Nous Podcast· 03 Jun 2026· 3:39:39

The Prophetic Model of Transformation in a Modern World | Abdul Mujeeb Khan & Maulana Sadiq Falahi

What does authentic Muslim leadership look like in the modern world? Can coaching, education, and personal development emerge from an Islamic worldview rather than simply borrowing from frameworks built elsewhere? In this conversation, Abdul Mujeeb Khan and Maulana Sadiq Falahi explore the challe…

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लीडरशिप का तसवुर भी बहुत ज्यादा इमावरिश्ड है। जितनी हमारी पावर्टी हम मैन्युफैक्चर कर रहे हैं ना इट इज अ फंक्शन ऑफ द पावर्टी ऑफ अंडरस्टैंडिंग लीडरशिप इटसेल्फ। [संगीत] सिर्फ काम करने वाले पैदा करना मकसूद नहीं। वो काम करने वाले अपने शोबे में खुदा का बंदा बनके काम करने वाले पैदा। लीडरशिप हम इक्वेट करते हैं ओदे से। हां, गद्दी से। तो लीडरशिप [संगीत] होती है नतीजे से, खैर से। उस सबके बीच में देयर इज अ जनरेशन दैट इज गोइंग थ्रू दिस प्रोसेस और वो अपनी-अपनी फील्ड्स में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन स्टिल दे आर कंटीन्यूसली एंड कंसिस्टेंटली फीलिंग दैट गैप। दिन रात बैठ के उसकी प्लानिंग करते [संगीत] थे। इसलिए कि हम पीछे पढ़ चुके थे। अल्लामा जी को पढ़ चुके थे। सदसवी को पढ़ चुके थे। मुनाजिर हसन गिलानी रहमतुल्लाह पढ़ चुके थे। व्हाट आर वी एक्सपेक्टिंग टू गेन फ्रॉम दिस काइंड ऑफ़ ट्रेनिंग? व्हाट इज द इस्लामिक मॉडल? फॉर खैर आईक्यू और ईक्यू के ऊपर देयर इज एन अदर इंटेलिजेंस एंड दैट इज द स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस वेयर डू यू पिवट एंड वेयर डिड यू थिंक नेसेसरी दैट यू ऑट टू फोकस ऑन कल्टीवेटिंग मुस्लिम लीडरशिप। 15 से लेके 40 साल की जो इंसान की उम्र है वो इज द एज ऑफ़ ट्रांसफॉर्मेशन। दो सवाल जो है बहुत अहम हो जाते हैं इसमें। आपको अगर लोगों की आंखों का तारा बनना है तो आपको लोगों के लिए नाफे बनना पड़ेगा। यह कुरान ने एक सीधा उसूल दिया है। और उसके बीच में फिर आप ये जो फेलोशिप्स डिजाइन कर रहे हैं, प्रोग्राम्स बना रहे हैं तो वो क्या थी पहली फेलोशिप और वो किस तरह से कंसीव की गई? तो 15 से 25 की उम्र में हम लोगों ने एक ट्रेल ब्लजर के नाम से यूथ एंपावरमेंट प्रोग्राम शुरू किया हुआ है। जहां पे ऑलरेडी मदारिस एस एन इंस्टीट्यूशन एक्सिस्ट करता है। तो कहीं ना कहीं उसमें एक लेवल ऑफ लीडरशिप कल्टीिवेशन का एक प्रोग्राम एंबेडेड है। उसमें लैकिंग क्या है? जब हम जो है पैन इंडिया मुस्लिम पपुलेशन की सोचते हैं या मतलब ह्यूमन ह्यूमैनिटी की पॉइंट ऑफ व्यू [संगीत] से हम सोचते हैं तो हमको अमन फेलोशिप नजर आता है एस द मोस्ट नेसेसरी ग्रास रूट एंपावरमेंट प्रोग्राम नाउस [संगीत] एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज [संगीत] पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के [संगीत] लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। आज की यह कॉन्वर्सेशन एक बड़े सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश है। जब इस्लामिक फ्रेमवर्क से ट्रेडिशन और मॉडर्निटी का सिंथेसिस [संगीत] होता है तो ऐसे ट्रांसफॉर्मिंग प्रोग्राम्स कैसे बनते हैं जो समाज बदलने में कैपेबल लोग तैयार करें। आज हमारे साथ दो ऐसी शख्सियतें [संगीत] हैं जिन्होंने यह काम सिर्फ सोचा नहीं किया है। एक मदरसे की दुनिया से और एक कॉर्पोरेट मैदान से [संगीत] दोनों एक ही मंजिल पर। हमारे पहले मेहमान हैं अब्दुल मुजीब खान साहब [संगीत] इंजीनियर मैकसी ट्रेंड एग्जीक्यूटिव कोच और एक ऐसे इंसान जिन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया का खालीपन देखा। टेक्निक बिना तकवा के और उसका जवाब इंस्टटशंस बनाकर दिया। आईक्यू सर्कल, भूमि, अमन फेलोशिप, ट्रेल ब्लज़र्स हर प्रोग्राम एक ही सवाल का जवाब है। इंसान बनता कैसे है? उनके नजदीक ट्रेनिंग सिर्फ इंफॉर्मेशन ट्रांसफर नहीं यह शूर की तामीर है। आज उनके साथ हैं मौलाना सादिक साहब फलाही। स्कॉलरली सर्कल्स में अबू हसन पोतक के नाम से मशहूर 28 साल से तालीम, तरबियत, साइकोलॉजी और मजहब की गहरी तफहीम। दारुल उलूम इमाम रब्बानी के फाउंडर महद अली इमाम शाह वली उ्लाह के फाउंडर उन लोगों के लिए जो मदरसे से फारग हो चुके हैं। मगर जिनका इंटेलेक्चुअल सफर अभी शुरू होना है। और एक सवाल जो उन्होंने पूछा क्या स्कूल खुदा से राब्ते का जरिया बन सकता है? दोनों ने एक ही मुश्किल देखी दो अलग दरवाजों से। एक ने पूछा मदरसे के बाद क्या? दूसरे ने पूछा मॉडर्न नॉलेज और कॉर्पोरेट लाइफ के बाद क्या? जवाब दोनों का एक ही है। इंसान की तशकील। आज का जो पॉडकास्ट है वो थोड़ा स्पेशल होने वाला है। मेरे साथ दो गेस्ट्स हैं और जब भी हम लोग इंडियन मुस्लिम हो या दुनिया में मुसलमानों की कंडीशन की बात करते हैं तो अक्सर यह पहलू हमेशा सामने आता है कि पिछले 100 200 सालों में जो दीनी तालीमात है और असली तालीमात है उसमें डिवीजन हो गया या जिसे कह सकते हैं कि जो रिलीजियस नॉलेज है या जो वर्ल्डली नॉलेज है और जब भी हम लोग इस्लाम इस्लाम को, मुसलमान को या दुनिया को एज ए कम्युनिटी इमेजिन करते हैं तो हमें हमेशा यह बताया जाता है। हम पढ़ते हैं कि दुनिया एक होलिस्टिक फ्रेमवर्क है। वहां पे जो सिस्टम्स हैं अब इवन अगर आप फिजिक्स में भी देखें मतलब इसका वो तो फिजिक्स में भी यूनिफाइड थ्योरी की बात हो रही होती है कि एक ऐसा पैराडाइम जो फिजिक्स की हर एक फिनोमिना को एक्सप्लेन कर सके। तो कोई भी जो फ्रेमवर्क सच और हक और ट्रुथ को क्लेम करेगा उसके लिए यह लाजमी हो जाएगा कि वो इस तरह की आइडियाज को लोगों के सामने पेश करें जो उनके लिए खुद के लिए भी और दूसरों के लिए भी वो हक के पैना पैमाने पे प्रोग्रेस के पैमाने पे अच्छाई के पैमा पैमाने पे वो लोगों के लिए काबिले कबूल हो [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो जिस तरह दूसरे ट्रेडिशंस चाहे वो सेकुलर ट्रेडिशंस हो, रिलीजियस ट्रेडिशंस हो, वो एक तरह से अपने फ्रेमवर्क को सामने रखते हुए यह सोचते हैं कि अगर हम जिंदा हैं और जी रहे हैं तो हमारी जिंदगी कंप्लीट, होलिस्टिक और मीनिंगफुल कैसे हो? और ये एक जो बड़ा सवाल है दुनिया जब नॉट जस्ट 1947 वहां सिर्फ हिंदुस्तान का बंटवारा नहीं हुआ। दुनिया उस 10 साल पीछे से बल्कि 2030 साल पीछे से पहली वर्ल्ड वॉर से लेकर बाद में 6070 तक पूरी दुनिया नए ज्योग्राफिकल रीजंस में डेवलप हुई और जो एक सिलसिला था नॉलेज प्रोडक्शन नॉलेज सिस्टम सिविलाइजेशंस इंटरेक्शंस का वो जिस तरह से चल रहा था उसमें डिवीजन आया और वो डिवीजन जो कल्चरल लाइफस्टाइल्स हैं जो मीनिंगफुल एक्सप्रेशनंस ऑफ इंस्टीटशंस है या नॉलेज है या जो सेल्फ है उसमें उसमें भी रिफ्लेक्ट किया और मैं भी जब जैसे-जैसे हिंदुस्तान का भी माहौल बढ़ता गया हम लोगों ने तो एक बहुत मुख्तलिफ हिंदुस्तान देखा। मैं अगर फ्रैंकली बोलूं दूसरे लोग बोलते होंगे मैं अक्सर यह बात बोलता हूं कि जो मेरी अप्रिंगिंग है सहारनपुर में और मेरी जो दोस्तियां थी वो नॉन मुस्लिम फ्रेंड्स भी बहुत ज्यादा थे और मुझे कभी बहुत ज्यादा एहसास नहीं हुआ ये हिंदू मुस्लिम ये और आज अब जाके जब हम लोग इसको रीड करते हैं ज्योग्राफिकली तो ये अंदाजा होता है कि इसकी वजह यह है कि पॉकेट्स में अलग-अलग तरीके के सिस्टम्स और फ्रेमवर्क्स एप्लीकेबल थे या चल रहे थे। अलग-अलग एक्सपेरिमेंट्स हो रहे थे माइक्रो लेवल पे और उन माइक्रो लेवल एक्सपेरिमेंट्स में अलग-अलग एरियाज, डिस्ट्रिक्ट, स्टेट्स में उनका एक्सप्रेशन भी था। तो बहुत सारे लोगों की बहुत डिफरेंट मेमोरीज हैं। मैंने पहली बार कोई रायट को होता हुआ या उसको सामने तस्वीर मैंने देखी दिल्ली में 2020 में। उससे पहले लिंचिंग्स का थोड़ा बहुत सुनते थे 2014 के बाद। लेकिन उससे पहले मेरी मेमोरी नहीं है। लोगों की है, गुजरात की है, बाकी जगहों की है। मेरी मेमोरी नहीं है। बट पिछले कई सालों से वह जो आइडेंटिटी का क्राइसिस है अक्सर हम यहां पर इस चैनल पर यह बात करते हैं कि जो मुसलमानों की आइडेंटिटी का क्राइसिस है वैसे तो वो पूरी दुनिया में है और वो सिर्फ मुसलमानों का नहीं है। इस वक्त दुनिया में कोई भी कम्युनिटी एक होलिस्टिक मुतमई पर्सपेक्टिव से जी नहीं रही है। उसमें खासा मुसलमान ज़्यादा सफ़र कर रहे हैं और वह हर जगह कर रहे हैं और इंडिया में भी उसका हमें बहुत सारा तजुर्बा होता है। तो मेरे लिए एक बड़ी पर्सनल जर्नी रही। मैं एमटी में पढ़ा एक मॉडर्न थोड़ा सा अमीर बच्चे जो घर में जिनके प्रिविलेज है ये सारी चीजें हैं। और उस उस लाइफ स्टाइल को मैंने देखा। फिर मैं जामिया में आया। जामिया में एक कम्युनिटी यूनिवर्सिटी है। उसमें मैंने देखा कि भ हम क्योंकि आईटी के जमाने से ही इस्लाम और तारीख और कॉन्स्टिट्यूशनलिटी और फलसफा ये सब देखने लगे थे। तो बड़ा एक्सपेक्टेशन था कि जामिया में पहुंचेंगे तो कोई दूसरी दुनिया होगी। यह तो वह इलाका है कि जिसमें हमें एजेंसी थी इसकी तामीर करने की, इसको शेप करने की, इसका स्ट्रक्चर डेवलप करने की। तो ऑफ कोर्स वहां पे नमाज पढ़ने का मौका मिलता था। कल्चरल एक्सप्रेशनंस थोड़े ज्यादा थे लेकिन मुतमई नहीं हुआ। कोई भी आप मीनिंगफुल डिस्कशन करना चाहे। किसी को कोई इंटरेस्ट नहीं है। और वो एक स्कूल की तरह उसकी ऑफ कोर्स आज हमें समझ आता है उसके पीछे क्या रीज़ंस है। फिर मैं जेएनयू में आया। जेएनयू में मुझे कल्चर और आइडियाज और ये तो बिल्कुल समझ नहीं आए फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ फिलॉसफी। लेकिन जो उनकी इंटरेक्शन की फ्रेमवर्क था कि हर जो बिलीविंग सिस्टम है और उसका इंडिविजुअल है वो आके एक दूसरे के सामने बहुत कॉन्फिडेंटली बात रख रहा था। ये मुझे लगा कि मेरे लिए ट्रांसफॉर्मेटिव जर्नीज़ थी। जिसकी वजह से यह जरूरी समझा गया कि इस तरह के प्लेटफॉर्म्स इमर्ज हो जहां पर नॉलेज के पर्सेक्टिव से क्या हम लोगों को मीनिंगफुल कन्वर्सेशन दे सकते हैं। बट [नाक से की जाने वाली आवाज़] इस सब में एक सवाल हमेशा बैक ऑफ द माइंड था कि आप 20 25 करोड़ की आबादी में से दो चार पांच 10 50 हजार लोग को आप मुतासिर कर रहे हैं। लेकिन जब बात आती है एट स्केल एक कम्युनिटी जो ट्रॉमा से गुजर रही हो जिसका जो सुबह से लेकर शाम तक का लिव्ड एक्सपीरियंस है वो मोरली वो कॉन्फिडेंस के लेवल पे वो विज़न और फ्यूचर को बेहतर समझना कि पॉसिबल है या नहीं उसके लेवल पर बहुत ही इनफीरियर अपने आप को महसूस करता है। उस कम्युनिटी को अगर लीडरशिप की जरूरत हो, उस कम्युनिटी को अगर मीनिंगफुल गोल्स की जरूरत हो, तो उसके प्रोग्राम्स कहां है? उसके फ्रेमवर्क्स कहां हैं? जिस तरह से यूनिवर्सिटीज से इंसान गुजरता है, ग्रेजुएट होता है तो उसको पता होता है कि उसको क्या करना है। उसका यह रोड मैप है, मैं इकोनॉमिक्स का स्टूडेंट है, मुझे यह करना है, मैं फलाने का स्टूडेंट है, मुझे ये करना है। और हमने दोनों तरफ देखा कि चाहे वो दीनी उलूम हो जो उनके इदारों में पढ़ाए जा रहे हैं। ऑफकोर्स उसका एक अचीवमेंट है। लेकिन वो जो दुनियावी सवालात हैं वो शायद और जो दुनिया में मुसलमान पढ़कर आ रहे हैं उनको यहां का और ये पिछले 100 150 साल से चला आ रहा है। तो जब मैंने आपके काम को देखा, अमन फेलोशिप को देखा और मौलाना से मेरी मुलाकात हुई और बहुत सारे डिस्कशंस हुए तो मुझे बड़ा इंटरेस्टिंग ये लगा कि आप लोग इस तरह के प्रोग्राम्स डेवलप कर चुके हैं, रन कर रहे हैं कि जिसमें एक होलिस्टिक ह्यूमन बीइंग जो ना सिर्फ अपने आपको वो सारी कम्युनिटीज से इमोशनल अटैचमेंट क्योंकि सब अल्लाह की मखलूक है। सब उसकी क्रिएशन है। वो इमोशनल अटैचमेंट रखने का पोटेंशियल रखता हो और चीजों को बेहतरी की तरफ ले जाने का पोटेंशियल रखता हो। उसकी तरबियत का एक निजाम आप लोगों ने तैयार किया। हम इस पे ब्रॉडली आज समझने की कोशिश करेंगे, डिस्कशन करेंगे। लेकिन जैसा मैंने बताया कि जैसे मेरी एक जर्नी है। आपसे बात हो रही थी तो आपकी भी एक जर्नी है वहां तक पहुंचने की। तो हम हमेशा यह प्रेफर करते हैं कि इंसान को समझने के लिए और उसके विज़ को समझने के लिए उसके रास्ते को भी देखना बहुत जरूरी है कि उसने क्या-क्या देखा, क्या समझा, कैसे वो जो नवेल्स में, फिक्शंस में और कहानियों में होता है ना कि वो जब कहानी के तौर पर रिप्रोड्यूस करी जाती है चीजें तो जल्दी और ज्यादा समझ आती हैं। तो पहले मैं आपसे शुरू करना चाहूंगा क्योंकि आप अमन फेलोशिप, ट्रेल ब्लेजर के बानी हैं। आपने इसको इमेजिन किया, कंसीव किया। मौलाना भी आपके साथ बहुत मौलाना ने के अपने भी बहुत ज्यादा इनिशिएटिव हैं अल्हम्दुलिल्लाह। बट उन्होंने ये जरूरी समझा कि वो भी इस तरह के फ्रेमवर्क में अपना ताुन करें, कंट्रीब्यूशन करें। तो आप कौन हैं? और आपका एक्सपीरियंस क्या है? और आप मेरे से एक जनरेशन ऊपर हैं। हम लोगों ने हर जनरेशन एक अलग हिंदुस्तान और एक अलग दुनिया देख रही है। आप किस दुनिया में पैदा हुए? जिस हिंदुस्तान में हम पैदा हुए के हैदराबाद जो है एक एक ट्रांजिशन मोड पे खड़ा था। वहां पे कुछ लोकल फर्सेस जो है ताकत में आने का मौका तलाश रहे। तो उन्होंने फिर जो है रवा ये जब बात है ये गालिबन 1975 [नाक से की जाने वाली आवाज़] 777 के आसपास की बात कर रहा हूं आई डोंट हैव द एक्सैक्ट नंबर इन माय माइंड वि क्लेरिटी बट उस 7577 अप्रोक्समेटली तो हैदराबाद में अचानक से राइड्स शुरू हुई वालिद साहब जो है एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी में पढ़ाते तो वालिद साहब काम पे निकले सुबह सुबह फजर के बाद जाते थे 7:00 बजे लंबा सफर करना पड़ता था बस पे जाते थे और 10:00 बजे के करीब जो है शहर में राइट्स शुरू हुए तो हमको फरी स्कूलों से जो है हालांकि हम कोई मतलब बड़ी ऊंची पढ़ाई कुछ नहीं पढ़ थे एलकेजी यूकेजी टाइप कुछ था तो फरी हमको स्कूल से ला लिया गया चाचा आए फटाफट स्कूल को खाली किया गया। जब घर लौटे घर में ये बात हुई कि कुछ राइट विंग हिंदुत्व फर्सेस है वो जो है मुसलमानों का कत्ल कर रहे हैं और पुलिस एक तरफा काम कर रही है। तो इस तरह से जो है पहली बार मुझे हैबत का एहसास हुआ। एक्सिस्टेंशियल हैबत का एहसास हुआ। वालिद साहब आएंगे नहीं आएंगे। घर में सारी खवातीन जो है वो मिर्ची का पानी बनाने लगे। तो फरी तौर पर वो छतों पर पानी के बकेटों को जो है ये किया गया बलूंस में भी शायद पानी भरा गया था ऐसा कुछ तो कुछ तैयारी हो रही थी इस तरह की एंड बहुत ज्यादा हैबत मतलब रोज मुसल्लों पे बैठ के रो रहे हैं मां तो मतलब मुसल्ले पे मुसलसिल रो रही है वालिद साहब आए नहीं है अल्टीमेटली रात को 8:00 बजे पुलिस वालिद साहब को घर पे छोड़ गई अलम्दुलिल्लाह यूनिवर्सिटी की तरफ से इंतजाम हुआ था सेफ्टी का वालिद साहब को स्कूटर नहीं भेजा उनको पुलिस स्कॉट के जरिए से भेजा [गला साफ़ करने की आवाज़] गया वापस घर पे तो वो पहला जो है मेरा इंट्रोडक्शन था बहुत मतलब आप क्या हो तीन पांच साल की उम्र आपकी है तो एक उसमें अपने मुसलमान होने की आइडेंटिटी को मैंने महसूस किया उसकी वनरेबिलिटी हां उसकी वनरेबिलिटी को मैंने महसूस किया एक और वाकया हुआ स्कूल में मतलब बात कुछ बातें ऐसी होती है वो जाके दिल में छुप जाती है वो वही बसती है फिर तो एक टीचर थी उनको जजा खैर मतलब ही नहीं तो उन्होंने मतलब चिड़चिड़ा के पूछा तुम लोग नहाते हो एवरीडे कोर्स तुम लोग एवरीड नहाते हो नहीं मुसलमान सिर्फ फ्राइडे फ्राइडे को नहीं नहाते [हंसी] तो बड़ी शर्मिंदगीगी महसूस हुई कि हम लोग रोज नहाते भी नहीं है, हाइजीनिक नहीं है। तो इस तरह से एक एक कास्टेंट मैंने अंडर करंट महसूस किया। सबके सामने बोला। हां बिल्कुल पूरी क्लास में है। आइडेंटिफाइंग यू बाय योर फेथ। ये भी एक मेथड है। मैंने देखा है कि वो जलील करने का एक तरीका है जो आराम के सामने जो भी आपके सामने लोग हैं ताकि आपको कॉन्फिडेंट लो हो जाए। अब्सोलुटली। हां यही मतलब एक कास्टेंट अंडर करंट है के मतलब तुम या तो तुम धोखेबाज हो तुम दगा देने वाले हो और तुम तुम जो है जाहिल भी हो तुम्हारी हैबिट्स जो है पर्सनल हैबिट्स जो है वो बहुत ज्यादा सोफिस्टिकेटेड सुलझी हुई तालीमी आफता ऐसा कुछ नहीं है तुम में कल्चरली आप डिप्र्राइव्ड है हां बिल्कुल यू आर डिप्र्राइव्ड तो मुझे कभी महसूस नहीं हुआ। ऑब्वियस तौर पर मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि इसका मुझ बहुत गहरा असर पड़ा है। अंटिल वेरी लेट। मतलब जब मैंने इसको एक्चुअली रिव्यू किया इन अ रिफ्लेक्टिव फ्रेम ऑफ़ माइंड की। अच्छा ये मेरे साथ हुआ क्या है? मैं कौन बन गया? इन हादसों का मुझ पर क्या असर पड़ा है? उसको मैंने बहुत बाद में रिव्यू किया। लेकिन ये सब पीछे से चल रहा है। अ बाय द टाइम आई वास इन माय 10थ स्टैंडर्ड ये समझ में आ गया था कि ये जो मेरा अ दीन है ये इनकंपैटबल है वि द रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड एंड इट्स डायरेक्शन बहुत डीपली इसमें जो है फ्रैक्चर है और ये कंपैटिबल नजर नहीं आ रहा है इन द सेंस आई विल एक्सप्लेन व्हाट आई मीन बाय कंपैट बिलिटी कि आप जो है जैसे ही आप 12th स्टैंडर्ड के आसपास में आ जाते हो या ग्रेजुएशन में आ जाते हो देन यू कन्फ्रंटेड वि दी आईडिया ऑफ द मिक्सिंग फ्री मिक्सिंग ऑफ़ बॉयज एंड गर्ल्स राइट एंड एक उसकी रैशन भी आपके सामने दी जाती है कि मतलब आप में सलीका कब आएगा आप बात नहीं करोगे तो आपको पता कैसे चलेगा कि जेंडर नॉर्म्स का अंदाजा कैसे हां तो और यहां पे जो है जितनी हम हमारी तालीम है दीन को लेकर की उस जो है सेपरेशन ऑफ सक्सेस है शादियों में जो है एतमाम एक पर्दा ये सारी चीजें इस तरह से है और दुनिया जो है कुछ और तकाजे कर रही है और उस वक्त में बायोलॉजिकली फिजियोलॉजिकली इंसान की फितरत जो है वो इंक्लाइंड होती है वो चाहता है कि जाए भाई मतलब व्हाई नॉट हैव फ्रेंड्स अमंग गर्ल्स एंड गर्लफ्रेंड हो एंड आशिकी ये सारी चीजें मतलब आप क्या देख रहे हो आप व्हाट सिनेमा इज दैट पहला नशा पहला कुमार आमिर खान के और इसके सलमान खान की मूवीस आ रही है। एंड नेचुरली यू आर इंपैक्टेड बाय दैट मतलब जो एजुकेटेड क्लास था उसका एक डेलिकेट बैलेंसिंग एक्ट था। मतलब अमिताभ एंड ऑल द पॉपुलर मूवीस ऑफ आवर टाइम्स वास वास वन लाइफ एंड देन सारे अखबार जो है कुरान की तालीम एंड दीन की दीन की जो है फहमी ये सारी ये एक अलग स्ट्रीम है। इसको बैलेंस मतलब ये दो पैरेलल स्ट्रीम्स है। लेकिन इनको बैलेंस करके घर में जो है मतलब हम जाके सिनेमा भी देख रहे हैं। हम कुरान की जो है तालीम में भी जो है बहुत सिंसियरली हम लोग इनवोल्व है तबलीग एंड इवन जमाते इस्लामी में जो है कुरान के दर्स को जो है घर में चलाना ये सारी चीजें पैरेलली चल रही है और यहां से इतना कन्फ्यूजन लेके मैं उठा था कि मुझे समझ ही नहीं आ रहा है तो मुझे लगा यार ये रहने ही दो इंटरेस्टिंग ये है कि आपके पास दो अल्टरनेटिव है आपने कौन सा रहने दो चुना क्योंकि जो दुनिया है वो टेलर्ड टुवर्ड्स है कि आप अगर इसको चुनते तो आपकी लाइफ डिफिकल्ट हो जाती। जिस तरह से आपकी लाइफ बताया जा रहा है कि होनी चाहिए। तो द डिसीजन मेकिंग इज ऑलरेडी बायस्ड फॉर एवरीबॉडी के दे कैन नॉट मोस्टली चूज़ एनीथिंग एल्स। देखिए ये भी कर रहा हूं कि मैं दीन को बाद में रखने की कोशिश कर रहा हूं। लेकिन मैं स्कूटर जो चलाता था बहुत बहुत बेतुगी तरीके से चलाया करता था और बहुत ही ज्यादा एडवेंचरस जो है मेरा मिजाज है रिबेलियस एडवेंचरस तो रश चला और बिना आयतल कोई कुर्सी पड़े आई वुड नेवर स्टार्ट द बाइक तो कुछ चीजें ऐसी जो है मतलब एंबेडेड है वो वो वहां से हिलेंग नहीं लेकिन एट द सेम टाइम बाकी की जनरल अंडरस्टैंडिंग तुम मतलब सबमिशन में आ जाओ। वालदा कहती थी तू खुद तो कुरान नहीं सीख रहा। मैं कहता था मां जितना जान लिया है उसी से परेशान है। आप मुझे और क्यों बर्बाद करना चाहते हो? मैं अपनी जिंदगी जीना चाहता हूं। मुझे जी लेने दो अपनी जिंदगी। दिस वास माय कास्टेंट आर्गुममेंट विथ माय मदर। एनीवे तो इंजीनियरिंग की इंजीनियरिंग में बहुत अच्छा है। मेरे साथ ये हुआ। आईसेक एक इंटरनेशनल स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन। उसका मैं हैदराबाद चैप्टर का प्रेसिडेंट बना। और वहां से जो है मेरी एक तरीके से एक तो लीडरशिप क्या होती है? लीडरशिप डेवलपमेंट की अहमियत क्या है? और दूसरों में लीडरशिप को डेवलप करना, खुद की लीडरशिप को एक्सपीरियंस करना। ये एक ट्रैक मेरा जो है वहां पे आईसेक में शुरू हुआ। एंड सडनली इट गव मी अ टेस्ट ऑफ फेम पॉपुलैरिटी जो बिकॉज़ ऑफ़ वैरायटी ऑफ़ रीज़ंस जो है मुझे मिल नहीं रही थी। आईसेक में जब मुझे ये ये फेम मिली एक्सेप्टेंस मिला या पॉपुलैरिटी मिली। मुझे लगा कि दिस इज होम। ये मेरे लिए बना है। दिस इज द एनवायरमेंट इन व्हिच आई विल ड्राइव। तो वहां से एक मेरी पर्सनालिटी जो है एक तरीके से जो है उभर के आने लगी। वहां से मैं माइका गया। ग्रेजुएशन के बाद में आई चोस ह्यूमैनिटीज है। कम्युनिकेशन स्टडीज को मैंने चुना। वहां गया तो वहां पे हॉस्टल है कैंपस है इंटेलेक्चुअल इलट के बीच में आपकी जो है प्रेजेंस है टोटली डिवोर्स फ्रॉम रिलजन एंड एवरीथिंग इस ऑल अबाउट व्हाट डस इट मीन टू बी सक्सेसफुल व्हाट डस इट मीन टू बी फेमस एंड हाउ इमैक्टफुल वुड यू बी व्हाट काइंड ऑफ़ लेगसी विल यू लीड बिहाइंड ये जो है कन्वर्सेशन जो है चलने लगी तो जितनी किताबें पढ़ी है वहां पे मुझे जो है कुछ दोस्त ऐसे बने मेरे जो अभी भी मेरे बहुत अच्छे दोस्तों में शामिल काफका नीमू ये सारी साथ ये सारी जो है किताबें जो है सामने आने लगी और इसका फिलोसफी से तो ये पूरा मुझ पे असर पड़ने लगा और मैं अपनी तब जाके मैं वहां पे अब ये एकिस्ट पोटेंशियल कंडीशन क्या होती है एंड एक्सिस्टेंशियल एंजाइटटी क्या होती है इस पर जो है फिक्र और बहस मुबार से यहां पर शुरू हुए और साथ में जो है ये भी हुआ कि भाई थिएटर करना चाहिए और ये बातें दुनिया के सामने रखनी चाहिए ये नजरिए दुनिया के सामने रखना चाहिए और वहां से सिनेमा सिनेमा बनाते हैं बॉम्बे आया एडवरटाइजिंग एजेंसी अपनी खोली अचानक से जो है जल्दी से क्लाइंट्स मिल गए तब लगा कि फिर जो हम करना चाहते दिस वास 9798 अच्छा हां तो वहां से फिर जो है सुधीर मिश्रा के यहां सुधीर मिश्रा के यहां चला गया और बहुत ज्यादा सुपर कॉन्फिडेंट हुआ करता था वो हूं भी आई टोल्ड हिम गिव मी फाइव मिनट्स इफ यू डोंट लाइक मी यू कैन चेक मी आउट मुझे क्राफ्ट ऑफ सिनेमा सीखना है आई वास वेरी वेरी स्पेसिफिक इन पर्टिकुलर क्राफ्ट ऑफ सिनेमा सीखना है मुझे और आप मुझे आपके आसपास में चाय बनाने भी दोगे तो मैं सीख लूंगा। अगर आपके पास उतना भी काम है तो प्लीज गिव मीचुनिटी तो उसका रुक जा तू मेरा क्या नुकसान है चाय चाय बना अच्छी बनाना [हंसी] तो इस तरह से जो है वहां पे रुका और मैंने फिर क्राफ्टर सिनेमा सीखा मतलब दिन रात सिनेमा देखना करना क्राफ्टर सिनेमा सीखना फिल्म बनाने का बहुत फ्यू आ गया एक स्क्रिप्ट भी जो है तैयार हो गई और सुधीर ने ही जो है एक प्रोड्यूस का भी इंतजाम किया जो उनका खास प्रोड्यूसर हुआ करते थे टू शर्मा जी तो उनके जरिए से जो है प्रोड्यूस करवा दूंगा इस तरह से बात भी हो गई और ये पूरा फेस मेरा मैं अपने आप को घर से बचा के रख रहा था वालदैन से वालिद साहब जो है थोड़ा सा पॉजिटिव थे लेकिन वालिदा जो है वो बैकग्राउंड में वालिद साहब से कह रही थी कि इसको वापस घर ले आओ लेकिन वालिद साहब बोल रहे थे कि नहीं वो कुछ कर रहा है वो मतलब वो फोकस है वो मतलब सोच समझ के जो है अपने आप को बनाने की कोशिश कर रहा है तो उसको डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए इस तरह से मतलब वेदर राइट और रोंग वो वो कॉन्शियस एफर्ट में लगा हुआ है तो उसके कॉन्शियस एफर्ट को किसी मंजिल पे पहुंचने देना चाहिए तो जैसे ही ये पता चला कि अब ये फिल्म मेरी बनने जा रही है वालदा को एक वायलेंट हेल्थ रिएक्शन हो गया ऑटो इम्यून हर बॉडी स्वेल्ड अप एंड शी इट स्टार्ट स्टार्टेड रिलीजिंग ट्रांसलूसेंट लिक्विड मतलब आंसुओं की तरह से पानी जो है पूरे पूरे जिस्म से जो है जा रहा था बहुत पूरा हाथ पैर फेस सब स्वेल हो गए थे आंख सर में स्वेलिंग आ गई थी सर से इस तरह कच्चा हो रहा था सर और एक ही उनका रेफ्रेम था कि तुम तुम सिनेमा में नहीं जाओगे तुम बर्बाद हो जाओगे दीन से तुम हमेशा के लिए दूर हो जाओगे तुम सिनेमा में नहीं जाओगे ये उनका कास्टेंट रेफरेंस तो इस बात को देख के वालिद साहब का भी ये हुआ कि जब तुम्हारी वालदा की ये हालत है तो तुम मतलब कैसे जा सकते हो यू नो तुम कुछ तो इंसानियत होनी चाहिए जो भी तुम कर रहे थे ये इससे बड़ा नहीं हो सकता तो अगर अब तुम जाओगे तो फिर तुम जाओ और ये जो वालिद साहब ने स्टैंड लिया कि इदर यू आर इन और यू आर आउट देयर इज नो इन बिटवीन वो मेरे लिए जो है बैक ब्रेकिंग था। तो अब मुझे समझ में आ गया कि मैं जा नहीं सकता। वरना ये था कि ठीक है वालदा की तयत कभी ना कभी तो ठीक हो ही जाएगी एक महीने में 15 दिन में 20 दिन में और मैं जाके अपनी सिनेमा को फिर से रिस्ट करूंगा। अच्छा मैंने कभी काम बगैर मोहब्बत किए मैंने काम नहीं किया लाइफ में। मतलब आज तक भी नहीं किया। अगर अगर वो मुझे उस काम से मोहब्बत नहीं है तो फिर वो मैं काम हाथ भी नहीं लगाऊंगा। और अगर मैं काम हाथ लगाऊंगा तो फिर बेइ मोहब्बत के साथ तो सिनेमा से मोहब्बत हो गई थी बहुत ज्यादा दिन और रात मैं रोता रहा नौ महीने तक और अल्लाह से इतना झगड़ा किया मैंने कि अल्लाह हाउ कुड यू यू नो डिफीट मी ये मेरा अल्लाह से बार-बार ये था तफाका था कि आपने मुझे हरा दिया मतलब वो दुनिया में जो है इतने अच्छे-अच्छे सिनेमा का स्कोप है और इतनी अच्छी आर्गुममेंट्स को बनाने की नेसेसिटी है। मतलब सिनेमा इतना पावरफुल है तो उसको मैं यूज़ करके वो करने जा रहा था। इतना बड़ा काम हो जाता। आपने मुझे उस काम से महरूम कर दिया। ऐसे हालात बना। तो मैं अल्लाह से झगड़ा कर रहा था। यू नीड टू गिव मी एन एक्सप्लेनेशन व्हाई यू हैव प्रिवेंटेड मी फ्रॉम सक्सीडिंग इन द फील्ड दैट आई हैड बीन टू लाफ। तो नौ महीने निकल गए। कुछ मेरे दोस्त आए बॉम्बे से। ऐसे ही हैदराबाद विजिट करते हुए तो बात छिड़ गई फिर से कि क्या है मुजीब तू क्यों नहीं आ जाता मतलब सब जैसे का वैसा है नौ महीने हुए है यू कैन जस्ट पिक अप फ्रॉम वेयर यू लेफ्ट ऑफ मैं कह रहा था कि नहीं यार मतलब अगर मेरे पास वो वो आर्गुममेंट नहीं बन पाया है कि मैं अपने दोनों वालिदैन को जिनसे मुझे जिंदगी मिली है उन दोनों को मैं ये कहूं कि यू नो आई आई एम गोइंग टू वॉक ओवर यू वो आर्गुममेंट मुझे अभी तक नजर नहीं आया। मैं वो आर्गुममेंट देख रहा हूं। एंड आई वास एक्चुअली ट्राइंग टू फिगर दैट आउट की बगावत अगर मैं करूं तो मुझे वैसी चाहिए। हां वैसी दलील चाहिए मुझे। और बहस हमारी चलतेचलते तारे जमीन पर आ गई। उनहीं दिनों में तारे जमीन पर रिलीज हुई थी। तूने तूने देखी तूने देखी। हां हां देखी देखी। अ तो इमीडिएटली तब उस बहस में मुझे अचानक से जो है क्या हुआ पता नहीं। मैंने कहा कि यार एक बात बता 20 करोड़ की बनी तारे जमीन पे मतलब एटलीस्ट दैट वास द नंबर दैट वास बीइंग थ्रोन अराउंड तो मैंने उनसे पूछा कि बात बता तुझे अगर 20 करोड़ मिल जाते और यू रियली केयर्ड अबाउट द इशू ऑफ चिल्ड्रन बीइंग ट्रोटाइज्ड बाय इग्नोरिंग देर डिफरेंसेस एंड इग्नोरिंग देर कंडीशन एंड सो ऑन एंड सो फोर तो क्या करेगा आमिर को ले सिनेमा बनाएगा कि तू ऐसा स्कूल ही कायम करेगा या इको सिस्टम कायम कर लेगा जिसमें ऐसे कुछ बच्चों पर मतलब ठोस मेहनत हो सके और ठोस नतीजा निकल सके। तो जैसे ही मैंने उनसे कहा उन्होंने तो