Nous Explainers· 10 Sept 2026· 20:04

Saharanpur Mosque Demolition: What Do the Land Records Say?

“If our judiciary is working this quickly, then why are five crore cases pending?” - Local Cleric

Full Transcript

इस वक्त में सहारनपुर की जो कलेक्टेट में जो मस्जिद है जिसको बुलडोज किया गया है मैं वहां पर मौजूद हूं। मस्जिद पक्ष की अगर हम बात करें तो उनका कहना है कि यह मस्जिद 1911 में बनी थी और उनके पास उनका बिजली का बिल भी मौजूद है। तमाम तरह के सवाल इसको लेकर उठाए जा रहे हैं और यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर इतनी जल्दबाजी में यह कदम क्यों उठाया गया है? मेरा काम आग लगाना है। नहीं मेरा काम आग लगाना नहीं है। मैं इस लड़ाई को ये कानून की लड़ाई है और मजबूती से लड़ रहा हूं और मजबूती से लड़ेंगे और जीतेंगे भी इंशा्लाह। अगर इतनी स्पीड से हमारी जुडिशरी काम कर रही है तो 5 करोड़ केसेस क्यों पेंडिंग है? अगर सेंट्रल गवर्नमेंट ये मानती है कि ये प्रॉपर्टी मस्जिद की है। ये प्रॉपर्टी है। लीज तभी तो हुआ। कह रहा हूं मस्जिद की ना मानती तो फिर लीज कैसे हो जाता? पूरी तरीके से जो मस्जिद है उसको समतल कर दिया गया है और उसका जो मलबा है वो उठाकर यहां पर फेंका गया है। देखो हमारे दिल पे बड़ी ठेस पहुंची है इसकी और ये मस्जिद हमें बादल चाहिए। इस तरह तो हम कहने लग जाए वो मंदिर तोड़ दो वो तोड़ दो जैसे मंदिर तोड़े तोड़ देंगे। किस वजह से कहलाता था सोने की चिड़िया हमारा देश कि हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब एक प्लेटफार्म पे बैठ के खाना खा लिया करते थे। दलित को और मुस्लिम को ही लड़ाना है इनके पीछे जुल्म होता है और किसी का कास्ट के पीछे नहीं जुल्म हो रहा कुछ भी। सिर्फ मुसलमान की बात ना करें आप हर आदमी को किसी भी मजहब का मानने वाला हो जो इंसाफ पसंद है वो इस वक्त इन हालात से शर्म शर्मिंदा है। इस वक्त मैं सहारनपुर की जो कलेक्टेट में जो मस्जिद है जिसको बुलडोज किया गया है मैं वहां पर मौजूद हूं। आप मेरे पीछे मस्जिद की वो साइड जो है वो देख सकते हैं। अब से कुछ दिन पहले यह अलाउड था कि आप वहां जाकर भी रिपोर्टिंग करें। लेकिन फिलहाल यहां पर यह बैरिकेडिंग जो है वो कर दी गई है। मैं आपको यह बता दूं कि लगातार यह जो विवाद है यह जो शुरू हुआ वो शुरू हुआ 10 फरवरी को जब बजरंग दल के एक नेता ने इस मस्जिद को कहा गया कि यह दरअसल जमीन को हड़प कर बनाई गई है। यानी कि इसको इललीगल और अवैध करार दिया गया। उसके बाद से ही हमने देखा यह विवाद जो है लगातार तूल पकड़ता गया और अब फिलहाल इस मस्जिद को बुलडोज कर दिया गया है। मस्जिद पक्ष की अगर हम बात करें तो उनका कहना है कि यह मस्जिद 1911 में बनी थी और उनके पास उनका बिजली का बिल भी मौजूद है। उनका यह भी कहना है कि उन्हें हाई कोर्ट में रिट फाइल करने के लिए उनको वक्त भी नहीं दिया गया। हालांकि उनके पास 22 दिन का वक्त मौजूद था और ताकि वह इलाहाबाद हाई कोर्ट जा सकते। उससे पहले ही यह मस्जिद बुलडोज कर दी गई। तमाम तरह के सवाल इसको लेकर उठाए जा रहे हैं और यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर इतनी जल्दबाजी में यह कदम क्यों उठाया गया है और जब पेपर्स वगैरह सब मस्जिद पक्ष का यह कहना है कि उनके पास मौजूद हैं तो उन्हें वो सब पेश करने के लिए वक्त क्यों नहीं दिया गया? इसमें तो कोई शक नहीं है कि जितना गम और जितना सदमा तमाम मुसलमानों को है उसकी कोई मिसाल नहीं पेश की जा सकती। लेकिन उसके साथ-साथ एक काबिले सताइश बात यह है