Nous Podcast· 21 Mar 2026· 36:53

This Is Not Strategic Silence, This Is Surrender’ — Yashwant Sinha on India’s Foreign Policy

In this sharp and probing conversation, Senior Journalist Bushra Khanum speaks with Yashwant Sinha (Former Finance Minister of India & Former External Affairs Minister) on India’s foreign policy posture amid escalating tensions in West Asia. The discussion examines whether India’s silence reflect…

Full Transcript

कितने शर्म की बात है कि 140 [संगीत] करोड़ के इस देश को अमेरिका बैठ के चला रहा है। यह स्ट्रेटेजिक साइलेंस है। यह सरेंडर है। और फिर उसके बाद यह कहा जा रहा है कि ईरान आपको फ्री पास देता रहे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोन से तेल ले जाने के लिए। हाउ इज [संगीत] दिस पॉसिबल इवन? और अगर यह ईरान के तेल को डिस्ट्रप्ट कर रहे हैं तो ईरान को पूरा हक है कि वो उनके तेल को डिस्टरप्ट करें। क्या टेिकल न्यूक्लियर जो वेपन है क्या आपको लगता है फ्रस्ट्रेशन में इजराइल इसका इस्तेमाल [संगीत] कर सकता है और इसीलिए हमारे देश में एक भयानक संकट उत्पन्न हो उसके पहले हमको कुछ करना चाहिए युद्ध रोकने के लिए तो भारत क्यों नहीं कर रहा है कुछ और अगर आगे स्टेट ऑफ फार्मू [संगीत] से जहाज नहीं आते हैं तो फिर कितना बड़ा क्राइसिस भारत के लिए पैदा हो सकता है ईरान कोई ऐसा मुल्क नहीं है कि वो [संगीत] सामने खड़े होकर लड़ाई नहीं लड़ सकता है। के लोग नहीं लड़ सकते हैं और इस बार तो और कट्टर युद्ध होगा। क्या ऐसे राज हैं जिसकी वजह से वह इतने झुके हुए हैं? आज तक देश [संगीत] का कोई प्रधानमंत्री इतना झुका हुआ नजर नहीं आया। इजराइल और इजराइल का मकसद यह है कि कोई भी उसके सामने खड़ा नहीं हो सके। उसे नजर नहीं मिला सके। तो बाकी सबको तो मैनेज कर लिया उन लोगों ने लगभग लेकिन ईरान मैनेज नहीं हुआ था। क्या एस्टीन की तरफ आपका कोई इशारा है? बिल्कुल फाइल्स बिल्कुल है। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद। इस वॉर को 20 दिन से ज्यादा का वक्त गुजर गया है और लग ही रहा था कि शायद इस वॉर में की इंटेंसिटी में कुछ कमी देखने के लिए मिले। बातचीत के कुछ दरवाजे खुले। नेगोशिएशन के कुछ दरवाजे खुले क्योंकि इस तरह की कोशिशें होती हुई नजर आ रही थी। लेकिन इजराइल को शायद यह पसंद नहीं था। जिस तरह से ट्रंप लगातार ये कहते हुए नजर आ रहे थे कि जल्द ही ये वॉर खत्म होने जा रही है। इस तरफ जो बातचीत थी उनकी या जिस तरह के वो बयान दे रहे थे लग रहा था कि वो किसी भी तरीके से इस वॉर से बाइज्जत तरीके से निकलना चाहते हैं और यह भी लग रहा था कि बुरी तरीके से इस वॉर में जो जस लॉबी है जो इजराइल है उसके कहने पर फंस गए हैं और उनको ये लग रहा था दो-ती दिन में कहानी खत्म हो जाएगी। लेकिन यह तो अनंडिंग जो वॉर है वह होती हुईज़ आ रही है। अब इजराइल ने एक बार फिर से जो टॉप लीडरशिप है ईरान की उसको निशाना बनाया जिसमें अली लारीजानी और जो कमांडर हैं अली लारेजानी के जो बेटे हैं उनकी शहादत हुई। ईरान ने कहा कि अब वो और ज्यादा इंटेंस तरीके से इन शहादतों का इंतकाम लेगा और उसने लिया भी। इस बीच इजराइल ने जो साउथ वार्स का जो ईरान का जो गैस प्लांट है उस पर हमला किया। ये बहुत बड़ा हमला था और ईरान ने फिर इसको लेकर भी रिटेलिएट किया। ईरान ने जो जीसीसी मुालिक में जो अमेरिकन इंटरेस्ट हैं उन पर हमला किया। क़तर में उसने जो सबसे बड़ा गैस प्लांट है उस पर उसने हमला किया है और अब जो ऑयल क्राइसिस है जो पहले से ही दुनिया में बड़े पैमाने पर पैदा हो गया है उसमें और इजाफा अब देखने के लिए मिलेगा और यह साफ हो गया है कि यह वॉर अब आने वाले आने वाले वक्त में तो थमने नहीं जा रही है बल्कि इसकी इंटेंसिटी और ज्यादा बढ़ती हुई नजर आ रही है। जो कैंट जो कि काउंटर टेररिज्म चीफ थे यूएस के जिन्होंने अभी रिजाइन किया है ये कहते हुए कि ईरान सीधे तौर पर अभी किसी तरह का यूएस के लिए थ्रेट नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि जो जस लॉबी है वो एक तरह से उसके प्रेशर में यह हम यह हमला जो है वह अमेरिका ने ईरान के ऊपर किया है और यह भी उन्होंने कहा कि किस तरह से जो यूएस की सरकार है उसको एक तरह से जस लॉबी जो है वो कंट्रोल करती है और उनके कहने पर ही यह हमला किया गया है। तो आप समझिए कि किस तरह से ये हमला इजराइल और जो जूस लॉबी है अमेरिका में उसके कहने पर ये किया गया है और अमेरिका को इसमें एक तरह से घसीटा गया है और ये साफ तौर पर ट्रंप के अलग-अलग बयानों से साफ तौर पर देखने के लिए मिलता है। हालांकि जो कैंट के इस्तीफे के बाद ट्रंप ये कह रहे हैं कि इससे बहुत ज्यादा कोई फर्क नहीं पड़ेगा। लेकिन आप समझिए कि यह कितना बड़ा इस्तीफा है और एक तरह से जो ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन है उसमें भी बगावत