Nous Explainers· 04 Jul 2026· 13:46

The Muslim Vision for a Peaceful, Prosperous and Inclusive India | Dr. Javed Jamil

India's progress depends on the participation and empowerment of all its citizens. In this video, we present our perspective on the Muslim Vision for a Peaceful, Prosperous, and Inclusive India, based on the ideas of Dr. Javed Jamil. We discuss the demographic significance of Indian Muslims, the …

Full Transcript

यह 2012 की बात है जब मेरा डॉक्यूमेंट बउनवान मुस्लिम विजन ऑफ सेकुलर इंडिया डेस्टिनेशन रोड मैप दिल्ली में इस्लामिक कल्चर सेंटर में उस वक्त के माइनॉरिटी मिनिस्टर जनाब सलमान खुर्शीद साहब और राज्यसभा में उस वक्त के डेपुटी चेयरमैन जनाब के रहमान साहब और दीगर मुअजिस शख्सियात की मौजूदगी में जारी किया गया। इस डॉक्यूमेंट ने पहले ही एक अच्छा खासा एक माहौल पैदा कर रखा था पूरे मुल्क के अंदर और लोगों की इसके अंदर बड़ी दिलचस्पी थी। इस डॉक्यूमेंट ने मुल्क भर में आवाम खवास की भरपूर तवज्जो हासिल की जो भी हिंदुस्तान में मुसलमानों के मसाइल से फिकरमंद थे। बाद अजा यह 2016 में एक किताब की सूरत में भी शायर हुआ। यहां यह मुनासिब होगा कि उस 450 से ज्यादा सफात के मुस्तमिल एक डॉक्यूमेंट का मुख्तसर तारुफ पेश किया जाए। आइए पहले मुख्तसरन यह समझने की कोशिश करें कि आखिर मुस्लिम विज़न है क्या? यानी मुसलमानों की सोच क्या है इस मुल्क के बारे में और अपनी कौम के बारे में। हम वो नहीं है जो दूसरे हमें समझते हैं। अक्सर लोग अपने तासुबात, नजरियाती तसवुरात और मफादात के रंगीन चश्मे लगाकर हमें देखते रहे हैं। लेकिन जरूरत अब इस बात की है कि हम मुसलमान खुद को अपने ही जाविव नजर से अपने ही चश्मे से देखना शुरू करें। शर्त सिर्फ यह है कि यह नजर हमारी करीब और दूर दोनों तरह के विज़न को दुरुस्त करने वाली हो। ऐसा ना हो कि सिर्फ हम करीब को तो देखते रहे। हम दूर का ना समझे। क्योंकि हमें जब भी कोई हम प्रोग्राम बनाना होता है हमें तो उसमें शॉर्टर और लगर दोनों चीजों को का तालमेल होना बहुत जरूरी है। मुसलमानों का मसला यह रहा है कि वो तवील अरसे से खुद को दूसरों के मयार परखते रहे हैं। यानी दूसरे हमारे बारे में क्या सोचते हैं? हम उसको स्टैंडर्ड मानकर अपने बारे में परखते हैं। और अपनी तरजीहात और एदाफ यानी हमारे गोल्स क्या होने चाहिए? हमारे प्रेफरेंसेस क्या होने चाहिए? दूसरों के फैसलों के मुताबिक तय करते रहे। हम यह भूल गए हैं कि हमारी स्ट्रेंथ और हमारी कमजोरियां दूसरों के अंदाजों से मुख्तलिफ होती हैं। हमारा अपना एक सोचने का एक नजरियाती पैरामीटर