Nous Podcast· 27 Mar 2026· 40:24

Iran is Reshaping the New World Order I Amaresh Misra

In an incisive conversation with senior journalist Bushra Khanum, author Amaresh Misra examines escalating tensions involving Iran, Israel, and global power alignments. The discussion questions narratives around military control, deterrence, and the possibility of wider regional conflict. It expl…

Full Transcript

कार्तिक कॉलेज कार्तिक आपने फिल्म तो देखी ही होगी ना जहां पर कार्तिक अपने आप को ही फोन करता था और अपने आप से बात करता था बिल्कुल उसी तरीके से ट्रंक करते हुए नजर आए जो अपने से बात करते थे उनको लगता था कि दुश्मन से उनकी दुश्मन हार गया है उनके सामने मैं मजाक नहीं कर रहा हूं ये बिल्कुल असली में यह ऐसा हो चुका है ट्रंप आई थिंक इज अंडरगोइंग अ फेस ऑफ एक्सट्रीम डूजन ईरान जो लगातार यह कह रहा है कि हम किसी भी कीमत पर झुकेंगे नहीं और हमारी शर्तों पर यह जंग खत्म खत्म होगी अगर हुई तो ईरान ने इजराइल को मारा है। उसकी अब पिक्चर साफ आ रही है। नेतहऊ इज नो लगर इन कंट्रोल ऑफ [संगीत] इजराइल। तिलवी से लेकर डिमोना से लेकर हाइफा यहां पर कितना नुकसान आपको लगता है वहां पर हुआ है और उधर डिमोना में जो इनका कम्युनिकेशन सिस्टम है जो इनका सेटेलाइट सिस्टम प्लस इनका जो न्यूक्लियर जो यहां पर वेपन्स है एक एक खतशा जो क्रिएट किया जा रहा है कि जो जो बूट्स ऑन ग्राउंड्स हैं वो किया जा सकता है जो उनका एयरक्राफ्ट कैरियर था जो पीछे हट गया था उसने फिर आगे आने की कोशिश की हालांकि F18 जहाज गिरा दिए ईरान ने F35 गिरा दिए F15 15 F16 गिरा दी। अब कोई अमेरिका के पास बचा नहीं। यूएई और सऊदी अरब दोनों ने यह कहा है कि आप अभी इस जंग को रोकिए मत। इस जब तक ईरान खत्म नहीं हो जाता। अब तीसरा वो एक्सप्लोर कर रहा है ग्राउंड इनवेज जहां ईरान सबसे मजबूत है। क्या इसका दायरा जो अभी जीसीसी तक ही महदूद है। क्या आपको लग रहा है फिर वो पूरी दुनिया तक फैल सकता है? जंग जैसे हमास ने 7 अक्टूबर 2023 के बाद दुनिया बदल दी। वैसे ही ईरान ने 28 फरवरी 2026 के बाद दुनिया बदल दी। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद। हर रोज ट्रंप इस तरह के बयान देते हैं कि वो अब मजाक का पात्र या कहें उर्दू में कि लतीफा बनते हुए नजर आ रहे हैं। कार्तिक कॉलिंग कार्तिक आपने फिल्म तो देखी ही होगी ना जहां पर कार्तिक अपने आप को ही फोन करता था और अपने आप से बात करता था। बिल्कुल उसी तरीके से ट्रंप करते हुए नजर आ रहे हैं और इसी तरह से ईरान में और पूरी दुनिया में उनका मजाक बनता हुआ नजर आ रहा है। वो खुद ही उठकर कहते हैं कि हमारी नेगोशिएशन की बातचीत चल रही है ईरान से और वॉर में हम जीत चुके हैं और वी आर द विनर वी हैव वन दिस वॉर। हर सुबह उठकर वो यही कहते हुए नजर आते हैं और हर बार वो यही कहते हुए नजर आते हैं कि हमारी बातचीत जो है वो ईरान से चल रही है और जल्द ही यह वॉर जो है वो खत्म हो जाएगी और ईरान हर बार आकर यह कहता हुआ नजर आता है कि कोई किसी तरह की कोई नेगोशिएशन कोई बातचीत अमेरिका के साथ नहीं हो रही है और ना ही होगी क्योंकि उनका सीधे तौर पर कहना है कि अब तक जबजब अमेरिका के साथ नेगोशिएशन शुरू हुए हैं तब-तब अमेरिका ने इजराइल के साथ मिल मिलकर ईरान के साथ सिर्फ धोखा किया है। तो जाहिर सी बात है कि जो ट्रस्ट है वह कंप्लीटली खत्म हो चुका है। अब यह कहा जा रहा है कि पाकिस्तान, टर्की और ओमान ये नेगोशिएशन में एक तरह से एक रोल निभा रहे हैं और बातचीत जो है वो चल रही है। ये भी हम देखें तो वेस्टर्न मीडिया की तरफ से ज्यादा इस बात को फैलाया जा रहा है। ये कहा गया कि 15 पॉइंट्स जो हैं वो दिए गए हैं। अमेरिका की तरफ से ये शर्तें रखी गई हैं कि ये शर्तें अगर ईरान मानता है तो नेगोशिएशन की बातचीत जो है वो आगे चलेगी और वॉर जो है थम जाएगी। ईरान ने कहा कि आप रखेंगे शर्तें या हम रखेंगे शर्तें। तो ईरान ने उन 15 जो पॉइंट्स थे उनको नकारते हुए अपने पांच शर्तें उन्होंने रखी हैं। जिसकी बात मैं आगे कन्वर्सेशन में करूंगी कि आखिर वो पांच शर्तें क्या हैं? सवाल यह है कि एक तरफ ट्रंप यह सब कुछ करते हुए नजर आ रहे हैं। अपने आप को विनर घोषित कर रहे हैं। बातचीत की बात कर रहे हैं। कह रहे हैं कि एयरफोर्स खत्म हो गई है। नेवी खत्म हो गई है। मिलिट्री खत्म हो गई है। लीडरशिप हमने खत्म कर दी है। और दूसरी तरफ वो मरींस भेज रहे हैं। वो ट्रूप्स भेज रहे हैं। वो जंगी जहाज भेज रहे हैं। वो स्पेशल कमांडोज़ जो हैं वो भेज रहे हैं मिडिल ईस्ट में। और यह कहा जा रहा है कि ग्राउंड इन्वजन की तैयारी की जा रही है। तो ये सब कुछ जो है जो एक कंफ्यूजन की स्थिति पैदा कर दी गई है जो एक कहते क्या हैं और एक्शन क्या होता हुआ नजर आ रहा है वो सारी दुनिया को दिख रहा है। इजराइल में भारी तबाही है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। बनगिवेन जो एयरपोर्ट है उसमें भी बताया जा रहा है कि बहुत भारी तबाही है। क्लेम्स तो यह तक किए जा रहे हैं कुछ रिपोर्ट्स में कि इतनी ज्यादा वहां पर नुकसान हुआ है कि शायद वहां से फ्लाइट भी उड़ान ना भर पाएं क्योंकि पूरी तरीके से सेंसरशिप है इजराइल में तो खबरें जो भी आती हैं वो सोशल मीडिया के हवाले से ज्यादा हैं। वही वीडियोस आ पाती हैं जो बहुत ही कम हमें देखने के लिए मिल रही हैं। लेकिन एक्सपर्ट्स जो हैं वह लगातार यह कहते हुए नजर आ रहे हैं कि भारी पैमाने पर इजराइल में नुकसान हुआ है और ना सिर्फ यह ईरान कर रहा है बल्कि यह किया जा रहा है हिजबुल्लाह की तरफ से भी यानी कि दोनों तरफ से इजराइल पर मार पड़ रही है। अब आगे ये सवाल है कि एक महीने के तकरीबन वक्त बीत रहा गया है इस जंग को। यह जंग किस तरफ जा रही है? क्या हम कोई पॉसिबिलिटी देख रहे हैं? क्या कोई बातचीत के दरवाजे खुलेंगे? क्या नेगोशिएशन की कोई पॉसिबिलिटी है? क्या जो ईरान की पांच शर्तें हैं? क्या उनको मान सकता है