Nous Podcast· 18 Apr 2026· 55:02

“SIR, Voter Deletion & West Bengal Elections | Parkala Prabhakar

What happens if your name suddenly disappears from the voter list?

Full Transcript

जो एक फिल्मी डायलॉग है कि तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख वही मिल रही है। बहुत ही अनरेस्टेड है वेस्ट बंगाल में एजुडिकेशन में 95% मुसलमान एसआईआर के जरिए टारगेटेड डिलीशियस कर रहे हैं। मार्जिनलाइज दलितों को आदिवासियों को मुसलमान को मुश्किल कर रहे हैं। डू यू डू यू थिंक कि दिस इज अ मर्डर ऑफ डेमोक्रेसी? इसको मैं ब्लडलेस पॉलिटिकल जीनोसाइड मान। अब एसआर के बाद सत्ता में जो बैठ रहा है वह निर्णय कर रहे हैं वोटर कौन होगा। देश में रहते हुए भी वो इस देश के नागरिक नहीं। क्या आप ये कह रहे हैं कि ये एसआईआर से ज्यादा यह बैकडोर एनआरसी है? ये इंडियास पॉलिटिकल सोसाइटी को पूरी तरह से बदलने की एक कोशिश। कोर्ट्स का जो रवैया है उसको आप कैसे देख रहे हैं? मेरा वोटिंग राइट आप नहीं छीन सकते। अगर 27 लाख पीपल इन स्टेट आर इनएलिजिबल फॉर वोटिंग। यह लोकतांत्रिक चुनाव कह सकते हैं क्या? बहुत ही डेंजरस और इमरजेंसी जैसी सिचुएशन है। आपका वोट तो चोरी हो रहा है। तो आप इलेक्शन क्यों लड़ रहे हैं? सिविल सोसाइटी पीसफुल सत्याग्रह के माध्यम से यह अपना के फीट ऑन द ग्राउंड एजिटेशन लाना है। यही इसका समाधान होगा। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहद। एसआईआर की प्रक्रिया बंगाल में की गई। उससे पहले आपने बिहार में उसको देखा। बिहार में जो एसआईआर हुआ उसके बाद आपने देखा कि किस तरह से वहां पर भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। और अब बंगाल में इसको किया गया है और देश के अलग-अलग राज्यों में इसको किया जा रहा है। लेकिन जहां इलेक्शंस हो रहे हैं वहां इसका सीधे तौर पर फायदा किसको मिल रहा है? अगर हम बिहार का एग्जांपल देखें तो साफ तौर पर लगता है भारतीय जनता पार्टी को। एसआईआर की बात जब हम पश्चिम बंगाल की करते हैं तो वहां अब तक 90 लाख वोटर्स डिलीट कर दिए गए हैं और या एजुडिकेशन में डाल दिए गए हैं। हमने देखा कि पूरे पश्चिम बंगाल में इसको लेकर अभी तक भी प्रोटेस्ट जारी हैं। हमने वायलेंट प्रोटेस्ट देखे और लोगों को यह लगा कि उनका जो सबसे बेसिक राइट है वो उनसे छीना जा रहा है। उनके वजूद पर एक बहुत बड़ा प्रहार किया जा रहा है और उनको ऐसा लग रहा है कि उनसे जैसे उनका सब कुछ छीना जा रहा है वो इस देश के नागरिक रहेंगे भी या नहीं रहेंगे इतने डाउट में सिटीजन जो है वो आ गए हैं जहां कहीं भी एसआईआर हो रहा है| अमूमन ये होता है कि इलेक्शन कमीशन पर लोगों का एक भरोसा होता है कि इलेक्शन कमीशन एक इंडिपेंडेंट बॉडी है उसी तरह से वो काम करेगा लेकिन हमने पिछले 10 12 सालों में हमने देखा है जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है और अपोजिशन भी लगातार यह इल्जाम लगाता रहा है कि कैसे भारतीय जनता पार्टी की बी टीम बनकर इस सरकार की बी टीम बनकर इलेक्शन कमीशन काम कर रहा है और सीधे तौर पर फायदा पहुंचा रहा है भारतीय जनता पार्टी को जो पश्चिम बंगाल में एसआईआर हुआ है उसको किस तरह से देखा जाए ah जो खास मेहमान मेरे साथ आज मौजूद है उनसे मैं बात करूंगी इसको लेकर और हम ऐसे वक्त में बात कर रहे हैं जब पार्लियामेंट में अह महिला आरक्षण वुमेन रिजर्वेशन बिल की आड़ में डीलिमिटेशन बिल लाया गया है। उस पर लगातार बहस जारी है। देखना ये होगा कि वोटिंग के बाद क्या होता है। लेकिन फिलहाल आज हम बात करने जा रहे हैं एसआईआर और उसके जरिए जो वोटर्स का राइट है खासतौर पर खास कम्युनिटी खास वर्ग का जो डिलीट किया जा रहा है उनसे छीना जा रहा है उसकी हम बात करेंगे। मेरे साथ प्रकला प्रभाकर जी मौजूद हैं जो कि मशहूर इकोनॉमिस्ट हैं। निर्मला सीतारमण के हस्बैंड हैं और इसके अलावा वो लगातार चुनाव सुधार एसआईआर ईवीएम में धांधली चुनावों में धांधली को लेकर सेमिनार से लेकर पब्लिक मीटिंग्स टीवी चैनल्स और डिजिटल तमाम जगहों पर विदाउट मिसिंग ह वर्ड्स वो लगातार इस पर बात करते रहे हैं और हाल ही में उन्होंने यह कहा था कि जो एसआईआर की प्रक्रिया है वो दरअसल एक ब्लडलेस पॉलिटिकल जेनोसाइड है। आई थिंक अब तक इससे ज्यादा स्ट्रांग वर्ड्स किसी ने इस्तेमाल नहीं किए एसआईआर को लेकर। वेलकम टू नाउ नेटवर्क परकला जी। थैंक यू मिला जी। थैंक यू वेरी मच फॉर हैविंग मी। परकला जी मेरा पहला सवाल आपसे ये कि पश्चिम बंगाल में वेस्ट बंगाल में ये जो एसआईआर हुआ है और इसी लिस्ट पर मुझे लग रहा है कि इसी लिस्ट पर यह इलेक्शन भी होने जा रहा है। 23 और 29 तारीख को जो वोटिंग होगी। कैसे देख रहे हैं आप इसको? बिश जी एक एक बात मैं जरूर कहना चाहता हूं कि मैं हिंदी भाषी नहीं हूं। थोड़ा मेरा हिंदी कमजोर है। फिर भी मैं कोशिश करूंगा लेकिन आप बर्दाश्त कीजिए। जी जी बिल्कुल माय प्लेजर जी। कभी-कभी अगर दिक्कत हो तो मैं अंग्रेजी भी इस्तेमाल करूंगा। बिल्कुल बिल्कुल यू आर फ्री। यू आर फ्री टू डू दैट। बुश जी आप पहले एसआईआर बंगाल में क्या हो रहा है? इस ये बात करने से पहले एक दो चीज बताना चाहता हूं। ये एसआईआर चीज क्या है? ये एसआईआर स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन किसने लागू किया? क्यों लागू किया? किसने इसको अनुमति दिया? ये निर्णय कैसे लिया? इसके बारे में दो मिनट हमसे हम हम तो बात करनी ही चाहिए। तो आमतौर पर हमको एव्री ईयर अक्टूबर नवंबर से लेके अगले साल जनवरी फरवरी तक समरी रिवीजन होती है और 24 अक्टूबर से लेकर 25 अक्टूबर जनवरी तक ये हुआ था। इसके बाद आया एसआई स्पेशल नॉट सम स्पेशल समरी रिवीजन बट स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन। तो इसके बारे में ये एक आध आरटीआई का क्वेरीज गए हैं इलेक्शन कमिश्नर के पास। तो उसमें यह बताया गया है कि एसआईआर यह नोटिफिकेशन में ऐसा बोला गया कि एसआईआर इसलिए कर रहे हैं। एसएसआर के बाद एक अध्ययन किया गया है। ये अध्ययन में यह साबित हुआ कि एसएसआर सेटिस्फेक्टरी नहीं हुआ। बहुत लोग ऐसी मरे हुए लोग और डुप्लीकेट ये सब लोग और भी है मौजूद है वोटर लिस्ट में शिफ्टेड लोग भी मौजूद है डेड लोग भी मौजूद है डुप्लीकेट भी बहुत है एसएसआर के बाद और हमारे जैसे लोग ईसीआई से पूछा गया कि कौन यह अध्ययन किया कब हुआ और उसका