0:48Should Mob Lynchers Be Called Terrorists?
“People who lynch should be called terrorists — in no unequivocal terms.”
In this thought-provoking panel discussion, we come together to examine how Muslims are represented across mainstream and alternative media in India. The conversation unpacks the growing dehumanisation of Muslims in television debates, news coverage, and political narratives, while also questioni…
मेरा ख्याल है अल्टरनेटिव मीडिया जो वैसे सरकार की मुखालिफत करता हुआ बीजेपी सरकार की मुखालिफत करता हुआ मीडिया है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है, कई बार एक लिमिटेड गेज से मुस्लिम्स को देखने की कोशिश करते हैं। दूसरा एक मसला है ये कि अल्टरनेटिव मीडिया में भी एक रिप्रेजेंटेशन का प्रॉब्लम है कि टॉप पोजीशंस में आमतौर पर मुस्लिम्स हैं या ऑपरेस्ट कास्ट के लोग हैं वो नहीं है। लेकिन अगर आप देखें ज्यादातर बेशतर जो अल्टरनेटिव मीडिया है उनका जो ऑडियंस है क्योंकि YouTube से वो अर्न करते हैं वो ज्यादातर मुसलमान है। अल्टरनेटिव मीडिया की बहुत बड़ी कमी है। स्पेशली व्हेन इट कम्स टू मुस्लिम्स। तो मुस्लिम्स में भी एक सेट टाइप के वॉइससेस चाहिए। मेरा खुद का एक्सपीरियंस है कि जब भी मैं मुसलमान लफ्ज का इस्तेमाल किया मैंने तो कहा कि नहीं माइनॉरिटी का इस्तेमाल करिए आप। मुसलमान का नहीं करिए। तो ये सारी चीजों को कौन रखेगा सामने? वही रख सकता है जिसका लिव्ड एक्सपीरियंस जिसके चैलेंजेस जिसकी डेली जो लाइफ है वो अफेक्टेड हो रही है रायट से मार्जिनलाइजेशन से डिस्क्रिमिनेशन से हाउस से लेकर तमाम तरह के इस तरह के हमारे पास एग्जांपल्स हैं वहां पर वो तब तो हेडलाइंस बनती थी लेकिन जब 20 साल 18 साल के बाद जब वही मुसलमान छूटते हैं तो वो एक हेडलाइन भी नहीं बन पाते हैं। मुझे कोई डाउट नहीं है इसमें कि हमें जो लोग लिंच करते हैं उनको टेररिस्ट कहना चाहिए। दे आर विजिल दे आर नॉट विजिलंटिस दे आर टेरेस दे आर किलिंग पीपल फॉर नो रीज़ अब सवाल यह है कि जो आपने फ्रेमवर्क्स डेवलप किए कि ह्यूमन राइट्स होने चाहिए तो मेरा राइट क्यों नहीं है प्लूरलिज्म होना चाहिए आईडियोलॉजीस में तो मैं मुसलमान और टोपी पहन के जब मौलाना आजाद गांधी और नेहरू के साथ खड़े हो सकते थे तो राहुल गांधी के साथ क्यों नहीं खड़े हो सकते? आप एक्चुअली आप रिप्रेजेंटेशन भी दे रहे हैं कि आपने एक मुसलमान को रखा हुआ है। लेकिन उसके साथ-साथ आप उसको वो आजादी नहीं दे रहे हैं कि वो किस तरह से उस चीजों को करना चाहते हैं। मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन सेक्टेरियन होगा। मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन जो है वो सेपरेटिज्म की तरफ जा सकता है। इस हैंगओवर को हटाने की जरूरत है। तो आज की डेट में मुस्लिम पॉलिटिकल थ्यरी क्या है? मेरा सवाल ये है कि जब कांशीराम की बात हो रही है कि उनकी पॉलिटिकल थ्यरी उनकी सोशल थ्यरी से आ रही है। 91 के बाद अलकायदा के खिलाफ फतवा किसने दिया? सबसे पहले दारुल उलम देवबंद ने दिया, अल हज़र ने दिया। तो ये कंजर्वेटिव हिंदू हिंदुत्व के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठा रहे हैं? सो आई एम नॉट सेइंग कि समबडी एल्स शुड नॉट डू इट। बट आई एम जस्ट सेइंग दैट वी नीड मोर एंड मोर रिप्रेजेंटेशन एंड मोर एंड मोर मीडिया हाउसेस। मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन उसी तरह होगा जैसे दलित का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन उत्तर प्रदेश में होके दलित ने सरकार बनाई। दलित भी तो मेजॉरिटी में नहीं है। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद और आज हम यहां पर इस पॉडकास्ट में बात करने जा रहे हैं कि किस तरह से जो हिंदुस्तान के मुसलमान हैं वह एक बदतरीन दौर से गुजर रहे हैं। आप किसी कॉर्पोरेट में काम करते हो या आप कहीं सब्जी बेचते हो या आप किसी जगह पर किसी तरह का कारोबार करते हो, कोई नौकरी करते हो, आप कहीं पर भी हो, आपको किसी भी वक्त किसी भी वजह से टारगेट किया जा सकता है। इन 12 सालों में एक ऐसा परमानेंट दुश्मन क्रिएट कर दिया गया है जिसे उसका पड़ोसी हिंदू पड़ोसी हमेशा एक शक की निगाह से देखता है। उसको लगता है यह किसी भी तरह का जिहाद कर सकता है। कभी लव जिहाद कर सकता है। कभी थूक जिहाद कर सकता है। यह आतंकवादी भी हो सकते हैं। इनके यहां तो इसी तरह के लोग होते हैं। डॉक्टर्स हो, इंजीनियर्स हो, हर किसी को एक शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है। यानी कि इसको अगर सही तरीके से कहा जाए तो लगातार मुसलमानों का डीह्यूमनाइजेशन किया जा रहा है। 12 साल में जितनी पॉलिटिकल पार्टीज इसके लिए जिम्मेदार हैं या एक पॉलिटिकल पार्टी भारतीय जनता पार्टी जो कि इस वक्त सत्ता में है वह जितनी जिम्मेदार है उससे कहीं ज्यादा जिम्मेदार है इस देश का सो कॉल्ड मेन स्ट्रीम मीडिया जो कि सरकार की गोद में बैठकर पत्रकारिता कर रहा है। जिसका हर रोज सिर्फ एक मकसद है कि किस तरह से कोई ना कोई एक ऐसा टॉपिक एक ऐसा मौजू चुना जाए जिससे मुसलमानों को देश का दुश्मन उन्हें गद्दार उन्हें आतंकवादी उन्हें जिहादी बताया जाए और उसके जरिए एक पॉलिटिकल पार्टी को सीधे तौर पर फायदा पहुंचाया जाए। सवाल यह है आज कि एक ऐसे दौर में चाहे हम बात करें मेन स्ट्रीम मीडिया की या हम बात करें अल्टरनेटिव मीडिया की। क्या वाकई में वो मुसलमानों के जो जायज सवाल हैं, मुसलमानों के जो जायज मुद्दे हैं, क्या उनकी वो आवाज बन पा रहे हैं? क्या उनके वो मुद्दे उस तरह से उठा पा रहे हैं? या फिर ऐसे दौर में मुसलमानों को उनके अपने मीडिया हाउसेस की जरूरत है जिसको हम मुस्लिम मीडिया भी कह सकते हैं। कुछ ऑर्गेनाइजेशंस हैं, कुछ मीडिया हाउसेस हैं जो इस तरह का काम कर रहे हैं। लेकिन क्या वह वाकई में इनफ है? और जो काम कर रहे हैं उनके सामने किस तरह के चैलेंजेस सामने उनके आ रहे हैं। दरपेश उनको हो रहे हैं। इस पर तो आज हम बात करेंगे ही लेकिन साथ में बात हम करेंगे मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन की भी। हम बात करेंगे कि आज के इस दौर में क्यों पहले से कहीं ज्यादा मुसलमानों को उनके थिंक टैंक, उनके इंस्टीटशंस, उनके मीडिया हाउसेस की जरूरत है। मेरे साथ तीन लोग जुड़े हुए हैं। मैं यह तो नहीं कहूंगी कि मेहमान हैं और यहां पर कोई सवाल जवाब का कोई सिलसिला नहीं होने जा रहा है बल्कि इट्स मोर लाइक अ डिस्कशन जहां हम सब अपनी-अपनी राय, अपनी-अपनी बातें और जो हमारे एक्सपीरियंसेस हैं उनको हम साझा भी करेंगे और आपके सामने हम यह भी बात करने की कोशिश करेंगे कि कैसे जो इंस्टीटशंस हैं, जो चैलेंजेस हैं उनको उनसे किस तरह से उन्हें हैंडल किया जाए। मेरे साथ असद अशरफ हैं जो कि सीनियर जर्नलिस्ट हैं, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट हैं। मेरे साथ आदित्य मेनन है। क्विंट में पॉलिटिकल एडिटर हैं। सीनियर जर्नलिस्ट हैं। और मेरे साथ अली जावेद हैं जो कि फाउंडिंग एडिटर हैं नाउ्स के। अ शुरुआत मैं आदित्य आपसे करना चाहूंगी क्योंकि मैं ये देख रही हूं कि आप एक अल्टरनेटिव मीडिया का हिस्सा हैं। उसके बाद भी जब आपकी स्टोरीज और हम जब देखते हैं तो मुझे लगता है कि आप अभी भी उन सवालों को कहीं ना कहीं उठाने में कामयाब हो पा रहे हैं। क्या अल्टरनेटिव मीडिया में भी इस तरह के चैलेंजेस आपको फेस करने पड़ रहे हैं और क्या आपको यह लग रहा है और पर्टिकुलरली अगर मैं आपकी बात ना करूं और अल्टरनेटिव मीडिया की बात करूं क्योंकि मेन स्ट्रीम मीडिया तो मुझे लग रहा है कि खुलकर इस तरह से सामने है कि अ सबको अब पता चल गया है इन 12 सालों में कि वो किस तरह से काम कर रहा है। लेकिन क्या अल्टरनेटिव मीडिया वाकई में अल्टरनेटिव मीडिया बन पा रहा है? मेरा ख्याल है अल्टरनेटिव मीडिया जो वैसे सरकार की मुखालिफत करता हुआ बीजेपी सरकार की मुखालिफत करता हुआ मीडिया है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है कई बार एक लिमिटेड गेज से मुस्लिम्स को देखने की कोशिश करते हैं। वो एक विक्टिम की तरह ही देखते हैं। तो जो कम्युनिटी के अंदर नवांसेस हैं जो एक पुशबैक कम्युनिटी के अंदर हो रहा है जो जुल्म हो रहा है उसके खिलाफ। कई बार वैसी वॉइसेस को दबाने की कोशिश की जाती है अल्टरनेटिव मीडिया में। अपने इदारे की बात नहीं कर रहा मैं। लेकिन जो बाकी अल्टरनेटिव मीडिया है उनमें कई बार ऐसी बातें सामने आई हैं। दूसरा एक मसला है ये कि अल्टरनेटिव मीडिया में भी एक रिप्रेजेंटेशन का प्रॉब्लम है कि टॉप पोजीशंस में आमतौर पर मुस्लिम्स हैं या ऑपरेस्ट कास्ट के लोग हैं वो नहीं है। टॉप पोजीशन में ज्यादातर जो एक सवर्णा लिबरल हैं उनकी ही नुमाइंदगी ज्यादा है। अह तो जाहिर सी बात है अल्टरनेटिव मीडिया का भी जो एक पर्सपेक्टिव है उससे शेप होता है। तो रिप्रेजेंटेशन और एक लिमिटेड गेज से मुस्लिम को देखना। ये दो मेन मसले हैं अल्टरनेटिव मीडिया के। हम तो इसका मतलब जो एक वो अल्टरनेटिव उसे बनना चाहिए था मेन स्ट्रीम मीडिया का उसमें उस हद तक कामयाब नहीं हो पाया है। लेकिन अगर आप देखें ज्यादातर बेशतर जो अल्टरनेटिव मीडिया हैं उनका जो ऑडियंस है क्योंकि YouTube से वो अर्न करते हैं वो ज्यादातर मुसलमान है। बेशतर मुसलमान है और आप देखें कि उनका कंट्रीब्यूशन उनको उस मुकाम तक पहुंचाने के लिए बहुत बड़ा है। तो तब भी आपको लग रहा है कि उस तरह से उन मौजू को या उन टॉपिक्स को जिस शिद्दत से उन्हें उठाना चाहिए या जिस तरह से उन्हें उठाना चाहिए एक नैरेटिव देना चाहिए या आपको एक एक वोकैबलरी देनी चाहिए उनको वो देने में वो कामयाब नहीं हो पा रहे हैं। मसला यह है कि जो जो मुस्लिम ऑडियंस है उनकी एक्सपेक्टेशन मेन स्ट्रीम मीडिया में जो तासुब है उस वजह से इतनी लो हो गई है कि महज बीजेपी की मुखालिफत करना या कम्युनल ना होना इतना काफी है ऐसे मीडिया हाउसेस को सपोर्ट करने के लिए। तो एक जेनवाइन जो मुस्लिम पर्सपेक्टिव सामने लाया जा सकता है वो नहीं लाया जाता है क्योंकि कम्युनिटी वाले खुद बहुत ज्यादा सपोर्ट नहीं करते हैं इस चीज को। ये एक अफसोस की बात है। पर इट इज़ ए प्रोडक्ट ऑफ़ द टाइम्स वी आर लिविंग इन अनफॉर्चूनेटली। असद आप कैसे देख रहे हैं इसको? नहीं मुझे लगता है कि जो आदित्य साहब ने बात की वो बहुत सही है। एक तरफ तो मेन स्ट्रीम मीडिया है जो बिल्कुल ही नोच केचड़ की बात कर रही है। इट्स कम हैज़ कम डाउन टू एन एक्सटेंट जहां पे वो मुझे लगता है कोलैबोरेटर्स हैं जो भी हो रहा है उसमें। तो लेकिन अल्टरनेटिव मीडिया की भी जहां तक बात है मुझे लगता है कि अल्टरनेटिव मीडिया को जिस गेस से मुसलमानों के साथ देखना की तरह जिस ग से देखने की जरूरत है उस गेस से देख नहीं पाते हैं और मुस्लिम्स को भी वही जो आदित्य साहब ने बोला कि विक्टिम हुड विक्टिम हुड का जो वो नैरेटिव है उसमें ही फिट आते हैं मुसलमान कहीं कहीं ना कहीं तो मुझे लगता है उसके अलावा मुझे लगता है कि एक एक लेफ्ट लिबरल डिस्कोर्स में शायद मुस्लिम पॉलिटिक्स को लेकर भी थोड़ा सा हेसिटेशन है, रिलक्टेंस है उसको एक्सेप्ट करने का। और अगर कोई ऐसा जर्नलिस्ट हो जो कहीं ना कहीं अपने आप को अपनी आइडेंटिटी से आइडेंटिफाई कर रहा हो, अपनी पॉलिटिक्स को कम्युनिटी के अराउंड डिफाइन कर रहा हो तो उससे भी उनको प्रॉब्लम होती है और ये मुझे लगता है कि एक रियलिटी है जो कि एक मींस अल्टरनेटिव मीडिया की बहुत बड़ी कमी है। स्पेशली व्हेन इट कम्स टू मुस्लिम्स। तो मुस्लिम्स में भी एक सेट टाइप के वसेस चाहिए कि ये पैटर्न में हमारे आते हैं। ये फ्रेमवर्क में फिट करते हैं। ये लेकिन ये कह सकते हैं देखिए हमारे ऊपर इतने चैलेंजेस हैं और उन चैलेंजेस को देखते हुए हम काम कर रहे हैं अल्टरनेटिव मीडिया में एटलीस्ट हम उनकी आवाज तो उठा पा रहे हैं। हम वो मुद्दे उठा पा रहे हैं जो मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं कर रहा है। लगता है कि जो मुद्दे उठाने की बात है मुसलमानों का मुद्दा सिर्फ विक्टिमहुड तक का मुद्दा नहीं है। विक्टिम हुड एक पार्ट है जिसमें ह्यूमन राइट्स पोलिशंस हैं ये हैं। लेकिन उसके साथ-साथ बहुत कुछ हो रहा है मुसलमान समाज में। उसके साथ-साथ एक लीडरशिप की चर्निंग हो रही है। उसके साथ-साथ नए तरह के आवाज आ रहे हैं। नए तरह के कलेक्टिव्स बन रहे हैं जो कि अपने आप को मुसलमानों की तरह आइडेंटिफाई करते हैं। और मुझे लगता है कहीं ना कहीं अल्टरनेटिव मीडिया को उस चीज से थोड़ा रिलक्टेंस है कि वो कोई भी चीज जो अपने आप को थोड़ा मुस्लिम आइडेंटिटी से रिलेट करे उसको वो एक्सेप्ट नहीं कर पाती है। एंड दैट इज़ बिकॉज़ ऑफ़ द फैक्ट दैट दीज़ मीडिया ऑर्गेनाइजेशन आर आल्सो ड्रिवन बाय सर्टेन आईडियोलॉजी। तो उनके जो एडिटर्स हैं उनकी भी कुछ आईडियोलॉजिकल समझ है तो वो सब कॉन्फ्लिक्टिंग होती है। लेकिन मुझे लगता है डायवर्सिटी को मद्देनजर रखते हुए डायवर्सिटी का जो कांसेप्ट है उसको मद्देनजर रखते हुए ज्यादा से ज्यादा मुस्लिम वॉइसेस को जगह देने की जरूरत है। और सिर्फ एक तरह के मुस्लिम वॉइससेस को नहीं अलग-अलग तरह के मुस्लिम वॉइससेस को जगह देने की जरूरत है। तभी तक तभी मुस्लिम समाज का जो है वो इमसिपेशन होगा। आप एक तरह के वॉइससेस को सिर्फ जगह देंगे कि एक आदमी आपके हिसाब से बोल रहा है तो दैट तो फिर आप तो वही कर रहे हैं जो संघ ही मीडिया भी कर रहा है ना मतलब आप उनको भी ऐसे लोग चाहिए जो उनके हिसाब से बात करें तो अगर आपको भी सिर्फ ऐसे लोग चाहिए जो आपके हिसाब से बात करें तो दैट इज सिंग अप अ डेंजरस प्रेसिडेंट तो आई थिंक थोड़ा डवर्स मतलब मैं इंटेंशंस पे बात नहीं कर रहा हूं इनके इंटेंशंस बहुत अच्छे हो सकते हैं और शायद वो ये उनको लगता हो कि जो वो कर रहे हैं वो सही कर रहे हैं उनके इंटेंशन बिल्कुल बुरे नहीं होंगे। लेकिन कहीं ना कहीं शायद उनकी अंडरस्टैंडिंग में अभी तक वो बात आ नहीं पाई है कि मुस्लिम्स के अंदर क्या चर्निंग हो रही है। वो किस तरह से अपना इसको आदित्य क्या इसको हम हमें दो हिस्सों में बांटना चाहिए? इससे पहले मैं अली के पास आऊं क्योंकि अली खुद एक मीडिया हाउस रन कर रहे हैं और उन्हें किस तरह की परेशानी से दोचार होना पड़ता है उसकी मैं बात करूंगी उनसे। लेकिन क्या हमें जब हम अल्टरनेटिव मीडिया की बात करते हैं तो क्या हमें इसे दो हिस्सों में बांट देना चाहिए? एक तो यह कि वो वो लोग जो पहले मेन स्ट्रीम मीडिया का हिस्सा थे और उसके बाद वह एक आप यूट्यूबर कह लें या उन्होंने अपने प्लेटफार्म शुरू किए। पहले वो शायद कभी ना कभी उन्होंने ये कहा कि वो मोदी के भी सपोर्टर रहे। इनिशियली 2014 में उन्हें लगा कि एक चेंज की जरूरत है। वो सब लोग उसका हिस्सा थे जब अन्ना मूवमेंट चल रहा था और उन्हें लगा कि कांग्रेस से ज्यादा कोई और विलेन इस देश के लिए नहीं हो सकता है और एक बदलाव की जरूरत है और तब वो उसका हिस्सा थे। और शायद उन्हें कुछ सालों के बाद यह लगा कि अ जो हो रहा है मुसलमानों के साथ या देश के साथ हो रहा है वो उस उतना हिस्सा उसका नहीं हो सकते हैं। सो देन दे स्टार्टेड देयर ओन YouTube चैनल्स और दूसरे वो हैं जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं जिन्होंने ऑर्गेनाइजेशंस बनाई हैं अल्टरनेटिव मीडिया की और उनमें उन्होंने लोगों को जगह दी है। रिप्रेजेंटेशन दिया है। तो अगर इन दोनों को अगर हम देखें तो इसमें क्या आप मोटे तौर पर फर्क देखते हैं? एक जाहिर है एक अपॉर्चुनिज्म का एक डिग्री तो है जो आप पहली कैटेगरी जिनकी बात कर रहे थे कि जिस किस्म की पोजीशन वो चाह रहे थे। उन्हें लगा ये एक नॉर्मल सरकार ही चेंज की तरह होगा कि सेम जो एलिट है वो उनको कहीं ना कहीं सर्कुलेशन में रहेंगे। लेकिन ऐसा थी नहीं सरकार। यह सरकार उस किस्म की आई है जो आपसे बस साष्टांग प्रणाम चाहती है। चाहती है कि आप पूरी तरह आप उनके सामने बिछ जाएं। जो शायद इन लोगों को गवारा नहीं था और अगर था भी गवारा तो उन्हें वैसे मौके नहीं मिले जैसे उन्हें लगता है उन्हें मिलने चाहिए। तो तो ऐसे लोग जरूर हैं। लेकिन फिर भी मेरा यही अप्रोच इसमें रहेगा कि लोगों को जो भी ऑर्गेनाइजेशन है उन्हें उनके काम से जज किया जाए। कि चाहे वह पहले उनका जो भी बैकग्राउंड रहा हो अगर अभी वह अच्छा काम कर रहे हैं और एक ईमानदारी से मेजॉरिटेरनिज्म के खिलाफ और जो सरकार का एक एक पूरी एक इंस्टीटशंस को खत्म करने की एक एक मुहिम चल रही है उसके खिलाफ अगर ईमानदारी से रिपोर्टिंग कर रहे हैं तो इनका जो जो भी माजी में इन्होंने किया उसे भूल जाना चाहिए मेरे हिसाब से या कम से कम ज़हन में रखना चाहिए बट बियों्ड अ पॉइंट