1:23Umar Khalid Case: Gaps in the Charge Sheet
“In Umar Khalid case, court hasn't connected the dots at all.”
Six years have passed. On January 5, 2026, the Supreme Court once again denied bail to Umar Khalid and Sharjeel Imam under the UAPA. Over time, their names have become familiar. You’ve probably heard them on TV debates, seen them in headlines, or in political speeches. But who are they, beyond th…
[संगीत] जी शद भाई बोलिए हां कैसे हो अल्हम्दुलिल्लाह आप बताएं कहां हो मैं अभी एसएफ टू में हूं बताइए हो गया क्लास क्लास हो गया है बस अभी मैं थोड़ा ऐसे ही चल रहा था आपको पता है कल सुप्रीम कोर्ट का बर्थडे आने वाला दो पिटिकलर है उसीलिए हम लोग बैठे हुए थे यहां पे लॉन में तो आइए बैठते हैं बात करते है अच्छा आप लोग लॉन में है एसएल टू के हम डिस्कस कर रहे थे आप ठीक है आते हैं हम दो मिनट रुकिए वो अपने लोग आपके अंदर प्लान करेंगे हिंसा भड़काने के लिए कभी बस जलाने के लिए आप लोगों से अपील अगर ऐसा कोई आदमी या आदमी ऐसा कोई दिखे तो उस आदमी को आप प्लीज आइसोलेट कर दीजिएगा अपना आंदोलन खराब मत होने दीजिएगा अगर वो डंडा लेकर आएंगे तो हम तिरंगा लेकर आएंगे और आपके इम्तहानात भी बढ़ेंगे आपको और इम्तहानों की गुजर करना पड़ेगा। आपको भड़काने आएंगे, अफरातफरी करवाने आएंगे, दंगा करवाने आएंगे। आपको पत्थर नहीं उठाना है। ये बस याद रख लीजिए। अगर कोई गड़बड़ी कर रहा है उसको पकड़ के कोने में करेंगे। उसका हिसाब पुलिस करेगी। [संगीत] समझ रहे हैं? उनको लगता है कि शायद इस बार जो है कम से कम बेल तो दे ही देना चाहिए कि एक लंबा [संगीत] वक्त हो गया है और सुप्रीम कोर्ट जो है में ये दोबारा वापस सुनवाई पहुंची है। उनको लगता है कि शायद इस बार जो है सुप्रीम कोर्ट जमानत दे दे और हमें उम्मीद है कि इस बार तमाम लोगों को जो है जमानत [संगीत] आपको बहुत लोगों को लग सकता है कि शायद उन्हें मिल जाए बेल। लेकिन मुझे लगता है कि आज जिस दौरान हम जी रहे हैं बहुत मुश्किल है कि उन्हें बेल मिले क्योंकि लगातार सरकार की तरफ से एक अटैक तो उन पे किया ही जा रहा है। मुझे तो नहीं लगता है कि उनमें से कोई भी आ [संगीत] रहा है। 6 साल भले ही हो जाएं। 6 साल चाहे और ज्यादा हो जाएं। मुझे नहीं लगता कि वो लोग आ रहे हैं जल्दी से। [संगीत] [संगीत] एंड टुडे द टॉप कोर्ट ऑफ द कंट्री डिनाइड बेल टू [संगीत] शजील इमाम एंड उमर खालिद रिफ्यूज टू रन बेल टू उमर खालिद एंड शजील इमाम इवन एज उमर खालिद एंड शजील इमाम कंटिन्यू टू स्टे इन जेल हमें दिल्ली जाम करना है हिंदुस्तानी मुसलमान शहरी है हमें शहरों में जाम करना है आप अगर हां सारे शेर हम क्या चाहते आजादी हम क्या चाहते आजादी जोर से बोलो आजादी आजादी में आजादी ऊंचा बोलो आजादी तुम भी बोलो आजादी तुम भी बोलो आजादी इधर से बोलो आजादी उधर से बोलो आजादी आजाद देश में आजादी आजाद देश में आजादी बीजेपी से आजादी आरएसएस से आजादी [संगीत] उमर बचपन से बड़ा ही फरमाबरदार बच्चा था और शुरू से ही उसके अंदर रहमदिली बहुत ज्यादा थी। लेकिन बचपन में उम्र गालिबन 5 साल के होंगे। उस वक्त बाबरी मस्जिद का हादसा हुआ था। और आज भी उनको उसकी यादें उनके जेहन में ताजा हैं। बच्चे कितना असर लेते हैं वो इसकी ये मिसाल है उम्र की कि उनको बहुत ज्यादा उनका असर अंदाज हुआ वो वाकया और जब वो ग्रेजुएशन में थे उस वक्त बटला हाउस एनकाउंटर हुआ। बटला हाउस एनकाउंटर ऐसा था कि शायद वो ही उसके लिए [संगीत] एक एक्टिविज्म में जाने का बहुत बड़ा सबब बना। इसीलिए उन्होंने फिर बस यह तय किया कि पढ़ाई और पढ़ाई के साथ-साथ मजलूमों के लिए जहां तक भी हो सकता है वह अपना वक्त लगाएंगे और उनके लिए आवाज बनेंगे। उमर खुद ही आ रहा था एक मुस्लिम पेटो से। तो अ जो हम लोगों के लिए कुछ सारे चीजें हम जान के बातचीत करके पढ़ के सीखते हैं। एटलीस्ट ऑन द क्वेश्चन ऑफ माइनॉरिटी क्वेश्चन अ मुस्लिम विच हंटिंग गेटवाइजेशन ये सारी चीजें अ के साथ वो वाकिफ था क्योंकि वो खुद ही जामिया से आता था। अ वो अपने आसपास वो दहशत देखा था। किस तरीके से एक कम्युनिटी को एक इस्लामोफोबिक लेंस से टारगेट किया गया। किस तरीके से उसका ब्रांडिंग किया गया। मीडिया में उसका किस तरीके का प्रचार था। ये सारी चीजों से वो वाकिफ था। उमर का पहले से ही ये था कि ये जिम्मेदारी हम लोगों की है कि हम जिस लोगों के टैक्स के पैसे से पढ़ रहे हैं उन लोगों की हकीकत उन लोगों का जो स्ट्रगल है उन लोगों का जो प्रॉब्लम्स है अह उसके बारे में बात करें। उसको सुधारने की बात करें। डिफिकल्ट क्वेश्चंस पूछे। दैट्स व्हाट आई वास टेलिंग ही नॉट लिसनिंग। हु इज ही उमर को विछ किया गया मीडिया के द्वारा टाइम्स नाउ और तमाम सारे चैनल ने वो किया। [संगीत] तमाम सारी चीजें जो बिल्कुल बिल्कुल बेबुनियाद है उसके बारे में बोली गई। तो उस समय में भी आपको याद रहेगा कि जेनू में हम अरेस्ट