Nous Podcast· 19 Mar 2026· 1:07:07

Uttam Nagar: When Tragedy Becomes a Political Weapon Against Muslims | Prof. Apoorvanand

The recent instance of violence in Delhi’s Uttam Nagar, questions the role of law enforcement, and expresses fears about social and political conditions. Though India’s authorities have repeatedly stated their commitment to upholding the Constitution and maintaining law and order for all citizens…

Full Transcript

अगर उस झगड़े में उस मुसलमान परिवार का कोई मारा गया होता तो क्या आप जो अभी मांग कर रहे हैं वही मांग की जा सकती थी? तो ये रेडिकलाइजेशन जो पहले शाखाओं में होता था स्कूलों में होता था बाकी जगह होता था। अब वो खुलेआम हो रहा है। इन हिंदुत्ववादी संगठनों की जगह अगर दो चार पांच 10 मुसलमान क्या इकट्ठे होते और इसी तरह की कोई नारेबाजी करते तो भी क्या क्या पुलिस इसी तरीके से खड़े होकर देखती रहती? कोई भी मुसलमान कह रहा है कि गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। कोई मुसलमान नहीं कह रहा है। क्या कोई मुसलमान तंजीम यह कह रही है, संगठन कोई कह रहा है कि गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। मेरा सवाल यह है कि चाहे हम दिल्ली दंगों की बात करें या अभी उत्तम नगर के इस इंसिडेंट की बात करें। पुलिस के रोल को आप कैसे देखते हैं? इसके उलट हम यह देखते हैं कि जब भी ऐसी घटना में हिंदू हमलावर होते हैं, हिंदू हत्या करते हैं। अगर उनकी गिरफ्तारी होती है तो हिंदू सड़क पर आ जाते हैं। और ये दिल्ली जैसे शहर में होना, देश की राजधानी में होना इसको आप कितना खतरनाक मानते हैं? क्या इस मुल्क में अब यह नियम बना दिया जाए कि अगर कोई इस तरह की हत्या हो जो दुर्भाग्यपूर्ण है तो मैं जिसको जिम्मेवार मानता हूं मैं उसको भी गोली मार दूं और फिर मैं जितने लोगों को इसमें जिम्मेवार मानता हूं मैं सबको गोली मार दूंगा। कि घर की महिलाएं अगर सामने आकर अपना पक्ष नहीं रखती तो शायद मीडिया को या दूसरे लोगों को पता ही नहीं चलता कि उस तरफ की स्टोरी क्या है। क्यों ऐसा है कि दिल्ली में सारे राजनीतिक दलों के हेड क्वार्टर हैं। दिल्ली में सारे राजनीतिक दलों के सबसे बड़े नेता हैं। वे क्यों नहीं उत्तम नगर जा सकते? ये जो एक पूरा रेडिकलाइजेशन है और सिर्फ क्या हम इसे हिंदुत्ववादी संगठन तक सीमित कर कर ही देखें? आप सुबह दोपहर शाम गांधी गांधी गांधी कहते रहे। गांधी ने आपको दिखलाया कि ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद। दिल्ली का उत्तम नगर इलाका इस वक्त सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सेंटर बना हुआ है। होली का वो दिन जिसमें दो जो पड़ोसी हैं उनका आपसी झगड़ा होता है। दोनों पड़ोसी यानी कि एक मुस्लिम और एक हिंदू होते हैं। अ जिस परिवार के जिस सदस्य की इसमें मृत्यु हुई है वो हिंदू कम्युनिटी से उसका नाम तरुण है। और जिनके जो एक्यूज्ड हैं वो मुस्लिम परिवार से हैं। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि प्रिंस नाम के एक लड़के ने जो उनकी घर की एक महिला है उसके ऊपर रंग फेंका जिसके बाद यह पूरा विवाद बढ़ा। वहीं हिंदू पक्ष का यह कहना है कि उनके घर की एक छोटी सी बच्ची ने पानी भरा बलून जो है वो फेंक कर मार दिया था और उसके बाद यह पूरा विवाद बढ़ा है जिसमें तरुण नाम का जो शख्स है उसकी मृत्यु हो गई है। इसके बाद से ही पूरा बवाल दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में खड़ा हो गया है। तमाम जो हिंदुत्ववादी संगठन हैं उनका जमावड़ा वहां लगातार लगा हुआ है। वो यह कह रहे हैं कि ईद नहीं मनाने दी जाएगी और यह भी उनका कहना है कि आपने हमारी होली को खराब किया। अब मुसलमानों के खून से होली खेली जाएगी। इस तरह के जेनुसाइडल जो कॉल्स हैं वो वहां पर दी जा रही हैं। वो भी दिल्ली में दी जा रही हैं। दिल्ली के उत्तम नगर इलाके में। आप सोचिए कि चंद किलोमीटर की दूरी पर पार्लियामेंट है, पीएम का हाउस है, राष्ट्रपति का हाउस है और वहां पर यह सब कुछ हो रहा है। तो अब ये दूरदराज इलाकों में यह नफरत नहीं रह गई है बल्कि अब देश की राजधानी दिल्ली में भी यह तमाम जिस तरह की जेनोसाइडल कॉल्स जो हैं वो खुलेआम दी जा रही हैं। हिंदू रक्षा दल से लेकर वीएसपी, बजरंग दल तमाम जो हिंदुत्ववादी संगठन हैं वो वहां पर इकट्ठा हैं। अभी माहौल वहां का बहुत टेंस्ड है। लोग जो वहां परेशान हैं काफी और एक तरह की सरहद बांट दी गई हैं जो उत्तम नगर इलाका है उसका ब्लॉक ए ब्लॉक बी में सरहदें बांट दी गई है। एक तरफ मुसलमान और दूसरी तरफ हिंदू और जहां एक तरफ जब हिंदुओं की हिंदू पक्ष की हम बात करते हैं तो उनकी तरफ से बदले की बात कही जा रही है और बदला वो भी पूरे समाज से बदले की वो बात कह रहे हैं। नारेबाजी की जा रही है कि तरुण हम शर्मिंदा हैं। तेरे कातिल जिंदा हैं। और वहीं मुस्लिम पक्ष की अगर हम बात करते हैं तो वो अफसोस दिखा रहे हैं। वो ये कह रहे हैं कि अगर किसी के अंदर भी इंसानी दिल है तो जाहिर सी बात है कि वो तरुण के लिए इंसाफ की मांग करेगा और इस पर अफसोस भी जाहिर करेगा और वो यह भी कह रहे हैं कि तरुण को इंसाफ मिलना चाहिए। लेकिन फिलहाल वहां किस तरह का माहौल है? पुलिस का रोल, सरकार का रोल, जुडिशरी का रोल और यह नफरत जो है जो इस तरह से बड़े पैमाने पर बढ़ रही है और खुले तौर पर इन हिंदुत्ववादी संगठनों को खुला स्टेज जिस तरह से दिया जा रहा है पुलिस की मौजूदगी में यह कितना खतरनाक देश के लिए साबित हो सकता है। आज इन्हीं तमाम पहलुओं पर हम बात करेंगे। उस पर बात करने के लिए मेरे साथ जीयू के प्रोफेसर प्रोफेसर अपूर्वानंद मेरे साथ जुड़ गए हैं जो पॉलिटिकल सोशल एक्टिविस्ट भी हैं। प्रोफेसर अपूवानंद जी बहुत-बहुत स्वागत आपका इस्तकबाल आपका कार्यक्रम में। मेरा पहला सवाल आपसे यह है कि जो उत्तम नगर का पूरा इंसिडेंट है। आप उसको कैसे देखते हैं? देखिए उत्तम नगर की घटना अब सिर्फ इन दो परिवारों के बीच की घटना नहीं रह गई। घटना तो वैसे ही हुई थी कि यह कहा जा रहा है कि बच्ची ने बैलून फेंका और दूसरे पक्ष के वकील ये कह रहे हैं कि प्रिंस नाम का कोई लड़का था जिसने बैलून फेंका और उसके बाद कहासनी हुई एक गाली गलौज हुई और फिर मारपीट हुई जो आम बात है हिंदुस्तान में कहीं भी होता है और फिर यह कहा जा रहा है कि बात शायद खत्म हो गई थी और तब यह लड़का तरुण यह जिम से कुछ और लोगों को लेकर आया और फिर मारपीट शुरू हुई और दोनों तरफ दोनों परिवारों में मारपीट हुई। आगे जो बरे हमें मालूम हुए जो पड़ोसियों के बारे से वो यह कि दोनों बहुत पुराने पड़ोसी रहे हैं और दोनों में अक्सर झड़प होती रही है और पार्किंग को लेकर कूड़े को लेकर बाकी चीजों को लेकर और यह एक और मौका मिल गया कि वो पुरानी झड़प और पुरानी अदावत फैलाई और ये जो तरुण खटिक है ये जिम से लड़कों को लेकर आए और उसमें दोनों परिवारों के लोग जख्मी हुए। दूसरे यानी मुसलमान जो परिवार है उसके लोग भी मारपीट में जख्मी हुए। वकील का कहना है कि उनको काफी चोटें आई हैं और और गहरे घाव है तहाड़ वो जेल में जेल में भी उनकी मौत पिटाई गई है। उसमें यह भी पता है जिसके बारे में आखरी तौर पर मुझे अभी नहीं मालूम कि एक 14 15 साल का बच्चा था रिवान जो शायद गायब उसका पता नहीं है और उनको अंदेशा इस बात का था कि शायद उसकी मौत हो गई है। लेकिन पिछले तीन चार दिन से मैंने उसके बारे में कुछ नहीं सुना तो हमें नहीं मालूम और उसकी अब चर्चा भी नहीं हो रही है रिवान की वो कहां है और भी गिरफ्तारियां उस परिवार से तो एक घटना हुई उसको इस तरह से देखिए मान लीजिए गुब्बाराही फेंका गया और दो परिवारों में झगड़ा हुआ और झगड़ा हुआ दोनों ने एक दूसरे को मारा पीटा और दोनों को ही चोटें आई तरुण को ऐसी जगह चोट लगी कि उसकी मौत हो गई ये दूसरे दूसरे पक्ष के हिसाब हो सकता था। नहीं हुआ। तरुण की मौत हो गई तो बहुत दुर्भाग्य में और जाहिर है कि वह हत्या है। हत्या हुई। जी पुलिस उसी तरह वही धाराएं लगाएगी उसमें और उसका अब उस पर मुकदमा चलेगा। जांच चलेगी। किसकी लाठी से हुआ? क्या हुआ? और सजा होगी। पुलिस ने गिरफ्तारी कर ली। तो जिस तरह कारवाई होती है किसी भी इस तरह की हिंसा की घटना में जिसमें दो पक्ष शामिल होते हैं। पुलिस को जो जैसे कारवाई पुलिस करती है वैसी कारवाई उसने की और हिंदुस्तान में अब जो रिवाज हो गया है क्योंकि एक पक्ष मुसलमान है तो उसके साथ ज्यादा सख्त कारवाई होगी ये हम सारे लोग जानते हैं। उसको किसी भी तरह नहीं छोड़ा जाएगा और उस पर हो सकता है कुछ और धाराएं लगाई जाए। लेकिन अगर हम साधारण तौर पर भी देखें तो वह पक्ष उसमें गिरफ्तारियां होती उसके बाद और भी गिरफ्तारियां तो यानी आपने परिवार की औरतों को भी गिरफ्तार कर दिया है। बाकी लोगों को भी कर दिया। तो ये एक सामान्य प्रक्रिया है। इसमें इन दो के अलावा कोई शामिल नहीं है। ऐसा नहीं है कि मुसलमान समुदाय से बाकी लोग भी शामिल हो गए मारपीट करने में। बाकी लोगों ने आकर तरुण को पीटना शुरू कर दिया। कोई नहीं शामिल। उसका कोई सबूत नहीं तो या फिर आप इसको सांप्रदायिक घटना नहीं कह सकते क्योंकि ऐसा नहीं हुआ कि तरुण ने एक मुसलमान तरुण के परिवार के किसी ने एक मुसलमान औरत पर दोबारा फेंका रंग का तो बाकी सारे मुसलमान निकल कर तरुण को पीटने आ गए ऐसा नहीं हुआ ये सिर्फ दो परिवार तक तो ये सांप्रदायिकता नहीं सांप्रदायिकता इसके बाद शुरू होती है जब पुलिस की कारवाई हो गई उसके उसके फौरन बाद रिजवान के ब्लड को बुलडोज किया जाता है। ये सांप्रदायिक कारवाई है और यह सरकारी सांप्रदायिक कारवाई क्योंकि उसके फौरन बाद होता है। बहाना यह बनाया जाता है कि वह एनक्रोचमेंट था। लेकिन इस हत्या के फौरन बाद इनक्रोचमेंट का आपको पता चला और आपने फौरन बाद ये कारवाई की जो सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के खिलाफ है। आपने नोटिस नहीं दी। आपने वक्त नहीं दिया कुछ नहीं किया तो यह पहले सांप्रदायिक कार्यवाही है जो सरकार ने की सरकारी सांप्रदायिक कार्यवाही उसके बाद दूसरी सांप्रदायिक गतिविधियां शुरू हुई जो हिंदू रक्षा दल बजरंग दल और बाकी लोगों ने इसे एक हिंदू पर आक्रमण का मामला बनाया तो तरुण अब हिंदू हो गया वो हिंदू था लेकिन अब वो सारे हिंदुओं का प्रतीक हो गया यानी और वो जो मुसलमान परिवार था जो एक मुसलमान परिवार है विद्वा या स्वागत अब वह सारे मुसलमानों का प्रतिनिधि हो गया। तो सांप्रदायिकता इस मारपीट की घटना में नहीं