है। अपने मकासिद हैं और मंजिल तक पहुंचने के अपने तरीके हैं। दुनिया के बारे में हमारा अपना अलग विज़ है जिसे हमने बदकिस्मती से मंजरे आम पर लाना और नाफिज़ करना की कोशिश करना छोड़ दिया है। इसका नतीजा यह है कि कुछ अंदरूनी और बैरूनी ताकतें मुसलसल मुसलमानों को एहसास कमतरी यानी एक इनफीरिटी कॉम्प्लेक्स में मुब्तला करने की कोशिश करते रहते हैं। हमें बार-बार यह बबर कराया जाता रहा है कि हम एक सो कॉल्ड लॉस कम्युनिटी है। यानी हम एक हारी हुई कौम है जिसके पास में कोई अपना मकसद नहीं रह गया है। जिसके पास कोई खास ताकत नहीं है। और उस वक्त तक हमारा मुस्तकबिल अंधेरे में है। यानी तारीख है जब तक हम एक मखसूस रास्ता इख्तियार ना करें और जाहिर है यह मखसूस रास्ता वो जो कि वो दूसरे तय करें। हमें इस धोखे पर मबनी रवय को बिल्कुल मुस्तद कर देना चाहिए। ताम इसका मतलब यह भी नहीं है कि हम दूसरों के राय को मुकम्मल तौर पर नजरअंदाज कर दें। तनकीद कई मर्तबा अपने तर अमल का असरे नो जायजा लेने का मौका फराहम करती है। अगर तनकीद बेबुनियाद हो तो यह हमारे अंदर नया जोश पैदा करती है। हमें चाहिए कि हम दूसरों की बातों का मुनजम तजिया करें और बगैर मरू हुए या बगैर माज़रत ख्वा हुए बगैर हम मसाइल का सामना करें। यानी हमारे अंदर एक अपोलजिटिक जो एक पूरा एक माहौल पैदा हो गया कि हम अपोलजेटिक बहुत जल्दी हो जाते हैं। तो उस अपोलजेटिक एटीट्यूड से हमें बाहर निकलना होगा। आइए अब हिंदुस्तानी आबादी में अपनी हैसियत की चंद हकीकतों को समझते हैं। 2026 के आगाज तक हिंदुस्तान दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला मुल्क बन चुका है। जिसकी आबादी 1.43 से 1.48 अरब के दरमियान है। जो आलमी आबादी का तकरीबन 18% बनती है। 2019 के अंदाजे के मुताबिक तकरीबन 20 करोड़ 40 लाख मुसलमानों के साथ हिंदुस्तान दुनिया में मुसलमानों की तीसरी सबसे बड़ी आबादी रखता है और दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम अकलियत की आबादी भी यही है। यानी ऐसे कंट्रीज जहां पर मुसलमान माइनॉरिटी में है। तो ऐसे जो तमाम कंट्रीज में इंडिया वो कंट्री है जहां पर मुसलमान माइनॉरिटी में होने के बावजूद उनका परसेंटेज मैक्सिमम है। यानी बाकी दुनिया के जो माइनॉरिटी जहां मुसलमान है उनके मुकाबले दुनिया के तकरीबन 10.9% मुसलमान हिंदुस्तान में रहते हैं। 