10:56India Has Stopped Talking About Lynching? nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=DZ5hEFotEU8&t=594s
What turns ordinary people into a violent mob? And how does hate speech travel from words to the streets? In this conversation, author and journalist Dayashankar Mishra speaks to senior journalist Bushra Khanum about his latest book, Akhlaq: Bharat Mein Mob Lynching Ki Vistrit Zameeni Padtaal. Th…
मोशन शेख को तो नहीं पता था कि कहां क्या हुआ है, हेट स्पीच [संगीत] हुई है। लेकिन वो हेट स्पीच ट्रैवल कर रही है। यानी वो ईंधन क्या है? मॉब लिंचिंग का ईंधन क्या है? मॉब लिंचिंग का ईंधन हेट स्पीच है। ये किताब जब आपने लिखनी शुरू की तो किस तरह की मुश्किलात का आपको सामना करना पड़ा है। आपने इसमें लिंचिंग को परिभाषित भी किया है। यानी लोग हत्यारी भीड़ में तब्दील हो जाए। ये गुस्सा उनके भीतर कौन भर रहा है? ये गुस्सा उनके भीतर कहां से आया? हम इस पर कोई सवाल नहीं है। लग रहा है अखलाक सिर्फ एक नाम रह गए हैं और उनकी पूरे के पूरे उस जुल्म को शायद लोग भूल गए हैं क्योंकि हर रोज अखलाक हो रहे हैं। वो लोग भी जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं। उनके खिलाफ बात कर रहे हैं। क्या वो लिंचिंग [संगीत] पर साफ आवाज में बात कर रहे हैं? नहीं कर रहे। अब जब हम अब देखते हैं तो ऐसा लगता है कि यह सब कुछ किया धरा जो है वो 12 सालों का है। लेकिन आपको नहीं लगता कि यह समाज में ऑलरेडी था। यह पनप रहा था। अचानक से 20 साल से मेरा रहता हुआ पड़ोसी कम्युनल नहीं हो सकता है। हिंदू राष्ट्र का एजेंडा कोई ऐसी [संगीत] चीज थोड़ी है जिसको अलग से परिभाषित करना पड़े। हिंदू राष्ट्र का एजेंडा बिल्कुल साफ है कि आपका और मेरा जो हक है वो बराबर नहीं है। जितना पेशेंस मुसलमान दिखा रहे हैं शायद ही कभी किसी ने दिखाया हो क्योंकि उनसे जुड़ी हुई हर चीज पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। बड़े-बड़े नेता इस बीच में जेल गए चले आए केवल एक आदमी जेल से रिहा नहीं होता और साफ तौर पर उसका नाम उमर खालिद है। बिल्कुल उमर खालिद हैं और शरजील इमाम भी हैं। हमने देखा था 2014 में जब मोदी दिल्ली आ रहे थे तो कैसे बड़े-बड़े स्कॉलर जो आजकल अखबारों में अलग मिजाज के लेख लिख रहे हैं उस वक्त उन्होंने कैसे अभिनंदन किया था और अगर शुभेंदु अधिकारी जैसे लोग जो ये कहें कि गाजा जैसा ट्रीटमेंट हो और फिर वो मुख्यमंत्री बन जाए। देखिए कोई भी सोसाइटी अपने बुजुर्गों के विवेक से आगे बढ़ती है। लेकिन मुझे वहां पर तमाम जो बुजुर्ग मिलते हैं वो कहते हैं गलत क्या हुआ? अच्छा। महिलाएं कह रही है कि अरे ये तो धर्म का मामला है। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं [संगीत] है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद और आज हम बात करने जा रहे हैं इस किताब की। आप देख सकते हैं इस किताब का नाम है अखलाक और उसके साथ ही यह कहती है कि भारत में मॉब लिंचिंग की विस्तृत यह जमीनी पड़ताल करती है। इस किताब के जरिए हम बात करेंगे मॉब लिंचिंग की। हम बात करेंगे कि मॉब लिंचिंग तो अभी भी हो रही है। मॉब लिंचिंग थमी नहीं है। लेकिन इसके बारे में बात करना लोगों ने बंद कर दिया है। क्या यह एक न्यू नॉर्मल बन चुका है? या फिर हम उस उस स्थिति में आ गए हैं जहां पर पहले जब हम गाजा की वो तस्वीरें तड़पते हुए बच्चों की, मरते हुए लोगों की जब तस्वीरें देखते थे तो आंखों से बेसाख्ता आंसू निकल जाया करते थे और हम अपने आप से सवाल पूछने लगते थे। लेकिन अब वो भी नॉर्मल हो चला है। तो क्या हम भारत में भी यह कहें कि जब अखलाक की लिंचिंग हुई थी तो पूरा देश ऐसा मानो जैसे तड़प सा उठा था, उठ खड़ा हुआ था। लोगों ने अपने अवार्ड्स तक वापस किए थे और एक तरह की एक चेतना सी जागी थी कि क्या भारत अब यहां पहुंच गया है कि सिर्फ किसी के खाने के उसने क्या खाया उसकी शक की बिना पर उसको पीट-पीट कर मार दिया जाए। लेकिन उसके बाद से अब हम बैठे हुए हैं 2026 में और सवाल वही है अभी भी जहन में कि लिंचिंग तो अभी भी हो रही है लेकिन उसके बारे में बात होनी क्यों बंद हो गई है क्या मुसलमान की जान इतनी सस्ती हो गई है कि अब वो एक हेडलाइन भी नहीं बनती है लिंचिंग किसी भी जो हेट क्राइम है उसकी शुरुआत नहीं है बल्कि मैं कहूंगी कि उसके आखिर है जिस तरह से धर्म संसदें जिस तरह से हमारे प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और लगातार जो हेट लगातार जो परोसी जाती है दिमागों को जो कैप्चर किया गया है जो एक दुश्मन खड़ा कर दिया गया है एक परमानेंट दुश्मन मुसलमान के नाम पर तो लोगों को यह बिलीवेबल लगता है कि हां ये चोर हो सकता है हां यह गाय खाता होगा हां ये गौ कशी करता होगा हां ये ऐसा हो सकता है और उसी की वजह से आप यह देखिए कि एक भीड़ तंत्र तैयार कर दिया गया है जो किसी को भी उसकी पहचान की बिना पर पीट-पीट कर मार देता यह किताब ना सिर्फ आपको एक इमोशनल जर्नी पर लेकर जाएगी। उनकी कहानियों को आपको बताएगी बल्कि सवाल पूछ रही है ये सरकार से, सत्ता से। सवाल पूछ रही है जुडिशरी से। सवाल यह पूछ रही है हर एक आम इंसान से और सवाल पूछ रही है ये मीडिया से, मीडिया के उस धड़े से जो लगातार मुसलमानों के खिलाफ नफरत परोस रहा है। और इस जो किताब के लेखक हैं वो भी अपने आप में काफी स्पेशल हैं। मेरे साथ दयाशंकर मिश्र जी हैं जो लगभग दो दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं। वो NDTV में रहे, वो Zee न्यूज़ में रहे। कई उन्होंने अखबार और पत्रिकाओं में उन्होंने काम किया है और उसके साथ-साथ जो उनकी आखिरी जॉब थी वो थी नेटवर्क 18 में। और जब वो वहां काम कर रहे थे। उन्होंने राहुल गांधी पर एक किताब लिखी थी और यह माना जाता है उनसे मैं इसकी तस्दीक करूंगी। माना जाता है कि उसके बाद ही वो मजबूर हुए या उन्हें मजबूर किया गया कि वो अपनी नौकरी को अलविदा कह दें। और उसके बाद आप ये देखिए ना तो उनकी वो किताब ना ही यह किताब किसी भी बड़े पब्लिकेशन ने नहीं छापी है। तो ये उन्होंने खुद अपनी किताब को पब्लिश किया है जिसको जल्द ही वो एक तरह से लॉन्च भी करने जा रहे हैं। दयाशंकर जी बहुत-बहुत स्वागत आपका कार्यक्रम में। इस पॉडकास्ट में। मैं शुरुआत इस बात से करूंगी कि लिंचिंग की हालत इस देश में यह है कि अभी तक भी यह समझा जाता है कि अखलाक वो पहले शख्स थे जिसकी 2014 के बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने तो वो पहले शख्स थे जिनकी लिंचिंग की गई थी। लेकिन आपकी किताब ये रोशनी डालती है इस पर और ये बताती है कि मोहसिन शेख जो कि महाराष्ट्र के रहने वाले थे। पुणे के रहने वाले थे। कंप्यूटर इंजीनियर थे। वो थे पहले शख्स जिनकी लिंचिंग की गई थी। पत्थरों से कुचल कुचल कर उनको मार दिया गया था और इंसाफ की आस में उनके पिता की हार्ट अटैक से मौत भी हो गई। यानी कि उनके बेटे को उनके परिवार को अभी तक भी इंसाफ नहीं मिला है। मैं इस पर लौटूंगी उस पर हम बात करेंगे। लेकिन मेरा पहला सवाल आपसे यह है कि एक ऐसे दौर में जब हम नफरत को बिल्कुल एक न्यू नॉर्मल और एक एक हम कह सकते हैं एक एक्सट्रीम में हम देख रहे हैं तो आपने ये रिस्क क्यों उठाया कि आप लिंचिंग पर किताब लिखें और आपका नाम तो दयाशंकर मिश्र है। लोग ये सवाल पूछते होंगे कि मिश्रा जी आपने ये क्यों रिस्क उठाया कि आप ये किताब लिखें क्योंकि लोग तो यह मानते होंगे कि आप मिश्रा जी हैं तो आप तो बीजेपी के कट्टर समर्थक रहे होंगे। बहुत-बहुत शुक्रिया पहले तो इस किताब पर बात करने के लिए क्योंकि इस किताब पर बात करने वाले लोग उतने ही कम है जितने लोग लिंचिंग पर बात करने वाले लोग कम है। तो आपने बातचीत के लिए वक्त निकाला इसके लिए बहुत शुक्रिया पहले आपका। अब जहां तक आपका सवाल है कि मैं अब मैं मिश्रा हूं और मैं ये ये किताब लिख रहा हूं। ये क्यों आया? मैं किताब लिखने का काम मैंने क्यों किया? इसमें आप किताब में गुजरेंगे तो कई जगह मुझसे सवाल पूछा गया। सबसे पहला तो सवाल ये अखलाक के जब मैं गांव गया बीते नवंबर में तब वहां मुझे लोगों ने घेरा और पूछा कि भाई आप तो ब्राह्मण हैं और आप ये काम क्यों करें? आप हमारे पीछे क्यों पड़े? आप धर्म के पीछे क्यों पड़े? या फिर सवाल पूछा गया है। ये इस बातचीत में किताब में है। एक जगह पर मुझे चाय की दुकान पर लोग मिल जाते हैं और मुझसे नाम पूछते हैं और जब मैं आमतौर पर दयाशंकर मैं कहता हूं कि भाई मैं दयाशंकर हूं तो वो कहते हैं नहीं नहीं दयाशंकर के आगे क्या है? तो मैं जब कहता हूं तो कहते हैं अरे हमारे आप क्यों इसमें आप ये क्या बात कर रहे हैं? क्योंकि उनके लिए अखलाक बीते जमाने की बात है। उनके लिए अखलाक भूल जाने वाली बात है। उनके लिए अखलाक यानी कोई सवाल ही नहीं है। उनके लिए अखलाक का कोई वजूद ही नहीं है। तो मैं केवल यही कहता हूं कि मैं दयाशंकर मिश्रा हूं। इसलिए मैं ये किताब लिख सकता हूं। और इसलिए ये किताब मुझे ही लिखी जानी चाहिए। और इस वक्त मैं आपसे बात कर पा रहा हूं। इस वक्त मैं कुछ कुछ मायने में अगर आजाद हूं तो इसलिए आजाद हूं क्योंकि मैं दयाशंकर मिश्रा हूं। तो अगर कोई परवेज खान ये किताब लिखते अगर कोई अब्दुल ये किताब लिखते तो उन पर और परेशानियां आती और मुश्किलें आती। उनके सवाल को सवाल के लेंस ना देखकर दूसरे लेंस उस पर उन पर लागू कर दिए जाते। और मैं दयाशंकर मिश्रा हूं। इससे पहले मैं इस देश का नागरिक हूं जिसे इस देश में रहने का, सवाल करने का, बात करने का अधिकार मिला है। संविधान ने दिया है। सरकार ने नहीं दिया है। संविधान ने दिया है। तो इसलिए यह मेरी एक एक नागरिक के तौर पर एक संवैधानिक मेरा हक है कि मैं उस चीज पर पूछूं जिस पर कोई नहीं पूछ रहा। तो इसलिए मैंने तय किया। अब एक तरह से पता नहीं मैं कब तक इसको निभा पाऊंगा। लेकिन मैंने अब तय ही किया है कि मैं उसी विषय पर काम करूंगा जिस विषय पर मुझे काम कम करता हुआ समाज में काम जिस विषय पर कम नजर आएगा। जैसे मान लीजिए कोई बात जब राहुल गांधी पर हमारी किताब आई और आज आप देख लीजिए। 2023 में किताब आई तब राहुल गांधी पर अच्छे-अच्छे लोग आप जो इस समय नाम ले रहे हैं जो बात कर रहे हैं तब तक कोई राहुल गांधी को बात ही नहीं करते थे राहुल गांधी पर एक्सेप्ट ही नहीं कर रहे थे या राहुल गांधी क्या कहना चाह रहे हैं वो उनको समझ ही नहीं आ रहा था क्योंकि उनका लेंस उनका नजरिया लोकप्रियतावाद है। जो चीज लोकप्रिय है फिर वही बहुसंख्यकवाद है। मेरा ऐसा मानना है और मैं इस बात का बहुत विश्वास करता हूं कि जिस तरफ 100 लोग खड़े हो मैं उस तरफ खड़ा नहीं होना चाहता। अगर मैं उस तरफ उस भीड़ का हिस्सा हूं इसका मतलब मेरे विवेक पर मेरा विवेक सही जगह पर नहीं है। लिंचिंग के साथ बिल्कुल वही बात है। इस वक्त देश में तमाम लोग वो लोग भी जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध कर रहे हैं। उनके खिलाफ बात कर रहे हैं। क्या वो लिंचिंग पर साफ आवाज में बात कर रहे हैं? नहीं कर रहे हैं। इसलिए मैंने तय किया कि मैं लिंचिंग पर एक किताब लिखूंगा। मेरे हाथ बहुत छोटे हैं। हमारे सबके संसाधन बहुत छोटे हैं। इस किताब के लिए पब्लिशर मतलब ढूंढने में मुझे बड़ी मशक्कत आई। आखिर में कोई नहीं मिला। तो मैंने तय किया कि नहीं मैं खुद दो आदमी तक ही पहुंचा पाऊंगा। आप जानती हैं कि एक स्वतंत्र लेखक के तौर पर आपके लिए काम करने में कितनी परेशानियां हैं, मुश्किलें हैं। लेकिन मुझे लगा कि मैं अपने मुश्किलें हैं। इसलिए मैं अपने फर्ज को फर्ज मेरा ईमान क्या है? मेरा फर्ज क्या है? प्रेमचंद इस देश के बड़े लेखक हुए हैं। उनकी एक बड़ी खूबसूरत लाइन है। जो हमेशा मेरे दिमाग को मतती रहती है कि क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात ना करोगे। तो मुझे लगता है कि लिंचिंग पर कहीं ना कहीं सबको यह डर है कि हम लिंचिंग पर सवाल पूछेंगे तो हमको हमको परेशानी आएगी। अब बल्कि ये हो गया है कि प्रधानमंत्री मोदी पर तो लोग सवाल कर रहे हैं लेकिन लिंचिंग पर नहीं कर रहे हैं। आरएसएस की नीतियों पर नहीं कर रहे हैं। हम तो इसलिए मुझे लगा कि नहीं लिंचिंग पर एक किताब लिखी जाए। लिंचिंग पर बात को मुद्दा बनाया जाए। जैसे आपने कहा अपने इंट्रोडक्शन में कि लिंचिंग तो हो रही है लेकिन लिंचिंग की चर्चा गायब हो गई है। अखबार से गायब है। टेलीविज़न चैनलों से गायब है। यहां तक कि जो एक अल्टरनेट मीडिया है उससे भी गायब है। उससे भी गायब है। तो एक पत्रकार के तौर पर हमारी जिम्मेदारी क्या है कि जो मुद्दा गायब है जिस मुद्दे पर कोई बात नहीं कर रहा। वही बात तो उस बात पर बात करना एक जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी है। और आप मैंने इस किताब को जितना भी मैं पढ़ सकी जितना मुझे वक्त मिला तो मैंने देखा है कि आप नगर-नगर डगर डगर आप गए हैं। आप छोटे-छोटे कमरों में आप रहे हैं और जहां पर जाकर आपने लोगों से बात की। आपको बहुत मुश्किलों का सामना भी करना पड़ा। क्योंकि आसान नहीं होता उन लोगों के के जख्मों को मैं कुरेदना तो नहीं बोलूंगी लेकिन फिर से उनको वहीं पर ले जाकर खड़ा करना और उनसे वो बात करना जिसको वो भूले तो नहीं है उनकी जिंदगी तो वहीं पर ठहर गई है लेकिन उनको लगता है कि उससे हासिल क्या होगा क्योंकि मैं भी जब जाती हूं मैंने दिल्ली राइट्स विक्टिम पर जब मैंने डॉक्यूमेंट्री बनाई या और दूसरी जगहों पर मैं जाती हूं तो मुझे लगता है कि लोगों को लगता है कि इससे हासिल क्या होगा क्योंकि उनके पास सिर्फ नाउदी है और नाउदी के अलावा और कुछ नहीं है। लेकिन आपकी किताब मुझे इसी तरह से लगती है कि जर्रा भी जो है कभी-कभी आफताब बन जाता है। मेरा सवाल आपसे यह है कि आपको किस तरह की मुश्किलात का सामना जो है ये किताब जब आपने लिखनी शुरू की तो किस तरह की मुश्किलात का आपको सामना करना पड़ा है? आपने इसमें लिंचिंग को परिभाषित भी किया है। तो वो आपकी परिभाषा क्या कहती है लिंचिंग की? और क्यों आपको यह लगता है दयाशंकर जी कि लिंचिंग तो हो रही है लेकिन वो जो मोस्ट सेकुलर चेहरे या प्लेटफॉर्म्स भी हैं उन्होंने भी इसके बारे में बात करना बंद कर दिया है। ऐसा क्यों मुसलमानों के सवाल या मुसलमानों की जान की कीमत इतनी कम क्यों हो गई है जब हम ये भी देख रहे हैं कि होपफुल टाइम्स हैं ये कहा जा रहा है। देखिए अब जो है सरकार को कटघरी में खड़ा किया जा रहा है। देखिए जो उनका वोट बैंक था मिडिल क्लास अपर मिडिल क्लास वह भी उनसे सवाल पूछ रहा है। लेकिन मुसलमान का मुद्दा तो वहीं का वही है। उस पर बात करनी लिंच पर बात करनी क्यों बंद कर दी है लोगों ने? मुझे लगता है कि एक तो यह जो राजनीति हम देख रहे हैं कि 2014 के बाद से सत्ता में एक ऐसी सरकार है जो बहुत साफ तौर पर लगातार नियमित अंतराल पर अपनी परिभाषाएं नई-नई परिभाषाएं वो लेकर के आते हैं। कभी वो आपको बताते हैं कि हिंदू का मतलब क्या है? कभी वह बताते हैं कि हिंदुस्तान में रहने वाला जो भी व्यक्ति है असल में वह हिंदू ही है। फिर वह किसी दिन यह कहते हैं, किसी दिन कुछ और कहते हैं। वो लगातार आपको एक तरीके के सीमा में बांधने की कोशिश है। और बार-बार बार-बार आपको बताने की कोशिश है कि आप तो हिंदू हैं। आप कुछ भी जैसे आप देखें आरएसएस की तरफ से बात आती है, सरकार की तरफ से बात आती है। कि उसमें चारों तरफ बात यह बताया जा रहा है कि सभी हिंदू हैं। आरएसएस प्रमुख का उद्बोधन नियमित अंतराल पर हम सबके दिमागों में आता रहता है। और इन सबके बीच में जो एक नागरिक का सवाल है वो गायब होना शुरू हो गया। सरकार जबजब परेशानी में पड़ती है, जब जब से सरकार यह केंद्र में आई है, जबजब मुसीबत में पड़ती है, जबजब आंदोलन उसे घेरता है, वो हिंदू मुसलमान शुरू कर देते हैं। और जो उस हिंदू मुसलमान पर जो सवाल करता है, वो सबसे पहले उनके निशाने पर आता है। उमर खालिद की क्या खता है। लेकिन उमर खालिद जब अपना भाषण देते हैं। जब जिस आप देखें कि कितनी सादगी से वो बात कहते हैं। कितने एक तथ्यात्मक एविडेंस के साथ बात करते हैं। लेकिन वोकि हिंदू मुस्लिम राजनीति की एक बिल्कुल एक तरह से आप देखें कि उसका स्पष्ट प्रतिवाद पैदा करते हैं तो लगता है कि अरे इस मामले की तो अब ये मामला तो गायब हो जाएगा तो आप उठा के उनको जेल में डाल दें। हम या उमर खालिद वो शख्स जो आदिवासियों की बात करते हैं जो दलितों की बात करते हैं। एक पढ़ा लिखा मुसलमान जो आपने बनी बनाई एक इमेज मुसलमानों की बनाई है उस धारणा को तोड़ता है उमर खालिद उमर खालिद तो उमर खालिद इसलिए जेल में नहीं है क्योंकि उमर खालिद इतने बड़े नेता हो गए या उमर खालिद से उमर खालिद इतने बड़े नेता हैं कि बाहर रहेंगे तो बात कहेंगे तो एक तरफ कहीं कोई वोट का मोबिलाइजेशन हो जाएगा नहीं उमर खालिद एक पढ़े लिखे स्कॉलर हैं। उनकी किताब आदिवासियों पर है और वह एक ऐसी तस्वीर पैदा करते हैं कि उनके भाषणों में आपको संविधान नजर आएगा। उनके भाषणों में नेहरू नजर आएंगे, अंबेडकर नजर आएंगे, गांधी नजर आएंगे। अहिंसा को जिस खूबसूरती से उमर खालिद बयान करते हैं वो बड़े-बड़े स्कॉलर नहीं कर पा रहे हैं या उनका पूरा काम जो अभी उनकी किताब पे टीवी आई है वो आदिवासियों पर है। तो जब आप उमर खालिद को पीछे रख देते हैं तो आप एक सबको संदेश देते हैं कि जो भी इस हिंदू मुस्लिम राजनीति का प्रतिवाद करेगा या जो भी हिंसा का जो है प्रतिवाद करेगा तो वो कहां चला जाएगा? उसकी जगह क्या हो जाएगी और सारे इंस्टीट्यूशन चुप हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट किस तरह से तय कर लेता है कि एक साल तक मत आना। हम ये मेरे लिए इतना मतलब एक जिसको आप कहें कि कितना बड़ा सबके लिए एक झटका है पढ़े लिखे लोगों के लिए जिनका संविधान में यकीन है। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कभी नहीं कहा कि एक साल तक मत आना। आपको फैसला जो देना है वह दे देते। लेकिन आप कैसे कह सकते हैं कि एक साल तक मत आना। जमानत के लिए नहीं आइए आप। मतलब आप ट्रायल भी नहीं शुरू किया है आपने अभी तक और आप जमानत के लिए भी कह रहे हैं कि एक साल तक आप मत आइएगा। यह राजनीति जब अपना चरित्र बदलती है तो इस राजनीति में क्या हो रहा है कि हर चीज उपदेश हो गई। हम जैसे प्रधानमंत्री को हम देखते हैं वह उपदेश समय-समय पर देते हैं। आरएसएस प्रमुख उपदेश देते हैं। यहां तक तो ठीक है। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट भी उपदेश देता है। सुप्रीम कोर्ट में भी बार-बार कहा जाता है ना कि जमानत नियम है, जेल अपवाद है। आप देखें कि उमर खालिद ने तकरीबन पांच छह सीजीआई देख लिए जहां तक इतना मुझे याद आ रहा है। इससे ज्यादा कम। सब ने यही बात कही। तो सुप्रीम कोर्ट भी क्या कर रहा है? उपदेश ही तो दे रहा है। तो इसका मतलब मेरे मैं उस बात पर हम लोग वापस लौटते हैं कि जब भी कोई व्यक्ति आकर के लिंचिंग के सवाल को अत्याचार के सवाल को रखता है और वो पढ़ा लिखा व्यक्ति रखता है जिसकी जो जो एक पढ़े लिखे तबके का जो नुमाइंदगी करता है तो ये सरकार को सरकार परेशान हो जाती है। तो यही वजह है कि जो लिंचिंग का सवाल है तो आप देखें कि बहुत से लोग जो मोदी प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना कर रहे हैं वो लिंचिंग के सवाल से क्यों बच रहे हैं जो आपकी बात थी। इसलिए बच रहे हैं क्योंकि असल में बहुसंख्यकवाद की राजनीति में कहीं ना कहीं बहुसंख्यकवाद की राजनीति ने उनके दिमागों पर कब्जा किया है। वो प्रधानमंत्री की नीतियों से नाराज हो सकते हैं। वो बीजेपी से नाराज हो सकते हैं। लेकिन मेरी चिंता उससे बड़ी है। वो कहीं ना कहीं उस बहुसंख्यकवादी राजनीति की चपेट में हैं। जो यह बता रही है कि मुसलमान का हक हमको कम रखना है। यह हिंदू राष्ट्र का एजेंडा क्या है? हम हिंदू राष्ट्र का एजेंडा कोई अह ऐसी चीज़ थोड़ी है जिसको अलग से परिभाषित करना पड़े। हिंदू राष्ट्र का एजेंडा बिल्कुल साफ़ है कि आपका और मेरा जो हक़ है वो बराबर नहीं है। हम आप दो दर्जे के नागरिक हैं। बिल्कुल तो आप अगर एक ही मामले में लोगों को जमानत कैसे मिलती जा रही है? बड़े-बड़े नेता इस बीच में जेल गए, चले आए। केवल एक आदमी जेल से रिहा नहीं होता और साफ तौर पर उसका नाम उमर खालिद है। बिल्कुल उमर खालिद हैं और शजील इमाम भी हैं। आप भी खालिद सैफी को भी अभी जमानत मिली है। गुलफिशा फातिमा को मिली है। एक जेल से निकाल उन्हें दूसरी जेल में यानी कि खुली है खुला आसमान है लेकिन वो जेल की तरह क्योंकि आप बात नहीं कर सकते। आप बोल नहीं सकते। आप मीडिया को बाइब नहीं दे सकते हैं। तो आपने उस जेल से तो निकाल दिया लेकिन एक दूसरी जगह पे आपने एक तरह से उनको ज़हनी कैद कर दिया है कि आप बात नहीं कर सकते। इसीलिए हमने जो इस किताब में जो अपनी परिभाषा देने की कोशिश की है मॉब लिंचिंग की उसमें ये सब शामिल है। हम और मैंने इस किताब में बार-बार जोर दिया। यहां पर भी जोर दिया कि मॉब लिंचिंग का अर्थ मेरे लिए केवल भीड़ द्वारा हमला करके किसी अकेले व्यक्ति की हत्या भर नहीं है। इसमें सब तरफ से घेरना शामिल है। इसमें शामिल है घेरना बुलडोजर से रात को अचानक मेरे घर को तोड़ देना। इसमें शामिल है कि नौकरियों से बाहर कर देना। इसमें शामिल है कि जब जब बराबरी के मौके आए तो मुझे बाहर कर दिया जाए। तो यह किताब मॉब लिंचिंग की परिभाषा को एक एक बहत्तर रूप में एक विस्तृत रूप में सामने रखने की कोशिश है। उसमें केवल फिजिकल शारीरिक रूप से मारा जाना भर शामिल नहीं है। ज़हनी भी है। लोगों का मारा जाना। इस किताब में आप जब अभी हम आगे बढ़ेंगे तो हम देखेंगे कि कैसे ज़हन में लिंचिंग चल रही है। कैसे डॉक्टरों के दिमाग में चल रहा है कि वो मुसलमान है। उसे मार दो। मतलब ऑक्सीजन की ऑक्सीजन के एक बेड की अस्पताल में जरूरत है तो एक ऐसे मरीज को मार दो जो मुसलमान है। उसकी सबसे बड़ी आइडेंटिटी क्या है? वो मुसलमान है। तो अगर मुसलमान केवल होने पर कोई तय कर ले दूर बैठे लोग बात कर रहे हैं कि मुसलमान को मार दो तो ये किताब इसलिए ये सवाल करती है कि जो मॉब लिंचिंग की परिभाषाएं हैं उसको असल में भारत के संदर्भ में ठीक से परिभाषित ही नहीं किया गया। क्यों परिभाषित नहीं किया गया? इसलिए क्योंकि हमने विश्वविद्यालय गिरा दिए। हम रामपुर में बुलडोजर विश्वविद्यालय बने हुए विश्व विश्वविद्यालय पर हम बुलडोजर चला रहे हैं। हम एक संस्थान नहीं खड़ा कर कर पाए। हम आईआईटी नहीं बना पा रहे हैं। हम विश्वविद्यालय नहीं बना पा रहे हैं। हम आईआईएम नहीं बना पा रहे हैं। हम सब गिरा रहे हैं। तो जब संस्थान गिर जाएंगे जब प्रोफेसर दिल्ली में हम देखते हैं कि गोबर से विश्वविद्यालय या जो है पोते जा रहे हैं तो मॉब लिंचिंग की परिभाषा कैसे आएगी? तो इस किताब में मैंने बहुत विनम्रता से एक तरह से मैं पत्रकार हूं। लेकिन मैंने एक उन उन परिभाषाओं को सवाल करने की भी कोशिश की है कि जो मॉब लिंचिंग से जो बात कही जाती है असल में वो अधूरी बात है। हम वो बात स्पष्ट नहीं होती। जब आपसे कोई कहता है कि मॉब लिंचिंग में अब्दुल मारा गया। ये खबर मान लीजिए कहीं गलती से छप भी जाए, आ भी जाए तो लोग कहते हैं मॉब लिंचिंग में मारा गया। जरूर उसी ने कुछ गड़बड़ किया होगा। भीड़ ऐसे थोड़ी भीड़ को गुस्सा आता है। उस भीड़ में गुस्सा किसने भरा कि भीड़ यानी लोग हत्यारी भीड़ में तब्दील तब्दील हो जाए। ये गुस्सा उनके भीतर कौन भर रहा है? ये गुस्सा उनके भीतर कहां से आया? इस पर कोई सवाल नहीं है। हम गुस्सैल भीड़ की तो बात कर रहे हैं। लेकिन उन लोगों को उस भीड़ को गुस्सैल किसने बनाया? भीड़ को गुस्सैल कैसे बनाया जा रहा है? किताब उसकी बात करने की चेष्टा है, कोशिश है। मैं आऊंगी इस पर देखिए कि मैं अखलाक और दूसरे जो आपने विक्टिम्स की जो व्यथा है जिसको आपने इसमें दर्ज किया है उनसे मिलकर उनके परिवार से मिलकर लेकिन मैं ये जानना चाहती हूं दयाशंकर जी कि अक्सर ये आर्गुमेंट दिया जाता है कि इस 12 साल में भारत बदल गया है। देखिए इस 12 साल में आरएसएस और भारतीय जनता पार्टी ने मिलकर और हिंदुत्ववादी जो संगठन है जिनको एक तरह से पावर दी है इस आरएसएस और बीजेपी ने देखिए भारत को कहां लाकर खड़ा कर दिया है मुसलमानों के साथ दलितों के साथ आदिवासियों के साथ ये क्या हो रहा है और जाहिर सी बात है कि मुसलमानों के साथ सबसे बड़े पैमाने पर हो रहा है और उनकी कोई पॉलिटिकल एजेंसी भी नहीं है तो इसलिए दलितों से मुसलमान यहां थोड़े फर्क भी हो जाते हैं। मेरा सवाल आपसे यह है कि यह जो एक भीड़ का जो एक यह मिजाज है यह हम यह देखते हैं क्योंकि हम जब वो वीडियो देखते हैं तो हमें लगता है कि एक भीड़ है उसको किसी एक शख्स पर उसकी पहचान की वजह से शक हुआ बच्चा चोरी उसके खाने की पसंद या उसकी किसी और वजह से और उसको पीट-पीट कर मार दिया जाता है या अधमरा कर दिया जाता है। क्या यह कहानी यहीं तक है? या आपको ये लग रहा है कि सिस्टमैटिक ढंग से जिस तरह से मुसलमानों को डीह्यूमिनाइज किया गया है। उनको एक परमानेंट दुश्मन बनाया गया है। जो ये बताया गया है कि आपका पड़ोसी आतंकवादी हो सकता है या फिर आपका पड़ोसी ऐसा हो सकता है जो लड़कियों पर गलत नजर जो है वो रखता हो या बच्चा चोरी भी वो कर सकता है। ये जो सिस्टमैटिक ढंग से WhatsApp के जरिए और लगातार हिंदुत्ववादी संगठन और आरएसएस और इन सबके जरिए जो किया गया यह जो लिंचिंग होती है यह आखरी मरहले आखिरी स्टेज के तौर पर आप देखते हैं क्योंकि लोग अक्सर इसको शुरुआत देखते हैं कि देखिए एक भीड़ आई भीड़ ने मार दिया मारकर खत्म कर दिया आप कैसे देख रहे हैं क्योंकि ये किताब इसके बारे में बात करती है मेरा मानना है कि जैसे हम सब गांव में रहे आप सबका गांव का सबका तजुर्बा होगा जो भी लोग शहर में हैं वो कहीं ना कहीं किसी ना किसी गांव से ही आए हैं। गांव में क्या होता है कि जब आप गर्मियों में भी आप जब खुले में सोते हैं तो जो दादी है जो मां है तो वो चद्दर डाल देते हैं। तो जब मैं बहुत छोटा था तो मैं कहता था कि ये भोपाल में तो हम रहते हैं तो वहां तो चद्दर नहीं है। गांव में रात को सोते समय चद्दर की क्या जरूरत है? तो मेरी दादी कहती थी कि ये जब शीत गिरता है यानी जब रात को आती है तो वो नुकसान करती है सर पर लगती है तो चद्दर रखना चाहिए लेकिन वो शीत ऐसे धीरे-धीरे तो नहीं दिखती हमें दिखती तो नहीं ना लेकिन वो है तो हम और रात जैसे-जैसे बढ़ती जाती है तो वो नीचे आती जाती है ये नफरत भी ऐसे ही इसके चरण है हम इसके स्टेप है हम एक कोई एक मंजिला इमारत नहीं है। नफरत। नफरत कोई एक मंजिला इमारत नहीं है। इसमें कई इमारतें हैं। कई सीढ़ियां हैं। घुमावदार सीढ़ियां हैं। उनसे पहुंचकर जब बात पहुंचती है चलते चलते चलते चलते तो वो आखिरी जो कड़ी है वो मॉब लिंचिंग है। मॉब लिंचिंग विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक औजार है। एक एक ऐसा औजार जिससे आप सत्ता प्राप्त करते हैं और सत्ता बनाए रखने में आपको उससे मदद मिलती है। हम तो यह कहना कि यह गुस्सैल भीड़ है। यह नागरिकों की अपनी अभिव्यक्ति है। ऐसी ऐसी बातें भी कही गई। अखलाक की मॉब लिंचिंग के बाद आप देखें कि राजनाथ सिंह ने क्या कहा था। वहां के जो सांसद थे उन्होंने क्या कहा था। महेश शर्मा ने संभवत उसे कहा था कि एक दुर्घटना है। हम या राजनाथ सिंह भी इस तरीके की बात कर रहे थे। यह बिल्कुल बात नहीं है। बात यह है कि जो मॉब लिंचिंग है उसका ईंधन क्या है? यह किताब बताती है कि मॉब लिंचिंग का जो ईंधन है वो हेट स्पीच है। और और भी बहुत सारी बातें हैं। लेकिन इसमें ज्यादातर इन इस इन सारे मामलों में आप देखें कि वो हेट मोहसिन शेख की हमने बात की कि वो हेट स्पीच है। वो भारत के किसी कोने में घटी है। लेकिन जैसे ही वो यात्रा करती हुई इंटरनेट के माध्यम से अलग-अलग जगह पर जाती है तो उस हेट स्पीच का शिकार सबसे पहले जो व्यक्ति मोबाइल देख रहा है उसका पड़ोसी होता है। मोशन शेख को तो नहीं पता था कि कहां क्या हुआ है। हेट स्पीच हुई है। वो तो अपना काम खत्म करके मस्जिद से निकल कर के बाहर जा रहे हैं। टिफिन लेने जा रहे हैं। खाना खाने जा रहे हैं। लेकिन वो हेट स्पीच ट्रेवल कर रही है। यानी वो ईंधन क्या है? मॉब लिंचिंग का ईंधन क्या है? मॉब लिंचिंग का ईंधन हेट स्पीच है और हेट स्पीच कोई एक जगह नहीं दे रहा है। हमने पिछले चुनाव में देखा 2014 का चुनाव किस तरह से लड़ा गया हमने देखा वो विकास की वोट लेकर लड़ा गया। 2019 में 17 से ही विकास को पीछे भेज दिया गया। 17 से 19 आते-आते और पीछे हुआ। लेकिन 19 से 24 के बीच में सबसे बड़ा फर्क यह है कि जो हमारे बड़े नेता थे सत्ताधारी दल के उनके ज्यादातर भाषण किसी ना किसी रूप में हेट स्पीच के साथ ही आगे बढ़ते हैं। तो लोगों के दिमाग में एक ही बात तो जा रही है कि मुसलमान मेरा हक ले ले रहा है। आज तक नहीं पता चल पाया कि कैसे ले ले रहा है। क्या-क्या नहीं कहा गया कि मंगलसूत्र छीन लेंगे। तुम्हारी गाय और भैंस छीन लेंगे। हम तो बार-बार बताया जा रहा है कि असल में तुम्हारा जो सबसे बड़ा शत्रु है वह सबसे बड़ा शत्रु बेरोजगारी नहीं है। सबसे बड़ा शत्रु नौकरी नहीं है। नौकरी की कमी नहीं है। काम की कमी नहीं है। तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु मुसलमान है। यही बात अलग-अलग तरीके से कही जाती है। जब बीजेपी के दूसरे नेता दिल्ली में कहते हैं गोली मारो सालों को। हम ये ये और क्या चाहिए? इतना बड़ा नेता लेकिन उनको पावर दी जाती है। हां, यह दो बातें होती हैं। जब कोई छोटा मोहल्ले का नेता कोई हेट स्पीच करता है तो हो सकता है कि उसकी अगर तरक्की ना हो मान लीजिए तो बाकी लोग कहेंगे कि इस इस तरीके की भाषा को कोई नोटिस नहीं करता है। प्रधानमंत्री जी नाराज हैं। लेकिन, अगर एक पार्षद हेट स्पीच देता है और उसको विधानसभा का टिकट 6 महीने बाद मिल जाता है। 6 महीने बाद मंत्री मिल जा बन जाता है। तो पूरे समाज में क्या संदेश जाता है? कि देखो आगे बढ़ने का यही यही फार्मूला है। तो जब वो नेता यहां से कहते हैं गोली मारो या हम देखते हैं कि दूसरे जो दिल्ली के इस वक्त उप मुख्यमंत्री हैं ये तमाम लोग जब अचानक से अपने साथ में एक साथ राजनीति कर रहे हैं। लेकिन उनकी एक लाइन की नफरत उनको आसमान में बिठा देती है। तो बाकी नेताओं के बीच होड़ मच जाती है। इस किताब में वो डाटा है जो बताता है कि कैसे 2022 के और 2002 की तरफ चारों तरफ से एक स्पर्धा है हेट स्पीच की। हम बड़ी मुश्किल में पड़ जाते हैं कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के भाषण ज्यादा हेट स्पीच के हैं या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के भाषण ज्यादा हेट स्पीच में हैं। हम दोनों के बीच में है तभी आसाम से चले आते हैं और हम अचानक देते हैं देखते हैं कि मध्य प्रदेश में एक नए व्यक्ति को जो मुख्यमंत्री बनाया है उनको अचानक से लगता है कि अरे मैं कहां जाऊंगा तो वो शामिल हो जाते हैं। फिर राजस्थान है राजस्थान वाले शामिल हो जाते हैं। फिर सब में होड़ मच जाती है। तो शुभेंदु अधिकारी आ जाते हैं। फिर अचानक से हम देखते हैं कि शुभेंदु अधिकारी आ जाते हैं। वह तो जैसे ही तय ही हुआ कि बंगाल का चुनाव होगा। वो यह मान के चल रहे हैं कि मैं ही अब मैं ही मैं हूं और कोई दूसरा इस संसार में है ही नहीं। और आप उनके तब से उनके अभियान देखिए। हम ऐसे ऐसे भाषण तो हम लोग फिर दुविधा में पड़ गए कि अब शुभेंदु अधिकारी नंबर एक पर हैं। महाराष्ट्र के नंबर दो पर हैं या उत्तर प्रदेश के नंबर तीन पर हैं। तो ये जो नेताओं की आपसी प्रतिस्पर्धा है आगे बढ़ने की ये भारत में जनतंत्र की लोकतंत्र की सबसे बड़ी सबसे बड़ी मैं कहूंगा कि सबसे बड़ी आपदा है ये। हम्म क्योंकि इसका इसका नुकसान किसको हो रहा है? मुख्यमंत्री के नीचे कौन है? मंत्री है। मंत्री के नीचे कौन है? फिर और उनका उनकी अपनी पूरी व्यवस्था है और इस सारी व्यवस्था में ब्यूरोक्रेसी है। आप देखें कि एक पुलिस का अफसर उठकर के बंगाल में जाता है और वो कैसे नाम ले लेकर के कह रहा है। हम यहां पर आप उत्तर प्रदेश में देखिए साफ तौर पर नेता में और ब्यूरोक्रेट की भाषा में कोई फर्क ही नहीं है। ब्यूरोक्रेट ब्यूरोक्रेसी को इतनी ताकत किसने दी? हमारे संविधान ने इसलिए दी ताकि वो नेताओं से कब्जे में ना रहे। हम एक आईएएस का और आईपीएस का सरकार अगर आप मैनुअल उठा के देखें तो सरकार कुछ कर नहीं सकती। हमारे पास अशोक खेमका जैसे अफसर भी तो हुए हैं। होते रहे तबादले वो अपने ईमान के साथ खड़े रहे। हम भट्ट संजीव भट्ट हुए हैं। हम तो अब अब ये कैसी बात है कि हमने ब्यूरोक्रेसी को इतना मजबूत क्यों बनाया था? हम लेकिन सब उसी प्रेमचंद की एक लाइन के जवाब में अगर आप देखें कि बिगाड़ के डर से सब ईमान की बात करना बंद कर रहे हैं। क्या सिर्फ इतना ही है कि बिगाड़ के डर से ईमान की बात करना बंद कर दे रहे हैं या फिर दे वर ऑलवेज लाइक दैट मतलब वो हमेशा से ही एक यही एक कम्युनल माइंडसेट ही था। हमेशा से वो ऐसे ही थे। बीजेपी के आने के बाद उनको लगा कि अब वो खुलकर सामने आ सकते हैं यानी कि पूरे तरीके से नंगे हो सकते हैं। अब जो वो अपने ढके छुपे ड्राइंग रूम में या फिर अपने घरों में कोई बात करते थे या बंद कमरों की मीटिंग्स में जो बात करते थे अब वो खुले तौर पर कर सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से उनको इनाम दिए जाएंगे। उनको उनको अह मिनिस्टर बनाया जाएगा या किसी डीएम बना दिया जाएगा। इस तरह से तमाम हम देख रहे हैं जज बना दिया जाएगा तो उनको ये लग रहा है कि अब तो ये हम खुले तौर पर कर सकते हैं क्योंकि ऐसा कैसे हो सकता है दयाशंकर जी कि मैं हमेशा से आई फेल टू अंडरस्टैंड दिस कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] ऐसे कैसे हो सकता है कि एक सरकार आती है वो सत्ता में आती है 2014 में माना कि एंटी इनकंबेंसी थी डेवलपमेंट का मुद्दा हुआ एक नया चेहरा हालांकि 2002 का मॉडल कहा गया 2002 गुजरात 2002 गुजरात सबको पता है कि क्या है वो मॉडल किस तरह की वहां पर हेट स्पीचेस क्या क्या दी गई वो वो ईंधन जो आप कह रहे हैं चाहे वो दंगे हो या मॉब लिंचिंग हो वो हेट स्पीच ही होती है जिससे भड़काया जाता है बरगलाया जाता है लोगों ने उस चेहरे को देखा था एक मुख्यमंत्री के तौर पर फिर भी यकीन करके लोगों ने वोट किया और ऐसा तो था नहीं कि वो सेकुलर बन गए थे अचानक से या कोई उस तरह की भाषा बोलने लगे थे लेकिन फिर भी आप यह देखें कि अब जब हम अब देखते हैं तो ऐसा लगता है कि ये सब कुछ किया धरा जो है वो 12 सालों का है। लेकिन आपको नहीं लगता कि यह समाज में ऑलरेडी था। यह पनप रहा था। अचानक से 20 साल से मेरा रहता हुआ पड़ोसी कम्युनल नहीं हो सकता है। कि वो अचानक से मुझ पे शक करने लगे और अचानक से मुझे सवाल करने लगे। तो इस सबको आप आप कैसे देख रहे हैं? क्योंकि ये जो किताब है वो उसकी मैंने क्योंकि इसकी भी बात वो किताब करती है तो इसको आप कैसे देख रहे हैं? बिल्कुल ठीक बात आपने कही। ऐसा नहीं है कि सब कुछ 14 के बाद ही बदला है। समाज में अलग-अलग तरीके से सांप्रदायिकता अलग-अलग स्तरों पर मौजूद रहती है। लेकिन होता क्या है कि एक ऐसी स्थिति आती है जब आपको यह लगे कि मैं गलत करके ही आगे बढ़ सकता हूं। पहले आपको डर है और वो डर मैंने कैसे बताया कि आप एक पार्टी में हैं और आप कभी-कभी आप बयान देते हैं तो पहले मीडिया क्या चाहता था? विवादास्पद बयान या अगर आप थोड़ा पीछे जाए तो अखबारों की हेडलाइन होती थी दो गुटों के बीच सांप्रदायिक हिंसा अब नाम लिखे जाते हैं क्यों क्योंकि भाई वो मीडिया था मुख्यमंत्री थे लोग थे प्रेस काउंसिल थी सारी चीजें थी इनके सबकी कनेक्टिविटी जरा देखिए कि पहले अखबारों में कोई खबर छपती थी तो फिर अगले दिन प्रेस काउंसिल का बयान भी आता था उसी तरह आता था जिस तरह हम सोचते हैं कि ये गलत आया या जो जो जहां पर आप अदालत में जाके शिकायत कर सकते थे तो अदालत भी ऐसे नहीं कहती थी कि तुम एक साल बाद आना। अदालत भी ऐसे नहीं आपसे कहती थी कि जो है हमारे असम के मुख्यमंत्री के का मामला जब अदालत में गया तो उन्होंने क्या कहा? बोले हर बात में मत आ जाया करो आप। तो मेरा कहना है कि सारी व्यवस्थाएं एक दूसरे को सपोर्ट करती थी कहीं ना कहीं। और लेकिन 2000 12 के बाद एक बड़ा अंतर क्या आया कि जो जितना जो जितने निचले स्तर पर बात करेगा वो असल में उतना ऊपर जाएगा। जैसे फिजिक्स में एक मजाक में बात कही जाती है कि जो जितनी हल्की चीज होती है वो हवा में उड़ जाती है। तो यहां हल्के होने का एक मामला ऐसा बना कि एक नेता 20 साल मेहनत करे और उसके बजाय 2 मिनट वो मुसलमानों के खिलाफ नफरत करे। तो उसको जो रिवार्ड सिस्टम बनाया और रिवार्ड सिस्टम क्यों बनाया क्योंकि गुजरात मॉडल पूरा का पूरा कॉपी और पेस्ट किया गया है। इस किताब में आखिरी के चैप्टर्स हैं जिनमें बताया गया है कि गोधरा की आप बात करते हैं। हां गोधरा की मैं बात कर रहा हूं। चुप्पियों के संसार की बात कर रहा हूं। तो असल में सारे लोग जो अभी प्रधानमंत्री के पूरे इस कालखंड को जब परिभाषित करने की कोशिश करते हैं तो वो भूल जाते हैं। भारत में मैं देख रहा हूं कि एक तरह के जैसे एक गजनी फिल्म आई थी आमिर खान साहब की उसमें नायक को एक बीमारी थी शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस। भारत में क्या हो रहा है कि लगातार एक शॉर्ट टर्म मेमोरी लॉस बनाया गया है। हम ये भूल गए हैं। हमने देखा था 2014 में जब मोदी दिल्ली आ रहे थे तो कैसे बड़े-बड़े स्कॉलर जो आजकल अखबारों में अलग मिजाज के लेख लिख रहे हैं। उस वक्त उन्होंने कैसे अभिनंदन किया था। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय लोग थे जो कह रहे थे कि नहीं नहीं मोदी तो सब कुछ गुजरात में पीछे छोड़ आए हैं। अब ये नई कहानी है। ये नई रवानी है। अभी ये इनफैक्ट अभी जो बड़े-बड़े नए-नए जो बड़े-बड़े यूटर्स भी हैं, पत्रकार जो YouTube पर अब आ गए हैं। जो संपादक रहे, अलग-अलग बड़े चैनल्स के बड़े चेहरे रहे। उन्होंने सबने खुलकर सपोर्ट किया था। था। राहुल को पप्पू बोला था और सब सपोर्ट किया था नरेंद्र मोदी का। आज वो सवाल पूछ रहे हैं। लेकिन आपके उस वक्त के किए की कीमत तो आज का मुसलमान चुका रहा है। बस यही यही बात है कि आप हमेशा से जब हम बात करते हैं तो हम लेखकों से पत्रकारों से एक दानिशमंदी की बात करते हैं। अन्ना आंदोलन इसी दिल्ली में हुआ और हमने अपने लेखकों, पत्रकारों को बड़े-बड़े पत्रकारों को उसमें गलती करते हुए साफ तौर पर देखा था। मेरी जो इससे पहले की किताब है उसमें दिल्ली नाम से एक पूरा चैप्टर है जिसमें हमने यह बताने की कोशिश की कि कैसे आरएसएस के लोग कैसे तमाम दूसरे संगठन अन्ना आंदोलन के पीछे थे। लेकिन अगर आप देखें कि अन्ना आंदोलन को तमाम राष्ट्रीय टेलीविजन चैनल तमाम अखबारों के लोग जो लोग बिल्कुल एकदम कांधे पर पालकी उनकी ढो रहे थे। क्या उन्होंने एक पल भी विचार नहीं किया कि यह सब कुछ कैसे घटित हो रहा है? इसके पीछे विचार क्या है? उस समय भी उनसे पूछा गया था। जैसे मुक्तिबोध पूछते हैं कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? तो उनको किसी ने उस बात का जवाब नहीं दिया कि पॉलिटिक्स क्या है? किसी ने कहा हम स्कूल बनवाएंगे। किसी कभी जवाब मिला सड़क बनवाएंगे। कभी जवाब मिला कि हम सबको जेल में डाल देंगे। लेकिन मुक्तिबोध का सवाल वहीं रह गया है कि पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? तो मेरा कहना है कि जब 2014 में मोदी सत्ता में आ रहे थे तब जो सवाल ठीक से पूछे जाने चाहिए थे वो नहीं पूछे गए। नहीं पूछा गया कि मुसलमानों के साथ क्या वही सलूक किया जाएगा जो गुजरात गुजरात में किया गया। तो इसमें सारी सब लोग अपनी-अपनी कहीं ना कहीं दिशा भटके हैं। वो वो खासतौर पर भटके हैं जिनके ऊपर खासतौर पर ये बड़ी जिम्मेदारी थी। आप देखें कि जब यह मॉब लिंचिंग शुरू होती है, हम वापस लौटते हैं उस पर मॉब लिंचिंग शुरू होती है। प्रधानमंत्री यहां शपथ ले रहे हैं और मोहसीन शेख जो है विशुद्ध रूप से पहचान के आधार पर इस किताब में हमने कोशिश की है कि सीधी बात की जाए। हमने लिखा कि पहचान से गई जान। तो पहचान से गई जान। क्यों? क्योंकि और कोई काम ही नहीं किया मोहसिन ने। वो निकलते हैं अपना ऑफिस का काम कर रहे हैं। मस्जिद से निकल रहे हैं। और उनको अपने मुसलमान होने पर वैसा ही गर्व है जैसा गर्व अनुराग ठाकुर को है। हम अनुराग ठाकुर यही तो कहते हैं ना कि भाई मैं तिलक लगाता हूं या जो भी करता हूं वो जो कहते हैं कि मैं वो दम से कहते हैं कि मैं हिंदू हूं। मोशन शेख ने भी पठानी सूट उनको बहुत पसंद था। उन्होंने पठानी सूट पहना हुआ था। उन्होंने माथे पर सफेद टोपी लगाई हुई थी। वो घनी दाढ़ी रखते थे। और इंजीनियर थे। इंजीनियर थे। कंप्यूटर इंजीनियर और उन्होंने बेंगलुरु को नहीं चुना था क्योंकि उनको पुणे की जो हवा है वो पुणा का जो हम जानते हैं मौसम है जो मिजाज है वो बेसाख्ता पसंद था। हमें उनके भाई मोबिन ने जो इंटरव्यू दिया उसमें वो बताते हैं। लेकिन मोहसिन नहीं समझ पाए कि पुणे की सड़कों पर एक गर्म हवा भी दौड़ रही है। उनको लगा कि नहीं पूना का मौसम बड़ा सुहावना है। वो उस गर्म हवा को नहीं भांप पाए। नहीं तो संभव था कि वह किसी आईटी कंप्यूटर इंजीनियर थे। हमें बताया गया है कि उनके पास दूसरे मौके थे। लेकिन उनको अपनी उस उस अपने शहर से प्यार होता है। आप किससे मोहब्बत करते हैं? हम केवल अपने इंसानों से इंसान केवल इंसान से मोहब्बत नहीं करता है। इंसान अपनी हवा से, अपनी पानी से, अपनी जमीन से, सबसे मोहब्बत करके इंसान बनता है। तो मोहसिन को अपने उस पूना के, हवा से, पानी से, मिजाज से, अपने पड़ोसियों से मोहब्बत थी। वो नहीं समझ पाए कि कैसे गर्म हवा सड़कों पर पागलों की तरह दौड़ रही है और उस गर्म हवा ने जब हमला किया मोहिन शेख पर तो उस हमले के खिलाफ सरकार चुप रही लेकिन तब लोग बोले याद कीजिएगा और मोहिन शेख के मोहिन शेख की जो यह घटना है यह प्रधानमंत्री के शपथ लेने के ठीक एक हफ्ते के भीतर की घटना है और उसके लगभग सवा साल बाद हम अखलाक में वो सड़क पर हुआ था ये घर में घुसकर हुआ है और आप दोनों में ये देखेंगे कि मतलब ऑफ कोर्स आपको तो पता है मैं लेकिन दर्शकों के लिए मैं कह रही हूं कि ये कहा जाता है कि किसी गरीब मुसलमान को किसी राह चलते को किसी गाय का कोई कारोबार करने वाले को गौपालक को जो एजुकेटेड नहीं है उसको जो है वो इस तरह से उनके साथ ये किया जाता है। पीट-पीट कर मार दिया जाता है। रहबर से लेकर अकबर से लेकर हमारे पास बहुत सारे ऐसे एग्जांपल्स हैं जो इसी का शिकार हुए हैं। लेकिन पहली मॉब लिंचिंग आप यह देखिए एक युवा अह एक इंजीनियर को मारा जाता है और दूसरे को आप देखिए कि उसके पिता को मारा जाता है जो आर्मी में होता है। जो आर्मी में होता है। और आप आपने फिर ट्रैवल किया अखलाक जी जहां पहले रहा करते थे मतलब जहां जहां उनकी लिंचिंग हुई है जो कि बहुत ही कम्युनल मैं कहूंगी कि वो पूरा गांव है नोएडा का और आपने उनके परिवार से भी आपने बात की है। मुझे यह बताइए कि क्या उनका परिवार उस वहीं पर जाकर ठहर गया है? क्योंकि अक्सर लोग अखलाक की बात करते हैं लेकिन उनका जो एक और बेटा और उनकी पत्नी उनको भी मारा गया था। उनका बेटा कोमा में चला गया था और एक बेटा उनका आर्मी में था। मैं मैं आपसे और फिर उसके बाद भी उनका बेटा ये कहता है कि उन्हें कानून पर यकीन है। इस देश के संविधान पर उन्हें यकीन है। वो ये तमाम बातें भी कहते हुए नजर कि मुझे हिंदुस्तान पर नाज है। नाज है। तो आप ये देखिए कि जिनके हुब्बुल वतनी पर सवाल किए जाते हैं। वह अपने पिता की पीट-पीट कर मारे जाने के बाद भी वह इन अल्फ़ाज़ों का इन अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल करते हैं। जब आप टाइम ट्रैवल करते हैं और जब आपने ट्रैवल किया और जब आप वहां पहुंचे तो आपने क्या देखा आपने? उस गांव में आपने क्या देखा? उस परिवार में आपने क्या देखा? क्योंकि मुझे लग रहा है अखलाक सिर्फ एक नाम रह गए हैं और उनकी पूरी के पूरे उस जुल्म को शायद लोग भूल गए हैं क्योंकि हर रोज अखलाक हो रहे हैं। इसके पहले मैं ये बात कहना चाहता हूं। मुझे बहुत से लोग पूछ रहे हैं जिन लोगों से बात हो रही है कि किताब का नाम अखलाक क्यों रखा हुआ? और किताब के कवर पर ही हम देख सकते हैं कि अखलाक नाम ही है। हम तो लोगों ने पूछा मुझसे कि भाई लिंचिंग तो मान लीजिए मोहसीन की भी हुई। हम लिंचिंग तो सुबोध की भी हुई लिंचिंग तो किसी जो है आर्यन की भी हुई या ऐसे तमाम नाम है लेकिन अखलाक क्यों हम अखलाक किस लिए क्योंकि अखलाक भारत में अपने तरीके के एक पहले मामले हैं जहां पर सरकार यानी जिसका काम है कि वो हत्या की जांच कराए हत्या के पर मुकदमे चले और दोषियों को सजा दिल लाए नवंबर में यानी बीते नवंबर में 2025 में उत्तर प्रदेश की सरकार एक याचिका दायर करती है कोर्ट में अदालत में स्थानीय अदालत में जहां ये मुकदमा चल रहा है और वो कहती है कि जितने इसके आरोपी हैं हत्यारोपी हैं सब पर से मुकदमे वापस ले लिए जाए। याद रखना पड़ेगा हमें हमारे दर्शकों को कि मोहसिन शेख का जो मुकदमा चला उसमें भी लोग छूट गए हैं। हम लिंचिंग के ज्यादातर मामलों में लोग छूट जाते हैं। लेकिन अदालत की प्रक्रिया तो पूरी हुई वो तो पुलिस की नाकामयाबी हुई जो इन्वेस्टिगेशन ठीक से नहीं हुई कि छूट गए लेकिन किसी मामले में किसी मामले में जहां तक मेरी जानकारी है सरकार कहे कि ये जो आरोपी हैं इन पर से वापस लेना है मुकदमे। हम वो जो उस जो उस वक्त वहां जज थे उन्होंने वो मामला सौरभ द्विवेदी उस वक्त जज थे उन्होंने उस मामले को याचिका को रद्द कर दिया। मुझे नहीं मालूम उत्तर प्रदेश चुनाव में अभी बहुत कम वक्त है। कभी यह याचिका दोबारा निश अदालत से उठ के हाई कोर्ट पहुंच जाए। लेकिन यह एक ऐसा मामला है जहां सरकार ने सारा जो लोकतंत्र का जो चोला है वो जैसे उतार करके सार्वजनिक रूप से आप घोषणा करते हैं कि हम इस मुल्क में सबके लिए नहीं है। हम इस देश में सबके लिए नहीं है। यह वतन सबका नहीं है। यह वतन अखलाक का नहीं है। क्या किसी दूसरे मामले में हम ऐसा होते हुए देखते हैं? नहीं देखते हैं। इसलिए यह किताब का नाम अखलाक इसलिए है क्योंकि अखलाक एक प्रतीक है कि कैसे आप मुझे सजा दे रहे हैं मेरे मुसलमान होने पर कि जब मैं अखलाक के घर के बाहर था तो मतलब मैं आपसे कैसे बयान करूं कि मुझे एक पल को लगा कि मैं शर्म से यहीं मैं यहीं दफन हो जाऊं। मुझे इतनी तकलीफ हुई कि मैं इसलिए जिंदा हूं। मैं इसलिए यहां खड़ा हूं क्योंकि मेरा नाम दयाशंकर है। मैं इसलिए मैं इसलिए यहां रह सकता हूं। मैं इसलिए यहां बात कर सकता हूं। अखलाक के ज्यादातर पड़ोसी हिंदू हैं। ये जब घटना घटी थी 2015 में ईद के कुछ दिन बाद ही घटी थी। बकरा वो तमाम लोग थे जिन्होंने दावत दावत दावत दावत ली थी ईद पर। या दावत का हिस्सा थे किसी ना किसी रूप में। वो लोग उनके जनाजे तक में जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। उस हिम्मत को तो छोड़िए। आज तो मैं 10 साल बाद मतलब यह सब 2015 में हुआ और मैं दोबारा अखलाक के घर से मिलने घर ही कहूंगा। घर जो जजर हो चुका है, घर जो वीराना है, घर जिसमें प्लास्टर जगह-जगह से उखड़ गया है। बाकी सारे घर एकदम चमक रहे हैं। तो मैंने देखा कि वो कहानी बता रहा है। जब वो घर मुझे अखलाक का घर मुझे देखता है तो मुझसे पूछता है कि तुम तुम क्या कर रहे हो? तो जब मैं अखलाक के घर के सामने हूं तो मैं बहुत बेचैनी महसूस करता हूं। मैं बहुत विवशता महसूस करता हूं। मैंने इस किताब में लिखा है कि वहां मंजर इस तरह का है कि मेरे साथ जो मेरे एक साथी गए थे।कि जब मैंने उनसे कहा कि मैं जा रहा हूं तो उन्होंने कहा कि मैं भी आपके साथ चलता हूं। तो आप समझे कि माहौल क्या है कि हमारी गाड़ी पर प्रेस लिखा हुआ था। लेकिन वो कहते हैं इस किताब में सब कुछ वो बयान है कि वो कहते हैं कि स्टीकर हम हटा देते हैं क्योंकि वहां जाना ठीक नहीं है। तो मैं कहता हूं कि इस देश में तो पत्रकार की गाड़ी पर प्रेस इसीलिए लिखा जाता था क्योंकि वो सेफ थी। तो अब ये क्या कह रहे हो? उसने कहा कि नहीं नहीं आप समझ नहीं रहे। तो मेरी और उसकी बात भी होती है। मैं कहता हूं मैं तो अभी पूरी सब जगह घूम के आ गया। अभी सब जगह घूम करके आ गया हूं। तो वो कहता है ये ये आप दादरी में हैं। आप उत्तर प्रदेश में हैं। उस दादरी में हैं जहां उत्तर प्रदेश की पूरी जहां से राजनीति जहां से गर्म हवा जो है उठनी शुरू होती है। तो आप बहस मत करिए। हम फिर हम देखते हैं कि जैसे पूरा एक जो मंजर है दादरी में या जो उनके घर के आसपास सब जगह जैसे कोई किसी से कुछ बोल नहीं रहा है। लेकिन जैसे हर कोई एक दूसरे पर नजर रख रहा है। लोग घूर रहे हैं कि आप क्यों हैं? हम लोगों से बात करने की कोशिश करते हैं तो लोग ये कहते हैं कि भाई जो है भूल जाओ आगे बढ़ जाओ। यहां तक कि जो उस गांव में बचे खुचे जो बाकी मुसलमान हैं मतलब उनको भी एक तरह से कोशिश की जा रही है कि वो वहां से किसी तरह चले जाएं। कहीं और चले जाएं। तो ये जो बिहाड़ा है वो हिंदुत्व की प्रयोगशाला का एक ऐलान मतलब एक एक ऐलान है। एक ऐलान हो गया है कि भाई अब हम ऐसी दुनिया चाहते हैं जहां से हम चाहेंगे तो अखलाक हमारे बीच रहेगा। हम चाहेंगे तो अखलाक हमारे साथ रहेगा। हम नहीं चाहेंगे तो नहीं रहेगा। क्योंकि हम चाह रहे हैं देखिए कोई भी सोसाइटी अपने बुजुर्गों के विवेक से आगे बढ़ती है। हमेशा हम देखते हैं कि जब जब परेशानियां आती हैं तो बुजुर्ग उसका नीव का पत्थर होते हैं या पिलर होते हैं। लेकिन मुझे वहां पर तमाम जो बुजुर्ग मिलते हैं वो यही कहते हैं कि हम इस पर बात कोई और बात करिए आप। हम वो कहते हैं गलत क्या हुआ? अच्छा महिलाएं कह रही है कि अरे यह तो धर्म का मामला है। तो मैं उनसे कहता हूं कैसा धर्म है कि किसी के घर में घुस के आप उसको मार देते हैं। उसका फ्रिज चेक करके हां उसका फ्रिज चेक करके आप मार दें। तो वो कहते हैं कि नहीं नहीं ये तो धर्म का काम है। मैं उन परिजनों से भी मिलने मिलने की कोशिश की। ऑफ रिकॉर्ड उन्होंने बात की जो लोग जमानत पर छूटे हुए हैं। किसी को कोई अफसोस नहीं है। वो लड़के एक एक तरह से नायक हैं। वो जो लड़के बाहर हैं जमानत पर उनकी जिंदगी में कोई फर्क नहीं आया। फर्क आना चाहिए था। अगर समाज में मोहब्बत थी तो फर्क आता कि उनकी शादियां ना होती। फर्क आता कि पंचायतें कहती कि हम तुमसे रोटी पानी का व्यवहार नहीं करेंगे। होता ना। कहते कि भाई शादियां पहले है कि इसको बाहर कर दो यहां से। अगर समाज वह समाज कहां गया जो अपनी हवा मिट्टी पानी में मौजूद एक अखलाक को मतलब जैसे मिटा दे रहे हैं जैसे कोई कंप्यूटर की कोई फाइल है कि मैंने डिलीट कर दी कंप्यूटर से आप एक फाइल डिलीट कर दीजिए तो फाइल डिलीट हो गई क्या हम क्या हम हम ऐसे ही हैं कि कोई भी एक एक लोग तय कर लेंगे कि यहां तुम नहीं रहो और तुम नहीं रहो हम तो हमारा संविधान क्या करेगा क्या मेरा संविधान मेरे साथ खड़ा नहीं होगा तो जब मैं अखलाक के घर पर हूं हूं। अखलाक का घर मुझसे पूछता है कि चुप्पी क्यों है? और मुझे लगता है कि मैं शर्म से शर्म से मैं कहां कहां चला जाऊं। अखलाक का घर वहीं महाराणा प्रताप की मूर्ति है। उससे भी पूछता है कि तुम्हारी वीरता की कहानियां ये तुम्हारे नाम के ही तो लोग हैं। वहां जो समुदाय रह रहे हैं वो महाराणा प्रताप से अपने को एसोसिएट करते हैं। महाराणा प्रताप की विषाड़ा में आप जैसे ही जाएं तो प्रवेश द्वार पर ही आपको महाराणा प्रताप मिल जाएंगे। भीतर भी महाराणा प्रताप मिल जाएंगे। महाराणा प्रताप की वीरता की कसमें मिल जाएंगी। वो घर जब महाराणा प्रताप से बार-बार पूछता है तो एक दिन वो घर देखता है कि महाराणा प्रताप की जो मूछे हैं जो सिंबल है वीरता का वो नीचे की तरफ है। यानी यानी पूरे के पूरे वातावरण में एक चुप्पी है। हम जैसे वातावरण में चारों तरफ एक ही बात दौड़ रही है कि बस चुप रहो आगे बढ़ो। तो यह जो दहशत है इससे समाज आगे नहीं जाता है। चुपियों से कोई भी तरक्की नहीं करता है। चुपियों से तो तानाशाही की लेयर मजबूत होती है। और आप बड़ी संख्या में लोगों को चुप इसलिए रखना चाहते हैं ताकि एक बार जब लोग चुप होना सीख जाए तो वह हर सवाल पर चुप हो जाएंगे। आज वो अखलाक पर चुप हैं। कल वो नौकरी पर चुप होंगे। परसों किसी और के मारे जाने पर चुप होंगे। जैसे इस दिल्ली में पानी भर रहा है। लोग चुप हैं। अस्पताल में आप देख रही हैं कैसी रिपोर्ट आ रही है सरकारी अस्पतालों की। क्या हालत है? लेकिन चुप हैं। यह अभ्यास है। इसी को कहते हैं कि ये सरकार सर्वसत्तावादी है। गलत है कि यह सरकार तानाशाही है। तानाशाही में और सर्वसत्तावादी सरकार में फर्क होता है। पहले इस सरकार ने तानाशाही की वो हैसियत प्राप्त की। अब ये सरकार तानाशाही से सर्वसत्तावाद की ओर बढ़ गई। हम सर्वसत्तावाद यही है कि दयाशंकर मिश्रा किताब नहीं लिख सकते राहुल गांधी पर। अगर यह सर्वसत्तावाद नहीं होता तो लिखते रहते। जैसे मोदी जी पर गाथाएं लिखी जा रही हैं तो एक किताब और सही। हम लेकिन अब जब ये प्रकाशक देश के तय करते हैं कि अखलाक पर किताब नहीं लिख सकते। क्योंकि वो कहते हैं कि इससे सरकार नाराज हो जाएगी। इसका मतलब सरकार हर महीन चीज पर नजर रख रही है। आप कैसे सोचते हैं? क्या खाते हैं? क्या पहनते हैं? पहनते हैं। आप क्या बोलते हैं? आप क्या बोलते हैं? हर चीज पर यही तो सर्वसत्तावाद है कि कंट्रोल है। सरकार केवल इस बात से अब नहीं पीछे हट गई कि आप किसको वोट देते हैं। हम हम आप देखें बिहार में और बंगाल में क्या हुआ। जिसने जो जिसका नाम एसआईआर से बाहर हुआ उसका नाम राशन से भी बाहर हुआ। यानी अगर आप मेरे वोटर नहीं हैं। अगर आप मुझको वोट नहीं करते हैं। तो पड़े रहिए बस यहां पर। पड़े रहिए आप। किसी भी दिन खबर आएगी कि आप इन सबको उठाएंगे और जैसे हमने देखा कि वहां जो कि कैसे-किन लोगों को उठाके बांग्लादेश के बाहर फेंक दिया गया है। कैसे कुछ लोगों को दूसरे देश की सीमा में डाल दिया गया है। वहां से लोग बाहर आए। बिल्कुल आप देखिए कि वो एक एग्जांपल है जो आप बात कर रहे हैं घुसपैठियों के नाम पर कि एक औरत मुंबई में आप देखें कि वो अपनी रोटी लेने के लिए जा रही है। रोटी और सब्जी