रिपोर्ट कहां है बता दीजिए। अब तक इसके बारे में कुछ भी नहीं बोल रहा है इलेक्शन कमिश्नर ऑफ इंडिया और उसके बाद अंजलि जी आप जानते हैं अंजली भारद्वाज भारद्वाज जी जो लोग शी इज़ अ वेरी प्रॉमिनेंट आरटीआई एंड ट्रांसपेरेंसी एक्टिविस्ट शी हैड फाइल्ड अनदर आरटीआई। इसमें यह पूछा गया कि किसने लिया है यह निर्णय? तो प्रिंसिपल सेक्रेटरी इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया लिख लिख के जवाब दे दिए हैं कि इलेक्शन कमीशन में कोई लिया नहीं। यह निर्णय तो मेरा सवाल यह है कि अध्ययन आप नहीं दे रहे हैं। अध्ययन का रिकमेंडेशंस अभी अभी आप सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं। और यह भी आप बोल रहे हैं कि इलेक्शन कमीशन में निर्णय कोई लिया नहीं। उसका फाइल नोटिंग्स नहीं है। उसका कुछ भी कासेप्ट पेपर नहीं है। कुछ भी नहीं है। और बिहार के बाद बिहार चुनाव के बाद एसआईआर के बाद हुआ जो चुनाव के बाद अब आप अब देखिए सरकार में ऐसा होता है कि आप कहीं कहीं आप कोई भी आप एक इंपॉर्टेंट डिसीजन लेंगे। थोड़ा इंप्लीमेंट करेंगे। यह एक फेस के बाद आप रिव्यु करेंगे। कैसा हुआ? क्या हुआ? गलती हुआ, कैसा इसको सुधार सकते हैं? इसको और कैसा अच्छा कर सकते हैं? ऐसे ऐसे तो रिव्यू होगा ना। तो बिहार के बाद और एक आरटीआई डाला गया कि क्या रिवीजन हुआ? क्या रिव्यू हुआ? तो इलेक्शन कमीशन यह बताया ऑफिशियली यह बताया आरटीआई क्वेरी को जवाब में कि कुछ रिव्यू नहीं हुआ। तो ये ये आप रखिए। तो इसका मतलब यह है हमको पता नहीं कौन लिया है। हमको पता नहीं किसके आधार पर लिया है यह निर्णय और रिव्यू कुछ नहीं हुआ और इसका फाइल नोटिस कुछ भी नहीं हुआ। इसका फाइल भी नहीं हुआ। नहीं है। अच्छा ये क्या है? एक दूसरा आपने जिक्र किया कि बिहार के बाद बिहार बिहार एसआईआर के बाद नतीजा कैसे आ गया? तो इसका मतलब यह है कि एसआईआर के जरिए अब कुछ कुछ लोग डेड लोग भी आप डिलीट किए होंगे शिफ्टेड लोग को डिलीट किए होंगे मैं नहीं मैं इससे मैं असहमत नहीं हूं ठीक है किए होंगे लेकिन ज्यादा से ज्यादा आप टारगेटेड डिलीशंस किए थे तो ऐसा डिलीशंस किया अब हम बहुत सारे एक्टिविस्ट डेड लोग डेड लोग बता के डिलीट किया गया उन लोगों को सुप्रीम कोर्ट ले गए और बहुत लोग डुप्लीकेट्स हैं। आपको आपको मालूम है एक ब्राज़लियन एक्ट्रेस का फोटो लगा के आप छह 15 20 लोकेशनेशंस पे उनका वोट है। तो यह तो डुप्लीकेशन डुप्लीकेशन भी है और बहुत डुप्लीकेशन बिहार में बहुत डुप्लीकेशन मिला है आपको एसआर के बाद और बिहार में एसआर के बाद इन्वेस्टिगेशन में यह साबित हुआ कि एक ही एड्रेस में 89 लोग रह रहे हैं। वो लोग ऐसे लोग हैं कि बहुत सारे धर्म का लोग हैं। बहुत सारे रीजंस का लोग हैं। बहुत सारे वन एड्रेस में 89 देन हमारे जैसे लोग गए हैं ये एक ये क्या घर है कैसा दिखता है कितना बड़ा है गए हैं और उनको मिला है घर भी नहीं है तो ये एसआईआर का बात इसका मतलब क्या है इसका मतलब है कि टारगेटेड डिलीशंस और कुछ टारगेटेड एडिशंस हुआ यह बिहार का है और अभी वेस्ट बंगाल में हो रहा है। आपने जिक्र किया बहुत बहुत ही अनरेस्ट है वेस्ट बंगाल में और कहीं नहीं वेस्ट बंगाल में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी लाया गया। वेस्ट बंगाल में एडजुडिकेशन लाया गया। ये ये क्या स्पेशल चीज है? एक दूसरा और आपको एडजुडिकेशन में नंबर मिलेगा। एजुडिकेशन में 90% 95% मुसलमान है। तो इसका क्या मतलब है? इसका इसका मतलब यह है कि आप एसआईआर के जरिए इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया के पीछे सरकार ये टारगेटेड डिलीशंस कर रहे हैं। तो अच्छा एक चीज आप ध्यान में रखिए कि ये शॉर्ट टर्म में भाजपा को फायदा मिल सकता है। इसमें मिल रहा है। बिहार में मिला है। शायद बंगाल में मिल सकता है। कितना रेजिस्टेंस होगा बंगाल में? अभी तक तो हमको पूरा आईडिया नहीं है लेकिन बहुत रेजिस्टेंस है। देखेंगे क्या होगा। तमिलनाडु में केरला में ये सब चल रहा है। लेकिन इसका नतीजा थोड़ा लॉन्ग टर्म में भी देखिए आप एसआईआर दिस आई थिंक इज वेरीेंट। एसआर के बाद बुरा जी हिंदुस्तान में दो तरीके के लोग हैं। एक तरीके के लोग जिसके पास वोट होगा दूसरे तरीके का लोग जिसके पास वोट नहीं होगा। तो एसआईआर हिंदुस्तान को ऐसी बांटेंगे ऐसे बांटेगा कि कुछ लोग के पास पूर्ण अधिकार है। पूर्ण नागरिकता है। कुछ लोगों के पास पूर्ण नहीं है। वोटिंग नहीं और वोटिंग नहीं है। आप आप वोटिंग वोटिंग लिस्ट में वोटर लिस्ट में आपका नाम नहीं है। आप अभी वोट नहीं कर सकते। ठीक है? आप ऐसे समझेंगे अच्छा सिर्फ वोट जाएगा देखेंगे। लेकिन आप आप इसके बाद दूसरा एसआई एसआईआर टू आप रोक सकते हैं नहीं रोक सकते। वो भी आ सकता है। एक बार आप नॉर्मलाइज कर लीजिए एसआईआर को दूसरा आ जाएगा। नेक्स्ट ईयर आ जाएगा। अच्छा ये इलेक्शन कमीशन अभी हमको बोल रहे हैं। 2002 और थ्री में एक बार एसआईआर हुआ तो आप क्या चिल्ला- चिल्ला रहे हैं? यह नई चीज नहीं है। ठीक मैं 2002 2003 में मैं वोटर था। अब शायद आप आप नहीं होंगे। जी लेकिन हिंदुस्तान में बहुत सारे लोग 2002 2003 2004 में वोटर थे। हम तो मैं एक सवाल पूछ रहा हूं आपके माध्यम से। हिंदुस्तान में कोई भी एक आदमी 2002 में इतना इतने सारा डॉक्यूमेंट्स लेके एक दफ्तर के पास जाके यह वोट वोटिंग के लिए वोटिंग अधिकारी के लिए वो एलिजिबल है ऐसे साबित किया क्या कभी हुआ नहीं तो अभी क्या हो रहा है अभी सब साबित करना करना है अब ये डॉक्यूमेंट ले आओ वो डॉक्यूमेंट ले आओ उनका पिताजी का ले आओ आपका माताजी का ले आओ उनका पुरकों का ले आओ ये सब बोल रहे हैं कभी हुआ क्या कभी नहीं हुआ तो ये अलग है तो इसका मतलब यह है कि आप जानबूझ के आप इसको इतना मुश्किल कर रहे हैं कुछ लोग आम लोग रोजाना रोज रोजी रोटी के लिए आप लेबर करते हैं डेली लेबर करते हैं अनपढ़ हैं गांव में रहते बाढ़ के ऐसी एरियाज में रहते हैं। इसको आप मुश्किल कर रहे हैं ना हम मार्जिनलाइज को मुस्लिम मुश्किल कर रहे हैं। दलितों को मुश्किल कर रहे हैं। आदिवासियों को मुश्किल कर रहे हैं। मुसलमान को मुश्किल कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों को मुश्किल कर रहे हैं। और दूसरा एसआर आएगा। तीसरा एसआर आएगा। नॉर्मल हो। एक बार नॉर्मलाइज होने के बाद ये सब हो जाएगा। तो इसका इसका आप आप दो तरीका तरीके के एनालिसिस