है। सांप्रदायिकता उसके बाद से शुरू होती है और वो सबसे पहले शुरू होती है सरकार की तरफ से और उसके बाद जो हिंदू सांप्रदायिक संगठन है उन सांप्रदायिक संगठनों की ओर से। जी ये जो हिंदुत्ववादी संगठन यहां इकट्ठा होना शुरू होते हैं और उसके बाद यह भी कहा गया कि मैं जो वकील है उनको सुन रही थी कि तरुण जो है उनका ताल्लुक भी बजरंग दल से था। उनके परिवार भी शायद एसोसिएटेड थे बजरंग दल से। इसको लेकर कन्फर्मेशन नहीं है। लेकिन मैंने वकील को सुना है कि उन्होंने इस तरह के क्लेम्स किए हैं। और उसके बाद यह जमावड़ा लगना शुरू हो जाता है वहां पर। पुलिस की मौजूदगी में लगातार वहां पर भीड़ इकट्ठी होती जाती है। जो राइट विंग के जो YouTube चैनल्स हैं, वह वहां पर पहुंचकर और ज्यादा इस नफरत को आग लगाते हैं। मेरा सवाल यह है कि चाहे हम दिल्ली दंगों की बात करें या अभी उत्तम नगर के इस इंसिडेंट की बात करें। पुलिस के रोल को आप कैसे देखते हैं? क्या अगर इन इन हिंदुत्ववादी संगठनों की जगह अगर दो चार पांच 10 मुसलमान क्या इकट्ठे होते और इसी तरह की कोई नारेबाजी करते तो भी क्या क्या पुलिस इसी तरीके से खड़े होकर देखती रहती? आपने आज से छ साल पहले के दिल्ली की हिंसा का जिक्र किया। दोनों में एक फर्क है और समानता भी है। फर्क यह है कि उस वक्त एक आंदोलन चल रहा था जिसे शाहीन बाग आंदोलन कहते हैं। जिसमें प्राय मुसलमान शामिल थे। मैं यह कह सकता हूं कि 98% मुसलमानों का आंदोलन था और नागरिकता के नए कानून के खिलाफ शांतिपूर्ण आंदोलन था और उसके खिलाफ अफवाहबाजी शुरू होती है और वह अफवाहबाजी केंद्रीय मंत्री करते हैं। संघीय सरकार के मंत्री करते हैं कि शाहीन बाग में आतंकवादी छिपे हुए हैं। बलात्कारी छिपे हुए हैं। और भारतीय जनता पार्टी के बड़े-बड़े नेता यह बात कहते हैं कि शाहीन के आंदोलन आतंकवादी तो यह पहले अफवाहबावादी शुरू होती है जिसमें उस आंदोलन को बदनाम किया जाता है और फिर हिंदुओं को उकसाया जाता है जिसमें गृह मंत्री ये कहते हैं कि ईवीएम का पतंग इतना तेज दबाव कि शाहीन बाग में झटका लगे तो वो बहुत साफ तौर पर एक उकसावा है जो प्रत्यक्ष रूप से हिंसा का उसावा और और फिर जैसा आंदोलनों में होता है अलग-अलग दौर में एक एक दिन औरतें आकर सड़क पर बैठ जाती हैं और फिर भारतीय जनता पार्टी के लोग कहते हैं कि अगर इनको सड़क से नहीं हटाया गया तो हम इनको हटा देंगे जो साफ तौर पर हिंसा की धमकी है और पुलिस उनको इकट्ठा होने देती है उनको ये धमकी देने देती है पुलिस अधिकारियों के सामने होता है और उसके बाद हिंसा शुरू होती है तो हम ये पूरा क्रम देख सकते हैं कि हिंसा अफवाहबाजी हो रही है यह आंदोलन डेढ़ महीने से शांतिपूर्ण चल रहा है। उसमें दो-तीन बार गोली चल चुकी है। वो हमला करने की कोशिश हो चुकी है। बुर्का पहन के लोग अंदर घुसने की कोशिश कर चुके हैं। ये सब हिंदू जो ये कर रहे हैं। तो और उसके बाद अफवाहबावाबाजी होती है जो हिंदुत्ववादी नेता कर रहे हैं। और फिर धमकी दी जाती है जो हिंदुत्ववादी नेता दे रहे हैं और फिर हिंसा होती है और हिंसा प्राय उन जगहों पर होती है जहां यह धरना चल रहा है शाहीन बाग का तो वह एक संगठित हिंसा है जो संगठित हिंसा शाहीन बाग आंदोलन के खिलाफ की जाती है और पुलिस के संरक्षण में की जाती है अब आप उस वक्त के नारे याद कीजिए जो मुझे याद है जो नारे वह है दिल्ली पुलिस लठ चलाओ हम तुम्हारे साथ तो दिल्ली पुलिस पुलिस और जो हमला करने वाले लोग हैं उनकी एकता बहुत स्पष्ट है। दो तरह के नारे लग रहे थे। दिल्ली पुलिस लठ चलाओ हम तुम्हारे साथ हैं और दूसरा मोदी जी लठ चलाओ हम तुम्हारे साथ। तो लोग बिल्कुल समझ रहे थे कि पुलिस उनके साथ है और हमने पुलिस की भूमिका भी तो वो एक हिंसा थी जो बहुत स्पष्ट था। यहां ट्रिगर कुछ और है या ट्रिगर उसको बनाया जा रहा है। वो ट्रिगर है नहीं। आमतौर पर इस तरह की घटनाएं जब होती है तो दो परिवारों तक सीमित रहती है। पुलिस अपनी कारवाई करती है। बात खत्म हो गई। लेकिन यहां क्योंकि एक पक्ष हिंदू है तो यह बहाना मिल गया लोगों को यह कहने का कि हिंदुओं पर अत्याचार हो रहा है। और इसके लिए हिंदुओं को संगठित होना चाहिए और होली खराब की गई वगैरह वगैरह। मुझे नहीं पता कि अह जब हत्या मतलब मौत हुई तो उसके बाद क्या हिंदुओं ने शोक में होली नहीं मनाई। ऐसा तो हिंदुओं ने नहीं तो होली उन्होंने मनाई जनरल मनाई। फिर ये कहना कि हमारी होली खराब हो गई। यह एक बहुत ही यह झूठ है। हम सब लोगों को पता है। लेकिन दोनों में ही जो चीज सामान्य दिखलाई पड़ रही है, वह है प्रशासन का साथ उन लोगों को देना जो हमला कर रहे हैं और वो हिंदुत्ववादी। 2020 में भी पुलिस ने हिंदुत्ववादी हिंदुत्ववादियों का साथ दिया और 2026 में भी उत्तम नगर में पुलिस उनको इजाजत दे रही है। मैंने जैसा सबसे पहले कहा कि सरकार ने खुद हिंसा की जब उसने घर गिराया। अब इस तरह जब घर गिराया जाता है तो उसमें प्रशासन का तर्क क्या होता है? मुझे याद है कि आपको याद होगा जोधपुर में रहता हूं। जोधपुर था या उदयपुर का जिसमें दो बच्चों में झगड़ा हुआ स्कूल में उनमें एक बच्चा मुसलमान था और उसने चाकू चला दिया तो हिंदू बच्चा मर गया इसमें भी दो पक्ष हैं। जी एक मुसलमान यहां भी मरने वाला हिंदू है। लेकिन ये तो बच्चों के बीच झगड़ा है। और उसके बाद पहला काम क्या हुआ? पहली कारवाई किसने की? पहली कारवाई प्रशासन ने वो क्या किया? जिस घर में जिस मकान में वो बच्चा रहता था, उसका परिवार रहता था, उसको उन्होंने बुलडोज कर दिया। जब पीपल्स यूनियन और सिविल लिबर्टीज के लोग गए मिलने डीएम से और उन्होंने कहा आपने ऐसा क्यों किया? तो उन्होंने कहा कि भीड़ को शांत करने के लिए ये हिंसा और आगे ना बढ़े। यानी आपने भीड़ को संतुष्ट किया कि हमने सजा दे दी है। तुम आगे वो समझाने की कोशिश कर रहे थे कि आप समझिए कि हमने हिंसा नहीं होने दी लेकिन पहले आपने खुद हिंसा कर दी। वहां विडंबना यह थी कि वह वह बच्चा एक ऑटो वाले का बच्चा था। और वो ऑटो वाला जिस मकान में रह रहा था उसमें चार परिवार रह रहे थे। वो किराए पर थे। वो मकान किसी और का था। हम जिसको उन्होंने बुलडोज कर दिया। तो वहां भी पहला काम उन्होंने यह किया। दिल्ली में भी पहला काम यही किया और जब यह तुरंत सरकार ने कर दिया तो उसने बतला दिया कि न्याय की सामान्य प्रक्रिया नहीं चलेगी। अब हम न्याय हम कई तरीके से करते हैं। जिसमें हम पहले ही फैसला कर देते हैं। यहां इसको सजा दी जानी चाहिए। तो और पहली सजा बिना एफआईआर के बिना अदालत में कोई कारवाई हुए बिना जांच हुए हमने सजा दी तो हम संतुष्ट कर रहे हैं। किसको आप संतुष्ट कर रहे हैं? जो मरा क्या उसको न्याय मिला इससे? नहीं मिला। न्याय तो कुछ भी नहीं चला। तो आप जाहिर है एक हिंदुत्ववादी मन को संतुष्ट कर रहे हैं। लेकिन अगर परिवार ही ये मांग कर रहा है। पिछले सालों की कई घटनाएं हम मुझे उत्तर प्रदेश की घटना याद है शायद वो पासगंज की थी उसके पहले कोई और घटना थी जिसमें 26 जनवरी को मुसलमानों के मोहल्ले पर चढ़ाई की गई और उस चढ़ाई में एक सुशील नाम का लड़का था शायद जो उस उस चढ़ाई में उत्साह पूर्वक शामिल हुआ और उसने हमला किया और वो मारा गया। ठीक है? उसके बाद पहली प्रतिक्रिया उसके पिता की बहुत ही संतुलित प्रतिक्रिया थी। लेकिन उसके बाद उसके पिता ने अपना रुख बदल दिया और उन्होंने वह भाषा बोलना शुरू की जो हिंदुत्ववादी चाहते थे कि बोले कि उन्होंने कहना शुरू किया मेरे बेटे को शहीद का दर्जा दिया जाना चाहिए। वो राष्ट्रध्वज के लिए मरा वगैरह वगैरह वगैरह जबकि वह बजरंग दल में शामिल था और यह एक तरह की गुंडागर्दी थी जिसमें वह शामिल था कि आप मुसलमानों के मोहल्ले पर जबरदस्ती चढ़ाई कर रहे हैं, हमला कर रहे हैं और उस लड़ाई झगड़े में मारा गया। तो पहले प्रतिक्रिया पिता की ठीक थी लेकिन उसके बाद पिता बदल गए। यहां पहले से ही दिखलाई पड़ रहा है के तरुण को तरुण रहने नहीं दिया गया। तरुण को एक हिंदुत्ववादी बता बना दिया गया तो जाहिर है उसके परिवार वालों की भाषा भी वैसे ही हो जाएगी जिसमें अब उनको तकलीफ नहीं है। अब वो बदले की जुबान में बात कर रहे हैं। बदला चाहिए लेकिन बदला आपको किससे चाहिए? जी। जिसने मारा होगा उससे चाहिए। क्या कोई भी मुसलमान खड़ा हुआ उस परिवार के साथ? नहीं हुआ। जी। कोई भी परिवार कह कोई भी मुसलमान कह रहा है कि गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। कोई मुसलमान नहीं कह रहा है। क्या कोई मुसलमान तंजीम यह कह रही है, संगठन कोई कह रहा है कि गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। नहीं कह रहा है। इसके उलट हम यह देखते हैं कि जब भी ऐसी घटना में हिंदू हमलावर होते हैं। हिंदू हत्या करते हैं। अगर उनकी गिरफ्तारी होती है तो हिंदू सड़क पर आ जाते हैं। हम नहीं गिरफ्तार होते। गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। वो थाने का घेराव कर लेते हैं। बलात्कारी की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। हत्यारे की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए। यहां तो कोई मुसलमान नहीं खड़ा हुआ। फिर किससे आप बदला लेना चाहते हैं? कारवाई तो चल रही है। इसके आगे क्या कारवाई हो सकती? क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए? यही यही कहा जा रहा है। क्या क्या ये आप कह रहे हैं? क्या इस मुल्क में अब यह नियम बना दिया जाए कि अगर कोई इस तरह की हत्या हो जो दुर्भाग्यपूर्ण है तो मैं जिसको जिम्मेवार मानता हूं मैं उसको भी गोली मार दूं और फिर मैं जितने लोगों को इसमें जिम्मेवार मानता हूं मैं सबको गोली मार दूं। वो यही कह रहे हैं कह रहे हैं कि एनकाउंटर होना चाहिए। बीच बाजार एनकाउंटर होना चाहिए। हम शर्मिंदा है कि उनके तरुण के कातिल जो है जिंदा है। यह भी कहा जा रहा है जो घर बुलडोज किया गया उसकी सिर्फ रेलिंग तोड़ी गई है। घर कहां बुलडोज सही से किया गया है और बिल्कुल इस तरह से दिखाया जा रहा है अगर दोनों पक्षों को देखते हैं हम तो बिल्कुल कंट्रास्ट व्यू है कंप्लीटली एक तरफ अगर जब हिंदू पक्ष को हम सुनते हैं बल्कि परिवार को भी मैं अगर सुनूं तो वो उसको बहुत ही माइल्ड इस तरह से बता रहे हैं कि तरुण तो बिल्कुल अकेला था और कोई देखिए अब वो उनकी मां बोल रही है कि देखिए मुझे भी लाठी मारी गई मेरे मुंह पर मैं भी जख्मी हूं उनके फादर बोल रहे हैं देखिए मेरी आंख में ये हो गया ये तो दोनों परिवार उस परिवार के वकील को कह रहे हैं हम् मारपीट हुई। परिवारों में मारपीट