12:48Islamisation of Knowledge Debate I nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=Y3EGBGGjmQk&t=12134s
What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
जो एक हमारा इस्लामिक इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन है उसमें हम ये देखते हैं कि बयक वक्त यानी मुख्तलिफ क्लासेस उलमा के आपस में बहुत बुनियादी चीजों में इलाफ कर रहे हैं। एक तरफ गजाली हैं और दूसरी तरफ इबने तैम्या है। दोनों एकदम बिल्कुल दो तरह से चीजों को देखते हैं और बहसें करते हैं। तो ये जो तजदीद और तजद्दुद का डिफरेंस है फिर एक बड़ा सवाल जो यह आता है। कौन ऐसे स्कॉलर्स हैं जो अभी भी ट्रेडिशन के विदिन हैं? कौन ऐसे स्कॉलर्स हैं जो तजद्दुद या मॉडर्निटी को ला रहे हैं? इब्ने अरबी के यहां इतना ज्यादा [संगीत] यूं कहा जाए कि आज के ऐतबार से तजद्दुद है के एक बहुत बड़ी तादाद ने उनकी तकफर की बात है। यानी इने तैमिया भी उनकी तकफीर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ इबने अरबी को मानने वाले लोग उनको शेख अकबर कहते हैं। तो इसको आप थोड़ा समझाइए कि जो ये तजदीद है ये कंसेप्चुअली स्पीकिंग इसकी इसका फ्रेमवर्क क्या है? इसकी हिस्ट्री क्या [संगीत] है? यह क्या हो रहा है या रुक गया? शाह वली उल्लाह का बहुत ज्यादा मौके बहुत ही शानदार है। उन्होंने कहा कि इल्म कलाम मनसूस नहीं है। इसलिए मैं अपने असलाफ से इसमें इख्तलाफ करूंगा और इसमें मैं खुद अपना मुजहिद हूं। इकबाल को आपको इसी फ्रेमवर्क में देखना चाहिए जो शाह वली उल्लाह कह रहे हैं। यार्ड स्टिक बन गया एक कि भ आप हफी हैं तो आप इसी [संगीत] तरह देखेंगे। आप यू नो शाफी हैं तो इसी तरह देखेंगे। उसकी क्या जरूरत थी? उसकी क्या लिमिट है? तो खुद इकबाल को हम देखते हैं कि उन्होंने रिकंस्ट्रक्शन अपने खुदबात में उन्होंने एक जो बड़ा खुतबा उनका है वो इ्तहाद पे अल्लामा शौकानी ने यमन में मुफ्ती मोहम्मद अब्दू ने रशीद रजा जो अलमनार तहरीक थी उन लोगों की ये कोशिशें [संगीत] थी कि नहीं भाई ये इज्तहाद को दोबारा रीएक्टिवेट करने की जरूरत है। [संगीत] क्यों ऐसा होता है कि चार जो स्कूल ऑफ़ थॉट्स हैं मोटा-मोटा वो अल्टीमेटली अपने आप को [संगीत] स्कूल ऑफ़ जो मान लीजिए वो कोई माथुरी दी अपने आप को बोलेगा कोई अशरी बोलेगा कोई बोलेगा कि नहीं मैं अथरी हूं। क्यों फिर ये कोरिलेशन क्यों बन जाता है? जिस वक्त में अबुल हसन अशरी ने इल्म कलाम की कोशिशें की तो उन पे ये शदीद तरीन एतराजात यही किए गए कि इल्म कलाम का इस्लाम से क्या ताल्लुक? आप क्यों चीजों को रशनलाइज करने की कोशिश कर रहे हैं? तो एट द एंड ऑफ द डे वो भी तो एक तरीके का नॉलेज प्रोडक्शन है। तो यह नॉलेज प्रोडक्शन और इस्लामाइजेशन [संगीत] ऑफ नॉलेज इसमें क्या बुनियादी फर्क है? एक शकेब अरसलान लुबनानी बहुत बड़े थिंकर थे। उन्होंने किताब लिखी लमाजा तदैना क्यों जो है दूसरे लोग जो है आगे बढ़ गए। हम लोग क्यों पीछे रह गए? हमारा डिक्लाइन क्यों हुआ? इस तरह का क्वेश्चन पैदा हुआ। नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन [संगीत] राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। आज हमारे साथ फिर से जुड़ रहे हैं मौलाना वारिस मजहरी साहब। पिछला जो एपिसोड हमने साथ किया वो मॉडर्न इस्लामिक थियोलॉजी की जो जरूरत के ऊपर जो पूरी डिबेट है स्पेशली इंडियन कॉन्टेक्स्ट में हम लोगों ने ट्रेस करने की कोशिश की थी और ये समझने की कोशिश करी थी कि जदीद और या फिर ये मॉडर्न या फिर क्लासिकल इसमें क्या डिफरेंस है और ये अंदाजा था हुआ कि बहुत सारे जो नॉलेज के टूल्स हैं जो एक जमाने में हमने यूनानी फलसफे से ग्रीक फिलोसफी फी से बाकी जो फलसफी जो ट्रेडिशंस रहे हैं दुनिया में क्योंकि इस्लाम जब एक्सपेंड कर रहा है अरब से बाहर निकल रहा है तो उसको डिफरेंट कल्चरर्स के साथ इंटैक्ट करना पड़ रहा है और वहां पे फिर जब आपको डिफरेंट कल्चरल कॉन्टेक्स्ट में इंटरेक्ट करना पड़ रहा है तो इवन जो आपकी जो फिककी स्कूल ऑफ थॉट्स हैं मजाहिब हैं। आपको हनफी थोड़ा सा एक डिफरेंट दिखेगा। मालिकी डिफरेंट दिखेगा। वो टेरिटोरियल रिक्वायरमेंट्स के हिसाब से भी जो रूल ऑफ लॉज़ हैं वो भी इवॉल्व हुए और जरूरत लेकिन हमेशा जो टेक्स्ट है कुरान है और हदीस है उसकी प्रिमिसी उसको सामने रखते हुए जो इल्म के साथ फिलॉसफी के साथ या दूसरे जितने भी नॉलेज की यू नो टूल्स हैं उनके साथ इंटरेक्ट हुआ। लेकिन ये जो हम इसमें आगे जिसे कहते हैं डिटेल में डिस्कशन करेंगे कि वो एक प्रोसेस कहीं ना कहीं रुक गया और इसका मतलब ये नहीं है कि इंटरनल डिस्कशंस नहीं हो रहे। एक वो लिमिट है कि जो लोग बोलने लगते हैं कि भ कुछ नहीं हो रहा। नहीं अच्छे खासे विद इन दीज़ टूलकिट्स भी अभी जो बात हो रही है कि भ जो उसूल सामने रखते हुए नए चैलेंजेस को कैसे फेस किया जाए और क्योंकि पिछली बार बात हुई थी शाह वली उल्लाह की भी रहम शाह साहब की जो मेथडोलॉजी है तदबीक की उसमें वो डिफरेंट स्कूल ऑफ़ थॉट्स की विद इन एंगेज तो वो भी हमारे ट्रेडिशन का हिस्सा है। ऐसा नहीं है कि भ हम लोग कोई नई बात कर रहे हैं या आप कोई नई बात कर रहे हैं। तो ट्रेडिशन में यह फ्लेक्सिबिलिटी है कि ये सारी की सारी चीज़ यानी इतनी डवर्सिटी है ये सारी बहसें उसमें आ जाती है तो हम कर सकते हैं और वो इंटेलेक्चुअल जॉइंट ने कर दिया वहां के तो फिर कहीं ना कहीं थोड़ा बहुत ये स्कोप अभी भी बाकी है। तो आज हम उसी बहस को मुझे लगता है क्योंकि आपकी नई किताब आई है फिक्र इस्लामी की तजदीद कि आपने इसमें बहुत जिसे कहते हैं अपने आप को हमंबली प्रेजेंट करते हुए कि मैं एक जिसे कहता हूं कि आप एनालाइज कर रहे हैं कि ये जो डिबेट्स हुई है। हालांकि उसमें आपके अपने पॉइंट ऑफ व्यूज हैं। लेकिन उसको आप फिर भी ये बोल रहे हैं कि इसको एक तरफ से थोड़ा सा बैकलग में रखते हुए एनालिसिस किया जाए कि क्या डिस्कशन हुए, कैसे हुए? क्या पॉइंट ऑफ व्यूज [गला साफ़ करने की आवाज़] थे और पिछले 200 300 साल स्पेशली ये जो डिबेट्स हैं वापस जब वापस आई इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन में तो कब किसने क्या कहां क्यों कितना लिया और उससे फिर ये जो 1940 50ज के बाद जो पूरा दुनिया वजूद में अलग नेशन स्टेट नई दुनिया बनी है तो वहां पे फिर एक्सपेरिमेंट्स करने के मौके मिले तो वहां हर तरह के लोग मॉडर्निस्ट्स भी बने क्लासिकल लोग भी तसव सब एक्सपेरिमेंट्स चल रहे हैं तो ये अच्छा वक्त है। एक 100 साल गुजर गया है स्पेशली बरे सगीर के हवाले से और हिंदुस्तान के हवाले से जो आजकल जो मुसलमान है यहां पे जिस तरह की प्रॉब्लम्स से गुजर रहा है और वो कहीं ना कहीं अपनी जो आइडेंटिटी की क्राइसिस का शिकार है उसको बहुत जरूरी है कि उसको यू नो वाबस्ता किया जाए कि आपकी एक रिच हेरिटेज है और वो कोई ज्यादा पुरानी भी नहीं है और अभी भी चल रही है। जी बिल्कुल तो डॉक्टर साहब ये किताब आपने आपकी पिछली किताब जदीद इल्म कलाम आपने एक तरीके से उस डिबेट को खोला और इस बार आपने उसको और पर्टिकुलर डिबेट्स की तरफ ले गए जो बड़े-बड़े डिस्कशन और इश्यूज हुए पिछले 100 150 200 साल में स्पेशली राशिद उल रिदा और यू नो अफगानी के वक्त में जो पूरा सा डिस्कशन फिर अलग-अलग जगह ये सारी 200 साल से तकरीबन यानी 100 साल से इस 20वीं सदी में तो इस बहस चली है लेकिन हम देखें तो 200 साल से इस पे बहस चल रही है। के एक तरह से जो इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन अगर आया है तो क्यों आया है? क्यों आया? या यूं कहा जाए कि जो हम एक हमारी इस्लामिक सिविलाइजेशन को जो एक डिक्लाइन फेस करना पड़ा है हम खासतौर से अदर सिविलाइजेशन के मुकाबले में इसकी वजह क्या है? तो फिर यह बहस में आई कि हमारा इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन हम उस पे ये सवाल पैदा होता है कि यह इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन क्यों कब कैसे इसके पीछे क्या चीजें हैं? तो इस तरह से हम यह देखते हैं कि पिछले 200 साल से 150 साल से इस पर काफी बहसें चल रही हैं। तो हमारी जो ये किताब है वो इन्हीं बहसों को उठाती है देखने की अपनी एक कोशिश करती है और बुनियादी तौर पे उसमें हमने ये देखने की कोशिश की है कि हम जिस इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन की बात कर रहे हैं उसकी अपनी हकीकत क्या है? नेचर क्या है? क्या आस्पेक्ट्स हैं? और फिर उस हवाले से ये के उसको उसकी तजदीद या उसका रिकंस्ट्रक्शन कैसे हो सकता है ताकि हमारी इस्लामिक थॉट आज के बड़े चैलेंजेस को पहले तो समझ सके हम और फिर उसको रिसोंड कर सके। तो वो क्या चीजें हैं? वो क्या टूल्स हैं जो हमारी इस्लामिक थॉट के लिए इन चैलेंजेस को सही तरह से समझने उसका जवाब देने के लिए जरूरी हैं। तो ये सब सवालात हमारी किताब उसको उठाती है और फिर एक कुछ मसाइल इश्यूज के हवाले से उसका कुछ फीचर कुछ एक स्ट्रक्चर भी बनाने की और पेश करने की कोशिश करती है। तो इस तरह से एक पूरे इस्लामी फिक्र की तजदीद या या रिकंस्ट्रक्शन इस्लामिक थॉट पे या किताब उस सारे पहलुओं पे बहस नहीं करती लेकिन उसके अहम पहलू कुछ इशूज़ को स्पेसिफिकली डील करती है। स्पेसिफिकली डील करती है। तो क्योंकि आपने हिस्टोरिकल कॉन्टेक्स्ट की बात करी और जब भी हम इस तरह की डिबेट्स में आते हैं कि क्यों जवाल हुआ? क्यों इस्लामिक सिविलाइजेशन जो दुनिया में गालिब रही अपनी इस कल्चरल इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन की वजह से वो आज की डेट में क्राइसिस ऑफ इंटेलेक्चुअलिटी क्राइसिस ऑफ़ सिविलाइजेशन को ही अपने आप फेस कर रही है। तो इसमें डिफरेंट पॉइंट ऑफ व्यूज हैं जिनको आपने इस बुक में सामने रखा है। पहली बात तो वो पॉइंट ऑफ व्यूज क्या है और आपको कौन सा पॉइंट ऑफ व्यू ज्यादा समझ आया? देखिए मुख्तलिफ तरह से इस डिक्लाइन को जिस इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन की हम बात कर रहे हैं मुख्तलिफ तरह से मुख्तलिफ जो इस्लामिक इंटेलेक्चुअल जो सर्कल्स हैं क्लासेस हैं उनसे जो एसोसिएटेड स्कॉलर्स हैं उन्होंने देखने की कोशिश की है। अपने-अपने अलग-अलग व्यू हैं। बाज लोग जो हैं उनको इस तरह से देखने की कोशिश करते हैं कि यह प्योरली मामला है इस्लाम पे सही तरह से यानी जो हमारे एल्डर्स का जो हमारे असलाफ का जो तरीका था उससे अलग हो जाने का की वजह से गोया कि एक देखते हैं कि एक एक तरह से अमली क्राइसिस है। यानी इसका ताल्लुक फिक्र से ज्यादा यूं कहा जाए कि एथिकल क्राइसिस है। मोरल क्राइसिस है। हमने सही तरह से इस्लाम को फॉलो नहीं कर रहे हैं। हम और इसकी वजह से यह क्राइसिस पैदा हुआ है। इस्लाम से एतमाद खत्म हुआ। शकात पैदा हुए और फिर इस तरह से इनोवेशन, बिदात, खुराफात मुख्तलिफ चीजें पैदा हुई और जिसकी वजह से हमारी थॉट, हमारा अमला और उससे आगे बढ़कर के फिर हमारी सिविलाइजेशन पूरी की पूरी मुतासिर हुई। तो हमारे जो एक ट्रेडिशनलिस्ट क्लास है वो तो इसको इसी तरह से देखते हैं। लेकिन एक दूसरी क्लास उसको इस तरह से देखती है के ये सारा का सारा मसला ये है कि अब टाइम एंड स्पेस के चेंज हो जाने की वजह से इस्लाम की जो बिल्कुल बुनियादी चीजें हैं जो बुनियादी टीचिंग्स हैं, बुनियादी जो वो पूरा का पूरा जो है इररेिलेवेंट हो गया है। और इस बात इसलिए जरूरत हमें इस बात की है कि हमें भी उसी तरह से उन्हीं टूल्स को लेकर करके इस्लाम पे इस्लामिक थॉट को री कंस्ट्रक्ट करने की कोशिश करना चाहिए। अ जिस तरह से वेस्टर्न वर्ल्ड में हुआ। यानी वेस्टर्न वर्ल्ड में क्या हुआ जो खासतौर से 16वीं, 17वीं, 18वीं सदी में हम ये देखते हैं कि उन्होंने रिफॉर्मेशन की पूरी कोशिश की। तो उन्होंने खासतौर से मजहब के हवाले से जो उनकी पूरी अप्रोच बनी है उस पूरी अप्रोच में हम ये देखते हैं कि जो पूरा इनलाइटनमेंट का जो पूरा जो एक पूरा ढांचा है रैशनलिज्म का रीजनिंग का उसको लेकर कर करके उन्होंने पूरे अपने अपना एक ढांचा बनाया जिसमें रिलीजन को बहुत कम से कम स्पेस दिया गया। बहुत ही कम जो हम समझ तो यह जो क्लास है जो मॉडर्न सेुलर स्कॉलर्स की हम तो मुस्लिम मॉडर्न सेुलर स्कॉलर्स तो वो कहते हैं कि हमारे सामने जिस तरह से जो वेस्ट एक पेश करता है एक पूरा स्ट्रक्चर जो पेश करता है हमें चाहिए कि उसको हमें फॉलो करना चाहिए और उसकी बुनियाद पे हमें अपने इस्लामिक हेरिटेज को इस्लामी तरास को जिसको हम कहते हैं इल्मी सरमाया हमारे अपने नजरियात हमारी जो इंटेलेक्चुअल बुनियादें हैं उन तमाम को गौर करना चाहिए रीथिंक करना चाहिए और इस थिंक के नतीजे में बिल्कुल उसी तरीके से उसी फ्रेमवर्क में जो बेस्ट ने अपने अख्तियार किया और इस तरह से रिथिंक कर कर के दोबारा उसको रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश उसी पैटर्न पे करना चाहिए। ये गोया कि एक अपनी एक तरह से हम ये देखते हैं कि एक दूसरी स्ट्रीम है। लेकिन एक बीच की जो हम ये देखते हैं कि एक क्लास है। एक स्कॉलर की एक क्लास है जो यह कहती है कि ना तो यह सही है कि आप यह कहें कि जो कुछ भी है सब कुछ सही चला आ रहा है और सिर्फ एक जो है यानी स्पिरिचुअल या मोरल सिर्फ क्राइसिस की बात है और सब कुछ सही है और उसमें किसी तब्दीली या रीथिंग करने की जरूरत नहीं है। सो ऐसा नहीं है। उसमें रीथिंक करने की जरूरत तो है। लेकिन इस्लाम के जो फाउंडेशंस हैं इस्लामिक थॉट के जो बुनियादें हैं उस वो तो एज इट इज़ हैं। वह अपनी जगह पे हैं। हां, लेकिन उसमें कोई तब्दीली नहीं आ सकती। लेकिन जो इस्लाम की जो ताबीरर है यानी जो इंटरप्रिटेशन है जो हमने पिछले 1400 साल में या 12 1300 साल में जो इस्लाम को समझने की इंटरप्रेट करने की जो कोशिश की गई है उससे इख्तलाफ किया जा सकता है। उसमें दोबारा उसको रीथिंक किया जा सकता है। यानी ये समझ लेना कि जैसा इस्लाम को बिल्कुल समझा गया है पिछले हजार सालों में वो बिल्कुल वैसे ही सही है। सो ऐसा नहीं है। और इसलिए हम अपने प्रीडसेस से अपने असलाफ से इख्तलाफ कर सकते हैं। चाहे वो गज़ाली हो, चाहे इबने तैमिया हो, चाहे इबने आजम हो, फला फला हो। तो हमें इस तरह से उसको रिथिंक करने की जरूरत है। हमें इस बात को बुनियादी तौर पे यह तस्लीम करना पड़ेगा कि बहुत सारे ऐसे इस्लामिक थॉट के ना के इस्लाम के चीजें मौजूदा दौर में इररेलवेंट हो के रह गई हैं। और इसलिए जरूरत है