Nous Podcast· 28 May 2026· 51:35

How Hate Around Muslim Festivals Is Being Normalised in India | Kunal Purohit

In this important conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with journalist and author Kunal Purohit, whose book H-Pop: The Secretive World of Hindutva Pop Stars investigates the rise of digital hate, propaganda, and majoritarian politics in India. The discussion examines how Muslim id…

Full Transcript

गाय और बकरी तो बस आज आज के टॉपिक है लेकिन कल उठके कोई और टॉपिक हो जाएगी जैसे महाराष्ट्र में कुछ ही दिनों पहले तक लव जिहाद सबसे बड़ी टॉपिक थी। ये अब समझ में आ रहा है कि इट वाज़ नेवर अबाउट काऊ। इट वाज़ ऑलवेज अबाउट मुस्लिम्स एंड देयर फेस्टिवल। और कैसे उनको ड्यू ह्यूमनाइज किया जाए। आप समझ सकते हैं कितनी कितनी बुरी बात है कि आप सूअर लेके आप आप ये दिखाना चाहते हैं कि अगर आप बकरी लेके आ रहे हैं तो हम हिंदू हैं। आप सूअर लेके आएंगे। क्या सिर्फ कुर्बानी या बकरे सिर्फ क्या सिर्फ बकरा ईद के दिन ही काटे जाते हैं कि सिंक्रेटिक ट्रेडिशन को खत्म करना और जो कम्युनिटी स्पिरिट था दोनों में वो फेस्टिवल्स को टारगेट करने से ही होता है पूछना और इसीलिए फेस्टिवल्स को टारगेट करना बहुत जरूरी हो जाता है। पश्चिम बंगाल से लेकर दूसरी तमाम जगहों पर आप ये देखें वहां तो कल्चरली हिंदू बलि देते हैं तो आपको उससे प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन सिर्फ यहां प्रॉब्लम सिर्फ एक है पहचान। जो जो धार्मिक हिंदू हैं जिनको पता है कि हिंदू धर्म में यह नहीं होता उनको आगे आके बोलना चाहिए कि यह हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है। इसको अगर हम सिर्फ हिंदुत्ववादी संगठन तक जोड़कर देखें तो क्या इसको कम नहीं आंक रहे हैं? क्या इंटेंसिटी को हम इसकी कम नहीं कर रहे हैं? क्योंकि जहर इतनी इतनी इतनी बारीकी से घोला गया है कि उसको मिटाना बहुत बहुत मुश्किल होगा जब तक पूरा समाज साथ में ना आए। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। बकरा ईद है और बकरा ईद है तो जाहिर सी बात है जो हिंदुत्व संगठन हैं उनको पूरी आजादी है कि वो जो चाहे सड़कों पर कर सकें। मैं यहां सबसे पहले बात करना चाहूंगी मुंबई की। मुंबई में हमने देखा कि मीरा रोड पर एक सोसाइटी में बकरों को लेकर इतना ज्यादा कस और मैं कहूंगी तांडव हमें एक तरह से देखने के लिए मिला है कि वहां पर हिंदुत्ववादी जो संगठन है और शायद हो सकता है कि कुछ सोसाइटी के लोग भी उनके साथ हो शामिल। उन्होंने इतना इसका विरोध प्रदर्शन किया है कि उन्होंने कहा कि अगर मुसलमान बकरे सोसाइटी के अंदर ला सकते हैं बकरा ईद के लिए कुर्बानी करने के लिए तो हमें भी सूअर लाने की इजाजत दी जाए और बाकायदा तौर पर वो हाथ में सूअर लेकर आए और हमने देखा कि पुलिस और जो हिंदुत्ववादी संगठन है जिस शख्स के हाथ में वो पिग था वो कैसे सड़कों पर भागते हुए वो नजर आ रहे हैं। उसके बाद हनुमान चालीसा पढ़ा गया। जय श्री राम के नारे लगाए गए और फिर हालत यह हुई कि यह डिसाइड हुआ कि जो सोसाइटी में जितने भी बकरे आए हुए हैं और यह कोई नई सोसाइटी नहीं थी। यह पुरानी सोसाइटी है। उनसे निकालकर उनको बाकायदा तौर पर एक ट्रॉली में रखकर अलग जगह ले जाया गया। और आपको इस तरह के जो घटनाएं हैं वो अलग-अलग मुंबई के अलग-अलग इलाकों सोसाइटी से आपको देखने के लिए मिलेंगी। और यह क्यों हो रहा है? यह इसलिए हो रहा है कि चाहे वह कैबिनेट मिनिस्टर हो या फिर वहां के एमएलए हो या फिर बीजेपी के एमपीज हो वो किस तरह से इस हेट को ना सिर्फ मेन स्ट्रीम कर रहे हैं बल्कि बाकायदा तौर पर इसको प्रमोट करते हुए नजर आ रहे हैं। और यहां पर मैं बात कर रही हूं नितेश राणे की। वो किस तरह का वेनम उगलते हैं, किस तरह का जहर उगलते हैं, यह मुझे बताने की जरूरत नहीं है। इसके अलावा हम यह देख रहे हैं कि जबजब मुसलमानों के त्यौहार आते हैं, वो लॉ एंड ऑर्डर का मसला बन जाता है। और जब हिंदुओं के त्यौहार आते हैं तो मुसलमान उन त्योहारों पर हिंदुओं के लिए थ्रेट बन जाते हैं। क्या मुसलमानों के त्यौहार, लॉ एंड ऑर्डर और हिंदुओं के जो फेस्टिवल हैं, वह क्या मुसलमान उनके लिए एक थ्रेट पैदा कर रहे हैं? ये भी देखा जा रहा है कि चाहे वो हनुमान जयंती हो, उसका महोत्सव हो, रामनवमी हो। यहां तक कि होली और दिवाली तक पर भी यह देखा जा रहा है कि इन त्यौहारों को एक तरह से शक्ति प्रदर्शन की तरह जो हिंदुत्ववादी संगठन है वो इसको इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। मस्जिदों को ढका जाता है त्रिपाल से या कपड़े से और अक्सर यह एक लॉ एंड ऑर्डर की जो प्रॉब्लम है वो बन जाते हैं। सवाल ये उठ रहा है कि जो त्यौहार मिलजुलकर मनाए जाते थे। आखिर इन 12 सालों में ऐसा क्या बदल गया है? इसके पीछे की राजनीति बढ़ता हुआ इसके पीछे जो हेट है इस सब पर आज हम बात करेंगे और उस पर बात करने के लिए मेरे साथ बेहद खास मेहमान जुड़ गए हैं जिनका इंट्रोडक्शन मैं आपसे कराना चाहूंगी। अह टुडे वी आर जॉइन बाय कुणाल पुरोहित एन अवार्ड विनिंग इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर एन ऑथर हु हैज़ स्पेंट नियरली टू डिकेड्स रिपोर्टिंग ऑन पॉलिटिक्स इनकलिटी माइग्रेशन हेट क्राइम्स एंड द राइज़ ऑफ़ हिंदुत्व नेशनलिज्म इन इंडिया ही इज़ द ऑथर ऑफ द वाइडली डिस्कस बुक एच पॉप हिंदुत्व पॉप द सीक्रेटिव वर्ल्ड ऑफ हिंदुत्व पॉप स्टार्स व्हिच एक्सप्लोरस हाउ म्यूजिक पोएट्री सोशल मीडिया एंड पॉपुलर कल्चर आर बीइंग बीइंग यूज्ड टू नॉर्मलाइज कम्युनल हेट एंड पोलराइजेशन इन कंटेंटरी इंडिया। कुणाल वेलकम टू नाउ नेटवर्क। बहुत-बहुत शुक्रिया बुशरा। वंडरफुल टू बी हियर। थैंक यू सो मच फॉर जॉइनिंग। मेरा पहला सवाल आपसे यह है और फिर मैं इस पर आगे इन तमाम चीजों को इलेबोरेट करूंगी। कुणाल की जो फिलहाल मुंबई में हो रहा है जो पश्चिम बंगाल में हो रहा है या हम देश के अलग-अलग हिस्सों में ईद के इर्द-गिर्द खासतौर पर बकरी ईद के इर्द-गिर्द जो होता हुआ हम देख रहे हैं इसको आप सिर्फ एक इवेंट के तौर पर देखते हैं कि इस इवेंट के इर्द-गिर्द ये किया जा रहा है। क्योंकि इसमें मैं ऐड ये करना चाहूंगी पश्चिम बंगाल के खासतौर पे हवाले से कि मुसलमानों ने डिसाइड किया कि वो इस बार गाय की कुर्बानी नहीं करेंगे। वो चाहे 14 साल से बड़ी हो, छोटी हो। तो एक तरह से ऊन उनो रिवर्स इसको कहा जा रहा है क्योंकि ज्यादातर गाय जो पालते हैं या बकरियां भी जो पालते हैं वो ज्यादातर हिंदू कम्युनिटी से होते हैं और जो लेने वाले होते हैं वो मुसलमान होते हैं। लेकिन यह अब समझ में आ रहा है कि इट वाज़ नेवर अबाउट काऊ। इट वाज़ ऑलवेज अबाउट मुस्लिम्स एंड देयर फेस्टिवल। और कैसे उनको ड्यू ह्यूमनाइज किया जाए और कैसे उनको एक लॉ एंड ऑर्डर के लिए एक थ्रेट जो है बताया जाए। बताया जाए कि कितने ज्यादा इनह्यूमन है यह लोग कि कैसे जानवरों की कुर्बानी करते हैं। जी बुशरा मैं शुरुआत इसी से करना चाहूंगा जो आपने कहा कि इट वास नेवर अबाउट द काऊ। मैं वहीं बंबई में बैठा हूं जहां बकरी को लेकर यू नो सियासती राजनीति शुरू हो गई है। हम ये देख रहे हैं कि बीजेपी के नेता एक हाउसिंग सोसाइटी से लेकर दूसरी हाउसिंग सोसाइटी जा रहे हैं। यही देखने कि मुसलमान क्या बकरी पाल रहे हैं और वो बकरी को वहां से निकाला जा रहा है। पुलिस को बुलाया जा रहा है। मीडिया के साथ वो लोग जा रहे हैं। तो एक तमाशा खड़ा खड़ा करना ये शायद ये शायद उनकी उनका मकसद होगा इस मोमेंट पर। लेकिन जैसे आपने कहा इट वास नेवर अबाउट द काऊ क्योंकि आज अगर बकरी पे यही चर्चा हो रही है कि बकरियों को की भी कुर्बानी नहीं हो सकती और उसको उसको आप लोग हाउसिंग सोसाइटी से बाहर निकाल रहे हैं मीडिया के साथ जा रहे हैं इसको हमें एक एक ब्रॉडर हिंदुत्व के