देखने के लिए मिल रही है और वह आवाजें और ज्यादा बुलंद होती हुई नजर आ रही हैं। मैं यहां पर कई और चीजें हैं जिनका आगे बातचीत में जिक्र करूंगी जो बहुत इंपॉर्टेंट है जिसमें तुलसी गाबाट का अभी रिसेंट में दिया गया उनका बयान है जिसको बहुत इंपॉर्टेंट तरीके से दिया जा रहा है। जिन कंट्रीज का उन्होंने जिक्र किया है। मैं बात करूंगी इंडियन फॉरेन पॉलिसी की इस पूरे वॉर में भारत के रोल की और भारत की जो इंडियन फॉरेन पॉलिसी है वो किधर जा रही है जो ऑयल क्राइसिस एलपीजी क्राइसिस है वो क्या आगे हम और बढ़ता हुआ देखेंगे और सिर्फ अभी दो जहाज भारत में आए हैं क्या स्टेट ऑफ हार्मोन से और भारत में क्या ईरान इजाजत देगा कि और जहाज आए या फिर हम आगे भारत में संकट को बढ़ता हुआ देखेंगे। मेरे साथ बहुत खास मेहमान आज जुड़ गए हैं। देश के जानेमाने वरिष्ठतम नेताओं में शुमार यशवंत सिन्हा जी जो कि एक्स फाइनेंस मिनिस्टर और फॉरेन मिनिस्टर रह चुके हैं और उनसे बेहतर इंडियन फॉरेन पॉलिसी और जो फिलहाल जो पूरी सिचुएशन बनी हुई है उस पर कोई और बात नहीं कर सकता था इसलिए मैंने उन्हें खासतौर पर आज कार्यक्रम में मैंने उन्हें बुलाया है। यशवंत जी नाउज़ नेटवर्क में आपका बहुत-बहुत स्वागत है। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। थैंक यू। पहला रिएक्शन आपका मैं इससे पहले मैं इंडियन फॉरेन पॉलिसी और भारत के रोल और भारत में जिस तरह का पूरा क्राइसिस है उसकी मैं बात करूं यशवंत जी इस जंग को आप किस तरफ जाता हुआ आप देख रहे हैं खासतौर पर कल जिस तरह से इजराइल ने हमला किया है गैस जो फैसिलिटी है उस पर और उसके बाद ईरान ने जिस तरह से रिटालिएट किया है क्या आप पूरी दुनिया में तेल के दाम और तेल को लेकर एक बड़ा और बहुत खतरनाक क्या क्राइसिस पैदा होता देख रहे हैं बिल्कुल ये सारी दुनिया की अर्थव्यवस्था के ऊपर इसका बहुत बड़ा कुप्रभाव पड़ना शुरू हो गया है और आगे चलकर और भी यह मामला गंभीर होगा। यह बिल्कुल एक वाहियात किस्म की लड़ाई है। इसका कोई तुक नहीं है। आपने तुलसी गाबार्ड की बात की, कैंट की बात की। ईरान नंबर एक न्यूक्लियर वेपंस नहीं बना रहा था। उसकी कोई ख्वाहिश नहीं थी तो न्यूक्लियर वेपंस बनाए। जहां तक मेरी जानकारी है वो यूरेनियम एनरचमेंट इसलिए कर रहा था कि वह इसका इस्तेमाल पावर जनरेशन प्ले करना चाहता था। ऊर्जा के लिए करना चाहता था। और अगर मान लीजिए कि उसने किसी रेड लाइन को क्रॉस भी किया तो इसको देखने की जिम्मेदारी किसकी थी? इसको देखने की जिम्मेदारी थी इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी को। क्योंकि उसी की यह जिम्मेदारी है कि वह दुनिया भर में जो डेवलपमेंट हो रहे हैं उस पर ध्यान रखें। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी की तरफ से कोई इस तरह का बयान नहीं आया कि ईरान न्यूक्लियर वेपंस बनाने के करीब है। और अगर वो करीब था भी तो अमेरिका का ही दावा है कि पिछले साल उन लोगों ने जो ईरान के ऊपर आक्रमण किया था तो उसमें उनके न्यूक्लियर फैसिलिटीज को पूरी तरह से बर्बाद कर दिया था। तो इसलिए यह बिल्कुल ही बेबुनियाद किस्म की का अप्रोच है। इसमें अमेरिका मुझे लगता है कि इजराइल के चक्कर में फंस गया। इजराइल के बारे में दो बात मैं कह दूं। नंबर एक कि आज इजराइल के में जो लोग सत्ता में हैं वो लोग उस क्षेत्र में गुंडागर्दी पर आमादा है। प्योर गुंडागर्दी होती है जो मोहल्ले का एक गुंडा होता है ना जो सबको चलते हुए धक्का मारता है। दबाने की कोशिश करता है इजराइल और इजराइल का मकसद यह है कि कोई भी उसके सामने खड़ा नहीं हो सके। उससे नजर नहीं मिला सके। तो बाकी सबको तो मैनेज कर लिया उन लोगों ने लगभग लेकिन ईरान मैनेज नहीं हुआ था। तो आज के दिन यह सारा युद्ध जो हो रहा है वह ईरान को नष्ट करने के लिए हो रहा है। उसकी ताकत को खत्म करने के लिए हो रहा है। इन द प्रोसेस दुनिया को कितना नुकसान होगा इसकी कोई चिंता नहीं है। ना इजराइल को है ना अमेरिका को है। और नुकसान जो है खास करके भारत जैसे देश को जो कि 80% तेल दुनिया के दूसरे देशों से आयात करता है। तो हम ऑलरेडी बहुत गंभीर संकट में फंस गए हैं और उसका पूरा प्रमाण आज हमारे डेली लाइफ में दिख रहा है। तो अब इस मौके पर हमको क्या करना चाहिए था? आपने फॉरेन पॉलिसी की बात की कि हमको इस समय क्योंकि ईरान भी हमारा दोस्त है, इजराइल भी हमारा दोस्त है, अमेरिका भी हमारा दोस्त है। तो इस समय क्या करना चाहिए था? इस समय हमको जो नैतिकता होती है ना फॉरेन पॉलिसी में उस नैतिकता का हवाला देकर एक स्ट्रांग स्टैंड लेना चाहिए था और ईरान के साथ खड़े होना चाहिए था और अमेरिका और इजराइल को दो टू कहना चाहिए था कि भाई ये तुम्हारा आक्रमण गलत है इस वॉर को तत्काल रोको भारत ने ऐसा कुछ नहीं किया है। भारत एक कुछ लोग उसको उसकी तारीफ कर रहे हैं कि भारत स्ट्रेटेजिक साइलेंस मेंटेन कर रहा है और ये बहुत अच्छा