कि उन्होंने बहुत बेइंतहा सब्र और तहम्मुल का मुजायरा किया। मुसलमान अपनी जान दे सकता है लेकिन अपनी इबादतगाह को गिरते हुए नहीं देख सकता। देखिए मस्जिद शहीद हुई है तो यकीनी तौर पर तकलीफ होगी। और जिस तरह के सिख शहीद की गई है वो पूरी तरह से गैर कानानूनी है और ये पूरे दस्तूर के ऊपर या संविधान के ऊपर इन्होंने बुलडोजर चलाया है क्योंकि मस्जिद वहां पर है इसे तो सरकार भी मानती है। इसे कोर्ट भी मानती है अगर वो मस्जिद ना मानती है तो फिर रिजेक्टमेंट थोड़ी ही होता। फिर बेदखली थोड़ी ही होती। तो वो मस्जिद तो है ही यूजर तो है ही जमीन के कागज चीख-चीख कर कह हैं कि जमीन सदियों पुरानी है और जमीन के मालिक आज भी कल की तो बात छोड़ दीजिए उस बात छोड़ दीजिए कि कब्जे की ये आज भी जमीन के मालिक याकूब खान वहीद खान ही हैं। 1324 फसली का खसरा मेरे सामने है। जिसमें खसरा नंबर 539 पर जो एंट्री है उसमें सामने लिखा है मस्जिद कलेक्टरी। तो 1324 फसल का मतलब यह हुआ कि यह 1917 का पेपर है और 1917 के पेपर में मस्जिद कलेक्टरी इसमें लिखा है तो इस पेपर से ही यह साबित है कि 1917 से पहले से ये मस्जिद मौजूद है और जब ये 1917 से पहले की बनी हुई मस्जिद है और उसके बाद में तमाम ये वो गवर्नमेंट भी बदलती रही फिर ऑफिसर्स आते रहे इसका मतलब ये है कि ये इललीगल मस्जिद नहीं है। यह कंसेंटेड मस्जिद है। और जब इललीगल नहीं है तो जो भी डिमोलिशन का या बेदखली का या जो भी कुछ ऑर्डर होता है वो इललीगल के खिलाफ होता है। 84 बीघे का ये नंबर है जिसके अंदर पूरी कलेक्टेट है। कलेक्टेट भी कब्जा की हुई बनी बनी हुई है। कलेक्टेट भी कब्जा कर कर बनी हुई है। आप उल्टा बोल रहे हैं। मैं उल्टा नहीं बोल रहा हूं। ये कागज बोल रहे हैं। ओके। ये कागज है। ये आज भी हैं। जिस जगह पर कलेक्टेट प्रेशर तो बाद में फैला है। पहले छोटा था। जिस जगह पर वो मस्जिद बनी है। हो सकता है कि जिस जमाने में वो मस्जिद बनी हो या तो उसके बाद कलेक्टेट कोर्ट एस्टैब्लिश हुआ। लेकिन अगर उससे पहले भी हुआ तो वहां को एक छोटी जगह थी जिसमें कलेक्टेट कोर्ट था। उस पॉसिबल पॉसिबिलिटी ये आती है कि वो उस परिसर से बाहर की जगह है कि जहां पर मस्जिद एस्टैब्लिश हुई और डेवलपमेंट के साथ-साथ वो पूरे का पूरा कॉरिडोर घिर गया और उसके बाद में वो मस्जिद जो है वो इस कलेक्टेट कोर्ट के परिसर में आ गई। आ गई। ओके। तो ये पूरी की पूरी तरीके से गैरकानूनी है। ये मस्जिद पुरानी थी। इसलिए 1991 के जो एक्ट है वशिप एक्ट उसके अंदर ये कवर्ड थी। 1947 से पहला स्ट्रक्चर था। दूसरी चीज ये लिमिटेशन एक्ट में कवर्ड होती है। क्योंकि 1960 से इसको लगातार गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने मालिक मानते हुए इसको किराया दे रही थी। टेलीकम्युनिकेशन डिपार्टमेंट। ये वक्त बाय यूजर में कवर होती है। जो नया एक्ट है नए एक्ट में पुराने के ऊपर नहीं इसका लागू होगा ये। क्योंकि इसके अंदर लगातार नमाज हो रही थी। मस्जिद का एक जो डाखाना है वह लीज पर लिया गया और सेंट्रल गवर्नमेंट की तरफ से यानी सेंट्रल गवर्नमेंट का मतलब यह हुआ कि जो पोस्ट मास्टर उस टाइम थे जो हेड थे वो जो भी इंचार्ज होते हैं उनका और मस्जिद के मुतव्ली का बाकायदा लीज़ डीड है। तो अगर सेंट्रल गवर्नमेंट यह मानती है कि यह प्रॉपर्टी मस्जिद की है। यह प्रॉपर्टी वफ की है। लीज़ तभी तो हुआ। अगर वह क्या नाम मस्जिद की ना मानती, तो फिर लीज़ कैसे हो जाता? ये कहा जा रहा है कि 1911 का आप बिल दे रहे हैं। लेकिन सहारनपुर में तो बिजली ही 1912 में। 1906 में। हां। 