ये कह दिया कि नहीं हम तो सिनेमा बनाएंगे इट्स एक्सट्रीमली इमैक्टफुल पावरफुल बट इट हिट मी इन माय हार्ट कि सिनेमा के बनने के बाद में कन्वर्सेशन बहुत होती लेकिन सारी कन्वर्सेशन भुला दी जाती है। दुनिया वही की वही खड़ी रह जाती है। दूसरी फिल्म आ जाती है। हां दूसरी फिल्म आ कन्वर्सेशन को आगे बढ़ाने के लिए। लेकिन जो काम बनता है जमीन पर वो एक्चुअली जमीनी मेहनत से बनता है। यानी कि अगर मतलब मैं इतना ही अपने एंगस्ट को जो है अच्छी दुनिया बनाने की जो फिक्र थी मेरी उसको मैं एक्चुअली फुलफिल करना चाहता हूं। तो सिनेमा कैन बी एन इफेक्टिव एली बट सिनेमा कैन नॉट बी द मेन टू नॉट द एंड इन इटसेल्फ या मे बी अ लिटल मीन्स हां पीपल रियलाइज दिस हिट मी आई न्यू अल्लाह हैस डिफिटेड मी मतलब आई आई नाउ आई हैव नो आर्गुममेंट टू मेक अगेंस्ट अल्लाह व्हाई अल्लाह हैस रिमूव्ड मी फ्रॉम देयर बिकॉज़ मेरी सुधीर से और जितने मेरे आसपास रहते थे सबसे यह बहस हुआ करती थी कि सिनेमा इस फॉर सोशल गुड। तो आप सोशल गुड क्यों नहीं कर रहे हैं? और वो मतलब उसमें ये तड़का जो डालते हैं आप मतलब आइटम नंबर है ये है वो है ये सारी चीजें आउट व्हाई डू यू गो आउट ऑफ इंटेग्रिटी ऑफ द स्टोरी? तो ये बहस हुआ करती थी हम लोग। बहुत ज्यादा बहस होती थी। तो सुधीर कहता भी था या तो तू पागल हो जाएगा या तो सिनेमा छोड़ देगा। तो हुआ भी ऐसा ही सिनेमा छोड़ दिया। पागल होने से उनके लिए आप पागल हो गए। आपके लिए आपने सिनेमा छोड़ दिया एक्सक्टली तो उसने ना भूल [हंसी] तो ये वहां पे फिर मुझे लगा कि नाउ आई हैव टू ट्रूली फाइंड मैं अपने ये जो मेरे ख्याल है इस सबको जो है मैं किस तरह से डायरेक्शन दूं और उसी दौर में जो है ये गुजरात राइट्स होने लगे और मुझे लगा कि मतलब इनफ इज इनफ नाउ लेट अस टेक दिस सीरियसली एंड मेक ए पॉइंट कि मतलब आप जो है अगर सोचने समझने वाले शख्स को जो है अगर वजह देते हैं कि वो अपनी जिंदगी से बेजार हो जाए बदजन हो जाए तो फिर वो सब कुछ फना कर सकता है। आप ऐसे हालात बना के अपने लिए तहफुज का इंतजाम नहीं कर रहे हैं बल्कि सबकी बर्बादी का जो है आप इंतजाम कर रहे हैं। ऐसा कुछ आर्गुममेंट बनाना चाहिए। मैं इस तरह से सोचने लगा। बट वहां पे फिर मैंने जब थोड़ी सी तहकीक करने लगा, रिसर्च करने लगा कि आर्गुममेंट को जो है इफेक्टिवली कैसे बनाए तो जितने भी मैंने जो है रेवोलशंस को स्टडी करने की कोशिश की। उसके नतीजे हमेशा से मैंने ये देखे कि सिर्फ लोग बदले पीपल वर रिप्लेस्ड यानी कि आप समझिए बोलिक रेवोल्यूशन को ले लीजिए या फ्रेंच रेवोल्यूशन को ले लीजिए बोरवा गई तो तो जो है कोई ब्यूरोक्रेसी आई मिडिल क्लास लो मिडिल क्लास ब्यूरोक्रेसी आई बट फिर इनको भी वही चाहिए था जो बुरजवा जो है चाहता था तो इस तरह से मैंने ये देखा कि लोग बदलते में हालात बिल्कुल नहीं बदलते। इफ इंसान जो है जबरन कोई तब्दीली की मेहनत करता है तो द ओनली मीनिंगफुल चेंज कैन बी कि ग्रास रूट्स से हम तामीर करें। कुछ नया बनाए। क्या बनाए कैसे बनता है इसका कोई आईडिया नहीं। इतने में वर्ल्ड बैंक के असाइनमेंट्स कुछ मिले मुझे। आंध्र प्रदेश के इंटीरियर रूरल एरिया में जाने का मौका मिला। तो वहां पर जाकर मैंने यह देखा कि पैसा तो वहां पर जा रहा है और उन तक पहुंच भी रहा है और उसके नतीजे में उनके पास जो है डिश एंटीना आ रहा है, टेलीविजन आ रहा है, वाइट बुड्स आ रहे हैं। ये सब हो रहा है। अल्कोहलिज्म बढ़ रहा है। लेकिन साथ में जिस तरह की ट्रेनिंग वर्ल्ड बैंक दे रहा था खवातीन को खासतौर पे जो सेल्फ हेल्प ग्रुप में जोड़ी जा रही थी के दिस मनी बिलोंग्स टू यू। दिस एंड यू आर द ओनर एंड द मास्टर ऑफ दिस मनी। योर हस्बैंड हैस नथिंग टू डू इट। ये बाफ्ता एक्टिव जो है वो एव्री मीटिंग में जुड़ते ही आपको ये पढ़ना पड़ता था। यू आर द ओनर यू आर द ओनर यू आर द ओनर। इस तरह हां बा इट इज अ पार्ट ऑफ योर मेमोराइजेशन। तो अब घरों में इसको ले झगड़े शुरू हो रहे थे। तलाकें बढ़ रही थी। इनफिडिटी बढ़ रही थी। ये सारा कुछ मेरे सामने आ रहा है। तो बड़ा परेशान हुआ मैं ये सब देख के। इसको डॉक्यूमेंट किया और ले जाके मैंने रिपोर्ट सबमिट की। तो उन्होंने ये देखा कि अच्छा पैसा पहुंच रहा है। बहुत अच्छी बात है। वाइट गुड्स आ रहे हैं। बहुत अच्छी बात है। तो फिर ये क्या है? ये सब तो आपको हमने कहा नहीं था कि आप कुछ हमको दें। ये सब आप हमको क्यों दे रहे हैं? मैंने कहा कि मैंने ये नोटिस किया है। ये जो हम कर रहे हैं उसके नतीजे में ये भी हो रहा है। जब तक आप जो है कुछ कुछ डेवलपमेंट ह्यूमन डेवलपमेंट के ऊपर अगर आप काम नहीं करेंगे उनमें जो है सलीखे पर आप काम नहीं करेंगे तो फिर यहां पे तो इन लॉन्ग रन आप ही का पैसा जो है फिर बर्बाद बर्बाद हो जाएगा राइट दे सिंपली डिसमिस दे सेड यार ये मतलब फर्स्ट वर्ल्ड के जो है थॉट्स को तुम थर्ड वर्ल्ड में क्या बात कर रहे हो यहां पे नहीं होगा इसको बाजू रखो और हमने आपसे मांगा नहीं था तो वी डोंट नीड इट। ये सब डिलीट करो अपने रिपोर्ट से और हमको जितनी हम लोगों ने आपको मैंडेट दी थी इंडिकेटर्स वोेंट समझते हैं। उनहीं इंडिकेटर्स पे क्वालिटी ऑफ़ लाइफ को मेजर कीजिए। अगर आपको कुछ ऑब्जरवेशन दिख रहा है तो वो आपकी प्रॉब्लम है। वो हमारी प्रॉब्लम है। सो दैट वास दैट वास दैट वास अगेन हार्ट ब्रेकिंग फॉर। अच्छा दूसरी इसमें दो तीन चीजें हैं। एक तो ये है कि अ लॉट ऑफ व्हाट दैट यू सेड इज आल्सो एक्चुअली पार्ट ऑफ माय स्टोरी इन द सेंस के रेजोनेट करने का क्या होता है कि ये जो प्रोडक्ट है जो ये जो मुसलमान है वो क्योंकि उसके पास उसके तालीमी इदारे नहीं है जिसमें वो होलि वो होलिज्म जो हमें एज ए कल्चरल आइडेंटिटी एज अ रिलीजियस आइडेंटिटी पढ़ाया जाता है उसका एक्सप्रेशन जो हमारी वर्ल्डली अफेयर्स में वो नहीं हो पाता है तो हम लोग जिन इदारों में जाते हैं वहां पे कंटेस्टेड रियलिटी होती है जो आपने भी देखी वो हम सब महसूस करते हैं और उसकी वजह से एक फ्रेगमेंटेड सेल्फ का एक तसवुर पैदा होता है। इंसान अपनी नफ्स, अपने वजूद और उसको लेके भी कास्टेंटली थेराइज कर रहा है ना मैं कौन हूं। लेकिन ये तब होता है ना जब आदमी सोच रहा है। अगर आप सोच नहीं रहे तो आप तो सच में नहीं इसमें जैसे मैं फॉर एग्जांपल मैं अपनी बात करूं या मेरे अपने कजिंस की बात करें उसकी बात करूं के सोचने की भी जो अह जो बाउंड्रीज हैं या जो स्कोप है या जो मेथोडोलॉजी है एक्टिवली सिखाया जा रहा है स्कूल्स में कि आप सोचिए लेकिन आप एक तरीके का सोचिए और वो उस तरीके से सोचने से जो आपकी जैसे आपने बोला कि भाई ये फलानी जगह पे ये हुआ लेकिन शराब के इंसिडेंसेस भी बढ़ रहे हैं। तलाक के इंसिडेंसेस भी बढ़ रहे हैं और उससे इन लोगों का लड़ाई हो रही है। झगड़ा हो रहा है वो हो रहा है। अगर एक तरीके से देखें तो उस औरत की भी जो क्वालिटी ऑफ़ लाइफ है क्या वह इंप्रूव हुई तो या उस मर्द की तो एक तरफ दो दो लेवल ऑफ प्रॉब्लम्स आई हैं। एक जो कई बार मैं भी देखता हूं हमारे मुआशरे में सोसाइटी में कि जो वेस्ट बोलता है कि एक पेट्रियरकी है कि औरत को दबा के रखा जाता है। है वो नहीं है वो जो बता रहे हैं। लेकिन अगर हम इस्लामिक पर्सपेक्टिव से उसी चीज को समझने की कोशिश करें कि जो हक हैं औरत के क्या वो दिए जा रहे हैं? तो एक तरफ यह है कि आपको हम हक नहीं देंगे। उनके हक का जो फ्रेमवर्क बाहर से आ रहा है वो अगर आप लेंगे क्योंकि आप उनको हक बता नहीं रहे हैं तो वो भी नहीं लेने देंगे। तो उसकी वजह से डबल अब्सोलटली नुकसान हो रहा है। कचमर बन रहा है। मतलब सोसाइटी कंप्लीटली डिस्ट्रॉय हो रही है। हालत में तो आदमी सोचने समझने के काबिल नहीं हो सकता सिवाय रिएक्शन देने के। एक्सक्टली। और उसमें एक फॉर एग्जांपल के इवन हमारे सर्कल्स में जो एक्सटेंडेड सर्कल्स हैं उसमें हम ये देख रहे हैं कि जो रिलीजियस माइंड के लड़के लड़कियां हैं उनके भी डिवोर्सेज खूब बढ़ रहे हैं और उसमें उसकी दूसरी वजह है। उसकी वजह यह कि जो ऐसा टॉपिक है कि ये टॉपिक है मुस्तकिल टॉपिक की भाई क्या हो रहा है बावजूद इसके कि मैं मुसलमान हूं। मैं अल्लाह को मान भी रहा हूं। मैं अखलाकियात की बात भी कर रहा हूं। मैं सब कुछ कर रहा हूं। उसके बावजूद भी मैं वैसे जी नहीं पा रहा। तो मैं ऐसा क्यों नहीं जी पा रहा? तो मैं कहां बन रहा हूं? मैं जो बोल रहा हूं वो बनाओगे। और जो बना वो मुझे दिखाई दे रहा है क्योंकि ये टॉपिक ये पूरा एजुकेशन का वो टॉपिक है जिसकी सबसे ज्यादा जिस पर बोलने की इस वक्त मुस्लिम कम्युनिटी को कि आखिर वो बन कहां है आप देख कहां रहे बना रहे हैं कहीं और उसको देखना चाह रहे कहीं और तो ना वो उधर दिखता है ना इधर दिखता है बीच में जैसे कहते है ना कि कंफ्यूज है कहता हूं कि हमारी जनरेशन जो है वो कंफ्यूज जनरेशन है और जो लोग कंफ्यूज होंगे वो कोई तकलीकी काम नहीं कर सकते। इन ऑल ऑफ़ व्हाट यू सेड या जो मौलाना ने भी जिस पे एक्सपेंशन किया एट द एंड ऑफ़ द डे दिस इज द क्राइसिस ऑफ़ आइडेंटिटी। मैं कौन हूं? मैं क्यों हूं? मेरा पर्पस क्या है? अगर मैं सही हूं तो मैं अपनी जो एग्जिस्टेंशियल एक्सपीरियंसेस हैं। इनको कंट्राडिक्शंस इनके खत्म क्यों नहीं कर पा रहा हूं? अगर मैं इस एजुकेशन पैराडाइम की तरफ जा रहा हूं तो उससे भी जो मुश्किलात या जो उससे भी प्रॉब्लम्स प्रोड्यूस हो रही है वो ये भी तो सॉल्व नहीं कर पा रहा है और ये कह रहा है कि तुम्हारे पास स्यूशन नहीं है। दोनों तरफ यही बात तो दोनों तरफ ये बात हो रही है कि भ और इसकी वजह से मेरे अंदर वो हिस्सा है मेरे दीन का जो मैं छोड़ नहीं सकता। क्यों? इस वजह से नहीं कि मैं छोड़ना नहीं चाहता। फॉर एग्जांपल क्योंकि आपके पास देने के लिए कुछ नहीं है। अब्सोलटली और मेरा [गला साफ़ करने की आवाज़] जो फ्रेमवर्क है उसमें इतनी मेहनत नहीं हो रही है कि वो जो देने वाला उधर से दे रहा है वो मैं भी दे सकूं। तो मैं तो फंस गया। मैं जो है मेरा एक बहुत मतलब जिस जिगरी दोस्त जिसको बना देता है जगदीश करके बॉम्बे में रहता है अ हम दोनों बहुत बहस करते थे वो वो अगेंस्ट मैंने उसको एक दिन कहा कि तूने मतलब जो डिनायल का रुख इख्तियार किया हुआ है मुझे लगता है एक्चुअली तू जानता है इसलिए डिनाई करता हूं और मैं एग्नोस्टिक हूं मैं जानता नहीं हूं इसीलिए ना ठोस तरीके से इंकार कर सकता हूं ना पक्के तरीके से इकरार कर सकता तो मैं बीच में हूं तू मुझसे ज्यादा जानता है फिर भी तू इंकार कर रहा है तो मैंने उससे कहा था तो वो स्टंट हो गया था और उसने बाद में इकरार भी किया था कि तू सही कह रहा है। मैं तेरी बात से बिल करता हूं। एनीवे तो रिटर्निंग टू द स्टोरी ऑफ़ वर्ल्ड बैंक। उसका मुझे बहुत बड़ा बड़ी तकलीफ हुई और उन दिनों में हम लोग क्या कर रहे थे? ऑनलाइन जो है याहू ग्रुप्स का बहुत जबरदस्त एक ऑर्गेनिक मूवमेंट चल रहा था और ये युवा मूवी आई थी मनीरत्न की। हम [गला साफ़ करने की आवाज़] बहुत ज्यादा सबके जोश वगैरह जो है जैसा तो याहू ग्रुप्स में बहुत ज्यादा हिंदुस्तान की तामीर की बहुत ज्यादा बात चल रही थी और वो वैसे बहुत सारे ग्रुप्स में मैं बहुत एक्टिवली लिखा करता था अपने नजरियाद रखा करता था तो एक ग्रुप बनने लगा भारत उदय मिशन के नाम से तो उसकी फिर नेशनल कन्वेंशन ऐसा डिसाइड हुआ कि चलिए सब लोग मिलते हैं जयपुर में और कुछ हिंदुस्तान में पैन इंडिया कुछ करेंगे। इलेक्ट्रल मूवमेंट एक ले आते हैं। ऑनेस्ट गवर्नेंस अगर होगी तो हिंदुस्तान के मसले ऐसे नहीं है कि वो वो हल ना हो सके। ये 2006 की बात है। हां 2006 की बात है। तो उसमें भी फिर इलाफ हो गए हम लोगों के कि जो है कैसे काम होना चाहिए कैसे नहीं काम होना चाहिए। तो हैदराबाद में कुछ हम लोगों की जो कोर बॉडी बन गई थी वालंटियर्स की मैं एक राकेश करके राकेश दुगू ही इस अ ब्रिलियंट आरटीआई एक्टिविस्ट एंड फैक्टली करके वो चलाता है प्लेटफार्म वो था राहुल अभी यूके चला गया है तेजस्वी थी वो भी यूके में है दिव्या थी वो आईएम गई फिर वहां से यूएस चली गई या सिंगापुर में पता नहीं कहा लेकिन इस तरह से एक बहुत जबरदस्त सोचने ने वाले और मेहनत करने वाले कई लोग अली मतलब बहुत सारे नाम मैं गिन सकता हूं परेश ये लोग हम लोग जमा हो गए थे इस फिक्र में कि नया हिंदुस्तान बनाते और हिंदुस्तान सिर्फ जो है अकली आर्गुममेंट्स से नहीं बनाया जा सकता उसको जमीन पे कोई मॉडल्स हमको क्रिएट करने होंगे कि ऐसा जो है जो है ट्रांसफॉर्मेशन लाया जा सकता है तो ट्रांसफॉर्मेशन लाने के लिए फिर हम लोगों ने उस वक्त में जो है शांता सिन्हा शी वास वर्किंग ऑन चिल्ड्रन इन लेबर द एजेंट ऑफ चिल्ड्रन इन लेबर तो उनको वहां से चाइल्ड लेबर को जो है लिबरेट कराना उनको वापस एजुकेशन में लाना मैक्स से अवार्ड मिला था उनको तभी तभी तो हम लोग उनके पास गए के हम लोग कुछ करना चाहते हैं अपने अपने वक्त में अपने वसाइल के साथ तो शी सेड कि बहुत बड़ी स्लम है रसूलपुरा क्यों नहीं तुम वहां जाके थोड़ा सा घूम फिर लो देख लो हैदराबाद में है हां बेगमपेट में जो है तो वहां हम गए हल्की सी पहाड़ी पे जो है हां मतलब बेगमपेट एयरपोर्ट से बिल्कुल सटी हुई है मैं जब हैदराबाद गया तो जाते हुए मुझे नजर आया था हां वहां पे हम लोग जो है घूम फिर के देख रहे थे और हालात वाकई में बहुत ज्यादा तकलीफ दे हालात इंसान को हमने बड़ी तकलीफों में जीते हुए जिंदगी गुजारते हुए देखा और बच्चों का भी जो है कोई पुरसाने हाल नहीं कोई ठिकाना नहीं ड्रग एडिक्शन में हम लोगों ने उनको पिश सूंघते हुए देखा हम लोगों ने पेट्रोल सूंघते हुए देखा उन लोगों को हम लोगों ने जुआ खेलते हुए देखा ऐसे ही पड़े हुए हैं बेसुद ये सारी चीजें हम लोगों ने रिकॉर्ड करना शुरू किया एस इन नोट्स बनाने शुरू किए और हम लोग जमा हुआ करते थे टमेंट पर नेकलेस तभी तभी बने थे वहां पर शाम को हम लोग जमा होते थे और जमा होके वी यूज टू डिस्कस की ये चल रहा है वहां पे क्या करें तो फाइनली जो है ये एक कंसेंसिस बन के आया के ये बस्ती को हम लोग जो है एस एन अडॉप कर लेते हैं एस अ रिस्पांसिबिलिटी इस बस्ती को हम लोग जो है ट्रांसफॉर्म करेंगे। कैसे करेंगे व्ला? वी हैड नो प्लान, नो आईडिया, नथिंग, नो नॉलेज। लेकिन ये है कि जिम्मेदारी ले लो। लीडरशिप का पहला प्रिंसिपल है जिम्मेदारी लो। तो वो आता था उतना उतना सीखा हुआ था। जिम्मेदारी लो, जिम्मेदारी ले ली। [नाक से की जाने वाली आवाज़] या अल्लाह। तो वहां पे हम लोग जो है गए इनके इन्फ्लुएंस में गए चाइल्ड लेबर के इनफ्लुएंस में गए थे। तो हम लोगों ने पहले ये तय किया कि बच्चों पर मेहनत करेंगे और उनको स्कूलों में एनरोलमेंट कराएंगे। वहां पे हमको गाइडेंस भी मिलेगी ना। हम जानते भी नहीं है कि क्या करना है। तो गाइडेंस मिलती रहेगी मतलब हमारा रास्ता बन जाएगा। तो जब हम इसके लिए क्या करें? सुबह 6:00 बजे से बच्चे निकलते हैं लेबर के। तो वहां 6:00 बजे पहुंच जाना बस्ती में और जाके घरों से बच्चे निकल रहे हैं तो उनको पकड़ के वापस घर ले आना और उनके वालिदैन को लेक्चर पिलाना तो उनके वालिदैन हमको बर्दाश्त कर रहे हैं सुन रहे हैं कि मतलब बच्चों को उठा के ना ले जाए पुलिस केस ना हो जाए तो मतलब चाइल्ड लेबर का मसला है तो वो लोग बर्दाश्त भी कर रहे हैं हम लोगों को और फिर कह रहे हैं कि नहीं नहीं हम बिल्कुल करेंगे करेंगे अभी तो उसको जाने दो [हंसी] तो ऐसा हुआ ऐसा दिन भर निकाल रहे हैं। दो चार दिन हो गए। एक शख्स वहां पर जो है बिल्कुल खटिया पे बैठा हुआ है। वो हमको रोज देख रहा है कि हम आ रहे हैं जा रहे हैं। एक दिन उसने हमको धर लिया। पकड़ के बिठा लिया। अब उसने हमसे पहला सवाल ये किया कि तुमको इलेक्शन कब लड़ना है? [हंसी] तो मैंने मैंने कहा नहीं हमको इलेक्शन नहीं लड़ना है। फिर तुम कर क्या रहे थे? इलेक्शन नहीं लड़ना है। तुम कर क्या रहे हो? समाज को अच्छा बनाना है। समाज को अच्छा बनाना। यू रियली मीन व्हाट यू से? उसने कहा कि एक काम करना पहले तुम बच्चों के घरों को जाना छोड़ दो। और जिला परिषद स्कूल देखा है कहां? कहा नहीं अभी तक तो नहीं है जिला परिषद स्कूल। पहले जाओ और जिला परिषद स्कूल देखो। वहां क्या हालात? वहां के क्या हालत? ये अब्सोल्व करने के लिए इन बच्चों के वहां पोटेंशियल है भी या नहीं वो आदमी कौन था बस्ती का एक खैरखा था सीनियर सिटीजन था और मतलब कुछ सुलझा हुआ था तो उसने जो है सही जगह आप वहां जाके देखिए आप तो हमें भेजना चाह रहे हैं वहां पे अब्सॉर्ब करने की कैपेसिटी है भी या नहीं तो जिला परिषद स्कूल हम पहुंचे अल्लाहू अकबर क्या क्या कैफियत थी उसमें मेरे पास उसके फोटो है क्लासरूम्स गिर गई है। दीवारें गिर गई है और वो कूड़ादान बन गई। उसी कूड़ादान में हजार बच्चों की कैपेसिटी का ये स्कूल है। दो मीडियम्स में ये चल रहा है। उर्दू मीडियम भी चलता है। उर्दू मीडियम सुबह से दोपहर चलता है। तेलुगु मीडियम दोपहर से शाम तक चलता है। तो हजार बच्चे यहां पर आगे पढ़ रहे हैं। नीम का झाड़ है। नीम के दरख्त के नीचे भी जो है क्लासेस हो रही है। और जो दो तीन क्लासेस है उस भी क्लासेस हो रही है। यहां पे स्वयं शिक्षा अभियान की जो कुछ जूनियर टीचर्स वाली कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स हुआ करती थी उनको आठ महीने की सैलरी नहीं मिलने के वजह से वो काम छोड़ चुकी थी और टीचर्स बिल्कुल नहीं है। दो तीन लोग हैं स्कूल में प्रिंसिपल और प्रिंसिपल के अलावा दो और तो ये जो है वहां पर चल रहा था हम लोगों ने जाके देखा स्कूल के अंदर बैग्स पड़े हुए हैं बच्चे बाहर गायब है कौन सा बच्चा कहां है व्ला तो तब हमको पता चला कि ये बच्चे जो है जुआ खेलना सीखते हैं एडिक्शन के आदि बनते है ये सारी बीमारियों में वो जो है मुलाला हो रहे है रिस्की बिहेवियर चाकू चलाना चलाना ये सारी चीजें जो है सीख रहे हैं इन ऑल इन द नेम ऑफ बीइंग इन स्कूल फॉर एजुकेशन वेयर एस वो बच्चे जो काम पे जा रहे हैं उनके वालिदैन उनको काम पे भेज रहे हैं दे हैव समबडी हु इस लुकिंग आउट फॉर देम नाउ कहने का मतलब है जो बच्चे स्कूल जा रहे हैं बच्चों को भेजा जा रहा है कि वहां पर इंतजामात नहीं है तो वो उस सबको बहाने से निकल तो रहे हैं लेकिन जिन चीजों में वो एक्टिविटीज में मु्तला हो रहे हैं वो ये सब थी और जो बच्चों को एक्चुअली काम पे भेजा जा रहा है क्योंकि वो एक सिस्टम के अंदर और नहीं उनका उनका स्किल डेवलपमेंट तो हो ही रहा था हां महफूस थे ना वो इन चीजों से उनका स्किल डेवलपमेंट हो रहा है वो घर को मतलब दे आर लर्निंग रिस्पसिबिलिटी फ्रॉम बेबीहुड मतलब स्कूल से अच्छा एजुकेशन वहां हो रहा है काम पे जिम्मेदारी मतलब वो वो अपने घर की जिम्मेदारी ले रहा है अपने वालिदैन की जिम्मेदारी ले रहा है अपने छोटों की बहुत बड़ी चीज सीख रहा एक तरीके से आप हल्की सी कंट्रोवरर्शियल बात बोल रहे हैं जो सोशल वर्क के हलकों में वो उसको इस तरह देखा जाएगा कि देखिए चाइल्ड लेबर की बात हो रही है हां हां श्योर लेकिन मैं तो ये उसका आउटकम है उसका आउटकम है आप चाहे तब भी किसी को किसी ने चाहा नहीं है कि स्कूल से दूर करके उसको ये सिखाया जाए लेकिन उसका नेचर ऐसा बन रहा है कि वो वहां सीख रहा है गलत आदतों से बच रहा है अच्छा एजुकेशन का पर्पस क्या है भाई सीखे और अच्छे अच्छे अखलाक पैदा करे और वहां काम पे जा रहा है तो वो सीख रहा है औरकि उस फ्रेम में उसको वो काम करना ही है वो डिसिबिलिट भी हो रहा है। दो चीजें जो मुझे बहुत इंटरेस्टिंग लगी। एक वर्ल्ड बैंक और एक डिस्ट्रिक्ट का स्कूल। वर्ल्ड बैंक मुझे इंटरेस्टिंग इसलिए लगा क्योंकि उसका यह क्लेम है यूनाइटेड नेशंस, वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ कि हम दुनिया को डेवलप कर रहे हैं और बेहतर से बेहतरीन की तरफ ले जा रहे हैं और उनके सामने जब आप पेश कर रहे हैं यह मसला है तो उस मसले को डिनाई कर दे रहे हैं। और दूसरी तरफ वह है कि जो स्टेट रिस्पांसिबिलिटी ले जिसको लेनी चाहिए और वह बजाहिर वह मार्केटिंग भी है कि हमने रिस्पांसिबिलिटी ले रखी है और उस रिस्पांसिबिलिटी के नाम पे जब वो आपके पेरेंट्स जो चाहते हैं बच्चे आगे बढ़े और वह अपने घर की रोजी रोटी को फिर भी कॉम्प्रोमाइज कर रहे हैं और उनके बच्चे जब उन स्कूल्स में पढ़ने जा रहे हैं तो वहां पे जो उनको माहौल मिल रहा है इट इज वर्स देन द माहौल जो वो कोई एक्टिव वो नहीं है डिसीजन लेकिन पैसिवली यह आउटकम निकल कर आ रहा है। 10 साल का हम लोगों ने 10थ क्लास पास रिकॉर्ड निकाला उस स्कूल का बस 13% 13% यानी कि 10 साल तक उस स्कूल की एवरेज पास परसेंटेज 13 है। मतलब ऑलमोस्ट 87% ड्रॉप आउट है। और अच्छा ऐसे वैसे ड्रॉप आउट भी नहीं है तो वो लोग 20 एक साल के आसपास तक पहुंच गए 18 20 साल के आसपास तक पहुंच एक लंबा वफा दे दिया और उन्होंने अपने आप को कुछ बनाया नहीं है देखिए लॉस सिर्फ ये नहीं है कि मतलब 10थ क्लास पास नहीं की लॉस ये है कि आप वो जहां तक चले भी उसका भी आउटपुट आपकी जिंदगी में कुछ नहीं आप क्या बने वहां तक जाने में क्या आप कुछ बन पाए अगर आप बन ही नहीं रहे हैं तो फिर आप क्यों जा रहे हैं? फिर एजुकेशन का क्या मतलब रह गया? ये सवाल हमको पूछना चाहिए। बन तो रहे हैं लेकिन बनना वो है जो सोसाइटी के लिए नुकसान नुकसानदेह बन रहे हैं। एक्सक्टली मतलब खुद अपने लिए भी मतलब वो कुछ कर नहीं पा रहे हैं। राइट? तो वो फिर निकल के पूरा एक एक्सप्लइटेटिव वही मतलब पूरा जो क्राइम एंड वायलेंस एंड ऑपरेशन का जो एक कास्टेंट लिव्ड एक्सपीरियंस रहता है गरीब बस्तियों में वो यही लोग तो उसको सस्टेन कर रहे हैं। जी इसमें जो जाया हो गए एजुकेशन का जो बेनिफिट है चौतर इसमें ये कि भाई ये आदमी सोसाइटी के लिए मुफीक बने लेकिन कम से कम दर्जा जो है ये नुकसान देना जी और अगर वो नुकसान प्रोड्यूस होने लगे तो फिर वो क्या मतलब बिल्कुल तो वहां पे जो है पहले ही आंख खुली कि डेवलपमेंट का काम जो है वो उसको भी समझने की जरूरत है। आप जो है अपने आप को पढ़ा लिखा समझ के अगर आप जाके किसी की मदद करने जाएंगे तो आप बिल्कुल नाकाम रहे तो आपको फिर से पढ़ना होगा समझना होगा। अब आप जितना जानते हैं उसको बाहर छोड़ के फिर उनकी जिंदगी में उतरना होगा। उनके जूते पहनने होंगे। उनकी तरह जिंदगी को देखना होगा। तब जाके आपको सशंस के नजर आने लग तो इवन जो अब्दुल मजीब खान साहब हैं जिन्होंने हिंदुस्तान की बेहतरीन एजुकेशन अच्छे घर सेफ एनवायरमेंट जिनका एक्सपीरियंस आपके मुंबई के सर्कल्स में भी बेहतरीन है। गुजरात के भी बेहतरीन इंस्टट्यूट में पढ़ रहे हैं। वह भी जब जमीन पर उतरते हैं इस सब नॉलेज के बाद जिनकी ट्रेनिंग हुई है जो पढ़ा है उनको यह समझ आता है कि उसका वो स्यूशन ओरिएंटेड नहीं है। ये जो पूरा का पूरा जो एजुकेशन का पैराडाइम है क्योंकि इवन फॉर एग्जांपल हम लोग भी जामिया में थे तो हमने कोशिश करी यहां पे एक पीछे एक स्लम है कि उसको करें हम बट आपने तो लंबा काम किया वी कुड नॉट डू थर्ड डे वो इस वजह से क्योंकि जब कोई सिस्टमिक नहीं होती ना कोई चीज वो जब वो सिर्फ इस वजह से है कि भाई आपका निजाम कुछ प्रॉब्लम्स क्रिएट कर रहा है। अब वह लोगों को पता चलेगा तो उसका पैच वर्क कर दो क्योंकि सिस्टम डोमिनेंटली ऑप्रेसिव है। आप वर्ल्ड बैंक भी तो एक न्यू लिबरल कैपिटलिज्म के फ्रेमवर्क में ऑपरेट कर रहा है। वही एंगेज कर रहा है। वही इनेबल कर रहा है कि वेल्थ का कंसंट्रेशन हो। पावर का कंसंट्रेशन हो। अब वही आके ज्ञान दे रहा है। वही लोन दे रहा है। वही वो सारी चीजें कर रहा है कि आप थोड़ा सा हिस्सा दो चार% इनके ऊपर ऐसे लगा दो ताकि ये लोग रेवोल्यूशन ना करें। तो एक बेचना है। ठीक है? एजुकेशन का मतलब है एजुकेशन जो है सोसाइटी के लिए कम वो प्रोडक्शन के लिए जाता है। एक्सक्टली लेबर एजुकेशन तय भी मार्केट पे हुआ है। और वो मार्केट के लिए तय हो रहा है। हमें क्या चाहिए? कितने ग्रेजुएट्स के वालों के जरिए से तय हो रहा है। समझ रहे? हम ये कहते हैं कि मार्केट लिंकेज इसका टर्म है तो वर्ल्ड बैंक अगर आपकी खैरखही कर रही है तो वो आपकी खैर नहीं कर रही है वो असल में उस कंपनी की कर रही है जिसके प्रोडक्शन को आप बेचने का काम कर रहे हैं पैसा तो दूसरे से ले रहे गरीबों के नाम पे लेकिन असल में माल बिकाया जा रहा है उस कंपनी का क्योंकि वहां फीस देना है वहां मिक्सर देना है एट द एंड ऑफ द डे वो खर्चा जो सोशल वर्क के नाम पे भी हो रहा है तो खरीदा तो जा रहा है इनहीं कॉर्पोरेट्स मेजर भी वही किया जा रहा है कि कितनी मिक्सर बिक रही है। वाइट गुड्स की कैटेगरी में कितना जो है वहां पे डिस्ट्रीब्यूशन फैला है। रिटेल आउटलेट्स लगे हैं। दे आर मेजरिंग दिस। अगर ये बता दिया कि भ तलाकें बढ़ रही है। लड़ाई झगड़े बढ़ रहे हैं। तो वो मत मेजर कीजिए। उससे तो क्या होगा कि प्रोग्राम फेलियर है। किसने कहा? उसके बाद उसकी मार्केट को कोई मार्केट नहीं उल्टा फेलियर है ना। आपकी मार्केट खत्म हो। मार्केट तकलीफ में आ जाए। हमारे वाल साहब कहते हैं इसको इकोनॉमिक फंडामेंटलिज्म के मौजूदा दौर में जो इकोनॉमिक्स है उसका गलबा है। बाकी सब उस फ्रेमवर्क से जस्टिफाई हो रही है मोरालिटी क्या है? हेल्थ पॉलिसी क्या है? कल्चरल पॉलिसी क्या है? उसके लिए अगर मुफीद है। उसको अगर उसमें प्रॉफिट मिल रहा है कॉर्पोरेट को तो पॉलिसी बनेगी वरना नहीं बनेगी। और यह इकोनॉमिक फंडामेंटलिज्म अलग वर्ड इसलिए क्योंकि सिर्फ यह कैपिटलिज्म में नहीं है। कम्युनिज्म में भी है क्योंकि मटेरियल जब गालिब हो जाए तो वो सिर्फ रिस्ट्रीब्यूशन की बात हो रही है। क्या प्रोड्यूस होगा उसकी बात नहीं। प्रोड्यूस वो भी वही कर रहा है। वो भी शराब बना रहा है। वो भी गैंबलिंग करवा रहा है। वो भी ये सारी चीजें करवा रहा है। जिससे सोशल गुड कॉम्प्रोमाइज हो रहा है। सरेंडर होना है कहीं ना कहीं। ठीक है? या तो आप खुदा के सामने सरेंडर हो जाए या आप किसी भी ताकत के सोर्स की तरफ हो जाए। जिस जमाने में जिस ताकत का सोर्स गालिब होगा बाद में उसके सामने वो है इस वक्त अगर मादा है पैसा है तो वो पैसे के सामने सर वही उसका खुदा है वो असल में सूफी है उस शील्ड का जो अपने हर एक्ट से पैसा चाहता है ऑफकोर्स वो तो उसको उसने स्पिरिचुअल एक्ट बना दिया ना हर कोई चाहता है कि भाई हम भी इतना ज्यादा हमारे पास भी गाड़ी हो उससे हमारी हैप्पीनेस और हमारी पर्स्यूड जुड़ी है। हां। तो मतलब उसके पास जब जब अल्लाह होगा उसका तब तब उसके काम बने। अगर उसका अल्लाह उसके पास नहीं है तो बेचैन होगा। यही बात हम अगर कहेंगे जब मजहबी नुक्त नजर से हम कहते हैं कि भाई हमारे सामने ताकत का जो सर चश्मा है वो खुदा है और उसी के सामने हमको सरेंडर होना है। तो जहांजहां वो हमारे साथ होगा हम ताकतवर। हम जहांजहां वो हमारे साथ होंगे वहां हमारे काम होंगे तो ये बात मेटाफिजिकल लगती है और वो फिजिकल लगती है तो मेटाफिजिकल और फिजिकल चीजों के दरमियान जो तकाबुन चल रहा है या आवेश है उसमें सशन यानी हल कहां निकलेगा वो शायद जो दिखाई देता है आखिर में बात वही आती है कि जब तक आप अपने तनाजुम को ठीक नहीं करते यानी आपके परसेप्शन को ये ये एक परसेप्शन है कि आपको देखना है लेकिन ये इतने सुराग से देखना है और आवाज ये लगाई जाएगी कि आपको देखने की आजादी है आप और जब आजादी देखने की तेज आगे तो क्या बोले सुराग में देख अच्छा जैसे आपने होलिस्टिक की बात करी तो ये वो सिस्टम है जो ये बोल रहा है कि ये जीने के पैमाने हैं। यह सक्सेस है और उससे जब मार्केट फेल हो रही है और उसमें यह सोशल इवल्स प्रोड्यूस हो रहे हैं तो उसको बोल रहा है कि भ अब इसके बाद यह जो कोर्स करेक्शन होगा इसके लिए कुछ अलग से कर लेते हैं। लेकिन होलिस्टिक में क्या होगा वो पहले से ही प्रेडिक्टेबल होगा कि ये जो सोसाइटी है इसको पहले से ही इमेजिन किया जाएगा कि उसमें ये भी हो सकता है तो क्या चाहिए