Nous Documentaries· 09 Jun 2026· 26:21

“Allah Will Give Us Justice" — The Forgotten Widows of Delhi Pogrom 2020 | Full Documentary

"Allah Will Give Us Justice" — that's what the widows of the Delhi Pogrom 2020 told us, five years after losing their husbands to one of independent India's most devastating episodes of communal violence.

Full Transcript

कभी सोचा है कैसा होता है वो सन्नाटा जो चीखों के बाद बजता [संगीत] है? जब एक औरत की आंखों के सामने उसकी पूरी दुनिया, उसका हमसफर, उसका सहारा नफरत की बेरहम भीड़ छीन लेती है। और जिस वक्त पर बीती है ना वो हमेशा याद रखते हैं। जब रात को लेटो एक बात याद आती [0:43] है, सारी रात में भी चली जाती है। उसकी आंखों के सामने उसकी पूरी दुनिया उजड़ जाती है। बच्चे बहुत टूट जाते हैं मेरे। अब जैसे ईद आ रही है [नाक से की जाने वाली आवाज़] बहुत याद करेंगे। बच्चे जो अभी [संगीत] समझ भी नहीं पाए थे कि हुआ क्या। उनकी जिंदगी उसी पल हमेशा के लिए बदल जाती है। और वजह सिर्फ एक पहचान मुसलमान होना। [1:29] फरवरी 2020 दिल्ली की तारीख का वो काला दिन वो खौफनाक मंजर जिसने हमेशा के लिए बदल दी दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट इलाके की [संगीत] तस्वीर। 23 फरवरी 2020 नॉर्थ ईस्ट दिल्ली को तीन दिन तक कम्युनल नफरत की आग में झोंक दिया गया। 53 जिंदगियां गई। 18 मस्जिदें जली घर, दुकान, स्कूल सब जलकर राख हो गए। [2:05] और हमेशा के लिए टूट गया भरोसा। प्रशासन से, पुलिस से, सरकार से, परिवार की तरह रह रहे पड़ोसियों से और अपने ही मुल्क में रह रहे अपने ही मुल्क से। आज 6 साल बाद मैं एक बार फिर से इन्हीं गलियों में मौजूद हूं। इन गलियों में अजीब सा सन्नाटा है। लेकिन यह सन्नाटा उन चीखों को छिपा नहीं पाता। यह खामोशी उस दर्द के समंदर को ढक नहीं सकती। [2:43] मल्लिका के लिए उस रात पड़ोसी लव्ज हमेशा के लिए मर गया। वह बताती हैं कि उनकी गली का मेन गेट एक हिंदू पड़ोसन ने ही बंद किया था। 200 से ज्यादा दंगाई हथियारों के साथ उनकी गली में घुसे। भीड़ को इशारा करते हुए यह कहा गया कि एक मुल्ला यहां छिपा है। तो शाम को 5:00 बजे छुट्टी हो रहे थे तो सब करे लड़ाई दंगा चालू लड़ाई हो रही हम आराम से अपना घर में रही घर में रहे थे [3:13] वहां से जो सपना करा लेडी एक नाम है हिंदू है वहां पे किराए पे रह रही थी तो सपना उस तो उन्हें क्या करा मेन जो गेट है रोड पे जो मेन गेट है उनमें ताला लगा दी अंदर से तो वहां पर किसी को हाथ में छरिया किसके हाथ में डंडे जंजीर इतना लंबा लंबा तुरवाल तो हम खिरकी से खड़ा होकर जैसे आपके सामने बैठे हैं ऐसी खिरकी से सब कुछ देख रहे थे कैसे मार रहे थे कैसे क्या कर रहे थे सब [3:43] कुछ मैंने खुद आंखों से देखा है आपने अपने शौहर को मारते हुए देखा मैंने आंखों से तो उसके बाद क्या करा तो कह रहा है उसको तो मारा उसको व मार दिया इनका सरिया तो उसके बाद उनको पेड़ पकड़ लिया था मेरा आदमी ने। भाई मेरी तो कोई गलती नहीं है। मैं तो रोज का कमाने वाला हूं। रोज का खाने वाला हूं। तो मुझे छोड़ दो। मैं तुम्हारा भाई हूं। तो वैसे एक गाली दिया था हिंदू ने मुल्ला। [4:14] आज तू भाई बता रहा है। आज मुल्ला भाई बता रहा है। तू हमारे आदमी को जब वो सिर पे जब मारा था तो जीना पीछे सामने वाली गेट से नहीं है। पीछे वाली गेट से लेके गई। जिन्ना पे पैर पकड़ के कि एक एक दो [संगीत] जने तो पैर पकड़े दो जने हाथ पकड़े दीवार पे मारते मारते लेके गई ऐसे करके ऐसेसे कर करके जिन्ना से उतर रहे थे दीवार पे