कॉन्टेक्स्ट में देखना पड़ेगा और वो कॉन्टेक्स्ट ये है कि हिंदुत्व को आज रेलेवेंट रहने के लिए उसको कॉन्सेंटली एक एक एक नया शिकार खोजने की जरूरत पड़ जाती है। तो, अह अगर कुछ दिनों के पहले हिंदुत्व कुछ और शिकार में था, वह आज शिकार बदल रहा है क्योंकि आज यह रेलेवेंट है। अह कुछ ही दिन बाद जब बकरी ईद खत्म हो जाएगी, तब एक दूसरा शिकार पाया जाएगा। तो हिंदुत्व की की जो करेंसी है उसको उसको रेलेवेंट रहने के लिए नए-नए टारगेट्स की जरूरत बिल्कुल पड़ती है और और उसकी सेंट्रल पॉइंट जो है कि इंडिया के रिलीजियस माइनॉरिटीज हो वो वो क्रिश्चियंस हो वो वो मुस्लिम्स हो उनको कैसे टारगेट किया जाए उनकी उनकी जो उनकी जो प्रथाएं उनकी जो ट्रेडिशंस हैं उनके जो फेस्टिवल्स हैं उनको कितना इनविज़िबल इनविज़िबलाइज आप कर सकते हैं इसी पे इसी पे पूरी पूरी ताकत लग जाती है और उसी ताकत को लगाने में आपको अलग-अलग शिकार की अक्सर जरूरत पड़ जाती है। तो इसीलिए गाय और बकरी तो बस आज आज के टॉपिक है लेकिन कल उठ के कोई और टॉपिक हो जाएगी जैसे महाराष्ट्र में कुछ ही दिनों पहले तक लव जिहाद सबसे बड़ी टॉपिक थी और और चकि वोकि वो टॉपिक में एक सरकार ने अपना योगदान दे दिया और एक एक नया कानून यहां आ गया महाराष्ट्र में जो जिसको महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट कहते हैं। तो क्योंकि वो कानून आ गया उसके बाद उन्होंने अगला टॉपिक लिया कुर्बानी का तो ये टॉपिक्स बदलते रहेंगे लेकिन हिंदुत्व का जो सेंट्रल कोर है जो मैसेजिंग है वो वही रहेगी कि रिलीजियस माइनॉरिटीज को मुसलमानों को क्रिश्चियंस को आप जितना इनविज़िबलाइज कर सकते हैं जितना सबजुगेट कर सकते हैं उतना कीजिएगा और बुशरा उनको सबजुगेट करने में अगर सबसे प्रोमिनेंट मौका जो होता है वो होता है उनके फेस्टिवल्स वो वो होता है वैसे मौके जहां पूरा समाज एक साथ आता है। वो पूरा समाज एक चीज को सेलिब्रेट करता है। एक चीज को मनाता है और आपको बहुत विज़िबल रिप्रेजेंटेशन दिखता है उस समाज का उन दिनों में। ये भी एक ट्रेंड है। ये भी कोई नई बात नहीं है। हमने हमने अगर कुछ ही महीने पहले जाएं हम तो हमने क्रिसमस में ये देखा था कि देश भर में और मैंने तो सात से आठ अलग-अलग राज्य में देखा ये। सात से आठ अलग राज्यों में चर्चेस के बाहर या फिर ऐसी जगहों पर जहां क्रिश्चियंस एक साथ जमा होकर क्रिसमस मना रहे थे। वहां हिंदुत्व संगठनाओं ने उन पर अटैक किया। उनको उनको उनको कई जगह असॉल्ट किया है। उनको इंटिमिडेट किया। हैकल किया गया। रनसेक की गई प्रोसीडिंग्स। तो तो हमने शुरुआत वहां से होते देखी। उसके बाद आपको याद होगा रमजान के वक्त भी यह हुआ था। जब देश के अलग-अलग हिस्सों में जो मुसलमान अपनी रमजान मना रहे थे उनको टारगेट किया गया और उन्हीं को वही प्रैक्टिससेस को टारगेट किया गया जो प्रैक्टिससेस वो अपने रमजान में जैसे जैसे सहरी हुआ जैसे इफ्तारी हुई उन सारी चीजों को प्रैक्टिस किया गया और और आज ये तीसरा मौका है जब हिंदुत्ववादी संगठनाएं एक और एक और रिलीजियस फेस्टिवल को टारगेट कर रही है और वो है बकरी ईद तो ये अगर आप ब्रॉडर कॉन्टेक्स्ट में देखें तो ये कॉन्टेक्स्ट यही है कि हिंदुत्व ऑर्गेनाइजेशनंस को ये पता चल गया है कि अगर आपको इन दोनों समाज मुस्लिम्स और क्रिश्चियंस को ये बताना है कि आखिरकार भारत हिंदुओं का है तो ये बताने का मौका सबसे अच्छा उनके फेस्टिवल्स में आता है क्योंकि आपने हर रोज तो आपने आपने हेट स्पीच से और हेट क्राइम से आपने वायलेंस तो आपने एस्टैब्लिश कर लिया है कि आपको उनको उनको वायलेंटली उनको गाली देनी है। उनको अलग-अलग चीजें कहनी है। लेकिन आपको जो उनका रिप्रेजेंटेशन है, जो उनकी विज़िबिलिटी है वो खत्म करनी है। तो वो खत्म करने का मौका आपको सबसे अच्छा उनके फेस्टिवल्स में मिलता है। और हम आज यही देख रहे हैं कि एक एक हिंदुत्व का एक नया पैटर्न आपके सामने आ रहा है। जी कुणाल अगर संवैधानिक पदों पर कॉन्स्टिट्यूशनल पोजीशंस पर बैठे हुए लोग अगर इसको लेजिटिमाइज करते हुए नजर आए। ना सिर्फ लेजिटिमाइज करें बल्कि उसमें एक तरह से खुद शामिल हो। उसको प्रमोट करें और एक तरह से उनको पावर एक तरह से देते हुए वो नजर आए तो हेट तो मेन स्ट्रीम बन ही गई है। वो तो हम देख रहे हैं वो पार्लियामेंट के अंदर से लेकर और इसके अलावा रैलियों में प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री से लेकर तमाम इन तमाम भाषाओं का वो इस्तेमाल करते हैं। उसका स्तर तो किस हद तक गिर गया है उसके बारे में बात करने की जरूरत नहीं है। लेकिन महाराष्ट्र में नितेश राणे से लेकर और तमाम जो इस तरह के लीडर्स हैं उनको खुली छूट है और वो जिस तरह से हेट को प्रोपेगेट कर रहे हैं तो इस तरह के संगठनों को तो पूरी आजादी उनको पता है पुलिस प्रशासन सरकार सब कुछ हमारे साथ है और हमें ये नहीं भूलना चाहिए हम बकरा ईद की बात कर रहे हैं कि टीसीएस भी इसी महाराष्ट्र का हिस्सा है। नहीं बिल्कुल देखिए महाराष्ट्र में ये एक पैटर्न बहुत अच्छा बन बना दिया है उन्होंने और मैं तो कहूंगा यही पैटर्न का हिस्सा वेस्ट बंगाल और आसाम में भी हमने हमें देखा है लेकिन मैं वेस्ट बंगाल और आसाम 1 मिनट के बाद आऊंगा महाराष्ट्र में हमने 2022 से जब से शिवसेना कांग्रेस और और राष्ट्रवादी कांग्रेस की जो सरकार बनी थी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में जब से वो सरकार गिरी है तब से बीजेपी और शिवसेना का जो एक गट था वो साथ में आके जब तक जब उन्होंने सरकार बनाई तब तब इन दोनों पार्टीज को लगने लगा और खास करके बीजेपी को यह लगने लगा कि महाराष्ट्र एक एक ऐसा स्टेट है जहां उसका उसका अस्तित्व थोड़ा सा खतरे में आया है क्योंकि तीन तीन बड़ी पार्टीज एक साथ आ गई थी और तीनों पार्टीज ने महाराष्ट्र में बीजेपी को सत्ता से बाहर कर दिया था जबकि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी थी यहां पे नंबर्स वाइज तो उनको ये पता चलने लगा कि बस अब अब जो राज जो राजनीति हम लोग करते आ रहे हैं बीजेपी जो महाराष्ट्र में करते आ रही है वो राजनी राजनीति से काम नहीं बनेगा। उनको एक अलग पैतरा इस्तेमाल करना पड़ेगा महाराष्ट्र में अपना वर्चस्व बनाने रखने के लिए। तो उसी के बाद हमने जैसे ही वो लोग जुलाई में जुलाई 2022 में जब बीजेपी और शिवसेना के गट की एकनाथ शिंद के नेतृत्व में सरकार बनी उसके बाद हमने एक पैटर्न देखा कि बीजेपी के बड़े-बड़े नेता बीजेपी के जो एमएलए होते हैं कभी-कभी एमपीज भी गए थे। अह ये सारे नेता अलग-अलग हिंदुत्ववादी संगठनाएं जिनका हमने कभी नाम नहीं सुना था। जो एस्टैब्लिश नहीं थी ना तो रजिस्टर्ड थी वो वैसी संगठनाओं के साथ मिलकर स्टेट के चप्पे-चप्पे जाकर गांव-गांव जाकर रैलीज करने लगे और रैलीज में यही बताने लगे कि हिंदू महाराष्ट्र में खतरे में है और हिंदू को बचाना है तो ये मुसलमान जो है उनको अपने कंट्रोल में रखना पड़ेगा। मुसलमान लैंड जिहाद, लव जिहाद करते हैं। ये सारा रेटोरिक उन्होंने बताया और उसका उसका एक बड़ा हिस्सा यह था कि बीजेपी के नेता जो तब सिर्फ बीजेपी के एमएलए या एमपीज थे वो भी इन रैलीज का हिस्सा बनने लगे। अ जब 2024 में चुनाव हुए तो हमने देखा कि हिंदुत्व मोबिलाइजेशन बीजेपी को बहुत ज्यादा काम में आया क्योंकि वो इतने बड़े मैंडेट के साथ बीजेपी, शिवसेना और राष्ट्रवादी अजीत पवार का जो गट था वो साथ में सरकार में आए कि कि अपोजिशन बिल्कुल खत्म हो गया महाराष्ट्र में। तो कहीं ना कहीं बीजेपी को एक एक एक सर्टिफिकेट मिल गया वोटर से कि भाई यह राजनीति जो हम हम पोलराइजेशन की राजनीति चला रहे हैं हम जो धर्म की राजनीति चला रहे हैं उसका वोटर्स को सपोर्ट है। तो इसीलिए जैसे ही सरकार बनी तब सरकार में एक कैबिनेट मंत्री आते हैं। जो मंत्री इन्हीं रैलीज में बहुत खुल खुलकर मुसलमानों को गाली दे रहे थे। मुसलमानों को हरे सांप मुसलमानों