Nous Explainers· 12 Sept 2026· 22:41

“If My Mosque Is Demolished, I Can’t Call for a Temple to Be Demolished”: Saharanpur MP Imran Masood

In an exclusive interview with senior journalist Bushra Khanum, Saharanpur MP Imran Masood discusses the demolition of a mosque inside the Saharanpur Collectorate and the questions it has raised over law, equality and religious sites. Masood argues that the issue should be viewed through the lens…

Full Transcript

मेरे लिए पहले मेरा शहर का अमन है और यहां का हिंदू मेरे साथ खड़ा हुआ है। और हिंदू साथ खड़ा हुआ है और इस लड़ाई को हिंदू भी मजबूती के साथ लड़ रहा है। अभी क्योंकि मैं शहर में घूम रही हूं। जब आप आम लोगों से बात करें तो ऐसा लगता है एक क्लियर डिवाइड सी नजर आती है यहां पर। ये कानून का मसला है और कानून में हम बहुत मजबूत हैं। इसको डाइवर्ट मत करिए अल्लाह के वास्ते। मस्जिद को बुलडोज कर दिया गया। लेकिन यहीं पर ही मंदिर भी है। और मंदिर को ना तो बुलडोज किया गया है ना ही उसे इललीगल करार दिया गया है। मेरी मस्जिद गिरा दी तो मैं किसी के मंदिर को गिराने की अपील नहीं कर सकता हूं। मैं तो मस्जिद की हिफाजत करूंगा, मंदिर की भी हिफाजत करूंगा। यह सहारनपुर है। आपके ऊपर इल्जाम भी है इमरान साहब कि आपने ढंग से प्रोटेस्ट नहीं किया। बरेली में क्या हुआ? बरेली में तौकीर रजा साहब को जमानत आज तक नहीं मिली और उनके साथ कम से कम 50 लोग हैं जिनका सब कुछ तबाह कर दिया। इमरान साहब क्या ये नहीं होता कि आपको क्यों डीएम की उस बात पर यकीन हो गया? जहां आपको लग रहा है कि शासन प्रशासन जो है यकीन ना करता। नहीं अगर मैं यकीन ना करूं आप रात भर वहां धरना देके बैठते वहां पर तो क्या आपको नहीं लगता कि आप एक नेता लड़ता हुआ नजर आता। नहीं नहीं मैं लड़ता हुआ नजर नहीं आता यहां मरता हुआ नजर आता मुसलमान मैं आपको बार-बार बता रहा हूं इनको मारते हुए दर्द नहीं होता। लेकिन मुसलमान कब तक ऐसे खामोश रहेगा संभल बाबरी मस्जिद लगातार एक लंबी चौड़ी लिस्ट है। मस्जिद मस्जिद आप चिल्लाते रहिए ये ये और मस्जिदें गिरेंगी। तो फिर क्या करें क्या करें। कुछ भी नहीं करिए दुआ करिए अल्लाह से अल्लाह से दुआ करिए। ये तो देश तो संविधान से चल रहा है है तो क्या ईश्वर अल्लाह भी है ना।

नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें।

और इस वक्त मेरे साथ इमरान मसूद साहब मौजूद है सहारनपुर के एमपी। इमरान साहब मुझे ये बताइए कि अभी कलेक्टेट की जो मस्जिद है उसको तो बुलडोज कर दिया गया है। उसको जमीदोज़ कर दिया गया है। मैं वो साइट देख कर आ रही हूं। वहां तो कोई नामोनिशान भी नहीं है कि कभी यहां पर कोई मस्जिद हुआ करती थी। अब आगे आप लोगों का क्या प्लान है? क्या आप करने जा रहे हैं? और क्या इसको लेकर मुसलमानों में एक गुस्सा है, गम है, तकलीफ है? क्या है?

देखिए मस्जिद शहीद हुई है तो यकीनी तौर पर तकलीफ होगी। और जिस तरह के सिख शहीद की गई है, वो पूरी तरह से गैर कानानूनी है। और यह पूरे दस्तूर के ऊपर या संविधान के ऊपर इन्होंने बुलडोजर चलाया है। जमीन के कागज चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जमीन सदियों पुरानी है और जमीन के मालिक आज भी कल की तो बात छोड़ दीजिए उस बात छोड़ दीजिए के कब्जे की ये आज भी जमीन के मालिक याकूब खान और वहीद खान ही है। 84 नंबर 84 बीघे का ये नंबर है जिसके अंदर पूरी कलेक्टेट है। कलेक्टेट भी कब्जा की हुई बनी बनी हुई है। कलेक्टेट भी कब्जा कर कर बनी हुई है।

