिव में जो हु गेट्स टू रिटन एज अ हीरो इज़ आल्सो यू नो सम हाउ लिंक्ड टू हु यू आर कास्ट क्लास सब आता है उसका लोकेशन तो सोशल लोकेशन बहुत जरूरी होती है। कोविड में जो डोम्स थे ना कहीं ना कहीं मतलब कहीं मुझे उतना दिखा ही नहीं तो मैं गई भी थी उनसे बात करने लेकिन उनका आपने किताब में देखा होगा उनके पास इतना काम था सम यू नो वर्क फॉर स्ट्रेट मतलब 40 आवर्स का स्ट्रेच में दे वर वर्किंग दे वर ईटिंग स्लीपिंग वॉकिंग अमंग द डेड ये सिचुएशन थी वो लोग और उस पर भी था ऊपर गर्मी में हीट वेव थी और लकड़ी से क्रिमेशन हो रहे थे उस वक्त जो इलेक्ट्रिक अपनी मशीनें होती हैं क्योंकि उसको कूल कूल ऑफ होने में थोड़ा टाइम लगता है। अगर उसने एक क्रिमेशन किया तो उसको थोड़ी देर बंद रखना होता है। मोस्ट इलेक्ट्रिक मशीनंस स्टॉप्ड वर्किंग वाराणसी में मैं जब थी फिर मैं पटना में भी आई सिमिलर हुआ उनकी वो हमारे को नैरेटिव में से ना वो एक तरह से एकदम फुटनोट भी नहीं है। मतलब जब हम बात कर रहे हैं एसेंशियल वर्कर्स की जिनको हम मोबिलिटी पास दे रहे थे जो लोग एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। उसमें कुछ डोम्स को तो पुलिस ने पीटा भी है क्योंकि अगर वो खाना लेने जा रहे हैं और वो लॉकडाउन एनफोर्स कर रहे हैं पुलिस वाले तो डोम्स तो एसेंशियल सर्विस में थे ही नहीं। तो एक मैं पटना के एक यंग से लड़के की कहानी में बताती हूं कि उसको तो पीटा भी गया तो हम उसको जो है अपनी गाड़ी क्योंकि हमारे पास पास था तो उसके थ्रू उसको हम उसके बस्ती में छोड़कर आए थे। सो ये कास्ट का ही एक फैक्टर है ना कि हमारे पूरे नैरेटिव में उनको हम तवज्जो ही नहीं दे रहे हैं। हम उनके काम की कोई बात ही नहीं कर रहे हैं। जबकि सबसे ज्यादा जो है जो लैक ऑफ सेफ्टी गियर की बात करते हैं क्योंकि वो लोग कोविड की जो किट थी आपने देखा होगा वो इतना आप उसको एसी में एक ने कहा भी मैंने कहा आप कोविड किट मिले तो क्या करें? तो उन्होंने कहा कि ये तो एसी के लोग एसी में बैठे लोग लोग करेंगे। हम लोग तो कोलैप्स ही कर जाएंगे। हम ज्यादा सिक हो जाएंगे यह पहन के। तो हम तो वह भी नहीं पहन सकते हैं। अनलाइक अदर कंट्रीज जहां पे जो क्रिमेशन का काम है वो सिस्टेटिक है। वो कास्ट से जुड़ा नहीं है तो उसमें थोड़े सेफ्टी गिय्स प्रोवाइड किए जाते हैं। बट यहां पर इंडियन सोसाइटी में अस्यूम कर लिया जाता है कि दे विल यू नो वर्क विदाउट एनी सेफ्टी गियर। वो अपने बेयर हैंड से काम करेंगे। एंड वी विल नॉट इवन एग्जामिन और डॉक्यूमेंट देयर लाइफ्स कि उन्होंने काम क्या किया। सो वो प्रभावित तो हुए ही इक्वली प्रभावित हुए। दे वर आल्सो गेटिंग राशन ट्वाइस द प्राइस। उनको भी मार पड़ रही थी। येट दे स्टेप्ड इन टू क्रिमेट द डेड। उन बॉडीज को भी किया जिनकी फैमिलीज़ ने अबेंडेंट कर दिया था। तो फैमिलीज़ श्मशान घाट की बाउंड्री तक आती थी क्योंकि प्लास्टिक में बॉडीज लिपटी हुई होती थी। तो वहां से देखते थे और थोड़ी देर के बाद कई बार चले भी जाते थे। तो जो बाउंड्री क्रॉस करके नहीं आ रहा उसके लास्ट राइट्स को जो डोम अह परफॉर्म कर रहा है और कुछ जगह पे पंडित जी भी चले गए थे जब इतनी लाशें आई क्योंकि आपको हिंदू अह सिस्टम में आप एक पंडित जी भी चाहिए हैं तो वह भी फ्लेड कर गए थे लेटर दे रिटर्न बट उनका भी जो जो भी क्रियाकर्म उन्होंने सीखा डोम्स ने ओवर द इयर्स और इतने सालों से वो सीखते आ रहे हैं तो उन्होंने डबल रोल किए दे वर सो फियरलेस एंड दे वर सो सेल्फिश क्योंकि मैं सोचती हूं कि जब फैमिलीज़ अबेंडन कर दे रही हैं जिनको जिनके लास्ट राइट करने से और और वो वो लोग आके कर रहे हैं तो दे दे शुड हैव बीन गिवन द ड्यू क्रेडिट फॉर दे वर्क देयर सर्विस व्हिच दे डिडंट गेट इनफ और मोस्टली जो डोम्स हैं वो दे आर लैंडलेस दे डू नॉट हैव अ रूफ ओवर देयर हेड और उनके जो बस्ती होती हैं वह दो-तीन साल में इविक्शन ड्राइव में जो चलाता है प्रशासन उसमें वह लोग अह भगा भगा दिए जाते हैं | सो दे मूव विद इन सिटी एक जगह से दूसरे और कोविड में फिर जब उनकी बात चली कि एक डेथ का स्पेक्टिकल बन गया था तो थोड़े बहुत विज़िबल भी हुए अल्टरनेट मीडिया ने उनके ऊपर कवरेज किया। आई रिमेंबर वायर ने अच्छा सा किया था। देयर वर सम स्टडीज जिन्होंने बीएचयू में किसी ने इसके ऊपर रिसर्च पेपर भी लिखा। ऐसा नहीं है कि कंप्लीटली फॉरगॉटन थे। लेकिन उनके ऊपर थोड़ा बहुत काम हुआ। बट जो काम एक मेन स्ट्रीम मीडिया भी करना कर सकती थी कि उन उनके बारे में उनकी स्ट्रगल्स को फिर हाईलाइट करती उस काम के जरिए। तो ज्यादा बेहतर उनको