15th अगस्त आते ही कुछ नाम फौरन जेहन में आ जाते हैं। महात्मा गांधी, भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और मौलाना आजाद जैसे कुछ नाम लेकिन हिंदुस्तान की आजादी की कहानी इन नामों पर खत्म नहीं होती। इस मुल्क की आजादी के लिए हजारों लोग लड़े। कुछ ने बरसों जेल की सलाखों के पीछे गुजार दिए। कुछ फांसी पर चढ़ गए और कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी वतन से दूर रहकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ दुनिया भर में लड़ाई लड़ी। मगर अफसोस आज उनके नाम हमारी किताबों में मुश्किल से मिलते हैं। आज हम आपको ऐसे ही दो मुस्लिम फ्रीडम फाइटर्स से मिलवाएंगे। एक जो उस हुकूमत का प्रधानमंत्री था जिसने काबुल से रूस के सम्राट निकोलस टू के नाम सोने की तश्तरी पर एक खत भेजा ताकि हिंदुस्तान की आजादी के लिए सम्राट की मदद हासिल की जा सके और दूसरे ने कोलकाता की एक गली में अपना अखबार दीवार पर चिपका दिया वजह थी जिनके लिए वो लिख रहे थे वो अखबार खरीद नहीं सकते थे और ज्यादातर पढ़ भी नहीं सकते थे| दोनों आजादी का मुतालबा कर रहे थे| यह कहानी है मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और मौलाना अली हुसैन आसन बिहारी की।
अगर मैं आपसे पूछूं हिंदुस्तान का पहला प्रधानमंत्री कौन था? ज्यादातर लोग जवाहरलाल नेहरू का नाम लेंगे। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी से पहले भी हिंदुस्तान की एक प्रोविजनल गवर्नमेंट बनी थी और उसके प्रधानमंत्री थे मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली। मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली 7 जुलाई 1854 को भोपाल के एक इतवारा मोहल्ले में पैदा हुए थे। शुरुआती तालीम भोपाल में हुई। अरेबिक, पर्शियन और उर्दू से शुरुआत हुई। लेकिन इल्म की तलाश उन्हें दुनिया भर में ले गई। आगे चलकर उन्होंने इंग्लिश, जर्मन, जापानीज और टर्किश समेत सात जबानों पर भारत हासिल की। 1880 के दशक में उन्होंने हिंदुस्तान छोड़ दिया। उनका मानना था कि ब्रिटिश एंपायर को अकेले हिंदुस्तान के अंदर से नहीं तोड़ा जा सकता। उसे चारों तरफ से घेरना पड़ेगा। भोपाल से निकले तो पहला पड़ाव था इंग्लैंड। 1895 में उन्हें लिवरपूल के मुस्लिम इंस्टिट्यूट में काम के लिए बुलाया गया। लेकिन यह सफर सिर्फ नौकरी का नहीं था। यहीं से उनका रिश्ता उन इंकलाबी हल्कों से जुड़ा जो हिंदुस्तान की आजादी का ख्वाब देख रहे थे। आगे चलकर वो लाला हरदयाल और राजा महेंद्र प्रताप जैसे लीडर्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। अंग्रेजी हुकूमत से उनकी पहली सीधी टक्कर भी यही हुई। जब ब्रिटेन के फॉर्मर पीएम ग्लैडस्टोन ने हिंदुस्तानियों के बारे में रेसिस्ट और इंसल्टिंग बातें कही तो बरकतुल्लाह ने मज़ामीन लिखे, तकरीरें कीं और खुलकर जवाब दिया। नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों ने उन पर सख्त नजर रखनी शुरू कर दी। लेकिन बरकतुल्लाह रुकने वालों में से नहीं थे। अगला पड़ाव था जापान। 