आप उल्टा बोल रहे हैं। मैं उल्टा नहीं बोल रहा हूं। यह कागज बोल रहे हैं। ओके। यह कागज है। यह आज भी है। 1324 और 1359 बंदोबस्त हमने दाखिल कर दिया। सब दरकिनार कर दिया। ये तो आज भी उन्हीं के नाम है। कलेक्टेट भी उन्हीं के नाम है। और एडवर्स पोज़ेशन जो होता है वो एडवर्स पोज़ेशन माना जाता है आम आदमी के लिए। सरकार के लिए एडवर्स पोज़ेशन नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग है कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा इसमें कि सरकार संरक्षक होती है भूमाफिया नहीं। तो इसलिए यह एडवर्स पोज़ेशन भी नहीं कर सकते कि एडवर्स पोज़ेशन इन्होंने कर रखा है।

तो ये पूरी की पूरी तरीके से गैर कानानूनी है। ये मस्जिद पुरानी थी। इसलिए 1991 के जो एक्ट है वशिप एक्ट उसके अंदर ये कवर्ड थी। 1947 से पहला स्ट्रक्चर था। दूसरी चीज यह लिमिटेशन एक्ट में कवर्ड होती है। क्योंकि 1960 से इसको लगातार गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने मालिक मानते हुए इसको किराया दे रही थी। टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट। यह वक्त बाय यूजर में कवर होती है। जो नया एक्ट है नए एक्ट में पुराने के ऊपर नहीं इसका लागू होगा ये। क्योंकि इसके अंदर लगातार नमाज हो रही थी। जब तक यह शहीद की गई उससे दो नमाज पहले तक इसमें नमाज हुई है। तो यह उसमें कवर होती थी। उसको नजरअंदाज कर दिया। सारे डॉक्यूमेंट चीख-चीख कर बोल रहे हैं कि मस्जिद है। उसको नजरअंदाज कर दिया। अपना एक मिनट लगाया और बुलडोजर कर दिया। ये जो आदेश सिटी मजिस्ट्रेट ने दिया उसके अंदर भी एिक्शन था। बेदखली थी। उसके अंदर ध्वस्तकरण डिमोलिशन नहीं था। बेदखली थी। तो यह जो काम हुआ है, यह पूरी तरीके से गैर कानानूनी हुआ है। कानून को ताक में रखकर हुआ है।

और सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के अंदर ही सब चीजें सुनी जाएंगी। जो फाइल पे डॉक्यूमेंट है वही चलेंगे।

तो आप ये कह रहे हैं क्या कोर्ट ने भी सरकार के प्रभाव में आकर ये काम किया है? देखिए मुझे नहीं पता क्योंकि डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने तो सिर्फ हमारी अपील खारिज की है। लेकिन सिटी मजिस्ट्रेट तो पूरी तरह से सरकार के प्रभाव में उन्होंने तो किसी चीज को देखा ही नहीं। सबसे पहले इसमें एक जांच हुई थी जो यहां एडीएमए थी अर्चना द्विवेदी उन्होंने जांच की थी। उस पूरी जांच रिपोर्ट को आउट कर गायब कर दिया। वो पूरी जांच रिपोर्ट गायब कर दी।

लेकिन ये भी कहा जा रहा है कि 1911 का बिजली का बिल जो मस्जिद कमेटी है उसने दिया है। ये कहा जा रहा है कि 1911 का आप बिल दे रहे हैं। लेकिन सहारनपुर में तो बिजली ही 1912 में 1906 में। हां। हां 1906 में बिजली आई सहारनपुर में और यह इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट की वेबसाइट से उठाया हुआ बिल है। ओके। यह कागज है। हां ये कोई वैसा जनरेट नहीं है। इलेक्ट्रिसिटी साइट की बोर्ड की वेबसाइट से उठाया हुआ बिल है और इस बिल के साथ एक एप्लीकेशन लगाई उन्होंने के साहब ये बिल इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड से हमें वेबसाइट से मिला है। आप अधीक्षण अभियंता को सम्मन करके बुलाइए और उनसे इसको वेरी वेरीफाई कराइए। तो रिस्पांसिबिलिटी किसकी हो गई वेरिफिकेशन की? लेकिन नहीं कराया क्योंकि वेबसाइट से उठाया था।

ओके। और यह कहा जा रहा है कि जो क्लेम किया जा रहा है कि यह तो आजादी से पहले की बनी हुई यह मस्जिद है यानी कि 1911 और मैं देख रही थी कि बाकायदा तौर पर किसी एक जर्नलिस्ट ने यह दिखाया है कि 1909 की मलबे से उठाकर जमीन 1906 या नौ की वो ईंट है जो उसी मलबे से उठाकर उन्होंने दिखाई है। लेकिन जो दूसरा पक्ष है उसका यह कहना है कि यह यह मस्जिद जो है वह 70 साल पुरानी है सिर्फ और यहां पर एक तरह से जो लोग यहां काम करते थे कलेक्टेट में उनको परमिशन दी गई थी कि वो यहां पर आकर नमाज पढ़ कब्जा कर लिया। परमिशन कौन देगा? परमिशन वो देगा ना जो मालिक होगा। तो मालिक तो आप हो नहीं आज भी नहीं हो मालिक तो आपसे परमिशन किस बात की। मालिक तो आज भी याकूब खान और वहीद खान ही है।