कीजिए। एक स्ट्रेट इलेक्शन रिजल्ट्स में क्या असर पड़ेगा? दूसरा हिंदुस्तान में क्या असर पड़ेगा? लॉन्ग टर्म बहुत बहुत इंपॉर्टेंट और बहुत गहरी बात आपने कही है कि एक तो हम ये देख रहे हैं कि इलेक्शन पे क्या असर पड़ेगा हार और जीत पर और कौन सी पॉलिटिकल पार्टी आ रही है। बट आप एक ही हिंदुस्तान में दो हिंदुस्तान बना रहे हैं। एक वो जो वोट कर सकेगा। एक वोट जो वोट नहीं कर सकेगा और जो वोट नहीं कर सकेगा उसका क्या तो उसको तो ये लगेगा कि वो शहरी है यहां का नहीं है। वो हमेशा अपने आप को एक डाउटफुल सिटीजन मानकर रहेगा और हमेशा उसके ऊपर एक तलवार सी लटकी रहेगी कि कब ना जाने उसके साथ क्या हो जाए क्योंकि उसका जो सबसे बेसिक राइट है वोट देने का वही आपने डाउटफुल बना दिया या उससे कंप्लीटली छीन लिया गया। कितना डेंजरस आप इस पूरे प्रोसेस को डेमोक्रेसी के लिए आप मान रहे हैं। डू यू डू यू थिंक कि दिस इज अ मर्डर ऑफ डेमोक्रेसी? और क्या आपको लग रहा है कि जब सम्राट चौधरी जैसे जो अब चीफ मिनिस्टर बन गए हैं बिहार के वे जब ये कहें कि इतने लाख वोटर्स को हमने हटा दिया। इस तरह के बयान दे वो और यह कहें कि अब उनसे और तमाम चीजें भी छीन ली जाएंगी। फिर शुभेंदु अधिकारी ये कहे कि देखिए हमारा परसेंटेज डिफरेंस इतना था हार और जीत का पिछली बार और अब तो एसआईआर हो गया है और अब तो हमारी 100% जीत है तो वो एक एक प्रिटेंस भी नहीं रहा है कि कोई प्रिटेंस भी हो बिल्कुल ब्रेजिन है ये जी तो आप आप इसको कैसे देख रहे हैं आप डेमोक्रेसी के लिए इसको कैसे देख रहे हैं और आने वाली हिंदुस्तान की तस्वीर जो आपने बनाई है आप उसको कैसे देख रहे हैं आगे मिश्रा जी एक एक बार ये आसाम का माननीय मुख्यमंत्री जी का बयान आप रिकॉल कीजिए। जी साहब ने ये कहा कि ये मियां लोगों को हम इधर से भगा नहीं सकते हैं। इसलिए हम ऐसी माहौल बना रहे हैं। वो खुद भाग जाएंगे। तो इसका क्या मतलब है? इसका यह मतलब है यह इलेक्शन वोटर लिस्ट का शुद्धिकरण नहीं है। यह मैं मैं इसलिए मैं बोल रहा हूं कि इसको मैं ब्लडलेस पॉलिटिकल जेनोसाइड मानता हूं। आप इतिहास में कई जगह जीनोसाइड हुआ था। आपको माइनॉरिटीज को जो आपका आपका धर्म का नहीं है। आपका कास्ट का नहीं है। आपका रिलीजन का नहीं है। आपका रीजन का नहीं है। आप आपकी भाष नहीं है। आपका सभ्यता का नहीं है। आपका रंग का नहीं है। ऐसे लोगों को अगर हो सके तो आप बाहर कर दिया। कुछ कई देशों से नहीं तो नहीं बाहर कर सके तो मार दिया। अगर मार नहीं सके तो बाहर कर दिया है ना लेकिन आज आज भारत देश में हिंदुस्तान में आप बाहर भी नहीं कर सकते हैं मार भी नहीं मार सकते हैं तो अगर एक सिटीजन को आप नहीं मार सके तो क्या कर सकते हैं आप यह कर सकते हैं उनका सिटीजनशिप को मार मार लीजिए सिटीजनशिप को खत्म कर लीजिए तो इसलिए मैं बोल रहा था कि ये ये ब्लडलेस जीोसाइड ये जीनोसाइड है लेकिन आप आदमियों को इंसान को आप आप कत्ल मत नहीं कर नहीं कर रहे हैं आप उनका नागरिकता तक को कत्ल कर रहे हैं तो उसके बाद क्या होगा उसके बाद वही वोट करेंगे जो आप चाहते हैं तो हमारे डेमोक्रेसी अब डेमोक्रेसी के मर्डर की बात कर रहे हैं। हमारे डेमोक्रेसी इसी स्टेज पे आ गया है। अभी एसआईआर के बाद अभी तक क्या था हमारा डेमोक्रेसी? हमारा डेमोक्रेसी वो था जिसमें वोटर निर्णय करते थे। सत्ता में कौन बैठना है? अब एसआर के बाद सत्ता में जो बैठ रहा है वह निर्णय कर रहे हैं। वोटर कौन होगा? फिर पूरा पलटा दिया है। तो पूरा सिस्टम ही चेंज कर दिया। जी बुशरा इनका नाम ठीक नहीं है। उसको निकाल दो। बरकला ठीक है। हम रखिए ऐसे कर सकते हैं। तो और इसका इसका आप थोड़ा आगे जाइए। यह सिनेरियो को थोड़ा थोड़ा आगे बढ़ाए तो आपको यह मिलेगा कि आपके पास वोट नहीं है। इसका मतलब आपका नाम वोटर लिस्ट में नहीं है। इसका मतलब आप आधार आपके पास आधार क्यों है? आपको वोटर ही नहीं है ना? आधार छोड़ छीन लो बाद में। अच्छा आपके पास आधार नहीं है। आपको राशन कैसे मिल रहा है? राशन छीन लो। हम अच्छा आपको यह यह सरकार का यह मुनाफा है ना यह आधार ही नहीं है। आपका वोटर नाम नहीं है। वोटर में लिस्ट में आपका नाम नहीं है। आधार भी नहीं है। और आपको राशन कार्ड कैसे मिल रहा है? छीन लो। अच्छा आपको खेती बड़ी है लेकिन आपके पास वोटर वोट नहीं है। आधार नहीं है। राशन नहीं है। आपको खेतीबाड़ी कैसे आई है? आप जाइए इधर नहीं। इधर आपका आपका ये इलाका नहीं है तो ये नहीं हो सकता है ये भी हो ये भी होने की चांस है तो आप आप इसको ध्यान में रखिए ये ये एसआईआर उषा जी ये मामूली चीज नहीं है ये जानबूझकर टारगेटेड ऑपरेशन अच्छा आप आप जो चाहेंगे जिसको चाहेंगे वह वोटर में रहे। ठीक है ना? उसके बाद क्या? उसके बाद यह होगा कि अब देखिए एक एक बार आप थोड़ा सोचिए। एक पांच लोग 500 लोग हैं। एक एक बस्ती में रहते हैं। उनके पास वोट नहीं है, आधार नहीं है, राशन नहीं है, वोट नहीं है उनके पास। खासतौर पर तो आप बोलिए कोई कोई राजनेता वो बस्ती में जाएगा नमस्कार करेगा पानी देगा सड़क देगा बिजली देगा नहीं तो इसका मतलब है एसआईआर के वजह से हिंदुस्तान में दो तरीके के लोग एक पूरे अधिकार पूरे इम्युनिटी गॉट डिस्कनेक्टेड रिकग्निशन एक तरीका दूसरा वोट नहीं है अधिकार नहीं है राशन नहीं है वोट नहीं है बस्ती नहीं है कोई आएगा नहीं ये हो सकता है अच्छा उसके बाद क्या होगा उसके बाद जी ये होगा कि अगर डिस्कनेक्ट हुआ हम दोनों के पास वोटिंग ऐसे लोग बहुत है देश में तो मौजूदा पॉलिटिकल पार्टी अब जो भी हो अब कम्युनिस्ट हो कांग्रेस हो समाजवादी हो नेशनलिस्ट पार्टी हो वो ये भी कुछ भी हो किसके पास जाएंगे वोट के लिए जो लोगों के पास वोट है उनके पास जाएंगे है ना उन्हीं के पास जाना है तो उन्हीं के पास जाएंगे तो आप वो वो पॉलिटिकल पार्टी क्या बोलेंग उन्हीं के मुद्दों के बारे में बात करेंगे हमारे जैसे लोगों के मुद्दों के बारे नहीं बात करेंगे है ना तो उसके बाद क्या होगा यह सिर्फ भाजपा के लिए मुनाफा नहीं है यह है एक डिज़ बुशरा जी सब पिटिकल पार्टियों को भाजपा का जैसा बनाने का एक प्रोजेक्ट है तो एक बार आपके पास वोट नहीं है हम तो आपका आधार आधार आपके पास आधार क्यों भाई आप वोट वोट ही वोटर ही नहीं है तो आधार आधार छीन लेंगे। उसके बाद अरे आपके पास वोट नहीं है, आधार भी नहीं है। आपको खेतीबाड़ी क्या है? छीन लेंगे और उसके बाद