1899 में वो जापान पहुंचे, जहां उन्हें यूनिवर्सिटी ऑफ टोक्यो में ओरिएंटल लैंग्वेज के प्रोफेसर के तौर पर अपॉइंट किया गया। वहीं रहते हुए उन्होंने पहले इस्लामिक फ्रेटरनिटी नाम का रिसाला निकाला। जब उस पर पाबंदी लगी तो उन्होंने एल इस्लाम नाम से एक अखबार निकाला। उर्दू और अंग्रेजी दोनों जुबानों में वो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लिखते रहे। उनका लिखा हिंदुस्तान तक पहुंचने लगा और इतना असरदार था कि ब्रिटिश सरकार ने जापान पर दबाव डालकर उन पर भी रोक लगवाने की कोशिश की। लेकिन बरकतुल्लाह झुकने वालों में से नहीं थे। इसी दौरान 1913 में उनका सफर उन्हें सैन फ्रांसिस्को ले गया, जहां वो गदर पार्टी से जुड़ गए। उनका मकसद बिल्कुल साफ था। कोई दरख्वास्त नहीं, कोई रेजोल्यूशन नहीं। वो चाहते थे कि अंग्रेजी फौज में भर्ती हिंदुस्तानी सिपाही अपनी बंदूक घुमा दें। और उधर टोक्यो में अगले ही साल 1914 में उनकी प्रोफेसरशिप भी खत्म कर दी गई। जरा सोचिए एक प्रोफेसर की नौकरी छीनने के लिए पूरी एंपायर को दखल देना पड़ा। इससे अंदाजा लगाइए कि बरकतुल्लाह अंग्रेजों के लिए कितने बड़े खतरे बन चुके थे। इधर गदर का पैगाम भी तेजी से फैल रहा था। देखते ही देखते वो 12 से ज्यादा मुल्कों तक पहुंच गया। और हजारों हिंदुस्तानी अपनी रोजी-रोटी छोड़कर वतन लौट पड़े। लेकिन बरकतुल्लाह की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से नहीं थी। वो हिंदुस्तानियों को भी एक करना चाहते थे। शायर हसरत मोहानी को लिखे एक पर्सनल लेटर में उन्होंने लिखा, हिंदुस्तान के मुसलमानों पर दो फर्ज हैं। एक मुल्क का और एक दीन का। और ये दोनों फर्ज तभी पूरे हो सकते हैं जब हिंदू और मुसलमान पूरी तरह एक हो जाएं। फिर आया दिसंबर 1915। उस वक्त पहली वर्ल्ड वॉर चल रही थी। बरकतुल्लाह, राजा महेंद्र प्रताप और मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी काबुल पहुंचे और बागे बाबर में हिंदुस्तान की पहली प्रोविजनल गवर्नमेंट का ऐलान हुआ। हिंदुस्तान के बाहर, अंग्रेजों की पहुंच से दूर। अब जरा देखिए इस हुकूमत को चला कौन रहा था? इसके प्रेसिडेंट थे राजा महेंद्र प्रताप, एक हिंदू राजा। प्राइम मिनिस्टर मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, भोपाल का एक मौलाना। और होम मिनिस्टर मौलाना उबैदुल्ला सिंधी, एक सिख घराने में पैदा हुए जिन्होंने बाद में इस्लाम कबूल किया। यह सिर्फ नाम की फेहरिस्त नहीं थी। यह उस हिंदुस्तान की तस्वीर थी जिसका वो ख्वाब देख रहे थे — एक ऐसा मुल्क जो किसी एक मजहब का नहीं है। यही वो हुकूमत थी जिसने जार यानी रूस के सम्राट को खत भेजा। जर्मनी और तुर्की से भी बात की। रूस के सम्राट ने मना कर दिया, तो 1919 में बरकतुल्लाह खुद मॉस्को पहुंचे और लेनिन से मिले — एक मौलाना, एक कम्युनिस्ट इंकलाबी के सामने, और बस एक ही मुद्दा था, हिंदुस्तान की आजादी। लेकिन बरकतुल्लाह अपने वतन कभी लौट नहीं सके। सितंबर 1927 में सैन फ्रांसिस्को में उनका इंतकाल हुआ। दफन सैक्रामेंटो में हुए। उम्र थी 73 साल। चार महाद्वीपों में जिंदगी गुजारी, लेकिन आजाद हिंदुस्तान का सूरज अपनी आंखों से कभी नहीं देख पाए।