हुई। सब जख्मी हुए। जी। उस तरफ के लोग उस तरफ के लोग दिख नहीं रहे हैं क्योंकि वो जेल में हैं। वकील का कहना है कि मैं देख कर आया हूं। उनको बहुत गहरे जख्म। ठीक है। उन उनको वहां भी मार लगी। उनको तिहाड़ जेल के अंदर भी पीटा गया। तो वह तो जेल में है। हां, इनको हो सकता है लाठी लगी हो। इसमें कहां शक है? हो सकता है लाठी लगी हो। लेकिन इससे क्या साबित होता है? कुछ भी साबित नहीं होता और यह यह बातें अब एक आप इसको ब्यरे कह सकते हैं कि तरुण क्या था? तरुण अच्छा आदमी था, तरुण बुरा आदमी था। यह बात रेलेवेंट नहीं है। तरुण अगर बुरा आदमी भी था, तरुण बजरंग दल का भी सदस्य था, तो भी उसकी मौत अफसोस की बात है। ठीक है। किसी को जिंदा रहने के लिए अच्छा आदमी होना जरूरी नहीं है। एक जब जेब खतरे को भी जिंदा होने का हक है। हर किसी को जिंदा रहने का हक है। और आप किसी को मारने के बाद ये नहीं कह सकते कि वो बुरा आदमी था इसलिए मैंने मार दिया। तो तरुण के पक्ष में यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि वो कितना अच्छा आदमी है। उसकी मौत गलत है। वो किस प्रकार हुई अब ये जांच से पता चलेगा और उसी के मुताबिक सजा भी होगी। अगर वो इरादतन की गई हत्या है तो उसकी सजा जानते हैं हम कि कितनी होगी और अगर वो गैर इरादतन हो गई हत्या है तो उसकी सजा क्या होगी। हम जानते हैं इसमें किस तरफ फैसले होते हैं। तो यह तो प्रक्रिया का मामला है। वे किससे बदला चाह रहे हैं? क्या चाह रहे हैं? उनसे पूछा जाना चाहिए कि इसके आगे क्या कारवाई होनी चाहिए? आप बताएं। अगर उस झगड़े में उस मुसलमान परिवार का कोई मारा गया होता तो क्या आप जो अभी मांग कर रहे हैं वही मांग की जा सकती थी? आप कह रहे हैं कि इससे आगे और क्या कि वो जेल में चले गए हैं। उनके परिवार को मैं सुन रही उन्होंने कहा कि जो बच्चा जिसका आप जिक्र कर रहे हैं छोटा बच्चा कि वो इतनी बुरी तरीके से जख्मी है कि उसे आईसीयू में होना चाहिए था और अब उसके बारे में पता ही नहीं है कि वो आखिर है कहां और उनकी घर की महिलाएं अगर सामने आकर अपना पक्ष नहीं रखती तो शायद मीडिया को या दूसरे लोगों को पता ही नहीं चलता कि उस तरफ की स्टोरी क्या है? इस तरीके से इस पूरे केस को जो हिंदुत्ववादी संगठन है उन्होंने हाईक कर लिया। क्या अब आपको यह लग रहा है कि ये उत्तम नगर इलाके में ये एक तरह का की सरहदें जो ये खींच गई हैं ये आपको लगता है कि हमेशा के लिए खींच गई हैं और अब ये खाई जो है जो बना दी गई है ये अब पटेगी नहीं और बल्कि इधर जो मुसलमान कुछ परिवार रहते हैं क्या आपको लगता है कि वो अब वहां से पलायन करने लगेंगे और इधर शायद जो कुछ हिंदू परिवार रहते हैं ब्लॉक बी में शायद वो पलायन करने लगेंगे और ये दिल्ली जैसे शहर में होना देश की राजधानी में होना इसको आप कितना खतरनाक मानते हैं देखिए दिल्ली में इसके पहले इस तरह की घटनाएं हुई। 1984 को मत कीजिए। 1984 में तकरीबन 4000 सिखों को मारा गया। इसी मैं मैं हमेशा ये सोचता हूं 4000 सिखों को मारने में कितने हजार लोग लगे? 10,000 एक आदमी को मारना इतना आसान नहीं होता है। आप वो भी मार सकते हैं। लेकिन जब आप घेर कर मार रहे हो, उसके गले में टायर डाल रहे हो, उसको जला रहे हो, वो भाग रहा हो, उसको तीन आदमी पकड़ रहे हो, एक आदमी को मारने में 10 20 लोग 4,000 से 20, 3000 कातिल वो दिल्ली में हैं। इत्मीनान से हैं। दादा नाना बन चुके होंगे। कोई डॉक्टर होगा, कोई पढ़ा रहा होगा, कोई दुकान कर रहा होगा। तो ये एक ऐसा समाज है जो कातिलों के साथ आराम से रहता है। और जो इसके बारे में सोचता नहीं है। आज आपके सामने मुसलमान है और मुसलमानों के खिलाफ नफरत बहुत आम है। तो इसलिए आप मुसलमानों के खिलाफ हिंसा करते हैं। वो लगता है ठीक ही है, जायज है। ये ऐसे हैं ही क्योंकि इन्होंने बंटवारा करवा दिया। तो इनको उनकी सजा मिलनी चाहिए। उस वक्त हम नहीं दे पाए ठीक से गांधी के चलते। अब मौका आ गया है। फिर कुछ लोग कहते हैं नहीं औरंगजेब ने किया था। उस वक्त हम ताकतवर नहीं थे। उस वक्त नहीं दे पाए। अब हम दे देंगे। तो आप अलग-अलग वक्त के लिए सजा दे रहे हैं। 400 साल पहले की सजा, 500 साल पहले की सजा, 75 साल पहले की सजा आप आज के मुसलमानों को दे रहे हैं। ठीक। लेकिन सिखों के साथ भी आप कर चुके हैं। जिनको आप ये कहते रहे हैं। नहीं नहीं वो तो हिंदू धर्म के रखवारे थे। उन्होंने मुसलमानों से बचाया। लेकिन आपने उनके साथ कोई रहम नहीं दिखलाया। अभी भी फिर भी सिख रह रहे हैं दिल्ली में। सिखों और हिंदुओं के बीच मोहब्बत की बात हम कैसे करें? मैं नहीं जानता। मेलजोल की बात हम कैसे करें? मैं नहीं जानता। मैं जानता हूं कि हिंदुस्तान के बहुत सारे इलाकों से सिखों को भागना पड़ा। मैं अपने शहर सिवान की बात जानता हूं। मैंने पटना में अपनी आंख के आगे सिखों की दुकानों को लूटते हुए देखा। खत्म होते हुए देखा। लेकिन 2020 हमने देखा है। अभी बहुत तुरंत का वाक्या है। 2020 के पहले आपने 2013 देखा मुजफ्फरनगर में और मुजफ्फरनगर में आप यह चीज हमने देखी कि पूरी की म आबादियों का एक तरह से तबादला हो गया। मुसलमान चले गए उन जगहों पे जहां मुसलमान थे। ज्यादा उत्तर पूर्व दिल्ली में हमने देखा कि हिंसा हुई 2020 में अगर आप आज जाके देखें तो शिव विहार में रहने वाले मुस्तफाबाद चले गए कहीं और चले गए लोगों ने गलियां छोड़ी हमने उस वक्त भी देखा था उसके बाद से मैं बातचीत करता रहता हूं और मुझे पता चलता रहता है कि किस तरह लोग एक गली पूरी मुसलमान गली बन जाती है एक गली हिंदू बल्कि मैं अभी आप जब जिक्र कर रहे हैं मैं बिल्कुल अभी गई हूं 24 फरवरी को ये वहां पर और मैंने यही देखा कि एक पूरी लेन है शिव विहार की और पहले मिक्स रहा करते अब बिल्कुल आप क्लियर डिवाइड वहां जाकर आप देख सकते हैं कि यहां से अच्छा हिंदू शुरू हो गए हैं और यहां से मुसलमान शुरू हो गए हैं। क्योंकि जो इधर रहते थे वो इधर और जो उधर रहते थे उधर उन्होंने पूरी तरीके से एक बाइनरी जो है वो वहां पर क्रिएट कर हिंसा जब भी होती है हिंसा तुरंत बंटवारा कर दे उत्तर पूर्व दिल्ली में जब हिंसा हुई और हम वहां गए तो एक गली है खजुरी में यानी और भी जगहों पे गली है हमने देखा कि बांस से बैरिकेडिंग हो गई इस तरफ के सारे मकान जले हुए हैं। उनको जला दिया गया है वह मुसलमान के मकान उस तरफ लोग बैठे हुए हैं और उनके चेहरे पर कोई अफसोस नहीं है। आप उनसे बात करने जाते हैं वो इंडिपेंडेंट है। उनको इससे कोई बल्कि उनको इससे बहुत नाराजगी जैसी उनके चेहरे से थी कि क्यों लोग मुसलमानों के साथ हमदर्दी बिता रहे हैं। तो हिंसा तुरंत मांटती है। और हिंसा अह के चलते अगर एक पक्ष को यह लगता है कि उस पर हिंसा का आरोप है तो वह और नाराज हो जाता है। कि मुझ पर क्यों इल्जाम लगाया जा रहा है। हालांकि वह जानता है कि वह शामिल था इसमें। अह तो यह मनोविज्ञान है। यह बिल्कुल हो सकता है कि उत्तम नगर में हो जाए। मैं बिल्कुल नहीं चाहूंगा। मैं अभी भी ये उम्मीद करता हूं कि ऐसी कोशिश हो वहां के लोगों की तरफ से। परसों मेरे दो दोस्त गए थे। एसोसिएशन प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के उन्होंने बतलाया कि नहीं वहां के हिंदू कह रहे हैं कि नहीं ऐसा कुछ भी नहीं हिंदुओं की दुकान के आगे इफ्तार के पहले मुसलमान मुसलमानों की लाइन लगी हुई थी खरीदारी के लिए और वो कह रहे थे नहीं बाहर के लोग करना चाह रहे हैं बाहर के लोग कितने कामयाब हो जाएंगे ये कहना बहुत मुश्किल है। पहले वह कामयाब हुए हैं हर जगह यहां नहीं हो इसके लिए अभी से कार्रवाई करनी पड़ेगी। उसमें देर हो रही है। आप वहां की जो पीस कमेटी के जो वीडियोस मैं देखता हूं उसमें मैं देखता हूं कि एक फर्क एक एक अंतर है। हिंदू जिस तरह बोल रहा है। बिल्कुल आप जो बोल रहे हैं। मैं इसी का ही जिक्र करने वाली थी। जो पीस कमेटी की बात कर रहे हैं। दोनों लोगों को मैं सुन रही थी। एक दाढ़ी वाले कुर्ता पजामा पहने हुए शख्स हैं और एक अपर कास्ट क्योंकि ये मेंशन करना मुझे लगता है कि शायद जरूरी हो जाता है। वो खड़े हुए हैं वहां पर और जो मुस्लिम शख्स हैं दाढ़ी वाले वो बात कर रहे हैं नहीं हम तो सालों से एक साथ रहे हैं। ये हमारा आपसी भाईचारा है। ये तो बाहर के लोग ही ये कर रहे हैं। ये एक एक इंसिडेंट है। इनकी तो ये राजस्थान से साथ में थे। ये तो परिवार की आपसी पड़ोसियों की जी झगड़ा है और कुछ नहीं। हम सब लोग एक साथ रहने लगेंगे। और जो हमने दूसरे पक्ष को मैंने सुना उन्होंने कहा कि आप लोगों में पढ़ाई लिखाई की थोड़ी कमी है। कमी है। अब ये देखिए ये ये जो बात है ये क्यों है? जी कि आप में पढ़ाई लिखाई की कमी है? इस यही मैं सुन रहा था हम कि उनके लिए अमन महत्वपूर्ण नहीं है। जो पढ़े लिखे नहीं है क्या वो अमन एक दूसरे के साथ मिलके नहीं रह सकते? क्या ज्यादा पढ़ लिख जाने से आप एक दूसरे के साथ रहना सीख जाते हैं? यह एक बिल्कुल ही गैर जरूरी चीज थी। वो कह रहे और उससे साफ था कि वो मुसलमानों पर आरोप लगाना चाह रहे हैं इस समय भी सारे मुसलमानों पर। जी जबकि वो मुसलमान साफ जो बुजुर्ग हैं, बुजुर्गवार हैं वो साफ कह रहे हैं कि यह दो परिवारों की बात है। वो मुसलमान परिवार के साथ हमदर्दी नहीं दिखा रहे। हम लेकिन यह परिवार यह जो सज्जन है यह मुसलमानों के साथ किसी तरह की रियायत नहीं बरत रहे। वो सारे मुसलमानों को इसमें शामिल कर रहे हैं क्योंकि आप में अकल नहीं है इसलिए आप हिंसा करते हैं और कह रहे हैं कि आप सब लोगों को एक बड़ा अमाउंट इकट्ठा करके उनके परिवार को देना है तब तो लगे ना कि हां आप लोग साथ में हैं तब तो लगे ना कि आप कुछ कर रहे हैं तो अब अब ये शर्त है ये कौन सा हिंदू करता है जो मुसलमान को मार देता है क्या हिंदू परिवार मिलकर कोई चंदा करते हैं मुसलमान को देने जाने तो आप जिस बातचीत का जिक्र कर रही हैं उससे ही स्पष्ट है कि एक गांठ है जो हिंदुओं के दिल में है और जो उभर आती है जो बात इस तरह के मौके पर तो आमतौर पे पहले जो पीस कमिटीज होती थी उनमें बुजुर्ग बैठा करते थे जो लोगों को शांत करते हैं लेकिन अब ऐसा कोई बचा नहीं और वो इस मौके का फायदा उठाते हैं। आपके अपने मन के भीतर जो बायस है जो नफरत है क्योंकि अब उसको मौका मिल गया एक हत्या हुई है तो जाहिर है कि एक एक तरह से उसकी पीठ दीवार से लगी हुई है मुसलमान कुछ बोल नहीं सकते एक मुसलमान ने मारा है सब जिम्मेवार महसूस कर रहे हैं कि उसके लिए वो जवाब दें उनको जवाब देनी है जबकि हिंदुओं को ऐसी कोई मजबूरी नहीं लगती ये जो आप फर्क