कि उस हिस्से को जो इज्तिहाद की बुनियाद पे एंड टाइम स्पेस की बुनियाद पे जो चेंज होता रहता है। इस्लाम का इस्लामिक थॉट का एक वो हिस्सा है। आप इसको थोड़ा और एक्सपैंड कीजिए जो ये इसी से जुड़ा के फाउंडेशंस और इंटरप्रिटेशंस इसके बीच का क्या डिफरेंस है? क्योंकि आगे की पूरी डिबेट इसी से कीजिए। बहुत अच्छा बहुत अच्छा। देखें एक तो इस्लाम की जो बुनियादी तालीमात हैं जो उसकी फाउंडेशंस हैं जिसको हम कहते हैं कि वो मुसल्लमात हैं। गोया कि उनसे वो उसका ताल्लुक ह्यूमन रीजनिंग से नहीं है। यानी चाहे वो हमारी अकल उसको पूरी तरह से पर्सव कर सकती हो, समझ सकती हो या ना समझ सकती हो लेकिन वो हमारी ईमानियात का हिस्सा है। वो एक तरह से आप कह सकते हैं रिलीजियस डोगमा आप कहें यानी उसके लिए चाहे वो हमारी अकल दोद चार की तरह से उसको समझ कर करके कबूल करने की सलाहियत रखती हो ना या ना रखती हो लेकिन हम उसको ईमानियात की बुनियाद पे उसको हम तस्लीम करना ईमान का तकाजा समझते हैं। कुरान और सुन्नत की जो बुनियादी तालीमात उससे ताल्लुक रखती हैं। यानी अगर कोई कहे कि आखिरत की तमाम चीजें यानी जो जिसको हम मेटाफिजिक्स में जिस पे हम बहस करते हैं उन तमाम चीजों में फरिश्ते हश और नाश खुदा का के तसवुरात उसका ये तमाम चीजों को आप नजरी अक्ल से प्योर रीजनिंग से इसको समझना चाहें करना चाहें तो जाहिर है आप नहीं समझ सकते जो कांट ने कहा कि भाई ये तो मुमकिन ही नहीं है तो हम ये समझते हैं कि कांट से बहुत सारी चीजों के खिलाफ के साथ लेकिन हम ये समझते हैं कि बहुत सारी चीजों को हम अक्ल से ना समझने के बावजूद उसको को हम दोद चार की तरह से तस्लीम करते हैं। वही हम फाउंडेशन समझते हैं। बाकी वो चीजें जिसको हम कहते हैं कि टाइम एंड स्पेस की बुनियाद पे वो उसमें तब्दीली आती है। उसके फहम में तब्दीली आती है। उसके इंटरप्रिटेशन में तब्दीली आती है। तो ये जो तब्दीलियां आती हैं उस हिस्से में हमें हर हाल में रीथिंक करना है। उसमें दोबारा उसमें हमें गौर फ़िक्र करते रहना है। हम्। देखिए अभी हमने जो बताया कि जैसे हमारा जो हमारा जो कि ईमानियात की जो चीज़ें हैं जिसको हम बिलीव का पूरा सिस्टम कहते हैं कि उसमें तो जैसे हम कहते हैं कि उसमें ज्यादा उसमें गौर फिक्र कर करके कोई नई इंटरप्रिटेशन की जरूरत नहीं है। उसकी मिसाल जैसे हमारे सर सैयद अहमद खान है। उन्होंने ये कहा कि ये जो पूरा जो तसवुर है कि ये फरिश्ते ऐसे होते हैं। सुसरे से फरिश्ते ऐसी कोई चीज नहीं है। या जन्नत या जहन्नुम का जो तसवुर दिया जा रहा है कि वो किसी प्लेस का नाम है जहां पे इस तरह की चीजें हैं जलाने वाली या इस तरह के लज्जत और खुशी हासिल करने वाली सो इसका कोई सिरे से वजूद नहीं है और ये कोई नई बात सर सैयद ने नहीं कही थी हमारे जो बड़े इस्लामिक के वो थे फिलॉसफर थे यानी इबने सीना और फराबी वगैरह के तसुवरा इसी तरह से थे हम ये समझते हां इसी तरह के तसवुरात थे वो इन चीजों को नहीं मानते थे वही वगैरह के कांसेप्ट को मोजात को जिन्होंने जिस तरह से उन्होंने बिल्कुल निगेट किया। उन्होंने ऐतराज किया कि सबकी कोई हकीकत नहीं है। सर सैयद ने भी किया और इसी तरह से हम यह देखते हैं कि सर सयद ने पहली दफा नहीं किया। ये हमारे जो मुस्लिम फिलॉसफर्स थे वो पहले शुरू से कर सकते थे। तो रेवोलेशन वगैरह पे भी उनकी हकीकत पे उनके एतराज थे। हम ये कहते हैं कि यह डोमेन जो है यह हमारा हमारे उसमें जाने वाला नहीं है। हम ये समझते हैं कि नहीं ये वो चीजें हैं कि जो अपनी हकीकत में किसी नई इंटरप्रिटेशन की मोहताज नहीं है। उसकी कुछ तफसीलात में तो हम डिबेट कर सकते हैं। उसको दूसरी तरह से देख सकते हैं। यानी हम ये कहें कि वही जो है मिसाल के तौर पे कि रिवुलेशन या वही जो है वो रसूल का एक अपना इंटरनल प्रोसेस होता है। जैसा कि हमारे फिलॉसफर्स ने कहा तो हम कहते हैं कि ये सही बात नहीं है। ये जो एक नई थिंकिंग आ रही है और ये हमारे आजकल के जो बड़े स्कॉलर्स हैं वो ये बात कहते हैं वो कोई बाहर से ऐसा नहीं है कि वो जो है खुदा की तरफ से कोई फरिश्ता आ रहा है और ये कोई ला कर करके खुदा का मैसेज या वो दे रहा है वही रेवोलेशन की शक्ल में है। बल्कि वो एक इंटरनल पुरुष है जो खुद एक पैगंबर सोचता है अपने तौर पे उसी को वही साइकोलॉजिकल और रिड्यूस [गला साफ़ करने की आवाज़] कर दिया। हम ये कहते हैं कि नहीं इस तरह की चीजों की तो कोई गुंजाइश नहीं है। हां लेकिन जो मुस्लिम स्कॉलर्स की एक क्लास है बड़ी जिसमें हमने अपने मौजूदा दौर में हम सर सैयद साहब को देख रहे हैं। सैयद उनके पूरे एतराम के साथ ठीक है। अपनी उन्होंने अपनी समझ थी। तो हम ये समझते हैं कि ये जो डोमेन है वो किसी रीथिंक रिकंस्ट्रक्शन का नहीं है। क्योंकि ये ईमानियात का बुनियादी अगर ऐसा हो तो फिर जो है हमारे पास कोई बुनियाद ऐसी नहीं रह जाती। और एक तरह से हम रिलेटिविज्म की तरफ चले जाते हैं। रिलेटिविज्म की तरफ चले जाते हैं। और फिर इसका मतलब हम ये समझते हैं कि रियलिटी जो है सिरे से दोद चार की तरह से फिक्स नहीं है। बल्कि वो चेंजबल है और टाइम एंड स्पेस में वो सब चेंज होती रहती है। खुदा रसूल कुरान रिवुलेशन फरिश्ता हश नश ये सारे के सारे तसवुरात ऐसे हैं जो सिर्फ पर्टिकुलर्स हैं। यूनिवर्सल कुछ नहीं है। पर्टिकुलर्स हैं। यूनिवर्सल कुछ नहीं है। अब वो हमेशा इस तरह से चेंज के होते रहेंगे। रिलेटिव हैं। तो हम यह समझते हैं कि नहीं यह जो एक एक तरह से क्रिश्चियन ट्रेडिशन में जो रिलेटिविज़्म का कांसेप्ट आया है, हम समझते हैं कि इसमें ये ये सही नहीं है। दूसरे हिस्से में बिलाशुबा हम कहते हैं कि वो हमेशा तब्दीली होती रही या दोनों सतहों पे। यानी आप जिसको हम थोलॉजी कहते हैं या कलाम कहते हैं उस सतह पे भी और फिर इस्लाम का जो जिसको हम इस्लामी फका में बहस करते हैं ये पूरा लीगल सिस्टम जो इस्लाम का है जो इ्तेहाद की बुनियाद पे हम उसमें भी तब्दीली उसमें भी हम रीथिंक कर सकते हैं और जो बुनियादी तसवूरात हैं इस्लाम के इस्लामिक वर्ल्ड व्यू के जिसमें हम जिसको हम इल्म कलाम के तहत इस्लामिक वर्ल्ड व्यू को जिस तरह से डिस्कस करते हैं उसमें बहुत सारी तब्दीलियां हो सकती हैं। लेकिन वो जो जो बुनियादी चीज है उससे हटकर हां लेकिन उसमें कुछ तफसीलात में हमेशा बात रही है। ऐसी बात नहीं है कि तफसीलात पे कोई खुद खुदा के सिफात पे बहुत सारी बहस हैं। हम ऐसा नहीं है कि दोद चार की तरह जो अशराइट ने अशरियों ने या मातुरीदी ने या मुतद ने जो कह दिया था एट्रिब्यूट्स ऑफ़ गॉड के बारे में वो दोद चार की तरह से ऐसा नहीं उसको लेकर के हमारे यहां डिबेट रही है। लेकिन लेकिन इस लेकिन वो जो बुनियादी जो खुदा के जो का जो बुनियादी तसवुर है कि खुदा ओमनी प्रेजेंट है। खुदा जो है उसके अंदर रहम का मादा है। खुदा जो इस हमारी इस कायनात से यूनिवर्स से ताल्लुक रखता है वो एक उसकी एक एक्टिव इंटरवेंशन है। हम अब मौजूदा दौर में इस पे बहस हो रही है। हम हमारे यहां इस्लामी मॉडर्निस्ट जो थिंकर्स हैं के ऐसा नहीं है कि खुदा ने कायनात एक यूनिवर्स बना दी है। अब खुदा का उसका कोई ताल्लुक खुदा का एक एक्टिव जो है इंटरवेंशन नहीं जो आइंस्टाइन का वो इंटरप्रिटेशन था कि भ बना दी और बना के छोड़ दिया है। बना के छोड़ दिया है। वो अपने तौर पे बिल्कुल की तरह काम कर रहा है। काम कर रहा है। तो ये हम समझते हैं कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम उसको डेइज़्म में ये जो आजकल एक ट्रेंड चला है जिसको कहते हैं डेइज़्म। यही है बिल्कुल खुदा को तो हम मानते हैं लेकिन खुदा कायनात में से से इस तरह से एक एक्टिव अपना एक वो रखता है रिलेशन रखता है कायनात को रन कर रहा है सो ऐसा नहीं है तो क्योंकि आपने ये बताया कि दो हिस्से हैं एक ईमानियात है जो जिसे कह सकते हैं कि कॉनसेप्चुअल मेटाफिजिकल और फाउंडेशन है हालांकि इसमें भी बड़ी डिबेट है कि भ मेटाफिजिक्स से ही पिस्टमोलॉजी आती है पिस्टमोलॉजी से ही मेथोलॉजी बनती है तो उसमें जो पर्टिकुलर्स और यूनिवर्स का डिबेट है उसमें कैसे यूनिवर्सल पर्टिकुलर को इनफॉर्म करता है क्योंकि अल्लाह के रसूल ससल्लम की जिंदगी में 23 साल में पर्टिकुलर्स भी हैं जो चेंजिंग कंडीशंस हैं तो वो कॉन्टेक्स्ट है रिलेटिविज्म नहीं है रिलेटिविटी नहीं है तो ये चीजों को भी तो उससे जो आपका जो अगला सवाल जुड़ता है जो आप अपनी किताब में जिसको डील करते हैं वो तजदीद वर्सेस तजद्दुल कि एक तो वो चीज है कि जो डिस्कर्सिव ट्रेडिशन यानी ट्रेडिशन की जो एक हिस्ट्री है और उसका जो प्रोसेस है और उसका जो बाउंड्रीज़ हैं कि जिसके विदिन आप यह समझते हैं कि ट्रेडिशन को समझा या समझाया जा रहा है सही तरीके से और दूसरी तरफ कोई जो चीज आप तजद्दुद बता रहे हैं तो इसको आप थोड़ा समझाइए कि जो ये तजदीद है ये कंसेप्चुअली स्पीकिंग इसकी इसका फ्रेमवर्क क्या है? इसकी हिस्ट्री क्या है? ये क्या हो रहा है या रुक गया? और उसके बनिस्बत जो तजदीद के नाम पे जो इंटरप्रिटेशन का जो हारमेनिकल हर्मोनेटिक्स खुला कि भाई आप उससे कैसे एक रिलेटिविस्टिक थॉट और मटेरियली डोमिनेटेड किस तरह से आ जाता है ये क्या डिफरेंस आपने बहुत अच्छा ये बहुत अहम क्वेश्चन है और हमारे जो आज के जो इस्लामिक थॉट को रिप्रेजेंट करने वाली जो जनरेशन है उसको खासतौर से इन सवालात को अपने ज़हन में रखना चाहिए। ये एक बड़ी डिबेट है। देखिए दोद चार की तरह से कोई एक बाइनरी दोद चार की तरह से करना तो मुश्किल है। उसमें बहुत ज्यादा इख्तलाफात हो सकते हैं। तजदीद क्या है और तजद्दुद क्या है? लेकिन जो एक बुनियादी चीज है जो हमने इसमें पेश करने की कोशिश की है। वो ये है कि देखें जो एक हमारा इस्लामिक इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन है वो अपने अंदर अपने अंदर जो डिस्कर्सिव ट्रेडिशन है अपने अंदर ये अ इतनी उसके अंदर डायवर्सिटी है। उसका फ्रेमवर्क खुद अपने आप में इतना वसी है। अगर हम देखें अपने पूरे ट्रेडिशन को तो उसमें हम ये देखते हैं कि बयक वक्त यानी मुख्तलिफ क्लासेस उलमा के और आपस में बहुत बुनियादी चीजों में इलाफ कर रहे हैं। यानी आप ये देखें के खुद जो है इब्ने तैमिया इमाम अहमद बिन हम्ल से जिसको फॉलो करते हैं। जबरदस्त तरीके से इख्तलाफ कर रहे हैं। [गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] यानी उसके हम देखें के एक तरफ गज़ाली हैं और दूसरी तरफ जो है वो अ इबने तैमिया है। दोनों एकदम बिल्कुल दो तरह से चीजों को देखते हैं और बहसें करते हैं। इबने अरबी के यहां इतना ज्यादा यूं कहा जाए कि आज के ऐतबार से तजद्दुद है कि वो ऐसी-ऐसी बातें कहते हैं कि जो बिल्कुल जो जिसको हम मुस्लिम ऑथोडॉक्सी से बिल्कुल हट कर करके उन्होंने बहुत सारी बातें कही है और इस वजह से इतनी कंट्रोवर्सी रही है के एक बहुत बड़ी तादाद ने उनकी तकफर की बात है। यानी इनेब तैमिया भी उनकी तकफीर करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ इबने अरबी को मानने वाले लोग उनको शेख-ए अकबर कहते हैं। शेख उल अकबर कहते हैं। इब्न तैमिया और इस तरह की एक बहुत बड़ी तादाद है जो कहती है कि बिल्कुल काफिर हैं। इसलिए कि वो ऐसी-ऐसी बातें कहते हैं जो बिल्कुल यानी जिसको कोई हजम जल्दी नहीं कर सकता। खैर उसको अभी हम बहस में नहीं लाते। तो हमारी ट्रेडिशन में ये सारा रंग रहा है। हम यह समझते हैं कि तजद्दुद वह है कि जो इस पूरे जो हमारा जो एक ट्रेडिशन का जो एक पूरा वो चला आ रहा है उससे उसमें उससे हट करके [गला साफ़ करने की आवाज़] उस पूरे फ्रेमवर्क से हट कर करके एक नए फ्रेमवर्क में बिल्कुल उससे कट करके एक रप्चर के साथ एक नई नए फ्रेमवर्क में अगर बात की जाती है तो वो एक तरह से तजद्दुद के खाने में चला जाता है। फिर सवाल ये पैदा होता है कि भाई वो कैसे तय होगा कि ये ट्रेडिशन में है या ट्रेडिशन में नहीं है? यह एक बहुत ही बुनियादी सवाल उठता है। तो देखा देखें यानी जो जिस इस्लामिक ट्रेडिशन की हम बात करते हैं बुनियादी तौर पे उस इस्लामिक ट्रेडिशन में एक तरफ मुद्दसीन हैं, फका हैं, मुस्लिम स्कॉलर्स हैं, उसूल फिक्र के लोग हैं। ये सारे के सारे लोगों ने कुछ अपनी बुनियादें बनाई हैं। और उन बुनियाद बना और उसी बुनियाद पे वह चीजों को देखते हैं। इस्लामी उन चीजों को उस फ्रेमवर्क के तहत देखने की कोशिश करते हैं। मौजूदा दौर में यह हुआ है कि यह जो पूरा का पूरा फ्रेमवर्क है यानी मिसाल के तौर पे जिसको आपने हारनेटिक्स की बात की यानी हारनेटिक्स के बुनियादी जो फ्रेमवर्क हमारे इबने रुशद के यहां हत्ता कि इबने सीना के यहां वो वो जो है अपना एक फ्रेमवर्क बनाते हैं कि वो ये कहते हैं कि ये जो है उसमें ले जो लैंग्वेज को एक बुनियादी अहमियत हासिल है। [गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] यानी वह लैंग्वेज जिसमें कुरान नाज़िल हुआ, वही नाज़िल हुई है, उसके बुनियादी उसूलों की बात मिसाल के तौर पे इबने रुशद करते हैं फसलुल मकाल में, तहाफत तहाफत में कि इसको तो फॉलो करना हमारे लिए बिल्कुल जरूरी है। अब अगर आप आकर कर करके नए सिरे से आप डीकंस्ट्रक्शन की थ्योरी थ्योरी पूरी लाते हैं। मिसाल के तौर पे और कहते हैं कि नहीं साहब ये पूरे नए सिरे से हम जो है इन चीजों को डीकंस्ट्रक्ट कर कर करके और ये समझते हुए कि गोया मुसनिफ ऑथर मर चुका है जो कहते हैं हार्मोनेटिक्स में हमारे वेस्टर्निक्स का जो पूरा कांसेप्ट है जिसमें डिस्कस हम इस तरह से इन तमाम चीजों को नए सिरे से देखने की कोशिश करेंगे। हम यह कोई फिक्स मीनिंग नहीं है। तो अगर आप यह कहते हैं कि कोई फिक्स मीनिंग नहीं है तो खुद इबने रुद के नजदीक यह होता है कि इससे एक बहुत बड़ा क्राइसिस पैदा हो जाता है कि फिर तो आप जो बुनियादी तसवुर है यानी यानी खुदा का रिसालत का वही का आखिरत का अगर इन तमाम चीजों को भी आप डीकंस्ट्रक्ट कर करके नए सिरे से समझने की आप कोशिश करते हैं [संगीत] तो आप उससे बिल्कुल बाहर आ जाते हैं और फिर यह सारे तसवुरात जो इस्लाम के बुनियादी हैं वो तसवुरात खत्म हो जाते हैं। खुद ये मैंने बताया कि तहाफत में फसल मकाल में अल कश इब्न रुद की जो सबसे बड़े यानी एक तरह से वो हैं आखरी वो इस तरह की बातें करते हैं तो हम ये समझते हैं कि तजद्दुद वो है कि आप इन तमाम चीजों को अपने इससे हटकर कर करके एक बिल्कुल एक नया पैराडाइम लाते हैं और जो खासतौर से वो डिराइव्ड है वेस्ट से जिसको लेकर करके