बरकतुल्लाह ने दुनिया के नक्शे पर हिंदुस्तान की आवाज बुलंद की। आइए अब उस फ्रीडम फाइटर की तरफ चलते हैं जिसने हिंदुस्तान के अंदर अपने ही लोगों को जगाने का काम किया। लेकिन उससे पहले एक छोटा सा सवाल: ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस मुल्क में सबसे पहले किन चीजों पर हमला किया? जवाब है हिंदुस्तान का हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट। कभी हिंदुस्तान का कपड़ा पूरी दुनिया में मशहूर था, लेकिन कंपनी ने ऐसी पॉलिसीज बनाईं कि विदेशी कपड़ा हिंदुस्तान के बाजारों पर छा गया और लाखों बुनकर बर्बाद हो गए। यही दर्द बाद में अदब और शायरी का भी हिस्सा बना। शायर-ए-इंकलाब जोश मलीहाबादी ने अपनी मशहूर नज़्म "ईस्ट इंडिया कंपनी के फरजंदों से खिताब" में अंग्रेजी हुकूमत पर तंज करते हुए कहा — दस्तकारों के अंगूठे काटते फिरते थे तुम, सुनते हिंदुस्तान पर मौत थी छाई हुई।
इन्हीं बर्बाद होते बुनकर घरानों में 15 अप्रैल 1889 को बिहारशरीफ के खासगंज मोहल्ले में अली हुसैन पैदा हुए। घर गरीब था, पेशा बुनाई का था। लेकिन विरासत सिर्फ गरीबी की नहीं थी। उनके दादा मौलाना अब्दुल रहमान 1857 की बगावत में उस इलाके की कयादत करने वालों में से थे। पढ़ाई जल्दी खत्म हो गई। 16 साल की उम्र में रोजी की तलाश उन्हें कोलकाता ले गई, जहां उन्होंने ऊषा कंपनी में नौकरी शुरू की। यहीं वो खिलाफत तहरीक से जुड़े। जब अली ब्रदर्स — मोहम्मद अली जौहर और शौकत अली — गिरफ्तार हुए, तो आसिम बिहारी ने उनकी वालिदा बी अम्मा के जलसे ऑर्गेनाइज करने शुरू किए। इसकी कीमत भी उनको चुकानी पड़ी। तहरीक से जुड़े आदमी को नौकरी कौन देता है? नौकरी चली गई और नई नौकरी मिलनी भी बंद हो गई। लेकिन पेट भी भरना था और तहरीक भी जलानी थी। इसलिए रोजी के लिए उन्होंने वही काम शुरू किया जो उस दौर में शहर के सबसे गरीब लोग करते थे — बीड़ी बनाना। बाद में उन्होंने एक तखल्लुस रखा और उसी नाम से पहचाने गए, आसिम बिहारी। और यहीं से उनकी असली कहानी शुरू होती है। बीड़ी बनाते-बनाते उन्होंने अपने साथी मजदूरों की एक टोली बना ली। नाम रखा दारुल मुजाकरा, यानी बहस का घर। वहां मुल्क और समाज पर मज़ामीन लिखे जाते, पढ़कर सुनाए जाते और फिर उन पर बहस होती। सिर्फ 22 साल की उम्र में उन्होंने बड़ों की तालीम के लिए 5 साल का पूरा प्लान बना लिया। दो साल बाद अपने वतन नालंदा में बज्म-ए-अदब कायम की। जरा सोचिए, एक बीड़ी मजदूर अपने समाज की तालीम के लिए फाइव ईयर प्लान बना रहा था। फिर 1919 आया। जलियांवाला बाग के बाद पूरे मुल्क में गुस्सा था। लाला लाजपत राय, मौलाना आजाद और कई दूसरे लीडर गिरफ्तार कर लिए गए। आसिम बिहारी ने उनकी रिहाई के लिए एक अजीब कैंपेन चलाया। उन्होंने पूरे मुल्क से वायसराय के नाम खत और टेलीग्राम भेजने की अपील की — हर जिले से, हर कस्बे से, हर गांव से। कहा जाता है कि ऐसे पैगामों की तादाद करीब डेढ़ लाख तक पहुंच गई। अगले ही साल उन्होंने कोलकाता में तांतीबाग में जमीयत-उल-मोमिनीन की