Nous Shorts· 07 Jul 2026· 1:52

Population Strength Doesn’t Translate to Seats

“As Muslim votes are split across seats, their impact becomes less decisive.”

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बरेली में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी होने के बावजूद पिछले चुनावों में बरेली और पीलीभीत सीटों पर बीजेपी सांसद ही जीतकर आए थे। अब आते हैं बलरामपुर पर। यहां की 38.4% मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को श्रावस्ती सीट में मिला दिया गया, जहां पहले से 30.79% मुस्लिम थे। इसके अलावा अतरौला ब्लॉक, जहां 44% मुस्लिम हैं, उसे गोंडा सीट में शामिल कर दिया गया, जहां मुस्लिम सिर्फ 19% हैं। नतीजा — मुस्लिम वोट दोनों ही सीटों में बंट गया। यही सिलसिला बहराइच जिले में भी जारी रहा, जहां करीब 34% मुस्लिम हैं। इस जिले को दो लोकसभा सीटों में बांट दिया गया — बहराइच और कैसरगंज। लेकिन कैसरगंज की 60% आबादी गोंडा जिले से ली गई, जहां मुस्लिम आबादी कम है, जिससे यहां मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी सिर्फ 25% रह गई। अब आते हैं बिजनौर पर। यहां की कुल आबादी 36 लाख से ज्यादा है और यहां 43% मुस्लिम हैं। इस जिले को तीन लोकसभा सीटों में बांटा गया — बिजनौर, मुरादाबाद और नगीना। देखने में लगता है कि यहां मुसलमानों की सही नुमाइंदगी है, लेकिन सवाल यह उठता है कि मुस्लिम वोटों को सिर्फ उन्हीं सीटों में क्यों समेट दिया गया है जहां उनकी आबादी पहले से ही ज्यादा है। इससे यह सवाल उठता है कि बिजनौर की अपनी अलग सीट क्यों नहीं बनाई गई? असल में यहां नगीना सीट मौजूद है, जहां 46% मुस्लिम आबादी है, लेकिन इसमें एक कैच है जिस पर हम वीडियो में आगे बात करेंगे। तो सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, आसाम और वेस्ट बंगाल में भी मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी है। तो सवाल उठता है क्या इन राज्यों का पॉलिटिकल मैप भी ऐसे ही कुछ दिखाता है?

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