यह कोर्ट में क्यों नहीं सिद्ध सब चीज़? कोर्ट कोर्ट जब एक बात सुनिए कोर्ट सुश्री मजिस्ट्रेट ने सुनाई नहीं किसी पेपर को अब जवाब देंगे ना हाई कोर्ट के अंदर जाकर हाई कोर्ट में थोड़ी दंगा मस्ती चलेगी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तो फाइल देखेंगे फाइल के ऊपर तो सब चीजें मौजूद हैं। इन्होंने कहा खसरे को आधार बनाकर खसरे को आधार बना के कहा उसके लिए भी हमने रूलिंग लगा दी सुप्रीम कोर्ट की कि खसरे को आधार केवल मध्य प्रदेश में बनाया जा सकता है उत्तर प्रदेश के अंदर खेवट और खतौनी चलेगी खेट में आज भी नाम उनका ही है।

तो ऐसी क्या जल्दबाजी थी कि इसको आननफानन में एक तरह से मैं रात का अंधेरा ही कहूंगी कि उसमें उसको बुलडोज कर दिया गया। पॉलिटिकल एजेंडा है। इसके अलावा कुछ नहीं है और अधिकारी आंख बंद करके पॉलिटिकल एजेंडे के ऊपर काम कर रहे हैं और कल को यही फसेंगे। इनको जवाब देना पड़ेगा। एग्जीक्यूशन इन्होंने किया है तो जवाब यही देंगे।

तो क्या आप इलाहाबाद में रिट फाइल करने? फाइल हो चुकी है। हो चुकी है। जी। और आप क्या उम्मीद लगा रहे हैं आप इलाहाबाद हाई कोर्ट से? देखिए हाई कोर्ट से हमें 100% मुझे लगता है कि 100% न्याय मिलेगा क्योंकि ये देखिए कोई भी आंख बंद करके जज जब बैठेंगे तो सारी फाइल आएगी। इनको फटकार लगनी है। इनके ऊपर जुर्माना होना है। हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीडीए के ऊपर प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी के ऊपर जुर्माना लगाया। इसी तरह से तोड़ने पर ₹42 लाख या ₹2 लाख जुर्माना लगा। ये सब कुछ होना है।

लेकिन अगर एक कोर्ट से आपको निचली कोर्ट से अगर इंसाफ नहीं मिला तो कैसे उम्मीद? निचली कोर्ट में तो हम गए ही नहीं। निचली कोर्ट में तो हमने अपील की थी। जो इन्होंने हमारे जो बेदखली का आर्डर उन्होंने हमारी अपील खारिज कर दी। बस इसके उसके अलावा तो कुछ भी नहीं। निजी कोर्ट में तो चला ही नहीं। हमारे पास हमें तो हाई कोर्ट जाना ही था ये मसला।

आपके पास 22 दिन थे। जी। 22 दिन थे कि उस 22 दिनों में आप हाई कोर्ट जाएं। यानी कि हाई कोर्ट आप जाएं और वहां पर जाकर अपनी रिट फाइल करें। लेकिन वो मौका भी नहीं दिया गया। नहीं आननफानन में तीन तारीख को आदेश दिया और चार तारीख को शाम को डेमोलिशन शुरू कर दिया।

आपके ऊपर इल्जाम भी है इमरान साहब कि आपने ढंग से प्रोटेस्ट नहीं किया। यहां के एमपी होने के नाते आपको जो एक तरह से लड़ते हुए दिखना चाहिए था वो लड़ते हुए आप नहीं दिखे। हां, मैं लड़ते हुए दिखता तो लोगों के जनाजे कंधों के ऊपर दिखाई देते। संभल और बरेली हुआ हुआ दिखाई देता। मेरी जिम्मेदारी अपने शहर को बचाना है। मेरी जिम्मेदारी यह नहीं है कि मैं शहर को आग लगवा दूं। यह लड़ाई कानून की है और कानून के दायरे में ही लड़ी जा सकती है। यह लड़ाई लाठी डंडे से आप क्या कर लेंगे लाठी डंडे से? आप बताइए मुझे संभल में क्या हुआ था? पुलिस ने सीधे गोली मारी, माथे पर गोली लगी, सीने पर गोली लगी। और एफआईआर क्या हुई के दंगाइयों ने मार दिया। कौन दंगाई वहां कोई हिंदू तो था नहीं। वहां तो पुलिस और मुसलमान आमने-सामने थे। कौन दंगाई आ गया वहां? पांच लोग मर गए। कितने लोग तबाह हो गए? बरेली में क्या हुआ? बरेली में तौकीर रजा साहब को जमानत आज तक नहीं मिली। और उनके साथ कम से कम 50 लोग हैं जिनका सब कुछ तबाह कर दिया। तो मैं बरेली और सार सभल बना हूं सहारनपुर को। 2014 में जब दंगा हुआ था। यहां के एमपी थे। मैं खड़े होकर के दंगा रोक रहा था और वह गाड़ियों में घूम-घूम कर शहर जलवा रहे थे। तो वो एमपी तो मैं नहीं हूं। मैं तो अपने आप मरना पसंद करूंगा लेकिन अपनी जान की कीमत पर अपने शहर को बचाऊंगा।