अमेरिका? क्या स्टेट ऑफ हॉर्मोंस को लेकर कोई स्ट्रेटजी बन सकती है? और एक और बात जब किसी ने यह पूछा कि आखिर स्टेट ऑफ़ हॉर्मोस को कैसे कौन कंट्रोल करेगा? तो ट्रंप कहते हुए नजर आते हैं कि हम साथ में कंट्रोल करेंगे। साथ का मतलब था वो और हु सोए एवर द आयतुल्लाह इज कि आयतुल्लाह और मैं मिलकर करेंगे। तो आप सोचिए कि एक शख्स जो अपने आप को यह कहता है कि दुनिया की सबसे बड़ी पावर का वो प्रेसिडेंट है। वो इस पूरी जंग को उसने और अपने बयानों से एक एक तरह से इसको एक मजाक बनाकर रख दिया है। जहां हजारों लोगों की जान जा रही है। आज इन्हीं सबके के इर्द-गिर्द आज हम अपनी बातचीत के दायरे को हम आगे बढ़ाएंगे। मेरे साथ बेहद खास मेहमान जुड़ गए हैं जिनके व्यूज को आप सुनना बहुत पसंद करते हैं। मेरे साथ वेस्ट रिशिया मामलों के जानकार ऑथर पॉलिटिकल एनालिस्ट सीनियर जर्नलिस्ट मेरे साथ अमरीश मिश्रा जी जुड़ गए हैं। अमरीश जी बहुत-बहुत स्वागत इस्तकबाल आपका कार्यक्रम में। थैंक यू। थैंक यू मिश्रा। थैंक यू। अमरीश जी मेरा पहला सवाल आपसे यह कि सबसे पहले बात ट्रंप की यहां पर कर लेते हैं। ट्रंप लगातार जिस तरह से बयान दे रहे हैं और जो जमीन पर जो हो रहा है जो प्रैक्टिकल स्टेप्स लिए जा रहे हैं और जो वो बयान दे रहे हैं उसमें सीधे तौर पर कंट्राडिक्शन नजर आते हैं। क्या लग रहा है आपको यह ट्रंप क्या जानबूझकर ऐसा कर रहे हैं? इसके पीछे भी क्या आप कोई गेम प्लान, कोई साजिश देखते हैं या फिर आपको लगता है कि एक ये सरफिरा साइकोपैथ काइंड ऑफ यू नो इज अ पर्सन हु इज नाउ अ प्रेसिडेंट ऑफ यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका और वो जो कुछ कर रहा है वो एक तरह से एक पपेट एक कठपुतली की तरह से काम करता हुआ नजर आ रहा है। नहीं देखिए ट्रंप कोई एक कठपुतली है ये तो हम नहीं कहेंगे लेकिन एक अजीब सी स्थिति हो गई है। देखिए पुश जी हमें वॉर हिस्टोरियन हो हिस्ट्री कभी स्टूडेंट टू मैंने ऐसे दौर देखे हैं स्पेशली एंशिएंट एरा में रोमन और ग्रीक एरा में अगर आप आप जाइए ऐसे लोग हुए हैं रोमन एपरर्स खासतौर पे जो डलूजनल लोग हैं कैलगुला का नाम सामने आता है दो-तीन और लोगों का का नाम आता है नीरो का नाम सामने आता है जो अपने से बात करते थे उनको लगता था कि दुश्मन से उनकी दुश्मन हार गया है उनके सामने मैं मजाक नहीं कर रहा हूं ये बिल्कुल असली में ये ऐसा हो चुका है रोमन एपरर्स मैंने दो नाम भी लिए वो लोग सच में ऐसा मानते थे कि कुछ ऐसी चीजें हो रही है कुछ हमको किसी ने अब वो एक कुछ ऐसा था कि कोई अच्छी गिफ्ट लाता था तो वो कह देता था कि ये जहर है या कोई जहर देता था तो उसको लगता था ये अच्छी गिफ्ट है। ये भी हुआ है। देखिए इतिहास से कोई चीज छुपी नहीं है। आज जो हो रहा है। हां संदर्भ नया है। टेक्नोलॉजी दूसरी है। दुनिया दूसरी है। तो इन सारी चीजों को देखते हुए ट्रंप आई थिंक इज अंडरगोइंग अ फेस ऑफ एक्सट्रीम डलजन और यह जो एक्सट्रीम डलजन होता है इसमें आपका कुछ भी हो सकता है। बाइडन की प्रॉब्लम यह थी कि वो उसने सुनना और रजिस्टर करना बंद कर दिया था। तो वो उसको याद ही नहीं रहता था। ट्रंप जो है यह अपना खुद क्रिएट करता है कि आज हमें हमने ये अचीव किया। कल हमने ये अचीव किया। एक मेडिकल प्रॉब्लम है। यह अब सामने आ रही है। अब यहां पर लेकिन कोई यह कहने वाला नहीं। अमेरिका को अभी सानों लग जाएंगे ट्रंप को हटाने के लिए। तो इसलिए दुनिया को इसे झेलना। अब वहां पर बात आ जाती है कि दुनिया क्यों झेले? एक अमेरिकन एंपायर एक इतना बड़ा जो कि पूरी दुनिया का जिसने शोषण किया है और बहुत कुछ बिजनेसेस वगैरह भी दी हैं लेकिन उससे ज्यादा लूटा है। अब उसकी उसका अगर प्रेसिडेंट ऐसी स्थिति में पहुंच गया है और वो नेतन्या जो कि एक और ऑब्सेसिव ओसीडी का शिकार है। ऑब्सेसिव कम कंपल्सिव डिसऑर्डर का शिकार है। तो एक और उसको वो मिल गया है जो एकदम ईरान को यही चाहता है कि रोज सुबह उठता है। उसको यही लगता है कि ईरान अभी खत्म क्यों नहीं हुआ? तो इस तरीके के जब दो लोग मिल गए हैं तो एक एबनॉर्मल सिचुएशन क्रिएट हो गई। इसी लेकिन ऐसे एबनॉर्मल लोगों को के काट के लिए ईरान खड़ा हो गया है। क्योंकि ईरान में देखिए क्या है? वह क्रांतिकारी एक प्रक्रिया से गुजरा हुआ देश है। जो देश क्रांतियों से गुजरते हैं, बहुत झेलते हैं और वह बहुत कुछ सीखते हैं। उनके मिजाज भी एक इस तरह का हो जाता है लड़ने का, अनवरत लड़ने का और अभी जो लोग आईआरजीसी के जो सत्ता में नए-नए आए हैं और क्योंकि पूरी पुरानी लीडरशिप खत्म कर दी गई। वह ऐसे ही हैं कि जो इस चीज को समझते हैं कि हमें इस समय जंग में पीछे हटना नहीं चाहिए। अच्छा एक चीज और इसमें ईरानी जनता देखिए बहुत सारे लोग नहीं समझ पा रहे हैं कि ईरान में क्या हुआ। ईरान में एक सोशल रेिवोल्यूशन हुआ है और वो सोशल रेवोल्यूशन मतलब दूसरी क्रांति हुई। एक 1979 में हुई और अभी 2026 में चल रही। वो जनता की क्रांति है। जिस तरीके से महिलाएं, बच्चे, मर्द उसके साथ-साथ जो वहां का जो वर्किंग क्लास है वो उभर के सामने आया है और वो सड़कों पे उसको स्ट्रीट जिहाद का नाम दिया जा रहा है। वो लगातार सड़क सड़कों पे बना हुआ है। जैसे आंदोलनों में होता है। और वहां सरकार भी तो उन्हीं की है। लेकिन उस सरकार के अंदर भी जो पुराने लोग थे या जो अमेरिका के साथ अकोमोडेट करना चाहते हैं या ईरानी सोसाइटी के जो न्यू रिच हैं जो चाहते थे कि अमेरिका के साथ हाथ मिलाएं उनके खिलाफ भी उनके खिलाफ भी एक गुस्सा उभर के सामने आ रहा है और ऐसे ऐसी थ्योरी सामने आ रही है। आप देखिए माजंदरान जैसी जगह यश जैसी जगह रात-रात भर आप वो वीडियोस देखिए रात-रात भर वहां पर महिलाएं खड़ी हैं नारे लगा रही हैं। और यह तो तब होता है जब किसी शासक को डिपोज करना हो। यह अमेरिका के खिलाफ इकट्ठा हो रहे हैं ईरान के लोग। और अपनी सरकार के समर्थन में ऐसी अद्भुत चीज तो कभी नहीं हुई है। और वहां पर इस इसीलिए देखिए जो ईरान की जो लोग सरकार में हैं जैसे आईआरजीसी है। मान