एटलीस्ट कंपनसेशन मिल जाता। तो पटना में जो डोम्स थे उनको 15 अगस्त जब आया उस साल 15 अगस्त आया तो दे वर इनवाइटेड। उनको कहा गया कि यू विल बी फैसिलिटेटेड। आपको आप कोविड में आपने बहुत अच्छा काम किया है। वो गए भी और बिना किसी ऑनर के वापस आ गए। उनको चेयर्स पे बिठा दिया गया। तो मैं सोचती हूं कि ऐसा अगर कोई कोई इस तरह की अगर अगर इस तरह किसी और कास्ट या क्लास के लोगों लोग करते इस तरह का काम तो उनको उनकी प्रशंसा में उनको उनके काम को हम लोग कितना एकनॉलेज करते हैं एज अ सोसाइटी जो कि हम डोम समुदाय का काम को हमने नहीं किया। ये बहुत ही बहुत बड़ा उदाहरण है इस पूरे कोविड दोनों कोविड वेव्स में। राइट ज्योति अब्सोलुटली बहुत सटीक एग्जांपल आपने दिया है। किस तरह से डोम समाज के लोगों ने बढ़-चढ़ के काम किया और उनको ड्यू क्रेडिट नहीं मिला जो उनको मिलना चाहिए था। ज्योति आप अपनी किताब में फेथ की बात भी करती हैं। फेथ से मेरा मतलब है रिलीजियस फेथ से और यू टॉक अबाउट कि ये फेथ जो था वहां पे एक दो पैमाने से काम आ रहा था। एक तरफ तो लोग एक दूसरे के साथ फेथ के वजह से रिलीजियस बिलीव्स के वजह से कोविड का खौफ कम करने की कोशिश कर रहे थे। कोविड का डर कम करने की कोशिश कर रहे थे। एट द सेम टाइम पीपल वर गैदरिंग टुगेदर इन होली फेयर और टू बी प्रिसाइज व्हाट हैपेंड इन दिल्ली जहां पे एक जमात जमात भी थी और लोग वहां पे इकट्ठा थे डिस्पाइट ऑल द वार्निंग्स एंड डिस्पाइट ऑल द थ्रेट्स दैट वर देयर एट दैट पॉइंट ऑफ़ टाइम तो इसके बारे में जो लिखना था ज्योति जब आपने लिखना शुरू किया इसके बारे में तो आपको किस किस तरह के चैलेंजेस फेस करने पड़े कि यह बहुत पॉलिटिकली लोडेड ना हो जाए। व्हेन यू टॉक अबाउट राइटिंग अबाउट फेथ एंड हाउ देयर वर सुपर स्प्रेडर्स, हाउ दी सर्टेन इंस्टेंसेस बिकम सुपर स्प्रेडर्स। वेल आई डू नॉट वांट टू से कि कोई एक इंसिडेंट सुपर स्प्रेडर हो गया था। चाहे वो दिल्ली का कोई इंसिडेंट हो, चाहे वो होली का कोई इंसिडेंट हो। लेकिन कई सारे ऐसे गैदरिंग्स हुए उस बीच में जहां पे बहुत ज्यादा रिस्क पड़ गया होगा। बहुत ज्यादा कोविड को फैलने का रिस्क पड़ गया होगा। तो उसको आपने नेविगेट कैसे किया लिखने में क्योंकि यह बहुत पॉलिटिकली लोडेड आर्गुमेंट ना बन जाए और किसी एक पक्ष के खिलाफ ना हो जाए। मैंने तबबलीगी जमात को लेकर मैंने रिपोर्टिंग की थी मेवात से की थी क्योंकि जिन्होंने अटेंड किया था बहुत सारे लोग वापस आए थे और हम देखने गए थे कि कोविड के नॉर्म्स फॉलो हो रहे हैं कि नहीं। बट इट इज़ नॉट अ पार्ट ऑफ़ माय बुक बट आई डू टॉक अबाउट द मेलाज़ दैट हैपन होली फेयर होली एंड अक्रॉस नॉर्थ इंडिया ये होते हैं और उस वक्त उत्तराखंड में भी हरिद्वार में भी हो रहा था तो ना सिर्फ तबबलीगी जमात क्योंकि तबबलीगी जमात को एक तरह से ओवरवेल्मिंगली कवर किया गया और पूरा अटेंशन एक तरह से उनकी गैदरिंग पर आ गया और जो स्क्रूटनी दोनों तरफ होनी चाहिए थी वो एक तरह से नहीं हुई लेकिन हमने जब जौनपुर में आप मैं जब गई और मैंने वहां पे देखा कि जौनपुर में कैसे फैल गया तो जो होली पर जो लोग आए थे और उत्तराखंड के हरिद्वार में जब जो जब जो लोग आए थे तो बहुत सारे लोग कोरोना को अपने साथ लेकर गए तो रिलीजन का जो रोल है उन्होंने वो सुपर स्प्रेडर तो कई जगह इस तरह की गैदरिंग्स रही लेकिन उस उसके लिए मुझे लगता था कि कोई भी एडमिनिस्ट्रेशन उसको दे वुड नॉट वांट टू मेस विद द रिलजन। इस वजह से दे जस्ट स्टेड अवे। अदरवाइज दे कुड हैव इंपोज्ड कर्फ्यू। इन स्पेसिफिक लोकेशनेशंस। जैसे बिहार में एक दो जगह मेले थे तो किसी डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर ने वहां पर कर्फ्यू लगा के उसको हटा दिया। बट देन देयर वर ऑर्डर्स कि आप क्यों लगा रहे हैं? मतलब ये तो ठीक नहीं है क्योंकि वही अगेन आपने कहा कि रिलीजियस सेंटीमेंट्स इतने जल्दी हर्ट हो जाते हैं तो उन्होंने शायद वो अपना कर्फ्यू हटा लिया बट इट वास सो थॉटफुल अगर इस तरह के मेलों की जानकारी किसी भी प्रशासन प्रशासनिक अधिकारी को थी तो वो उस उसको सुपर स्प्रेडर होने मतलब से बचा सकते थे लेकिन उसके लिए बहुत ही केयरफुली डील उनको करना होता लेकिन ज्यादातर जगह पर नहीं किया गया क्योंकि आप नहीं कह रह सकते कि आप हरिद्वार में क्यों गए? आप उनको फिर उस तरह से छटनी या उस तरह का चिन्हित भी नहीं कर सकते कि यह सिर्फ अलग रिलीजियस गैदरिंग के लोग हैं। तो थोड़ा सा उसको कोविड की पूरी मैनेजमेंट को थोड़ा सा अलग तरह का ट्विस्ट दे दिया जाता। लेकिन आई फाउंड आउट अक्रॉस रिलीजंस। अब