को अलग-अलग गाली से उनको उनको बुलाते थे। मुसलमानों को मारने की धमकी देते थे। मस्जिद में घुसने की धमकी देते थे। जब और यही नहीं बस पुलिस वालों को भी धमकी देते थे कि अगर आपने हम हिंदुओं पर कुछ भी किया तो आप याद रखिएगा कि ये हिंदुत्ववादी सरकार है और हमारे हमारे सरकार में होम मिनिस्टर एक हिंदुत्ववादी आदमी है देवेंद्र फडनवीस। तो ऐसी ऐसी रेटरिक और ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने वाले आदमी नितेश राणे जब यहां सरकार बनती है 2024 में तो नितेश राणे को कैबिनेट मिनिस्ट्री का कैबिनेट मिनिस्टर का दर्जा दिया जाता है और और आप उसी से आप थोड़ा सा आप एस्टीमेट लगा सकते हैं कि हिंदुत्व की राजनीति बीजेपी के लिए कितनी ज्यादा महत्वपूर्ण है। तो आपने आपने बस उनको इंप्यूनिटी नहीं दी पूछना। मैं तो आपको थोड़ा सा मैं करेक्ट भी करूंगा कि उनको इंप्युरिटी नहीं दी है। महाराष्ट्र का मॉडल ये है कि अगर आप धर्म की राजनीति और पोलराइजेशन की राजनीति करते हैं तो आपको एक रिवॉर्ड दिया जाएगा और आपका रिवॉर्ड अलग-अलग मायनों में हो सकता है। कभी-कभी वो एमएलए या एमपी की टिकट हो सकती है या फिर आपको कैबिनेट मिनिस्टर भी बनाया जा सकता है। और और मैंने 2 मिनट पहले आपको कहा था कि हमें यही मॉडल आसाम और और वेस्ट बंगाल में भी देखने लगा देखने मिला है और और उसका उसका कारण यह है कि वेस्ट बंगाल में हमने जो दो-तीन सालों से हमने बीजेपी की कैंपेन देखी है बहुत जोरों शोरों से वो कैंपेन करते जा रहे हैं। वो कैंपेन लीड करने वाले शुभेंदु शुभेंदु अधिकारी शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी से जब उन्होंने बीजेपी में प्रवेश लिया उसके बाद से उनके स्वर बहुत बदले और उन्होंने एक बड़ा मुद्दा जो उठाया वो ये था कि बांग्लादेशी और जो मुसलमान है वेस्ट बंगाल में वो हिंदू को बहुत ज्यादा उनकी प्रताड़ना कर रहे हैं। उनको परेशान कर रहे हैं। तो एंटी मुस्लिम कैंपेनिंग उन्होंने शुरू कर दी बहुत जोरों शोरों से और उसी कैंपेन का हिस्सा था पिछले दो-तीन सालों में वेस्ट बंगाल में हमने जो जो पोलराइजेशन देखा जहां शुभेंदु अधिकारी ये कहते हैं कि जैसे इजराइल में इजराइल ने गाजा को जो सबक सिखाया उसी तरीके का सबक 100 करोड़ हिंदुओं को एक साथ आके सब सिखाना पड़ेगा। जब जब शुभेंदु अधिकारी ऐसी भाषा इस्तेमाल करते हैं और जब वो वेस्ट बंगाल के हिंदुओं को कहते हैं कि आप सरकारी दवाई मत खरीदिए क्योंकि शायद इसमें ऐसी दवाई मिलाई होगी जिससे हिंदू फैमिली प्लानिंग के लिए शायद फोर्सफुल हो जाए और उन्हें बच्चे ना हो पाए और क्योंकि ममता सरकार को यही चाहिए कि हिंदू खत्म हो जाए यहां से और मुसलमान बढ़ जाए तो ऐसी ऐसी तरीके की भाषा इस्तेमाल करने वाले आदमी को जब बीजेपी चीफ मिनिस्टर बनाती है तो इंप्युनिटी नहीं उसको उसको रिवॉर्ड दिया जाता है बुशरा और और और उसी का हिस्सा हम देख रहे हैं कि जब आप आपकी टॉप लीडरशिप देश की टॉप लीडरशिप ये सिग्नल करती है कि आप दो समाज के बीच में झगड़ा लगाकर आप दो समाज को कहीं ना कहीं उनके बीच में नफरत के के बीच बोकर आप आपको एक रिवॉर्ड दिया जाएगा। आपको एक बड़े पद पर बिठाया जाएगा। तो फिर आम जो साधारण कार्यकर्ता है उसको भी पता चल जाता है कि इस बीजेपी में और इस सरकार में और इस इस नए भारत में अगर हमें कोई महत्वपूर्ण पॉलिटिकल पोस्ट पे पहुंचना है तो उसका उसका रास्ता सिर्फ एक ही है कि वो है कि हिंदू मुसलमान में आप नफरत भी नफरत बोइए और आप उनमें झगड़ा लगाइए और हमें यही हर जगह दिखाई दे रहा है ना ही सिर्फ मीरा भयंदर में बट आसाम वेस्ट बंगाल और और देश के बहुत सारे अन्य राज्यों में जी बिल्कुल आप इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं और आपने बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट उठाया कि रिवॉर्ड और इसीलिए हम यह देख रहे हैं कि जबजब कोई ऐसा करता है या आप वैसे भी देख लें अगर बिलकिस बानू के रेपिस्ट जो है वो बाहर निकल कर आते हैं तो उनको कैसे फूल मालाओं से उनका स्वागत किया जाता है। कोई भी हिंदुत्ववादी अगर संगठन से जुड़ा हुआ कोई भी जो नफरत फैला रहा है या इवन खत्म करके भी अगर कोई गया है और वापस छूट कर आता है तो उसको किस तरह से स्वागत उसका किया जाता है बल्कि टिकट तक देकर उसे एमएलए, एमपी और मिनिस्टर तक बना दिया जाता है। तो ये तो एक एक सेट पैटर्न जो है वो बीजेपी ने बना दिया और खासतौर पे वो लोग जो अगर दूसरी पार्टी से आते हैं यानी कि वो आरएसएस से नहीं आए हैं या बीजेपी में इनिशियली नहीं थे किसी और पार्टी से आए तो उन्हें और ज्यादा अपने आप को प्रूफ करना पड़ता है कि वो कितने ज्यादा नफरत जो है वो फैला सकते हैं उसका कितना हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन एक सवाल जो इंपॉर्टेंट यहां पर है कुणाल वो ये कि एक तो यह है कि क्या इसको सिर्फ इस तरह से देखा जाए? क्या ये हिंदुत्ववादी संगठन है? यह कर रहे हैं और बीजेपी इनको प्रमोट कर रही है या एस अ सोसाइटी एस अ होल वो बदल चुकी है इन 12 सालों में क्योंकि अगर टीसीएस जैसी घटना को वो बिलीवेबल मान लेते हैं और यहां पर मैं जो लिबरल्स है उनकी भी बात करूंगी। उनको ऐसे क्यों लगने लगता है कि हां मुसलमान तो ऐसे हो सकते हैं। क्यों उनको नहीं लगता कि इस पर इन्वेस्टिगेट करने की जरूरत है या ये भी एक प्रोपेगेंडा हो सकता है। ये भी एक एक सियासत का एक हिस्सा हो सकता है कि ना सिर्फ एक यू नो गरीब मुसलमान ही नहीं बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर और कॉर्पोरेट्स में काम करने वाले भी अलग-अलग तरह का जिहाद करते हैं। सारे जिहादी हैं। इनका मकसद सिर्फ यही है कि देश को तोड़ना और यही करते रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि सोसाइटी को क्यों यह तमाम चीजें बिलीवेबल लगती हैं? और क्या इसको अगर हम सिर्फ हिंदुत्ववादी संगठन तक जोड़कर देखें तो क्या इसको कम नहीं आंक रहे हैं? क्या इंटेंसिटी को हम इसकी कम नहीं कर रहे हैं? देखिए पूरा आज हम जो माहौल रास्ते पर देख रहे हैं उस उस माहौल को बनाने के पीछे बहुत सालों की मेहनत लगी है हिंदुत्ववादी संगठनाओं से और मैं मेहनत को कोटेशन मार्क्स में मैं डालूंगा। लेकिन ये मेहनत इस तरह के लगी है कि आपको याद होगा जब 2014 में मोदी आए और हमें सब हम सबको एहसास होने लगा कि हम जो Facebook पर देख रहे थे जो धीरे-धीरे WhatsApp पर देखने लगे थे वो सारा बिल्कुल एक आईटी सेल का हिस्सा था। अह अब तो वह वह अब बहुत दूर की बात लगती है कि हमको WhatsApp पे छुपी-छुपाए मैसेज आते थे कि मुसलमान ऐसे हैं और वैसे हैं। क्योंकि आज तो खुलेआम हमारे पद प्रधानमंत्री से लेकर गृह मंत्री से लेकर अलग-अलग चीफ मिनिस्टर्स हमारे न्यूज़ एंकर्स ये सारी यही भाषा बोल रहे हैं। लेकिन वो जमाना अगर आपको याद हो दर्शकों को मैं वापस याद दिला दिलाना चाहूंगा कि उस जमाने में हमको WhatsApp पे मैसेजेस आया करते थे। Facebook पे कभी-कभी कोई पोस्ट कर देता था कि मुसलमान ऐसे होते हैं कि मुसलमान ये कर रहे हैं, मुसलमान वो कर रहे हैं। जब वो कैरेक्टराइजेशन बनाने की शुरुआत हुई थी जब वो प्रोपोगेंडा को स्प्रेड करने की बात जब हुई थी तब वो धीरे-धीरे करके अलग-अलग तरीके से वो प्रोपगेंडा लोगों तक पहुंचाया गया था। और उस प्रोपगेंडा को जैसे मैं कभी-कभी कहता हूं कि एक स्लो ड्रिपिंग टैप जो होता है नल को पूरा नहीं खोल दिया आपने। नल को धीरे-धीरे एक-एक बूंद गिरती गई। तो वो बूंद गिरतेगिरते कहीं ना कहीं लोगों के मन में वो वो आपने डालना शुरू कर दिया कि देखिए मुसलमान तो भाई आपका आपकी बेटी ले लेंगे। मुसलमान तो आपका घर ले लेंगे। देखिए वहां पे एक मुसलमान ने ऐसा कर दिया। देखिए यहां पे एक मुसलमान ने वैसा कर दिया। तो आपको धीरे-धीरे आपको कन्विंस किया गया कि मुसलमान देश के लिए और हिंदू समाज के लिए अच्छा नहीं है। जब ये