2:30Ottoman Caliph: What Happened After 1924?
“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
"Constitutional protections for minorities are not appeasement—they are compensation."
लेकिन क्योंकि माइनॉरिटी माइनॉरिटी है, लेकिन क्योंकि माइनॉरिटी माइनॉरिटी है, अक्सरियत अक्सरियत है और उसको जो आपका आईन अक्सरियत अक्सरियत है और उसको जो आपका आईन अक्सरियत अक्सरियत है और उसको जो आपका आईन है, कॉन्स्टिट्यूशन है, उसमें खास तवज्जो है, कॉन्स्टिट्यूशन है, उसमें खास तवज्जो है, कॉन्स्टिट्यूशन है, उसमें खास तवज्जो देने की बात कही गई है। और इस बात इस बात देने की बात कही गई है। और इस बात इस बात देने की बात कही गई है। और इस बात इस बात को कहने पर लोग लोग कहते हैं कि आप अलग को कहने पर लोग लोग कहते हैं कि आप अलग को कहने पर लोग लोग कहते हैं कि आप अलग हैं क्या? आपको खास तवज्जो दी जा रही है। हैं क्या? आपको खास तवज्जो दी जा रही है। हैं क्या? आपको खास तवज्जो दी जा रही है। क्या आपको खास अपीज़मेंट किया जा रहा है? क्या आपको खास अपीज़मेंट किया जा रहा है? क्या आपको खास अपीज़मेंट किया जा रहा है? यह सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि अगर यह सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि अगर यह सवाल पूछे जाते हैं। हालांकि अगर डेमोक्रेटिक अह पॉलिसी को डेमोक्रेटिक डेमोक्रेटिक अह पॉलिसी को डेमोक्रेटिक डेमोक्रेटिक अह पॉलिसी को डेमोक्रेटिक स्ट्रक्चर्स को आप समझे तो ऐसा नहीं है। स्ट्रक्चर्स को आप समझे तो ऐसा नहीं है। स्ट्रक्चर्स को आप समझे तो ऐसा नहीं है। उनको सिर्फ कंपनसेट किया जाता है अपने उनको सिर्फ कंपनसेट किया जाता है अपने उनको सिर्फ कंपनसेट किया जाता है अपने अकलियत होने की वजह से। क्योंकि जब आपकी अकलियत होने की वजह से। क्योंकि जब आपकी अकलियत होने की वजह से। क्योंकि जब आपकी आप अपनी बात को उतने पुरजोर तरीके से नहीं आप अपनी बात को उतने पुरजोर तरीके से नहीं आप अपनी बात को उतने पुरजोर तरीके से नहीं कह सकते हैं जितने पुरजोर तरीके से कह सकते हैं जितने पुरजोर तरीके से कह सकते हैं जितने पुरजोर तरीके से अक्सरियत कह सकती है तो आपको उस आवाज को अक्सरियत कह सकती है तो आपको उस आवाज को अक्सरियत कह सकती है तो आपको उस आवाज को नुमाया करने के लिए कुछ प्रोविज़ंस नुमाया करने के लिए कुछ प्रोविज़ंस नुमाया करने के लिए कुछ प्रोविज़ंस कॉन्स्टिट्यूशन पे रखे गए हैं वो अपीज़बल कॉन्स्टिट्यूशन पे रखे गए हैं वो अपीज़बल कॉन्स्टिट्यूशन पे रखे गए हैं वो अपीज़बल नहीं है। वो कंपनसेशन है और इस बात को आज नहीं है। वो कंपनसेशन है और इस बात को आज नहीं है। वो कंपनसेशन है और इस बात को आज लोग समझने के लिए तैयार नहीं है। खासतौर लोग समझने के लिए तैयार नहीं है। खासतौर लोग समझने के लिए तैयार नहीं है। खासतौर पे वो लोग जो इख्तदार में है इसको समझने पे वो लोग जो इख्तदार में है इसको समझने पे वो लोग जो इख्तदार में है इसको समझने के लिए तैयार नहीं है। ऑब्वियसली एक के लिए तैयार नहीं है। ऑब्वियसली एक के लिए तैयार नहीं है। ऑब्वियसली एक बुनियादी क्राइसिस है। अब उसको अकलियत के बुनियादी क्राइसिस है। अब उसको अकलियत के बुनियादी क्राइसिस है। अब उसको अकलियत के लोग मुसलमान ये समझे कि यह हमारा क्राइसिस लोग मुसलमान ये समझे कि यह हमारा क्राइसिस लोग मुसलमान ये समझे कि यह हमारा क्राइसिस है और यह हम पर तवज्जो है और उस वजह से है और यह हम पर तवज्जो है और उस वजह से है और यह हम पर तवज्जो है और उस वजह से हमको ये तकलीफ है और शिकायत है और हमारे हमको ये तकलीफ है और शिकायत है और हमारे हमको ये तकलीफ है और शिकायत है और हमारे लिए हमारे लिए दुश्वारियां हैं। लेकिन यह लिए हमारे लिए दुश्वारियां हैं। लेकिन यह लिए हमारे लिए दुश्वारियां हैं। लेकिन यह सबके लिए है।
2:30“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
1:47“I Will Protect Mosque & Temple Both”- MP Imran Masood
1:04Aakar Patel examines how public mobilisation can shape government decisions—from the protests against the NRC and farm laws to the question of institutional accountability.
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