Nous Documentaries· 26 Jul 2026· 19:02

Mohammad Ali Jauhar University Under Threat: Students, VC & Dr. Tazeen Fatma Speak Out

The Rampur Development Authority has ordered the demolition of 38 buildings at Mohammad Ali Jauhar University, alleging that they were constructed without the required statutory approvals. The university disputes the order, arguing that much of the campus was built before the area came under the …

Full Transcript

अब तो सबसे ज्यादा हमें टेंशन हमारे करियर की हो रही है। अगर ये यूनिवर्सिटी तोड़ देंगे तो हमारे करियर का क्या होगा? इतने सारे स्टूडेंट हैं उनके करियर का क्या होगा? अगर सरकार ये कहती है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। अगर बेटी पढ़ेगी नहीं तो बचेगी कैसे? मौलाना मोहम्मद अली जौहर एक फ्रीडम फाइटर थे। तो ऐसे फ्रीडम फाइटर के नाम पर बनी हुई यूनिवर्सिटी को अगर सिर्फ नाम की वजह से निशाना बनाया जा रहा है तो यह भी हमारे लिए शर्मनाक है। मैम ये यूनिवर्सिटी को ध्वस्त नहीं किया जा रहा है। मतलब ये हम सब लोगों के ड्रीम्स को ध्वस्त किया जा रहा है। मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी में मोहम्मद आजम खान साहब की जान बचती है। तो उन्हें मेंटली टॉर्चर करने के लिए मैं समझता हूं ये गैर कानून दिया गया है। हम किताबें लेकर अपने क्लास रूमों में बैठ जाएंगे और कहेंगे आइए बुलडोजर लेकर हमें इसी में दफन कर दीजिए। हम इसी में दफन हो जाएंगे। सिर्फ जिनके मोहल्लात में ही जले चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले। ऐसे दस्तूर को सुबह बेनूर को मैं नहीं जानता। [1:03] अगर उनका ये अरमान है कि बिल्डिंग तोड़ दे तोड़ दें। हम पेड़ के नीचे पड़ाएंगे। हम सड़कों पे पढ़ाएंगे। जहीर साहब जब आप यह बात कह रहे हैं तो ना सिर्फ आपके अल्फाज में वो तकलीफ है बल्कि आपकी आंखों में भी वो तकलीफ है और वो जज्बात जो है आप काबू नहीं कर पा रहे हैं। [1:48] मैं इस वक्त मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी में मौजूद हूं। जी हां, वही यूनिवर्सिटी जिसको बहुत ही अरमान, हसरत, ख्वाब के साथ आजम खान ने बनाया था। और उन्हीं आजम खान से एक तरह से राजनीतिक बदला लेते हुए या फिर उसको टारगेट करते हुए क्योंकि एक माइनॉरिटी इंस्टीट्यूशन भी है। आरडीए ने एक नोटिस जारी किया है और नोटिस जारी करके यह कहा है कि 250 से 300 एकड़ में बनी फैली यह यूनिवर्सिटी 40 में से 38 भवन वो इललीगल हैं। उनको बुलडोज करने का नोटिस जारी किया गया है। 