जब ये कन्विंस होना लोग शुरू हो गए तो फिर आपने जो है समझ लीजिए कोविड में कोरोना जिहाद आपने देश के सामने रख दिया कि देखिए मुसलमान तो भाई ये कर रहे हैं। तो उनमें से कुछ लोग मान गए कुछ लोग नहीं माने। फिर आपने वापस वही का वही प्रोपेगेंडा शुरू रखा धीरे धीरे धीरे करके और उसमें मैं पॉप कल्चर को भी एक बड़ा हिस्सा मानूंगा कि आपने पॉप कल्चर से भी यही दर्शाया कि देखिए भाई हम जो कह रहे थे आपको WhatsApp पे अब तो आपके सिनेमा में आ रहा है कि कि केरला में देखिए लड़कियों को ले आया जा रहा है और लव जिहाद के नाम पे उनको टेररिस्ट बनाया जा रहा है वगैरह-वगैरह। तो ये सारा इसका सारा ये जो प्रोपोगेंडा था उसका असर ये हुआ कि जब आपके सामने मुसलमान आता है तो आपको उससे एक एक एक मनुष्य एक एक मनुष्य या एक फेलो ह्यूमन की तरह से नहीं देखना है उसको उसको आपको ऐसा देखना है कि वो एक हिंदू समाज को खतरा है और वो शायद आपके बेटी से बेटी को खतरा दे सकता है। आपके घर को खतरा दे सकता है। आपके परिवार को खतरा दे सकता है। तो इसका मतलब क्या हुआ? इसका मतलब ये हुआ कि जब आप देखते हैं कि कोई मुसलमान आपकी Uber टैक्सी चलाता है तो आपको आपको घृणा होने लगे कि नहीं भाई मैं मैं मुसलमान की Uber टैक्सी में नहीं जाऊंगा या फिर जब कोई मुसलमान आपके घर आके आपकी Zomato या Swiggy की डिलीवरी करे तो आपको ये लगे कि नहीं शायद इसने थूक दिया होगा। तो ये सारा एक एक एक लार्जर जो अटेमप्ट थी उसकी मैनिफेस्टेशन थी बुशरा और और और उसका जो कलेक्टिव उसका जो असर हुआ है वो ये है कि आज आपके सामने जब मुसलमान को मारा जा रहा है या फिर या फिर वो नमाज कहीं पढ़ लेता है तो जैसे कुछ महीनों पहले रमजान में हुआ था कि उत्तराखंड के एक एक खाली खेत पर एक बेचारा मुसलमान अपनी नमाज़ पढ़ रहा था। तो उसमें कोई चार पांच हिंदू आए और मोबाइल रिकॉर्डिंग करते-करते उसको तो इतना मारा गया उसको इतनी गाली दी गई और कहा गया कि तू यहां पर मैं तो ब्राह्मण हूं मेरे मेरे खेत पे कैसे नमाज़ कर सकता है। तो ये नॉर्मलाइज कर देना यही ये प्रोपेगेंडा का काम था कि आपके सामने जब ऐसी चीजें आए जैसे कल आई कि कोई कोई सूअर लेके आप समझ सकते हैं कितनी कितनी बुरी बात है कि आप सूअर लेके आप आप ये दिखाना चाहते हैं कि अगर आप बकरी लेके आ रहे हैं तो हम हिंदू हैं। हम सूअर लेके आएंगे। तो ये नॉर्मलाइज कर देना क्योंकि ये अगर 2012 या 10 या 13 तक में भी होता या 14 में भी होता तो हिंदू समाज का एक बड़ा हिस्सा ऐसा होता कि वो वो मतलब वो एकदम उस रिपल्स हो जाता वो उससे और वो ये कहता कि भाई ये क्या कर रहे हैं हम ऐसे नहीं है हिंदू ऐसे नहीं है हिंदू ऐसा नहीं कर सकते और हिंदू हिंदू धर्म जो है वो वो वो वो इसकी परमिशन आपको नहीं देता लेकिन आज 2026 में आपने 12 साल इतना काम किया है हिंदुत्ववादी संगठनाओं ने, भारतीय जनता पार्टी ने, उनके बड़े-बड़े नेताओं ने कि आज जब कोई हिंदू मुसलमान सोसाइटी के तरफ सूअर ले जा रहा है और वो सूअर छोड़ने की बात कर रहा है तो लोग उसको समर्थन दे रहे हैं और लोग कह रहे हैं कि भाई ये ठीक है। ये तो होना ही चाहिए। तो आपने डिस्कोर्स को ही आपने इतना चेंज कर दिया है कि आज आज इसमें लोग इसको कुछ गलत नहीं मानते। आज तो लोग कह रहे हैं कि भाई लेकिन कुर्बानी क्यों कर रहे हैं? तो आपने तो नॉर्मलाइज कर दिया है हेट। आप आप अब आप अब सवाल कुछ और कर रहे हैं। जबकि आपको सवाल ये करना चाहिए कि भाई अगर कुर्बानी से आपको कोई दिक्कत है तो क्या इसके कोई संवैधानिक फोरम्स नहीं है जहां ये बात डिस्कस हो पाए या जहां इसका हल निकल पाए? क्या बीजेपी के बड़े-बड़े नेताओं का काम यह है कि वो अलग-अलग सोसाइटीज में जाए और वहां के हिंदुओं को कहे कि आप ये मुसलमानों की बकरियों को निकालिए और जब तक ये बकरियां नहीं निकलती तब तक हम नहीं निकलेंगे। क्या ये किरट सोमैया जैसे किट सोमैया जैसे लोगों का काम है कि वो अलग-अलग सोसाइटी में सोसाइटीज में जाए और वो ये करें वो समाज के बीच आकर नफरत बोए। क्या उनका काम यह नहीं है कि वहां के मुसलमानों को एक साथ ले। वहां के हिंदुओं को एक साथ ले और दोनों को बिठाएं और उनमें सुलह करें। क्या हम भूल गए हैं? गवर्नेंस इसी को कहते हैं। गवर्नेंस ग्रीवियंस रेजोल्यूशन को कहते हैं। गवर्नेंस कॉन्फ्लिक्ट रेजोल्यूशन को कहते हैं। ना कि गवर्नेंस कॉन्फ्लिक्ट को बढ़ाना ना कि गवर्नेंस कॉन्फ्लिक्ट को पैदा करना। हम यही देख रहे हैं कि कि सत्ता में जो लोग हैं वो कॉन्फ्लिक्ट को पैदा कर रहे हैं। मुशरा। बिल्कुल कुणाल वो तो एक आप जो लास्ट अपना आपने अभी कहा कि वो तो एक आइडियल सिचुएशन है कि इस तरह से सोचा जाए कि एक सोसाइटी के एक हिस्से को दूसरी सोसाइटी के एक हिस्से से कोई प्रॉब्लम है तो आप सामने आप सामने बैठकर इसका सशन निकालें और सवाल ये भी है कि क्या सिर्फ कुर्बानी या या बकरे सिर्फ क्या सिर्फ बकरा ईद के दिन ही काटे जाते हैं। भाई सारे साल 364 दिन तो आप तमाम नॉनवेज वेजिटेरियन जो रेस्टोरेंट्स हैं तमाम जगहों पर यही सब परोसा जाता है। यही सब होता है तो एक दिन से आपको इतनी परेशानी है और इसके अलावा आप पश्चिम बंगाल से लेकर दूसरी तमाम जगहों पर आप ये देखें वहां तो कल्चरली हिंदू बलि देते हैं तो आपको उससे प्रॉब्लम नहीं है लेकिन सिर्फ यहां प्रॉब्लम सिर्फ एक है पहचान और इसके अलावा कोई प्रॉब्लम नहीं है। सिर्फ यही है कि उनको किस तरह से उनके हर त्यौहार पर यह बताया जाए कि यह जालिम लोग हैं। यह देखिए किस तरह से यह सब कुछ करते हैं। यह इंसान कहलाने के लायक ही नहीं है। इस तरह से सिचुएशन को पैदा कर देना और जो सूअर वाली बात है वह सिर्फ यहीं से नहीं है। आप दिल्ली की एक सोसाइटी है। बाकायदा तौर पर यहां पर आपने वो खबर देखी होगी बाकायदा तौर पर यहां पर वो सूअर पाले गए और यह कहा गया कि ये तो हमारे शायद भगवान का कोई रूप है और घरों में बेडरूम्स में उनको रखा गया ताकि मुसलमानों को सोसाइटी से भगाया जा सके। तो हर रोज जो हम यह देख रहे हैं कि एक चीज हो गई। अब इसको लग रहा है कि इसका नॉर्मलाइजेशन हो गया। यहां अब कुछ और ऐसा और घिनौना या और खतरनाक कुछ लाया जाए तो मुझे लग रहा है पिक्चर में सूअर आ गए हैं। मेरा सवाल लेकिन यह है कुणाल आपसे क्योंकि आपने हिंदुत्व पॉप नाम की ये किताब लिखी है। मुझे लगता है कि हर किसी को उसको पढ़ना चाहिए टू अंडरस्टैंड कि कैसे इस कल्चर के जरिए हिंदुत्व को नॉर्मलाइज गानों उन सब के जरिए जो है वो किया जा रहा है। क्योंकि मैं इसको इसलिए लाना चाहती हूं कि जब भी हम कोई हिंदुओं का जो त्यौहार देखते हैं चाहे रामनवमी हो, गणेश उत्सव हो या इस तरह के अभी तो होली पर भी यह सब कुछ होने लगा है कि आप किसी भी मस्जिद के सामने आप खड़े होते हैं। जोर-जोर से आप वही आपत्तिजनक उसी तरह के गाने बजाते हैं और आपको लगता है कि इसी तरीके से आप त्यौहार मना सकते हैं। आप तलवारें लहराते हैं। आप यह सब कुछ करते हैं। और अब तो इसमें छोटे-छोटे बच्चों और लड़कियों तक की एंट्री हो गई है कि वो अजीब अजीब तरह के तरह के इशारे कर कर उन गानों पर डांस करके अपने आप को आई डोंट नो क्या उनको सेटिस्फेक्शन मिलता है। आई आई फेल टू अंडरस्टैंड। आप इसको कैसे देख रहे हैं कि हिंदुओं के त्यौहार मुसलमानों के लिए थ्रेट बना दिए गए हैं और मुसलमानों के त्यौहार लॉ एंड ऑर्डर की प्रॉब्लम हुए हैं। यह क्रिएट कर दिया गया है। चाहे फिर वो कोई भी त्यौहार हो। जी बिल्कुल जैसे मैंने जैसे मैंने कहा मुशरा विजिबलाइजेशन खत्म कर देना हर चीज में। टीसीएस में भी अगर आप देखें तो तो लव जिहाद तो एक मामला निकल गया कि भाई ये देखिए कैसे करते हैं लव जिहाद वगैरह। लेकिन इससे जो एक एक चीज जो हमने शायद यह सारे डिबेट में मिस कर दी थी टीसीएस वाले मामले में वो यह था और उसका अंडरलाइन मैसेज जो जो मैं समझ रहा हूं जो हिंदुत्व संगठनाएं अपना जो ऑनलाइन प्रोपगेंडा चलाती है उसमें