1906 में बिजली आई सहारनपुर में और यह इलेक्ट्रिसिटी डिपार्टमेंट की वेबसाइट से उठाया हुआ बिल है। फिर दूसरे जो पुराने पेपर्स हैं के बिजली के बिल हैं और बाकी सारे का सारा रिकॉर्ड है। उन सब से ये साबित है कि पुरानी मस्जिद है। और 46 साल से मैं प्रैक्टिस कर रहा हूं। उससे पहले मेरे फादर थे। मेरे फादर का मोस्ट प्रोब्ली 51 52 का उनका रजिस्ट्रेशन था। इसी मस्जिद में उनसे भी पहले का बहुत पुरानी मस्जिद चली आ रही है। उससे पहले के जो लोग हैं वो सब के सब बताते हैं। नमाज़ पढ़ते रहे हैं। वहां नमाज़ पढ़ते रहे हैं। अभी मैं जहां पर खड़ी हूं और आपको थोड़ा अजीब लग रहा होगा कि मेरे हाथ में ये क्या है? मैं ईंट लेकर क्यों खड़ी हुई हूं? अगर आप गौर से इसको देखेंगे तो इस पर लिखा हुआ है 1911 और मेरे पीछे जो आप मलबा देख रहे हैं यह उसी मस्जिद का मलबा है जो कलेक्टेट में बनी हुई थी और उसको तड़के सुबह 5:00 बजे आननफानन में बुलडोज कर दिया गया यानी कि यह जो क्लेम किया जा रहा है कि यह मस्जिद 1911 की बनी हुई है मस्जिद कमेटी की तरफ से देखिए उसका सबूत भी मेरे हाथ में है। ये यहीं से अभी मैं यहां पर आई हूं और यहीं से मैंने इस जो ईंट है उसको उठाया है। इस ईंट में 1911 यहां पर लिखा हुआ है और यहां जो लोग मौजूद हैं उनका यह कहना है कि अगर मैं कुछ देर पहले यहां पर आती तो शायद 1909 और छ तक की जो ईंटें हैं वो यहां पर मौजूद थी। आइए मैं आपको ये दिखाना चाह रही हूं कि ये जो मलबा है आप ये देख सकते हैं। यहां पर आपको यहां पर पर्दे यहां पर आपको कुछ यहां पर कपड़े चटाई ये सब आपको नजर आएंगी। यह सब बताया जा रहा है कि जो इमाम साहब मस्जिद के जो इमाम थे जो अपनी फैमिली के साथ वहां पर रहते थे ये उनके सारी ये कपड़े और उनका यह सारा सामान है। सोचिए आप कि मस्जिद से उनको अपने कपड़े तक निकालने नहीं दिए गए। यानी कि सामान भी उन्हें नहीं निकालने दिया गया। जबकि पूरा का पूरा ये आश्वासन दिया गया था कि मस्जिद को सिर्फ अभी सील किया जा रहा है। उसको बुलडोज नहीं किया जाएगा। ये तमाम बातें कही जा रही थी और जब लोग इस आश्वासन पर यकीन जब उन्होंने कर लिया तो सुबह 5:00 बजे के करीब इस मस्जिद को बुलडोज कर दिया गया और इस तरह से बुलडोज किया गया है कि आपको वहां पर नामोनिशान भी आपको वहां पर नजर नहीं आएगा। पूरी तरीके से जो मस्जिद है उसको समतल कर दिया गया है और उसका जो मलबा है वो उठाकर यहां पर फेंका गया है। यहां पर लगातार लोगों की भीड़ है। लोग यहां से ईंटों को उठाकर लेकर जा रहे हैं। एक तरह से याद के तौर पर अपने घरों में रख रहे हैं। उनको तकलीफ है कि उनकी मस्जिद को शहीद कर दिया गया है। यह भी कहा जा रहा है कि सपारे वगैरह यहां से उठाकर उनको दफन किया गया है। कपड़े वगैरह आप सब देख सकते हैं। आपको लगता है आने वाले इलेक्शन की वजह से भी ये हो रहा है? बिल्कुल असल वजह यही है। देखो हमारे दिल पे बड़ी ठेस पहुंची है इसकी और ये मस्जिद हमें बात सही है। ये इलेक्शन की वजह से हुआ है और कोई भी कह दे कि ये मस्जिद टूटने आया तो उसे तोड़ देगा थोड़ी है। जो इस तरह तो हम कहने लग जाए वो मंदिर तोड़ दो वो तोड़ दो। ऐसे मंदिर तोड़े तोड़ देंगे। दूसरी बात यह है कि आज तो ये मस्जिद तोड़ी फिर और मस्जिद अभी देखे गए हैं। ऐसा ना होना चाहिए। क्या ये आपको लग रहा है फिर से आने वाले इलेक्शन में ये हिंदू मुसलमान करने की कोशिश है? ये मस्जिद को गिरा के मतलब इनका तात्पर्य ये था कि ये मतलब ये मस्जिद तोड़ने के बाद ये मुस्लिमों को भड़काने का काम था। ये साफसाफ है मतलब इनका और कुछ नहीं है। लेकिन