देखते हैं मैं इस इसके बाद इस पर आऊं कि ईद पर आपको क्या खतशा लग रहा है? क्या आपको लग रहा है कि क्या वहां पर हो सकता है? और इसके अलावा जुडिशरी के रोल की मैं बात करूं। उससे पहले मैं ये जरूर आपसे बात करना चाहूंगी कि ये जो दो फर्क आप देख रहे हैं अ जो हिंदू समाज का खासतौर पर बीजेपी के सत्ता में आने के बाद जो आप एक रेडिकलाइजेशन देख रहे हैं या फिर उसका सरफेस पर आना जो आप देख रहे हैं इसको आप कैसे देखते हैं? और दूसरा मुसलमानों को इसमें क्या करना चाहिए कि मुसलमान एक तरह से एक हमेशा एक विक्टिम तो है ही लेकिन वो एक एक मैं इसमें भी देख रही थी और एक अजीब सी कैफियत होती है जब आप उन लोगों को देखते हैं कि एक परिवार की तरफ से जो कुछ किया गया उसके लिए एक पूरे मुसलमान समाज को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और उसके अलावा जो मुस्लिम समाज के लोग भी हैं वो एक तरह से बैकफुट पर हैं। डिफेंसिव डिफेंसिव है और वो बहुत संभल संभल के अपने एक-ए लाइन को बोल रहे हैं कि ऐसा ना हो कि हमारा एक लफ्ज भी ऐसा निकल जाए जो नागवार गुजरे या इसको ट्रिगर कर दे तो दे आर बीइंग एक्सट्रीमली केयरफुल एंड कॉशियस उधर ऐसा कुछ नजर नहीं आता तो उनको क्या ये हो गया है कि ये हमारा देश है ये यहां पर आकर रह रहे हैं जो उनके अंदर इस तरह की फीलिंग्स पैदा कराई गई और देखिए अब हिंदू जो है सुरक्षित नहीं है यह जो एक पूरा रेडिकलाइजेशन है और सिर्फ क्या हम इसे हिंदुत्ववादी संगठन तक सीमित कर कर ही ठीक है। रेडिकलाइजेशन की जब बात आप बात करते हैं तो रेडिकलाइजेशन तो कई तरीकों से होता है और इसमें कोई शक नहीं है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जो सैकड़ों संगठन है वो रोजाना रेडिकलाइजेशन की इस रेडिकलाइज करने की इस प्रोसेस की पूरी जो प्रक्रिया है इस प्रक्रिया को 100 साल से चला रहे हैं। तो अगर सुबह दोपहर शाम आप सरस्वती विद्या शिशु मंदिर विद्या भारती सेवा भारती संस्कार भारती बाकी सब से आप राष्ट्र की खास तरह की परिकल्पना लोगों के दिमाग में भरते रहेंगे और अगर आप एक पूरे समुदाय को मुसलमान हो उनकी खास तस्वीर लोगों के दिमाग में भरते रहेंगे तो उसके नतीजे होते हैं। दिमाग इस तरह के बनते हैं जिनको आप रेडिकल दिमाग है। जो अगर मुसलमानों की हत्या कर दी जाए तो बुरा नहीं मानते। उनको मार दिया जाए क्योंकि उनको होना ही नहीं चाहिए था। दूसरे वो हमारी तरह के नहीं है और वो उन्होंने हमारी जगह पे कब्जा कर लिया है। हमारे संसार अगर प्रधानमंत्री ये कहे कि आपका रिजर्वेशन वो छीन रहे हैं। अगर गृह मंत्री कहे अगर बाकी लोग यह कहे अगर मुख्यमंत्री असम का यह कहे कि रिक्शा वाले को कम पैसा दो कम यह दो। तो यह रेडिकलाइजेशन जो पहले शाखाओं में होता था, स्कूलों में होता था, बाकी जगह होता था, अब वो खुलेआम हो रहा है। वो प्रधानमंत्री कर रहा है, वो गृह मंत्री कर रहा है। वो टेलीविज़ चैनल्स कर रहे हैं। वो अखबार कर रहे हैं। फिल्में कर रही हैं। और ये बहुत भयानक है क्योंकि पहले इस चीज को लेकर हिचक होती लेकिन अब इस चीज को लेकर फक्र महान ये तो ये रेडिकलाइजेशन का फैक्ट है। इसमें मुसलमान क्या कर सकते हैं? मुसलमान कुछ नहीं कर सकते। कहा गया मुसलमान पिछड़े होते हैं। पढ़े लिखे नहीं होते। उनको पढ़ना लिखना चाहिए। जब मुसलमान पढ़ने लिखने लगते हैं तो कहा जाता है पढ़े लिखे मुसलमान शातिर होते हैं। आप शील इमाम को देखिए। आप उमलिक को देखिए। इतने शातिर दिमाग अदालत ने कह दिया कि यह दरअसल पढ़ इतने पढ़े लिखे और हैं इतने शातिर हो गए कि जो चाहते हैं वो बोलते नहीं तो फिर मुसलमान क्या करे कहा जाता है नहीं उसको कब्रिस्तान और बाकी तक सीमित नहीं रहना चाहिए मस्जिद तक उसको स्कूल कॉलेज हॉस्पिटल तो जब वो स्कूल कॉलेज हॉस्पिटल बनाने लगता है तो कहा जाता है जिहाद कर अगर वह एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विज में आ रहा है तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत कहते हैं कि इनफिल्ट्रेट कर रहे हैं स्टेट में इनफिल्ट्रेट करने स्टेट अपरेटस में इनफिल तो मुसलमान क्या कोई बताएं मुझे कि मुसलमान क्या करें? यह सवाल फजूल है। मुसलमान एक तरह से अपने सर्वाइवल की लड़ाई लड़ रहा है। लड़ रहे हैं और वो कायदे से लड़ रहे हैं। कई चीजें हैं। आप एक जमहूरी निजाम है। मुसलमान चाहते हैं कि हिंदुस्तान में सेुलर जमूरी निजाम है। वो कोई प्रो मुस्लिम निजाम नहीं चाहते। सेुलर जमूरी निजाम जिसमें उनकी जान माल इज्जत की हिफाजत हो। तो वह ऐसे पॉलिटिकल फर्सेस को चाहते हैं पावर में रहे जो कर सके कम से कम ऐसे कंडीशन कर सके वो उनको वोट दे तो वो अपना डेमोक्रेटिक फर्ज जमूरी जो उनकी उनका फर्ज है वो निभा रहे हैं दूसरी तरफ जब आप उनका कत्ल करते हैं मॉब लिंचिंग करते हैं तो क्या वो क्या कर रहे हैं क्या वो जवाबी हमला कर रहे हैं नहीं कर रहे हैं क्या वो इस तरह से जुलूस निकाल रहे हैं जैसे उत्तम नगर में निकल रहा है नहीं निकाल रहे हैं कोई अदालत का दरवाजा खटखटा। जकिया जाफरी 2002 से 22 साल, 23 साल और सुप्रीम कोर्ट इस पर हैरान हो गया कि अरे आप इतने साल कैसे इंसाफ की लड़ाई लड़ सकती हैं? जरूर कोई साजिश हो। यानी मुसलमान अगर इंसाफ की लड़ाई लड़ रहा है तो वह साजिश कर रहा है। तो एक वृद्ध महिला दतिया जाफरी अपने शौहर के कत्ल का इंसाफ के लिए वो लड़ती रही। आप बिलकिस बानो को देखिए 15 साल लड़ाई लड़ी उसने। यह सब कानूनी लड़ाईयां है। ज्यादातर लोग जो अदालत में हैं वो अनपढ़ है। पढ़े लिखे नहीं है। जुनैद की मां पढ़ी लिखी नहीं। पहलू खान बहुत सारे नाम सब अदालत में हैं। मैं राहुल भाटे की किताब पढ़ रहा था। द हाई डेंसिटी प्रोजेक्ट जिसमें वो एक उत्तर पूर्व दिल्ली की हिंसा के बाद मुकदमे की बात करते हैं जिसमें निसार या नासिक नाम का कैरेक्टर है जो गवाह के रूप में आता है उसकी गवाही कितनी खतरनाक है कोई भी किसी भी मुसलमान की को गवाह के रूप में टिके रहना कितना खतरनाक है इस वक्त लेकिन लोग टिके रहते हैं तो वो एक संवैधानिक और कानूनी तरीके से लड़ाई लड़ रहा है बाकी मुसलमान जो काम करना चाहिए वो कर रहे हैं। मुसलमान वकील वकालत कर रहे हैं। लड़ाई लड़ रहे हैं। और मैं देखता हूं बहुत सारे नौजवान मुसलमान वो अपने हक की बात कर रहे हैं। कोई हिंसा की बात नहीं कर। मैंने मुसलमानों की तरफ से किसी हिंसा की बात नहीं। लेकिन अब कोई तो जो करना है वो मुसलमानों को नहीं करना। वो हिंदुओं को करना है। उनको आरएसएस को रोकना है। उनको अपने बच्चों को सरस्वती शिशु मंदिर में जाने से रो बंद करना है। उनको शाखाओं में लोगों को जाने से बंद करना है। उनको बीजेपी को वोट देना रोक बंद करना है। और ये कौन करेगा? हिंदुओं को करना पड़ेगा। लेकिन आप यह देखें कि जो आप जैसे लोग जो इतना खुलकर इस तरह से बात करते हैं। मेरा सवाल यह है कि जो लोग बीजेपी के वोटर हैं या जो हिंदू इस तरह से रेडिक्लाइज्ड हैं या जो ये हिंदुत्ववादी जो संगठन है इनकी इनकी जो भी इनकी मानसिकता है उस पर यकीन करते हैं या कहते हैं कि हां ठीक ही कह रहे हैं ये लोग। उन लोगों तक कौन रीच आउट करेगा? क्योंकि जो हिंदू खुलकर जो सेकुलरिज्म की बात कर रहे हैं, जो आपसी भाईचारे की बात कर रहे हैं, जो मुसलमानों के इंसाफ की भी बात कर रहे हैं, उनकी पेट तो पैर तो उन उन हिंदुओं में है नहीं कि वो जाके उनको कन्विंस कर सकें। नहीं, ये नहीं है कि पैर नहीं है। हमें हमेशा ये समझना चाहिए कि जब समाज इस तरह से बदल रहा हो और ये लंबी चर्चा का विषय हो सकता है। जी तो आप कैसे हस्तक्षेप करें? उसमें यह मुमकिन नहीं है कि मैं आपके दिल के गांठ को खोल दूं। कितनी देर लगेगी उसमें? कहना बहुत मुश्किल है। मैं आपके मन में जो बैठा हुआ पूराग्रह है उसको खत्म कर दूं। मुमकिन नहीं है। तो फिर क्या किया जा सकता है? एक मुसलमान अपने बारे में उसके बारे में जो ख्याल हिंदुओं के मन में है उसको कैसे बदल दे? वो क्या करे कि वो बदल जाए? या जिनको आप कह रही हैं समझदार हिंदू जो ऐसा सोचते हैं वो कैसे बदल वो मुमकिन नहीं है। जो चीज की जा सकती है जी वो कानून के राज को कायम करना है। इसका मतलब ये है कि मेरे मन में अगर आपके खिलाफ कोई बायस है तो उस बायस के चलते आप मेरा कोई नुकसान ना कर सके। मेरे मन में अगर आपके खिलाफ बायस है तो मैं उस बायस की वजह से आपका नुकसान ना कर सका। बायस करके वो तो एक लंबी तरबियत मेलजोल और सबका मामला है। मनोविज्ञान का मामला है। जब एक जगह पर एक ज्योग्राफिकल लोकेशन में लोग साथ रहते हैं तो उसमें मैं अपने बायस की वजह से दूसरे का हक खत्म ना करूं। इस यह इंतजाम करना राज्य की जिम्मेवारी होती है। इसीलिए राज्य होता है और किसी दूसरी चीज के लिए राज्य नहीं होता। वरना प्राइवेट जैसे लोग आजकल अपने अपार्टमेंट की हिफाजत के लिए प्राइवेट सिक्योरिटी रखने लगे। तो क्या अब कम्युनिटीज को प्राइवेट सिक्योरिटी रखनी चाहिए? अगर राज्य इस राज्य अपनी ये जिम्मेदारी खत्म कर देता जो वो मुसलमानों को प्रोटेक्ट नहीं करेगा। वो क्रिश्चियंस को प्रोटेक्ट नहीं करेगा। और वह हिंदुत्ववादी फर्सेस के साथ मिलकर उन पर अटैक करेगा या उनके पहले उन पर अटैक करेगा हिंदुत्ववादी बनकर। तो आप जो पूछ रही हैं उसका कोई सीधा जवाब नहीं है। मैं सिर्फ यह कह सकता हूं कि उसका एक ही तरीका है कि निजाम बदले। क्योंकि हम हिंदुस्तान में भी यह चीज देख रहे हैं। कर्नाटक में कल तक बीजेपी की सरकार थी। जब बीजेपी की सरकार थी उस वक्त के रोजाना एंटी मुस्लिम इंसिडेंट्स की संख्या को देखिए पुलिस का रवैया देखिए और कांग्रेस की सरकार आने के बाद आप उसकी संख्या तुलना आप करें काफी फर्क दिखलाई पड़ेगा वो फर्क सिर्फ इस वजह से हुआ कि एक जो राजनीतिक अह शासन था वो बदल गया राजनीतिक व्यवस्था कायदे से होना यह चाहिए कि पुलिस इंपार्शियल हो, ब्यूरोक्रेसी इंपार्शियल हो जो कि नहीं है और जो सबसे खतरनाक बात और यह बात इस इसको कोई डीएम नहीं सुन रहा होगा, कोई एसपी नहीं सुन रहा होगा। लेकिन मैं यह मानता हूं कि एक शहरी के तौर पर मैं जब अपने घर में रहता हूं, मैं जब घर से निकलता हूं तो मैं किस बल पर निकलता हूं? मैं इस बल पर निकलता हूं। मेरे इलाके के रूपनगर थाना चौकसी कर रहा होगा। मेरी गाड़ी को बीच में रोक कर कोई कार जैकिंग नहीं करेगा। कोई छीन के नहीं ले जाएगा। ये कैसे होता है? मुझे कोई मार नहीं डालेगा। तो मैं किस पर भरोसा करके चल रहा हूं? मैं लोकल पुलिस पर भरोसा करके चल रहा हूं। मैं डीएम पे भरोसा करके चल रहा हूं। ठीक है बाकी लोगों पर जी लेकिन