मार रहे थे और आप देख रही [संगीत] हम देखी हैं मलिका के पति मुशर्रत को पहले सरयों से पीटा गया फिर दीवारों से उनका सर [4:45] मारा गया और जब वह लहूलुहान होकर जमीन पर गिर पड़े तो उन्हें सीढ़ियों से घसीटते हुए नीचे लाया गया जिंदा आग में झोंक दिया गया और फिर नाले में फेंक दिया क्या कह रहा टीवी चले जावी में जीटीवी चली गई उस टाइम मेरे साथ में कोई भी नहीं था ना बच्चा भी था ना कोई भी नहीं था मैं अकेले थी जीटी गई पांचप महीने के बच्चे की सिर फूटी पड़ी है किसी का जुबान बाहर है किसी का गर्दन कटा हुआ है किसी का हाथ कटा हुआ है किसी का [5:17] हमारे आदमी को उसमें रखने के लिए जगह नहीं था एक कपूर एक एक के ऊपर एक एक को पूरा मुर्दा है कहां तक कितना मेरे आगे चक्कर मैंने वो देखते मैंने भाग के बाहर आ गई और दोबारा हिम्मत करके अंदर गया एक एक आदमी था वो भी गया जाने के बाद तो उनके पूरे बदन पे गबर मबर मट्टी मुट्ठी किचन मिचर [संगीत] सब लगा हुआ था उनका तब [5:47] बोले ये है मेरा आदमी ऊपर वाला का मर्जी है वही ऊपर वाला साथ देता है सब कोई साथ नहीं देते। उस एक रात ने मल्लिका से उनका सुहाग, उनके बच्चों से उनका बाप और एक पूरे परिवार से उनकी दुनिया छीन ली। हमने उनके पैर भी पकड़े। हमने कहा हमारे पापा को मत मारो छोड़ दो। हम रोए थे उनके पैर पकड़ के। लेकिन उन्होंने लात मार के हमें साइड हटा दिया कि तुम लोग हट जाओ वरना तुम्हें भी मार देंगे। अब हम अकेले [6:17] इतने सारे 200 250 लोगों की भीड़ को हम चार पांच जने कहां क्या कर सकते हैं। बहुत दिल रुक जाता है। बहुत दिल फट जाते हैं मेरे को। जब मैं इन तंग गलियों से गुजरती हूं तो ऐसा लगता है जैसे वक्त यहां आकर ठहर गया है। और सही मायने में ठहर ही तो गया है वक्त उन औरतों के लिए जिनकी जिंदगियां हमेशा के लिए तबाह बर्बाद कर दी गई। पल भर में जिनसे उनका सब कुछ छीन लिया गया वो [6:47] ख्वाब भी जो शायद अब कभी पूरे नहीं होंगे। नरगिस उस वक्त प्रेग्नेंट थी जब फरवरी 2020 की हिंसा ने उनके शौहर मुरसलीन को उनसे हमेशा के लिए छीन लिया। 21 फरवरी को वो रोज की तरह काम पर निकले थे। लेकिन फिर कभी वापस नहीं लौटे। नरगिस इंतजार करती रही। दरवाजे की हर आहट पर चौंकती रही। लेकिन लौट कर सिर्फ उनकी मौत की खबर आई। तो मेरे से बगैर बताओ आ गए। फिर 3 बजे [7:17] 3:30 बजे किसी ने बताया हमारी पड़ोसन ने वहीं के दिल्ली में बहुत ज्यादा दंगे हो रहे हैं। झगड़ा हो रहा तो मेरा जी परेशान सा मैंने कॉल करी। मैंने देखो पता नहीं कहां गए। मैंने कॉल करी तो उन पर कॉल जाती रही। फ़ ही नहीं उठाया। ऐसे ही पूरी रात हो गई। पूरा दिन मतलब आधा दिन वो चला गया। पूरी रात हो गई। फिर हमने दो दिन तलक ऐसी ट्राई करते रहे। फोन जाता रहा। तीसरे दिन स्विच ऑफ हो गया। को कोई कॉल वोल कुछ नहीं दरोगा ने हमें बुलाया हम फिर थाने गए थाने में से हमें दरोगा जी टीवी ले गया फिर हम [7:48] जी टीवी पहुंचे तो बस जी टीवी में थे वे तो जी टीवी में थे मतलब मैं तो ज्यादा से देख भी नहीं पाई थी चक्कर आंखों के आगे अंधेरा और बेहोश हो गई थी कुछ देखने की टेंशन हो रही थी बहुत फिर देखा तो एकदम ऐसा देखा बस उनके कोख में तो गोली मार रखी थी और पेट में तलवार मार रखी थी। होठ भी काट रखा था उनका। बहुत भयानक कर रखा था। उनके सिर में भी बहुत बजा रखा था। खून ही [8:19] खून था। सर में भी चेहरा तो उनका कालसिया हो गया था। लेकिन फिर भी मैंने पिछान उनकी कर ली थी क्योंकि उनके सीधे पैर का अंगूठा कटा हुआ था। इससे पहले बहुत बुरी हालत थी कि देखा नहीं जा रहा था। इतनी बेदर्दी से मार रखा