उनके खिलाफ उसे इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ये एक हमंबल मेरा सजेशन है इस मामले में। मैं मुस्लिम मीडिया के सवाल पर आऊंगी। लेकिन उससे पहले मैं अली से पूछना चाहूंगी। अली जब आपने ये अपनी ऑर्गेनाइजेशन शुरू की थी। आपने ऐसे वक्त में शुरू की थी जब आप एक जेएनयू के एक तालिबेइल्म थे और एक सीए एनआरसी को लेकर एक पूरी चर्निंग चल रही थी। मुसलमान अपने वजूद का सवाल पूछ रहा था और शायद आप भी उसका हिस्सा थे। मैं भी उसका हिस्सा थी। मैंने उस वक्त में मेन स्ट्रीम मीडिया छोड़ा था और आप यह सोच रहे थे कि कैसे एक मीडिया हाउस को शुरू किया जाए। किस तरह के चैलेंजेस तब से लेकर अब तक आपके सामने आते हैं? अपार्ट फ्रॉम फाइनेंससेस? अ क्या आपको लगता है कोई भी टॉपिक चुनने से पहले, कोई भी गेस को लाने से पहले या फिर आप आप मीडिया हाउस यह कहने से पहले कि इट्स ओन बाय मुस्लिम्स एंड रन बाय मुस्लिम्स। क्या किसी तरह की कोई हिच होती है, कोई डर रहता है? कैसे देखते हैं? क्या चैलेंजेस हैं आपके सामने? फॉर एग्जांपल जो यहां पे मैं उसको कनेक्ट करना चाहूंगा कि जो बात हो रही थी स्पेशली असद भाई ने भी जो बात बोली आईडियोलॉजी और आइडेंटिटी के हवाले से तो सबसे पहले तो ये जब सीए का दौर चल रहा था और हम स्टूडेंट्स थे जेएनयू में एमफिल कर रहे थे और भी बाकी साथी थे। सबसे बड़ा चैलेंज उस टाइम पे क्यों जरूरत महसूस हुई कि एक मीडिया या फिर एक रिसर्च के इदारे की जरूरत है। तो हमारी जो अपनी रीडिंग है उसमें जो दुनिया की हिस्ट्री है तारीख है वह आइडेंटिटीज और आईडियोलॉजीस की है और उसके बिटवीन नेगोशिएशंस की है कि हम मुख्तलिफ होने के बावजूद किस तरह से अपनी शनाख्त अपनी आइडेंटिटी को बरकरार रखते हुए क्या हम लोग म्यूचुअली जहां पे ओवरलैपिंग स्पसेस हैं वहां हम रह सकते हैं क्योंकि दुनिया कोई इस तरह की तो है नहीं कि कंप्लीटली एक्सक्लूसिव स्पसेस हैं। मुसलमान मुसलमान की जगह रह रहा है। हिंदू हिंदू की जगह रह रहा है। सिख सिख की जगह रह रहा है। और उनकी इंटरनल कल्चरल आइडेंटिटी में कंसिस्टेंसी हो। हालांकि हम यह भी जानते हैं कि विदिन ट्रेडिशंस भी इतने डिफरेंट मुख्तलिफ पॉइंट ऑफ व्यूज होते हैं। आप शियाज़ और सुन्नीज़ को ले लीजिए, देवबंदीज और बरेलवीज़ को ले लीजिए, आप वैष्णवाइज़ और शेवाइट्स को ले लीजिए। आप मुख्तलिफ जितने भी ट्रेडिशन हैं। तो सवाल असल में बुनियादी है कि क्या एज एन आइडेंटिटी मुझे इख्तियार है कि मैं अपना पक्ष रख सकूं। और वो मैं पक्ष किस तरह के पब्लिक स्फेयर और सोशल कंडीशंस में और स्टेट कंडीशंस में रख सकता हूं। तो एक तरफ तो यह वादा कि हिंदुस्तान की आजादी के वक्त कि हम एज ए कॉन्स्टिट्यूशनल बीइंग्स सिटीजंस हमें ये इंश्योर किया गया ऑन रिटन पीस ऑफ पेपर कि आप सबकी इक्वलिटी ऑफ़ अपोरर्चुनिटी है और बाकी सारी चीजें हैं। लेकिन पिछले 70 सालों में जो हमने देखा कि एक्सेस टू एजुकेशन, एक्सेस टू हेल्थ, एक्सेस टू बहुत सारी मुख्तलिफ चीजें जो एक इंसान को इंसान बनाती हैं। उसके जो 10, 15 20 साल होते हैं जिसमें वो जीता है, बनता है, समझता है। ये देखता है कि उसकी जो कल्चरल आइडेंटिटी है या उसके जीने का तरीका है क्या वो इन ऑड्स तो नहीं है मेन स्ट्रीम के तो जो आज का हिंदुस्तान हम देख रहे हैं वो चाहे कांग्रेस का दौर हो चाहे वो लेफ्ट सेकुलर लिबरल का दौर हो वो जो डिस्टिंगशंस और जो डिबेट्स हिंदुस्तान की आजादी के वक्त हुए कि प्लूरलिज्म क्या है? मुख्तलिफ ख्याल के लोग मुख्तलिफ ट्रेडिशंस के लोग किस तरह से एक नेशन को वजूद में ला सकते हैं। बनिस्बत इसके कि कोई एक टोटिटेरियन अथॉरिटेटिव रिजीम हो। तो हम जब तक ये बात करते हैं हमने 70 80 साल जो बात करी 70 साल वो ज्यादातर हमने बात करी इंस्टीटशंस फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ़ स्टेट। लेकिन स्टेट ने वो जो इंटरनल डिफरेंसेस थे कि मुसलमान गरीब है या ये कि ब्यूरोक्रेसी क्योंकि मेजॉरिटी से आ रही है। मेजॉरिटी के पास पढ़ने लिखने के जराय ज्यादा हैं। वही जाके मीडिया हाउसेस बनाते हैं। वही जाके आईएएस बनते हैं। वही जाके अस्पताल बनाते हैं। वो जो डिफरेंस है कि स्टार्टिंग लाइन में ओपोरर्चुनिटी में वो फेस हमने या डिफरेंट जो माइनॉरिटीज उन्होंने फेस किया और उसका प्रोडक्ट ये हुआ कि 60 70 साल में जो मीडिया है जो उसका प्राइमरी रोल है वो डिस्कोर्स और कंसेंट क्रिएट करना है कि आज की डेट में अगर ये बात रखी जा रही है लोगों के सामने कि मुसलमान जिहाद करता है। तो पहले तो जिहाद की कैटेगरी को जनरली डिस्कर्सिव बनाया गया कि ये जिहाद है। फिर वह जिहाद जब लोगों के सामने आ गया तो वह थूक जिहाद भी हो सकता है, लैंड जिहाद भी हो सकता है, फलाना। फिर वो एक एब्स्ट्रैक्ट कैटेगरी से आपका टीसीएस में भी वो जिहाद हो सकता है। उसके बनिस्बत जब एक आइडेंटिटी उसको ना तो मेन स्ट्रीम में क्योंकि जैसा असद भाई ने बोला कि आईडियोलॉजीस के अपने कमिटमेंट्स होते हैं। और वो कमिटमेंट्स ये होते हैं कि अगर लेफ्टिस्ट हैं तो मुझे एक तरीके का निजाम कायम करना है जिसमें क्लास की ये इंटरप्रिटेशन है। तो उसमें रिलीजन की इंटरप्रिटेशन, कास्ट की इंटरप्रिटेशन, जेंडर की इंटरप्रिटेशन वो उतनी ज्यादा डेवलप्ड नहीं है जितना दूसरी आइडियोलॉजिकल फॉरमेशंस में है। फॉर एग्जांपल इस्लाम में भी अगर आप देखें वैसे कुरान में और ओरिजिनल उसमें औरतों के बहुत हुकूक हैं। कास्ट का वो फ्रेमवर्क नहीं है। लेकिन जब हम सोशियोलॉजी ऑफ मुस्लिम एकिस्टेंस को देखते हैं तो आपको पेट्रियाकी भी दिखेगी। आपको कास्ट भी दिखेगा। तो ये सारी चीजों को कौन रखेगा सामने? वही रख सकता है जिसका लिव्ड एक्सपीरियंस जिसके चैलेंजेस, जिसकी डेली जो लाइफ है वो अफेक्टेड हो रही है रायट से, मार्जिनलाइजेशन से, डिस्क्रिमिनेशन से। तो हमने ये देखा जब हम जो आपने बोला शुरुआत में कि मीडिया भी है, आपकी पॉलिटिकल फॉरमेशंस भी हैं। आपके हेल्थ इंस्ट सब कुछ है। कहने को हमारी जो अपनी ऑर्गेनाइजेशंस है उन्होंने भी सारे शोबे खोल रखे हैं कि हम एनजीओ भी चलाते हैं। हम अस्पताल भी चला। लेकिन क्या वो नेशनल स्केल पे मुस्लिम डिस्कोर्स प्रोड्यूस कर पा रहा है? क्या हिजाब सिर्फ एक नॉर्मेटिव सजाने का तरीका है या किसी एक खवा जो जो एक जेंडरर्ड आइडेंटिटी है एक पर्टिकुलर ट्रेडिशन से उसकी मोड ऑफ एक्सपीरियंस है जिंदगी की ये सारी डिबेट्स जब तक पब्लिक स्फेयर में ना आए तो आप अपने राइट्स भी नहीं नेगोशिएट कर सकते क्योंकि जब हिजाब का मसला हुआ तो यह आ गया ना कि हिजाब एसेंशियल है भी या नहीं और हमारे लोग तो थे ही नहीं कि भई यह बताने के लिए कि भ एसेंशियल हो सकता है या नहीं हो सकता है? क्या आपको ये लग रहा है कि जो मौजूदा मुस्लिम मीडिया है अ क्या वो ये सब करने में कामयाब हो पा रहा है? देखिए क्या होता है कि हर चीज के मरहले होते हैं, स्टेजेस होते हैं। ग्लास ये है। इसमें पानी है भी और नहीं भी है। तो एक तरफ तो यह है कि मुसलमानों का पार्टीशन के बाद पहली बात तो ये कि हम आगे बात करेंगे। पार्टीशन का जिम्मेदार मुसलमान नहीं है। वो भी हिंदुत्ववादी है। वो जो बंगाल से लेकर आनंद मठ से लेकर हिंदू महासभा का वायलेंस से लेकर आरएस ये सब ऐसा एलियनेशन प्रोड्यूस करना कि जिसमें एक हिस्सा मुसलमान का वो चूज़ करे जो भी गलत हुआ। तो यह प्रोडक्ट है जो साइकिल की उसमें जब हम पार्टीशन के बाद इस एग्जिस्टेंस से सामने आते हैं तो हमने जो 70 साल में गेन किया हमने जो स्ट्रगल्स किए हमने बाबरी की बात करी शबानों की बात की दूसरी की ये हमारे अचीवमेंट्स हैं। लेकिन वो अचीवमेंट्स अगर रोटी कपड़ा मकान रिप्रेजेंटेशन आइडेंटिटी के बगैर हुआ तो वो इनकंप्लीट था। उसकी जिम्मेदारी भी हमारी है। हमें ये समझना पड़ेगा कि बीजेपी के आने से पहले जितना स्पेस था भी वो हमने नहीं इस्तेमाल किया। और आज भी जिस तरह के इदारे हम वजूद में ला रहे हैं, वह रिएक्टिव हैं। उनके अंदर ज्यादातर चीजों में सुबह जो बात बोली जा रही होती है, वही एंकर शाम को दूसरी बात बोल रहा होता है। क्योंकि उसको उस वक्त जो इंसान व्यू लाया जा सकता है उसके लिए जो भी खबर मार्केट में है वो आप पेश कर देते हैं। तो ये मुस्लिम आइडेंटिटी के लिए शॉर्ट टर्म पे तो एडवांटेजियस है बीजेपी के लिए। क्योंकि उनको क्या है? उनको भी चाहिए। अगर मुस्लिम आइडेंटिटी बजाहिर लोगों के सामने नहीं आएगी तो उनको भी उससे फायदा नहीं होगा ना कि भाई आपको दिख नहीं रहा है वो जिहादी जो एक मेजॉरिटी के ज़हन में जिसकी तस्वीर बनी हुई है अगर वो मार्केट में एकिस्ट ही नहीं करेगा वो टीवी पे उसका कुछ आर्टिकुलेशन नहीं आएगा तो लोग भूल जाएंगे बिलीवेबल भी नहीं होगा तो ऑफ कोर्स देयर आर अ लॉट ऑफ़ अचीवमेंट्स बट क्योंकि हम थम के नहीं सोच रहे हैं हम रिसर्च के बगैर नैरेटिव नहीं हो सकता नैरेटिव के बगैर मूवमेंट्स नहीं हो सकते। मूवमेंट्स के बगैर राइट्स नहीं हो सकते। राइट्स के बगैर इंस्टीट्यूशनलाइज्ड एजुकेशन, हेल्थ और ये सब चीजें नहीं हो सकती। तो अनफॉर्चूनेटली बहुत अल्लाह का एहसान है कि सब लोग बहुत कुछ कर रहे हैं। बट ईगोस लैक ऑफ अंडरस्टैंडिंग ऑफ होलिस्टिक विज़न कि किस तरह से दूसरी जो आईडियोलॉजीस हैं वो एक दूसरे से डिफरेंसेस रखने के बावजूद टेबल पे बैठ पाती हैं। बात कर पाती हैं। हमारे यहां ये नहीं है। लेकिन हर मैं इतने मैं असद और आदित्य के पास आऊं कि हर गुजरते दिन के साथ हम ये देख रहे हैं। चाहे पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन हो या फिर हम मीडिया के हवाले से बात कर रहे हैं। इसमें इजाफा नहीं हो रहा है। यह हर गुजरते दिन के साथ हम इसको कम होते देख रहे हैं। चैलेंजेस और बढ़ते हुए हम देख रहे हैं। और मुसलमानों का एक वाहिद सवाल जिसको मैं बार-बार कहती हूं कि उनका तहफुज उनकी सिक्योरिटी यही बन के रह गया है। वो अपने जो बेसिक क्वेश्चंस हैं उनको वो उठा नहीं पा रहे हैं। वो ये नहीं कह पा रहे हैं कि हमें एक थिंक टैंक की जरूरत है। हमें इंस्टीटशंस की जरूरत है। अपने मीडिया हाउसेस की जरूरत है। हम जहां जिस गेटोंस में हम रहते हैं वहां के हालात आप देखिए किस तरह के हैं। वो सवाल वो कह रहा है कि हमें बस जीने दीजिए, जिंदा रहने दीजिए और हम बाकी काम खुद कर लेंगे। इस तरह की सिचुएशन और यह कहने बहुत अजीब लगता है। लेकिन अभी बिहार का इलेक्शन और फिर उसके बाद बंगाल का इलेक्शन मुझे लगता है इसने इन चीजों को और ज्यादा एस्टैब्लिश किया है। और अगर अ मुख्यमंत्री जिसने संविधान को हाथ में लेकर शपथ ली है वो यह कह रहा है कि एसआईआर के जरिए जो वोट वोटर नहीं रह गए उनको कोई भी वेलफेयर स्कीम जो है उसका फायदा नहीं मिलेगा। और उसमें आपको पता है बेशतर उसमें मुसलमान हैं और गरीब मुसलमान है। तो क्या मेरा सवाल यह है क्या मुसलमान इस बारे में उस तरह से सोच पा रहे हैं? क्या उस तरह की चर्निंग उनके अंदर हो रही है? और जब नाउ जैसे मीडिया हाउसेस बहुत रिसर्च करके इस तरह के कंटेंट को प्रोड्यूस करते हैं। इसके दो मकसद हैं। एक तो ये कि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे। एक वोकैबलरी आप प्रोवाइड करें। एक आप उनको बताएं कि अगर कोई जिहाद को लेकर आपसे सवाल पूछ रहा है, हिजाब को लेकर आपसे सवाल पूछ रहा है या दूसरे मसलों पर सवाल पूछ रहा है, रिप्रेजेंटेशन पे तो आपके पास एक वोकैबलरी हो जिसका आप जवाब दे सकके क्योंकि मुसलमानों की मुश्किल यह है कि जब उनके सामने कोई चीज आती है तो वो रिएक्टिव हो जाते हैं। वो एक स्यूशन ओरिएंटेड जो उन्हें जवाब देना चाहिए वो शायद नहीं दे पाते हैं। तो इस सब में आपको आपको क्या परेशानी आपको पेश आ रही है? एक तो लोग शायद उतना नहीं देख पा रहे हैं। एक तो ये है परेशानी क्योंकि मैं आई एम आल्सो अ पार्ट ऑफ नाउ। सो आई कैन से दैट और दूसरा क्या फाइनेंससेस क्या इसकी वजह से भी बहुत सारे जो मुस्लिम मीडिया हाउसेस खुलते हैं वो खुलते बहुत जोश के साथ हैं विज़न के साथ और फिर वो बंद हो जाते हैं? जी। तो इसमें दो चीजें हैं। एक तो यह है कि चर्निंग है और बहुत एब्सोलटली विगरस चर्निंग है कि भस्पेशली जो यंग मासेस हैं ऑफ कोर्स क्योंकि नैरेटिव नहीं है तो उनकी एनर्जी चैनलाइज नहीं हो पा रही हैं। दो तरह के चीजें हैं जिससे किसी भी कम्युनिटी की जो रिसोर्सेज हैं वो मोबिलाइज हो सकती हैं। एक तो ये जो आपकी इंटरनल ऑर्गेनाइजेशंस हैं और एक वो आपके कोलैबोरेटर्स वो आपके जिनके साथ आपके अलायंसेस हैं जो आपके नाम पे आपसे वोट ले रहे हैं। एक तरफ तो मुस्लिम इदारे हैं जिनको 50 100 साल से 30 साल से 40 साल से जिन्होंने ऑर्गेनाइज करके एक रेलेवेंट अमाउंट ऑफ ह्यूमन रिसोर्स और फाइनेंसियल रिसोर्स जिनके हाथ में है और हिजमनाइज्ड है वो एक पर्टिकुलर नजरिए से सिस्टम को देखते हैं और वो जितनी नई मुस्लिम यंग फॉरमेशंस हैं चाहे वो इंटेलेक्चुअल हो पॉलिटिकल हो वो उनको इन माय ऑब्जरवेशन बहुत कॉन्शियसली नेगेट करते हैं और इनमें सारे बड़े इदारे इन्वॉल्वड हैं। और उसकी वजह से कि जो इस तरह के छोटे इदारे हैं जो स्ट्रगल करके अगर वजूद में भी आते हैं तो वह यह सोचते हैं कि उनकी जो एक्सपेंसेस हैं वो कैसे मीट होंगे। बनिस्बत उसके वो जो दूसरे इदारे हैं वो अननेसेसरी स्ट्रक्चर्स क्रिएट करते हैं जिनका वो सिमिलर आउटपुट भी नहीं होता। बहुत सारे आउटपुट उनके बहुत अच्छे होते हैं। लेकिन जहां पे उनकी कोर कंपटेंसी भी नहीं होती क्योंकि वो भी इंटरनली हैजमनाइज करना चाहते हैं। जिस तरह से आज एसआईआर के जरिए, वोट के जरिए, बाकी चीजों के जरिए बीजेपी चाहती है कि सारी चीज सारा सुपरस्ट्रक्चर उसके हाथ में हो। अनफॉर्चूनेटली ऑर्गेनाइजेशंस का ये नेचर होता है कि जैसे-जैसे वो पावर को अकोमोडेट और अक्यूमुलेट करते हैं, वो चाहते हैं कि हर चीज हमारे जरिए से हो। यही दूसरा हिस्सा है मेन स्ट्रीम पॉलिटिक्स का कि जिसमें अगर मुसलमान ताकतवर बनता है तो इंटरनली उसकी अपनी कल्चरल आइडेंटिटी को वो इन्वेस्ट करेगा। वो इन्वेस्ट करेगा तो उसके लीडर्स निकलेंगे। उसके लीडर्स निकलेंगे तो वो पॉलिटिकल फॉर्मेशन करेंगे। वो पॉलिटिकल फॉर्मेशन करेंगे तो इनके लिए दिक्कत आएगी। तो एट द एंड ऑफ़ द डे प्रॉब्लम यह है कि पीपल आर नॉट रेडी टू शेयर पावर। और पावर शेयर करने के लिए आपको दो चीजें आपको ह्यूमन रिसोर्स कैपिटल रिसोर्स दोनों शेयर करनी पड़ेंगी। अब वह पूल शेयर नहीं करेंगे बल्कि आप एक्टिवली किल करते हैं। असद भाई का एक्सपीरियंस है। हमारा एक्सपीरियंस है। हमारे साथ अल्लाह का एहसान है कि हमने उस तरह से नहीं देखा। मैं आपको बताऊं मेरा जो एज ए ऑर्गेनाइजेशन एक्सपीरियंस और एज ए एक्सपीरियंस जो थिंकिंग कर रहा है कि बाकी लोगों के साथ क्या हो रहा है। आई एम एट अ बेटर प्लेस। वी हैव गॉट प्रोजेक्ट्स, वी हैव गॉट सपोर्ट। उतनी बड़ी फंडिंग या कुछ नहीं है। लेकिन छोटे-छोटे पीसेस में उस वजह से क्योंकि हम लोग अप्रिशिएट भी करते हैं। हमारी जो नई क्लास है उसके साथ एक और प्रॉब्लम भी है कि वो विज़डम के तहत क्रिटिसिज्म और क्रिटिक को डिफरेंशिएट नहीं कर पा रहा है। क्रिटिसिज्म के चक्कर में वो यह सोच रहा है कि इन ये जीरो है। जीरो नहीं है। उस चक्कर में डिस्रस्ट है। जो इस तरह का टोटैटेरियन स्टेट जब बन रहा होता है, वह यह बोलता है कि इसको अंदर करो। तो ये बाहर रहेगा। जो बाहर रहेगा उस पे ट्रस्ट मत करो क्योंकि वो बाहर कैसे है? जबकि वो भी यही काम कर रहा है। ये भी काम कर रहा है। तो एक पॉलिटिकल इकॉनमी क्रिएट की गई है जिसमें माइनॉरिटी डिप्र्राइव्ड भी हो और डिसट्रस्टफुल भी हो। और उस कॉन्टेक्स्ट में इंस्टीट्यूशनलाइजेशन ऑफ मुस्लिम मूवमेंट्स या माइनॉरिटी मूवमेंट्स इंपॉसिबल हो जाए। उसमें सबसे बड़ा रोल आज की डेट में बीजेपी का नहीं है। कांग्रेस का नहीं है। वह मुस्लिम जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं जिनके पास रिसोर्सेज हैं जो नए इंडिविजुअल मुस्लिम्स जो इमर्ज हो रहे हैं वो उनके साथ शेयर नहीं करना चाहती ग्लोरी। उनकी है। मतलब वो ये है कि एक बार कोई मेंबर पर बैठ गया। तो बस वो उतरने के लिए तैयार नहीं है। और मैं यह भी देखती हूं कि जब कोई कोई रिलीजियस इस तरह की कोई चीज होती है तब तो आप लाखों का मजमा इकट्ठा कर लेते हैं। अगर बात वफ की थी तो लाखों सफेद कुर्ते पजामे में हमें लोग नजर आए लेकिन उतने बड़े पैमाने पर हमें हिजाब जैसे इशू पर नहीं नजर आए। उतने बड़े पैमाने पर हमें हर रोज लिंच होते हुए मुसलमानों के लिए हमें वो लोग नजर नहीं आते हैं। तो यह सवाल तो यह भी है कि आप ठीक है जो मौजूदा सरकार कर रही है वह तो एक है ही उसपे तो हम सवाल कर ही रहे हैं क्योंकि ऑब्वियसली वो आंसरेबल है लेकिन फिर हम मुस्लिम जो रिप्रेजेंटेशन है उनके ऊपर भी एक एक बड़ा सवाल है लेकिन