लेकिन एक नेता का तो यह काम होता है इमरान साहब कि जनता को यह लगे जिन्होंने आपको वोट किया है कि अगर उनकी इमोशनली किसी चीज से वो अटैच है यानी कि मस्जिद जैसी जगह पर जो कि इतनी पुरानी कदीम मस्जिद है और आप यह कहा गया कि आपको नजरबंद कर दिया गया है। इसीलिए आप बाहर नहीं जा पा रहे हैं। और फिर लोगों ने यह कहा कि नेताओं को तो नजरबंद किया जाता है तो क्या नेता फिर घर में बंद होकर ऐसे तमाशा देखता रहेगा? देखिए मुझे नजरबंद नहीं किया। नवे नजर बंद हुआ। मैं रात को मैंने बात करी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से दो-दो बार बात हुई। मुझे लग गया कि यह गिराएंगे। लाठी डंडे से नहीं रोक सकते। लाठी डंडे से आप पुलिस के सामना करके नहीं रोक सकते थे। मेरे खड़े होने का मतलब मैं जाता 2000 की भीड़ डालता। गोली चलती। होना तो फिर भी वही था। होना फिर भी वही था। लेकिन शहर में आग लग जाती। मेरा काम आग लगाना है। नहीं, मेरा काम आग लगाना नहीं है। मैं इस लड़ाई को यह कानून की लड़ाई है और मजबूती से लड़ रहा हूं और मजबूती से लड़ेंगे और जीतेंगे भी इंशा्लाह।

मैं आया यहां आते ही मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। पूरी दुनिया के अंदर आज मस्जिदें तो और भी तोड़ी है इन्होंने। ये सहारनपुर की मस्जिद का जिक्र क्यों है? क्योंकि इसकी मजबूत पैरोकारी कर रहा हूं। मजबूती के साथ लड़ाई लड़ रहा हूं यहां से। पूरी दुनिया के अंदर आज पता चल गया कि इन्होंने गैर कानानूनी तरीके से तोड़ी है। पूरे हिंदुस्तान के अंदर हर प्रदेश के अंदर लोग रो रहे हैं और मेरे सहारनपुर के लोग रो रहे हैं। बीजेपी की एमएलए रो रही है। एक्स एक्स एमएलए शशि वाला पुंडीर क्योंकि सहारनपुर है। यहां सहारनपुर जख्मों पर नमक नहीं लगाता। जख्मों पर मरम रखता है। और जितनी मस्जिद मेरे लिए अजीज है उतनी आपके लिए अजीज है। उतनी तीसरे के लिए अजीज है।

मस्जिद का दर्द हर किसी को होगा। इमरान साहब क्या यह नहीं होता कि आपको क्यों डीएम की उस बात पर यकीन हो गया जहां आपको लग रहा है कि शासन प्रशासन जो है यकीन ना करता अगर मैं यकीन ना आप रात भर वहां धरना देके बैठते वहां पर तो क्या आपको नहीं लगता कि आप एक नेता लड़ता हुआ नजर आता। नहीं नहीं मैं लड़ता हुआ नजर नहीं आता यहां मरता हुआ नजर आता मुसलमान मैं आपको बार-बार बता रहा हूं इनको मारते हुए दर्द नहीं होता लड़ता हुआ नेता मेरे से ज्यादा लड़ाई लड़ने वाला इनमें से कोई सा भी नहीं है यहां पर हमेशा लड़ी है मैंने और मैं लड़ता हूं अपने लोगों के लिए मैं मर जाऊं मुझे फिक्र नहीं लेकिन मेरे आड़ में 10 20 लोग और मर जाए मेरे लिए तो मेरे लिए मुमकिन नहीं है मैं मैं नहीं मरवा सकता हूं मेरे लिए पहले मेरा शहर का अमन है और यहां का हिंदू मेरे साथ खड़ा हुआ है और हिंदू साथ खड़ा हुआ है और इस लड़ाई को हिंदू भी मजबूती के साथ लड़ रहा है इस केस के अंदर दो गवाही हिंदुओं के ने दी है सिटी मजिस्ट्रेट के यहां दो गवाही दी है हिंदुओं ने।

लेकिन जब आप अभी क्योंकि मैं शहर में घूम रही हूं जब आप आम लोगों से बात करें तो ऐसा लगता है एक क्लियर डिवाइड सी नजर आती है यहां पर एक खामोशी भी है। एक क्लियर डिवाइड भी नजर आती है। लोग यह कहते हुए नजर आते हैं कि देखिए एक कुआं था फिर उस पर कब्जा कर लिया और पूरी वहां पर मस्जिद लोग हैं इनके बोलने से कुछ नहीं होता है। इसके अंदर गवाही भी हिंदुओं ने ही दी है। मस्जिद के पक्ष में।