आज हमारे जो स्कॉलर्स की एक बहुत एक तादाद है तो वो लेकर के बात करती है और वो वो कहती है कि नहीं वो आज की थ्यरीज लैंग्वेज की फिलॉसफी की और उसको बुनियादी साइंस को वो बुनियादी अहमियत है जो साइंटिज्म तक पहुंचता है और इस तरह से लैंग्वेज में चीजों को वो कर करके फिर वो चीजों को देखने की इस तरह से कोशिश करता है कि हमारा ट्रेडिशन का जो बुनियादी टेंपरामेंट है मिजाज है वो उसको एक्सेप्ट नहीं कर पाता और वो उस फ्रेमवर्क से हट जाता है। ये क्या ये कहा जा सकता है कि जैसे फरिश्तों के हवाले से जैसे अल्लाह की जात के हवाले से, उसके एट्रिब्यूट्स के हवाले से जैसे यह जो प्रॉफेटहुड में जैसे मिराज का किस्सा है उसके हवाले से वो जो है एक्सप्लेनेशंस हैं जो जो वोकैबलरी या जो लैंग्वेज में अरबी में चीजें आई कुरान में या हदीस में पूरी जो ह्यूमन का जो एफर्ट है चाहे वो अक्ल का इस्तेमाल हो चाहे ऑब्जरवेशन हो इसको कंस्ट्रक्ट करने में प्रूफ करने में इसके लिए प्रूफ कंस्ट्रक्ट करने में लग रहा दूसरा यह है कि एक आपने एक इंडिपेंडेंट रीजनिंग का आपने बोला भाई न्यूटन का एक फ्रेमवर्क है। एक आइंस्टाइन का है यह। अब आप इससे कुरान को एक कुरान के नजरिए से आप चीजों को कंस्ट्रक्ट कर रहे हैं। ये बहुत अहम बात है। यानी आप जो है एक तरह से जो अपनी एपिस्टमोलॉजी तय करती हैं। उस फ्रेमवर्क में आप बुनियादी तौर पे रीजन को वो अहमियत देते हैं। एक जुमले में अगर कहा जाए कि उसमें रेवेलेशन को कोई बुनियादी सोर्स ऑफ नॉलेज के तौर पे आप उसको इस्तेमाल नहीं करते। हमारी इस्लामिक जो एपिस्टमोलॉजी है उसमें दोद चार की तरह से यह बात तय है कि हमारे दो बुनियादी सोर्स ऑफ नॉलेज हैं। यानी एक इंडिपेंडेंट वही या रेवोलेशन अपना एक इंडिपेंडेंट सोर्स रखता है। और दूसरा बहर रीजन है। हमारे सेंसेस हैं जिनके जरिए हम कोई नॉलेज हासिल करते हैं। लेकिन एक इंडिपेंडेंट जो एक जरिया है, सोर्स है वो वही है। लेकिन ये जिस हम फ्रेमवर्क की बात करते हैं जो आज सेुलर मॉडर्निस्ट फ्रेमवर्क है उसमें जो है वही की अपनी हैसियत बिल्कुल डाइलट हो करके रह जाती है खत्म हो जाती है तो वही को हम इस तरह से यूज़ करते हैं कि वही ने जो कुछ चीजों को रेवोलेशन ने कुछ चीजों को जो तय कर दिया है तो जो तय कर दिया है कुछ देखिए वही में भी दो तरह की चीजें हैं। कुछ चीजों दोद चार की तरह से वही ने तय किया और यह बताया कि यहां पर तुम्हारी अकल इन चीजों को दोद चार की तरह से कैप्चर नहीं कर सकती समझ नहीं सकती इसलिए बार-बार कुरान में इस तरह की 20वीं आयत है कि नहीं समझ सकती इसलिए तुम इसको तो खुदा पे छोड़ दे तुम इस ये तुम्हारे ईमान का तकाजा है कि तुमको इस पे ईमान लाना है हम और ऐसी बहुत सारी मुताद चीजें हैं जिसको रसूल को भी वो इल्म नहीं दिया गया रसूल ने रसूल ने जो कहा कि भ रूह के बारे में तुमको सारी चीजें हमें नहीं बताई गई है। बहुत मामूली साहिल है। तुमको वैसे ही उसको वो करना है। तकदीर वगैरह जो डिसनी वगैरह की बातें हैं उस पे ज्यादा बहस नहीं की गई कि बस इसको तुम समझो कि ऐसा कुछ है। तो खुद खुदा की जो जात और हैसियत है ये मुमकिन नहीं है कि तुम उसकी सारी तफसीलात को समझ कर करके फिर ईमान लाओ। यानी प्योर रीजनिंग की बुनियाद पे तुमको हर हर चीज वो हो जाए। इसलिए तुमको तो ये वाली चीज खुद जो है यानी [गला साफ़ करने की आवाज़] जिस इस्लामिक ट्रेडिशन की हम बात करते हैं तो उसमें हम ये कहते हैं कि इन चीजों को हम समझने की कोशिश करते हैं आ और समझाने की कोशिश करते हैं। लेकिन हम ये दोद चार की तरह से नहीं कहते कि कुरान को बुनियादी चीजों को समझने के ईमान का तकाजा ये है कि हम इन तमाम चीजों को पहले हर हाल में दो-दो चार की तरह से समझें। दूसरी बात जो आपने कही कि फिर ये कि इनको समझने के लिए हमें जो मॉडर्न टूल्स ऑफ रीजनिंग है, साइंस है, मॉडर्न फिलॉसफी है, उसकी बुनियाद पे पहले एक फ्रेमवर्क तय होगा। उसकी बुनियाद पे हम इस पूरे इल्म को जांचेंगे, समझेंगे दो-दो चार की तरह से। अगर उसके मुताबिक ये पूरी तरह समझ में आती है तो हम इसको एक्सेप्ट करेंगे। अगर समझ में नहीं आती है तो हम एक्सेप्ट नहीं करेंगे। सो ऐसा नहीं है। इसलिए ऐसा नहीं है कि ये तो ये जो हम देखते हैं कि चीजें तो इवॉल्व होती रहती हैं। आज साइंस ने एक बात कही है। आज कुछ फिलोसोफिकल डिबेट और डिस्कोर्सेस चल रहे हैं। अगर हम अपने इस इस्लामिक नॉलेज को पूरे को अगर उसके बिल्कुल ताबे कर देते हैं। उसका एक सबोर्डिनेट कर देते हैं। तो फिर ये होगा के अगर वो नजरियात में आज कुछ है कल तब्दीली पैदा होती है तो इस्लाम की जो बुनियादी जो चीजें हैं वो दोद चार की तरह से फिक्स हैं। आपने उसको ऐसी चीजों के जरिए आप समझने की कोशिश कर रहे हैं जो जिसमें जिसमें जिसका खुद दावा है कि ये दो-दो चार की तरह से तयशुदा नहीं है। तब्दीलियां हो सकती हैं। तो जो आप ये जो डिस्टिंशन है तजदीद और तजद्दुद का हमारे यहां एकेडमिया में एकेडेमिक्स में उसको इस तरह जैसे मैं बोल रहा था देखा जाएगा मैं उसको इस तरह समझूंगा कि क्या किसी पैराडाइम पैराडाइम कौन सा है जो गालिब होगा इंटरप्रिटेशन में तो क्योंकि कुरान अपने आप में एक पैरा पैराडाइम है तो वो जो इस्तेमाल कर रहा है अब जैसे फॉर एग्जांपल मौलाना हमीदुद्दीन फराही का एक बड़ा जो कंट्रीब्यूशन ये है कि नज़्म का और जो और आमूद का और इसमें कि भ उसकी अपनी स्ट्रक्चर है रीजनिंग की उसका इंटररिलेशन है कोरिलेशन है तो वो स्ट्रक्चर अपने आप में बोलता है जब वो बोलता है और इंसान अपनी अक्ल को लगाता है और उसको अगर वो मरकज बनाता है अपनी एक्टिविटी का तो फिर वहां पे जो शेप होगा ट्रेडिशन या फिर एपिस्टमोलॉजी वगैरह वो उसके बाउंड्स में होगा। सही। दूसरी तरफ यह है कि भ जो एक कंप्लीटली इंडिपेंडेंट ह्यूमन इंटेलेक्चुअल रीजनिंग है जिसमें आपको जो आपने बोला कि भाई वो टाइम बाउंड है कॉन्टेक्स्चुअल है उसमें आपको जो कल चीज साइंस लग रही है परसों नहीं लगेगी। बिल्कुल। फिर वापस आप बोल देंगे नहीं ये है। तो वो जो पेडेस्टल है उसमें आप कभी ये कभी वो और अगर आपने अस्यूम कर लिया कि खुदा है और खुदा है तो फिर वो अगर जस्ट खुदा है और रहम रहीम है तो वो इंटरक्ट करने की भी कोशिश करेगा। वो अपने मैसेज भी भेजेगा। तो ये पूरा एक वो है फाउंडेशन का। बिल्कुल। तो ये जो तजदीद और तजद्दुद का डिफरेंस है। फिर एक बड़ा सवाल जो ये आता है पिछले 100 साल में और अब हम जनरेशन जो कि भ कौन ऐसे स्कॉलर्स हैं जो अभी भी ट्रेडिशन के विदिन है? कौन ऐसे स्कॉलर्स हैं जो तजद्दुद या मॉडर्निटी को ला रहे हैं। कुछ तो ऐसे होंगे जो क्लियरली इन दोनों में बांट दिए जाएंगे। और कुछ ऐसे हैं मसलन मैं नहीं ये बहुत सारे लोग बोलते हैं मेरा इसमें अपना कोई इंटरप्रिटेशन नहीं है क्योंकि मैं बहुत ज्यादा उनको करीब से पढ़ा नहीं है। लेकिन अक्सर जावेद अहमद गांधी साहब का नाम आता है कि भ कहीं वो ट्रेडिशन को फाउंडेशनली रीइटरप्रेट कर रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि भ नहीं बहुत सारी चीजें हैं। तो तीनों कैटेगरीज में कि एक जहां पर बॉर्डर लाइन है वो किस तरह डिस्टिंशन हम डिसाइड करें और एक दो स्कॉलर एक दो स्कॉलर आप जरा बताएं ताकि थोड़ा सा ये जो फ्रेमवर्क है उसको अप्लाई कैसे किया जाए उसकी थोड़ी समझ आए अगरचे अ हम आप समझते हैं कि यानी कुछ पर्सनालिटीज को बुनियाद बना करके बात करना हमेशा जरा दुश्वार तो होता है जी क्योंकि जाहिर है कुछ लोगों के अपने इमोशनल अटैचमेंट होते हैं उनको अच्छी अच्छी खासी उससे एक तरह की कंट्रोवर्सी भी क्रिएट होती है। लेकिन फिर भी जो हमने जो बताया और जिसको कि हमने एक तरह से अपनी किताब में भी डिस्कस करने की कुछ कोशिश की है। तो जो हमारा बुनियादी फ्रेमवर्क है कि वो बिल्कुल अपने इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन से हटकर कर कर के बिल्कुल एक नए अंदाज में चीजों को देखना और समझना और फिर बुनियादी जो फाउंडेशंस है उससे इख़्तलाफ करना उससे अलग हट जाना। अब यह देखते हैं कि हमारे सर सैयद अहमद खान मिसाल के तौर पर इंडिया में देखें तो अगर बड़ी मिसाल क्योंकि आपने कहा कि कोई ऐसा तो बड़ी मिसाल के तौर पे अगर आप देखें तो एक वाज़ मिसाल तजद्दुद के हवाले से सर सैयद अहमद खान की है। उन्होंने जो है उन तमाम बुनियादी चीजों का उन्होंने इंकार किया। जैसे उन्होंने तमाम मुजात वगैरह का इंकार किया और उसकी बुनियाद पे कुरान की जो तावील की जिस तरह से उन्होंने मिस इंटरप्रिटेशन किया उस पे खुद तमाम सर सैयद अहमद खान के फॉलोअर हैं। मैं भी सर सैयद खान के बहुत ही ज्यादा यानी उनका एतराम नहीं उनके कंट्रीब्यूशन का बहुत ही ज्यादा पूरी तरह से मैं उसका मोहतरफ हूं। लेकिन इस [गला साफ़ करने की आवाज़] बात को ये सारे लोग एक्सेप्ट करते हैं कि उन्होंने किस तरह से समझने और समझाने की कोशिश की कि जिसमें इस्लाम का जो बुनियादी जो फिक्र का जो एक बुनियादी ढांचा जो स्ट्रक्चर जो है वो एक तरह से टूट जाता है बिल्कुल एक टूट जाता है जो उन्होंने अपनी तफसीरुल कुरान में और उनकी जो जो उस जो तफसीर कुरान का जो उसूल उन्होंने बनाया तो उसमें वो बुनियादी तौर पे अपनी अकल को वो इस तरह से अहमियत देते हैं कि जहां पे रिवुलेशन की और वही की अहमियत बिल्कुल एक सेकेंडरी हो के रह जाती है। हम बिल्कुल सेकेंडरी हो यानी एक रिलेटिविटी रिलेटिविज्म सा पैदा होता है। क्योंकि उनका कहना यह है कि साहब वर्क ऑफ गॉड एंड वर्ड ऑफ गॉड इस दोनों में कंट्राडिक्शन नहीं हो सकता। तो इसलिए साइंस ने जो एक पैराडाइम बना दिया है दो-दो चार की तरह से जिसको वो कहते हैं वर्क ऑफ गॉड। हम यानी जो नेचुरलिज्म ने नेचुरलिस्ट ने यूरोपियन वेस्टर्न नेचुरलिस्ट ने एक फ्रेमवर्क कायनात को यूनिवर्स को समझने का बना दिया था। अब लामहाला हम पूरे कुरान को पूरे अपने स्क्रिप्चर को उसी के मुताबिक देखने की कोशिश करेंगे और जहांजहां पे हमें लगता है कि कुछ उससे क्लश कर रही है चीज तो हम उस कुरान में अपनी चीजों को तब्दील करेंगे क्योंकि वो तो फिक्स है। वो पूरे जो आइडियाज थे यूनिवर्सल आइडियाज यानी साइंस के और ज मॉडर्न फिलॉसफी के खासतौर से जो नेचर नेचर के हवाले से उसको वो ऐसा फिक्स समझते थे कि उसमें तो कोई तब्दीली नहीं हो सकती। ला माला हमें कुरान की सारी आयतों को नए सिरे से समझना पड़ेगा। इससे कतज़ की सारी हदीस पूरे 1400 साल की रिवायत बिल्कुल इससे हट जाए। आप समझ रहे हैं? तो इस तरह की चीजें हैं। इसी तरह से वो जो है हमारे मिसाल के तौर पे एए फैजी हैं जो जिनकी किताब है मॉडर्न मॉडर्न एप्रोच टू इस्लाम। तो ये एक बड़े ये थे यानी 20वीं सदी के शुरू में की एक बड़ी शख्सियत हैं और उनकी मशहूर किताब है ये। वो बात करते हैं कि इस्लाम में पूरे रिफेशन की जरूरत है और इसी तरह से रिफेशन की जरूरत है जिस तरीके से क्रिश्चियनिटी में रिफॉर्म हुआ है। तो एक मॉडर्न एप्रोच की बात ये है कि उन तमाम नजरियात को अलग हटते हुए कुरान के बुनियादी चीजों से बिल्कुल अलग हटते हुए वो दोदो चार की तरह उस बुक में लिखते हैं। मैंने उसको कई दफा पढ़ा है। वो कहते हैं कि हमें तो उसी तरह से जिस तरह से बाइबल को और जिस तरह से चीजों को परखा गया है और उसी के मुताबिक जो है कुरान को परख करके हिस्टोरिकल मेथड हां मेथड अपना करके इन तमाम चीजों को करना चाहिए। अरब लोगों में मोहम्मद अरकून हैं, हसन हफी हैं, मोहम्मद शहर हैं। इसी तरह से नसर हामिद अबू ज़द हैं। ये एक बहुत बड़ी खेप है। हमारे यहां कम है। लेकिन हमारे मॉडर्न मॉडर्निस्ट स्कॉलर जो अरब दुनिया के हैं वहां तो बहुत बड़ी तादाद है। वो तो उन तमाम चीजों में जो हमारे बेसिक जो बुनियादी इस्लामिक आइडियाज हैं यानी हश्र का तसवुर, आखिरत का तसवुर उन तमाम चीजों को भी रिकंस्ट्रक्ट करना चाहते हैं। इन तमाम चीजों को भी वो मानने के लिए इस तरह से तैयार किसी भी हालत में नहीं है। तो हम ये समझते हैं कि ये सब जो है हम इसमें बात नहीं कर सकते। नहीं करते कि इरदाद है, इलहाद है, थइज़्म है, एपोस्ट्रेसी है उसको तो रहने दें। लेकिन हम ये समझते हैं कि ये वो सेकुलर मॉडर्निज्म है जो बिल्कुल हमारे ट्रेडिशन से बिल्कुल हटा हुआ है और वो ऐसा तजद्दुद है जो इस्लाम के खाने में नहीं आता। बाकी जावेद अहमद गामदी साहब हैं या इस तरह के और जो स्कॉलर्स हैं बहुत सारी चीजों में उन्होंने अपने असलाफ से इख्तलाफ किया है और बड़ी चीजों में इख्तलाफ किया है। लेकिन ऐसी मिसाल नहीं मिलेगी कि इसकी खुद हमारे रिवायत में हमारे ट्रेडिशन से वो चीजें हट कर यानी खुद शाह वली उल्लाह जिसको आपने भी पढ़ा हमने भी पढ़ा उनके उन्होंने जिसने जितनी बड़ी-बड़ी चीजें यानी इख्तलाफात हैं। यानी खुद शाह वली उल्लाह जो है मोजात को इस तरह से नहीं मानते। वो कहते हैं कि कुरान का वो जो है मिसाल के तौर पे शकुल कमर का मोजजा है कि चांद को टुकड़े होने का वो नहीं मानते। वो इटरर्निटी ऑफ़ द वर्ल्ड का नजरिया मानते हैं। वो वो कहते हैं कि साहब जो है कदम आलम या आलम के कदीम या इटरर्नल होने का वो कहते हैं। उसको मानते हैं। हालांकि आप समझ सकते हैं कि मैं इसको लेकर के कितनी बहस हैं कि मैटर कैसे कदीम या इटरनल हो सकता है। खुद जो है इबने तैमिया के यहां इस तरह की चीजें मिल जाती हैं। और सबसे ज्यादा इस तरह की बड़ी-बड़ी चीजें हमने बताया कि खुद इबने अरबी के यहां है। इबी कहते हैं कि सिर्फ नबूवत गैर तशरी नबूवत बंद हुई है। वरना नबूवत अभी भी जारी है। ये तो मैं एक मिसाल बता रहा हूं। सिर्फ 10ों मिसाल हैं जो खुद इबने अरबी के तो हम ये कहना ये चाह रहे हैं कि अगर आप अपने ट्रेडिशन में को देखें तो उस ट्रेडिशन में खुद गजाली के यहां जो बड़ी-बड़ी तनकीदें इबने तैमिया ने की हैं। इबने रुद ने की हैं। इतनी बड़ी-बड़ी चीजें नजर आएंगी। हम तो जो जो चीज़ यहांज़ नहीं आ सकती तो हम हमें यह कहना पड़ेगा के हम जो है इस तरह किसी को मुतजद करार देने का जो एक फ्रेमवर्क बनाते हैं वो सिर्फ ऐसा नहीं हो सकता कि 20वीं सदी के स्कॉलर्स पे तो वो पूरी तरह अप्लाई करता हो और जो उससे ऊपर जो अब हमारी ट्रेडिशन का दोद चार की तरह से हिस्सा हो चुके हैं उस पे अप्लाई ना करता हो। सो ऐसा नहीं है। हमें ऐसा फ्रेमवर्क बनाना पड़ेगा कि उसमें अगर हम 20वीं सदी के आज के स्कॉलर को देखें तो पुराने को भी देखें। उसकी बुनियाद पे फिर उनसे मुतालिक भी हमारा वही फैसला होना चाहिए। तो हम यह समझते