मैं असद आपके पास आऊंगी कि मैं भी मेन स्ट्रीम मीडिया का हिस्सा रही हूं और 2019-20 में लगभग 18-19 साल के बाद मैंने उसको छोड़ा और मुझे पता है कि वह किस तरह से वहां काम किया जाता है। किस तरह से टॉपिक चूज़ किए जाते हैं। क्या कुछ वहां पर होता है और यह सिर्फ बीजेपी के आने के बाद नहीं हुआ है बल्कि कांग्रेस के जमाने में भी हमने देखा है जो आतंकवाद का टेररिज्म का इल्जाम लगाकर जिस तरह से मुसलमानों को पकड़ा जाता था बटला हाउस से लेकर तमाम तरह के इस तरह के हमारे पास एग्जांपल्स हैं वहां पर वो तब तो हेडलाइंस बनती थी लेकिन जब 20 साल 18 साल के बाद जब वही मुसलमान छूटते हैं तो वो एक हेडलाइन भी नहीं बन पाते हैं तो और अब तो खैर मेन स्ट्रीम मीडिया का यह हाल है कि हर रोज रोज सुबह शाम उनको डिबेट के लिए कोई ना कोई एक ऐसा टॉपिक चाहिए। क्या आपको लग रहा है कि पहले जो गरीब मुसलमान थे जिनके पास अपनी वॉइस नहीं थी जो इतने आर्टिकुलेट नहीं थे या अपनी बातों को नहीं रख सकते थे उनको टारगेट किया जाता था। अब नया टारगेट क्या आपको लग रहा है? कॉर्पोरेट में काम करने वाले जो एफ्लुएंट मुस्लिम्स हैं। अब वो नया टारगेट है कि ताकि जो आप अर्बन पॉकेट्स में भी जो मुसलमान रह रहे हैं उनको भी जो उनका हिंदू पड़ोसी है वो एक शक की निगाह से देखे कि देखिए ये डॉक्टर है लेकिन ये टेररिस्ट हो सकता है। ये इंजीनियर है तो लेकिन यह एक जिहाद का रैकेट जो है चला सकता है। यह तो एक सवाल है। लेकिन इसका जवाब मुसलमान कैसे दें? किस तरह से अपने आप को वो पेश करें? यह एक बड़ा सवाल है। नहीं, पहले तो यह बिल्कुल सही बात है कि पहले जो टारगेटिंग थी वो कहीं ना कहीं क्लास का उसमें एक एलिमेंट था कि गरीबों को टारगेट किया जा रहा था। हालांकि टेरर के नाम पे और भी लोगों को टारगेट किया गया है। टेररिज्म डॉक्टर्स इंजीनियर तभी डॉक्टर्स इंजीनियर पकड़े जा रहे थे। लेकिन जो ये सब थ्योरी है लव जिहाद की और लैंड जिहाद की। तो दे आर मेंट टू टारगेट अप अर्बन क्लास। नो कॉर्पोरेट जिहाद। नौ कॉर्पोरेट जिहाद जो ये पूरा मामला टीसीएस का है नासिक में यहां पर निदा खान को भी अरेस्ट किया है। तो डिस्पाइट ऑल द एविडेंस दैट हैज़ दैट हैज़ सरफेस्ड उसके बाद भी अरेस्ट कर लिया गया निदा खान को। उसके बाद भी एक नैरेटिव बनाया जा रहा है। तो ये क्लियरली टारगेट कर रहे हैं अर्बन मुस्लिम्स को जो पढ़े लिखे मुसलमान है उसको और ये मैं नहीं कह रहा हूं कि किसी को टारगेट करना चाहिए। अगर पहले हो रहा था टारगेट गरीब मुसलमान वो भी उतना ही गलत था। जो अब तो ये हो रहा है कि इक्वल प्लेइंग फील्ड हो गया है। सबको टारगेट कर रहे हैं। तो दैट इज़ मतलब पॉलिटिकली आई माइट बी रोंग। लेकिन ये है कि अब सबको टारगेट कर रहे हैं। पहले हरामोखास को हां हरामो खास को टारगेट कर रहे हैं। लेकिन पहले सब गरीबों को टारगेट कर देते हैं। उनको अदराइज़ कर देते हैं। एक क्लास का एलिमेंट था। लेकिन मुसलमानों को क्या करना चाहिए यहां पे? मुसलमानों को मुझे लगता है कि सबसे इंपॉर्टेंट काम जो मुसलमानों का है वो नैरेटिव बिल्डिंग का है। अपने अपने अपने अराउंड जो उनकी समझदारी है अपने आपको डिफेंस करने अपने आप को डिफेंड करने के लिए जिस तरह का नैरेटिव बनाना चाहिए उसको बिल्ड करने की जरूरत है। उसके लिए मीडियम की जरूरत है। तो यहां पे जैसे नाउ जैसे ऑर्गेनाइजेशनंस हैं और ऐसे और भी ऑर्गेनाइजेशनंस हैं वो बहुत इंपॉर्टेंट होते हैं। क्योंकि इस तरह की डिबेट्स जो हैं वो मेन स्ट्रीम मीडिया में तो नहीं हो सकती हैं। एंड देन एट द सेम टाइम अल्टरनेटिव मीडिया भी जो है वो बहुत ज्यादा स्पेस नहीं देता है इस तरह की डिबेट्स को। उसका जैसे पहले मैंने कहा फोकस विक्टिम विक्टिमहुड पे होता है कि आप विक्टिम हैं। आपका ह्यूमन राइट्स पोलिशन हो रहा है। लेकिन कम्युनिटी का जो अपना नैरेटिव है, कम्युनिटी की जो अपनी समझदारी है चीज को लेकर अगर अगर जिहाद को हम डिबेट कर रहे हैं, तो जिहाद को हम कैसे डिबेट करेंगे? जिहाद को सिर्फ हम एक इविल एंगल से डिबेट करेंगे। हम जिहाद के अलग-अलग पैमानों को समझेंगे। जो जो जो अंडर जो रिलीजियस अंडरस्टैंडिंग हो सकती है जिहाद की उसको समझने की कोशिश करेंगे। तो इसका स्पेस हमारे पास है ही नहीं। मतलब यू कैन नॉट डू दैट इन अल्टरनेटिव मीडिया। यू कैन नॉट डू दैट इन मेन स्ट्रीम मीडिया एट ऑल। ठीक है ना? मेन स्ट्रीम मीडिया में अगर वो बुलाते हैं तो फिर ऐसे लोगों को देख के बुलाते हैं जो बहुत ज्यादा आर्टिकुलेट ना हो। जिनका वो मजाक बना सकें जो और जाके अपनी जुबान खोल के कम्युनिटी को डिमोनाइज कर दें। तो आप कभी भी देखेंगे किसी स्मार्ट किसी अच्छे इस्लामिक स्कॉलर को जिसका काम रनाउंड हो जिसको लोग जानते हो दुनिया में उनको वो नहीं बुलाएंगे ऐसे मुद्दों पर डिबेट करने के लिए बल्कि इस्लामिक स्कॉलर वो लिखना भी पसंद नहीं पसंद नहीं करेंगे बिकॉज़ यू नो आई हैव बीन अ पार्ट ऑफ़ मिनिस्ट्री मीडिया एंड नाउ अ पार्ट ऑफ़ अल्टरनेटिव मीडिया। सो आई हैव फर्स्ट एंड एक्सपीरियंस ऑफ बोथ। बिल्कुल बिल्कुल। तो वो वो वो वैसे ही करते हैं कि वो डेमोनाइज करने के लिए कुछ चेहरों को बुला लेंगे। तो जो रियल चर्निंग है, जो रियल डिबेट्स हैं विद इन द कम्युनिटी जो रियल क्वेश्चंस उठ रहे हैं विद इन द कम्युनिटी उनको मीडियम चाहिए और वो मीडियम जो है ऐसे मीडिया हाउसेस नाउ जैसे मीडिया हाउसेस जो हैं वो बहुत इंपॉर्टेंट वहां पे प्ले करते हैं अपना रोल को क्योंकि मुझे नहीं लगता कि जिस तरह का काम यहां पे हो रहा है और भी अगर एक दो मीडिया हाउसेस हो जहां हो रहा हो तो दिस इज़ फर्स्ट ऑफ इट्स काइंड। मतलब ऐसा स्पेस पहली बार बना है जहां पे एक अच्छे स्तर का डिबेट हो रहा है और अच्छे स्तर की बातचीत हो रही है और मुझे लगता है कि इसी तरह के जो कोशिशें हैं इसको मुसलमानों को बढ़ाना चाहिए क्योंकि सोच तो बहुत रहे हैं लेकिन अपनी मीडियम्स को स्ट्रांग करना पड़ेगा लोगों तक पहुंचने के लिए। आपको लगता है सिर्फ रिपोर्ट करना माना कि आज लिंचिंग का कोई इंसिडेंट होता है। कहीं किसी मुसलमान को कहीं पर किसी और बात के लिए टारगेट किया जाता है। तो इसके दो आस्पेक्ट हैं। एक तो ये कि आप कितना रिपोर्ट किए जा रहे हैं। यानी कि क्या आप हेडलाइंस में आ रहे हैं? क्या आपकी जिंदगी की क्या इतनी भी अहमियत है कि आप एक हेडलाइन में भी आप महदूद हो पाएं या उसमें आप फिट हो पाएं। और दूसरा है कि जब इस तरह के इंसिडेंसेस हो जाए तो फिर उसके बाद जो मुसलमान हैं उसको कैसे हैंडल करें? तो हमें दो हिस्सों में जो मीडिया की हम बात कर रहे हैं मुझे लगता है इसको हम दो हिस्सों में हमें देखने की जरूरत है। तो आपको कहां कमी लगती है? क्या आपको लग रहा है कि रिपोर्ट इनफ हो रहा है और एक तरह की जो वोकैबलरी है या किस तरह से उसको उठाया जाना चाहिए किस तरह की बात होनी चाहिए किस तरह के क्वेश्चंस रेज होने चाहिए वो नहीं हो रहा है मुझे बिल्कुल लगता है कि एक तो ये सवाल है कि आजकल तो शायद इनविज़िबलाइज भी हो गई लिंचिंग विंचिंग भी बहुत ज्यादा रिपोर्ट्स नहीं हो रहे हैं उसके अराउंड स्क्रोल करके आप हां तो मुझे लगता है कि वो नॉर्मलाइज हो चुका है और इट हैज़ कम टू अ पॉइंट वेयर वी हैव एक्सेप्टेड दैट ओके दिस इज अ न्यू नॉर्मल एंड दिस इज गोइंग टू हैपन हैपन सम अदर डे तो ये होता रहेगा तो बहुत अनफॉर्चूनेट पार्ट है उसका रीज़ सिंपल है क्योंकि जिस तरह से रिएक्ट करना चाहिए था कम्युनिटी को जितना बड़ा इशू बनाना चाहिए था मुझे लगता है कहीं ना कहीं मैं थोड़ा सा क्रिटिकल होऊंगा यहां पे हालांकि बहुत सारे लोग नाराज भी हो जाएंगे लेकिन मुझे लगता है कि कई बार मुसलमानों ने बहुत सारी कोशिश की जब पहला लिंचिंग का इंसिडेंट हुआ था अखलाक का दादरी में उसके बाद मुसलमानों ने कोशिश की कि वो ईद पे ब्लैक बैंड्स पहने और ये वो करके थोड़ा थोड़ा एक पहला मुस्लिम प्रोटेस्ट सिंबॉलिक प्रोटेस्ट दुनिया भर में उसको उसके बारे में लोगों को बताएं दैट दिस इस हैपनिंग वि द मुस्लिम कम्युनिटी इन इंडिया लेकिन मुझे लगता है कहीं ना कहीं वो कॉम्पिटिटिवनेस जो पावर के अराउंड जो लड़ाई होती है ना कि अच्छा ये अब ये प्रोटेस्ट हो रहा है तो एक मुस्लिम पॉलिटिकल पावर जो है वो साइड में मर्ज कर जाएगी तो एट द पैरेलली लेट्स डू समथिंग व्हिच इज़ बिगर देन दैट एंड देन यू फेल टू कंटिन्यू डूइंग दैट मतलब आई वुड नॉट नेम किसी को कि किसी ने ऐसा किया लेकिन वो लगातार नहीं नहीं हो पाया। ऐसे प्रोटेस्ट बाद में बड़े पैमाने पे हुए हैं। काफी ग्लैमरस भी थे। लेकिन वो कंटिन्यू नहीं हो पाए। एक दो प्रोटेस्ट हुआ वो बंद हो गया। क्या आपको लग रहा है कि कुछ इंस्टीटशंस की या कुछ लोगों की एक तरह की एक हेजुमनी भी है। बिल्कुल हैमनी। मुझे लगता है कि वो पावर के अराउंड तो पावर को पावर जिस तरह से हम आपस में बांटना चाहते हैं उसमें जिसके पास अपोजिशन में ही बैठ के जिसके पास इस्टैब्लिश पावर है वो भी अपनी पावर को छोड़ना नहीं चाहता है और उस उस पावर को बचाने के लिए वो एक हेजमिनी समाज में प्रोड्यूस करता है और उसी हेजमेनिक थॉट से हम सबका एक्शन गवर्न होता है। तो मुझे लगता है कि वो तो चलता वो तो चलता है। दूसरी चीज आपने बहुत अहम पूछी थी कि मुसलमानों को यह जो अल्टरनेटिव मीडिया भी जो है जिस तरह से रिपोर्ट हो रहा है मुझे लगता है कि मुझे कोई डाउट नहीं है इसमें कि हमें जो लोग लिंच करते हैं उनको टेररिस्ट कहना चाहिए दे आर विजिल दे आर नॉट विजिलांटिस दे आर टेररिस्ट दे आर किलिंग पीपल फॉर नो रीज़न ठीक है तो उनको मुझे लगता है ये वोकैबलरी कंप्लीटली मिसिंग है फ्रॉम फ्रॉम एवरीव्हेयर नाउ वन वुड यू नो कम टू द पॉइंट कि वहां लड़ा ये टेररिज्म का डेफिनेशन क्या है ये क्या है वो क्या है तो लेकिन एंड आई थिंक देयर इज़ अब्सोल्यूट नो देयर इज़ अब्सोलुटली नो रीज़न व्हाई वी शुड नॉट कॉल देम टेरेस। आई मीन दीज़ पीपल हु आर किलिंग पीपल इनोसेंट पीपल फॉर जस्ट अ देर ईटिंग हैबिट्स एंड लिविंग हैबिट्स। और टेररिज्म क्या होता है? टेररिज्म क्या होता है? बिल्कुल। लेकिन आदित्य मैं देख रही हूं कि इवन अल्टरनेटिव मीडिया में भी शायद मुझे लगता है कि बहुत बारगेन करने के बाद भी मुसलमान बहुत असर्ट करने के बाद भी अपने आप को जो यंग माइंड्स हैं जिसके बारे में अली भी जिक्र कर रहे थे कि एक चर्निंग है एक बड़े पैमाने पर चर्निंग है जो राहुल गांधी को ये कहने पर मजबूर करते हैं कि आप माइनॉरिटी नहीं मुसलमान बोलिए मुसलमानों की बात हो रही है सिख की बात हो तो आप सिख बोलिए क्रिश्चियन की बात हो क्रिश्चियन बोलिए जब मुसलमानों की बात होती है तभी आप माइनॉरिटी का लफज़ क्यों लेकर आ जाते हैं? तो वो वो कर रहे हैं। अल्टरनेटिव मीडिया में भी मैं देखती हूं और मेरा खुद का एक्सपीरियंस है कि जब भी मैं मुसलमान लफ्ज का इस्तेमाल किया मैंने तो कहा कि नहीं माइनॉरिटी का इस्तेमाल करिए आप। मुसलमान का नहीं करिए। तो यहां तक आने में कि उनको टेररिस्ट कहा जाए। मुझे लगता है एक लंबा सफर जो है तय करना है। 12 साल तो हम देख रहे हैं। उससे पहले भी हम देख रहे हैं। उससे पहले अल्टरनेटिव मीडिया था नहीं। 12 अभी हमने अल्टरनेटिव मीडिया पिछले 10 11 साल में ही यह इमर्ज हुआ है। तो यह कमी आप क्यों देखते हैं? मुसलमान इतना भी बारगेन क्यों नहीं कर पा रहा है? अपने आप को इतना भी असर्ट क्यों नहीं कर पा रहा है? क्यों इतने कम पर ही उसको तसल्ली या तशफी मिल जाती है? दैट एटलीस्ट अ यू नो अ अप्पर कास्ट हिंदू जर्नलिस्ट इज़ रेजिंग योर वॉइस। एंड दैट्स इनफ फॉर देम। हाउ दे आर रेजिंग, व्हाट दे आर सेइंग? एंड व्हाट बेनिफिट दे आर गेनिंग? दे आर नॉट कंसर्न अबाउट इट। अब यही बात तो हेजिमनी कहलाती है ना कि जब हेजिमनी होता है तो चाहे आप अपोज कर रहे हो मुसलमानों को या मुसलमानों की हिमायत भी कर रहे हो हम हम वी आर सपोज्ड टू फील ग्रेटफुल कि भाई अरे देखिए हमारे लिए बात कर रहे हैं कितने बड़े अच्छे आदमी हैं वगैरह तो यही हजमनी होती है। यही डोमिनेंट कास्ट होना डोमिनेंट कम्युनिटी होने के यही मायने हैं। तो वह तो है ही मसला। इनसे यह सवाल पूछना चाहिए कि ठीक है। चलिए मैं यह भी कंसीड करने को तैयार हूं कि हेट क्राइम वगैरह पर इन्होंने आवाज उठाई है। मैं मैं कंसीड करूंगा। लेकिन हिंदू रेडिकलाइजेशन को क्वेश्चन करने के लिए हिंदू रेडिकलाइजेशन के खिलाफ पुश बैकक करने के लिए हिंदू जो मेजॉरिटी कम्युनिटी को डीरैडिकलाइज करने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। कुछ एक होते हैं चलिए जो वो एक टैक्टिकल उनका एक अप्रोच होता है ध्रुवराठी टाइप की कि वो अगर उन उनका यह मानना है कि हम अगर पॉलिसी पॉइंट ऑफ व्यू से सरकार को क्रिटिसाइज़ करेंगे और एक्सपोज करेंगे तो उससे नेचुरली यह लोग सरकार के खिलाफ हो जाएंगे। पर उन्होंने टाइप के शख्स ने कभी क्लेम भी नहीं किया कि वो कोई एक बहुत लार्जर पॉलिटिकल प्रोजेक्ट का हिस्सा हैं। बट लेकिन जो लोग क्लेम करते हैं वो हिंदू रेडिकलाइजेशन को एक्सपोज क्यों नहीं कर रहे हैं? वो ये जो नेटवर्क्स हैं जो इसके पीछे आईडियोलॉजी है कोई ये सवाल कोई क्यों नहीं उठाता है कि आज तक हिंदुत्व को हिंदू पॉइंट ऑफ व्यू से कभी किसी ने क्रिटिसाइज क्यों नहीं किया गया? हिंदुत्व को हमेशा कहते हैं कि सेकुलरिज्म के पॉइंट ऑफ व्यू से क्रिटिसाइज किया। होना भी चाहिए। लेकिन जिस तरह से जब 91 हुआ और आइसिस हुआ आइसिस को सबसे ज्यादा मुसलमानों ने क्रिटिसाइज किया। असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि मैं इनके टुकड़े कर दूंगा। ये ये यानी जहन्नुम के कुत्ते हैं। ये दोज़ आर ह एक्सैक्ट वर्ड्स। अब 91 के बाद अलकायदा के खिलाफ फतवा किसने दिया? सबसे पहले दारुल उलम देवबंद ने दिया। अलहज़र ने दिया। तो ये कंजर्वेटिव हिंदू हिंदुत्व के खिलाफ क्यों आवाज नहीं उठा रहे? हिंदू पॉइंट ऑफ व्यू से हिंदुत्व के खिलाफ क्यों? की बात करें पुलवामा और ये सब हुआ तब भी मुसलमानों ने सड़कों पर आकर बाकायदा तौर पर इसको कंडेम किया और कहा कि यह किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। लेकिन वही सवाल जो आप कह रहे हैं कि क्या जब हम ये देखते हैं कि कोई भी त्यौहार हो उसमें कम उम्र की लड़कियां अब तो लड़कियां शामिल होकर वो जिस तरह के एक्शंस और जिन गानों पर वो डांस कर रही हैं जो छोटे-छोटे बच्चे हैं माइनर्स हैं जो 8 10 साल के हैं जिनकी उम्र जो इन जुलूस का हिस्सा बनते हैं मेरे समझ में यह नहीं आता है कि उन लोगों को लेकर या ये जो एक तरह का एक रेडिकलाइजेशन जो हिंदुओं का हो रहा है हिंदुत्व के नाम पर अपनी आइडेंटिटी को असर्ट करने के नाम पर क्या हमें बहुत दबाया गया? इसको लेकर सवाल क्यों नहीं उठाया जा रहा है? और इसी से जुड़ा एक और मैं इसमें जोड़ दूं कि बहुत रीसेंट एग्जांपल है टीसीएस का। जब हम टीसीएस की बात करते हैं तो ये जितने भी अल्टरनेटिव मीडिया के जो लोग हैं जो मैं बार-बार इस शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहती। बट अपर कास्ट जो हिंदू हैं और ऑफकोर्स जो यह पोट्रे करते हैं दे आर सेकुलर एंड यू नो दे आर अगेंस्ट दिस द सिस्टम पावर सिस्टम उन्होंने टीसीएस पे जिस तरह की लाइन ली उन्हें एक एक मिनट में लगा कि यस इट इज़ बिलीवबल हां मुसलमान ऐसा कर सकते हैं। मुझे लगता है कि सॉरी थोड़ा सा इंटरप्ट करूंगा। मुझे लगता है कि कहीं भी कोई भी थ्योरी आती है। आई थिंक दीज़ आर द पीपल हु टाइम एंड अगेन उसको बिलीव करते हैं शुरू में। चाहे वो लव जिहाद की थ्योरी थी। लव जिहाद की थ्योरी कहां से आई? केरला से आई। किसने उठाई? लव जिहाद की थ्योरी अगर उसकी पॉलिटिकल पार्टी का बैकग्राउंड देखिए। जिन लोगों ने शुरू में इसको एक थ्योरी बनाया। तो यू विल कम टू रियलाइज़ दैट दिस वाज़ आल्सो समथिंग व्हिच वाज़ एक्सेप्टेड बाय आवर लिबरल सोसाइटी एट अ पॉइंट ऑफ़ टाइम। और आज जो टीसीएस की बात है, ठीक है। अब टीसीएस पे बहुत सारी बातें हो रही हैं। बहुत सारे डिबेट्स हो रहे हैं। लेकिन शुरू-शुर में जो लोग कह रहे थे कि नहीं ऐसा भी हो सकता है, ऐसा भी हो सकता है। आई थिंक यू नो वन हैज़ टू हैव दैट कॉमन सेंस कि ऐसा कैसे हो सकता है? यू नो विद इन एन ऑर्गेनाइजेशन आपके साथ और मतलब कैसे आपको ये बिलीवेबल भी लग सकता है कि एक ऐसे दौर में है जहां मुसलमान हर तरीके से क्वेश्चन किया जा रहा है। सताया जा रहा है। जुल्म उसके ऊपर किया जा रहा है। उसकी आइडेंटिटी को लेकर उसके पूरे वजूद पर सर से लेकर पांव तक उसके हर चीज उससे जुड़ी हुई है। वो क्वेश्चनेबल बना दी गई है। और वो किसी भी चीज को लेकर टारगेट किया जा सकता है। जेल भेजा जा सकता है। आप एजुकेटेड है। आप जेएनयू में पढ़ते हैं। आप डॉक्टर इंजीनियर हैं। वो एक नेक्सेस चला