ये भी हो सकता है। तो वो सिस्टम के विदिन उसकी ओरिजिनल जो पॉलिसी है उसके विदिन होगा। वो करेक्टिव पॉलिसी नहीं है। ये सब करेक्टिव पॉलिसी है। अभी अभी देखिए देखिए एक मिसाल कि हमको कहा कि आंख झुकाओ। है ना? मर्द को कहा आंख झुकाओ। औरत को कहा पर्दा करो। तो अब बहस यहां होगी कि भाई क्यों उसको पर्दा करो। उसके ऊपर जुल्म हो रहा है। और इसको भी जुल्म। भाई देखने की चीज है। देखेगा नहीं तो क्या करे? ये भी मजलूम है जो हाथ नीचे करके चल रहा है बुद्धू है और वो जो बुर्का पहन के चल रही है वो भी पागल है बुद्धू है ठीक है अच्छा इसमें हमने ये सोचा कि भाई ना आग लड़ेगी ना दो आदमी एक दूसरे के सामने आएंगे अजनबी और फिर वो जिना होगा और जीना होगा तो एड्स होगा और एड्स होगा तो ये होगा ये सारी चीजें ये दो ही चीजों के अंदर समा दी गई है अब ये क्या करेंगे इस पर बहस करें उसके बाद जो है दोनों को लड़ने देंगे फिर बोलेंगे कि अरे यार रेप हो गया। जरूरी नहीं ना कि ये दोनों लड़ने के बाद भी दोनों की रजामंदी हो। हो सकता है एक राजी हो एक नाराज हो लेकिन उसको तो चाहिए तो उसने रेप कर दिया। अब रेप के लिए एक इंस्टट्यूट बनाओ जो रेप का इलाज करे। ठीक है? फिर वो जिना हो गया तो जीना के नतीजे में जो चाइल्ड आया तो उस चाइल्ड कौन संभालेगा? तो अब उसके लिए यतीम खाना बनाओ। फिर से मुझे आपकी बात सुन के वालिद साहब की याद आ गई। वह इसको बोलते हैं कि कमर्शियलाइजेशन ऑफ ह्यूमन वीकनेस में पहले शराब बेच के पैसा कमाओ, फिर शराब के इलाज से पैसा कमाओ। पहले सेक्स को बेच के पैसा कमाओ, फिर उससे होने वाली बीमारियों के इलाज से आप पैसा बनाओ। तो, वह जो पूला साइकिल है उसमें एट द एंड ऑफ़ द डे मेकिंग ऑफ़ द मनी इज़ेंट। और जो आपने इंपॉर्टेंट बात कही, मैं उसको बोलता हूं डायमेंशनलिटी रिडक्शन। कि आपने जो ह्यूमन बीइंग के एक्सपीरियंसेस के डायमेंशंस हैं जहां पर उस एक हरकत के नताइज निकल सकते हैं। जब वो आपने कोलैप्स कर दिया और आपने बोला कि भाई इसी डायमेंशन में सोचो तो फिर उसके नताइज तो आपने बाहर ही निकाल दिए और उससे उस लिव्ड एक्सपीरियंस से जो भी प्रॉब्लम्स क्रिएट होंगी वो आप प्रॉब्लम मानोगे ही नहीं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसलिए मैंने क्या कहा कि जो पोस्ट मॉडर्निज्म है वो आदमी को इस पल जीने के लिए आजादी देता है कि अभी तू जी इस वक्त मजा आ रहा है मजा बाद में देख ले क्या होता तो ना पीछे क्या होता है वो सोचने की जरूरत है ना आगे क्या होता है वो सोचने की जरूरत अभी जी ले भाई तेरे से तेरे पास इतना ही मौका है लिविंग इन द मोमेंट वो लिविंग इन द मोमेंट भी नहीं होता एक्चुअली सफरिंग इन द मोमेंट [हंसी] तो नाम तो उसी तरह दे रहा ब्रांडिंग उस तरह से की गई इंसान कबूल कैसे करेगा तो कबूल करने की जो टाइटल्स होते हैं रद्द करने की जो टाइटल्स होते हैं उसकी जगह कबूल करने के टाइटल्स बस इतना ही बात और ये जो मिसलेबलिंग भी हुई है बहुत अग्रेसिव एंड बहुत वायलेंट हुई है यानी पूरी अच्छाई को आपने मिसलेबल कर दिया और बुराई को आपने मिसलेबल कर ये सब लैंग्वेज लैंग्वेज पे भी जो जुल्म हुआ है ऑफलेट ये रीसेंट फिनोमिना तो मैं मुझे भाई आप पे वापस आऊंगा। पहले मैं बीच में मौलाना के पास जाना चाह रहा हूं कि आप वर्ल्ड बैंक से क्योंकि एक ट्रांसफॉर्मेशन सफर होगा उस पे हम आएंगे। लेकिन उससे पहले कि जो उनका बचपन गुजरा है या उन्होंने जो चीजें देखी क्विकली अगर हम उन्हें भी रिव्यु करें वजह यह है कि हम एक डिफरेंट नॉलेज सिस्टम के प्रोडक्ट हैं। आप एक डिफरेंट हालांकि हम कन्वर्ज होने की कोशिश कर रहे हैं और उसी की पूरी प्रैक्टिस है कि भ इस फ्रेगमेंटेड रियलिटी को वापस कैसे जोड़ा जाए। लेकिन फिर भी एक्सपीरियंशियली हम लोगों ने एक अलग जर्नी ली। तो वह जर्नी भी समझने की जरूरत है जो एक जो मुसलमान तबका है वह एक बड़ा तबका है [गला साफ़ करने की आवाज़] जो इस जर्नी को ले रहा है और वो क्या चैलेंजेस फेस कर रहा है तो मेरा ताल्लुक जो है वो कोकण के बिहार से रत्नागिरी जिले में एक तालुका है खेड़ रत्नागिरी तो वो जगह है जहां पे सावरकर को जेल में रखा गया था वो भी है और वो रत्नागिरी जो है आप उसके लिए बहुत मशहूर है अल्फसो के अल्फा आम आम के लिए तो खेड़ तालुका है वहां से 9 किलोमीटर पर एक गांव है। वहां हम पैदा हुए 1977 में हमारे वालिद साहब सिर्फ एजुकेशन के लिए मुंबई आए हमारे वालिद साहब की फाइनशियल कंडीशन ऐसी नहीं थी कि वो चार चार बच्चे पांच पांच बच्चे एक तो बाद में पैदा हुआ भी आने के बाद लेकिन चार तो वहां थे [गला साफ़ करने की आवाज़] चार को पढ़ाने के लिए वो और जिस कंडीशन में वो पोर्टस में काम करते थे एक खलासी नाम के एक फैकल्टी है पोर्टस के अंदर मजदूर पानी के जहाज पर उसमें काम करते थे तो जाहिर सी बात है फिर इस क्लास का आदमी रहेगा कहां? तो उन्होंने जो रिहाइश इ्तियार की थी वो कुरला में एक जगह है हलापुर। तो वहां पर एक बहुत ही बड़ा सलम है। उस सलम में हम रहे 27 साल जिंदगी के हमने वहां निकाले तो तीन साल की उम्र थी मेरी जब मैं बॉम्बे आया और उसी सलम में समझो कि शूर की आंखें हमने खोल दी। तो हमारे आसपास क्या था? मुख्तलिफ कम्युनिटी के लोग थे अलग-अलग इलाकों से रहने वाले यूपी के भी बिहार के भी और मुस्लिम गैर मुस्लिम सब एक साथ रहते थे हम लोग गटर बिल्कुल सामने है जरा सी बारिश हुई तो पानी जो है फौरन घर में आ जाता था इस तरह के सिनेरियो में हम परवरिश पाए हम तो हमारे वालिदन फोकस थे कि हमको पढ़ाना है और पढ़ाने के लिए वो सारी कुर्बानियां दे रहे थे अपनी जज्बात की कुर्बानियां अपनी लाइफ लाइफ में कंप्रोमाइज सारी चीजें कर रहे थे वो हमको दिख रहा था वो आज भी हमारे सामने आंखों के सामने है उसप जाने से आगे निकलते हैं हम कि हमारा एडमिशन हुआ ऊटी स्कूल अंजुमन खैरुल इस्लाम कुरला तो पढ़ते पढ़ते आगे बढ़ ही रहे थे शूर जब बेदार हुआ उस वक्त मैं सातवीं आठवीं में था और मैं जमात में गया तब तब्लीगी जम हां पहली मर्तबा मस्जिद से वैसे ताल्लुक था क्योंकि अक्सर वक्त हमारा मस्जिद में गुजरता था सब लोग हम लोग बड़े बड़े हो गए थे तो मकतब में जा रहे हैं तो मकतब का टाइम दो घंटे का हम चार चार घंटे मकब में रहते थे फिर हमारे मोजिन साहब भी दोस्त हमारे इमाम साहब भी दोस्त और उनकी खिदमत में लगना मस्जिद की सफाई करना अक्सर वक्त हमारा मस्जिद में गुजरता था इसलिए कि बस्ती में जाने के लिए कोई दिलचस्पी कोई चीज तो थी नहीं उससे बेहतर था क्योंकि बड़ा सहन मस्जिद का था। वहां रहते थे। पंखा चलता था। अगर सोना है तो वहां सो भी गए। तो सारी कंफर्टेबल लाइफ जो थी हमारे लिए तो मस्जिद [गला साफ़ करने की आवाज़] में बहुत रहते थे। लेकिन बाकायदा तालीम ताल्लुम और फिक्री सफर जो शुरू हुआ वो आठ आठवीं के साल हुआ। पहला दिन तबलीग में लगा। उस वक्त नौजवानों की जमात जो है एक पीढ़ी करती थी और वहां से जो है हमको एक झटका लगा और वो झटका में स्कूल लेकर के आया। अब स्कूल अंजुमन खैर इस्लाम थी। अब मैं अपनी उस समझ एक दिन की समझ थी लेकिन वो समझ बहुत ही जैसे कहते है ना कि एक ही वक्त में किसी चीज को अंदर डाल दिया गया हो दिमाग में और उसको सारी चीजें देखने की लियाकत आ गई हो। इस तरह से हो गया था। तो हम तीन भाई थे उस वक्त पढ़ रहे थे तो असेंबली जब तक हम लोग थे तीनों भाई हमारे बड़े भाई थे अशफाक तो जब तक वो थे तब तक असेंबली वो चलाते थे उनके जाने के बाद असेंबली मैंने चलाई उसके बाद मेरे छोटे भाई थे सिराज वो असेंबली चला रहे थे तो स्कूल की असेंबली पर भी हमारा कब्जा था कब्जा था [गला साफ़ करने की आवाज़] तो अंजुमन खैरुल इस्लाम खैरुल इस्लाम का लफ्ज सुनने के बाद अब मेरे दिमाग में दूसरी बातें आने लगी जो हमने देखा वहां कि हमारा तो एजुकेशन ही नहीं। जब मैं पांचवी में गया तो वहां लड़ाईया चल रही थी प्रिंसिपल की और टीचर्स की। तो वो तो लड़ाई तीन तीन चार चार साल चली मेरे ख्याल से। उस स्कूल में टीचर्स ने मिलकर के बच्चों के जरिए से पूरा स्कूल का फर्नीचर तुड़वा दिया। अच्छा। और हम उसका हिस्सा तोड़फोड़ था। तो तोड़फोड़ में सब मजा आता था। बच्चों को फिर जो बच्चे वहां मीडियम स्कूल था तो आसपास के जिस इलाके से बच्चे आते थे वो कोई बहुत ज्यादा विज़ और कोई मकसद जिंदगी का लेकर के स्कूल में आए हुए नहीं होते थे। उनको ये अच्छी एक्टिविटी मिल गई जो हम मोहल्ले में कर रहे थे वो हमको स्कूल में मिल गया तो और भी क्वालिटी कॉन्फिडेंस भी ज्यादा होता है ना कि देखिए ये जो स्कूल हमें दबा रहा है हमारी डेली लाइफ को कंट्रोल कर रहा है उसको देखो हमने तोड़ दिया तो उस वक्त अंजुम खैर इस्लाम के जो सेक्रेटरी थे मीठा साहब तो उनको मार खाता हुआ हमने वहां देखा बारिश थे बुजुर्ग थे और बड़े नूरानी चेहरे वाले थे और उनको मार खाता हुआ हमने देखा तो ख इस्लाम को हमने फिर अब देखना शुरू किया कि इस्लाम क्या है तो मैं मुझे याद है कि वफे में मैं बच्चे को लेकर बैठता था उनको हजरत इब्राहिम सलाम का वो जो वाकया है के अल्लाह रूह कैसे कब्ज करेंगे जरा मुझे बताइए तो वो हदीस के अंदर जिक्र किया गया तो मैं वो बच्चों को लेकर के सुनाता था न में मैं गया तो न में एक अली टीचर आया शेरवानी के साथ पहला आदमी जिसको मैंने देखा हमारे स्कूल में जो पूरी अपीरेंस के साथ इस्लामिक अपीरेंस के साथ आए तो उनका नाम था जावेद आलम साहब अलीगढ़ से थे आजम आजमगढ़ से थे असल में अलीगढ़ से पढ़े हुए तो जब वो आए पहले दिन तो बच्चों ने जो उनका हाल बनाया जो बैक बेंचर होते हैं चिल्लाना शुरू किया पीछे से मुल्ला जी मुल्ला जी मुल्ला जी ठीक है तो मुझको कयामत गुजर रही थी इसलिए कि मैं पसंद हो गया और मेरे नजदीक वो मुकद्दस शख्सियत है और पूरे माहौल में कोई भी ऐसा नहीं दिख रहा है। यही एक आदमी है जो मेरी पसंद का दिखाई दे रहा है और उसके साथ ये हो रहा है। तो वो चोट जो है दिल पर वो आज तक है। फिर दूसरा जब पीरियड आया फिजिक्स पढ़ाते थे हमको तो वो आने से पहले उनकी तस्वीर जो है बोर्ड पर बन गई और उस वक्त चाचा चौधरी और साबू ये कॉमिक्स चला करती थी हमारे दौर में तो उसमें जो कैरेक्टर होते थे किस तरह के कॉमेडी कैरेक्टर उस तरह उनकी तस्वीर बना करके उनकी दाढ़ी को ऐसा ऐसा करके फिर नीचे लिख दिया गया था मुल्ला जी ये सब आ रहा है जहन पर असर अंदाज हो रहा है तो इसी बीच तब में भी काफी वक्त लगा बहुत एक्टिव था मैंने मुझे मैं इतना छोटा था कि मुझे जमात में ले भी नहीं जाते थे वो पूरी जमात में तस्कील करके तैयार करके भेजता था और जब मेरी बात आती थी तो मेरा कद बहुत छोटा था तो मुझे वापस भेज देते तो मैं रोता हुआ आता था [गला साफ़ करने की आवाज़] अब मैंने तय किया कि मदरसा जाना है और मदरसा गया मैं जमात में 40 दिन लगाया एसएससी के बाद एसएससी पूरा किया और उसके बाद 40 जमात में गया जमात से आ के फौरन मदरसा गया पहला जो दाखिला हुआ मेरा श्रीवर्धन में हुआ जामिया हुसैनिया अरबिया श्रीवर्धन कोकन में वहां जाने के बाद एक अब ये स्कूल में मैं देख चुका तो अब मैं मदरसे में क्या देखने जा रहा हूं आप सोच सकते है ना कि मैं मदरसे में क्या देखने जा रहा हूं तो अब मैं जब वहां गया तो जिस तरह से आम इंसानी जिंदगी होती है वहां भी उसी तरह की जिंदगी दिखाई देने लगी कि मैं तो एक अच्छा कांसेप्ट लेके गया था कि यहां जाने के बाद अब मेरी टीम दीनदारी जो और भी साउंड हो जाएगी। मैं इल्म भी हासिल करने लग जाऊंगा तो मैं वली बन जाऊंगा। इसके साथ में गया था। अब वहां गया तो सब हमारी तरह इंसान थे। वहां बहुत जबरदस्त झटका लगा। लेकिन उस झटके को मैंने अंदर ही रखा दबा के। बहुत सारा टूट फूट हुआ। उसका कभी तस्करा बाद में करेंगे तो बहुत टूटफूट हुई। लेकिन मैं वहां सेटिस्फाइड नहीं हुआ। पढ़ाई को लेकर के। फिर मैं वहां से आया बाहर। लेकिन एक एहसास वहां भी और फिर यहां आने के बाद भी वहां स्कूल था यहां मदरसा दोनों जगह जो है जो चीज मुझे दिखाई दे रही थी वो अंदर मेरे जहन की तशकील कर रही थी फिर मदरसा आया देवबंद से करीब मुजफ्फरनगर में एक बागोवाली मदरसा है वहां मेरा दाखिला हुआ लेकिन वालिदावाली का जो गांव है हां बागोवाली मुजफ्फरनगर में तो मेरी वालिदा ने जो है तार बेच के मुझे वापस बुलाया मैं बहुत बीमार हूं बोल के उनको किसी ने बता दिया कि वहां बहुत मच्छर है ऐसा है वैसा है तो हमारी वालिदा घबरा गई उन्होंने तार किया तारी पहली बार मैंने देखा था जिंदगी में तार इससे पहले तार उस वक्त देखा था जब हमारे वालिद साहब को उनके वालिद के इंतकाल की खबर आई थी और उसके बाद ये तार आया था तो उसका एक झटका लगा तो मैं वैसे ही निकला फौरन बाद में आने के बाद पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है वो मुझको वापस बुलाने के लिए ये ड्रामा किया गया था फिर गया वापस लेकिन इस दौरान जो मेरी की फिक्र बन रही थी कि ना मदरसे में वो मिला ना स्कूल में ये एक खला जिंदगी में यानी सवाल की तरह मेरे ऊपर मुसल्लत था फिर उसके बाद हमने पढ़ना शुरू किया गुजरात में आए तो वहां अच्छे असातिदा मिले और उनकी निगरानी भी रही और उनके मुताले की हिदायत तो उस नतीजे में बहुत सारी चीजें पढ़ी उसमें एक जज्बा पैदा हुआ कि भाई ये स्कूल ये मदरसा ये दो अलग-अलग क्यों है? ये दोनों एक क्यों नहीं ये सवाल फिर खड़ा हुआ तो वहां से फरागत के बाद फिर मदरसे में पढ़ाने बैठा तीन साल पढ़ाया मदरसे में तो वहां भी गवारा नहीं हुआ। वहां से छोड़ के नया नया मिल्लत स्कूल जोशरी में इस कासेप्ट पर खड़ा हुआ था कि हमने मदरसा और स्कूल दोनों को जमा कर कंबाइंड एजुकेशन का तसवुर आया तो मेरे अंदर वो पक ही रहा था और ये पहली मर्तबा मेरे सामने आया तो फिर मैंने मदरसे को खैरबाद कहा वहां इस्तीफा दे के मैं वहां चला गया तो 2001 में मैं वापस आया मुंबई [गला साफ़ करने की आवाज़] और वहां काम के दौरान और भी मुताला होता चला गया होता चला चला गया। ये जरूरत दिन ब दिन इसका एहसास बढ़ता चला गया कि दोनों एजुकेशन एक होनी चाहिए। स्कूल के रहते रहते तीन साल में मुझे ये अंदाजा हो गया था कि दोनों एजुकेशन एक के नतीजे में जो जनरेशन तैयार होनी चाहिए वो मेरे ख्याल से स्कूल में नहीं हो सकती। क्योंकि स्कूल में जो दीनियाद का सब्जेक्ट होता है वो बहुत ही मुख्तसर होता है। एक घंटा दिया जाता है या आधा घंटा दिया जाता है। फिर उसमें जो है बच्चों के लिए जो कंडीशन होती है पढ़ाई की उसमें फिर ये बहुत ज्यादा मुसिर नहीं होता। उतना ही हो सकता है जितना मकब में कोई आदमी कुरान पढ़ लेता है, नाजा पढ़ लेता है, दुआ याद कर लेता है। उससे ज्यादा यहां नहीं हो सकता। मैं तो किसी पर्सनालिटी की तलाश में था ना। मैं दोनों तालीम के नतीजे में एक जामे शख्सियत के तलाश में था। तो वहां भी मुझे दिखाई नहीं दी कि यहां भी यह पूरा नहीं हो सकता। तो वहां रहते रहते फिर हम टीम बना लिए थे हमारे पास जो असातिजा थे और उनके साथ बैठ बैठ उठ के मुख्तलिफ नजरियात पर गुफ्तगू करते करते एक टीम बन गई थी जो इसके लिए तैयार हो गए थे कि हम एक ऐसा मदरसा बनाएंगे जहां इस तालीम को मदरसे में लाया क्योंकि यहां लिमिटेशंस है बच्चे दिन पढ़ते हैं लेकिन घर पे चले जाते हैं तो घर पे जाने के बाद फिर वही माहौल है उसी माहौल में रहते हैं तो यहां का जो कुछ भी हमने किया हुआ होता है वहां जाकर के फिर वो मिट जाता है तो रोज मिटना रोड लिखना रोज निटाना रोज लिखा उससे अच्छा है कि ऐसा कोई इदारा बनाया जाए जो बोर्डिंग हो और वहां उन पर एक मुद्दत तक खास मेहनत की जाए और उनकी शख्सियत में उसको पिरोया जाए। फिर ये बाहर आए तो फिर इनके ऊपर उतना इफेक्ट नहीं होगा। वो इसका काबिल होंगे कि इस तरह के अगर कोई इफेक्ट आते भी है तो उनका डिफेंस सिस्टम जो है वो इतना ताकतवर हो चुका होगा कि उस पर असर अंदाज नहीं होगा। तो फिर हमने जो है जामिया शाह अब्दुल अजीज दहलवी के नाम से एक इदारा शुरू करने का सोचा और सोचने के बाद उस पर बहुत मंथन हुआ दो तीन साथी चार साथी हम लोग मिलकर के दिन रात बैठ के उसकी प्लानिंग करते थे। इसलिए हम पीछे पढ़ चुके थे। अल्लामाली को पढ़ चुके थे। सैयद सलमान नवी को पढ़ चुके थे। मना हसन गानी रहमतुल पढ़ चुके इन सब लोगों को पढ़ चुके थे जो इस पर कुछ ना कुछ कह के गए हैं। तो ये सवाल था कि इतना जब कहा गया है दोनों तालीम की इफादियत पर इतनी बात हुई है और सबकी ये तमन्नाएं थी तो फिर हो क्यों नहीं रहा? इतने सालों में हुआ क्यों नहीं? 100 साल में भी क्यों नहीं हो पाया? क्यों नहीं हो पाया? और जिन्होंने करने की कोशिश की वो कामयाब क्यों नहीं हो पाए? तो ये सब सवालात के साथ जी रहे थे। तो सवालात के हल करने की कोशिश कर रहे थे। तो क्यों नहीं हुआ? तो उनको अफराद नहीं मिले होंगे। उनको ये वसाइल नहीं मिले होंगे। वसाइल कैसे लाएंगे अफराद कैसे लाएंगे जो जो नहीं हो सकता था वह कैसे फराहम करेंगे इस पर हमने पूरा काम किया और एक फुल पैकेज तैयार किया यानी यू समझिए कि ईंट लगाने से लेकर के बाहर निकलने तक का पूरा सिस्टम सोचा तीन साल हम लगाया इसके पीछे और उसके बाद फिर उसको लेकर के निकले हम लोग बड़ों के पास जाए इसको पेश तो मौलानाद मदनी साहब फिर मौलाना बद्दीन अजमल साहब फिर मौलाना गुलाम मुस्तानवी रहमतुल्लाह फिर होते होते जो है हम पहुंचे और सिद नोमानी साहब के पास जब उनके सामने हमने ये रखा तो उन्होंने बहुत ही खुशी से उसको कुबूल किया और कहा कि मैं तो यहां आया हूं इसीलिए मैं सील खानका चलाने नहीं आया मैं तो इस तरह का कोई इदारा चाहता हूं तो फिर हम उनके साथ वाबस्ता हो गए अब वहां सवाल पैदा हुआ कि यह शुरू करना क्योंकि असल गए थे ये काम शुरू करने के लिए और वहां भी जो मसाइल आ रहे थे वो वसाइल के आ रहे थे जमीन मौजूद है लेकिन उसको हरी करने के लिए मसाइल नहीं है और वो बिल्कुल देहात था तो वहां अगर फैकल्टी को बुलाना भी हो तो कैसे बुलाएंगे देहात है तो ये सब चीजें चल रही थी तो हमने अपने सिस्टम में फिर थोड़ा सा सोच करके कि कैसे इसको कंफर्टेबल बनाएंगे इन हालात के लिए तो बहुत सारे मशरे में हुआ काम शुरू हुआ तो उसमें पहला ये हुआ कि हम पहले उलमा की ट्रेनिंग का काम करें तो वहां महाद व्ला दहल भी शुरू किया उलमा की ट्रेनिंग के लिए और कैंपस इंटरव्यू के जरिए से उनको हम वहां लाते थे फिर हम उनको दो साल वहां रखते थे उनको जमीन पर उतार करके तरबियत देने की कोशिश करते थे कमाई पढ़ाई कम जो कुछ वो पढ़ चुके हैं वो किस तरह से गौर फिक्र के नतीजे में बाहर निकले और फिर वो प्रैक्टिकल लाइफ के लिए तैयार हो। उस वक्त हम लोग प्रोजेक्ट चलाते थे। वीकली मंथली प्रोजेक्ट चलाते थे। गांव में जाते थे। गांव के अंदर झाड़ू और सारा सफाई का सामान ले जा के पूरे गांव में एक हिस्सा तय कर लेते कि इस साल इस महीने सब महीने जो इतना सफाई करना है तो हमने ओलमा को गटर में उठा उतार उतार के जो है गटर में जो रेती जमा हुई थी एक एक लोरी दो तीन लोरी हमने गटरों से रेती निकाली थी ओलमा के जरिए से इनको प्रैक्टिकल बनाना है कि जब बारिश होती थी घास काटना है रास्ता बनाना है ऐसे सारे काम हम वहां करते थे। फिर मजलिस होती थी तो मजलिस की सफाई मेहमानों का इकराम उनके खाने का तकसीम पूरा काम डिस्ट्रीब्यूशन करना यानी एक तरह का समझिए कि लीडरशिप प्रोग्राम था लेकिन उसके ऊपर टाइटल लीडरशिप का नहीं था तो वो तरबियत शुरू की 2012 13 के अंदर हमने दार इमाम रबारी शुरू किया और वो शुरू किया तो फीस का पहला इदारा था तकरीबन 93ाउ फीस हमने रखी सालाना और सभी ख थे कि ये कैसे हो सकता है कि मदरसे में कोई इतनी फीस दे के आए लेकिन तसवुर जो था दोनों तालीम एक जगह करना तो पीछे जमात इस्लामी के जरिए से तब के जरिए से मुख्तजीम तहरीको के जरिए से एहसास तो आवाम में पैदा होने लगा था कि भाई तालीम से काफी नहीं ये तालीम भी जरूरी है उसी के नतीजे में लोग मुख्तलिफ तहरीको में भी जाते थे कि भाई हम डॉक्टर तो हो गए लेकिन हमको दी नहीं आ रहा तो तब्ली में जा रहे हैं कोई जमात जमात इस्लामी जा रहा कोई किसी तहरीक में जा रहा है तो ये हम समझ गए थे कि आवाम के अंदर इसकी तलब पैदा हो गई है और अगर हम यहां 40 बच्चे बुलाना चाहे इस कासेप्ट पे तो आ जाए तो हमको कॉन्फिडेंस था लेकिन मौलाना थोड़ा घबरा रहे थे के पता नहीं मदरसा है मदरसे में कौन फीस लेकर के आए तो हमने कहा कि नहीं अगर फीस नहीं लेंगे तो फिर वो इदारा भी शुरू नहीं करे क्योंकि फीस फीस के जरिए से ही हम चाहते हैं कि वो सारी जरूरत तालीमी वो पूरी की इमारतें चाहे आवाम बनाए आवामी चंदे के जरिए से इमारतें बनाई जाए लेकिन तालीम को आवामी खर्च पर ना रखा जाए जिनके बच्चे बनने वाले हैं हम उनसे उसका पैसा लिया जाए या उनको कहा जाए कि वो ये जिम्मेदारी को कुबूल करें तो बहुत उसके ऊपर ले जब ऐलान निकला तो उसके बाद जो है फोन आते थे और बहुत सुनाते थे फोन नंबर भी मेरा ही था तो बहुत सुनाते थे [गला साफ़ करने की आवाज़] लेकिन ये था कि जुनून था कि ये काम करना है क्योंकि ये पहली जरूरत थी हमारे नस् हमारा पूरा जहन बना था वो ये था कि पहली ब्रिज करने वाली नस्ल चाहिए जो हमारे पास जो दो तबकात बन गए एक मदरसे से निकलने वाला तबका या एक दीनदार तबका है और दूसरा जो कॉलेज यूनिवर्सिटी से निकला हुआ है और जो प्रोफेशनल है तो ये दोनों तबों के दरमियान एक बहुत बड़ा गैप है इस गैप को पूरा करने के लिए पहले वो लोग चाहिए जो इनकी जुबान में बात कर सके। अब ये बहुत बड़ा टास्क नहीं था। पहला ये था कि इनकी जुबान में बात कर सके। मतलब ये है कि जहां जहां ये उलमा एड्रेस कर रहे हैं आवाम को वहां ऐसे लोग जाए जो उनकी जुबान में बात कर सके। उसकी तैयारी का पहला प्रोग्राम था। फिर धीरेधीरे आगे टास्क बढ़ाने का इरादा था। तो ये हमारे खून में था। दोनों तालीम दोनों तालीम तो तजुर्बात वहां से पांच साल के बाद निकले तो उस वक्त ये सोचा कि भाई अब तो हमसे कोई इदारा नहीं क्योंकि इदारा बनाना कोई खाने का काम नहीं और उसमें आम तौर पर तालीमी इदारों को के लिए हमारे पास या नए कासेप्ट पर कोई काम करना हो तो आवाम जो है उसमें बहुत जल्दी कोई आगे बढ़ती नहीं है। तो 2015 में जब वहां से हम निकले तो हमने ये तय किया कि भाई अब हमको कोई इदारा नहीं बनाना है। कोई अच्छा काम कर रहा होगा तो उसको अपुन जाकर के अपने नजरिए के मुताबिक जो मदद कर सकते हैं करें। इसी दौरान जो है जब मैं 2015 में मिल्लत फाउंडेशन से जुड़ा मिलत फाउंडेशन एक आजाद इदारा है जो मुस्लिम स्कूल जितने चल रहे हैं इस्लामिक स्कूल के नाम से उनको सालाना जमा करता है और जो मेरे जो बोर में बहुत अच्छे से घर पे छत पे उनके अस्पताल की वहां एक बार मेरे वालिद साहब रुके भी काफी अच्छे तो 2015 में हम उनके कॉन्फ्रेंस में गए तो वहां जाने के बाद जो है फिर बड़ी टीम नजर आई तो उनके साथ जुड़े और बहुत सारे मामलात हुए तो तो जैसे जैसे हम करीब आए तो लोगों ने हमारी फिक्र देखी गुफ्तगू जब होती थी तो तो एक बड़ी टीम थी तो उसमें से एक टीम ट्रेनिंग के लिए तय हुआ था मुजीब भाई की ट्रेनिंग की मैं मैं तो इनको जानता नहीं था। तो मुझे मिबा का फोन आया मिबा भाई का हैदराबाद से के मुजीब खान साहब है और वो ऐसी ट्रेनिंग करते हैं। लेकिन हम चाहते हैं कि आप उनसे पहले मिले वो क्या करना चाहे क्या करना चाहते हैं क्या कंटेंट पेश करना चाहते हैं वो चेक करें ताकि हमारे साथी जो है वो उनकी गुमराहियों से बच सके या वो अगर गुमराह हो तो उनकी इलाह हो सके रिव्यू रिव्यू काउंसिल आपके लिए मौलाना थे [हंसी] तो मैंने कहा ठीक है भाई मैं देखता हूं इंशा्लाह तो इनका नंबर दिया हमारी उनकी बात हुई फिर इन्होंने जो है पुणे का सफर भी किया लेकिन हम लोग नहीं मिल पाए क्योंकि उनका फ्लाइट लेट हो गया था और रात को एक बजे पहुंचे फिर वो मुंबई चले गए फिर ऐन प्रोग्राम के दिन हम लोग वहां पहुंचे तो मगरब की नमाज के बाद मैं इनसे मुलाकात किया मैंने कहा कि मैं हूं मौली सादिक इन्होंने बताया कि हां मैं आपको जो है वो प्रोग्राम दिखा देता हूं। आज कब बैठेंगे हम लोग तो मैंने इनसे कहा कि अब वक्त नहीं है कि हम प्रोग्राम देखें क्योंकि आपने पूरी तैयारी की होगी। उसका एक माइंड सेट बनाया होगा। अभी मैं उसमें बीच में कुछ उंगली डालूंगा कि ये मत करो ये मत करो ये मत करो। तो उसमें तो आपका पूरा बना बनाया जो है स्ट्रक्चर ऐन वक्त पे हिल सकता है। तो ये सही वक्त नहीं है इस पर बात करने का। आप प्रोग्राम चलाइए। जहां कोई बात होगी तो हम वहां पर बात करेंगे इंशा्लाह। तो पांच दिन का प्रोग्राम था और वो प्रोग्राम जो देखा मैंने तो मैंने उसमें क्या देखा क्योंकि तालीम और तरबियत दोनों उनवान को मैं लेके चल रहा था और सिर्फ ऐसा नहीं कि मैं सिर्फ तालीम की बात करता था। तरबियत पर भी मैं काफी मुताला कर चुका इस्लामिक तसव से तो ताल्लुक था ही। उसके अलावा भी मैंने बाकायदा इस्लामी तरबियत को उनके माहरीन से सीखने की कोशिश की थी यानी समझने की कोशिश की थी। तो मैंने जो है शाला को पढ़ा था। मैंने जो है अली को पढ़ा था। को पढ़ा था। फिर मौलाना मकबूल अहमदारी साहब की किताब है उसको पढ़ा था। और इसीलिए पढ़ा था कि मुझे फनने में तरबियत सीखना है कि इंसान को इंसान कैसे बनाया जाता है। तो मैंने उनके कंटेंट को इतना ज्यादा नहीं देखा। मैंने यह देखा कि यह जो सफर करा रहे हैं आदमी को कन्वस करने का वो क्या है और वो कितना ताकतवर है वो मुझे वहां दिखाई दिया क्योंकि ये मुझे जगह जगह खला इसका महसूस होता था कि जो लोग तरबियत पर बात कर रहे हैं तो उनके पास तरबियत करने का जो फ्लो है या उसके जो तकाजे हैं वो तकाजे उनके पास उस तरह ताकोतर अंदाज में मौजूद नहीं और तरबियत पे हो सकता है वो बयान तो कर लेंगे जैसे वो गुस्से पर बयान कर लेंगे वो हसत पर बयान कर लेंगे वो निफाक पर बयान कर लेंगे ये जितनी बुरी आदतें हैं या मजा है हसाइल है इस पर बात तो कर लेंगे लेकिन एक आदमी जिसके अंदर ये पैदा हो गई है उसको धीरेधीरे इससे निजात कैसे दिलाएंगे और उसको कन्वस कैसे करेंगे कि तुझे ये छोड़ना है वो मुझे हर जगह तो मैं उसको उस जमाने में कहता था कि तरबियत के लिए उलू तरबियत सीखना जरूरी है। अभी इनसे मुलाकात नहीं हुई। उस वक्त मेरा ये मेरे जुमले हुआ करते थे उलमा से डिस्कशन के दौरान भी के उम तरबियत के लिए तरबियत के उलूम सीखना जरूरी है और वोकि हम लोग सीखे नहीं होते इस वजह से हम तरबियत का काम नहीं कर पाते। वो जवाब मुझे यहां मिला। ये जवाब मुझे यहां मिला। तो इनकी कदर मेरे दिल में बहुत थी। फिर उसके बाद दूसरा प्रोग्राम हुआ तो दूसरे प्रोग्राम में उन लोगों ने शिरकत नहीं की। पहले तो मुझे उन्होंने भेजा था मिलत फाउंडेशन वालों ने। दूसरे प्रोग्राम में उन लोगों ने इनको आउट कर दिया था बहुत खर्चा हो रहा है। वो जो हमारे यहां तालीम का मतलब होता है कि उसमें पैसा ना खर्च हो। अब वो पैसा नहीं खर्च होगा तो कौन करेगा? तो आज तक हमारी कौम की तालीम जो है वो कौम ही कर रही है। इंडिविजुअल्स उस पर खर्चा करने के लिए आज तक भी अभी तैयार नहीं है। तो वहां बहुत महंगा प्रोग्राम हो रहा है। वो होटल में क्यों बैठ हो रहा है? फाइव स्टार होटल की क्या जरूरत है? किसी कमरे में भी हो सकता है। इस तरह की बहस वहां चली और फिर वो जब वो मवाद पर कोई चीज नहीं मिली तो उसके सिस्टम पर बात होने लगी कि वो कोंबूर ही जाने की क्या जरूरत है? और विलास में रहने की क्या जरूरत है? इतना खर्चालू क्यों करना चाहिए? ठीक है? तो उन लोगों ने इस उनवान से जो है उसको खारिज कर दिया। लेकिन मैं गया मैं दूसरे प्रोग्राम में भी गया। लेकिन जो पहला प्रोग्राम था और दूसरा प्रोग्राम था तो मैंने उनको रिवु दिया था उस वक्त भी कि जो पहला प्रोग्राम था वो ताकतवर प्रोग्राम था। दूसरे प्रोग्राम में हालांकि ट्रेनर्स जो है वो इंटरनेशनल ट्रेनर्स आए थे। हुआ ये कि मैकिंजी की जो फैकल्टी है एबरकिन की कोर फैकल्टी उसको ट्रांसफॉर्मेशन के फ्रेमवक्स में जिसने