हैं कि इस तरह के लोगों से इख्तलाफात तो बहुत ज्यादा हम कर सकते हैं। यानी उनकी बातों ऐसा नहीं है कि हम उनको ये कहे कि जो बातें जावेद अहमद खामदी साहब जो बातें कह रहे हैं वो सारी वो सही है। नहीं नहीं बिल्कुल बहुत सारी बातें ऐसी हैं जो बिलाशुबा हम उनसे दो-दो चार की तरह से इख्तलाफ करते हैं और हमें करना चाहिए। हम लेकिन उसकी बुनियाद पे हम वो जो तजद्दुद का जो खाना जो हमने बनाया है जिस तरह से कि हम उसको उस खाने में डाल दें। हमें लगता है कि वह सही नहीं है। क्योंकि अगर हमें उस डालें तो हमें लगता है कि गजाली से लेकर शाह वली उल्लाह तक ऐसे स्कॉलर्स की दर्जनों बहुत तादाद है कि जिनको हमें लामहाला फिर उसमें रखना पड़ेगा। तो इंटरेस्टिंगली कहने का मतलब ये है कि इवन जो अभी भी जो लोग स्कॉलर्स इस तरह की जैसे आपका इमाम मेहंदी पे ईसा सलाम के आने पे आपकी मुख्तलिफ राय है। उसका आपने ये जो फ्रेमवर्क तय किया वो ये है कि भ हदीस जो मुतवातिर है या फिर इस तरह की सिंगल सोर्स है। अगर सिंगल सोर्स है चाहे सनद कितना भी स्ट्रांग हो लेकिन अगर उसका मतन उसको वो नहीं कर रहा है। पूरी तरीके से सपोर्ट नहीं कर रहा है तो उस पे सवाल उठाया जा सकता है। लेकिन यह खास तौर से मुतवातिर से अगर दोद चार की तरह से एक तय है कुरान की मुहकमात यानी वो आयात कुरान की जो जो दोद चार की तरह से सरी है अपने आप में वाज़ हैं। किसी तावील किसी इंटरप्रिटेशन की इस तरह की जरूरत नहीं है। या मुतवातिर हदीसें बिल्कुल मौजूद है। उसकी बुनियाद पे कोई चीज दो-दो चार का जो तय होती है उसमें किसी इख्तलाफ की गुंजाइश नहीं होती। लेकिन जो खबर आहाद जिसको हम कहते हैं सिंगल हदीसों की जो एक चैन है उससे जो चीजें आती है उसमें इख्तलाफ की गुंजाइश होती है उसकी बातची और उसकी बात चीजों का इंकार की रिवायत हमारे ट्रेडिशन में रही है मुतादद हदीस का इंकार खुद इमाम अबू हनीफा ने किया और सबसे ज्यादा हफी ट्रेडिशन में ये बात है कि वो हदीसों के बहुत सारी हदीसों को इस बुनियाद पे इंकार कर देते हैं कि वो कुरानिक जो यूनिवर्सल्स हैं कुलियात हैं बुनियादी चीजें वो कहते हैं कि वो उससे टकरा रही है इसलिए हम इन हदीस को नहीं मानते। इसके बावजूद कि वो हदीसे हदीसे जो है अगरचे कब्रे आहाद है लेकिन सही हैं। तो हम ये देखते हैं कि खुद गोया कि हमारे ट्रेडिशन में इस तरह के मुख्तलिफ चीजों से इख्तलाफ की रिवायत रही है। आपने हजरत मेहंदी मेहंदी या ईसा की हजरत हजरत ईसा की बात की कि इससे बाद लोग इंकार करते हैं। आपको हैरत होगी अगर आपके इल्म में ना हो कि खुद अल्लामा इकबाल भी करते हैं। हम अब हम कहें कि नहीं साहब उनप कोई इस तरह का हम फतवा लगाएं इकबाल पे इकबाल भी लेकिन कोई नहीं लगाता। तो हम ये समझते हैं कि ये गलत है। हम जो है उनको कायल करने की कोशिश करेंगे। हमारे अपनी दलीलें हैं। अपनी सारी की सारी चीजें हैं। लेकिन इस तरह की चीजों की बुनियाद पे हम ये नहीं कह सकते कि उन पे कोई फतवा नहीं लगा सकते। इस तरह से वो इस्लाम के दायरे में हैं। और इस दायरे में रह के बात कर रहे हैं। अब ये कह सकते हैं कि इस तरह की चीजें ठीक है। आपको कम मिलेंगी। एक दो मिसालें तो फिर भी मिलंगी हमारे अपने ट्रेडिशन में लेकिन कम मिलेंगी। लेकिन बहरहाल इसकी बुनियाद पे हम यह नहीं कह सकते कि उनको बिल्कुल ये कहा जाएगा कि वो ट्रेडिशन से हटकर करके ऐसी बातें कह रहे हैं कि अब उनकी सारी बातें मुस्तरद कर देनी चाहिए या जो है वो इस दायरे दायरे से हर हाल में निकल जाती हैं। हम ये कहते हैं कि वो गलत हैं। यानी इस तरह के लोगों की हम सारी बातों को एक्सेप्ट नहीं करते। हम कहते हैं लेकिन उनके लिए हमें फिर वही आर्गुममेंट के जरिए हम अपनी बात रखते हैं कि ये एप्रोच बिल्कुल गलत है हम और ये एप्रोच बिल्कुल सही है। इससे ज्यादा और कुछ नहीं है। सो डिफरेंस ये है कि जो हमारी जो कुरान है या हदीस का ट्रेडिशन या बाकी सारी चीजें उसमें अगर इंटरप्रिटेशन और वो हो भी रहा है तो विद इन द बाउंड्स ऑफ व्हाट इज़ बीइंग अलाउड फ्रॉम दीज़ टेक्स्चुअल इनफेंसेस देमसेल्व्स। और अगर उसके बाहर के नजरिए से उसको कंप्लीटली फाउंडेशनली चेंज बिना किसी जो ट्रेडिशनल जो लिटरेचर है उसको सामने रख के किया जा रहा है तो ये चीज आउटसाइड द ट्रेडिशन हो गई और उसको बिल्कुल जिसे कहते हैं कि अग्रेसिवली उसके खिलाफ हमें पोजीशन लेनी चाहिए और इस वाले पोजीशन में हमें उसके इंटैक्ट करना चाहिए। इंटैक्ट करना चाहिए। तो इसी से अब ये जो दूसरी चीज जुड़ी हुई है के अल्लाह के रसूल सल्ला वसल्लम की वफात के बाद जब पूरा का पूरा एक सिलसिला शुरू हुआ जिसमें खिलाफत राशिदा है उसमें इंटरप्रिटेशंस हैं हमारे खुद के जो चार पहले खलीफा है उनके बीच में डिफरेंसेस हैं कुछ इशूज़ को लेके और फिर उसके बाद अगले 200 साल में जो मज़ाहिब फॉर्म हो रहे हैं अकीदे के जो फ्रेमवर्क फॉल हो रहे हैं फॉर्म हो रहे हैं उसूल जो कायम हो रहे हैं फिर वो अपने आप में एक टाइम में फिक्स हो जाते हैं और उनको फिर आप उनके ऊपर डिबेट नहीं कर सकते या फिर यह समझ लिया जाता है कि यह जो कुछ फ्रेमवर्क सामने आ गए हैं कि इमाम इबने तैमिया तक जो आता है कि भ अच्छा ठीक है इसके विदिन तो आप इश्तहाद कर सकते हैं डिफर लेकिन आप एक तकलीद विद इन पॉसिबल व्यूज है और एक है कि भ नहीं प्योर तकलीद है कि नहीं आप इसी उसूल और एक ये है कि नहीं अभी हम इवन बिय्ड दैट ये जो इमाम इब्ने तैमिया का पोजीशन है उसके बियों्ड जाके भी रिकंस्ट्रक्ट कर सकते तो तकलीद क्या है? और तकलीद से यह जो यह बात पूरी जो डिबेट शुरू हुई के यारार्ड स्टिक बन गया एक कि भ आप हफी हैं तो आप इसी तरह देखेंगे। आप यू नो शाफी हैं तो इसी तरह देखेंगे। हत्ता कि भ आप शियाओं में अगर आप जाफरी हैं तो आप इस तरह से देखेंगे। उसकी क्या जरूरत थी? उसकी क्या लिमिट है? उसमें क्यों जरूरत है फिर से सोचने की? और क्या ऑप्शंस अवेलेबल है? बहुत अच्छा। देखिए ये तो ऐसा क्वेश्चन है कि इस पे बाज़्ता तौर पे एक अलग से गुफ्तगूया होना चाहिए कि यानी इज्तिहाद [गला साफ़ करने की आवाज़] का जो हमारा एक पूरा जो कांसेप्ट था जो ट्रेडिशन था वो किस तरह से अब जब के मौजूदा दौर में जिसकी सबसे ज्यादा जरूरत थी ऐसा लग रहा है कि वही एक तरह से डिस्कार हो के रह गया है। तो पहले तो इस पे गुफ्तगू कर लेते हैं कि ये जो ऐसी नौबत क्यों आई और तकलीद और इश्तहाद क्या है और हिस्टोरिकली हम किस तरह से इसको देखते हैं। देखें ये जो तीसरी चौथी सदी में हम ये देखते हैं हिजरी में हम ये देखते हैं कि ये मुख्तलिफ स्कूल्स ऑफ थॉट बनते हुए चले गए। उसकी बुनियादी वजह जो थी कि वो मुख्तलिफ तरह की हदीस हैं। एक बहुत बड़ी तादाद में ओलमा एंड स्कॉलर्स हैं जो उसकी बुनियाद पे वो मुख्तलिफ तरह के अ उनकी अप्रोचेस उनके फतवे उनकी चीजें सामने आ रही हैं। जिनके लिए जरूरत पड़ी कि उनको लिमिट किया जाए कुछ। वरना एक रिवायत ऐसी है जिसमें एक चीज हलाल और दूसरे में बिल्कुल हराम। तीसरे में कुछ और। अब जो है उलमा स्कॉलर्स की एक लंबी चौड़ी तादाद है खेप है और हर हर कोई दलील के तौर पे यह दिखा देता है वो दिखा देता है तो इस बात की कोशिश की गई कि इसको लिमिट किया जाए और और उसके लिमिटेशन के लिए ये हुआ कि नहीं ये जो चार जो हैकि बड़ी तादाद ही है चार लोगों को यानी सुन्नी स्कूल ऑफ थॉट उनके जो इसको फॉलो किया जाएगा और विदिन फोर स्कूल ऑफ थॉट रह कर करके हम किसी चीज को के बारे में एक फैसला कर सकते हैं। कोई स्टैंड हम ले सकते हैं। यह उस वक्त की एक जरूरत थी। यानी एक एक इंतशार बहुत ज्यादा था। एक मिस था, एक इंतशार था। उसको खत्म करने की एक टेंपरेरी ये एक कोशिश थी। ये एफर्ट थी कि उसको किया जाए। हम समझते हैं कि ये उस वक्त की एक तरह से जरूरत हम्म। लेकिन बाद में हुआ ये के ऐसा आगे चलकर के हुआ कि ये जो स्कूल ऑफ थॉट है इसी को वो एक तरह से वो क्रेडिबिलिटी ऑथेंटिसिटी ऐसी मिल गई फिक्स कि अब इससे बाहर जाकर कर कर के कोई लीगल इंडिपेंडेंट रीजनिंग नहीं हो सकती। सिरे से इससे बाहर जा कर करके हम कोई एक नई ओपिनियन बिल्कुल क्रिएट नहीं कर सकते और जिसको हम कहते हैं कि गोया इज्तहाद का एक तरह से दरवाजा बंद कर दिया गया। यानी कभी ऐसा नहीं हुआ किसी किसी पॉइंट ऑफ टाइम में कि किसी ने कोई ऐसा किसी बादशाह ने या किसी स्कॉलर ने ये कहा हो कि भाई आज से इज्तहाद का दरवाजा हम बंद करते हैं और आज के बाद से कोई इत्तहाद नहीं होगा। यानी इजहाद का मतलब एब्सोल्यूट इजहाद यानी इन चार फ्रेमवर्क से हट के लेकिन ऐसा हो गया और फिर उसके साथ एक तरह से खामोशी के खामोश तौर पे ये तस्लीम कर लिया गया कि अब यही हक है उससे बाहर जो है हक नहीं है गोया कि लेकिन हम ये देखते हैं कि जब आज की जो ये दुनिया जो चेंज हुई है यानी 18वीं 19वीं सदी में जो खासतौर से ये दुनिया चेंज हुई है 20वीं सदी में आकर करके के आज का की पूरी दुनिया ने जिस तरह से अपने आप को तब्दील किया तो हमारे सामने जो बड़े-बड़े बड़े क्वेश्चन थे, बड़े-बड़े सवाल थे। वो इस बात का तकाजा कर रहे थे के वो जो इ्तहाद का टूल हमारे पास था उसको दोबारा लाया जाए। यानी मुसलमानों को ये एहसास हुआ जब उनको यह महसूस हुआ खासतौर से कॉलोनियल पीरियड में कि ऐसा क्यों हुआ? एक शकेब अरसलान लुबनानी बहुत बड़े थिंकर थे। उन्होंने किताब लिखी लमाजा तदैना क्यों जो है दूसरे लोग जो है आगे बढ़ गए। हम लोग क्यों पीछे रह गए? हमारा डिक्लाइन क्यों हुआ? इस तरह का क्वेश्चन पैदा हुआ। उस क्वेश्चन में यह आया कि नहीं जरूर कुछ ना कुछ हमने खो दिया है। जरूर कुछ ना कुछ ऐसा बिगाड़ आया है हमारी फिक्र में, हमारे ट्रेडिशन में, हमारी चीजों में जिसको करेक्ट करने की जरूरत है। तो एक बुनियादी चीज जो हमें समझ में आई वो ये के इज्तहाद को हमने बिल्कुल ही बंद कर रखा है। हम अब नतीजा यह है कि हमारे पास जो फो फतावा की किताबें हैं उनके फतावा हैं उनके जो कुछ उससे पहले जो फका की किताबों के उसूल हैं वो अपने आप में बहुत ही स्टेग्नेंट बहुत ही जामिद हैं। लेकिन हम यह समझते हैं कि उससे बाहर आकर करके हम सोच ही नहीं सकते। जबकि आज के सवालात आज के बड़े इशज़ इतने बड़े हैं कि जिनको उस पैराडाइव में हम हल ही नहीं कर सकते सिरे से। इस बात की जरूरत इसलिए पेश आई और इस पे एक जबरदस्त डिबेट चली जिसको खुद इकबाल को हम देखते हैं कि उन्होंने रिकंस्ट्रक्शन अपने खुतबात में उन्होंने एक जो बड़ा खुतबा उनका है वो इ्तहाद पे है। अब उनसे पहले मिसाल के तौर पे अल्लामा शौकानी ने यमन में उन्होंने जबरदस्त तरीके से कोशिशें की। मुफ्ती मोहम्मद अबू ने रशीद रजा जो अलमनार तहरीक थी उन लोगों की ये कोशिशें थी कि नहीं भाई यह इजहाद को दोबारा रीएक्टिवेट करने की जरूरत है। ये पूरा कांसेप्ट बहुत ज्यादा हमारे दौर में बिल्कुल एकदम जामिद हो के रह गया है। तो यह पूरा का पूरा इज्तिहाद का जो अह वह हुआ अह अच्छा आखिरी बात कि हम ये देखते हैं कि खुद हमारे उस पूरे ट्रेडिशन में इज्तिहाद के हवाले से ये एप्रोच रही है कि नहीं ऐसा समझना के अब जो कुछ भी इमाम अबू हनीफा ने कह दिया, इमाम शाफई ने इमाम मालिक ने कह दिया वो दो-दो चार की तरह से ऐसा है। सो ऐसा नहीं है। और खासतौर से हंबली ट्रेडिशन में यह ज़हन में हमली ट्रेडिशन में तो यह रहा कि नहीं अब्सोल्यूट इजहाद जिसको हम इत्तहाद मुतलक कहते हैं वह तो हमेशा करना ही जरूरी है। सुयूती ने पूरी एक किताब लिखी कि इंतहाई जिहालत की बात है। कोई ये कहे कि इ्तहाद नहीं। मुताद स्कॉलर कहते थे कि आज इत्तेहाद की ज्यादा हमारे पास टूल्स हैं। ज्यादा वसाइल हैं जिनको यूज़ कर करके हम कर सकते हैं। लेकिन तो बहरहाल खुलासा ये है कि 20वीं सदी का जमाना इ्तेहाद का ज्यादा मुतकाज़ था। लेकिन हमारी पूरी फिक्र जिस तरह से ढल चुकी थी, फिक्स हो चुकी थी, उसने इज्तिहाद के इस पूरे कांसेप्ट को बहुत ज्यादा अलग थलग डिस्कार कर करके रख दिया। जो हमारी जिसको हम इंटेलेक्चुअल डिक्लाइन कहते हैं उस और स्टेग्नेशन कहते हैं, जुमूद कहते हैं, उसमें एक बुनियादी चीज़ वो है जो इज्तिहाद के पूरे तसवुर को बिल्कुल उठा कर करके बाहर कर देना है। इरिलवेंट हो जाना है। आप इकबाल को क्यों प्रिविलेज करते हैं? जितना भी करते हैं, कितना करते हैं? क्या इकबाल की कंट्रीब्यूशन है इस डिबेट में? और क्या लिमिटेशन है? फिर मैं फिर एक लार्जर सवाल पूछूंगा के उसूल के ऊपर कि अभी जो हमने इश्तेहाद की बात करी इमाम अबू हनीफा के हवाले से वहां पे इश्तेहाद की तो बात हो रही है लेकिन उसूल अगर सेम है तो वो एल्गोरिथम है वो वही चीज प्रोड्यूस करेगा तो वो इश्तेहाद बात करेंगे इस पे हम आगे बात करेंगे कि वो उसूल पे इश्तेहाद या फिर उसूल कायम होने के बाद सवाल है ये बहुत ये हमारे किताब [गला साफ़ करने की आवाज़] में भी इस पे बहस जी जी जी जहां तक इकबाल की का के मुतालिक आपने सवाल उठाया बहुत अहम है। इकबाल की मुख्तलिफ बातों से इख्तलाफ के बावजूद और वो इख्तलाफ किया जा रहा है। हमारी ब्यूटी हमारे ट्रेडिशन की यही है के बड़े-बड़े स्कॉलर से हमेशा इख्तलाफ किया जाता रहा। चाहे वो अबू हनीफा शाफई से लेकर के तैमिया और गजाली तक। तो इकबाल जाहिर है क्यों नहीं उनसे इख्तलाफात होंगे। लेकिन मौजूदा दौर में इकबाल ने जो उनके खुदबात हैं रिकंस्ट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम। उसमें इकबाल ने बुनियादी तौर पे देखें दो काम किया। एक तो अ उन्होंने जो इस्लामिक वर्ल्ड व्यू था इस्लामिक थियोलॉजी थी उसको मॉडर्न पर्सपेक्टिव में उसको रिकंस्ट्रक्ट करने की उन्होंने कोशिश की। एक ऐसा इल्मियाती एपिस्टेमोलॉजिकल फ्रेमवर्क बनाने की कोशिश की। जिसमें वो मजहब को मजहबी हकीकत को मजहब को समझने को अ एक फ्रेमवर्क उन्होंने बनाया और इस तरह से जो एक जदीद सा जदीद फिलॉसफी ने कुछ इस तरह से खासतौर से ये लॉजिकल पॉलिट यानी पॉजिटिविज्म वगैरह जो आया है जिसने बताया कि ये मजहब-वज़हब तो कुछ ऐसी चीज है कि खुद इंसान ने अपने तौर पे पैदा किया। यह तस्सवुर सामने आया कि साहब मजहबी हकीकतें जो है अपना कोई साइंटिफिक बुनियाद अकली बुनियाद रिशनल बुनियाद नहीं रखती है। इकबाल ने इसको उसी फ्रेमवर्क में ये समझने और समझाने की कोशिश की कि नहीं साहब मजहबी इल्म की अपनी एक हकीकत है। उसको उसको जांचा परखा जा सकता है और और परख करके साबित किया जा सकता है कि मजहब अपनी एक इल्मी बुनियाद रखता है। जिसको उन्होंने दूसरे खुदबे में मिसाल के तौर पे