रहे हैं। वो भी टीसीएस में मतलब कैसे इनिशियली हाउ डू दे थिंक दैट इट इज़ सो बिलीवबल मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि आप मुसलमानों की हिमायत करें डिफेंड करें अपना काम ढंग से कर लीजिए प्रूफ ढूंढिए एज अ जर्नलिस्ट क्या काम है आप तो सबूत ढूंढेंगे ना भाई जो शख्स कॉल सेंटर में काम करती हैं जो कोई पावर के पोजीशन में ही नहीं है वो कैसे किसी पे इस इस किस्म का दबाव डाल सकती है कि भाई आप कन्वर्ट हो जाओ आप कॉमन सेंस यूज़ कीजिए ना आज तक एक कॉल सेंटर वाला ऑफिस में किसी के ऊपर उसका ज़ोर नहीं होगा। तो सवाल पूछिए नॉर्मल वाले डॉक्यूमेंट चज़ कीजिए कि अगर वाकई में ऐसा हुआ है तो इंटरनल कंप्लेंट कहां थी उस ऑर्गेनाइजेशन में? इंटरनल कंप्लेंट के पूरे जो पेपर वर्क है वो कहां था? मेल ट्रेल कहां है उसका? और किसकी शिकायत पर किया गया ये सब कुछ? बीजेपी के एक एक कार्यकर्ता की शिकायत पर। बेसिक सवाल अपना काम कीजिए। हम यह भी नहीं कह रहे। अगर वाकई में अगर आपके इन्वेस्टिगेशन के बाद आपको ऐसे तथ्य मिलते हैं कि सच में कन्वर्जन रैकेट चल रहा है तो आप बेशक एक्सपोज कीजिए। सीना ठोक के एक्सपोज कीजिए। हम सब हम सब आपको सपोर्ट करेंगे। पर आप जस्ट डू यू वर्क। अब्सोलुटली डू योर जॉब। डोंट यू आर नॉट डूइंग एनी फेवर्स टू एनीवन। जस्ट डू योर जॉब। आप कैसे देख रहे हैं अली इसको कि जब बात इस तरह की आती है कि जब हम अच्छा लोगों को यह भी लग सकता है जब मैं बात कर रही हूं कि मे बी यू नो वी आर क्रिटिसाइजिंग टू मच लेकिन लेकिन शायद आप क्रिटिसाइज उनसे उनको करते हैं जिनसे आप एक्सपेक्ट कर रहे हैं। एक तरफ वो मेन स्ट्रीम मीडिया है जिससे कोई एक्सपेक्टेशंस नहीं है। जहां हमें पता है कि कोई भी किसी भी तरह का क्रिटिसिज्म वहां पर कोई मायने ही नहीं रखेगा। तो आप क्रिटिसाइज उनको करते हैं जहां आपको लगता है कि कुछ एक्सपेक्टेशंस हैं। वो लोग हैं जो शायद आवाज उठा रहे हैं। वो भी एक मुश्किल दौर है पूरा उसमें एटलीस्ट यू नो दे आर डूइंग सम वर्क वो भी अपने आप को असर्ट कर रहे हैं। तो इसीलिए हम ये क्वेश्चन कर रहे हैं। लेकिन क्यों यह सारी चीजें जब होती हैं क्यों एकदम से यह बिलीवेबल बना दिया जाता है इस तरह के इंसिडेंसेस को क्या लगता है कि जो प्रीकंसीव्ड नोशंस हैं या जो बीजेपी आरएसएस का एजेंडा इतने सालों का जो रहा उसने कहीं ना कहीं बैक ऑफ योर माइंड एक इमेज तो एक बना दी है मुसलमानों की। तो जब भी कुछ होता है तो उनको लगता है हां हो सकता है। असल में अगर आप देखें एकेडमिया में अभी ये काफी रिसर्च आ चुकी है कि सेकुलरिज्म और सेकुलराइजेशन में फर्क है। तो सेकुलरिज्म के नाम पे जो लिबरल्स ने लेफ्टिस्ट ने एक नो गॉड या गॉडलेस वर्ल्ड को इमेजिन किया। जिसमें उन्होंने सारे जितने ट्रेडिशंस हैं, उनके जितने एक्सप्रेशंस हैं उनको सबको एक पैमाने पे रख के कंप्लीटली इरेज़ कर दिया। स्पिरिचुअलिटी के एग्ज़िस्टेंस को डिनाई कर दिया। और 100 साल तक जब भी कोई कल्चरल आइडेंटिटी उस एक्सप्रेशन के थ्रू अपनी लिबरेशन, रेवोल्यूशन, रेजिस्टेंस और इमसिपेशन की बात करे तो उसे तकियानूसी सोच उसे पिछड़ी हुई वो ये सारी चीजें ये जो वोकैबलरी है जो आज बीजेपी इस्लाम के खिलाफ वेपनाइज कर रहा है वो भी सेकुलर वोकैबलरी है। या जो इवन हिंदूइज़्म के खिलाफ अह फ़ॉर एग्ज़ांपल कभी किसी दौर में आगे कोई इस्तेमाल करेगा अब इस्तेमाल कर रहा है वह भी सेकुलर अह यू नो पर्सपेक्टिव से दी जाने वाली वोकैबलरी है। तो एक तो ये है कि दुनिया में जो राइज ऑफ राइट विंग्स है वो इस वजह से हुआ क्योंकि दुनिया जो है लार्जली वो इंसान एक स्पिरिचुअल बीइंग है। उसको आज की डेट में अह आप साइकोलॉजी में आप साइंसेस में आप कॉन्शियसनेस के स्पिरिचुअल एंगल को डिनाई नहीं कर सकते। और यह आज की फाइंडिंग्स में है। आपने एक 100 150 200 साल दुनिया में सेकुलराइजेशन ऑफ नॉलेज के नाम पे आपने पूरी दुनिया को कॉलोनाइज किया और प्रेस किया। एक जमाने के बाद जब फ्रीडम मूवमेंट्स हुए उन्होंने आपने बोला कि भाई ब्रिटिश कॉलोनाइजर है और उसी सेकुलर लिबरल फ्रेमवर्क के विदिन उन्होंने बोला कि ऑपरेशन तो मत करो लेकिन लोग खुद इस चीज को बिलीव करें और उसके लिए आपने एक्सप्लसिट ऑपरेशन की जगह आपने ऐसे इदारे बनाए, वर्ल्ड बैंक्स बनाए, आईएमएफ बनाए। आपने यह बोला कि भ आप ये एक्शन करोगे तो आपको फंड मिलेगा। आपको अगर मीडिया हाउस चलाना है तो आप इकोलॉजी पे बात करो। आप लिबरल उस पे बात करो। आप एलजीबीटी है अगर तो उसको बस एक ही पर्सपेक्टिव से देखें। उनकी फाउंडेशनल डिस्कशंस ही ना हो। कोई डिस्कशन ना हो। जेंडरर्ड नॉर्म्स पे एक ही तरीके से देखा जाए। तो उस सब में एक दुनिया में जो बड़ी पपुलेशन है उसको कॉलोनियल वोकैबलरी मिली। उसी वोकैबलरी को बीजेपी जो ब्रिटिश ने किया जो 91 में डिबेट्स हुए जो बाकी सारी चीजें हैं ये सेकुलर लिबरल वर्ल्ड ऑर्डर की क्रिएट की हुई वोकैबलरी है जो पॉलिटिकल इस्लाम क्रिश्चियनिटी या जिस तरह के भी मूवमेंट्स हैं उसमें ऑफ कोर्स उन्होंने इस्लाम को सबसे ज्यादा अपने उसमें रखा उसकी भी वजह है कि आप दुनिया के सेंटर में ऑयल आज तो आपको सबको ईरान और इसकी वजह से पता चल रहा है। लेकिन आज से 20 साल पहले लोग उस तरह नहीं लेते थे। तो अब सवाल ये है कि जो आपने फ्रेमवर्क्स डेवलप किए कि ह्यूमन राइट्स होने चाहिए तो मेरा राइट क्यों नहीं है? और प्लूरलिज्म होना चाहिए आईडियोलॉजीस में तो मैं मुसलमान और टोपी पहन के जब मौलाना आजाद गांधी और नेहरू के साथ खड़े हो सकते थे तो राहुल गांधी के साथ क्यों नहीं खड़े हो सकते? क्यों राहुल गांधी यह बात बोलते हैं कि भाई हम जिसकी जितनी आबादी उतना उसकी रिप्रेजेंट तो वो क्यों वोट डिस्ट्रीब्यूशन में नहीं दिखता और अगर आसाम में मुस्लिम एमएलए ज्यादा आ रहे हैं तो मुस्लिम डोमिनेटेड सीट्स में जहां कोई और जीत नहीं सकता था वहीं से क्यों कांग्रेस का रिप्रेजेंटेशन दिख रहा है कहीं और से क्यों नहीं दिख रहा? तो एक लेवल पर तो हमने बात की कि मुस्लिम खुद की जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं उनकी अपनी इंटरनल हेजमिनीस की वजह से क्योंकि वो चाहते हैं कि भ उनके हाथ में कंट्रोल रहे पावर का और उनका नेक्सस है इनके साथ इनको कंट्रोल करते हैं कि अगर अब आपको पावर चाहिए इंस्टीट्यूशनल लेवल पे तो हम हैं जो आपके लिए डील करेंगे और उस डील में आपको कंप्लीटली मुस्लिम्स को डिसएंगेज्ड रखना पड़ेगा। उसकी कंस्ट्रक्टिव डिबेट से डिसएंगेज रखना पड़ेगा। यू सेइंग कि जो मुसलमानों की एक आम मुसलमान की जो डायरेक्ट एजेंसी नहीं है। उसका एक एक आप कहें कि एक मीडिएटर है। नहीं ज़ीरो है। आप यह बताइए कि अगर किसी मुसलमान को 25 करोड़ की या 20 करोड़ की आबादी है। इतने बच्चे हायर एजुकेशन से निकल रहे हैं। अगर उसको अपनी आज बात आकर कहनी हो ये लेफ्टिस्ट हो, लिबरल हो, हिंदुत्ववादी हो, इनके पास 100, 100 डेढ़-150 प्लेटफॉर्म्स हैं। अगर आप आज नाउ सबको भी एंगेज करने लगे तो कितने पॉडकास्ट कर लेगा? कितने इंगेजमेंट्स कर लेगा? जब तक आप अपनी वोकैबलरी, अपनी वॉइस का इंस्टीट्यूशनलाइजेशन और आपको बंदा चाहिए कैडर। आपको सोचने वाला मुसलमान नहीं चाहिए। मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशनंस की बात है। जिनके पास पैसे ठीक-ठाक हैं और वो एंगेज नहीं कर। तो यह लेयर्ड ऑपरेशन है। एक ऑपरेशन है जो अनचाहा है। वो ऐसा नहीं मैं कहूंगा कि वो जानबूझ के हो रहा है। लेकिन तंजीमियत का या ऑर्गेनाइजेशनल डिमांड का एक बहुत यह होता है कि सब कुछ मेरे ताबे हो जाए। तो जो मुस्लिम पॉलिटिकल एक्सप्रेशन है ना वो सिर्फ बीजेपी का प्रोडक्ट नहीं है। वो सिर्फ कांग्रेस का भी प्रोडक्ट नहीं है। वो एक लेयर्ड हायरार्की है जो हमारी अपनी शनाख्त से शुरू होते हुए वो मल्टीप्लाई होती रहती है। वो हमें इसलिए इस्तेमाल कर पाते हैं क्योंकि हम इस्तेमाल होना चाहते हैं क्योंकि हम अपनी लेकिन अभी आप देख रहे हैं कि मुसलमान ये सवाल तो उठा रहे हैं। मुसलमान कह रहे हैं कि हम सिर्फ दरी बिछाने के लिए नहीं हैं। हमें आप हमारा रिप्रेजेंटेशन दीजिए और वो सबक हां नहीं नहीं लेकिन वो सबक सिखाने के भी मूड में है और गलत तरीके से भी सिखा रहे हैं जैसे आप पश्चिम बंगाल में देख लें कि जिनको उन्होंने चुना मिसिंग ह नेम बाबरी मस्जिद की हुमायूं कबीर अगर दो सीटों से अगर वो जीत जाए या एआईएमएम जिसका कोई किसी तरह का कोई स्टेक नहीं है वहां पर अगर वो कई हजार वोट वहां से लेकर आ जाए तो यह सवाल तो यह उठ रहा है कि जो एक चर्निंग चल रही है या जो रिप्रेजेंटेशन की बात हो रही है या वह लोग जो यह सवाल उठा रहे हैं कि भई हम दरी बिछाने के लिए नहीं है। हम क्यों ए और बी में ही बंद कर रह जाएं। वी वांट टू सी सी डी ई एफ ऑप्शंस मतलब वी वांट हैव एंडलेस ऑप्शन एंड वी वांट टू वी वांट टू सी कि हम किसको चुनना चाहते हैं? कौन हमारे बारे में बात कर रहा है? तो आपको लग रहा है कि कि क्या सही डिसीजन इस तरह से भी सबक सिखाने की भी क्या मुसलमान ले पा रहे हैं या वहां पर भी जिस तरह से जो अली कह रहे हैं कि उनकी डायरेक्ट एजेंसी वहां पर भी नहीं है। दे आल्सो हैव मीडिएटर्स देयर। मेरे ख्याल एक बहुत ज्यादा तवज्जो चाहे इंडिविजुअल मुस्लिम्स का हो या मोर दैन इंडिविजुअल मुस्लिम जो मीडिएटर्स का हो। बहुत ज्यादा तवज्जो उनका इलेक्शन पर होता है। कि साहब इलेक्शन में किसको वोट दें? इलेक्शन 5 साल में एक बार आता है। पर दिक्कत यह है कि उनके इख्तियार में यह एक इकलौती चीज है। जो एक्चुअली सबसे सिंपल चीज है। इलेक्शन में किसे वोट देना है वो ऑलमोस्ट हर मुस्लिम को पता है। किसे वोट देना है, किसे नहीं देना है। तो ये कोई बहुत कॉम्प्लिकेटेड सवाल नहीं है। लेकिन इख्तियार में वही चीज है। मसला यह है कि इस पर कोई फोकस नहीं है कि भ जो बाकी 5 साल में हमारे हुकूक हमसे छीने जा रहे हैं। जो बाकायदा हमले हो रहे हैं जो एक-ए एक एक तरफ़ा ऑपरेशन चल रहा है उससे कैसे निपटा जाए उससे कम्युनिटी उससे निपटने के लिए कम्युनिटी को कैसे तैयार किया जाए लार्ज स्केल में वकील कैसे तैयार किए जाए जो लोगों के हुकूक छीनने से रोक सके इदारे कैसे बनाए जाए इंस्टीिट्यूशन कैसे बनाए जाए इस पर बात नहीं हो रही है | बिकॉज़ ये मिडिल मैन को ये बात सूट करता है कि भाई हम आपको यहां पे इतने वोट दिलवा देंगे तो सारा तवज्जो वोट पे ही चल रहा है उसके आगे बात जा ही नहीं रही। ना पार्टी उस बारे में बात करना चाह रही है ना ऑर्गेनाइजेशन बात करना चाह रही है और ना इंडिविजुअल बात करना चाह रही है। तो आपको लग रहा है कि आम मुसलमान इससे कोई सबक ले रहे हैं। 12 साल में जो उनके साथ हुआ क्योंकि 12 साल में जो हो रहा है वो बहुत विज़िबल है क्योंकि जो आप मेन स्ट्रीम मीडिया जो एक तरह से कंप्लीटली जो चेंज हुआ है। ऐसा नहीं कि पहले भी पहले नहीं किया करता था। आई हैव सीन कि जो पावर थी उसके करीब हुआ करते थे। लेकिन उसमें ऐसा नहीं था कि आप पावर से सवाल ही नहीं पूछ सकते थे। ऐसा नहीं था क्योंकि कांग्रेस की यूपीए वन यूपीए टू की गवर्नमेंट में भी आई वाज़ आल्सो पावर ऑफ़ मिनिस्ट्री मीडिया। तो वहां क्रिटिकल सवाल पूछे गए हैं और तभी अन्ना मूवमेंट वगैरह ये तमाम चीजें हुई। अगर यह होता तो बीजेपी जैसी अगर पावर होता तो शायद यह सब भी नहीं होता। मैं 15 साल आपको माज़ी में ले जाना चाहूंगा। 2011 था। यही इलेक्शन साइकिल था। वेस्ट बंगाल, आसाम, केरल। वेस्ट बंगाल में हाईएस्ट एवर मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन हुआ था। क्योंकि लेफ्ट हमेशा मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन लो रखती थी। तृणमूल कांग्रेस मुसलमानों का सपोर्ट चाहती थी। उन्होंने बहुत टिकटें दी मुसलमानों को और रिकॉर्ड नंबर पर मुस्लिम जीत कर आए। असम में एआईयूडीएफ बदरुद्दीन अजमल की मेन अपोजिशन के तौर पर नजर आई। केरल में मुस्लिम लीग एक बहुत अगेन उनकी हाईएस्ट बेस्ट एवर परफॉर्मेंस उनकी हुई। यह हुई पॉलिटिक्स की बात इलेक्टोरल पॉलिटिक्स की। नॉन इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में सच रिपोर्ट को कुछ साल ही हुए थे। कम्युनिटी के अंदर एक पूरी डिबेट चल रही थी कि रिप्रेजेंटेशन में डेवलपमेंट में हर मायनों में सेुलर पॉलिटिक्स ने हमें पीछे रखा है। तो एक वहां एक एक शुरुआत हुई थी। एक वो दौर है तब किस किस्म की हम कम्युनिटी में चर्निंग और डिबेट चल रही थी। एक नैरेटिव बन रहा था। एक एनर्जी थी और आज 15 साल बाद बेसिक हुकूक के लिए हमें तरसाया जा रहा है। यानी हम बेसिक हुकूक कि भाई अगर एसआईआर में नाम चला गया तो आपको बेनिफिट्स नहीं मिलेंगे। आप फिर सिटीजन ही नहीं रहेंगे। आज हम सिटीजनशिप बचाने की कगार पर आ गए हैं। तो इस किस्म का पतन हुआ है नैरेटिव का। इसके लिए जिम्मेदार आप किसको मानते हैं? आप भी इसमें आप अपनी बात रखिएगा। किसको जिम्मेदार मानते हैं? क्या उन पॉलिटिकल पार्टीज को जो मुसलमानों का रिप्रेजेंटेशन कर रही थी? उन मुसलमानों को जो उनके पीछे जा रहे थे या अ जो एजेंसीज थी जो इंस्टीटशंस थे जो मुसलमानों के नाम पर बनाए गए किसको आप जिम्मेदार इसमें मान रहे हैं मेरी राय में इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वो पार्टियां वो इन्फ्लुएंसर्स और वो इंस्टीटशंस हैं जिन्होंने हिंदू कम्युनिटी के अंदर इस कदर का रेडिकलाइजेशन होने दिया। जिन पार्टियों ने एक काउंटर नैरेटिव नहीं दिया हिंदू कम्युनिटी को जिन जिन इन्फ्लुएंसर्स ने कम्युनिटी को एक अच्छी राह नहीं दिखाई और जो इंस्टीटशंस देखते रहे और ये होने दिया मैं सबसे पहली जिम्मेदारी तो इनकी मैं यहां पे मानूंगा क्योंकि अब मैं देख रही थी कि जो इस पर अब आप अपनी बात रखिएगा इस सवाल पर लेकिन पश्चिम बंगाल का अगर हम देखें तो रिजल्ट जब से आए हैं उसके बाद से ही यह देखा जा रहा है ऑफ कोर्स एसआईआर तो एक बड़ा बड़ा हिस्सा है ही जो इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन क्या सिर्फ एसआईआर ही इसके लिए जिम्मेदार है या फिर जिस तरह की ममता बनर्जी की पॉलिटिक्स रही इवन अराउंड मुस्लिम्स क्या वो भी इसके लिए जिम्मेदार है? तो मेरे ही एक एक प्रोग्राम में एक कमेंट एक आया जो मुझे अच्छा लगा जो पश्चिम बंगाल से ही थे एक मुसलमान थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने बड़ा लंबा चौड़ा एक कमेंट किया और उन्होंने उसमें लिखा कि ममता बनर्जी ने क्या किया? ममता बनर्जी ने मुसलमानों को ऑफ कोर्स डरा के रखा कि अगर बीजेपी आएगी तो आपके साथ यह हो जाएगा। जहां मुसलमान गलत भी थे वहां उनको उस तरह से उनके ऊपर कारवाई नहीं की गई जो करनी चाहिए थी जो आपको दिखाना अगर गलत है तो गलत है। आपको कार्यवाही करनी चाहिए थी। उससे मुसलमान उनसे हिंदुओं में एक तरह से एक डिवाइड पैदा होना शुरू हो गया। मुसलमानों को अलग किया और हिंदुओं को अलग किया। तो वो एक क्लियर डिवाइड जो है वो बनाती गई। जहां सोसाइटी कम्युनिटीज मिलकर रहती त्यौहार और हर चीज को मिलकर बनाती थी। उसमें कहीं ना कहीं कि डर की वजह से डर पैदा करने के लिए वो उनको सेपरेट किया गया। उनको अलग किया गया। जिसकी वजह से आरएसएस और बीजेपी को अपने पैर को मजबूत करने के लिए वो पूरी जमीन उनको मिली। और सबसे ज्यादा मजबूत कब हुई है बीजेपी और आरएसएस पश्चिम बंगाल में जब ममता बनर्जी की सरकार रही है और जितना लेफ्ट का जितना भी कार्डर था जितना उनका वोट बैंक था वो शिफ्ट हुआ राइट में तो मतलब इतना बड़ा आईडियोलॉजिकल शिफ्ट तो ये और जो मैं जिम्मेदार कर रही थी इसको आप क्या आपको लगता है ये चीजें भी बहुत जिम्मेदार है जो फिलहाल जिस तरह की हम सिचुएशंस परिस्थितियां जो हम देख रहे हैं मुझे लगता है कि ये जो अपीजमेंट की जहां तक बात होती है कि ममता अपीजमेंट कर रही है या कोई और अपीजमेंट कर रहा मुझे लगता है कहीं ना कहीं इसमें एक हमें यह एलिमेंट देखना जरूरी है। एंड वी शुड आल्सो टॉक अबाउट दिस। इट्स टाइम टू टॉक अबाउट दिस कि आपका टोपी पहनना हमारे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। आपका चादर ओढ़ देना हमारे लिए इंपॉर्टेंट नहीं है। आप वो करें। आप क्यों करेंगे वो? व्हाई शुड यू डू इट? व्हाई शुड यू गो एंड वअर अ स्कल कैप। ठीक है ना? वो आपकी जिम्म आपका काम है कि आप हमें इक्वल नागरिक की तरह ट्रीट करें। आप हमें जो वेलफेयर इंडिकेटर्स हैं उस पे इंश्योर करें कि हम ऊपर आए। आप हमारे इकोनमिक इंडिकेटर्स को इंश्योर करें कि हम ऊपर आ तो ये कहीं ना कहीं जो अपीज़मेंट की पॉलिटिक्स जो बीजेपी खेल पाती है और कम्युनल फर्सेस खेल पाते हैं उस तरह की पॉलिटिक्स को काउंटर करने के लिए मुझे लगता है कि ये बहुत इंपॉर्टेंट है सेकुलर पार्टी को समझना कि मुसलमानों को स्ट्रेंथन करना पड़ेगा। उनके