2:30Ottoman Caliph: What Happened After 1924?
“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
"Your religion is for you, my religion is for me." Can faith become the foundation for peaceful coexistence rather than conflict?
ऐज़ एन इंडिविजुअल हमें किसी के मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। आप कोई भी कैटेगरी कर दीजिए, दे दीजिए, इनके उसके लिए भी कुरान का गाइडिंग प्रिंसिपल है लकुम दीनकुम वलिय दीन। आपके लिए आपका दीन, मेरे लिए मेरा दीन। लेट मी प्रैक्टिस माय रिलजन, लेट यू प्रैक्टिस योर रिलजन, और मैं आपके लिए थ्रेट नहीं हूं, आप मेरे लिए थ्रेट नहीं है। दिस इज अ यूनिवर्सल ऑर्डर ऑफ कलेक्टिव एक्सिस्टेंस। तो आपको अपनी फेथ भी कंप्रोमाइज नहीं करनी है, सरेंडर नहीं करना है। यू एज अ मुस्लिम इन टर्म्स ऑफ फेथ, रिलीजियस प्रैक्टिससेस, यू हैव टू अबाइड बाय दैट। आपको वो करना है, चलना है। यू हैव टू कीप, यू हैव टू प्रोटेक्ट दैट। और उसी तरह से दूसरे भी है जो शायद आपके प्रैक्टिससेस के कॉन्ट्रेरी है। तो ये कैसे को-एक्सिस्ट कर सकता है? कुरान उसके लिए भी यही गाइडिंग प्रिंसिपल देता है, दीनकुम वलिय दीन, आपके प्रैक्टिस, आपकी बिलीफ, आपका फेथ आपके लिए, मेरे लिए मेरा फेथ। उसके बाद, इस मस्जिद से निकल के, मंदिर से बाहर निकल के, हमारी कलेक्टिव रिस्पॉन्सिबिलिटी, कलेक्टिव आइडेंटिटी है, वी लिव टुगेदर। उसके बारे में कुरान क्या कहता है, मुस्लिम को क्या करना चाहिए। मैंने इस पॉडकास्ट के दौरान आपके सवालों का जवाब दिया कि रिस्पॉन्सिबिलिटी ऐसी है। एक और आयत मेरे ज़हन में आ रही है, तो शायद पूरा मतन याद नहीं आ रहा हो, अल्लाह ताला ने ये फरमाया कि अल्लाह ताला ने अलग-अलग रास्ते बनाए हैं अल्लाह ताला तक पहुंचने के लिए। और आखिर में यही कहते हैं, फस्तबिकुल खैरात, बेहतरीन में एक दूसरे के साथ मुकाबला करो।
2:30“He embodied all the complexity and contradictions of the late Ottoman experience.”
1:47“I Will Protect Mosque & Temple Both”- MP Imran Masood
1:04Aakar Patel examines how public mobilisation can shape government decisions—from the protests against the NRC and farm laws to the question of institutional accountability.
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