एक एक बहुत बड़ा मैसेज ये था कि देखिए मुसलमान चाहे कितना ही पढ़ा लिखा हो अगर वो कॉर्पोरेट स्पेस में भी आ जाता है अगर वो अपने मस्जिद से बाहर निकल के कॉर्पोरेट स्पेस में भी आ जाता है तो भी वो यही करेगा तो क्या अभी भी आपको मुसलमान को हायर करना है? तो उससे आपने किया क्या? उससे आपने मुसलमान जो एजुकेटेड मुसलमान है उसकी विजिबिलिटी आपने आपने वहां से भी कम करने की कोशिश शुरू कर दी है। आपने एक मैसेज दे दिया है कि देखिए सबसे देश की सबसे बड़ी यू नो वन ऑफ़ द बिगेस्ट कंपनीज़ इन द वर्ल्ड एंड वन ऑफ़ द बिगेस्ट आईटी फर्म्स इन द इन द इन द कंट्री। अ ऐसी कंपनी में भी अगर आप उनको जॉब दे दे तो फिर भी वो लोग यही करेंगे। तो क्या आगे से भी आप उनको जॉब देना चाहेंगे और ये मेरे बहुत सारे मेरे मेरे मुसलमान जो दोस्त हैं मेरे जो पहचान वाले हैं उन्होंने मुझे आके ये कहा भी है और ये शायद आपने भी एज अ जर्नलिस्ट आपने ये शायद नोट किया होगा कि ऑलरेडी हम देख रहे हैं कि मुसलमानों पे एक एक एक अनसेट डिस्क्रिमिनेशन जॉब्स में आता ही है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनको जॉब्स नहीं मिल पाती। तो जब टीसीएस वाला मामला हो जाता है तो वो जो जो रिप्रेजेंटेशन मिल रही है वो भी कम हो जाती है। तो हर हर स्फीयर में चाहे वो पब्लिक स्फीयर हो चाहे वो आपको याद होगा कुछ साल पहले यूपीएससी जिहाद कि यूपीएससी में मुसलमान बच्चे इतने ज्यादा क्यों आ रहे हैं? आपको कुछ समय पहले ये भी याद होगा कि कि जम्मू एंड कश्मीर में एक एक मेडिकल कॉलेज थी जहां बहुत सारे मुसलमान बच्चे थे और हिंदू बच्चे कम थे। तो उस कॉलेज में जाके हिंदुत्ववादी संगठनाओं ने वो कॉलेज बंद करा दिया कि भाई यहां तो बहुत ज्यादा मुसलमान बच्चे हो गए। तो आपको वहां से भी मुसलमान बच्चों का भी रिप्रेजेंटेशन कम कर देना है। तो हर स्फयर में नो मैटर व्हाट द स्फीयर इज दी आईडिया इज कि आप जितना हो सके उतना मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन और विज़िबिलिटी को कम कर दीजिए। और जैसा मैंने कहा फेस्टिवल्स सोशल स्फीयर में और पब्लिक स्फीयर में फेस्टिवल्स एक बहुत बड़ा मौका है जिसमें आप मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन और उनकी विजिबिलिटी को खत्म कर सकते हैं और आप एक बहुत खुला मैसेज दे सकते हैं कि यह देश हिंदुओं का है और अब आपको हम बताएंगे कि आपका फेस्टिवल आप कैसे सेलिब्रेट करोगे। एक तो यह है। दूसरी बात यह होती है कि आप जो जो बंबई में हो रहा है बकरी ईद में अलग-अलग सोसाइटीज में जाके बीजेपी के नेता किरिट्स सोमेया जैसे लोग अलग-अलग सोसाइटीज में कह रहे हैं कि यहां बकरी आपने कैसे रखी है इनको निकालिए। बहुत सारे ऐसे सोसाइटीज है जैसे घाटकोपर नाम का एक इलाका है। आज किरट सोमैया और अन्य बीजेपी के नेताएं वहां गए हैं और वहां पे एक एक सोसाइटी में बकरी रखी गई थी मुसलमान समाज के ओर से और उन बकरियों को निकाला गया आज। अब वहां के जो लोकल्स हैं जो टीवी इंटरव्यूज दे रहे हैं वो कह रहे हैं कि ये प्रथा 1997 से चली आ रही है। तो आपने लगभग 30 साल से जो प्रथा चली आ रही थी आपने सडनली जाके वो प्रथा खत्म कर दी और आपने वहां पे एक बीज बो दिया कि भाई मुसलमान ये कैसा कर कैसे कर सकते हैं यहां। तो आप ये कर रहे हैं कि हिंदू और मुसलमान में जो सिंक्रेटिक ट्रेडिशंस थे लोकली है ना नेशनली तो नहीं लेकिन लोकली जो एरियाज और कम्युनिटीज थी जहां दोनों समाज साथ में रहते थे वहां से भी उनका जो बॉन्ड था उनकी जो ट्रेडिशंस थे उनके सिंक्रेटिसिज्म था वो खत्म कर दिया आपने तो ये एक बहुत एक एक अंडरलाइनिंग एक थोड़ा सा इसको हमें रीट्रेट करना जरूरी है कि सिंक्रेटिक ट्रेडिशन को खत्म करना और जो कम्युनिटी स्पिरिट था दोनों में एक एक हार्मोनी थी कोिस्टेंस था उसको खत्म करना वो फेस्टिवल्स को टारगेट करने से ही होता है पुशरा और इसीलिए फेस्टिवल्स को टारगेट करना बहुत जरूरी हो जाता है। मैं अक्सर कहीं जैसे मैं महाराष्ट्र में कहीं गांव में घुमा हूं। अलग-अलग देश के अलग-अलग गांव में घुमा हूं। वहां वहां ईद पे भी ये ट्रेडिशनंस होते हैं कि दोनों समाज साथ में आए। वहां होली में दिवाली में भी अलग-अलग दोनों समाज साथ में आते हैं। तो ये कोिस्टेंस को खत्म करना एक बहुत बड़ा हिस्सा है हिंदुत्व का। क्योंकि जब तक ये को एक्जिस्टेंस खत्म नहीं होगा तब तक आपका प्रोपेगेंडा कोई खरीदेगा नहीं। आपका प्रोपेगेंडा कोई मानेगा नहीं। क्योंकि अगर आप मुसलमानों के आसपास रह रहे हैं। अगर आप हिंदू हैं, मुसलमानों के साथ हैं मगर आप मुसलमान हैं, हिंदुओं के साथ हैं। अगर आप एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो आप देखेंगे कि भ ये मेरे लिए खतरा कैसे है? जो जिनके साथ मैं पला बढ़ा, जिनके साथ मैंने बचपन बिताया, स्कूल गया, कॉलेज गया, मेरे अच्छे दोस्त हैं वो आज सडनली खतरा कैसे बन जाते हैं? तो आप वो प्रोपेगेंडा नहीं मानेंगे और वो प्रोपेगेंडा मनवाने के लिए आपका कोएस्टेंस मुसलमानों के साथ और मुसलमानों का हिंदुओं के साथ खत्म करना बहुत जरूरी है अनुशा और इसीलिए दोनों दोनों समाज के फेस्टिवल्स को टारगेट किया जाता है ताकि ये डीपनिंग पोलराइजेशन थोड़ा सा और डीपन हो जाए। बिल्कुल आप इंपॉर्टेंट बात कर रहे हैं क्योंकि त्यौहार जो है आपके इमोशंस से भी बहुत ज्यादा जुड़े होते हैं और आप सब लोग एक साथ किसी एक चीज को पूरा चाहे कोई भी समाज का कोई भी 100 हिंदू या मुसलमान वो एक साथ मना रहे होते हैं अपने-अपने त्यौहारों को तो जाहिर सी बात है कि सेंटीमेंट्स जो हैं वो बहुत हाई होते हैं और खासतौर पे कुर्बानी का त्यौहार हज के इर्द-गिर्द होता है। तो मुसलमानों के लिए इट इज वेरी वेरी सेंटीमेंटल आल्सो कि वो कुर्बानी का एक पूरा उनका जज्बा है और हज हो रहा होता है उस वक्त में सब कुछ। लेकिन मैं पश्चिम बंगाल के लिए लास्ट टू थ्री क्वेश्चंस मेरे पास आपके लिए कुणाल मैं पश्चिम बंगाल में देख रही थी कि पश्चिम बंगाल में जाहिर सी बात है कि गौकशी जो है वो वहां पर इललीगल नहीं थी और हमेशा से वो होती रही। 1950 का एक कानून वहां पर लाया जाता है। नए नियम लागू किए जाते हैं बीजेपी की सरकार बनने के बाद और यह कहा जाता है कि 14 साल तक की जो गाय हैं वो तो शायद उनके लिए गौ माता है लेकिन 14 साल के बाद यानी कि जब वो दूध देना बंद कर दें या बीमार हो जाए या अपाहिज हो जाए तो फिर उनको उनकी उनको काटा जा सकता है या उनको इस तरह से सेल ऑफ किया जा सकता है। तो एक तो यह हिपोक्रेसी दिखाता है कि क्या पूरे हिंदू समाज को यह नजर नहीं आता। ये तो ऐसे हो गया कि आप अपने मां-बाप को एक एक स्टेज तक इस्तेमाल करने के लिए रख रहे हैं और फिर उसके बाद आप उनसे कह रहे हैं कि भाई अब आप हमारे किसी काम के नहीं है। अब आप जाइए क्योंकि आप माता का दर्जा उनको दे रहे हैं। लेकिन मुसलमानों ने डिसाइड किया कि वो नहीं खरीदने जा रहे हैं काऊ और यह एक तरह का पूरा एक मैसेजिंग भी दी गई कि तमाम जो अलग-अलग इस्लामिक इंस्टीटशंस हैं उनकी तरफ से कहा गया ऑर्गेनाइजेशन की तरफ से कि आप काऊ को आप राष्ट्रीय पशु आप आप घोषित कर दीजिए और हम आपके साथ हैं। बार-बार यह मांग की गई। मैं मेरा सवाल आपसे यह है कि आखिर इस तरह के मुश्किल सिचुएशंस में या ये लगातार जो हेट है अलग-अलग तरीके से अलग-अलग तरह से जो अब मुसलमानों के बिल्कुल सर पर आ गए और हर तबके के लिए आ गई है। अगर वो इस तरह से अपनी एक मैसेजिंग दे भी रहे हैं। एक बड़ा मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं। अगर उसके बाद भी यह कहीं से कम नहीं हो रही है। बल्कि दूसरी चीजें लाकर आप उसको और बढ़ावा दे रहे हैं। मैं बार-बार यह पूछती हूं क्योंकि लोग कहते हैं कि आप तो रोना-धोना करती रहती हैं। यह तो विक्टिमहुड है, विक्टिमाइजेशन है। यह तो आप इस तरह से ही करती रहती हैं। होगा क्या? तो मैं आपसे पूछना चाहती हूं कुणाल दैट यू हैव कवर्ड फॉर लास्ट टू डिकेड्स। आप ये तमाम इश्यूज को आप कवर कर रहे हैं। 