2030 तक हिंदुस्तान में मुसलमानों की तादाद 23 करोड़ 22 लाख तक पहुंचने का इमकान है। यह मुसलमानों का तनासुब 2010 में 14.6% से बढ़कर 2030 में 15.9% होने की तवकको है। इस तरह हिंदुस्तान की मुस्लिम आबादी इंडोनेशिया और पाकिस्तान के अलावा किसी भी मुस्लिम मुल्क से ज्यादा है। इस हैसियत का तकाजा यह है कि मुसलमानों को कौमी और बैनुल अकवा में यानी नेशनल और इंटरनेशनल पॉलिसीज में नुमाया तौर पर असर अंदाज होने के काबिल बनना चाहिए। खासतौर पर समाजी और माशी तरक्की से मुतालिक प्रोग्रामों में यानी जो सोशल इश्यूज हैं जो इकोनमिक इशज़ है उससे रिलेटेड जो प्रोग्राम्स हैं उनमें मुसलमानों को बहुत पॉजिटिव कंट्रीब्यूशन के साथ आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए। इसी तरह उन्हें मुल्क के वसाइल में अपने आबादी के मुताबिक हिस्सा मिलना चाहिए। उन्हें मुल्क की कामयाबियों में शरीक होना चाहिए और फायदा भी उनका उठाना चाहिए। लेकिन हकीकत यह है कि ऐसा हो नहीं रहा है और मौजूदा हालात में मुस्तकबिल करीर में इसके इमकानात भी बहुत कम नजर आते हैं। यही वो सुरते हाल है जिसे बदलने की अशद जरूरत है। मुसलमान एक ऐसे मुल्क के शहरी हैं जो दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत और सबसे ज्यादा आबादी वाला मुल्क है। हिंदुस्तान आलमी मशत में एक उभरती हुई ताकत भी है और उसकी स्ट्रेटेजिक एहमियत भी बहुत ज्यादा है। मुसलमान एक मजहबी कौम है क्योंकि ज्यादातर मुसलमान इंडिया के चाहे वो हिंदू हो, चाहे मुसलमान हो, चाहे वो दूसरी कम्युनिटीज के हो, वो मजहब पर यकीन रखने वाले हैं। वेस्टर्न कंट्रीज की तरह नहीं है कि जहां पर एक बड़ी तादाद ऐसी है कि जो अथिस्टिक हो गई है। यानी जो किसी मजहब को नहीं मानती। कहने को वो समझा जाता है कि वो क्रिश्चियन है। लेकिन वो क्रिश्चियनिटी में भी बिलीव नहीं करती। मुसलमान एक मजहबी कौम है जिनका अपने दीन पर मजबूत यकीन है और वो ये तमाम जो डेवलपमेंटल एक्टिविटीज सो कॉल्ड चल रही है उनसे मुतमई नहीं होते क्योंकि डेवलपमेंट का तकाजा कुछ और इस्लाम के नजदीक है लेकिन आज की इकोनमिक फर्सेस उनको किसी और अंदाज में पेश करती है क्योंकि वो सिर्फ अपना मफाद देखते हैं। उनको तो चाहे वो तो उनके लिए तो अल्कोहल भी बहुत बढ़िया चीज है। उनके लिए नाजायज ताल्लुकात भी बढ़िया चीज है और उनके लिए गैंबलिंग भी बहुत जबरदस्त चीज है। उसको वो फायदा उठाते हैं। लेकिन जाहिर है इस्लाम में यह जो दीनी तालीमात है इस्लाम की उसके ये खिलाफ है। अक्सर उन्हें यह महसूस होता है मुसलमानों को कि अक्सरियती तबका उनके मजहबी जज्बात का लिहाज नहीं करता। यह यह बात हिंदुस्तान के ऊपर भी अप्लाई होती है और पूरे वर्ल्ड पर भी अप्लाई होती है। उनकी नौजवान आबादी का तनासुब ज्यादा है। मेहनतकशों और सफिन की तादाद में लगातार इजाफा हो रहा है। जिसके लिए तालीम और समाजी मंसूबाबंदी की इंतहाई अशद जरूरत है। लेकिन आखिर कहां गलती रह गई? कहां कमी रह गई? मुसलमान