पेश किया है। और इस तरह से इकबाल ने पहला यह ढांचा बनाया के मजहब की अपनी अहमियत है और उसको साबित किया जा सकता है। ह्यूमन रीजनिंग और साइंट और साइंसी साइंटिफिक फ्रेमवर्क में साबित किया जा सकता है। दूसरे जो है इस्लाम की तरफ वो आते हैं और फिर जिस इजहाद की हम बात कर रहे हैं जो उनकी गैर मामूली जो उनका छठा खुतबा है गैर मामूली तौर पे जो उन्होंने इज्तिहाद का जो पे जो बहस की है वो पढ़ने के लायक है। यानी वो इससे हटकर के जो हमारे मदारिस में जिस तरह से इज्तिहाद की बहसें होती हैं जो हमारे उसके उसूल शरायत और ये सब जो बातें फिक या उसूल फिक्र में उससे हटकर करके बातें हैं। क्योंकि ज्यादा बड़े फ्रेमवर्क में बड़े सिनेरियो में उन्होंने इत्तेहाद की बात की है और वो कहना चाह रहे हैं कि इस्लाम इस्लामिक शरिया या इस्लाम का जो पूरा इस्लाम है वो उसके मूवमेंट की थ्योरी जो बुनियादी है वो इज्तिहाद का तसवुर है। मूवमेंट की थ्योरी बताते हैं। वो इस बुनियाद पे वो अपनी एक अबदी हकीकत एक इटरनल हकीकत रखता है और वो बिल्कुल जामिद हो गया है। पूरा का पूरा कांसेप्ट। तो इसलिए जो है मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा इस बात की जरूरत है कि इज्तेहाद के तसवुर को रीएक्टिवेट किया जाए। दोबारा इज्तहाद को उनके उस उस तसवुर से हटते वो करते हुए यानी इत्तेहाद के लिए जितना ज्यादा पाबंद कर दिया गया है। यानी जितनी शरायत जितने तसवुरात इकबाल उसकी बहस नहीं करते। लेकिन उनका मजमुई फ्रेमवर्क लगता है कि आज के मॉडर्न दुनिया में मॉडर्न तरीके से इस कांसेप्ट को आगे बढ़ाने की जरूरत है और इसी तरीके से हम अपनी इस्लामिक शरिया को मौजूदा दौर के तकाजों के मुताबिक कर सकते हैं। इकबाल ये देखने की कोशिश करते हैं और फिर कुछ इश्यूज को भी जैसे सियासत पे बात करते हैं, वुमस राइट पे बात करते हैं। वो कहते हैं कि इन तमाम चीजों में इत्तेहाद की जरूरत है। आपका डिफरेंस क्या है इकबाल सर? हां जहां तक डिफरेंस की बात है कि इकबाल ने अपनी एफर्ट की है और बिलाशबा बहुत ही एप्रिशिएबल है। इसमें कोई शक की बात नहीं है। लेकिन मजमुई तौर पे हम ये जरूर देखते हैं कि इकबाल ने जो अपना एक फ्रेमवर्क बनाया है उसमें कहीं ना कहीं ऐसा लगता है और उसी को लेकर के इकबाल पे तनकीदें भी बहुत ज्यादा होती रही हैं। कि उन्होंने मजहबी हकीकत को जो एक या जो रियलिटीज़ हैं अह मेटाफिजिकल रियलिटीज़ इस्लाम के यानी अह इस्लामिक थियोलॉजी या इस्लामिक बिलीव को उन्होंने जो जिसको साइंटिफिक रियलिटीज़ या साइंटिफिक फ्रेमवर्क के बिल्कुल ताबे कर दिया है एकदम। यानी वो वो मजहब की हकीकत को साबित करने के लिए जो टूल्स इख्तियार करते हैं वो टूल्स को में बुनियादी तौर पे वो मॉडर्न फिलॉसफी को साइंस को लाते हैं। इसलिए मिसाल के तौर पे बर्गसन से वो बहुत ज्यादा मुतासिर हैं। बहुत ज्यादा वहां से वो चीजों को लाते हैं। आइंस्टाइन [नाक से की जाने वाली आवाज़] की बहुत ज्यादा हवाला देते हैं। वो इसी तरह से विलियम जेम्स का बहुत ज्यादा हवाला देते हैं। वगैरह-वगैरह बहुत ज्यादा। तो इस तरह की बहुत सारी शख्सियात को इस तरह के वो एक एक साइंटिफिक अपना एक पैराडाइम बनाते हैं और उसकी बुनियाद पे मजहबी हकीकत [गला साफ़ करने की आवाज़] को समझने की कोशिश करते हैं। उनप उस पे बुनियादी तौर पे एतराज ये वही होता है जिसका हमने पहले वो जिक्र किया के ये जो बुनियादी मजहब का जो तसवुर है वो बुनियादी मजहब का तसवुर को एक साबित करने के लिए ये जो आप एक साइंट साइंसी टूल जो बना रहे हैं आप तो लामहाला आप ऐसा कर रहे हैं कि साइंस को ऊपर रख रहे हैं और मजहब को आप नीचे रख रहे हैं या फिर यह हो रहा है कि आज आप जिस तरह से साइंसी नजरियात को बुनियाद बना कर करके मजहब को देखने समझने की कोशिश कर रहे हैं। आगे जाकर करके ये सारी तब्दीलियां आएंगी आ सकती हैं। वहां पे फिर क्या पोजीशन इस्लाम मजहब की बनेगी? मजहब की जो बुनियादी रियलिटीज है वो फिक्स हैं, इटरनल है। आप उसको इस तरह से उसके ताबे कर देते हैं के उससे ये एक मेथडोलॉजिकल ये एक प्रॉब्लम पैदा हो जाती है। एक खास इस्लामिक वर्ल्ड व्यू को तय करने के लिए एक खास जो आप टूल्स ये जो तजदीद और तजद्दुद में जो हमने डिफरेंस लाया तो इकबाल को कैसे देखेंगे उसमें? क्योंकि तजद्दुद में तो हमने यही के हम जब तरजीह दे रहे हैं एक एपिस्टेमोलॉजी को जो होलिज्म ऑफ़ इस्लाम को नहीं डील कर पा रही है। तो क्या इकबाल देखिए ये एक अच्छी बात इकबाल ने कही है। बहुत अहम सवाल है क्वेश्चन है। इकबाल ने उनको मालूम था कि ये सब तो एतराज होंगे वगैरह वगैरह। हम इकबाल ने शुरू ही में यह बात कही है कि देखिए मैंने जो कुछ भी बात कही है यह आपको 100 फीसद इससे इख्तलाफ करने का हक है। मुकदमे ही प्रीफेस जो लिखा है उसी में उन्होंने बात की है। आपको इसको मुकम्मल तौर पे इख्तलाफ करने का हक है। उन्होंने कहा कि आने वाली तमाम जनरेशन को अपना-अपना हक है कि वो अपने तौर पे चीजों को समझे और अपना उसको सामने लाए। मैंने एक चीज समझी है, समझाने की कोशिश की है और ये मैं समझता हूं कि मैं अपने आप में एक मुखलिस और सिंसियर हूं। हम दूसरी बात वो कहते हैं कि साहब इस्लाम को पूरे तौर मौजूदा दौर में चैलेंजेस इस तरह से हैं कि पूरे इस्लामिक इस ढांचे को हमें एक तरह से रिथिंक करने की जरूरत है। और अपने असलाफ अपने प्रीडसेसर से इसमें इख्तलाफ अगर जरूरी है तो हमें करना पड़ेगा। यह हमारी अप्रोच है और ऐसा करना चाहिए। इकबाल ने रिकंस्ट्रक्शन में लिखा है। लेकिन यह दोद चार की तरह से फिक्स नहीं है। आप जो चीजें चाहे तो इख्तलाफ करें। जो चीजें चाहे तो एक्सेप्ट करें। तो इस तरह से गुंजाइश निकलती है और इकबाल पे एतराज करने वाले ने शदीद तरीन एतराज किए हैं। इसी तरह के जो हमने मिसाल के तौर उन्हीं के शागिर्द थे बुरहान अहमद फारूकी साहब पाकिस्तान के शागिर्द थे। इकबाल से काफी वो किया है। उन्होंने कहता है इकबाल ने तो साहब जो है कुरान को साइंस का गुलाम बना दिया। इस तरह की बातें वो कहते हैं। तो ये ये इख्तलाफात अपनी जगह है। लेकिन इकबाल की अपनी जो एक सिंसियरिटी थी अपना जो इखलास था वो अपनी जगह है कि वो ये समझते थे कि हमारी ये कोशिश है। आप इसको जैसे भी देखना चाहे देखें। तो ये इससे कैसे डिफरेंट है कि जो मान लीजिए कि जो अशारी हैं या फिर जो मातुरीदी हैं या फिर जो अथरी हैं या फिर जो मोतजला का स्कूल ऑफ़ थॉट है ये भी जो पोजीशंस हैं अक्ल में नकल में कल्प पे वो जो फिलोसोफिकल रीजनिंग में भाई कितना रीजन को जगह दें कितना उसको जगह दें तो ये भी तो उस जमाने के हिसाब की जो डिबेट्स हैं वो सिर्फ ऐसा नहीं है वहां पे वो उससे पहले ग्रीक फिलॉसोफी में भी हुई है। हिंदू फिलॉसोफी में भी हुई है। बुद्धिस्ट फिलॉसोफी में भी हुई है। पर्शियन फिलॉसोफी में भी हुई हैं। तो अगर इकबाल ने फॉर एग्जांपल अपने कंटेंपररी जमाने के हिसाब से टूल्स और इसको इस्तेमाल किया लेकिन ये बोल दिया कि अब ये फिक्सेटेड नहीं है। लेकिन दूसरी तरफ ये हो रहा है कि जो खुद अपने आप में फिलॉसफी है और वो उस जमाने में जो ईमानियात की कुछ जो चीजें हैं डिफेंड करने के लिए उसको वजूद में लाया गया। उसको रीजन किया गया। तो वो प्रिविलेज क्यों लेती है? और उससे जो पूरा का पूरा जो जो आप खुद भी बोलते हैं कि भ एक मेडिसिन एक जमाने में तैयार की गई और बाद में उसको वो वो कर दिया। तो असली सवाल उसी तरह से इकबाल का देखते हैं। आपने खुद ही वो जवाब फराम कर दिया। देखिए जिस वक्त में अबुल हसन अशरी ने इल्म कलाम की कोशिशें की तो उन पे ये शदीद तरीन एतराजात यही किए गए कि इल्म कलाम का इस्लाम से क्या ताल्लुक? आप क्यों चीजों को रशनलाइज करने की कोशिश कर रहे हैं। उनको पूरी किताब लिखनी पड़ी। अबुल हसन अशरी को एक पूरी किताब अल इस्तेहसान फी खौज इल्म कलाम उन्हें लिखा और इसमें उन्होंने यह दिया कि नहीं साहब यह ऐसी चीज़ है कि यह तो इसको आप कहें कि इस्लामी ऐतबार से गलत है और जिस तरह से खासतौर से हमली उलमा शदीद तरीन ऐतराज था उनका कि ये इल्म कलाम पूरा का पूरा आपको मालूम है इल्म कलाम के बारे में इमाम शाफी कहते थे कि जो इल्म कलाम में इख्तियार करता है तो उसको पहले तो कोड़ा मारना चाहिए और शहर में उसको जो है घुमाना चाहिए। हम इमाम युसुफ कहते थे कि जो इल्म कलाम पढ़ता है वो जंदका हेरेटिक है। वह बिल्कुल कुफ्र है एक तरह से। खुद यह डिबेट रही है। लेकिन बाद में अब देखिए इल्म कलाम वही वो हो गया। तो हम इकबाल की पोजीशन जो हम देखते हैं कि यह जो इकबाल की कोशिशें हैं इल्म कलाम के हवाले से बुनियादी तौर पे रिकंस्ट्रक्शन एक कलामी प्रोजेक्ट है। तो इकबाल की कोशिशों को उसी पर्सपेक्टिव में देखने की कोशिश करना चाहिए कि ये हर जमाने में का ये एक चैलेंज है कि आप किस तरह से इस्लाम इस्लामिक थॉट को देखने और समझने उसको रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश करते हैं। बजाहिर वो लगता है कि वो [गला साफ़ करने की आवाज़] इस्लाम के लिए वो चैलेंज बन रहा है और बा लोगों के सामने वो लगता है कि इस्लाम से हटा हुआ है। लेकिन वो उसका एक तकाजा होता है। गजाली पे भी इसी तरह से शदीद तरीन एतराज हुए थे। जब उन्होंने इल्म कलाम के हवाले से कोशिश की। शाह वली उल्लाह का बहुत ज्यादा मौके बहुत ही शानदार है। उन्होंने कहा कि देखें साहब जहां तक बात इल्म कलाम के हवाले से है। उन्होंने कहा कि इल्म कलाम मनसूस नहीं है। मंसूस का मतलब वो किसी नस या रिलीजियस टेक्स्ट की बुनियाद पे तयशुदा नहीं है। इसलिए [गला साफ़ करने की आवाज़] मैं अपने असलाफ से इसमें इख्तलाफ करूंगा और इसमें मैं खुद अपना मुजहिद हूं। ये बात की शुरू ही मैंने लिखा उन्होंने कि मुझे इसमें कोई ये नहीं मैं अपनी इंडिपेंडेंट रीजनिंग रखता हूं। इल्म कलाम के हवाले से दूसरे हवाले से वो बात नहीं कर रहे हैं। लेकिन इस हवाले से इसीलिए उन्होंने बहुत सारे इख्तलाफात किए। शुरू ही में कह दिया कि मैं अपने असलाफ से पिछले लोगों से इख्तलाफ करूंगा और मैं इसकी कोई परवाह नहीं करता। इसलिए नहीं करता कि ये चीज मनसूस नहीं है। नस से दो-दो चार चीज साबित नहीं है। ये तो एक तरह का इंटेलेक्चुअल एक एफर्ट है और वो हम कर रहे हैं और इसलिए ऐसा तो इकबाल को आपको इसी फ्रेमवर्क में देखना चाहिए जो शाह वली उल्लाह कह रहे हैं। तो आपको ये नहीं लगता कि जो कलाम है वो फिक को भी इनफॉर्म करता है और फिक जो है वो भी कलाम को इनफॉर्म करता है। तो सिर्फ ये कि कलाम कंप्लीटली इंडिपेंडेंट है। वो इन द सर्विस ऑफ लॉ भी है। इन द सर्विस ऑफ फाउंडेशन वही है। फाउंडेशन देता है। फाउंडेशन वही देता है। तो फका को इ्तेहाद को फाउंडेशन वही देता है। जी। इसीलिए हम देखते हैं कि मिसाल के तौर पे खुद जो फका की जो रीजनिंग भी है जो कई बार ऐसा होता है कि कोई ओरिजिनल थिंकर है फिलॉसोफी में ट्रेंड नहीं है उसके बावजूद वो फिलॉसोफिकल रीजनिंग कर रहा होता है। क्यों ऐसा होता है कि चार जो स्कूल ऑफ़ थॉट्स हैं मोटा-मोटा वो अल्टीमेटली अपने आपको स्कूल ऑफ जो मान लीजिए वो कोई माुरी दी अपने आप को बोलेगा कोई अशरी बोलेगा कोई बोलेगा कि नहीं मैं अथरी हूं। क्यों? फिर ये कोरिलेशन क्यों बन जाता है? पहली बात तो यह कि देखें ये जो है इल्म कलाम और फका के हवाले से जो आपने बात उठाई है बहुत दिलचस्प [गला साफ़ करने की आवाज़] बात है खुद अल मुस्तफा में इमाम गजाली इल्म कलाम को ऊपर रखते हैं वो ये हमें जानना चाहिए हमारे व्यूअर्स को हमारे इसको और वो कहते हैं कि बुनियादी तौर पे इल्म कलाम इन तमाम उलूम से सबसे ऊपर उठ करके और इसीलिए अल मुस्तफा में उन्होंने इल्म यानी अल मुस्तफा इल्म उसूल की किताब है फका की किताब है लेकिन उसका जो बुनियादी जो पूरा उन्होंने तफसील के साथ जो लिखा है मुकदमा वो प्योरली इल्म कलाम पे है और कहा कि उस ये फाउंडेशन है उसकी ये बुनियाद है इस बुनियाद पे फिर हम जो है जो लीगल जो उसूल है जो प्रिंसिपल्स हैं वो हम बनाएंगे वो तय करेंगे और इसलिए वो कहते हैं कि इल्म कलाम सबसे ऊपर का इल्म है। अब देखिए कहां इल्म कलाम को लोग बिल्कुल ही नीचे रखते हैं। अल मुस्तफा में गज़ाली ने इसको सबसे बिल्कुल ऊपर रखा है। दूसरी बात पे हम आते हैं के ये जो उसूल जो बनाए जाते हैं जो जिसकी बुनियाद पे फिर हम इ्तहाद और तकलीद और ये सारे इस्तेमाद और सारे इसकी बात हम करते हैं लीगल रीजनिंग की वो तमाम जिसको हम उसूल फिक्र की मुकदमात और और उसकी बुनियाद हैं। तो यहां पे आकर के इल्म कलाम और और क्या कहते हैं कि इल्म उसूल फिक्र कि दोनों की चीजें बुनियादी हो जाती हैं। दोनों में इक्वल सी बहस कहती है। यानी अकल क्या है? अकल की अपनी लिमिटेशन क्या है? कैपेसिटी क्या है? क्या समझ सकता है? क्या नहीं समझता? इस तरह की सारी बहसें हमारे उसूल फिक के लोगों ने भी की है। फिलॉसफर ने भी की है। मुतकिल्लीन ने भी की है। सारी बहसें हमारे यहां मौजूद हैं। अब ये सवाल ये पैदा होता है कि ये जो हमारे जो मुख्तलिफ स्कूल ऑफ थॉट बने हैं उनके यहां उसूल फिक्र के अपने बुनियादी उसूल हैं। जिसकी बुनियाद पे वो सारी के उन्होंने इज्तहाद का अपना एक फ्रेमवर्क तय किया है। हम्। और उसकी बुनियाद पे अब यह तसवुर बना है कि यह जो एक प्रिंसिपल तय कर दिए गए हैं जो उसूल फिक फिक के जो प्रिंसिपल्स तय किए कर दिए गए हैं। अब इसी की बुनियाद पे आगे जो कुछ भी होना है वो बिल्कुल यही होना है जो पहले से एक तयशुदा है। अबू हनीफा, इमाम शाफी, इमाम बिन हम्ल, इमाम मालिक वगैरह-वगैरह उनकी सारी की सारी किताबें। इस ताल्लुक से हमें यह ज़हन में रखना चाहिए कि देखिए वहां जो है कुछ चीजें उसूल यानी सवाल यह पैदा होता है कि अगर वो चीजें दोद चार की तरह से तय हैं तो फिक्स्ड हैं तो फिर तो एक दर्जे में तो देखा जाए तो इज्तिहाद का तो फिर वहां वही एक फिक्स पैराडाइम है। उससे आगे तो बढ़ ही नहीं सकते आप। फिर तो आपको हर हाल में 1000 साल 1200 साल पहले से जो एक चीज तय कर दी गई उससे आगे आप निकल कर के आप कोई नई चीज नहीं कह सकते। इस ताल्लुक से यानी अर्ज करना चाहूंगा कि देखें खुद उसूल फिक्र के जो बुनियादी मबास हैं तो कुछ चीजें तो इसमें कोई शक की बात नहीं है कि बिल्कुल दोद चार की तरह से तय है। देखिए किताब जो है यानी कुरान जो है वो सबसे ऊपर है। हम हमारी लीगल रीजनिंग में फिक्र में बुनियादी सोर्स जो है वो कुरान है। हर [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोई मानता है। हम हमारे जो जो सेकंड सोर्स है वो हदीस है और इसमें कोई इख्तलाफ बिल्कुल नहीं है। लेकिन आप देखें कि इजमा है कयास है मिसाल के तौर उसमें बहुत सारे इख्तलाफात हैं और उसके बाद चार पांच और जो सोर्सेज हैं शरीयत के मसादिर शरीयत के हवाले से उस पे इस कदर इख्तलाफात हैं पूरे ट्रेडिशन में के मिसाल के तौर पे इमाम अबू हनीफा इस्तेहसान जिसकी तफसील की यहां जरूरत नहीं कि इस्तेहसान को एक मुस्तकिल सोर्स मानते हैं। इमाम शाफई कहते हैं कि इस्तेहसान को मानना तो बिल्कुल शरीयत को गढ़ना है। खुद से शरीयत बनाना है। तो इतने बड़े इख्तलाफात हैं। तो मैं जरा मुख्तसर तौर पे ये कहना चाहूंगा के इल्म उसूल फिक्र की जो चीजें जो हम एक फ्रेमवर्क हम तयशुदा देखते हैं उसको जिस तरह से इसको हम आज इमेजिन कर रहे हैं कि वो इतना दोद चार की तरह से तयशुदा है कि अब उसमें कुछ भी जाकर के नहीं किया जा सकता। सो ऐसा नहीं है बल्कि इसमें खुद बहुत ज्यादा गुंजाइशें हैं कि उस पे गुफ्तगू की जा सकती है और मिसाल के तौर पे अ ताहिर बिन आशूर है ये टिसियन बड़े थिंकर थे उनका बड़ा इंपैक्ट है हर कोई जानता होगा जो भी मकासिद शरीयत के हवाले से यानी शातवी ने जो अल मुवाकात मकास शरीयत लिखी उस पे काम को आगे बढ़ाने वाले हमारे अभी 20वीं सदी में वो थे ताहिर बिन आशूर ने मकासद शरीयत इस्लामिया में बहुत तफसील के साथ इसमें इस पे गुफ्तगू की है। हम तो बहरहाल इस तरह से हमें इज्तिहाद के पूरे तसवुर को आगे बढ़ाने की जरूरत है ताकि ये महसूस ना हो के इज्तिहाद तो सिर्फ नाम इस बात का है कि चार स्कूल ऑफ थॉट ने जो में रह करके आप जो कुछ कहते हैं वो आपके ट्रेडिशन के मुताबिक है और वही हक है। उससे बाहर आकर के जो कुछ भी आप कहते हैं वो बिल्कुल हक नहीं है। वो बिल्कुल उस फ्रेमवर्क से हटा हुआ है। हमारे ट्रेडिशन से कटा हुआ है। सो ऐसा नहीं है। और हम ये देखते हैं कि खुद जो है चार स्कूल ऑफ थॉट के अलावा खुद हमेशा एक स्कूल ऑफ थॉट रहा है जिसको हम जाहरी स्कूल कहते हैं। उसने कभी भी इन चार स्कूल ऑफ़ थॉट को नहीं माना। लेकिन मौजूदा दौर में इस बात का तकाजा है कि जो और भी स्कूल ऑफ़ थॉट हैं, उनसे भी इस्तफादा किया जा सकता है। करना चाहिए। जाफरी स्कूल ऑफ़ थॉट है, ज़दी स्कूल ऑफ़ थॉट है। आप इन तमाम चीजों से कट कर करके आप नहीं रह सकते। मिसाल के तौर पे टर्की में यानी ऑटोमन एंपायर के लास्ट में उन्होंने बनाया था मजलत हकाम अदलिया कुछ एक नई जो है उन्होंने ये कोशिश की थी कि कोडिफिकेशन ऑफ लॉ की कोशिश की थी और नए जमाने के ऐतबार से वो एक इत्तहादी कोशिश की थी। उसमें एक बुनियादी उस उन्होंने ये इख्तियार किया था के आज के जो तकाजे हैं मॉडर्न दुनिया के मुताबिक खासतौर से खरीदो फरोख्त वगैरह बिनेस तजारत और इस तरह के मामलात तो चारों स्कूल ऑफ़ थॉट से हटकर करके भी अगर कोई चीज हमें मिले सहाबा के यहां ताबेईन के यहां मुस्तहदीन के यहां तो हमें उसको इख्तियार करना चाहिए और ऐसा नहीं समझना चाहिए कि वो हमारे ट्रेडिशन से बाहर है। क्योंकि इस जो अभी हम थीम चल रही है उसमें हम लोग जो लार्जर फ्रेमवर्क डिस्कस कर रहे हैं कि किस तरह से जो इस्लाम और उसका कंट्रीब्यूशन और जो इस्लामिक सिविलाइजेशन है वो कैसे फ्रोजन इन टाइम लोगों को लगने लगी हमें खुद महसूस होने लगा तो इस हवाले से बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बातें की और उसमें आपने जो मौलाना मौदूदी और सैयद कुतब का जो जिक्र किया है जो मुलूकियत की जो पूरी डिबेट है खिलाफत से मुलकियत का जो पूरा मामला है और जहा हालिया का पूरा मामला और ताूद का पूरा मामला है। तो एक पर्टिकुलर वे में ये समझने की कोशिश की किस तरह से एक तो इकबाल ने जो हमने बात की कि भ इकबाल किस तरह से देख रहे हैं। इसी तरह से देवबंदी ट्रेडिशन बड़े सगीर में बात कर रहा हूं। मेरी ज्यादा नॉलेज नहीं है बाहर के ट्रेडिशंस की। तो यहां पे क्योंकि थोड़ा बहुत पढ़ते हैं तो अंदाजा होता है। तो आप इनको किस तरह देख रहे हैं कि एक तरीके से जो होलिज्म है इस्लाम पोलिटिकल थॉट को सिर्फ पिटिकल थॉट नहीं मतलब उसमें हम पॉलिटिकल थॉट की बात करें लेकिन ये जो मौलाना मौदूदी का इकामत दीन का जो प्रोजेक्ट है हुकूमत इलाही का जो प्रोजेक्ट है इस्लाम एस अ होलिस्टिक वर्ल्ड व्यू का जो प्रोडक्ट या सिस्टम का जो प्रोडक्ट है और उस सिस्टम में जब आप पिटिकल थॉट को लोकेट कर रहे हैं और एक तरीके से देख रहे हैं तो क्या कंट्रीब्यूशन है क्या लिमिटेशन रहा ये जो एक तरीके कि वो भी इश्तहाद करने की कोशिश कर रहे हैं। एक तरीके की तजदीद जो क्लेम है स्कूल ऑफ़ थॉट का वो क्या है? हमने इकबाल पे बात करी। हम थोड़ा सा इसको भी देखने की कोशिश करें। आपने खास तौर से मौलाना मौजूद और सैयद कुतुब की बात की। उनकी अपनी जो इस हैसियत से बड़ा काम है। इसमें कोई शक की बात नहीं कि उन्होंने इस्लामी फिक्र को इस्लामिक थॉट को मौजूदा दौर के मुताबिक उसको इंटरप्रेट करने की कोशिश की लोगों के लिए ताकि उसको ज्यादा से ज्यादा समझना आसान हो। लेकिन उन्होंने जो इस्लामिक अ पॉलिटिकल थियोलॉजी के हवाले से उनकी जो फिक्र है और जिस पे लेकर के हम देखते हैं कि सारी दुनिया में काफी इस पे डिबेट रही है। इधर कई दहाइयों से कई डिकेड से इस पे बहुत ज्यादा बहसें रही हैं। उन बहसों से मैं तमाम चीजों से तो इत्तेफाक नहीं करता। लोग अपने-अपने तौर पे बातें करते हैं। लेकिन इसमें कोई शक की बात नहीं है कि जो इकामत दीन का जो कांसेप्ट है मौलाना मौदूदी का जो खासतौर से जिसको आपने उठाया बहुत ही एहतराम के साथ क्योंकि बहुत बड़े स्कॉलर हैं आइडियोलॉग हैं और इसमें और उनका इंपैक्ट ना सिर्फ इंडियन सब्टिनेंट पे है। सही बात ये है पूरे आलम इस्लाम पे है। पूरे उनके पूरे रिस्पेक्ट इंतहाई एतराम के साथ। लेकिन ये है कि इकामत दीन का जो पूरा कांसेप्ट जो मौलाना मौदूदी का है वो सही मायने में उसमें काफी एकजरेशन है, काफी मुबालगा है और वो काफी ये जो कॉलोनियल पीरियड जो था जो कॉलोनियल पावर्स ने जिस तरह से मुस्लिम इस्लामिक ट्रेडिशन को बर्बाद किया, कॉलोनाइज किया, हमारे पूरे इसको स्ट्रक्चर को तबाह किया, उससे इन्फ्लुएंस था बहुत ज्यादा। और उसकी बुनियाद पे उस इनफ्लुएंस ज़हन के तहत उन्होंने यह इकामत का तसवुर दिया जो प्योरली पॉलिटिकल था कि यानी इकामत दीन का मतलब ये है कि पूरी दुनिया में इस्लामी हुकूमत का कयाम सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि पूरी दुनिया में पूरे रूए जमीन पे हमें इस्लामी हुकूमत का कायम करना इसका हमारा एजेंडा है और यही हमारी बुनियादी जिम्मेदारी है। दीन का बुनियादी तकाजा है। दीन का बुनियादी तसवुर ही इसी पे कायम है। यह बहुत ज्यादा मुबालगा था। जिसको एक तरह से कहा गया कि यह जो है इस्लाम की एक पॉलिटिकल इंटरप्रिटेशन है। और इस्लाम की एक सियासी तफसीर है। गोया के कि पूरे इस्लाम को पॉलिटिकल फ्रेमवर्क में देखना। पॉलिटिक्स जरूर इस्लाम का दीन का एक हिस्सा है। इंटेग्रल पार्ट है। हम यह नहीं कह सकते कि हम इस्लाम को इस तरह से इमेजिन नहीं कर सकते जिसमें पॉलिटिक्स की कोई जगह ना हुई हो। ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। लेकिन उसको सेंट्रल पॉइंट में पॉलिटिक्स को रखना ये गलत है। उसमें कोई शक की बात नहीं है कि उसकी अपनी अहमियत के बावजूद। तो इस तरह से इकामत दीन का तसवुर ये हुआ कि इस्लामी हुकूमत का कयाम जो है वही इस्लामिक दावा या इस्लामिक अ एक्टिविज्म का एक बुनियादी तकाजा बन गया बिल्कुल एकदम कि जो उससे हट के सोचता है या जो उस अपनी एफर्ट नहीं लगाता अपनी कोशिशें उसमें नहीं करता तो गोया वो या तो इस्लामी से हट जाता है या कम से कम वो मुखलिस नहीं है दीन के तहत और इस तरह की बातें है वो जाकर करके फिर जो है सैयद कुतुब के यहां उसने और ज्यादा शिद्दत इख्तियार कर ली जो उन्होंने जाहिलियत करी जल कुरान में चीज़ उन्होंने लिखी इसीलिए हम देखते हैं कि फिर मौलाना मदददी ने जो कुरान की चार बुनियादी इस्तलाहों में जो कुछ लिखा सैयद कुतुब उससे बहुत ज्यादा मुतासिर हुए फिर सैयद कुतुब ने उनको और ज्यादा आगे बढ़ाया फिर हम ये देखते हैं जिसकी तरफ हम आपको इशारा करना चाहते हैं कि वहां जो हसन हुजैबी आए वो हसन हुजैबी मुर्शिद आम थे मुस्लिम के दूसरे या तीसरे उन्होंने उसे इख्तलाफ किया। उन्होंने नाम के साथ मौलाना मोदी के इससे इख्तलाफ किया। पूरी जो इकामत और हाकिमियत की जो बहस है सैयद कुतुब से शदीद तरीन इख्तलाफ किया। हालांकि वो खुद अखवान के थे। उन्होंने कहा कि नहीं यह जिस तरह से इस्लाम की अकामत की बात हो रही है खुदा की सोवनिटी हकमियत की जो बात को जिस तरह से ईमान का दोदो चार की तरह तकाजा बना करके पेश किया जा रहा है उसको ईमान का एक बुनियादी इस तरह से ये सही नहीं है उनकी किताब का नाम है दोहात लाकुजात कि हम लोग प्रीचर्स हैं वी आर प्रीचर्स नॉट जजेस हम जज नहीं है जज हमें जजमेंट देने की जरूरत नहीं है हम लोग तो प्रीचर्स हैं दाई हैं सिर्फ और उसमें उन्होंने इख्तलाफ दाई दावत देते हुए ऑलरेडी जज नहीं कर रहा है। जब वो यह बोल रहा है। दाई का काम यह है कि आ के आप इस्लाम की की तरफ आप आप पीसफुली बता बना बताएं और उनको अपनी बातें रख दें। आप किसी के ईमान या कुफ्र की बुनियाद पे आप जजमेंटल नहीं हो सकते। आप उसको एक इस तरह से तय नहीं कर सकते कि जो ऐसा ना करे वो मुसलमान नहीं है। जो ऐसा करे वो ये है। यानी ये कहना वो चाह रहे होंगे जो किताब का जो टाइटल है दुआ खुजात हम काजी नहीं है। हम दाई हैं। पर लेकिन काजी का तो पूरा निजाम है ना इस्लाम में मतलब जज करने का कि नहीं वो इस इस कॉन्टेक्स्ट में नहीं है। उन्होंने इस कॉन्टेक्स्ट में कहा कि खासतौर से सैयद कुतुब के यहां एक तरह से वो रुझान पैदा हुआ के इस तरह से इसको एक्सेप्ट करना यानी आज की जो हुकूमतें हैं उनकी नजर में गैरुल्लाह की हुकूमतें हैं। सेकुलर हुकूमतें हैं। जो इस्ला जो कुरानी और इस्लामी तसवुर हयात या जो इस्लामिक वर्ल्ड व्यू की बुनियाद पे कुरान सुन्नत बुनियाद पे कायम नहीं है। उनसे हमें बगावत करना चाहिए। उनको तोड़ने की कोशिश करना चाहिए। आगे बढ़ के उनकी मुखालफत करना चाहिए। जो उसको एक्सेप्ट करता है एक तरह से वो इस्लाम नहीं है। या उन्होंने यह कहने की कोशिश की इसी तरह से के बिल्कुल ये जाहिलियत है। जाहिलियत करशीन की ये तो आजकल हम दोबारा उसी इस तरह के इस सेुलर ढांचे को इख्तियार करना गैरुल्लाह की हुकूमत को कबूल करना एक तरह से वो जाहिलियत है जिसको खत्म करने के लिए इस्लाम आया था। तो इस तरह से तो एक तरह से जजमेंटल होना है ना कि आप बिल्कुल एक तरह से उनको इस्लाम से बाहर कर रहे हैं। वो ये नहीं कह रहे हैं तुम काफिर हो लेकिन बातें उसी तरह से जा रही है और इसीलिए उनके फॉलोअर्स के मिसाल के तौर पे अल हिजरा व तकफीर का एक पूरा जो ट्रेंड चला एक पूरा ग्रुप बना उसका यही कहना था कि सारी काफिर हैं। जितनी मस्जिदें ये नजर आ रही है मिस्र में काफिरों की मस्जिद हैं। हमें हिजरत करना चाहिए क्योंकि ये काफिरों की हुकूमत है ये सारी की सारी और इन काफिरों के साथ जिहाद करना ही बुनियादी हमारा तकाजा है। तो हजरा व तकफीर वाला ये सब चीजों से इन्फ्लुएंस थे। सैयद कुतुब एक बड़ा दिमाग थे और एक बहुत बड़ा काम किया है। लेकिन युसुफ करजावी भी इस तरह से कहते हैं। मैं ऐसा नहीं कि युसुफ मैं सैयद कुतुब को इस तरह से मैं कोई उनको अहमियत नहीं दे रहा हूं या मुकाम दे नहीं दे रहा हूं। ये सब अल्लाह के नेक बंदे थे। उन्होंने इस्लाम को अपने तौर पे समझने की कोशिश की। यही बात युसुफ करजा भी खुद सैयद कुतुब के हवाले से कहते हैं। ठीक है। उनकी अपनी कुछ चीजें हैं और हमारे पूरे ट्रेडिशन में इसकी मिसालें मिलती हैं। हमने बताया कि खुद जो है हमने इब हमने यानी इमाम अबू हनीफा क्या कि हमने सहाबा की बहुत सारी चीजों को मुस्तरद कर दिया। उनके बहुत सारे नजरियात हैं जिसप अभी बहस की गुंजाइश नहीं है। हमने अपने मुजतहदीन की बातों को बहुत सारी चीजों को माना। बहुत सारी चीजों को नहीं माना। हमने इबने तैमिया और गज़ाली और इब्ने अरबी की बहुत सारी चीजों को मुस्तरद कर दिया। तो कोई इसमें मसला नहीं है के हम जो है आज के अपने जिन स्कॉलर्स से अपने दौर के उनसे इख्तलाफ करें और डट करके इख्तलाफ करें। अगर इमा हनीफा ये कहते थे कि हमारी बात अगर इस्लाम से कुरान से और सुन्नत से हट के उसको दीवार पे मार दो। तो जाहिर है सैयद कुतुब या इमाम मौलाना मौदूदी इससे हट के कोई नजरिया नहीं रख सकते। हम्म। इसलिए हर शख्स हर किसी को उसी कुरान सुन्नत की बुनियाद पे इस्लाम को दीन को समझने का पूरा हक़ हासिल है। इख्तलाफ करने का पूरे एहतराम के साथ करने का पूरा इख्तलाफ है। हक है। और वो वो उसको इस्तेमाल करते हुए जो लोगों ने किया है उनकी बातों को भी सुनना चाहिए। हां। लेकिन ये के आप इन शख्सियात को के पे कोई इ्तहाम कोई तोहमत लगाएं उनके बारे में कोई ऐसा वैसा नजरिया कायम करें जैसा कि आजकल हमारी रविश है वो दुरुस्त नहीं है। तो यह अगर यह बात कही जाए कि इवन मौला मौदूदी और सैद कुत के हवाले से के जो तजदीद और तजद्दुद का डिफरेंस है के कोशिश इस्लामी जो रिवायत है और ओरिजिन की स्टोरी है उसी को सामने रखते हुए समझने की कोशिश करी गई लेकिन शायद के एक हिस्सा जो दीन का था जो एक कॉन्टेक्स्ट है फॉर एग्जांपल अल्लाह के रसूल सल्लम की जिंदगी में वो वक्त भी आया वो दौर भी आया जो फतह मक्का के बाद और पूरा निजाम भी कायम हुआ वो भी तो वो जो वो वाला हिस्सा है उसी को मकासिद कंप्लीट और बनाते हुए उससे रिवर्स क्योंकि एक तरीका ये है कि जब अल्लाह के रसूल ये सब चीजें कर रहे हैं तो वो लोगों के सामने जो उनके साथ हैं उनके सामने ये वाज़ नहीं कर रहे हैं कि भ हुकूमत हमारा मकसद है। हुकूमत बन रही है। चीजें इंस्टीटश इदारे बन रहे हैं। जब वो जाके हिजरत कर रहे हैं मदीने में तो यह सोच के हिजरत नहीं कर रहे हैं कि मैं यहां नई मार्केट बनाऊंगा। यह हिजरत नहीं कर रहे हैं करके मैं वहां मस्जिद बनाऊंगा। लेकिन जैसे ही पहुंच रहे हैं तो वो रियलाइज कर रहे हैं कि भ एक इदारा अभी स्पेस एंड टाइम में जो हमें नया मिला है उसमें ये इदारा वजूद में आ सकता है। तो जब ये बात रख दी जा रही है कि नहीं इसी इदारे को बनाने के लिए आप सारी जद्दोजहद करेंगे तो जो आपका कॉन्टेक्स्ट है वो आपने चेंज कर दिया कि जो उसकी रिक्वायरमेंट है कि ऐसा स्पेस