तरबियत दी थी गीता बेलन करके हम तो गीता बेलिन का बहुत सालों के बाद में एक प्रोग्राम जो है तय पाया और उसमें मुझे स्कॉलरशिप मिली उस प्रोग्राम के ऑक्सफोर्ड में जो प्रोग्राम मैं गया शिरकत शुरू की मैंने और मुझे बहुत मतलब उस खातून ने वो ताकत मुझे महसूस हुई कि ये ट्रांसफॉर्मेशन कर सकती है। तो मैंने उनसे बताया कि मैं इस तरह से जो है मुस्लिम लीडरशिप पर ही मैं जो है काम कर रहा हूं वहां पर हिंदुस्तान में। शी गॉट वै एक्साइटेड। शी सेड आई वुड लव टू कम एंड डू अ सेशन फॉर यू। तो मैंने उबा को कॉल किया फॉर यू आर गीता इस ऑफरिंग टू कम एंड डू अ सेशन। मतलब जो मैकजी को बना रही है मैकिंजी की फैकल्टी को बना रही है। वो खुद अगर आके जो भी बनाए वो अ इट विल बी पावरफुल करते हैं। सो ऑल ऑफ़ अस अग्रीड एंड वेरी क्विकली गीता बेलन वास इन इंडिया एंड द सेकंड प्रोग्राम हैपेंड बट दैट सेकंड प्रोग्राम द वे इन वि इट हैपेंड एंड सम ऑफ़ द थिंग्स दैट आई नोटिस्ड व बीइंग आस्क्ड ऑफ मी बी एक्सट्रीमली अनकंफर्टेबल अबाउट इवन कंटिन्यूइंग द प्रोग्राम क्या किस तरह की बात हुआ ये कि मतलब इसमें थोड़ा सा मैं बैकग्राउंड आपको व्हेन आई जॉइ मैकिंजी पहली बार मुझे जो है इसको कनेक्ट कर लेते हैं क्योंकि आप वर्ल्ड बैंक हम वहां से छोड़ के मौलाना के पास आए थे और मौलाना आपके प्रोग्राम तक पहुंचा दिए तो बीच का जो गैप आपकी कहानी है उसको हम ब्रिज करते हुए फिर इसमें आते हैं। तो मैं जब भूमि में मतलब मुझे पहली बार ये पता चला कि कम्युनिटी डेवलपमेंट रिक्वायरर्स समबडी हु स्टैंड्स वि द कम्युनिटी नॉट ऑन टॉप ऑफ द कम्युनिटी। मतलब मैं बाहर से आके उनको ये नहीं बता सकता कि तुमको कैसे जीना चाहिए। मैं उनके जूते पहन के ये समझने की कोशिश कर सकता हूं कि उनकी तकलीफे क्या है और उनका वहां पे उस उन हालात में सबसे मुनासब जो है हल क्या निकल सकता है तो जिस तरह से हम लोगों ने वहां पर काम करना शुरू किया बहुत जबरदस्त काम हम लोगों ने किया एक तो हम लोगों ने एक मूवमेंट शुरू किया था जिसका नाम फ्रीडम अंडर कंस्ट्रक्शन अ एक्चुअली वो हुआ ऐसे फ्रीडम अंडर कंस्ट्रक्शन वास एन अमेजिंग थॉट एट दैट टाइम अ हम लोगों को जो है वहां पर ये स्कूल देखा हम लोगों ने जिला परिषद बिल्कुल बर्बाद हालत में बच्चों के पास पढ़ने के लिए स्कूल नहीं क्लास रूम्स नहीं है और हमको फंड्स चाहिए थे उनकी अगर हम पुरानी सैलरी दे देते वो जो स्वयं शिक्षा अभियान के जो जूनियर टीचर्स थे उनको अगर हम बाकी सैलरी अगर हम कर देते हैं उनकी तो वो फिर से जो है रिजॉइ करने के लिए भी तैयार थी और हम उनको रिजॉइ करवाने के लिए भी हम तैयार थे वो जिम्मेदारी उठाने के लिए हम तैयार कि स्कूल थोड़ा सा बेहतर हो जाए। मतलब इस काबिल तो हो जाए कि बच्चे अगर बैठे तो उनको वहां पर तालीम मिले। तो इतना तो हमको जिम्मेदारी उठानी चाहिए। हम लोगों ने ले लिया। देखा स्कूल के आसपास में डेढ़ एकड़ की जमीन थी। लोगों ने पता किया कि ये जमीन किसकी है। तो सब ने पूरी बस्ती वालों ने हमको बताया कि एक्चुअली तो ये जमीन जो है जो थी वो कुछ सात एकड़ थी और उसमें कब्जे होते रहे होते रहे होते रहे और डेढ़ एकड़ बन गई है जमीन और ये भी चली जाएगी। अगर जल्दी इसका कुछ ना किया तो हम लोगों ने सोचा कि यार यह पूरा इसको पहले बाउंड्री वाल उठाके जो है सिक्योर कर लेते हैं और प्लेग्राउंड एक अच्छा एक स्कूल का तसवुर या मॉडल स्कूल बनाते हैं। यही एक इंस्पिरेशनल स्टोरी बन जाएगी पूरे स्लम के ट्रांसफॉर्मेशन के लिए। इस तरह से हम लोगों ने सोचा और उसको करने के लिए हम लोगों ने अगस्त 15 आ रहा था। हमारे पास पैसे वसाइल बहुत कम थे। उन लोगों ने लगा कि मतलब हिंदुस्तान की आजादी और आजादी एस एन आईडिया इटसेल्फ फ्रीडम उसका दूसरा नाम जिम्मेदारी है जैसे जैसे मतलब जितनी ज्यादा जिम्मेदार कौमे होंगी उतनी ज्यादा उस कौम की आजादी का एहसास होगा और जितनी लापरवाह लातालुक कौमे बनेगी उतनी तंग उनकी आजादी होगी ये एक लॉजिकल जो है कनेक्शन है बिटवीन इंडिपेंडेंस एंड एंड रिस्पसिबिलिटी तो हम लोगों ने कहा कि हम लोग बिल्कुल खाली मतलब झंडा वंदन करो जन गण मन गाओ और छुट्टी मनाओ ये चल रहा है हमारा तो इसको रिवाइटलाइज करते हैं और उस उस दौर में तो हम लोग जो है पूरा हिंदुस्तान बनाने के लिए निकले हुए थे हम लोगों ने रिवाइटलाइजेशन के लिए फ्रीडम अंडर कंस्ट्रक्शन शुरू किया पत्थर आ गया है सीमेंट आ गई है वालंटियर्स रात को आने वाले हैं हम लोग बैठे हुए हैं वी सिंग िंग देयर एंड मिलिट्री आ गई वहां पे। अच्छा मिलिट्री मतलब मिलिट्री मिलिट्री वि वेपन्स उनको किसी ने कॉल करके बताया कि यहां पे जमीन का कब्जा चल रहा है। और ये एरिया जो है मिलिट्री कैंटेनमेंट एरिया जहां पर हम लोग थे रसूलपुरा पूरा मिलिट्री कंटेनमेंट तो वो लोग पुलिस ले आ गए। तो वी सरप्राइज वी स्ट कलेक्टर के हमारे पास रिटर्न ऑर्डर्स है और कलेक्टर के मतलब लैंड रिकॉर्ड्स में ये जमीन बिलोंग्स टू द स्कूल मिलिट्री यहां क्या कर रही है तो वो उन्होंने कहा कि यू कैन नॉट टच दिस दिस इस मिलिट्री प्रॉपर्टी आप अगर इसको हाथ भी लगाओगे कंकर यहां का हाथ लगाओगे गोली मार देगा आपको इस तरह से तो हम लोग भागदौड़ ये वो शुरू किए और इससे फाइनली हमको दे टू कन्वस अस दे रियलाइज दैट वी वर वेल मीनिंग यंग पीपल हु ट्राइंग टू डू सम गुड इन द लोकल कम्युनिटी तो वहां का सीईओ पटमेंट का सीईओ उसने बुलवाया और उसने अपने रिकॉर्ड्स प्रोड्यूस किए ट्रांसफर प्रोसेस इनिशिएट हुआ था कंप्लीट नहीं हुआ था सो इट कैन नॉट बिलोंग टू कलेक्टर एंड कलेक्टर कैन नॉट गिव यू परमिशन टू सिक्योर द लैंड इट वास कटनमेंट बोर्ड तो वी वर डिस्ट्रक्ट कि आप क्या करें मतलब ये लैंड को बनाने के लिए जो है सब मटेरियल आया हुआ है और अब हम लैंड को बचा ही नहीं सकते। तो अचानक से नजर पड़ी क्लास रूम्स गिरे हुए हैं और क्लास रूम्स ही बना देते हैं और इस तरह से रात को 12:00 बजे वालंटियर्स जमा स्ट्रक्चर है उस स्ट्रक्चर को उस स्ट्रक्चर को हम लोगों ने रातों रात बनाया ठीक किया उसको फिर हाफ कंस्ट्रक्टेड वाल्स बनाए सुबह की 8:00 बजे तक वालंटियर्स ने काम किया तो एक बहुत मुनजम काम जो है और एक अच्छी मिसाल जो है हम लोगों ने कलेक्टिव एक्शन हां कलेक्टिव एक्शन की रखी तो इट बिकम अ हज हिट एस एन आईडिया द नेक्स्ट थिंग इन फ्रंट ऑफ अस वास ट्राइंग टू अंडरस्टैंड की स्कूल में तालीम की दुश्वारियां क्या है एस्पेशली इन इस्लाम लाइक कॉन्टेक्स्ट तो वहां पे हम लोगों ने ये देखा कि इनके पास कोई रोल रोल मॉडल नहीं है। जहां से ये आते हैं उनके पास घर में मतलब एक तो मतलब खुद तालीम हासिल करना इतना तकलीफ भी होता है। मैथ्स को समझो, साइंस को समझो, लैंग्वेज को समझो मतलब इट इज इट इज अ स्ट्रगल फॉर अ चाइल्ड टू डाइजेस्ट द सब्जेक्ट दैट इस बीइंग टॉट। इन हालात में बैठ के वो सीखने की कोशिश कर रहा है। जहां पर मतलब वो उसका बाप पी के आ रहा है। मां और बाप जो है आपस में झगड़ा कर रहे हैं। उसके पास कोई ऐसा ये भी नहीं है। मतलब मोटिवेशन ही नहीं है कि वो मतलब जुस्तजू के साथ जो है एक सुई के साथ तालीम भी हासिल कर ले। तो ये ये इनके चैलेंजेस है एजुकेशन में रहने के देर आर मेनी बैरियर्स टू एजुकेशन एंड वो पूरा एनवायरमेंट इको सिस्टम ही वैसा है कि एजुकेशन को वो सपोर्ट नहीं करते उसको हम जो है ठीक करने के लिए हम लोगों ने फिर एक और प्रोग्राम को कंसीव किया जिसका नाम हम लोगों ने रखा एकलव्य द्रोणाचार्य टटरिंग मेंटरिंग प्रोग्राम जिसमें हम लोग जो है स्टूडेंट्स और प्रोफेशनल को लाए और इनको इनके के साथ अटैच करें कुछ सब्जेक्ट पढ़ाने के लिए और कुछ पर्सपेक्टिव देने के लिए कि तालीम अगर हासिल कर लेता है बंदा तो मतलब फ्यूचर किस रास्ते पे आगे बढ़ेगा तो जब वो हम लोगों ने किया उसके लिए ट्रेनिंग ऑर्गेनाइज की ये सब किया बहुत कुछ किया लेकिन जो एटीट्यूड्स हम लोगों ने देखे वालंटियर्स के वो अक्सर एटीट्यूड ऐसा था अरे बेचारा बच्चा बेचारी बच्ची इसके पास मतलब चॉकलेट खाने के पैसे नहीं है तो मतलब इनको फाइव स्टार दिलाओ पुअर चाइल्ड मतलब गीत के लिए इसने कपड़े कुछ नहीं बनाए हैं। तो मतलब उनका पूरा जो है व्हाट डू आई हैव एस अ प्रिविलेज एंड व्हाट डू दे नॉट हैव एस अ प्रिविलेज इन टर्म्स ऑफ़ पोज़ेशंस एंड एंड यू नो स्टफ टू हैव रादर देन यू नो व्हाट कैपेसिटीज डू दे नीड सो दैट दे कैन सक्सीड इन लाइफ। तो ये हम लोगों ने एटीट्यूड इनल वीकनेस देखी वालंटियर्स ने और दैट वास सच ए मैसिव थिंग फॉर अस की हम वी कैन नोट अलव दिस टू कंटिन्यू अनलेस वी चेंज दिस रेडिकली एंड वहां पे फॉर द फर्स्ट टाइम वी ट्रांसफॉर्म द एंटायर प्रोग्राम एंड वी से दिस इस नॉट अ सोशल सर्विस प्रोग्राम एनी मोर इट्स अ लीडरशिप प्रोग्राम फॉर यंग प्रोफेशनल्स एंड कॉलेज स्टूडेंट्स आपको हम एंड लीडरशिप डेवलपमेंट रिक्वायर्स टेकिंग ऑन अ रिस्पांसिबिलिटी वेयर यू फील श इन फ्रंट ऑफ वेयर यू फील लेस इन रिलेशन टू द चैलेंज यू टेकन ऑन एंड दैट कंपेल्स यू टू बिल्ड योरसेल्फ सो दैट इवेंचुअली यू आर एबल टू ओवरकम दैट चैलेंज एंड मेंटरिंग एंड टटरिंग अ चाइल्ड इन अ स्लम इज दैट चैलेंज आप इससे एंगेज करिए मतलब अगर आप स्ट्रगल कर रहे हैं फॉर एग्जांपल टू टू हैव अ रिलेशनशिप विथ द ऑोजिट सेक्स राइट एंड यहां पे ये बच्चा उतनी उम्र से वही स्ट्रगल कर रहा है। मतलब यंग अडलेसेंट भी वही कर रहा है। एल्डर अलेसेंट भी वही स्ट्रगल कर रहा है। तो अगर आप कोई हेल्दी बिहेवियर अपने लिए जो है सोचते हैं कि ये हेल्दी एक्सप्रेशन है इस इस अर्ज का तो फिर आप इस बच्ची को क्या समझाएंगे? क्या करे वो अपने आप के साथ? वो डेट पे जाए कि नहीं जाए? वो डेटिंग करे कि नहीं करे? और अगर डेटिंग नहीं करे तो क्यों नहीं करे? आपके पास मोरल क्या रीजन है उसको इस रास्ते से वो अपने आप को बचा के रखे अगर आप ये उसको क्लियर करना चाहते हैं तो अपने आप के लिए आपको पहले वो क्लियर करना होगा यू कैन नोट यू नो शो समबडी अ वे ऑन वि यू हैव नॉट वॉक फॉर योरसेल्फ फॉर एग्जांपल जब शुरू में आपने बात बोली रसूलपुरा की तो कि भाई यहां पे जो बच्चे हैं नशे कर रहे हैं गैंबलिंग कर रहे हैं शराब पी रहे हैं तो उस वक्त भी मेरे ज़हन में आया कि वो लोग जो वालंटियर्स है वो खुद खुद भी प्रिविलेज्ड सेटिंग्स में वो काम करते हैं। वो काम करते हैं और तो वो काम वहां क्यों सही है और यहां क्यों सही नहीं है। दैट बिकम द पिवट। आई मीन व्हेन वी स्टार्टेड वर्किंग वि वालंटियर्स दिस इज एकक्टली व्हाट हिट आवर वालंटियर से देर इज डुप्लीसिटी कि हम अपने लिए जो एक्सेप्टेबल मान लेते हैं और और प्रिविलेज एंड गुड लाइफ हमने डिफाइन कर ली है वो किसी और के लिए जो है इमैक्टिकल है सिर्फ इतना है या देयर आर मोरल डायमेंशन दैट नीड टू बी एक्सप्ल फॉर मसेल्फ एंड देन आई एम एबल टू हैव अ कन्वर्सेशन दे से दिस लाइफ इटसेल्फ सेंस दिस इस द पाथ वी चूस दे आर नॉट गोइंग टू गो विथ आवरसे एंड सो यू नीड टू यू नो दी आर द एटीट्यूड्स टू कल्टीवेट दी आर द रेस्पोंसिबल दिस इस द वे टू टेक रेस्पसिबिलिटी फॉर वनसेल्फ एंड फॉर वंस कंडीशन इट्स नॉट अबाउट व्हाट यू आर वेरिंग व्हाट आई एम वेरिंग मतलब वो बदलता रहता है फैशन के हिसाब से मतलब कभी चप्पल फैशनेबल हो जाएगी तो चप्पल आ जाएगी कभी जूता फैशनेबल हो जाएगा तो जूता आ जाएगा फैशन के पीछे मत जाना। अपने आप को बनाओ। अपनी वैल्यू को बनाओ। अब ये तुम्हारी अपनी वैल्यू कितना बन गई है? तुम अपने कॉलेज में जब जाते हो तो कितना वैल्यू बनाने पे जो है तुम फोकस कर रहे हो। ये इतना इंटेंस हम लोगों ने रिगरस काम करना शुरू किया ऑन द ट्रांसफॉर्मेशन ऑफ द मेंटर्स एंड टटर्स के इनवेरिएबली एव्री सिंगल वन ऑफ देम दे स्टार्टेड क्रैकिंग इंटरव्यूज इन हावर्ड आईएसबीस आईएम एंड ऑल द एलट प्रोग्राम्स दे स्टार्टेड गोइंग देयर और इन ऑर्गेनाइजेशन लाइक Google microsoft इवन इफ दे आर यंग प्रोफेशनल्स द वे दे वर एंगेजिंग वि द चैलेंज इन देर रेस्पेक्टिव जो उनका रोल है इन देर रेस्पेक्टिव रोल्स इन देर ऑर्गेनाइजेशन स्टार्टेड टू शो रिमारकेबल डिफरेंस विथ एवरीबडी एल्स तो ये वििबल डिफरेंस हम लोगों को दिखने लगा। सो इवेंचुअली आईआईटी मद्रास डड अ पीएचडी पेपर ऑन आवर प्रोग्राम व्हिच गॉट पब्लिश्ड मतलब पीएचडी गॉट पब्लिश्ड तो सो दिस बिकम अ वेरी सक्सेसफुल प्रोग्राम इन एक्सपीरियंशियल लीडरशिप डेवलपमेंट वेयर यंग प्रोफेशनल्स व टेकिंग रिस्पसिबिलिटी ऑफ ट्रांसफॉर्मिंग एटीट्यूड्स क्रिटिकल एटीट्यूड्स ऑफ अंडर प्रिविलेज चिल्ड्रन विदाउट नेसेसरी मेकिंग देम फील लेस अबाउट देमसेल्व्स तो अब रसूलपुरा में इसका जो ट्रांसफेशन हुआ फ्रॉम 13% एवरेज पास परसेंटेज वी ज़ूम टू अबाउट 95 97% पास परसेंटेज वहां पे अभी भी काम चल रहा है। अल्हम्दुलिल्लाह रब आलम जितना काम हम लोगों ने शुरू किया उसके आगे काम बढ़ता गया। अल्हम्दुलिल्लाह रसूलपुरा में जो लोकल कम्युनिटी की आज कैपेसिटी है टू वर्क ऑन देर ओन रेस्पेक्टिव चैलेंजेस वो बहुत स्ट्रांग है। वो इसलिए है क्योंकि जो जिन फेलोस पर हम लोगों ने कहा वहां पर भी हम लोगों ने फेलोशिप शुरू की। इवेंचुअली स्टार्टेड अ फेलोशिप देर स्टार्टेड वि सेवन वुमेन एंड वन मैन एट पीपल एस फेलोस ऑफ रसूलपुरा लीडरशिप प्रोग्राम और उनके थ्रू हम लोगों ने पूरे इनिशिएटिव्स को जो है वहां पे एक्सजीक्यूट किया और बार-बार हम शुरू से ये कहते थे कि हम यहां पे बसने के लिए नहीं आए। वी आर नॉट हियर टू स्टे एंड हम यहां पर रुकने वाले नहीं है। ये और ये हमारा घर नहीं है। कि हम जिम्मेदारी जो है जिंदगी भर हम इसकी जिम्मेदारी उठाएंगे। हम तो यहां से जाने वाले हैं और जाकर ही रहेंगे। तो ये हम शुरू से कहते आए थे। देयर वर अ लॉट ऑफ़ सक्सेस इन रसूलपुर एक्सपेरिमेंट एंड अ लॉट ऑफ़ फेलियर्स। द मॉडल इज अ सक्सेस बिकॉज़ इट इट गव अस ट्रेमेंडस रिजल्ट्स बोथ एट द लेवल ऑफ़ अदर इनिशिएटिव्स इन द कम्युनिटी हेल्थ इनिशिएटिव वी स्टार्ट लिटरली एस्टैब्लिश्ड अ क्लनिक देयर और ऐसेसे वहां पे हम लोगों ने यूनिवर्सिटी कोलबोरेशन के साथ में ऐसेसे काम किए अर्ली चाइल्डहुड डिसेबिलिटी डिटेक्शन एंड देन इंटरवेशन टू यू नो मेक अप द डेवलपमेंटल डिलेज़ जो डेवलपमेंट गोल्स होते हैं छोटे बच्चों के पैदा होने वाले बच्चों के तो अगर उसमें डिले भी है तो क्या इंटरवेंशन हम ऐसे ले कि इवेंचुअली बच्चा मेकअप कर जाए और वो नॉर्मल बच्चों के साथ फिर अपने जो है एजुकेशन के सफर को वो आगे बढ़ा सके। इस तरह के बहुत सारे काम हम लोगों ने लैंडमार्क वर्क वी डन इन रसूलपुरा अलम्दुलिल्लाह रब तो कम्युनिटी सिर्फ सिर्फ हम लोगों ने क्या किया? हम लोगों ने यकीन रखा की अल्लाह ने इंसान को बनाया है बेशुमार सलाहियतों के साथ। ह्यूमन पोटेंशियल इस इनीडीड इनफाइनाइट। इस पर हम लोगों ने आंख बंद करके भरोसा किया और उस भरोसे पे हम लोगों ने उनको सपोर्ट किया उनकी सलाहियतों को बनाने और जब उनकी सलाहियतें बनती गई तो उनके लिए अपने सोलशन अपने प्रॉब्लम्स को समझना जो की वो जी रहे हैं वो प्रॉब्लम और उनके सोश को पहचानना उनके लिए बहुत आसान था तो इस तरह से बहुत सारे सोश वहां पे हम लोगों ने इम्लीमेंट किए सेल्फ हेल्प ग्रुप्स का फॉर्मेशन वहां पे भी हुआ एंटरप्रेन्योरशिप के एक्सपेरिमेंट्स होने लगे वहां पे थ्रू सेल्फ हेल्प ग्रुप फ्रेमव वहां पे जो है छोटी छोटी एंटरप्राइज में लोगों को सपोर्ट करने की कोशिश करना वो हुआ रेमडीियल एजुकेशन का पूरा एक निजाम वहां पे बना और ये सारी चीजें जो है वी ऑलवेज केप्ट आवरसेल्व्स इन द बैकग्राउंड अगर काम होना है तो बस्ती वालों को ये जिम्मेदारी लेनी होगी और करना होगा। हम उनको फैसिलिटेट करेंगे कि तुमको किन-किन से मिलना चाहिए, क्या-क्या बातें करनी चाहिए, कौन सी कौन सी इनफेशन तुमको जमा करनी चाहिए और तुम्हारे अपने एटीट्यूड्स में जो कमजोरियां है उसमें हम तुमको कैसे डेवलप करें। अच्छा ब्रॉडली स्पीकिंग अपटिल नाउ जो स्टोरी का अर्क है वो वो ये है कि भ मुस्लिम स्टूडेंट्स मुस्लिम यंग पीपल कमिंग फ्रॉम डवर्स बैकग्राउंड एक स्कूल मदरसे के कॉम्बिनेशन में एक स्कूलिंग प्लस इलट एजुकेशन के कॉम्बिनेशन में और आइडेंटिटी का जो एक क्राइसिस है वो अंडर करंट चलता जा रहा है वो चलता जा रहा है लेकिन क्योंकि सिस्टम जहां पर प्रोड्यूसेबल और रिप्रोड्यूसेबल होता है इज़ली वहां पर चीजें मैनिफेस्ट कर पाता है इंसान। तो अब आप यहां पर हैं रसूलपुरा में हैं। वहां पे आप ब्रॉडली स्पीकिंग जेरिक यू नो लार्जली इंडिया एज अ होल में जो पपुलेशन है उसमें आप एक सबसेट ऑफ द पॉपुलेशन विद ऑल ऑफ़ दैट डायवर्सिटी। आप उसको एक मॉडल पपुलेशन लेके आप अपना एक्सपेरिमेंट करते हैं। बट इन ऑल ऑफ दिस दिस इज़ पोस्ट 2006 2007 सचर कमेटी की रिपोर्ट आ गई है। लोगों का ज़हन में ये सामने है कि भ एक पिछड़वी कम्युनिटी है जो पार्टीशन के बाद और पिछड़ गई है। और उस दौरान में बहुत सारे सिविल मूवमेंट्स हैं। गुजरात राइट्स हो चुका है। बाबरी के शहादत की मेमोरी लोगों में लाइव है। उस सबके बीच में देयर इज़ अ जनरेशन दैट इज़ गोइंग थ्रू दिस प्रोसेस। और वह अपनी-अपनी फील्ड्स में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। लेकिन स्टिल दे आर कंटीन्यूअसली एंड कंसिस्टेंटली फीलिंग दैट गैप। या तो आपकी भी क्योंकि जिंदगी में वो आप बताते हैं दूसरी जगह पे। मैं चाहता हूं कि व्यूअर्स को भी पता चले। दैट एपिसोड वेयर यू आर शिफ्टिंग टुवर्ड्स मैकनजी बट इंडिया में पॉलिटिकल टर्मोइल्स हो रहे हैं। आप उससे एंगेज कैसे कर रहे हैं? एंड वेयर डू यू पिव इट? एंड वेयर डिड यू थिंक नेसेसरी दैट यू ऑट टू फोकस ऑन कल्टीवेटिंग मुस्लिम लीडरशिप? या या तो रसूलपुरा बिकम माय सॉर्ट ऑफ शेप मी इनू अ लीडरशिप फैसिलिटेटर जो जिस तरीके से हम लोग फैसिलिटेट करने की कोशिश कर रहे थे कास्टेंटली लेटिंग पीपल टेक द लीड रोल व्हाइल मेकिंग शोर वी बिल्ड देर बिहेवियरल कैपेसिटीज और स्किल्स वेयर दैट वास नीडेड ये मैकिंजी के पास जो है खबर गई और उनके पास महाराष्ट्र में एक स्कूल ट्रांसफॉर्मेशन का प्रोजेक्ट आया तो उनको फैसिलिटेटर्स की अचानक से जरूरत पड़ गई तो मेरा नाम किसी ने रेकमेंड कर दिया कि ये एजुकेशन में साउथ में बहुत अच्छा काम कर रहा है। तो स्कूलों के टीचरों के साथ ये बहुत करता है और हम लोग तब तक कलेक्टर के साथ जो है एमओयू साइन करके 10 स्कूलों में ये टटिंग मेंटिंग प्रोग्राम हैदराबाद में कर रहे थे। तो एट स्केल चल रहा था काम। अ तो मैकजी ने मुझे बुलाया और मुझे सीधे-सीधे मुझे एकदम से बता दिया कि ये वर्कशॉप है। आपको अभी ये काम करना है। इतनी देर का काम है। आई वेंट एंड आई ड उन्होंने मेरा काम देखा। दे लव माय वर्क द वे यू आर एबल टू मूव पीपल इज पावरफुल। व्हाई डोंट यू जॉइन अस? मैंने कहा श्योर व्हाट डस इट टेक? अप्लाई कीजिए एंड दे आस्क मी फॉर फॉर माय सीवी इन 2010 अ दे टेक अ ईयर टू वेट पीपल पूरा का पूरा एक मतलब थरो इवैल्यूएशन क्राइटेरिया रहता है तो बाय 2011 दे कंप्लीटेड माय वेटिंग प्रोसेस एंड टूक मी ऑन बोर्ड 2011 में एक और चीज हो गई थी मतलब ये अनाजारे जो है उठे और इन्होंने एतेजाज कर दिया कि बहुत ज्यादा करप्शन हो गया है अनटोल इनटोलरेबल है और उन्होंने लोकपाल की डिमांड ये सिर्फ अगर वो करप्शन इनटोलरेबल है कह के रुक जाते तो शायद मुझे कुछ डिस्टरबेंस नहीं होता। लेकिन जैसे ही उन्होंने लोकपाल को डिफाइन किया इट वास अबब्सोलटली क्लियर के देयर इज देयर इज अ मतलब अनकॉन्शियस थॉट इफ नॉट अ थॉट थ्रू यू नो एंटायर डिजाइन कि इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन को कंप्लीटली सेटसाइड कर दिया जाए। ये कॉन्स्टिट्यूशनल जो पावर को पावर डिस्ट्रीब्यूशन है, कॉन्सिट्यूशनल पावर डिस्ट्रीब्यूशन मैकेनिज्म है जुडिशरी, पार्लियामेंट एंड ब्यूरोक्रेसी के बीच में इन तीनों पर अगर कोई बॉडी आ जाती है तो फिर ये तीनों की पावर्स एक जगह पे कंसंट्रेट हो चुकी है। अगर ये पावर्स एक जगह पे कंसंट्रेट हो गई है तो फिर नेसेसरीली व्हाट फ्लोस फ्रॉम देयर इज डिक्टेटरशिप। मतलब इट इज नॉट यू नो टू कॉम्प्लिकेटेड टू अंडरस्टैंड इट सेल्फ एविडेंट मतलब और आप ये डिमांड कर रहे हैं नॉट ओनली आर यू डिमांडिंग एवरीबडी इज फीलिंग पॉजिटिव एंड गुड अबाउट दैट डिमांड एंड दे आर सेइंग इनफ ऑफ़ डेमोक्रेसी टू मच डेमोक्रेसी इन लोगों को मतलब जूते मारो इन लोगों को मतलब चौरस्ते पे टंगा दो द एंगर इज सो पल्पेबल एंड एवरीबडी इस आउट ऑन द स्ट्रीट्स डिमांडिंग दिस काइंड ऑफ़ ट्रांसफॉर्मेशन एंड चेंज एंड मनमोहन सिंह की गवर्नमेंट तो बिल्कुल मतलब चुपी हो गई थी। मतलब दे वर नॉट एबल टू रेस्पोंड [नाक से की जाने वाली आवाज़] इफेक्टिवली इन पावरफुल मैनर। तो मुझे लगा कि मतलब ठीक है अगर मैं मान भी लेता हूं कि करप्शन अनएक्सेप्टेबल है। और बहुत ज्यादा करप्शन हो रहा है और खुद मतलब उन दिनों में कपल सिबल साहब ने एक अजीब सी मतलब बात कह दी है। किसने कही थी नहीं मालूम बट समबडी वै सीरियस। उन्होंने कहा कि क्या उन्होंने कहा ₹ 20 काफी है समथिंग रेडिकुलस नंबर 33 शायद ₹ या ₹3 समथिंग लाइक दैट या ₹40 एक आदमी के लिए तीन टाइम के खाने के लिए काफी है। तो ये ऐसेसे बातें हो रही तो मुझे लगा कि भाई ये बहुत वरेबल मोमेंट है। तो अगर वजन बात रखनी है तो फिर अन्ना हजारे अगर अनशन कर रहे हैं भूख प्यास के साथ मुझे भी उसका इक्वल कोई काम करना चाहिए। तो मैंने ये डिसाइड किया कि कन्याकुमारी से दिल्ली तक मैं पैदल चलूंगा। और गांव गांव रुक के मैं करप्शन पर बात करूंगा और यह भी बात करूंगा कि देखो करप्शन एक ऐसा नहीं है कि मतलब वो ऊपर ही पैदा हो रहा है। वो नीचे से हम पैदा करके इतना बड़ा ऊपर पहुंचतेपहुंचते वो बड़ा नंबर दिख रहा है। लेकिन पैदा नीचे हो रहा है। मतलब वो ₹200 की बिरयानी में पैदा हो रहा है। वो हर जगह हां वो ठर की बोतल में पैदा हो रहा है जो आप इलेक्शन के टाइम पे मतलब लेते हैं। हां वो सब वो सब्सट ऑल करप्शन। यू आर सेलिंग योर वोट। हां। तो वो पूरा काउंट कर लो ना और जो आपको यह सब देके खिला पिला के जो है आपका वोट ले रहा है तो वो जाके फिर अपना दुकान डालेगा ही ना वो उसने दुकान की ओपनिंग तो आप ही के हाथों से फीता कटवाया आप ये क्यों समझते हैं कि मतलब वो वहां जाके मतलब पुण्य करेगा आपके लिए डजंट वर्क आउट तो ये बात करते हैं लोगों से और लोगों को ये भी बताते हैं कि लोकपाल इस नॉट दी आइडियल सशन इस तरह से हम लोग उठे थे और चले तो जैसे ही हम तुम लोग चले वी स्टार्ट कौन लोग वी मोबिलाइज्ड अ स्मॉल टीम ऑफ पीपल हु वांटेड द एडवेंचर मिशन मेरा था विज़ मेरा था बाकी सब लोग देख रहे थे वी आर ये एडवेंचरस चलते हैं मतलब हिंदुस्तान देखते हैं ये भी मजा आएगा ये भी करके [हंसी] देखते हैं थोड़ा चलना फिरना भी हो जाएगा वो होता है ना हमारे यहां कहा जाता था कि वो जो अमीरों के बच्चे हैं वो फेलोशिप प्रोग्राम में जाते हैं चलो गांव भी देख आते हैं फिर आके बहुत दिनों तक उसकी बयाना बयाना करते हैं कि देखिए ऐसा देखा और फिर भूल के अपनी जिंदगी में लग [हंसी] जाते हैं। तो ऐसा कुछ छोटा सा ग्रुप ले कन्याकुमारी पहुंच गए। वहां से चौरस्ते पर खड़ना लोगों को जमा करना बात एक छोटी सी टुकड़ी थी हमारे पास दो कोर वालंटियर्स की अगर मतलब लग्जरी होती तो वो एक अगर हम शाम पहुंच रहे हैं तो वो सुबह चले जाते और वहां पे मतलब पहले जाना पंचायत ग्राम पंचायत सरपंच से मिलना वहां के तहसीलदार से मिलना वहां के डॉक्टर से मिलना टीचर से मिलना पहले जो मिल जाए हम पैदल चल के आ रहे हैं। कुछ कहना है सुन लो। इस तरह से ऑर्गेनिकली हम लोगों ने ऑर्गेनाइज करना शुरू किया। तो आप ओरिजिनल राहुल गांधी [हंसी] भारत जोड़ो से पहले वाला जो भारत जोड़ा गया है तो वो चले जैसेजैसे हम महाराष्ट्र पहुंचे आरएसएस हमसे इंगेज करने लगी एस अ सिस्टम हम बाजक्ता इंट्रोडक्शन के साथ कि हम आरएसएस से हैं। और मतलब राष्ट्र बनाना तो हमारा मतलब कर्तव्य धर्म है। हमारा हमारा वो है। आप हमारा काम कर रहे हो तो हम तो बहुत आपको सराहेंगे, पलकों पे रखेंगे वगैरह वगैरह तो उनके कई शाखाओं में जाना, वहां पे जो है बोलना अच्छा वो भी हर पिच पे बैटिंग करते हैं। अन्ना हजारे का लोकपाल भी वो कर रहे हैं और आपकी भी साथ जिससे जिसको जैसे लूप में ले लो ले लो। वहां से अगर आप कन्वस हो जाते तो आज आप मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के लीडर होते। [हंसी] नहीं एक्चुअली मुझे दो ऑफर्स आए। एक तो मुझे बीजेपी जाइन करने का ऑफर आया। इंटरेस्ट और मुझे आप आंध्र प्रदेश का भी ऑफर आया था कि तुम आप आंध्र प्रदेश बनाओ। अच्छा हां। तो बनाने का क्या मतलब है? मतलब आप अभी तो तब तब बन रही थी ना ऐसा बन गई नहीं थीच अच्छा मतलब जब तक वो दो स्टेट्स में डिवीजन और वो भी जो है आप खुद जो है एस अ पिलिटिकल एंटिटी बस अनाउंस हुई थी अभी कि होगी ये पिटिकल पार्टी तो तुम वहां पे जाके करो काम ऐसा एनीवे लेकिन एक एमपी में एक आरएसएस के जो है जो साहब थे। उन्होंने मुंह पे कह दिया कि तुमको मुसलमान नहीं होना चाहिए। बहुत अच्छे हो। तुम वो मुसलमान नहीं। उन्होंने ये नहीं कहा कि आप हैं तो हिंदू ही। हिंदुस्तान में सब हिंदू हैं। वो उस उस मैं वही कह रहा हूं। उस वक्त तक एवोल्यूशन नहीं हुआ था कि इस तरह के लोगों को डील कैसे किया जाए। [हंसी] तो असल में आप तो हिंदू हैं। आप तो मुसलमान है ही नहीं। तो तो ये जो है बहुत भारी होता गया मेरे सीन पर के मुझे इस तरह से तोला जा रहा है कि मैं मुसलमान हूं और मैं खुद अपने अंदर देख रहा हूं कि मेरे अंदर एक बेचैनी है जो बचपन से पल रही है अपने मुसलमान होने को ले इसीलिए मैं नाम भूमि रखता हूं भूमि पसंद करता हूं गुरुकुल रखता हूं मेरे मतलब पूरे संस्कृत जो है को मैं प्रेफर करता था और एक तरीके से मैं ये भी सोचता था कि हिंदुस्तान है तो मतलब हर और भी ग्रुप्स जब आप ले चल रहे हैं तो एक्सक्टली तो लेकिन लेकिन अगर आप मुझे कहते कि भाई तुम एहसान क्यों नहीं रखते हां तो मैं बहुत वायलेंटली उसको अपोज करता सिंपली बिकॉज़ मैं कहता कि यार ये एक कम्युनिटी से अटैच है। हम उस तरह का मैं था उस वक्त में उस तरीके से मैं जो है चीजों को देख रहा था और जब मैं चल रहा था तो मैं अपने आप को ऐसा होते हुए देख रहा था धीरेधीरे मैं ढल रहा था मेरा हिंदुस्तानी होना मेरे मुसलमान होने पर हां हां कि मैं हिंदुस्तानी होने के नतीजे में अपने मुसलमान होने से कितना शर्मिंदा हूं और कितना घबराया हुआ हूं तो ये जो है इतना हावी हो गया मेरा खत्म होने। हालांकि वो जो पूरा फ्रीडम मूवमेंट है या बाकी सारी चीजें हैं उसमें मुसलमान होना और हिंदुस्तान की आजादी का दावा एक कंप्लीटली इंटर है कि भाई जमीयत के हल्के और जमीयत की वो हो रही है। पॉलिसी पास हो रही है तो कांग्रेस भी उसको ले रही है। तो वो आजाद हिंदुस्तान में उस आइडेंटिटी को इतना कंपिटिटिव कैसे बना दिया गया? और क्यों बना दिया गया? और उसके जिम्मेदार हम तो है नहीं क्योंकि हमारे लिए तो वो बहुत ज्यादा आज भी नहीं आज भी नहीं है वो प्रॉब्लम इतना प्रॉब्लम होने के बावजूद भी आज भी आज भी जो हिंदुस्तान का मुसलमान है वो अपने आप को इस वतन से जोड़ते हुए बहुत सारी चीजों को देखता है या [गला साफ़ करने की आवाज़] तो जब मैं घर लौटा तो मुझे लगा कि इतना मैं करप्शन के खिलाफ बोल रहा था और इंटेग्रिटी के लिए बोल रहा मेरी अपनी इंटेग्रिटी इतनी रिस्पेक्ट कि मैं मतलब अपने मुसलमान होने को ठीक से ठीक से जो है लेके चल नहीं पा रहा हूं तो मेरी क्या इंटेग्रिटी है अपने आप की तो ये जब तक इंटेग्रिटी को मैं रिस्टोर नहीं कर लेता वो क्या होगी मुझे अभी पता नहीं है लेकिन जब तक वो इंटेग्रिटी पूरी तरीके से रिस्टोर नहीं हो जाती मुझे ये देश बनाओ वाले कामों को थोड़ा सा पीछे हटना चाहिए उससे अ पहली चीज अ और अब मेरा फोकस जो है पूरी तरीके से सच कमेट की रिपोर्ट बन गई। मतलब उसके पहले भी था लेकिन मुझे लगा कि अब अगर मैं मुसलमान ही जो है हूं और ये पूरा हिंदुस्तान मुझसे कह रहा है कि मैं मुसलमान हूं। तो ठीक है फिर मैं मुसलमान हो जाता हूं। और फिर पूरी तरीके से मुसलमान को मैं समझता हूं, देखता हूं और उस पर काम करता हूं। वो मेरा घर है। घर पे मैं जो है अपनी जान जितनी मैं लगा सकता हूं लगाऊंगा। तो सच कमिटी रिपोर्ट को ठीक से देखना और अपने चैलेंजेस को ठीक से समझना ये जो है फिर मैं वहां पे करने लगा। मैंने सोशल एंटरप्राइ को रास्ता मैकिंजी में तो मैं काम कर ही रहा था। लेकिन वंटरी डायमेंशन में मैंने जो है मुस्लिम एलिमेंट्स पर जो है गौर करना मुस्लिम जो है इंगेजमेंट्स पर सोशल इंगेजमेंट्स पर गौर करना तो फिर मुझे बखरीद नजर आई और बकरी में जो है जानवरों का लेना देना पूरी एक्टिविटी और कितना ये जो है इस एक्टिविटी के जरिए से कितना क्या मॉडल्स बनाए जा सकते है किस तरह से डेवलपमेंट किया जा सकता है उस तरह से सोचना और वो वो काम करना उसमें मैं अपने आप को लगाने लगा और उसमें बहुत नुकसान मैंने उठाया अपने आप को क्योंकि सडनली जो है एट स्केल करने की कोशिश कर रहा था ऐसे फील्ड में जहां पे जो है कोई ऑर्गेनाइजेशन नहीं थी तो उसका मुझे बहुत शदीद नुकसान उठाना पड़ा एंड दैट्स ओके अलम्दुलिल्लाह अपना वो मैंने फेस किया लेकिन एक्चुअली जो अ मेरे साथ हुआ कि 2017 के आतेआते अल्लाह ताला ने पूरी तरीके से मेरी कमर तोड़ी वो नुकसान जो हुआ एक्चुअली इतना बड़ा नुकसान था मेरे फाइनशियली कि मुझे लगा कि अल्लाह ताला ने पूरी कॉम्प्रहेंसिवली मुझे जो है कोलप्स किया एक तरीके से और जब मैं बैठ के एक और चीज पैलली मैकजी का एक डेवलप इंटरेस्टिंग है वो आपको बताता हूं मैकजी में ये चल रहा था कि देयर इज एन एंटायर देयर इज अ स्ट्रक्चर टू हाउ ऑर्गेनाइजेशनल ट्रांसफॉर्मेशन टेक्स प्लेस राइट द रिजल्ट्स आर टू बी अचीव्ड थ्रू पीपल राइट सो द फर्स्ट थिंग यू डू इज़ बिल्ड द इंडिविजुअल देन एमवर द इंडिविजुअल टू बिल्ड रिलेशनशिप्स विथ अदर इंडिविजुअल्स सो स्ट्रेंथन द रिलेशनशिप्स इन द ऑर्गेनाइजेशन एंड वंस द इंडिविजुअल इज स्ट्रांग एंड द रिलेशनशिप्स आर स्ट्रेंथन देन फोकस ऑन वर्क फ्लोस एंड स्किल्स दैट आर नीडेड फॉर एफिशिएंट वर्क टू फ्लो दिस बिकम्स द ओवरऑल फाउंडेशन ऑन टॉप ऑफ व्हिच यू नाउ बिल्ड विजनरी लीडरशिप कैपेसिटीज लेगसी क्या होगी डायरेक्शन क्या होगा विज़न क्या है इस तरह ये एक कोर उनका बेसिक मॉडल जो जो हम लोगों ने वहां पर सीखा लेकिन जो सेल्फ डेवलपमेंट था उसमें एक ओवरवेल्मिंग आईक्यू ईक्यू एलिमेंट्स थे इन अमेरिका फ्रॉम 200 ऑनवर्ड्स देयर इज अ मूवमेंट एंड लॉजिकली सो अ कि अगर आप देखते हैं कि लीडरशिप डेवलपमेंट इटसेल्फ ये फील्ड कैसे इवॉल्व हुई है। लीडरशिप डेवलपमेंट फॉर्मली हुआ करती थी आर्मी एकेडमी और कहीं लीडरशिप डेवलपमेंट का तसवुर भी नहीं था। ऐसा नहीं कि मतलब ब्यूरोक्रेसी में लीडरशिप डेवलपमेंट [गला साफ़ करने की आवाज़] की जरूरत है। लीडरशिप डेवलपमेंट आर्मी के बारे में ये सोचा जाता था कि वहां उनमें लीडर्स होने चाहिए क्योंकि उनको आर्मियों को लीड करना है। बाज वहां पे जाना और जान जाने का और जमीन पूरी हो जाने का ऐसा तसवुर है। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] लीडरशिप एकेडमी सिंस दे वर फोकस्ड ऑन आर्मी एंड वर्ल्ड वॉर वन एंड वर्ल्ड वॉर टू के जो नताइज निकले उस वक्त के लीडरशिप मॉडल्स के नतीजे में जो एंटायरली आईक्यू बेस्ड थे। जब उन्होंने नता देखे तो दे रियलाइज दैट आईक्यू एस अ कैपेसिटी और इंडिकेटर ऑफ लीडरशिप पोटेंशियल इज नॉट वर्किंग अप बिक जितने फैसले थे इतने मतलब स्टुपिड एंड फुलिश फैसले थे जिसके नतीजों में लाखों करोड़ों करोड़ों लोगों की जान चली गई के उसको इंटेलिजेंट समझना भी मतलब और ऐसा नहीं कि बहुत ग्रे फैसले थे कुछ भी हो सकता था। इतना तो जो है अलऊ करना चाहिए। ऐसा नहीं है। मतलब बहुत ज्यादा फुलिश एंड स्टूपिड बहुत ज्यादा फैसले लिए गए इस तरह से। तो ये जब वहां पे देखा गया इंटेलेक्चुअल मतलब एकेडमी में ये पढ़ा गया तो उनकी ये बेचैनी थी कि कुछ और होना चाहिए। और उसी वक्त न्यूरो साइंस में और न्यूरोलॉजी में कुछ डेवलपमेंट्स हो रहे थे। लिंबिक ब्रेन के ऊपर जो है स्टडी चल रही थी। तो उसमें ये समझ में आया कि द फंक्शन ऑफ इमोशंस इन इंटेलिजेंस समझ में आया। पहले ये कनेक्शन जो है एस्टैब्लिश कनेक्शन नहीं था कि इमोशंस कंट्रीब्यूट टू इंटेलिजेंस ये कनेक्शन नहीं था। इसीलिए अक्सर ये कहा जाता था कि कीप योर इमोशंस आउट ऑफ वर्क। वर्क प्लेस पे इमोशंस मत लेके आना। तो ये एक पॉपुलर नॉर्म था। बट सडनली दे रियलाइज दैट इमोशंस इज इन इंटेग्रल एलिमेंट ऑफ इंटेलिजेंस एंड अगर आप इमोशंस को डिवोर्स कर देते हो तो आप एक्चुअली इंटेलिजेंस को कॉम्प्रोमाइज कर देते हो। तो सडनली देयर वास दिस हज डेव एक्साइटमेंट इन द फील्ड ऑफ़ इमोशनल इंटेलिजेंस। एंड बाय द टाइम इट वी वर इन 80 इन द वेस्ट इमोशनल इंटेलिजेंस वाज़ सीन लाइक द इलीट लीडरशिप प्रोग्राम टू बी पार्ट ऑफ़। राइट? फिलोसोफी में एक थॉट एक्सपेरिमेंट है कि अ कि अगर यूजली क्या होता है कि अगर आपके जो आप ऑनेस्टली सोच रहे हैं वो आप बयान नहीं करते तो उसका असमशन ये है कि उसकी वजह से दुनिया खराब हो रही है। तो फिर ये आया ये आया कि अगर सब लोग का पूरा ट्रांसपेरेंट थॉट सबके सामने आ जाए तो उससे ऑनेस्टी रहेगी। लोग हो जाएंगे। तो सब सबकी सुन पा रहे थे। तो उसकी वजह से जो ना कहने की चीज थी जिससे लड़ाई झगड़ा और वो लोग वो पूरा का पूरा पता चला कि वो मोहल्ला तबाह हो गया क्योंकि वो जो चीज किसी की बुराई या किसी का वो जो आप रोक सकते थे और थम के बता सकते थे वो इमोशनल उससे आएगा कि अगर कोई मुझे ये बात बोले इमीडिएटली आपको रैशनली तो बड़ा सही लगेगा कि भाई इसको मैं ये बता देता हूं कि इसके अंदर ये प्रॉब्लम है और यह बेहतर हो सकती है। लेकिन कब किस सच बोल रहा हूं कब किस कॉन्टेक्स्ट में कितना और कैसे बताना है वो आप हालांकि उसकी भी एक रैशनलिटी है कि इमोशंस को आप कैसे इवैल्यूएट कर रहे हैं लेकिन जब तक आप इमोशन को पढ़ेंगे नहीं तो उसको रैशनलाइज कैसे करेंगे कि कब कौन सा इमोशन वो हो रहा है तो ये ये एक इमोशनल इंटेलिजेंस एक बहुत बड़ा जो है डेवलपमेंट होने लगा अराउंड 90ज एक और चीज वहां पे पैरेललली डेवलपमेंट होने लगी माइंडफुलनेस एंड अवेयरनेस योगा एंड माइंडफुलनेस एंड अवेयरनेस क्रिटिकिटी ऑफ ऑफ डेवलपिंग कॉन्शियसनेस हाइट एंड स्टेट ऑफ कॉन्शियसनेस एस अ लीडर एसेटरा बाय द टाइम वी केम टू 2000 अ वी वर एबल टू कंक्लूड एस एस एस अ ह्यूमन कलेक्टिव के आईक्यू और ईक्यू के ऊपर देयर इज एन अदर इंटेलिजेंस एंड दैट इज द स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस राइट एंड इफ वी डू नॉट कल्टीवेट स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस देन व्हाटएवर इंटेलिजेंस अदर इंटेलिजेंस इज इज डेवलप्ड डस मोर डैमेज देन गुड हाउ आर दे डिफरशिएटिंग ईक्यू फ्रॉम स्पिरिचुअलिटी मीनिंग नॉट जस्ट फीलिंग हाउ यू डिराइव मीनिंग तो स्पिरिचुअल कोशन बिकम लाइक द एपिसेंट ऑफ डेवलपिंग ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम स्पेशली द पर्सनल ट्रांसफेशन और ये गीता बिलिंग का जो प्रोग्राम भी था वो इसी फ्रेमवर्क में था कि वी विल वी विल डेवलप हाईएस्ट ऑर्डर ऑफ स्पिरिचुअल कैपेसिटी तो वो जो आप बात बोल रहे हैं जस्ट टू [नाक से की जाने वाली आवाज़] कनेक्ट सम डॉट्स दैट मेरे ज़हन में आ रहे हैं। तो आई फील लाइक कि स्पिरिचुअल कोशंट भी जब कॉर्पोरेट फ्रेमवर्क्स में डेवलप हो रहा है तो आई सी ओशो ओ या कहने का मतलब कि आपको एक पर्टिकुलर स्पिरिचुअल उसमें एज ए लेबर इतना ज्यादा इनवॉल्व कर दिया जाए कि आपकी दैट्स एक्सक्टली हाउ माय कॉन्फ्लिक्ट वि गीता बेलिन स्टार्टेड गीता बेलिन ने मुझसे दखाजे ने शुरू किए कि आप जो है प्रॉफेट मोहम्मद को जो है इस रूम में उनकी तवज्जोहात बुलाइए। जब ऐसे तहाजे मेरे साथ होने लगे तो तवज्जो बुलाइए मतलब मतलब लेट देम बी प्रेजेंट उनको कॉल देम विथ योर दुआ विथ योर यू नो नमाज एसेट्रा सेंट्रिसिज्म को इनवोक किया जा रहा है स्पिरिचुअलिटी के फ्रेमवर्क में और जो मिस्टिकल एलिमेंट्स है जो अस्यूम्ड है कि भ आप अपने ट्रेडिशन में उन मिस्टिकल एलिमेंट्स को इनवोक करें ताकि लोग ट्रांस में चले जाए और उस ट्रांस से वो जो महसूस हो उनके जो एहसासात हो तो उसमें उनको ये लगे कि भ इस पैराडाइम के विद इन हमारी ये चीज भी तो कृष्णा कॉन्शियसनेस में एलिमेंट बहुत हाईली डेवलप्ड हो अब्सोल्यूट तो एक तो वो था दूसरा उनका एक ट्रुथ मॉडल है। ट्रुथ स्केल बनाया हुआ है बाज और वो ट्रुथ स्केल में ऐसा है कि जो है इंसान को जितना करीब वो सच के होता है उतना उसके अंदर एक ताकत महसूस होती है। जितना सच से दूर रहता है वो उतना जो है वो कमजोर महसूस करता है। और इस बेसिस पे उन्होंने कुरान के कॉनशसनेस को कुछ एवरेज एक 250 का 1000 के स्केल के ऊपर उस 250 300 पे उन्होंने कुरान के कॉनशसनेस को निपट दिया और वो वो वो स्केल मुझे सिखाना चाहती थी और बाकी ट्रेडिशन को कितने पे रखा स्केल क्रिश्चियन ट्रेडिशन को उन्होंने 400 पे रखा बुद्धिज्म वगैरह को उन्होंने करीबन 700 800 रखा स्केल कितने का है 1000 का का स्केल 250 महीने [हंसी] सूफी वगैरह से मुलाकात भी नहीं हुई लगता है। असल वो इधर पढ़ते तो पता चलता वही पढ़ते वही मैं कह रहा हूं कि वो सूफी मेटाफिजिक से लगता है कि इंटरेक्शन ही नहीं हुआ। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक एक कहानी वो सुनाती थी उसमें। कि 15 दिन तक मैं लामका में थी। लामका लामका क्या है? ला मकान ला मकान मतलब जहां टाइम एक्सिस्ट नहीं करता अच्छा तो उन्होंने वो टाइमलेस एक्सपीरियंस लिया है तो वहां से वो जाग के आई थी तो ये हमको फना के बाद वो बका की स्टेज पे लीडरशिप ट्रेनिंग कर रही हां तो मुझे लगा कि ये बहुत ज्यादा तामझाम हो गया है और मुझे यहां से टू मच कमिटमेंट टू मच स्पिरिचुअल कमिटमेंट तो रुखसत ले लेनी चाहिए और दूसरी भी कुछ ऐसी चीजें हो रही थी वहां पर कि मुझे लगा कि अब मुझे फोकस करना चाहिए इस्लाम में लीडरशिप डेवलपमेंट पर सीरियसली क्योंकि स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस एस एस ए सेंटर ऑफ इंटेलिजेंस इटसेल्फ मेड अबब्सोल्यूट सेंस आईडिया फितरा और अपने लिटरेचर से अलाइन हो रहा था मतलब बिलकुल अलाइन हो रहा है जो सफर है खजू ने भी इसको है के एक जमाने में जो है जिस्मानी ताकत फोकस होती थी। फिर जो है वो दिमागी ताकत की तरफ आई। फिर वो जज्बाती ताकत की तरफ। फिर ये रूहानी ताकत। तो मतलब वो मादी ताकत से इसका सफर जो है वो रूहानियत की तरफ हुआ है। लेकिन फिर वो रूहानियत को खुदा से खाली देखना चाहते हैं। उस रूहानियत की जगह पर मगरब ने जैसे इंसान को रखा हिंदू ने जैसे इंसान को रखा ये भी जो है उस चक्कर में इंसान ही को वहां रखना चाहते। अच्छा [नाक से की जाने वाली आवाज़] मना क्योंकि आप यहां मौजूद हैं। तसवुर से आपका ताल्लुक है तो गीता जो खातून है वो या वो जो स्पिरिचुअल लीडर्स हैं मुख्तलिफ कम्युनिटीज जो बनाई गई उनमें जो स्पिरिचुअल इनवोकेशन है वो जो स्टेट ऑफ माइंड है वो अगर वह इनवोक करके क्वालिटी ऑफ लाइफ को बेहतर करना चाह भी रहे हैं और तसव्वुफ में भी वही हो रहा है। बजाहिर क्लेम पे बात कर रहा हूं मैं। तो प्रॉब्लम क्या है और डिफरेंस क्या है? मैं क्यों मुतासिर ना हूं या मैं क्यों मुतासिर होके उसमें मुतमई नहीं हो पाता। उसके कुछ अगर मरहले हैं उसके कुछ अगर जितने भी गैर इस्लामी तसवुफ है उसको तसवु कहते हैं उसको इराक कहते इराक उसका मतलब तसवुफ कहते हैं इराक इसको आप थोड़ा सा व्यूअर्स के लिए भी बहुत पर्टिकुलर वो फनी चीज है इसको व्यूअर्स में इस तरह नहीं जाना चाहिए लेकिन बता देता हूं शराब में क्या हो रहा है कि आप अपनी जजीबिल्त के मुख्तलिफ तकाजे हैं। उसको आप सप्रेस करते हैं। मैं उन तकाजों को दबाते इसको कुचल देना। मेरे हिंदूज़्म में भी है कि मैं ये खाऊंगा नहीं, मैं पूंगा नहीं। ऐसा मैं वैसा जो बुद्धिज्म में, जैनिज्म में मेरे नफ्स को जो चीजें अच्छी लगती है मैं उसको अनकंडीशनल छोड़ देता हूं। कि वो छोड़ने ही की है। वो माया है। जब तक आप माया को छोड़ोगे नहीं तब तक आपका जो रूहानी वजूद है वो ताकतवर होता नहीं। ये फ्रेम है उसका। अच्छा वेस्टर्न स्पिरिचुअलिज्म में भी इसी तरह की चीजें आई है। अब जो लेटर डेवलपमेंट्स है कि भाई पूरा वीगन हो जाओ पूरा ये हो जाओ। मतलब अंदर ही जाएंगे। जब भी जाएंगे पोस्ट मॉडर्निटी से वही का रास्ता खुलता है। हां जब जब भी जाएंगे इंसान अपनी अनदेखी ताकतों का इस्तेमाल करना चाहेगा तो वो अगर खुदा की तरफ नहीं जाएगा तो वो इंसान की तरफ ही आएगा। इसलिए कि इंसान में भी तो अल्लाह ने बहुत सारी ताकत रख जी वो ऐसा नहीं है कि वो खलीफा है तो खलीफा है तो उसके अंदर कोई क्वालिटी है तो वो खलीफा है। तो उस एक और चीज आपके बात में ऐड करना चाह रहा हूं। क्योंकि उसका साद हुआ मेरा उससे एक और इनका दावा है कि ये एक ऐसे मकाम पे जाते आते रहते हैं वो आसमानी सफर की बात पर चौथे आसमान पांचवे आसमान पे हम जाते अभी पोडकास्ट पे अच्छा मैं सुबह से गया तो और वहां पे वहां पे इनको उनको जो है इंसानियत के लिए जो है खुसूसी जिम्मेदारियां दी जाती है। वो खुसूसी जिम्मेदारियां लेके आते हैं लौट के आते हैं। वो मेडिटेशन में जब मतलब घंटों बैठे रहते हैं वो वहां पे जाते हैं और वहां पे जो है पूरा एक कॉन्फ्रेंसेस भी होती है और ये होता है वो होता है और वो वहां पे से जिम्मेदारी ले आते हैं और उनको नाम तुम्हारा नाम भी दिया गया था मेरे को और इसीलिए मैंने तुमको चुन के बुलाया था। तो इसमें होता ये है अगर आप थोड़ा सा भी जो है बहके हुए हैं तो फिर या तो आप मुकिल हो जाए आप ही मुझे बचा सकते हैं। एक और चीज वो करते हैं कि वो अपने आप को सामने रखते हैं। अल्लाह अल्लाह आपके बस का नहीं है। हां वो ये बोलते हैं ना कि जरिया है। जरिया मैं हूं और मैं तुम्हारी बात पहुंचा दूंगा। तो उससे ऑलरेडी आपका जो स्पिरिचुअल एक्सपीरियंस है वो उस ह्यूमन कंडीशन में बाउंड हो जाता है। जो आपने बोला ना खलीफा में भी उसको गैर मामूली ताकत दे रखी है अल्लाह ने भाई मैं उससे दिमाग जो लोग दिमाग की लाइन का इल्म हासिल करते हैं वो लोग इसकी बेहतर तरीके से तौजीची कर पाएंगे जो जज्बात पर काम कर रहे हैं तो उसकी जज्बात में क्या तकलीफ अभी हम लोग मैकजी ने आपको एकजेक्टली क्या दिया और उससे जो मिसिंग था वो क्या था और उस जर्नी में आपने क्या पाया कुरान से बाकी सारी चीजों से जिससे से यू यू बिल्ड एन अल्टरनेटिव फ्रेमवर्क जो आप अपने जो फेलोशिप प्रोग्राम्स है अब उस पे आते हैं कि व्हाट इज प्रोग्राम पे आइए प्रोग्राम्स पे आते हैं तीनों प्रोग्राम पे आइए तो अराउंड 2015 ऑनवर्ड्स मेथिजी काकि जो है ओरिएंटेशन था दैट वास कास्टेंटली रिटर्निंग टू स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस दैट बिकम [हंसी] फॉर मी अ सिग्निफिकेंट मोटिवेशन टू कि मैं अपने जड़े जो है खोद कर देखो कि वहां पे कंक्रीट विडम क्या है? हिकमा क्या है जो मैं जो है लेके कॉन्फिडेंटली अमंग माय पियर्स बात कर सकूं तो वो मेरी एक जुस्तजू बनने लगी 2015 से और अल्हम्दुलिल्लाह रब आलम मतलब पहली फॉर एक्स वन द फर्स्ट थिंग्स टू हेट मी सूर रात की वो आयत है ना के हम तुम्हारे हम की हालत नहीं समझेंगे जब तक तुम उसको ना बदलो जो तुम्हारे दिलों में है दिल में क्या है तुम्हारी नफ्स है तुम्हारी नसियात है तुम्हारी चाहते हैं तुम्हारी ख्वाहिश तुम्हारी दुश्मन है तुम्हारी मोहब्बत तो जब तक तुम इसको इवैलुएट नहीं कर लोगे और इसमें जो है कचरा हटा के तुम इसको साफ नहीं कर लोगे तो तुम्हारे हालात नहीं बदलेंगे इट मेक्स अब्सोल्यूट लॉजिकल सेंस जो हम लोग मैकजी में कर रहे है वही कर रहे है मतलब लिटरली वही कर रहे है की आप जो है फोकस्ड हो जाइए टवर्ड्स योर गोल्स इंटरफेरेंसेस को जो है ओवरकम कर लीजिए जो आपकी लिमिटेशंस है लिमिटिंग बिलीव्स है उनको ओवरकम कर लीजिए मतलब साइकोलजिकली स्पीकिंग जितनी हम बात कर रहे हैं वो एक्चुअली नफ्सियात पर बात कर रहे है एंड नफसियात का एक बहुत जबरदस्त गहरा जो है बॉडी ऑफ नॉलेज एकिस्ट करता है वििन आवर लीनिए ट्रेडिशन इमामली रहमतुल्लाह रहमतुल्लाह तो ये इन पर जो है पूरी तरीके से मेरी तवज्जो जब आने लगी मेरे खुद कल पे जो है इसका इतना गहरा असर पड़ने लगा और मुझे साफ दिखने लगा कि मेरी नाकामिया क्या है फॉर एक्स आई फाइंड इट डिफिकल्ट टू कंसीव स्मॉल आई एम जस्ट एडमिटिंग टू समथिंग मैं सोचने लगता हूं तो वो बड़ा ही पैदा होता है आई जस्ट थिंकिंग बाय डिफॉल्ट वो मेरा टेट है मैथिंकर है हां मैथि मतलब ऑटोमेटिकली मुझे इकोसिस्टम नजर आने लग जाता तो अब मुझे ये करना चाहिए था कि देख तो मैं माइक्रो सिस्टम हूं लेकिन जो जमीन पर खड़ा हो सकता है वो माइक्रो ही खड़ा हो सकता है। राइट? तो लेकिन मेरी ये जुस्तजू होती थी कि मैं किसी तरह से अपने विल से जो है मैक खड़ा कर लूं। ये मेरी एक कमजोरी थी। जब ये नुकसानात हुए और जो भी हालात जिंदगी के बनते हैं इंसान उन पर अगर गौर करता है कि अल्लाह ताला ने इसमें मेरे लिए क्या जो है सबक रखी है रखे हैं कि मेरे इसमें जो है इस्लाह हो जाए तो ये मुझे नजर आने लगा कि दुनिया बनाना जिसको मैंने अपनी जिम्मेदारी बना ली थी वो एक्चुअली मेरी जिम्मेदारी है नहीं मेरा बनना मेरी जिम्मेदारी है और दुनिया बनाने की मेहनत मेरे बनने के लिए दुनिया बनाने का आउटकम देखने की जिद कोई बहुत ज्यादा मुफीद जिद नहीं है बल्कि इरशनल एंड पागलपन है क्योंकि जो इंसान मतलब कोई भी हो ट्रंप हो फॉर एक्स या पूरे मुल्कों के प्राइम मिनिस्टर और प्रेसिडेंट्स एक प्रेसिडेंशियल कमेट बना ले या प्राइम मिनिस्टरियल कमेट बना ले और बैठ जाए दे स्टिल डू नॉट कंट्रोल द यूनिवर्स और इट्स फंक्शन एंड सो वेदर यू वांट टू डू गुड जैसे सोशल गुड को लेके इतने मतलब एक्टिविस्ट बहुत स्ट्रांग ओपिनियंस के साथ फीलिंग्स के साथ और अपनी जान पूरी देकर काम करते हैं टू सी दैट सोशल गुड बीइंग क्रिएटेड और फिर बहुत ज्यादा डिसपॉइंटेड भी हो जाते हैं कि मतलब दुनिया तंग मतलब दुनिया छोटी पड़ जाती है। लोग उनको धोखा देते हैं। लोग उनका साथ दे नहीं पाते हैं। और फिर उसको लेके वो एक कहानी बन जाती है कि यू नो ह्यूमैनिटी डस नॉट डिर्व मी वाली कहानी पैदा होती है वहां से अ जो कि मतलब अपने आप में इतनी फुलिश कहानी है बिकॉज़ यू आर वर्किंग अगेंस्ट द फंडामेंटल प्रिंसिपल्स ऑफ लाइफ एंड इट्स ऑर्गेनाइजेशन द फंडामेंटल प्रिंसिपल ऑफ ऑफ लाइफ इज योर बिकमिंग आप बन जाते हैं तो फिर आपकी खुशबू तो पूरे समाज में फैलेगी ना कैसे कोई उसको मिटा देगा या कैसे उसको कोई मतलब छुपा देगा आपकी खुशबू छुप नहीं सकती अगर आप बन रहे हैं तो उससे जो फायदा दुनिया को होगा वो होके ही रहेगा लेकिन अल्लाह विल डिप्लॉय यू विल नॉट डिप्लॉय योरसेल्फ बाय योर ओन फ्री विल एंड यू नो क्रिएट समथिंग हजरत उमर फारक र फॉर एक्स बियरलेस एक्स ऑफ़ लीडरशिप अगर खुद वो खलीफा बनने के लिए अपने आप को बनाते बताओ मतलब क्या होता उमर फारूक र दिस वास ट्रस्ट अपॉन ही वास इंटरेस्टेड एंड एनी सेम पर्सन विल नॉट बी इंटरेस्टेड किसको चाहिए भाई पूछ अकाउंटेबिलिटी अपनी देना मुश्किल है पूरी समाज की अकाउंटेबिलिटी दे लो यानी कि अगर कोई शराबी बन रहा है तो मेरी अकाउंटेबिलिटी है कोई गधे के पैर में जो है कांटा चुभ रहा है मेरी अकाउंटेबिलिटी हजरत उमर फारूक र अल्लाह वास ह एंग्जायटी वास अनपल मतलब रोड पे किसी जानवर के पैर में अगर कांटा चुब जाएगा तो उमर अल्लाह को क्या जवाब देगा इस ह एंजाइटटी एंड ट्रूली दैट इज द ओनली फॉर्म ऑफ लीडरशिप दैट इस बोर्न ऑफ इस्लाम अगर आपकी ये ए्जायटी नहीं है तो फिर आप आपकी नफ्स के जो है तकाजों को पूरा कर रहे हैं और लीडरशिप को आप एक्सप्लइट कर रहे हैं। यानी कि लोग जो आपकी जिम्मेदारी में है द होल कासेप्ट ऑफ ट्रस्टीशिप ऑफ अमानत ये अमानत है। मेरी जिस्म अमानत है। जिंदगी अमानत है, वक्त अमानत है, माल अमानत है। क्या है जो आपका है? अच्छा लीडर बनता है या बनाया जाता है? जैसे बहुत सारे लीडरशिप प्रोग्राम्स के बारे में जब ये होता है तो आर यू बोर्न अ लीडर और आर यू मेड अ लीडर? देखिए लीडरशिप का तसवुर भी बहुत ज्यादा एमावरिश्ड है। जितनी हमारी पावर्टी हम मैन्युफैक्चर कर रहे हैं ना, इट इज अ इट इज अ फंक्शन ऑफ द पावर्टी ऑफ अंडरस्टैंडिंग लीडरशिप इटसेल्फ। लीडरशिप हम इक्वेट करते हैं ओदे से हां गद्दी से लीडरशिप होती है नतीजे से खैर से नफे से मन से फायदा पहुंचा तो आप इसको पूरा टोटली जो है मिसअंडरस्टैंड कर चुके हैं और आपकी भूख दौड़ सारी जो है वो गद्दी है तो फिर जो रास्ते में आएगा रौंदा जाएगा मतलब आसानी से उसको यू समझिए कि लीडरशिप नाम है देने का हम वो लेने की जब बन जाएगी तो क्या होगा हम लुटाने का लेने की बन जाएगी तो वो होगा जो अभी दुनिया जिस हाल में है तो देगा किसको जिसको दे रहा है वो मर रहा है मतलब जिसको देने का है लीडर किसके हो आप आप हिंदुस्तानी हो गए हो अब वो हिंदुस्तानी तो मर रहा है और आप आपके लोग और आपके साथी वो ग्रो कर रहे हैं तो ये पूरा इनवर्टेड जो जो अंडरस्टैंडिंग है वो समझ में आ जाएगी तो फिर मैं मतलब कैसे मैं अपने आप को कहीं और खर्च करता और एक तरफ तो मेरा दीन मुझसे ये कह रहा है कि तू ऐसा बन जा अब और एक तरफ ये उम्मत जिसके जिसकी ये दौलत है जिसकी ये विरासत है और हम यार मतलब देख रहे हैं कि कोई आके हमारा कुछ भला कर जाए तो ये जो आपकी चर्निंग चल रही है ये चर्निंग एक पर्टिकुलर कॉन्टेक्स्ट में चल रही है 2011 11 12 13 अब 14 भी हो चुका है। 14 के बाद एक तरह का माहौल एक तरह की नई एंजायटी जो पूरी कम्युनिटी ने फेस करनी शुरू करी उस कॉन्टेक्स्ट में आप अभी भी मैकजी में हैं और मैकजी आप छोड़ने वाले हैं। हां वहां उस वक्त उस वक्त में हैं और उसके बीच में फिर आप ये जो फेलोशिप्स डिजाइन कर रहे हैं प्रोग्राम्स बना रहे हैं तो वो क्या थी पहली फेलोशिप और वो किस तरह से कंसीव की गई? 2017 के आते-आते अब मेरे लिए ये ये क्लियर हो गया था कि मुझे मुसलमानों में गहरा उतर के काम करना चाहिए क्योंकि हमारा हमारा जो ओशन ऑफ नॉलेज है बहुत गहरा है तो उसमें मुझे जो बनने का मौका मिलेगा वो कहीं और नहीं मैं मैकजी में वो नहीं बन पाऊंगा जो [गला साफ़ करने की आवाज़] कुरान में डूब के बन पाएगा तो पहला मेरे लिए तो ये क्लियर हो द यूनिवर्स फॉर मैकजी और सेुलर लिबरल इज स्मॉलर देन द यूनिवर्स जो कुरान जिसका जिसको पेश कर रहा है जिन पोटेंशिटी को सामने रख रहा हूं जिस जैसा इंसान मैं [गला साफ़ करने की आवाज़] अपने आप को बना सकता हूं मुसलमान बनकर वो मैं मैकजी में रह के नहीं बन सकता और वो मैकजी मतलब कुछ नहीं है कुछ नहीं जेनुइनली मतलब एंड आई लव मैकिजी फॉर देर फॉर देर देरेंस टू वैल्यूस फॉर देर कमिटमेंट टू डेवलपिंग इंटेलिजेंस ग्रोइंग नॉलेज एंड अपाइंग इट इन सर्विस ऑफ ह्यूमैनिटी ये सारी चीजें मैं मैकजी की बहुत पसंद करता हूं बट जो उनका सोर्स ऑफ नॉलेज है वो बहुत कम बहुत छोटा बहुत तंग है वो मतलब एक एक बाल्टी से जो है वो निकाल के इतना जहां बना रहे हैं तो मैं अगर समंदर से निकालू और दरिया से निकालू तो क्या नहीं जहां बन सकता ये मेरे सामने आ गया तो वहां से वहां पर मेरे लिए मैकजी के बाहर आना वास नेसेसरी आउटकम मतलब अदरवाइज नॉट बी ट्रू टू मसेल्फ और जब अगर मैं बाहर आ रहा हूं और उम्मत में मुझे काम करना है एक चीज बहुत क्लियर हो गई थी मेरे लिए के [नाक से की जाने वाली आवाज़] जब जो है कोर ट्रांसफॉर्मेशन के जो सोर्सेस है वो हमारे प्राइमरी सोर्सेस है कुरान है हदीस है आप स्ला वसल्लम की सीरत है और फिर उसके बाद में अगर आप देख तो अकाबरीन है सबा इकराम की जो हैिंदगियां वो सारी हमारे पास जो है अल्हम्दुलिल्लाह रब आलमीन तो अगर ये हमारा कंटेंट है जिससे हम ट्रांसफॉर्मेशन जिससे हम ह्यूमैनिटी को रिकंसीव करें अपनी खुद की ह्यूमैनिटी को रिबिल्ड करें और फेलो ह्यूमैनिटी से इंटीग्रेट करें और उनको सर्व करें ये अगर हमको करना है तो देन नेसेसरीली ओलेमा आर द फर्स्ट अमोंग द फर्स्ट इन लाइन फॉर ट्रांसफॉर्मेशन और ये जो मैकजीस की खास बात ये है कि वो नॉलेज को जिस तरह से कोडिफाई करते हैं ट्रांसफॉर्मेशनल फ्रेमवक्स में वो बहुत आसान कर देते हैं इंसान के लिए सेल्फ रियलाइज करना हमारे पास जो कल्चर है तालीम को शेयर करने का वो है बयान देना हम हम जो है मस्जिदों में बयान करते हैं। गैदरिंग्स में बयान होता है। कुरान का बयान होता है। दर्ज भी होता है तो वो बयान ही रहता है। अगर हम तफसीर भी दे रहे होते हैं तो वो बयान की शक्ल होती है। एक एक शक्ल ये हुआ था ये हुआ था ये हुआ था। अल्लाह ने ये कहा अल्लाह ने ये कहा अल्लाह ने ये कहा। अल्हम्दुलिल्लाह रब आलमीन जानना जरूरी है कि अल्लाह ने क्या कहा और जितना अच्छा कोई समझा दे बहुत अच्छी बात है लेकिन अगर आप मुझे एक एक्सपीरियंस के जरिए से जो है आप मुझे मौका दे गुजरने का और मैं खुद उस आयत को महसूस कर लूं उसके मफूम को मैं महसूस कर लूं वो जो देखना होगा मेरा उस आयत के मतलब वो आयत मेरे लिए एक लेंस बन जाएगी उस लेंस से जब मैं मैं दुनिया को देख लेता हूं या अपने आपको देख लेता हूं। तो जो हकीकत मुझ पर खुलेगी फिर मेरे लिए मुश्किल हो जाता है उस हकीकत से छुपना। तो जो मैं फिर इरादा करता हूं बनने का या तदीली का वो मेरे अपने देखने के नतीजे से ये जो उनकी स्पेशलाइजेशन है अल्लाह ताला ने मुझे लगता है मुझे 2011 से ले 2018 तक जो मैं रहा हूं मैंजी में ये सीखने के लिए अल्लाह ने मुझे वहां पर भेजा। और जब वो मेरा मतलब उतना मेरा काम हो गया कि मैं वो सीख चुका था। अब मेरी ये जिम्मेदारी थी कि अब मैं उस दौलत को लाके वहां पे पेर देता जहां पे एक्चुअली सोर्स ऑफ नॉलेज है। जो कुरान है, हदीस है, सीरत है। तो अगर अगर अब इस मेथड के साथ इस कंटेंट को जोड़ के काम करना है। ये मेथड है। ये कंटेंट है। आप इस मेथड में ये कंटेंट को डाल दीजिए। अजीम ताकत पैदा होगी। तो अब कहां से शुरू करे सिवाय उलमा के और किससे शुरू कर किया जा सकता है उलमा की ये जिम्मेदारी है कि वो इस तरीके की चीजों को सीखे और सीख के खुद बने और बनाने वाले बने तो वहां पे अमन फेलोशिप पैदा होती है हमारे लिए और जो हमारा इमामत का तसवुर भी है उसको भी बहुत हम लोगों ने मतलब इतना महदूद कर दिया है कि कोई मतलब खाली सिर्फ मस्जिद में जो है नमाजों की इमामत के सिवा और क्या इमामत रहती है बाकी उलमा इसलिए क्योंकि कि जो अगर नेटवर्क देखा जाए अह मुस्लिम इस्लामिक सोसाइटी का तो अगर एक कंसिस्टेंट मौजूदगी अक्रॉस द मोहल्ला अक्रॉस द रीजन कोई एक है और उसका जो सोर्स है वो कुरान और सुन्नत है तो बाकी मतलब किसी मोहल्ले में हो सकता है डॉक्टर हो इंजीनियर ना हो किसी में वो हो तो वो जो एक यूनिफाइंग जो एलिमेंट है उसकी जो ट्रेनिंग है वो भी उस ट्रेडिशन में जिस ट्रेडिशन को वो रिप्रेजेंट कर रहा तो कोई और उस लेवल के पेनिट्रेशन को ट्रांसफॉर्मेशन को वैसे भी कैंडिडेट नहीं बन सकता। जी बिल्कुल और उसके पास जो इल्म है वो [नाक से की जाने वाली आवाज़] बस सनद मुसिल है हम कि उसने जो वक्त गुजारा है या जो तालीमात हासिल की है उसका एक रेफरेंस है एक के पीछे एक एक के पीछे एक एक के पीछे वो असातीजा से होता हुआ जो आया है उसका [गला साफ़ करने की आवाज़] एक चैन है उस चैन के मुताबिक उसने उसको हासिल किया हुआ है तो वो निस्बत भी बहुत ताकतवर है। जो हदीस हम पढ़ रहे हैं तो हमारी हदीस जो हमने सुनी है अपने उस्ताद से तो उस उस्ताद उस्ताद की सनद हमको मालूम है कि उसने किससे पढ़ा, उसने किससे पढ़ा, उसने किसने पढ़ा। उससे