तरक्की के मुख्तलिफ मैदानों में क्यों पीछे रह गया? इसका जिम्मेदार कौन है? आइए उसके पीछे की वजूहात समझने की कोशिश करते हैं। कुछ पार्टियां खुलकर मुस्लिम मुखालिफ समझी जाती हैं। लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी पॉलिटिकल पार्टी ने बिलखसूस मुसलमानों की हकीकी जरूरत का ख्याल नहीं किया। मुसलमानों का क्या इन जनरल भी पॉलिटिकल पार्टीज जो आम जनता के जो मफादात है उनका ख्याल बहुत कम करती हैं। वह अपना पॉलिटिकल इंटरेस्ट ज्यादा करती हैं। सेकुलर जमातों ने मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया जबकि दीगर जमातें उनके हुकूक को भी महदूद करना चाहती हैं। मुसलमानों की नुमाइंदगी कम रही है। यानी नुमाइंदगी उन पॉलिटिकल पार्टीज में भी और उसके अलावा जो इंस्टीट्यूशन है जैसे पार्लियामेंट असेंबलीज में भी और जो नुमाइंदे आते भी हैं वह भी अपनी पार्टी की पॉलिसियों के ताबे होकर रह जाते हैं ना कि अपनी कम्युनिटी के मसाइल की हकीकत तर्जुमान जो चंद लोग बीजेपी में होते हैं वो जाहिर है फिर वो उनके नजदीक वो मुसलमानों के मफादात या मुसलमानों के जो तकाजे हैं वो अपनी पार्टी में जाकर बयान नहीं करते बल्कि उनकी पार्टी के जो नजरियात वो समझाने की मुसलमानों को कोशिश करते हैं। इसी तरह बाकी दूसरी पार्टियों का भी हाल है। उसके अलावा उलमा ने ज्यादातर मजहबी मामलात पर तो तवज्जो दी और समाजी और माशी तरक्की पर वो खातिरखा तवज्जो नहीं दी जिसके लिए उनका फर्ज बनता था जिससे आवाम और उलमा के दरमियान एक फासला बढ़ता चला गया। यानी फासला दीनी ऐतबार से ना सही लेकिन दुनियावी मामलात में जिस तरीके का एक कम्युनिकेशन होना चाहिए था कि उलमा दीन उनकी पूरी नुमाइंदगी कर रहे होते उनको एक तरीके से गाइडेंस कर रहे होते वो चीज जिस हद तक होनी चाहिए उस हद तक नहीं हुई बेशतर दानिशवर यानी जो इंटेलेक्चुअल जो पढ़े लिखे लोग हैं वो अमली काम के बजाय सिर्फ क्रिटिसिज्म तक महदूद होकर रह जाते हैं और जामे हिकमती अमली तैयार करने में नाकाम रहे। अकलियत और अक्सरियत का मसला सिर्फ मजहब की बुनियाद पर नहीं होना चाहिए। हिंदुस्तान की अक्सरियत यानी ओवरऑल इंडिया की जो पूरी जो मेजोरिटी है वो गरीब है और मुसलमान भी उनहीं मसाइल का शिकार हो रहा है। इसलिए वो उस बड़ी अक्सरियत की कयादत कर सकते हैं। मुसलमानों में भी अमीर मुतवस और गरीब तबकात हैं और जाहिर है गरीब तबकात और मुतवसित की तादाद कहीं ज्यादा है जो दीगर कम्युनिटीज की तरह ही मसाइल और मरात रखते हैं। बुनियादी सहूलियात जैसे सड़कें, पानी, बिजली, हेल्थ, बैंकिंग, इनफ्लेशन, महंगाई वगैरह तमाम शहरियों को मुतासिर करती है। इसी तरह क्राइम्स, करप्शन, ड्रग्स