आप कह रहे हैं इस जो कोशिश की जा रही थी कम्युनल करने की माहौल वो नहीं हुआ। नहीं हुआ। ये आप गारंटी से बोल रहे हैं। हुआ नहीं है। अब मैं कह रहा हूं इन्होंने नेक्स्ट डे पोस्टर भी लगा कर देख लिए। यहां तो पोस्टर भी लगाए थे नेक्स्ट डे। नहीं हुआ।

लेकिन सहारनपुर को सेंटर बनाकर पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में क्या एक तरह की नज़र पेश की जा रही है? और ये कहा जा रहा है कि यहां से उत्तराखंड भी देखिए पास है। तो उसको भी एक तरह से देखिए बिल्कुल नहीं होगा। बिल्कुल नहीं होगा। यहां कम्युनल टेंशन नहीं होगी इंशाल्लाह। मैं अपने शहर के ऊपर दंगे का कलंक नहीं लगने दूंगा। मेरे में जितना दम है उतना दम लगा के रखूंगा। और मैं सबसे अपील भी करता हूं। देखिए लड़ाई कानून से लड़ी जाएगी। यह कानून का मसला है और कानून में हम बहुत मजबूत हैं। इसको डायवर्ट मत करिए अल्लाह के वास्ते। यह सरकार चाहती है डायवर्ट हो जाए। मैं डायवर्ट नहीं होने देंगे इसको। आप सोच रहे हैं कि वहां प्रोटेस्ट करने से मस्जिद रुक जाती। किसी भी सूरत में नहीं रुकना था। मेरे पास तो इस तरह की इनपुट है कि जेल भी खाली करा ली गई थी। कि गिरफ्तारियां बहुत बड़े पैमाने पर एकदम करेंगे। ये सारी चीज जब मैं जिम्मेदार जगह पे बैठा हूं तो मेरी जिम्मेदारी है कि मैं वो काम करूंगा जिस काम से लोगों का फायदा हो। मेरा फायदा हो सकता है जाती तौर पर हो जाए कुछ लेकिन मैं अपने फायदे को नहीं देखता हूं। मेरे लिए मेरे जनपद मेरे शहर मेरे लोग वो हैं।

आप में और समाजवादी पार्टी में क्या किसी तरह का कोई रिफ्ट चल रहा है? क्योंकि पहले इस तरह की बातें आई कि आपको नजरबंद किया गया है। फिर उसके बाद इरा हसन ने कहा उन्हें नजरबंद किया गया है। कुछ और नेताओं ने कहा समाजवादी पार्टी के कि उनको भी नजरबंद किया गया है। फिर आपके जो बातचीत थी उसमें एक बदलाव आया कि आपने कहा कि आपको नजरबंद नहीं किया गया। मैंने तो कहा ही नहीं कभी नजरबंद किया मुझे। मैंने कभी नहीं कहा। ना मैं नजरबंद हुआ। मैंने कब कहा? मैं तो दिल्ली था। मैं दिल्ली से सीधा आया। सीधा मैंने शाहनवाज के यहां आकर के प्रेस कॉन्फ्रेंस की। सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस की मैंने शाहनवाज के यहां से आकर के।

नहीं आप यह बताइए तो आने वाले वक्त में जो उत्तर प्रदेश का इलेक्शन है अलायंस तो आपका और समाजवादी पार्टी का होगा। यह कहा जाता है कि भ आपकी वजह से कहीं ना कहीं आप जिस तरह के बयान दे रहे हैं ये कहीं ना कहीं अटक रहा है और आप नहीं चाहते हैं कि अलायंस जो है वो कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का हो। यह इल्जाम लगाया जाता है। दूसरा क्या यह अच्छा नहीं होता कि जब आप एक इंडिया गठबंधन नाम का एक गठबंधन है तो आप इरा समाजवादी पार्टी के नेता सब लोग एक साथ मिलकर यह आवाज उठाते। ये दो अलग-अलग आवाजें क्यों उठ रही हैं कि आपकी अलग है और समाजवादी पार्टी की अलग है। नहीं उनकी पार्टी अलग है। मेरी पार्टी अलग है। लेकिन आप मैं कांग्रेस के लिए नहीं। गठबंधन जब होगा तब होगा। अभी तो गठबंधन का कोई स्वरूप नहीं है इसमें। जब गठबंधन होगा। यह गठबंधन का फैसला पार्टी का है। मैं अपनी पार्टी को थोड़ी दफन कर दूंगा। मैं अपनी पार्टी के लिए लडूंगा। मैं कांग्रेस में हूं। कांग्रेस के कांग्रेस के सर्वाइवल के लिए बात करूंगा और अपने सर्वाइवल के लिए हर कोई लड़ता है? तो इसमें कोई नई बात थोड़ी ना है।