मुस्लिम बढ़के ये मुस्लिम भड़के और ये मतलब लड़े झगड़ा आपस में और हम अपना आपस में मजे लेवे। ये अपना लक्ष्य आराम से निकाल लेंगे। किस वजह से कहलाता था सोने की चिड़िया हमारा देश कि हम हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सब एक प्लेटफार्म पे बैठ के खाना खा लिया करते थे। यहां से ये नहीं था भेदभाव इस सरकार से पहले कि यहां भेदभाव था कि ये हिंदू है या मुसलमान है। सबके शादियों में ब्याहों में सब एक जगह बैठ के दावत भी खाते थे। आपस में बैठते भी थे, खाना भी खाते थे, खाना खिलाते भी थे। और जब से यह सरकार बनी यह ताना 27 वो बन गया कि भाई यह तो हिंदू है यह मुसलमान है। आपको इसमें फूट घेर के यह अपना उल्लू सीधा करें। क्या मुसलमानों को इस तरह से डरा के क्या खामोश करने की भी आपको लगता है कोशिश है? बिल्कुल खामोश करने की कोशिश की जा रही है कि मुसलमान जो है डरा डर के घरों में बैठ जाए। कान कानून की तो मान के चलते हैं। कानून एक एक साइड की देख रहा है। बस एक ही साइड की देख रहा है। तानाशाही हमें छोड़ रहे हैं। ये किसी की मतलब ऐसी नहीं है ये। यह सोचते हैं यह सारी जमीन दान करी गई है। दोनों कोर्ट है ना जो दोनों ही दान करी हुई है। और यह कह देते हैं मतलब दोस्त कर दो, किसी की मस्जिद कर दो, कुछ कर दो। ऐसा करने से क्या होगा साबित? हिंदू मुस्लिम को लड़ाने में आपस में ये काम कर रहे हैं अपना। दलित को और मुस्लिम को ही लड़ाना है। इनके पीछे जुर्म होता है और किसी का कास्ट के पीछे नहीं जुल्म हो रहा कुछ भी। और इसके अलावा इन पे तीर क्या था कि बाबरी मस्जिद का मामला था इनके पास। वो बरी हो गया था। चलो भाई मुसलमान ये सबर कर बैठा था कि भाई चलो भाई मस्जिद अल्लाह का घर है। अल्लाह अब देखेगा लेकिन इस पे नहीं सबर ही इन्हें होया। इनका तो सिर्फ अपनी कुर्सी का चक्कर है। इसके अलावा कोई चीज इनके पास नहीं है। मस्जिद तो चली गई है। मलबे के ढेर से ही शायद वह अपने दिल को किसी तरह की तसल्ली देने की क्या कोशिश कर रहे हैं या फिर इसी को देखकर शायद अपना गम मना रहे हैं। लोगों को एक नाराजगी भी है और एक गुस्सा भी है। गुस्सा उनको सियासी लीडर्स से है। नाराजगी उनको अपने रिलीजियस लीडर्स से भी है। उनका ये कहना है कि जो शिद्दत दिखनी चाहिए थी मस्जिद को बचाने की जो एक लीडरशिप दिखनी चाहिए थी इस मस्जिद को बचाने के लिए वो पूरी तरीके से गायब रही। जैसे और दूसरे उसमें फेनेटिक तंजीमे बनी हुई है। मैं वैसी नहीं बना सकता। क्योंकि मुझे कॉन्स्टिट्यूशन पे यकीन है क्योंकि मुझे अपने कानून पे यकीन है और अगर वह यकीन तोड़ा जाएगा तो मैं बेबसी से ऐसे देखता रहूंगा जैसे मेरी मस्जिद शहीद कर दी गई कलेक्टेट कोर्ट में जबकि जिसके बहुत स्ट्रांग एविडेंसेस मौजूद हैं। जितनी तेजी से जितनी सुरत से जितनी स्पीड से कलेक्टेट मस्जिद को तय किया गया है। अगर इतनी स्पीड से हमारी जुडिशरी काम कर रही है तो 5 करोड़ केसेस क्यों पेंडिंग है? और फिर लोगों ने यह कहा कि नेताओं को तो नजरबंद किया जाता है तो क्या नेता फिर घर में बंद होकर ऐसे तमाशा देखता रहेगा? देखिए मुझे नजरबंद नहीं किया। ना मैं नजरबंद हुआ। मैं रात को मैंने बात करी डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से दो-दो बार बात हुई। मुझे लग गया कि ये गिराएंगे। लाठी डंडे से नहीं रोक सकते। लाठी डंडे से आप पुलिस के सामना करके नहीं रोक सकते थे। मेरे खड़े होने का मतलब मैं जाता 2000 की भीड़ डालता गोली चलती। होना तो फिर भी वही था। होना फिर भी वही था। लेकिन शहर में आग लग जाती। मेरा काम आग लगाना है। नहीं। मेरा काम आग लगाना नहीं है। मैं इस लड़ाई को ये कानून की लड़ाई है और मजबूती से लड़ रहा हूं। वो तो ऑर्डर देना ना देना वो तो हाई कोर्ट में गया है। वो हाई कोर्ट की ये देखेंगे कि इललीगल है या लीगल है या जो भी कुछ है वो तो वहां का मामला है। लेकिन जो इस वक्त तक की जो पोजीशन है उसमें दो चीजें बिल्कुल अया है। बिल्कुल साफ हैं कि एक तो डिमोलिशन का तो कोई ऑर्डर ही नहीं था। बेदखली का और उसका यानी तरीका यह होता है कि 30 दिन के अंदर आप इसमें जो भी कुछ है उसे खाली करते हैं। उसके बाद नसी लग जाता है और उसके बाद अगर बेदखली का डिमोलिशन का ऑर्डर होता है तो स्पेसिफिक ऑर्डर होता है और उसके बाद ही वो डिमोलिशन हो सकता है। तो यह जो पूरी की पूरी कारवाई हुई है यह पूरी गैर कानानूनी कारवाई है। इललीगल कारवाई है और इसको किसी भी तरीके से जस्टिफाई नहीं ठहराया जा सकता। और आप क्या उम्मीद लगा रहे हैं आप इलाहाबाद हाई कोर्ट से देखिए हाई कोर्ट से हमें 100% मुझे लगता है कि 100% न्याय मिलेगा क्योंकि ये देखिए कोई भी आंख बंद करके जज जब बैठेंगे तो सारी फाइल आएगी इनको फटकार लगनी है इनके ऊपर जुर्माना होना है हाई कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पीडीए के ऊपर प्रयागराज डेवलपमेंट अथॉरिटी के ऊपर जुर्माना लगाया इसी तरह से तोड़ने पर ₹42 लाख या ₹2 जुनवाने लगा। इंसाफ के मायने यह हैं कि जो सबूत और जो गवाहान है अगर उसके साथ मुंसिफाना और बहुत ही मतलब एक एक जस्टिफाइड अप्रोच अपनाई जाए तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि वो मस्जिद वहां दोबारा तामीर होगी। लेकिन वो मुंसफाना अप्रोच आए तो वो मुंसफाना वो वो जस्ट वो जस्टिस प्रिवेल तो करें मुसलमान को इस वक्त इन्होंने इतना परेशान कर दिया और यही इनका मकसद है कि आप परेशान दिखें। यही मकसद भी है इनका। लेकिन मैं बार-बार कहता हूं कि 25 करोड़ लोगों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। 25 करोड़ लोगों को आप हटा नहीं सकते मुल्क से। सिर्फ मुसलमान की बात ना करें आप। हर आदमी वो किसी भी मजहब का मानने वाला हो जो इंसाफ पसंद है वो इस वक्त इन हालात से शर्मिंदा है। ये मुल्क इस मुल्क के लिए एक दस्तूर एक आइन एक कॉन्स्टिट्यूशन तरतीब दिया गया है। उस उस कानून उस दस्तूर उस कॉन्स्टिट्यूशन से अगर यह मुल्क नहीं चलेगा तो क्या यह मुल्क के साथ कॉन्स्टिट्यूशन के साथ वफादारी है या गद्दारी है? इस मस्जिद के बुलडोज होने के बाद जब आप सहारनपुर शहर के अलग-अलग इलाकों में जाएंगे तो आपको एक अजीब सा सन्नाटा नजर आएगा। लोग तकलीफ में हैं, गुस्से में हैं, गम में हैं, लेकिन बहुत कुछ खुलकर कह नहीं पा रहे हैं। उनका अभी भी यह कहना है कि उन्हें यकीन है अदालतों पर, उन्हें यकीन है इस देश के कानून पर, उन्हें यकीन है इस देश के संविधान पर और उन्हें यकीन है उस परवरदिगार पर कि उनको इंसाफ जरूर मिलेगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिट फाइल कर दी गई है और उनको अब यह लग रहा है कि उनको इलाहाबाद हाईकोर्ट से इंसाफ मिलेगा और उनकी मस्जिद जहां पर थी वो फिर से वहीं पर जरूर बनेगी और जब मैं आपसे ये बात कर रही हूं तो मैं सहारनपुर में मौजूद लेकिन मैं आपको यह बता दूं कि इसी वक्त मुरादाबाद में जो मुस्तफा मस्जिद है उस पर भी एक नोटिस चसपा कर दिया गया है और वहां पर भी कागज मांगे जा रहे हैं। तो अब एक मस्जिद के बाद दूसरी मस्जिद यानी कि मुरादाबाद की मुस्तफा मस्जिद का अब नंबर आ गया है और सवाल यही है कि आखिर कितनी मस्जिदों के कागज मांगे जाएंगे?