12 साल में तो सिचुएशन बिल्कुल बदल गई है। आप क्या देख रहे हैं कि आखिर क्या स्ट्रेटजी फिर होनी चाहिए? मुसलमानों को मुसलमान भी और फिर हिंदू भी आखिर क्या करें? देखिए एक तो दूसरा मैं यह बहुत फर्मली मानता हूं कि हिंदू समाज को आगे आके बोलना चाहिए कि क्या यह आपका धर्म है कि क्या आपको हिंदू धर्म में यह बताया गया है कि ऐसे एक एक समाज को आप आप डेनिगेट करिए उनको टारगेट करिए ऐसी भाषा यूज़ करिए ये हिंदू समाज में और हिंदू धर्म में तो नहीं बताया गया है तो तो जो जो धार्मिक हिंदू हैं जिनको पता है कि हिंदू धर्म में यह नहीं होता उनको आगे आके बोलना चाहिए कि यह हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं है। आपको अपनी राजनीति करनी है, करिए आप लेकिन इसको हिंदू धर्म का नाम मत दीजिए आप। तो यह बताना बहुत जरूरी है। लेकिन अनफॉर्चूनेट बात यह है कि हिंदू धर्म के लोग भी और जो हिंदू धर्म को मानते हैं जो हिंदू धर्म को मैं तो ये कहूंगा कि हिंदू धर्म में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो धर्म का काम करते हैं उन लोगों को बाहर आके कहना चाहिए कि भाई ये हमारा धर्म नहीं है। जो कुछ लोगों ने कहा भी है मैं ये नहीं कहता कि किसी ने नहीं कहा। लेकिन और लोगों को आके ये कहना चाहिए कि हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं हो सकता। जो ऐसे लोग हैं जो धर्म का काम करते हैं। शायद वो अगर कहने लगे तो लोगों के दिमाग में और उनके सोच में शायद एक बदलाव आए। क्योंकि क्योंकि जहर इतनी इतनी इतनी बारीकी से घोला गया है कि उसको मिटाना बहुत बहुत मुश्किल होगा जब तक पूरा समाज साथ में ना आए और वो आज हमें होते नहीं देख दिखाई दे रहा है। दूसरी बात यह है कि देखिए जैसे जैसे-जैसे इकोनॉमिक हार्डशिप और डिस्ट्रेस बढ़ता जाएगा देश में वैसे वैसे अलग-अलग अटेमप्ट्स किए जाएंगे आपको डिस्ट्रैक्ट करने के लिए आपको बताने के लिए कि असल में जो आपका आपकी जो महंगाई है आपको जो काम नहीं मिल पा रहा है आपके जो रिसोर्स आपके पास नहीं आ रहे उसका उसका उसकी अगर रिस्पांसिबिलिटी कोई लेता है तो वो मुसलमान को लेनी चाहिए क्योंकि वो आपकी रिस्पस वो आपकी रिसोर्सेज खा रहा है। यह रेटरिक हमने ऑलरेडी देखना शुरू कर दिया है। कुछ-कुछ इलेक्शंस में अगर आप देखिए पिछले कुछ डेढ़ दो साल में जो इलेक्शंस हुए हैं उसमें बार-बार ये कहा जा रहा है कि देखिए बाहर के लोग आ रहे हैं। आपकी आपकी जमीन ले जा रहे हैं। आपकी आपका काम आपका राशन आपके रिसोर्सेज सारा कुछ लेके जा रहे हैं। तो ये ये लेटर एक वही है कि देखिए आपको नहीं मिल रहा है क्योंकि ये लोग आके आपका आपका सारा कुछ जो जो आपको ड्यू है वो लेके जा रहे हैं। तो ये हम देखेंगे कि इन द फ्यूचर ये लेटर और भी बढ़ेगा क्योंकि ऑलरेडी हम देख रहे हैं महंगाई बढ़ गई है। ऑलरेडी हम देख रहे हैं कि देश का युवा जो है वो बहुत परेशान है। उसको उसको ना तो उसकी पेपर्स ठीक से हो रहे हैं। ना तो पेपर्स होने के बाद उसको जॉब मिल रहा है। ना तो सरकार अब जॉब्स दे पा रही है, ना तो प्राइवेट इंडस्ट्री जॉब दे पा रही है। तो तो फाइनली आप किसको ब्लेम करेंगे इस सारी चीज़ के लिए? और सरकार ही आपको कह रही है कि भाई हमें ब्लेम मत करिए, मुसलमान को ब्लेम करिए आप। तो ये अटेमप्ट पोलराइजेशन की और बढ़ने वाली है। और और जैसे हमने देखा है ये सिर्फ कोई फ्रिंज एलिमेंट्स तो है नहीं। ये तो अब सरकार में बैठे हुए लोग आपको कह रहे हैं कि भाई देखिए बाहर से लोग आ रहे हैं और आपका आपका सारा कुछ ले जा रहे हैं। तो तो ये सारी अटेम्प्ट्स बढ़ेंगी। इसीलिए हिंदू समाज को, मुसलमान समाज को चौकन्ना रहना बहुत जरूरी है। इसीलिए हमें हमारे जो मूलभूत सवाल हैं उनको पूछना बहुत जरूरी है। क्योंकि जब तक हम सवाल नहीं पूछेंगे तब तक हमें डिस्ट्रैक्ट करते रहेंगे सत्ता में बैठे हुए लोग और वही होते आ रहा है। बिल्कुल सवाल पूछने वाले तो वैसे भी एंटी नेशनल हैं। तो आप और हम दोनों जाहिर सी बात है उसी कैटेगरी में आते हैं। लेकिन छोटी-छोटी चीजें मैं अभी फिलहाल देख रही हूं कि किस तरह से बदल रही हैं। अभी एक इंसिडेंट है मुजफ्फरनगर का। वहां पर एक एक ब्लॉगर फूड ब्लॉगर वो जाकर एक नॉनवेज की एक रेस्टोरेंट है उसको कवर करने के लिए जाता है और वो बीच में जो भी उसके रास्ते में आ रहा है उसको कवर कर रहा है। बीच में एक मंदिर है और उसमें वो तिरंगा और वहां पर कुछ झड़ियां इस तरह से लगी हुई है। वो उसकी भी कुछ सेकंड की यू नो क्लिप बना लेता है और उसमें वो नॉन नॉनवेज रेस्टोरेंट जो है उसको भी वो दिखा रहा है। उस पर आप यह सोचिए कि हिंदुत्ववादी संगठन जो हैं उन्होंने कंप्लेंट की कि हमारी धार्मिक भावनाएं जो हैं वह आहत हो गई। उस शख्स ने उस ब्लॉगर ने माफी मांगी कि मुझे वो तिरंगा दिखता हुआ जो हमारी देश की शान है मुझे बहुत अच्छा लग रहा था। मैंने उसको कैप्चर कर लिया। अगर ऐसी गलती हो गई तो मुझे आप माफ कर दीजिए। लेकिन हुआ क्या? उसके ऊपर बीएनएस 170 इफ आई एम नॉट रोंग उसके ऊपर लगा दिया गया। शांति भंग करने का आरोप उस पर लगाकर उसको जेल में डाल दिया गया। आप सोचिए कि मतलब कहां आकर खड़े हो गए हैं हम लोग कि इतनी इतनी चीजों पर किसी मुसलमान को आप जेल में डाल दे रहे हैं तो आप कितनी पावर इन जैसे लुच्चे लफंगों और गुंडों को आप दे रहे हैं और खुलेआम यह सब कुछ कर रहे हैं। तो यह मेरा सवाल यह है कि इसकी तो कोई एक्सट्रीम नजर ही नहीं आ रही है मुझे कुणाल और यह चिंता आप भी दर्शा रहे हैं कि इट्स गोइंग टू इनक्रीज क्योंकि अभी मैं देख रही थी पश्चिम बंगाल में उन्होंने शिवेंदु अधिकारी कह रहे हैं जल्दी-जल्दी यहां से भागो और 24 परगना और मालदा के बीच में उन्होंने रोहिंग्या और बांग्लादेशी कहकर गरीब मुसलमानों को वहां पर बिठाया हुआ है। बांग्लादेश कह रहा है यह हमारे नहीं है। और यहां पर उन्हें एक्सेप्ट नहीं किया जा रहा है। मैं मेरा सवाल यही है कि और फिर अमित शाह कह रहे हैं कि डेमोग्राफी बदल रही है तो वह उन्होंने एक नई कमेटी जो है वह बनाई है। तो डू यू डू यू सी दिस इज़ एन नेवर एंडिंग प्रोसेस वन थिंग विल सबसाइड द अनदर थिंग यू नो वो उभर जाएगी और ये ऐसे ही चलता रहेगा। तो फिर आखिर आखिर होना क्या है? सत्ता का में बदलाव ही एक रास्ता है और वो एसआईआर इलेक्शन एजेंसीज उन सबको कैप्चर करके उस को भी कैप्चर कर लिया गया है बीजेपी की तरफ से। देखिए बुष जैसे मैंने कहा हिंदुत्व तभी कामयाब हो पाएगा जब वो अपने आप को अपने कार्डर को अपनी संगठनाओं को एक कॉन्सेंट स्टेट ऑफ़ मोबिलाइजेशन में रखें। और वो कास्टेंट स्टेट ऑफ मोबिलाइजेशन में रखना बहुत मुश्किल है। क्योंकि कहां है ऐसे इशूज़ और कितने इशूज़ आपको मिलेंगे ऐसे कि आप कास्टेंटली आप बस हिंदू और मुसलमानों के बीच में आप बिल्कुल जो है पोलराइज कर रहे हैं लोगों को वगैरह-वगैरह। तो आपकोकि ये इशूज़ नहीं मिलेंगे। आपको इन्वेंट करने पड़ेंगे वो इशूज़। और आपको ढूंढ-ढूंढ कर हर चीज पे एक मजहबी रंग देना पड़ेगा हर चीज को। अगर यही चीज जो फूड ब्लॉगर की आप बात कर रहे हैं अगर वही चीज कोई हिंदू फूड ब्लॉगर करता तो क्या उसका हशर ये होता? उसका नहीं होता ये। ये इसीलिए हो रहा है क्योंकि वो मुसलमान है और उसने उसने उसने वो शॉट दिया और उसके बाद वो जाके मटन या चिकन खा रहा है। तो ये उसी वजह से हुआ है क्योंकि वो मुसलमान है। इसीलिए उनको एक एक मौका मिल गया अपने आप को मोबिलाइज करने का और अपने लोगों को मोबिलाइज करने का। क्योंकि हिंदुत्ववादी जो संगठनाएं हैं वो जानती हैं कि अगर आप लोगों को मोबिलाइज नहीं रखते तो आज के जमाने में लोगों का अटेंशन स्पैन इतना कम है कि वो कोई और कोई और और इशू में और और वो महंगाई के सब्जेक्ट पे या फिर फिर जॉब्स के सब्जेक्ट पे वो सवाल पूछने लगेंगे। तो आपको