है। पहले भी बहुत सारे केसेस हुए हैं जिसमें ऐसा इसने किया है। मैं मानता हूं कि सर्वथा गलत है और इंडिया को स्टैंड इसमें लेना चाहिए और लेना चाहिए। उसके हक में जो आक्रमण का शिकार है उसके हक में नहीं जो आक्रमणकारी है। जी बिल्कुल भारत के लिए आप और कितनी मुश्किलें आगे बढ़ते हुए देख रहे हैं क्योंकि रशिया से तेल लेने के लिए 30 दिन की इजाजत अमेरिका ने दी है। इजाजत। यानी अब अमेरिका 140 करोड़ के देश को 140 करोड़ भारतीय जो हैं उसके इतने बड़े देश को अब अमेरिका ये इजाजत दे रहा है कि आप 30 दिन का तेल जो है ले सकते हैं। रशिया से और ईरान से यशवंत जी हम रुपी में हम तेल खरीदते थे और जाहिर सी बात है कि ये हमारे लिए एक बहुत बड़ा बेनिफिट था। लेकिन जब से ये सेंक्शन लगा है कि हम ईरान से और रशिया से तेल नहीं खरीद सकते तो जो हमारा जो जो फॉरेक्स रिजर्व है वो भी जाहिर सी बात है हमारा घटा है और इसीलिए रुपया कमजोर हुआ है और इसीलिए डॉलर मजबूत हुआ है। मेरा सवाल आपसे यह है कि क्या आगे आने वाले दिनों में रुपए को और कमजोर होता आप देखेंगे और दूसरा अह तेल का क्राइसिस और ये एलपीजी का जो क्राइसिस है अभी देश में इसको आप और कितना बढ़ते हुए देख रहे हैं हिंदुस्तान में क्योंकि बार-बार यह कहा जा रहा है वही जो एक झूठी इमेज गढ़ी जाती है कि एवरीथिंग इज जस्ट ऑल राइट यह कहना कि अपोजिशन अफवाह फैला रहा है लोग मर रहे हैं लाइनों में लगे हुए 5 77000 की उन्हें सिलडर्स मिल रहे हैं और यहां कहा जा रहा है कि अफवाह फैलाई जा रही है। दो जहाज सिर्फ आए हैं और वह भी ईरान ने ह्यूमैनिटेरियन ग्राउंड पर क्योंकि उन्होंने कहा कि जो हिंदुस्तान की जो जनता है वो ईरान के पक्ष में है इसलिए उन्होंने इजाजत दे दी और अगर आगे स्टेट ऑफ हार्मू से जहाज नहीं आते हैं तो फिर कितना बड़ा क्राइसिस भारत के लिए पैदा हो सकता है। देखिए यहां तो हम भारत में प्रचार की दुनिया में जी रहे हैं। सरकार जो है वो इतना जबरदस्त प्रचार कराती है कि उसमें सच दब जाता है। सच समाप्त हो जाता है। अब जैसे ये दो जहाज शिवालिक और एक और कोई जहाज वो एलपीजी लेकर आ रहे हैं भारत और यहां पर इतना प्रचार हुआ कि देखो स्टेट ऑफ हार्मोस क्रॉस कर गया। मोदी जी की एक फोन कॉल ने और यह बात मैं किसी इधर-उधर के लोगों की नहीं कर रहा हूं। कल शिवराज चौहान जो हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री हैं और आज एग्रीकल्चर मिनिस्टर हैं। किस तरह लहरा रहा है कि हाथ लोकसभा में बोल रहे थे कि मोदी जी के एक फोन कॉल ने ऐसे कर दिया। मोदी जी के एक फोन कॉल ने वैसे कर दिया। वह जो दो जहाज आ रहे हैं एलपीजी लेके उसके बारे में सूचना यह है कि वह मात्र दो दिन का सप्लाई ले आ रहे हैं। भारत का जो कंजमशन है एलपीजी का उसमें दो दिन में वह दोनों जहांजहां के एलपीजी हमारी मार्केट में आएगा तो खत्म हो जाएगा और हम ऐसा प्रचार कर रहे हैं कि जैसे कि पूरा एलपीजी क्राइसिस सॉल्व हो गया। मैं इसके पक्ष में नहीं हूं कि अफवाह फैलाई जाए। लेकिन क्या वह आदमी जो लाइन में खड़े होकर मर गया हार्ट अटैक से वह अफवाह है क्या यह बात जो एलपीजी सिलडर्स आ रहे हैं एलपीजी गैस आ रहा है तो वह दो ही दिन के सप्लाई को पूरा करेगा यह क्या अफवाह है तो इसलिए मोदी सरकार लगातार सच्चाई को छिपाने का प्रयास कर रही है और कहीं से कुछ सच्चाई सामने आती है लोग लाते हैं तो उसके बारे में कहा जाता है कि अफवाह फैला रहे हैं तो खैर उनकी बात छोड़ दीजिए। मैं ये कह रहा हूं कि भारत के लिए एक तो बहुत गंभीर संकट है। सबसे पहले चूहे भागते हैं। कोई शिप अगर डूबने लगता है तो सबसे पहले चूहे भागते हैं। हमारे यहां इसका सबसे बड़ा प्रमाण कि शिप में कुछ खराबी आ गई है वो स्टॉक मार्केट है। स्टॉक मार्केट में धड़ाम अगर हुआ है आज तो वो इसलिए हुआ है कि लोग देख रहे हैं एक एक तरफ लड़ाई खत्म नहीं हो रही है। कोई भी इंडिकेशन नहीं है कि लड़ाई खत्म हो रही है। कोई जानता नहीं है कि लड़ाई कैसे खत्म होगी। और उसका कुप्रभाव पूरी दुनिया के ऊपर पड़ रहा है। हमारी अर्थव्यवस्था के ऊपर भी पड़ रहा है। मैं आपको एक बात और बताऊं कि हमारे यहां जो स्टॉक मार्केट में फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स हैं विदेशी जो पैसा लगाते हैं वो अपना पैसा निकाल रहे हैं। अब उसमें अह अह जो इंडियन इन्वेस्टर्स हैं, वह डालते हैं, तो कुछ हद तक बैलेंस होता है। अगर नहीं डालते हैं, तो बैलेंस नहीं होता है। अभी दो दिन पहले हमने देखा कि मार्केट बहुत चढ़ गया। वह बॉटम फिशिंग उसको बोलते हैं। कि जब मार्केट बहुत गिर गया था तो लोगों ने सोचा सस्ते में खरीद लो तो कुछ खरीदारी हुई तो मार्केट ऊपर गया। तो क्या होता है कि फॉरेन इंस्टिट्यूशनल इन्वेस्टर्स अपना शेयर बेचते हैं बाजार में और फिर वह जाते हैं रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी कि मनी मार्केट में और मनी मार्केट में अपने