हुए हैं। कन्हैया अरेस्ट हुआ। [संगीत] उमर अरेस्ट हुआ। एक बहुत ही कंसर्टेड अटेम्प्ट मीडिया के [संगीत] द्वारा था। तो उस वक्त पे जिस तरीके से मीडिया ने भी उमर के चेहरे के ऊपर खास [संगीत] करके लालाल बॉर्डर लगा के उसके बारे में कि वो पाकिस्तान गया है, वो इधर गया है, उधर गया [संगीत] है। मैंने मीडिया में आके ये कहा कि ये बहुत ही गलत नैरेटिव आप लोग खड़ा कर रहे हैं। जिस आदमी के पास पासपोर्ट नहीं [संगीत] है वो पाकिस्तान कैसे गया? और ये इस तरह की कॉलें आप बता रहे हैं ये तो इंपॉसिबल है। [संगीत] वो मीडिया ट्रायल जो है उमर खालिद का एक्सक्लूसिवली उमर खालिद पे जो अटैक [संगीत] किया गया कि कन्हैया कुमार को, अनिरबान को और पूरी 10 12 लोगों की टीम थी उन पे उनको बिल्कुल छोड़ के सिर्फ ये तीन लोगों पे फोकस किया गया और तीन लोगों में भी उमर खालिद पे ज्यादा फोकस किया गया। आप अंदाजा लगाइए कि जब यह [संगीत] लोग उमर खालिद और अनिरबान स्पेशल सेल में मौजूद थे तो अनीरबान को यह ऑफर दिया गया बार-बार [संगीत] कि आप गवाह बन जाइए आप गवाह ये तो मुसलमान है हम इसको वो कर लेंगे [संगीत] साहब मैं लोग जो गाड़ी ले आए [संगीत] और आप देखिएगा कि जो अभी जो कुछ हो रहा है इस वक्त में यानी [संगीत] 2000 20 के वाक्य को बुनियाद बनाकर जो लार्ज केस के नाम पर [संगीत] शुरू हुई है उसमें भी आप देखिए उसमें तो काफी लोग थे मुसलमान भी थे गैर मुस्लिम भी थे जो सीए एनआरसी की तहरीक में शामिल [संगीत] थे लेकिन उन सबको छोड़ दिया गया सिर्फ मुसलमानों को टारगेट किया गया और अब मुसलमानों में से भी अब आप सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को देखेंगे तो उसमें से भी दो लोगों को खासतौर से उमर खालिद [संगीत] और शील इमाम को एक्सक्लूड यानी एक्सक्लूसिवली टारगेट किया जा रहा है। गांव में अरुणाचल, आसाम, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जहां तक मुझे याद है चारों स्टेट से पुलिस आए थे और उनकी पूरी टीम आई हुई थी। ये लगभग 5:30 चार चार बजे 5:30 की बात होगी सुबह की और सुबह लगभग फजर की अजान के पहले लगभग चार 3:30 4 बजे के आसपास मेरे दोस्त के घर पर रेड मारा उन्होंने और मुझे उठाया उस दिन सबसे पहले उसके बाद यहां से गाड़ी वाड़ी पे बैठा के लगभग 50 60 पुलिस वाले होंगे कमांडो वामंडो और वो सारे उठा के यहां से हमको ले गए और यूं ही एक खुले मैदान में उन्होंने मतलब आंख पर पट्टीवट्टी बांध दी और बोला दौड़ो वगैरह इस तरह की चीजें की मतलब वो एक तरह से एक एनकाउंटर फ्रेमिंग का एक मतलब कहते हैं ना वो पूरा दिखाने की कोशिश कर रहे थे ताकि कि हम परेशान हो और ये सारी चीजें हैं जो भी वो उनके सवालात हैं कि शरजील कहां है क्या है कैसे है उन सारी चीजों का जवाब दें यहीं पर लाया था उन्होंने उसके बाद वही बोलने लगे आंखों पे पट्टी बंधी हुई है बोल रहे हैं दौड़ो और वगैरह गाली बक रहे हैं उसके बाद बोल रहे हैं कि आंखों पे पट्टी बंधी है तो एहसास भी नहीं हो रहा कि दुनिया में आसपास चल क्या रहा है मतलब एक बिल्कुल कह सकते हैं अंधेरा कमरे में जैसे खड़े हैं वैसा महसूस हो रहा था और वो बोल रहे दौड़ो पता नहीं चल रहा कहीं संभल रहा हूं कहीं उठ रहा हूं उस उसी हालात साथ में बोलने दौड़ो। फिर लास्ट में ज़हन में क्या आया? अल्लाह बेहतर जाने। तंग आ के हम जाके भाई टीले पे बैठ गए। उसके बाद बोलते हैं भाग नहीं तो गोली मार दूंगा वगैरह सारी चीजें। तो मैं ठीक है जो करना है करिए आप। हम भागेंगे नहीं। ये हमने बोला। तो जब ये सुना तो फिर और गाली बकते आए पास में और मुंह में पिस्तल कॉक कर दिया। उसके बाद बोले मार दें वगैरह। गाली बक रहे हैं गंदी गंदी। क्या ही डर था। अब जब मुंह में पिस्तल कॉक किया था तो बस वही एक बार लगा कि आज जाना है तो [संगीत] ठीक है जाएंगे। अब एक तो ये हमारा एक चीज अकीदा बहुत पक्का है। ठीक है? हर इंसान दुनिया में [संगीत] कुछ गलतियां करता है। अच्छी बुराई, ईमान की कमी सारी चीजें होती है। कहीं ना कहीं इंसान से गलतियां होती है। बट एक चीज पे बड़ा मुकम्मल ईमान है कि मौत भरत है। तो जब मुंह में पिस्तल को किया तो आंख बंद किया। हम ला इलाहा इल्लल्लाह मोहम्मद रसूल्लाह पढ़ लिया। हम बोले अब मरना होगा तो कम से कम आखिरी वक्त तो अल्लाह को याद करके मरे। [संगीत] कुछ गलती होगी तो अल्लाह कम से कम गुनाहों से निजात देंगे। [संगीत] बहुत सारे मामलों में मेरे भाई से इख्तलाफ है। मतलब कोई [संगीत] बात हो गई तो उस पे मेरी मेरा थॉट प्रोसेस कुछ और है। उनका थॉट प्रोसेस कुछ और है। वो सारी चीजें होती है। बट अपार्ट फ्रॉम दैट जहां बॉन्डिंग की बात की जाएगी तो जाहिर सी बात है कि ही कैन डाई फॉर मी। आई कैन डाई फॉर। [संगीत] [संगीत] शजील जी वी डोंट एक्सप्रेस हिज इमोशंस मच। वो अपना दर्द बताता नहीं ज्यादा भाई साहब। तो इसलिए हमको नहीं हमसे भी नहीं बताता जैसे हम भी शल से मतलब बहुत है कीप इट टू [संगीत] असफ ये हमारे