तबबलीगी जमात का भी हो या फिर जो होली के मेले थे या फिर हरिद्वार का मेला था उन सब ने कहीं ना कहीं उस वक्त कंट्रीब्यूट किया था। सेकंड वेव के दौरान भी किया था क्योंकि सेकंड के कोविड वेव से पहले पॉलिटिकल रैलीज भी हो रही थी। ऐसा नहीं कि सिर्फ मेले हो रहे थे पिटिकल रैली और इस तरह का माहौल बन गया था कि चीजें तो बहुत नॉर्मल है तो जब लॉकडाउन ही नहीं है तो फिर कोरोना का क्या डर है? लोगों में ना ये मैसेज गया जो कि टॉप से गया जो हमारी लीडरशिप थे थी उस वक्त या जिस तरह के एकशंस वो ले रहे थे तो लोगों ने भी फॉलो किया। अब मैं आपको पटना में एक मधु नाम की महिला है। कोविड विडो है और उनके सेकंड कोविड वेव में ही शादियां भी बहुत बड़ा सुपर स्प्रेडर थी उस वक्त क्योंकि लोगों ने पहले वेव की शादी को टाल दिया था दूसरी वेव के लिए और उनको तो पता ही नहीं था कि दूसरी वेव आने वाली है। तो सब लोग शादियों में गए तो शादियों से निकलकर बहुत सारे लोग मरे तो मैंने उनसे पूछा कि मतलब आप लोगों को क्यों नहीं लगा कि कोरोना हो सकता है। पहले दिन ही क्यों नहीं लगा? तो उन्होंने यही कहा कि बिहार सरकार ने तो 4 मई को कोरोना लगाया लॉकडाउन लगाया और हमें तो 28 तारीख को ही हम शादी में चले गए 28 28 अप्रैल और 3 मई तो सरकार ही कोरोना लॉकडाउन नहीं लगा रही तो मुझे कैसे पता चलेगा मैं अनपढ़ महिला हूं मुझे कैसे पता चलेगा कि कोरोना को कितना सीरियस लेना है तो मैं उनकी बात से मुझे ये महसूस हुआ कि जो सरकारों के जो कंफ्यूजिंग एक तरह के नोटिफिक एक तो आज कुछ वो जानकारी देते थे अगले दिन उसी की कंट्राडिक्टरी बात कुछ वो नोटिफिकेशन में निकाल देते थे। तो इससे ना जब तक आखिरी आदमी तक बात पहुंचती थी बहुत सारा मेस मेसी इन क्रिएट हो जाती थी। उससे बहुत कंफ्यूजन रहा और ज्यादा मतलब मिसमनेजमेंट ज्यादा हुआ उस चीज से रादर कि उसको टाइमली अरेस्ट कर पाते उस वायरस को स्प्रेड होने से। सो वेडिंग्स मेलाज़ आल्सो पॉलिटिकल रैलीज़ इन यूपीस केस द लोकल बॉडी इक्शंस जो पंचायत में उन्होंने कराए। ये चारों पांचों चीजें जो थी वो टाइमली इंटरवीन करके रोकी जा सकती थी और थोड़ा सा हम जो हमारी जो एक तरह की जो कैजुअलिटीज बढ़ी उनको भी रोका जा सकता था। राइट ज्योति ज्योति कुछ आखिरी सवाल है मेरे आपसे एक दो सवाल और हैं। कोविड में हमने एक ऐसा भी सिचुएशन देखा जहां पे एक तरफ लोगों को टारगेट किया जा रहा था किसी एक जाति विशेष लोगों को कि वो सुपर स्प्रेडर्स हो रहे हैं। वो कोविड फैला रहे हैं? क्या आपके सामने कोई ऐसा इंसिडेंट आया जहां पर आपको रिपोर्टिंग एक्सपीरियंस के दौरान यह लगा कि सामने वाला यह कह रहा है कि इस कम्युनिटी के वजह से लोग कोविड फैला फैल रहा है। इस कम्युनिटी के वजह से कोविड इतना ज्यादा आम हो गया है। इतना ज्यादा फैल गया है या शब्द कोविड जिहाद जैसे शब्द का भी इस्तेमाल किया गया था। तो आपको इस रिपोर्टिंग एक्सपीरियंस के दौरान ऐसा कुछ लगा? मेरे मेरे मतलब जहांजहां मैं गई मुझे इस तरह का मतलब कोई अक्यूजेशन या कोविड जिहाद जैसे शब्द वो हां वो थे सोशल मीडिया पर तो बहुत थे और प्राइम टाइम डिबेट्स में भी बहुत थे लेकिन मैं वही समझने की कोशिश कर रहा हूं कि ये क्या सोशल मीडिया तक ही सीमित रहते हैं या ग्राउंड पे भी ऐसे डिस्कोर्सेस जाके पेनिट्रेट कर जाते हैं। कुछ जगह किया था मतलब कुछ जगह मैं ऐसा नहीं कहूंगी लेकिन वो ये जो अपना जो दिल्ली की सराउंडिंग्स हैं आपको जो उसका जो एनसीआर है उसमें ये बहुत ही प्रोमिनेंटली अग्रेसिवली देखा जाता है और मैंने एक दो जगह देखा लेकिन जब मैं यूपी बिहार की अगर बात कर रही हूं इन दो स्टेट्स की बात करूं तो यहां पर लोग उस तरह की बात नहीं कह रहे थे कि कोविड जिहाद है। वहां पे थ्यरीज थी अलग थी। जैसे हरियाणा में जो मैं जहां से आती हूं वहां पर थी कि ये कोई चाइना का वायरस है जो फैला दिया गया है। फिर यूपी में लोग ऐसा समझते थे कि पहले तो उन्होंने इसको इसको एक्सेप्ट ही नहीं किया कि कोई वायरस है। उनको लगा कोई तो थ्योरी है सरकार की। ये सुइया लगाने के लिए ये लोग जानबूझ के ऐसा कर रहे हैं। अब बिहार में भी बहुत समय तक लोग जो है इसको रियलिटी नहीं मान रहे थे। जब तक कि उनका अपना कोई ना चला गया हो। लेकिन एक लार्जर जो सेंटीमेंट था वो इस तरह का नहीं था कि किसी रिलीजन स्पेसिफिक को टारगेट करता हो या किसी कास्ट को टारगेट करता हो कि इन्होंने फैला रहा है। इनफैक्ट जैसे अभी मैं डोम्स की बात करूं तो वो लोग तो कहते हैं कि हम उनकी कोरोना में जैसे पटना बांस घाट पर कोई भी कोविड से डेड डेथ नहीं हुई। तो उन्होंने