इकोनॉमिक उनके इकोनमिक हालात को बेहतर बनाने पड़ेंगे। उनके सामाजिक हालात को बेहतर बनाने पड़ेंगे। और अगर यह सब बेहतर होना शुरू हो गए तो बीजेपी कहीं ना कहीं अपने आप वीक वीक होना शुरू हो जाएगी। क्या आपको लगता है चाहती नहीं है पार्टी? बिल्कुल ऐसा चाहती नहीं है बिकॉज़ दे आल्सो वांट कि बीजेपी का फियर जो है वो कहीं ना कहीं बीजेपी का फियर मुसलमानों के अंदर बना रहे और उस फियर में वो आप आपको इन मास वोट करते रहे। अब पता नहीं शायद पॉलिटिक्स पूरी तरह से चरमरा गई है। उस तरह की पॉलिटिक्स अब नई तरह की पॉलिटिक्स जो इमर्ज होगी वो कैसी होगी। कि सेकुलर पार्टीज कैसे रीनेगोशिएट करते हैं। मुसलमान हो सकते हैं आपको वो देखने की देखने का देखने की जरूरत होगी। हालांकि अभी बहुत कुछ बदलाव नहीं दिख रहा है। लेकिन आने वाले टाइम में वो इंटरेस्टिंग होगा कि कैसे सेकुलर पार्टीज अपने आप को प्लेस करती है मुसलमानों के साथ। दूसरा जो एक बहुत इंपॉर्टेंट चीज ये है कि मुसलमानों के किसी तरह के मोबिलाइजेशन को आप एक्सट्रीमिस्ट मोबिलाइजेशन ना कहें। जो आपने बात कही कि असदुद्दीन ओवैसी ने मैं हुमायूं कबीर की बात तो नहीं कर रहा हूं। हुमायूं और कबीर का तो खैर एक्सपोज भी हो गए हैं वो कि पैसे ले रहे थे, ये कर रहे थे, वो कर रहे थे। लेकिन जहां तक असदुद्दीन ओवैसी की पॉलिटिक्स लड़ने की इलेक्शन लड़ने की बात है, मैं उसको कहीं से भी गलत नहीं मानता हूं। मुझे लगता है कि आप कभी भी अपना स्पेस क्रिएट करेंगे पावर में तो आप किसी ना किसी का शेयर तो खाएंगे और आप कभी किसी ना किसी का शेयर खाएंगे तो आपको गालियां तो पड़ेगी। लेकिन आपको नहीं लगता कि हिकमते अमली भी एक चीज होती है कि अभी आप जिस तरह की चीजें देख रहे हैं नहीं माना कि नहीं मैं एक एक बात यहां पर रखूं आपकी कि एआईएमएम जो क्रिएट हुई वो हैदराबाद बेस्ड पार्टी वहां पर वो कितनी सीट पर लड़ते हैं मैं ये नहीं कह रही कि असदुद्दीन ओवैसी को या उनकी पार्टी को लड़ने का हक नहीं है ऑफ कोर्स उनको है उन्होंने एक अपनी पार्टी बनाई है वो जहां चाहे जिस जगह से चाहे वो लड़े लेकिन वो उत्तर प्रदेश में जब जाते हैं तो वह कितनी सीटों पर लड़ते हैं? क्या वाकई में उन्हें एक हुमायूं कबीर से उन्हें अलायंस करना चाहिए था? जी हां मैं उस पे आ रहा हूं। देखिए हम लगातार यही बात कर रहे हैं कि हम अपना अपना अपना मोबिलाइजेशन हम करें। चाहे वो मीडिया स्पेसेस में हो, चाहे पॉलिटिकल स्पसेस में हो, चाहे सिविल सोसाइटी के स्पेस में हो। तो जब आप अपना मोबिलाइजेशन करेंगे तो आपको इलेक्शंस लड़ने की जरूरत पड़ेगी। आपको कहीं ना कहीं अब मेरा सवाल यह है कि बिहार में असदुद्दीन ओवैसी ने पांच सीट जीते हैं। पांच या छह सी पांच सीट जीते। छह सीट भी जीत जाते। एक कैंडिडेट उनका बहुत कम वोटों से हारा। 300 कुछ वोटों से हारा। तो अगर पांच सीट जीते तो क्या प्रॉब्लम थी सेुलर अलायंस को असदुद्दीन ओवैसी के साथ इंगेज करने में? जब वो इलेक्शन से पहले बार-बार लेटर्स लिख रहे थे कि हमसे इंगेज करो। हमसे इंगेज करो। बाद में तो फिर रोना कोई इलाज नहीं है ना। आई डोंट थिंक दैट्स अ सशन कि बाद में आप क्लेम करें कि अरे ये इलेक्शन क्यों लड़ लिए? इन्होंने वोट खा लिया वो कर दिया। आपको एक्सेप्ट करना पड़ेगा मुस्लिम पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन को। आप मुस्लिम पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन को आपने सिर्फ एक एक्सट्रीमिज्म के नजरिए से देखने का पैमाना बना लिया है कि आप उस अगर कोई भी पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन होगा चाहे वो पीस पार्टी हो चाहे वो असदुद्दीन ओवैसी हो चाहे वो एसडीपीआई हो चाहे वो कोई और पॉलिटिकल फ्रंट हो आप उसको आईएसएफ हो आप उसको एक्सट्रीमिस्ट करार दोगे और उसका एक रीज़न ये भी है कि हमारा जो इंडिपेंडेंस की हिस्ट्री है और वो इंडिपेंडेंस की हिस्ट्री का जो हैंगओवर है जिसको जो हिस्ट्री हम जैसे अली साहब ने बताया पहले कि उसके लिए सिर्फ मुसलमान जिम्मेदार नहीं थे उस पार्टीशन के लिए उस पार्टीशन के बहुत सारे अलग-अलग पैमाने थे। मुसलमान उसका एक हिस्सा थे। लेकिन उस उससे पहले बहुत कुछ हुआ। उससे पहले हिंदुत्ववादी फोर्सेस ने सबसे पहले इस आईडिया को रखा कि टू नेशंस थ्योरी जो है तो आई थिंक उसके अलग-अलग तो ये जब तक हैंगओवर नहीं हट जाएगा कि मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन सेक्टेरियन होगा। मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन जो है वह सेपरेटिज्म की तरफ जा सकता है। इस हैंगओवर को हटाने की जरूरत है। मुसलमानों का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन उसी तरह होगा जैसे दलित का पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन उत्तर प्रदेश में होके दलित ने सरकार बनाई। दलित भी तो मेजॉरिटी में नहीं है। लेकिन उन्होंने सरकार मायावती चीफ मिनिस्टर रहीं। तो क्यों रही? क्योंकि वो पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन हुआ। उन्होंने दूसरों से नेगोशिएट किया। दूसरों के टाउन्स पे साथ में इलेक्शन लड़ा। लोगों के अपनी कांस्टेंसी बनाई। लेकिन आपको नहीं लगता कि जब मुस्लिम किसी पार्टी की बात आती है तो एंड इट्स इट्स अ इट्स एन ओपन डिस्कशन वी ऑल कैन पार्टिसिपेट। अह जब हम मुस्लिम रिप पार्टीज की जब हम बात करते हैं तो क्या वाकई में वो अपने साथ दलितों को ओबीसीज को मार्जिन कम्युनिटीज़ को क्या अपने साथ उस तरह से जोड़कर अपने साथ लेकर चल चल पाते हैं क्योंकि मायावती सिर्फ अकेले अकेले दलितों के दम पर तो नहीं बनी। जाहिर सी बात है उन्हें मुसलमानों का बड़े पैमाने पर वोट मिला। उन्हें ओबीसीज का भी उनको वोट मिला। असदुद्दीन ओवैसी और एएमआईएम की पॉलिटिक्स से मुझे मेन इख्तलाफ यह है। वो ये नहीं कि वो इलेक्शन लड़ रहे हैं यहां। उससे कोई प्रॉब्लम मैंने कई बार पब्लिकली भी डिफेंड किया इस चीज को कि उनका भी पूरा तवज्जो इलेक्शंस पर ही है। बीएसपी को वो अपना एक आदर्श मानते हैं। कांशीराम की तारीफ करते हैं। वह यह नहीं इस बार वो देखते कि कांशीराम ने सियासत में आने से पहले इतने साल कम्युनिटी में काम किया। कई दशकों तक कम्युनिटी में काम किया। कम हर हर जिले में हर हर ब्लॉक में उन्होंने अपने कम्युनिटी ऑर्गेनाइजेशनंस बनाए जो कास्ट अट्रॉसिटीज के खिलाफ आवाज उठाते थे और पॉलिटिकल एंपावरमेंट की सोशल एंपावरमेंट की बात करते थे। एंड एज ए कलमिनेशन ऑफ़ दैट दे केम इनू पॉलिटिक्स। इनका मसला ये है कि ये पॉलिटिक्स के जरिए ही सारे चेंजेस करना चाह रहे हैं। आज नहीं तो कल अब दिक्कत होगी एमआईएम को कि जब मुंसिपालिटी भी आपके खिलाफ यूज़ हो रही है अह यह बुलडोजर के जरिए या फिर स्टेट गवर्नमेंट्स आपके हुकूक खा रही है पावर में आते ही तो आज नहीं तो कल एक प्रैक्टिकल डिसीजन मुस्लिम लेने लग जाएंगे कि एमआईएम पर तभी वोट देंगे जब बिहार जैसा हो कि आपको भी जेडीयू और आरजेडी में कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं नजर आ रहा है एक इलेक्शन में तो चलो कुछ सीटों में एमआईएम के साथ एक्सपेरिमेंट कर दें या फिर महाराष्ट्र जैसा सिचुएशन हो जहां पे भाई एक शिवसेना एक एनसीपी इस तरफ भी है। एक शिवसेना एक एनसीपी उस तरफ भी है। हां, लेकिन सवाल यह भी आदित्य फिर उसके साथ कि माना कि पांच एमएलए बिहार से जीत कर आते हैं एआईएमएम के जो आप मोबिलाइजेशन की आप बात कर रहे हैं। मेरा सवाल यह है कि क्या मोबिलाइजेशन किन शर्तों पर हो रहा है? किस तरह से हो रहा है? क्या वो सही हो रहा है? क्या उससे मुसलमानों को उस मोबिलाइजेशन से कुछ हासिल हो रहा है? और इसके साथ-साथ कि वो पांच जो एमएलए चुनकर आए हैं या 28 20 एमएलए उत्तर प्रदेश से मुसलमान चुनकर आते हैं या फिर आसाम से चुनकर अभी आए हैं सबसे ज्यादा कांग्रेस से वो आखिर कर कर क्या रहे हैं? वो क्या करेंगे? क्या मैं क्योंकि मैं एक एग्जांपल आपको देना चाहती हूं। दिल्ली में बुलडोजर चल रहा था और मैंने कई बार इस बात को कहा है। आप लेफ्ट की पॉलिटिक्स को बहुत क्रिटिसाइज कर सकते हैं। बहुत बात कह सकते हैं। लेकिन 70 साल की एक वृंदा खरा जो है वो बुलडोजर के सामने खड़ी हुई। भी वो तस्वीर इंटरनेशनलली लोगों ने देखी। क्या उसकी जगह असदुद्दीन ओवैसी नहीं हो सकते थे? क्या उसकी जगह कोई और मुस्लिम लीडर नहीं हो सकता था? एक आप एक सिंबॉलिक आप कहते हैं कि मैं इस पोजीशन में नहीं हूं कि मैं यह कर सकूं बट मैं इस पोजीशन में हूं कि मैं लड़ता हुआ तो नजर आ रहा हूं। एटलीस्ट यू आई एम रेजिंग योर वॉइस एंड आई एम टेकिंग ऑल काइंड ऑफ़ अ रिस्क। सो व्हाई व्हाई डोंट वी सी देम लाइक दैट? आप गोदी मीडिया के उन चैनल्स पर उन एंकर्स के साथ आप डिबेट करते हुए नजर आते हैं। अच्छी बात है। वी आल्सो नीड सच काइंड ऑफ़ रिप्रेजेंटेशन। आप और मैं सिर्फ एक पर्टिकुलर असदुद्दीन ओवैसी की बात नहीं कर रही हूं। मैं और लोगों की भी बात कर रही हूं। या आपकी हम बात करते हैं जब आप पार्लियामेंट में जब आप स्पीच देते हैं। ऑफ कोर्स चाहे वो इमरान प्रतापगढ़ हो या फिर इकरा हसन हो या फिर हम इन जैसे तमाम लोगों की अच्छी बात है कि आप वो आर्टिकुलेशन के साथ अपनी बातों को रखते हैं। बट व्हाट अबाउट दी प्रैक्टिकल सशंस? उससे मुसलमानों को मिल क्या रहा है? हासिल क्या हो रहा है? ये वन बाय वन एक्चुअली अगेन क्योंकि मेरी जो बायस है वो आइडियाज और एकेडमिया की तरफ हो जाती है कि कोई भी चीज सक्सेसफुल जब होती है कि जब आपके सामने उसको रोड मैप हो कि अब फॉर एग्जांपल एक तरीके से इस सवाल को कंट्राडिक्टरी भी समझा जा सकता है कि हम लोगों ने इस पूरी डिबेट को शुरू किया कि अब मुस्लिम मीडिया की जरूरत है। तो मुस्लिम मीडिया होना भी एक तरीके से ये है कि भ आप स्पेस को पोलराइज कर रहे हैं। फॉर एग्जांपल वही चीज अगर आप देखें इकोनमी में, पॉलिटिक्स में हर जगह उसकी मैनिफेस्टेशन होगी। सवाल यह है एक्चुअली कि क्या किसी भी आइडेंटिटी जब तीन ग्रुप आइडेंटिटीज एक जगह पे हैं तो कई जगह पे उनकी स्पसेस ओवरलैप करेंगी। कई जगह पे उनकी स्पेसेस एक्सक्लूसिव होंगी। कई जगह पे उनकी स्पेसेस में इस तरह होगा कि नेगोशिएशन में कोई ज्यादा होगा, कोई बड़ा होगा। बहुत सारे अलग-अलग एक्सप्रेशनंस हो सकते हैं। सवाल ये है कि मेरे पास ए और बी की ही चॉइस क्यों है? जब इतनी डायनेमिक इतनी कॉम्प्लेक्स डेमोग्राफी हो उस डेमोग्राफी को डील करने के लिए पॉलिटिकल एक्सप्रेशन भी उतना ही कॉम्प्लेक्स की जरूरत पड़ जाती है कि जहां पे अगर मुस्लिम पॉपुलेशन 60- 70% से ज्यादा है तो पहला सवाल ये है कि वो वहां पे क्यों ना लड़े? दूसरा सवाल है कि वो जो आता है मुसलमान के ऊपर कि एक जमाने में अगेन जब हम पार्टीशन की बात करते हैं, इंडिपेंडेंस की बात करते हैं तो उस टाइम पे हमने आजाद को डिमिनाइज कर दिया। मौलाना आजाद की और बहुत सारी लिमिटेशंस हो सकती हैं जिस तरह हमारी और सबकी हैं। और मैं पर्टिकुलरली रिस्पेक्ट करता हूं हमारे जितने भी लीडरशिप उस टाइम पे प्रोड्यूस हुई चाहे वो जमीयत उलमा हो, जमात इस्लामी हो, चाहे वो इमारत शरिया हो। लेकिन ऐसी कंडीशन प्रोड्यूस हो गई। जिन भी वजूहात की वजह से मेरे हिसाब से वो हिंदुत्व की वजह से हुई। आपने बंगाल में जो किया 1800 में काव विजिल्टिज्म किया। आपने बंगाल पार्टीशन का जो वंदे मातरम से रेट्रिक वो किया। आपने जो अखाड़े प्रोड्यूस किए जिसमें वायलेंस होता था। आप जो जाके उस जमाने में भी मस्जिद के सामने जाके गाने गाते थे अपने वो करते थे। तो यह रोड मैप आज का नहीं है। यह आपको 1880 से लेकर 1947 के बीच में मैच्योर होते हुए दिखेगा। और उस टाइम आरएसएस नहीं हिंदू महासभा इसकी ऑर्गेनाइजिंग फोर्स थी और गॉडसे के बाद हिंदू महासभा कम हो गई। तो आरएसएस ने एक तरीके से वो विरासत को बगैर उस क्रिटिसिज्म के ले लिया। तो आज की डेट में मुस्लिम पॉलिटिकल थ्यरी क्या है? मेरा सवाल ये है कि जब कांशीराम की बात हो रही है कि उनकी पॉलिटिकल थ्योरी उनकी सोशल थ्योरी से आ रही है तो आपकी पॉलिटिकल थ्यरी डिवाइड ऑफ सोशल थ्योरी जब भी होगी वो एक्सप्रेशन तो अच्छा होगा पॉजिटिव डायरेक्शन में होगा कि कल को यहां पे अगर यह नहीं जीत रहे तो कोई और नौजवान आकर जो बेटर अल्टरनेटिव दे सके वो कर सकेगा। तो एक एक्सप्रेशन का एडवांसमेंट हो रहा है। तो उसको तो हमें डिनाई नहीं करना चाहिए। आज की डेट में अगर आम आदमी पार्टी दिल्ली में थी तो वो पंजाब क्यों गई? वह पार्टी गुजरात क्यों गई? उससे यह सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा है? इसमें सवाल यह है कि क्या वाकई में जो जिन मुस्लिम पार्टीज की हम यहां पर बात कर रहे हैं क्योंकि यू आर गिविंग एग्जांपल हां मैं ओवैसी को डिफेंड नहीं कर रहा हूं। आई डोंट लाइक हिम फॉर द काइंड ऑफ़ पॉलिटिक्स डिवाइड ऑफ़ सोशल थ्यरी। मैं ये कह रहा हूं कि जब ओवैसी को सामने रख के स्ट्रंग मैन से आप अल्टीमेटली मुस्लिम पॉलिटिक्स को अगर वो कर लें, द आर्गुमेंट नीड्स टू बी नंस्ड। अगर मुसलमान ओवैसी नहीं तो कोई और जो हो सकता है वो नॉर्मलाइज क्यों नहीं हो रहा? क्यों मुस्लिम पॉलिटिकल एक्सप्रेशन को एक ऐसे इलाके में कांग्रेस या रीजनल पार्टीज या दूसरे जहां पर मुसलमान की पपुलेशन कम है। लेकिन उसकी लीडरशिप क्वालिटी ज्यादा है। आप उस पे जज क्यों नहीं कर रहे हो? आप पॉलिटिकल डेमोग्राफी पे क्यों जज कर रहे हो? तो सवाल तो आपसे है ना कि क्या डिर्विंग मुस्लिम कैंडिडेट्स एक्सिस्ट नहीं करते? और अगर मुस्लिम पॉलिटिक्स आपकी पार्टी से होती है तो हिस्टोरिकली देखा गया ना आप हिजाब पे नहीं बोल सकते। आप बुलडोजर पे नहीं जा सकते। आपको तो फिर भी असदुद्दीन ओवैसी वफ के बारे में बोलते हुए दिख जाएंगे। दूसरी जगह पे जाते हुए दिख जाएंगे। इवन बहुत जगहों पे लिंचिंग वाले घरों में भी जाते हुए दिखेंगे। एक एग्जांपल में एक बुलडोजर वृंदा कराट तो क्योंकि वो उस एक्सप्रेशन से आती है। उसको सेलिब्रेट किया जा रहा है। उसको बिल्कुल रूच में रखा जा रहा है कि तो बाकी 100 लिंचिंग्स में वो कहां है? ब्रांडिंग बहुत आसान है। एंड इट इज नॉट अबाउट ओवैसी। ओवैसी के साथ 1001 प्रॉब्लम्स हैं। हम उससे एग्री करते हैं। सवाल यह है कि आप ओवैसी को सामने रख के ये डिस्कशन ही क्यों करते हैं? आप हमारी पॉलिटिकल एक्सप्रेशन जब मीडिया में भी हो सकती है, पॉलिटिक्स में भी हो सकती है, इकोनमी भी हो सकती है। एक डेमोग्राफी में जहां मुसलमान ओखला में है ज्यादा अगर दूसरी जगह पे दूसरे को राइट है तो मुझे क्यों ना हो? सवाल यह है कि ये मेरी बेसिक कॉन्स्टिट्यूशनलिटी क्या वो पार्टीज ये कन्विंस कर पा रही है? मेरा सवाल यह है कि हां नहीं जब हम यह बात करते हैं कि बीजेपी दो से लेकर कहां तक पहुंच गई कि आरएसएस का पूरा का पूरा सिस्टम जो है आप यह देखिए कि उसने कैसे अपने आप को मजबूत किया। भी सेुलर गांधी सेकुलर पार्टी जिम्मेदार हैं। महात्मा गांधी फॉर व्हाटएवर अगेन नो लीडर हैज़ बीन अ कंप्लीट लीडर। गांधी से मैं चार इलाफात अपने सामने रख सकता हूं। लेकिन उसके बावजूद अगर हिंदुस्तान ने कोई एक लीडर ऐसा देखा है जिसको मैं यह समझता हूं कि ही इज़ अ जीनियस अबव एव्री जीनियस। कि वो मल्टीपल एक्सप्रेशनंस ऑफ डिफरेंसेस को कंसोलिडेट कर पा रहा है। देखिए अगर किताब कॉन्स्टिट्यूशन कोई बोलेगा एंटी मुस्लिम है तो कॉन्स्टिट्यूशन एंटी हिंदू भी है। कॉन्स्टिट्यूशन एंटी एससी एसटी भी है। कॉन्स्टिट्यूशन एंटी लिबरल भी है। क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन कर ही यह रहा है कि वो बिटवीन मल्टीपल क्लेम्स ऑफ यूनिवर्सल वैल्यूस कि हिंदुत्व का यूनिवर्सल क्लेम, लिबरल का यूनिवर्सल क्लेम, एससी एसटी का यूनिवर्सल क्लेम, इस्लाम का यूनिवर्सल क्लेम वो उसको नेगोशिएट करके लिमिट कर रहा है कि पब्लिक स्फीयर में आप ये क्लेम्स कंप्लीटली इन्हेरिट नहीं कर सकते और प्राइवेट स्फीयर में आपके क्लेम्स एक्सपंड हो। हालांकि वह कभी भी एक्सप्रेस नहीं हुआ। यह अलग है कि ब्यूरोक्रेसी में क्या हुआ, दूसरी जगहों पे क्या हुआ, लिबरल्स ने उसको कैसे इस्तेमाल किया? लेकिन ये डिस्कशन था तो वहां पर एक गांधी एक्सिस्ट करता था जो स्पिरिचुअलिटी अमंग हिंदूज को वो एंगेज कर पा रहे थे। आज का राहुल गांधी हो या कोई और गांधी हो या कोई लीडर हो कांग्रेस का वो हिंदूइज़्म के कल्चरल एक्सप्रेशन को या इस्लाम के कल्चर मुसलमान तो फिर भी वोट दे रहा है। सवाल उनसे है कि आप मेजॉरिटी में हैं। आपका मेरी जिम्मेदारी नहीं है। मैं तो अभी भी आपको ही वोट दे रहा हूं सिवाय इक्की दुक्की चिककी जगह पे। मेरा सारा वोट आप पर जा रहा है या उन पॉलिटिकल पार्टीज पे जा रहा है जो रीजनल लेवल पर उसी आईडियोलॉजी को रिप्रेजेंट कर रही