15 दिन का वक्त दिया गया है और यह कहा गया है कि अगर 15 दिन में आपने इसको बुलडोज नहीं किया तो हम आकर इसको बुलडोज कर देंगे और पैसा भी यूनिवर्सिटी से ही चार्ज किया जाएगा। अब मैं यहां पर छात्रों से जानूंगी जरूर कि उनके मन में क्या है? वो आखिर क्या सोच रहे हैं? वो अपने भविष्य को लेकर कितने चिंतित हैं? उनके ज़हन में किस तरह के सवाल जो हैं वो आ रहे हैं? क्या उनकी शिकायतें भी हैं? यह सब भी मैं जानूंगी। क्यों तोड़ी जा रही है यूनिवर्सिटी? यह तो उन लोगों को पता होगा क्यों तोड़ रहे हैं इस यूनिवर्सिटी को। हमें तो सिर्फ अपना करियर दिख रहा है। बाकी हमें कुछ नहीं दिख रहा। सारी चीजें एक तरफ रख के सारी राजनीति एक तरफ रख के हमें बस अपना करियर दिख रहा है। अभी सारे स्टूडेंटों का यही टेंशन है कि हमारे करियर का क्या होगा? हमने दो-दो साल पढ़ लिए, कोई एक साल पढ़ लिया, कोई तीन साल पढ़ लिया। सारे लोग इसी टेंशन में पड़े हुए हैं। कुछ लोग डिग्री करके निकल गए हैं तो कुछ लोग डिग्री लेने से बैठे हैं। अभी यहां बहुत सारे स्टूडेंट है जो कि मेरे सुपर सीनियर भी हैं, सीनियर भी हैं, जूनियर भी हैं। उनकी कैरियर को लेके मैं आज यहां आई हूं। मुझे सरकार से कोई मांग नहीं है। चाहे सरकार बीजेपी की हो, चाहे समाजवादी की हो, चाहे एसपी की हो, ए टू जेड किसी की भी सरकार हो, बच्चा हो या बड़ा हो जिसको वोट देना है वो उसी सरकार को देगा। बोर्ड से भी कोई मतलब नहीं है। यहां जो बच्चे बैठे हैं वो अपने सिर्फ करियर को लेके बैठे हैं। शिक्षा को लेके बैठे हैं। अगर शिक्षा ही नहीं होगी तो बच्चा कैसे आगे बढ़ेगा? अगर सरकार ये कहती है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ। अगर बेटी पढ़ेगी नहीं तो बचेगी कैसे? फिजिकल हैंडीकैप हूं मैम। पीएच कैटेगरी से आता हूं मैम। यहां पर मैम मैंने ₹24,000 में मेरा एलएलएम कंप्लीट हो रहा है। मैम मात्र ₹24,000 मैम। अच्छा सबसे अच्छी बात यह है मैम जैसे ही मैं गेट से बाहर गेट से अपने कैंपस के अंदर एंटर करता हूं यहां पर रिक्शा लगी हुई होती है मैम जो मुझे फ्री में कोई पैसा नहीं जो यूनिवर्सिटी की ही तरफ से मुझे प्रोवाइड कराई जाती है मैम फ्री में मुझे फैकल्टी तक मुझे छोड़कर आती है और वहीं से लेकर भी आती है मैम फ्री में। मैम हमें नहीं पता ये किस चीज के बेसिस पर किया जा रहा है कुछ बोलते हैं पॉलिटिक्स से रिलेटेड किया जा रहा है या जिसने या इसे आजम खान सर ने बनवाया तो किया जा रहा है हमें उस चीज से पता नहीं लेकिन हमने इस यूनिवर्सिटी में ये सोच के एडमिशन नहीं लिया था कि आजम खान की यूनिवर्सिटी है। हम तो ये किसी और की यूनिवर्सिटी भी होती तब भी यहीं एडमिशन लेते हैं। यूनिवर्सिटी समझ के हमने पॉलिटिक्स से समझ के हमने यहां पे एडमिशन नहीं कराया। कि जब जौहर विश्वविद्यालय का एडमिशन का टाइम पीक लेवल पे होता है। जब एडमिशन का टाइम होता है तो ये लोग चाहते हैं कि इसमें बच्चे नहीं आए। नहीं। तो यहां तमाम पुलिस फ़ोर्स लगा दी जाती है। जैसे कि यहां पे कोई आतंकी पढ़ाई हो रही है। काहे