वालिद थे परेशान कितना भी हो वो अपने अंदर रखते थे और ही जस्ट ट्राई टू [संगीत] सॉल्व इट एंड लाइक सारी चीजें कैसे एक लाइन पे लाई जाए वो सारी चीजें वालिद साहब भी करते थे वो असर शायद हम [संगीत] दोनों में हमें जींस का वहां पे जब अरेस्टिंग का मामला था तो एक हमारे रिलेटिव भी आए मेरे खालू आए वहां से पटना से तो हालत ये था कि लोग जब लोगों से जब वो एड्रेस पूछ रहे थे वो फर्स्ट टाइम आए थे तो एड्रेस पूछ रहे थे कि भाई अकबर इमाम साहब का घर कहां पे है घर कहां पे है मतलब वो हिंदू मुस्लिम पूरा गांव घूम के किसी ने उनको घर नहीं बताया क्योंकि लोगों को ऐसा लगता था कि कोई ना कोई आईबी वाला है या कोई फोर्स से है तो फिर जाके तंग करेगा ये करेगा इसलिए कोई घर ही नहीं बताते थे तो ये हाल था अक्रॉस कम्युनिटी किसी ने घर नहीं बताया लास्ट में वो कोई एक बेचारा शरीफ आदमी सीधा आदमी मिल गया उनसे पूछा घर का है तो उसने रास्ता घर तक लाके पहुंचा दिया तो बोला उन्होंने कि हम रिश्तेदार हैं। हम पुलिस से नहीं है वगैरह तब जाके घर पहुंचाएगा। लोग बचपन से जान रहे हैं कितने गैर मुसलमान हो मुसलमान हो सबकी गोद में खेल चुके हैं शदीद तो उनके लिए वो आज भी एक बच्चा है जो कहीं ना कहीं इस हकीकत को जानते हैं कि वो एक गलत इंसान नहीं हो सकता और कहीं ना कहीं वो इस बात को बहुत बेहतर जानते हैं कि शजील की जो थॉट्स है वो मतलब लोगों के उद्धार के लिए है। उनके कह सकते हैं देश या कह सकते हैं किसी इंडिविजुअल की बुराई के लिए नहीं है। बाबरी मस्जिद [संगीत] का वर्डिक्ट आ गया सुप्रीम कोर्ट की तरफ से। उस वक्त जब पूरी कम्युनिटी के बड़े लीडर्स मुस्लिम कम्युनिटी [संगीत] को सब्र करने की हिदायत दे रहे थे और यह कह रहे थे कि [संगीत] कोई बात नहीं है। वी शुड एक्सेप्ट व्हाट हैज़ बीन प्रोनाउंस्ड। शजील भाई वाज़ वन ऑफ़ द वेरी फ्यू पीपल जिन्होंने ना सिर्फ मज़म्मत करी उस वर्डिक्ट की बट एक प्रोटेस्ट [संगीत] भी मोबिलाइज़ कर कर जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ऑर्गेनाइज करा। तो इट स्पीक्स अ लॉट टू हिज करेज। इट स्पीक्स अ लॉट टू हिज एबिलिटी टू लीड द कम्युनिटी। कि हमको सिर्फ डरना नहीं है। हमको जहां पर हम डिसटिस्फाइड [संगीत] हैं, जहां पर हम खुश नहीं है, अपनी नाराजगी को बुलंद आवाज के साथ दर्ज भी करना है। एंड [संगीत] दिस इज़ व्हाट शजील भाई डिड थ्रूउ दिस इज़ व्हाई शाहीन बाग वाज़ आल्सो सच अ बिग सक्सेस। [संगीत] एंड जब शाहीन बाग के रेजिडेंट्स अ प्रोटेस्ट के लिए सड़कों पर उतरे दे डिड नॉट नो व्हाट टू डू दे डिड नॉट नो कहां जाना है क्या करना है किससे बात करनी है वहां पर शजील इमाम और आसिफ मुस्तबा ने क्राउड को संभाला उनको यह समझाया कि हमको यहीं पे बैठ जाना चाहिए इस नेशनल हाईवे को ब्लॉकेट कर दे कर कर और अपनी डिमांड्स को एक पीसफुल तरीके से स्टेट के सामने रखना चाहिए गवर्नमेंट के सामने रखना चाहिए कि यह एक्ट यह बिल हमको हमको बिल्कुल भी एक्सेप्टेबल नहीं है। हम इसके साथ कभी नहीं खड़े हो सकते हैं। आपको इसको वापस लेना ही पड़ेगा। एंड दैट इज हाउ शाहीन बाग केम इंटू एक्सिस्टेंस। पहली मेरा कन्वर्सेशन पहला कन्वर्सेशन शेडल से 14 दिसंबर 2019 का है। [संगीत] एक हान आडेंट एक जर्मन फिलॉसफर है जिसको मैंने कोड भी कहा था कि इफ यू आर बीइंग एक्सप्लइटेड एस अ ज फाइट लाइक एज अ ज नॉट एज अ चैंपियन ऑफ द ह्यूमन नाइट्स। अगर आपको इस वजह से मारा जा रहा है कि आप मुसलमान हैं तो इस वजह से लड़िए कि आप मुसलमान हैं। जब सरकार आपको डिस्क्रिमिनेट करने का बेसिस रिलजन बनाती है तो उस डिस्क्रिमिनेशन से लड़ने का बेसिस रिलजन क्यों नहीं हो सकता? शजील और हमारा एकदम कनेक्ट हुआ इसी चीज से। तो मैं मानता हूं शरजील का जो रोल कनेक्ट लोग करते हैं या कनफाइन करते हैं शाहीन बाग से। शरजील का आईडिया इससे कहीं बढ़ गया है। शजील वो शख्स है जिसने यह डिसीजन लिया। आईआईटी से जेएनयू आया [संगीत] अपनी जॉब छोड़ के ताकि वो इस पे रिसर्च करें कि जो हिंदू मुस्लिम राइट्स जो मैन्युफैक्चर होते हैं इस [संगीत] मुल्क में उसका रियल कॉज क्या है? बाबरी मस्जिद का जो जजमेंट है उस पे एक पिटीशन बनाना उसको पैन इंडिया में फैलाना लोगों को बोलना कि ये जजमेंट एक क्लासिकल एग्जांपल है मेजिटोरिनियन टरनी का। जब शनू से आए थे शाहीन बाग [संगीत] तो कोई कपड़ा नहीं ले आए थे वो एक सेट ऑफ क्लोथ जो पहना था शजील ने वही पहन के आए थे और उसके बाद क्योंकि शाहीन बाग का मूवमेंट इतना बड़ा था एक मिनट की फुर्सत नहीं थी कि वो [संगीत] जेनू जा सके तो वो मुझे याद है कि हमारे किसी दोस्त के कुर्ता किसी का पजामा किसी किसी का जैकेट ये एक आदमी को देखिए जो इतना बड़ा मूवमेंट लीड कर रहा है उसको फिक्र नहीं है अपने सामान की उसको फिक्र नहीं कि मुझे जेएनयू जाके बेसिक चीजें लेके आनी है। तो उसका जो पैशन था वो रिमारकेबल था। लोग इसी से कनेक्ट करते थे। इन छ सालों में, सात सालों में