बुनियाद रखी। बाद में यही पूरे मुल्क में मोमिन कॉन्फ्रेंस के नाम से मशहूर हुई। पहली बार बुनकरों, दस्तकारों और मेहनतकश तबकों की अपनी एक सियासी आवाज थी। अप्रैल 1921 में उन्होंने वो चीज शुरू की जिससे हमने यह वीडियो शुरू की थी — दीवार अखबार, नाम था "अल मोमिन"। बड़े-बड़े कागजों पर मज़ामीन लिखे जाते, गली-मोहल्लों की दीवारों पर चिपकाए जाते और जो पढ़ नहीं सकता था उसे वहीं खड़े होकर पढ़कर सुनाया जाता। बाद में यही अखबार बाकायदा छपकर निकलने लगा। जरा सोचिए, उन्होंने यह इंतजार नहीं किया कि पहले लोग पढ़ना सीखें, फिर अखबार पढ़ें। उन्होंने अखबार ही ऐसा बना दिया जो पढ़े-लिखे और अनपढ़ दोनों तक पहुंच सके। इसीलिए उन्हें शायद "फादर ऑफ पसमांदा मूवमेंट" भी कहा जाता है। इसी दौर में तांतीबाग के एक जलसे में महात्मा गांधी, मौलाना आजाद और मोहम्मद अली जौहर भी पहुंचे। कहा जाता है कि गांधी ने तंजीम को एक लाख रुपये की पेशकश की, कुछ शर्तों के साथ। उस दौर में इतनी गरीब तंजीम के लिए एक लाख रुपये सब कुछ था। आसिम बिहारी ने मना कर दिया। उनका कहना था, अगर यह तंजीम मजदूरों की अपनी आवाज है तो यह किसी और की शर्तों पर नहीं चल सकती। जहां भी मोमिन कॉन्फ्रेंस की शाखा खुलती, वहां लाइब्रेरी भी खुलती, तालीम के मरकज भी खुलते, रोजगार की कोशिशें भी शुरू होतीं। आसिम बिहारी खुद कभी सदर नहीं बने, बहुत इसरार के बाद जनरल सेक्रेटरी बने और बाकी जिंदगी दूसरों को आगे करते रहे। तंजीम ने उनके लिए एक मामूली सा भत्ता तय किया, वो भी कई बार नहीं मिलता था। बीड़ी मजदूर उन्हें कमाली बाबा कहते थे और तहरीक में उनका नाम था कश्ती-ए-सफीर, यानी चलता-फिरता एंबेसडर। फिर 40 का दशक आया जब मुल्क की सियासत बंटवारे की तरफ बढ़ रही थी। आसिम बिहारी ने उसका खुलकर विरोध किया। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान सदियों से साथ रहते आए हैं, उन्हें लकीर खींचकर अलग नहीं किया जा सकता। उनका यकीन था कि बंटवारे का सबसे बड़ा नुकसान उन मेहनतकश तबकों को होगा जो पहले ही गरीबी और नाइंसाफी से जूझ रहे थे। 6 दिसंबर 1953 को इलाहाबाद के अटाला में हाजी कमरुद्दीन के घर में उनका इंतकाल हो गया। वहीं दफन हुए, ना जायदाद छोड़ी, ना ओहदा, बस एक तहरीक।
मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली और मौलाना अली हुसैन आसिम बिहारी — दो अलग-अलग शहर, दो अलग-अलग रास्ते, लेकिन एक ही मंजिल। एक ने दुनिया के नक्शे पर भारत की आजादी की आवाज बुलंद की। दूसरे ने हिंदुस्तान के अंदर उन लोगों को आवाज दी जिनकी आवाज कोई सुनना नहीं चाहता था। लेकिन दोनों की लड़ाई सिर्फ अंग्रेजों से नहीं थी। दोनों उस हिंदुस्तान का ख्वाब देख रहे थे जहां आजादी सिर्फ हुकूमत बदलने का नाम ना हो, बल्कि इंसाफ, बराबरी और बराबर शहरियत की बुनियाद हो। बरकतुल्लाह के लिए आजाद हिंदुस्तान वो था जहां एक हिंदू राजा और एक मुस्लिम मौलाना एक ही कैबिनेट में बैठ सकें। आसिम बिहारी के लिए आजादी वो थी जहां बुनकर का बेटा भी पढ़ सके, मजदूर की भी अपनी आवाज हो और समाज के सबसे कमजोर तबके भी सिर उठाकर जी सकें।