अगर मुझे यह भरोसा ना हो कि पुलिस मेरी तो मैं तो किसी पॉलिटिकल लीडर पे नहीं कर रहा हूं ये मैं मान के चलता हूं कि एक राजनीतिक सत्ता आ गई है जो मुसलमान मुसलमानों के खिलाफ लेकिन डीएम एसपी अगर उन संभल कर साधारण पुलिस जी मैं वही कह रहा हूं संभल अगर ब्यूरोक्रेसी और पुलिस पूरी तरह से बदल जाए तो फिर बचना बहुत मुश्किल है। अगर आप देखें कि वो खुद होली खेल रहे हैं और कह रहे हैं कि तुम रील बना दो तुम्हारी रेल बना दूंगा मैं। हां तो मैं सिर्फ ये कह रहा हूं संबल उसका बहुत अच्छा उदाहरण है। लेकिन संबल सबसे कहते हैं क्रूडिस्ट उदाहरण है। ग्लोब रिफाइंड तरीके से यह काम कर रहा है। और यह बात अब आर्मी तक पहुंच गई है। तो यह बहुत खतरनाक है। अगर यह होगा तो तो क्या किया जाए? नहीं। और हिंदुस्तान के लोग अगर इसकी अर्जेंसी नहीं समझते हैं। देखिए बहुत सारे लोग कहते हैं ये नहीं बदलेगा। लोगों का दिल नहीं बदलेगा। सत्ता बदल जाए तो भी नहीं। मेरा कहना है ये आपके लिए उतना महत्वपूर्ण नहीं है। यू कैन अफोर्ड टू वेट कि वो उसका दिल बदल जाए। मुस्लिम्स कांट अफोर्ड टू वेट। उनके लिए जरूरी है कि इस पर रोक लगे, ब्रेक लगे। क्रिश्चियंस कांट अफोर्ड टू वेक। आप कहेंगे नहीं नहीं इसको बदलने में वक्त लगेगा। नहीं पहले आप सरकार बदलिए क्योंकि हिंदुस्तान के पुलिस ऑफिसर्स और हिंदुस्तान की ब्यूरोक्रेसी में इतना करेज नहीं है कि वो अपनी कॉन्स्टिट्यूशन ड्यूटी निभा सकें। तो उनको एक बॉस चाहिए। पॉलिटिकल बॉस जो उनको कहे कि तुम निभाओ। हम वो पिटिकल बॉस बदलना जरूरी है। किसी भी तरह उसको बदलना जरूरी है। तो अगर तब्दीली होगी तो यहां होगी। मैं फिर दिलों की बात नहीं कर रहा। कह रहा हूं कि इसमें काफी वक्त लग सकता है। वो नहीं बदल सकता है। ये भी लेकिन वो लोग जो बीजेपी को वोट नहीं करते। वो जो खामोश हैं लोग। देखिए ज्यादातर लोग मैं मैं अभी भी ये कह रहा हूं कि आमतौर पे होता क्या है कि मैं नहीं चाहता हूं कि हत्या हो। लेकिन 10 गुंडे आए मैं उनको कंफ्रंट नहीं करूंगा। दीपक कुमार की तरह का असाधारण साहस हम सबसे उसकी मांग नहीं कर सकते। इसीलिए तो दीपक कुमार एक है। या इस तरह के लोग एक आ गए। वो हिमाचल की जो लड़की थी जो निकल के सड़क पर आ गई। वो अपवाद होते हैं। आमतौर पे लोग नहीं कर सकते। आपके सामने 10 गुंडे आ जाए तो शायद आप हिचकिचा जाएंगे। तो यह शायद ज्यादती होगी लोगों से मांग करनी कि वो कंफ्रंट करें उन गुंडों को जबकि उनको पता है कि वो गुंडे उनको श है राज्य की तो उसमें कायरता मैं नहीं कहूंगा उसको लेकिन जब आपके परिवारों में इसको लेकर सामान्य सहमति हो जो वोट नहीं भी दे रहे हैं तो ये घटनाएं इसलिए होती है कि इनको लेकर समाज में सामान्य सहमति हो ठीक मतलब हुआ तो कोई बुरी बात नहीं। यह इस सामान्य सहमति पर हमें अपने परिवारों में बात करनी पड़ेगी। अगर मेरे खाने के टेबल पर मेरे परिवार का एक सदस्य आकर एक मुसलमान विरोधी बात कर रहा है तो मैं क्या उसको लिहाजन कुछ नहीं कह रहा हूं कि वो मेरे घर आया है और बात करता है और खाने पर आया है मैं कैसे उसको या ये मैं कह सकता हूं कि उसकी इजाजत मेरे घर में नहीं है और वो अगर धमकी दे कि मैं चला जाऊंगा तो मैं कह सकता हूं आप जा सकते हो क्या ये रिॉल्व हमारे भीतर है क्या ये मैं किसी रिश्तेदार को कह सकता हूं कि मैं अब मेरा आपसे रिश्ता नहीं रहेगा और आपका ये विचार है। यह जब तक नहीं होगा और यह तब्दीली हिंदुओं को करनी है तब तक हम नहीं उम्मीद कर सकते कि हिंदुस्तान में कुछ भी क्योंकि मैं देख रही थी उत्तम नगर का ये वाकया जहां छोटे-छोटे बच्चे हैं नाबालग बच्चे वो खड़े होकर वहां पर कह रहे हैं उन उन टीवी चैनल से या YouTube प्लेटफार्म से बात करते हुए कि मुल्लों को काटना चाहिए और ये यहां पर इस तरह से भैंस और यह ये बकरी यहां पर काटते हैं। हम इन्हें ऐसे करने नहीं देंगे। ये मैं मतलब एक एक अजीब कैफियत होती है जब आप इन बच्चों को सुनते हैं कि घर में किस तरह की बातें होती होंगी क्योंकि ये पेरेंटिंग का हिस्सा है वो इसी तरह से सुनते होंगे ये सारी बातें तो डिस्कोर्स जी ये डिस्कोर्स है जो रेस्पेक्टेबल डिस्पोर्स है जाहिर है बच्चे को मुझे पुणे के एक संगठन के एक कार्यकर्ता बतला रही थी कि वो बच्चों को पिकनिक से वापस ले जा रही थी और जब ऑटो रिकी और जब वो ऑटो रिक्शा एक मस्जिद के आगे से जैसे ही गुजरा अचानक बच्चों ने नारा लगाया जय श्री राम और वो बिल्कुल स्पेंड हो गए और उन्होंने कहा कि इन बच्चों के साथ मैं काम करती हूं उनको मैं पिकनिक से लौटा रही थी मस्जिद को देख के जय श्री राम का नारा लगाना चाहिए ये उनके दिमाग में कैसे आया तो ये जो डिस्कोर्स है जो डिस्पोर्स चल रहा है जिसमें आप रामनवमी का जुलूस निकालते हैं मस्जिद पे चढ़ते हैं तलवार क्या इसका एक ग्लोरिफिकेशन किया जा रहा है इसलिए मुझे मुझे लगता है कि बिल्कुल इसका ग्लोरिफिकेशन इसको जायज माना जाता है। इसको बर्दाश्त के लायक माना जाता है। इसको दंडित नहीं किया जाता है। इसकी पर्याप्त निंदा नहीं की जाती है। कभी इसको बुरा माना जाता था। लेकिन अब इसको अच्छा माना जाता है। इसमें शरीक होना। लोग अपने बच्चों को भेजते हैं। राम राम नवमी के जुलूस में आप अक्सर देखेंगे 12 13 बरस के बच्चे अपने हाथ में तलवार हैं। नारे लगा। यह अच्छी बात मानी जाती है क्योंकि अगर प्रधानमंत्री वही कर रहा है तो मुझे भी वही करना चाहिए। यह तो आम कहावत है बड़े लोग जिस रास्ते जाते हैं बाकी लोग भी उस रास्ते जाते हैं। महाजन जिस रास्ते चलते हैं साधारण लोग उसी रास्ते से चलते हैं। तो अगर हमारा प्रधानमंत्री गाली गलौज कर रहा है। गृह मंत्री कर रहा है। मुसलमानों के खिलाफ मुख्यमंत्री कर रहा है तो जरूर अच्छी बात है। बिल्कुल। हेमंत विश्व शर्मा आज तक पर बैठे हुए थे और वो कह रहे थे कि जो मुसलमान है उनको परेशान मैं परेशान करना चाहता हूं ताकि वो खुद ही परेशान होकर वहां से चले जाए। उस एंकर ने कंफ्रेंट क्यों नहीं किया? यही और और वो एंकर खुद को उसके बाद आईने में किस तरह देखती है? लेकिन उस एंकर को भी लगता है क्योंकि वो एंकर खुद एंटी मुस्लिम है। तो यह एक प्रोएक्टिव एंटी मुस्लिम हेट हिंदुस्तान के हिंदुओं और सिर्फ हिंदुस्तान के नहीं डासपरा के भी हिंदुओं के एक बड़े हिस्से का स्वभाव बन जाएगा। यह हिंदुओं के लिए बहुत चिंता की बात है। मुसलमानों का जो नुकसान होगा वो हो रहा है। मुसलमान एक बहुत ही अनसर्टेन हालत में है हिंदुस्तान में। आप नहीं कह सकते आप गाड़ी ले जा रहे हैं। आप पर हमला होगा नहीं होगा। बिल्कुल खास तौर पे जो विज़िबल मुस्लिम है। हां जो विज़िबल मुस्लिम है। आप नहीं कह सकते आपको रोक कर आपका आधार कार्ड मांगा जाएगा। आधार कार्ड में आपका नाम देखने पर आपके साथ क्या होगा? आप चल रहे हैं उस बोगी में आपके बगल में जो बैठा हुआ है वो आपके साथ क्या करेगा आपको नहीं पता है आपको नहीं पता है कि आप चल रहे हैं रात को सोए हुए हैं ट्रेन में तो क्या किसी जो आरपीएफ का जवान है उस वो आपको गोली मार देगा आप आप नहीं जानते तो हिंदुस्तान के मुसलमान इस अनसर्टेनिटी में रहने की उनको आदत पड़ गई है जैसा गाजा के ये तुलना बहुत ही गलत अह डिसपोशननेट है। जी। लेकिन गजा के मुसलमानों को मालूम है कि या वहां के ईसाइयों को कि कहीं से भी बम गिर सकता है। दो तीन मेरे सवाल हैं। क्या आप ये देख रहे हैं? हो सकता है कि आप मेरे सवाल से अग्री ना करें। क्या आपको लग रहा है कि मुसलमानों को जिस तरह से दबाया जा रहा है, उनको लगातार जिस तरह से सप्रेस किया जा रहा है, जैसे कि बाबरी मस्जिद का हम इंसिडेंट ले कि ये कहा जाता था कि एक मस्जिद है। आप मान जाइए इस पर ये एक हार्मोनी के लिए पीस के लिए और फिर उसके बाद हमने देखा कि हजारों मस्जिदों की लिस्ट है। हर रोज मुसलमान सताए जा रहे हैं। परेशान किए जा रहे हैं। उनको डीह्यूमिनाइज किया जाता है। ऐसा लगता है कि उनका इज्जत उनका वकार अब उसकी कोई अहमियत नहीं है। कोई भी ट्रेन में, मेट्रो में कोई भी चप्पल उतार के मारने लगता है। कोई भी पीट-पीट के मार देता है सब कुछ और ऐसा लग रहा है कि एक एक तरह की एक ऐसी खामोशी है जो कभी-कभी लगता है कि कहीं तूफान की तरह तो नहीं आएगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि घटेगी किसी दिन? मैं सिर्फ ये अक्सर लोगों को कहा जाता है। ये क्यों नहीं होना चाहिए? क्योंकि उधर से कुछ टेररिस्ट होगा। मेरा कहना है कि क्या आप इस डर से ये खत्म करेंगे? आज से तकरीबन 100 साल पहले हमारे एक पुरके हुए जिनका नाम प्रेमचंद है। हिंदी उर्दू के बहुत और हिंदुस्तान के बहुत बड़े लेखक उन्होंने एक बात कही थी उस वक्त जी 1922 23 24 उन्होंने कहा था कि मुसलमानों के साथ जो बर्ताव किया जा रहा है उस वक्त की बात कोई भी कौम लंबे वक्त तक अपनी जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर सकती और उसे नहीं करना चाहिए। ये प्रेमचंद लिखा है। मैं देखिए मैंने कहा कि मुसलमान 12 साल 13 साल से क्या कर रहे हैं। जी मुसलमानों ने उसके पहले नाइंसाफी का एक लंबा वक्ता देखा है। क्या 2002 का इंसाफ हुआ? नहीं हुआ। मुकदमे बहुत सारे हुए। नहीं हुआ। एक तरह का इनाम मिला। और वो इनाम लोगों ने लिया। मुंबई का क्या हुआ? भिमंडी का क्या हुआ? जमशेदपुर का क्या हुआ? भागलपुर का क्या हुआ? एक तरह से हिंदुस्तानी स्टेट ने यह तय कर लिया है कि वह नहीं करेगा इंसान। यह तो मुसलमान देख रहे हैं। क्या कैसे याद किया? देखिए एक वफा होता है। 70 साल में क्या मुसलमानों ने मुसलमानों के टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन की भरमार होगी। जिस तरह अगर आप नक्शा बनाना चाहे और मुसलमानों पर होने वाले हमलों का नक्शा बना लें। हिंदुस्तान तो हर जगह दिखलाई पड़ेगा। क्या मुसलमानों ने वैसे रिएक्ट किया जिसका अच्छा जिसका अंदेशा लोग दिखलाते रहते हैं, डर दिखलाते रहते हैं। टेररिज्म टेररिज्म टेररिज्म ये मुस्लिम मुस्लिम टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन खड़े हो जाएंगे। 