रुपए को वो कन्वर्ट करते हैं डॉलर्स में। तो डॉलर की का डिमांड बढ़ता है तो जब डॉलर का डिमांड बढ़ता है तो रुपए की कीमत घटती है उसकी तुलना में यही पूरी व्यवस्था है और आरबीआई जो है वह केवल इस बात की के ऊपर निगरानी रखता है कि मार्केट में बहुत ज्यादा हलचल नहीं हो। अगर बहुत ज्यादा हलचल होती है तो वह डॉलर्स रिलीज करता है ताकि मार्केट स्टेबलाइज हो। उसका आरबीआई का काम यह नहीं है कि वो डॉलर रूपी का जो पार वैल्यू है उसको तय करें कि 91 होगा कि 90 होगा कि 92 होगा। यह आरबीआई का काम नहीं है। आरबीआई का काम है यह देखना कि मार्केट में बहुत हलचल तो नहीं है। अगर बहुत उथल-पुथल है मार्केट में तब वह आता है मार्केट में इंटरवीन करता है। तो इस तरह करके अगर हम देखें तो हमारे देश के ऊपर इन्वेस्टर्स का विश्वास घटेगा। घट रहा है। नंबर एक। नंबर दो रुपए की कीमत डॉलर के मुकाबले में गिर रही है तो उसका नतीजा यह होगा कि जो हम इंपोर्ट करते हैं वह सारा कुछ महंगा हो जाएगा जिसमें तेल भी है। कच्चा तेल एक तो उसकी कीमत चली गई $ के ऊपर तो हम उसको इंपोर्ट करेंगे तो अपने कंज्यूमर्स के लिए नेसेसरीली हमको बढ़ाना पड़ेगा। जैसे कि एलपीजी में हम लोगों ने किया। उसके बाद वह जो आएगा उसमें दूसरा एडिशन हो जाएगा रुपए की कीमत कि हम पहले अगर $ खर्च करके जो लाते थे उसका रुपए का वैल्यू एक x अमाउंट था तो अब $ खर्च करके तेल लाएंगे तो तेल की कम की मात्रा भी घटेगी और रुपए में उसकी कीमत और ज्यादा हो जाएगी क्योंकि रुपया गिर रहा है तो ये सब इन सब समस्याओं से हमें जूझना पड़ेगा केवल एलपीजी का सवाल नहीं है। हमारे यहां जो रिजर्व्स हैं तेल के वह नाकाफी हैं और तेल का भी संकट हो सकता है। अभी जो अमेरिका ने हमको आपने कहा ठीक कि इजाजत दी है अलऊ किया है कि हम 30 दिन तक रूस का तेल खरीद सकते हैं। अब रशिया का तेल कौन सा तेल जो कि आज प्रोड्यूस नहीं हो रहा है जो कि प्रोड्यूस होकर हाई सीज में है। वो हाई सीज में वो जो तेल है वह रशा इंडिया को बेच सकता है। यह इजाजत अमेरिका ने हमको दी है। कितने शर्म की बात है? कितने शर्म की बात है कि 140 करोड़ के इस देश को अमेरिका बैठ के चला रहा है। मोदी जी के बारे में अनाप शनाप बोल रहा है। हमारे देश के प्रधानमंत्री हैं। हमको इजाजत दे रहा है। और हम खामोश हैं। स्ट्रेटेजिक साइलेंस यह स्ट्रेटेजिक साइलेंस है। यह सरेंडर है। यह हमको ऐसा लगता है कि हम अमेरिका के मातत देश हो गए हैं। वी हैव बिकम अ सेटेलाइट कंट्री ऑफ़ द यूएस। तो ये तो हमारे लिए बहुत तो हर दृष्टिकोण से फॉरेन पॉलिसी हमारी कैसे चल रही है, कैसे चलेगी आगे जाकर? और इकोनॉमिक पॉलिसी का क्या होगा आगे चलकर? इन सबके ऊपर आम जनता को इससे बहुत आगे चलकर नुकसान होने वाला है और यह हमारे लिए बहुत चिंता का विषय है। जी तेल के अलावा क्या यशवंत जी यूरिया भी हम मिडिल ईस्ट कंट्रीज से अ इफ आई एम नॉट रोंग 25% हम शायद इंपोर्ट करते हैं। तो अगर जिस तरह के पूरे हालात इस जीसीसी जो मुालिक हैं जो कंट्रीज हैं उनमें बने हुए हैं और लगातार वो भी अंडर अटैक है क्योंकि जाहिर सी बात है ईरान अपनी सेल्फ डिफेंस में और जो अमेरिकन बेसिस हैं उन पर हमला कर रहा है। मिसाइल्स अगर यूएई की धरती से अगर दागे जा रही हैं ईरान में तो ईरान जाहिर सी बात है रिटेलिएट करेगा। यूएई में भी करेगा और दूसरे कंट्रीज में भी करेगा क्योंकि अमेरिका उन बेसिस को इस्तेमाल करके ईरान के ऊपर हमला कर रहा है और ईरान लगातार उसका जवाब दे रहा है। चाहे वो गैस फैसिलिटीज हो, ऑयल फैसिलिटीज हो उन पर हमला करके कल रात उसने बहुत खतरनाक हमले किए हैं जिसको साफ तौर पर देखा जा सकता है। तो क्या आपको लग रहा है कि तेल गैस के अलावा इस तरह के संकट भी क्या देश में आ सकते हैं? क्या आप फूड क्राइसिस भी होता देखेंगे? यूरिया अगर वक्त पे नहीं पहुंचेगा और देश इसके लिए सरकार इसके लिए कितनी तैयार आपको नजर आती है क्योंकि यहां तो ऐसा लगता है कि सिर्फ ऑप्टिक्स की पॉलिटिक्स हो रही है। लगातार अगर आप प्रधानमंत्री के Twitter हैंडल को ही देखें तो वो कंडेम तो करते हैं कि जो जीसीसी के अलग-अलग कंट्रीज हैं उनके ऊपर जो ईरान हमला कर रहा है लेकिन ईरान के ऊपर जो इतने खतरनाक हमले हो रहे हैं जो उसके ऊपर इललीगल अटैक किए गए हैं उसको कंडेम नहीं कर रहा। और फिर उसके बाद यह कहा जा रहा है कि ईरान आपको फ्री पास देता रहे स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस से तेल ले जाने के लिए। हाउ इज दिस पॉसिबल इवन? नहीं बिल्कुल गलत बयानी हो रही है सरकार की तरफ से और आपने ठीक सवाल उठाया फर्टिलाइजर का। तेल ही नहीं फर्टिलाइजर की कीमत भी बढ़ेगी और फर्टिलाइजर की कमी भी होगी। मैं अफवाह नहीं फैला रहा हूं। जाहिर सी बात है कि जो हमारा यूरिया आता है गल्फ कंट्रीज से उसके ऊपर असर पड़ा है और पड़ेगा। और दूसरी बात यह है कि हमारे यहां जो मौसम आने वाले दिनों में है वो खेती