लेने के लिए जा रही है। अपने घर से कह कर जाती है। वो एक घर-घर जाकर काम करती है। उसका शौहर भी इसी तरह से काम करता है। गाड़ी वगैरह धोने का और इस सब का और अचानक से वहां शादी वर्दी में लोग आते हैं जो अपने आप को क्राइम ब्रांच का फिर बाद में कहते हैं और उसको उठाकर ले जाते हैं और फिर उसके बाद उसे बांग्लादेश भेज दिया जाता है। और फिर वहां उसके पास हर एक चीज है। उसके गांव वाले डीएम के ऑफिस जाकर यह यह प्रमाण दे रहे हैं कि भाई हमने उसे बचपन से देखा है। जब से वो पैदा हुई है तब से हमने उसे देखा है। लेकिन क्योंकि वो मुसलमान है तो आपने एक दिन उठाकर उसको दूसरे देश ही फेंक दिया। और फिर आप लड़ते रहिए कानूनी लड़ाई। और यह सब इसलिए क्योंकि जितना आप यह करते हैं तो आपको रिवार्ड मिलता है। आप कुछ थोड़ा पीछे ले जाना चाहूंगा कि आपको याद होगा कोरोना के वक्त टेलीविजन स्क्रीन पर खबरें आती हैं कि शाहरुख खान के बेटे ड्रग उसमें पाए गए पार्टियों में पाए गए। लगातार खबरें चलती रहती हैं चारों तरफ की और मात्रा बताई जाती है। कुछ दिन बाद हम देखते हैं कि कैसे अदालत में वो सारा मामला खत्म हो गया। लेकिन जो वो अफसर था जिसने इस मामले को आगे बढ़ाया था मैं उनका नाम भूल रहा हूं। वो जो अफसर थे मुस्लिम थे वो नहीं नहीं वो अफसर मुस्लिम नहीं थे। अफसर का नाम मैं भूल रहा हूं कि क्या था। लेकिन कैसे हम उनको बीजेपी और आरएसएस के दफ्तरों में जाते हुए देखते हैं। हम कैसे खबरें आती हैं कि वो चुनाव लड़ने वाले हैं। हम तो मैं वो सीधा एक एक किस्म का जो आपने बात कही ना कि हर कोई ये देख रहा है कि यही रास्ता है। हम बिल्कुल। तो रास्ता बहुत साफ बना दिया गया है। जब आप देखें कि बिलकिस बानो के जब रेपिस्ट जो है जब बाहर निकल कर आते हैं तो उनकी औरतें जो हैं उनको मालाएं पहनाकर उनके पैर छूकर उनका स्वागत करती हैं और वो बाहर निकलते हैं। कितना सड़ा हुआ ये समाज है। मतलब सड़ा हुआ ही नहीं है। इसमें से बदबू और फफूंदन ही नहीं न जाने और क्या-क्या निकल रहा है कि ये समाज कहां आकर खड़ा हो गया। ये सब कैसे शुरू होता है। ये सब ऐसे शुरू होता है कि बिलकिस बानो के जो दोषी हैं। उनसे पहले हम झारखंड चले और देखें कि केंद्रीय मंत्री रहे हैं उस वक्त जयंत सिन्हा हम लोग हिंदुस्तान में आमतौर पर पढ़े और अनपढ़ को लेकर बड़े कंफ्यूज हैं। हम अपने आदमी को जो प्यार मोहब्बत से रहता है। उसके पास कोई विदेश की डिग्री नहीं है। हम उसको ऐसी नीची निगाह से देखते हैं। जैन सिन्हा को हम कहते हैं ये तो बड़े पढ़े लिखे बड़े लोग हैं भाई। विदेशों में पड़े पड़े हुए लोग हैं और उन वो जो है मॉब लिंचिंग के आरोप जो उस वक्त तो मुकदमा चल ही रहा है और उनका स्वागत कर रहे हैं। मिठाई खिला मिठाई खिला रहे हैं और उसके बदले में वो कोई बाद में जब होता है तो आप देखें कैसे बचकाने तर्क दिए जाते हैं। तो जब आप देख जब कोई देखता है एक छोटा पार्षद एक छोटा नेता एक छोटा कार्यकर्ता कि ये ये मेरा हीरो ये काम कर रहा है। मेरा सांसद मेरा मंत्री इसका मतलब मेरे को भी मंत्री बनना है। यह जो चारों तरफ से देश में बात चल रही है कि मुझे तरक्की करना है और मुसलमान की कीमत पर करना है क्योंकि मुसलमान सॉफ्ट टारगेट है। ये किताब वो तमाम बयानों को दर्ज करने की कोशिश है कि अगर मैं मुसलमान ना हूं तो मैं बचने का मेरा पूरा चांस है। क्यों चांस है? क्योंकि आज कल मेरे बगल में किसी नेता को ख्याल आ जाए कि मेरा नाम तो पीछे चल रहा है इलेक्शन में तो मैं जो है हमला कर दूं। मैं एक बुलडोजर ले जाके चढ़ा दूं और कहूं कि यहां जो है गाय का मांस था। तो अब ये जो बात ये जो फिनोमिनन आ गया है ये फिनोमिनन हमारे दिमागों को मतलब जो भी सेंटीमेंट्स पहले सोसाइटी में थे वो 2014 के बाद से उनको इतनी शक्ति मिल रही है। इतनी ऊर्जा मिल रही है हरपण। पहले अफसरों को यह डर रहता था कि वो किसी मामले में फंस गए तो सुप्रीम कोर्ट में घसीटे जाएंगे। लेकिन अब जब सब तरफ से आप अफसरों को देखते हैं कि कैसे वो नफरत फैलाने वाले कैसे आगे बढ़ रहे हैं तो उनके भीतर भी वही बात होती है। मैं जुडिशरी पर भी आऊंगी और मीडिया के रोल पर भी आऊंगी क्योंकि इन दोनों की बात किए बगैर बात आगे बढ़ नहीं सकती है। लेकिन उससे पहले ये कुछ जो आपने कुछ लोगों की जो विक्टिम्स हैं या उनके परिवार वाले हैं उन उनकी तमाम बातों को आपने इसमें शामिल किया है। आप अलग-अलग जगह जाकर आपने ट्रैवल किया है। आपने नूर की आप जब बात करते हैं कि नफरत से हारी दोस्ती मैं चाहूंगी कि उसके बारे में आप मुझे कुछ बताएं और उदगीर जो है ये दो चीजें हैं जो जो और खासतौर पे उदगीर की जो जो बात है जो डॉक्टर का जिस तरह का वो रवैया है यानी कि डॉक्टर को ये कहा जाता है कि कुछ लोग कहते हैं कि जमीन पर भगवान बिल्कुल बिल्कुल आप ये कहें कि उनके ऊपर आप एक तरह से ही होते हैं कि भाई मतलब खुदा और डॉक्टर में क्या है? हां मतलब आप ये कहते हैं कि जमीन मतलब आपको वो वो सिफत मिली है अपनी पढ़ाई के थ्रू कि आप किसी की जान बचा सकें आपके ऊपर इतनी जैसे पुलिस में कहते हैं कि भई आप रक्षक हैं और रक्षक ही भक्षक बन जाए तो ये भी उसी तरह की ही आपकी ये उदगीर की कहानी है। इन दोनों के बारे में आप बताइए कि इन दोनों में क्या सबसे शॉकिंग आपको लगा और क्या है इन विक्टिम्स की कि जो पूरी कहानियां है। कहानी शब्द से मैं थोड़ा सा परहेज कर रही हूं कि कहानी ऐसा लगता है कि कोई मनोरंजन की बात है। जी बिल्कुल इस किताब में वैसे ज्यादातर जगहों पर हम गए हैं और हमने लोगों से बात की है तो बहुत लंबी बातचीतें हुई पहले हमने उनको समझने की कोशिश की जैसा आपने शुरुआत में कहा कि मुश्किल क्या आई मुश्किल ये आई कि जब मैं किसी पीड़ित जिसकी जान चली गई उसके परिवार जनों से मिल रहा हूं तो ये मुझसे पूछते हैं कि आप जो ये लिख रहे हैं जो ये दर्ज कर रहे हैं इसका क्या करेंगे हम तो मैं उनसे से कहता हूं कि मैं इसको इसको मैं दस्तावेज बनाऊंगा। आपकी बात को दूर तक ले जाने की कोशिश करूंगा। हम तो वो कहते हैं इससे क्या होगा? हम इससे मेरी जिंदगी पर क्या फर्क पड़ेगा? हम जो आप ये सब कर रहे हैं क्या मेरी जिंदगी उससे बेहतर हो जाएगी? हम तो मैं उनको कहता हूं कि मैं इस बात की तो कोई बात नहीं कह सकता लेकिन शायद दूसरे की जिंदगी शायद तबाह होने से शायद हम बचा पाए। तो एक बड़ी लंबी प्रक्रिया कई जगहों पर हुई जहां लोगों ने मुझसे कहा कि हम आपसे बात क्यों करें? हमें आपसे बात क्यों करनी चाहिए और उसका जिम्मेदार यह मीडिया है जिसने इतनी गैर जिम्मेदाराना तरीके से मॉब लिंचिंग को रिपोर्ट किया है कि मरने वाला ही जिम्मेदार है। हम आप टीवी चैनलों को मैं एक चुनौती देता हूं। सारे टीवी चैनलों को डॉक्यूमेंट कीजिए और आप देखिए। सब जगह आपको मिलेगा कि जो मरा है असल में वही जिम्मेदार है। अखलाक में केस भी हो जाता है। में क्या हुआ? मरने वाले पर केस हो जाएगा। उसके परिजनों पर मुकदमे हो जाएंगे। तो एक बड़ी मुश्किल हमें इसमें आई कि हम उनसे बात करें। लेकिन जब आप उनसे बात करते हैं, वो आपको समझते हैं, आप उनसे वो समझ जाते हैं कि आप आप करना क्या चाहते हैं। तो ये जो कहानी जिसका आपने जिक्र किया ये सतारा की कहानी है। सतारा महाराष्ट्र में एक बिल्कुल ही आप कहें कि जिसको हम कहते हैं कि एक ऐसी जगह जहां अलग-अलग लोग रह रहे हैं। मतलब जहां हिंदू भी हैं, मुसलमान भी हैं। और सबसे खूबसूरत बात ये है कि वहां मुसलमान गणेश मंडल के अध्यक्ष हैं। जो ये मेरी जिन पर ये पूरी रिपोर्ट है नूरुल शिकलगार वो गणेश मंडल के अध्यक्ष थे। आप जरा मुझे बता सकती हैं कि उत्तर प्रदेश में कौन सा मुसलमान गणेश उत्सव समिति का अध्यक्ष होगा। मेरी जो मेरा जो जो पैदाइशी जो प्रदेश है वह मध्य प्रदेश है। मध्य प्रदेश में भी गणेश उत्सव बहुत मनाया जाता है। दुर्गा उत्सव भी बहुत मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश में भी लेकिन मध्य प्रदेश में हमारा बचपन भी था। हमने देखा हमने बहुत कम देखा। बहुत बचपन में किसी को देखा तो देखा। कमेटी में तो देखा नीचे कि एक कमेटी है उसमें कोई अयास खान भी है अगर ऊपर दयाशंकर है तो हम लेकिन मैंने ऐसा तो नहीं देखा मुझे याद नहीं आता है बहुत मेरे पहले की बात हो तो मुझे नहीं पता कि गणेश उत्सव समिति के जो अध्यक्ष हैं वो नूरुल शिकलगार हैं लेकिन पुसेसावली में नूरुल शिकलगार गणेश मंडल के अध्यक्ष थे। इसका मतलब जो कौमी एकता जिसे आप कहते हैं जो मोहब्बत कहते हैं वो सतारा में पुसेसावली में थी ना तब तो गणेश मंडल के अध्यक्ष बने। सही बात है। और 2023 तक सब ठीक चलता रहता है। आराम से सारे काम चल रहे हैं। लेकिन इसी बीच में अगर आप देखें ध्यान से 2021 22 से महाराष्ट्र में हेट स्पीच बढ़नी शुरू हो रही है। पूरे देश में बढ़ रही है। महाराष्ट्र में और तेजी से बढ़ रही है। और चारों तरफ यह हो रहा है कि कोई भी चीज अचानक से बिना सत्यापित किए हुए चैनलों पर दौड़ रही है। ऐसी ही कुछ रिपोर्ट दौड़नी शुरू होती हैं और जैसे आप यहां बजरंग दल का नाम सुनते हैं अतिवादी संगठन के रूप में हिंदूवादी संगठन के रूप में वैसे ही वहां संभाजी भिड़े नाम का एक ग्रुप है महाराष्ट्र में कह लीजिए कि पर्यायवाची ही एक प्रकार से उन सब की रैलियां हो रही हैं। वो रैलियां क्या हो रही हैं कि किसी किसी दूर कहीं पर कोई ऐसा भाषण हुआ है जिससे हिंदुओं को लग रहा है किसी भी बात से आजकल हिंदुओं की भावनाएं जो है वो आहत आहत हो गई है एकदम इतनी मैं कहूंगा कि एकदम इतनी फ्रेजाइल हो गई है कि किसी बात से भी वो आहत हो जाती हैं तो पुसेसावली में एक जमात आई हुई है और नूरुल उसके स्वागत में लगे हैं काम में लगे हैं दिन में जो है बजरंग दल की कोई रैली हुई है और लोगों को अचानक से गुस्सा आ गया है। भावनाएं भड़काई गई हैं। माफ़ कीजिएगा। यहां मैं यह संभाजी भेड़े जो [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं उनका समूह वहां काम कर रहा है। उन सब की है और अचानक से एक हिंसा भड़क जाती है। तो नूल को लोग कहते हैं कि जो है आप घर जाइए हम सब लोग अपना यहां देख लेंगे। हम तो वो कहते हैं ये तो मेरा ही है। सब हम ही सब तो हैं इसमें। और वो देखते हैं कि जो वो जुलूस चला आ रहा है जो जुलूस में लोग हैं वो उनके बचपन के दोस्त हैं। चिन्मय, राहुल, पंकज और ये दोस्ती कोई मामूली दोस्ती नहीं है। यहां बहुत ध्यान से हमारे दर्शकों को सुनना चाहिए कि जब नूरुल की जब शादी हो रही है और उन्होंने जो गाड़ी बुक की है, आमतौर पर हिंदुस्तान में है कि शादी के पहले आप नई कार लेते हैं तो उस कार को आने में कुछ वक्त लग गया है। और यह सब बातें स्वर्गीय नरुल की पत्नी आयशा मुझे बता रही है। कोई और नहीं बता रहा है। हमें जो उन्होंने इंटरव्यू दिया उसमें तो आयशा मुझे बता रही है कि नरुल ने मुझे फोन किया और नरुल ने कहा कि हमारी गाड़ी तो आई नहीं लेकिन चिंता की बात नहीं है। वो चिन्मय कह रहा है कि उसकी भी नई गाड़ी है तो हम उसकी गाड़ी से बारात लेकर आएंगे। हम दोस्ती दोस्ती है ना। इतनी दोस्ती नहीं है। नहीं तो लोग नई गाड़ी में ये हिंदू है, मुसलमान है। सब बहुत लोग बहुत नियम कानून दोस्ती अपनी जगह है। लेकिन पूजा में तो यह लगेगा, पूजा में वो लगेगा। लेकिन आखिर दोनों तरफ के मामले रहे होंगे। पारिवारिक पारिवारिक रहे होंगे। पड़ोस में आप रह रहे हैं। और इतना ही नहीं आगे चलकर के जब आयशा मां बनने वाली हैं। हम तो उनको क्रेविंग होती है अलग-अलग चीजों की। उनकी रात को उनको मन करता है कि ये चीज जरा मुझे मिल जाए। तो वह नूरुल फोन करते हैं अपने दोस्तों के उनकी छोटी सी दुकान है तो वह रात को 2:00 बजे कहते हैं कोई बात नहीं परेशान मत हो मुझे 2:00 बजे भी भाभी आप उठा लिया करो तो 2:00 बजे वो दुकान का शटर निकालते हैं उनके घर वाले पूछते हैं भाई रात को दुकान क्यों खोल रहा है तो कोई और बहाना बना देते हैं कि ये तो रोज-रोज का मामला है यानी आप आत्मीयता देख रहे हैं रिशेदारी देख रहे हैं लेकिन ये सारी रिशेदारी ये सारा प्यार ये अचानक 10 सितंबर 2023 के बाद कैसे गायब हो जाता है? क्योंकि 10 सितंबर 2023 को ही यह सारा जो जुलूस निकलता है, सारे भाषण होने शुरू होते हैं और संभाजी भिड़े का जो एक हिंदू प्रतिष्ठान है, उसकी एक पोस्ट वायरल हुई थी और वर्धनगढ़ नाम की एक जगह है। वहां भी तनाव बढ़ गया था। और पुसेसावली में मुस्लिम मुस्लिम इलाकों में हिंदू प्रतिष्ठान के लोग लगातार जुलूस निकाल रहे थे। रैलियां कर रहे थे। पुलिस को भी जानकारी दी गई थी कि पुलिस जो है वह आए और उन जो डीजे बज रहा था जो गाने बज रहे थे उसमें जो है तरह-तरह की आप मतलब ऐसी बातें हैं जो बतानी है माइक पर मतलब बड़ी मुझे शर्म आती है उन बातों को कहते हुए और उस उनमें सब में ये बज रहा है कि देश में रहना है तो जय श्री राम कहना है और बदन में लुंगी मुंह में पान और इस तरीके की सब तमाम बातें हैं। तो ये सब चल रहा है और इसी के दौरान हिंसा भड़क जाती है और यह जो जुलूस के लोग हैं ये कहते हैं कि जमात में दूसरी जगह से लोग आए हैं उनको सबक सिखाना जरूरी है और नूल कहते हैं कि वो बाहर से आए लोग हैं अगर उनको जरा सी भी खरोच आएगी तो हमारे नाम हमारा पुसेसा वली का नाम खराब होगा तो वो सबको निकालने लग जाते हैं जैसे मस्जिद मस्जिद के पीछे के इलाके से कि लोग चल जमात के लोगों को आप यहां से निकाल दें तो इस जो जमात के लोग हैं उन रूल से कहते हैं कि नहीं हम तो चले जाएंगे लेकिन ये जो लोग हैं। ये आप ही के मोहल्ले के हो सकता है आपको ज्यादा नुकसान पहुंचाए। तो नूरुल कहते हैं अरे ये सब अपने ही आदमी है। ये तीनों जो है उस जुलूस में आगे पीछे कहीं थे तो बोले वो तो अपने हैं। कैसी बात कर रहे हो तुम? और जब बहुत पास भी आ रहे हैं वो लोग और वो लोग कह भी रहे हैं कि तुम हट जाओ। नूरुल से उनमें से कोई जो तीनों ये तीन उनके दोस्त हैं वो कह रहे हैं कि आप नूरुल से कह रहे हो तुम हट जाओ भाई तुम जाओ। तो नूरुल उस पर ध्यान ना देकर उनको निकालने में लगे हैं। और यह और भी भीड़ के लोग नूरुल तक पहुंच जाते हैं। नूरुल से कहते हैं कि आप रास्ता दें। नूरुल कहते हैं कि मेरा भाई नाम खराब हो जाएगा हमारे तो शेशावली का। सतारा का नाम खराब हो जाएगा अगर इनको चोट आई। और आप देखें कि यह तीनों लोग यानी तीन यह जिनमें राहुल, पंकज और नूरुल कब की दोस्ती है और ये तीनों लोग नूरुल पर हमला कर देते हैं। नूरुल की जान चली जाती है। रात को देर रात को मतलब रात हो गई। अभी ये सब शाम का वक्त है। उसके पहले आयशा मुझे बता रही थी कि वो पांच मतलब ये शाम को मगरिब की नमाज शाम के जी उसके छुपने के बाद दिन छुपने के बाद है और वो उस दिन वो कह रहे हैं कि पता नहीं मेरा जी हुआ मैंने कहा कि मत जाओ तो वो वो कहते हैं नहीं बस मैं गया और आया और रात हो गई रात को 10 11:00 बजे या उससे भी देर रात को पुलिस उनके घर पर दस्तक देती है और आयशा और उनकी मां से कहती है कि आपको चलना पड़ेगा नूरुल को चोट लगी है। आयशा प्रेग्नेंट है। उनको नहीं बताया जाता। पुलिस जब उनके घर जाती है तो उनके साथ कोई जो है वो महिला जरूरी है कि भाई आप जाए बताने लेकिन कोई नहीं है। उनको गाड़ी में बिठाया जाता है। पुलिस अस्पताल ले जाया जाता है और फिर पता चलता है डॉक्टर बाहर निकल के आते हैं और बताते हैं कि भाई नूरुल को तो नूरुल की जान चली गई है। तब वो देखती हैं, सोचती हैं आयशा कि उनके दोस्त कहां हैं? हम वह तमाम लोग कहां हैं? हम तब वो अब वही जब आप जिनके साथ उन्हीं को तो आप पूछते हैं सही बात है मुश्किल में मुश्किल में कि वो लोग कहां है लेकिन पता नहीं चलता है लोग बताते नहीं है वो अपने अब इससे बड़े उनके जीवन में क्या घटना घटेगी घट गई है परेशान है फिर उनके परिवार के लोग आयशा के आते हैं तब जाकर कहीं अगले दिन मतलब उस दिन शाम तक जब मतलब सारी चीजें हो जाती हैं तब जाकर के आयशा को पूछती हैं बार-बार कि वो लोग कहां हैं उनके दोस्त कहां है? उनको बुलाओ। तो फिर उनको पता चलता है कि वही थे। वही थे। अब मैं आपसे बताऊं कि मैं मेरी मतलब आप कह सकते हैं शायद मेरी कमजोरी भी आप कह सकते हैं कि मुझे इस किताब को तैयार करने में बहुत वक्त लगा। ये किताब शायद छ सात महीने पहले तैयार हो जाती। लेकिन मैं एक ऐसी कशमकश में था। मैं मैं इतनी परेशानी में था। संवेदना के रूप से, इमोशन के रूप से कि मतलब मैं इसको कैसे बयान करूं? ये यकीन करना यकीन करना मुश्किल है। मैंने कई बार आयशा से पूछा कि आप जरा अपने अपने फैक्ट को आप जरा चेक कर लें। लेकिन वो उनके परिजन भी मेरे साथ बैठे हैं और वो क्या आयशा ने या उनके परिवार वालों ने उन लड़कों से फिर से जो दोस्त थे उनसे कभी बात करने की कोशिश की? क्योंकि हो सकता है कि उस वक्त नफरत इतने दिमाग पर हावी हो गई हो कि उनको सही और गलत की समझ वो भूल गए हो। मैं एक एक बेनिफिट ऑफ़ डाउट होता है ना उसको देने की कोशिश कर रही हूं या फिर मतलब मैं अल्फाज़ नहीं है कि मैं कैसे कहूं कि कैसे हो सकता है कि जो आपके बेस्ट फ्रेंड रहे हो वही आपको पीट-पीट कर मार दें। बहुत जो मुझे उन्होंने बताया आयशा ने हम उन्होंने मुझे बताया कि कोशिश तो इन्होंने की लेकिन वो बातचीत को राजी नहीं हुए। हो सकता है कि हो सकता है मैं कह रहा हूं कोई हमारे पास उसका एविडेंस नहीं है कि उनके मन में क्या आया हो इसका कोई हमारे पास हमको कुछ मिल नहीं पाया। हम चाहते थे कि हम राहुल, चिन्मय और पंकज से भी किसी तरह बात कर पाए कि अचानक क्या ऐसा हुआ। लेकिन आरोपी हैं। मामला सब चल रहा है। अदालत में है। एफआईआर दर्ज है। 