बोलेंगे आपके पास खेतीबाड़ी नहीं है। आपका नाम पर कुछ पत्र नहीं है। कुछ भी नहीं है। आपके पास आधार नहीं है। आपके पास वोट नहीं है। आपको राशन क्यों मिल रहा है? छीन लेंगे। तो ये क्यों नहीं हो सकता? तो बार-बार एसआईआर क्यों नहीं हो सकता है? एक बार इसको नॉर्मलाइज कर लिया तो आप मैं बोलूंगा अरे मेरा नहीं है। मुसलमानों का प्रॉब्लम है। मुसलमान बोलेंगे ये ये हमारा नहीं है। वो पसमंदा का है। यह मथुआ का ये इसका है वो उसका है। ऐसे बोलेंगे तो इधर मैं मेरे को मालदा में नहीं हो रहा है। लेकिन और 24 परगनामे हो रहे हैं। नर्थ 24 परगनामा हो रहे। वो ये नहीं हो रहे। में नहीं हो रहे। बिहार में नहीं हो रहे। उधर नहीं ऐसा नहीं ना। सी आप लिबर्टी या फ्रीडम के जैसे ही फ्रेंचाइज भी इनविजिबल है मुशला जी आपका फ्रेंचाइज गए तो हमारा हमारा हमारा लोकतंत्र कम हो जाएगा ना हम तो अगर अगर कुछ पॉलिटिकल पार्टी ये बोल रहे हैं कि नहीं नहीं इसका सिर्फ 10,000 डिलीशन हुआ लेकिन हम पिछले इलेक्शन में 20,000 से जीते हैं तो हमको नुकसान नहीं होगा। यह इलेक्शन के नुकसान की बात नहीं है। यह नागरिकता के बात है। अच्छा एक एक वोटर एक एलिजिबल वोटर भी वोटर रोल से नहीं डिलीट होना चाहिए। तो इसका मतलब इसका पूरा ब्रॉड नतीजा एक तो एक तो शॉर्ट टर्म में यह अह भाजपा को मुनाफा होगा। एक यह इसको इसको नुकसान होगा। उसको नहीं नुकसान होगा। ये तो शॉर्ट टर्म है। ऑलराइट लेकिन ये ये पूरा होने के बाद क्या होगा कि कुछ लोगों के पास वोट है। कुछ लोगों के पास वोट नहीं है। अगर कुछ लोगों के पास वोट है कुछ लोगों के पास नहीं है तो मौजूदा पॉलिटिकल पार्टीज किसके पास जाएंगे वोट मांगने के लिए? ओनली दोज़ पीपल हु हैव वोट। तो इसका मतलब यह है कि यह सब पिटिकल पार्टीज किसके बारे में बात करेंगे? किसके मुद्दे के बारे में बात करेंगे? ओनली दोज़ पीपल हु हैव वोट जिसके पास वोट है उन्हीं की मुद्दा उठाएंगे ना। तो इसका मतलब यह है कि आज भाजपा कुछ लोगों के बारे में ही बात कर रहे हैं। लेकिन कल परसों सारे पॉलिटिकल पार्टीज कुछ लोगों के बारे में ही बात करेंगे क्योंकि उनके पास ही वोट है। तो इसका मतलब यह लार्जर कॉन्सिक्वेंस ये लार्जर नतीजा क्या होगा कि इंडिया में सब पिटिकल पार्टीज आप कोई भी नाम रखिए उसका सब पिटिकल पार्टीज एक ही बात करेंगे। एक ही जैसे लोगों के बारे में ही बात करेंगे क्योंकि उन्हीं का वोट है। उन्हीं का वोट पाना है। मेरा वोट तो मेरे मेरे पास तो वोट नहीं है। आपके पास तो वोट नहीं है। आपका हमारा वोट पाने के लिए उनका जरूरत ही नहीं है। तो आपका और हमारा बस्ती में आने के लिए भी जरूरत नहीं है उनका। तो इसका मतलब यह है कि जी आप जो एक्सप्लेन कर प्रकला जी क्या इसका मतलब यह कि देश में रहते हुए भी वो इस देश के नागरिक नहीं दूसरा क्या आप ये कह रहे हैं कि ये एसआईआर से ज्यादा ये बैक डोर एनआरसी है तीसरा क्या आप ये कह रहे हैं कि वो तो आपने कहा कि आप दो हिंदुस्तान बनाने एक वो जो वोट कर पाएगा एक वो जो वोट नहीं कर पाएगा लेकिन मेरा सवाल यह है कि जो लाखों वोटर्स एसआईआर के थ्रू हटा दिए गए बिहार में और जगहों से हटाए जा रहे हैं जो बंगाल से हटा दिए गए और हटाए जा रहे हैं। उन सब लोगों का आखिर होगा क्या? वो क्या सिर्फ यहां सिर्फ रहेंगे? उनका क्या होगा? उनका क्या फ्यूचर है? वो क्या सिर्फ कोर्ट्स के चक्कर लगाते रहेंगे? एक ऐसे कोर्ट के जो अभी तक ये डिसाइड नहीं कर पाया है कि एसआईआर कॉन्स्टिट्यूशनल है भी या नहीं? तो मैंने मैंने जैसे बोला कि दो तरीके के लोग रहेंगे भारत में। एक तरीके का लोग जिसके पास पूर्ण अधिकार है हम जिसके पास नहीं है आप रह सकते हैं नहीं तो अरे ऐसी हालात में आप नहीं रह सके तो जाइए आप कहे ना उधर जाइए इधर जाइए तो ऐसे बोलेंगे एक दूसरा कि ये जो लोग उनके पास वोटिंग नहीं है पूर्णतः पूरी तरह नागरिकता नहीं है उनके पास। अगर वोटिंग नहीं है तो आप अब 100% तो सिटीजन नहीं है। आप ट्रू तो ये ये लोगों ये लोग सेकंड क्लास सिटीजंस बनेंगे। दूसरी दर्जा एक दर्जा वो है कि उनके पास वोटिंग भी है, राशन भी है, खेतीबाड़ी भी है, उनके पास आधार भी है, कुछ भी है। सब कुछ है। कुछ लोगों के पास वोटिंग नहीं है, आधार नहीं है, कुछ भी नहीं। तो रही यह एक इसलिए मैं बोल रहा हूं आप बिना सिटीजन को खत कर करके आप सिटीजनशिप को खत कर रहे हैं। नागरिकता को खत कर रहे हैं। तो इसलिए मैं यह बोल रहा हूं कि ये ये ब्लडलेस पॉलिटिकल जीनोसाइड है। तो इसी रास्ते पे जा रहे हैं हम। इसको रोकना पड़ेगा। अच्छा यह आपने और एक बात उठाई है अभी कि क्या होगा इन लोगों का मिश्रा जी अब बिहार में हुआ क्या हुआ उन लोगों का इलेक्शन इलेक्शन के दौरान इलेक्शन से पहले इलेक्शन के दौरान हम सब लोग चिल्लाए थे उनके पास उनका उनका उनका वोट अधिकार छीन लिया गया है वो वोट अधिकार यात्रा लाए हैं ये सब लाए हैं ना तो उसके बाद क्या हुआ? इलेक्शन हो गया। सब ठंडा हो गया। कोई पॉलिटिकल पार्टी जो लोग जीते हैं, जो लोग हारे हैं, किसी पॉलिटिकल पार्टी ये डिलीटेड लोगों के बारे में बात किया क्या अभी तक? उसके बाद नहीं कर रहे। यही होगा बंगाल के बाद, यही होगा तमिलनाडु के बाद, यही होगा केरला के बाद। हो जाएंगे वो लोग। जी। ये दिस इज़ द ट्रेजडी। तो इफ यू इफ यू इफ यू कनेक्ट ओनली टू इलेक्शन देन यू विल फोरगेट अबाउट इलेक्शन। आफ्टर द इलेक्शन यू विल फॉरगेट अबाउट दिस बी। दे हैव नॉट वोट इट। नेक्स्ट टाइम आल्सो यू डोंट हैव टू गो टू देम। देयर फॉर इसलिए मैं इसको लॉन्ग टर्म पर्सपेक्टिव से देखने के लिए आपको मैं अह मैं मैं प्लीड कर रहा हूं आपसे। मैं अनुरोध कर रहा हूं। आप इसको लॉन्ग टर्म में देखिए। चुनाव के बारे में ठीक है। चुनाव इंपॉर्टेंट है। मैं मैं नहीं बोल रहा हूं। चुनाव इंपॉर्टेंट नहीं है। लेकिन इसका नतीजा बहुत ही लॉन्ग टर्म में ये इंडियास पॉलिटिकल सोसाइटी को पूरी तरह से बदलने की एक कोशिश ये प्रोजेक्ट है। ये समझ के आप चलिए। आप बहुत इंपॉर्टेंट बहुत गंभीर बात कह रहे हैं। मुझे लगता है कि शायद इस तरह से अभी तक इसको देखा नहीं गया है या इस तरह का इसका एनालिसिस नहीं किया गया है क्योंकि लोग इसको इलेक्शन के पर्सपेक्टिव में देखते हैं और ये देखते हैं कि देखिए यहां पर बीजेपी की सत्ता पर काबिज हो गई। बंगाल में भी बना लेगी और ये देखिए कि इन लोगों का क्या होगा और फिर वहां