लीजिए आईआरजीसी क्या है? ईरान की सेना अलग है। आईआरजीसी अलग है। और उसमें इंटीग्रेशन है। ईरान की सेना ईरान देश की है। लेकिन आईआरजीसी खासतौर पे बनी है। इ ईरान की क्रांति की हिफाजत के लिए तो उसका एक अलग तरीका और उसकी अपनी आर्मी है, उसकी अपनी नेवी है, उसकी अपनी एयरफोर्स है और उसकी अपनी एयररोस्पेस इंडस्ट्री है। यानी मिसाइल्स का कंट्रोल उसका है और कोऑर्डिनेशन जाहिर सी बात है जो मेन ईरान आर्मी है उसके साथ है। तो आईआरजीसी इसलिए बनी है कि ताकि जो क्रांतिकारी एलिमेंट सोसाइटी के हैं वो हमेशा नेतृत्व में रहे। और एक परमानेंट रेिवोल्यूशन का जो कांसेप्ट है जो इमाम कुमैनी ने दिया था कि लगातार हर वक्त एक चर्निंग होती रहेगी और इस चर्निंग को आप हमको इनकरेज करना है। हमको दबाना नहीं है। नहीं तो और देशों में आजादी मिलने के बाद या क्रांति होने के बाद एक टेंडेंसी हो जाती है कि नया रूलिंग क्लास उभर जाता है और फिर जो मेहनतकश तबके हैं उनको दबाया जाता है। यहां पर उल्टा हो रहा है। वहां पर मेहनतकश तबके इस जंग के समय बाहर आ गए हैं और वो पूरी सोसाइटी का नेतृत्व अपने हाथ में लेने की प्रक्रिया में है और यही चीज ताकत दे रही है ईरान को इस समय जो ईरान में आप तो समझ ही रही होंगी मुस्तफा खामई नए हैं। अभी जो लारी जानी की जगह जो गदर जो अपॉइंट हुए हैं वो एक और सीक्रेट आर्मी के चीफ हैं। एक और लेयर्स हैं ईरान। तो आईआरजीसी के पास भी तीनचार ऐसी फोर्सेस हैं जो गुप्त हैं। जिनके बारे में हमको नहीं पता। उनमें से एक जो एक जो वहां का ईरान का अपना ओरिजिनल हजबुल्ला है उसके उसके जो चीफ है वो इस समय लारी जाने की जगह नेशनल सिक्योरिटी चीफ बने हुए हैं जो गदर इनका नाम तो वो उस इस तरह के रेडिकल लोग और मैं जब ईरान में था तो ऐसे लोगों से मैं मतलब मेरी मुलाकात हुई थी तो ऐसे रेडिकल लोग जब सत्ता में हैं तो जो आपको दिखाई पड़ रहा है सुनाई पड़ रहा है चाहे वो इजराइल के बर्बादी हो और इसको किसी ने इमेजिन नहीं किया था। चाहे अमेरिका का पीछे हटना हो और रीडप्लॉयमेंट हो जिसके बारे में आगे बात करेंगे। इसमें कोई अटंबा नहीं। मेरे दो सवाल हैं आपसे और पहले मैं ये जानना चाहूंगी कि इससे पहले मैं ये जानूं कि ईरान की आपको अगली स्ट्रेटजी क्या नजर आ रही है? ईरान जो लगातार यह कह रहा है कि हम किसी भी कीमत पर झुकेंगे नहीं। हम किसी भी कीमत पर दबेंगे नहीं। और हमारी शर्तों पर यह जंग खत्म होगी अगर हुई तो। अगर हमारे मकसद पूरे हो जाएंगे उसके बाद। इसी तरह के तमाम जो बातें हैं, बयान है वो ईरान की तरफ से आ रहे हैं। मेरा उससे पहले आपसे सवाल ये है कि पूरी तरीके की सेंसरशिप है इजराइल में। इजराइल के बारे में हमें जो भी कुछ इंफॉर्मेशन हमें मिल पा रही है वो जो अलग-अलग एक्सपर्ट हैं जो अपने एक्सपीरियंसेस से बता रहे हैं या तो वो हमें पता चल पा रहा है या फिर सोशल मीडिया के जरिए जो हमें खबरें मिल जाती हैं वो पता चल पा रहा है। और उस पर भी ये ये है कि जो लोग इस तरह की वीडियो शेयर कर रहे हैं उनको अरेस्ट तक किया जा रहा है वहां पर। मेरा सवाल यह है कि आपके सोर्सेस क्या कहते हैं कि तिलवी से लेकर डुमोना से लेकर हाइफा यहां पर कितना नुकसान आपको लगता है वहां पर हुआ है खासतौर पर न्यूक्लियरसाइड और दूसरा जो एनर्जी जो इंफ्रास्ट्रक्चर है वो कितने बड़े पैमाने पर तबाह हुए हैं इजराइल में और क्या आपको लग रहा है कि ये भी आपको एक रीजन यहां पर नजर आता है कि जो बार-बार ट्रंप की तरफ से कहा जाता है कि अब हम जल्द इस वॉर को खत्म करना चाहते हैं क्या ये भी भी आपको लगता है या यहां पर भी आपको दो बातें लगती हैं कि ट्रंप खत्म करना चाहते हैं। लेकिन नितिन याहू यह चाहते हैं कि हमारे अभी गोल्स कंप्लीट नहीं हुए एंड ही वांट्स टू यू नो ड्रैग दिस वॉर फर्दर। देखिए नेतया इज नो लगर इन कंट्रोल ऑफ इजराइल। यह आप समझ लीजिए। बहुत बड़ा स्टेटमेंट है यह। लेकिन यह आप यह सच्चाई एंड नेतन्याऊ इज़ इन नो पोज़शन टु डिसाइड व्हेन द वॉर विल एंड ट्रंप उस पोजीशन में नहीं है तो नेतन्याऊ तो बिल्कुल ही नहीं इसलिए देखिए जो स्ट्रेटेजिकली ईरान ने इजराइल को मारा है उसकी अब पिक्चर साफ आ रही है कि नॉर्थ इजराइल में उसने हाइफा को मारा जहां उनका पावर स्टेशन है और सेंट्रल ऑफ साउथ इजराइल में उसने दिमोना को मारा जहां उनका न्यूक्लियर सेंटर और दमोना के पास ही जो सिदोदका है बेथ ये बेथ हिमेश है इस तरह की जगह जहां पर उनका सेटेलाइट कम्युनिकेशन सेंटर था जो करीब आज से 10 दिन पहले ईरान ने मार दिया था सैटकॉम और उधर उनकी रिफाइनरी तो वो जो उनकी एनर्जी नीड्स पूरी होती है हाइपर से 50% से ज्यादा इजराइल की एनर्जी नीड एक ही जगह से पूरी होती है हाइपर से उस ऑयल रिफाइनरी उस ऑयल रिफाइनरी का क्या हाल है एक्चुअली यह कोई नहीं बता बता रहा है लेकिन भारी मात्रा में इजराइल के अंदर एक एनर्जी संकट पैदा हो। अब एग्जैक्टली क्या हुआ है इसलिए नहीं बता पा रहे हैं क्योंकि सेंसरशिप है और ईरान एक जहां तक एक सेटेलाइट इमेजरी है ये देखिए सेटेलाइट इमेजरी से आप ये तो देख सकते हैं कि हाईपा का नुकसान हो लेकिन उसमें पूरी तरह से सप्लाई बंद हो गई है। ये सेटेलाइट भी नहीं पकड़ पाएगा। बिकॉज़ दिस इज एन ऑपरेशनल इशू कि वो किसी तरह से जुगाड़ कर रहे हैं। कहीं और से पानी मंगा रहे हैं। यह कर रहे हैं, वह कर रहे हैं। वो हर चीज नहीं। हां ये है कि आईफा का जो ऑयल रिफाइनरी जो जो प्लांट है प्लस वहां पर वाटर प्लांट्स भी हैं उनको ध्वस्त कर दिया गया है। यानी पावर सिचुएशन इजराइल की बहुत खराब है। बिजली नहीं रह रही है। और उधर दिना में जो इनका कम्युनिकेशन सिस्टम है जो इनका सेटेलाइट सिस्टम प्लस इनका जो न्यूक्लियर जो यहां पर वेपंस है उनको एग्जैक्टली स्ट्राइक किया है कि नहीं? क्योंकि कोई रेडियो एक्टिविटी की अभी खबर नहीं आई। लेकिन हो सकता है कि उनके अगल-बगल स्ट्राइक किया हो और यह स्थिति बना दी हो कि वह अपने न्यूक्लियर वेपंस इजराइल वहां से निकाल ना सके। ये एक एक बड़ी चीज और