कहा कि वी वर मे बी वी हैव द ग्रेटेस्ट इम्यूनिटी। हम लोग बच गए। ये तो सिर्फ अमीरों को होने वाली चीज थी। ये गरीबों को कैसे होगी? तो इस तरह की बातें मतलब जरूर सामने आई कि कुछ लोगों को लगा कि उनकी इम्युनिटी इतनी अच्छी थी कि यह इस तरह के वायरस भी उनको नहीं उनको इस तरह का वायरस नहीं होता। नहीं जैसे हां जैसे अगर मैं जो मूसर्स हैं बिहार में मांझी जो अगेन वेरी वलनेरेबल कम्युनिटी जो गरीबी और शिक्षा से जूझती है उन लोगों उन लोगों के बीच में भी कोविड की मौतें उतनी नहीं हुई तो अब जब जाके मैं पूछती हूं कि कोरोना के कैसे थे तो उनके लिए थोड़ा सा एक डर था वैक्सीन का डर था बहुत ज्यादा हेजिटेंसी थी उनको लगता था सरकार का ये कोई षड्यंत्र है जो उनको सुइया लगा देगा और वो 15 20 दिन बीमार रहेंगे उनका काम प्रभावित होगा ये चीज बहुत उभर के आई और उस तरह का जो जो नैरेटिव बनाया गया था बाय सर्टेन सेक्शंस ऑन सोशल मीडिया वो उतना अभी अभी भी नहीं कोई बोलता है कि इट वाज़ है इट वाज़ अ कास्परेसी बाय सर्टेन कास्ट और सर्टेन रिलजन इस तरह का तो अभी तो नहीं है और उस वक्त भी नहीं था। राइट ज्योति मेरा आखिरी सवाल आपसे यह है। हालांकि मुझे बार-बार यह लग रहा है। मुझे नहीं पता कि आपको ऐसा आप कैसा महसूस कर रही होंगी। मुझे लगता है कि हालांकि मैं उस वक्त फील्ड पे नहीं था। मैं रिपोर्टिंग नहीं कर रहा था और मैं अपने पेरेंट्स को अटेंड कर रहा था। लेकिन आप फील्ड पे थी। आपने बहुत सारी स्टोरीज देखी। बहुत सारे ग्रिम सिचुएशंस देखे हैं। आपने बहुत लोगों को परेशान हालत में देखा और यह कल्टर्मिनेट हो के कहीं ना कहीं आपके दिलो दिमाग में बैठ जाता है। और कई बार आप सोचते हैं उसके बारे में। अब जब आपकी किताब रिलीज हो गई है। डू यू फील दैट इट इज़ आल्सो अ फॉर्म ऑफ एक्सप्रेशन व्हिच आल्सो रिलीजेस यू फ्रॉम दोज़ मेमोरीज फॉर नाउ या यह मेमोरीज आपकी जिंदगी में रहेंगी और कहीं ना कहीं आपको परेशान करेंगी। और मैं बार-बार इसलिए परेशान कह रहा हूं क्योंकि शायद कुछ लोग हो जो कुछ लोग होते हैं जो ऐसे थॉट से ऐसे इमेजरी से ऐसे स्टोरीज से थोड़ा ट्रोमेटाइज हो जाते हैं और तो आपके सिचुएशन में ऐसा क्या है? मतलब एक तो कोविड फॉर मी वास अबाउट डेथ एंड इट वास नॉट यू नो इन माय सर्कल और समवन दैट आई न्यू जितने भी लोग जिनसे मिली या जिनकी जिनके मैंने आखिरी चेहरे देखे दे वर स्ट्रेंजर्स लेकिन डेथ बहुत ही अनसेटलिंग होता है एंड स्पेशली एट अ यंग एज और उस वक्त तो बिल्कुल मतलब पहले तो कोई पॉज था नहीं तो ऐसा रिफ्लेक्ट नहीं कर पा रहे थे कि व्हाट इट मींस टू विटनेस डेथ एंड राइट अबाउट इट। एंड लेटर व्हेन आई स्टार्टेड राइटिंग बिकॉज़ अह द मोस्ट डिफिकल्ट पार्ट ऑफ़ दिस बुक वाज़ रिपोर्टिंग। क्योंकि वो तो एकदम डेडली था और आप किस तरह से उस वायरस के अटैक से बच के आ जाए। फिर लिखना भी मेरे लिए बहुत आसान नहीं था। कई बार सोचा क्या नैरेटिव हो? किस स्टोरी को किस तरह से लिखा जाए। फिर हमने सोचा कि रिपोर्टर के लेंस से लिखते हैं इसको। क्रोनोलॉजिकली लिखते हैं। स्टार्ट करते हैं दिल्ली से एंड वन डिस्ट्रिक्ट वन डिस्ट्रिक्ट एंड वन थीम विल लीड टू अनदर कि अगर जौनपुर में लोग आए तो फिर उसके बाद क्या हुआ? वाराणसी के गांव में क्या हुआ? वाराणसी से फिर हम बक्सर पहुंचते हैं। वहां हॉस्पिटल में वेंटिलेटर नहीं है। तो ये सब हमने डिसाइड किया। लिखते टाइम भी ना बहुत मैं इसको इसको अवॉइड कर रही थी क्योंकि बहुत दिमाग में ना ताजा हो जाती है। तो जब मैं लिखने बैठती थी 2022 में भी 23 में भी और मैं काम भी कर रही थी लगातार लेकिन लिखते ही वह सारी ड्रेडफुल मेमोरीज ना दे जस्ट यू नो कम बैक टू यू यू आर यू फाइंड योरसेल्फ इन दैट हॉस्पिटल जहां पे एक एक सिलेंडर से चार पेशेंट जो है हाहा कर रहे हैं और मतलब आप हेल्पलेसली सिर्फ यू वाच पीपल डाई इन फ्रंट ऑफ यू यू आर नॉट अ डॉक्टर यू नॉट अ नर्स यू आर नॉट एन एन एन एन एन एन एन एन एन एन एडमिनिस्ट्रेटर क्या कर सकते हो आप उसमें आप ऐसे खड़े हैं तो था लेकिन आई हैव नेवर सॉर्ट एनी प्रोफेशनल हेल्प कि मैं मतलब जाऊं कि मैंने इस तरह की कवरेज की है और मुझे मतलब मेरी नॉर्मल लाइफ में उस तरह के कुछ आए। लेकिन अभी जैसे मैं अपने फैमिली में जब हम बैठ के बात करते हैं तो हम सबसे ज्यादा जो मेरे दिमाग में अब आता है जब मैं खुद भी वापस देखती हूं अपनी फोटो। सो आई वास इफ यू यू लुक एट माय फोटो सम ऑफ़ द फोटोज। आई वास माइल नरिश्ड। आई वास नॉट हैविंग प्रॉपर मील्स क्योंकि हाइड्रेशन ही नहीं था। सुबह पानी पी के निकलो तो तीन मास्क लगा के आप