की पढ़ाई हो रही है? यहां से जो बच्चा पढ़ के निकलेगा, कोई डॉक्टर होगा, कोई साइंटिस्ट होगा, कोई वकील होगा। आज मैं बीए एलएलबी मेरी यहीं से ही कंप्लीट हुई है। मैं एडवोकेट बन चुका हूं और मैं एलएलएम सेकंड ईयर का यहां का छात्र हूं। क्या आपको लग रहा है ये एक माइनॉरिटी इंस्टिट्यूशन है, इसलिए इसको निशाना बनाया जा रहा है? कह सकते हैं? हम कह सकते हैं? ना तड़पने की इजाजत है ना फरियाद की है। घुट के मर जाऊं यही मर्जी मेरे सयाद की है। तो मैम ये जो मैं यहां की एक्स स्टूडेंट हूं और मैंने यहां से बीएड किया है और यहां पे जो लड़कियां बैठी हुई है ये मेरी स्टूडेंट हैं। और ये वो लोग खुद आई और मेरा खुद चार दिन से अंदर से घुट रही थी कि मैं ऐसे सोशलॉजी की टीचर हूं। मैं इन लोगों को क्या पढ़ाऊंगी कि क्या क्रांतियां यूं ही चलती रही? क्या जब मेरा कॉलेज खुद डिमोलिश करने की बातें हो रही थी तो मैं यहां घरों में अपने स्कूल में टीचिंग कर रही थी। तो यह पढ़ाई मैंने अपनी जिंदगी में इंप्लीमेंट ही नहीं की। आज हम जो है यहां से ये जो यूनिवर्सिटी है ये कोई स्ट्रक्चर नहीं है। ये इमोशन है हमारे। [5:52] आपने जब यहां गौहर यूनिवर्सिटी को जब आपने चुना था तो क्यों चुना था आपने? मैम एक तो वही सबसे बड़ा है कि रामपुर में कोई यूनिवर्सिटी नहीं है। इसलिए हम जौहर यूनिवर्सिटी हैं। और सबसे बड़ा जो वो हमारा वो है ये इसीलिए क्योंकि यहां पर कोई यूनिवर्सिटी नहीं है। बाहर हम जा नहीं सकते। हम्म। आपको लग रहा है आपका करियर दांव पे लग रहा है? जी बिल्कुल। हम आपको डर सता रहा है? जी मैम मैम ये यूनिवर्सिटी को ध्वस्त नहीं किया जा रहा है। मतलब ये हम सब लोगों के ड्रीम्स को ध्वस्त किया जा रहा है। आज मैं एक हॉस्पिटल में एज ए डॉक्टर के रूप में पब्लिक और जितने भी लोग परेशान है उनका इलाज कर रही हूं मैं। एक गायनी डॉक्टर हूं। वहां पर मिलांगाराम हॉस्पिटल में मैं रहती हूं। वहां से आई हूं मैं आज यहां पर। मेरा यहां जब एडमिशन मैंने लिया था, जब मैं यहां से पास आउट हुई थी, तो बहुत कम पेमेंट पर यहां पर मेरी पढ़ाई हुई थी और बहुत अच्छे से मैं यहां से गई थी। अगर ये यूनिवर्सिटी नहीं होती तो शायद आज मैं कामयाब नहीं हो पाती। मैं इस पैरामेडिकल डिपार्टमेंट के अंदर पहले बैच का पहला स्टूडेंट हूं और अल्हम्दुलिल्लाह एक अच्छे प्लेटफार्म पे हूं। और इतने कम पैसों में मैंने यहां से वो तालीम हासिल की अगर आज के बच्चे का हमारे जो रामपुर में कुछ स्कूल्स हैं जैसे मोदी है, ग्रीन बोर्ड है, वाइट हॉल है तो बच्चे के एलकेजी, यूकेजी में एडमिशन के वक्त में चले जाते हैं। इतने पैसे जो हमने यहां से तालीम मुकम्मल कर ली उतने पैसे में आप समझ सकती हैं मैम। और हमारी जो एक मेरे साथ में मेरी बहन और थी वो यहां से फार्मेसी कर गई है। एमबीबीएस कर रही है। दूसरी