उसने हुजूर अकरम सल्लल्लाहु अलह वसल्लम तक उस रिवायत का पूरा सिलसिला है। तो ये चैन बहुत बड़ा रोल अदा करता है। एक ये है कि नॉलेज आपने यहां से जमा कर लिया, वहां से जमा कर लिया, वहां से जमा किया। और एक है कि बाकायदा आपने उसको किसी उस्ताद से हासिल किया है। तो यह एक स्ट्रेंथ है, एक ताकत है। और उस ताकत को और ज्यादा तब हम ताकतवर बना सकते हैं जब उसको इंटरप्रिट करने के लिए या उसको हम इस्तेमाल करने के लिए वो तरीके अपनाए जो लोगों के लिए ज्यादा आसान और मुफीद बनता है। अच्छा मौलाना ये तो स्ट्रेंथ बताई आपने। वीकनेस क्या है? क्यों इनको जहां पर ऑलरेडी मदारिस एस एन इंस्टीट्यूशन एक्सिस्ट करता है जिसका काम ही यह है कि प्रोफेटिक लीडरशिप के ट्रांस सीरत जब आपको पढ़ाई जा रही है आपको वो वाकयात वाक्यात बता बयान किए जा रहे हैं और उससे आपको बताया जा रहा है ये क्यों ये क्यों ये क्यों लिया गया डिसीजन तो कहीं ना कहीं उसमें एक लेवल ऑफ लीडरशिप कल्टीवेशन का एक प्रोग्राम एंबेडेड है। उसमें लैकिंग क्या है? लैकिंग जो है वो उनको पढ़ा तो दिया जा रहा है। कुरान पढ़ा दिया, हदीस पढ़ा दिया और भी दूसरे उलूम फका पढ़ा दिया, उसूल फिकता पढ़ा दिया। लेकिन इसको आप ले जाकर के प्रोजेक्ट में कैसे कन्वर्ट करेंगे? किन-किन फॉर्म्स में ले जाकर के इसको इस्तेमाल करेंगे जिससे ये इल्म जो है अपनी तब्दीली के साथ लोगों की तब्दीली का भी सबब बनेगा। मुजीब भाई ने भी उसकी तरफ इशारा किया कि भाई ये एक मेथड है। एक तरीका है। इस तरीके से हम चीजों को डिकोड कर रहे हैं। खोल के देख रहे हैं। हत्ता कि वो हमारा तजुर्बा बन जा रहा है। और जिस चीज को इल्म के बाद हम तजुर्ब में ले लेते हैं तो फिर वो हमारे यकीन में तब्दील हो जाता है और उसके खिलाफ जीना मुश्किल हो जाता है। तो अब वो उलमा जो इल्म हासिल कर रहे हैं वो एक कंटेंट है। लेकिन उस कंटेंट को प्रेजेंट करने के लिए कितने फॉर्म्स हैं? असल में वो मोलिम है। पूरे मुशरे का मोल्लिम है। आलिम मोल्लिम है। चाहे वो इमामत पर हो, चाहे मकतब में हो या चाहे मदरसे में हो, चाहे जहां भी हो उसकी ये हैसियत कि वो पूरे समाज का मोहल्लिम है। ये बाय डिफॉल्ट तय है। उम्मत इसमें इत्तेफाक रखती है। लेकिन उस मुल्लिम को ये पता होना कि भाई इस लेवल के आदमी के साथ इस कंटेंट को किस तरह शेयर करेंगे। इस लेवल के आदमी के साथ इस कंटेंट को किस तरह शेयर करेंगे। उसकी जहनी सतह को सामने रख के इसको कैसे उस मकाम पर उतार करके ले जाएंगे कि वो उसका यकीन बने, उसका तजुर्बा बने और वो उसकी जिंदगी में तब्दील का बायस बने। वो टेक्निकिटी जिसको कहते हैं या जो तरबियत कहते हैं वो तरबियत वहां नहीं। इसलिए इमाम है तो उसके मन में बहुत है उम्मत के लिए करने का। ऐसा नहीं है कि वो सोया हुआ है। लेकिन वो देखता है कि मैं बेबस हूं। कि मैं कैसे नेटवर्किंग करूं। मैं कैसे ताल्लुकात बना कम्युनिकेशन मैं किस तरह करूं लोगों की जो पोटेंशियल है उन पोटेंशियल का यूज करने के लिए मैं क्या प्रोग्रामिंग बनाऊं किस तरह से करूं तो उसके पास वो आईडियाज नहीं होने की वजह से बेचारा फिर वो उतनी ही एरिया के अंदर अपने आप को सीमित कर लेता है अब जिन लोगों को ये मौके मिल जाते हैं कहीं पर अगर एक आदमी भी ऐसा मौका पा लेता है तो फिर वो एक बहुत बड़े समाज पर असर अंदाज होता है। तो यह मुजीब भाई जो अमन फेलोशिप है जो मौलाना ने बातें बताई इन गैप्स को आप एक प्रोग्राम के तहत एक्चुअली कैसे बिल्ड करते हैं? कैसे उस लीडरशिप को उलमा में कल्टीवेट करते हैं कि वो एक्शन ओरिएंटेड बने। ऑफ कोर्स एक एक्शन तो हो ही रहा है कि जिसको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते कि किसी भी कम्युनिटी की एक मोरल इकॉनमी होती है। उस मोरालिटी को बरकरार रखना उसके उसूलों को कायम रखना उससे लोगों को जोड़ वो तो वो कर ही रहा है। उसमें तो कोई डिनाइयल नहीं है। लेकिन उसके अलावा बहुत सारी जो एक्टिविटीज उस जगह से हो सकती थी एक होता है मोरल इकॉनमी को समझना और उसको बनाए रखना। हम ठीक है? लेकिन मोरल इकॉनमी को इंटेग्रल टू लाइफ समझना और खुद उस तरह से बरतना और दूसरों को उस तरह से बरतने की दावत देना ये गैप तो जो मैकिंजी मतलब मैकजी मजबूर हो रहा है इस बात को जो है एक्सेप्ट करने के लिए कि एक रूहानी ताकत है या रूहानी इंटेलिजेंस है व्हिच इज द सोर्स ऑफ़ गुडनेस हम और अगर अगर उसको जो है इनेबल कर दिया जाएगा तो देन नेसेसरीली ह्यूमन गुडनेस विल विल मल्टीप्लाई इटसेल्फ इन सो मेनी वेज़ क्रिएटिंग प्रॉफिट्स इज अ बाय डिफॉल्ट आउटकम हालांकि देखिए उनका मकसद बहुत रेडिकली क्लियर [गला साफ़ करने की आवाज़] है कि हमको पैसा चाहिए x शुड बिकम 3x राइट जो फर्म एक्स को 3x बिल्कुल क्लियर कट फोकस के साथ काम करती है वो इस इस इस बात पर मजबूर हो रही है कि एक्स को 3x बनाने का सबसे आसान तरीका है अनलीच ह्यूमन गुडनेस। व्हेन ह्यूमन गुडनेस इज़ अनलीस्ट नेसेसरीली गुडनेस मल्टीप्लाई एंड वन फॉर्म ऑफ़ गुडनेस इस वेल प्रॉफिट। अनदर फॉर्म ऑफ़ गुडनेस विल बी इनोवेशन क्रिएटिविटी ट्रांसफॉर्मेशन इन टर्म्स ऑफ़ क्वालिटी। बहुत सारी चीजें होने लगती है। व्हेन गुडनेस इज़ अनलीच। ये मैकजी देख रही है। ठीक है? उस उसी को आप सीधे से मतलब फरी वापस सूर रात की उस आयत पे ले आइए कि हम आपके हालात नहीं बदलेंगे जब तक आप अपने दिल में वो जो है उसको ना बदल लो और हमारे दिल में क्या है सिवाय ईमान के और क्या होना चाहिए तस्की का प्रोग्राम है हां तजिय का प्रोग्राम है कि जो आपके पास आपकी रुकावटें हैं उन रुकावटों को दूर कीजिए आपका इफा इफा जो खुद ब खुद बढ़ जाएगा क्या-क्या पढ़ाते हैं कैसे कैसे करते तो सोर्स स्पिरिचुअल इंटेलिजेंस एसेंशियली हाउ डू यू कनेक्ट वि अल्लाह व्हाट इज योर रिलेशनशिप वि अल्लाह हाउ डू यू अंडरस्टैंड अल्लाह हाउ डू यू अंडरस्टैंड योरसेल्फ एंड हाउ डू यू रिोल्व द क्वेश्चन ऑफ इबादा एंड उबूदिया फॉर योरसेल्फ या तो पहले आपको इस पर तवज्जो दिलाते है हम दूसरा हम ये करते हैं क्योंकि आप इमामत के ऑफिस के लिए बनाए गए हैं तो इमामत के बहुत सारे जिम्मेदारियां होते हैं। लोगों को ले काम करना, कम्युनिकेशन आपको सीखना होगा। प्रॉब्लम सॉल्विंग आपको आनी चाहिए। आपको लोगों के के पास से डेटा कलेक्शन, डेटा एनालिसिस की आप में सलाहियत होनी चाहिए। आप अगर कोई प्रोजेक्ट को जरूरी समझते हैं तो आप उसको प्रोजेक्ट को कंसीव करना, उसको प्लान करना, उसको ऑर्गेनाइज करना, प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की आप में जो है सलाहियत रहना, ये सारी चीजें आपको जो है सिखानी पड़ती है लोगों को मोबिलाइज करना। अच्छा ये पूरा आप सडनली यू आर नाउ बिगनिंग टू बिल्ड अ टीम एंड एन ऑर्गेनाइजेशन योरसेल्फ। तो टीम बनाना लोगों को डेवलप करना लोगों को उन जिम्मेदारियों मतलब लोगों को इस तरह से पढ़ना कि उनकी क्या सलाहियत है और वो एकजेक्टली कहां पे जो है बहुत अच्छे से जो है किरदार अपना अदा कर सकते हैं। उनको वो जिम्मेदारियां देना। इस तरीके से उस इलाके के पूरे मसलों पर जो है आपकी नजर रहे ताकि वहां पे खैर पैदा कर सके आप और वहां पे आप जो है ईमान की कैफियत को क्योंकि आप खुद ये जान गए हैं कि आप जो दीन सिखाने के लिए आए हैं दैट इज नॉट दीन वर्सेस दुनिया या दीन का एक पैरेलल ट्रैक है एंड दुनिया का दूसरा ट्रैक है। पूरी दुनिया जो है वो दीन है। तो उस तरह से आप भी जिएंगे। उसी तरह से आप लोगों को जीना सिखाएंगे। तो एक मिसाली जो है कौम फिर बनेगी ओवर टाइम क्योंकि आप खुद भी वैसे बन रहे हो तो दिस इज द कोर ऑब्जेक्टिव ऑफ ह्यूमन फेलोशिप तो अगर एक्टिविटीज में आप जैसे प्रोग्राम कितने टाइम का होता है किस तरह की ऑडियंस ये ये जो है जिस तरीके से हम लोगों ने इसको डिजाइन किया तीन साल का प्रोग्राम है और ये तीन साल के आउटकम में हम जो देखना चाहते हैं के दे शुड हैव डेवलप कैपेसिटी ऑफ एटलीस्ट अनदर 100 पीपल वििन देर लोकल कम्युनिटी एंड देर प्रेजेंस इन द कम्युनिटी शुड बिकम इरिलेव यानी की उनकी इमामत अगर ना भी हो तो वहां पर ह अदर इमाम्स जो है बन चुके हो ओवर पीरियड थ्री इयर्स जिसमें ये सारी सलाहियत हो यानी कम्युनिकेशन की सलाहियत हो प्रोजेक्ट मैनेजमेंट की सलाहियत हो ग से इंगेज करने की सलाहियते हो गवर्नमेंट को कंट्रीब्यूट करने की सलाहियत हो लोगों को जोड़ने की सलाहियत हो पीस बिल्डिंग करने की सलाहियत हो आज के जमाने में डॉक्यूमेंटेशन की सलाहियत सिस्टम बिल्डिंग की सलाहियत हो ये सारी सलाहियत सिर्फ उनमे ना हो बल्कि वो जो जितनी सलाहियत उनको दी जा रही है वो अपने इलाके में दूसरों में मुंतकिल करते रहे हो इस तरह से इन थ्री ईयर टाइम फ्रेम दे कैन कंक्लूड देर फेलोशिप। अब एक तरीके के इस्लामिक सिविल सर्वेंट्स बना रहे हैं जो जिनको मैक और माइक्रो रिक्वायरमेंट्स ऑफ अ लोकालिटी को इवैलुएट करना समझना रीड करना मैप करना उसको प्रायोरिटाइज करना उसके लिए रिसोर्स आइडेंटिफिकेशन ह्यूमन रिसोर्स आइडेंटिफिकेशन उसके लिए पूरा रोड मैप तैयार करना स्टेजेस तैयार करना तो वो ट्रेन भी और ट्रेन करना और उस सब के प्रोसेस में खुद भी आपकी एक ऐसी मेथोडोलॉजी इवॉल्व होना कि आप चीजों को पढ़े, समझे, इंटक्ट करें, नेटवर्क करें। इसमें खास बात क्या है कि यह काम आपको करना है लेकिन यह काम आप अपने बनने के लिए कर रहे हैं। रिटर्न में जो आपको मिलना मिलना है वो अपनी शख्सियत बननी चाहिए। यह सिर्फ वास्ता है। यह काम जितने हो रहे हैं, यह सब वास्ते हैं। यह मकसूद नहीं है। मकसूद ये है कि इन कामों के करते करते आप खुदा के अंदर जाते। आप खुदा के बंदे बन जाते। और जब आप खुदा के बंदे बन जाते हैं तो आपके नीचे के लोग भी उतने ही खुदा को जानने वाले और खुदा की बंदगी के लिए तैयार होने चाहिए। सिर्फ काम करने वाले पैदा करना मकसूद नहीं। वो काम करने वाले अपने शोबे में खुदा का बंदा बनके काम करने वाले पैदा हो। इसी बात को और आपकी पुरानी बात को कनेक्ट अगर मैं करना चाहूं तो मैकजी गुडनेस की बात करता है। लेकिन उसका जो तसवुर है गुडनेस का उसमें ये तो है कि आपकी जो जो वर्किंग क्लास है वो गुडनेस को एक तरह से कंसीव और कंसेप्चुअलाइज करे। लेकिन जो ऑर्गेनाइजेशन है वो अगर 3x कर भी रही है वो 3 एक्स डिस्ट्रीब्यूट कैसे हो रहा है? उसका वो मुशारका है, मुदार है, उसका लेबर और कैपिटल का कॉन्ट्रैक्ट क्या है? तो इस्लाम में सिर्फ यह नहीं है कि भ आप गुडनेस बट गुडनेस फॉर व्हाट पर्पस और उसके भी ऑर्गेनाइजिंग प्रिंसिपल्स हैं। वो जो रिलेशनल जिसे कहते हैं मैट्रिक्स है तो इवन दो मैकसी हैज़ सर्टेनली अंडरस्टुड एंड यू नो उसको उसकी कुछ रेलेवेंट कैटेगरीज़ हैं मोरालिटी की, गुडनेस की, नेटवर्क की जो उसने आइडेंटिफाई करी हैं। बट विदाउट द मैट्रिक्स इन प्लेस उसका फिर भी जो अल्टीमेट रिजल्ट है इनकिटी होगा वह इनकिटी ही होगा। वह ऑपरेशन ही होगा। और वो ऑपरेशन कई बार जैसे ये मसलन ईस्ट इंडिया कंपनी या ब्रिटानिया की कॉलोनाइजेशन कि आपको आपके घर में खुश कर दिया है। पूरी कायनात पूरी दुनिया सफर कर रही है। हिंदुस्तान में फेमिन हो रहा है। हो रहा है। तो एक तरीके का ये इनवर्ड स्पिरिचुअलिटी और आउटवर्ड कोलोनाइजेशन। हां और विद इन दी स्ट्रक्चर आल्सो हायरार्किकल कॉलोनाइजेशन और हरार्किकल एलिवेशन। अब्सोलट तो ये जो प्रोग्राम्स हैं जब वो कुरान और जो इस्लामिक तालीमात है और उलूम है उनके जब कॉन्टेक्स्ट में इनको रिकसेप्चुअलाइज किया जाता है तो जो गुडनेस का भी होलिज्म है वो भी इन प्रोग्राम के विद इन एंबेडेड है इसमें इसमें क्या होता है कि शुरू भी अल्लाह है हम और खत्म भी अल्लाह है यानी सफर का शुरुआत की शुरुआत भी अल्लाह और उसका एंड भी अल्लाह है। यहां मेरी जो खुदा की मारफत थी जिस लेवल की थी। ठीक है? उससे मैंने सफर शुरू किया। ये सफर करते करते मैं खुदा की इतनी मारफत कर लूं कि फिर मेरे लिए यानी किसी का हक मारना, किसी को धोखा देना, किसी की किसी की पीछे बदख्वाही करना ये सब मेरे लिए यानी नफरत की चीज बन। एक मुसलमान हो और वो फिर वो अपने मफादात के लिए किसी को भट चढ़ा दे। अपने मफादात के लिए किसी के लुक में छीन ले। अपने मफादात के लिए किसी को दांव पे लगा दे। ये पॉसिबल नहीं है। क्योंकि वो हर वक्त अल्लाह के सामने खड़ा है। वो किसके साथ धोखा करेगा? उसकी जिंदगी जो है वो रास्तबाजी की तरफ आ जाए। वो चालबाज ना बने। उसका एजुकेशन या उसकी ट्रेनिंग या उसकी डेवलपमेंट उसको चालबाज ना बनाए। बल्कि वो रास्तबाज हो जाए क्योंकि खुदा के यहां चालबाजी चलेगी नहीं। वहां तो जो कुछ भी है वो राबाजी है। क्या छुपा लोगे आप अल्लाह से? तो हिडन कॉज कुछ भी नहीं। सफर अल्लाह से शुरू होगा अल्लाह पर खत्म होगा। यह नबियों का सफर जो है वो किस तरह का है कि सब कुछ करने के बाद सामने वालों की तरफ से कुूल नहीं होता या अप्रिशिएट नहीं किया जाता कदर नहीं की जाती तो उनका एक ही जुमला होता था कि हम आपसे कुछ नहीं चाहते हम आपसे कुछ नहीं चाहते हम तो इसका बदला अल्लाह से लेने वाले लाल अल्लाह इसका थोड़ा सा भी हिस्सा अगर मतलब हमारे एक्टिविज्म में आ जाए समाजी जो इ्तिमाई काम कर रहे हैं उनके अंदर अगर ये आ जाए तो दुनिया का रंग ही बदल जाएगा इंशा्लाह जब आप किसी से कुछ लेने ही नहीं जा रहे तो आपसे कोई डरेगा आप देने जा रहे हैं देने वाले को कौन नहीं अप्रिशिएट करता कौन नहीं कुबूल करता है तो हम देने वाले बन जाए तो जो हमारे हमारी लेगसी है उसमें एक बात ये और है कि आपको अगर लोगों की आंखों का तारा बनना है तो आपको लोगों के लिए नाफ बनना पड़ेगा। ये कुरान ने एक सीधा उसूल दिया है। अम्मास जो लोगों के लिए नफा बखश बनेगा। अल्लाह ताला उसी को मुस्तकम करते हैं। अब हमारी नाफियत देख ले कि अगर हम अपनी नाफियत को वापस से इनकल्केट कर ले या वापस से ले आए। तो हमारे से लोगों को शिकवा क्या है? जब आप बेनिफक्टर हैं तो जो लोगों को आपसे फायदे हो रहे हैं तो ये हुआ भी अल्लाह के रसूल ने जब मदीने में सारे जो एक उनकी इंस्टीट्यूशन मेकिंग हुई स्पेशली मैं मार्केट को लेके बड़ा होता हूं कि उस मार्केट में यहूदी भी आके ट्रेड करने को तैयार है। मुशरिक भी आने को ट्रीट करने को तैयार है और वो उसको ज्यादा फायदेमंद मान समझ रहा है उस एक्टिविटी को और वहां से आपने पूरा इंस्टीट्यूशन से ट्रांसलेशन किया। आप अगर देखोगे तो सोशल रिफॉर्म है भाई उसको लोग पॉलिटिकल रिफॉर्म के द्वारा देखते हैं। यानी हमारी पूरी जो हिस्ट्री है उसमेंकि उन चीजों को ज्यादा एक्सपोज किया गया है तो हमको वो दिखाई देती है। लेकिन ये जो पीछे हुआ है कि किस तरह से बाजार किस तरह से लोगों का इस्तेसाल कर रहा था तो उनकी पहली पसंद क्या हो सकती है? ऐसा बाजार होगा जहां लोग एक दूसरे पर एतमाद कर सकते हैं। लोग किसी को धोखा नहीं दे सकते। ना रदी माल जो है अच्छी कीमत में बेचने की चाल चल सकते हैं। ऐसे बाजार के अंदर आदमी अपना माल लाकर बेचेगा या ऐसे बाजार में आकर के खरीदेगा या जहां लोग इस्तेसाल कर रहे हो, धोखा दे रहे हो, कम तोल रहे हो। तो ये जो वैल्यूस थी हमारी ये वैल्यूस लोगों को मजबूर करती थी कि आप आइए हमारे यहां बाजार लगाइए। आप आइए हमारे यहां घर बनाइए। आप आइए हमारे यहां सल्तनत चलाइए। ये ऑफर्स है। तो हुआ क्या है कि हमारा इंटरप्रिटेशन जो हमारा पूरा वो हो गया है पॉलिटिकल। और पॉलिटिक्स का नाम है आज के दौर में लेना। और सोसाइटी में क्या होता है? देना। तो इसी से जुड़ी हुई क्योंकि आपकी फ्लाइट भी है हमें चीजों एक तो यह समझ आने वाली बात है डिप्लोमा की जो अभी भी मदारिस में ट्रेनिंग है उसमें ऑलरेडी मटेरियलिज्म की जो इंटेंसिटी है वो कम की तरफ है। अभी इतनी हाई हुई नहीं है। अभी उतनी हाई नहीं हुई है। हालांकि बहुत सारी चीजों में हो रहा है आहिस्ता आहिस्ता लेकिन वो उस लेवल का नहीं है कि जो यूनिवर्सिटीज में हालात है तो वहां पे अमाउंट ऑफ पीपल अवेलेबल फॉर ट्रांसफॉर्मेशन इज मोर बट उसके अलावा यूनिवर्सिटीज में कम होने के बावजूद भी ऐसे बच्चे आपको मिलते हैं जिनका जिनकी क्वालिटी एंड स्केल ऑफ ट्रांसफॉर्मेशन माइट बी मोर इन द सेंस कि आज का क्योंकि सिस्टम इस फ्रेमवर्क में है। तो जब आप इस चीज को उस लैंग्वेज में बयान करते हैं तो बहुत सारे लोग जो इनकी नहीं सुन रहे और वो जब दोनों जुड़ के बात करते हैं तो उसकी स्केल बहुत बढ़ जाती है। तो उसके लिए आपके पास क्या प्रोग्राम है कि जहां पे एक तरफ उलमा है तो दूसरी तरफ चंद ही सही। राइट? तो इसको जो है पूरा एक ट्रांसमेशन इकोसिस्टम की तरफ से हम लोग देख पाए। जब हम जो है पैन इंडिया मुस्लिम पपुलेशन की सोचते हैं या मतलब ह्यूमन ह्यूमैनिटी की पॉइंट ऑफ व्यू से हम सोचते हैं तो हमको अमन फेलोशिप नजर आता है एस द मोस्ट नेसेसरी ग्रास रूट एंपावरमेंट प्रोग्राम ग्रास रूट ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम लेकिन देयर आर अदर क्रिटिकल कैटेगरीज दैट मस्ट बी एड्रेस्ड वि इक्वलेंस [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक जो है यूथ है हमारा 15 से 25 का ये 15 से 25 एक बहुत फॉर्मेटिव एज होती है। मतलब इसमें इंसान अपना पूरी जिंदगी का जो है वर्ल्ड वो वो फ्रेम कर लेता है। अब नहीं किसी भी जरिए से फ्रेम करता है। वो दोस्तों के जरिए से सिनेमा के जरिए से कहीं भी किसी भी तरीके से फ्रेम कर लेता है। और ये उम्र है भी मतलब फ्रॉम फ्रॉम ए स्टेजेस ऑफ़ डेवलपमेंट पर्सेक्टिव से अगर आप आते हैं एक इवन का बहुत अच्छा मॉडल है स्टेजेस ऑफ़ कॉन्शियसनेस का उसको मैंने जो है फ्रॉम माय ओन अंडरस्टैंडिंग आई हैव रिफ्रेम इट तो मुझे 15 से लेके 40 साल की जो इंसान की उम्र है वो इस द एज ऑफ़ ट्रांसफेशन दो सवाल जो है बहुत अहम हो जाते हैं इसमें एक हु आई इसका एक जो है ठोस जवाब मिल जाए और दूसरा हुस हु इस माय क्रिएटर हुस र इसका एक क्लियर जवाब होना चाहिए। ये दो जवाब अगर ठीक-ठाक मिल जाते हैं, जिंदगी के डिसिशन मेकिंग के फ्रेमवर्क में बहुत ज्यादा हेल्थ आ जाती है। दिस दिस इज हु माय ऑथेंटिक सेल्फ इज। राइट? एंड एंड दिस इज हु आई एम अकाउंटेबल टू इन टोटिटी। दिस इज वेयर आई विल सबमिट। यह फ्रेमवर्क जब इंसान का बन जाता है तो उसकी डिसजन मेकिंग जो है वो ब्यूटीफाई हो जाती है अपने आप में। राइट? तो 15 से 25 की उम्र में हम लोगों ने एक ट्रेल ब्लजर के नाम से यूथ एंपावरमेंट प्रोग्राम शुरू किया हुआ है। वि इस अगेन थ्री एंड हाफ ईयर प्रोग्राम जिसमें हम लोग क्या करते हैं? इसमें फसेस है यू नो देयर इज ट्रेल सीकर ट्रेल मेकर एंड देन ट्रेल ब्लज़र ट्रेल ब्लज़ समबडी हु वन कैन लुक अप टू यानी कि अगर ये बंदा एकेडमिक्स में है तो इसका हाथ पकड़ने वाला कोई ना हो बंदा हो बंदी हो द इंडिविजुअल शुड बी एन एग्जांपल एग्जांपल इन एकेडमिक एक्सीलेंस बी एन एक्स इन सर्विस एक्सीलेंस बी एन एक्स सैंपल इन इन द वे यू हां शोबे में आप काम कर रहे हैं बेहतरीन मिसाल इवन इन योर फमिलियर रिलेशनशिप वहां पे भी हां अगर आप वहां पे ठीक नहीं है तो आप मतलब आप दुनिया में धोखा ही देंगे क्योंकि आपके बुनियादी रिश्तों में आपको सलाहियत नहीं है डील करने की तो ये इस तरह से हम उनको एक्सीलेंस में एक तरीके से जो है डीप ड एक्सपीरियंस देते हैं जिससे वो इजीली वाश ऑफ ना हो सके रंग पक्का चढ़ता है किसी शख्स पर इस मेहनत का तो इसको हम लोगों ने फेस में डिफाइन किया हुआ है ट्रेल सीकर जो होता है वो छ महीने का फेस है जिसमें तीन तीन दिन की वर्कशॉप होती है बाकी की ऑनलाइन क्लासेस होती है इन बिल्डिंग वन सेल्फ एंड प्राइमरीली आंसरिंग दी टू क्वेश्चन हु एम आई एंड हु इज माय क्रिएटर राइट जब हम ट्रेल मेकर में आते हैं तो देन वी स्टार्ट एंगेजिंग देम इन सोशल चैलेंजेस कि आप जो है देखिए सोशल चैलेंजेस क्या है दूसरों के साथ मिलके उन चैलेंजेस को आप सॉल्व करने की कोशिश करिए और उसमें फाइव डेज की जो है ट्रेनिंग होती है बाकी की ऑनलाइन ट्रेनिंग होती है। उसके बाद में जो ट्रेल ब्लजर है वी एक्चुअली गाइड देम टू बिल्डिंग सेमी ऑटोनॉमस यूथ कलेक्टिव्स। सेमी ऑटोनॉमस इन द सेंस दैट दे विल ऑल बी बाउंड बाय अ सर्टन सेंट्रल कॉन्स्टिट्यूशन एंड दे विल बी इंडिपेंडेंट टू एड्रेस द चैलेंजेस ऑफ देयर लोकल कम्युनिटी एंड सो ऑन एंड सो फॉर तो उस तरह से और वो 15 महीने के लिए उसमें रहते हैं। को ये मतलब इतनी डीप भी है एंड ऑल इनकंपसिंग भी है और पक्का रंग चढ़ता है ती तीन साल में वी बिलीव वी विल ट्रूली हैव सम आउटस्टैंडिंग यंग पीपल बीइंग ग्रुप फॉर वर्किंग ऑन द चैलेंजेस ऑफ़ आवर टाइम्स जो भी इस वक्त के चैलेंज इस तरफ एक तरफ ओलमा है दूसरी तरफ ये है नौजवान तो ये कॉलेज है और वहां के जो स्टूडेंट्स होंगे वो यहां डेवलप होंगे इंशा्लाह और वो वो वहां डेवलप होंगे और फिर ये दोनों किसी बस्ती में मिल जाए। हां मिलके कोलबोरेटिवली काम भी करेंगे। अब और अब जो है एक जो थर्ड कैटेगरी है जो हम अब इस वक्त जो है उसके ऊपर तवज्जो दे रहे हैं वो है प्रोफेशनल्स की कैटेगरी। हमारे पास जो है जो डेवलपमेंट का मैंडेट है पीपल डेवलपमेंट का मैंडेट है वो इतना वास्ट है। फॉर एग्जांपल हमको बहुत ज्यादा काउंसलर्स की जरूरत है। हमको बहुत ज्यादा स्टूडेंट कोचेस की जरूरत है। मैरिज काउंसिलिंग एंड मैरिज कोचेस की जरूरत है। पेरेंटिंग काउंसलिंग पेरेंटिंग कोचेस की जरूरत है। इवन प्रोफेशनल सक्सेस इन एन एनवायरमेंट व्हेन इट इज फॉर एग्जांपल द एंटायर टाटा कंसलटेंसी सर्विस फियास को राइट अब अब मुसलमान जो है अपने मुसलमान होने को लेके इतना बेचैन और इतना परेशान है कि क्या मैं मतलब मुसलमान रह भी सकता हूं और मैं अपने प्रोफेशनल करियर में एक्सेल भी कर सकता हूं और डेमोंस्ट्रेट भी कर सकता हूं और लीडरशिप रोल ले भी सकता हूं और इंटीग्रेटेड होलनेस भी फील कर सकता हूं ये एक सबके लिए बहुत बड़ा चैलेंज बन गया तो ऐसे में जरूरी हो जाता है कि वो जो है उनको कोई कोच हो जो इस्लाम भी बहुत अच्छे से समझता हो और जो है कोचिंग एस ए मेथड को भी बहुत अच्छे से जो है वो सीखा हुआ हो और प्रोफेशनल फ्रेम प्रोफेशनल वर्ल्ड को उसमें अच्छे से खेल रहा हो तो ये तीनों का जो है कॉम्बिनेशन हमको क्रिएट करना जरूरी हो गया है जिसके लिए हम लोगों ने एक प्रोग्राम अभी अनाउंस किया है आर्किटेक्चर ऑफ द हार्ट इस्लामिक फाउंडेशन और इस्लामिक ऑंटोलॉजिकल फाउंडेशन तो जिसमें जो है नफ्स की बात होगी पल्प की बनने की बात होगी होगी फितरा के ऊपर बात होगी जो कमजोरिया है इंसान की उसके ऊपर भी बात होगी इससे जो है और ये पूरा जो नॉलेज डेवलप हो रहा है वो ऑथेंटिक सोर्सेस से डेवलप हो रहा है ऐसा नहीं है कि हम कोई वेस्टर्न मॉडल को लेके उसमें हम इस्लामिक टर्म्स को जो है ओवर ओवरले कर रहे हैं एंड उसको इस्लामिक बुला रहे है इट इस प्योरली होम ग्रोन इस्लामिक मॉडल व्हिच कैन बिकम अ मीन्स ऑफ लर्निंग लर्निंग एंड लाइट फॉर द मैकजी ऑफ द वर्ल्ड ट्रांसफेशन अगर आप वाकई में मतलब यू वांट टू एक्सेल ट्रांसफेशन कम टू कुरान एंड सी व्हाट कुरान गिव्स यू ये जो है इंशा्लाह ताला हमारी कोशिश है की जो है हम कंट्रीब्यूशन दे सके ह्यूमैनिटी को और ये हमारी जिम्मेदारी है अगर आपके पास कुरान है और आप कुरान से रोशनी नहीं पैदा कर रहे हैं। आप रोशनी नहीं दे पा रहे हैं तो आपकी कमजोरी है और फिर आपको कमजोर बोला जाएगा। मतलब अल्लाह विल विल मेक यू फील मतलब आपकी जिल्लत होगी रुसवाई होगी जो हो रही है। एंड दिस इस बिकॉज़ आप जो है ना सीख रहे हैं ना उस पर आप जो है अमल कर रहे हैं ना उससे जो है रोशनी पैदा करके आप दुनिया में रोशनी फैला रहे हैं। तो फिर उसके नतीजे में ये सारी जिल्लत और रुसवाई है। तो ये जो इस वक्त की जो कंडीशंस है ऑफकोर्स हम हिंदुस्तान में रहते हैं तो हम उसको करीब से देखते हैं। लेकिन दुनिया ही पूरी तरह से जो तरम भरम बिल्कुल हालात बुरे हैं। मोरलिटी खत्म है। ऊंचनीच बहुत ज्यादा है। कुर्बत बहुत ज्यादा है। इतनी डेवलपमेंट और इतनी साइंस और टेक्नोलॉजी के बावजूद आज भी 60% ऑफ़ द पीपल लिविंग। वो स्ट्रगल कर रहे हैं लाइफ में। 