बहुत सारे स्कॉलर से मैं मिला हूं। [संगीत] स्कॉलर तो स्कॉलरली बात बहुत करते हैं। किताब में उनको थ्यरी बहुत मालूम है। लेकिन बहुत ही रेयर स्कॉलर्स होते हैं जो ग्राउंड पे कनेक्ट होते हैं। शजील जेएनयू में स्कॉलरली टॉक भी कर रहे हैं। शजील शाहीन बाग में सड़क पे भी बैठे हैं। शजील शाहीन बाग सड़क [संगीत] पे सो रहे हैं। शजील मासेस को कनेक्ट कर पा रहे हैं। ये सारी चीजें हमको समझनी पड़ेंगी कि व्हाई डिड द स्टेट गो आफ्टर शजील इमाम? द स्टेट वेंट आफ्टर शजील इमाम बिकॉज़ ही वाज़ [संगीत] एन आर्टिकुलेट मुस्लिम हु वाज़ अनपोलजेटिक हु वाज़ वेरी क्लियर इन व्हाट सिस्टेमिक प्रॉब्लम्स द मुस्लिम कम्युनिटी इज़ फेसिंग एंड ही हैड एन आईडिया ऑफ़ हाउ टू गो अबाउट इट हाउ टू टैकल दीज़ प्रॉब्लम्स एंड हाउ टू रियलाइज़ द एस्पिरेशंस ऑफ़ द मुस्लिम कम्युनिटी। जी अस्सलाम वालेकुम। जी अम्मी निकल गए। नहीं नहीं हबीब भाई हैं और मेहरबान है रहीम भाई हम अहमद 12:00 बजे आएगा 11:30 तो उस टाइम लेट हो रहा था तो तैयार हो रहे थे हम हां हां नहीं देखा अभी और ये बोलना कि ट्रायल्स वाला 2 घंटे में आ रहा है हम हम प्रेस क्लब अब कल हम आ ही जाएंगे ना एक प्रेस क्लब होगा या प्रेस क्लब ऑफ इंडिया होगा हम मोटा-मोटी रेस क्लब ठीक है अल्लाह हाफज़ देखिए हम हम सच कहें तो हमें उम्मीद थी कि बेल हो जाएगा लेकिन शजील भाई पहले भी 50-50 थे अल्लाह जाने क्यों मतलब क्या उनको लग रहा था। उन्होंने बोला था कि बहुत सारी चीजें बोली कि यह करो वो करो। बोले आप तो आ ही रहे हो। क्या करना है? बस 15 दिन बाद कर लेना आप। तो बोले नहीं नहीं बेल डिनाई भी हो सकता है। तुम तैयारी में रहो। ये काम करना है वो काम करना है। सारी चीजें तो ही वास मेंटली प्रिपयर्ड फॉर द कह सकते हैं मतलब नेगेटिव ऑर्डर टू। बट ठीक है। हमको उम्मीद थी कि आप कितना ही मतलब अन्याय करेंगे और कितना ही जुल्म की इंतहा है कि मतलब एक लड़का जो कि जेल में है जो दंगा हो रहा है और उसको आप जेल में कास्परेटर बताते हैं। तो ये तो बहुत ही हास्यास्पद है। मजाक मजाका वाली चीज है। लेकिन चलिए एक्सपेक्टेशन थी कि बेल होगी नहीं हुआ। [संगीत] तो जब कोर्ट में जा रहा था मैं तो जितने मीडिया के लोग मिले वो सब मुबारकबाद दे रहे थे। कह रहे मिठाई लाइए मिठाई लाइए कि अब तो बेल मिलने वाली है आज। लेकिन बहरहाल तो वह बहुत मायूसी हुई कि भाई अदालत ने जिस अंदाज का फैसला दिया है वो हिंदुस्तान की तारीख का बिलकुल नादिर फैसला है। एक [संगीत] वो नैरेटिव था जो स्पीच को लेकर के कि खाली स्पीच के वजह से अंदर है। वो क्लेरिटी [संगीत] सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट में ही है जिसमें लिखा है कि शील टॉक्ड अबाउट दी चोकिंग ऑफ़ एसेंशियल सर्विसेस। ये सुप्रीम कोर्ट ने खुद ही लिखा है और ये चीज भी हम आज रखने वाले हैं क्योंकि हम अभी रिसेंटली देखें कि वो एक सांसद हैं जो कांग्रेस के नाम [संगीत] हम भूल रहे हैं। उनसे पूछा गया है ऑन एयर कि शीलम की स्पीच को आप कैसे डिफेंड करेंगे? तो उनके पास जवाब ही नहीं है कि भाई कोर्ट उसको बोल रहा है डायरेक्टली। तो आप कौन होते हैं इस चीज को कि [संगीत] अगर आप सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला मान लें कि शीलम को भी अंदर होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला भी तो मानिए वो रीडिंग भी तो मानिए जिसमें उन्होंने बोला कि चोकिंग की बात कर रहा है। काटने की बात नहीं कर रहा है। यानी मेरे ख्याल से हिंदुस्तान की तारीख में मुसलमानों की सबसे कामयाब और मास मूवमेंट अगर कोई थी तो सीएनआरसी मूवमेंट थी। तो इनको लगा कि ये ये तो बड़ा गड़बड़ हो रहा है। तो इनको सबक सिखाना चाहिए। तो [संगीत] ये जो 2020 का में दंगों से जोड़ के इन लोगों को साइलेंट कासी और वगैरह में फैलाने की कोशिश की गई और इतनी लंबी चार्जशीट बनाई गई कि ये लोग पूरी जिंदगी ही उससे निकल ना सके। 3000 पंडों की चार्जशीट है और उसके अलावा 900 गवाहे हैं। गवाह गवाह विटनेसेस हैं इसके अंदर। तो आप अंदाजा लगाइए कि कितना लंबा प्लान किया है। [संगीत] जिन लोगों ने भी ये बनाया है। कितना लंबा प्लान किया है कि पूरी जिंदगी इनका ये केस लड़ते लड़ते ही निकल जाए। तो आप देखिए कि अब हालांकि उसमें कोई दम नहीं है। पूरी चार्जशीट को आप उठा के देखिएगा सिवाय कहानियों के अली फ्लाई की दास्तान है। उसके अलावा कुछ भी नहीं है। जो इतनी भारी मोटी चार्जशीट है उसमें कहीं पे उन्होंने ये नहीं दिखाया है कि दीज़ पीपल [संगीत] वर एक्चुअली यूजिंग सीएए एज अ रूल्स और दैट दे वांट इन इस्लामिक स्टेट। दिस इज़ जस्ट अ बोल्ड पिटिकल एलगेशन। सो देयर आर मेनी मेनी मेनी गैप्स इन द चार्जशीट। अगर आप चार्जशीट को पढ़ें तो यह भी नहीं साफ है कि वो अलज क्या कर रहे हैं। [संगीत] क्या मास्टरमाइंड किया इन लोगों ने? क्या कास्परेसी थी? ये कैसे जानते [संगीत] थे कि इनके प्रोटेस्ट करने से दूसरों को इतना