दूसरी बात देखिए जो ईरान की आपने पूछी कि ईरान ने देखिए ट्रंप के 15 पॉइंट को रिजेक्ट कर दिया। ट्रंप के 15 पॉइंट मैं साफ कह रहा हूं फर्जी थे। उसमें कोई सब्सटेंस नहीं था। दुनिया में कोई कोई कुछ भी कह रहे लेकिन वो फर्जी थे। उसमें सब्सटेंस ही नहीं था। इस और ईरान ने फिर जो अपने पांच पॉइंट रखे हैं जिसमें यह है सबसे पहले कि युद्ध बंद इस बार अगर युद्धबंदी होगी सीज फायर होगा तो उसमें गारंटियर्स रह यानी ब्रिटेन फ्रांस सबको लिखित लिखा पढ़ी में साइन करके देना होगा कि यह सीज फायर दोबारा ईरान पे हमला नहीं होगा यह इसकी गारंटी होनी चाहिए नंबर एक नंबर दो सेंशंस हटने चाहिए अभी यूएस ने हटाए हैं सेंश जिससे ईरान को बहुत फायदा है 178 मिलियन बैरल तेल से सेंश हटाए और भी अमेरिका पूरे सारे सेंशंस हटा दे। तीसरी बात कंपनसेशन। अब यह देखिए ट्रिकी सवाल है क्योंकि इंटरनेशनल लॉ के हिसाब से जो अग्रेसर है उसको कंपनसेशन तो देना पड़ता है और जो जिसके खिलाफ अग्रेशन हुआ है वो कंपनसेशन मांग सकता है। अब यहां अमेरिका मानता ही नहीं कि वो अग्रेसर है। जबकि वो अग्रेसर है ही तो ये तो दुनिया के सामने है या वो कहे कि हम इस वजह से अग्रेसर है। तो वो वजह की बात नहीं होती है। जो अग्रेसर है उसको देना पड़ता है। इराक में तो कोई मांगने वाला नहीं था। अफगानिस्तान में तालिबान ने ऐसी कोई डिमांड रखी नहीं अभी तक। लेकिन ईरान रख रहा है कि हमें कंपनसेशन हमको चाहिए। उसके बाद स्टेट्स ऑफ हुर्मू स्टेट्स ऑफ हुर्मूस पर कंट्रोल किसका होगा? ट्रंप ने हिंट किया था कि आयतुल्लाह और वो एक साथ कंट्रोल करेंगे। वो मजाक नहीं था। वो वो उसने एक तरह से प्लान एक दिया था। एक ऑफर दिया था कि ईरान की पार्टनरशिप में अमेरिका कंट्रोल करेगा स्टेट्स ऑफ को। ईरान ने उसको रिजेक्ट कर दिया। ईरान ने कहा कोई सवाल ही नहीं। अच्छा अब पांचवा पॉइंट पांचवा पॉइंट ईरान का ये है कि अगर युद्ध रोकना है तो फिलिस्तीनी जो सिटीजंस है उनपे गोली चलना बंद हो। लेबनन में सिविलियंस पे जो हमले हो रहे हैं इजराइल कर रहा है वो इजराइल बंद करे लेबनन खाली करे। सीरिया में जो इजराइल घुसा हुआ है वहां से वहां से इजराइल हटे और इराक से अमेरिका हटे। तो यह जो सारा है कि मिडिल ईस्ट को अमेरिका खाली करे। इजराइल जो है जिन इलाकों पे कब्जे किए हुए वह खाली करे और जाहिर सी बात है कि इस समय फिलिस्तीन के अलग राज बनने का एक रास्ता इसमें साफ होता है। तो ये देखिए ईरान के पांच पॉइंट्स हैं जिन्होंने दुनिया को इस समय हिला। बिल्कुल। जाहिर सी बात है और लोगों को ये नहीं लगा होगा कि जब ये वॉर शुरू हुई थी तब लोग ये कहते थे कि ईरान कितने दिन टिक पाएगा। अब आप ये देखिए कि इन 25 26 दिनों में किस तरह से पूरी दुनिया का नैरेटिव पूरी दुनिया का जो पर्सपेक्टिव है टुवर्ड्स ईरान हैज़ कंप्लीटली चेंज्ड। नाउ पीपल आर आस्किंग कि अमेरिका कितने दिन टिक पाएगा क्योंकि लगातार वो जो बेचैनी बेकरारी है एक जो रेस्टलेसनेस है वो ईरान में देखने के लिए नहीं मिल रही है। ईरान इज एट ई। उसके मैं यह नहीं कह रही कि उसके ऊपर मार नहीं पड़ रही है। तबाही हो रही है। लोग वहां पर लगातार शहीद हो रहे हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर की बर्बादी हो रही है। वह सब कुछ हो रहा है और ईरान को ये पता था कि होगा इसी तरह से होगा। लेकिन फिर भी आप ये देखिए कि लोग हजारों की तादाद में बाहर निकलते हैं। जो जेस्चर्स हैं उनके लीडरशिप के जो एक लीडर की तरह होने चाहिए वो बिल्कुल एक तरह से वो यकीन अपने लोगों को दिलाते हुए दुनिया को दिलाते हुए नजर आते हैं और यह बताते हुए असर्ट भी करते हुए अपने आप को नजर आते हैं कि देखिए जंग आपने शुरू की है खत्म हम करेंगे हमारी शर्तों पर होगी। तो इन 26 दिनों में 27 दिनों में ये बदला है। पूरी दुनिया जो है वो एक तरह से दबदबा मानती हुई ईरान का नजर आ रही है। एक छोटे से मुल्क ने ये करके दिखाया है दुनिया की सो कॉल्ड जो वर्ल्ड पावर्स हैं उनके सामने। मेरा सवाल आपसे यह अमरीश जी जिसका लगातार एक एक खतशा जो क्रिएट किया जा रहा है कि जो बूट्स ऑन ग्राउंड्स हैं वह किया जा सकता है किसी भी वक्त। एक तरफ ट्रंप इस तरह के बयान दे रहे हैं लेकिन दूसरी तरफ आप ये देखें कि हमले तो नहीं रुके हैं। ना ईरान की तरफ से रुके हैं ना अमेरिका इजराइल की तरफ से रुके हैं। मेरा सवाल ये है कि जो मरीन ट्रूप्स ये जंगी जहाज जो लगातार मोबिलाइज किए जा रहे हैं मिडिल ईस्ट की तरफ इसका मकसद आप क्या देखते हैं? क्या इसका मकसद खर्ड आइलैंड पे किसी तरह का कब्जा करने का है? और क्या इसके लिए ईरान पूरी तरीके से तैयार है? क्योंकि ईरान ने ये कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो एक तरह से उनकी जुबान ये थी कि अपनी कब्र खुद खो देगा अमेरिका। देखिए इसमें सीधी बात है अमेरिका ने अपनी एक बड़ी फोर्स वहां जुटाई है या जुटाने की प्रक्रिया में अभी सच्चाई पूरी तरह से क्लियर नहीं है। एक तो जो इब्राहिम लिंकन पीछे हट गई थी जो उनका एयरक्राफ्ट कैरियर था जो पीछे हट गया था उसने फिर आगे आने की कोशिश की। हालांकि कल खबर आई थी कि उस पे ड्रोंस पर फिर से हमला हुआ है। अब जो जनरल और फोर्ड है जो इनकी सबसे एडवांस्ड 1.1 बिलियन की या आई थिंक अबाउट 11 बिलियन 11 बिलियन डॉलर्स की जो इनकी इनका एयरक्राफ्ट कैरियर है न्यूक्लियर पावर जेरल फोर्ट जिसमें टॉयलेट खराब हो गया जिसमें आग लग गई। फिर वो ग्रीस चला गया रिपेयर के लिए। अब वो वहां से खबर है कि वहां से चल दिया है। लेकिन इस खबर का एतबार अभी हम लोग को नहीं हो रहा है। उसके बाद देखिए जो मेन चीज अब ट्रंप एक नया पत्ता लाए वो एयर क्योंकि एयर पावर में F18 जहाज गिरा दिए ईरान ने। F35 गिरा दिए। F15 F16 गिरा दिए। अब कोई अमेरिका के पास बचा नहीं। यह जो मिथ था कि अमेरिकन स्टल्थ टेक्नोलॉजी इनमिनसिपल है कि खास तौर पर F35 कि ये बिल्कुल इनको कोई मार नहीं सकता इनको रडार नहीं पकड़ सकता वहां ईरान ने इंफ्रारेड सेंसर्स यूज़ कर और इंफ्रारेड