था उनको। यहां को इधर गोली थी। इधर से यहां से मुंह [संगीत] लेकर तलवार मार रखी थी। यहां पे होठ तलवार से काट रखा था। सिर में गन बजा रखी थी। सब फूटा पड़ा था सब कुछ। मतलब इतनी बुरी हालत थी कि आपको पहचानना [8:49] मुश्किल हो रहा था। जी पर कुछ पहचान तो लिया था मैंने। एक झलक में पहचान लिया था कि हां यही है। कितनी जिंदगी बदल गई आपकी तब से अब तक? मेरी तो सारी बदल गई। मेरी तो जिंदगी में बस यह है कि बच्चे हैं। के इन बच्चों की वजह से मैं जी रही हूं। और नहीं मेरा तो कुछ भी नहीं है। कोई दूर से दूर तक भी अपना नजर ही नहीं आता। कुछ हो जाता था तो एकदम लेके चल दे थे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] और अब तो कुछ हो भी जावे तो पड़े रहो। कोई पूछने वाला नहीं, कोई ले जाने वाला नहीं। कुछ नहीं। [9:27] तो जब आप बहुत परेशान होती हैं, दिल घबराता है आपका और कुछ समझ नहीं आता। तो फिर किससे बात करने का दिल चाहता है? किससे बात करती हैं? मैं तो पागल सी हो जाती हूं। थोड़े देर घंटे तो मैं बहुत ज्यादा पागल सी हो जाती हूं। जब मैं ऐसी हो जाती हूं उनकी याद आती है मुझे बहुत कि टाइम नहीं कटता जी नहीं लगता, दिन नहीं लगता। बहुत ज्यादा बेचैनी सी हो जाती है। छ साल बाद भी नरगिस की जिंदगी वहीं अटकी हुई है। शिवहार की तंग गलियों में वो तीन बच्चों को पाल रही हैं। छोटे-मोटे काम [9:57] करके घर चलाती [संगीत] हैं और हर दिन उस सदमे के साथ उठती हैं जो कभी गया ही नहीं। सबसे गहरा दर्द उनके बच्चों की आंखों में है। नरगिस कहती हैं कि उनकी बेटी हिजा आज भी रातों को अपने अब्बू को याद करके रोती है। उस बाप को पुकारते हुए जिसे वह कभी जान ही नहीं पाई। [संगीत] [10:27] जाहिरा कभी उन औरतों में थी जिनकी दुनिया छोटी थी मगर पूरी थी। शौहर था, बच्चे थे, छोटे-छोटे सपने थे। और एक ऐसा घर था जहां माली तंगी थी लेकिन मोहब्बत की कमी नहीं थी। दिल्ली दंगों ने जाहिरा से सिर्फ उनका शौहर नहीं छीना। उनके बच्चों से बाप का साया, घर से सुकून और जिंदगी से यकीन भी छीन लिया। बस अभी जिंदगी ऐसी चल रही है कि बड़ा लड़का काम कर रहा है और घर में हम मां बेटियां काम करते हैं। कितने बच्चे हैं आपके? चार बच्चे हैं। [10:57] और कितनी लड़कियां हैं? कितनी लड़के? दो बेटे हैं, दो बेटियां हैं। तो आपको कैसे पता चला कि वहां पर दंगे हो रहे हैं? मतलब दंगों का तो पता था कि दंगे तो शायद सबको ही पता था कि दंगे हो रहे हैं दंगे। तो फिर इसके पापा जो है ना इसके अब्बू यहां आए हुए थे। मतलब मेरी अम्मी को ही देखने आए थे। फिर उसके बाद में वो दो-तीन दिन जैसे दंगे हो रहे थे तो फिर गए नहीं थे। फिर जब वो उस दिन शाम में जब अमन शांति सी हो गई तो जब वो यहां से निकले थे। ये सोच के कि अब सब कुछ ठीक हो गया। हां अब सब कुछ ठीक हो गया। तो फिर वो जब [11:27] जहां तड़क भी पहुंचे होंगे मतलब मैं फोन भी मैं भी कर रही थी वो जब तड़क तो मिलता रहा फोन उसके बाद में उनका फोन मिलना ही बंद हो गया था फिर वो मतलब हमारे व मुस्तफाबाद में कोई एक जाने वाले हैं उसके पास उन्होंने फोन करा था हम आपके शौहर ने फोन किया था उनको जी जब वो मतलब इर्दगिर्द में फंसे हुए थे हम तो उन्होंने फोन करा क्या बोला था उन्होंने फ़ उन्होंने फोन करके ये बोला था कि वो वहां पे मैं यहां फंस चुका हूं उससे जो भी उससे बोला मैं यहां फंस चुका हूं। अब बस देखो [11:59] जो भी होगा वो दो एक ही बात कर पाए थे उससे तो उसके बाद में कॉल कट गई थी। कैसे पता चला था आपको उनके बारे? तो फिर फोन करा था ना हमने तो कॉल नहीं लगी थी। फिर उसके बाद मेरे