गुस्सा आएगा कि वो आके अटैक करेंगे। इसी चार्जशीट में जो एमएलसीस [संगीत] हैं मेडिकल मेडिकल लीगल रिपोर्ट्स दे मोस्टली मुस्लिम्स हु [संगीत] वर इंजर्ड द आसन द लॉस ऑफ़ प्रॉपर्टी अगेन इज़ सिग्निफिकेंटली मुस्लिम द डेथ्स आर सिग्निफिकेंटली मुस्लिम। सो देन हु इज़ द पर्सन हु आइदर गॉट इनसाइटेड और गॉट प्रोवोक्ड? हाउ आर दे लिंक्ड टू द प्रोटेस्ट्स? दैट इज़ नॉट क्लियर। और जब तक आपका केस कोहेरेंट नहीं है फॉर द कोर्ट टू देन रिलाई ऑन इट एंड से दैट दिस इज अ सीरियस टेरर ऑफेंस इस टू माय माइंड आर लिटरेरी दे हैव कनेक्टेड द डॉट्स एट ऑल अल्हम्दुलिल्लाह ये कुछ नहीं है इंशा्लाह हमारी हमारी परेशानी सिर्फ ये है कि हमको जुडिशरी से ये तो नहीं थी कि जुडिशरी हद तक इस इतना वो चले जाएंगे तो बाकी तो जहां तक वो हुकूमत का रवैया है पुलिस का रवैया है वो तो बहुत गैर मामूल है पहले से ही मालूम था वालदा का भी मामला ऐसा है कि वो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस इस तरह की चीजों से बहुत ज्यादा परेशान नहीं होती उनकी परेशानी सिर्फ ये है जेल के अंदर सर्दी का मौसम है और हवा आती है चारों तरफ से खुला हुआ है और कपड़े गरम कितने रखने का मौका होता है कंबल एक दिया जाता है उससे काम चलने वाला नहीं है मतलब आंख खुलते ही [संगीत] सबसे पहला ख्याल जो है वो उम्र का ही आता है और रात को सोने के वक्त तक भी हम जाहिर है कि कितने कंफर्ट में और सब [संगीत] हैं। बहुत दिनों तक कभी उमर ने अभी भी वो जेल में भी अपनी तकलीफों का या किसी के बारे में हमसे बताते नहीं है और हमें तसल्ली देते हैं। लेकिन पैरोल पे आए हुए थे तो किसी बात हुई तब हमें पता चला कि स्पेशल सेल [संगीत] में पैर में उनको जंजीर बांध के रखा जाता था। इसमें कौन अकाउंटेबल है? किससे पूछा जाए? किससे इंसाफ की गुहार लगाई जाए? ये बात गौर फरमाने वाली है कि जो स्पीचेस के लिए एफआईआर हुए थे वो पांच अलग-अलग एफआईआर हुए थे 25 और [संगीत] 26 जनवरी 2020 को। उन पांचों एफआईआर में बेल मिल चुकी है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यह क्लियरली बोला था कि शरजील [संगीत] इमाम ने किसी को भी हथियार उठाने के लिए नहीं कहा। उसने वायलेंस का कॉल नहीं दिया और यह बोल के बेल ग्रांट की गई थी। और इस एफआईआर 59 में जिसमें अभी ये कस्टडी में है। उस केस में भी ये [संगीत] सारे लोग मिस कर जाते हैं देखना कि यह एफआईआर हुई थी दिल्ली दंगे के लिए कि दिल्ली दंगे की कॉनस्परेसी इन [संगीत] लोगों ने की। दिल्ली दंगा हुआ था फरवरी के एंड में 2020 और शरजील इमाम इस स्पीच [संगीत] के एफआईआर में 28 जनवरी 2020 से कस्टडी में है। 11 फरवरी को भी शरजील इमाम जेल में था। तो यह कहना कि या तो स्पीचेस की वजह से इसके बेल डिनाई की गई है या फिर क्योंकि इस तरीके की डिवाइसिव बयान इन्होंने दिए थे इसलिए बेल डिनाई किया गया। ये सब गलत है। अगर कोई भी इंसान उनकी वो पूरी स्पीच सुनेगा, इट वुड बी वेरी क्लियर व्हाट [संगीत] ही इज़ टॉकिंग अबाउट। ही इज़ टॉकिंग अबाउट चक्काजाम व्हिच इज नॉट सेडिशन, व्हिच डज़ नॉट अमाउंट टू यूएपीए। इट्स अ डेमोक्रेटिक मोड ऑफ़ प्रोटेस्ट। [संगीत] बट स्टिल द स्टेट क्रिमिनलाइज्ड हिम एंड व्हाट इज़ मोर डिसपॉइंटिंग इज़ दैट द सिविल सोसाइटी, द सेक्युलर पार्टीज, द लेफ्ट लिबरल पार्टीज दे [संगीत] सपोर्टेड स्टेट्स क्रिमिनलाइजेशन। इस बयान को ऐसे पेश किया गया कि शरजिल ने असम को भारत से काटने की बात की है। लेकिन अगर आप इसके पूरे बयान को देखिए तो कुछ और पता चलेगा। द स्पीच इज अबाउट 40 मिनट्स लॉन्ग एंड इफ वन लिसंस टू द एंटायर थिंग इट्स क्वाइट क्लियर दैट ही इज कॉलिंग फॉर अ चक्का जाम। एंड शर्जिल इमाम ने हर जगह अपने हर स्पीच में अगर आप कोई भी स्पीच उठा के देख लें तो शुरू से यह कहा है कि मॉडल चक्का जाम होना चाहिए। डिसरप्टिव चक्का जाम होना चाहिए कि चक्का जाम करने से अगर उनका कहना है कि कोई एक मोड ऑफ प्रोटेस्ट है जिससे कुछ अचीव किया जा सकता है कंस्ट्रक्टिवली और वो अगर इललीगल नहीं है तो आई डोंट थिंक कि इसको किसी भी और नजरिए से देखना चाहिए। अब करना क्या है? जो बातें मैंने बोली आप अपने हॉस्टल में बोलिए या हमें चक्का जाम करना है। ठीक है। अगर हम सड़क जाम कर रहे हैं और आप मदद करना चाहते हैं तो खूब आइए। पैर मक है आपका कि हम रास्ता नहीं बंद कर रहे सड़क बंद कर रहे ये हाईवे जाम है इस रोड को हम तब तक जाम रखेंगे जब तक हमारी हैसियत कभी भी किसी भी स्पीच को पूरे कॉन्टेक्स्ट में देखा जाता है अगर ये 1 घंटे 5 मिनट की स्पीच है [संगीत] तो आप इसमें से सिर्फ 39 सेकंड्स को अलग से देखें और बाकी के स्पीच को अलग से देखें [संगीत] तो यह सही बात नहीं है। [संगीत] देखिए हम विक्टिम नहीं है। ये हकीकत है कि मैं बताऊं मैं विक्टिम नहीं हूं। विक्टिम यहां पर नजीब है जिनके साथ जुल्म हुआ है। विक्टिम उसको कहते हैं कि जिसके साथ कहीं ना कहीं ऐसा हादसा हो जाए