70 साल में नहीं हुए कोई एक गिरोह खड़ा हुआ खत्म हुआ। लेकिन जिस पैमाने पर मुसलमानों के साथ हिंसा हुई है उसका जवाब क्या वायलेंस से मुसलमानों ने दिया है उन्होंने हमेशा कॉन्स्टिट्यूशनल तरीकों से उन्होंने हमेशा दिल्ली में 3000 से ज्यादा मुसलमान मारे क्या किया असम ने टेररिस्ट ऑ्गेनाइजेशन बना लिया नहीं बनाया ना भागलपुर में 2000 से ज्यादा टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन बनाया नहीं बनाया तो फिर हम किसका कच्छा दिखा रहे हैं? क्या कर रहे हैं? मैं उस उसकी तरफ बात ही नहीं करना चाहता हूं। मैं कहता हूं कि यह नहीं होना चाहिए। और अगर कोई सेल्फ रेस्पेक्टिव फॉर्म होगी तो इस दिल्लत को बर्दाश्त नहीं करेगी। उसको नहीं करना चाहिए। लेकिन अगर सेल्फ डिफेंस ही एक तरह का क्राइम बना दिया जाए। माना कि कुछ जगहों पर हमने देखा कि सेल्फ डिफेंस में मुसलमान उठे या परिवार भी कह सकता है कि मैंने सेल्फ डिफेंस में या जो उत्तम नगर का परिवार हम नहीं जानते जब झगड़ा हुआ ये तो जांच की बात है किसने किस पर पहले हमला किया कैसे हुआ किसने सेल्फ डिफेंस किया मुझे इंदौर के एक की एक मीटिंग की याद है जिसमें एक बुजुर्ग मुसलमान खड़े हुए और रो पड़े उन्होंने कहा कि अब हमसे ये कहा जा रहा है कि तुम्हारे ऊपर तलवार चले तुम हाथ भी नहीं उठाओ वो रोने यू शुड नॉट डिफेंड योरसेल्फ। लेट योरसेल्फ बी किल्ड और आप खड़े रह बस ऐसे ही सब। आप आप खुद को मारे जाने दें। पेश कर दें आप। ये पेश करें। मेरा मेरा जो मन होगा मैं आपके साथ जो करना चाहूंगा आप करें। जो जैसे ईरान पर अभी हमले के बाद ईरान ने जब जवाबी कारवाई की तो डोन्ड ट्रंप ने क्या कहा? इट्स अ बिट अनफेयर। इट्स अ बिट अनफेयर टू रिटेलिएट। अलव मी टू अटैक यू एंड किल यू। यू आर बीइंग अनफेयर टू रिटेल यू। तो यही कहा जा रहा है। लेकिन मैं ये मानता हूं कि हिंदुस्तान के मुसलमानों ने बहुत ही धीरज और बहुत ही संयम और बहुत ही सभ्यता का परिचय दिया। इस केस में उत्तम नगर के केस में आप जुडिशरी के रोल को आप किस तरह से देखते जुडिशरी ने हिंदुस्तान को जितना निराश किया है, जिस वक़्त जुडिशरी की भूमिका थी, उसी वक़्त जुडिशरी ने बतलाया कि वो वो दरअसल उस उसके लायक नहीं है। जिस जितनी इज्जत उनको दी जाती है, उसके लायक नहीं है। क्योंकि जुडिशरी ने ये कहा था कि हेट स्पीचेस नहीं होनी चाहिए। या घर बुलडोज नहीं होना चाहिए। घर बुलडोज नहीं होना चाहिए। आपकी आंख के आगे हो रहा है। तो अगर कुत्तों पर आप सो मैं कुत्तों के खिलाफ नहीं हूं। कुत्तों के खिलाफ बेइ इंसानी होना चाहिए। लेकिन आप सो मोटो कॉग्निजेंस ले सकते हैं। आप एक एनसीआरटी के चैप्टर का सोमोटो कॉग्निजेंस ले सकते हैं। और मुसलमानों के घर गिराए जा रहे हैं। आपकी आंख बंद है। आपके कान बंद है। मैं नहीं जानता आज अदालत में मेंशन किया गया है उत्तर नगर। मैं नहीं जानता कि उनको इसकी सेंस ऑफ अर्जेंसी कितनी है। लेकिन यह पूरा दौर हिंदुस्तान की अदालत न्याय न्यायपालिका के लिए सबसे शर्मनाक दौर के रूप में देखा गया। जिसमें उनके पास मौका था कि वो हिंदुस्तान की जम्हूरियत को और हिंदुस्तान को बचाएं। उन्होंने तय किया कि वो नहीं करेंगे। जैसे हिंदुस्तान की ब्यूरोक्रेसी को यह मौका है। मैं अभी भी कहता हूं मुझे मालूम है कि 2002 में ऐसे बहादुर पुलिस ऑफिसर्स गुजरात में मौजूद थे जिन्होंने वो नहीं होने दिया जो सरकार चाहती थी। उसकी सजा उन्होंने बुक की वो जेल में। जी। मुझको ये पता है कि 1984 में ऐसे ऑफिसर थे जिन्होंने सिखों के खिलाफ हिंसा। ऐसे जजेस थे अपने जो हैं आप उनको पनिश करते हैं। आप उनको ट्रांसफर करते हैं। आप उनको डिमोट करते हैं। अब तो फिर वह चाहे चंद्रचूर हो बोगोई हो बोबड़े हो सूर्यकांत और अब जो हैं वे सब जब रिटायर होंगे आगे जब उनके बारे में लिखा जाएगा तो जैसे मुझे इस लफ्ज़ का इस्तेमाल करना चाहिए कि नहीं आप वो एमआर रिपब्लिक के जजेस के बारे में कहते हैं या न्यूरब ट्रायल में जजेस का ट्रायल हुआ तो उनसे पूछा जाएगा कि वो कहां भूल गए थे दो लास्ट सवाल मेरे आपसे कि एक तो यह कि ईद बिल्कुल अन करीब है और उत्तम उत्तम नगर में जिस तरह की टेंशनंस बनी हुई है और जिस तरह की नारेबाजियां वहां पर की जा रही है कि खून से जो है होली खेली जाएगी ईद नहीं मनाने दी जाएगी सब क्या आपको लग रहा है कि वहां कोई इस तरह का कोई इंसिडेंट वहां पर हो सकता है या आपको लग रहा है कि अभी इनफ एफर्ट्स किए जा रहे हैं क्योंकि मैं लगातार देख रही हूं कि दोनों तरफ लोग जा रहे हैं। खास तौर पे जहां मुसलमान रहते हैं उस तरफ मैं देख रही हूं बहुत ज्यादा लोग जो हैं सिविल सोसाइटी के वहां जाकर बातचीत कर रहे हैं। लेकिन फिर भी क्या आपको कोई डर है? देखिए मैं ये मानता हूं कि इसको प्रेडिक्ट करना बहुत मुश्किल है। क्योंकि अगर किसी गिरोह ने ये तय किया है कि वो हिंसा करेगा तो वो हिंसा करेगा। उसको रोकना पुलिस का काम है। इंटेलिजेंस उसके पास है। आप देख रहे हैं कि रोज धमकी दी जा रही है। यह धमकी उस दिन एक्चुअल फिजिकल वायलेंस में कन्वर्ट होगी कि नहीं ये मैं अभी प्रेडिक्ट नहीं कर सकता। लेकिन उसको रोका जा सकता है। जैसे आप बैरिकेडिंग करके लोगों को नहीं जाने दे रहे हैं। वैसे आप इन ग्रुप्स को इकट्ठा नहीं होने दे सकते। ये दिल्ली पुलिस इसमें सक्षम है। हम 10 लोग इकट्ठा होना चाहते हैं। दिल्ली पुलिस नहीं होने देती। तो फिर वो यह कैसे होने दे? इसका मतलब यह उसकी मर्जी से हो रहा है। होगा कि नहीं होगा मैं नहीं जानता। मेरा यह कहना है कि इसको रोकने के प्रयास किए जाने चाहिए और उसमें मुझे निराशा जितनी पुलिस से है, पार्टी से है, उतने विपक्षी दलों से भी। क्यों ऐसा है कि दिल्ली में सारे राजनीतिक दलों के हेड क्वार्टर है। दिल्ली में सारे राजनीतिक दलों के सबसे बड़े नेता हैं। वे क्यों नहीं उत्तम नगर जा सकते? हम्म। वे क्यों नहीं वहां शांति सभा कर सकते? वो क्यों नहीं? ज्यादातर नेता हिंदू नेता वो क्यों नहीं हिंदुओं से बात कर सकते? आप सुबह दोपहर शाम गांधी गांधी गांधी कहते रहे। अब गांधी ने आपको दिखलाया कि ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए? क्या आप इसको ये मानते हैं कि ये इतनी छोटी जगह है कि बड़े नेताओं को नहीं जाना चाहिए? क्या आप इसका इंतजार कर रहे हैं कि कोई बड़ा हादसा हो जाए उसके बाद आप कुछ कहें। यह जिम्मेवारी उनकी भी है ना कि वो जाए। अकेले प्रोफेसर त्रिपाठी बी के त्रिपाठी आईआईटी जो रिटायर्ड वो शख्स अकेले जाता है। कितना खतरा उठा के जाता है? अकेले और दूसरे राजनीतिक दलों के नेता नहीं जा सकते। और खासतौर पे वो लोग जो मोहब्बत की दुकान की बात करते हैं। खासतौर पे वो जहां आप हर छोटी-मोटी घटना पर हम देखते हैं कि उनको जाते हुए। लेकिन चाहे वो दिल्ली दंगों की बात हो या अब की बात हो हमने उन्हें नहीं देखा है कि जब मुसलमानों पर हमला हो रहा हो तो हमारे राजनीतिक दलों को बहुत कम जगह जाते हैं अक्सर कतराते हैं। तो अगर वो कतराते रहेंगे तो ये हिंसा बढ़ती रहेगी। उनको यह हिम्मत दिखलानी चाहिए कि वह हिंसा के खिलाफ बात कर सकते हैं और जहां जरूरत है दखल देने की वहां दखल दे सकते हैं। वह सिर्फ बात नहीं है। वह एक्शन है। और राजनीतिक दलों से प्रवचन की उम्मीद नहीं की जाती। उनसे एक्शन की उम्मीद की जाती है। दिल्ली में तो आजादी का वक्त था ना। जब गांधी ने कहा कि मेरी जगह नवाखाली है या मेरी जगह कोलकाता है। मेरी जगह कहीं और है। उनसे लोगों ने कहा अरे वहां बड़े फैसले हो रहे हैं। नहीं है। मेरा काम यहां है यहां अमन कायम करना। तो क्यों नहीं राजनीतिक नेता वहां कायम कर सकते? लास्ट सवाल मेरा आपसे कि फिर इंसाफ जब आप कह रहे हैं जुडिशरी से उम्मीद नहीं और जिस तरह से जुडिशरी का पूरा बिहेवियर रहा है दूसरा पुलिस से अभी भी मैं ये उम्मीद कर रहा हूं कि आज मेंशन हुआ हम आज लोग लेकर गए हैं अरजी मैं उम्मीद कर रहा हूं कि अदालत अदालत कुछ करेगी लेकिन फिर मुसलमानों के लिए इंसाफ के मायने क्या इंसाफ उनको कैसे मिलेगा क्योंकि अगर आप ये कह रहे हैं कि वो सब्र का मुजाहरा कर रहे हैं। पुलिस का रोल हम यह देख रहे हैं। जुडिशरी का हम रोल हम देख रहे हैं। जो विपक्षी पार्टी है उनका रोल हम देख रहे हैं। सरकार तो जाहिर सी बात है कि इसमें इन्वॉल्व है। चाहे वो पहले आम आदमी पार्टी थी उसका भी हमने रोल देखा और अब तो बीजेपी की सत्ता है यहां पर। डबल इंजन की सरकार जिसे वो कहते हैं। और ये सिर्फ मैं स्टैंड अलोन इस केस की ही अगर बात कर लूं तो भी मैं बोल रही हूं कि फिर इंसाफ किस तरह से मिलेगा। क्योंकि उनके लिए तो अगर हिंदू पक्ष की बात करें तो उनके लिए तो इंसाफ के मायने ये है कि एनकाउंटर किया जाए। मौत का बदला मौत। देखिए मौत का बदला मौत सिर्फ अभी की बात नहीं हुई। आमतौर पे लोगों के दिमाग में रहता है कि मौत का बदला मौत। हम बलात्कार के लिए फांसी। ये एक कॉमन सेंस है। रूल ऑफ लॉ कहता है ये नहीं होगा। रूल ऑफ लॉ है। प्रोसेस है। एक प्रक्रिया है। तो लोग कुछ भी कहते नहीं। लोग तो कहेंगे। अभी भी कहा जाता है बलात्कार फांसी लेकिन आप बतलाते नहीं कानून का राज है। मैं लोगों की मर्जी के हिसाब से उनको शांत करने के लिए इंसाफ का काम नहीं करता। तो यह चीज इसका जवाब मेरे पास नहीं है। मैंने आपसे कहा कि मुझे जो सब यह कर सकते हैं वो सब कॉम्प्लसिट दिखाई पड़ता है। जैसे उन्होंने तय कर लिया हो कि हिंदुस्तान में एक मेजॉरिटेरियन हुकूमत को हमेशा के लिए कायम कर देना है। उसमें सारे इदारे शामिल है। इलेक्शन कमीशन शामिल है। ब्यूरोक्रेसी शामिल है, पुलिस शामिल है, जुडिशरी शामिल है। तो ये एक बहुत मुश्किल अनडिक्लेयर्ड हिंदू राष्ट्र ही है। एक तरह से एक तरह से लेकिन अभी उसके खिलाफ जद्दोजहद चल रही है। सारे लोग जेल में नहीं है। अ ऐसे वकील मौजूद हैं चाहे नित्या राम कृष्ण कपिल सुबह बहुत सारे जो अभी भी अदालत के सामने खड़े हैं। मुरलीधर जैसे वकील अतुल इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकील जिनका तबादला इसके लिए किया गया कि वो इंसाफ की बात कर रहे हैं। वो मौजूद है जिन्होंने कहा संभल के पुलिस से कि आप रेस्ट्रिक्ट नहीं कर सकते और उन्होंने पूछा कि क्या आप कुंभ में जब स्टैंपेड हुआ तो उसके बाद आपने कहा कि तीन तीन फीट में कितने हिंदू प्रार्थना करेंगे कि आपने ये नियम लागू किया है। अगर आपने नहीं किया आप मुसलमानों पर ये फैसला ऐसे कुछ जजेस मौजूद हैं। तो मैं ये मानता हूं कि हिंदुस्तान में अभी एक भयंकर जद्दोजहद चल रही है। आखरी फेज में पहले फेज में नहीं ये चल रही है। जिसमें हिंदुस्तान को बचाने की कोशिश हो रही है। वो मुसलमानों को सिर्फ बचाने की कोशिश बिलकुल। वो हिंदुस्तान को बचाने की कोशिश है। कामयाब होगी? नहीं होगी। बहुत-बहुत शुक्रिया प्रोफेसर अब्दुल आलम जी आपने वक्त दिया और जाहिर सी बात है बहुत सेंसिटिव इशू है। अब ये देखना है कि ईद अन करीब है। क्या वहां पर होता है। हम सिर्फ उम्मीद ये कर सकते हैं कि वहां सब कुछ और सारे हालात जो है वो ठीक रहे। बहुत शुक्रिया।