27 लोग इसमें आरोपी बनाए गए थे। जिसमें वो तीन सबसे ज्यादा मुख्य हैं और हत्या के आरोपियों में है। तो उनसे तो बातचीत संभव नहीं हो पाई। यानी कि अगर उनके उनके अंदर कोई नदामत होती जी। तो वो शायद खुद ही आते कि कि गलती हो गई है। उस वक्त हम इस बहकावे में भड़काव में या इस तरह से हम आ गए। एक एक लेटर एक रियलाइजेशन होता है। इसका मतलब ऐसा कुछ भी नहीं है। हां मतलब बिल्कुल मतलब मैं भी इस बात से बिल्कुल सहमत हूं क्योंकि अगर आपको एक प्रायश्चित होता है अभी हम लौटेंगे इस किताब में ग्राहम स्टैंस के पास। मैं चाहूंगा कि आप हमें हमारे दर्शकों को ले चलें। जिसमें हम एक प्रायश्चित भी देखेंगे कि अगर प्रायश्चित है या अफसोस है तो वो कैसे अलग चीज में अलग दिशा में ले जाता है जीवन को। लेकिन यहां ऐसा मतलब बहुत अफसोस है कि ऐसा कुछ हुआ नहीं। मैंने उनसे पूछा भी कि उनके परिवार के लोगों का क्या रवैया है? खासतौर पर उनके परिवार की महिलाओं का महिलाओं ने बाद में आकर के कुछ कहा या कुछ बातचीत हुई। लेकिन आयशा के पास उस बारे में बताने के लिए कुछ है नहीं कि कैसे उनको कैसे मतलब उनको सांत्वना देने की कोशिश की गई। हां उन्होंने यही कहा कि जब कभी उनके परिवार के लोग मिल जाते हैं तो वो शर्मिंदा जरूर उनको होते हुए देखते हैं। नहीं मिला पाती होंगी महिलाएं लेकिन मुझे लगता है कि ये केवल शर्मिंदगीगी काफी नहीं है। औरकि अदालत में मामला चल रहा है तो इसलिए भी शायद ये हो सकता है। मुझे लगता है कि जो जैसे मैंने आपसे शुरू में कहा कि वो जो शीत जैसे ओस जैसे धीरे धीमे-धीमे आता है तो वो नफरत बैक ऑफ द माइंड हमारे दिमाग के दर्ज होती रहती है और वो कैसे अचानक बन जाती है कि आपको लगता है कि नहीं ये जो है वो जो एक इंसान की जान ले एक इंसान की जान ले ले आप और ये भी कि इंसान की जान ले लेने पर आपको जरूरी नहीं है कि सजा हो ही जाए हम अभी तो यह मामला अदालत में है। हो सकता है कि आप वहां से छूट जाए। छूटने के बाद आपके दूसरे मौके बन जाए। हो सकता है कि राहुल चिन्मय और जो तीसरे व्यक्ति हैं पंकज हो सकता है कि वो किसी पॉलिटिकल पार्टी के नेता बन जाए। इस आधार पर उनकी राजनीति हो जाए। तो वो क्यों अभी इस बात को अपने इस प्रोस्पेक्ट को अपने खत्म करें? क्योंकि हमने अखलाक के मामले में भी यही देखा कि जो लोग जमानत पर हैं जब सरकार कह रही है कि इनको वापस करो। हम जब वहां के लोग मानने को तैयार नहीं है। यह बिल्कुल वही बात है कि नो वन किल्ड जेसिका। तो जैसे जेसिका को किसी ने नहीं मारा। वैसे अखलाक को किसी ने नहीं मारा। वैसे जो है नरुल को किसी ने नहीं मारा। कोई नुरुल पहलू को किसी ने नहीं मारा। पहलू को किसी ने मारा। तो सबसे इसमें बात यह है कि जो जो मॉब लिंचिंग है उसका जो ईंधन है वो हमने इस किताब में समझाया है कि कैसे वो हेट स्पीच है और हेट स्पीच है और मल्टीपल एक्ट हैं। एक तो ये एक हेट स्पीच हो गई। दूसरा एक जैसे बुलडोजर है। आप देखें कि अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने क्या कहा। उन्होंने कहा ना कि मैं कलाकारों की तरह गाना तो नहीं गा सकता। लेकिन मैं बुरे लोगों को दंडित कर सकता हूं। उन पर बुलडोजर चला सकता हूं। इसी आशय की बात लगभग लगभग आप यह देखें कि अगर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री, मुख्यमंत्री अगर हम और वे करके बात करें वो कहें हम और वे यानी कि आप एक क्लियर डिवाइड आप क्रिएट कर रहे हैं और ये अगर इस तरह की चीजें पार्लियामेंट से चुनावी रैलियों से अगर इस तरह की चीजें हो कि आप हेट को आप पूरी तरीके से ना सिर्फ नॉर्मलाइज कर रहे हैं बल्कि उसको पावर दे रहे हैं और यह बता रहे हैं कि अगर आप ऐसा करेंगे तो आपको कैसे इनाम से नवाजा जाएगा? यह अच्छी बात है कि अगर प्रधानमंत्री कपड़ों से पहचान रहे हैं। वो यह कह रहे हैं कि आपके घरों की बेटियों को वो ले जाएंगे। अगर कब्र से निकालकर यह कहा जा रहा है कि उन औरतों के साथ मुसलमान औरतों के साथ क्या किया जाए? अगर बुलडोजर को न्याय का पर्याय बना दिया जाए और और आपकी रैलियों के बाहर बुलडोजर को खड़ा कर दिया जाए कि ये इस तरह से ऐसे होगा। उनके साथ होगा। अगर आप ये देखें कि मौलाना मोहम्मद अली जौहर जो कि कितने बड़े हुब्बुल वतन तो मैं कहूंगी लेकिन उन्होंने आजादी की लड़ाई में उनका कितना अहम रोल है। आप उसको पार्टीशन का दुश्मन आप बना दें। बिल्कुल कि वो आजादी के दुश्मन थे और पार्टीशन के पैरोकार थे। आप कुछ भी कह दीजिए कौन है आपका गिरेबान पकड़ने वाला या कौन कौन सी कोर्ट है या कौन से वो है कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट कोई सुमोटो लेगा। कोई नहीं लेगा। आप यह देखिए क्या किया जा रहा है और अगर शुभेंदु अधिकारी जैसे लोग जो यह कहें कि गाजा जैसा ट्रीटमेंट हो और फिर वो मुख्यमंत्री बन जाए तो ये तो एक एक तरह का पूरा आप ये देखें सिस्टमेटिक ढंग से आपको एक पूरी चीजें आपको बताई जा रही है कि आप ऐसा करेंगे तो आपको क्या-क्या मिल सकता है एंड इट्स अ न्यू नॉर्मल लेकिन मैं ये जो उदगीर की जो कहानी है ये ये इसलिए बहुत सिहरन बदन पर पैदा करती है कि अब तक तो आप यह देख रहे हैं कि एक हेट स्पीच है। उस हेट स्पीच में कुछ हिंदुत्ववादी, कुछ आपके पड़ोसी या कुछ उस तरह से नफरत से भरे लोग यह इस तरह की चीजें कर रहे हैं। लेकिन एक डॉक्टर यह कहे कि अब अब आपकी सांसे चलेंगी और अब मैं आपकी सांसों की डोर को थाम लूंगा। तो नफरत जो है वो कितनी गहराई और कहां तक पैवस्त हो चुकी है। यह उसकी एक एक अजीब सी यह दास्तान है। मतलब एक है कि हम शारीरिक रूप से किसी की पहचान करते हैं हम और उसको हम मार देते हैं। हमको मौका मिलता है। हमने मार दिया। लेकिन एक है कि मुझे मौका ही नहीं मिल रहा है। हम मुझे मैं डॉक्टर हूं ना। हां। मैं इस जगह पे बैठा हुआ हूं। मैं मैं डॉक्टर हूं और जो है अब मैं तो बाहर निकल के जा नहीं सकता कि बुलडोजर चला दूं या मैं सीआरपीएफ का जवान भी नहीं हूं कि ट्रेन में जा रहा हूं किसी से पूछूं हम और इसके पीछे क्या है? इसके पीछे बस मैं एक मिनट लौट के आऊंगा कि जब अखलाक की लिंचिंग की गई उसके बाद राजनाथ सिंह जो केंद्रीय गृह मंत्री थे उन्होंने कहा हम कैसे स्वीकार कर सकते हैं कि इस देश में गाय मारी जाए। एक लाइन का स्टेटमेंट अभी साबित नहीं हुआ कि गाय थी कि नहीं थी। गाय मारी जाए। महेश शर्मा ने क्या कहा जो उस वक्त संस्कृति मंत्री थे। ये क्या संस्कृति है? अखलाक की मौत एक दुर्घटना है। हम अब आप देखें कि आप कर क्या रहे हैं? अब चलते हैं उदगीर। हम तो और इसी में इसी में मैं जुड़ू। जब आप राजनाथ सिंह की बात करें गाय के नाम पर तो अभी का ही हम उनका भी योगी आदित्यनाथ का भी आप बयान ले लीजिए कि कुछ मौलवी मुल्ला मौलवी जो हैं वो कह रहे हैं कि राष्ट्र पशु घोषित कर दिया जाए। अब वे हमें बताएंगे वही वे और हम कि वे हमें बताएंगे कि हमें अब अपनी गौ माता को कैसे देखना है। उनकी हिम्मत कैसे हुई, गाय को, गौ माता को, वो उनके शब्द है ये, कि उनकी हिम्मत कैसे हुई गौ माता को पशु कहने की? कि वो तो हमारे लिए धरोहर हैं। आप उन्हें पशु समझते हैं। उदगीर पर जाने से पहले मॉब लिंचिंग इस वक्त का सबसे बड़ा कारगर टूल है सांप्रदायिकता के लिए। ये हमेशा नहीं रहेगा। हम हम क्योंकि इस वक्त उससे बड़ा कोई टूल नहीं है। हम तो ये प्रेजेंट पॉलिटिक्स का एक हिंदुओं के तुष्टीरण का बहुत सॉलिड वेपन है। हिंदुओं का तुष्टीरण हां हम मैं दोहरा दूं हम मॉब लिंचिंग हिंदुओं के तुष्टीरण का प्रमुख औजार है हम जिसमें मुझे कुछ नहीं करना मैं आज पुल बनाऊं कल बह जाए हम मैं आज स्कूल बनाऊं कल गिर जाए मैं आज पेपर कराऊं लीक हो जाए हम सब सब आगे पीछे चल रहे हैं क्योंकि लोगों के दिमाग में है कि सरकार काम कर रही है सरकार ने हमारा हक सुनिश्चित किया है इस सरकार ने सबसे बड़ा काम यह तय किया है कि उसने यह तय किया है कि मुसलमानों के नाम पर जो मुसलमानों को जो इफराद जो बांटी जा रही थी हमारा हक जो बांटा जा रहा था जो मंगलसूत्र बांटा जा रहा था ये सारे सवाल लोगों के दिमाग से ना चले जाते हैं। हम तो मैं फिर दोहरा दूं कि मॉब लिंचिंग हिंदुओं का तुष्टीरण है। इसलिए यह सबसे अधिक हिंदुओं के खिलाफ ही जाता है। और फिर राहत इंदौरी साहब याद आते हैं। क्यों? क्योंकि आर्यन मिश्रा भी तो वो तो हिंदू ही है। बिल्कुल। हम और वे हम क्या कह रहे हैं ये? हम और वे तो आर्यन मिश्रा तो हम में शामिल है। हम इसी किताब में सुबोध सिंह भी हैं जो अपना फर्ज निभाते हुए कुर्बान हुए इसी मेरठ के पास बुलंदशहर में। जिनको किया गया। जिनको लिंच किया गया। क्योंकि लिंचिंग एक मानसिकता है। और उसकी कहानी ये है उदगीर। हम उस मानसिकता की कहानी है कि वो डॉक्टर बैठा-बठा सोच रहा है कि हमारा नंबर कब आएगा? हम हम कैसे वो सर्टिफिकेट जैसे वो जैसे हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय हम उसके भीतर भी तो एक बात होगी कि हमारा नंबर कब आएगा? अब हमारा नंबर आया है। अब हमें साबित करना है कि उमर खालिद का हम क्या करें? तो हम कह देते हैं जाओ एक साल तक नहीं आ सकते। अब डॉक्टर यहां सोच रहा है कि मुझे क्या करना पड़ेगा? उसके दिमाग में वह बेचैनी है कि मैं कैसे सबक सिखाऊं इसको। इसी किताब में हमने आगे भी बताया है कि हमने कई मनोचिकित्सकों से या मनोवैज्ञानिकों से बात करने की कोशिश की कि वो एकेडमिक लेंस से बताएं कि मॉब लिंचिंग क्या है। उसमें एक व्यक्ति ने एक डॉक्टर ने जो दिल्ली एनसीआर में रहते हैं। मुझे कहा कि हम उस गली में हमारे बाप दादा जाने से तब भी मना करते थे। फिर जब हम मतलब हमारे बाबा मना करते थे फिर हमारे पिता मना करते रहे अब मैं अब अपने बच्चों को उस गली में जाने से मना करता हूं तो आखिर उस गली में ऐसा कुछ तो है हम लेकिन मेरे पेशेंट मुसलमान है उस गली यानी मुसलमानों की गली गली यानी मुसलमान तो मैंने कहा कि क्या आप मुसलमानों का इलाज नहीं करते हम उन्होंने कहा वो तो कमर्शियल बात है वो तो पैसा कमाना है लेकिन अब अगर इस कहानी को आप पढ़े उदगीर की कहानी को इसका मतलब मैं इलाज में गड़बड़ी भी कर सकता हूं हम उदगीर में क्या हो रहा है? उदगीर में यह कहानी कोरोना की है। यानी कोरोना मतलब आप समझ लें 2000 अप्रैल 2021 में जब एकदम दूसरी लहर चारों तरफ प्रचंड जो है वेग से बढ़ रही है और एक डॉक्टर हैं जो इलाज कर रहे हैं और कोरोना पॉजिटिव हो गए हैं। तो इसमें एक शख्स है दायमी अजीमुद्दीन गैसुद्दीन। ये हमें सोलापुर से हम उदगीर गए और उदगीर में हमको ये मिले। हमने इनका इंटरव्यू किया। तो दाहिमी डॉक्टर से कहते हैं कि अब आप भी डॉक्टर हिंदू हैं। उनका नाम शशिकांत है। तो डॉक्टर शशिकांत से कहते हैं कि मैं भी पॉजिटिव हूं। ये मेरी पत्नी तो पहले से ही पॉजिटिव है। इनका इलाज चल रहा है। ये ऑक्सीजन ले रही हैं काफी ज्यादा। जैसे उस समय था ना कि कितने लीटर ऑक्सीजन पर हैं। तो जो इनकी दायमी की जो पत्नी है वो 14 लीटर ऑक्सीजन पर हैं। जो उस वक्त काफी ज्यादा मात्रा यानी उनकी तबीयत ज्यादा खराब रही होगी तब वो 14 लीटर ऑक्सीजन पर हैं। तो ये डॉक्टर शशिकांत हैं। ये भी पॉजिटिव हो गए हैं। दायमी भी कोरोना इलाज के चक्कर में यह भी पॉजिटिव हो गए हैं। तो वो कहते हैं मैं आपके लिए खाना पीना घर से ही बना के ले आया करूंगा। तो ऐसे करके एक दिन वह खाना पीना बना के ले आए हैं। पत्नी की तबीयत थोड़ी बेहतर होनी शुरू हुई है। तो वह खाना खा रहे हैं दोनों लोग। तब इनके एक वरिष्ठ डॉक्टर का फोन आता है। संयोग से संयोग है केवल उनका नाम भी शशिकांत जो दूसरे डॉक्टर का फोन आ रहा है। तो दोनों शशिकांत हैं। दोनों शशिकांत हैं। दर्शक हमारे दुविधा में ना हो। तो जो वो डॉक्टर जो दूसरे वाले शशिकांत है वो सीनियर हैं उनके ऊपर सारा इंतजाम का कोविड की जिम्मेदारी है तो वो इससे कहते हैं कि तुम्हारे यहां कितने अस्पताल में कितने बेड तुम्हारे पास हैं क्या है तो कहते हैं कि बहुत हालत खराब है कोई भी बेड खाली नहीं है कुछ भी नहीं है कहते हैं कोई ऑक्सीजन सिलेंडर हो तो कहते हैं कुछ भी नहीं है इस पर जो वो जो डॉक्टर हैं शशिकांत शशिकांत देश पांडे वो नाराजगी जताते हैं और वह कहते हैं किसी को अंदर आने की इजाजत मत मत दो। दायमी के मरीज को मार दो। उसे बहुत ऑक्सीजन लग रहा है और वो गाली देते हैं मुसलमानों को और कहते हैं कि जो है तुम्हें मुसलमानों से बहुत हमदर्दी है। ओ ये सब रिकॉर्ड में है। तो एक डॉक्टर दूसरे सीनियर डॉक्टर उस डॉक्टर को फोन करके कह रहे हैं। ये सारी बातें हैं। और ये कैसे हुआ कि दोनों खाना खा रहे हैं। जैसे मैं और आप बात कर रहे हैं और हमारे जो है यहां पर हैं और आपका फोन आए और आप मुझे कहें कि स्पीकर पे डाल दीजिए। मेरे मेरे बॉस का आया है। सीनियर का फोन आया और हम यह मान के चलते हैं कि भाई चलो वो जो भी बातें कहेंगे उनकी बातोंगी अब मैं अब दायमी से क्या कहूं मुझे समझ नहीं आ रहा है जब वो ये सब हमारी बात हो रही है। मुझे लग रहा है कि दायमी भावुक हो जाते हैं बात करते हुए और मुझे मैं नहीं समझ पाता कि मेरे पास शब्द नहीं है। पता नहीं मेरे दर्शक मेरे पाठक इन सारी कहानियों को पढ़ भी पाएंगे नहीं पढ़ पाएंगे। बहुत से लोगों ने मुझे कहा कि आपने ऐसी बोझिल किताब लिख दी है। इसको कौन ही पढ़ेगा? इसको पढ़ना क्यों चाहिए? हम तो मैंने कहा कि अगर सच्चाई बोझिल है, सच्चाई मुश्किल है तो मुझे उसे सरल तरीके से करने का काम मैं नहीं कर सकता। वो जो सच है जो खराब सच है जो मुश्किल सच है वो तो सामने रखना पड़ेगा। मंटो ने यही सिखाया हमको कि मैं इलाज तो नहीं कर सकता लेकिन मैं तुम्हारी सड़न को सामने तो रख सकता हूं। हम हम तो मैंने तो केवल वही इसकी बहुत कहानियां मतलब इस कदर परेशान करती हैं कि मैंने मैं स्वीकार करता हूं कि मुझे उन्होंने परेशान किए रखा। मेरे मेरी ये किताब सात आठ महीने पहले पूरी हो जाती। लेकिन मैं उसमें उलझा रहा। मुझे लगा मैं क्या लिखूं? कैसे लिखूं। लिखते लिखते जो है आपका मन खराब हो जाता है। आप रुक जाते हैं। आप रुक जाते हैं। फिर काम अटका रहता है। मैं आपसे इसलिए रिलेट कर सकती हूं क्योंकि मैं भी इसी तरह के प्रोजेक्ट्स पे मैं काम करती रहती हूं। मैंने दिल्ली राइट्स विक्टिम पर मैंने अभी-अभी डॉक्यूमेंट्री की है। उस तरीके से और जो दूसरी डॉक्यूमेंट्री मैं बना रही हूं या जिसप मैं काम कर रही हूं। इसी तरह की मुश्किलात का आपको सामना करना पड़ता है क्योंकि अगर आप इंसान हैं, इंसानी दिल है तो आपके अंदर यह तमाम जज्बात जो हैं पैदा होंगे और लोग बहुत ये कहते हैं कि एक पत्रकार के तौर पर आपसे भी शायद यह कहा गया हो कि प्रैक्टिकल होकर आप चीजों को करिए। भाई किसी की मौत हुई है उसको एक डॉक्यूमेंट की तरह दर्ज करिए और आप इसकी डॉक्यूमेंट्री या किताब या आप जो भी जिस भी शक्ल में आप करें आप कर दीजिए। ऐसा कैसे कर सकते हैं आप? मुझे लगता है कि जो लोग ऐसा कर सकते हैं वो अपने पेशे से न्याय नहीं कर सकते। हम और वो दूसरी चीज से कंपेयर नहीं कर सकते हैं। जैसे बहुत से लोग आपको डॉक्टरी पेशे से इसको कंपेयर करते हैं कि जैसे तुलना करते हैं कि जैसे डॉक्टर है वो मरीज के साथ कितना इन कितना शामिल होगा। हम लेकिन वो एक अलग प्रक्रिया है और आप देखेंगे कि जो महान डॉक्टर हुए हैं इतिहास में हम वो सब कहीं ना कहीं उनके अंदर जो एक सबसे बड़ी बात आती है वो इमोशनल वो वो अपने मरीज को इमोशन ही तो देते हैं। ताकत क्या है? ताकत दवाई नहीं है। लेकिन एक डॉक्टर अपने मरीज को क्या देता है? हौसला ताकत। क्या किसी दवाई में आपने देखा है कि इसमें लिखा हो कि मेंटल स्ट्रेंथ नहीं वो डॉक्टर का ही काम है। अगर हम इस इस काम में हैं तो हमें उसके लिए वक्त देना पड़ेगा और उन मुश्किलों से मुझे लगता है कि मुझे और आपको मतलब अगर हम उसमें शामिल नहीं होंगे उसके दर्द का बयान नहीं करेंगे। तो जब इसमें दायमी ने मुझे बताया तो मैंने उनसे रुक के दो बार पूछा कि भाई कौन सा डॉक्टर ये ये वाला शशिकांत कौन सा? फिर मैंने पूछा तो उन्होंने कहा कि भाई हम तो बिरयानी खा रहे थे। मेरे हाथ से प्लेट लगभग गिरी गई और ये दूसरे वाले डॉक्टर की भी हालत खराब हुई क्योंकि ये अब ये पता नहीं कि भाई ये कितने इनोसेंट है क्या पता कि दोनों में इसके पहले क्या बात हुई हो ये भी तो नहीं पता बिल्कुल और अचानक उन डॉक्टर की ऐसी हिम्मत कैसे हो गई कि उनसे ऐसे डायरेक्टली बोल ये बात तो तब होती है ना जब मैं और आप कोई बात कर रहे हैं तो जाहिर है हम बैकग्राउंड होगा तो हम दोनों जब किसी एक सामान्य बात पर राजी रहे होंगे तब ना अचानक कोई इतनी बड़ी बात आप मुझसे थोड़ी कह देंगे तो अब ये सारे सवाल थे। दायमी एकदम भावुक हो जाते हैं और मुझसे कहते हैं कि मैं उसके बाद घर नहीं गया। फिर जब उनकी पत्नी ठीक हो गई यानी डिस्चार्ज करा करके ही वो ले गए। तो उनको डर था कि अगर कुछ भी हो सकता है ना जब इतना बड़ा डॉक्टर आपसे कह रहा है कि खुद आप मतलब आप जब सामने सुन ले रहे हैं तो मतलब क्या आप करेंगे? यह दयाशंकर जी मैं इस पर आना चाहूंगी क्योंकि अक्सर मैं यह सवाल पूछती हूं और जब भी मैंने अ इस तरह के टॉपिक्स पर जब भी मैंने कोई इस तरह के पडकास्ट या इंटरव्यूज किए हैं अ हालांकि मुश्किल होगा यह बता पाना और यह कह पाना कि इस तरह के इस मुश्किल दौर में आखिर मुसलमान क्या करें? यह एक ये एक बड़ा सवाल आता है। अभी हम यह देख रहे हैं कि वह बहुत ज्यादा उर्दू में कहते हैं सब्र और तहम्मुल यानी कि पेशेंस का वो एक तरह से मुजाहरा कर रहे हैं। वो उसको दिखा रहे हैं। और अक्सर विश्लेषक ये कहते हैं कि जितना पेशेंस मुसलमान दिखा रहे हैं शायद ही कभी किसी ने दिखाया हो क्योंकि उनसे जुड़ी हुई हर चीज पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। उन्हें लगातार दोयम दशरे का नागरिक बनाया जा रहा है। उनका अधिकार छीना जा रहा है। अदालतों से उन्हें इंसाफ नहीं मिल रहा है। सरकारें उनके साथ नहीं खड़ी हैं। समाज उनको दुश्मन मान रहा है। यानी कि हर एक चीज जो है उनकी क्वेश्चनेबल है और उसको बिलीवेबल भी बना दिया गया है। तो फिर ऐसे दौर में मुसलमान क्या करें? और फिर मैं आऊंगी जो आपने मुल्क मुसलमान और मॉब लिंचिंग जो सरफराज साहब के साथ आपने वो किया है कि एक एक मुसलमान कैसे देखता है इस सबको मैं उस पर आऊंगी क्योंकि मैं चाहती हूं कि दो-तीन चीजें और कि हम मीडिया पर भी बात करें। हम कोर्ट्स पर भी बात करें यानी जुडिशियल सिस्टम पर भी हम बात करें। लेकिन उससे पहले आप मुझे बताइए कि क्या आपकी यह किताब यह भी बताती है कि मुसलमान क्या करें? सच पूछिए तो मैं जब अलग-अलग हिस्सों में घूमा हम और देखा तो मैंने अपने आप को थोड़ा कोसा। हम कोसा इसलिए क्योंकि मुझे लगा कि मैंने पहले क्यों नहीं मैं इस