जिसके लिए वो तैयार ना हो। [संगीत] हम पहले दिन से तैयार हैं। जिस दिन अब सड़क पर उतरे हैं। हमारे शील भाई हो, हम हो या हमारे जैसे हजारों स्टूडेंट्स [संगीत] हो जिन्होंने अपनी किसी ने आंखें खोई, किसी का हाथ टूटा, किसी का पांव फटा, सर फटा। कितने बच्चे खो दिए। तो वो पहले दिन से तैयार हैं। सड़क पे जिस दिन उतरे हैं कि हम इस तानाशाह सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ने जा रहे हैं अपने हुकूक के लिए। तो वो पहले दिन से तैयार हैं। और जब लड़ाई अब लड़ने उतरते हैं अपने हक के लिए तो आप विक्टिम नहीं। आप अपने हक की लड़ाई लड़ने जा रहे हैं। मैं आज तक छ साल में कभी मीडिया में नहीं आया। मुझे लगता है पहली बार मैं आपसे [संगीत] रूबरू हूं क्योंकि मैं कभी अपने आप को एक विक्टिम के तौर पे देखना ही नहीं चाहता ना। नहीं शील इमाम चाहते हैं। अगर आप देखेंगे कि जिस तरह का मुकदमा कायम किया गया है शजील इमाम पर या उमर खालिद पर या और दूसरे लोगों पर उसको देखकर आपको हंसी आएगी के इनके सबूत में जो चीजें पेश की जा रही हैं उस पर 153 का सीआरपीसी के दफा 153 भी ना लगा लग नहीं सकता। लेकिन उस पे अनलॉफुल एक्टिविटीज एक्ट लगा दिया गया। व्हेन यू से कि ये सब टेरा एक्ट हो सकता है। राइट दैट द द गवर्नमेंट द स्टेट विल डिसाइड द प्रोसक्यूशन विल डिसाइड देन यू आर बायपासिंग प्रेसिडेंट फ्रॉम फ्रॉम द सुप्रीम कोर्ट देयर जजमेंट्स अपॉन जजमेंट्स। बार-बार कोर्ट्स ने ये कहा है कि अ प्रोटेस्ट अ प्रोटेस्ट मार्च और अ धरना और अ बंद इज एट बेस्ट अ पब्लिक डिसऑर्डर। यू नो यू कैन यू कैन अप्लाई आईपीसी सेक्शंस। आप 144 लगा दीजिए। आप अनलॉफुल असेंबली में पकड़ लीजिए लोगों को। राइटिंग में भी पकड़ सकते हैं लोगों को। यह टेरर एक्ट कैसे बन गया? और जब कोर्ट ये कहता है कि इट कैन बी अ टेरर एक्ट। तब आप पूरा इख्तियार दे रहे हैं गवर्नमेंट को स्टेट को कि वो डिस्क्रेशनरी पावर अपना यह करें। वो कहे कि हम इसको मानेंगे टेरा एक्ट। इसको नहीं मानेंगे टेरा एक्ट। 2 मार्च को हम गए बाकायदा हम यानी कमीशन के एक पूरे वफ के तौर से गए और फिर पुलिस वाले भी काफी तादाद में हमारे साथ थे और दूसरे लोग भी वहां के जो मकामी लोग थे वो भी साथ हो गए पूरा एक समझ लीजिए जत्थ था और जाकर के हमने तकरीबन हर जगह देखा जहां ये हुआ था तो आंख से नजर आ गया कि ये हुआ क्या है मतलब मतलब मुसलमान का घर जलाया गया, तोड़ा गया और साथ ही हिंदू का घर उसे कुछ भी नहीं हुआ। मस्जिदें तकरीबन 19 या 21 मस्जिदें ना इसमें नंबर पूरे हमने उसमें लिस्ट में दिया हुआ है। मस्जिदें तोड़ी गई, मस्जिदें जलाई गई बल्कि मस्जिदें जो है ना ब्लास्ट की गई। [संगीत] देखिए कितने लोग रोजाना ही बल्कि आजकल एकदम आम हो गया है कि जब देखिए के एक आदमी निकलता है कि मुसलमानों का कत्लेआम करना है उनका जेनोसाइड करना है उनको खत्म करना है इसके खिलाफ क्या केस नहीं होना चाहिए कोई भी केस नहीं होता है वो जो एक पकी मान ले कौन सा आदमी है उसको गिरफ्तार किया गया चारप दिन में उसकी बेल मिल गई यानी [संगीत] जो आदमी हजारों तलवें तकसीम कर रहा है। उसको तो चारप दिन में बेल मिल जाती है। और जिस आदमी ने कुछ किया ही नहीं है। यानी उमर खालिद और जिसकी बात कर रहे हैं [संगीत] शरजील की तो अभी तक कुछ साबित नहीं हुआ है। आप क्या इंतजार कर रहे हैं? छठा साल क्यों गुजर गया है? कौन सा इतना बड़ा केस है आपके के पास कि आप जो आप उसका ट्रायल नहीं शुरू कर रहे हैं। ट्रायल शुरू कीजिए। अब तक तो कोई भी ट्रायल होता अगर डे टू डे होता तो पांच छ महीने में सब खत्म हो गया होता। दूसरी बात यह कि आप कह रहे हैं कि रिजीम चेंज [संगीत] चाहते थे तो अगर रिजीम चेंज चाहते थे अगर गवर्नमेंट बदलना चाहते थे तो [संगीत] डेमोक्रेसी में तो यह होता है ये सबको हक है द चार्जशीट डजंट एक्सप्लेन व्हाई रिजीम चेंज इज अ प्रॉब्लम वो बार-बार कहते हैं रिजीम [संगीत] चेंज रिजीम चेंज रिजीम चेंज इसमें इंप्लिकेशन ये है कि आप वो करना चाह रहे थे जो श्रीलंका [संगीत] में हुआ या जो नेपाल में हुआ या जो बांग्लादेश में हुआ कि आप वायलेंटली रिजीम चेंज करना चाहते देते बट देयर इज नो एलगेशन नॉट वन एलगेशन दैट एनी ऑफ़ द [संगीत] प्रोटेस्टर्स टारगेटेड एनी गवर्नमेंट फैसिलिटी। यह तो आप आपने कहीं नहीं कहा है कि प्रोटेस्टर्स ने एक बार भी गवर्नमेंट को या गवर्नमेंट फैसिलिटीज़ को वायलेंटली [संगीत] टारगेट किया हो। यह तो आपका एलिगेशन नहीं है। देन व्हाट डस रिजीम चेंज मीन? दे वर डूइंग [संगीत] धरनाज़ दे वर डूइंग अ प्रोटेस्ट व्हिच इज देयर डेमोक्रेटिक कॉन्स्टिट्यूशनल राइट [गाना गाने की आवाज़] [संगीत] शजील हो गुलफिशा हो खालिद सैफी हो इन तमाम सारे लोगों के लिए ये बहुत इंपॉर्टेंट है कि बाहर बातें होती रहनी चाहिए तो उसके लिए तब भी जेल का वक्त जो है जो वो गुजार रहा है वो मीनिंगफुल तभी होगा जब उसके [संगीत] बारे में नहीं लेकिन मुद्दों के बारे में