उतारना नहीं चाहते क्योंकि आपको लगता है कि हॉस्पिटल में खड़े हो तो आपको ही हो जाएगा। तो बहुत बुरी मतलब मैं आई थिंक अपने हेल्थ के हिसाब से कहूं तो आई वाज आई वाज वीकर फिजिकली वीक। एंड मेंटली तो एकदम कुछ था ही नहीं। आफ्टर मतलब आफ्टर रिटर्निंग टू दिल्ली मैंने थोड़ा ब्रेक लिया था 10-15 दिन का। मैंने ऑफिस में अपने कहा भी था कि मुझसे कुछ हो नहीं रहा है। मतलब जस्ट गिव मी अ ब्रेक। आई वास गिवन अ ब्रेक। थैंकफुली। मैंने अच्छे से ब्रेक लिया। लेकिन उसके बाद कभी उस तरह से मैंने इसको मतलब आई ट्राई टू स्टे अवे फ्रॉम द स्टोरीज। क्योंकि जैसे अगर मैं कल्याणी की स्टोरी से सबसे ज्यादा मैं आई एम अ मदर। आई आई कैन रिलेट टू हर। तो मुझे अभी भी अगर उसकी स्टोरी में बहुत मैं उसको खुद भी पढूंगी तो फिर मैं अपने आपको उसी 5 साल पुराने में चाहूंगी। तो आई ट्राई हार्ड नॉट टू नॉट टू गो बैक टू दी स्टोरी दोज़ मेमोरी सम हाउ मतलब लगता है कि ठीक है हो गया और अब एक रिलीफ भी है जैसा आपने कहा कि किताब किताब लिखने के बाद एक आपने एक्सप्रेस कर दिया अपने को जी मेरा हो गया तो फिर नहीं है लेकिन कोई भी इस तरह के करते हैं अभी मैं आप अगर आज मुझसे पूछा जाए तो इफ समवन यंग अगर कोई ऐसा जाता है आपकी टीम में से रिपोर्टिंग करने आई वुड सजेस्ट कि दे दे सीक प्रोफेशनल हेल्प एंड एंड वंस वंस दे रिटर्न फ्रॉम मे बी कवरिंग वॉर कवरिंग पेंडेमिक्स कवरिंग फ्लड्स तो आके थोड़ा सा आप कर लें तो उससे थोड़ा लाइफ में पर्सपेक्टिव भी मिलता है एंड यू आर एबल टू मे बी डिटच योरसेल्फ फ्रॉम द स्टोरीज एंड यू आर एबल टू लुक लुक एट देम फ्रॉम फ्रॉम अ डिफरेंट लेंस थोड़ा दूर होके आप स्टोरीज को देख सकते हैं। कोरोना में पॉसिबल ही नहीं था कि आप वो दूरी बनाएं अपने रिपोर्टर और जो सब्जेक्ट है वो दूर-दूर हैं। उस तरह का तो नहीं हो रहा था। बट सम ऑफ द स्टोरीज आई एम स्टिल अटैच टू एंड आई ट्राई नॉट टू थिंक अबाउट देम एंड कल्याणी अग्रहरी स्टोरी वास वन ऑफ देम राइट ज्योति इस दौरान आपको भी कई बार कोविड आपने भी कॉन्ट्रैक्ट किया था एस फ एस आई अंडरस्टैंड जी फर्स्ट वेव में मुझे दिसंबर में हुआ था इन द सेकंड वेव आई वास इन लखनऊ एंड आई वास फॉलिंग सिक मुझे ऐसा लग रहा था कि शायद वो जो डेथ का पूरा सीन मैं देख के आती हूं ना उससे मेरे को आई लॉस्ट माय एपेटाइट आई वाज़ नॉट हैविंग मील्स एंड आई वाज़ द ओनली पर्सन स्टेइंग इन दैट होटल ये किसी में गोमती नगर या कहीं पे रह रही थी तो ड्राइवर आ जाते थे मेरे साथ अरुणेश जी और फिर दो दिन हुआ तो मतलब दिमाग में एक शक हुआ कि मतलब मैंने सोचा था कि कोरोना एक बार हो गया तो दोबारा तो हो ही नहीं सकता। फिर आने लग गई कि जिनको कोरोना एक बार हुआ है वो दोबारा आके वो लोग कई बार लोग मर भी जा रहे हैं। तो फिर पैनिकिक हो गया तीसरे दिन तक तो फिर मैं गई ऑक्सीमीटर देखने कि मेरी मेरी ऑक्सीजन का लेवल क्या है? तो पूरे लखनऊ में ऑक्सीमीटर ही नहीं है। दिल्ली में बैठे ऑफिस के कलीग्स भी मदद नहीं कर सकते। तो मैं गई बहुत आउटर पर जाके मैं उसके सिक्स पता नहीं कितना कुछ ढाई तीन 4000 का कोई ऑक्सीमीटर मैं लेकर आई। फिर देखा तो ऑक्सीजन थोड़ी सी कम लग रही थी। तो फिर मैं तुरंत अपना टेस्ट कराने भागी किसी हॉस्पिटल। वहां गई तो इतनी लंबी लाइन थी। अब कोई शॉर्टकट भी नहीं है। सब लोगों को उतनी इमरजेंसी है। तो मैंने दे दिया अपना कोविड का जो टेस्ट था तो अपना करा लिया। लेकिन उसको आने में 7 दिन का मुझे वेटिंग मिला था। मैंने कहा सात दिन में अगर मैं इस होटल में मर गई तो मुझे तो कौन देखेगा? फिर सम हाउऊ किसी हॉस्पिटल के ओनर से किसी को फोन करा के मैंने दो या तीन दिन में अपनी रिपोर्ट मांगी। वो नेगेटिव थी। लेकिन मुझे सारे सिम्टम्स कोविड के थे। तो अल्टीमेटली मैं वाराणसी में जाके आई आई आस्क्ड माय ऑफिस दैट आई एम गोइंग टू गेट माय सिटी स्कैन डन। उन्होंने कहा कि इतना डरने की बात नहीं है। बट आई वास स्केयर्ड। मैंने कहा नहीं एक बार सिटी स्कैन से भी कंफर्म कर लेते हैं दैट आई डू नॉट हैव कोविड। और फिर थैंकफुली मुझे कोविड नहीं था सिटी स्कैन के बाद वाराणसी में। तो फिर मैंने एकदम आराम से अपना पूरा किया। वो सिकनेस मुझे लगता है कि खाने पीने की और डिहाइड्रेशन की वजह से मुझे हुई होगी और हो सकता है कोविड नहीं रहा होगा और हो सकता है रहा भी हो अपने आप रिकवर हो गया हो आई कांट आई एम नॉट श्योर बट माय कोविड टेस्ट केम नेगेटिव राइट ज्योति एंड दिस मस्ट हैव बीन वन ऑफ़ द टफेस्ट असाइनमेंट ऑफ योर जर्नलिस्टिक करियर राइट या आई हैव बीन इन जर्नलिज्म फॉर फॉर