का मौसम है। अभी जून जुलाई से हमारे यहां खेती शुरू हो जाएगी बड़े पैमाने पर और उस समय देश में अगर फर्टिलाइजर की कमी होती है तो किसानों का बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा उससे। तो इसलिए अब सरकार क्या कर रही है? फर्टिलाइजर की तरफ ध्यान नहीं जाता है लोगों का। तेल की तरफ आजकल जा रहा है कच्चे तेल की तरफ। लेकिन आपने बहुत अच्छा सवाल उठाया कि फर्टिलाइजर की भी किल्लत होने जा रही है। और ऐसे समय में होने जा रही है जबकि कृषि का मौसम आ रहा है भारत में। तो इसलिए उसकी भी चिंता सरकार को भी करनी है। हम सबको करनी है। और यह भी बड़ा एक नुकसान कर सकता है भारत का। इसको ध्यान में हमको रखना पड़ेगा। और जीसीसी कंट्रीज देखिए ईरान को इन्होंने आज कितने 19 दिन हो गए 20 दिन हो गए 20 दिन हो गए और जितना भयानक हमला ये दोनों बदमाश देश यूएस और इजराइल मिलकर कर रहे हैं ईरान के ऊपर कि सब कुछ सब कुछ ईरान का डिस्ट्रॉय कर दो तो ईरान मरता क्या ना करता वो भी तो करेगा और अगर वो अटैक गल्फ कंट्रीज की तरफ के बेसिस से हो रहा है तो उन बेसिस पर तो अटैक करेगा ही करेगा वो और अगर यह ईरान के तेल को डिसरप्ट कर रहे हैं तो हमको ईरान को पूरा हक है कि वो उनके तेल को डिसरप्ट करें। आफ्टर ऑल उनकी जो तेल की खवत हो रही है जहाजों की और हवाई जहाजों की वो तेल तो वहीं से वो लग रहे हैं। तो इसलिए आप ईरान को दोष नहीं दे सकते हैं कि उसने ऐसा क्यों किया? और मोदी जी बहुत गलत कर रहे हैं कि तत्काल वो फोन उठाते हैं, फोन करते हैं कुवैत को, आबू धाबी को और यूएई को कि भाई ईरान बहुत गलत कर रहा है और कंडेम करते हैं इसको। अमेरिका और इजराइल को कंडेम करने की हिम्मत उनको नहीं है। लेकिन ईरान को कंडेम कर रहे हैं और साथ में हम कहते हैं कि भाई ईरान ने हमारी शिप को अलऊ कर दिया स्टेट ऑफ़ हार्मोस से पास करने को। जबकि यह सच नहीं है। और फिर यह होता है कि हाथ लहरा लहरा के शिवराज जी चौहान जी लोकसभा में कहते हैं एक फोन कॉल पर ऐसे हो गया। एक फोन कॉल वैसे हो गया। वॉर रुकवादी पापा आपको याद है ना? वॉर रुकवादी पापा। अब वॉर रुकवादी पापा, एक ऐड नहीं रहा। सरकार के मंत्री बहुत रुकवादी पापा कहते चल रहे हैं और लोकसभा जैसी पवित्र संस्था में कह रहे हैं तो ये तो हाल है हमारे देश का और हमें बहुत तरह के संकट से गुजरना पड़ेगा। यह युद्ध कैसे समाप्त होगा यह कहना बड़ा मुश्किल है आज के दिन। भारत की भूमिका हो सकती थी। कोई भी आज भारत का प्रधानमंत्री होता ना तो वह भारत की भूमिका निभाता। मैं आपको एक बात और जोड़ना चाहता हूं इसमें जी कि ब्रिक्स के बारे में कहा जा रहा है कि भाई ईरान तो युद्ध में है और ईरान भी ब्रिक्स का मेंबर है तो ईरान ब्रिक्स में कोई सहमति नहीं बनेगी। बहुत पहले जब मैं विदेश मंत्री था तो मैंने एक संस्था बनाई थी दो और देशों के साथ मिलकर जो एक ब्राजील था और एक साउथ अफ्रीका था। उसका नाम है इप्सा। इंडिया, ब्राजील, साउथ अफ्रीका। उसमें तीन ही देश हैं। ब्रिक्स जब आया एक्जिस्टेंस में तो ब्रिक्स ने एक तरह से ओवरटेक कर लिया। इसको इब्सा को और उसके बाद ब्रिक्स बढ़ते चला गया। तब 17 18 देश जो पहले एक ग्रुप ऑफ 18 करके होता था। उस तरह की जनता बन गई है जिसमें कि अब कंसेंसस बनाना बहुत मुश्किल है। लेकिन इ्सा कंसेंसस बन सकता है क्योंकि तीन ही देश उसमें हैं। क्या भारत को इस समय इ्सा की बैठक नहीं बुलानी चाहिए? क्या तत्काल एक कंसेंसस वहां नहीं बनानी चाहिए? और अगर भारत अकेले युद्ध रोकने का प्रयास नहीं कर सकता है तो मैं तो यह कहूंगा कि भारत को इ्सा की बैठक बुलाकर और इ्सा के माध्यम से युद्ध को रोकने का प्रयास करना चाहिए। तत्काल रोकने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि हमको सबसे ज़्यादा नुकसान हो रहा है। बाक़ी लोगों को भी लोगों को तो यह कैपेसिटी है कि वह हमसे ज़्यादा दिन तक इसको बर्दाश्त कर सकते हैं। लेकिन हम हमारी इसमें जो कैपेसिटी है बर्दाश्त करने की वह बहुत कम है। और इसीलिए हमारे देश में एक भयानक संकट उत्पन्न हो उसके पहले हमको कुछ करना चाहिए युद्ध रोकने के लिए। हम तो भारत क्यों नहीं कर रहा है कुछ? कोई भी सरकार इंडिया में होती इस समय तो वह कोशिश करती कि हमारे पड़ोस में जो युद्ध हो रहा है उसको रोका जाए। लेकिन हम नहीं कर रहे हैं और आपने बिल्कुल ठीक कहा कि यूएस में वो कट साहब जो थे उन्होंने कहा है कि युद्ध करना गलत है। इस्तीफा दे दिया। तुलसी गबाटार्ड का जो स्टेटमेंट आया है और भी स्टेटमेंट्स हैं जिसमें यह कहते हैं वह लोग कि यह कहना बिल्कुल गलत है कि ईरान एक तो न्यूक्लियर वेपन बना रहा था या ईरानी हमला करने वाला था ऐसा कुछ नहीं था यह गलत है और यह बिल्कुल वो कहानी जो है कि तूने नहीं किया तो तेरे बाप ने किया लेकिन मैं तुमको मारूंगा खाऊंगा वही ट्रंप की नीति है इस समय और हमको खड़े होने की उसके खिलाफ हिम्मत नहीं आखिर इतना इतने