बातचीत जारी हो और उस बातचीत के लिए उसका जेल [संगीत] जाना अगर एक टूल बन जाता है उस बातचीत को जारी रखने के लिए देन दैट इजेंट राइटर्स को तो उन लोगों ने छोड़ दिया जो लोग पीसफुल प्रोटेस्ट कर रहे थे उसके ऊपर ये तमाम सारी चीजें थोपा गया और बिना कोई एविडेंस का [संगीत] अ मतलब इतना मनगढ़ंत एक केस जो प्रशांत भूषण भी कुछ दिन पहले कह रहे थे जो कोर्ट में एक दिन ना टिक पाए वो अभी 5 [संगीत] साल हो गए ये तमाम सारे लोग अभी बीजेपी में उसका जो विछटिंग [संगीत] हुआ उसका असर वहां तक सीमित नहीं थी। हम लोग जेल गए हम लोग जेल से वापस आ [संगीत] गए लेकिन उमर कभी अपने नॉर्मल जिंदगी में वापस नहीं आ पाया। तो उमर को बेल हो भी जाती है जब वो घर आ भी जाएंगे [संगीत] तो उनके लिए वो आजाद जिंदगी तो नहीं होगी। नॉर्मल लाइफ नॉर्मल लाइफ गुजारने लायक तो उन्होंने इन लोगों को छोड़ा नहीं कि वो अपनी जिंदगी में आगे फ्रीली [संगीत] कुछ भी काम कर सकें। वो ऐसा उन्होंने रखा छोड़ा ही नहीं है। बड़ा लंबा टाइम हो गया। हम लोग कोई सोचे भी नहीं थे कि कभी ऐसा भी हो सकता है 6 साल 7 साल 8 साल लग जाएगा। नहीं ये लोगों ने केस जिस तरह बनाया है ना। आप समझते हैं इनकी जिंदगी में केस का फैसला हो पाएगा? कभी नहीं। मेन आर्गुमेंट हमारा हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह यही था कि अब इतना [संगीत] डिले हो चुका है। डिले इन ट्रायल के बेसिस पे ही आप बेल ग्रांट कर दो। बट यह जानते हुए [संगीत] कि ट्रायल बहुत लंबा चलने वाला है। 1000 से ज्यादा विटनेस आएंगे इसमें। [संगीत] 18 एक्यूज़्ड हैं। बहुत टाइम लगेगा। हमें ये उम्मीद थी कि बेल दे देगा सुप्रीम कोर्ट। बट बेल ग्रांट नहीं [संगीत] किया गया। अब फिर एक साल का कंडीशन लगाया गया है कि एक साल में अगर ट्रायल हो जाता है कंप्लीट तो [संगीत] ठीक है वरना फिर आप फिर से अपना बिल रिन्यू कर सकते हैं। ऐसा लगता ही नहीं है उनको देख के कि वो परेशान [संगीत] हैं या वो थक गए हैं। सुरजील भाई के बारे में मैं एक ये बात कहना चाहूंगी। इवन आफ्टर सिक्स इयर्स ऑफ इंकार्सिरेशन [संगीत] कोई कुछ भी कहे उनका ज़हन आज भी आजाद [संगीत] है। एक तरह से सिर्फ इनकी पनिशमेंट है और एक एक खास कम्युनिटी के होने की पनिशमेंट [संगीत] है और बोलने की पनिशमेंट है। सड़क पे आने की पनिशमेंट है। जबकि इन सब बातों की हमारे मुल्क में हमारे कानून ने, हमारे दस्तूर ने हमको पूरी इजाजत दी है। लेकिन आज यह हुकूमत समझती है कि यह इजाज़त और यह हुकूक सिर्फ़ एक कम्युनिटी [संगीत] के हैं। दूसरे के नहीं है। उमर का एक मतलब जो पिछले [संगीत] 5 साल में एक ठहराव भी आया है। जो हम देखते थे कि हम 2016 में बहुत कम समय के लिए हम लोग जेल [संगीत] में गए थे। लेकिन उस समय पे उम्र का एक था कि कब बाहर निकलेंगे। अ तो वो बेचैनी थी। पिछले 5 साल में हम जितने बार जाकर [संगीत] उससे मिले हैं, हम यह महसूस किए हैं कि उसमें एक ठहराव है। वो चीजों को एक लंबे समय तक [संगीत] देख पा रहा है। एक हिस्ट्री का जो एक आर्क रहता है, उसमें उसको पता है कि हम सबका अभी जेल में एक किरदार है और उस रोल को वो समझता है कि हमारा रोल अभी जेल में है। [संगीत] हमेशा मेरी वाल्दा का कहना है कि अगर हम शायद मिलने जाएंगे तो शायद मेरे लिए थोड़ा मुश्किल है कि हम उसको वापस छोड़ के आएंगे। क्योंकि जेल की एक सलाखों के पीछे अपने बेटे को छोड़ के आना किसी [संगीत] भी मां के लिए वो कह सकते हैं बहुत आसान काम नहीं है। इसलिए हमारी वालदा नहीं जाती हैं। जिस दिन भाईजान जा रहा था सरेंडर करने के बाद [संगीत] और दिल्ली पुलिस के कॉल के हिसाब से अरेस्ट। तो उस दिन अम्मी ने बोला जाओ तुमको अल्लाह के हवाले किया। [संगीत] और वो अभी तक उसी पे स्टगेंट है। उन्हीं लफ्जों पे कायम है कि हां मैंने उसको अल्लाह के हवाले किया। अल्लाह [संगीत] उसकी हिफाजत करे। फिर भी मुझे अल्लाह की जात से उम्मीद है। इंशा्लाह बेहतर वो होगा उनके हक में [संगीत] और इस सिलसिले में सूर यूसुफ मेरे लिए बहुत ही मतलब मेरे दिल से करीब है और मेरे लिए बहुत बाई सुकून [संगीत] है। तो इंशा्लाह ताला हमें नजर नहीं आता अल्लाह की हिकमत। अल्लाह ताला हिकमत [संगीत] के साथ वो फैसला भी आएगा कि वो हमारे साथ आकर मिलेंगे इंशा्लाह इन [गाना गाने की आवाज़] यूसुफ यूसुफ कदम मनहु अल इनहु यस फ इन्लाह ला अजुल मोहसनीन [संगीत] [संगीत] [संगीत] [संगीत]
Companion article
On the day India's Supreme Court took up the bail pleas of Umar Khalid and Sharjeel Imam, students on a university campus were already bracing for the outcome. In one conversation caught on the eve of the hearing, a student urges friends gathered on the lawn not to let anyone provoke them into violence once the verdict comes, warning that any disorder would be used against the protest itself and only prolong their own troubles.