अ डेकेड नाउ एंड दिस वाज़ द टफेस्टिंग वाज़ द टफेस्ट ऑफ़ योर जर्नलिस्टिक करियर राइट डू यू हैव एनी मैसेज फॉर यंग जर्नलिस्ट हु आर गोइंग गोइंग आउट टू रिपोर्ट ऑन फील्ड्स टुडे। आज मैं देखता हूं आज के दौर में देखता हूं। आई थिंक दिस इज समथिंग दैट आई थिंक पॉलिटिकली माइट नॉट बी द राइट थिंग टू से बिकॉज़ अ लॉट ऑफ़ यंग पीपल मूव टुवर्ड्स इज़ियर पाथ ऑफ रिपोर्टिंग जहां पे वैलिडेशन है जहां पे रिकॉग्निशन है जहां पे अवार्ड्स हैं। लेकिन मुझे लगता है कि कई सारे ऐसे मुद्दे आज की डेट में हैं जिसको मेन स्ट्रीम मीडिया बहुत ज्यादा इग्नोर करती है और कहीं ना कहीं वो अल्टरनेटिव स्पसेस से जो नॉन लेगेसी मीडिया है उस स्पसेस से भी डिसअपीयर हो रहे हैं क्योंकि रिपोर्टर शायद उसमें बहुत ज्यादा इंटरेस्ट नहीं शो कर रहे हैं। स्पेशली मैं अगर माइनॉरिटी के अगेंस्ट वायलेंस की बात करूं तो मुझे लगता है अगर एक दो प्लेटफॉर्म्स को छोड़ दें तो बहुत ज्यादा कवरेज उस तरफ किसी का नहीं है और व्हाट मैसेज डू यू हैव टू कन्व टू यंग जर्नलिस्ट हु माइट बी वाचिंग दिस शो एंड एंड मे बी विलिंग टू टेक लेसंस फ्रॉम यू आई वुड नॉट लाइक टू बैच द यंग रिपोर्टर्स बिकॉज़ आई वास आल्सो वंस अ यंग रिपोर्टर एंड मेरे सामने मतलब जब मैं 2016 16 में मैंने एंट्री किया जर्नलिज्म में तो उस वक्त डिजिटल मीडिया का राइज़ हो रहा था। तो जो जो आइडियल्स हमारे सामने होते हैं उस वक्त तो हम जैसे रवश कुमार थे उस वक्त तो एक यंग जो लोग होते हैं मुझे लगता है बहुत आइडियलिस्टिक तो होते ही हैं और बहुत पैशन ड्रिवन होते हैं लेकिन अभी अभी 2026 में अब उनके पास जो सबसे बड़े उनके जो उदाहरण है उनके पास यूर्स हैं। तो उसी से ये हमारी रिस्पांसिबिलिटी भी है। एक तरह से मैं तो अपने आप पर ही लेती हूं कि अगर कोई यंग मुझे देखे तो मैं किस तरह का उदाहरण सेट करूं। अ ये बात बहुत पिछले चार पांच साल से कॉन्शियसली मैं सोचती हूं। तो जो जो नर्चरिंग और इस तरह की होनी चाहिए वो तो न्यूज़ रूम्स ही पैदा करेंगे अच्छे रिपोर्टर्स। अच्छे एडिटर्स की रिस्पांसिबिलिटी है कि वो अच्छे रिपोर्टर्स पैदा करें। लेकिन हमने देखा है कि रिपोर्टिंग में कोई अब इन्वेस्ट भी नहीं करना चाहता है। ग्राउंड रिपोर्टिंग इज एक्सपेंसिव। यू नीड रिसोर्सेज, यू नीड पीपल आर विलिंग टू ट्रेवल एंड दे आर दे आर विलिंग टू वर्क बट यू नीड टू होल्ड देयर हैंड्स। यू नीड टू गाइड देम। वो चीजें न्यूज़ रूम से थोड़ा सा ना डिसअपीयर हो रही हैं। और इंडिपेंडेंट में आई बिलीव दैट देयर आर देयर आर चैलेंजेस क्योंकि उनके पास लॉजिस्टिक्स के भी बहुत बड़े चैलेंज है और दे जस्ट ट्राई टू मतलब जिनका मिनिमम रिसोर्स है वो जितना कर सकते हैं अगर वो एक सिर्फ एक वीडियो से काम चल जाता है तो वो दे वुड नॉट वांट टू क्यों क्यों जाएंगे अगर उनके पास नहीं इट इज मोर टू डू विद विद पीपल आई मीन द कॉर्पोरेट्स और जो जो भी मीडिया में फंड कर सकते हाथ खींच रहे हैं। इस वजह से मुझे लगता है कि चाहे माइनॉरिटी के इशू हो, जेंडर के हो, वो सारे मुद्दे धीरे-धीरे सरफेस पे अब प्रिशा शर्मा शर्मा का जो केस है अब क्योंकि उसमें केस जो है उसमें आपको अच्छे व्यूज मिल रहे हैं। Twitter पे वायरल इसलिए वो उसमें लगे हुए हैं। लेकिन अगर आप किसी एक और डोरी डेथ की बात करेंगे तो उसमें भेज के वो आरटीआई लगाकर नहीं देखेंगे या उस तरह की चीजें नहीं करवा रहे हैं। अगेन, आई आई थिंक आई वुड लाइक टु बिलीव दैट दिस द प्रॉब्लम लाइ ऑन द अदर साइड अह ऑन द अदर साइड। इट इज़ टु डू विथ द एडिटर्स एंड द द प्रमोटर्स ऑफ़ गुड जर्नलिज्म एंड विलिंग टू टेक दैट रिस्क। अब्सोलुटली टू द पॉइंट ज्योति। अह थैंक यू सो मच ज्योति कि आपने हमें वक्त दिया और इस इंटरव्यू को अंजाम दिया और हम बहुत-बहुत शुक्रिया आपको करते हैं अपने तहे दिल से और उम्मीद करते हैं कि जो लोग इस इंटरव्यू को देखेंगे वो इस इंटरव्यू से कुछ कुछ इंपॉर्टेंट एलिमेंट्स को निकाल पाएंगे, कुछ समझ पाएंगे जो उस दौरान में कोविड के दौरान हुआ। जिस तरह के इनफरेंसेस थे अथॉरिटीज की, गवर्नमेंट की उसको समझने की कोशिश करेंगे। और ज्योति मुझे लगता है कि आपकी ये किताब उस राह में एक बहुत बड़ा माइलस्टोन है। एंड आई विश यू ऑल द बेस्ट विथ दिस बुक एंड विश यू ऑल द बेस्ट फॉर योर वर्क अहेड। थैंक यू सो मच। थैंक यू सो मच फॉर हैविंग मी। बहुत अच्छी बातचीत रही और आई रियली होप कि अब कोई भी टेक अवे से ले सकें लोग और यह हमारा एक तरह से हमारा सौभाग्य ही होगा कि हम कुछ कंट्रीब्यूट कर पाए सोसाइटी में मीनिंगफुली। थैंक यू सो मच ज्योति।