लेकिन यह कहानी सिर्फ बरकतुल्लाह और आसिम बिहारी की नहीं है। यह उन सैकड़ों लोगों की कहानी है जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी के लिए अपनी जिंदगी लगा दी। मगर आज उनकी याद भी हमारी याददाश्त से मिटती जा रही है। उनमें से कुछ नाम हैं अशफाकउल्ला खान, जिनकी उम्र सिर्फ 27 साल थी जब उन्हें काकोरी कांड के बाद फांसी दे दी गई। हसरत मोहानी, जिन्होंने "इंकलाब जिंदाबाद" का नारा बुलंद किया और सबसे पहले मुकम्मल आजादी की मांग रखी। सैफुद्दीन किचलू, जिनकी गिरफ्तारी के विरोध में जमा हुई भीड़ पर जलियांवाला बाग में गोलियां चलाई गईं। बेगम हजरत महल, जिन्होंने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ अवध की कमान संभाली। पीर अली खान, जिन्हें 1857 में पटना में फांसी दे दी गई। शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन, जिन्होंने माल्टा की जेल में बरसों कैद काटी। और बी अम्मा, जिनकी आवाज ने पूरे मुल्क में खिलाफत तहरीक को नई जान दी। यह फेहरिस्त बहुत लंबी है, और शायद इसलिए अधूरी भी, क्योंकि इसमें से बहुत से नाम हमारी किताबों तक कभी पहुंचे ही नहीं। आज भी इस मुल्क में एक पूरी कौम से बार-बार उनकी वफादारी का सबूत मांगा जाता है। लेकिन सवाल यह नहीं है कि सबूत है या नहीं। सबूत तो तारीख के हर सफे पर दर्ज है। सवाल सिर्फ इतना है, हमें वो सफे पढ़ाए क्यों नहीं गए?
और शायद यही वजह है कि लड़ाई आज भी खत्म नहीं हुई। अब सवाल यह नहीं कि किसने मुल्क के लिए क्या किया। सवाल यह है कि हमारी सामूहिक याददाश्त में किसे जगह मिलेगी और किसका नाम धीरे-धीरे मिटा दिया जाएगा। एक मिसाल देखिए, भोपाल में एक यूनिवर्सिटी है, करीब चार दशक से उसके नाम के साथ एक नाम जुड़ा हुआ है — बरकतुल्लाह। लेकिन 3 जून 2026 को उसकी एग्जीक्यूटिव काउंसिल ने एकमत होकर तय किया कि यह नाम हटा दिया जाए। फाइल अब गवर्नर के पास है। अब प्रपोजल में वजह क्या लिखी है? यह कि राजा भोज के मुकाबले बरकतुल्लाह का इस इलाके में कोई खास योगदान नहीं है, सिवाय इसके कि वो यहां के रहने वाले थे। सोचिए, जिस शख्स ने हिंदुस्तान की पहली प्रोविजनल गवर्नमेंट में प्राइम मिनिस्टर की जिम्मेदारी निभाई हो, जिसने अपनी पूरी जिंदगी मुल्क की आजादी के नाम कर दी, उसके बारे में कहा जा रहा है, कोई खास योगदान नहीं। और उधर आसिम बिहारी के साथ मामला और भी खामोश है। उनके नाम पर तो कभी कुछ रखा ही नहीं गया। एक की कब्र सैक्रामेंटो में है, दूसरे की इलाहाबाद में। एक आजाद हिंदुस्तान देख ही नहीं पाया, दूसरे ने देखा, लेकिन शायद वो हिंदुस्तान नहीं जिसका उसने ख्वाब देखा था।
इस 15 अगस्त जब आप तिरंगा लहराएं, तो सिर्फ उन लोगों को याद मत कीजिएगा जिनके नाम हमें याद करा दिए गए। उन लोगों को भी याद कीजिएगा जिन्हें हमारी याद से धीरे-धीरे मिटा दिया गया। क्योंकि तारीख सिर्फ लिखी नहीं जाती, तारीख याद भी रखी जाती है, और याद रखना भी एक सियासी अमल है। थैंक यू, शुक्रिया, हैप्पी इंडिपेंडेंस डे।
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