मेरी बहन थी फार्मेसी कर गई है। एमबीबीएस कर रही है। यहां के बच्चे पूरी दुनिया में नाम रोशन कर रहे हैं। मेरा भाई नॉर्वे में है। इंजीनियर साइंटिस्ट है वो रिसर्च करके बहुत ऊपर पहुंच गया है। तो हम लोग जो है ना ये अपनी पॉलिटिकल चीजों को अपने पास रखें। ये हमारी है। हमारे जज्बा जुड़े हुए हैं। वाहिद एक ऐसी यूनिवर्सिटी है जिसमें सिंगल पेरेंट्स या दोनों पेरेंट्स की डेथ हो गई है। मैम सिंगल पेरेंट्स में 50% मैम लेस फीस कर दी जाती है मैम दोनों बहुत पेरेंट्स नहीं है मैम 100% फीस इसमें लेस कर दी जाती है वाहिद एक ऐसी यूनिवर्सिटी है मैम और सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें मुस्लिम भी नहीं पढ़ रहे हैं मैम सारे रिलीजन के लोग वो सारे रिलीजन को इक्वली ही ट्रीट किया जाता है मैम ये फिलहाल जो हो रहा है ये कहा जाता है कि आजम खान साहब जो हैं वो तो बहुत एोगेंट रहे वो इस तरह से लोगों से बात नहीं करते थे या और अब उनके साथ ऐसा हो रहा है तो अब उन्हें ये सारी चीजें याद आ रही है। जब इस तरह की बातें कही जाती है तो आपके ज़हन में फिर क्या आता है? क्या सोचते हैं आप? इस तरह की बातें अगर उनके पॉलिटिकल अगेंस्ट वाले जो लोग हैं वो करते हैं तो वो सिर्फ पॉलिटिकल के आधार पर करते हैं। क्योंकि यहां पर मैं खुद मिला हूं यहां पर यूनिवर्सिटी आते थे। तो हमें हमेशा वो आगे को बढ़ाने के लिए ही कहते थे। कहते थे कि और पढ़ो, अच्छे से पढ़ो। हमसे बहुत अच्छे से बात करते थे और कहते थे कि आगे बढ़ो के यहीं पढ़ो, अच्छे से पढ़ो। जहां आजम खान सर का सवाल है। कितने फैमिली मेंबर उनके यहां वो हैं। उनकी छोटी सी फैमिली है। हम उनकी फैमिली हैं। हम बच्चे हैं यहां के भविष्य। वो अपने लिए कोई ये थोड़ी ना कि वो इतने सेल्फिश है कि उन्होंने अपनी फैमिली के पास बच्चे पढ़ेंगे। उनकी फैमिली में कोई नहीं है। छोटे उसको उनको लोगों में चैन नहीं है। वो आपको पता है कि पॉलिटिक्स ने उनका मतलब आप लोग अपना करते रहो जो आपका चल रहा है। हम इतनी बड़ी-बड़ी बातें नहीं बोल रहे हैं। जब हमें उस चीज के अंदर खाने हमें कोई वो नहीं है। ये हमारी है। उन्होंने हमारे लिए बनाई है। [8:58] तो यहां आपने देखा यहां छात्रों की बातों को आपने सुना। यहां पर आपने देखा कि इधर मेरी तरफ एक तरफ फीमेल छात्र हैं। यहां पर इधर मेल छात्र हैं। कोई बीएससी कर रहा है। कोई पैरा मेडिकल में है। कोई लॉ का स्टूडेंट है। कोई ह्यूमैनिटीज का है। किसी का फर्स्ट ईयर है। किसी का सेकंड ईयर है। किसी का फाइनल ईयर है। कोई मास्टर्स कर रहा है। कोई अलीगढ़ से ग्रेजुएशन किसी ने किया। कोई यहां पर आकर मास्टर्स कर रहा है। कोई एक्स स्टूडेंट है। कोई अपने अच्छे-अच्छे जी। जी ये अलीगढ़ से आई तो अलग-अलग जगहों से देखिए यहां पर यह आ रहे हैं और उनकी सिर्फ एक ही मांग है कि