एंड टाइम होता। लेकिन क्योंकि ऐसा स्पेस एंड टाइम अवेलेबल नहीं है मुसलमानों के सामने तो उनके सामने अपने आप को एक्टिवेट करने की मशीनरी में या तो यह कि भ आप सब कुछ डिक्लेअ करके आप उससे जिहाद करने बैठ जाएं और उसको डिनाई कर दें या फिर आप एक तरीके से नॉन ऑपरेशनल हो जाएंगे उस पेस एंड टाइम में क्योंकि आपके पास कुछ करने को नहीं है मेथोलॉजी नहीं है। तो इसके इसके यू नो ऑोजिशन में पॉलिटिकल थियोलॉजी में आप इसमें क्योंकि बुक में वो डिबेट कर रहे हैं। आप क्या दूसरी राय अवेलेबल है और आपको क्या लगता है कि इस डिबेट को क्योंकि ये मैं इस कॉन्टेक्स्ट में भी बात हो रही है कि ये [नाक से की जाने वाली आवाज़] फ्रोजन इन टाइम हो गया और फिर लोगों ने कोशिश करी अलग-अलग लोगों ने कि भ अब इसको किस तरह से सिविलाइजेशन को वापस यू नो एक्टिवेट किया जाए। तो अलग-अलग लोगों ने इकबाल को मेटाफिजिक्स में इंटरेस्ट था। उनको पोएट्री फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ़ फिलॉसफी में इंटरेस्ट था। तो वो वहां से चीजों को ढूंढ रहे हैं। किसी को एक्टिविज्म में इंटरेस्ट है तो एक्टिविज्म में ढूंढ रहा है। किसी को करिकुलम में इंटरेस्ट है कि भाई हमें रिवायत को किस तरह से महफूज़ रखना है और एक जनरेशन को वापस उसमें ट्रेन कर रहा है। तो और क्या अल्टरनेटिव्स थे जो सामने आए? जी खासतौर से अगर हम पॉलिटिकल थोलॉजी के हवाले से जिसमें भी बात हो रही है जिस का्टेक्स्ट में आप कह रहे हैं जो इख्तलाफ बुनियादी तौर पे है वो ये के अ उसमें जिस तरह से इकामत के तसवुर को बिल्कुल सेंट्रल पॉइंट में रख दिया गया है और उसकी बुनियादी में रखते हुए उस पूरे दीन को इंटरप्रेट किया जा रहा है। तो ये गलत है। लेकिन ऐसा नहीं है के इकामत की कोशिश गलत है। इस्लामी हुकूमत नहीं होना चाहिए। क्योंकि ये तो जरूरी है। जब कुरान एक मुकम्मल दीन देता है और कहता है के उखल सिल काफा तुम दीन में पूरे के पूरे दाखिल हो जाओ। हम दीन में पूरे के पूरे दाखिल होने का मतलब है कि जो इस्लामी पूरी शरीयत है जाहिर है वो अमल करने के लिए है। वो उठा के बंद कर देने के लिए नहीं है। लेकिन वहां पे मसला बस ये होता है कि आप इसको एक बुनियादी एजेंडा बनाते हैं और दुनिया के तमाम मुसलमानों को इसका जिम्मेदार करार देते हैं के इसी को का झंडा लेकर करके आपको पूरी दुनिया में घूम जाना है। और हर जगह की हुकूमतों को तब्दील कर करके इस पे लाना है। यहां पे ये गलत हो जाता है। यानी इस्लामी हुकूमत बनना चाहिए। इसमें कोई शक की बात नहीं है। लेकिन हर आदमी मुक्कलफ नहीं है। दोद चार की तरह से बहुत आसान लफ्जों में कहा जाए तो ये है। यानी इस्लामिक एक्टिविज्म का जो अपना जो तसवुर है जो तकाजा है वो वैरी करता है कम्युनिटी कम्युनिटी। यानी मुस्लिम हुकूमतों पे में जो मुसलमान रह रहे हैं वो जिन चीजों के लिए कमिटेड हैं जाहिर है जो लोग नॉन मुस्लिम कंट्रीज में रह रहे हैं उसके कमिटेड नहीं है। अब आप कहें कि साहब जो है उनको इस्लामी हुकूमत बनाना चाहिए इंडिया में के लोगों को और क्या कहते हैं यूरोप में जो लोग फ्रांस और जर्मनी और और यूएसए में रहना गलत है। इसी तरीके से इस तरह के तस्सवुरात के उनको जिस तरह से बहुत ही मुजर्रद फ्रेमवर्क में देखने की कोशिश की गई के ब्लैक एंड वाइट कि ये जो है बिल्कुल इस्लाम है ये तागूत है। बिल्कुल एकदम कुफ्र है। यानी सेकुलरिज्म बिल्कुल कुफ्र और तागूत अगर आप ये जमूरियत को मानते हैं। सेकुलरिज्म को मानते हैं कुफ्र और ये इस्लाम ये गलत था। बिल्कुल एकदम क्योंकि ये गलत है और इसी से बहुत सारे मसले पैदा हुए। क्योंकि ऐसा नहीं हो सकता और ना है और नहीं इस्लाम के बुनियादी तालीमात से इसको साबित बिल्कुल किया जा सकता है के अ सिर्फ और सिर्फ इस्लामी जिंदगी का तसवुर एक प्योर इस्लामी हुकूमत के तहत ही हो सकता है। सो ऐसा बिल्कुल नहीं है। यानी ऐसा हुआ कि साहब नहीं सारा पार्लियामेंट सिस्टम और यह पूरा का पूरा जो डेमोक्रेटिक ढांचा सेुलर ढांचा बिल्कुल जो इसमें को कबूल करता है उसका ईमान से हाथ धो लेता है। बहुत सारे लोगों ने मुलाजमतों से इस्तीफा दे दिया सब कुछ छोड़ दिया। यानी बुनियादी तसवुर ये है कि गैर मुस्लिम हुकूमतों में इस्लामी इस्लामी जिंदगी का तसवुर ही नहीं किया जा सकता। वो गलत है। उसको हट जाना चाहिए। चला जाना चाहिए। उसको जंगल में जाकर के इख्तियार कर लेना चाहिए। वो इंडिविजुअल [गला साफ़ करने की आवाज़] फैमिली और सोसाइटी के लेवल पे मतलब हम ये मान सकते हैं कि हां अगर पूरा का पूरा सिस्टम इस्लामी उसूल शरिया से नहीं चल रहा है तो डिफरेंस होंगे। बहुत यही बात है। यानी जो बीच में जो आई जो बात है कि अगर आपको इस्लाम की बुनियादी चीजों पे अमल करने की इजाजत है आपको आप एक इस्लामिक लाइफ आप गुजार रहे हैं। वो सारी चीजों पे आप शरीयत पे अमल कर रहे हैं। तो फिर भी आपका ये समझे कि आपका इस्लाम का आपसे ये तकाजा या डिमांड है कि हर हाल में इसको तोड़ करके इस्लामी हुकूमत बनाना है। सो ऐसा नहीं है। ये बुनियादी डिफरेंस ये है कि नहीं है। हालांकि दावत देनी है इस्लाम की तरफ। दावत देनी है। आप पीसफुल आप दावत दीजिए। लेकिन यह आप इसके मुक्कलफ़ नहीं है। कमिटेड इसके लिए नहीं है कि आप टकरा करके उसको तोड़ करके हर हाल में अपनी वो खिलाफत आला मिहाज नबूवत कायम करें और ये समझें कि हमारी जो लाइफ है वो इनकंप्लीट रहेगी। जब तक के यानी इस्लामिकली इनकंप्लीट रहेगी। जब तक के हम अपना एक इस्लामी सियासी वजूद वो प्योर वजूद में नहीं लाते। ये इसने एक बड़ा मसला पैदा किया मौजूदा दौर में। आप ये देखिए कि आज के मौजूदा दौर में आपको मालूम है 40 45% लोग नॉन मुस्लिम कंट्रीज में रह रहे हैं। मुस्लिम आने वाले दिनों में इसका अंदाजा है कि 10 साल में 15 20 साल में मुस्लिम कंट्रीज के मुकाबले में नॉन मुस्लिम कंट्रीज में रहने वालों की तादाद बढ़ जाएगी। और इसका इससे भी समझ सकते हैं के यानी हमारी अक्सरियत ये ख्वाहिश रखती है कि किसी तरह से उनको ये यूरोपियन कंट्रीज में अमेरिका में जगह मिल जाए चाहे वो बहुत बड़े ओलमा हो स्कॉलर्स हो अल्लाह वाले हो मुत्तकी हो इमाम हो वो भी चाहते हैं कि हमारे बच्चे वहां ऐसी हालत में अगर आप ये तसवुर देते हैं कि साहब नहीं ये सारी की सारी हुकूमत जहां हम रह रहे हैं वो बिल्कुल ऐसी है कि हमें उसको यानी तोड़ना चाहिए और वो गैर इस्लामी है और उनसे कोई कंप्रोमाइज कोई समझौता नहीं हो सकता। तो, यह तो एक डबल स्टैंडर्ड हो जाता है और यह सिरे से मुमकिन नहीं है। इस्लाम आपको ऐसी चीजों का सिरे से मुकलफ़ ही नहीं कर सकता कि जो सिरे से मुमकिन भी नहीं है। हम तो ये तो क्योंकि बहुत बड़ी डिबेट है। बड़ी डिबेट है। आपनेकि छेड़ा तो इसलिए वरना ये बड़ी कंट्रोवर्शियल डिबेट है। बाज लोगों के जज्बात इससे मजरू हो सकते हैं और बाज लोग अपने तौर पे उसको वो समझ सकते हैं कि लेकिन ये कि मैंने अपनी एक पोजीशन रखी है। मैं इसको इस तरह से समझता हूं हर किसी को अपने तौर पे समझने का इख्तलाफ करने का बिल्कुल हक है। यानी जो हमारे बड़े उलमा स्कॉलर्स इंक्लूडिंग मौलाना मौदूदी मौलाना सैयद कुतुब अमीन हसन इस्लाई इन तमाम लोगों ने अब इख्तलाफात दूसरों से किए हैं। अपने बड़े लोगों से इख्तलाफ किए हैं। तो ठीक है। वो हम तो उसी ट्रेडिशन की बात कर रहे हैं कि हम लोग उसी को आगे बढ़ाकर बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। कि अपने बड़ों से पूरे एहतराम के साथ इख्तलाफ करने में कोई मुजायका नहीं है। हम्म। इसलिए उनके फॉलोअर्स को जरा सा भी इस पे जो है डिसहर्टन नहीं होना चाहिए। क्योंकि हम यह बात कर रहे हैं कि क्या-क्या कोशिशें रही रिवाइवल की तो उनमें एक कोशिश इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज की भी रही। जी। और इसमें भी दो तरीके हैं। एक तरीका वो है कि जो नॉलेज हमने पिछले 1000 साल में प्रोड्यूस करी वो नॉलेज सफिशिएंट है। इस पर हमने थोड़ी बात करी फिक फिक के हवाले से। लेकिन अगर हम इसको कि एक तरीके की फिजिक्स की अंडरस्टैंडिंग हमारे जो हिस्टोरिकल फिगर्स हैं उसमें रही। वो ग्रीक थॉट्स है या खुद इमाम अरबी जब वहदतुल वजूद का फलसफा सामने रख रहे हैं तो उसमें ग्रीक फिलॉसफी के क्या असरात हैं ये ये सारी चीज़ और दूसरी तरफ ये है कि जो जिन्होंने कहा कि भाई अब अब जो मॉडर्नाइजेशन का मतलब ये है कि भ हम ये जो नए टूलकिट्स आए हैं इनको इस्लामाइज कर देंगे के बेसिक ये हुआ कि भ हिस्ट्री में हम ये पढ़ा देंगे हम जिसे कहते हैं कि भ मैथ मैथ्स के साथ में पूरा इस्लामाइजेशन ऑफ़ नॉलेज का जो पूरा प्रोजेक्ट है कि हम इसकी तरह से सोशल साइंसेस को हमें इस्लामाइज करना चाहिए और ये पूरी एक मूवमेंट चली उसी से मुतालिका आप जी जी तो ये दो चीज़ एक तो एक इस्लामाइजेशन नॉलेज में एक वो इस्लामाइजेशन ऑफ़ नॉलेज का प्रोजेक्ट है जो नकीब अत्तास कि भ माज़ से हम इस्लामाइजेशन करें। एक प्रोजेक्ट वो है कि जो आज के कॉन्टेक्स्ट में फॉर एग्जांपल वो जो अमेरिकन फिगर हैं। इस्माइल ये हैं और फजुर रहमान साहब हैं। इस तरह के जो लोग हैं। बुनियादी फर्क क्या है? क्या कोशिशें थी? क्या क्रिटिसिज्म है? इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज की जो अपनी मूवमेंट थी यानी नकीब अलत्ता जैसा कि आपने कहा असल तो उन्होंने इस्लाम एंड सेकुलरिज्म में इस पे कुछ गुफ्तगू की। फिर उसके बाद जो है इस्माइल लाजी अल फारूकी ने इसको बाजाब्ता तहरीक की शक्ल दी। उन्होंने किताबें लिखी और उनके पास इदारा था। उनके पास मजबूत स्कॉलर्स की और इंडिविजुअल्स की टीम थी जिसके तहत उन्होंने इसको आगे बढ़ाया और इस तरह से 70 80 में ये चीज चली लेकिन आपको मालूम होना चाहिए कि आगे चलकर करके खुद जो है खुद ताजाबिर उलमानी जो उसी तहरीक के बड़े ये हैं उन्होंने लिखा कि ये चीज आगे चल नहीं पाई बढ़ नहीं पाई। अब्दुल हमीद मोहम्मद सुलेमान है। ताजाबीर उलवानी की तहरीर हैं जो बताती हैं कि वो चीज आगे नहीं बढ़ पाई। हम भी देखते हैं पिछले 50 सालों में [गहरी सांस लेने की आवाज़][अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] ये जितनी जोर शोर के साथ ये चीज आगे बढ़ी थी इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज वाली वो अ आगे नहीं बढ़ पाई। उसकी वजह ये हुई के ये जो अपने आप में जो कांसेप्ट है इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज का ये अ सही मायने में देखा जाए तो एक तरफ तो ये हम कह सकते हैं कि यानी प्रैक्टिकल नहीं। दूसरी बात हम ये कह सकते हैं कि ये इस्लामी फिक्र का बुनियादी तकाजा भी नहीं है। हम दोनों बात कहते हैं कि ये मुमकिन भी नहीं करना भी नहीं चाहिए और अगर करने की कोशिश करें तो ये मुमकिन भी नहीं है। पहले तो ये बात ये है कि इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज की जरूरत क्यों पड़ी? आखिर क्यों इस मूवमेंट की जरूरत पड़ी है? जो हमारे इस्माइल लाजी अल फारूकी साहब जाबिर उलवानी नकीब अलत्तास ये तमाम लोगों ने जो थेसिस अपनी बनाई वो ये के ये जो पूरे सोशल साइंसेस का जो पूरा इस वक्त जो वेस्ट में के सांचे में जो ढल करके कंस्ट्रक्ट हो कर करके जो सामने आया है जिसको पूरी दुनिया में पढ़ाया जा रहा है उसकी बुनियाद पे जो एक वर्ल्ड व्यू तय हुआ है। उस वर्ल्ड व्यू में खुदा की जगह पे एक तरह से इंसान को रख दिया गया है। यानी जो पहले थियोसेंट्रिक था, वह बिलकुल एंथ्रोपोसेंट्रिक हो गया। इंसान मरकजी पूरा का पूरा तसवुर जिसमें खुदा को मजहब को सिरे से कोई स्पेस हासिल नहीं है। और हम पूरी इस यूनिवर्स को उसी पैराडाइव में समझने की गोया कि कोशिश करते हैं। हमारी फिजिक्स, हमारी एस्ट्रोनॉमी और हमारी वो सारी की सारी चीजें वो हैं कि जिसको एकदम प्योरली मटेरियलिस्टिक फ्रेमवर्क में सेुलर फ्रेमवर्क में देखने की कोशिश की जाती है। जिसमें खुदा और वही और रेवोलेशन और आखिरत का तसवुर ये बिल्कुल खत्म हो जाता है। सिर्फ एक मटेरियलिस्टिक अप्रोच बन जाती है। इसलिए हमें इस बात की जरूरत है के उसमें वही को खासतौर से रेवुलेशन को एक तरफ यानी वो कहते हैं हमारे ताजाबिर उलवानी के जो है एक किरातुल कौन यानी यूनिवर्स की रीडिंग होनी चाहिए। एक एक तरफ किरातुल किताब यानी वही किरातुल वही वही को बुनियादी स्पेस मिलना चाहिए। इस तरह सेुलराइजेशन की जगह पे इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज होना चाहिए। तो आप ये देखें कि उसके पीछे जो चीज थी जो मुहर्रिक था जो असल उनको मोटिव था वो ये था कि हमें इस तरह से करना चाहिए। लेकिन सही बात तो ये है कि ये देखें कि अगर आप इस तरह के जो इल्म को आप इल्म एक ऐसी चीज है नॉलेज ऐसी चीज है अपनी तमाम तफसील के साथ कि जिसको इस्लामाइज खासकर यानी सोशल साइंसेस को इस्लामाइज अगर आप करते हैं तो अवलन तो मुमकिन नहीं है लेकिन अगर आप करने की कोशिश करते हैं तो इसका मतलब अपना एक अलग सा एक आइलैंड एक जजीरा बना लेते हैं। अपने आप को इस पूरे धारे से हट कर करके मजहब का लेवल चपका देते हैं। तो इसका मतलब यह हुआ कि एक जो है नॉलेज वो है या एक फ्रेमवर्क वो है वो इस्लामी है। तो कोई और जो है वो एक अपना एक क्रिश्चियन बनाता है। कोई हिंदू बनाता है, कोई यह बनाता है, कोई एक बनाता है। सवाल तो यह पैदा होगा कि फिर आप जो चीजों को अपना टूल बना करके जो समझने की कोशिश कर रहे हैं वो दूसरे के लिए क्यों एक्सेप्टेबल होने लगा? फिर जब आपने उसको एक खास स्ट्रक्चर दिया, एक खास फ्रेमवर्क कि हम ये हर हाल में कुरान की आयतों के जरिए हम समझने की कोशिश करेंगे। ये पूरी फिजिकल रियलिटी है। फला फला को तो इस मजहब के टैग लगने के बाद दूसरों के लिए कैसे एक्सेप्टेबल होगा? फिर वह बुनियादी चीज क्या रह जाएगी जो जो तमाम लोगों को जोड़ती हो और जो तमाम लोगों के लिए एक बुनियादी थेसिस प्रिमिससेस बन सके और जिसकी बुनियाद पे आप डायलॉग कर सके वो डायलॉग की वो डायलॉग ही का वो खत्म हो जाता है। इस तरह देखें कि साहब पूरा जो हमारा ट्रेडिशन रहा है मिसाल के तौर पे जो पहले आपने भी उठाया ये जो हमने ढांचा बनाया था यूनान से ग्रीक से लिया था सिर्फ ग्रीकी से नहीं लिया था हमने इंडिया से भी एस्ट्रोनॉमी ली थी हमने मैथमेटिक्स से ली थी बहुत सारी चीजें ली थी मुख्तलिफ तहजीबों से ली थी कभी ऐसा नहीं हुआ कि पहले इन चीजों को पूरा इस्लामाइज करना है और इस्लामाइज कर कर करके फिर अपना एक ढांचा [गला साफ़ करने की