आखिरी मेरा सवाल कि आने वाले जो फ्राइडे है क्या उसको लेकर लग रहा है कि आपको किसी तरह की कोई टेंशनंस हैं? क्योंकि अगर कोई भी अगर चंद लोग भी आपके हैं तो आपके चैनल पे कह रहा हूं और चाहूंगा कि सर्कुलेट भी हो। मैं सबसे मौतवाना दरख्वास्त करना चाहता हूं। खुदा के लिए इसका रुख मत मोड़ने मुड़ने देना। अमन रखिए। जीत आपकी होगी। ताकत अल्लाह की लाठी में बहुत है। जीत आपकी होगी। क्योंकि कागज आपके बहुत मजबूती के साथ बोल रहे हैं। इसको खुदा के लिए डायवर्ट मत होने दीजिएगा। गम और गुस्सा दबा के रखिए। लड़ाई कानून की है। यह हमें कानून में ही लड़नी है। और इसी में हम जीते भीेंगे अभी। मैंने सारे आपको बता दिए। सारे डॉक्यूमेंट बता दिए। जो आदमी प्रोवोकेशन की बात करता है वो आपका दुश्मन है। प्रोवोक करके सिर्फ आपको पिटवा सकते हैं, मरवा सकते हैं। आपके घरों पर बुलडोजर चला सकते हैं। इसके अलावा कुछ नहीं होने वाला है। और यही सरकार की मंशा है। तो मेरी खुदा के लिए सबसे अपील है कि जुमा की नमाज पढ़े और दुआ करें।

बस दो और छोटे-छोटे सवाल मेरे आप ही की इस बात से आ रहे हैं। आपने एक और चीज कही है कि इसी मजिस्ट्रेट जो है यहीं पर ही मस्जिद को बुलडोज कर दिया गया लेकिन यहीं पर ही मंदिर भी है और मंदिर को लेकर मंदिर को ना तो बुलडोज किया गया है ना ही उसे इललीगल करार दिया गया है। तो क्या आपकी क्या कोई मांग है इसको लेकर? बिल्कुल भी नहीं। ये सहारनपुर है। मेरी मस्जिद गिरा दी तो मैं किसी के मंदिर को गिराने की अपील नहीं कर सकता हूं। मैं तो मस्जिद की हिफाजत करूंगा। मैं मंदिर की भी हिफाजत करूंगा। ये सहारनपुर है। मैं मंदिर की भी हिफाजत करूंगा।

और लेकिन लोग ये कह रहे हैं कि आप ऐसा करके जब मैं वहां मजिस्ट्रेट में कुछ लोगों से बात कर रही थी क्योंकि मैं वहां मंदिर ढूंढने की कोशिश कर रही थी कि मस्जिद तो मुझे बुलडोज हुई मिल गई। लेकिन मंदिर है कहां? तो पता चला कि जब आप मजिस्ट्रेट से पूरा बाहर निकलते हैं और बाहर की तरफ जाते हैं तब वहां पर मंदिर है। और वहां कुछ लोग कह रहे थे। मैंने कहा नहीं अच्छा मंदिर भी है यहां पर तो आप मुझे बताएं। तो उन्होंने कहा नहीं नहीं वो तो सिर्फ इमरान मसूद जो हैं वो राजनीति करने की कोशिश कर रहे हैं। भड़काने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर मस्जिद गिराई है तो फिर मस्जिद तो मंदिर का भी फिर आप। मैंने बिल्कुल नहीं मैंने तो किसी टाइम नहीं कहा मैं अब भी कह रहा हूं कि मैं तो मस्जिद के भी मंदिर के भी उतने ही प्रोटेक्शन में खड़ा हूं। मैं बिल्कुल मंदिर गिराने की बात नहीं करूंगा। बिल्कुल सवाल ही पैदा नहीं हो ना। डिमांड है हमारी।

और ये सारे मुसलमान कह रहे हैं। मैं नहीं कह रहा हूं। इमरान नहीं कह रहा है। सब मुसलमान कह रहे हैं। यह सहारनपुर है। जब मेरी मस्जिद के लिए दो हिंदू गवाही दे रहे हैं। मेरी मस्जिद के लिए सारा हिंदू बीजेपी की एक बड़ी नेता रो-रो कर वीडियो डाल रही है। तो ये यही तो सहारनपुर है। हम किसी के जख्मों पर मरम नहीं लगा नमक नहीं लगाते। हम मरम लगाते हैं। जख्म हमारे लगा है तो मेरे हिंदू भाई मरम लगा रहे हैं।