30% को तो सुबह शाम के खाने का भी अंदाजा नहीं है। तो दिस इज़ द वर्ल्ड वी हैव बिल्ट विद एब्सोल्यूट टेक्नोलॉजी, एब्सोल्यूट सो कॉल्ड प्रोग्रेस। और उसके बावजूद ये हालात हैं। तो ये जो तीन तरह के ऑडियंसेस हैं जिनके लिए ये डिज़ किए गए हैं। व्हाट आर द एक्सपेक्टेड आउटकम्स फॉर फॉर मी एज़ अ मुस्लिम फॉर मी लिविंग इन अ कम्युनिटी इन व्हिच देयर आर मुस्लिम्स एज़ वेल एज़ नॉन मुस्लिम्स एंड टू द वर्ल्ड एज़ अ होल? हम हम व्हाट आर वी एक्सपेक्टिंग टू गेन फ्रॉम दिस काइंड ऑफ़ ट्रेनिंग। व्हाट इज द इस्लामिक मॉडल फॉर खैर? द फर्स्ट नेसेसरी आउटकम ऑफ ऑल ऑफ दिस एफर्ट इज दैट पीपल शुड बी एबल टू एनकाउंटर जो इंसान के किरदार की खूबी होती खूबसूरती होती एक खूबसूरत किरदार इंसान जो है जब बनता है तो उससे कितना फायदा होता है हम सबको और हर तकलीफ में हर परेशानी में जो है हम अच्छे लोगों की तलाश में निकलते हैं। कोई अच्छा हो जो हमको भरोसेमंद बता भरोसेमंद हो तो ऐसे लोग हम चाहते हैं कि समाज में ये अक्सर मतलब इनफ नंबर्स में ये जो है क्रिएट हो जब ये होगा तो नेसेसरीली फिर ह्यूमन क्वालिटी ऑफ लाइफ के जितने इंडिकेटर्स है गुडनेस के राइट उन इंडिकेटर्स में हमको फिर फर्क दिखने लगेगा नेसेस स्टार्टिंग फ्रॉम इवन इन फॉर एग्जांपल हाउ कपल्स आर इन एक्सपीरियंसिंग देर मैरिज और हाउ दे आर पेेंटिंग देर चिल्ड्रन एंड एंड व्हाट काइंड ऑफ़ एन एनवायरमेंट दे आर बिल्डिंग एट होम जिसके जिसकी अच्छाई फिर जो है दूसरे बच्चों में खेलने में करने में और दूसरे वहां पे इंटरेक्शन में नजर आएगी। बिल्डिंग के इंटरेक्शन में नजर आएगी। गली के इंटरेक्शन में नजर आएगी। एक वो खूबसूरती अपने आप को जो है वो एक मनवा के रहती है। हां मतलब वो अपनी अच्छाई कहां आप गुलाब को छुपा लोगे वो अपनी खूबसूरती तो मतलब एक्सप्रेस कर ही देगा। तो ये ये माइक्रो लेवल पे ये चीजें होने लगेगी। मै लेवल पे हमारे जो एजुकेशन के तरीके हैं उसमें हमको जो है सिग्निफिकेंट जो है इवोल्यूशन नजर आने लगेगा। जिस तरीके से हम तजारत करते हैं, बिजनेस करते हैं, मतलब जो एक्सट्रक्टिव ओरिएंटेशन हो गया है हमारा मतलब किसी तरह से मुझे मिल जाए, ज्यादा से ज्यादा मिल जाए, किसी और को मिलता है, खाने को नहीं मिलता है। इस द ओरिएंटेशन इस द वर्ल्ड व्यू एक्चुअली मतलब कामयाबी का राज इसे माना जाता है कि मैं कितना सेल्फ ऑब्सेस्ड हो जाता हूं। वर्सेस जब ट्रांसफॉर्मेशन होने लगेगा तो कितना कलेक्टिव ओरिएंटेशन इसमें आने लगता है। कई मतलब मतलब किस्से है ना कि बाजार में कोई गया था खरीदने के लिए और जैसे ही मैं पहली दुकान पे पहुंचा उसने कहा कि नहीं हालांकि उसके पास माल है बेचने के लिए लेकिन वो कहता है कि नहीं मेरा मेरा आज की तजारत का खत्म हो गई है अगर आप अब खरीदना चाहते हैं तो बाजू वाले के पास जाइए और वो इस तरह से आखरी वाले के पास भेज देता है दुकानदार जब आखरी वाले के पास जाता है और उसके पास जब उसको मिलता है तो वो हैरत में आखरी वाले से पूछता है कि इन लोगों ने अपनी दुकान से मुझे बेचा क्यों नहीं? जबकि इनके पास माल है देने के लिए। तो उसने कहा कि नहीं अभी तक मेरी दुकान नहीं चली है। उनकी दुकान चल गई है क्योंकि उनकी पहले है। तो ये ये तसवुर इस तरह से एक दूसरे का ख्याल रखना बाजार का ख्याल रखना। एक दूसरे का ख्याल रखने के रखने से बाजार का पूरा बाजार बनता है। हम सोचते हैं कि हमारी दुकान चल जाए, बाजार भाड़ में जाए तो बाजार सड़ जाएगा। एक दिन वो सड़क मेरे ही घर में आएगी ना। हम तो आपको ये लोग चाहिए। आपको ये ताजिल चाहिए। आपको ऐसे टीचर्स चाहिए। आपको ऐसे इंटेलेक्चुअल्स चाहिए। आपको ऐसे साइंटिस्ट चाहिए। वन ऑफ दी जो एक इंटरेस्टिंग चीज मुझे याद आई मदीने के बाजार के बारे में कि उसमें एक उसूल था कि जो सुबह पहले आएगा वो अपनी जगह को उसी हिसाब से कि वहां फिक्स्ड क्योंकि उस जमाने में उस तरह की दुकानें नहीं थी के तो उन्होंने जिस तरह से उसूल बनाया कि भ ये नहीं है कि आपने इस पे अपनी गांड बांध ली कि मेरी दुकान है। सुबह जल्दी आओ फजर के बाद जो आया वहां रख दो। तो उसमें भी फिर देन यू यू हैव टू डिर्व टू ओन दैट प्लेस इन दैट सेंस। तो जैसा कि हम लोगों ने बोला था कि मुजीब भाई क्योंकि उनकी फ्लाइट थी और उनको निकलना था तो हम इस कन्वर्सेशन को थोड़ा और कंटिन्यू रखेंगे और स्पेशली वो सवाल जो हमने पीछे छोड़ा तसवुफ के हवाले से और स्पेशली ये बात के जब स्पिरिचुअल क्लेम्स किसी एक ट्रेडिशन के ना हो सिर्फ हर ट्रेडिशन अपना स्पिरिचुअल क्लेम कर रहा यहां तक कि मटेरियल जो मटेरियलिटी का जो ट्रेडिशन है वो भी आज जो हम स्पिरिचुअल क्वेश्चन और इस सब की बात कर रहे हैं उसका भी एक अपना स्पिरिचुअल क्लेम हो और बजाहिर दिखने में वो जो स्पिरिचुअल क्लेम्स है उनकी जो मेथोडोलॉजी है वहां भी जिक्र हो रहा है यहां भी जिक्र हो रहा है अल्फाज़ का मैं इस्तेमाल कर रहा हूं लूजली वो इस वजह से के कंपेरेटिव उसके ऑफ कोर्स जिक्र का एक पूरा जो पैराडाइम है वो एक डिफरेंट है। दीन का जो जो मीनिंग है वो डिफरेंट है। लेकिन अगर सिर्फ और सिर्फ उसके रिडक्टिव फॉर्म में देखा जाए कि वहां पे भी बैठ के मजलिस हो रही है। वहां पे भी उस तरह का फन लेने की कोशिश की जा रही है। वहां पे भी मंत्र या फिर वो जाप हो रहे हैं। तो उस सब में यह कैसे डिफरेंशिएट किया जाए कि जिस सिचुएशन ऑफ ट्रांस को या जिस सिचुएशन ऑफ कॉन्शियसनेस को इनवोक किया जा रहा है वह सेम हमारे यहां वो प्रॉब्लम नहीं है। ये चैलेंज क्योंकि एक तरीके से एक तो ये है कि भाई हम क्योंकि किसी उससे आते हैं ट्रेडिशन से तो हम अस्यूम करके चलते हैं। लेकिन अगर हम अस्यूम ना करें और उसको लॉजिकली समझने की कोशिश करें कि तसवुफ में और दूसरे जो स्पिरिचुअल ट्रेडिशन है उनमें बुनियादी फर्क क्या है? देखिए एक तो ये इंसान की एक जहाज है कि वो कुछ मखसूस किस्म की कुतें अपने साथ रखना चाहता है। हम जो दूसरे को हासिल ना हो। ठीक है। एक कॉमन आदमी जिस तरह जी रहा है चाहे कोई जिसको कहते है ना आदमी की अपनी शनाख्त के बहुत सारे उनवान आज कोई बोले मैथ में अच्छा बनना चाह रहा है कोई इंग्लिश में अच्छा बनना चाह रहा कोई इंजीनियरिंग में अच्छा बनना चाह रहा तो ये अपनी शनाख में कुछ डिफरेंट चीजें लाना चाहता है जो दूसरों में नहीं ये एक उसकी एक प्यास है तो उस [गला साफ़ करने की आवाज़] प्यास का की इंतहा और इदा क्या होनी चाहिए प्यास क्यों लगे आदमी तो तसोफ जो है उसको उसकी प्यास की इदा भी अल्लाह मानता है और उसकी इंतहा भी अल्लाह मानता है और उसके बीच में जो सारे मेथड्स है जैसे जिक्र करना मुराकबा करना ठीक है ये सब चीजें ये आप देखेंगे तो इसमें कुछ कुत हाथ आ जाती है किसी चीज पर बार-बार सो कहते हैं ये बीदान का खेल है। जैसे इंसान को ये पांच सेंसेस दिए है अल्लाह ने कान आ ये जो है हवास खमसा फिर अक्ल है इसका ताल्लुक हवास खमसा से अक्ल का ताल्लुक हवा खमसा से उसके अलावा भी अल्लाह ने उसको अंदर दिया हुआ है कुछ सेंसेस है जिसको तस की जबान में कहते हैं सिर है नफ्स है रूह है तो ये सेंसेस है। ये सेंसेस जब डेवलप होते हैं तो एक अलग तरह की कुत इंसान के अंदर पैदा होती है। वो कैसे वो डेवलप होते हैं? देखिए असल में रूह विद दान यानी अक्ल और रूह के बीच में एक कुत है जिसको विदान कहते हैं। विद दान क्या है कि आदमी किसी चीज के साथ इतनी मुजबत करता है। इतना कंटिन्यू उसके साथ लगा रहता है कि उसके नतीजे में उसके पास एक एक्स्ट्रा सेंस पैदा हुआ। बहुत आसानी से अगर इसको हम समझे तो एक मैकेनिक है तो मैकेनिक जो है वो बार-बार इतने सालों तक वो गाड़ी के और इंजन के और उसके साथ लगा रहता है के वो इंजन की आवाज को सुन के ही समझ लेता है कि मसला किधर है। गाड़ी चलाने वाला नहीं उसको महसूस करता है। लेकिन क्योंकि वो उस फन के साथ इतना रचा बसा है उसकी जिंदगी के साथ कि उसके अंदर उसकी एक महारत पैदा हो जाती है। ऐसे ही जब आदमीत पर कोशिश करता है उसके दो रूट है। एक है इलाहियात और एक है कायनात। इलाहियात का मतलब यही जो मेटाफिजिक्स तो जब इलाहियात पर आदमी गौर करने लगता है या उसके साथ बहुत ज्यादा वाबस्ता हो जाता है और बहुत स्पिरिचुअल यानी नफ्स की जो ख्वाहिशात है जो तकाजे हैं उन तकाजों में कंप्रोमाइज करके वो उन तकाजों को पूरा करने की कोशिश करता है जो उसकी विधान से उठ रही है तो उसके अंदर एक महारत पैदा हो जाती जैसे अक्ल में बार-बार काम करने से एक महारत पैदा हो जाती है ऐसे ही इन विजान के जो एरिया है उस पर काम करने से पैदा हो जाती है। उसमें जैसे भाई आदमी खाने पीने से रुक जाए। लिमिटेड खाए जितना जितने में जी सकता है उतना ही खाए। बहुत ज्यादा पेट भर के ना खाए। सोने में कुछ लिमिटेड सोए। बहुत ज्यादा सोए नहीं। ठीक है? बहुत ज्यादा बोले नहीं। खामोश रहे। तो हमारे यहां देखेंगे के खाना, कम खाना, कम सोना, कम बोलना यह अच्छी आदतों में शुमार की जाती है। यानी इसके जरिए से आदमी बहुत सारी अलशों से बच जाता है। और बहुत सारी अच्छाइयों की तरफ आता है। तो इसका एक जो है लेवल है एदाल का और एक लेवल है एक्स्ट्रा हर चीज में एक है इफरा एक है तद एक हैदार तो इंसान को अल्लाह ने जिबियत की तीन कुत उसमें कुत अलिया है ये कुत गजबिया है ये कुत शाफिया है ये तीन कुतों की नतीजे में इंसान किसी चीज को चाहता है अक्ल में बहुत ज्यादा अगर इफरात हो जाए तो आदमी जो है ना जहीन नहीं बनता है बल्कि चालाक हो जाए और अक्ल का जितना यूज़ करना चाहिए उतना ना करे तो बेवकूफ हो जाए अब ये चालाकी और बेवकूफ बेवकूफ के बेवकूफी के बीच में एक दानिश है हिकमत है ये किसका तकाजा है ये तकाजा है जिलत का इंसान की जो हैवानी जिलत उस जिलत का ये तकाजा है कि वो अक्ल का इस्तेमाल करता है। तो जब वो बहुत ज्यादा अकल का इस्तेमाल करता है तो वो एक ऐसी एरिया में चला जाता है जहां वो चालाकियां करने लगता है। हम और कम करता है तो बेवकूफ बन जाता है और एतदाल के साथ रहता है तो फिर वो हिकमत पैदा होती है। ऐसे ही कुत गजबिया है तो कुत गजबिया के भी इरा तत और एतदाल के लेवल्स है। अब कोई अगर उस कुत को बहुत ज्यादा इस्तेमाल करता है तो वो इस्तदाद करता है, जुल्म करता है, जालिम बन जाता है और अगर बिल्कुल गुस्से को इस्तेमाल नहीं करता तो बुदिल बन जाता है। और अगर दोनों के बीच में रहेगा तो फिर वो आदिल बनेगा। ये कुत है। ठीक है? ऐसे ही कुते शवि है। तो कुत शिया के अंदर आदमी जब एकदम बढ़ जाता है तो उसमें फिर वो बेहया बन जाता है, नफड़ बन जाता है और अगर बिल्कुल ना हो तो वो उसको इंटरेस्ट ही नहीं रहता इस तरह की शवानी चीजों में और जब एतदाल में होता है तो आफी बन जाता है उसमें इफत आती है। तो ये इंसानी हैवानी जिलत के तकाजे अब इन तकाजों के अंदर आदमी जैसेजैसे इराद का शिकार होता है तो उसके जो उसके जो नताज निकलते हैं वो मुबत और मंजूर होते हैं। तो जितने लोग दुनिया में बसते हैं उनमें एक ख्वाहिश है के कुछ एक्स्ट्रा चीजें हम हासिल करें। तो वो इन कुतों में इजाफे और किल्लत यानी कमी पर कुछ ना कुछ एक्सपेरिमेंट करते रहते हैं। एक आदमी हकीम बनना चाह रहा है। बहुत ज्यादा शाना बनना चाह रहा है। तो फिर वो इतना शाना बनता बनता चला जाता है कि वो शाने की क्रॉस ही कर लेता है और वो चला जाता है। फिर चालाक बन जाता है। तो उसकी चालाक चालाकी से वो खुद महफूज़ नहीं रहता। दुनिया को हरा देना उसका मकसद बन जाता है अक्ल का। अब अगर ये पैदा हो जाए तो नुकसान दे है और उससे नीचे उतर उतर जाए कि बिल्कुल बेवकूफ बेवकूफ हो जाए तो दुनिया के मामलात ही नहीं कर सकता। उसके बीच में है राय हिकमत है कि भाई जिस वक्त जो काम करने की जरूरत है उसको सोच विचार करके आदमी जिसमें किसी का नुकसान ना हो और फायदा सोचे भी तो इतना अपना इतना फायदा ना सोचे कि दूसरे को नुकसान देने पर मुतीज हो जाए। तो ये जो चीजें है इनहीं चीजों के ऊपर लोग मेहनत करते हैं। इसमें क्या है? मेरा नफ्स मकसूद है। शुरुआत कहां से हो रही है? मैं कुछ एक्स्ट्रा चाहता हूं। हम दूसरों के मुकाबले में मैं कुछ एक्स्ट्रा चाहता हूं। तो वो इन कुतों को या तो दबा देते हैं या बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं। तो बढ़ाने और दबाने के बीच में फिर मुख्तलिफ किस्म के हालात पैदा होते हैं। अब आपने सुना होगा ना कुरान करीम के नजूल से पहले कहानत थी। क्या करते थे वो? तो इंसान का लोग तो वो इसी तरह की मशके करके कुछ कुत अपने अंदर पैदा करते थे। उनहीं कुतों को ऊपर तक पहुंचने से रोकने के लिए वो शहा सा था कि इस वक्त वही नाजिल हो रही है। तो वही नाजिल होने के दौरान इन लोगों को वहां तक पहुंचने ना दिया जाए। क्योंकि उनके अंदर ये कुत नफ्स को कुचलने के नतीजे में कुछ एक्स्ट्रा कुते पैदा हो जाती है। हम लेकिन वो किसके लिए होती है? वह अपने लिए होता है। यही बात जब इस्लाम करेगा तो क्या करेगा? एदाल की बात करेगा। शरीयत नाम है इन कुतों के दरमियान एदाल पैदा करना। ये जिलत की कुत है। तसवुफ इसका नाम है। ठीक है? फिर तसवुफ का दूसरा रुख है। दूसरा रुख है जो रूहानी रूहानी जो मलकात है उन मलकात में आगे बढ़ने का जो विदान के जिलत के हैं विजान के हैं। उसमें क्या है? उसमें है तहारत पाकी उसमें है अदालत इंसाफ उसमें है समाहत फयादी शराफत और उसमें है शजात बहादुर ये रूह के तकाजे तो रूह के अंदर इन तकाजों में जब आदमी इफरात तफरीक का शिकार होता है तो फिर वो सब हालात पैदा होते रूहानियत पर काम करने वाले जैसे आदमी नफ्स को दबाता है रूहानियत मौज पर आदमी इसको अगर दबाया तो ये मौज पर आ गई तो जिबिल्लत और फितरत ये दो चीजें है तो हैवानी जिलत होती है जो इंसान के जिस्म का तकाजा है और फितरत जो है वो रूहानी होती है जो इंसान की रूह का तकाजा है तो इन दोनों तकाजों के बीच में एतदाल कायम करने की बात करता है इस्लाम। उसमें जो पानी की जुस्तजू है इसके जरिए से इसमें जो भी मशक कर रहा उसमें पानी की जो जुस्तजू है वो अल्लाह है हम और जितने दूसरे निजाम चाहे वो हिंदुओं का जोग हो चाहे फिर ये इराक हो जो अभी आ रहा है अंग्रेजों की तरफ से या मादी रूहानी जो मेडिटेशन और ये सारी चीजें जो हो रही इसमें मकसूद क्या है कॉन्शियसनेस अपने कॉन्शियसनेस को डेवलप करना कॉनशसनेस किस में है? इंसान के नफ्स में। तो वो सिर्फ अपने नफ्स की तरक्की के लिए इन कुतों को इस्तेमाल कर रहे हैं। उसमें कहीं भी अल्लाह नहीं है। यानी किसी किसी जात के सामने सरेंडर करना मकसूद नहीं है। उनका मकसूद है अपने अपनी जात को स्ट्रेंथ करना। तो तसफ में ये और दीगर रूहानी मशकों में यह फर्क है कि तसफ में कमाल पाने के बाद झुकना किधर है? अल्लाह के सामने। एक आदमी अगर इस लाइन से कमाल पा लेगा तो उस कमाल का फायदा किसको है? दुनिया में इतना ही फायदा हो सकता है कि वो कुछ कुतों ज्यादा कुतों से लैस दिखाई देगा। उसके बाद उसके पास क्या है? वो तो खत्म हो जाएगा। मरने के बाद फिर उसका क्या फायदा है? तो तस जितनी म रियादत कराता है उन रियादतों के पीछे खुदा की यात है नफ्स को अगर वो रियादतों के जरिए से उसकी कुतों को कंट्रोल में करना चाहता है तो वो इसलिए करना चाहता है कि नफ्स खुदा के सामने सजदा हो जाए वो अपनी खुदाई का ऐलान करे इसके लिए नहीं इसलिए जब अनल हक वगरा के जो दावे हुए इस जमाने में [गला साफ़ करने की आवाज़] तो अगर यह देखा जाए तो वो हो सकता है किसी का मजनूना मजनूना नारा हो कलंदराना नारा हो कि मैं क्या हूं मैं अल्लाह हूं वो अपने आप को अल्लाह इतनी सारी रियाजत करने के बाद आदमी ये तो नहीं कह सकता कि मैं अल्लाह हूं वो सिर्फ अपने और उसके दरमियान रिश्ते की हमंगी को बताने की कोशिश कर रहा है लेकिन उसको बर्दाश्त नहीं किया शरीयत ने क्योंकि शरीयत एतदाल पैदा करने के लिए आई हो सकता है अल्लाह के ताल्लुक उस बंदे के और अल्लाह के दरमियान वो ताल्लुक बहुत आला किस्म का ताल्लुक हो लेकिन वो ताल्लुक मेरार नहीं बन सकता है। उसकी वजह ये है कि जो चीज ये वाला एक्सपीरियंस है वो क्योंकि मटेरियलिटी में नहीं है। जहां पे ज्यादातर एक्सपीरियंस आवाम कोपरेट करता है। तो इस तरह का जो एक्सप्रेशन जो कोई और जिसको फील ना कर सके और उससे फिर लोगों का मोड ऑफ एक्सपीरियंस लोग बदलने की कोशिश करें दूसरी तरफ तो वो एक मेथड नहीं बन सकता या उसके मेथड अगर वो मेथड नहीं है सिर्फ क्लेम है तो शरीयत उसको वो एक्स्ट्रा चीज है लिमिट करेगी उसके लिए क्या है उसके लिए क्या है हमारे पास पूरी शरीयत एहसान हुस्ने अमल मौत हयात की तकलीक का मकसद भी हुस्ने अमल है और इस कायनात की तजी तहसीम का मकसद भी हुस्ने अमल है ना और हुस्ने अमल की जो मेथड है या जो बाउंड्रीज है वो शरीयत शरीयत पर आदमी अमल करे तो उसके बाद वो उस एहसान को पा सकता है। एहसान का मतलब ये है कि आदमी अपने अपने नफ्स को खुदा के सामने सरेंडर करती है। अब लोग एक्स्ट्रा चाहते हैं ना कुछ सब एक जैसे हैं। हम बहुत इंटेलेक्चुअल बनना चाहते हैं तो रैशन फैकल्टी को इतना इवॉल्व करना चाहते हैं कि हर चीज हो जाता है कि बहुत ज्यादा अच्छा स्पोर्ट्समैन बन जाए तो वो अपनी फिजिकल जो पूरा रिस्पांस मैकेनिज्म है ट्रेनिंग है उस तरह करेगा। तो इसी तरह के जब मैं उसको एग्जांपल इस तरह लेना चाह रहा हूं कि अगर कोई बहुत ज्यादा रैशनली अपने आप को कंसीव कर पाया और उसने अपनी वो फैकल्टी को बिल्ड किया और उसके बाद अगर उसने जो फलसफा पेश लाया सामने वो लिबरलिज्म, न्यू लिबरलिज्म और फिर कैपिटलिज्म और उसमें उसने ये चाहा शुरू में कि भ मैं तो ये चाहता हूं कि सब लोग उससे फायदा अदा करें। लेकिन वो क्योंकि उस लिमिट तक ले जाके उसको रिड्यूस कर दिया है। अल्टीमेटली उससे नुकसान ही होगा। साल मिसाल तो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी वो पर्टिकुलर फैकल्टी जो है वो इवॉल्व नहीं थी। वो पर्टिकुलर फैकल्टी डिवाइड ऑफ अदर फैकल्टीज वो हाइपर एवोल्यूशन और वो बाकी डायमेंशंस को ना देख पाने की वजह से जो वो रिजल्ट ला रही है वो इनकंप्लीट है रिडक्टिव है और उससे नुकसान पैदा होता है। आदमी आमतौर पर जब किसी चीज में खो जाता है जो गर्क होना जिसको कहते हैं किसी चीज में गर्क हो जाना तो वो एक एक कैफियत जुनून ही होती है। फिर उसको इधर का नहीं दिखता, इधर का नहीं दिखता, इधर का नहीं दिखता। वो घोड़े की सी में चल रहा होता है। तो सिर्फ वो चल नहीं रहा होता है। एक मकाम ऐसी जगह पर आता है कि फिर वो इन सब चीजों का इंकार भी करने लगता है। जो उसके सामने होता है सिर्फ उसका इस्बात नहीं करता। बल्कि आजू-बाजू की चीजों का इंकार भी करने लगता है। इसलिए माया है। मतलब उसका अगर आप इंटेलेक्चुअल आर्टिकुलेशन देखेंगे तो ये सब माया है। तो उसके रियलिज्म को ही इंकार कर दिया क्योंकि वो दूसरी फैकल्टीज ना डेवलप होने की वजह से आपने मेटाफिजिक्स तो बना दी लेकिन उसकी फिजिकलिज्म नहीं आई। क्योंकि मेटाफिजिक्स डिवइड ऑफ फिजिकलिज्म जहां पे शरीयत मैनिफेस्ट करेगी तो वो एप्लीकेबल नहीं है ना। हां एप्लीकेबल नहीं है तो आप अपने आप को सिस्टम से बाहर करोगे क्योंकि वहां आपकी ऑपरेशन और फंक्शनलिज्म खत्म हो जाएगा। आप फंक्शन नहीं कर सकते तो फिर आप ये बोलोगे ये फंक्शन करने की जगह ही नहीं है। हमने तसवु बता दिया क्या है? अब इसको बोला कि ये तजिया नफ्स है और उसको बोला कि ये जो प्रोग्राम है ये एक लिमिटेड फॉर्म में जिस फॉर्म में आवाम को या इस लेवल पे आप बेहतर जानते हो तो कैसे वो करेंगे ये भी एक तरीके से नफ्स को तैयार करने का तरीका है विद इंटरसेक्शन ऑफ प्रैक्टिकिटी उससे फिर हम अमन फेलोशिप को ट्रेडिशन से भी जोड़ रहे और मॉडिनिटी और जो बाकी चीज है उस भी रूट हो जाएंगे तो इसमें जो अमन फेलोशिप में जो दोनों चीजों को जमा करने की कोशिश है यानी मेरी अगर खिदमत खलक भी अगर मैं कर रहा हूं लोगों के काम भी आ रहा हूं जैसे कि मैं पहले भी कह चुका मेरे ये सब काम टवर्ड्स क्या हुआ अल्लाह तो मेरी जिंदगी पूरी की पूरी अल्लाह के लिए बन जाए। अगर मैं समाज के लिए कुछ नहीं कर सकता यानी मैं समाजी जिंदगी नहीं गुजार सकता तो मैं अपने खानदान के को ही पूरा समाज समझ इतनी जिम्मेदारी तो मुझ में है है ना तो भाई हम अकेले रहे निकाह ना करें तन्हाई में जिंदगी गुजारे जिसको अप्रिशिएट नहीं करता इस्लाम वो इ्तिमाई जिंदगी चाहता है तो इ्तिमाई जिंदगी जब भी आएगी उसमें दो रिश्तों के बीच में अल्लाह लाना जरूरी है वो वो अल्लाह अल्लाह ही जो है ना हुक और फरा डिफाइन करता है। अब जैसे ही आप उस से बाहर निकलते हैं, खानदान में से बाहर निकलते हैं, सोसाइटी में आते हैं तो वहां भी कौन चाहिए? अल्लाह चाहिए। मैं अगर किसी के मसले को लेकर के कोर्ट में जा रहा हूं, हल कराने के लिए, किसी मजलूम की मदद के लिए अगर कोर्ट में जा रहा हूं तो मैं क्यों जाऊंगा? या तो मैं इसलिए जाऊंगा कि लोग मुझे हमद समझे। जैसे मुजीब भाई ने कहा कि जब वो काम करने लगे तो उन्होंने पूछा भाई कब इलेक्शन लड़ रहे हो? ये सिंबल बन गया ना तो ये कब सिंबल बनेगा? इससे पहले ऐसा नहीं था। सोसाइटी के अंदर लोग इससे भी बड़े-बड़े काम करते थे और ये बात ही नहीं थी कि इसके बदले में कुछ लेना है। आज से 50 साल पहले की भी सोसाइटी अगर हम देखते हैं तो सोसाइटी के अंदर लोग सोशल वर्क आपस में एक दूसरे के काम आने को तजारत नहीं समझते थे। कोई कंसलटेंसी थी क्या? ये कंसलटेंसी का लफ्ज कहां से आ गया? ये कंसलटेंसी का जो लफ्ज है वो असल में वो हर काम जो सामाजिक काम हो सकता है वो पैसे में बदल गया। मैं किसी का ताुन कर सकता था। हत्ता के निकाह हो रहे हैं लोगों के जोड़े बनाए जा रहे हैं, लगाए जा रहे हैं। उसमें भी आदमी आ गया कंसलटेंट। हम अब एक एक जोड़ा लगाने का कोई 25,000 ले रहा है, कोई 500 ले रहा है, कोई लाख रुपया ले रहा है। और पहले यह काम जो है लोग मोहल्लों के अंदर खुद यू ही कर लेते थे और कभी ये सोचते भी नहीं थे कि इसके बदले में कोई रुमाल ही दे देगा। तो अमन फेलोशिप इस लेवल का क्योंकि आपकी तजिया जो है तजिय के बगैर आप कोई आवामी काम नहीं कर सकते। वरना फिर अराज आ जाते यानी अल्लाह अगर दिल में ताकतवर अंदाज में हमारे दिल में बैठा नहीं है उसके बाद जब हम समाज समाजी काम करने लगते हैं तो फिर हम उसमें खयानतों की तरफ जाते हैं। तो स्किल्ड कर देना बगैर अल्लाह के और सिर्फ अल्लाह हो और स्किल्ड ना हो दोनों चीजें जो है वो नुकसान दे तो अल्लाह भी होना चाहिए पूरी ताकत के साथ और वो स्किल्ड भी होना चाहिए। अगर सिर्फ स्किल्ड है और अल्लाह नहीं है तो फिर सिर्फ वही होगा जो अब हो रहा है। अभी जो पूरे मुशरे की जो बीमारी है जैसे मैंने कहा कि भाई हर चीज के बदले में पैसा आ गया है। पैसा दुनिया का खुदा बन गया है। वो खुदा को रिप्लेस किया है। उसने तो खुदा को वहां रिप्लेस करना पड़ेगा। हमारे हर काम में खुदा को रिप्लेस करना पड़ेगा। तो जहां भी दो ताल्लुकात आए वहां बीच में अल्लाह तो फिर हमारी ताकत बनेगी। वो तो ताल्लुक नफ्स और रूह के भी है वो भी दो है तो उसके बीच भी अल्लाह है तो ऐसा नहीं है कि सिर्फ आउटसाइड रिलेशनशिप इंटरनल रिलेशनशिप्स भी मेरा ताल्लुक अल्लाह के जात तो एक तो कॉल से कर रहा हूं मैं इकरार हम और एक मैं फेल से कर रहा हूं बंदगी ठीक है एक है इकरारारे बंदगी और एक है इजहारे बंदगी ये मेरा इजहार है अल्लाह के साथ मेरे ताल्लुक इकरार बंदगी में हमारी पूरे अकायद आ जाते और इजहारे बंदगी में हमारी पूरी जिंदगी भी आ जाती तो ये मेरा अल्लाह के साथ रिलेशन तो अल्लाह बीच में आ गया मेरे हर फैसले में ऐसे ही ताल्लुकात में भी अल्लाह ही होना चाहिए चाहे वो घरेलू ताल्लुकात हो या समाजी ताल्लुकात हो हत्ता के आप अगर वजीर आजम की सीट पर बैठे हुए हो तो वहां से भी जो आप आवाम के साथ ताल्लुक बनाओगे उसमें भी अल्लाह ही चाहिए तो अल्लाह को लाना जरूरी है और लोग ये समझ रहे हैं कि बाय डिफॉल्ट अल्लाह हमारे आगे अल्लाह को लाने की कोशिश के बगैर हमने यह तय कर लिया है कि कुछ ऐसी चीजें जो हम अपने जाहिर में सजा लेते हैं उसके नतीजे में हम समझते हैं कि हम अल्लाह लाजमी है। इसलिए मदरसे में जो फारग होने के बाद तजिया एक मुस्तकिल काम है। उसके लिए लोग जो है तब में जा रहा है। कोई खानका में जा रहा है। कोई अपने मश के साथ रह रहा है। तो ये तजिया की जो जरूरत है काहे की जरूरत है। इसी की जरूरत है कि दिल हमारा तमाम आला से पाक हो जाए ताकि इसमें अल्लाह बस वो रेगुलर रहता है ज्यादातर लोग इख्तियारी लेकिन वहां भी इ्तियारी है मैंडेटरी कुछ भी नहीं वो उस पर बात करेंगे तो फिर पूरे सिलेबस पर बात करना पड़ेगा लेकिन ये है कि कुछ ना कुछ एहसास कुछ बच्चों में रहता है तो वो रास्ता इ्तियार कर लेते हैं और ज्यादातर लोग फिर सीधा मैदान में आ जाते हैं तो जब मैदान में आ जाते हैं और बगैर अल्लाह के ताल्लुक के साथ आते हैं तो जगह जगह फिर ठोकर खानी पड़ती है। फिर लोग वहां उनसे अल्लाह पूछने की बजाय उनसे स्किल पूछ रहे होते हैं। तो पहले अगर स्किल लोगों के पास नहीं थी तो उनके पास अल्लाह इतना स्ट्रांग था कि वो सारी कमजोरियों को ठीक कर लेता था। अब ऐसा है कि अल्लाह भी हम उतनी ताकतवर अंदाज में नहीं ले रहे हैं और स्किल भी नहीं है। तो इन दोनों को कहीं ना कहीं तो ला के पैदा करना पड़ेगा। तो उसके लिए कोशिश है के ओलमा ही इस काम को बेहतर तरीके से कर सकते हैं क्योंकि इनके अंदर ये जोहर मौजूद है भाई कुरान इन्होंने पढ़ा है हदीस इन्होंने पढ़ी है फिर दुनिया से जिस कदर लगाव अब लोगों का हो गया है या अपनी जिंदगी को टाइम इक्वल टू मनी जिस तरह से कर दिया है लोगों ने उतना बड़ा ताकतवर तसवुर अभी इधर उस तरह का नहीं आया है तो इन लोगों के अंदर ये जज्बा और फिर उस जज्बे को अगर फॉर्मुलेट कर दिया जाए तो वो काम में तब्दील हो के एक बेहतरीन तब्दीली का जरिया बन सके। तो बहुत शुक्रिया और मौलाना आपसे दूसरी मुलाकात रही और मेरे लिए पर्सनली भी काफी फायदेमंद हुआ। मैं जैसे आपको बोल रहा था कि स्पिरिचुअलिटी के हवाले से तसवुस के हवाले से हमारे अंदर भी जो इल्मी चीजों में है या एक्टिविज्म में है या बाकी दूसरे शोबे हैं जो आपने बताया कि एक फैकल्टी है वह हाइपर रिवॉल्व है। लेकिन क्योंकि तजकिया का नफ्स को मेंटर करने का क्योंकि प्रोग्राम रेडीली अवेलेबल नहीं है। और उस वजह से पुरानेकों के सिलसिले भी रेडीली अवेलेबल नहीं है। खानकाें भी जितनी ज्यादा पहले एक्टिव होती थी उतनी नहीं है। तो वो जो फ्रेगमेंटेड रियलिटी है उसमें एक अब जो रिपोर्ट्स के हवाले से तो ज्यादा से ज्यादा तीन चार% बच्चा मदरसे में है। म्ता वगैरह मिला लें तो 6.5 7 8% है। 15% भी मान लें। चलिए कि भाई अंडरवैलड है तो भी कम से कम 80 85% जो मुसलमान बच्चा है वो उस एजुकेशन सिस्टम से उसका कोई ताल्लुक ही नहीं है। तो इसका मतलब उसमें जो फैकल्टीज इवॉल्व हो सकती हैं उस फैकल जिस तरह मदरसे के बच्चे की फैकल्टीज इवॉल्व नहीं है इधर की तरफ की तो एक बड़ा जो मेजरिटी है उसकी बेसिक फैकल्टीज इवॉल्व नहीं है। और अक्सर मैं यह शिकायत की तरह करता हूं उलमा से कि आप लोगों ने अपने ब्रिज प्रोग्राम्स तो बना लिए और इन बच्चों के ब्रिज प्रोग्राम्स कहां तो ट्रेल ब्लजर भी मुझे लगता है कि उसकी तरफ एक शुरुआत है के धीरे धीरे धीरे आएगी हर चीज में तब्दीली आएगी हर चीज में अगर अल्लाह ने इसको इरादा करने का चलाने का इंशा्लाह और प्रोफेशनल्स के लिए भी जो आप बात बता रहे हैं तो ये वो सारी जगह है जहां पे गैप्स आए एक जमाने के साथ जुड़ा आखरी बात मैं कर उसके लिए लेट करना जरूरी है कि मैं मुजीब भाई के साथ क्यों जुड़ा तो उनका जो मैंने इंसान साजी का प्रोग्राम देखा है तो मुझे दिखाई दिया है कि वो सारी चीजें जो हमारे तसव की किताबों के अंदर जो मश जिस तरह से शख्सियत बनाया करते थे और जिस तरह से उन हिजाबात को जिसको हम तजिया कहते हैं तो तजिया क्या होता है कि आदमी और अल्लाह और उसके न्स के दरमियान जो पर्दे आ जाते हैं तमन्नाओं के आरजुओं के गुनाहों के मासियत के पर्दे आ जाते हैं। ये कैसे छटेंगे हम कैसे छटेंगे? और आदमी अपनी शख्सियत को कैसे पहचान लेगा? जो हमको किताबें पढ़ाया गया कि आदमी अपने आप को पहचान ले खुदा को पहचान ले। हम तो अपने आप को पहचानने का यह सफर है और उसका जो उनका तरीका है वो बहुत ही ताकतवर है। तो उसको देख के मैं ये समझा कि भाई इस तरह का कोई आदमी अपने पास है ठीक है और मुझे भी ये भी पता था कि अगर ये अकेले खड़े होंगे तो हो सकता है जगह जगह इनको जो है चैलेंजेस चैलेंजेस आएंगे और एक बासलाहियत इंसान सिर्फ दीवार पर सर मारते मारते चला जाए क्योंकि एक्सेप्टेबिलिटी नहीं होगी दो लोग साथ खड़े हो गए हैं तो आवाम में दोनों तरफ एक्सेप्टेबिलिटी ये बहुत सारी जगहों पर गए बड़े-बड़े लोगों तक गए जो मिस्बा सफर कराए इनको ना तो उन्होंने मिस्बा फिर सब हाई क्वालिटी के लोगों के पास गए हैं तो जितने ओलमा हमारे बड़े हैं उनके पास ये गए हैं लेकिन उनके पास थोड़ी वक्त है कि वो इनके साथ उनके पास तो इस तरह के बहुत सारे लोग आते रहते तो कोई खड़ा तो नहीं होगा उनके साथ और नीचे लोग पूछते हैं आपको किसका सपोर्ट है अभी तो हम खाली सैफुल्ला रहमानी साहब का बकायदा लेटर ले चलते है जो हमारा ट्रेल विलजर का प्रोग्राम एक जगह हम नागड़ में कर रहे थे तो उन लोगों ने कहा कि भाई ये किनसे जुड़े हुए हैं और हमारे अकाबिल में से किसका सपोर्ट इनको हासिल है तो फिर हमने वहां से बल उस्मान के जरिए से का लेटर मंगाया और उसके जरिए से फिर वहां पर प्रोग्राम हुआ अब प्रोग्राम हो जाने के बाद फिर किसी लेटर की जरूरत नहीं पड़ेगी एक बार हो गया तो लोगों को अंदाजा हो गया क्या चीज है लेकिन लोग घबराते हैं कि पता नहीं क्या चीज है क्या इस तरह हालात भी है हां इस तरह हालात भी है कि कोई भी आता है कुछ भी बोल के उचक के ले चला जा रहा है तो उसमें उनका डरना भी ठीक है लेकिन मैंने ये सोच करके कि भाई अपनी जिंदगी कितने दिन बचा है उनके पास भी उतने दिन नहीं है दोनों के मिलने से अगर कोई चीज खड़ी हो जाती है तो इससे बड़ा कंट्रीब्यूशन जो है मिलने के लिए कोई नहीं होगा इस ख्याल से साथ में मुझे लगता है कि ये इस वक्त जमाने की जरूरत भी है और जितना फ्रेगमेंटेड जो हम कल भी बात कर रहे थे कि हमारे एक्सपीरियसेस हो गए। अगर उन्हें फ्रेगमेंट बाय फ्रेगमेंट जोड़ा नहीं गया और उसके लिए वो जो प्रोग्राम डेवलपमेंट भी होगा वो भी उसी तरह होगा कि पहले इन दो को जोड़ो फिर उन चार को जोड़ो फिर उस पांच को तो वो जब शख्सियत बननी शुरू होंगी उन प्रोग्राम्स के थ्रू तो वो इन द कमिंग फ्यूचर इनहीं में से जो लोग निकलेंगे वो और आप जुड़ के और ज्यादा चीजें मुझे लगता है कि बहुत इंपॉर्टेंट चीजें हैं और मैं दरख्वास्त करूंगा जो लोग देख रहे हैं के ज्यादातर चीजों के लिए हम लोग ट्रेनिंग प्रोग्राम और मुख्तलिफ चीजों में अपना वक्त भी एआई के भी कोर्सेस ले रहे हैं। बाकी चीजों के भी कोर्सेस ले रहे हैं। लेकिन मैं कौन हूं? मैं क्या हूं और मैं क्या बनना चाहता हूं। उसको हम लोग ऐसे समझते हैं कि जैसे हम ही कुछ किताबें पढ़ के सब कुछ समझ जाएंगे। जिस तरह हमें दूसरी चीजों के लिए जरूरत पड़ती है। लोगों को देखने की, चीजें समझने की, मशवरे करने की, इजाजत लेने की, बहुत सारी चीज। उसी तरह इस यह जो फैकल्टी है जो सेल्फ की फैकल्टी है उसको भी इवॉल्व करने के लिए कुछ अगर इतने बेहतरीन प्रोग्राम्स डेवलप हो रहे हैं तो कम से कम आप लोगों को ट्राई करना चाहिए एंगेज करना चाहिए यू शुड बी ओपन टू दी आइडियाज गिवन के सब हालात क्या है उस वक्त और ज्यादा जरूरी हो जाता है कि अपनी सेल्फ को कंटेन कर पाना तो बहुत शुक्रिया मौलाना आप यहां पर आए शुक्रगुजार हूं आपका मौका दिया आपने अल्लाह ताला आपकी इस कोशिश को कबूल फरमाए हमारे लिए रास्ता है सामने