इलेक्शंस खत्म हो जाते हैं और फिर उसके बाद उन वोटर्स के बारे में कोई बात नहीं करता। लेकिन आप जो पूरा एक इसके डॉट्स जो आप कनेक्ट कर रहे हैं कि कैसे वोटर राइट आपसे लेने के बाद क्या-क्या और हो सकता है और उसके बाद जो सरकारी पॉलिसीज हैं चाहे घर की हो या दूसरी हो यानी कि वो तमाम फायदे भी उन लोगों को मिलने बंद हो जाएंगे। और वो वोटर्स कौन है? उनमें से मैक्सिमम वोटर्स वो हैं जो मुसलमान हैं, जो दलित हैं या वो वोटर्स जो विपक्ष को वोट करते रहे जो बीजेपी को वोट नहीं करते। ये पैटर्न हमने तमाम जगहों पर देखा है। परला जी मेरा सवाल यह है कि यह बहुत ही डेंजरस और इमरजेंसी जैसी सिचुएशन है जिसको शायद जो अपोजिशन पार्टीज भी हैं वो इसको आवाज तो उठाती है लेकिन मुझे लगता है कि सिर्फ मोमेंट्री होता है। बहुत हल्के में होता है। कुछ प्रेस कॉन्फ्रेंसेस होती है एक आध यात्रा और फिर उसको ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। कोर्ट्स का जो रवैया है उसको आप कैसे देख रहे हैं? मैं ट्रिब्यूनल पर भी आऊंगी, एजुडिकेशन पर भी आऊंगी। उसकी हम बात करेंगे कि उस प्रोसेस को आप कैसे देख रहे हैं। लेकिन उससे पहले जो सुप्रीम कोर्ट का रवैया है उसको आप कैसे देख रहे हैं। लगातार हम ये देख रहे हैं कि सुनवाई पे सुनवाई जो एक फिल्मी डायलॉग है कि तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख वही मिल रही है। लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं मिल रहा है। इलेक्शन पर इलेक्शन हो गए। लेकिन अभी तक कोर्ट ये डिसाइड नहीं कर पाया कि अनकॉनस्ट्टिट्यूशनल है या कॉन्स्टिट्यूशनल है। क्योंकि अगर यही डिसाइड हो जाए तो पूरी पूरे का पूरा प्रोसेस ही खत्म हो जाएगा। अगर ये अनकॉनस्ट्टिट्यूशनल है तो। जी अगर यह नहीं डिसाइड किया आपने कोर्ट नहीं डिसाइड किया सुप्रीम कोर्ट ने नहीं डिसाइड किया तो यह लागू है चल रहा है हो गया है इलेक्शन भी हो गया उसके बाद पूरे देश में ये सर प्रक्रिया पूरा हो गया है उसके बाद क्या करेंगे ठीक एक दूसरा मैं ये बोलने से मेरे को खुशी नहीं है लेकिन यह बोलना जरूरी है कि मेरे मेरे अ इसमें मेरे ओपिनियन में हम सुप्रीम कोर्ट या जुडिशरी के ऊपर डिपेंड होना इतना ठीक नहीं लग रहा है। इतना ठीक नहीं लग रहा है क्योंकि देखिए एक तो डिसाइड नहीं है यह कॉन्सिट्यूशनली है या नॉन कॉन्स्टिट्यूशन देखिए यह यह अभी अभी जो जो प्रोसेस जारी है उसके बारे में आप नहीं डिसाइड किए तो कैसे और नहीं आप आप नहीं डिसाइड किए तो ये ये ये ये प्रोसेस पूरा हो जाएगा ना तो अगर अगर कोई प्रपोजल है सिर्फ प्रपोजल स्टेज में है तो उसके ऊपर आप टाइम ले सकते लेकिन जो दो जो प्रोसेस अभी जारी है उसके बारे में आप टाइम नहीं ले सकते। आपको तुरंत डिसाइड करना ही चाहिए। एक दूसरा आप देखिए बंगाल में क्या हुआ कि अबाउट 93 94 लैक्स वर डिलीटेड देन ऑन द बेसिस ऑफ लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी एसेट्रा एसेट्रा देन एजुकेशन सम पीपल वर एडमिटेड सम पीपल वर नॉट एडमिटेड फाइनली 27 है बोलते हैं 27 को 27 लाखों का डिसीजन नहीं होता तो डिसीजन नहीं हुआ इसके बारे में ये लोग वोट कर सकते हैं नहीं कर सकते ये एलिजिबल या नहीं एलिजिबल उसको डिसाइड नहीं हुआ तो अगर डिसाइड नहीं हुआ तो उसको नेचुरली वोटिंग राइट मिलना चाहिए ना क्योंकि यह आपका पुराना जो वोटर लिस्ट है वह अभी जिंदा है। उसको उसको पूरा आपने आपने उसको उसको कूड़े में डाला नहीं खत्म नहीं कर दिया जी खत्म नहीं किया वो जिंदा है तो अगर डिसीजन आप नहीं लिया तो मेरे को क्यों पनिश कर रहे हैं भैया मेरा वोट क्यों अगर आपने सही या नहीं सही सही या गलती मेरे को आप आप यह घोषणा कर दीजिए कि आप इनजिबल है मैं अपील कर सकता हूं लेकिन बिना मेरे को इनलिजिबल डिसाइड कर बिना डिसाइड करके मेरा मेरा वोटिंग राइट आप नहीं छीन सकते छीन लिया है। उसके बाद अभी कल आर्टिकल 142 इनवोक करके सुप्रीम कोर्ट ने एक अच्छा डिसीजन लिया। लेकिन आपका आपका एक्सपीरियंस में इलेक्शन कमीशन अगर इसको नहीं लागू करना चाहते हैं। इसको बहुत ही हास्ता हा स्लो प्रोसेस आप करेंगे। 21 तक फर्स्ट फेस का है आपके पास और 27 तक शायद 26 25 तक सेकंड फज़ का है। अगर उस समय तक आप ये 27 लाख में से सिर्फ 1 लाख को किया तो इसका मतलब क्या है? 27 लाख इंस्टेड ऑफ़ 27 लै 26 लैक्स यू आर डिनाइंग। तो मैं मेरा सवाल यह बुनियादी सवाल है अगर 27 लाख पीपल इन स्टेट आर इनलिजिबल फॉर वोटिंग ये आप इसको लोकतांत्रिक चुनाव कह सकते हैं क्या? इसका नतीजा पीपल्स मैंडेट हो सकती है क्या? हम अच्छा मैं मैं यह नहीं बोल रहा हूं कि अगर भाजपा जीत गए तो यह मैंडेट नहीं है। ममता का पार्टी जीत गए तो मैंडेट नहीं ऐसे नहीं बोल रहा हूं। मैं मेरे को कौन जीतता है कौन हारता है इससे मतलब ही नहीं है। मैं सिर्फ ये प्रोसेस इंटीग्रिटी के बारे में बात कर रहा हूं। यह प्रोसेस इंटीग्रिटी है क्या इसमें? नहीं है। अगर 27 लाख पीपल आप इनलिजिबल नहीं डिसाइड करेंगे फिर भी आप वोट नहीं करेंगे। सुप्रीम कोर्ट कहने के बावजूद 27 लाख नहीं 26 25 24 फिर भी एक मतदाता अगर वोट नहीं किए तो वो इलेक्शन प्रोसेस उधर का ठीक नहीं है ना। इसे समझना चाहिए। यह मुसलमान का वोट है। यह ईसाइयों का वोट है। यह सिख का वोट है। यह आदिवासी का वोट है। नहीं सबका वोट मैं हमारा प्रिंसिपल क्या है? वन पर्सन वन वोट वन वैल्यू सेम वैल्यू है। यह राष्ट्रपति जी का वोटिंग और मेरा वोटिंग एक ही वैल्यू है। मैडम भी एक ही वोट दे सकते हैं। मैं भी एक ही वोट दे सकता हूं। ये प्रिंसिपल है ये। इस पूरे प्रोसेस को ही लग रहा है कि बदल दिया गया है। कंप्लीटली बदल दिया गया है। और इसीलिए कहा जा रहा है कि डेमोक्रेसी का पूरा ढांचा जो है जो स्ट्रक्चर है उसको बदल उसको हमारी आंखों के सामने बदला जा रहा है और हम हेल्पलेस बैठे हुए हैं। अगर बात भी कर रहे हैं तो उसका नतीजा क्या निकल रहा है? आप जैसे लोग हिम्मत दिखाकर इन तमाम चीजों पर फेयरलेसली आप आवाज उठा रहे हैं, बात कर रहे हैं तो शायद कुछ लोग तक लोगों तक असली बात पहुंच पा रही है। लेकिन उसका नतीजा क्या निकल रहा है? ये एक बड़ा सवाल है। जब तक ये एक जन आंदोलन नहीं बनता है। पीपल्स मूवमेंट नहीं बनेगा। जब तक पॉलिटिकल पार्टीज इसको इमरजेंसी समझ कर इसको ये नहीं समझेगी कि इस काम से पहले कोई और काम नहीं। तब तक तो फिर