Companion article

A book five years in the making

Journalist Jyoti Yadav began reporting on India's Covid-19 migrant exodus during the first wave of 2020, when a publisher first approached her about turning her dispatches into a book. The project kept getting overtaken by events: a second wave arrived before the manuscript could progress, and Yadav found herself extending the work instead, following the same migrant workers and families across roughly three or four more years to track what the pandemic had actually done to their lives. She made her last round of follow-up visits in 2024, edited through 2025, and the book, "Faith and Fury," finally appeared this year. Her publisher pushed to drop "Covid" from the title entirely, she says, sensing pandemic fatigue among readers — "everywhere I went, people said they didn't want to hear about corona anymore."

The title's two halves describe two things she kept encountering on the road. "Faith" covers moments like the migrant workers who refused to abandon their bicycles even when offered a lift by truck or bus — for many, Yadav says, a bicycle was their only reliable means of mobility, and letting go of it felt like giving up the one thing certain to get them home. It also covers a woman she met running a roadside langar at the Uttar Pradesh–Bihar border who was herself dependent on government rations, yet showed up to feed passing workers anyway; and villagers near Rampur and Bareilly who handed out buttermilk and water to migrants forced by police barricades to walk an extra 25–30 kilometres. "Fury" is what she found running underneath nearly every class she encountered except the ruling elite — rage at the oxygen shortages, at the chaos of the Shramik trains, and at cases like a Punjab family given four hours' notice before a 12–13 hour train journey with no food or water, during peak heatwave conditions.

A failure with no accounting

Yadav is blunt about the central argument of her reporting: the migrant exodus was a failure of the state, and five years on, she sees no meaningful accountability for it. She points to Bablu Paswan, from a remote village on the India–Nepal border in Madhubani district, who paid ₹4,000 to travel part of the way home by truck during the first wave, walked the rest through the night, and was quarantined in a government school. Years later, he remains poorer than before, still carrying pandemic-era debt, and was thrown out of work again during the recent cooking-gas subsidy crisis — forced into the same crowded trains, "packed like livestock," that defined 2020.

When Yadav tried to check whether state labour departments in Uttar Pradesh or Bihar — the two states that send the most migrant labour outward — had even collected internal data on how many workers left and returned after the first wave, she found nothing reliable. "Without a solid data set, how are you going to frame policy?" she asks. If a single reporter could gather migration figures from a panchayat, she argues, state governments with far greater resources could have done the same and simply didn't. The daily wage for the workers she has followed since 2019 has stayed frozen at roughly ₹500 even as inflation has climbed steadily through 2026 — a stagnation she reads as evidence that no real investigation or correction ever followed.

Counting the dead by counting the pyres

Much of Yadav's most consequential reporting involved establishing, empirically, that India's official Covid death counts were undercounted — work she pursued by visiting crematoria and burial grounds directly and comparing what she saw there against municipal health bulletins, which tracked only deaths that occurred inside hospitals. Many patients, she found, never reached a hospital at all, or received a positive test result only after they had already died — deaths the official count simply never captured. Her early story on undercounted deaths, filed from Lucknow, was among the first to expose the scale of the gap using numbers rather than anecdote alone. She says she faced no institutional pressure from her employer to suppress the figures; if anything, her editor pushed her to substantiate the "gap" she suspected with hard data precisely because lived testimony alone was too easy for authorities to dismiss.