Companion article

A split that runs through the self

The Nous Podcast conversation opens on a premise both guests return to repeatedly: sometime over the past century and a half, Muslim education split into two separate, poorly reconciled tracks — deeni ilm (religious knowledge) taught in madrasas, and duniyavi ilm (worldly knowledge) taught in schools and universities. Abdul Mujeeb Khan, an engineer-turned-executive-coach who spent seven years at McKinsey & Company before leaving to build leadership programs for Muslims, argues this split produces what he calls a "fragmented self" — a person who cannot express the holistic worldview their faith teaches them in their actual worldly life, because no institution ever taught them how. Maulana Sadiq Falahi, founder of Darul Uloom Imam Rabbani and known in scholarly circles as Abu Hasan Potak, arrives at the same diagnosis from the opposite direction: madrasas transmit enormous religious content — Quran, Hadith, jurisprudence — but rarely teach graduates how to translate that content into the practical, community-facing leadership work their role as ulama demands.

Khan's route from Hyderabad's riots to McKinsey

Khan traces his own reckoning with Muslim identity back to childhood in Hyderabad during communal riots around 1975-77, when his father, a university lecturer, was escorted home by police after violence broke out mid-commute — his first felt sense, at three or four years old, of what he calls "existential vulnerability" tied to being Muslim. A school teacher's mocking remark that "Muslims only bathe on Fridays," delivered in front of the class, compounded a quieter, constant undercurrent of shame around his religious identity that he says he didn't consciously process until much later in life.

After university and a stint as president of the Hyderabad chapter of the student group AIESEC, Khan pursued communication studies at MICA, then chased a filmmaking career under director Sudhir Mishra in Mumbai, learning craft from the ground up ("I told him: give me five minutes, and if you don't like me, you can throw me out — I'll even make the tea"). A finished script and a producer lined up, he was on the verge of directing his first film when his mother suffered a severe stress-induced autoimmune reaction — her body swelling and weeping fluid — over her fear that cinema would permanently estrange him from his faith. His father, previously supportive, told him plainly there was no middle ground: family, or the film. Khan spent nine months in what he describes as open argument with God over the loss, until a conversation with a friend crystallized his own answer: if he had ₹20 crore and genuinely cared about a social issue, would he make a film about it, or build an institution that produced concrete, sustained results? He chose the latter, walked away from cinema, and turned toward the 2002 Gujarat riots as the moment he decided the work had to be serious and structural rather than expressive.

The World Bank contradiction

An early formative disillusionment came through a World Bank-funded rural development assignment in interior Andhra Pradesh. Villagers were being pulled into self-help groups premised on female financial ownership ("this money belongs to you, not your husband," repeated at every meeting) — a genuinely progressive intervention on paper. But Khan documented a parallel rise in alcoholism, domestic conflict, infidelity and divorce that accompanied the new consumer goods and dish antennas flowing into these households, and submitted it in his report. The response, he says, was blunt: the Bank's mandated indicators showed money and consumer goods reaching villages — a success by their own metrics — and Khan's observations about family breakdown were simply deleted as "First World" concerns irrelevant to development in the "Third World." He connects this to what he calls "economic fundamentalism" — a framework, present in capitalism and communism alike, in which the market's measured outcomes define reality regardless of what harm goes uncounted alongside them.

Rebuilding a slum from the ground up

Around the same period, Khan and a small group of volunteers — inspired by child-labour activist Shanta Sinha — adopted Rasoolpura, a slum abutting Hyderabad's Begumpet airport, as a self-assigned responsibility, with no plan beyond the conviction that "leadership's first principle is taking responsibility." Early efforts to pull child labourers back into the local Zilla Parishad school collapsed once Khan actually visited it: collapsed classrooms doubling as garbage dumps, a 1,000-student capacity split across Urdu and Telugu shifts, contract teachers unpaid for eight months and gone, an average tenth-grade pass rate over ten years of just 13 percent. He came to a difficult conclusion: children who "dropped out" into labour were, in some respects, absorbing more real responsibility and life-skill than those who stayed enrolled in a school that offered them nothing but exposure to gambling, addiction and violence while nominally "in education."

The group's first major project, "Freedom Under Construction," rebuilt the school's boundary wall and classrooms through volunteer labour timed around India's Independence Day — a project nearly derailed when the military moved to block them from securing what turned out to be disputed cantonment land, before officials were persuaded the young volunteers were acting in good faith and the project proceeded overnight. A second early lesson came from watching volunteers' own condescension toward the children they mentored — pitying, deficit-framed language Khan says forced a wholesale redesign: the program was reframed not as social service but as a leadership program for the young professionals themselves, built on the premise that mentoring a slum child through matters like adolescent romantic pressure requires you to have first worked out your own answers to the same questions. The resulting Eklavya-Dronacharya tutoring and mentoring initiative, alongside a health clinic, disability-detection programs and self-help groups, eventually helped push the school's pass rate from 13 percent to roughly 95-97 percent — a result later documented in a published IIT Madras research paper.

Corruption, cooption, and a reckoning with identity

Khan's profile in transformation work caught McKinsey's attention around a Maharashtra school-reform project, and he formally joined the firm in 2011 after a year-long vetting process. That same year, he joined the Anna Hazare-led anti-corruption movement, walking from Kanyakumari toward Delhi, stopping in villages to argue that corruption isn't only manufactured at the top but sold cheaply at the bottom — in every vote traded for a plate of biryani or a bottle of liquor at election time. Along the way, RSS shakhas began engaging his small walking group as fellow travellers in "nation-building" — until, in one encounter, a senior RSS figure told him directly: "You shouldn't be Muslim. You're actually Hindu" — not an inclusive gesture, Khan says, but an erasure. He describes watching himself gradually absorb the logic that his "Indian-ness" was in quiet tension with his "Muslim-ness," until a moment of self-confrontation: if he was campaigning against corruption in the name of personal integrity while unable to hold his own religious identity with any integrity, what did that make him? He resolved, in the wake of the 2006 Sachar Committee report on Muslim socioeconomic marginalization, to fully "become Muslim" rather than negotiate the identity away — a decision that redirected his volunteer energy toward Muslim community engagement even as he remained inside McKinsey.

From IQ to EQ to "spiritual intelligence" — and a break with Gita Bellin

Khan traces corporate leadership theory's own evolution — from IQ-centred army-academy models discredited by catastrophically poor decisions in the two World Wars, to the 1980s-90s rise of emotional intelligence once neuroscience established emotion's role in cognition, to a more recent corporate embrace of "spiritual intelligence" as leadership's next frontier. He was sent, through McKinsey, to train with Gita Bellin, a well-regarded corporate transformation coach whose methods he initially found powerful — until she began asking him, in session, to "invoke the Prophet Muhammad's attention into the room" alongside cross-tradition mystical techniques, and described having recently spent fifteen days in a timeless meditative state she called "la makan." She had also devised a numeric "truth scale," on which she ranked Quranic consciousness at roughly 250 out of 1,000, Christian consciousness at 400, and Buddhism at 700-800. For Khan, this was the breaking point: a syncretic, self-focused spiritual-industrial framework, engineered to make people "feel" transformed through invoked trance states, rather than a specific, textually rooted tradition oriented toward submission to God. It sharpened his conviction that authentic transformation work had to be built from Islam's own primary sources — Quran, Hadith and Seerah — rather than borrowed corporate spirituality with Islamic vocabulary layered on top.

Amaan Fellowship: giving ulama a method, not just content

By 2017, Khan concluded his own transformation had to happen "inside the ummah" rather than inside McKinsey, however much he valued the firm's rigor. The insight that shaped Amaan Fellowship, the program he built with backing from senior scholars including Maulana Saeedur Rahman Azmi Nadwi, was that Islamic scholars — ulama — already hold the deepest, most textually authoritative "content" for transformation, but madrasas rarely teach the method of translating that content into felt, lived experience for a congregation. Traditional religious instruction, he and Falahi agree, tends to remain in bayan (declarative sermon) form — "Allah said this, Allah said that" — rather than giving people an experiential encounter with a verse that reshapes how they actually see the world. Amaan Fellowship pairs Islamic content with the kind of practical, skills-based transformation methodology Khan learned at McKinsey: communication, project management, data collection and analysis, team-building, community mobilization — treating each fellow as a future "civil servant of Islam" who, over three years, should be able to reproduce these capacities in at least a hundred others within their own community, making their personal presence eventually unnecessary.

Falahi's parallel path, from a Mumbai slum to Darul Uloom

Maulana Sadiq Falahi's own journey began in Halapur, a slum in Mumbai's Kurla area where his family lived for 27 years after his father, a port dockworker, moved from coastal Maharashtra purely to educate his children. Falahi's serious religious formation began in eighth grade through a youth tabligh mission, but his path through both a regular school and later multiple madrasas left him each time disillusioned — not finding, as he'd hoped, a total, integrated formation of the self in either. That dissatisfaction eventually crystallized into the conviction that religious and worldly education needed to be fused into a single institution, not run as parallel tracks that dissolve the moment a student goes home each evening. He and a small team spent three years designing what became Jamia Shah Abdul Aziz Dehlvi, a residential madrasa built around sustained, embedded character formation rather than daily instruction alone — training ulama through practical community projects such as village sanitation drives, alongside religious study. He later founded Darul Uloom Imam Rabbani, deliberately charging an annual fee of roughly ₹93,000 against the near-universal assumption that religious education must be free or community-subsidized — a decision he says was necessary to make the institution financially self-sustaining rather than dependent on public charity indefinitely.

Falahi was introduced to Khan's work through the Millat Foundation, initially in an unofficial vetting role — colleagues wanted him to review Khan's program's Islamic soundness before endorsing it to others. What won him over, he says, was recognizing in Khan's method precisely what he'd long argued was missing from religious pedagogy: that "teaching the sciences of character formation is a prerequisite for actually forming character" — a conviction he'd held before ever meeting Khan, now demonstrated in practice.

What tasawwuf is not

A significant stretch of the conversation is given to Falahi distinguishing authentic Islamic tazkiya (self-purification) from what he sees as a global marketplace of secular "spirituality" — including corporate mysticism like Bellin's — that superficially resembles it. His account rests on a psychology of three inborn human faculties: aql (intellect), ghadab (assertive/aggressive drive) and shahwa (desire) — each capable of excess (ifraat) or deficiency (tafreet), with virtue located in their balanced mean (i'tidal). Excess intellect curdles into cunning; its absence into foolishness; balance produces wisdom. The same logic governs anger (tyranny versus cowardice, balanced by justice) and desire (shamelessness versus indifference, balanced by chastity). Where tasawwuf's disciplined practices — reduced eating, reduced sleep, reduced speech — cultivate a rare inner faculty he calls widan by continuously subordinating the self's competing appetites to God, other spiritual traditions and modern "consciousness" practices, he argues, cultivate the same rare faculties toward a fundamentally different end: strengthening and elevating the self, rather than surrendering it. The distinguishing test, in his account, is what happens after mastery is attained — a Sufi's spiritual attainment bends back toward prostration before God, while secular consciousness-work, even when it borrows tazkiya's outward techniques, ultimately serves the practitioner's own sense of power or self-actualization.

Reaching youth and professionals

Beyond Amaan Fellowship for ulama, Khan describes Trailblazer, a three-and-a-half-year leadership program for those aged 15-25 — an age range he frames as decisive for how a person will ultimately answer two foundational questions: who am I, and who is my Creator. The program runs through three phases — Trail Seeker, Trail Maker and Trail Blazer — moving participants from intensive self-formation workshops toward engagement with real social challenges, and eventually toward building semi-autonomous youth collectives bound by a shared constitution but free to address their own local community's problems. A newly announced third track, "Architecture of the Heart," targets working professionals navigating the tension between religious identity and corporate success, pairing Islamic psychology of the self with professional coaching methodology — an attempt, as Khan frames it, to build "a home-grown Islamic model" for leadership development rather than retrofitting Islamic vocabulary onto imported corporate or New Age frameworks.

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