ये होता ही रहेगा। क्या आपको लग रहा है प्रकला जी कि ये अपोजिशन पार्टीज जो पूरी तरीके से अभी भी हाशिए पर हैं जिनके पास कोई लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है। उनके इलेक्शन कमीशन सुनता नहीं है। उनको बुलाया जाता है तो इंसल्ट किया जाता है। उनकी बात को माना नहीं जाता है। राहुल गांधी जैसे नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं। वो फिर भी इतना एफर्ट करते हैं। कोई और तो उतना भी एफर्ट नहीं कर रहा है। तो क्या आपको लग रहा है कि वो इस इमरजेंसी को समझ भी पा रहे हैं या नहीं? क्योंकि अगर जब पश्चिम बंगाल की बात करते हैं तो पश्चिम बंगाल में एक लड़ने वाली नेता एटलीस्ट यू नो वी कैन सी ऑन द फेस कि शी इस फाइटिंग उनकी वहां पर गवर्नमेंट है मजबूत है वो वहां पर वो आवाज को उठा रही है तब भी हो तो वही रहा है जो इलेक्शन कमीशन चाह रहा है या फिर मैं अगर अपोजिशन की भाषा बोलूं कि जो बीजेपी चाह रही है जी और पिछली बार के और इस बार के अगर हम मुकाबले की बात करें तो लगभग 40 से 50 लाख वोटर्स का शायद फर्क था जीत और हार का और 90 लाख आपने हटा दिए हैं। सो क्लियरली ये तो समझ में आ रहा है कि ये क्या हो रहा है। तो इस सबको आप कैसे देख रहे हैं और आपने एजुकेशन को बहुत अच्छे से यहां पर समझाया और उसका प्रोसेस इतना स्लो है। इतना स्लो है कि लोग उनके सामने अपीयर हो रहे हैं उस ट्रिब्यूनल के सामने और महीनों महीनों में आप ये देखिए कितने हफ्तों में एक या दो चार लोगों के नाम जो है वो क्लियर होते हैं कि वो वोटर है या नहीं है। सो इसको आप कैसे देख रहे हैं? हाउ डू यू सी दैट? और क्या इमरजेंसी को अपोजिशन समझ रहा है? और नहीं समझ रहा तो फिर लोगों के पास क्या ऑप्शन है जिनके वोट्स डिलीट कर दिए गए हैं या किए जाएंगे? मुश जी एक बात मजाक की बात मैं बोलूं मेरे मेरे कोई एक दोस्त ने बताया आप जैसे बोले थे ना मैं मैं बहुत महीनों से सालों से इस बात में दोहराते रहा हूं बोलते रहा हूं मैं आप बोले थे ना ऐसे वो भी मेरे को देख रहा था एक बार मेरे से मिला तो बोला कि क्या परला इतना चिल्लाते हो इतना लिखते हो इतना बात करते हो इतना घूमते हो क्या बात है कुछ नहीं होने वाला है अच्छा क्यों नहीं पूछने वाले? अ ये बोला कि देखो ये इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया है ना आप समझो भाजपा के पास युवाओं को ऑर्गेनाइज करने के लिए युवा मोर्चा है। महिलाओं को ऑर्गेनाइज करने के लिए महिला मोर्चा है। किसानों को ऑर्गेनाइज करने के लिए किसान मोर्चा है। माइनॉरिटीज को ऑर्गेनाइज करने के लिए माइनॉरिटी मोर्चा है। इलेक्शंस को ऑर्गेनाइज करने के लिए इलेक्शन मोर्चा है। वो यही है। इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया उनका इलेक्शन मोर्चा है। तो इसका मतलब मजाक में बोला था ये लेकिन लेकिन इसके पीछे क्या है? इसके पीछे ये है बुशराज जी मैं बोल सकता हूं कि इलेक्शन कमीशन का विश्वसनीयता है ना इसका इसका क्रेडिबिलिटी इतना लो लेवल पर पहुंची है। लोग यह समझ रहे हैं कि यह इलेक्शन कमीशन है ना यह बीजेपी जो कहेगा वह करेगा। बस यह और अब हम आते हैं विपक्ष के पास और राजनीतिक दल के पास। अच्छा आप वोट चोरी हुआ। ऐसी नारा आपने उठाया। वोट चोर गद्दी छोर। वोट चोर गद्दी चोर। बहुत बड़ा-बड़ा रैलीज किया। इसका क्या मतलब है? आप यह यह यह मैंडेट्स चोरी हो रहा है। इसका इसका आपका यह है ना मन में यह है ना इसका मतलब आप इस इसमें आपको यकीन है कि वोट चोरी हो रहा है। वोट चोरी के बाद ही सरकार बन रहा है। है ना? वोट चोरी के बाद ही सदन बन रहा है। इसका मतलब यह है कि यह सदन को कुछ सेंटिटी नहीं है। तो आप जैसी ऐसी सदन को जिसको आप वोट चोरी के नतीजे से बन रहा है ऐसा आप मानते हैं ना आपने उतना चिल्लाया तो इसमें क्यों बैठते हैं? दूसरा अगर वोट चोरी के बारे में आपको पूरा यकीन है। आप कुछ भी कहो, कुछ भी करो आपका वोट तो चोरी हो रहा है। आपको यकीन है ना? अगर यकीन है तो आप इलेक्शन क्यों लड़ रहे हैं? तो इसका मतलब मेरा मतलब यह है कि जिस दिन सारे विपक्ष इस्तीफा देके यह सदन यह सरकार सिर्फ वोट चोरी की वजह से ही खड़ा है। आज हम इसमें हम हिस्सा नहीं लेंगे। हम बाहर आ गए हैं और कुछ भी इलेक्शन हो वोट चोरी जब तक वोट चोरी है जब तक एसी चुनाव आयोग है हम इसमें हिस्सा नहीं लेंगे आप क्यों नहीं बोल सकते आप क्यों हिस्सा ले रहे आप हिस्सा लेके मिश्रा जी हिस्सा लेके आप उधर बैठ के आप क्या कर रहे हैं आप हिस्सा लेके जो वोट चोरी का नतीजा नतीजा जी से बना हुआ सदन बना हुआ सरकार को आप क्रेडिबिलिटी दे रहे हैं। हम उसमें बैठ के सदन में बैठ के वो सदन को आप क्रेडिबिलिटी दे रहे हैं। तो ये कर सकते हैं क्या ये लोग? आई डोंट नो। बट ऐसा नहीं करने से नहीं करने तक इसको हम सॉल्व नहीं कर सकते। यह लोग नहीं किए तो सिविल सोसाइटी हम जैसे लोग पीसफुल सत्याग्रह के माध्यम से यह अपना के फीट ऑन द ग्राउंड एजिटेशन लाना है। यही इसका समाधान होगा। मैं और कुछ नहीं देख सकता हूं। मैं कुछ नहीं देख पाता हूं। आपको लगता है डू यू डू यू फर्सी कि ऐसा कुछ होने जा रहा है। ऐसा कुछ हो सकता है? क्योंकि हमने देखा कि जो बिहार में यात्रा हुई उसमें काफी लोगों का समर्थन मिला। जितना शायद उम्मीद भी नहीं थी उससे उम्मीद से कहीं ज्यादा। लेकिन वो लगा कि वो जो एक मोमेंटम बना उसको सस्टेन नहीं कर पाई ये पॉलिटिकल पार्टीज कि उसको आगे लेकर जाती। उसको एक देश का मूवमेंट बनाती। ये सिर्फ हार और जीत की बाइनरी में ही इसको देखा। उससे आगे इसको नहीं देख पाए। अब पश्चिम बंगाल का इलेक्शन हो रहा है। हो सकता है कांग्रेस पार्टी का उतना स्टेक वहां पर ना हो। हो सकता है कि लेफ्ट पार्टीज ये सोच रही हो कि भाई शायद हम उस तरह के कंपटीशन में नहीं है। तो यहां पर तृणमूल कांग्रेस है और भारतीय जनता पार्टी है। यानी कि इन दोनों का ही जीत और हार का फैसला इन दोनों के बीच में ही होना है और कुछ छोटे छोटे-छोटे प्लेयर्स हैं जो वहां पर हैं साथ में। उसमें कांग्रेस है, लेफ्ट पार्टीज हैं और कुछ दूसरे दल हैं। मेरा सवाल ये है कि क्या आप पश्चिम बंगाल में अगर सरकार भारतीय जनता पार्टी की बन जाती है और अगर तृणमूल कांग्रेस वहां से चली जाती है तो आप इसको फिर कैसे देख रहे हैं? क्या आपको नहीं लग रहा कि इलेक्शन दर इलेक्शन बीजेपी इसी तरीके से हर