Companion article

A Quarrel, a Death, and a City on Edge

On the afternoon of Holi this year, a long-simmering dispute between two neighbouring families in Uttam Nagar, in west Delhi, turned fatal. The two households, one Hindu and one Muslim, had fought for years over ordinary things: parking spots, garbage, the small frictions of shared walls. Accounts of what triggered this particular flare-up diverge. The Muslim family says a young man in their neighbour's circle, Prince, threw colour on a woman of their house; the Hindu family says the reverse, that a young girl in their home was struck by a water balloon thrown from the other side. Words were exchanged, then blows, in what Professor Apoorvanand, a Delhi University professor and long-time political and social commentator, described as an ordinary occurrence that plays out somewhere in India most days.

The first clash appeared to end there. But Tarun, a Hindu man from one of the two families, then returned with associates from a gym, and a second, larger confrontation followed in which people on both sides were hurt. Tarun died of his injuries. Apoorvanand did not equivocate on this point: whatever the provocation, "yeh hatya hai" — this is a killing — and the ordinary machinery of criminal law, an investigation, charges, a trial, must now run its course. Members of the Muslim family were also seriously injured; their lawyer says some suffered deep wounds and were beaten again after being taken into Tihar jail. A minor from the family, a 14- or 15-year-old referred to as Rizwan, went missing in the aftermath, with fears — unconfirmed — that he may have died; there has been no further word of him in the days since. Several members of the Muslim family, including women, were arrested.

Where the Communal Turn Actually Begins

Apoorvanand's central argument is that the fight itself was not a communal event. Two neighbours who happened to be Hindu and Muslim had a violent altercation of the kind that recurs across the country regardless of religion; nothing in the transcript of events he describes suggests that other Muslims joined in against Tarun, or that the clash spread beyond the two households. "Yeh sirf do parivar tak" — this stayed confined to two families, he said, arguing that by any ordinary reading this was not, in itself, sectarian violence.