ससुराल वालों के पास भी खबर पहुंच गई थी कि इस तरह से वहां वहां से मेरे पास भी फोन आया। मैंने भी उन लोगों के पास फोन करा। तीन दिन हो गए थे हमें ढूंढते-ढूंढते। कहीं कॉल ही [संगीत] नहीं कुछ पता ही नहीं चल रहा था। फिर बाद में ये हुआ कि जो भी नहीं मिल रहा है ना वो Zee टीवी में जाके देखो। घायल भी वहीं मिलेंगे और मरे हुए भी वहीं मिलेंगे। फिर जब वो Zee टीवी में जाकर [12:29] ढूंढा तो फिर वहां [संगीत] पे इनके वो मिली थी लाश। तो आप तीन दिन तक ढूंढ रहे। तीन दिन तक ढूंढ रहे थे। हम सोच रहे थे कि मतलब कहीं क्या कहीं छुप गए हो या कहीं पुलिस पकड़ के ले गई हो इस तरह के मतलब सोच सब तरफ जाती है और ढूंढ सब रिश्तेदारों में यारों में दोस्तों में सब तरफ कॉल कर ली थी। कहीं पता नहीं चला था। [संगीत] फिर जब वहां जाकर देखा तीसरे दिन जब वहां लाश किस हालत में थी? मतलब दासी में थी कि वहां से जो जिन लोगों ने निकाला होगा मतलब नाले के नाले में ऐसा निकाला था जैसे कि उस पे भी मट्टी भूस ये सब चीजें मतलब [13:02] गंदगी लगी हुई थी तकलीफ होती है सोचती [संगीत] है इस बारे में तो बताओ जिसको लगी पता होगी कितनी तकलीफ झेली होगी उन्होंने हमें इतनी सी लग जाए हमें कितनी तकलीफ होती है ये तो मार खाने वाले को या जाने वाले को पता है कि बेचारे कितनी तकलीफ झेल झेल के गए होंगे कैसे मारा होगा उन्होंने कम वक्तों ने मगर जिसके ऊपर बीती है ना वह हमेशा याद रखते हैं जब रात को लेटो जब बात याद आती है सारी रात में भी चली जाती है [13:33] बस साथ मतलब साथ कौन देने वाला देने वाला तो अल्लाह है साथ हम तो अल्लाह से ही मांगते हैं जो भी [संगीत] कुछ मांगते हैं अब ऐसा साथ देने वाला तो खैर तुम्हें पता ही है सब सुख के साथ ही होते हैं दुख का तो कोई नहीं होता दुख में तो और पल्ला झाड़ [संगीत] के पीछे हो जाते हैं जायरा के आंसू थमने का नाम नहीं लेते हैं। हर दूसरी बात पर वो अपने शौहर को याद करते हुए फूट-फूट कर रोने लगती हैं। मानो उनकी जिंदगी फरवरी 2020 से कभी आगे बढ़ ही नहीं [14:05] पाई। जिस औरत ने कभी अकेले घर से बाहर कदम नहीं रखा था। आज वही घर की रखवाली भी कर रही हैं। रोजी भी कमा रही हैं। मां भी हैं और अपने बच्चों के लिए बाप भी बन चुकी हैं। यहां की दीवारें आज भी गवाही दे रही हैं। जले हुए दरवाजे, भागते हुए कदम, चीखते हुए बच्चे, दहाड़ती हुई माएं। यहां आज भी आपको हर कदम पर, हर गली पर एक दर्दनाक दास्तान [14:35] देखने के लिए मिल जाएगी। जब वो दूसरों के को देखते हैं। हां। [संगीत] तो जब ज्यादा बच्चे याद करते हैं कि हमारे अब्बू होते तो हमें भी ऐसे प्यार करते। हमारे अब्बू होते तो हमें भी ऐसे गले से लगाते। तो दूसरों को देख के मतलब बच्चों के दिल में एहसास होता है। बच्चे बहुत याद करते हैं। बच्चे बहुत टूट जाते हैं मेरे। अब जैसे ईद आ रही है। बहुत याद [संगीत] करेंगे। बच्चे क्या सोचते हैं? बच्चे तो बस ये [15:07] सोचते हैं कि आज हमारे अब्बू होते तो हमारे साथ यह होता। आज हमारे अब्बू होते तो हम ऐसे होते। हमारे अब्बू होते तो यह हो जाता। बस बच्चे तो अपने बाप को याद करते हैं ज्यादातर। जब महसूस हो जाता है जब बच्चे की [संगीत] बच्चे हैं ये बच्चे हैं वो दूसरी के बच्चे जाओ सामने आ जाते उसके बाप आ जाते हैं भागते फिर पापा आ गई पापा चीज दे दो बच्चे दुकान है सामने आपने देखा है और दूसरी बच्चा अपना बाप को बाप कहता है बाप का [15:37] प्यार मैं दे सकती हूं नहीं दे सकती बच्चों के आगे [संगीत] नहीं रो सकते क्योंकि बच्चों को फिर एहसास होता है बच्चों का दिल दुखता है अकेले में तो