राज्य में एसआईआर वहां पर होगा क्योंकि बीजेपी मैं इसलिए कह रही हूं कि बीजेपी इस द ओनली पार्टी हु डस नॉट से एनीथिंग अबाउट दिस रादर वो एक तरह से इलेक्शन कमीशन के स्पोक्सपर्सन की तरह टीवी चैनल्स और प्रेस कॉन्फ्रेंसेस में बात करते हैं। तो इसीलिए ये सवाल उठता है कि और ये अब कोई ढकी छपी बात नहीं है। हम इतने मासूम नहीं है ना ही देश की जनता कि उनको नहीं पता है कि कौन कर रहा है किस तरह से कर रहा है। तो मेरा आपसे यह सवाल और एक लास्ट सवाल फिर मैं आपसे पूछूंगी कि अगर ऐसा होता है तो क्या इस पूरे प्रोसेस को क्या आपको लग रहा है कि लेजिटिमाइज कर दिया गया है ये एक शॉट शॉट उनके हाथ एक ऐसा त्रुक का इक्का लग गया है कि बिहार पश्चिम बंगाल एंड मे बी सम अदर स्टेट जहां उन्होंने कभी सोचा भी ना हो क्योंकि पश्चिम बंगाल भी एक ऐसा राज्य है जहां उन्होंने नहीं सोचा था कभी उनकी सरकार बन सकती है और वहां पे लगातार वो मजबूत हो रहे हैं और अगर इस इलेक्शन में बना ली सरकार तो फिर तो क्या होगा फिर ये ये बड़ा सवाल है और बड़ा बेचैनी का सवाल है। बड़ा सवाल है। लेकिन मैं ये इतना तक मैं बोल सकता हूं मुस्ता जी। अगर बंगाल में ऐसा कुछ हुआ आप आप आप जो आप जो फेयर कर रहे हैं जैसे कुछ हुआ। बंगाल बहुत ही क्या होगा? बहुत ही अनरेस्ट होगा बंगाल। हम और शायद वो वो वहां वहां प्रॉब्लम होने के बाद वहां पॉलिटिकल पार्टीज कूदने के बाद अच्छा ये दूसरी पॉलिटिकल पार्टी ये ये मत समझना कि ये तृणमूल और बीजेपी का बीच में लड़ाई है। नहीं ओके ये ये ये देश में लोकतंत्र रहेंगे या नहीं रहेंगे ऐसी लड़ाई है। तो ये ऐसे समझ के आगे जाना है। सब सब लोग अगर एक एक पॉलिटिकल पार्टी को अगर पॉलिटिकल पार्टी को उधर कुछ भी जगह नहीं है तो भी बंगाल के बारे में सोचना है। एक पॉलिटिकल पार्टी को समाजवादी समाजवादी पार्टी तमिलनाडु में कुछ नहीं है। समाजवादी पार्टी को तमिलनाडु के बारे में भी सोचना है क्योंकि ये देश का हिस्सा है। मणिपुर के बारे में सोचना है। हम सब भूल गए हैं। ऐसी बिहार हो गया भूल गया। मणिपुर हुआ भूल गया बंगाल होंगे भूल जाएंगे तमिलनाडु होंगे भूल जाएंगे ऐसा भूलना मत लगातार इसके बारे में बात करना है लगातार इसके बारे में हम हेजिटेट करना बिल्कुल ओनली देन कैन वी सेव दिस कंट्री बुरा जी दिस इज अ वेरी डीप क्राइसिस इन बहुत गंभीर आप वो कर रहे हैं और यह बहुत चिंता पैदा करता है और ऐसा लग रहा है कि हर चीज को इस देश में इस देश की जनता अपनी किस्मत समझकर या हम इसमें क्या कर पाएंगे यह समझकर शायद बैठ गए हैं। चाहे वो नोटबंदी हमने देखी उसके बाद कोरोना काल हमने देखा। फिर अब आप ये देखिए कि किस तरह से जो हमारी फॉरेन पॉलिसी है या देश में महंगाई बेरोजगारी जो बढ़ रही है जो युवा बाहर निकलते हैं उनप पे कैसे लाठी चार्ज इतनी शॉर्टलिफ्ड मेमोरी है मैं ये देख रही हूं कि कुछ होता है उसके बारे में बात होती है और लोग भूल जाते हैं जो एक पॉलिटिकल पार्टीज किसी चीज को एक मूवमेंट बनाती थी कि जब तक इसका हमें एंड रिजल्ट देखने के लिए नहीं मिलेगा तब तक हम नहीं बैठेंगे वो सब देखने के लिए नहीं मिल रहा है क्या आपको ये लग रहा है मैं माय लास्ट क्वेश्चन टू कि क्या आपको लग रहा है कि ये पॉलिटिकल पार्टीज बेहस हो गई है? आई मीन दे डोंट नो कि क्या हो रहा है या फिर वो अपनी पार्टीज को बचाने अपनी सीट को बचाने अपने आप को बचाने में इतनी ज्यादा वो गई है कि वो बात तो करती है लोकतंत्र की इलेक्शन कमिशन सुधार की सबकी लेकिन जिस हद तक उन्हें जाना चाहिए उस हद तक नहीं जाती हैं। तो ऐसे में तो आप एक-एक करके तमाम स्टेट से सिमट जाएंगे और जो आरएसएस का जो ख्वाब है जो बीजेपी का ख्वाब है वो वो पूरा होगा। पश्चिम बंगाल में अगर सरकार बन गई तो वो तो इनका मुझे लगता है कि एक 100 इयर्स में जो कंप्लीट किए उसमें शायद सबसे इंपॉर्टेंट उनका ये ड्रीम होगा व्हिच व्हिच विल कम ट्रू इफ दैट हैपेंस मैं पिटिकल पार्टीज का ऑफ कोर्स मैं आई आई एम नॉट यू नो अंडरएस्टिमेटिंग देयर देयरेंस दे आरेंट बहुत इंपॉर्टेंट है ये लेकिन अब तक मेरे पास ये सबूत नहीं है कि ये ये पूरा लास्ट स्माइल तक जाएंगे। इसको फिट ऑन द ग्राउंड एजिटेशन लाएंगे, लड़ेंगे। ऐसी सबूत मेरे पास नहीं है। तो तो विकल्प क्या है? विकल्प बृष् मेरे को यही लगता है कि सिविल सोसाइटी शुड स्टार्ट ऑर्गेनाइजिंग। अगर सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइज करके थोड़ा आगे जाएंगे तो आएंगे पॉलिटिकल पार्टीज। क्योंकि देखिए हमारे जैसे लोग लड़ रहे हैं। हम एमपी थोड़ी बनेंगे। एमएलए थोड़ी बनेंगे। हम मंत्री थोड़ी बनेंगे। वह लोग बनेंगे ना। तो इसलिए आएंगे वो लोग। लेकिन इनिशिएटिव वही लेना है। वही कर सकते हैं। ऐसी ऐसी बात हम आपके हमारे मन में से आप हम निकालना चाहिए। हम करना है। हम ये ये क्रिकेट मैच देखने का स्पेक्टेटर का सिंड्रोम मेंटालिटी जो है ना देखेंगे। वैसा ऐसा हो रहा है क्या? बंगाल में क्या हो रहा है? ऐसा हो रहा है? नहीं ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं आप आप एनालिसिस का हो गया है। एनालिसिस आप क्या है? आपका प्रॉब्लम क्या है? डायग्नोसिस क्या है? आपको मालूम है। लेकिन अभी एक्शन का टाइम है। पीसफुल सत्याग्रह फीट ऑन द ग्राउंड एजिटेशन टू स्टॉप दिस एंड टू सेव आवर रिपब्लिक। बिलकुल। यही मुझे लगता है कि लास्ट रिसोर्ट है और एक लोकतांत्रिक निजाम में एक डेमोक्रेटिक सेटअप में यही जनता के पास भी और आप जैसे लोगों के पास हम जैसे लोगों के पास सिविल सोसाइटी के जो लोग हैं जो अपने देश के बारे में सोचते हैं कंसर्न है डेमोक्रेसी के बारे में जो सोचते हैं। इस देश की जो रूह है जो आत्मा है उसके बारे में सोच रहे हैं। कैसे हम पूरी दुनिया में कैसे देखे जा रहे हैं। किस तरह से हम एक शानदार डेमोक्रेसी थे। इलेक्शन कमीशन को हमारे जो है वो बुलाया जाता है कि फ्री एंड फेयर इलेक्शन किस तरह से होता है वो दिखाने के लिए वो डेमो करने के लिए और देखिए उसी देश में क्या हो रहा है इलेक्शन कमीशन क्या करता हुआ नजर आ रहा है। बहुत-बहुत शुक्रिया थैंक यू सो मच प्रकला जी आपने टाइम दिया और आई एम श्योर कि आपके जरिए जो हमारी ऑडियंस है उसको बहुत कुछ सीखने और जानने का मौका मिला होगा। थैंक यू सो मच फॉर योर वैललेबल टाइम। थैंक यू बश जी। थैंक यू वेरी मच। बहुत शुक्रिया। थैंक यू।