What changed that, in his account, was the state's own response. Soon after Tarun's death, authorities demolished the home belonging to Rizwan's family, officially justified as action against an unauthorised structure. Apoorvanand calls this the first act of communalisation, and insists it was carried out by the government itself: no notice was given, no time allowed, and the demolition proceeded in defiance of the Supreme Court's own directions on how such actions must be conducted. "Yeh pehli sampradayik karyavahi hai" — this was the first communal act, he said, delivered by the state before any Hindutva organisation had even mobilised.

He drew a direct parallel to an earlier case in Rajasthan, where a school fight between two children, one Hindu and one Muslim, ended with the Hindu child stabbed and killed. There too, he said, the administration's first response was to bulldoze the home the Muslim family lived in, a rented house belonging to someone else entirely. When civil-liberties activists asked the district magistrate to explain the demolition, the officer said it was done to placate the mob and prevent further violence. Apoorvanand's rejoinder was blunt: that is not justice for the dead child, it is an attempt to satisfy what he called a Hindutva sensibility, punishment delivered before any FIR, any court hearing, any investigation had taken place.

Only after this state action, he said, did the second wave of communalisation begin: Hindu Raksha Dal, Bajrang Dal and the Vishva Hindu Parishad converged on Uttam Nagar and recast a death between neighbours as an attack on Hindus as a category. Tarun, in this retelling, stopped being an individual and became a stand-in for all Hindus; the accused family became, in the same move, representative of all Muslims. Apoorvanand noted, without confirming it, that lawyers involved in the case have claimed Tarun's own family had links to Bajrang Dal.

A Familiar Sequence, From Shaheen Bagh to Uttam Nagar

Asked to compare this with the Delhi riots of February 2020, Apoorvanand distinguished the two while insisting on a shared pattern. That earlier violence followed a sustained, months-long protest at Shaheen Bagh against the Citizenship Amendment Act, a movement he said was overwhelmingly Muslim in composition and entirely peaceful. What preceded the violence, he argued, was a state-driven rumour campaign: central ministers claimed terrorists and rapists were hiding among the Shaheen Bagh protesters, and senior leaders of the ruling party described the sit-in itself as an act of terrorism. He recalled a widely noted remark from a Union minister about pressing the voting button so hard that Shaheen Bagh would feel the shock, calling it a direct incitement to violence. When Bharatiya Janata Party leaders then warned that protesters would be removed by force if they did not leave the streets themselves, he said, police allowed the threat to be made openly and did nothing to stop it. The chants of that moment, he recalled, made the alignment explicit: "Delhi Police lath chalao, hum tumhare saath," and its companion, invoking the prime minister directly.

Uttam Nagar lacks that organised backdrop; there was no protest movement to be smeared before the violence. But Apoorvanand sees the same institutional posture repeating: police standing by while a mob mobilises, and administrative machinery treating one community's grievance as license for collective retribution. "2020 mein bhi police ne unka saath diya, 2026 mein bhi" — in 2020 the police sided with them, and now again, he said, describing an unbroken thread of permissiveness toward Hindutva mobilisation regardless of which government or year. He also dismissed as false the claim, repeated by protesters, that the incident had ruined Hindu households' Holi; Hindus in the area, he said, celebrated the festival as they normally would, making the grievance a fabricated pretext rather than a lived injury.

Genocidal Calls and a Double Standard in Policing

The slogans and demands circulating in Uttam Nagar have gone well beyond grief. Protesters have declared that Eid will not be allowed to be celebrated, that the next Holi will be played with Muslim blood, and chanted that they are ashamed because Tarun's killers still live. Some have called openly for an extrajudicial "encounter" killing of the accused, in the middle of a public street. Apoorvanand's response was to turn the demand back on itself: should the country adopt a rule that anyone who considers a person responsible for a death may simply shoot them, and then shoot everyone else they hold responsible too? He noted that no Muslim organisation, anywhere, has ever demanded that arrests be halted after a Muslim was accused of killing someone; by contrast, he said, when Hindu men are arrested for lynching or rape, crowds often surround the police station itself demanding that they be freed.

He pointed to a structural asymmetry in how the two families are being heard. Tarun's parents have spoken to the media about their own injuries and grief, while the accused family's account has reached the public mainly through their lawyer, since its members are in jail; the lawyer says they too were badly hurt, and beaten again inside Tihar. Apoorvanand argued that Tarun's character, good or bad, and any past association with an organisation like Bajrang Dal, is irrelevant to the wrongness of his death — but by the same logic, he added, it is equally irrelevant to how much protection the accused family deserves under the law while the case proceeds.

The area itself has begun to harden along communal lines: Uttam Nagar's blocks have effectively been divided into a Hindu side and a Muslim side, each hardening its own narrative. Apoorvanand said he sees the same pattern recur wherever such violence has occurred. He described visiting Shiv Vihar in northeast Delhi as recently as late February, five years after the 2020 riots, and finding a lane that had once been mixed now clearly split, with residents pointing out exactly where the "Hindu" stretch ends and the "Muslim" one begins. In Khajuri Khas, he recalled seeing bamboo barricades still separating burned Muslim homes from a Hindu side where residents showed no remorse and, if anything, resented those who expressed sympathy for the Muslim victims. "Hinsa turant baant deti hai" — violence divides a place instantly, he said, and once a side feels blamed for that violence, even correctly, it tends to grow more defensive and resentful rather than less.

Peace Committees and an Unequal Burden of Proof

Apoorvanand pointed to a telling contrast in footage of Uttam Nagar's peace-committee meetings. An elderly Muslim man, speaking calmly, insisted the two families had lived as neighbours for years, that this was a private dispute rather than a communal one, and that the whole community should not be blamed for it. A Hindu speaker at the same gathering, whom Apoorvanand identified as upper-caste, responded by telling Muslims present that they suffered from a lack of education, then suggested Muslims collectively raise a large sum of money for Tarun's family as proof that they truly stood with their neighbours.

Apoorvanand called this a revealing double standard: no equivalent demand has ever been made of Hindus, that they collectively raise money for a Muslim family killed by Hindu men, after any of the many such killings across the country. The unequal expectation, he said, exposes something durable, "ek ganth jo Hinduon ke dil mein hai" — a knot lodged in the Hindu heart that resurfaces at moments exactly like this one. He also noted that the community elders who once quietly contained such tensions before they escalated have largely disappeared, leaving fewer people equipped, or willing, to do that work now.

A Hundred Years of Preparing the Ground

Pressed on whether this radicalisation could be confined to fringe Hindutva organisations, Apoorvanand rejected the framing outright. He traced it instead to the Rashtriya Swayamsevak Sangh and its network of affiliated organisations, which he said have spent a century filling minds, through institutions such as Saraswati Shishu Mandir, Vidya Bharati, Seva Bharati and Sanskar Bharati, with a particular idea of the nation and a particular image of Muslims. The result, in his description, are minds conditioned not to mind if Muslims are killed, because, in that worldview, they should not exist in that place at all, are seen as fundamentally different, and are believed to have taken something that belongs to others.

What was once confined to shakhas and classrooms, he argued, is now spoken openly by the country's most powerful office-holders, and amplified by television channels, newspapers and films. Where such rhetoric once produced at least some public hesitation, he said, it is now voiced with pride. He cited footage of children on camera calling for violence against Muslims, and recounted an activist's account of schoolchildren spontaneously chanting "Jai Shri Ram" as their auto-rickshaw passed a mosque, on their way back from a picnic. He connected this to the normalisation of Ram Navami processions in which boys as young as twelve now carry swords, a practice he said was once condemned but is now treated as admirable, on the reasoning that if the prime minister behaves a certain way, ordinary citizens feel licensed to follow.

The Impossible Position of Being Muslim

Asked what Muslims could realistically do to defuse this atmosphere, Apoorvanand's answer was that the question itself has no honest answer, because every path is foreclosed. Muslims are called backward when they are uneducated, he said, and "shatir" — cunning — when they are educated, citing court remarks about activists Sharjeel Imam and Umar Khalid suggesting their education made their intentions harder to detect. They are told not to confine themselves to mosques and graveyards, and then accused of pursuing "jihad" when they build schools, colleges and hospitals instead. When they enter the civil services, he said, they are accused of infiltrating the state apparatus, a phrase he attributed to RSS chief Mohan Bhagwat.

His conclusion was that Muslims are fighting what amounts to a battle for survival, and doing so entirely within constitutional and democratic means: seeking not a pro-Muslim state but a secular, democratic order that protects life, property and dignity, and voting accordingly. He drew a sharp contrast between this record and the fear routinely invoked to justify surveillance and suspicion of the community. Despite decades of anti-Muslim violence, in the Partition era, in the 2002 Gujarat riots, and in outbreaks in Mumbai, Bhiwandi, Jamshedpur and Bhagalpur, he said no organised Muslim terrorist movement has taken root in seventy years. The response to injustice, he argued, has instead run almost entirely through the courts: he cited Zakia Jafri's more than two-decade legal fight over her husband's killing in the 2002 riots, Bilkis Bano's fifteen-year pursuit of justice, and the unlettered mothers of victims like Junaid and Pahlu Khan who have nonetheless pursued their cases in court. He also referenced a recent account of the trial following the 2020 Delhi riots, describing how dangerous it can be for any Muslim witness simply to hold their ground under testimony, and noted that people do so anyway.

Institutions That Have Taken a Side

Apoorvanand extended his critique to the institutions meant to check this kind of majoritarian mobilisation. He pointed to a change in the recorded rate of anti-Muslim incidents in Karnataka after the state's government changed from the BJP to the Congress, arguing that this shift shows police and administrative behaviour tracks political leadership far more than it reflects fixed institutional values. His broader claim was that neither the bureaucracy nor the police in India currently have the independent courage to act impartially, and that they instead require what he called a "political boss" willing to insist on it. It followed, in his view, that changing the ruling political leadership matters more, in the near term, than hoping individual attitudes will soften on their own, since, as he put it, "Muslims can't afford to wait" for that slower change of heart, and neither can Christians.

His sharpest words were reserved for the judiciary, which he called complicit in what he described as the most shameful period in its history. He faulted courts for failing to act against demolitions carried out in violation of the Supreme Court's own guidelines, and for not curbing open hate speech, while contrasting this with the readiness of the same courts to take up matters like a school textbook chapter on their own initiative. He named former Chief Justices D.Y. Chandrachud and S.A. Bobde, along with sitting Chief Justice Surya Kant, predicting that history would eventually judge this generation of judges the way Nuremberg-era judges were judged for what they failed to do when it mattered. He described the state's institutions collectively, the Election Commission, the bureaucracy, the police and the judiciary, as having effectively settled into cementing what he called an undeclared Hindu Rashtra. Still, he pointed to lawyers such as Nitya Ramakrishnan and Kapil Sibal, and to judges such as S. Muralidhar and a transferred Allahabad High Court judge, along with court orders questioning why restrictions imposed on Muslim gatherings were not applied equally after the Kumbh stampede, as evidence that the fight against this drift has not been entirely abandoned.

Waiting for Eid, and for Someone to Show Up

With Eid approaching and threats still circulating that it will not be allowed to be celebrated in Uttam Nagar, Apoorvanand said predicting whether the threats will turn into actual violence is genuinely difficult, since a determined group can act regardless of warnings. But he insisted the risk is not unmanageable: Delhi Police, he noted, routinely prevents far smaller and less threatening gatherings from forming at all, which means its continued tolerance of these mobilisations reflects a choice rather than a limitation of capacity.

His deepest frustration, though, was directed at politicians across the spectrum. Every major political party has its national headquarters in Delhi, he pointed out, and yet none of their senior leaders have travelled to Uttam Nagar to hold a peace meeting or speak directly to the Hindu residents whose anger is driving the mobilisation. He noted that only a retired IIT professor, B.K. Tripathi, had gone there alone, at real personal risk, while national leaders who invoke Gandhi's name constantly have ignored Gandhi's actual example of travelling personally to Noakhali and other sites of violence to restore calm. Justice, he said in closing, cannot be delivered on the terms the loudest voices in Uttam Nagar are demanding, since the rule of law does not operate by public sentiment or a logic of a death for a death, however common that sentiment may be. What is underway, he said, is not simply a fight to protect Muslims but a broader, uncertain struggle to keep India itself from settling permanently into majoritarian rule, a struggle he does not expect to win outright, but one he said has not yet been abandoned.

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