लेकिन मुसलमान कब तक ऐसे खामोश रहेगा? संभल बाबरी मस्जिद लगातार एक लंबी चौड़ी लिस्ट है WhatsApp पे जो सर्कुलेट होती है जहां पर हजारों मस्जिदें हैं। कोई भी बजरंग दल का किसी का मस्जिद मस्जिद आप चिल्लाते रहिए ये ये और मस्जिदें गिरेंगी। तो फिर क्या करें क्या करें। कुछ भी नहीं करिए दुआ करिए अल्लाह से अल्लाह से दुआ करिए। ये तो देश तो संविधान से चल रहा है संविधान है तो क्या अब ये ईश्वर अल्लाह भी है ना। संविधान चल रहा है संविधान बचे अल्लाह से दुआ करिए संविधान बचे। और ये जो आंख पर पट्टी बांध के चलता है मुसलमान। अल्लाह के वास्ते इससे गुजारिश है आंख पर पट्टी मत बांधो। होशमंदी और अकलमंदी के साथ काम करो। तारीफ नहीं करेंगे आप मुसलमानों की कि वो बहुत दयानतदारी से काम कर रहे हैं। नहीं नहीं ऐसी दयानतदारी किस काम की है कि शोर मचा दिया आपने। पता चला आपका शोर मचाते ही दूसरा वोट इकट्ठा हो जाता है और वो जीत कर चले जाते हैं। पिटते हमें। पिटता कौन है? पिछले तो मुसलमान है।

लेकिन आप देखें मस्जिद बुलडोज हुई और देख रही हूं मैं कि लोग रोजमर्रा की अपनी जिंदगी में ऐसे ही आ और क्या करेंगे? और क्या करेंगे? आप क्या चाहते हो? ये बताओ आप बताओ क्या चाहते हो कि और क्या करेंगे? देखिए मुसलमान को इस वक्त मुसलमान को इस वक्त इन्होंने इतना परेशान कर दिया और यही इनका मकसद है। कि आप परेशान दिखें। यही मकसद भी है इनका। लेकिन मैं बार-बार कहता हूं कि 25 करोड़ लोगों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। 25 करोड़ लोगों को आप हटा नहीं सकते मुल्क से। ये मुल्क का अमनोमान बचाने की जहां तक हमसे कोशिश हो रही है कि मुल्क के अंदर अमन रहे, शांति रहे, हम वहां तक कोशिश करेंगे। अगर योगी आदित्यनाथ यहां आकर इस मस्जिद के हवाले से आकर यहां पर अगर कोई रैली या कुछ करते हैं और बांटने की कोशिश करते हैं। जैसे जौहर यूनिवर्सिटी के लिए उन्होंने कहा। मौलाना मोहम्मद अली जौहर को उन्होंने फिर वही बात आ गई ना। फिर वही बात आ गई। मैं कह रहा हूं कि मुसलमान को अकलमंदी से काम ले। उनके ट्रैप में क्यों मुसलमान उलझ रहा है? उनका तो मकसद ही यह है। उनका सिर्फ मकसद ही है कि आप उछले और आपके उछलते ही दूसरा तरफ गेम ओवर खत्म। आप उछलते रहिए। फिर तो आप उछलते रहिए ना। आपके उछलने से कुछ फर्क पड़ रहा है ना। दूध में से मक्खी की तरह निकाल के फेंक तो दिया आपको। पहले बड़ा मुसलमान शोर मचाता था ना कि हमारे बिना नहीं बन सकती। आप ही के बिना बन रही है।

ठीक है इमरान साहब बहुत-बहुत शुक्रिया आपका वक्त देने के लिए। थैंक यू सो मच।

Companion article

In the early hours of the fourth day after a city magistrate's order, bulldozers moved into the grounds of the district collectorate in Saharanpur, western Uttar Pradesh, and razed a mosque that had stood inside the government compound for generations. By the time local journalists reached the site, there was, in the words of one who visited, “no trace that a mosque had ever stood there.” The demolition has become the latest flashpoint in a string of mosque clearances across Uttar Pradesh, and it has thrust Saharanpur's sitting Congress MP, Imran Masood, into an uncomfortable position: the local Muslim leader now dividing his own constituents between those who want him fighting in the streets and those, including some Hindu neighbours, quietly standing by him.

A Mosque Erased Overnight

Masood's account begins with the timeline. He says the city magistrate's order came on the third of the month, and by the evening of the fourth, demolition was already underway — leaving no real window for an appeal. By law, he says, he should have had roughly 22 days to move the Allahabad High Court against an eviction order before any structure could be touched. That window, he says, was never honoured.

Central to his objection is a distinction he returns to repeatedly: the city magistrate's order, he says, was for “bedakhali” — eviction — not demolition. Acting on an eviction order as though it authorised demolition, he argues, was itself an act outside the law.

A Paper Trail That Predates the Collectorate Itself

Masood's central claim is about ownership, not sentiment. The mosque, he says, sat on survey plot number 84, an 84-bigha parcel that also happens to contain the entire district collectorate compound built around it. According to land settlement records dating to the bandobast (revenue settlement) years he cites as 1324 and 1359 in the Bikrami calendar — corresponding to the colonial-era land settlements — and reflected in the khewat and khatauni revenue registers still in force in Uttar Pradesh, the land was, and remains, recorded in the names of two individuals: Yakub Khan and Waheed Khan. “The collectorate itself is built on encroached land,” Masood says. “The papers are screaming that this land is centuries old, and the owners are the same men on record today.”