यह ये यूनिवर्सिटी सिर्फ एक बिल्डिंग ईंट गारे से बनी हुई एक बिल्डिंग नहीं है बल्कि उनके लिए ये एक जज्बात है। जिस वक्त आपके पास यह खबर आई, यह नोटिस आया कि यूनिवर्सिटी को जिससे बहुत अरमान, हसरत और बहुत सारे ख्वाबों को बुनकर आजम खान साहब ने बनाया था और उसको बुलडोज करने का नोटिस जब आपके पास आया और सिर्फ 15 दिन का नोटिस आपको दिया गया। सबसे पहली जो थॉट आपके ज़हन में आया वो क्या था? देखिए सबसे पहली बात तो यह है कि मैंने कभी यह सोच सोचा ही नहीं कि यूनिवर्सिटी को डिमोलिश कर दिया जाएगा। इसलिए कि पहली चीज मुझे अल्लाह ताला पर बेहद यकीन है। शायद सभी को होगा। लेकिन मुझे भी इस चीज पे पूरी पूरा यकीन है कि अगर कोई चीज बिल्कुल सच्चाई और ईमानदारी के साथ की जाए कोई काम तो यूनिवर्सिटी भी पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ बनाई गई है और ये इस यूनिवर्सिटी में ये जो इतना ज्यादा बच्चे हमारे आंदोलन कर रहे हैं तो स्टूडेंट्स भी बहुत ज्यादा इमोशनली अटैच हैं क्योंकि इसे बनाने में इन बच्चों का भी बहुत ज्यादा एक तरह से कंट्रीब्यूशन है। तेज तपती हुई धूपों में इन लोगों ने खुद ईंट सीमेंट और यह चीज़ यह सारी चीजें कार सेवा की है और यूनिवर्सिटी को बनाया है। [11:03] तो आपको क्या लग रहा है कि किस कैफियत से वो गुजर रहे होंगे? क्या उन्हें महसूस हो देखिए इस कैफियत को सिर्फ मैं ही नहीं सभी लोग महसूस कर सकते होंगे कि एक ऐसा इंसान जो कि इतना ज्यादा इमोशनली अटैच हो अपनी यूनिवर्स मतलब अपनी क्या एक शिक्षण संस्थान से एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन से वो कैसा महसूस करेगा जब उससे यह कहा जाए कि इसे गिरा दिया जाएगा। देखिए जो नोटिस दिया गया है आरडीए की ओर से वह नोटिस पूरी तरह से इललीगल है औरत्राधिकार से बाहर जाकर नोटिस दिया गया है। आरडीए को इस मामले में नोटिस देने का अधिकार नहीं था। जहां पर यूनिवर्सिटी स्थित है। वह ग्राम सिंघनखेड़ा के नाम से एक गांव है। उसकी अराजी में है। सिंघन खेड़ा गांव आरडीएम में 27924 में ऐड किया गया है। उससे पहले आरडीएम में ये गांव था ही नहीं। किसी चीज को इललीगल कह देना एकदम क्योंकि मैं लॉ का प्रोफेसर रहा हूं और अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में डीन चेयरमैन भी रह के आ रहा हूं। वहां का वाइस चांसलर भी था मैं। मैं खूब जानता हूं लीगलिटी क्या होती है? इललीगलिटी क्या होती है? मुझे बड़ी हैरत है वह आरडीए रामपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी जो 2024 में हमारे एरिया में एप्लीकेबल हुआ और जैसा कि हर लॉ का आदमी जानता है मैं भी जानता हूं आप भी जानते हैं जो भी स्कॉलर है जानते हैं कि जब कोई एक्ट पास होता है तो पहले पार्लियामेंट से पास होता है फिर प्रेसिडेंट उसे एसेंड देता है उसके बाद ऑफिशियल