सेंसर्स जो हैं जो जहाज रडार को एवेट कर सकता है वो इंफ्रारेड सेंसर को एवेट नहीं कर सकता क्योंकि इंफ्रारेड सेंसर हीट को पकड़ते हैं और यह जो F35 जहाज है यह हीट बहुत इमिट करता है। उनको मतलब ही नहीं है। ट्रेडिशनल रडार के जो फंक्शन होते हैं रेडियो फ्रीक्वेंसी छोड़ना या कुछ और फ्रीक्वेंसी छोड़ के और हवाई जहाज के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वेव्स को पढ़ना ये इंफ्रारेड सेंसर का काम नहीं है। वो हीट को पड़ता है। तो ये चीज अमेरिका को पता नहीं थी। और ये इसके माध्यम से इस टेक्नोलॉजी के माध्यम से ईरान ने अमेरिका के कई ऐसे जहाज हवाई जहाज गिरा। तो कहने का मतलब यह है कि समुद्र की लड़ाई और द बैटल इन द एयर इन दोनों में अमेरिका पटकनी खाया। अब तीसरा वो एक्सप्लोर कर रहा है ग्राउंड इनवेज जहां ईरान सबसे मजबूत है। एयर और नेवी में तो फिर भी ईरान को ऐसे ट्रेडिशनल फ़ नहीं माना जाता। अनकन्वेंशनल फ़ की लेकिन उसने अपने अनकन्वेंशनल अप्रोच से ही बहुत कुछ दिखा। अब ग्राउंड इन्वजन में तो वहां तो ईरान मजबूत है। तो यह क्या कर रहे हैं कि अपने मरींस इकट्ठा कर रहे हैं। कमांडोस बहुत ही स्पेशलाइज और हाली ट्रेन। अब इनका भी इतने मिथ्स हैं जैसे मरीन एक्सपिडिशनरी फोर्स है 11th मरीन एक्सपीडिशनरी फोर्स जो वहां से यूएसएस त्रिपोली से आई है मतलब यूएसएस त्रिपोली पर आई है उधर से चाइना की तरफ से और वो मिडिल ईस्ट में उसकी पहुंचने की उम्मीद है। उधर से डेल्टा फोर्स आ रही है। उधर से 8 एयरबर्न डिवीजन आ रही है। पैराशूटर्स यानी खरकालीन पे सीधे ऊपर से पैराशूट वो लोग पैराशूट करेंगे। उसके बाद नेवी सील्स आ रहे हैं। और यह सब फर्सेस जो है यह एफीबियस एसॉल्ट के लिए फेमस है। यानी यह समुद्र और जमीन पर एक साथ लड़ सकते हैं और ये कहीं भी रह सकते हैं। कुछ भी खा पी के रह सकते हैं। मतलब ये इनको माना जाता है कि ऐसे एक-एक सोल्जर एक मॉन्सर है। आप समझ लीजिए। ऐसा ऐसा दिखाया जाता है। डेल्टा फोर्स है वो भी आ रही है। रेंजर्स हैं। ये सब जो है ये 5 6 हजार ये सोचिए एक-एक आदमी एक दानव है। इस टाइप से प्रोट्रे किया जाता है। वो है कि नहीं वो तो पता लग जाएगा। लेकिन इनकी ट्रेनिंग ऐसी दी गई तो अमेरिका देख रहा है ईरान। लेकिन इससे भी विचलित नहीं है। इससे भी वो बहुत ज्यादा घबरा नहीं रहा है क्योंकि ईरान को पता है कि है तो वो इंसान और वो उनको मारा जा सकता है। मतलब ऐसा तो है नहीं कि वो एलियंस हैं या कुछ ऐसा इन्वेशन हो गया है। हालांकि दिखाया ऐसा जाता है। तो इसलिए देखिए ये सारी बातें जो है इसमें ईरान का का एडवांटेज है। खर्क आइलैंड की जो टोपोग्राफी और उसकी ज्योग्राफी है उसमें पहाड़ हैं, गुफाएं हैं वो अमेरिकनंस के लिए आसान नहीं है। वो ऐसा सिनेरियो अपने वहां अमेरिका में रिकक्रिएट कर चुके हैं ट्रेनिंग के लिए। लेकिन सिनेरियो रिकक्रिएट करके ट्रेन करना और एक्चुअल ट्रेन पे आके ट्रेन करना वो एक अलग चीज हो जाती है। वहां पर ईरान पूरी तरह से तैयार है। मिसाइलें बिछी हुई है। चारों तरफ गुफाओं में सोल्जर्स हैं। हर आइलैंड में ये लोग उतरेंगे या तो उतरने ही नहीं दिया जाएगा। हवा में ही मार देंगे। और अगर उतर गए तो उसके बाद उनको वहां से निकलने नहीं दिया जाएगा। ये जी। क्या सऊदी अरब और यूएई वॉर में सीधे तरीके से शामिल हो सकते हैं? क्योंकि वर्ल्ड स्ट्रीट जनरल, न्यूयॉर्क टाइम्स इस तरह के तमाम जो मीडिया हाउसेस हैं, न्यूज़ पोर्टल्स हैं उनकी तरफ से यह खबर चलाई गई और यह कहा गया और तमाम मीडिया ने इसको पिकअप किया कि यूएई और जो सऊदी अरब है वो सीधे तौर पर शामिल हो सकते हैं इस जंग में। कहा यह भी गया कि यूएई और सऊदी अरब दोनों ने यह कहा है कि आप भी इस जंग को रोकिए मत। इस जब तक ईरान खत्म नहीं हो जाता तब तक आप इस जंग को जारी रखिए। ये तमाम खबरें चलाई गई। आपको क्या लग रहा है कि एक तरफ तो हम ये देख रहे हैं कि लगातार जो जीसीसी कंट्रीज हैं उनके अमेरिकन बेसिस पर वहां पर जो अमेरिकन इंटरेस्ट हैं उस पर लगातार निशाना बना ही रहा है ईरान। लेकिन उनकी तरफ से ये अभी तक सीधे तौर पर नहीं कहा गया है कि हम भी इसी तरीके से ईरान के ऊपर कोई डायरेक्ट हमला करेंगे। क्या आपको लग रहा है आगे आने वाले दिनों में यह भी कोई पॉसिबिलिटी बनती हुई आपको नजर आ रही है? देखिए ये तो सब पिछले दो-तीन दिन की खबरें हो गई। पुरानी होगी। आज जो लेटेस्ट खबर है वो क़तर से है। क़तर का बयान आया है कि हम ईरान के साथ हैं। और क़तर के बिना क़तर के बिना सऊदी अरेबिया कतई हिम्मत नहीं करेगा कुछ करने की। क्योंकि अगर वह जितना देखिए इस समय ईरान ने केंद्रित किया है यूएई पे और यूएई चाहे जितना उसके पास कुछ नहीं है। उसके पास जो है अमेरिकन बेसिस थे जो काफी हद तक वहां से खाली हो गए और उस अब यूएई अच्छा जो पावर थोड़ी बहुत भी जिसके पास कुछ है वो इजिप्ट, टर्की, क़तर और सऊदी अरेबिया है। अदरवाइज आप तो जानते हैं कुवैत और बहरेन का कोई मतलब नहीं है। मिलिट्री टर्म्स में ओमान वैसे भी ईरान से लड़ेगा। क़तर ने कह दिया कि ईरान हमारा दोस्त है। कोई एनलेशन की बात गलत है कि ईरान को खत्म कर दो, यह कर दो। ऐसा कुछ नहीं है। हम ईरान के साथ हैं। सऊदी अरेबिया से जो खबर आई थी उसका खंडन सऊदी अरेबिया ने कर दिया है। उसने कहा हमने कभी ऐसा नहीं कहा था कि ईरान को निपटा दो। तो ये देखिए अभी आप पर्दे के पीछे क्या हो रहा है, क्या नहीं हो रहा वो अलग एक अलग सवाल है। पर पॉलिटिकली अभी कोई भी अरब देश ईरान के खिलाफ नहीं जा सकता है। क्योंकि ईरान ने फिलिस्तीन का सवाल उठा दिया है। और फिलिस्तीन का सवाल ऐसा है सेंसिटिव है। दुखती रग है पूरे अरब नेशन की या अरब जितने भी मुल्क हैं कि वो इस पे कुछ बोल ही नहीं सकते। वो इसमें लेकिन एक काउंटर एक काउंटर ये है मेरा अमरीश जी कि आप ये कह रहे हैं कि ये अरब कंट्रीज क्योंकि फिलिस्तीन के सवाल पर ये कुछ नहीं कह सकते। यह बहुत सेंसिटिव इशू है। लेकिन जब फिलिस्तीन में जो कुछ हो रहा है उसके लिए आखिर इन अरब कंट्रीज