सफर पर निकला। हम तो मुझे लगा कि चलो देर से ही सही लेकिन मैं जमीनी हकीकत के पास हूं। एक छोटी सी इसमें एक मैं कोई पोएट नहीं हूं। आप लोगों की तरह मैं बहुत अच्छा बहुत अच्छे से उस बात को कह भी नहीं पाऊं। लेकिन जब पूरी किताब लिख दी है तो और कितना अच्छे से कहेंगे आप? इस किताब के एक हिस्से में जहां पर कु क्लक्स क्लान और आरएसएस हैं। तो कु क्लक्स क्लान एक अमेरिका में एक संगठन है जो वाइट सुप्रीमेसी यानी जो श्वेत लोग हैं उनकी उनकी यानी उनको आगे रखता है। उनको देता है। तरजीह देता है। उनको पहले दर्जे का नागरिक बनाता है। तो वो संगठन लगातार काम कर रहा है। हम और वह कैसे काम कर रहा है और वह संगठन कब खड़ा हुआ जरा इसको आरएसएस पर मैं बात करना चाहूंगा कि जैसे आरएसएस कब खड़ा हुआ 1925 में आजादी कब मिली 47 में दोनों के बीच का अंतर आप देखें तो उनके पास पर्याप्त समय था 25 से लेकर और 47 तक कि वो अपनी देशभक्ति साबित करते लेकिन उन्होंने अपना वक्त किस में बिताया बकोल विनोबा भाबे बकल डॉ राजेंद्र प्रसाद हम जिनको संघ के लोग अपने अपने ना मतलब वो ये मानते हैं कि लोग ज्यादा अच्छे से उनको समझ पाए। इनके बयान मौजूद है बहुत साफ-साफ गांधी की हत्या के बाद वर्धा सम्मेलन में कि आरएसएस के लोग अपने लोगों को सेना और पुलिस में भर्ती करा रहे थे ताकि वहां उनका बेस मजबूत हो। हम आरएसएस ने बहुत सफाई से अपने आप को दूर रखा कि हम आजादी की लड़ाई में कहीं फंस ना जाए। हम क्यों ना फंस जाए ताकि हमारे संगठन पर बैन ना लग जाए। जबजब और मुखर्जी जैसे लोग जो आपके इनके बीजेपी के अध्यक्ष आप कह लीजिए बड़े नेता कह लीजिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी वो कैसी चिट्ठियां लिख रहे थे भारत छोड़ो आंदोलन के वक्त। अब कु क्लक्स क्लान क्या कर रहा है? उधर चलते हैं। क्लक्स क्लान बना जब अमेरिका आजाद हो गया। तो इनको लगा कि सबको बराबरी का अमेरिका। अमेरिका में भी बराबरी की बात संविधान में आई कि अब कल से अमेरिका आजाद काले गोरे सब बराबर दोनों भाई अपना आराम से रहेंगे। क्या दिक्कत है? तो ये जो वाइट सुप्रीमेसी थी इन्होंने कहा ऐसा नहीं चलेगा। तो इन्होंने क्या किया? इन्होंने कहा कि सिनेमाघर घर तो दो नहीं बना सकते। महंगा है। तो हमारी खिड़की अलग, तुम्हारी खिड़की अलग। हमारा वाशरूम अलग, तुम्हारा वाशरूम अलग। हमारी दुकान अलग, अगर संभव है जहां हमारा पार्क अलग, हमारा पार्क का कोना अलग, है सब बराबर। हम लेकिन ये अलग बराबर मतलब बराबर मतलब कागज पे बराबर जैसे यहां बराबर है। हम हम लेकिन वहां बराबर नहीं है। और फिर धीरे-धीरे 1830 के आसपास आते-आते एक जिम क्रो कानून बनने शुरू हुए। एक राइस नाम के एक व्यक्ति हुए जो एक तरह का नाटक करते थे अपने चेहरे पर एक काला रंगपत करके और वह बताते थे कि असल में अश्वेतों के के साथ कैसा किया जाना चाहिए और उसमें अश्वेत कैरेक्टर उन्होंने कई बनाए जिसमें वो उनका मजाक उड़ाते थे। हम तो ये जिम क्रो नाम से उनका नाम पूरा उनके नाम में जिम आता था तो वो वो एक जिम क्रो नाम से एक ऐसा पूरा का पूरा वातावरण बनना शुरू होता है जिसमें कैसे मजाक उड़ाया जाए और आप देखें कि नाटक और थिएटरों की सांप्रदायिकता में बड़ी भूमिका रही है। भारत में भी सांप्रदायिकता ने कवि सम्मेलनों के सहारे बहुत आगे बढ़ी है। भारत में जो आगे चलकर के कवि जो आगे चलकर के भारत के पहले स्वयंसेवक प्रधानमंत्री बनते हैं। उनकी बड़ी पहचान कवि के रूप में रही। उन्होंने ही बाबरी मस्जिद के अ आप कहें कि बाबरी विध्वंस के पहले जो बयान दिया था कि सम कर दिया। तो वो अपने कवी मिजाज के लिए ही हुए। उनकी शान में भारत में एक से एक उदार लोग आप देखेंगे कि भारत में इंदिरा गांधी को इंदिरा गांधी कहा जाता है। राजीव गांधी को राजीव गांधी कहा जाता है। नेहरू को भी नेहरू कहा जाता है। लेकिन हम ज्यादातर लोगों को हम अटल जी कहते हुए देखते हैं। तो मेरे कहने का मतलब है कि नाटकों से सिनेमा से वातावरण बनाया जाता है। हम भारत में अभी क्या चल रहा है? पिछले 12 14 वर्षों में किस तरीके की फिल्में आई हैं। इन सब में किस तरीके का वायलेंस है? इनका विलेन कौन है? इनका खलनायक कौन है? आप जरा देखें तो सारे के सारे खलनायकों के नाम में खान क्यों है? एक एक फिल्म जिसके बारे में नसीर साहब ने भी बाद में अफसोस जाहिर किया। मैं यहां कहना चाहूंगा फिल्म का नाम शायद ए वेडनेसडे था जो बड़ी मशहूर फिल्म हुई जिसमें कैसे एक सामान्य मामूली जो आदमी है बिल्कुल सामान्य नागरिक वो कैसे आतंकवादियों को सजा देता है किसी ने भी ध्यान दिया कि वो सारे के सारे आतंकवादी कौन है वो सारे के सारे मुसलमान थे बहुत बारीकी से सांप्रदायिकता को बुना जाता है जिसमें सिनेमा की जिसमें किताबों की बड़ी भूमिका है बिल्कुल बिलकुल बिल्कुल वहां से आया जब वो फिल्म आई आप देखें चारों तरफ आउटस्टैंडिंग रेटिंग आउटस्टैंडिंग नसीर साहब का मैं एक इंटरव्यू सुन रहा था जिन्होंने कहा कि मुझे इस पर गौर करना चाहिए था मुझसे चूक हुई क्योंकि शायद मैंने निर्देशक पर ज्यादा भरोसा कर लिया या स्क्रिप्ट पर मैं नहीं गया तो आप देखें कि केवल अभी की बात नहीं लंबे समय से मतलब जब हमारे जो ये जो हम जिन आमिर शाहरुख सलमान या अक्षय या जो भी लोग हैं जो बड़े समय से काम कर रहे हैं और जिसमें ये लोग जो बड़े सक्षम भी हैं सिनेमा में जिनकी सलमान खान की या तमाम लोग जिनकी हैसियत है ये जब अपनी स्क्रिप्ट पढ़ रहे थे तो उसमें आखिर हर फिल्म में विलिलेन खान ही क्यों है अब जब इतना बड़ा सिनेमा की दुनिया है और उसमें हर हर मतलब किरदार विलन मुसलमान है तो वो समाज में कैसे उसको आप अह खलनायक और अब आप देखिए अब तो इसकी एक्सट्रीम हो गई तो प्रोपगेंड फिल्म जो हैरला से धुरंधर से लेकर इस तरह की तमाम फिल्में जो है बिल्कुल सारे तरफ है इन सब सा क्या हो रहा है कि बच्चा भी फिल्म देख रहा है आजकल आप देखें पहले सिनेमा में फिल्म लगती थी टीवी में आने में बहुत वक्त लगता था आजकल सिनेमा में फिल्म लगी 15 दिन बाद कहां आ गई टीवी में आ गई अब हर फिल्म का जरा देखें हर फिल्म को आप उठा लें कोई भी फिल्म कोई भी रैंडम फिल्म उसमें जो बुरा व्यक्ति वो कौन है? मुसलमान है। जबकि इसके उलट तथ्य क्या कहते हैं? तथ्य [गला साफ़ करने की आवाज़] यह कहते हैं कि हमारे डीआरडीओ में भी पकड़े गए जो लोग हैं जासूसी करते हुए रॉ में भी जो पकड़े गए जासूसी करते हुए वो कौन है? या हनी ट्रैप में जो फंसते हैं जो हनी ट्रैप में फंसते हैं वो कौन है? वो सब के सब तो मिश्रा, ब्राह्मण, तिवारी, डीएमटी, दुबे, तिवारी, मिस ये सब हैं उसमें। तो ये कौन लोग हैं? लेकिन ये क्यों नहीं आते उसमें? तो अब जब यह नहीं आएंगे सिनेमा में तो वो कैसा सिनेमा है? तो यह जो काम राइस ने किया था 1830 में अमेरिका में जिससे बड़े पैमाने पर लिंचिंग की घटनाएं बढ़ी वही काम भारत में लगातार हो रहा है। आप देखें वो फिल्में जिसमें मुसलमान या दलित नायक है जो वो अधिकार की बराबरी कर रहा है। वो फिल्मों को कोई प्रमोट करता हुआ नजर आता है? आपके और हमारे जैसे लोग जिनकी मैं बड़ी उससे कहूं बड़ी कोई बिसात ही नहीं है। कौन ही सुन रहा है, कौन ही समझ रहा है, कौन ही तवज्जो दे रहा है। हम और आप कहते रहे अपने घर बंद कमरे के कोरस में लेकिन उस यूनिवर्स में वो बातें कैसे क्यों नहीं अखबारों में इस बात पर आर्टिकल लिखते लोग? सिनेमा पर बड़े-बड़े कॉलम हैं। लेकिन क्या कोई कॉलम नजर आता है कि इस फिल्म का भी जो खलनायक है वो खान क्यों है? क्या आपको भी लगता है जयशंकर जी आपकी इस बात से मुझे एक बात यह रही कि हम हम सब भी तो अपनेप तरह के एक इको चेंबर्स में हैं। आप मुझसे बात कर रहे हैं। मैं आपसे बात कर रही हूं। हम अपने तरह के लोगों से बात कर रहे हैं। हम अपने तरह के लोगों को अपने कार्यक्रमों में बुला रहे हैं। हम उनसे ही बात करते हैं। उनसे वो कहलवाते हैं जो हम सुनना चाहते हैं और वो वही बात कहते हुए नजर आते हैं। वो भी एक तरह के दूसरे पॉपुलर सेंटीमेंट के साथ वो खड़े हो जाते हैं। आप YouTube का एल्गोरििदम भी देखेंगे वो भी उसी तरह से काम करता है। सोशल मीडिया का एल्गोरिदम भी उसी तरह से काम करता है। आपको वही दिखाता है। उनके लिए सब कुछ वो बिजनेस है। लेकिन मेरा सवाल यह जरूर है कि क्या एक सोसाइटी में जो एक डायलॉग है क्या वो आपको नहीं लगता कि वह बिल्कुल खत्म हो गया है एक हिंदू एक मुसलमान के बीच में एक दलित या एक अपर कास्ट के बीच में या इसी तरह के आप कोई भी ड्रॉ कर सकते हैं चीजें कि उसमें वो खत्म हो गया है। तभी तो उसको लगता है कि ये सामने वाला जो मेरा पड़ोसी है ये ऐसा ही हो सकता है। मुझे आपके बारे में बहुत पता होगा एक मुसलमान के तौर पर लेकिन हो सकता है एक हिंदू के तौर पर आपको मेरे बारे में मेरे अकीदे के बारे में मैं कैसे नमाज पढ़ती हूं कैसे वजू करती हूं या कैसे चीजें करती हूं आपको नहीं पता होगा क्योंकि जिस तरह के सवाल मुझसे पूछे गए हैं मुझे पता है मैंने प्रैक्टिकली उसको देखा है इसलिए मैं आपसे यह बोल रही हूं तो क्या आपको नहीं लगता कि ये मीडिया के जरिए फिल्मों के जरिए गानों के जरिए कविताओं के जरिए नेताओं के जरिए ये जो नफरत को यह पूरी तरीके से फैलाया और पसारा गया है। इसमें एक डायलॉग की कमी आपको क्या नजर आती है? बिल्कुल मैं आपकी बात से सहमत हूं और यह बहुत जरूरी सवाल है क्योंकि डायलॉग बिल्कुल लोक डेमोक्रेसी का बिल्कुल बुनियादी बुनियादी बात है कि अगर आप किसी बात से मैं आपकी किसी बात से सहमत नहीं हूं तो मैं आपसे पूछता हूं कि अच्छा आप क्या कहना चाहती हैं? चलिए आइए बात करते हैं और यह जो भारत है इसमें डायलॉग की बड़ी परंपरा रही है। आज से नहीं जो लोग अपने आप को कहते हैं कि डंके की चोट पर सनातनी है। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि क्या उन्होंने मंडन मिश्र और शंकराचार्य के डायलॉग सुने हैं। जिसमें डायलॉग शुरू हो गया तो सालों बीत गए। हम महाभारत की बड़ी चर्चा होती है। हम अभी आजकल तो हिंदू राष्ट्र चल रहा है। सही बात। फिनोमिनन चल रहा है। आप देखें कि महाभारत की खूबसूरती क्या है कि दोनों पार्टियां जंग के लिए बिल्कुल तैयार हैं। इधर पांडवाज हैं। इधर कौरवाज हैं। पांडव कौरव सामने आमने हैं। सब बिल्कुल तैयार हैं कि अब हो जाए अब बहुत हो गया। अब बातचीत बहुत हो गई। तब अर्जुन खड़े होते हैं और कृष्ण से कहते हैं कि मुझे थोड़ा डाउट आ रहा है। अब आप सोचें कितनी अजीब बात है। है ना? हम अब सब कुछ हो गया है। अब एकदम तैयार हैं। इधर से भी इधर भी जो भीम वगैरह हैं जो बिल्कुल एकदम बुलिश हैं। तो वो कह रहे हैं अरे बाद में बात कर लेंगे घर चलो शाम को। तो कृष्ण कहते हैं नहीं नहीं डाउट क्लियर करना जरूरी है। लेट्स टॉक तो वो बातचीत शुरू कर देते हैं। अब इस बातचीत में आप देखें कि कई दिन बीत गए क्योंकि वो उनके अर्जुन के जो है वो डाउट ही क्लियर नहीं हो रहे। हम्म तो भारत जिसको हम जिस पर कहते हैं कि ये देश है जिसमें बात है डायलॉग है जो ये खासतौर पर मेरे वो उन लोगों से उन दर्शकों को एड्रेस करूंगा जो जिनको बरगलाया जाता है कि सनातन क्या है हम तो उनको कहा जाता है ना कि हम कब तक सहन करेंगे कब तक बात करेंगे अरे बात ही तो बुनियादी बात है जो कृष्ण है महाभारत में जो उसके हीरो हैं सबसे बड़े हीरो हैं वो सुप्रीम लीडर वो बार-बार कह रहे हैं थोड़ी बात कर सब कुछ अन्याय हो गया है। सब कुछ इंतहाई चल रही है। वो क्या कह रहे हैं? मारने की बात नहीं कह रहे हैं। उनको तो सुप्रीम बताया गया ना वो एक चक्र चलाएं और सारी कायनात खत्म। लेकिन वो क्या कह रहे हैं? नहीं थोड़ी बात कर लेते हैं। चलो बार-बार उनकी इंसल्ट भी हो रही है दुर्योधन के कैंप की तरफ से। लेकिन वो क्या कह रहे हैं? बात कर लेते हैं। मेरे कहने का मतलब है कि डायलॉग एक बुनियादी चीज थी। टेलीविजन चैनलों की जो शुरुआती डिबेट हैं अगर आप देखें दूरदर्शन दूरदर्शन चैनलों की डिबेट देखें उनको कितने शांति से बात की जाती थी। अगर आप शुरुआती डिबेट्स देखें जिसमें एनडीt अब तो पूर्व हो गए मतलब एक विडंबना है वो एक अलग बातचीत का विमर्श या विनोद दुआ या विनोद दुआ वो बात हो रही है विनोद दुआ साहब कि अगर सवाल आप उस समय के केंद्रीय मंत्रियों से देख लें तो आपको लगेगा कि एक ये भी जमाने रहे या जो डॉक्टर राय जैसे क्वेश्चनिंग कर रहे थे एनडीटीवी में नेताओं से तो सवाल था डायलॉग था प्रोग्राम थे या करण थापर ने पानी पिला दिया था करण थापर ने पानी पिला दिया। तो ये यानी बातचीत के मौके खोल रहे थे। मैं आपसे राजी हूं, सहमत हूं, असहमत हूं। लेकिन हम बात कर रहे थे। हम ये जो सरकार की सबसे जो खराब बात शुरू हुई इस देश में वो 2014 से ये हुई कि अगर मैं रवश कुमार से, अगर मैं अ अभिसार से, अगर मैं पुण्यसुन वाजपेयी से सहमत नहीं हूं। वो कोई एक शब्द भी ऐसा कहते हैं तो मैं कहूंगा कि आप चले जाइए हम या मुझे एक भी किताब ऐसी नजर आती है जो मेरे ऊपर नहीं लिखी गई है तो मैं कहता हूं आप चले जाइए हम तो डायलॉग कैसे बंद होता है डायलॉग केवल इस बात से केवल अपनी बात कह रहे हैं चारों तरफ एक तंत्र बना दिया गया हर रविवार को मैं मन की बात करूंगा मेरे मन में जो आएगा मैं बात करूंगा तो ये जो डायलॉग केवल अच्छा इससे इसका परिणाम क्या होता है जब एक सुप्रीम लीडर यानी प्रधानमंत्री जब कोई परंपरा शुरू करते हैं सब तरफ वही जाती है। मैं आपको बड़े दावे के साथ और बड़ी विनम्रता के साथ कह रहा हूं हमारे न्यूज़ रूम की भाषा क्या हो गई है। वही भाषा है जो प्रधानमंत्री की भाषा है। मैं कई डॉक्टरों के सम्मेलन में गया बातचीत की। वहां डॉक्टर भी ऐसे ही बोल रहा है। मतलब जो डॉक्टरों का चीफ डॉक्टर वो लोगों को संबोधित कर रहा है तो कह रहा है देखिए मेरे पास टाइम नहीं है। आप लोगों को जो कहना है कह दीजिए मैं अपनी बात कह के चला जाऊंगा। तो हर जगह जब जब बीजेपी में जब लोकतंत्र खत्म होगा तो उसकी कीमत देश को चुकानी पड़ेगी। केवल बीजेपी को नहीं चुकानी पड़ेगी। क्योंकि वो अगर सबसे बड़ी पार्टी है अगर वो सरकार में है और उसी में लोकतंत्र खत्म हो जाएगा। जब किसी नेता का बयान ही नहीं आएगा। जब सब चारों तरफ वही कहना है जो इन्होंने कहा है। हम्म वही आखिरी सच है। ये ये डायलॉग के डायलॉग ऊपर से चलता है। आप नेहरू की मिसाल देखें। नेहरू अपने खिलाफ जबकि उनको कोई चुनौती कहीं से नहीं थी। अखबारों में आर्टिकल लिखते थे। अपनी आलोचना करते हुए आर्टिकल छद्म नामों से। हम तो एक बार शिकायत घूमते फिरते आई ये जो अधिकारी होते हैं रॉ के और बाकी जगहों के या अफसरान खुफिया एजेंसियों के उन्होंने कहा कि कौन लिख रहा है इसकी? हमें जांच करनी चाहिए। तो नेहरू ने कहा कि मैं जांच कर लूंगा आप जाइए। क्योंकि वो इससे क्या मैसेज देना चाहते थे कि लोग प्रधानमंत्री से डरे नहीं। हम लोग आलोचना करें मेरी और यहां आलोचना को इस तरह से हमने बना दिया। तो यह जो डायलॉग है यह बंद हुआ नंबर एक। नंबर दो क्या चीज हुई? नंबर दो बात ये हो गई चारों तरफ से सब तरफ से कि मीडिया ने नफरत फेंकनी शुरू कर दी। तो एक तो डायलॉग बंद हुआ। नफरत फेंकनी शुरू आ गई। दूसरा गोधरा में भी ये किताब आखिरी में ले जाती है। अलग-अलग कॉलोनियों के गेट बन गए। मेरा मोहल्ला आपके मोहल्ले से नहीं जाएगा। मैं अभी गोधरा होकर के आया हूं। तमाम रास्ते बंद कर दिए गए जो बस्तियों को बस्तियों से जोड़ते थे। जो दिलों को दिलों से जोड़ते थे। मुसलमान मोहल्ले, मुसलमान मोहल्ले, हिंदू मोहल्ले, हिंदू मोहल्ले कितने ही कितने ही हम बट रहे हैं। तो डायलॉग केवल ऐसा थोड़ी है कि डायलॉग कोई घोषणा है कि आज हम डायलॉग करेंगे। आज आओ बात करेंगे। हम हम पड़ोस में हमने दरवाजा बंद कर लिया है। हमने घर खाली कर दिया क्योंकि आप यहां रहती हैं तो अब तीन लोग अगर यहां रहते हैं तो मैं कैसे रहूं हम और मुझे बार-बार बताया जा रहा है कि आप कैसे रहेंगे। आप जरा देख करके देखिए कितने वीडियोस आ रहे हैं कि एक किसी मुसलमान ने हिंदू बस्ती में घर ले लिया। मेरी किताब में भी वो एक बयान दर्ज है। भोपाल का ही बयान दर्ज है। कि कैसे एक घर में एक जगह पर एक पुलिस इंस्पेक्टर ने एक घर किसी मुस्लिम व्यक्ति को बेच दिया। सच्चा किस्सा है। वो मेरे मेरे ही परिचित हैं। और जैसे ही पता चला विधायक को बताया गया। विधायक ने इंस्पेक्टर को बुलाया। बोले कि नौकरी से चले जाओगे। उन्होंने कहा साहब सब हो गया है। उन्होंने कहा कुछ भी हो गया हो हमारे मोहल्ले में कैसे आप मुस्लिम को घर दे सकते हैं? तो हम डायलॉग कहां से शुरू कहां से खत्म कर रहे हैं? यूनिवर्सिटी में हमने एक ही बात कह दी कि हम विश्व गुरु बन गए। यह केवल मजाक की बात नहीं है कि यह बात हो गई है। हमने हम उस डायलॉग में आपने कहा हम इको डायलॉग बना दिया। हम डायलॉग में बुला किसको रहे हैं? वही उन्हीं लोगों को बना रहे हैं जो ये घोषणा कर सके कि विश्वुरु हम बन गए सर। अब कुछ नहीं बचा है। तो अब ये डायलॉग बचा ही नहीं। हम लगातार अलग-अलग यहां पर विक्टिम्स की हम बात कर रहे हैं और हमने ये देखा है कि उड़ीसा में किस तरह से सबसे ज्यादा क्रिश्चियंस को वहां पर निशाना बनाया गया। जिंदा जलाए गए या फिर चर्च और गिरजाघर जो थे उनको किस तरह से आग के हवाले किया गया और लगातार जो प्रार्थनाएं सभाएं हुई वो अभी भी आप देखें अभी तो और उड़ीसा बदल गया है। अब तो और अब तो नवीन पटनायक वाला रहा नहीं अब तो बीजेपी वाला वो बन गया है और कहीं ना कहीं वो नफरत समाज में पल पल रही थी और पनप रही थी और वहां क्रिश्चियंस के खिलाफ ज्यादा है और मुसलमानों को भी अब बड़े पैमाने पर वहां निशाना बनाया जा रहा है। ग्राम स्टेंस जो है वह एक काफी मशहूर एक केस रहा है और आपने इसको यहां किताब में अपनी यहां पर दर्ज किया है और उसमें कुछ बड़ी यूनिक बातें आपने इसमें दर्ज की हैं। मैं चाहूंगी कि अगर आप जल्दी से उसके बारे में यहां पर मेंशन कर दें कि क्यों आपको यह लगता है कि ये बाकी जो विक्टिम्स हैं या बाकी जो केसेस थे उनसे ये अलग है। देखिए 1999 में पहला ऐसा मौका था जब इस देश में एक गर्वित गर्वित स्वयंसेवक पहली बार हम प्रधानमंत्री बने जो अपने आप को कहते थे कि उनको आरएसएस का स्वयंसेवक होने पर अभी जो हैं वो दूसरे हैं। पहले उस 99 में वो पहले हम्म। तो उस वक्त क्या होता है कि जब लंबे समय से बातचीत चल रही है और बात हो रही है कि अब पहली बार स्वयंसेवक प्रधानमंत्री बन गए हैं तो जो अनुसांगिक संगठन जो जिस तरह से आरएसएस अपने शब्दों का इस्तेमाल करता है। आप अटल बिहारी वाजपेयी के दौर की बात कर रहे हैं। तो जो बीजेपी आरएसएस के जो अनुसांगिक संगठन हैं, सहयोगी संगठन हैं, उनका एकदम वो जैसे आउट ऑफ कंट्रोल हो गए हैं। उनको लगता है कि अब बस हमको अब कब मौका मिलेगा? जैसे अभी अभी क्या चल रहा है? क्योंकि अब नहीं तो कभी नहीं अभी नहीं तो कभी नहीं उस वक्त पूरे उड़ीसा में एक चारों तरफ एक वातावरण चल रहा है ग्राहम स्टेंस को जानना समझना मैं अभी इस यात्रा में कई लोगों से मिला जो उनसे मिले थे ग्राहम स्टेंस क्या कमाल के आदमी थे उड़ीसा में रहते थे एक शानदार जिंदगी जी रहे थे जब वो भारत आए तो इसलिए आए क्योंकि जो लेप्रोसी मिशन था लेप्रोसी यानी कुष्ठ रोग कुष्ठ रोग को भारत में ये माना जाता है कि ये पूर्व जन्मों का जो है वो पाप है अगर किसी अह मतलब मतलब किसी हिंदू को हुआ है तो वो ये कहानी बनाता है। मजहब के आधार पर और अपने पाप पुण्य की कहानियां बनती होंगी। लेकिन हिंदुओं में ये है कि कुष्ट अगर किसी को हुआ है तो वो इसीलिए हुआ कि पिछले जन्म के पाप थे। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि 1999 की घटना थी और मैं भोपाल में था 2003 में और एक ऐसी वर्कशॉप में का हिस्सा था जिसमें लेप्रोसी के विक्टिम बुलाए गए इस किताब में सब दर्ज है और वह बता रहे थे कि कैसे उनको उनके ही परिजन सता रहे हैं। पूर्व जन्म के पापों की सजा दे रहे हैं। ऐसी बीमारी को ठीक करने ग्राहम स्टेंस भारत उस काम को देखने आते हैं और वो वहीं के होकर के रह जाते हैं। तो ये बताना जरूरी है कि वो गोरे थे। गोरे थे। हम और वो मतलब देखने आए थे लेकिन फिर वो यहीं यहीं काम करने लगते हैं और वो कितनी जल्दी सारी भाषाएं सीख लेते हैं। उनको केवल अंग्रेजी आती थी लेकिन वो उड़िया सीख लेते हैं। जो जो उड़ीसा की जो बोलियां हैं वो सीख लेते हैं और बड़ी आसानी से काम कर रहे हैं। दारा सिंह नाम का एक व्यक्ति है जो उत्तर प्रदेश से गया हुआ है। यानी नफरत का सेंटर कहीं ना कहीं भारत में लंबे समय से अगर आप देखें तो उत्तर भारत ही है। और उसको लगा वो लगातार इनको ग्राम स्टेंस को निशाना बनाता है। धमकियां जाती हैं। लेकिन जनवरी 1999 की एक रात जब किताब में जो तस्वीर है इसी चर्च के सामने ग्राहम स्टेंस अपने बच्चों फिलिप और तिमोती के साथ सो रहे हैं रात में सर्द रात में और भीड़ आती है और ग्राहम स्टेंस और उनके बच्चों को जिंदा जला देती है। सारे लोग छूट जाते हैं अदालतों में जाकर के। केवल तीन लोगों को सजा होती है। दारा सिंह, महेंद्र हेमब्रम और चंचू हाजदा। इसमें चंचू हाजदा नाबालिक हैं। यानी उनकी उम्र 12 साल के लगभग आसपास है। इस किताब में बताया गया है कि दारा सिंह कैसे बच्चों पर अपना नियंत्रण रखता था। हम जब नफरत की हम बात करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि बच्चों के दिमागों में क्या भरा जा रहा है। आगे चलकर के महेंद्र हेमब्रम को जेल से रिहा कर दिया जाता है। कथित अच्छे व्यवहार के आधार पर और अब आप देखें कि दारा सिंह की भी रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है। कथित अच्छे व्यवहार के आधार पर। चंचू ने जेल से छूटने के कुछ वक्त बाद ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। ये एक बड़ी खबर थी। कायदे से यह हेडलाइन बननी चाहिए थी चारों तरफ कि जिस वजह से उसमें नफरत की उस भीड़ में शामिल था बाद में वो बाद में किस तरह से किस तरह हुआ तो मैंने उससे बहुत बात करने बात की लंबीलंबी हमारी बातचीत हुई वो ईसाई हैं मतलब माफ कीजिए वो आदिवासी हैं और हिंदी नहीं बोल पाते तो काफी वक्त हमको बातचीत में अनुवादकों की मदद से लगा समझने में वो बार-बार ये कहते हैं कि मेरे को शांति मिली और एक तरह से वो इसको प्रायश्चित के तौर पर देखते हैं कि आखिर मैं कैसे दारा के शिकंजे में आ गया था। कैसे उसका हिस्सा बन गया था। कैसे मुझे समझ में आया था कि दारा के साथ रहने का मतलब पावर है। दारा के साथ रहने का मतलब सही है। अब जरा इन बातों को आज की नफरतों से आज के बच्चों से देखें। आप देख रहे हैं कैसे-कैसे वीडियो इंटरनेट पर चल रहे हैं। कितनी अश्लील हरकतें कर रहे हैं कि उनको आपको अपनी टाइमलाइन पर शेयर करते हुए शर्म सब कुछ धर्म के नाम पर सब कुछ धर्म के नाम पर है और उनकी उम्र देखिए हम 8 10 11 साल ये दुर्भाग्य है कि भारत में लोग जंतरमंतर के तो उनकी बात कर रहे हैं लेकिन इनकी [गला साफ़ करने की आवाज़] बात नहीं कर रहे हैं। ये भी उसका हिस्सा हैं। ये भी उतना ही हिस्सा है। तो इस किताब में चंचू हसदा के साथ लंबी लंबी बातचीत है। इस बात को चंचू ने एक्सप्लेन किया है कि कैसे वो इस एक तरह से इस ट्रैप में आ गए थे जिसमें उनको बताया गया कि जो भी हिंदुत्व के खिलाफ है क्या है ये नहीं पता लेकिन जो जो हिंदुओं के खिलाफ बोल रहा है क्या बोल रहा है ये भी नहीं पता लेकिन जिसको कह दिया गया कि हिंदुओं के खिलाफ बोल रहा है उसको मारना हमारा फर्ज है हमारा धर्म है इसी नाते वो इस भीड़ का हिस्सा थे अब वो इन दिनों जो है वो अपना खेती किसानी मजदूरी का काम करते हैं आजीविका चला रहे हैं। गहरे अफसोस में हैं। उनको इस बात का बहुत अफसोस है कि कैसे उनसे ऐसा काम हो गया। तो हमारे दर्शकों को, पाठकों को यह कहानी पढ़नी चाहिए और यह समझना चाहिए कि कैसे नफरत से अपने बच्चों को बचाना बेहद-बहरी क्योंकि क्योंकि आप देखिए आरएसएस और बीजेपी और जितने हिंदुत्ववादी संगठन है यही तो कर रहे हैं। हथियार दे रहे हैं बच्चों के हाथ में, लड़कियों के हाथ में और लड़कों के हाथ में। ये सिर्फ लड़कों तक महदूद नहीं है बल्कि दोनों के हाथ में। और कैसे उनके दिमाग को कंट्रोल करके उनको पोल्यूट कर रहे हैं ताकि वो शिक्षा, रोजगार इस तरह के तमाम सवाल ना पूछें। वो एक भीड़ बने और ऐसी भीड़ बने जो बिना सवाल किए एक नफरती भीड़ बनकर बस आरएसएस और बीजेपी के पीछे चलते रहें और वो अपना मकसद जो है वो हासिल करते रहें। वो सब हम देख रहे हैं और ये उसकी एक ये मिसाल है जो आपने आपने पेश की है। मैं आऊंगी क्योंकि पडकास्ट थोड़ा हमारा लंबा हो गया है दयाशंकर जी और मैं चाहती हूं कोई पॉइंट हमारा मिस ना हो जाए। तो मैं यहां पर बात करना चाहूंगी जुडिशरी की कि जब लिंचिंग की इस तरह की तमाम यह घटनाएं हो रही हैं और मैं अभी 12 साल की ही मैं सिर्फ बात करूं [नाक से की जाने वाली आवाज़] और लगातार हो रही है। इसमें कोई हमें ये नहीं दिखता है कि किसी तरह की कोई रुकावट देखने के लिए मिल रही है। हेडलाइन से गायब हो जाने का मतलब यह नहीं है कि घटनाएं नहीं हो रही हैं। और फिर हम जुडिशरी के रोल को देखते हैं। अगर कोई एक नज़र भी इसमें यह साबित हो जाती कि आप अगर ऐसे करेंगे तो आपको यह कड़ी सजा मिलेगी क्योंकि आप लिंचिंग का कानून भी देखें तो वो भी आपको बहुत धुलमुल आपको दिखता है। आप कोर्ट से कोई इंसाफ नहीं मिलता है। वो सब आप देख रहे हैं। क्या आपको लगता है कि यह भी एक बड़ा रीजन है कि इस तरह की घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रही हैं। इंसाफ को कोर्ट्स को, अदालतों को आप कैसे देखते हैं? बहुत जरूरी सवाल आपने पूछा और यह बहुत प्रासंगिक इसलिए है क्योंकि लोकतंत्र में आप देखें सबकी भूमिका है। हम लोकतंत्र में केवल सरकार से लोकतंत्र है नहीं। बिल्कुल तो लोकतंत्र भी है और हमारी नौकरशाही भी है। हम हमारी कार्यपालिका की भूमिकाएं हैं। न्यायपालिका की भूमिकाएं हैं। सुप्रीम कोर्ट को हमेशा भारत ही नहीं दुनिया भर में एक गाइडिंग लाइट भी आप देखते हैं ना कि वो हमेशा एक रोशनी दिखाने का काम करता है। जब आप हताशा में हो, निराशा में हो तो आप कहते हैं मैं सुप्रीम कोर्ट चला जाऊं। हम गांवगांव में लेकर शहरों तक में घरों में झगड़ा होता है तो लोग कभी प्यार में मोहब्बत में तकरार में कहते हैं ना मैं कोर्ट चला जाऊंगा तो एक गरीब मजलूम आदमी भी कह रहा है कि कोर्ट चला जाऊंगा उद्योगपतियों में भाइयों में झगड़ा होता है वो भी कहां निपटाने आते हैं सुप्रीम कोर्ट लेकिन हमने देखा कि कैसे इस देश में सुप्रीम कोर्ट भी जैसे बिगाड़ के डर से ईमान की बात नहीं कर रहा है। अब वो कौन सा बिगाड़ का डर उनको सता रहा है जो जज हैं जिनको प्रिविलेज है जिनको सुरक्षा है मतलब पूरे आजन्म सुरक्षा है कि आपको आपको तमाम तरीके के प्रावधान दिए गए हैं वो लोग अगर डरे हुए हैं तो वो आखिर किस चीज से डरे हुए हैं क्या वो इसलिए डरे हैं कि कहीं कोई ना कोई कोई ना कोई उन्होंने अपने काम में काम को ठीक से निभा नहीं है या वो किसी आगे बढ़ने का रास्ता तलाश रहे हैं। ने देखा है कि जज कितने छोटे-छोटे प्रलोभनों में हमें देखते हुए नजर आ रहे हैं। हमें तो लगता था कि सुप्रीम कोर्ट का सुप्रीम कोर्ट में मतलब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया होना कितनी बड़ी बात है। लेकिन एक दिन हमको पता चला कि राज्यसभा सांसद होना ज्यादा बड़ी बात है। ये बात मैं इसलिए भी कह रहा हूं क्योंकि 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने लिंचिंग के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण फैसला दिया था। उस फैसले में प्रावधान भी तय किए गए गाइडलाइन भी तय की गई थी। लेकिन उन सबसे बड़ी बात यह थी कि अगर किसी राज्य में कोई लिंचिंग की घटना घट रही है और ठीक से ऐसा लगता है पीड़ितों को पीड़ितों के परिजनों को कि ठीक से काम नहीं किया सरकार ने तो इसका मुकदमा चलाया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हुई है। यानी सुप्रीम कोर्ट के प्रावधानों का ठीक से पालना नहीं हुई है। ये मजबूर करता था राज्यों को कि लिंचिंग के खिलाफ वो सख्त प्रावधान करें। लेकिन 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर याचिका को रद्द कर दिया। यानी 2026 में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक याचिका आती है जिसमें बताया जाता है कि लिंचिंग के मामले में कैसे सुप्रीम कोर्ट के प्रावधान पूरे नहीं किए जा रहे हैं। नियमों की पालना नहीं हो रही है और कहा जाता है कि कोर्ट ऑफ कंटेंप्ट किसी राज्य की सरकार पर चलाया जाना चाहिए। तो सुप्रीम कोर्ट यह कहता है कि इससे तो अराजकता फैल जाएगी। हम तो यह साफ़ तौर पर बहुसंख्यकवाद की राजनीति का समर्थन है। और जब यह फैसला आया तो इस देश में केवल द हिंदू ने टिप्पणी की कि ये बहुसंख्यकवाद की राजनीति के सामने एक तरह से सम सरेंडर जैसा है। लेकिन कोई भी दूसरा अखबार कोई भी अखबार, कोई भी पत्रकार, कोई भी चित्रकार, कोई भी जो भी अपनी भूमिकाओं को निभा रहा है। किसी ने इस विषय पर कोई बात नहीं की। तो जब सुप्रीम कोर्ट से हमको निराशा हाथ लगेगी तो फिर क्या होगा? तो मुझे लगता है कि मॉब लिंचिंग एक एक कलेक्टिव जिम्मेदारी के तौर पर हम लोगों को लेना पड़ेगा। यह हमारे खिलाफ है। ये हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों ये ये किसी एक के खिलाफ नहीं क्योंकि ये सरकार क्या चाहती है कि हमारे को समझा दिया जाए कि तुम्हारे खिलाफ नहीं है। ये तो मुसलमान को हम सता रहे हैं। फिर ये तुम्हारे खिलाफ नहीं है। ये तो दलितों को ठिकाने लगाना है। बहुत उनका दिमाग खराब हो गया। सबका नंबर आएगा। सबका नंबर आएगा। ईसाई अभी तक क्या होता था? ईसाइयों के बारे में देख लीजिए आप। और मैं आपको एक आखिरी बात कह के बात खत्म करूं। मैं कुछ ऐसे लोगों से इस सिलसिले में मिला जो प्रदर्शन कर रहे हैं कि मिशनरी खराब है हम और ईसाई स्कूल के बाहर फॉर्म लेने के लिए लाइन में खड़े हैं बजरंग दल के कार्यकर्ता। तो मैंने उनसे पूछा कि जब इतना खराब सब सारी व्यवस्था है ईसाइयों की तो यहां अपने बच्चों को क्यों पढ़ा रहे हो? तो वो साफ कहते हैं कि देखिए वो हमारा काम है। वो करियर है और ये बच्चे की जिंदगी है। हम अपने बच्चे की जिंदगी आपको बनानी है। दूसरे के खराब जिंदगी बनानी है। दूसरे की खराब करनी है। तो मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए भीड़ को भीड़ को संभालने के लिए केवल विपक्ष केवल लेखक, केवल पत्रकार, केवल समाज ये अकेले-अकेले की लड़ाई नहीं है। अकेले-अकेले की लड़ाई के चक्कर में ही हम सब सबका नंबर आ जाता। आखिरी में सवाल यह पूछ रही हूं मैं आपसे क्योंकि अभी यह कहा जाता है कि देखिए राहुल गांधी क्योंकि आपकी किताब भी है राहुल गांधी पर और यह उस वक्त की कहानी किताब है आपकी जब उन्होंने मोहब्बत की बात की थी और उन्होंने एक हिम्मत दिखाई थी जिसको अप्रिशिएट किया जाना चाहिए। अभी भी वो आईडियोलॉजी की बात करते हैं। वो कहते हैं कि आइडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो आरएसएस और बीजेपी को एक साथ एक सांस में उसका नाम लेते हैं। वो क्रू कैपिटलिज्म की वो बात करते हैं। वो वो तमाम हिम्मत दिखा रहे हैं। लेकिन फिर भी मैं ये कहूंगी कि मुसलमानों के सवाल पर जिस तरह का आइडियोलॉजिकल स्टैंड उन्हें लेना चाहिए। जिस तरह से उन्हें एक मुहिम छेड़नी चाहिए वो करते हुए नजर नहीं आते हैं। वह एक हिचक है। वो एक डर है कि वो उनको समझाया जाता होगा या खुद उनको समझ में आता होगा कि भ वोट बैंक उनका चला जाएगा या सरकार उनकी नहीं आएगी। वो तो अब भी नहीं हो रहा है। पिछले 12 साल से भी अगर आप इस सवाल पर खामोश हैं तो तब भी तो वो नहीं हुआ है। तब भी तो ऐसा नहीं कि आप खामोश रहकर आपने 10 जगह अपनी सरकार बना ली या आप केंद्र में आपकी वापसी आ गई। आपके चैलेंजेस तो वहीं के वहीं हैं। आपको खामोश रहकर भी आपको देशद्रोही कहा जाता है। तो आप बोलकर क्यों नहीं देशद्रोही बन जाते हैं? तो आप दलितों के सवाल उठा लेते हैं। आप आदिवासियों के सवाल उठाते हैं। आप छात्रों के सवाल उठाते हैं। आप एक मीटिंग में ये कहते हैं कि भाई देखिए माइनॉरिटी नहीं मुसलमानों को मुसलमान कहा जाना चाहिए। जैसे कि बहुत कोई एहसान की बात है। लेकिन जो एक तरह के जितना जुल्म मुसलमानों पर हो रहा है उतना तो किसी और पर नहीं हो रहा है। तो उसके लिए उसको लेकर कोई कोई बात कोई कोई इस तरह की कोई मुहिम या उस पर कोई स्टैंड लेते हुए क्यों नहीं नजर आते हैं? राहुल गांधी ही सिर्फ नहीं या और बाकी लोग भी जिनका मुस्लिम एक वोट बैंक रहा है। क्योंकि बीजेपी तो यह कहती है भई हमें तो मुसलमानों का वोट ही नहीं चाहिए। उसे तो वो दोयम दर्जे का नागरिक क्या हो सकता है कुछ दिन में नागरिक भी ना मानना बंद कर दे वो। बिल्कुल ठीक आपने बात कही। मुझे लगता है कि केवल राहुल गांधीकि विपक्ष नेता प्रतिपक्ष नेता प्रतिपक्ष हैं और कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। लेकिन केवल राहुल गांधी नहीं पूरे देश मेंकि अलग-अलग पार्टियां हैं। अलग-अलग जगह पर उनका प्रभाव है। तो मुझे लगता है निजी तौर पर कि सब लोगों को इस मामले में लिंचिंग के सवाल को जिस प्रमुखता और जिस मैं कहूंगा कि जिसको प्रमुख स्वर में बड़ी आवाज बड़ी साफ आवाज में जैसे और कहना चाहिए वैसे अभी सुनाई नहीं दे रहा है और मैं इसको एक लोकतांत्रिक पूरी व्यवस्था में इसको कमी के तौर पर देखता हूं और मैं उम्मीद करता हूं आप और हम एक नागरिक के तौर पर उम्मीद करते हैं कि नेता प्रतिपक्ष और जो वो विपक्षी पार्टियां जो समय-समय पर अपने मतलब इन मुद्दों को उठाने की बात करते हैं। वो ये बात कहते हैं कि वो मुसलमानों के साथ हैं। वो सबके साथ हैं। मुझे लगता है कि जो ये कहता है कि हम सबके साथ हैं। उसकी जिम्मेदारी उतनी ज्यादा बढ़ जाती है। हम्म तो हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले वक्त में लिंचिंग पर एक चुप्पी सब तरफ से टूटेगी और खासतौर पर पिटिकल पार्टीज की तरफ से टूटनी बहुत-बहुत जरूरी है और ये मुझे लगता है एक बुनियादी काम मैं इसको मैं इसको किसी जिसको आप कहते हैं ना कि लोग कहते हैं कि भाई आप ये ऐसा आप क्यों कर रहे हैं या इसलिए कर रहे हैं या कोई बहुत आप हाई मोरल ग्राउंड हाई मोरल मैं इसको माफ़ कीजिएगा मैं किसी हाई मोरल ग्राउंड की बात नहीं मैं इसको को बेसिक बात कह रहा हूं। जैसे जैसे आप किसी को देश में कहें कि भाई हवा आ रही है तो हवा हवा पानी मिट्टी बेसिक बात है ना ये बुनियादी बात है कि लिंचिंग नहीं होनी चाहिए। इसको इसका एक एक लास्ट इसमें क्योंकि मुझे लग रहा है कि ये बात भी होनी जरूरी है। क्योंकि ये किताब जो है एक तरह का दस्तावेज है। ठीक है? आपने उन लोगों से बात की, उन विक्टिम से बात की, परिवारों से बात की आपने। मैं जो पाती हूं वो ये कि डॉक्यूमेंटेशन की बहुत कमी है। डॉक्यूमेंटेशन आप एक दस्तावेज है। आज हम एक इतिहास के पन्नों को पलटते हैं तो हम तारीख की बात करते हैं। तब हुआ था इतने लोग मरे थे। हम पार्टीशन तक की बात करते हैं कि 20 लाख 24 लाख लोग जो हैं वो मरे थे। लेकिन मैं ये मान, मैं ये देखती हूं चाहे मैं दिल्ली दंगों की जब मैं ये डॉक्यूमेंट्री बना रही थी तब भी मैंने देखा कि ये पता ही नहीं है कि इतनी मुश्किल का सामना करना पड़ा ये जानने के लिए कि कितनी विधवाएं हैं जी। इस दिल्ली दिल्ली दंगे की। तो आप सोचिए ये तो अभी का है। बिल्कुल वो दिल्ली में हुआ है। राजधानी में हुआ है। कोई दूर दराज का नहीं है। सेम मैं पाती हूं लिंचिंग में भी कि अगर आप आज एक आप लिस्ट बनानी शुरू करें कि अब तक 2014 से लेकर 26 तक कितनी लिंचिंग हुई है। कितने उसमें मारे गए हैं। कितने घायल उनके साथ क्या हुआ है। तो आपको एक एक प्रॉपर डाटा पाने में बहुत मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा और हो सकता है कि एग्जैक्ट आपको मिले भी ना क्योंकि वो रजिस्टर भी हो सकता है ना हुआ हो किसी भी तरीके से। तो आप यह अगर दो लाइन में आप बता सके कि यह कितना जरूरी है। आप डॉक्यूमेंटेशन को आप मानते हैं। मुझे लगता है कि यह काम प्राथमिक तौर पर सरकार का काम है। जैसे एनसीआरबी का डाटा होता है। आप देखें कि ज्यादातर मामलों में जब भी आप किसी