और फहाशी जैसे मसाइल पूरे मुआशरे को मुतासिर करते हैं। मुसलमानों को इन तमाम मामलात में फल किरदार अदा करना चाहिए। और इन चीजों के खिलाफ मैदान में उतरना चाहिए और अपने जो उनके इस्लामी नजरियात है उनको सामने रखते हुए इनका हल पेश करने की कोशिश करनी चाहिए। हिंदुस्तान की इकॉनमी तकरीबन 8 फीसदी की शरह से बढ़ती रही है। लेकिन मुसलमानों की माशी तरक्की उससे बहुत कम समझी जाती है। मुसलमानों को अपनी हम जहती तरक्की के लिए कैसे मंसूबाबंदी करनी चाहिए? हमें इस पर गौर करने की जरूरत है। उन्हें कौमी सतह पर जामे और मरबूत मंसूबा करनी होगी जो हर शोबे का अहता होगा वो करे। यानी पूरी तरह ऑर्गेनाइज्ड हो। उनमें मल्टीपल जो है उसके ऑर्गन्स हो और उनके अंदर आपस में कोऑर्डिनेशन हो। यह बहुत जरूरी है। कोई शोभा छूटना नहीं चाहिए और तमाम जितनी भी अलग-अलग ग्रुप्स अलग-अलग मैदानों में काम कर रहे हैं उनके दरमियान एक कोऑर्डिनेशन होना चाहिए। अब आइए देखते हैं कि हिंदुस्तान के बारे में मुसलमानों का विज़ क्या है। नंबर एक एक सेकुलर हिंदुस्तान जहां पर मजहब का एहतराम हो। किसी मजहब या उसकी मुकद्दस शख्सियात की तौहीन ना की जाती हो और सब मिलजुलकर एक बेहतर मुल्क की तामीर करें। नंबर दो आला अखलाकी अखदार वाला हिंदुस्तान। जहां पर खानदानी और समाजी दार यानी फैमिली वैल्यूस और सोशल वैल्यूस पूरी तरह महफूज़ रहे और बुराइयों जैसे ड्रग्स जैसे गंबलिंग या जुआ फहाशी वगैरह के खिलाफ मुसर इदामात किए जाना जरूरी है। नंबर तीन हकीकी मसावात वाला हिंदुस्तान यानी एक इक्वलिटी हो तमाम समाज के अंदर जहां पर जो एक इनकम इनइक्वलिटी है यानी माशी अदम मसावात कम से कम हो और उसमें लगातार कमी आनी चाहिए। नंबर चार एक सिक्योर हिंदुस्तान सिक्योर इंडिया यानी एक महफूज हर तरह से महफूज जहां पर क्राइम्स वायलेंस करप्शन और औरतों के खिलाफ जो जरायम है उन पर सख्ती से काबू पाया जा रहा हो। नंबर पांच अमन का गहवारा हिंदुस्तान यानी एक जो है हिंदुस्तान ऐसा पीस का एक पूरा दुनिया के लिए एक मिसाल बने। वो हिंदुस्तान जो आलमी ताकतों की बालादस्ती के खिलाफ खड़ा हो और कमजोर मुालिक की मदद करे। नंबर छह खुशहाल हिंदुस्तान यानी जो हर तरीके से एक प्रोस्पेरस मुल्क हो जहां तरक्की के समररा सबको बराबर मिले। मुसलमानों का बामानी किरदार भी बहुत जरूरी है। मुसलमान तरक्की में हिस्सा लें और उन्हें अपने मजहबी और सकाफती उसूलों के मुताबिक जिंदगी गुजारने की आजादी हो। मुख्तसरन हमारे ख्वाबों का हिंदुस्तान एक ऐसा मुल्क है जो ताकत के बजाय अमन अखलाकियात और इंसानीदार को तरजीह देता हो और पूरी इंसानियत की फलाह का रहनुमा बने। बहुत-बहुत शुक्रिया।