Companion article

A Dispute That Started With an Accusation

On February 10, a Bajrang Dal leader alleged that a small mosque standing inside the compound of the Saharanpur district collectorate had been built on encroached government land. The claim was simple and explosive: the structure, he said, was illegal, and therefore fair game for removal. Within weeks the accusation hardened into an administrative campaign, and before dawn one morning, it ended with bulldozers.

The mosque committee's account of the building's history begins in 1911. Members say they hold documentary proof, including an electricity bill, and that the structure predates the collectorate complex that eventually grew to enclose it. They also say the process that ended in demolition denied them any real chance to be heard — they had 22 days available in which they could have approached the Allahabad High Court, and the mosque was pulled down before that window closed.

What the Land Records Say

The strongest evidence produced by the mosque's defenders is not the electricity bill but a khasra, a revenue land record, dated to the Fasli year 1324 — corresponding to 1917 in the Gregorian calendar. In the entry for khasra number 539, the record lists the site simply as "Masjid Collectory." A lawyer representing the mosque committee argued that this single line settles the underlying question: if the mosque already appears in a government land record from 1917, it did not spring up illegally inside the collectorate — the collectorate expanded around it.

The same lawyer told reporters at the site that he has practised law for 46 years, and that his father was registered as a practitioner at the same mosque as far back as 1951 or 1952, placing worship there at least three-quarters of a century before the demolition.