गजेट में पब्लिश होता है जिस दिन पब्लिश होता है वो उसी से एप्लीकेबल भी होता है पता नहीं इसे रेट्रोस्पेक्ट इफेक्ट हमारे ऑनरेबल डीएम साहब क्यों दे रहे हैं? डीएम साहब भी किसी शिक्षण संस्थान से शिक्षा पाकर इतनी ऊंची कुर्सी पर बैठे हैं। तमाम सारे देश में शिक्षण संस्थान ऐसे होंगे। मैं समझता हूं कोई भी शिक्षण संस्थान ऐसा नहीं होगा जो सारे मानक पूरे करता हो बिल्डिंग्स के। मान लीजिए कोई बच्चा एलएलबी सेकंड ईयर में है और वह यहां से एमयू में या डीयू में या में दाखिला लेना चाहता है थर्ड ईयर में तो क्या मैडम दाखिला हो जाएगा नहीं हो सकता ना या मैं ही नहीं लूंगा कैसे आएगा दाखिला दूसरे से मैं कैसे कहूंगा दाखिला ले लीजिए तो क्या उसकी रेमेडी हमारी गवर्नमेंट के पास है क्या होगा उनका हजारों बच्चों का क्यों खेलना है उनकी जिंदगी से क्या बिगाड़ा है भाई आजम खान ने यही तो किया है कि एक एकडमिक इंस्टट्यूशन बनाया है उन गरीब लोगों के लिए जरापुर मुरादाबाद बरेली आसपास के उन गरीब लोगों के लिए जिनके आटे कनस्तर आज भी खाली है जिन पे इतना भी कपड़ा नहीं है घर पर पर्दा डालने अगर वह अपने बच्चों को दोपहर का खाना दे देते हैं तो शायद रात का मिले ना मिले यह भी उन्हें सोचना पड़ता है। उनके लिए यूनिवर्सिटी बनाई गई है। कौन सा गुनाह कर लिया? उसी इंस्टिट्यूशन का मैं वाइस चांसलर हूं। और यह मेरी ड्यूटी है के अगर उनका ये अरमान है कि बिल्डिंग तोड़ दे, तोड़ दे। हम पेड़ के नीचे पढ़ाएंगे। हम सड़कों पर पढ़ाएंगे। यूनिवर्सिटी थोड़ी आप मिटा दोगे। [14:39] जहीर साहब जब आप ये बात कह रहे हैं तो ना सिर्फ आपके अल्फाज़ में वो तकलीफ है बल्कि आपकी आंखों में भी वो तकलीफ है। और वो जज्बात जो है आप काबू नहीं कर पा रहे हैं। मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के चांसलर माननीय मोहम्मद आजम खान हैं। उनके खिलाफ तमाम सारे फर्जी घटनाओं के केस 2019 से लगातार दर्ज कराए जा रहे हैं। मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी में मोहम्मद आजम खान साहब की जान बचती है। तो उन्हें मेंटली टॉर्चर करने के लिए हम मैं समझता हूं यह गैर कानानूनी नोटिस दिया गया है। जी बदले की कारवाही से तो किया ही जा रहा है। एक तो आजम साहब जो है जाहिर है मुखालिफो पार्टी के हैं। इस वजह से भी और दूसरी चीज यह है एक आवाज यह भी उठ रही है कि क्या जौहर यूनिवर्सिटी जो नाम है अगर इसका नाम बदल दिया जाए तो नाम की वजह से इस यूनिवर्सिटी को तोड़ा जा रहा है। तो अगर नाम की वजह से तोड़ा जा रहा है तो यह हमारे लिए और भी शर्म की बात है क्योंकि मौलाना मोहम्मद अली जौहर एक फ्रीडम फाइटर थे और उन्होंने कह दिया था कि मैं गुलाम हिंदुस्तान में अपनी मरना भी पसंद नहीं करूंगा। तो ऐसे फ्रीडम फाइटर के नाम पर बनी हुई यूनिवर्सिटी को अगर सिर्फ नाम की वजह से निशाना बनाया जा रहा है तो यह भी हमारे लिए शर्मनाक है। एक तो मुश्किल दौर आपके लिए यह है कि आपके बेटे अब्दुल आजम और खुद आजम खान साहब जेल में हैं। और दूसरी तरफ अब यह जौहर यूनिवर्सिटी को बुलडोज करने की बात अभी भी जिस तरह जितने एक्टिव डिंपल यादव को जितना एक्टिव मैं अखिलेश यादव को या तमाम जो एमपीज हैं उनको मैं देख रही हूं वहां दिल्ली में मैं उनको यहां पर नहीं देख रही हूं। इसकी क्या वजह क्या आपको भी कोई शिकायत है? मेरा ख्याल है यह सारे सवालात तो आप पार्टी के एमपीज एमएलए से पूछे या पार्टी के अध्यक्ष से यह वही लोग बता सकते हैं कि वो यहां क्यों नहीं एक्टिव है शिकायत तो है आपकी नहीं मेरी मुझे कोई शिकायत नहीं है क्यों लेकिन क्यों इसलिए कि मैंने इससे पहले और कुछ भी और मौकों पर भी देखा है महसूस किया है लेकिन जो एक हुजूम दिखना चाहिए था कि भाई ये एक शिक्षण संस्थान है यहां पर भी 3000 प्लस बच्चे पढ़ते हैं और आपको इलेक्शन तो उत्तर प्रदेश का ही लड़ना है। हो सकता है कि वह अब मुख्यमंत्री बनने के बजाय प्राइम मिनिस्टर बनने का उनका मकसद हो। [17:11] अगर बुलडोज कर दिया जाता है इस यूनिवर्सिटी को मान लीजिए यू नो कि आप अगर वर्स्ट सोचे कि माना कि इसको बुलडोज अगर कर दिया जाता है तो फिर आप लोगों के पास क्या ऑप्शन है? अगर ऐसा होता है तो उनको हमारी लाशों में से गुजर के जाना पड़ेगा। यह दिन जो देखने को मिल रहा है यकीन जाने ऐसे लग रहा है कि बुलडोजर 38 पे नहीं बल्कि वो हमारे घरों पे चल रहा है। हम किताबें लेकर अपने क्लास रूमों में बैठ जाएंगे और कहेंगे आइए बुलडोजर लेकर हमें इसी में दफन कर दीजिए। हम इसी में दफन हो जाएंगे मैम। दीप जिनके मोहल्लात में ही जले। चंद लोगों की खुशियों को लेकर चले। ऐसे दस्तूर को सुबह बेनूर को मैं नहीं जानता। जब आप इस यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर से बात करें तो वह भी अपनी बात को पूरी तरीके से नहीं रख पाते और बात करते-करते वो जज्बाती उठते हैं। छात्रों से बात करें तो उनकी आंखों में आंसू हैं। यहां की फैकल्टी से बात करें तो वो भी जज्बाती हैं। पेरेंट्स भी अपने बच्चों के फ्यूचर और उनके हाल को लेकर परेशान हैं। उनको एक डर सता रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि इस यूनिवर्सिटी पर वाकई में बुलडोजर चल जाएगा और यह यूनिवर्सिटी उनसे छीन जाएगी। हालांकि वो यह भी कहते हैं कि उन्हें यकीन है देश के संविधान पर, कानून पर, कोर्ट्स पर, अदालतों पर और उन्हें यकीन है उस परवरदिगार पर कि वो तो उन्हें कम से कम बिल्कुल मायूस नहीं करेगा और उनकी यह यूनिवर्सिटी बुलडोज नहीं होगी। लेकिन वो यह भी कहते हैं कि अगर सरकार ने यह तय कर ही लिया है कि वह उस यूनिवर्सिटी को बुलडोज करेंगे तो यह बुलडोजर उनकी लाशों पर से होकर गुजरेगा।