हैं जो आपकी आईडियोलॉजी है? तो सवाल ये है कि हिंदूइज़्म अगर को जरूरत है एक्सप्रेशन की तो हिंदुत्व क्यों दे रहा है? आप क्यों नहीं दे पा रहे? इट्स मोर अबाउट कि रिप्रेजेंटेशन स्ट्रक्चर क्या है और क्या वो दे पा रहे हैं। मुझे लगता है कि दिस डिस्कशन कैन गो ऑन एंड ऑन एंड वी हैव अ लॉट। मैं उसको एंड नहीं कर पाया। मुसलमानों को हिंदुस्तान के लिए एक आपका एक्सप्रेशन है जो आपकी इंडिविजुअल आइडेंटिटी है। बट अल्लाह के रसूल ससल्लम ने जब हिजरत करी मदीने में तो वहां पे जो ट्रीटी हुई है वो आप एक तरीके से उस जो जिस तरह का माहौल और आईडियोलॉजी मक्के में थी वहां आके मदीने भी आप उस तरह के लोगों के साथ ट्रीटी भी कर रहे हैं। आप जस के साथ कर रहे हैं। ईसाइयों के साथ कर रहे हैं। इस्लाम के पॉलिटिकल एक्सप्रेशन में 21 सेंचुरी की लैंग्वेज देना कि इस्लाम है क्या? उसके अंदर आप जिस लीगल प्लूरलिज्म की बात कर रहे हो कॉन्स्टिट्यूशनल वो हमारे यहां हमारे यहां फंडामेंटली एंबेडेड है। वो उस्मानिया खिलाफत हो, उमय हो, अब्बासी हो, अल्लाह के रसूल खुद किस तरह से तो पॉजिटिव इस्लाम भी लोग को पता नहीं है कि हमारी इकोनॉमिक डिमांड्स क्या है? हमारी दूसरे कम्युनिटी के हम अंबेडकर ने ये बोला, हम भी ये कर ठीक है, बोला होगा। आजाद ने क्या बोला आपको पता है या किसी और ने मौदूदी ने क्या बोला फॉर एग्जांपल या हुसैन अहमद मदनी ने क्या बोला लेकिन वो तो पहुंच ही नहीं रहा ना लोगों तक इसलिए नहीं पहुंच रहा क्योंकि यहां पे भी हेजमनीज है वहां पे भी हेजमनीज है नई बात होना नहीं चाहती क्या हमें इसको और लास्ट ये हमारा सेगमेंट बिल्कुल हम इसको वाइंड अप करेंगे फिर कि क्या हमें इसे फिर दो हिस्सों में हमें बांटना चाहिए मैं सबके सामने ये सवाल रख रही हूं कि एक तो ये कि मुसलमान मुसलमानों को किस तरह से उनकी वोकैबरी दी जाए। उनका रिप्रेजेंटेशन दिए जाए। अ वो किस तरह से उनके सामने कोई मसला अगर दरपेश होता है, कोई बड़ा इस तरह का कोई हादसा या कुछ भी जिसमें आप टेररिज्म से लेकर जिहाद या हमने कोरोना के टाइम पे तमाम जो बड़े इवेंट्स हमने देखे कि वो उसमें अपने आप को किस तरह से प्रेजेंट करें। कैसे अपने आप को वो डिफेंड करें। उस टाइम वो किस तरह के स्टेप्स ले। एक तो ये पार्ट है इसका। दूसरा पार्ट है इसका कि इस्लाम क्या है? क्या सही इस्लाम है? इस्लाम क्या कहता है? कुरान क्या कहता है? हदीस क्या है? और उसको किस तरह से? क्योंकि आजकल तो आप ये देखिए ना कि मेन स्ट्रीम मीडिया से लेकर तमाम मीडिया में कुरान हदीस से लेकर सब तरह की बातें होती हैं। तो और उसको किस तरह से उसके डिस्टोर्टेड फॉर्म्स जो है वो पेश की जाती है और किसी भी हद तक जाया जाता है। तो क्या आपको लग रहा है कि दो हिस्सों पर काम करने की जरूरत है? और या आपको लगता है देयर आर लेयर्स जहां काम करने की जरूरत है कि एक तरफ ये वोकैबलरी या आर्टिकुलेशन ये रिप्रेजेंटेशन देना दूसरा एक इस्लाम की सही तस्वीर सही पिक्चर पेश करना तीसरा अपने इंस्टीटशंस बिल्ड करना चौथा अपने मीडिया हाउसेस और इस तरह की चीजों को बिल्ड करना और पांचवा जो हमारे एकिस्टिंग इंस्टीटशंस हैं जहां पर आप अपनी जकात भी देते हैं आप उनको सपोर्ट करते हैं उनसे सब भी सवाल करना कि वो क्या कर रहे हैं वो व्हाट डू यू थिंक ऑफ ऑन ऑल ऑफ़ दैट वन बाय वन? मुझे लगता है कि आपने जो सारे पॉइंट्स बताए हैं बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट्स हैं और सब सारी चीजों पे काम करने की जरूरत है जो मिसर रिप्रेजेंटेशन है रिलीजन का जिस तरह क्या हम उनको प्रायोरिटाइज कर सकते हैं? बिल्कुल बिल्कुल और और वी कैन डू इट यू नो ऑल इन एट वंस। नहीं मतलब प्रायोरिटाइज मुझे लगता है कि ऐसा तो कभी टाइम नहीं आएगा कि हम एक कंप्लीट कर लेंगे और दूसरे दिन स्टार्ट करेंगे। वो टारगेट तो नहीं है। आई थिंक इट्स अ वेरी वेरीरी लॉन्ग प्रोसेस। अगर आप अगर रिलजन के अराउंड ही जो आपकी मिस इनफार्मेशन है उसको काउंटर करना शुरू करें तो अगले कई डिकेड्स लग जाएंगे। तो ये सब काम साथ में होने की जरूरत है। दूसरी चीज ये है कि एक चीज मैं बहुत ये बताना चाह रहा था। मुझे लगता है थोड़ा आउट ऑफ कॉन्टेक्स्ट भी होगा यहां पे। जो मुसलमानों का मोबिलाइजेशन है चाहे वो सिविल सोसाइटी के स्पेस में हो, पॉलिटिकल स्पेस में हो वो किसी के खिलाफ नहीं है। मतलब एक चीज को बहुत इंपॉर्टेंट ध्यान रखने की जरूरत है कि हम मुसलमान जो हैं ना लेफ्ट पार्टीज के खिलाफ हैं ना सेकुलर पार्टीज के खिलाफ हैं। और हम तो सेकुलरिज्म को ही एनरिश करते हैं। वी वांट सेकुलरिज्म टू बी इन दिस कंट्री। लेकिन मुसलमान जो पॉलिटिकल मोबिलाइजेशन है वो सिर्फ हिस्से की लड़ाई लड़ रहा है अपना कि उनको उनका जो रिप्रेजेंटेशन का 14% का जो हिस्सा है उसमें कुछ ना कुछ मिलना चाहिए। तो ये एक नोशन अगर इस प्रोग्राम से मुझे लगता है जाए कि मुसलमान जो है किसी के खिलाफ नहीं है और उन्हें किसी से लेफ्ट से प्रॉब्लम नहीं है। लिबरल तबके से प्रॉब्लम नहीं है। इनफैक्ट मेजॉरिटी ऑफ़ मुस्लिम्स ये चाहते हैं कि हिंदुस्तान जो है एक सेकुलर मुल्क की तरह मेजॉरिटी क्या मुझे लगता है कि सारे मुसलमान ये चाहते हैं कि मुसलमान हिंदुस्तान एक सेकुलर मुल्क की तरह रहे और जो लड़ाई है वो कहीं ना कहीं अपने पार्टिसिपेशन की है। तो मुझे लगता है ये बात थोड़ा क्लेरिफाई करनी जरूरी थी क्योंकि हम लोगों ने बार-बार शायद ब्लैंकेट तरीके से बोला है कि हां तो मुझे लगता है दैट हैस दैट हैड टू बी क्लेरिफाइड हियर। एंड एट द सेम टाइम मुझे लगता है जो आप बात बोल रही हैं कि ये तीन चार पहलू पर काम करने की जरूरत है वो बहुत ज्यादा जरूरत है। सब चीजों पर काम करने की जरूरत है और अपने इंस्टीटश को मजबूत करने की जरूरत है। जो एकिस्टिंग इंस्टिट्यूशन है उनको भी सपोर्ट करने की जरूरत है। और डायवर्सिटी की बात जहां तक मीडिया में है, मीडिया में डायवर्सिटी की बात से हमने शुरू किया था। तो वहां पे मैं जाके फिर सर्कुलन करूंगा कि डायवर्सिटी की बात जहां तक मीडिया में है तो यह समझने की जरूरत है कि जो लोग डायवर्सिटी को प्रमोट करते हैं जो लोग ये निकालते हैं एप्लीकेशनेशंस कि हमें बैकवर्ड कम्युनिटी से कोई चाहिए, माइनॉरिटी कम्युनिटी से कोई चाहिए, हमें एससी कम्युनिटी से कोई चाहिए। तो वो सिंबॉलिक नहीं होना चाहिए। उसमें ऐसा नहीं होना चाहिए कि आपको एक तरह के लोग चाहिए इस कम्युनिटी से। इट शुड बी डवर्स इन इट्स रियल सेंस। अगर हर लोग हर तरह के लोग आपके मीडिया इंस्टिट्यूशन में आकर काम करें, आपके इंस्टिट्यूशन में काम करें तो वो रियल डायवर्सिटी होगी। इसलिए नहीं क्योंकि मैं असद अशरफ को कोई पसंद है या अली जावेद को कोई पसंद है तो उन्होंने उस कम्युनिटी के एक आदमी को रख लिया और बोला कि हम डायवर्सिटी हमारे यहां डायवर्सिटी है और हम अलग करना चाहते हैं। आप फिल इन करना चाहते हैं। तो वो डायवर्सिटी सिंबॉलिक नहीं होनी चाहिए। वो डायवर्सिटी इन इट्स रियल सेंस होनी चाहिए कि अगर उस आदमी की कोई बात है अगर वो आदमी एक अलग नजर नजरिए से चीज को देख रहा है तो आपके अंदर वो मादा हो कि आप उस चीज उस डिबेट को एक्सेप्ट करें और आप उससे बातचीत करें आप उससे डिबेट करें जैसे कुछ ऑर्गेनाइजेशनंस की मैं यहां पर बात करूंगी कि जहां पर शायद हिजाब पहने जो लड़कियां हैं उनको बाकायदा तौर पर वो एक प्रेजेंटर हैं। वो प्रेजेंट करती हैं चीजों को। इनफैक्ट मैंने देखा जो शज में पूरा उस तरह का जो पहना जाता है वहां पर भी एक मैंने देखा वो पहले फर्स्ट ऑफ इट्स काइंड आई थिंक इट वास क्योंकि उससे पहले मैंने नहीं देखा मुझे लगता है कि ये सब जो हो रहा है इसी चर्निंग के वजह से हो रहा है क्योंकि जिस तरह का प्रेशर मुस्लिम यंग ग्रुप्स बना रहे हैं चाहे वो Twitter पे ही क्यों ना हो चाहे वो सोशल मीडिया पे ही क्यों ना हो लेकिन उससे एक नैरेटिव तो बनता है आज से पहले साहब फिर भी सवाल मेरा ये है इसमें कि क्या वो जिस तरह तरह से वो दिख रही है या दिख रहे हैं। अ क्या उसके बाद आपने ठीक है एक आपने एक मैसेजिंग दी कि सी वी आर गिविंग देम रिप्रेजेंटेशन जो हिजाब भी पहन रही हैं लड़कियां या आप उनको जो रिप्रेजेंटेशन दे रहे हैं क्या आप उनको उतनी आजादी भी दे रहे हैं कि वो जिन टॉपिक्स पर बात करना चाहती हैं जिन स्टोरीज को वो हैंडल करना चाहती हैं जिन वोकैबलरीज को वो रखना चाहती हैं जिस तरह से उस प्रोग्राम को उस स्टोरी को उस रिपोर्टिंग को करना चाह रही हैं क्या आप उनको वो आजादी दे रहे हैं या फिर एक सिंबल के हिसाब से आपने उनको को रखा है एक मैसेजिंग के लिए बिकॉज़ यू हैव अ लार्ज ऑडियंस ऑफ़ मुस्लिम। और फिर उसके बाद लेकिन वो बात वही कर रही है जो और लोग कर रहे हैं। तो यू नो इन अ वे इट्स इट्स कंट्राडिक्टेड ट्रू। यू कांट से पर्टिकुलर लाइन और वर्ड्स ऑफ़ फ्रेज़ जस्ट टू डिफाइन इट। हाउ हाउ डू यू सी? मतलब इसको आप कैसे देखेंगे? नहीं मुझे लगता है कि यह एक स्टेप है। हालांकि हिजाब पहनना ना पहनना किसी का पर्सनल चॉइस है। एक स्टेप मूव एक स्टेप फॉरवर्ड तो है कि आप अब हिजाब क्योंकि आज से दो साल पहले मुझे लगता है किसी ने कंप्लेन की थी कि उनको हिजाब पहन के एनडीवी में या किसी ऑर्गेनाइजेशन में काम नहीं करने को मिला और क्योंकि वो हिजाबी थी। तो मुझे लगता है कि गोइंग फॉरवर्ड ये एक स्टेप है कि आप हिजाब पहनने वाले लोगों को एक्सेप्ट कर रहे हैं। आई थिंक इट इज़ आल्सो बोरोड फ्रॉम वेस्ट। वेस्ट में भी अब एक्सेप्ट कर रहे हैं हिजाब पहनने वाले लोगों को। तो मुझे लगता है कि एक स्टेप है और लेकिन इसको सिर्फ सिंबॉलिक ना बनाया जाए। जैसे कि आपने बात कही कि उनको जो उनके हिसाब से न्यूज़ प्रेजेंट करना है। उनके हिसाब से अपने व्यूज प्रेजेंट करने हैं। उनको अपने हिसाब से स्टोरी को ट्विस्ट देना है। तो उस फॉर्म में भी डायवर्सिटी दिखनी चाहिए। रादर देन जस्ट हैविंग अ सिंबॉलिकली जस्ट सिंबॉलिकली हैविंग समवन वियरिंग अ हजाब एंड डिक्लेअरिंग इट दैट यू अ डवर्स ऑर्गेनाइजेशन मीडिया का पार्ट रही हूं और हूं अभी भी पार्ट। और जब मैं कोई भी स्टोरी मैं कवर करने के लिए जाती हूं तो ऑफ कोर्स इन बैक ऑफ माय माइंड मुझे एक ये रहता है कि एक यू नो एक सेल्फ डाउट रहता है कि मैं जो स्टोरी उठा रही हूं उसमें मैं किस तरह की वोकैबलरी यूज कर रही हूं। ऐसा तो नहीं मेरी ऑर्गेनाइजेशन को कोई प्रॉब्लम तो नहीं हो जाएगी इससे। वो ये तो नहीं सोचेंग कि मुसलमान है तो सिर्फ मुसलमान मुसलमान करती रहती हैं या इस तरह की स्टोरीज जो है वो कर रही हैं या माना कि मैं इलेक्शन भी कवर करने गई और मैंने जाके इत्तेफाकन या डेलीबेटली भी हो सकता है कि मैंने एक मुस्लिम कांस्टीट्यूएंसी को चुना और वहां से जाके मैंने उसको रिपोर्ट किया और फिर उसमें यह कह दिया जाए कि अरे हमें पता है मुसलमान क्या सोचते हैं। वो तो एंटी मोदी बात करेंगे ही करेंगे। तो वहां जाने की क्या जरूरत है? आपको दूसरी जगहों पर जाना चाहिए। तो आप एक्चुअली आप रिप्रेजेंटेशन भी दे रहे हैं कि आपने एक मुसलमान को रखा हुआ है। लेकिन उसके साथ-साथ आप उसको वो आजादी नहीं दे रहे हैं कि वह किस तरह से उस चीजों को करना चाहते हैं। या फिर कोई भी मुस्लिम स्टोरी है। माना कि लिंचिंग है या कुछ भी आप करना चाह रहे हैं। तो उसमें यह कह देना कि आप इसको एंपलीफाई करेंगे। आप उनकी हेट को ही एंपलीफाई कर रहे हैं। आप उनको और स्टेज दे रहे हैं। तो लेट्स जस्ट डोंट डू दैट टू समथिंग एल्स। या फिर आप मत करिए। हम करेंगे इसको। बेशक। यह यह भी मसला होता है न्यूज़ रूम्स में कि जो मुस्लिम रिपोर्टर होता है उनको यह कहा जाता है कि आप यह माइनॉरिटी वाली स्टोरी करें या लिंचिंग हुआ तो मुस्लिम रिपोर्टर ही जाएगा वगैरह-वगैरह लेकिन मुस्लिम रिपोर्टर हिंदुत्व पे क्यों नहीं कर सकता स्टोरी ठीक है उसका पर्सपेक्टिव्स पे क्यों नहीं आ सकता होम मिनिस्ट्री क्यों नहीं कवर कर सकता फाइनेंस पे क्यों नहीं कर सकता स्टोरी ये भी अलव होना चाहिए तो एक कन्वर्स प्रॉब्लम भी है कि मुसलमान रिपोर्टर है तो उनसे सिर्फ बस मुसलमानों वाली ही स्टोरी कराएं। हालांकि उसके भी फायदे होते हैं। जैसे हमने अब हिजाब प्रोटेस्ट पे कर्नाटक में जो हुआ था उस पे डॉक्यूमेंट्री कराई और एक प्रैक्टिसिंग मुस्लिम रिपोर्टर गई थी नॉन हिजाबी। अ पर एक वो उसका पर्सपेक्टिव बाकी स्टोरी से बिल्कुल ही अलग था कि वो प्रोटेस्ट पे जरूर किया। लेकिन उसका पूरा तवज्जो इस चीज पर था कि लड़कियां पुशबैक कैसे कर रही हैं? इनके एस्पिरेशन क्या है? ये हिम्मत कैसे दिखा रही? इन्होंने लड़ाई कैसे करी इन लड़कों से? ये जो गुंडों थे गुंडों से तो वो जाहिर है जब आप रिप्रेजेंटेशन देते हैं न्यूज़ रूम में तो एक अलग किस्म का पर्सपेक्टिव सामने आ जाता है। अगर मेरा ख्याल है अगर कोई सवर्णा टाइप के जाते वहां रिपोर्टर तो वो एक अलग एक प्योरली एक स्टेप कि भ इनको डिनाई किया जा रहा है। बेचारी बच्चियां एक एंगल आप पेश अब जैसे एक बहुत ही बड़े पत्रकार ने शाहीन बाग के बीच में अ इस तरह से पेश किया कि ये औरतें पहली बार घर से बाहर निकल रही हैं। जो भी शख्स ये कह रहा है वो कभी एक मुस्लिम मोहल्ले में आया ही नहीं है। जहां देर रात तक मुस्लिम महिलाएं बाहर होती हैं क्योंकि वो एक एक महफूज़ स्पेस है। एक एक सेफ चौंक जाना कि बुर्की में कोई लड़की है तो वो अंग्रेजी बोल रही है। अंग्रेजी बोल रही है। उसको पूरा इस तरह से वायरल करना कि ये तो एलियंस हैं। मतलब हाउ कैन मतलब वो कैसे कर सकती हैं। तो इस तरह के ये और ये उन लोगों की बात हो रही है शायद जो गोदी मीडिया से नहीं आते हैं। बल्कि जो एक सेकुलर मीडिया का हिस्सा हैं या उस तरह के वो लोग हैं। लेकिन वो जो मैंने बात की जो जो हम स्यूशन की जो हम बात कर रहे हैं उस पर आपकी क्या राय है? फिर मैं अली से आखरी स्यूशन को लेकर जो आपने स्टेप्स मेंशन करे वो मेरे ख्याल एक बहुत अच्छा ब्लूप्रिंट है जिन्हें रखना चाहिए। काफी उसमें से काम 1920 सही लेकिन हो भी रहे हैं। जैसे मिसाल के तौर पर जो आपने बात की कि कोई तबबलीग जमात टाइप का जो उनके हाउडिंग वाला हादसा हुआ कोविड के दौरान तो एक मॉडरेशन से कैसे इस किस्म के प्रोवोकेशन को रिसोंड किया जाए। ये बात आम मुसलमान अपने लिव्ड एक्सपीरियंस के जरिए भी समझ रहा है कि प्रवोक किया जाएगा। हमें प्रवोक नहीं होना है। हमें हिकमत से काम लेना है। और ये मैसेज बार-बार मसाजिद में भी दिया जाता है कि हर बार जब अमूमन मैंने देखा है जुम्मे की नमाज के बाद दुआ की जाती है कि अल्लाह इस मुल्क में अमन कायम फरमा और लोगों में मोहब्बत कायम फरमा। तो ये बात कि हम साथ में रह रहे हैं। हमें मॉडरेशन से रहना है, हिकमत से रहना है और सबके साथ मोहब्बत कायम करके रखनी है। तो ये मैसेज लोग अपने ज़हन में भी महसूस कर रहे हैं और ये मस्जिद के जरिए भी ये नैरेटिव काफी अच्छी तरह से मेरे ख्याल है लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। तो कुछ काम हो रहे हैं। इनमें से जो काम नहीं हो रहे हैं और जिनको और ज्यादा करने की जरूरत है वो है इंस्टीट्यूशन बिल्डिंग। हम उस उस तरफ उस उसके तरफ काम करने की जरूरत है। रिसोर्सेज हैं कम्युनिटी में। कई चीजों के लिए रिसोर्सेज मुहैया हो जाते हैं। रिलीफ के काम में अगर कल को पैसे इकट्ठा करने की बात कहे तो हो जाते हैं पैसे इकट्ठा। मस्जिद बनाने के लिए पैसे इकट्ठा हो जाते हैं। ईरान जैसे इशू का तो ईरान जैसे इशू पे हो गए। यहां तक कि घर डेमोलिश हो गया। उसके लिए भी हो जाते हैं अल्हम्दुलिल्लाह और होने की जरूरत है लेकिन हो जाते हैं लेकिन इंस्टीटश के बनने के लिए तालीम के लिए पैसे इकट्ठा करना वो कई बार अब जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा है तो वो उस तरफ गुंजाइश जरूर है और मैं यहां पे एक एग्जांपल भी देती हूं कि अक्सर मैं गाजा की बात करती हूं कि जब हम ये देखते हैं कि क्यों मुस्लिम इंस्टीटशंस या मुस्लिम मीडिया हाउसेस या मुस्लिम जर्नलिस्ट की हमें जरूरत है। अगर हम पूरी दुनिया में अभी फिलहाल देखें जिस तरह का एक नरेटिव गाजा के को लेकर बना है एक सिंपैथी है सत्ता खिलाफ है। लेकिन जो लोग हैं वो अक्रॉस रिलीजन यू नो और एथनिसिटी वो बेशतर मैं कहूंगी कि वो गाजा के साथ है और हमने सारी दुनिया में प्रोटेस्ट हमने देखे हैं और वो इसलिए एक तरह से ये बन पाए एक तो सोशल मीडिया और के जरिए उन्होंने उनको पहुंचाया और दूसरा जो कुछ मीडिया हाउसेस थे उन्होंने उनको जगह दी स्पेस दी और वो जो जो खुद विक्टिम थे वही स्टोरी भी थे और वही जर्नलिस्ट भी थे तो उन्होंने जिस तरह से उन चीजों को अनफिल्टर अनबायस्ड जो था जिस तरह से था उसको पेश किया अपने पर्सपेक्टिव से तो मुझे लग रहा है उससे बहुत ज्यादा एक