2:30Ottoman Caliph: What Happened After 1924?
“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
“For two days, I kept on calling him”
नरगिस उस वक्त प्रेग्नेंट थीं जब फरवरी 2020 की हिंसा ने उनके शौहर मुरसलीन को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया। 21 फरवरी को वो रोज की तरह काम पर निकले थे। लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटे। नरगिस इंतजार करती रही। दरवाजे की हर आहट पर चौंकती रही। लेकिन लौट कर सिर्फ उनकी मौत की खबर आई। तो मेरे से बगैर बताओ आ गए। फिर 3 बजे 3:30 बजे किसी ने बताया हमारी पड़ोसन ने वहीं के दिल्ली में बहुत ज्यादा दंगे हो रहे हैं झगड़ा हो रहा तो मेरा जी परेशान सा मैंने कॉल करी मैं इन्हें देखो पता नहीं कहां गए मैंने कॉल करी तो उन पर कॉल जाती रही फ़ ही नहीं उठाया ऐसी पूरी रात हो गई पूरा दिन मतलब आधा दिन वो चला गया पूरी रात हो गई फिर हमने दो दिन तलक ऐसी ट्राई करते रहे फोन जाता रहा तीसरे दिन स्विच ऑफ हो गया फ़ कोई कॉल वोल कुछ नहीं दरोगा में बुलाया हम फिर थाने गए थाने में हमें दरोगा जी टीवी ले गया। फिर हम जी टीवी पहुंचे तो बस जी टीवी में थे वे तो जी टीवी में थे। मतलब मैं तो ज्यादा से देख भी नहीं पाई थी। चक्कर, आंखों के आगे अंधेरा और बेहोश हो गई थी। कुछ देखने की टेंशन हुई थी बहुत। फिर देखा तो एकदम ऐसा देखा। बस उनके कोख में तो गोली मार रखी थी। और पेट में तलवार मार रखी थी। होठ भी काट रखा था उनका। बहुत भयानक कर रखा था। उनके सिर में भी बहुत बजा रखा था। खून ही खून था। सर में भी चेहरा तो उनका काला सिया हो गया था। लेकिन फिर भी मैंने पहचान उनकी कर ली थी क्योंकि उनके सीधे पैर का अंगूठा कटा हुआ था इससे पहले। बहुत बुरी हालत थी कि देखा नहीं जा रहा था। इतनी बेदर्दी से मार रखा था उनको। यहां को इधर गोली थी। इधर से यहां से लेकर तलवार मार रखी यहां पे होठ तलवार सेट रखा था। सिनेमा गन बजा रखी थी। सब फूटा पड़ा था सब कुछ। मतलब इतनी बुरी हालत थी कि आपको पहचानना मुश्किल हो रहा था। जी कुछ पहचान तो लिया था मैंने। एक झलक में पहचान लिया था कि हां यही है। कितनी जिंदगी बदल गई आपकी तब से अब तक? मेरी तो सारी बदल गई। मेरी तो जिंदगी में बस यह है कि बच्चे हैं। इन बच्चों की वजह से मैं जी रही हूं। और नहीं मेरा तो कुछ भी नहीं है। कोई दूर से दूर तक भी अपना नजर ही नहीं आता। कुछ हो जाता था तो एकदम लेके चलते हुए थे और अब तो कुछ हो भी जावे तो पड़े रहो। कोई पूछने वाला नहीं, कोई ले जाने वाला नहीं है। कुछ नहीं। तो जब आप बहुत परेशान होती हैं, दिल घबराता है आपका और कुछ समझ नहीं आता। तो फिर किससे बात करने का दिल चाहता है? किससे बात करती हैं? तो पागल सी हो जाती हूं। थोड़े देर घंटे तो मैं बहुत ज्यादा पागल सी हो जाती जब मैं ऐसी हो जाती हूं उनकी याद आती है मुझे बहुत कि टाइम नहीं कटता जी नहीं लगता दिन नहीं लगता
2:30“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
1:47“I Will Protect Mosque & Temple Both”- MP Imran Masood
1:04Aakar Patel examines how public mobilisation can shape government decisions—from the protests against the NRC and farm laws to the question of institutional accountability.
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