मजबूर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्यों नजर आ रहे हैं? क्या ऐसे मैं इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहती लेकिन फिर भी क्या ऐसे राज हैं जिसकी वजह से वो इतने झुके हुए हैं? आज तक देश का कोई प्रधानमंत्री इतना झुका हुआ नजर नहीं आया। ईरान और इजराइल के आगे जितना नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नजर आ रहे हैं। क्योंकि आप यह देखें कि जंग शुरू हुई उससे 2 दिन पहले ही प्रधानमंत्री का वहां पर जाना और बड़ी-बड़ी बातें इजराइल के लिए कहना और उसमें तमाम देशवासियों के लिए भी कहना कि उनका भी संदेश है। वहां पर जाकर एक ऐसा तमगा ले लेना जो इससे पहले कभी किसी को नहीं मिला। सिर्फ मोदी जी को खुश करने के लिए वो दे दिया गया। और दो दिन बाद वही इजराइल अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान के ऊपर इललीगल वॉर छेड़ देते हैं और आप 13 दिन तक बिल्कुल खामोश रहते हैं। एक लफ्ज नहीं कहा गया सुप्रीम लीडर के की डेथ को लेकर तो मेरे समझ में यह नहीं आता है कि भारत इतना कमजोर या प्रधानमंत्री इतने झुके हुए और क्यों नजर आ रहे हैं कि यूएस की जब मर्जी होती है जो कहना चाहते हैं वह कहते हैं। यानी कि वो कह रहे हैं बैठो तो बैठ जाते हैं। खड़े हो तो खड़े हो जाते हैं। अपनी ना कोई मर्जी है। वी आर अ सोववरन कंट्री। बिल्कुल। अब वो क्या राज है मैं नहीं जानता हूं कि मोदी जी दो देशों के सामने नहीं खड़ा होना चाहते हैं। एक इजराइल है और एक अमेरिका है। अमेरिका ही नहीं इजराइल के सामने भी तो जैसा आपने कहा दो दिन पहले गए और वहां पर एकदम सॉलिडली ईरान के साथ खड़े नजर आए। तो इसका राज क्या है? अब कहना तो मुश्किल है लेकिन मुझे लगता है कि हमको याद करना चाहिए पेगेस को। पेगसस हमने इजराइल से ही खरीदा था ना क्योंकि स्पाईवेयर है। खुफिया गिरी करने का एक तंत्र है। तो वो हमने खुफियागिरी का तंत्र लिया पेगेस इजराइल से। अब किसको पता है कि उसका कैसे इस्तेमाल किया गया? इजराइल हमको पता है, इजराइल को पता है और अमेरिका को पता है। अब उसमें है मैं यह गेस कर रहा हूं कि मान लीजिए कि बात खुले और यह बात सामने आए कि मोदी जी ने पेगेस का इस्तेमाल किया अपने सीनियर कैबिनेट कॉलीग्स को काकी खुफियागिरी कराने का। उन्होंने इसका इस्तेमाल किया भारत के राष्ट्रपति की खुफियागिरी कराने का। वह अपोजिशन के लीडर्स का कराया आपका हमारा कराया उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन अपने लोगों का खुद अपने लोगों का कराया तो फिर मोदी जी की कितनी फजीहत होगी तो यह जानकारी किसके पास है कि पेगसस का इस्तेमाल किसके-किसके खिलाफ किया गया यह अमेरिका को पता है क्योंकि अमेरिका इजराइल एक है और इजराइल को पता है। तो इसलिए इजराइल को खुश रखना जरूरी है। अमेरिका को खुश रखना जरूरी है। माने कोई चक्कर है मेरा अपना गेस की पिगेस हो सकता है। हो सकता है कि इससे भी कुछ भयानक सच हो जिसको छुपाने छुपाने का प्रयास हो रहा है। जी क्या एप्सिन की तरफ आपका कोई इशारा है? बिल्कुल इशारा है। फाइल्स बिल्कुल है। माने दुनिया में देखिए कि एप्सिन फाइल्स में जिन लोगों का नाम आया दूर-दूर तक भी तो उनका इस्तीफा हो गया। उनके खिलाफ इंक्वायरी शुरू हो गई। और हमारे देश में एक व्यक्ति जो इतना नजदीक थास्टीन के वो कैबिनेट मिनिस्टर बना हुआ घूम रहा है और मोदी जी की हिम्मत नहीं है उसको कैबिनेट से हटाने की। जी बिल्कुल लास्ट मेरा क्वेश्चन आपसे यशवंत जी कि जो तुलसी गबाट का जो बयान है जिसमें वो रशिया का नाम ले रही हैं, नॉर्थ कोरिया का नाम ले रही हैं। पाकिस्तान का नाम ले रही हैं। चाइना का नाम ले रही हैं। और वो कह रहे हैं कि ये ये अब हमारे लिए सबसे बड़े न्यूक्लियर थ्रेट्स हैं। वो इस तरह के मिसाइल्स बना रहे हैं जो यूएस तक हिट कर सकते हैं। किस तरफ वो इशारा कर रही हैं? आखिर क्या प्लानिंग है? क्योंकि ऐसे वक्त में जब ऑलरेडी एक इतनी बड़ी वॉर चल रही है जहां दुनिया में इसको लेकर एक एक नया क्राइसिस पैदा हो गया है और जो ट्रंप हैं वो एक तरह से ये कहते हुए नजर आ रहे हैं कि भ मैं भीख जैसे वर्ड का इस्तेमाल नहीं करूंगी। लेकिन इस तरह से रिक्वेस्ट कर रहे हैं कि भैटो कंट्रीज से कि आप आइए हमारे साथ इस कोलेशन में ताकि स्टेट ऑफ हार्मोस खुलवाया जाए और उन्होंने बिल्कुल इसको मना कर दिया है। तो इस बयान को आप कैसे देखते हैं? दूसरा मेरा इसी से जुड़ा सवाल है कि क्या आपको यह लग रहा है कि बूट्स ऑन ग्राउंड्स की आपको कोई पॉसिबिलिटी इसमें नजर आती है और एक बेहद डेंजरस जिन चीजों की तरफ इशारा किया जा रहा है कि क्या टेिकल न्यूक्लियर जो वेपन है क्या आपको लगता है फ्रस्ट्रेशन में इजराइल इसका इस्तेमाल कर सकता है? और क्या आपको लग रहा है यह जंग जो है वह अमेरिका के कंट्रोल से पूरी चली गई है। अब इजराइल यह तय करता हुआ नजर आ रहा है कि क्या आगे करना है, कैसे करना