चाहिए कि वो उस पर सवाल ना पूछे। आपको चाहिए कि वो सवाल इसी पे पूछे कि भाई अब मुसलमान अभी भी मेरे सामने क्यों दिख रहा है? और उसको उसको आप आप उसको बकरी ईद में कुर्बानी क्यों देने दे रहे हैं? वो लव जिहाद क्यों कर रहा है? तो आपको बस इसी टाइप के सवाल पूछवाने हैं लोगों से। तो आप उनको अपने अपने कार्डर के थ्रू अपना जो प्रोपगेंडा मशीनरी है उसके थ्रू आप यही सारे विषय आप उनको दिखाते जाइए। मैं आपको एक छोटा एग्जांपल देता हूं जो मीरा भयांदर की हम लोग बात कर रहे हैं। आज उसी मीरा भयंदर में कुछ ही दिन पहले एक एक मसला हुआ। ऐसा हुआ कि एक एक मुसलमान आदमी और एक हिंदू आदमी के बीच में एक डिस्प्यूट हो गया था। अब वो हिंदू आदमी की दुकान थी वो मुसलमान आदमी ने उसको शायद उसको उस पे रेंट पे दी थी। उनका कोई डिस्प्यूट था वो खाली नहीं कर रहा था। तो पुलिस आई और और वो हिंदू आदमी को और मुसलमान आदमी के साथ बात-वात हुई। उनका कोई रेजोल्यूशन हुआ नहीं हुआ पता नहीं। बीच में आई बजरंग दल और वीएचपी और वो लोग पहुंच गए वहां कैमरा के साथ और पुलिस के साथ और उन्होंने सारा कुछ रिकॉर्ड कर दिया और उन्होंने यह दिखाया कि ये दो आदमी में डिस्प्यूट नहीं है। ये देखिए मुसलमान जिहादी हिंदुओं का हिंदुओं की दुकान लेके बैठ गया था और पुलिस ने भी कुछ नहीं किया और हम अब आए हैं और हमने इनका इनकी दुकान छुड़वाई है। तो फिर उन्होंने वो सारा वीडियो रिकॉर्ड किया और अंत में जो हिंदू आदमी है उससे ये उन्होंने एक वीडियो रिकॉर्डिंग में ले लिया कि मेरी दुकान मुझे वापस नहीं मिल रही ये मुसलमान ने ले ली थी मेरी दुकान और अब वीएसपी और बजरंग दल ने मुझे मेरी दुकान वापस दे दी है। तो आपने देखा कि एक एक जो लोकल डिस्प्यूट है जो बहुत डोमेस्टिक और बहुत साधारण डिस्प्यूट था उसको आपने एक मजहबी रंग दे दिया और उसको कह दिया कि देखिए वो तो जिहादी आदमी है जिसने इसकी दुकान ले ली है। तो क्या क्या ऐसे लोग नहीं होंगे हिंदू समाज में जो किसी दूसरे की दुकान पे शायद वो कब्जा करके बैठे होंगे या फिर डिस्प्यूट में होंगे। क्या सिर्फ ये मुसलमान लोग करते हैं? लेकिन आपने मैसेज वही दिया कि ये मुसलमान जिहादी था और ये जिहाद कर रहा था लैंड जिहाद। तो आपने उसको लैंड जिहाद का टैग दे दिया। तो यही मैं कहना चाहता हूं कि इसी प्रकार से जो है मोबिलाइजेशन होती रहेगी क्योंकि इशूज़ कम पड़ रहे हैं हिंदुत्ववादी संगठनाओं को। तो हर इशू में मजहबी रंग देना, हर इशू में लोगों को मोबिलाइज करना और उनको ये कहलवाना कि देखिए हिंदू खतरे में है और मैं आपको रोज एक एग्जांपल दूंगा। तो अगर आप वो प्रोपेगेंडा कंज्यूम करते हैं जो देश का बहुत एक बड़ा हिस्सा कंज्यूम करता है। आप आप मान लेंगे कि हिंदू सचमुच में खतरे में है और मुसलमान हिंदू के लिए खतरा बन गया है और ये हिंदुत्व की जीत है जब आप ये मानना शुरू कर देते हैं और ये उनको मनवाना बहुत जरूरी है पुष्पा। जी बिल्कुल वेरी क्विकली 30 सेकंड में मेरा लास्ट क्वेश्चन क्या आपको ये लग रहा है कि खासतौर पर मुसलमानों के हवाले से मैं बात कर रही हूं कि जब इस तरह के कि मसले उनके सामने आए जो कि हर रोज आ रहे हैं। हर घंटे हर मिनट आ रहे हैं। अलग-अलग तरीके से आ रहे हैं। आप सोशल मीडिया स्क्रॉल करिए तो लगता है कि बंद कर कर आप बैठ जाइए। और लेकिन इसका नॉर्मलाइजेशन भी बहुत ज्यादा हो गया है कि जब पहला इंसिडेंट हुआ अखलाक का तो हमने देखा कि उसको लेकर प्रोटेस्ट हुए। सब लोगों ने उस पर बात की और बहुत ह्यू क्राई था। पॉलिटिशियंस भी जाकर मिलकर आए। लेकिन उसके बाद अब तो अखलाक की लाइन लग गई है। तो वो इतना नॉर्मल हो गया है। बिल्कुल वैसे ही जैसे हम गजा की बात करते हैं कि जब कुछ दिन तक वो हो रहा था तो आपको वो वीडियोस देखना बर्दाश्त नहीं होता था। और फिर शायद अब आप स्क्रोल करते हैं। ओ हो हो हो करते हैं और आप बंद करके उनको रख देते हैं। आई थिंक सेम इज हैपनिंग विद यू नो मुस्लिम्स इन इंडिया कि इतने ज्यादा हो रहे हैं कि आप वो एक हेडलाइन भी नहीं बन पाते। एक एक किसी की मौत एक हेडलाइन भी नहीं बनती है। प्रोपगेंडा की ये जीत है और मैं यही कहता हूं इसीलिए कहता हूं कि प्रोपगेंडा जब आप स्टडी करेंगे और आप देखेंगे कि आप बार-बार ये कह रहे थे कि ये मुसलमान जो है वो आपको खतरा है। आपके लिए खतरा है। आपकी बेटी के लिए खतरा है। आपके समाज के लिए आपके घर के लिए आपके गांव के लिए खतरा है। तो आपने उसी खतरे को बार-बार दर्शाया है। तो उसका मतलब क्या हुआ कि जब आप देखते हैं मुसलमान किसी मुसलमान को मारा जा रहा है या मुसलमान को गाली दे रहे हैं या फिर मुसलमान को हरा सांप और अलग-अलग टाइप की गाली दी जा रही है नेताओं से तो आप कहेंगे कि ठीक है मतलब यही तो बताया गया था कि ये खतरा है तो अच्छी बात है कि इनको मारा जा रहा है और अच्छी बात है कि इनको गाली दी जा रही है तो ये जो है ये ये प्रोपेगेंडा की जो पूरी आर्क है पूरी जर्नी है उसका कलमिनेशन है ये घुसना क्या आपको लगता है मुसलमानों को वोकैबलरी और आर्टिक ुलेशन उनको देने की जरूरत है कि आप ऐसी सिचुएशन में किस तरह से रिएक्ट करें, एक्ट करें, क्या कहें पीसफुल तरीके से कॉन्स्टिट्यूशनली आपको क्या करना चाहिए? क्या आपको लगता है कि इस पर मिलकर सिविल सोसाइटी और दूसरे लोगों को काम करने की जरूरत है और उनको यह बताने की जरूरत है क्योंकि समटाइ्स यू नो आई सी आई फेल टू अंडरस्टैंड भी और इसके अलावा भी मैं देखती हूं कि कुछ चीजों पर वो बात करना चाहते हैं कहना चाहते हैं मे बी वो जुबान या किस तरह से उस पर रिएक्ट करें ताकि वो किसी मुश्किल में ना फंसे तो क्या आपको लगता है इस पर भी काम करने की जरूरत है लास्ट क्वेश्चन मेरा आपसे नहीं बिल्कुल आई थिंक आई थिंक देखिए मैं जैसे देखता हूं हूं इस इस इशू को। आई थिंक मुसलमान समाज ने काफी पेशेंस से पिछले 12 साल निकाले हैं। हमने ऐसे बहुत सारे ओकेजन नहीं देखे जहां जहां उनका प्रोटेस्ट वायलेंट हो गया हो या या उनके प्रोटेस्ट के बाद वायलेंस हुआ हो। तो वो बिल्कुल कुछ ऐसे कुछ ऐसे इश्यूज होंगे। कुछ ऐसे इंसिडेंट्स होंगे जहां ये हुआ हो। लेकिन ओवरऑल अगर आप देखें तो तो ज्यादा करके जो उनके प्रोटेस्ट थे या तो वो खत्म हो गए हैं या तो वो प्रोटेस्ट ही नहीं करते। और वह भी एक एक टाइप का साइलेंट प्रोटेस्ट है या तो फिर उन्होंने जहां-जहां प्रोटेस्ट किया है वो वो काफी संयम से उन्होंने किया है। एक तो यह है कि मुसलमान समाज से आर्टिकुलेशन जैसे आपने कहा बिल्कुल होना चाहिए और समाज के युवा समाज के लोग ऐसे जो जो बाकी समाज से बात कर सके जो उनको डायलॉग कर कर समझा सके क्योंकि ऐसा है कि देखिए न्यूज़ मीडिया में भी जो लोगों को वो लेके आते हैं मुसलमान समाज को रिप्रेजेंट करने वो भी ऐसे लोग होते हैं जो बहुत ज्यादा हॉट एडेड होते हैं और जो भाषा वही बोलते हैं जो हिंदुत्व समाज के लोग बोलते हैं तो कहीं ना कहीं वो टीआरपी के लिए वो एक-एक एक-एक अपनी भाषा बोल रहे हैं तो उन जैसे लोगों को को अपना नुमाइंदा ना बना के सेंसिबल लोग अगर आर्टिकुलेशन कर पाए जैसा आप कह रहे हैं वो एक और दूसरा सिविल सोसाइटी को ये करने की जरूरत है कि दोनों समाज को एक साथ बिठाने की और ये सारे जो सारे जो डिफरेंसेस हैं उसको एक साथ कैसे मिटाया जाए उस उस पर चर्चा करने की बहुत ज्यादा जरूरत है क्योंकि आज वो स्पेस बिल्कुल खत्म हो गया है और वो स्पेस पूरा हिंदुत्ववादी संगठनाओं ने ले लिया है जो डायलॉग नहीं चाहती जो कंफ्रंटेशन चाहती है तो अगर आपको वो स्पेस उनके लिए खत्म करना करना है तो आपको डायलॉग के तरफ दोनों समाज को लेके जाना बहुत जरूरी है। जी बिल्कुल बहुत-बहुत शुक्रिया कुणाल आपका इतना वक्त आपने दिया और आई एम श्योर इस प्रोग्राम के इस कार्यक्रम के जरिए बहुत सारे लोगों को बहुत कुछ समझ में आया होगा। थैंक यू सो मच फॉर योर वैलेबल टाइम। थैंक यू। थैंक यू सो मच पुष्पा।