Companion article

A document born in 2012

In 2012, Dr Javed Jamil released a document titled "Muslim Vision of Secular India: Destination and Road Map" at the Islamic Cultural Centre in Delhi, in the presence of the then Union Minority Affairs Minister Salman Khurshid, the then Deputy Chairman of the Rajya Sabha K. Rahman Khan, and other prominent figures. The document, running over 450 pages, generated considerable public interest at the time and was later published as a book in 2016. Presenting a summary of it now, Jamil argues its central propositions remain, if anything, more urgent than when he first wrote them.

Seeing themselves through their own eyes

Jamil's starting point is a critique of how Indian Muslims have come to understand themselves. Too often, he argues, they are viewed by others through lenses of prejudice, ideology and self-interest — and, worse, they have internalised those external judgements as their own standard. "We have forgotten that our strengths and our weaknesses are different from others' assumptions about us," he says, describing a community that has let outsiders define its goals and priorities rather than working these out for itself. The result, in his telling, is a manufactured inferiority complex — the repeated suggestion that Muslims are a "loser community" without purpose or strength, whose future depends on following a path charted by others. Jamil does not counsel dismissing outside criticism altogether — fair critique, he says, can prompt useful self-examination — but he argues Muslims must shed what he calls their reflexively "apologetic" posture and confront problems directly rather than retreating into defensiveness.

The weight of numbers

Jamil grounds his argument in demography. By the start of 2026, India has become the world's most populous country, with a population between 1.43 and 1.48 billion — roughly 18 percent of humanity. As of 2019 estimates, India's roughly 204 million Muslims made it home to the world's third-largest Muslim population and the largest Muslim minority population anywhere: about 10.9 percent of the world's Muslims live in India, a country where they remain a minority by national count. By 2030, Jamil projects, that number could reach 232 million, with Muslims' share of the population rising from 14.6 percent in 2010 to roughly 15.9 percent — meaning India's Muslim population would exceed that of every Muslim-majority country except Indonesia and Pakistan. That scale, Jamil argues, ought to translate into real influence over national and international policy, and a proportionate share in the country's resources and successes. Instead, he says, the opposite has happened, and current trends offer little hope of near-term correction.

A young, working, religious population

Jamil describes Indian Muslims as citizens of the world's largest democracy and most populous nation, one that is also a rising global power. He characterises them as a strongly religious community — unlike parts of the Western world, he argues, where large numbers have effectively become non-religious even while nominally retaining a faith label. Because of this, he says, many Muslims remain unpersuaded by development framed around alcohol, gambling or extramarital relationships being treated as economic goods, since these conflict with Islamic teaching. He also notes what he describes as a widespread sense among Muslims that the majority community does not sufficiently respect their religious sentiments — a perception he says applies both within India and globally. Demographically, he points to a young, growing labour force in need of far greater investment in education and social planning.

Where responsibility lies

Turning to explanations for the community's lag in development, Jamil spreads responsibility widely. He argues no political party — whether openly identified as anti-Muslim or nominally secular — has genuinely served Muslims' real interests; secular parties, he says, have treated Muslims as a vote bank, while others have sought to curtail their rights. Political representation, he notes, remains thin, and even those elected often answer to party lines rather than community needs. He is equally critical of Muslim religious scholars (ulama), who he says focused heavily on religious matters while neglecting social and economic advancement, widening the gap between community and clergy on worldly matters even as religious guidance continued. Intellectuals, in his account, too often confined themselves to criticism without producing workable, practical programmes.

A vision built around six pillars

Jamil is careful to note that the challenge of minority and majority is not solely about religion — India's broader majority is poor, and Muslims share many of the same struggles around roads, water, electricity, healthcare, banking and inflation, as well as crime, corruption, drugs and social decay, and should take an active role in addressing them. He calls for coordinated, community-wide planning across every sector of Muslim civic life, arguing that fragmented efforts by disconnected groups have limited impact.

He then sets out what he calls the Muslim vision for India across six pillars: a secular India where all faiths are respected and none insulted; an India of high moral character where family and social values are protected and evils like drugs, gambling and vice are firmly checked; an India of genuine equality, with shrinking income inequality; a secure India where crime, violence, corruption and crimes against women are firmly controlled; an India that is a cradle of peace, standing against the domination of global powers and supporting weaker nations; and a prosperous India where the fruits of development reach everyone equally. Within this vision, he argues, Muslims should participate meaningfully in national progress while retaining the freedom to live according to their religious and cultural principles. "Our dream," Jamil concludes, "is of an India that gives peace, ethics and humanity precedence over power, and that leads the way for the welfare of all humanity."

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