है, किस तरह से करना है। क्योंकि कल का जो हमला हुआ है यशवंत जी यह माना जा रहा था कि उससे पहले थोड़ी शायद इस तरह की स्थितियां बनती हुई नजर आ रही थी। अली लारीजानी की जब शहादत हुई है उससे पहले कि शायद कोई बातचीत के दरवाजे खुले और इजराइल ऐसा नहीं चाहता था। इसलिए इजराइल ने टॉप लीडरशिप को टारगेट किया ताकि इसमें जो इजाफा है इन अटैक्स में और ज्यादा देखने के लिए मिले। फिर देखिए [गला साफ़ करने की आवाज़] इजराइल के बारे में मैंने कहा कि इजराइल एक रोग स्टेट की तरह बिहेव कर रहा है। अब लड़ाई हो रही है। ठीक है। मिसाइल्स की लड़ाई हो चाहे फौज की लड़ाई हो। लड़ाई अपनी जगह पर है। बट ऐसा कभी नहीं हुआ है कि कोई भी कभी भी कोई जंग हो तो उसमें लीडरशिप को टारगेट किया जाए। लीडरशिप को क्या जर्मन्स ने चर्चिल को मारने की कोशिश की थी कभी? सेकंड वर्ल्ड वॉर में या अलाइड फोर्सेस ने क्या हिटलर को पर्सनली मारने की कोशिश की थी या उसके जो और दूसरे कॉलीग्स थे उनको मारने की कोशिश की थी। एक नया तरीका इजराइल ने निकाला है कि लोगों को असससनेट करो और यह बहुत खतरनाक है एक ट्रेंड बिकॉज़ अगर दूसरे देश इसको फॉलो करने लगे तब दुनिया जाके कहां ठहरेगी तो इसलिए यह खतरनाक खेल इजराइल खेल रहा है। दूसरी तरफ मेरा अपना मानना है जो मैंने पहले कहा कि इजराइल ने ही अमेरिका को इसमें फंसा दिया है। जरूर नेतन याू ने ट्रम्प को कहा होगा कि हम तो मिलकर लड़ेंगे तो ईरान तो तुरंत 2 दिन में खत्म हो जाएगा। वहां पर क्रांति हो जाएगी और रिजम चेंज हो जाएगा जो हम लोग चाहते हैं। ऐसा कुछ नहीं हुआ। और ये लोग मारते जा रहे हैं वहां के लीडरशिप को। फिर भी रिजीम चेंज नहीं हो रहा है। फिर भी लोग सड़कों पर उतर कर खुशियां नहीं मना रहे हैं कि ईरान की लीडरशिप को मारा जा रहा है। और उसमें जो मॉडरेट्स थे जो बातचीत चला सकते थे उस वैसे लोगों को भी मार रहे हैं ये लोग। तो कोई बात ही नहीं समझ में आ रही कि यह युद्ध जो है वह किस तरह लड़ा जा रहा है और किधर जा रहा है। कैसे खत्म होगा कहना मुश्किल है। मुझे केवल एक उम्मीद नजर आ रही है कि अमेरिका में पुशबैक शुरू हो गया है। वो आवाज धीरे-धीरे और तेज होगी। केंट जैसे और लोग जो हैं अमेरिका के शासन में वो लोग इसके खिलाफ प्रोटेस्ट करेंगे। और तब शायद ट्रंप को अकल आए और वह युद्ध रोकने का प्रयास करें। आपने जो कहा कि पाकिस्तान का और इन देशों का जिक्र किया कि इनके पास मिसाइल बनाने की क्षमता ऐसी है कि वो अमेरिका तक जा सकती है। तो अमेरिका को चिंता करनी ही चाहिए इस बात की। लेकिन हमको भारत में इस बात की चिंता करनी चाहिए। अगर पाकिस्तान के पास इतने खतरनाक मिसाइल्स हैं और आजकल मिसाइल से ही लड़ाई लड़ी जा रही है। आपने बूट्स एंड ग्राउंड की बात की। मैं उम्मीद करता हूं। हालांकि उन्होंने मरींस की टुकड़ी वहां भेजी है। लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि बूट सन ग्राउंड वो नहीं उतारेंगे क्योंकि बूट सनग्राउंड उतारेंगे तो वो बहुत बड़ा रिस्क मोल लेंगे। ईरान कोई ऐसा मुल्क नहीं है कि वह सामने खड़े होकर लड़ाई नहीं लड़ सकता है। उसके लोग नहीं लड़ सकते हैं। और इस बार तो और कट्टर युद्ध होगा ईरान की तरफ से। इसलिए बूट सन ग्राउंड मैं समझता हूं कि इतनी बड़ी बेवकूफी ट्रंप नहीं करेंगे और बूट सन ग्राउंड नहीं उतारेंगे। लेकिन मिसाइल्स का वॉारफेयर चलता रहेगा। भारत को पाकिस्तान ने जो कुछ डेवलप किया है उसके बारे में ज्यादा चिंता करने की जरूरत है। जी बिल्कुल ये साफ बिल्कुल जाहिर हो रहा है कि ये वॉर जो है वो आने वाले वक्त में तो थमने नहीं जा रही है। ये डेंजरस होती जा रही है। इसका दायरा भी बढ़ता जा रहा है और यह लग रहा है कि ईरान तो जाहिर सी बात है कि अपने सेल्फ डिफेंस में वो लड़ रहा है और पूरी तरीके से वो भी ये चाहता है कि इस बार यह सब आरपार हो इसलिए भी कि जो हमेशा ईरान हमेशा जो इजराइल और अमेरिका की जो दादागिरी है कि आप हर कुछ दिन के बाद खड़े हो जाते हैं और अभी जून में 12 दिन की जंग हुई फिर आप जब बातचीत चल रही थी फिर आपने ये इललीगल वॉर छेड़ दी यह बार-बार ना हो तो हमेशा के लिए ये इजराइल और अमेरिका की दादागिरी खत्म हो ईरान भी यह चाहता है कि वंस एंड फॉर ऑल यह हो जाए क्योंकि उसका जितना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर का नुकसान हुआ है जो लोग वहां पर हताहत हो रहे हैं जिस तरह से लीडरशिप उसकी उसकी खत्म हुई है तो जाहिर सी बात है कि वो तो पूरे एक तरह के रिवेंज के मूड में है ही लेकिन अगर ऑयल फैसिलिटीज को गैस फैसिलिटीज को अगर इस तरह से निशाना बनाया जाता रहा तो यह जो वॉर है यह पूरी दुनिया को इसने ऑलरेडी अपने चपेट में ले लिया है यह और ज्यादा डेंजरस और बड़ी होती हुई नजर आ रही है। बहुत-बहुत शुक्रिया यशवंत जी आपका कार्यक्रम का हिस्सा बनने के लिए, वक्त देने के लिए। बहुत-बहुत शुक्रिया। बहुत धन्यवाद। थैंक यू सो मच।