हेल्प जो है वो एक नैरेटिव बिल्ड करने में बनी जो कंप्लीटली मुझे अगर कंप्लीटली ना कहूं तो बहुत बड़ी तादाद में मुझे हिंदुस्तान में वो मिसिंग लगता है और इसीलिए जब हम ये बात करते हैं किसी को यह ऐतराज भी हो सकता है कि जैसे अली बोल रहे थे कि हम यहां पर भी एक कोई डिवाइड करने की हम बात कर रहे हैं लेकिन मुझे लगता है कि जिस चश्मे से या जिस तरह से मैं उस पर्टिकुलर स्टोरी को देखूंगी एज अ सिटीजन ऑफ दिस कंट्री एज अ मुस्लिम एज अ विक्टिम यू नो कि कैसे मुझे डीह्यूमिनाइज किया जा रहा है। सेकंड क्लास सिटीजन बनाया जा रहा है। हर रोज मेरे इर्द-गिर्द किस तरह की दीवारें जो है वो खड़ी की जा रही हैं। जिस जज्बे और जज्बात के साथ शायद मैं पेश कर पाऊंगी उसको शायद कोई और नहीं कर पाएगा। तो आई एम नॉट सेइंग कि समबडी एल्स शुड नॉट डू इट। बट आई एम जस्ट सेइंग दैट वी नीड मोर एंड मोर रिप्रेजेंटेशन एंड मोर एंड मोर मीडिया हाउसेस। यह अभी का मुझे लगता है बिकॉज़ एज अ जर्नलिस्ट मैं शायद इस बात को यहां पर इस तरह से रख सकती हूं। बट वो जो फाइव फाइव पॉइंट्स मैंने रखे हैं अली इफ यू कैन कंक्लूड ऑन दैट। देखिए इवन जब हम लोग हिंदुत्व को देख रहे हैं या दूसरे जो आईडियोलॉजिकल फ्रेमवर्क हैं उनका एक होलिस्टिक फ्रेम सिस्टम है। उनके यहां स्कूल्स हैं, उनके यहां यूनिवर्सिटीज हैं। उनके यहां मीडिया हाउसेस हैं, सिंक टैंक्स हैं। उनके यहां लीगल अपेरेटस है। तो कभी भी कोई सिस्टम है जब चर्निंग होती है या जो उसका एक्सप्रेशन होता है वो ज बेटर हो सकता है जब उसको हर नोड पे उसकी इंस्टीटशंस एक्सिस्ट करते हो। मुस्लिम्स में जिस तरह का डायलॉग और जिस तरह की फ्रेमवर्क्स डेवलप हुए एक चीज पे बहुत आके लोगों के लिए आसान हो गया। मुतमईन हो गए कि भ दो काम एक तो मस्जिद मदरसा बना लीजिए दूसरा स्कूल बना दीजिए ये स्कूल और ये सब और तीसरा रिलीफ का काम कर लीजिए। तो हमने भी जब ये नाउस के हवाले से बाकी चीजों से देखी फंड्स की जरूरत पड़ी या ये वो करने की तो यूजली लोग यही होता है कि भ स्कूल चला रहे हैं या फिर एड का काम कर रहे हैं या ऑफ कोर्स ऑल ऑफ देम आर वेरी नेसेसरी थिंग्स पर ये इनमें से कोई भी एक ऐसी चीज नहीं है कि जो आपकी राइट्स को नेगोशिएट कर रहा हो। ये कोई अब जैसे कोई सवाल पूछता है कि भाई 25 साल बाद जब ये बच्चे पढ़ेंगे तो ये बच्चे बाहर निकल के चेंज लाएंगे तो मैं उनसे बोलता हूं 25 साल तक वो इंस्टीट्यूशन रहेगा। वो तो आपकी यूनिवर्सिटीज भी बंद कर रहे हैं। वो तो वाइट कॉलर जिहाद के नाम पर आपकी कंपनीज भी बंद कर रहे हैं। वो तो आपकी चाहे वो मदरसा वो सब चीजें बंद कर रहे हैं। तो जब आपने ये बात करी फॉर फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ फस्तीन तो वहां पे जो स्किल्ड रिक्वायर्ड टू डू एडवोकेसी है वो आवाम तक उसकी ट्रेनिंग है। आपके जब तक डिस्ट्रिक्ट के लेवल पे, गांव के लेवल पे या नाउ जैसी ऑर्गेनाइजेशन या कोई जब तक ट्रेनिंग्स नहीं करेंगे कि जो रेप्लकेबल प्रोग्राम्स हो और उसके लिए साथ-साथ ये यू नो नैरेटिव नहीं बनाया जाएगा कि भ पीपल हैव टू फंड दैट। मिडिल ऑर्गेनाइजेशंस दे विल हैव हमेशा अपना पर्सपेक्टिव वो करेगा। एट द एंड ऑफ़ द डे वो वाइट कॉलर्स जिहाद क्यों बोल रहे हैं? क्योंकि उनको यह दिख रहा है कि भाई राइज ऑफ मिडिल क्लास अमोंग्स मुस्लिम्स हुआ है पिछले कई सालों में और वह जो मिडिल क्लास है वो किसी भी एकिस्टिंग मुस्लिम इदारे से एन मास कनेक्टेड नहीं है ना वो जमाते इस्लामी के साथ है ना जमीयत उलमा के साथ है ना वो तबबलीगी जमात के साथ है ना मैं ये नहीं बोल रहा हूं क्रिटिसाइज नहीं कर रहा हूं मैं ये बता रहा हूं दिस इज़ द रियलिटी और वो जो चर्निंग है वो अल्टीमेटली एक्सप्रेशनंस ले रही है स्मॉल इंस्टीट्यूशनल फ्रेमवर्क के जिस तरह से हम लोगों के भी सबके अटेमप्ट्स रहे हैं तो वहां वहां पे जब ये चीज राइज होने लगेगी और डीसेंट्रलाइज न्यू फॉरमेशंस होंगी जो बहुत अब क्या है कि भ अगर आपको जमात इस्लामी को कंट्रोल करना है जमीत उलमा को कंट्रोल करना है एक ऑर्गेनाइजेशन है स्टेट वो ले सकता है अगर एक्सप्रेशनंस इतने लेवल पे हो डिसेंट्रलाइज्ड हो और उनकी एक लैंग्वेज हो फस्तीन की एक लैंग्वेज है उनकी कंसिस्टेंसी है उनकी डिमांड क्या है उस डिमांड का रिलेशन क्या है राइट से क्या रिलेशन है इस्लाम से क्या रिलेशन है टेरिटोरियलिटी से क्या रिलेशन है ऑपरेशन से क्या रिलेशन है इंडियन मुस्लिम्स में वो कंसिस्टेंट नहीं है। वो जो लैंग्वेज वो बोल रहा है पब्लिक स्फेयर में वो लैंग्वेज आपकी बहुत ज्यादा बोरोड है। वो सेकुलर लेफ्ट की लैंग्वेज है। उसमें कोई बुराई नहीं है। लेकिन आप आज की डेट में जो इदारे मुस्लिम इदारे जो ये प्रोग्राम्स भी कर रहे हैं वो इन स्पेसेस को ऑर्गेनाइज करके वो आईडियोलॉजिकली कुछ एक्सप्रेस नहीं कर रहे हैं। वो सिर्फ अपनी जगह बना रहे हैं कि भ हम भी इस जगह में मौजूद हो सकते हैं। लेकिन वो जो पैराडाइम ऑफ डिस्कशन है डिस्पाइट द फैक्ट कि आप एक मुस्लिम इदारा हो इस्लाम पसंद हो ये बातें बोल रहे हो आपकी कोई एजेंसी नहीं है आपके ही करवाए हुए प्रोग्राम में क्योंकि जो आप लैंग्वेज बोल रहे हो वो लैंग्वेज आपको क्लियर ही नहीं है तो सबसे बड़ी प्रॉब्लम तो ये है कि सबसे पहले जब तक रिसर्च नहीं होगा मीडिया में भी वही बात आएगी जो आपको आपको अपनी हिस्ट्री नहीं पता है लोगों को पार्टीशन की जब तक हिस्ट्री नहीं पता चलेगी कि कब कहां कैसे क्यों हुआ अब जैसा दीपक अगर जाके बोल देते हैं कि शाह वली उल्लाह देहलवी वाज़ द फर्स्ट सेपरेटिस्ट। यह बहुत प्रॉब्लमैटिक स्टेटमेंट है। कैसे? आपको अपने ही जो ट्रेडिशन में बड़े उलमा गुजरे और रिफॉर्मर्स गुजरे उनकी हिस्ट्री नहीं पता। अगर वो ये बोल देते हैं कि बंगाल में 1905 में जो पार्टीशन हुआ वो फिर से 1947 के पार्टीशन की वजह बनी। तो फिर हम ये सवाल नहीं करते हैं कि हम आनंद मठ में ये तो बोलते हैं कि उसमें हिंदू फिगर्स को माता की तरह दिखाया जा रहा है। इसलिए इस्लाम नहीं। नहीं। उससे बड़ा सवाल उस स्टोरी में यह है कि पहली बार एक नवेल के फॉर्म में पहली बार केरला फाइल्स आई कि उसने यह कहा कि जो भक्ति जो जो सन्यासी जो फकीर और सन्यासी मूवमेंट हुआ 1780ज में 90ज में जब ब्रिटिश की वजह से पॉलिसी की वजह से फेमिन आने लगा और वहां से लोकल जो गरीब मुसलमान फकीर और गरीब हिंदू सनातन संतान सनातनीज यह अफेक्ट होने लगे इनके इनके रिलीजियस रूल्स। तो इन्होंने ब्रिटिश के खिलाफ जिहाद किया, धर्म युद्ध किया और वहां पे यह लोग साथ थे। लेकिन जब बंकिम चंद्र चैटर्जी इस नवेल को लिखते हैं ब्रिटिश गवर्नमेंट के अंदर डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट होते हुए तो वो फकीर मुसलमान को गायब कर देते हैं। और वो वहां पे मुस्लिम नवाब लाते हैं कि वो मुस्लिम नवाब जो ऑप्रेसर है। आप देखिए पैटर्न। इसीलिए वंदे मातरम उनके लिए रिक्वायरमेंट है कि वह सावरकर से ज्यादा क्यों आनंद मठ को और वंदे मातरम को ओन कर रहे हैं। क्योंकि वहां से उनकी पॉलिसी का फ्रेमवर्क के पहली बार कि आप बोलो कि नहीं एक कॉलोनाइजेशन नहीं दो कॉलोनाइजेशन हुए। एक इस्लामिक कॉलोनाइजेशन था एक ब्रिटिश कॉलोनाइजेशन था। हत्ता कि यहां पे ज्यादातर जो लोग हैं मुसलमान वो यहीं के हैं। जो लोग अगर बाहर से आए भी वो यहीं के रह गए। यहीं सारे पैसे जो इमर्ज हुए यहीं खर्च हुए। वहां पर हिंदू लीडर्स भी थे जो आपकी मिलिट्री के टॉप कमांड ये सब इरेज्ड मुस्लिम एक ऑपरेशर रूलर है। सनातन सनातन जो संतानंस हैं वो भारत माता को वो कर रहे हैं। प्रोटेक्ट कर रहे हैं। ब्रिटिशर आपका शॉर्ट टर्म एनिमी है। लॉन्ग टर्म एलई है। क्योंकि ये स्पेस बनेगा जिस पे आप इस ऑप्रेसिव मुसलमान को खत्म कर सकते हैं। और वह वहां पे जो भद्रोक जैसा आज हम यहां बोल रहे हैं यह भद्रलोक की विद इन चर्निंग हो रही है। और वहां पे नेशनल कांग्रेस इमर्ज हो रही है और वह वंदे मातरम को जानते हुए क्यों उसको यह दिख रहा है कि इसकी नाम पे चैनलाइज किया। हमेशा सेक्युलर लिबरल पॉलिटिक्स ने इजी वे ऑफ मोबिलाइजेशन को चुना रादर देन राइट वे ऑफ मोबिलाइजेशन के। तो यह हमें जो आप लोगों ने बोला कि जब तक हमें यह पता नहीं होगा कि हिंदुत्व दावा क्या कर रहा है या जो लिबरल स्पेसेस हैं उसमें इस्लामोफोबिया कहां और कितना है? दे आर नॉट कंप्लीटली इस्लामोफोबिक। बीजेपी और कांग्रेस जमीन आसमान का फर्क है। ये हमें रियलाइज करना पड़ेगा। दे विल ऑलवेज बी आवर एलआई। लेफ्ट भी हमारा एलआई है। लिबरल भी हमारा एलआई है। दलित भी हमारा एलआई है। हमारा इवन हिंदू भी एलआई है। जिसके साथ हम हमारा हिंदुत्ववादी एलआई नहीं हो सकता। क्योंकि उनकी पॉलिटिकल फिलॉसफी में इस्लाम अनएक्सेप्टेबल है। उनका कंसोलिडेशन इसी बेस पे होता है। उनके पास कोई दूसरा फार्मूला नहीं है। तो आप उनके साथ कैसे अल कर देंगे? लेकिन नॉर्मलाइजेशन और जो हेट हो रहा है जो मुसलमानों के अंदर भी हो रहा है कि आप किसी भी चीज को आप देखते हैं जैसे हमने अखलाक से हमने शुरुआत की कि जब हम अखलाक की बात करते हैं तो एक एक ऐसी बेचैनी थी तमाम मुसलमानों में कि ऐसे कैसे हो सकता है। लेकिन अभी हम देखते हैं हम सोशल मीडिया पर देखते हैं कि कोई भी ख़ास तौर पर हरियाणा और मेवात इस तरफ की मैं बात करूं कि किसी को भी ले आते हैं वो अबडक्ट करके किसी भी गरीब मुसलमान को और उसे गौ रक्षा और इसके नाम पर उसको पीटा जाता है मारा जाता है। मतलब जुल्म की हर इंतहा उसके साथ पार की जाती है और मुसलमान देखते हैं दो चार जो एक्टिव मुस्लिम्स हैं या लिबरल्स हैं या और उस तरह के लोग हैं जो इस तरह की वॉइसेस को एंपलीफाई करते हैं। वो उनको ट्वीट रीट्वीट करते हैं। बस इतने तक मतलब एक मुसलमान की जान की कीमत अब एक हेडलाइन भी नहीं रह गई है। ये भी यह जो रियल प्रॉब्लम है ये इसकी वजह हमारी अपनी मुस्लिम इदारे हैं कि जो इतनी मैसिव यंग पपुलेशन है उसकी इमोशनल इंटेलिजेंस को या उसकी इस रिस्पांस को आप कंटेन नहीं कर पा रहे हैं। चैनलाइज नहीं कर पा रहे हैं। आप उसको इंस्टीट्यूशनल एक्सप्रेशन नहीं दे पा रहे हैं कि अब आप इस एनर्जी और इस फ्रस्ट्रेशन का करें क्या? तो जब आपके पास कोई डायरेक्शन नहीं होता है तो हत्ता आप भी रेडिकलाइज होगे। एक तरफ हिंदू यूथ रेडिकलाइज होगा तो दूसरी तरफ मुस्लिम यूथ रेडिकलाइज होगा और वो रेडिकलाइजेशन का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है। वो इस वजह से हो रहा है क्योंकि जब आप लिंचिंग करोगे तो किसी ना किसी तरह वो प्रोटेक्शन करेगा और उस प्रोटेक्शन का कोई आर्टिकुलेशन नहीं होगा। तो वो भी रिस्पांसिबिलिटी दो चैनल्स की है। आपको जो सेकुलर लिबरल पॉलिटिक्स है उसको मुसलमान को उसकी डिर्विंग स्पेस देनी पड़ेगी। विद इन मुस्लिम्स जो नए एक्सप्रेशनंस हो रहे हैं उनको उनको डिर्विंग स्पेस देनी पड़ेगी। तो ये रिप्रेजेंटेशन की लड़ाई अलग-अलग मरहले पे है। वो इंटरनल भी है, एक्सटर्नल भी है। बिल्कुल। और मुझे लगता है कि ये इतना वास्ट टॉपिक है कि हम उसे एक एक पडकास्ट में शायद उसको समेट नहीं सकते हैं। हम सबके ज़हन में अभी बहुत सारे थॉट प्रोसेससेस जो है वो घूम रहे हैं। वो थी कि इस वक्त तो सबसे ज्यादा नॉर्मेटिव रिप्रेजेंटेशन तो आरएसएस मुसलमानों को दे रहा है। एमआरएम वहां हिजाब भी है, टोपी भी है, दाढ़ी भी है, इमाम भी है। तो अगर यही रिप्रेजेंटेशन है तो मुझे बहुत मिल रहा है वहां पे। और अगर मैं अपनी बात नहीं रख पा रहा हूं। हां। मतलब आप उनकी तरह बनके तो आप इनकी तरह बनके आप हिजाब कर लीजिए। कोई दिक्कत नहीं है। वही वही बात है। शर्त तो यह है ना फर्क है। डिग्री का फर्क है। लेकिन आईडिया एट द कोर सेम है। कि ले डिग्री ऑफ इस्लामोफोबिया का फर्क है। इस सब में मिसिंग ये रहा कि हम शायद अगले अपने किसी पॉडकास्ट में जब इसी तरह की है तो ये स्क्वायर टेबल लेकिन ये रेक्टेंगुल क्या इसको बट राउंड टेबल हम बोले कि चादर गरीब मीडिया हाउस की डाइनिंग टेबल और उसी में हम खाना भी खाएंगे। जी बिल्कुल। तो ये भी खैर एकराज है जो अली ने जिससे पर्दा उठा दिया लेकिन अगर और मुझे लगता है इस तरह की राउंड टेबल्स की जरूरत है और जहां बॉलीवुड के उसके जरिए और उसमें भी जो खासतौर पर जो जो प्लेटफॉर्म्स हैं Netflix और इन तमाम जगहों पर जो बहुत इजीली एक्सेसिबल हैं वहां पर किस तरह से मुसलमानों के इर्द-गिर्द जो हेट है या इस तरह की फिल्म्स हैं या जो प्रोपेगेंडा है वो कितने इजी तरीके से एंटरटेनमेंट के जरिए परोसा जा रहा है और उससे भी कितनी साइकी जो है वह चेंज हो रही है और वह इफेक्ट हो रही है। आई थिंक उस पर भी बात करना बहुत जरूरी है। ऑफ कोर्स हम अगले पडकास्ट में इस पर बात करेंगे। लेकिन जाहिर सी बात है कि मुझे ऐसा लगता है कि शायद इस पॉडकास्ट के जरिए एक रोड मैप एक तस्वीर कम से कम हम कुछ हद तक पेश करने में हम शायद कुछ कामयाब रह पाए हैं। और यहां पर बार-बार फिर हम यही कहेंगे जिस तरह से असद ने भी कहा या अली और आदित्य भी बोल रहे हैं कि यहां पर हम किसी के खिलाफ यहां पर बात करने के लिए नहीं इकट्ठा हुए हैं। यहां पर जो मुसलमानों की मौजूदा सूरते हाल है, अह उसमें उनको किस तरह से अपने आप को प्रेजेंट करना है, उनको किस तरह की वोकैबलरी मिलनी चाहिए। उनका रिप्रेजेंट रिप्रेजेंटेशन किस तरह से हो वो अपने आप को किस तरह से पेश करें और कैसे जो इंस्टीटशंस हैं उनकी बिल्डिंग करें इस सब के इर्द-गिर्द हमारी बातचीत ज्यादा है। आई होप आप लोगों को पसंद आया हो। कोई क्रिटिसिज्म भी हो कोई भी हो तो कमेंट बॉक्स हमारा खुला है। आप उसमें जरूर अपनी राय जरूर दें और अपनी जुबान का भाषा का आप ख्याल रखते हुए अपने ओपिनियन आप जरूर दे सकते हैं। इसको शेयर भी आप ज्यादा से ज्यादा करें। ये आपका एक कंट्रीब्यूशन होगा। अगर वाकई में आप जो हमने बात की है उसको लेकर वाकई में अगर आप कुछ सोचते हैं या आपको लगता है कि इस तरह के इंस्टीट्यूशन या मीडिया हाउसेस की हमें जरूरत है
Companion article
Four journalists sat down for a Nous Podcast panel to ask a blunt question: after more than a decade of what they describe as escalating dehumanisation, do India's Muslims need media houses, think tanks and political institutions that are unambiguously their own? The host, Bushra Khanam Fahad, who spent nearly two decades in mainstream media before leaving it in 2019-20, opened by arguing that India's so-called mainstream media bears more responsibility for anti-Muslim sentiment over the past twelve years than the ruling Bharatiya Janata Party itself, because it functions, in her words, as journalism conducted "sitting in the government's lap." She was joined by Asad Ashraf, an independent senior journalist; Aditya Menon, Political Editor at The Quint; and Ali Javed, founding editor of Nous, who started the organisation while he was a student at Jawaharlal Nehru University during the protests against the Citizenship Amendment Act and National Register of Citizens. The conversation ranged from newsroom hiring practices to the political economy of Muslim organisations to the nineteenth-century Bengali novel that, the panel argued, still supplies the vocabulary of suspicion applied to Muslims today.
Menon set the terms early. Alternative media, he argued, exists in opposition to the BJP government, but when it comes to Muslims it suffers from two distinct problems. First, a representation problem: top editorial positions in most alternative outlets are held by upper-caste liberals rather than Muslims or people from oppressed castes, even though the majority of these platforms' YouTube-driven audience and revenue comes from Muslim viewers. Second, a framing problem: Muslims are seen through what he called a "limited gauge," reduced to victimhood, while the internal debates, pushback and diversity of opinion within the community rarely surface. "The alternative that was supposed to exist has not succeeded to that extent," he said of alternative media's failure to become a genuine substitute for the mainstream.