A further layer of documentation, mosque representatives say, comes from the mosque's own tenancy history. Part of the mosque premises — including what is described as a small outbuilding or "dakkhana" — had been leased since 1960 to the central government's telecommunications department, whose postmaster at the time signed a formal lease deed with the mosque's mutawalli, its custodian. If the government did not consider the land to belong to the mosque, one representative asked, on what basis was a lease ever signed with the mosque's custodian in the first place?

Taken together, the mosque committee argues this record trail brings the structure under two separate legal protections: the Places of Worship Act of 1991, which freezes the religious character of structures that existed as of August 1947, and the Limitation Act, given decades of continuous government acknowledgment of the mosque's ownership through rent payments.

A Contested Brick

Not every piece of evidence in this dispute is uncontested. Officials and others sceptical of the mosque committee's claim have pointed out that electricity did not reach Saharanpur until 1906, and question how a structure could produce a verifiable 1911 electricity bill so soon after. Mosque defenders counter that the same municipal electricity department's own website lists 1906 as the year power arrived in the city — which, they say, is consistent with, not contrary to, a 1911 document.

Standing amid the rubble after the demolition, one reporter recovered and held up a brick stamped with the year 1911, describing it as physical evidence of the same claim the committee had been making with paperwork. Onlookers at the site said that had she arrived earlier, she might have found bricks bearing even older dates, 1909 or before.

The Morning of the Demolition

According to residents and mosque representatives who spoke at the site, authorities had given assurances in the preceding days that the mosque would only be sealed, not torn down. Trusting that assurance, families did not empty the structure of belongings. Around five o'clock one morning, bulldozers levelled the mosque anyway. Clothing, bedding, curtains and other personal items belonging to the resident imam and his family were destroyed in the rubble, unable to be retrieved beforehand. Local residents described going to the demolition site afterward to collect bricks from the debris as keepsakes, a small remembrance of a structure they said their community had prayed in for generations.

Mosque representatives argue that the manner of the demolition was itself unlawful, independent of the underlying ownership dispute. Eviction from a government-linked property ordinarily requires a specific process: a formal notice, typically a thirty-day period in which occupants must vacate, and only then, if compliance fails, a specific demolition order. No such sequence was followed here, according to the mosque side — no eviction order preceded the bulldozers, and no separate demolition order was produced either.

'The Collectorate Grew Around It'

One exchange captured at the demolition site illustrates how contested the underlying premise remains. When a mosque representative argued that the surrounding government complex had itself expanded onto encroached land over time, an unidentified official pushed back, accusing him of inverting the facts. The representative held his ground, insisting the documents, not his own opinion, supported the claim: that the collectorate premises had spread outward over the decades from a smaller original footprint, gradually enclosing what had been, at the time the mosque was built, a freestanding structure outside any government compound at all. Only later, as the collectorate court complex grew around it, did the mosque come to sit inside government-controlled land — not, as officials now argue, the other way around.

That argument matters because it reframes the entire basis for the demolition. If the mosque predates the surrounding administrative complex, mosque representatives argue, it cannot legally be treated as an unauthorised structure that appeared on protected government land; instead, the government premises grew to surround a structure that had every right to already be there.

Politics, Patience, and What Comes Next

Several people who spoke to reporters at the site connected the timing of the demolition to the run-up to elections, suggesting the episode was less about zoning and more about provoking a reaction from the state's Muslim minority. One commentator, addressing the broader mood among Muslims in the aftermath, praised what they described as extraordinary patience and restraint in the community's response, arguing that the loss of a place of worship is felt with unmatched grief, even as the community avoided any move toward confrontation.

Others directed criticism inward, arguing that both political and religious leadership had been largely absent from the site when their presence and support were most needed.

The dispute has not stayed confined to Saharanpur. Days after the demolition, a notice was reportedly pasted on the Mustafa Mosque in nearby Moradabad, demanding that its custodians produce ownership documents as well — raising the question, as one resident put it, of how many mosques will be asked to produce their papers next.

A petition on behalf of the Saharanpur mosque has since been filed in the Allahabad High Court. Mosque representatives say they are hopeful of a favourable outcome, pointing to a precedent in which the same court fined the Prayagraj Development Authority roughly ₹42 lakh over an unlawful demolition. Whether that precedent will extend to Saharanpur remains, for now, an open question — one that will be decided not at the site of the rubble, but in a courtroom.

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