Companion article

Three Weeks Into an Unending War

By the twentieth day of the Israel-Iran war, what had briefly looked like a possible opening for negotiation had instead hardened into open-ended escalation. Israel struck Iran's South Pars gas facility, among the largest hits of the war so far; Iran retaliated against American interests across the Gulf, including a major gas facility in Qatar; and the killing of senior Iranian official Ali Larijani, along with his son, signalled that Israel had moved from military infrastructure to targeting individual leaders. Against this backdrop, former Indian finance and external affairs minister Yashwant Sinha joined Nous Network for an assessment of what the war means for India, and how New Delhi has chosen to respond to it: largely, in his account, by saying nothing at all.

"This is strategic silence. This is surrender," Sinha said of the government's posture, adding that India has effectively become "a satellite country of the US."

The Economic Toll: Oil, the Rupee, and the Market

Sinha's starting point was blunt: India imports roughly 80 percent of its oil, and a war disrupting Gulf supply lines is not an abstraction for New Delhi but an immediate and serious economic threat. He linked the recent slide in India's stock market directly to investor anxiety over an open-ended conflict, explaining that foreign institutional investors pulling money out of Indian equities convert those rupees into dollars, pushing up dollar demand and weakening the rupee in turn. The Reserve Bank of India's job, he noted, is not to fix an exchange rate but to intervene only when volatility becomes extreme — a role it has increasingly been forced to play.

On the specific question of fuel supply, Sinha challenged the government's public messaging. Officials, he said, were celebrating the arrival of two tankers carrying LPG through the Strait of Hormuz as evidence that a single phone call from the prime minister had resolved the crisis. In fact, Sinha said, those two shipments amounted to roughly two days' worth of India's LPG consumption — and Iran had allowed them through on humanitarian grounds, not as a broader guarantee of continued passage. Those two ships, he said, carry "mere two days' supply," dismissing the idea that the crisis had been solved as its own kind of misinformation.

He extended the same warning to fertiliser. India imports roughly a quarter of its urea from Gulf countries, he said, and with the kharif sowing season beginning in June and July, a fertiliser shortfall arriving in the same window as the war could inflict serious damage on farmers — a risk he said the government's public messaging had almost entirely ignored in its focus on crude oil.

A Foreign Policy of Silence

Asked what New Delhi should have done differently, Sinha argued that India had a moral basis for taking a clear position rooted in international norms, and should have stated plainly that the initial attack was wrong and called for an immediate end to the war. Instead, he said, the government chose what commentators have described as "strategic silence" — a posture he rejects entirely, arguing that India should stand with the country that was attacked, not stay neutral between an aggressor and its target.

He was particularly critical of the government's handling of a 30-day US exemption allowing India to import limited quantities of Russian oil already at sea — oil that had already been produced and was sitting on the high seas rather than newly extracted. That Washington should be in a position to grant or withhold such permission from a country of 1.4 billion people, Sinha said, was itself a mark of how far Indian foreign policy had drifted, calling it a matter of national shame that a country of India's size was being "run from Washington."

Sinha also pointed to the government's asymmetric public statements: swift condemnation of Iranian strikes on Gulf states, he said, paired with near-total silence on the strikes against Iran itself, including no public statement at all on the killing of Iran's supreme leader for thirteen days.

Why the Silence? Two Theories

Pressed on why Prime Minister Narendra Modi's government appeared unusually deferential toward both Israel and the United States, Sinha offered two speculative explanations rather than firm claims. The first involved Pegasus, the Israeli-made spyware India is widely reported to have purchased; Sinha suggested — without direct evidence — that if it later emerged the software had been used domestically against members of the prime minister's own cabinet or other Indian officials, the resulting embarrassment could be a reason for New Delhi's reluctance to publicly criticise Israel. The second was a reference to the so-called Epstein files, with Sinha noting that a member of the Indian cabinet has retained his position despite reported proximity to Jeffrey Epstein, in contrast to the resignations and investigations such associations triggered elsewhere. Sinha offered both as conjecture rather than established fact, but framed them as possible explanations for what he called India's unusually deferential posture.

A Proposal: Revive IBSA

Sinha's central policy suggestion was procedural rather than rhetorical. He noted that BRICS, which includes Iran as a member, has grown too large and unwieldy — expanding from its original three-country core to a bloc of 17 or 18 states — to build the kind of consensus a moment like this requires. As foreign minister, Sinha had helped found IBSA, a trilateral grouping of India, Brazil and South Africa, precisely because a three-country forum could reach consensus that a larger bloc could not. He argued that India should convene an IBSA meeting now and use it as a vehicle to press for an end to the war, framing the urgency in stark terms: India, he said, cannot absorb the economic shock of a prolonged conflict as easily as other countries can.

Assassinations, Nuclear Risk, and What Comes Next

Sinha also addressed the killing of Iranian leadership figures directly, calling it an unprecedented and dangerous departure from historical norms of warfare — noting that even during the Second World War, Allied forces did not attempt to personally assassinate Hitler or his inner circle. He warned that if other states adopt the same tactic in future conflicts, the precedent could prove destabilising well beyond this war.

On the question of whether Israel might use a tactical nuclear weapon out of frustration, or whether the United States might commit ground troops, Sinha was more measured, saying he did not believe Washington would take the "reckless" step of putting boots on the ground given the scale of resistance Iran would mount. He did, however, urge that India pay close attention to Pakistan's missile capabilities, in light of statements from US officials naming Pakistan, along with Russia, North Korea and China, among countries whose missile programmes now concern Washington.

Sinha's one note of cautious optimism concerned dissent inside the American security establishment itself, pointing to the resignation of a senior US counterterrorism official who stated publicly that Iran had posed no direct threat to the United States. That kind of internal pushback, Sinha suggested, might eventually be what forces a change in course — even if, for now, the war shows no sign of slowing down.

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