ने किया क्या है? उन्होंने तो कुछ भी नहीं किया इसको लेकर और एक तरह से वो एक एक मूक दक्षक की तरह इसको बैठकर सिर्फ तमाशा जैसे होता है ना देखते हैं। बिल्कुल उसी तरीके की कैफियत इन लोगों की नजर आई है। अगर इस सब पर किसी ने कोई स्टैंड लिया है तो ईरान मुझे लगता है कि एक ऐसा कंट्री है जिसने स्टैंड ही नहीं लिया बल्कि उसने हिज्जबुल्लाह और हमास इन इन सबको एक तरह से मजबूती भी उन्होंने दी है। एक तरह से ये उनके अलाय भी कहे जाते हैं। प्रॉक्सीस ने अलय भी कहे जाते हैं। तो मेरा सवाल यह है कि जब आप यह बात कहते हैं तो क्या यह यह भी तो एक तस्वीर सामने फिर निकल कर आती है। नहीं नहीं उन्होंने किया नहीं वो बात भी सच है। सवाल लेकिन ये नहीं है। सवाल यह है कि नहीं करना और जो कर रहा है उसका साथ देना उसमें फर्क है। भाई यहां तो बात हो रही है कि वेस्टर्न मीडिया यह कह रहा है कि अरब देश अमेरिका इजराइल का साथ दे। तो अमेरिका इजराइल का साथ वह नहीं दें। हम वह फ़िलिस्तीन के सवाल पे क्योंकि ईरान ने फिलिस्तीन का सवाल उठा दिया है। उनको पता है कि फिलिस्तीन के सवाल पे हमको तटस्थ ही हम रहे तो वही अच्छा है। और ईरान को यह सूट करता है कि अरब देश जो है चुप रहें। ईरान के साथ रहे या फिलिस्तीन के साथ रहें और इधर जो जंग है वह अमेरिका, इजराइल वर्सेस ईरान ही रहे और कोई इसमें ना आए। कि यूएई को तो बर्बाद कर ही चुके हैं। यूएई के पास कोई फोर्स भी नहीं है। तो इसलिए अभी जो ये जो अच्छा पाकिस्तान वगैरह की बात है कि पाकिस्तान में बातचीत हो सकती है। तुर्की में बातचीत हो सकती है। तो तुर्की देखिए एक अपने में बड़ी पावर है। नेटो का वो हिस्सा है। टर्की इज पार्ट ऑफ नेटो। तो और टर्की भी सॉफ्ट है ईरान के प्रति। इस पूरे टर्की पे भी हमले हुए। वहां पे जो अमेरिकन बेससेस हैं ईरान ने डिनाई कर दिया। फिर यह हुआ कि वह इजराइल ने ही कराए होंगे फॉल्स फ्लैग और ऐसे कई फॉल्स फ्लैग टर्की पे ईरान इजराइल सॉरी इजराइल ऐसे कई फॉल्स फ्लैग अटैक्स टर्की पे पहले कर चुका है। इसलिए टर्की भी ईरान के साथ है। अभी जो वेस्टर्न मीडिया ये दिखाने की कोशिश कर रहा है कि कि जब से ट्रंप ने पांच दिन की बमबारी बंद की है। मतलब पांच दिन के लिए बमबारी बंद की है। तब से इस्लामिक मुल्क ईरान पे प्रेशर डालने समझौता कर लो। सच्चाई यह नहीं है और ऐसी कोई स्थिति नहीं है कि वह ईरान पे प्रेशर डाल लें। बात करेंगे। बात तो भाई हमारे प्रधानमंत्री ऑफ पेजिशियान की भी हो या ट्रंप ने भी मोदी को कॉल किया जिस भी संदर्भ में किया हो लेकिन लोग तो यही कह रहे हैं कि वो इस जंग के संदर्भ में किया तो ये देखिए बातचीत तो चले ईरान ईरान में ऐसा थोड़ी ना है कि आप बातचीत करना चाहिए कोई बातचीत ना करे लेकिन सवाल है शर्तें मानना और अब ईरान ने एक लाल एक रेखा खींच दी है कि यह युद्ध इस युद्ध का रिमोट कंट्रोल हमारे हाथ में है। इस युद्ध पे हावी हम हैं। अपर हैंड हमारा है। इसलिए हमारी शर्तें मानी जाए। अमेरिका की शर्तें हमें माननी है। अमेरिका उस स्थिति में भी नहीं है कि वह शर्तें पेश कर सके। और जो सबके ज़हन में जो सवाल है वो यही कि यह जंग आपको कितनी लंबी खींचती हुई नजर आ रही है। लोगों को यह लग रहा है। पहले भी लगा कि शायद एक हफ्ते में खत्म हो जाएगी। फिर 10 दिन में लोगों को लगा यह खत्म हो जाएगी। लेकिन अब आप ये देखें कि लगभग एक महीना इस जंग को होने जा रहा है और ऐसे में अभी हाल फिलहाल में तो नहीं लग रहा है कि ये जंग थमने जा रही है। हालांकि थोड़ी सी आईज ब्रेक करने की कोशिश जरूर है। कुछ कंट्रीज सामने निकल कर आए हैं जो नेगोशिएशन की बात कर रहे हैं। लेकिन जिस तरह की शर्तें ईरान ने रखी हैं वो अमेरिका मानेगा ये भी बहुत दूर की बात लगती है। तो आपको क्या लग रहा है? ईरान की आगे स्ट्रेटजी क्या है और इस वॉर को आप कहां जाता हुआ देख रहे हैं? बिकॉज़ सम एक्सपर्ट्स आर सजेस्टिंग दैट यू नो दिस वॉर इज़ नॉट काइंड ऑफ़ अ वॉर जो लोग सोच रहे हैं कि हमला किया गया और यहां पर लीडरशिप आपने खत्म कर दी। फिर कुछ दिन के बाद यह एक तरह का बदला लिया ईरान ने और फिर कहीं बीच में आकर यह जंग जो है वो एक तरह से खत्म हो जाएगी। जहां अमेरिका यह कहेगा कि हम विनर हो गए। ईरान तो जाहिर सी बात है दुनिया को बता ही रहा है कि उसने किस तरह से क्या कुछ इजराइल के साथ और जीसीसी कंट्रीज के साथ क्या उसने किया है और किस बहादुरी से वो लड़ रहा है। तो वही मेरा सवाल फिर कि क्या ये वॉर आप पिछली तमाम वॉर से कितनी डिफरेंट आप इसको मान रहे हैं और कितने लंबा आप इसको खींचता हुआ देख रहे हैं। नहीं ये तो सही बात है कि ये वॉर डिफरेंट है और ये भी आपको बता दें कि ये जल्दी खत्म होने वाली नहीं है। अनलेस एंड एंटल इजराइल की हालत देख के अमेरिका सरेंडर कर दे। ये भी हो सकता है क्योंकि इजराइल की बहुत बुरी स्थिति और अमेरिका को कोई डायरेक्ट थ्रेट नहीं है। वो तो सच्चाई है और अमेरिका में रेिग्नेशन शुरू हो गए हैं कि अमेरिका को कोई डायरेक्ट थ्रेट नहीं तो हम क्यों इजराइल के लिए लड़े? इजराइल के लिए मरे। अमेरिकन सोल्जर्स में अभी [गला साफ़ करने की आवाज़] हविंगटन पोस्ट बहुत फेमस अमेरिकन साइट है। हविंगटन पोस्ट ने बकायदा अमेरिकन सोल्जर्स का सर्वे किया था। मिडिल ईस्ट में जो हैं और उनमें से ज्यादातर ने 80% ने कहा था हम इजराइल के लिए मरना नहीं चाहते। तो इसलिए इस वॉर को अमेरिकन अमेरिका का सपोर्ट नहीं है। इजराइल का सपोर्ट है। इजराइल में 70% जनता चाहती है युद्ध हो। लेकिन वो इसलिए चाहती है कि अमेरिका के कंधे पर रख के बंदूक चला रहे थे वो अभी तक। अब अमेरिका पीछे हट गया है तो वह पिट रहे हैं। तो इसलिए इजराइल में भी एक थिंकिंग आ रही है कि नेत्र्याओं की वजह से हम मारे जा रहे हैं। तो इसलिए देखिए इस जंग का अभी कुछ कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन अभी जब ट्रंप के पांच दिन पूरे होंगे अभी शायद आज तीसरा दिन है दो दिन और हैं। उसके बाद क्लियर होगा। और जो ग्राउंड और जो