The reporting itself was gruelling. Beyond her single prior experience attending a funeral, Yadav had no history of spending time at cremation grounds, and she did so during peak heatwave conditions, layering N95 and surgical masks against a virus whose transmission routes seemed to change by the week. Sitting at burning ghats and asking grieving families whether their relative's death had been Covid-related was, she says plainly, "not a good experience" — but it was there that the mechanics of the undercount became visible firsthand.

The guilt of an empty seat

One of the book's most personal passages describes a moment on the road out of Lucknow, travelling with a colleague and driver, passing long columns of migrant workers on foot — elderly people in their sixties, toddlers being carried, women bearing heavy loads. When the crew stopped to interview people, most families spoke openly about their exhaustion and their journeys. But Yadav describes the discomfort of climbing back into a vehicle with an unused seat while the same people continued walking, their eyes following the car as it pulled away. At one point, a group directly asked if the car could take just one person. Deciding who among a crowd of equally desperate people was "most" needy, she says, became close to impossible — every person had a sick relative, an infant, or an elderly parent that made them count. Journalists are also engaged in surveillance and data-gathering, not relief work, she notes, and taking on relief functions carried its own risk: reporters at the time faced accusations of spreading the virus themselves simply by getting close to migrants for interviews.

Reporting alone, as a woman

Yadav also details the particular hazards of covering the exodus as a solo woman reporter. Normal safety precautions — sharing live location with family, avoiding travel after dark — became harder to maintain because police, who would ordinarily provide some ambient security at checkpoints, had been redeployed almost entirely to Covid management: guarding hospitals, patrolling oxygen plants, enforcing red-zone lockdowns. That left deserted roads with essentially no law-enforcement presence. She recalls a reporting trip to Araria in Bihar, covering Covid orphans, where a washed-out road forced her to travel the final leg by motorbike with an unverified local escort for roughly 12 kilometres — an experience she says she spent praying through, replaying viral videos of gender-based violence in her head the entire way. She completed her coverage through to when Covid case numbers finally declined, but says in hindsight, news organizations sending solo women reporters into such conditions should have taken far more precaution than they did.

What became of the "Girl of Bihar"

Yadav revisited one of the pandemic's most famous individual stories: Jyoti Kumari, dubbed the "Girl of Bihar" for cycling her injured father roughly 700 kilometres to Darbhanga over seven or eight days during the first lockdown. At the time, Kumari became a national symbol of resilience — praised by figures including Ivanka Trump, courted by Bihar politicians including Tejashwi Yadav and Chirag Paswan, who promised to fund her education, and approached by a filmmaker who announced plans for a biopic. By the time Yadav caught up with her again in 2024, however, Kumari's father had died of a heart attack in 2021 (unrelated to Covid), the promised film had never materialized, and Kumari herself had never enrolled in the college education she had hoped for and that ministers had publicly promised to support — the ministers in question having since lost their portfolios in Bihar's shifting governments. The one durable change in her circumstances was a new house, built with money from the media attention itself. "If someone this visible, this celebrated, ends up back in obscurity," Yadav says, "you can only imagine what happened to the millions who never had a spotlight at all."

The Dom community's uncredited labour

Perhaps the sharpest thread in Yadav's reporting concerns caste — specifically the Dom community, traditionally assigned the work of cremation in Hindu ritual practice. During the pandemic's worst stretches, Dom workers in Varanasi and Patna worked 40-hour stretches without rest, living, eating and sleeping among the dead, often performing final rites for bodies that families themselves refused to approach, watching instead from a distance amid stigma and fear of infection. Electric crematoria frequently broke down under the volume and heat, shifting the burden onto wood-pyre cremation performed largely by Dom labourers. They received no protective equipment — one worker told Yadav that the standard-issue Covid PPE kits were unusable in their conditions, "made for people sitting in air conditioning" — and some were beaten by police for leaving their settlements to buy food, because their work was never classified as an "essential service" entitled to a movement pass.

Yadav argues this labour was almost entirely absent from the national "Covid hero" narrative that centred doctors, bureaucrats and politicians — a narrative, she notes, that reflects whose caste and class position gets written as heroism in the first place. Some alternative outlets and a BHU research paper did document the Dom community's role, she says, but mainstream coverage largely ignored it; Patna's Dom workers were nominally "felicitated" at an Independence Day event that year but seated without any real honour attached. "If any other caste or class had done this work," she says, "we would acknowledge it completely differently."

Superspreaders, unevenly scrutinized

Yadav is careful in the book to avoid singling out any one religious gathering as uniquely responsible for spreading the virus, noting that Holi melas across north India, the Kumbh-adjacent crowds at Haridwar, political rallies, and UP's local body elections all created comparable risk during the same period — even as the Tablighi Jamaat congregation in Delhi drew disproportionate media scrutiny and blame. She traces one wedding "superspreader" event in Patna through Madhu, a Covid widow whose family attended a wedding on April 28, just days before Bihar's government imposed a lockdown on May 4 — timing Madhu says left her, as she put it, with no way to have known how seriously to treat the virus, since the government's own actions signalled it wasn't yet urgent.

As for the explicitly communal language that circulated around the pandemic — terms like "Covid jihad" — Yadav says she encountered it prominently in social media and prime-time television debate, and saw it surface aggressively in Delhi's National Capital Region specifically, but did not find it dominant in her ground reporting across Uttar Pradesh and Bihar, where local explanations for the virus varied instead by region: a "Chinese virus" theory in Haryana, government-conspiracy theories about vaccination in parts of UP, and — among some Dom and Musahar community members Yadav interviewed — a belief that their own low Covid mortality reflected superior immunity, since "this was something that only happened to the rich."

The cost of witnessing

Yadav is candid about the reporting's personal toll: she was visibly malnourished in photographs from the period, dehydrated from hours in triple-layered masks, and contracted Covid herself during the first wave in December before what she suspected was a possible reinfection in Lucknow during the second — a scare that sent her hunting for an unavailable oximeter across the city before a CT scan in Varanasi came back negative. She took a fifteen-day break after returning to Delhi and has since deliberately avoided revisiting certain stories, particularly that of Kalyani Agrahari, saying she still finds herself pulled back into the trauma of that period when she does. She recommends young reporters covering disasters, conflict or pandemics actively seek professional psychological support — support she never sought herself but wishes she had — and closes with a broader concern that Indian newsrooms are investing less, not more, in the kind of resource-intensive ground reporting that surfaced stories like the Dom community's uncredited labour in the first place, particularly on minority-focused violence that she says now struggles to find sustained coverage even in independent media.

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