Companion article

West Bengal is going to the polls this month on an electoral roll that has been quietly emptied of tens of lakhs of names. In conversation with Nous, the economist and long-time election-reform campaigner Parkala Prabhakar argued that the Special Intensive Revision, or SIR, carried out ahead of the vote is not the routine housekeeping the Election Commission of India describes, but what he called a "bloodless political genocide" — a phrase, he said, he does not use lightly.

What the SIR Actually Is, and Why No One Will Explain It

Every year, between October and February, the Election Commission conducts a Summary Revision of electoral rolls — adding new voters, removing the dead, correcting errors. What happened in Bihar earlier this year, and has now been repeated in West Bengal, was different: a Special Intensive Revision, justified in official notifications on the grounds that an unspecified internal study had found the ordinary revision process unsatisfactory, riddled with dead voters, duplicates and people who had shifted address. Prabhakar said he does not dispute that such errors exist. What troubles him is the opacity around the decision itself. Right to Information queries filed by activists, including the transparency campaigner Anjali Bhardwaj, sought the study that justified the SIR, the name of the authority that ordered it, and any file noting or concept paper behind it. The Election Commission's response, he said, was that no such record exists — no study has been made public, no single official is named as having taken the decision, and a separate RTI after the Bihar exercise established that no review of that rollout was ever conducted before the same process was extended to Bengal and other states.

Ninety Lakh Names, Twenty-Seven Lakh Left in Limbo

In West Bengal, Prabhakar said, close to ninety to ninety-four lakh voters have either been deleted from the rolls outright or referred to a slower process called adjudication, where a tribunal decides case by case whether a flagged name is genuine. He was careful to say that not every deletion is illegitimate — pointing to cases from Bihar where a Brazilian actress's photograph was used to register duplicate voters at fifteen to twenty different locations, and where investigators found a single address registered to eighty-nine people of different castes, regions and religions, at a location that on inspection turned out to have no house at all. But he argued the same clean-up exercise has doubled as cover for what he called targeted deletions, noting that those referred to adjudication in Bengal are overwhelmingly — by his account, ninety to ninety-five percent — Muslim. Of the roughly ninety lakh names in question, around twenty-seven lakh remained undecided at the time of the interview: neither confirmed as eligible nor formally struck off, even as the state's old electoral roll, which he stressed has not been legally extinguished, continues to exist in parallel. His argument is procedural as much as political: a voter who has not been ruled ineligible cannot lawfully be denied a ballot, yet the adjudication tribunals are moving so slowly — by his estimate, clearing only a handful of names a week — that most of the twenty-seven lakh will remain unresolved by the time both phases of voting are over.

A Reversed Burden of Proof

A recurring theme in Prabhakar's argument is that the documentary burden now placed on ordinary voters has no precedent. When the Election Commission points to a similar special revision conducted in 2002-03 to argue that nothing unusual is underway, he counters that no Indian voter in that exercise was asked to produce a paper trail proving their parents' citizenship or their own eligibility document by document, in the way SIR now demands. That burden, he said, falls hardest on people who can least carry it — daily-wage labourers, the illiterate, residents of flood-prone villages without stable paperwork — and disproportionately on Muslims, Dalits and Adivasis, the groups he says are being made to prove, again and again, that they belong.

Two Indias: From No Vote to No Aadhaar, No Ration, No Land

Prabhakar's central warning is that SIR does not simply subtract names from a list; it splits citizens into two tiers. One tier retains full rights and recognition. The other loses the vote first, and with it the political attention of every party, since, as he put it, parties will only campaign for and act on behalf of "those people who have votes." He sketched what he sees as the logical next steps once someone is off the voter rolls: if a person is not a voter, why should they need an Aadhaar card; if they have no Aadhaar, why should they receive a ration card; if they have no ration card, what basis do they have to hold farmland at all. He was careful to frame this as a foreseeable trajectory rather than a settled fact, but insisted the sequence is not far-fetched once disenfranchisement is normalised. In his account, the relationship between voters and the state has been inverted: previously, voters decided who would hold power; after SIR, those already in power are deciding who gets to be a voter.

Why He Calls It "Bloodless Political Genocide"

Asked to explain the phrase, Prabhakar said genocide historically meant expelling or killing populations distinguished by religion, caste, region, language or civilisation. A modern Indian state, he argued, can no longer expel or physically eliminate its own citizens — but it can extinguish their citizenship instead, achieving a comparable erasure by bureaucratic rather than violent means. He invoked a remark by Assam's chief minister about the state's "Miya" Muslim population, that the state need not physically expel them because conditions could be engineered to make them leave on their own, as an illustration of the same underlying logic. He was emphatic that his objection is not about which party wins or loses a given election — he said explicitly that a Trinamool Congress victory would not, by his standard, make the process legitimate either — but about whether the process itself preserves what he called the basic democratic principle of "one person, one vote, one value."

A Reluctant Umpire and an Indecisive Court

Prabhakar was equally critical of the institutions meant to check this process. He said the Election Commission's credibility has fallen so low that it is popularly seen as functioning like another wing of the ruling party — comparable, he said sardonically, to the BJP's youth, women's, farmers' and minority wings, except this one organises elections. On the judiciary, he described a pattern of adjournment after adjournment on the constitutional validity of SIR — "tareekh pe tareekh," in his words — even as elections proceed on the results of the very process whose legality remains undecided. The Supreme Court did invoke Article 142 to grant some relief on the adjudication timeline, which he welcomed, but he argued that courts should not be taking their time on a process that is actively running its course; a decision deferred, he said, is functionally a decision to let the process complete unchallenged. He added, pointedly, that he is uneasy about how much the country has come to depend on the judiciary to resolve what is fundamentally a political and administrative failure.

The Opposition's Contradiction

Prabhakar reserved some of his sharpest criticism for opposition parties. He noted that parties which raised the slogan "vote chor, gaddi chor" — vote thief, throne thief — and held large rallies alleging stolen mandates have nonetheless continued to take their seats in the very assemblies and Parliament they say were elected on stolen votes. If a party genuinely believes an election's outcome rests on theft, he argued, boycotting the resulting house rather than legitimising it by sitting in it would be the consistent response. He also pointed to a pattern of short memory: a yatra against voter deletions in Bihar drew unexpectedly strong public support but was not sustained into a durable national movement, and crises in Manipur, Bihar and now Bengal are each set aside once the news cycle, and the election, moves on. He warned that if the BJP wins West Bengal on rolls reshaped by this SIR, it would hand the party a repeatable template — a "trump card" the party could deploy in state after state — and, in his words, would fulfil what may be the single most consequential ambition the Rashtriya Swayamsevak Sangh has pursued in a century.

Civil Society as the Last Resort

Asked what remains to be done, Prabhakar said he places little faith in either the courts or political parties to carry this fight to its conclusion, based on what he has observed so far. His prescription is sustained, peaceful satyagraha — organised civil society agitation with, in his phrase, "feet on the ground," rather than sporadic press conferences or one-off yatras. He argued that political parties tend to follow public mobilisation rather than lead it, and that only a broad, non-partisan citizens' movement, one that keeps attention on Bihar, Manipur, Bengal and Tamil Nadu alike rather than moving on after each election, can force the issue to remain a national priority. He closed by framing the stakes in terms of India's own self-image: a country that has long presented its elections as a model of free and fair democracy to the rest of the world, he said, cannot ignore what its own Election Commission is now seen to be doing at home.

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