इंसान रोता ही है फिर रात में बैठ [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपको अपने शौहर की कितनी याद आती है? आपको पर पता है ऐसे तन्हाई क्या चीज होती है? बीवी हूं मैं इनकी। जी याद तो बहुत आती है। कोई दिन, कोई मिनट। [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोई पल [16:07] जाता ही नहीं मेरा। देखो इतने दिन हो गए लेकिन मैं अभी तक भी बोलती ही नहीं हूं ना। क्योंकि इनकी हर बात मुझे याद आती है। आपके जख्म बिल्कुल वैसे [संगीत] ही हैं। छ साल होने जा रहे हैं। लोगों को तो यह लगता है कि शायद [संगीत] लोगों के जेहन से वो तस्वीरें शायद धुंधली हो रही हैं या लोगों के शायद अब उस बारे में इतना सोच नहीं रहे। लेकिन देखो लोग नहीं सोच रहे होंगे। हम्। मगर जिसके ऊपर बीती है ना, वह हमेशा याद रखते हैं। जब रात को लेटो, जब बात याद आती [16:38] है, सारी रात न्यू चली जाती है। एक घर के दायरे में रही शौहर के मरने के बाद दे वर दे केम इंटू एन ह्यूज आई मीन आई वुड [संगीत] से क्यूट फाइनेंसियल क्राइसिस। तो उनके लिए बहुत परेशानी का सबब था। पहला तो इस रियलाइज कर पाना कि उनका शौर अब नहीं है। क्योंकि मुस्लिम सोसाइटीज में या जो सोसाइटी में हम रहते हैं औरत का एक्सिस्टेंस शादीशुदा औरत का एकिस्टेंस एक मर्द के साथ अटैच्ड है। तो जैसे ही मर्द नहीं है तो औरत के लिए एक तो एकिस्टेंशियल क्राइसिस है। ये समझना एक्सेप्ट कर पाना। दूसरा बच्चों की फी, घर [17:10] के खर्च, अखराजात बहुत सारी चीजें हैं जिसको मैनेज करने की जिम्मेदारी एंटायरली में एक ऐसी हाउसहोल्ड के मेंबर पे आएगा जो पहले जिम्मेदारियों से इस जिम्मेदारियों से फ्री थी। [संगीत] तो उनकी मेमोरी में कलेक्टिव मेमोरी में ये जो डार्क चैप्टर्स है हेट का वायलेंस का ट्रॉमा है अपने शौहर क्लास देखने के लिए तो वो अभी भी वो पूरा ट्रॉमा एक लिव्ड एक्सपीरियंस है जो उनकी लाइफ में इमाइब्ड हो गए हैं। वो 6 साल बाद 6 महीने बाद 60 साल बाद भी मुझे नहीं लगता किसी भी किसी भी तरीके से खत्म होगा। ये इन सब फैमिलीज़ [17:41] के लिए एक सबसे बड़ी क्राइसिस थी अपने शौहर के जाने के बाद एक्सेप्टेंस। दूसरा था कि एक डिग्निफाइड लाइवलीहुड क्रिएट करना। क्योंकि अगर इन सारी फैमिली को देख तो ऑलरेडी ये बहुत ही मार्जिलाइज सेक्शन सोसाइटी में है। शौहर के जाने के बाद छोटे-छोटे खर्च इनफैक्ट बच्चों की स्कूल की फी घर के राशन की को परचेस करना घर में कोई बीमार हो गया उसकी जिम्मेदारी तो यही छोटी-छोटी चीजें थी जो उसमें इनके लिए बहुत बड़ा क्वेश्चन था किसके सामने हाथ फैलाएं। बहुत सारी फैमिली थी। आधी नहीं थी [18:11] इन सब चीजों की। तो कई कई फैमिली की उनकी अपनी अब्बा ने अम्मा ने या उनके भाइयों ने सपोर्ट किया। कईयों के सासससुर ने सपोर्ट किया। लेकिन ये सपोर्ट सिस्टमकि एक ऐसी कम्युनिटी से हैं जो खुद में गरीब हैं। तो जो उनका सपोर्ट सिस्टम है वो भी गरीब हैं। तो बहुत लॉन्ग रन तक कोई इनको फाइनशियली सपोर्ट नहीं कर सकता था। तो छ महीने साल भर बाद इनफैक्ट जब कोविड का सेकंड वेव खत्म हुआ उसके विद इन थ्री सिक्स मंथ इन्होंने रियलाइज कर लिया कि वो बहुत ही सीवियर फाइनेंसियल क्राइसिस में है। गांठ पर गया हाथोरा चला चला के। हाथरा [18:42] हाथरा से काम करती हूं। अच्छा हाथरा चलाती हूं। आग में ऐसे हाथ जल जाते हैं हाथ में जैसे भट्टी होती है ना भट्टी में शोल्डर निकालनी पड़ती है उसमें हाथ लगा के ऐसे पकड़ के काम करनी पड़ती है हाथ भी जल जाते हैं सारे हाथ जले पड़े हैं इतना मुसीबत में काम करती हूं मैं इनसे क्या पूरे दिन काम