ग्राउंड इन्वजन के लिए जिन फोर्सेस को जिन मॉनस्टर्स की फर्सेस को भेजा है। मैं मॉनस्टर्स गलत सेंस में नहीं कह रहा हूं। मैं इन जनरल तो जिन उनको भेजा है सोल्जर्स को वो वाकई उनका ग्राउंड असेसमेंट क्या होगा क्योंकि ये जो सारी फर्सेस हैं ये बहुत स्पेशलाइज्ड फर्सेस हैं। इनके अपने स्पेशलाइज्ड कमांड्स हैं और ये ग्राउंड का पहले असेसमेंट करती कि इस ग्राउंड पे हम कैसे लड़ेंगे। अब वो असेसमेंट अभी दिया है नहीं दिया है। यह सब बहुत इंपॉर्टेंट ऐसी चीजें हैं ऑपरेशनल जिसकी वजह से ग्राउंड इन्वजन टल भी सकता है, जल्दी हो भी सकता है। लेकिन ग्राउंड इन्वजन अगर हुआ तब तो यह जंग बहुत लंबी खींच जाएगी। तब तो फिर ऐसी इतनी लंबी खींचेगी कि अभी कुछ भी उसका उसके बारे में कहना बेकार है। अब सवाल यह है कि अमेरिका अगर पहले ही हमले में हार गया और पीछे हट गया। लेकिन अगर अमेरिका टिका रहा और फर्सेस भेजता रहा और फर्सेस जैसे वियतनाम में हुआ वियतनाम में यह थोड़ी ना किसी ने सोचा था 10 साल लड़ाई चलेगी लेकिन वियतनाम में अमेरिका जैसे-जैसे हारता गया वैसे-वैसे और फर्सेस भेजता गया उसके पास ये ये रिसोर्सेज तब भी थे आज भी है कि वो अफोर्ड कर सकता है। फिर जब पब्लिक बैकलैश हुआ और जब ग्राउंड पे वो उन्होंने देखा कि हम नहीं जीत रहे हैं। उनके सोल्जर्स भी समझ गए कि हम नहीं जीत रहे हैं तो वो पीछे हट गया। अमेरिका विथड्रॉ कर गया वहां से। उसी तरीके से यहां पर भी अभी देखिए धीरे-धीरे जिससे अमेरिका में होता है वह एक एक वे एक भेजते हैं पैच पे दूसरा भेजेंगे फिर तीसरा भेजेंगे, चौथा भेजेंगे। अगर वो प्रक्रिया चली तो फिर यह युद्ध का कुछ नहीं कहा जा सकता। और अगर अमेरिका पहले ही झटके में पीछे हो गया तो फिर यह युद्ध शायद फिर भी 15 20 दिन एक महीने में रुक सकता है। मेरा लास्ट क्वेश्चन आपसे कि अगर यह युद्ध जो है वो आगे आपको खींचता हुआ नजर आता है। मान लीजिए कि एक महीना होने जा रहा है। लेट्स से कि एक महीना और आगे चलता है। और अभी जिस तरह से हम यह देख रहे हैं कि ऑयल क्राइसिस जो है पूरी दुनिया में देखने के लिए मिल रहा है। गैस का जो क्राइसिस है एलपीजी का वो हमें देखने के लिए मिल रहा है। यूरिया की हम बात करें, खाद की हम बात करें, वह तमाम क्राइसिस भी देखने के लिए मिल रहा है। बहुत सारे मुल्क ऐसे हैं जिन्होंने पार्शियल लॉकडाउन लगा दिया है। वर्क फ्रॉम होम की वो बात कर रहे हैं। जरूरत पड़ने पे ही घर से बाहर निकलने की वो बात कर रहे हैं। अभी की का डेवलपमेंट यह है कि कुछ कंट्रीज को उन्होंने ये बोल दिया है फ्रेंडली कंट्रीज को जिसमें इराक का नाम लिया है, पाकिस्तान का नाम लिया है, इंडिया का नाम भी है उसमें। और इसके अलावा चाइना और रशिया तो पहले से हैं ही। कि ये पांच कंट्रीज जो हैं उनके जहाज स्टेट ऑफ हॉर्मोस से उन्होंने ईरान ने गुजारने की इजाजत दे दी है। हालांकि जो खबर है उसमें मोदी का नाम नहीं है। गवर्नमेंट का नाम नहीं है। लेकिन उन्होंने एक कहा है कि जो हमारे फ्रेंडली जिनसे हमारे रिश्ते हैं उनकी उन्होंने बात की है। इसको इस तरह से देखा जा रहा है कि मे बी जिस इट इज़ बिकॉज़ ऑफ़ द पीपल ऑफ इंडिया। जिस तरह का उनका पूरा जेस्चर रहा है। खासतौर पे कश्मीर से जो हमने तमाम तस्वीरें देखी। क्या आप फिर इस जंग को अगर ऐसे बढ़ती है तो पूरी दुनिया में किस तरह का क्राइसिस पैदा होता हुआ आप देख रहे हैं और दूसरा कि क्या आपको लग रहा है कि फिर इसमें नेटो कंट्रीज से लेकर जीसीसी कंट्रीज सीधे तौर पर शामिल होते हुए क्या इस तरफ भी आप इसको बढ़ते हुए देख रहे हैं क्या इसका दायरा जो अभी जीसीसी तक ही महदूद है क्या आपको लग रहा है फिर वो पूरी दुनिया तक फैल सकता है हां बिल्कुल पूरी दुनिया में क्राइसिस पैदा होगी फूड ग्रेन क्राइसिस भी पैदा हो सकती है बहुत क्योंकि देखिए पेट्रोकेमिकल्स पे बहुत कुछ डिपेंडेंट है। प्लास्टिक बनता है, रबड़ बनता है। अभी गुजरात में प्लाईवुड की का बिजनेस ठप्प पड़ा है। और भी बहुत सारी चीजें हैं। एलुमिनियम उसमें भी जरूरत गैस की होती है स्मेल्टिंग में। तो ऐसी बहुत सारी चीजें हैं जो प्रभावित होंगी और ग्लोबल स्तर पे हो। तो यह हो सकता है कि दुनिया में एक इकोनॉमिक क्राइसिस आए इस जंग की वजह से और फिर उस इकोनॉमिक क्राइसिस में क्या होगा कि उस समाज अंदर से उनकी चर्निंग होगी और वहां भी रिजीम चेंज हो सकता है। जैसे गल्फ कंट्रीज में रिजीम चेंज हो सकता है। ईरान ने ऐसी प्रक्रिया शुरू कर दी। अपने आप वहां की जनता अपराइजिंग कर सकती है। भारत जैसे देशों में बहुत सारे और और देश जहां अगर बेरोजगारी बढ़ गई, महंगाई बढ़ गई ईरान के सवाल पे तो यहां एक दूसरी स्थिति पैदा हो सकती है। तो इसलिए देखिए ये जंग जैसे हमास ने 7 अक्टूबर 2023 के बाद दुनिया बदल दी। वैसे ही ईरान ने 28 फरवरी 2026 के बाद दुनिया बदल दी और इसको दुनिया जितनी जल्दी समझे उतना उसके फायदे में है। वरना वो पुरानी तरीके से अगर सोचेगा तो इसमें लोग वैसे ही मारे जाएंगे। कुछ जंग में मारे जाएंगे। कुछ जंग और ज्यादातर जंग के बाहर मारे जाएंगे जिनको समझ ही में नहीं आ रहा है क्या हो रहा है। जी महत्वपूर्ण बात आपने कही है और लास्ट आपकी जो लाइन है वो इस पूरी बातचीत का एक तरह से सार है कि जो 28 फरवरी के बाद से ईरान ने दुनिया बदल दी। बिल्कुल उसी तरीके से जैसे अक्टूबर सात के बाद से हमास ने एक तरह से दुनिया बदली और उस वो देखें कि आप जो पैलेस्टाइन में जो हुआ उसके बाद पूरी दुनिया में जो पैलेस्टाइन को लेकर एक एक हमदर्दी और ये जो असली चेहरा इजराइल और अमेरिका का है जो घिनौना चेहरा है वो लोगों के सामने निकल कर आया और अब बिल्कुल वैसा ही ईरान के साथ जो जंग इललीगल जो वॉर है उसमें भी बिल्कुल उसी तरीके से देखने के लिए मिल रहा है। बहुत-बहुत शुक्रिया अमरीश जी आपका वक्त देने के लिए, नाउ नेटवर्क के साथ जुड़ने के लिए। आई एम श्योर हमेशा की तरह आज का भी यह पडकास्ट काफी लोगों को पसंद आएगा। बहुत-बहुत शुक्रिया जुड़ने के लिए। थैंक थैंक