The anticipation gave way to disappointment. As archival news broadcasts recorded it, the country's top court had denied bail to Sharjeel Imam and Umar Khalid, refusing them relief even as both continued to sit in jail. The setback extended a wait that, for both men, now stretches past six years, almost all of it in pretrial custody under the Unlawful Activities (Prevention) Act, India's principal anti-terror law, in a case built around the protests against the Citizenship Amendment Act (CAA) and the communal riots that followed in northeast Delhi in February 2020.
Those protests are remembered partly through their soundtrack: the chant of azaadi, or freedom, that rang out at Shaheen Bagh and at sit-ins across Delhi, alongside calls to jam the capital's roads in peaceful defiance of the new citizenship law. The accounts that follow come from people close to both men, family members and fellow organisers who are not named in the recording used for this piece; they are identified here by their relationship to Khalid and Imam, which is what the material makes clear.
Umar Khalid was around five years old when the Babri Masjid was demolished in 1992, and those close to him say the memory has stayed vivid in his mind ever since, evidence, in their telling, of how much children absorb from events around them. Years later, while he was still an undergraduate, the Batla House encounter became what family and friends describe as the turning point that pulled him toward activism, after which he resolved to combine his studies with speaking up for the marginalised. Coming from a Muslim background himself, he was, in the words of one person who knew him well, already familiar with how a minority community could be targeted through an Islamophobic lens and packaged that way in the media.
That familiarity became personal in 2016, when Khalid was one of several JNU students accused of sedition alongside Kanhaiya Kumar and Anirban Bhattacharya. Associates say the wider group of ten or twelve students was largely set aside while media coverage fixed overwhelmingly on three names, and on Khalid most of all: television channels ran unverified claims that he had travelled to Pakistan, even though, as he pointed out at the time, he did not hold a passport. One person detained alongside him has recalled that police repeatedly pressed Anirban to turn prosecution witness against Khalid specifically because he was Muslim.
Sharjeel Imam's path ran through IIT and then JNU, where he gave up an engineering career to research the roots of communal riots in India. When the Supreme Court delivered its Ayodhya verdict in November 2019 and prominent Muslim leaders counselled the community to accept it quietly, Imam was among the few who instead helped organise a protest at JNU. Weeks later, when residents of Shaheen Bagh poured onto the streets against the CAA without a clear sense of what to do next, associates say it was Imam, working alongside fellow organiser Asif Mustafa, who helped shape the sit-in: block the highway, stay peaceful, and press the demand until the law was withdrawn.
Those who organised alongside him describe a man so consumed by the movement that he arrived at Shaheen Bagh with only the clothes on his back, wearing borrowed kurtas and jackets for months because there was no time to return to campus for his own belongings. One fellow organiser invokes the philosopher Hannah Arendt's argument that a person persecuted for one identity should resist as that same identity, not merely as an abstract rights-bearer, and says that logic was what drew them to Imam's politics. In their account, the state went after him because he was an articulate, unapologetic Muslim voice, clear about the community's problems and about how to address them.
The larger conspiracy case against Khalid, Imam and sixteen other co-accused rests on a chargesheet running to roughly 3,000 pages and naming close to 900 witnesses, a scale that lawyers and family alike argue is designed less to prove a crime than to keep the accused fighting litigation for the rest of their lives. The veteran lawyer Prashant Bhushan has said the case would not survive a single day of real scrutiny in open court.
Imam's own legal history undercuts the state's timeline. Five separate FIRs were filed against him over speeches he gave on 25 and 26 January 2020, and all five have since resulted in bail, with the Allahabad High Court explicitly finding that he never called for anyone to take up arms or resort to violence. Yet he remains in custody under a sixth case, FIR 59, which accuses him of conspiring to cause the Delhi riots, even though he had already been in jail since 28 January 2020, weeks before those riots broke out at the end of February.
The speech at the centre of that case has often been reduced to a single line about cutting Assam off from India, stripped of its roughly 40-minute context. Even the Supreme Court's own order describes Imam as having spoken about the choking of essential services through a chakka jam, a road blockade, rather than any call to sever territory or incite violence, a form of protest courts have elsewhere treated as, at most, a public-order offence rather than sedition or terrorism.
Family and associates also point to gaps in what the chargesheet actually establishes: that the CAA-NRC movement included Hindus as well as Muslims, yet only Muslim organisers were pursued; that the document never explains how blocking a road was expected to provoke attackers, or shows any intent to target a government facility despite alleging the accused sought regime change; and that when activists visited the riot-affected neighbourhoods, they documented nineteen to twenty-one mosques damaged, burned or deliberately blown up, while Hindu properties nearby were untouched, and that most of the injured and dead were themselves Muslim, a pattern hard to square with a theory of Muslim-orchestrated violence. Meanwhile, people who have openly called for violence against Muslims elsewhere have been granted bail within days.
One family member recounts being picked up during the search for Imam himself: blindfolded, driven to an open field, told to run, and threatened at gunpoint before being asked, over and over, where Sharjeel was. At what felt like the worst moment, with a pistol cocked against his face, he recalls closing his eyes and reciting the Islamic declaration of faith, prepared, as he puts it, to die remembering God rather than in fear.
Those closest to Imam describe a household where pain is rarely spoken aloud. His father, they say, absorbed his own worries silently and tried simply to keep the family steady, a trait Imam seems to have inherited; even now, in prison, he tends to reassure relatives rather than describe his own hardship. It was only during a period of parole, family members say, that they learned he had been kept in leg chains inside the special cell.
His mother does not visit the jail, relatives explain, because leaving a son behind bars is not something she can bring herself to do more than she must. On the day he surrendered to be arrested, she told him only that she had entrusted him to God, words the family says she still repeats today.
Those who visit Khalid describe a similar toll, coupled with a change in him over the past five years: less of the restlessness he showed during a brief spell in custody in 2016, replaced by what one visitor calls a longer, calmer view of his place in a larger historical arc. Family members and fellow organisers argue that the years in jail retain any meaning only if the public conversation continues, not about the two men personally but about the citizenship law and the riots that followed, and they fault mainstream secular and left-liberal parties for largely accepting the state's framing of the case rather than contesting it. Even after six years of incarceration, one relative says of Imam, his mind remains free.
56:39In the first episode of Emerging Perspectives, Sania Ismailee joins Wardah Beg for a conversation about the philosophical questions that lie beneath India’s debate on the Uniform Civil Code. For eight years, through her PhD research, Sania examined the UCC through the questions of secularism and …
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
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