करके महीने पे ₹6000 ₹6000 में बताइए आप घर कैसे चलाएंगे हम और एक दिन की भी छुट्टी एक दिन भी छुट्टी ना एक दिन छुट्टी [19:12] हां एक भी दिन छुट्टी होगी तो वो पैसे काट लेंगे पैसे काट लेंगी वो काट कूट के महीना फिर 3000 ₹000 महीना पड़ रहा है। आज छुट्टी नहीं करेंगे तो पूरा ₹000 आ जाता है हाथ में तो बीमारी होती है। बीमारी भी हो जाती है। तबियत खराब हो जाते हैं। केस किया है आपने कोर्ट में? केस वकील आया था तो केस डाला था उसमें कोर्ट में। तो केस तो वैसे चल भी रहा था। तारीख में बुलाते थे वे हर बार। यही पूछताछ करते थे [19:44] कि तुम्हारा दुश्मन कौन था? जब हमें दुश्मन का पता ही नहीं कौन था अगर दुश्मन का पता होता तो हम नाम से पहले लिखवा देते जब हमें कुछ पता ही नहीं किसने उन्हें मारा कौन हमारा दुश्मन था कि ऐसी बेदर्दी से किसने बुरा हाल करा मुझे कुछ नहीं पता हमें तारीख को बुलाते थे हर बार हमारे ससुर की तारीख लगी हुई थी तो हमारे ससुर का इंतकाल हो गया फिर मेरे बच्चे छोटे-छोटे थे सुबह से शाम हो जाती है कोर्ट में जाने से तो मैं उस दिन कह ही आई थी के जब तुमसे कुछ नहीं हो रहा था मैं [20:14] तारीख पे नहीं आने के लिए हम तो केस लड़ रहे हैं। हम तो केस कर दिया। हमारी दो बार गवाही हो गई। पैसा नहीं तीन चार बंदे को पैसा लिया था मैंने। व कोर्ट में बंद करा दिया। कट कर दूंगा मैं। तो वो जो तीन चार बंदे हैं वो अभी जेल में है वो। हां हम तो बंद करा दिया। अभी ये नहीं पता अभी जेल में है ना। उसके बाद हमारे पास ना कोई फोन आया। जब जब गवाही हुई है। एक बार फोन आया था मेरे बच्चे की गवाही के फोन आए थे। तो दिल्ली पुलिस जब खुद इस पूरे [20:45] राइट्स में एक पार्टी की हैसियत से इंगेज है तो आप यह कैसे एक्सपेक्ट कर सकते हैं कि दिल्ली पुलिस एक ऐसी इन्वेस्टिगेशन करेगी जिसमें वो लोगों को सजा दिलाएगी। तो दिल्ली पुलिस तो खुद इसमें दंगा करने वालों में और कराने वालों में शामिल थी। हम मैं कोई दब के छुप के बात नहीं कह रहा हूं। तो आप ये देखेंगे कि दिल्ली पुलिस का सारा जोर उस पे है कि जो लोग फाल्सली इंप्लिकेट किए गए हैं। कई सारे केसेस हैं जो अपने आप में नजीर बनेंगे बने हुए हैं इस बार में। सिर्फ एफआईआर 59 की बात नहीं [21:17] है। दूसरे तमाम केसेस हैं उनको वो निकलने नहीं देना चाहते। लेकिन जो एक्चुअल प्रोपरेटर हैं जो लोग मारे गए हैं उनको कौन आके मार गया उनके बारे में कोई बात करने को तैयार नहीं है। तो दिल्ली पुलिस का कोई इन्वेस्टिगेशन नहीं है। सिर्फ झूठी कहानी 59 और दूसरे केसेस में है। दिल्ली पुलिस खुद दंगा करने में शामिल थी। जब हम 1984 के जो दंगे हुए थे जब हम उन कॉलोनीज में जाते हैं वहां जब लोगों से हम बात करते हैं वो बहुत ऑर्गेनाइज लगती है। एक-एक चीज एक-एक पेपर वर्क उनके पास फोटोग्राफ्स तमाम चीजें उनके पास मौजूद [21:49] होती हैं। लेकिन जब हम यही चीज जब हम दिल्ली दंगों में जाकर उन विक्टिम से जाकर बात करते हैं या जब उनसे मिलते हैं तो मुझे वो चीजें उतनी ऑर्गेनाइज नहीं नजर आती। बिल्कुल ऐसा लगता है किसी को केस में इंटरेस्ट नहीं है या या उनका मेरे ख्याल से इकोनॉमिक बैकग्राउंड उस तरह का है या फिर उनकी कोई पॉलिटिकल एजेंसी नहीं है अ जिसकी वजह से होता है। तो ये फर्क जो जो दिखता है कि इतने साल के बाद भी यू नो दे स्टिल हैव द पॉलिटिकल एजेंसी। लोग अभी भी जाकर उनके बारे में बात करते हैं। अभी भी उनकी से है। लेकिन वही सेम चीज वहां नहीं [22:21] हमें नजर आती है। देखिए एक तो डिफरेंस ये है जैसे मैंने कहा कि 90% इन पूरे केसेस में जो विक्टिम्स