Companion article

A month into open war between Iran, Israel and the United States, host Bushra Khan Fahad put a blunt question to the author and political analyst Amaresh Misra on Nous Podcast: is Donald Trump's stream of contradictory statements — declaring victory one day, mobilising troops the next — a deliberate strategy, or something closer to delusion? Misra's answer, developed across the conversation, was that Iran has systematically dismantled the premises the war began on, and that the contradictions in Washington's messaging are a symptom of that reversal rather than a plan.

A president talking to himself

Misra opened by comparing Trump's behaviour to a well-documented pattern among certain Roman emperors — he named Caligula and Nero specifically — who, in his telling, genuinely believed their enemies had already been defeated before them, mistaking poison for a gift and a gift for poison. He was careful to frame this as historical pattern rather than diagnosis: what is different now, he said, is the technology and the scale, not the underlying psychology of a leader losing touch with events on the ground.

Where Joe Biden's failure, in Misra's account, was that he stopped registering information altogether, Trump's version is that he actively constructs his own record of daily "achievements" — a distinction Misra called a sign of a leader in a state of extreme delusion, compounded, he argued, by Benjamin Netanyahu's own obsessive drive to see the war through regardless of cost. The pairing of the two men, he suggested, is what produced the abnormal character of this war.

Reading the damage through the blackout

With Israel operating under wartime censorship, Misra said, most detailed information about the state of the country is reaching the outside world through social media rather than official channels or credible satellite analysis, since satellite imagery can show structural damage but not whether supply chains have actually failed. On that basis, he described Haifa's power station and desalination plant as destroyed, cutting deeply into an energy supply that meets more than half of Israel's needs, and named Dimona — the site of Israel's nuclear programme and satellite communications — and the nearby Beit Shemesh satellite hub as targets Iran struck roughly ten days into the war.

He was careful to note the limits of what can be confirmed: no radioactivity has been reported at Dimona, he said, which likely means Iranian strikes hit facilities around the nuclear site rather than the core itself, but in a way that may have made it impossible for Israel to safely move weapons stored there. Combined with the Haifa refinery, which he said supplies the bulk of Israel's oil needs, the picture Misra drew was of a country in a deepening energy crisis it cannot openly acknowledge.

Iran's five conditions

Misra dismissed Washington's own fifteen-point proposal for a ceasefire as "fake," without substance, and said Iran had rejected it outright in favour of five conditions of its own. First, any ceasefire must come with written guarantees — signed by Britain, France and other powers, not just the US — that Iran will not be attacked again. Second, all US sanctions must be lifted, not merely the recent easing that has already let an estimated 178 million barrels of oil back onto the market. Third, Iran is demanding compensation, a demand Misra called legally awkward for Washington to refuse in principle, since international law obliges an aggressor to compensate the party it attacked — but one Washington cannot accept without conceding it was the aggressor in the first place.

The fourth condition concerns control of the Strait of Hormuz. Misra said Trump had floated joint US-Iranian control of the strait — with "the Ayatollah and I" managing it together — and that this was a genuine proposal, not a joke; Iran rejected it outright. The fifth condition is the broadest: an end to Israeli fire on Palestinian civilians, an Israeli withdrawal from Lebanon and Syria, and a US withdrawal from Iraq — in effect, a demand that the region be vacated by both occupying and basing powers, opening space, Misra argued, for an independent Palestinian state.

The battle in the air, at sea, and what a ground invasion would mean

Misra's account of the war's military trajectory rests on a specific technical claim: that Iran defeated American stealth technology not by beating its radar-evading design, but by ignoring radar altogether. Aircraft like the F-35, he said, emit enormous amounts of heat, and Iran used infrared sensors — which track heat rather than radio-frequency signatures — to shoot down F-18s, F-35s, F-15s and F-16s. The premise that stealth aircraft were effectively unkillable, he argued, has collapsed.

At sea, he pointed to reported technical failures aboard the USS Gerald R. Ford, the US Navy's newest and most expensive carrier, and to the USS Abraham Lincoln's carrier group withdrawing and then attempting to return, only for its drones to reportedly come under fresh attack. With both the air and naval campaigns faltering by his account, he said the US is now exploring a ground invasion — the one domain where Iran is conventionally considered strongest rather than weakest.

He described the forces being assembled for that scenario — the 11th Marine Expeditionary Unit arriving via the USS Tripoli, Delta Force, the 82nd Airborne, Army Rangers and Navy SEALs — as elite units built for amphibious assault, but noted that Iran has spent years fortifying Kharg Island's caves and mountainous terrain specifically against this contingency. Rehearsing an invasion scenario on American soil, he said, is not the same as executing one on ground Iran has spent years preparing to defend, missile emplacements and all.

Arab silence and Qatar's dissent

Asked whether Saudi Arabia and the UAE might join the war directly, as some Western reporting had suggested, Misra said the more recent and more telling signal was Qatar's public statement that it stands with Iran — a position, he said, that makes it politically impossible for Saudi Arabia to act against Tehran without Doha's cover, since neither Kuwait nor Bahrain carry independent military weight and Oman would not fight Iran regardless. Saudi Arabia, he added, has already denied the reports attributed to it.

The deeper reason Arab governments cannot move against Iran, in Misra's telling, is that Iran has explicitly put the Palestinian question at the centre of the war — the one issue no Arab government can be seen opposing, whatever it has or has not done for Palestinians in practice. He drew a distinction between not acting on Palestine, which is true of most Gulf states, and actively joining a war against the one state that has backed Hezbollah and Hamas materially. Turkey, a NATO member, he said, has also stayed quietly aligned with Iran, dismissing Israeli-attributed strikes on Turkish soil as false-flag operations of a kind Israel had allegedly carried out before.

A war already reshaping the world

Misra argued the war has already produced a global economic shock, visible in oil, gas, fertiliser and petrochemical shortages that ripple into industries as specific as Gujarat's plywood sector, and warned this could deepen into a wider crisis affecting food grains, given how much of that supply chain runs through petrochemical inputs. That economic strain, he suggested, carries its own political risk of triggering unrest and even regime change in states far from the immediate battlefield, echoing what he described as an internal social uprising already under way inside Iran itself — one he characterised as a second revolution, distinct from 1979, driven by ordinary workers, women and men taking to the streets in support of the state against the war rather than against it.

He closed by rejecting the idea that Iran had granted safe passage through Hormuz to five "friendly" countries — including India, Pakistan, Iraq, China and Russia — as a favour to the Modi government specifically; he read it instead as recognition of Indian public sentiment, pointing to displays of solidarity from Kashmir, even where New Delhi itself has stayed silent. Misra's closing framing was direct: just as Hamas's October 7, 2023 attack changed the world, he said, Iran's conduct since the war began has changed it again — and the world would be better served understanding that quickly rather than waiting for the casualties, in and out of uniform, to make the point for it.

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