Companion article

Fifteen Days to Bulldoze a University

The Rampur Development Authority has declared 38 of the 40 buildings on the roughly 250-to-300-acre campus of Mohammad Ali Jauhar University illegal, ordering the institution to demolish them within fifteen days or have the authority do it and bill the university for the cost. Nous visited the campus in Rampur — founded and built by the jailed Samajwadi Party leader Mohammad Azam Khan — to hear from the students, faculty and administration living through the threat.

'All We Can See Is Our Career'

Student after student told Nous their overriding fear was simply for years already invested: some two or three years into a degree, others freshly graduated and now unsure their qualification will mean anything if the campus is torn down. One student, who said he studies under the physically-handicapped category, said his entire LL.M. degree costs him twenty-four thousand rupees, and that the university additionally provides him a free rickshaw between the gate and his faculty building each day. A woman completing her law degree argued that most students never chose Jauhar University because of its association with Azam Khan — for many in and around Rampur, she said, it is simply the only university within reach, since the city has no other.

Teaching Revolutions While Facing One

A sociology teacher and alumna described the discomfort of teaching her students about historical revolutions while her own college faced demolition orders, saying the disconnect had left her unable to sit with her usual lesson plans. A doctor and alumna, now practising as a gynaecologist at a hospital in the region, said she could not have completed her medical training without the university's low fees, and that two of her siblings had gone on to become a pharmacist and a doctor respectively, with a brother now working as an engineer and researcher in Norway — evidence, she said, of what the institution has made possible for families like hers.

Built by More Than One Community

Students repeatedly pushed back on the idea that the university serves only Muslims. It waives fees entirely for students who have lost both parents and grants a fifty percent concession to those raised by a single parent, they said, and its student body has never been exclusively Muslim; Hindu and Sikh donors and neighbours contributed to building it alongside Muslim ones, and one student told Nous the university treats every religion equally rather than favouring any one of them.

The Vice-Chancellor's Case

The university's vice-chancellor — addressed throughout the visit as Zaheer Sahab, and a former dean, department chairman and vice-chancellor at Aligarh Muslim University before joining Jauhar University, as well as a law professor — argued the demolition notice is legally void. The land in question, in the village of Singhankheda, was only brought under the Rampur Development Authority's jurisdiction in 2024, he said, meaning the notice applies the authority's rules retroactively to buildings constructed years earlier — a basic violation, in his account, of the principle that a law takes effect only from the date of its official publication, not before it. He asked pointedly what recourse the government could offer the thousands of students partway through a degree if the campus were demolished, comparing it to a student mid-way through an LL.B. being unable to transfer years of credit to another university.

Zaheer framed the demolition threat as retaliation against Azam Khan for his opposition politics, compounded, he suggested, by discomfort with the university's name — it honours Maulana Mohammad Ali Jauhar, a freedom fighter who once said he would rather not die in an enslaved India than compromise his principles. Targeting an institution over that name, Zaheer said, would be a matter of shame for whoever was doing it. He connected the notice explicitly to the fact that Azam Khan and his son Abdullah Azam are both currently jailed on what he described as a string of fabricated cases dating back to 2019, describing the university's targeting as intended to further pressure and mentally torment a man who built the institution, in his words, for the poorest families of Rampur, Moradabad and Bareilly — families who sometimes cannot be certain of a second meal in a day.

'We Will Teach Under the Trees'

Zaheer told Nous that if the buildings are torn down, students and faculty will hold classes under trees or on the roads rather than stop teaching, insisting a university is not something that can simply be erased. Across the visit, the emotional register was consistent: faculty and students in tears, parents anxious about their children's futures yet voicing faith in the constitution, the courts and God that the demolition will not ultimately proceed. But more than one voice on campus repeated a warning in the same breath — that if government bulldozers do arrive at Mohammad Ali Jauhar University, they will have to pass over their bodies first.

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