थे वो बिलो पावर्टी लाइन थे। जाहिर सी बात है बिलो पावर्टी लाइन होंगे तो अनएजुकेटेड होंगे। तो दोनों चीजें थी। फिर जो यह पॉलिटिकल एनवायरमेंट बिल्ड अप हुआ है तो उनको लगता है कि अब जो हमारा बचा हुआ है इस पूरी लड़ाई में कहीं वो भी हमारे हाथ से नहीं निकल जाए और जाहिर सी बात है कि इस पूरे सेटअप में जब इतना बड़ा वायलेंस आप 1984 के बाद सिख कम्युनिटी ने कोई [22:52] वायलेंस नहीं देखा है। बट ईच एंड एवरी डे वी आर फेसिंग डे टू डे एज अ एज अ एपीसीआर वेयर वी आर वर्किंग। तो वहां पर हम तकरीबन 2700 केसेस देख रहे हैं जो हमारी हैसियत से ज्यादा हैं। लेकिन रोज केसेस इनक्रीस हो रहे हैं। तो जाहिर सी बात है कि जिस लेवल का अटैक है जिस लेवल का ऑर्गेनाइज सिस्टमैटिक अटैक हिंदुस्तानी मुसलमानों पर है। मुसलमानों की हैसियत उस लेवल के रिसोंड मैकेनिज्म की नहीं है। ये तो बात बहुत सीरियस बात है और आप जाहिर [23:24] सी बात है कह रहे हैं कि कोई ढकीर चिपकी बात नहीं है। मेरा सवाल यह है तो फिर इंसाफ आखिर इन लोगों को मिलेगा कैसे? क्योंकि आप यह कहें कि सरकार ने कुछ लोगों को ₹1 लाख दे दिए मुआवजे के तौर पर या कुछ एनजीओस हैं वो उनकी मदद कर रहे हैं। लेकिन शायद उनके दिल [संगीत] को तसल्ली तो तब मिलेगी जब वो अपनी आंखों से उन लोगों को के साथ भी वो होता देखेंगे जो उनके उनके साथ हुआ है। इस इंसाफ की लड़ाई की बात करें। इंसाफ की लड़ाई में एक आदमी जो टिपिकल लोअर मिडिल क्लास है। सारे लोग वैसे ही हैं। आपने [23:54] मुझसे ज्यादा कवरेज करी है। आपको बेहतर अंदाजा है। वो सारे लोअर मिडिल क्लास हैं। आप उनसे एक्सपेक्ट करते हैं कि वो उस दिन ऑफिस नहीं जाए और कोर्ट में आकर दिन भर बैठे रहें। अपनी तारीख का इंतजार करें और उस तारीख का जिसमें कुछ भी नहीं हो रहा। तो हमारे साथ इंसाफ नहीं हुई। बेईमानी हो रही है। अल्लाह माफ ना करेंगे। इंसाफ की तो यह उम्मीद ही छोड़ रखी है मैंने कि इंसाफ तो बस अल्लाह ही करेगा क्योंकि देखो जब कोई हमारे दुश्मन नहीं था [24:24] कोई हमारा हमें हम किसी को जानते नहीं हमें ये नहीं पता कि ना उन्हें मारा है तो ऐसे तो किसी को मैं फसवा नहीं सकती ना ही [संगीत] किसी का ऐसा नाम ले सकती ना ही हमारे घर कुट में कोई ऐसा दुश्मन था ना ही रिश्तेदार में था ना ही मोहल्ले पड़ोस वाला था कोई भी तो ऐसे किसी का नाम नहीं ले सकती बस अब तो मैंने अल्लाह के ऊपर छोड़ दिया कि अल्लाह ही इंसाफ करेगा उनका भी जिसने मैंने मारा। मुझे जिन्होंने मेरे पापा को मारा है उनको भी सजा होनी चाहिए। मिलना चाह रही हूं मेरे साथ इंसाफ हो। अगर वो लोग इंसाफ नहीं [24:55] कर सकते ना तो हम लोगों को भी मार दें। इतना चाहती हूं मैं। या तो इंसाफ कर दें। अगर इंसाफ नहीं कर सकते तो फिर हम लोगों को भी मार दें। जिनका कोई कसूर नहीं था। हम लोग दर-दर ठोक रहे खा रहे। दूसरों के आगे हाथ मिला रहे हैं। जिन्होंने मारा वो लोग खुलेआम यूं ही घूम रहे हैं। ऐशो आराम की जिंदगी जी रहे हैं। हमारा तो कोई कसूर भी नहीं था। ना हम हिंदू मानते ना मुसलमान हम सबको एक जैसा ही मानते हैं। तो इंसान [25:30] आज कैमरे के [संगीत] सामने हम आपको इन तीन औरतों की दर्दनाक दास्तान सुना पाए। क्योंकि इन्होंने कैमरे के सामने आना कुबूल किया। लेकिन यह सिर्फ तीन दास्ताने नहीं है। यह आईना है उस नाइंसाफ [संगीत] सिस्टम का जो 6 साल बाद भी इंसाफ नहीं दे सका है। यहां 18 और विडोस हैं। 18 और नाम, 18 और जिंदगियां, 18 और उजड़े हुए घर जो अटक गई हैं 23 फरवरी 2020 में बेशुमार सवालों के [26:00] साथ इंसाफ के [संगीत] इंतजार में। ओम

