Nous Shorts· 20 Jun 2026· 2:43

Manmohan Singh, Muslims, and the Politics of Justice

"The Sachar Committee exposed the myth of Muslim appeasement."

Full Transcript

मनमोहन सिंह की जब सरकार थी, 10 साल तो मुल्क का कम्युनल टेंपरेचर ऑल टाइम लो था। कोई बड़े फसाद नहीं हुए थे, बड़ी इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थीं जो पिछले 12 साल से अब देखने को मिल रही हैं। और उन्होंने दो बड़े काम किए। एक, सच्चर कमेटी बनाई कि यह पता चले कि भाई मुसलमानों की इस मुल्क में सूरतेहाल क्या है। पहली बार हुआ था कि यही कहा जाता था कि साहब अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में बातचीत होनी चाहिए, मुसलमानों के बारे में नहीं। और दूसरी तरफ जो संघ परिवार और उसके समर्थक दल हैं वो ये कहते थे कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है, अपीज़मेंट हो रहा है, इन्हें सब कुछ मिल गया। लेकिन उस सच्चर कमेटी ने जो पार्लियामेंट में जब टेबल की गई तो उसने सारी सूरतेहाल बयान की। उसने कम्युनिस्ट पार्टियों को भी एक्सपोज़ किया कि बंगाल में सबसे ज्यादा बुरी हालत मुसलमानों की है, वो बंगाल में है जहां 30% से ज्यादा मुसलमान हैं — तो उसने फिर एक्सपोज़ कर दिया उस पूरे प्रोपगेंडे को, अपीज़मेंट को। और फिर दूसरा बड़ा काम यह हुआ कि मिनिस्ट्री ऑफ माइनॉरिटी अफेयर्स बनी, हालांकि वो मेरे नज़दीक नॉन-स्टार्टर ही रही है, बन गई है, लेकिन उसको खत्म करने की हिम्मत नरेंद्र मोदी हुकूमत में भी नहीं थी। और वहां थोड़ा-बहुत जो भी कहिए कुछ काम हो रहा है, माइनॉरिटी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बना है, वक्फ से रिलेटेड कुछ चीज़ें हैं, लेकिन उसमें कम्युनिटी का भी एक रोल होना चाहिए, वो नहीं होता है, वो अपने घरों में बैठे हुए हैं कि भाई हम इसमें क्या करें, जो भी सारी चीज़ें आती हैं वो हम पॉलिटिकल पार्टी, सरकार और दूसरे लोगों पर नहीं थोप सकते कि साहब इनकी वजह से हमारे साथ ज़्यादती होती है। मेरा सवाल यह है कि आप बहैसियत कम्युनिटी क्या कर रहे हैं, और अपने राइट्स के लिए लड़ने को आपको किसने रोका? इस मुल्क का आईन आपको यह हक देता है कि आप निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जाएं। एक बार, दो बार, तीन बार, दस बार आपकी ये अपीलें खारिज होंगी, लेकिन वो रिकॉर्ड पर तो आएगा मामला। कभी न कभी तो यह बात होगी कि इस तरह की चीज़ें नहीं होनी चाहिए। आपने जो बात की कि लिंचिंग हो रही है, बुलडोज़र चल रहा है — बुलडोज़र के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया। अब उस पर इम्प्लीमेंटेशन हो पाता है कि नहीं, यह देखने का काम तो आपकी सिविल सोसाइटी का भी है। आपके जो लोग मीडिया में हैं, या जिस भी तरह से कंसर्न्ड सिटीज़न के तौर पर हैं, उनको भी तो आगे आकर इन बातों को करना चाहिए। हम यह अपने घर में बैठ जाते हैं कि यह सारी चीज़ें दूसरे — जो ह्यूमन राइट्स के ऑर्गेनाइज़ेशन हैं वो हमारी बात करें, पॉलिटिकल पार्टीज़ हमारी बात करें, और हम खुद कुछ न करें, डर और खौफ की हरास में घर बैठ जाएं।

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