भी डाटा की बात करते हैं तो एनसीआरसीबी को आप रेफर करते हैं। ये लिंचिंग कोकि सरकार इसको कहीं परिभाषित ही नहीं कर रही है। सबसे पहला काम ये होना चाहिए कि सब लोगों को ये मांग करनी चाहिए कि एनसीआरसीबी अपने डाटा में लिंचिंग के केस को ठीक से डिफाइन करें। तो आखिर डाटा क्या है? डाटा एक दस्तावेज है और सरकार जब ये बात करती है तो सरकार तो हमारे लिए है। भाई हम हम मालिक है ना? सरकार क्या है? सरकार हमारी सेवक है। तो ये जो कुछ अपराध घट रहा है और साफ तौर पर अपराध घट रहा है उसके उसकी उसके डाटा का काम होना चाहिए तो वो प्राथमिक सोर्स बने। असल में सरकार यह इसलिए नहीं कर रही क्योंकि वो अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटती है। आखिर में वो यही सब जगह यही तय किया जाता है कि ना तो कोई लिंचिंग हुई ना कोई मरा जैसे अखलाक के मामले में उस वक्त के संस्कृति मंत्री कह रहे थे कि ये क्या है? ये तो दुर्घट ये तो एक्सीडेंट है। तो ये हत्या है ना। हत्या और एक्सीडेंट में फर्क है। आखिर में मैं यह कहना चाहूंगा कि मॉब लिंचिंग को कभी भी इस तरह से नहीं समझा जाना चाहिए कि केवल भीड़ द्वारा की गई हत्या या हिंसा है। बहुत साफ-साफ मैं कहना चाहता हूं मॉब लिंचिंग एक संगठित अपराध है। ये सोची समझी साजिश है कि मुझे मुसलमानों को मुझे ईसाइयों को, मुझे दलितों को, कैसे आदिवासियों को कैसे सबक सिखाना है। इस किताब में मुसलमानों, दलितों, ईसाइयों, आदिवासियों की वह कहानियां हैं और वह गवाहियां हैं जो उनके आंसुओं को बयान करती हैं। उनकी पीड़ा को बयान करती हैं। और याद रखिए अगर आपको यह सब बेचैन नहीं करता तो मैं बहुत माफी के साथ कहूंगा कि हम में से अगला नंबर किसी का भी हो सकता है। हम और हम सब इसी तरह से चुप होते यहां पर पहुंचे हैं। अगर आपको यह बेचैन नहीं करता तो क्या वाकई में आप अपने आप को इंसान भी कह सकते हैं? फिर अगर किसी दूसरे इंसान को इतनी बेदर्दी से मारे जाने पर अगर आप में वो तड़प भी पैदा ना हो या आप उसके बारे में बात भी ना करें तो। दयाशंकर जी बहुत-बहुत शुक्रिया आपका कि आपने एक किताब लिखी और शुक्रिया आपका नाउ के स्टूडियो आने के लिए और इस इस पॉडकास्ट के लिए। बहुत-बहुत शुक्रिया। बहुत शुक्रिया। एक जरूरी सवाल यह कि अगर कोई इसको किताब को खरीदना चाहता है और पढ़ना चाहता है तो उसके पास क्या-क्या जरिए हैं? किस तरह से वो इस किताब को खरीद सकता है? आप ये बताएं मुझे। ये किताब Amazon पर, Flipkart पर मौजूद है। वहां से हमारे पाठक, दर्शक किताब मंगा सकते हैं। लेकिन इस किताब के आने के बाद कुछ अजीब अजीब तरीके की परेशानियां आ रही हैं। कभी किताब उपलब्ध होती है, कभी कुछ तकनीकी समस्याएं। पता नहीं मैं अभी तो उनको तकनीकी ही कह रहा हूं। अह तो उम्मीद करते हैं कि वो दूर [गला साफ़ करने की आवाज़] होनी चाहिए। लेकिन इसके लिए हमने एक व्यवस्था ये की है कि एक नंबर है मैं चाहूंगा कि आप नोट करें। हमारी स्क्रीन पर भी ये आ रहा होगा 787 99 28528 इस नंबर पर आप मुझे WhatsApp मैसेज भेज सकते हैं और हम इस पर कॉल नहीं ले पाएंगे। बहुत माफी के साथ कह रहा हूं क्योंकि मुझे अकेले ही सब कुछ करना होता है। आप इस पर मैसेज कर दें कि आपको इस किताब की एक दो या जितनी भी प्रतियां चाहिए और हम क्यूआर कोड स्कैन करने के लिए आपको देते हैं। आप वहां भुगतान करके अपना पता पिन कोड और मोबाइल नंबर सहित हमें भेज सकते हैं। उसके बाद हम जल्दी से जल्दी किताब आप तक भेजते हैं। भारत के किसी भी हिस्से में अगर आप हैं तो आप हमें 7879928528 पर संदेश भेजकर यह किताब ले सकते हैं, पढ़ सकते हैं और नागरिकों तक इसे पहुंचा सकते हैं। मैं एक बात बस आखिरी में दोहराना चाहता हूं कि इस किताब का प्रकाशन मैंने स्वयं किया है और तब किया है, मजबूरी में किया है जब भारत में लगभग सभी प्रकाशनों ने इसे छापने से इंकार कर दिया। इंकार कर दिया। जी। तो बिल्कुल एक जिम्मेदारी की तरह भी आप इसको ले सकते हैं और एक प्रोत्साहन के तरह भी आप इसको ले सकते हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया दया शंकर जी।
Companion article
Every account of mob lynching in Narendra Modi's India begins, almost by reflex, with Mohammad Akhlaq — beaten to death by a mob outside Delhi in Dadri in September 2015 over rumours of beef in his refrigerator. Journalist Dayashankar Mishra's self-published book, titled simply "Akhlaq," insists the timeline is wrong. The first person lynched after Modi's government took office, he told Nous Podcast, was Mohsin Shaikh, a young computer engineer in Pune who was stoned to death barely a week after the prime minister's swearing-in in 2014. Shaikh had stepped out of a mosque to collect his lunch when a mob, primed by a hate speech circulating that day that he had no connection to, beat him for wearing a Pathani suit and a white skullcap. His father died of a heart attack still waiting for justice; the family, Mishra said, has never received it.
Mishra spent nearly two decades in mainstream journalism — at NDTV, Zee News and, most recently, Network18 — before what he describes as a forced exit following an earlier book he wrote on Rahul Gandhi. Neither that book nor "Akhlaq" found a publisher willing to print them; he brought out "Akhlaq" himself, distributing it through a WhatsApp number rather than bookstores, after what he says was a wall of refusals from India's major publishing houses.
The book's central intervention is definitional. Mishra argues that Indian public discourse has never properly defined mob lynching, and that the narrow definition — a crowd killing a lone individual — lets the state off the hook. His own definition is deliberately expansive: a bulldozer demolishing a home overnight, a Muslim professional pushed out of a job, an equal opportunity quietly denied — all of it, he argues, belongs under the same heading, because all of it flows from the same source. "Mob lynching is a purely political tool," he said, "one that helps you gain and hold power." He rejects the framing, used by ministers after Akhlaq's killing, that such deaths are unfortunate accidents or the spontaneous fury of an angry crowd. Anger, he says, has to be manufactured, and someone is doing the manufacturing.
Mishra's central metaphor is fuel: if lynching is the fire, hate speech is what feeds it. He traces a shift in the register of ruling-party campaigns — from the "development" plank of 2014, already fading by 2019, to speeches by 2024 that routinely folded in some version of hate rhetoric against Muslims. The mechanism, he argues, is reward: a low-level party functionary who spends two minutes attacking Muslims advances faster than one who spends twenty years on constituency work, because television and social media amplify the former and ignore the latter. He points to a chain of examples — a Delhi minister's public call to "shoot the traitors," a West Bengal opposition leader's suggestion that Muslims be given "Gaza-like treatment" before going on to become chief minister — arguing that no institution, court or press has treated these as disqualifying.
Hate speech, in his account, does not stay local. It "travels" — through WhatsApp forwards and clipped videos — reaching a neighbourhood long before the person it targets even knows a rumour exists. Mohsin Shaikh, he said, had no idea any hate speech had circulated that day; by the time he left the mosque, it had already reached the men waiting for him.
Mishra explains the book's title by pointing to something narrower and, he argues, unprecedented: in November 2025, the Uttar Pradesh government filed a petition in the trial court asking that all murder charges against Akhlaq's killers be withdrawn. A local judge, Saurabh Dwivedi, rejected the plea, though Mishra notes it could resurface once the state moves closer to elections. He calls it the first instance in which a state government has moved, openly and through the courts, to abandon the prosecution of a man's killers rather than merely fail to secure a conviction. "This nation is not for everyone," he said of what the petition signalled. "This nation is not Akhlaq's."
He describes travelling to Akhlaq's village in Dadri a decade after the killing, and finding the family home — cracked plaster, still visibly decayed — standing out against neighbouring houses that have all been renovated. A colleague travelling with him asked to remove the press sticker from their car before entering the village, telling Mishra that a press sticker, once a mark of safety for a journalist in India, was no longer one there. Elders in the village, when asked what went wrong, told him there was nothing to discuss; women told him it was "a matter of religion." Men out on bail for the killing, he said, show no remorse and have faced no social cost — no boycotts, no called-off marriages, nothing resembling the collective consequence a genuinely wounded community might impose.
The book's most wrenching case study, Mishra said, comes from Pusesawali, a village in Satara district, Maharashtra, where Nurul Shikalgar — a Muslim who served as president of the local Ganesh festival committee, a detail Mishra dwells on as evidence of genuine, unforced coexistence — was beaten to death on 10 September 2023. His killers, according to the case now in court, were three of his closest childhood friends: Rahul, Chinmay and Pankaj. Nurul's wife Ayesha, pregnant at the time, told Mishra how one of the three had once driven the wedding car for their marriage when Nurul's own hadn't arrived in time, and how Nurul would open his friend's shop at 2 a.m. to satisfy her pregnancy cravings.
That closeness dissolved, Mishra said, after months of rising hate speech in Maharashtra through 2021–23 and a wave of provocative religious processions linked to hardline Hindu outfits through the area, including one on the day Nurul died. When a procession passed through a tense, mixed neighbourhood and clashes broke out, Nurul — trying to protect visiting members of a religious gathering from harm, worried it would tarnish his village's name — was told by the crowd to step aside. He didn't recognise the danger even as his own friends approached; he assumed, until the end, that they were "his own people." Ayesha learned only the next day, from relatives, that the men who killed her husband were the same three friends he had trusted completely. None of the three has expressed remorse, Mishra said; the case remains in court.
A second case, from Udgir in Maharashtra during the brutal second wave of Covid-19 in April 2021, unsettled Mishra more than any other in the book, he said. Dayem Azimuddin Gaisuddin's wife was critically ill on 14 litres of oxygen; the treating doctor, also infected with Covid himself, was on the phone with a senior colleague — coincidentally sharing the same first name — arranging supplies. The senior doctor, on hearing there were no beds or oxygen cylinders left, told his colleague, on a call Dayem overheard on speaker, to let the Muslim patient die, adding a slur about "sympathy for Muslims." Mishra records Dayem's account of the moment almost breaking down describing it. The episode, Mishra argues, complicates the standard picture of lynching as a street phenomenon carried out by an inflamed crowd: here the mob's logic had lodged itself inside a hospital, inside a profession whose entire purpose is the opposite of what it produced that night. He recounts a separate conversation with a doctor in Delhi who admitted he still avoids a particular Muslim-majority lane out of an inherited, unexamined caution passed down from his father and grandfather — a lynching of the mind, in Mishra's phrase, that never needs a crowd to gather at all.
Mishra draws a historical parallel to the American Jim Crow era, when travelling minstrel performances built and normalised caricatures of Black Americans decades before the Ku Klux Klan's violence peaked — arguing that culture manufactures the permission structures that later violence merely acts on. He applies the same logic to Hindi cinema, noting how consistently the on-screen villain in recent big-budget films carries a Muslim name, while intelligence and espionage cases exposed in real life — DRDO leaks, RAW moles, honey-trap scandals — disproportionately involve upper-caste Hindu surnames that never make it to the screen. He cites Naseeruddin Shah's later public regret over "A Wednesday," a film in which every terrorist character is written as Muslim, as evidence that even acclaimed actors have, in his view, failed to interrogate scripts they helped make iconic.
Turning to the courts, Mishra points to the Supreme Court's 2018 guidelines on lynching, which allowed contempt proceedings against state governments that failed to implement anti-lynching safeguards. In 2026, he said, the Court dismissed a fresh contempt petition seeking to enforce those very guidelines, warning that pursuing it risked "anarchy" — a ruling only one major newspaper, The Hindu, criticised in print as a capitulation to majoritarian politics. He links this to the prolonged incarceration of activist Umar Khalid, held without trial for years on sedition-adjacent charges while other, more prominent political figures moved in and out of jail on bail; he argues Khalid's real offence, in the state's eyes, is that his speeches invoke the Constitution, Nehru, Ambedkar and Gandhi with a fluency that undercuts caricatures of Muslim politics his prosecutors need to sustain.
The book's account of the 1999 killing of Australian missionary Graham Staines and his two young sons, burned alive in their car outside a church in Odisha, offers Mishra a rare counterpoint. Of the men convicted, one — Chinmay Hansda, a minor at the time — later converted to Christianity and told Mishra, through a translator, that he now lives with lasting remorse for having been drawn, as a child, into a mob controlled by the main convict, Dara Singh. Mishra contrasts this with the total absence of remorse he found among those out on bail in the Akhlaq case and the Shikalgar case, arguing the difference is instructive: without social or legal consequence, there is no mechanism by which perpetrators are made to reckon with what they did.
Mishra is candid that the book asks a question he cannot fully answer: what should Muslims themselves do in this environment. His clearer argument is aimed elsewhere — at opposition politicians, including Rahul Gandhi, whom he credits with real ideological courage on other fronts but faults for stopping short of naming mob lynching as a central, sustained campaign issue. Silence, he notes, hasn't even been politically rewarded: opposition parties that avoid the subject have not thereby won elections. His closing argument is that lynching is not a Muslim problem to be managed but a collective one, since the same machinery that targets Muslims today has, in Odisha and elsewhere, already turned on Christians, and could turn on anyone the state finds it useful to make an example of next. Documentation, he insists, remains the single largest gap — no reliable national count exists of how many people have been killed this way since 2014, in large part, he argues, because the government has never allowed the National Crime Records Bureau to define or record lynching as a distinct category in the first place.
10:56This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=DZ5hEFotEU8&t=594s
10:56This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=DZ5hEFotEU8&t=594s
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
3:25:59What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
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