Companion article

Three Days That Remade Northeast Delhi

On 23 February 2020, communal violence erupted in Northeast Delhi and burned for three days. By the time it subsided, 53 people were dead, 18 mosques had been set alight, and homes, shops and schools across the district's working-class neighbourhoods had been reduced to ash.

Six years on, a documentary crew returned to the same lanes and found them unnervingly quiet, a silence that, as the film's narration puts it, cannot hide the screams that came before it. Behind that quiet are women whose husbands did not survive those three days: widows who watched the men they had built their lives around dragged from their homes and killed in the street, and who have spent the years since raising children alone, chasing court dates, and waiting for a state that has yet to answer for what happened.

Three of them agreed to speak on camera: Mallika, Nargis and Jahira. Their testimonies, and the wider reckoning the film sets alongside them, form the record that follows.

Mallika: “I Saw It With My Own Eyes”

Mallika lost her husband, Musharraf, on the night the violence reached her street. She recalls that the lane's main gate had been locked from outside by a Hindu neighbour she names as Sapna, trapping the family inside as a mob of more than 200 men, armed with iron rods, chains and swords, surged in on a rumour that a Muslim man was hiding there.

From her window, Mallika watched as the crowd found her husband. Musharraf was beaten with iron rods, she says, and his head was struck against a wall. “I saw it with my own eyes,” Mallika told Nous. When Musharraf collapsed, bleeding, he was dragged down a stairwell, set on fire while still alive, and his body was thrown into a drain.

Her children, she says, clung to the attackers' legs and begged for their father's life; they were kicked aside and warned they would be killed too if they did not move. Mallika later went searching among the dead and injured collected at a nearby hospital, where the bodies had been laid out faster than there was room for them, and identified her husband herself. “It was God's will,” she says now. Musharraf's death left their children without a father, and left Mallika running the household alone in a neighbourhood where she still recognises many of the people who stood by, or joined in, that night.

Nargis was pregnant when her husband, Mursaleen, left for work on the morning of 21 February 2020. He never came back. As reports of rioting spread through the neighbourhood that afternoon, Nargis began calling him; the phone rang unanswered through the night and the next day, and by the third day had gone switched off entirely.

Relatives and in-laws searched in parallel, calling around the family's contacts with no success, until word came that the missing and the dead were being taken to the same hospital. There, after three days of searching, Nargis found her husband's body: shot in the abdomen, cut across the stomach with a sword, his lips slashed and his skull battered until his face was unrecognisable. She identified him only by the missing big toe on his right foot.

“All I have left in my life now is my children,” Nargis told Nous. Six years later she is still raising three of them alone in the narrow lanes she names as Shivhar, taking on small jobs to keep the household running. The grief has not receded with time, she says; it is her young daughter, Hija, who carries it most visibly, crying at night for a father she was too young ever to have known.

Jahira: Trapped on the Walk Home

Jahira describes a small but complete life before February 2020: a husband, four children, a home with little money but no shortage of affection. Her husband had come to visit her mother in the area and stayed through the worst of the rioting; when an evening lull convinced him the violence had passed, he set out for home. It hadn't passed. He called her along the way to say he was trapped, and the line cut before he could say more.

It took Jahira's family three days of searching relatives, friends and hospitals before they found him. His body, she says, was recovered caked in mud and debris, consistent, in the family's understanding, with having been pulled from a drain.

Jahira is left raising two sons and two daughters. Her eldest son now works to support the household, while she and her daughters manage what remains of it. She had never, before that year, stepped outside her home alone. “Whoever it happened to never forgets,” she told Nous. She now runs the household by herself, mother and, in her children's telling, father as well.

Six Years On, No One Has Been Held to Account

The film pairs these three testimonies with a broader accounting of what has, and has not, followed. An advocate interviewed in the documentary, who works on riot cases through APCR, describes a double crisis for women like Mallika, Nargis and Jahira: first an existential one, since in the communities they come from a married woman's social standing is bound to her husband's presence, and second a material one, as school fees, groceries and medical costs suddenly became a single widow's sole responsibility in households that were already poor before they lost an earner.

Extended family absorbed some of that burden, the advocate notes, but because the wider support network is itself poor, it could not sustain the families for long; within months of the pandemic's second wave, most had slid into serious financial crisis. One of the women describes working at a bangle-kiln, her hands scarred from the furnace, for roughly six thousand rupees a month with no paid leave, a single missed day costing her a third of her wage.

Court proceedings have moved just as slowly. One widow recounts being summoned to hearing after hearing and asked each time who her enemy was, a question she says she cannot answer, since she recognised no one in the mob that killed her husband. Her father-in-law had been attending the hearings on the family's behalf until his own death partway through the case; after that, with young children to care for, she found it increasingly hard to spend entire days in court for dates that produced no movement.

The advocate goes further, arguing that Delhi Police cannot be expected to conduct an impartial investigation into riots in which, he says, the force was itself implicated as a participant, and that its energy since has gone into cases such as FIR 59, prosecuting people it alleges were “falsely implicated,” rather than identifying the killers themselves. He draws a contrast with the 1984 anti-Sikh riots, whose survivors, he says, remain comparatively organised, documented and politically visible decades on; the 2020 riot victims, overwhelmingly poor and without an equivalent political constituency, have not had the same capacity to sustain their case in public memory, even as APCR alone says it is tracking roughly 2,700 riot-related cases, more than the organisation says it can adequately handle.

Some compensation has reached a handful of families, the film cites government payouts of roughly one lakh rupees, alongside support from a few NGOs, but for the women interviewed that has not amounted to justice. One widow, doubting the case will ever be resolved through the courts, has largely stopped expecting it from the state at all. “Only Allah will give us justice,” she says. One of the daughters interviewed in the film, speaking of the men who killed her father, wants something more concrete: that they be punished, and that she be allowed to see it happen.

Mallika, Nargis and Jahira are, in the film's own accounting, only three of at least twenty-one widows the violence of February 2020 created; the other eighteen did not agree to appear on camera. Six years after the mosques burned and the drains filled with bodies, the documentary argues, their cases remain where they began: unresolved, and waiting.

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