Companion article

A moving target

Journalist and author Kunal Purohit opens his conversation on the Nous Podcast with a blunt reframe of the goat controversies convulsing Mumbai housing societies ahead of Bakr-Eid: "it was never about the cow." In Mira Road, Hindutva-aligned residents and organizations demanded that if Muslims could bring goats into their societies for ritual sacrifice, Hindus should be allowed to bring in pigs — and did so on camera, chanting Hanuman Chalisa and "Jai Shri Ram" as police escorted the animal through the complex, before the society's goats were removed entirely and relocated by trolley. Purohit, author of "H-Pop: The Secretive World of Hindutva Pop Stars," argues the target is interchangeable by design: months earlier it was "love jihad" in Maharashtra, prompting a new state law; before that it was Christmas gatherings attacked outside churches in seven or eight states; then Ramzan practices like sehri and iftar. "Hindutva needs a constant target to stay relevant," he says — today's controversy will fade once a new one is manufactured.

Why festivals specifically

Purohit argues festivals are targeted precisely because they are the moments when a minority community's presence becomes most visible — a shared, public celebration that Hindutva organizations can attack to signal, unmistakably, whose country this is. He traces the same pattern to Ganesh Utsav, Ram Navami and Hanuman Jayanti processions turned into shows of force, mosques draped in tarpaulin along procession routes, and provocative songs blasted outside them — a dynamic that has, in his account, recently spread to Holi as well, complete with children choreographed to sexually suggestive lyrics targeting Muslims. The deeper objective, he argues, is dismantling syncretic local traditions — villages across Maharashtra where both communities historically joined each other's Eid, Holi and Diwali celebrations. He cites Ghatkoper, a Mumbai neighbourhood where a goat-keeping practice dating to 1997 was abruptly shut down this year by BJP leader Kirit Somaiya and allies, deliberately severing a three-decade-old local coexistence. "As long as coexistence continues," Purohit says, "your propaganda won't sell" — someone who grew up alongside Muslim neighbours and friends won't easily believe they're suddenly a threat, so eroding that lived proximity becomes a precondition for the broader narrative to take hold.

Maharashtra's reward system

Purohit locates the current wave's political origins in the 2022 collapse of the Uddav Thackeray-led coalition government, after which the BJP, newly anxious about its dominance in Maharashtra, began mobilizing previously unknown or unregistered Hindutva outfits through village-level rallies warning that Hindus were under threat from Muslim "land jihad" and "love jihad." He argues the resulting 2024 landslide taught the party a durable lesson: polarization is rewarded by voters. He points to Nitesh Rane, who as an MLA openly called Muslims "green snakes," threatened to enter mosques, and warned police that a "Hindutva government" backed him — before being made a cabinet minister after the 2024 election. Purohit rejects the framing that such figures are merely granted impunity: "it's not impunity, it's reward" — a model he says has since spread to West Bengal, where Suvendu Adhikari pivoted from the Trinamool Congress to an anti-Muslim campaign explicitly invoking Israel's war on Gaza as a model ("100 crore Hindus" should together teach a lesson) and pushing conspiracy theories that government medicine is secretly sterilizing Hindu families — rhetoric he says has been rewarded with Adhikari's rise, not sanctioned.

The slow drip

Asked why such open bigotry doesn't provoke broader social revulsion, Purohit describes a "slow dripping tap" of propaganda dating back to unofficial WhatsApp forwards and IT-cell Facebook posts before 2014 — content now openly echoed by the Prime Minister, Home Minister, chief ministers and news anchors. What changed, he argues, is that Muslims stopped being seen as fellow humans and came to be pre-categorized as threats: to your daughter, your home, your family — a frame he says trains people to feel discomfort taking an Uber from a Muslim driver or receiving food delivery from one. The cumulative effect, he argues, is a citizenry that no longer recoils at events that would once have been unthinkable — like a man filmed carrying a pig into a housing society to intimidate Muslim residents, or a Muslim man beaten on camera in Uttarakhand for praying on a field, told by his attacker "I am a Brahmin, how can you pray on my land." A decade ago, Purohit says, such incidents would have provoked outrage across Hindu society; today, questions shift instead to why the sacrifice was allowed at all.

Beyond the poor: erasing visibility everywhere

Purohit connects the pattern to a broader campaign of shrinking Muslim visibility across every sphere of public life, not just festivals. He cites the "TCS jihad" controversy — where allegations against Muslim employees at Tata Consultancy Services carried an underlying message that even educated professionals in corporate India "will still do this," reinforcing informal hiring discrimination Muslim professionals already report. He draws parallel lines to a since-shelved "UPSC jihad" narrative questioning why Muslim candidates were succeeding in civil service exams, and a Jammu and Kashmir medical college controversy where Hindutva organizations pushed to shut down an institution over its high proportion of Muslim students. "No matter the sphere," he says, "the idea is to reduce Muslim representation and visibility as much as possible" — festivals simply offer the most visible, emotionally charged opportunity to do so.

Manufacturing incidents when none exist

Purohit describes how ordinary, secular disputes are retroactively given communal framing to sustain constant mobilization — because, he argues, Hindutva organizations must keep their cadre in "a constant state of mobilization" or risk losing public attention to more pressing concerns like inflation and unemployment. He recounts a Mira Bhayandar case where a routine landlord-tenant rent dispute between a Hindu shopkeeper and Muslim tenant was reframed by Bajrang Dal and VHP activists — who arrived with cameras — as a Muslim "land jihad" seizure, with the Hindu shopkeeper recorded thanking the organizations for "recovering" his shop. He also cites a Muzaffarnagar case where a Muslim food blogger, filming a non-vegetarian restaurant review, briefly captured a nearby temple's flag in frame; despite the blogger's apology explaining he found the tricolour moving, he was charged under Bharatiya Nyaya Sanhita Section 170 for disturbing peace and jailed — a response Purohit says would be unthinkable had a Hindu blogger filmed the same shot.

Where it goes from here

Purohit predicts economic distress will accelerate the pattern, as rhetoric already surfacing in recent state elections — outsiders "taking your land, your jobs, your resources" — increasingly redirects public frustration over inflation and unemployment toward Muslims specifically, with West Bengal's rhetoric branding Bengali Muslims as Bangladeshi or Rohingya infiltrators, and Union Home Minister Amit Shah's new committee on "changing demographics," as early instances of a durable trend. He argues genuinely religious Hindus who know their tradition contains no license for this behaviour need to say so publicly and repeatedly, rather than leaving isolated voices to carry that argument alone — while cautioning that the "poison has been mixed too finely" to be undone without broader social mobilization to match it.

Normalization as propaganda's endpoint

Purohit closes by describing what he calls propaganda's "culmination": the point where individual deaths — like that of Mohammad Akhlaq in 2015, which once drew national protest and political visits — no longer register as headlines at all, numbed by sheer frequency, much as viewers have grown desensitized scrolling past images from Gaza. He credits the broader Muslim community with notable restraint over the past twelve years, largely avoiding violent protest even amid sustained provocation, and argues the priority now is developing calmer, more measured public articulation — voices that can speak past both media figures incentivized toward inflammatory soundbites and toward genuine civil-society dialogue capable of reclaiming space that Hindutva organizations, which thrive on confrontation rather than conversation, have otherwise captured entirely.

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