He anticipates the obvious counter — that decades of unchallenged government occupation should count for something — and cites a Supreme Court position that adverse possession, the doctrine that long, uncontested occupation can convert into ownership, does not run in the government's favour. The state, he says the court has held, is a custodian of land, not a party that can claim it by encroachment. If anyone has been sitting on land they don't legally own, by his account, it is the collectorate, not the mosque.

He also argues that the mosque was protected under the Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991, which freezes the religious character of any site as it stood on 15 August 1947. Since the structure predates independence and was, he says, in continuous use for prayer — with namaz offered inside it as recently as two prayer sessions before the demolition — he believes it should have been shielded by that law, as well as by “title by long user,” a separate doctrine under which decades of unchallenged religious use establishes a right to continue. Government records, he adds, show the telecommunications department paying the mosque committee rent for the site since 1960, itself implying official recognition of the committee's rights on the land.

A Disputed Electricity Bill

The administration's counter-case, as Masood describes it, rests substantially on documentary attempts to show the mosque was a comparatively recent structure with no independent claim to the land — including a 1911 electricity bill pulled from the state electricity board's own website and submitted in the mosque committee's name. Masood calls the exercise self-defeating: electricity did not reach Saharanpur until 1906, he says, which makes a bill from just a few years later entirely plausible rather than suspicious, and he says officials never summoned the executive engineer to verify the document despite being asked to. He also points to reporting that traced bricks recovered from the demolished structure's rubble to a construction period around 1906–1909, consistent with his version rather than the administration's newer claim that the mosque was only around 70 years old and had been built by collectorate employees who were merely permitted to pray there. “Permission from whom?” he asks. “Permission is granted by the owner. And the owner, on paper, has never been the government.”

He also dismisses the administration's use of “khasra” land records as the basis for its claim, noting that the Supreme Court has held khasra records to be primary evidence of title only in Madhya Pradesh; in Uttar Pradesh, he says, the operative documents are khewat and khatauni, both of which still carry Yakub Khan's and Waheed Khan's names. He also says an internal administrative inquiry into the site, led by an additional district magistrate, was conducted before the demolition and that its findings were never made public — he alleges the report itself was made to disappear.

Why He Didn't Lead a Street Protest

The sharpest exchange in the interview is not about land law but about Masood's own conduct. He is asked directly why, as Saharanpur's MP, he did not lead an overnight sit-in or a visible confrontation with the administration once he suspected the mosque would be demolished regardless of assurances from the district magistrate. His answer draws a hard line between what he calls fighting and what he calls dying. “If I had stood there fighting, you would have seen bodies carried on shoulders,” he says, invoking recent violence in Sambhal, where he says police shot people directly — in the forehead, in the chest — and the resulting FIR blamed “rioters,” even though, in his telling, only police and Muslim residents were present at the scene, and five people died. He also points to Bareilly, where cleric Maulana Tauqir Raza has not been granted bail and roughly fifty people, he says, had everything they owned destroyed.

Masood contrasts himself with his own predecessor as Saharanpur's MP, whom he accuses of having driven through the city inciting violence during 2014 riots while he himself worked to stop them. His responsibility, he says, is to protect his city's peace, not to “set it on fire” for the sake of looking combative. He denies reports that he was placed under house arrest, saying he was in Delhi when the demolition began, returned directly, and held a press conference from a party colleague's residence rather than staying silent.

“This Is Saharanpur”

Perhaps the most striking element of Masood's account is what he says did not happen. Within the same collectorate compound, close to where the mosque stood, sits a temple that has been neither demolished nor declared unauthorised — and Masood insists he has no demand that it be treated differently. “If my mosque is demolished, I cannot call for a temple to be demolished,” he says. “I will protect the mosque. I will protect the temple too. This is Saharanpur.” He notes that two Hindu residents gave testimony before the city magistrate in the mosque's favour, and that a former BJP MLA from the area publicly posted an emotional video over the demolition. Attempts to inflame communal tension in the aftermath, including posters put up the following day, did not, in his account, gain traction locally.

The Road Ahead

Masood says a writ petition has already been filed before the Allahabad High Court and that he expects, in his words, “100 percent justice,” pointing to a separate case in which the same court fined the Prayagraj Development Authority over unauthorised demolitions. His appeal to Muslim residents, repeated throughout the conversation, is for restraint rather than confrontation: pray, do not be provoked, and trust the paperwork and the courts rather than the street. He is dismissive of anyone urging a more combative response, characterising provocation as a trap that benefits the state by giving it a pretext for arrests and further bulldozing, and he pushes back on suggestions of friction with alliance partners in the Samajwadi Party, saying coalition decisions rest with party leadership rather than individual MPs.

Whether the courts vindicate his reading of the land records remains to be seen. What Masood is staking his own political credibility on, in the meantime, is a bet that patience and paperwork will do more for Saharanpur's Muslims than a fight he says he has watched turn fatal everywhere else it has been tried this year.

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