Ashraf agreed, adding a further layer: left-liberal discourse carries a reluctance to accept Muslim political identity on its own terms. A journalist who identifies openly with his community, he said, draws suspicion even from outlets that claim to defend minorities. Ashraf warned that when alternative media only makes space for Muslim voices who fit a predictable pattern, it replicates the very demand for conformity it criticises in Hindutva-aligned media — "that is setting up a dangerous precedent," he said. Real diversity, both agreed, meant welcoming Muslim voices that push back internally on caste, patriarchy and communal politics, not just voices that perform victimhood on cue.
The panel drew a distinction between two kinds of alternative-media actors: former mainstream journalists who broke away to start YouTube channels, some of whom had earlier supported the 2014 change of government or the Anna Hazare movement before growing disillusioned, and organisations built from scratch specifically to represent underrepresented communities. Menon argued that intent should matter less than current conduct: people should be judged by their present work, and if an outlet is now reporting honestly against majoritarianism, its past associations should not be held against it indefinitely.
Javed traced Nous's origins to a specific historical moment. As CAA-NRC protests convulsed the country and he was among students pursuing an MPhil at JNU, he said the group came to see history as a continuous negotiation between identities and ideologies — communities that remain internally distinct while sharing overlapping public space. He argued that post-independence India's structural inequalities in access to education and health meant the demographic majority built the institutions — media houses, the bureaucracy, hospitals — while Muslims did not build parallel capacity at the same scale. That gap, he said, allowed categories like "jihad" to expand almost infinitely in public discourse: first a discursive category, then attached to interfaith relationships ("love jihad"), then to public spitting, land disputes, and eventually corporate employment, with no organised Muslim institutional voice available to contest each new iteration as it appeared. He pointed to the 2022 hijab controversy as an example: when the question of whether the hijab was religiously "essential" reached the courts and media, no institutional Muslim voice existed with the standing to answer.
Fahad turned the conversation to recent state elections in Bihar and West Bengal, and to the Special Intensive Revision of electoral rolls (SIR), which risks stripping welfare benefits from voters — disproportionately poor Muslims — who fall off the rolls. She argued this has narrowed Muslim political demands to a single, minimal ask: physical safety. "Just let us live, let us survive, and we'll handle the rest ourselves," is how she characterised the prevailing mood, arguing that this defensive crouch has crowded out any sustained push for think tanks, institutions or independent media. Javed agreed that achievements since Partition — the Babri Masjid movement, the Shah Bano case, decades of incremental gains — remained incomplete without parallel gains in institutional representation and identity, and said Muslims bear some responsibility for not using the political space available even before the BJP's rise.
One of the panel's sharper arguments concerned power within Muslim institutions themselves. Javed said that Muslim organisations decades old, sitting on relevant human and financial resources, consciously sideline new intellectual and political formations emerging among younger Muslims, in order to protect their own control. "People are not ready to share power," he said, adding that sharing power requires sharing both human and financial capital — something established organisations resist, and in his observation, actively work against rather than merely withhold. He argued this internal hegemony, more than the BJP or Congress, is today the single biggest obstacle to institutionalising Muslim political and intellectual life, because a stronger, more organised community would produce leaders who challenge the existing mediator class. New, smaller outlets that do try to form, he said, often collapse under financial strain precisely because larger, established organisations decline to support parallel structures that might dilute their own hegemony.
Fahad connected this to uneven community mobilisation: enormous crowds gather for religious causes such as the Waqf Act protests, she noted, but comparable numbers have not turned out over the hijab issue or the near-daily incidence of lynching. Ashraf, pointing to community response after the 2015 Dadri lynching of Mohammad Akhlaq, recalled early symbolic protests — Eid black-band campaigns — that failed to sustain momentum, which he attributed partly to competition among community leaders unwilling to let a protest movement grow beyond their own reach.
The panel spent considerable time on the case of Nida Khan, a Muslim employee at Tata Consultancy Services in Nashik arrested over an alleged forced-conversion racket — a case both Ashraf and Menon said mainstream and even some ostensibly secular commentators found instantly credible despite thin evidence, coining it "corporate jihad." Menon argued that a basic journalistic instinct — asking for internal complaint records, email trails, verifying whether a low-level call-centre employee could plausibly coerce colleagues — was abandoned in the rush to believe the narrative. "Just do your job," he said, arguing journalists should investigate thoroughly and, if evidence supports the claim, report it — but should not skip the verification step simply because the accusation fits a pre-existing script.
Javed extended the point into a broader argument about vocabulary. He distinguished secularism from what he called secularisation: a process in which international funding structures — the World Bank, the IMF — shaped decades of alternative and liberal media around a narrow set of acceptable causes (ecology, LGBTQ rights, a single template of gender norms) while treating religious identity and spirituality as illegitimate or backward. He argued that this same "secular vocabulary," originally developed to marginalise all religious expression, has since been selectively weaponised by the BJP against Islam specifically, and that the psychological groundwork of twelve years of majoritarian narrative-building is what makes accusations like the TCS case instantly believable to a broad public.
A substantial section of the discussion turned to Asaduddin Owaisi and the All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen. Menon defended AIMIM's basic right to contest elections as legitimate political mobilisation, arguing Muslim political formations are reflexively branded "sectarian" or "separatist" because of an unexamined historical hangover from Partition — one he said should be discarded the same way Dalit political mobilisation, culminating in Kanshi Ram's Bahujan Samaj Party and Mayawati's chief ministership, is no longer treated as inherently separatist despite Dalits also being a minority.
Fahad pushed back, asking what tangible outcomes Muslim political mobilisation had actually delivered — noting AIMIM's five Bihar assembly seats in the 2025 election — and contrasted Owaisi's visibility with veteran CPI(M) leader Brinda Karat's widely photographed 2024 confrontation with bulldozers in Delhi. "Why don't we see them like that?" she asked, questioning why prominent Muslim political figures are rarely as visible resisting demolitions as they are in televised studio debates. Javed countered by arguing the comparison was unfair on its own terms: Owaisi is frequently present at both Waqf-related mobilisations and lynching sites, and singling out one high-profile case of allyship, such as Karat's, obscures the absence of similar visibility around the roughly one hundred lynchings that receive no comparable coverage. He argued the deeper problem is that Muslim political expression is evaluated only through the lens of Owaisi, rather than being allowed the same diversity of local, regional expression that Congress or the BJP enjoy.
Menon drew the sharpest historical comparison, tracing what he called the "hangover" of separatism accusations back roughly a century — arguing that the ideological architecture predates the RSS. He located the Hindu Mahasabha's late-nineteenth-century cow-protection agitations, the 1905 Bengal Partition-era Vande Mataram rhetoric, and violent akhadas as the true originators of the two-nation framework, which the RSS inherited "without that criticism" after Nathuram Godse's assassination of Gandhi diminished the Mahasabha's standing. He singled out Bankim Chandra Chatterjee's novel Anandmath, written while its author served as a British district magistrate, for erasing the historical role of Muslim fakirs who fought alongside Hindu sannyasis in the 1770s-90s Sannyasi Rebellion against British-induced famine, replacing them in the narrative with an oppressive Muslim nawab — a substitution Menon said laid the template for treating Muslims, rather than the British, as the primary long-term threat to a Hindu nation. By contrast, the panel held up Gandhi as a leader who, whatever his limitations, uniquely engaged Hindu spiritual and cultural expression from within a pluralist, negotiated framework — something Menon said no subsequent Congress leader, including Rahul Gandhi, has managed to replicate, leaving that ground open for Hindutva to claim uncontested.
Fahad asked Javed to distill the conversation into a practical roadmap, and he offered five areas of work that he said must proceed simultaneously rather than sequentially: building the vocabulary and confidence to respond to loaded questions about jihad or the hijab; presenting an accurate account of Islamic texts and history against distortion; building independent institutions; building independent media; and holding existing, resource-rich Muslim organisations accountable for what they actually deliver in exchange for community funding. He stressed this was not a checklist to complete in order but a long process requiring years of parallel effort, and cautioned that Muslim political mobilisation should not be read as hostility toward the Left, secular parties or Dalits — all of whom he described as allies — but only as a demand for a fair share, roughly proportionate to a 14 percent population, within a system all communities negotiate together. He was careful to distinguish these allies from Hindutva, which he said cannot be treated the same way because its political philosophy structurally excludes Islam by design.
Returning to newsroom practice, Menon and Fahad discussed the difference between symbolic and substantive diversity. Hiring a hijab-wearing presenter, Menon argued, means little if she is denied the freedom to choose her own stories and vocabulary; genuine diversity requires giving different perspectives real editorial latitude, not using them as a branding device for an outlet's own credibility. Fahad, drawing on her own reporting experience, described the instinctive self-censorship many Muslim journalists practise — hesitating over vocabulary for fear it will be read by editors as excessive advocacy — and criticised the common newsroom pattern of assigning Muslim reporters only to "minority" stories while barring them from covering finance, home affairs or Hindutva politics. She cited a documentary on the Karnataka hijab protests where a practising Muslim reporter's coverage foregrounded the protesting girls' courage and aspirations, in contrast to typical mainstream coverage — including, she noted, a prominent journalist's framing of Shaheen Bagh's women protesters as "stepping outside their homes for the first time," an assumption she said no one familiar with Muslim neighbourhoods, where women are routinely out late at night in safe communal spaces, would make.
Fahad offered the global response to Gaza as a contrast to the Indian situation: a broad, cross-religious wave of sympathy and protest was possible, she argued, largely because Palestinian journalists reporting from inside Gaza were simultaneously the story's subjects and its tellers, bypassing outside gatekeepers entirely. She said India lacks an equivalent capacity — not necessarily because the world is uninterested, but because Muslim institutions and media in India remain too underdeveloped to generate an unfiltered, first-person narrative at comparable scale.
The panel closed on an observation from Menon that stayed unresolved: the RSS-affiliated Muslim Rashtriya Manch currently offers Muslims perhaps the most "normative" representation available in Indian public life — visibly wearing the cap, the beard, the imam's bearing — even as it participates in a project many panellists see as fundamentally hostile to Muslim political autonomy. Javed's response was that adopting Hindutva's own visual grammar to gain acceptance is no different in kind from what Hindutva demands elsewhere, only differing in degree. All four agreed the discussion illustrated exactly the case for the institutions they had spent ninety minutes describing: without independent Muslim-run media, research bodies and political vocabulary, the community remains dependent on other people's narratives about it — sympathetic or hostile — rather than producing its own. The panel signed off proposing a follow-up conversation on how Bollywood and streaming platforms shape the same narrative terrain the discussion had just mapped.
56:39In the first episode of Emerging Perspectives, Sania Ismailee joins Wardah Beg for a conversation about the philosophical questions that lie beneath India’s debate on the Uniform Civil Code. For eight years, through her PhD research, Sania examined the UCC through the questions of secularism and …
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
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