आवाज़] एक वो बना कर करके फिर हम सारी चीजों को ऐसा कर लेंगे क्योंकि ऐसा मुमकिन नहीं था सिरे से इसलिए कभी भी ऐसा नहीं किया गया। इसलिए हम देखते हैं कि हमारी पूरा जो इल्म कलाम है, हमारी जो पूरी फिलॉसफी है, जिसकी बात आपने उठाई है, वह इन्फ्लुएंस्ड है ग्रीक फिलॉसफी से। यानी यूं कहा जाए कि जिसको हम उसूल फिक कहते हैं और उसूल फिक्र में जो एक बुनियादी बहसें हैं, कलामी बहसें हैं वो बिल्कुल ग्रीक फिलॉसफी की बुनियाद पे तय की गई है। यानी हम अपने शरीयत को अपने दीन को समझने का एक हवाला वो जो है इंटरप्रेट करने का और समझने का वो हवाला है जो ग्रीक फिलॉसफी से लिया हुआ है। वहां पे ये नहीं कहा गया कि ये ग्रीक फिलॉसफी से आप क्यों चीजें लेकर करके हमको दीन को समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह बात अबुल हसन अशरी से किसी ने नहीं कही। गज़ाली से किसी ने नहीं कही। और इब्ने अरबी भी वही कर रहे थे। पूरा वैदतु वजूद का नज़रिया चीजों को ग्रीक फिलॉसफी से ला कर के समझा रहे थे। कोई यह नहीं कहता कि आप यह वैदतु वजूद को समझने समझाने के लिए आपको क्या जरूरत पड़ी है कि अरिस्टोटल की फिलॉसफी को आप लाएं और जाकर के जबरदस्ती हमें इस तरह से बताएं कि ऐसे है। तो कहने का मकसद यह है कि यह जो पूरा इस्लामाइजेशन ऑफ नॉलेज का जो पूरा प्रोजेक्ट था उसके पीछे जो ज़हनकार फरमा था बिलाशबा वो मुखलिस लोग थे कि उन्होंने ये देख करके कि किस तरह से एक वेस्टनाइजेशन ऑफ नॉलेज या सेकुलाइजेशन ऑफ नॉलेज का एक पूरी दुनिया में एक कहर गोया कि बरपा है। तो हमें इस बात की जरूरत है कि इस्लामिक वर्ल्ड व्यू को इस्लामिक थॉट को अपनी बुनियाद पे जोड़ने के पे लाने के लिए इस बात की जरूरत है कि उसमें तब्दीली लाई जाए और एक थीसिस एक मफूजा एक बुनियाद वो तय की जाए लेकिन जैसा कि खुद हमारे निजातुल्लाह सिद्दीकी यही बात कहते हैं। आपने फजलुर रहमान साहब का नाम लिया। फजल रहमान साहब का भी यही कहना है जो मैं कह रहा हूं। डॉक्टर फजल रहमान का कि ये जो है अ ये चीज जो है वो खुद इस्लामिक थॉट के लिए अ बहुत ही ज्यादा गोया के नुकसानदेह रही उसको बिल्कुल अलग थलग कर देने की एक कैफियत है जो खुद उसके लिए बहुत ज्यादा नुकसानदेह इस्लामिक थॉट के हक में नहीं है ये तो जब ये दावत के हवाले से कि भ इस्लाम एक तरीके से एक डिफरेंट रियलिटी ऑफ बिलीफ को प्रोड्यूस करता है तो वहां पे भी तो मुसलमान अपना अपने को अलग थलग कर रहा है। एक तरीके से एक बिलीफ सिस्टम के हवाले से वो अपनी वोकैबलरी क्रिएट कर रहा है। वो ये बोल रहा है कि भ जकात का ये निजाम है। ये रिबा का ये मामलात है। ये दूसरी तरह तो एट द एंड ऑफ़ द डे वो भी तो एक तरीके का नॉलेज प्रोडक्शन है। तो ये नॉलेज प्रोडक्शन और इस्लामाइजेशन ऑफ़ नॉलेज इसमें क्या बुनियादी फर्क बुनियादी चीज़ यह है कि ये जो हमारा जो हमारी जिसका ताल्लुक हमारी इबादत से हैं। हमारी बुनियादी अकायद से हैं। यानी अकायद और इबादत ये एक बुनियादी चीज है। तो ये जो पूरा का की पूरी चीज़ है, इसके लिए हमें किसी इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज की जरूरत नहीं है। इसका ताल्लुक बुनियादी तौर पे वही से है। कि वही में यह बताया गया कि यह खुदा, ये रसूल, ये आखिरत, यह फरिश्ते ये वगैरह वगैरह और ये नमाज, ये रोजा एक बुनियादी चीज़ हैं। यहां जो ये तो बुनियादी तौर पे हम देखिए ये नस पे तय है। लेकिन ये जिस चीज की हम इस्लामाइजेशन की बात कर रहे हैं। वो अपने इर्द-गिर्द को समझने के लिए, अपनी कायनात को, अपनी यूनिवर्स को समझने के लिए ये एक मुकम्मल तौर पे इंटेलेक्चुअल एक एफर्ट है। अपनी इंसानी ह्यूमन रीजनिंग के तहत इन चीजों को हम समझेंगे। उसमें लड़खड़ाएंगे, गलतियां करेंगे और फिर संभलेंगे, फिर आगे बढ़ेंगे। ये जो हमने ग्रीक थोलॉजी को बुनियाद बना करके कोशिश बात कही। ये इसी दायरे की बात थी कि जिसमें हम देखते हैं कि अबुल हसन अशरी से लेकर के गजाली तक इस तरह की कोशिशें वो कर रहे थे। उसमें वो यह नहीं देख रहे थे कि कुरान और हदीस से दो जिस तरह से हनाबला वो कर रहे थे कि हम इससे आगे बढ़ के कुरान हदीस से बाहर जाकर नहीं जा सकते लेकिन गजाले और अरेबी या फला फला जा के वो ग्रीक थियोलॉजी से ग्रीक फिलॉसफी से ये चीजों को ला रहे थे तो ये जो हम जिस इस्लामाइजेशन की बात कर रहे हैं उसका ताल्लुक इस्लामी शरीयत की या इस्लामी अकीदे और या बिलीफ सिस्टम की बात से वो हट कर करके है ये वाला जो हिस्सा है हम उसकी बात कर रहे हैं। हमने जो अभी तक बात की है वो ज्यादातर तजदीद तजद्दुद क्राइसिस जो हम लोग आइडेंटिटी का फेस कर रहे हैं उसमें जो अलग-अलग डिबेट्स हुई उसका आपका जो क्रिटिकल एनालिसिस है बहुत सारे लोगों ने बहुत सारी बात रखी उसको लेकिन आपकी किताब का एक दूसरा हिस्सा है जिसमें आप भी रिकंस्ट्रक्शन की पोटेंशियलिटी की बात करते हैं। आप बात करेंगे कि भ इथियोलॉजी को फिर से लाइफलेस की जगह एक इवेंटफुल एक्टिविटी कैसे बनाया जाए? रेस्टोरेशन आप बहुत सारी जो हम क्रिटिक कर रहे हैं आप भी वही कोशिश कर रहे हैं उसप अपनी ओपिनियन रख रहे हैं साइंस के हवाले से रिलजन के हवाले से इस्लामिक जुरिसूडेंस या इस्लामिक जुरिसूडेंस के फिक के हवाले से आप उसमें भी जो फॉर एग्जांपल अगर इश्तहाद होगा तो वो किस किस्म का होगा उसकी इंस्टीट्यूशनल रियलिटी क्या होगी फतवा के कल्चर के ऊपर आप बात कर रहे हैं कि कोई चीज जो पहले एक्सेप्ट नहीं की जाती है वो कैसे एक्सेप्टेबल हो जाती है आप बात कर रहे हैं इ्त्तिमाई इश्तेहाद की। आप औरत के हुकूक की बात कर रहे हैं। आप बात कर रहे हैं इन्हेरिटेंस में वो हुकूक क्यों डिफरेंशिएटेड रह जा रहे हैं बावजूद इसके कि हम अदिल की बात करेंगे। आप धिम्मी और सिटीजनशिप की बात कर रहे हैं। ये सारी चीजें हम मुझे लगता है कि अगले एपिसोड में ये पहला पार्ट है। तो ये पार्ट यहां तक हमने इस तरह करा कि हम क्रिटिकल एनालिसिस के पर्सपेक्टिव से चीजों को देख रहे थे कि अभी तक ये जो कोशिशें हुई हैं और आगे हम ये बात करेंगे ये कोशिशें कैसे कंटिन्यूड रहनी चाहिए। आपका इसमें क्या पर्सेक्टिव है? तो जैसे कि हमने पिछले एपिसोड में जो बातें की वो ये था कि वहां के साथ एक जदी इल्म कलाम पे एपिसोड पहले हो चुका था जिसमें मॉडर्न थियोलॉजी की जो रिक्वायरमेंट है कैसे प्रोड्यूस हुई लोगों ने क्यों आर्ग्यू करना शुरू किया कि शायद जो मते कलाम लॉजिक या जो पूरा ट्रेडिशनल जो ट्रेडिशनल थियोलॉजिकल साइंसेस है कलाम जिसे कहा जाता है मुकमून जो प्रैक्टिशनर्स ऑफ़ कलाम वो शायद जो नॉलेज सिस्टम्स को प्रोड्यूस किए थे वो एक जमाने के बाद जब यूरोपियन मॉडर्निटी आई और यूरोपियन कॉलोनियल निजाम पूरे दुनिया पे गालिब हुआ और उनकी एजुकेशन सिस्टम और ये सारी चीजें तो उससे एक पूरा का पूरा ईस्ट में जितने ट्रेडिशंस थे या फिर एक्सट्रीम वेस्ट में अमेरिका वगैरह में पुराने वो दरहम बरहम हुए और वहां पे कंप्लीट एपिस्टेमिक इरेजर हुआ कि आपको अपने तर्ज पे अपने रुझान से अपने निजाम से जिंदगी जीना भुला दिया गया और उसमें फिर यह जो पूरा क्राइसिस हुआ उसमें हमने पूरा जैसे डिस्कशन किया कि भाई तजदीद क्या है? क्योंकि जब क्राइसिस हो रहा था आपने अपनी किताब में लिखा कि भ उसके लिए फिर कुछ लोग इकट्ठे होते हैं। उनको रियलाइजेशन होता है। ट्रेडिशन की रिवाइवल की बात होती है। तो तजदीद क्या है और तजद्दुद क्या है? कि रिवाइवल विदाउट बीइंग एंबेडेड इन ट्रेडिशन के भाई कई बार बाहरी जो आपकी कोई फलसफा है, ग्रीक है, मॉडर्न है वो हावी हो जाए इंटरप्रिटेशन में रादर देन क्लासिकल अंडरस्टैंडिंग। तो आपने तजदीद को बोला वो एक तरीके का रिकंस्ट्रक्शन है और रिन्यूल है। तो फिर ये भी बात हुई कि उसके बावजूद तकलीद को आपने ये बताया कि इवन अगर विद इन क्लासिकल ट्रेडिशन भी अगर चीज रुक जाए, थम जाए और दुनिया मूव कर रही है तो वहां पर भी अगर आपके पास रिसोर्सेज नहीं होंगे इंटेलेक्चुअल तो आप शायद जो जमाने की यू नो प्रॉब्लम्स है उनको फेस नहीं करने देंगे और ये शायद हम लोगों ने देखा अभी आपसे जो शाह साहब के हवाले से और उसके बाद जो पूरे देवबंद अहले हदीस और तबबलीगी जमात सब लोग जितने मूवमेंट सर सैयद डिस्कशन सर सैयद के बारे में ये बात हुई कि वो तजद्दुद शायद कि भ वो ट्रेडिशन के बाहर लेकिन कम से कम सर सैयद का ये कंट्रीब्यूशन हां लेकिन वो सर सैयद उसके बावजूद वो शाह साहब की हिवायत से बहरहाल अपने आप को जोड़ करके देखते हैं। वो अपने आप को उससे बाहर नहीं है और वो कहीं ना कहीं कोशिश अपने को तसवुर नहीं करते। तो ये अपने ऊपर उन्होंने एक एक ट्रेडिशनल लिमिट जो लगाई लेकिन हम उसके बाद डिबेट में और भी कि भाई पॉलिटिकल थियोलॉजी के हवाले से भी जो ये इंटरप्रिटेशन हुई है सारी चीजें वो लेकिन बहाल जो पिछला जो एपिसोड यहां तक एंड हुआ और हमने ये फिर उसके बाद डिसाइड किया कि भ अगले एपिसोड में हम लोग जो बात करेंगे वो अब जो ये थियोलॉजी का जो रिकंस्ट्रक्शन के ऊपर जो डिबेट है और पिछली बार उस पर कुछ बात हुई थी फर्स्ट एपिसोड में लेकिन इस बार स्पेशली नई किताब के हवाले से आपने जो जिक्र किया है जी तो आप कुछ टर्मिनोलॉजीस का इस्तेमाल करते हैं इजाला इरादा इजाफा रिमूवल रेस्टोरेशन एडिशन जी तो कलाम के कॉन्टेक्स्ट में के अगर मैं इसको कोरिलेट करूं अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पे जब मक्के में वही आई मदीने में जो वही आई तो कुछ ट्रेडिशंस पहले से चले आ रहे थे वो जुके तू चलते रहे कुछ ट्रेडिशंस को बिल्कुल रोक दिया गया कुछ में इंप्रूवमेंट किया गया कुछ ऐड किया गया ऐड किया गया सबट्रैक्ट किया गया तो मैं एकदम से जब आपने ये बात बोली मुझे ये कोई बात ऐसी नहीं लगी कि वो रसूल खुदा सल्ला अल वसल्लम की मिसाल से शायद बाहर हो लेकिन उसकी जो डेप्थ है और उसकी जो हिस्टोरिकल अंडरस्टैंडिंग है आप उसको जरा हमारे सामने देखिए ये तो हमने कलाम के कॉन्टेक्स्ट में इसको हमने इस तरह से डिस्कस किया है। लेकिन फिर बड़ी बेहतरीन बहस हुतुल्लाह बालगा में शाह वलीला ने किया। अच्छा जहां पे वो ये बताते हैं कि शरीयत किस तरह से कंस्ट्रक्ट होती है और किस तरह से एक पैगंबर उस कंस्ट्रक्शन में उसका क्या रोल होता है। किस तरह से जब एक पैगंबर नया पैगंबर आता है तो उसके सामने जो बड़े सोशल पॉलिटिकल प्रॉब्लम्स होती है, चैलेंजेस होते हैं। उसको सामने रखते हुए फिर उसको यह कंस्ट्रक्ट करना पड़ता है। हम बहुत दिलचस्प ये बताते हैं कि वो भी कहते हैं कि ये तीन तरीके होते हैं। वही जिसको हमने एक तरह से कहा कि और तो वो यह कहते हैं कि पैगंबर ये कहता है कि सबसे पहले ये देखता है कि सोसाइटी को कौन सी खराबियां उसके अंदर ऐसी हैं के जिसको सिर्फ और सिर्फ रिफॉर्म उसमें कर कर करके उसके यानी रिफॉर्म करने के करने के बाद उसको बरकरार रखा जाए। तो कुछ चीजें वो होती है सोसाइटी की कि जिसको बिल्कुल खत्म नहीं किया जाता। सिर्फ रिफेशन की रिक्वायरमेंट होती है वहीं तक उसको रखा जाता है। कुछ चीजें वो होती है के जिसको रिफेशन की भी जरूरत नहीं। उसको एज इट इज उसको एक्सेप्ट कर लिया जाता है। पैगंबर ये चाहता है कि सोसाइटी ना टूटे जिस तरह से उसका स्ट्रक्चर है। जहां तक हो सके एडजस्टमेंट हो सके। शाली का भी उस तरह से उसको एडजस्ट करने की कोशिश करना चाहिए। तो एक तो ये है कि थोड़ा सा रिमूव थोड़ा सा उसमें कुछ तब्दीली कर करके उसको बरकरार रखना कुछ को एज इट इज रखना और कम चीजें ऐसी होती है कि जिसको बिल्कुल ही वो वो इजाला यानी बिल्कुल जो है उसको रिमूवल रिमूवल बिलकुल खत्म कर देने की वो करता है। जैसे शराब वगैरह की जैसी चीजें हैं तो उसके बारे में ये हुक्म आया कि बिल्कुल खत्म इसका तो कोई शैतानी काम है इसलिए बिलकुल शैतानी काम है। लेकिन जो हैस है दयत के मसाइल है यानी जो ब्लड मनी वगैरह है और बहुत सारे जो जो हमारे नमाज़ रोज़ की जो चीज़ है सब भी उन्हीं के ट्रेडिशन में था पहले से मौजूद था इन चीजों को को सिर्फ ये किया गया तो रिकंस्ट्रक्ट किया गया उसकी रूह को बरकरार रखा गया उसमें कहीं पे कुछ तब्दीली कुछ तब्दीली लेकिन उसको बाहर रखा गया तो ये जो हमने थोलजिकल जो यानी इस्लामिक थियोलॉजिकल थोलॉजी के जो रिकंस्ट्रक्शन की बात की है तो उसका जो हमने एक तरह से जो फ्रेमवर्क बनाया है तो हमारा हमारा ये कहना है कि जो लोग ये कहते हैं जो क्लास इंटेलेक्चुअल्स की ये कहती है कि जो हमारा ट्रेडिशनल इल्म कलाम है जो ग्रीक फिलॉसफी की बुनियाद पे बना हुआ है औरकि अब ग्रीक फिलॉसफी अपने उस स्ट्रक्चर के साथ नहीं रही है। उसकी बहुत सारी चीजें ऐसी है के जो अब इरिवेंट हो गई है। तो इसकी बुनियाद पर वो कहते हैं कि अब पुराना कलाम जो है जो जो हमें हमने बनाया था कभी दसवीं 11 यानी आठवीं नौवीं दसवीं सदी में अब उसकी कोई जरूरत नहीं है। तो ये बात सही नहीं है। तो हम ये समझते हैं कि नहीं यानी उसका एक हिस्सा तो यकीनन ऐसा है के जिसके में जिसकी अब जरूरत नहीं रही वो इरिलेवेंट हो गया है। अब जैसे मिसाल के तौर पे ग्रीक फिलॉसफी के मुताबिक जो उनका जो कांसेप्ट था एस्ट्रोनॉमी का या फिजिक्स का जो एरिस्टोटीलियन जो कांसेप्ट ऑफ वर्ल्ड था जो वर्ल्ड व्यू था तो उसमें जो है वो ये देखते थे कि साहब जो हमारी ये दुनिया है वो जो अपर लनर वर्ल्ड है चांद से ऊपर की दुनिया है इन दोनों में बुनियादी फर्क है रिसोजल के यहां बुनियादी फर्क है तो मिसाल के तौर पे वो ये समझते थे कि यहां से कोई आदमी ऊपर नहीं जा सकता। इसलिए कि मुख्तलिफ तरह के जो है स्फीयर है जहां जो है बहुत ज्यादा ठंडा है, आग है। तो यानी ये इंसानी बडी के साथ हम मिसाल के तौर पे जा ही नहीं सकते। उन्होंने जिस तरह से फिजिक्स को देखा था। इस तरह से जो है मुख्तलिफ जो नजरियात जैसे उनके एक तसवुर है जिसका एटमि का तसव जिसको हमारे मुक्किन यूज़ करते हैं। अब ये जो है इस तरह के तसवुरात में ग्रीक फिलॉसफी को लेकर कर करके उसकी बुनियाद पे जो एक थीसिस डेवलप की गई थी। हम तो अब क्योंकि मॉडर्न साइंस में मॉडर्न फिलॉसफी में यह चीज़ आई कि नहीं इसकी हकीकत ऐसी नहीं है। अब यह कहना कि कोई ऐसी चीज है जो जो इनविज़िबल है और उसके वो काबिल तकसीम नहीं है। सो ऐसा नहीं है। उसको तो जितना भी चाहे आप तकसीम कर सकते हैं। तो हमारे यहां जो इस तरह की कुछ बहसे बड़ी जो रही है यानी मोटे तौर पे इल्म कलाम की वो बहस जिसका ताल्लुक इसीियन फिजिकल वर्ल्ड से था। उसमें काफी तब्दीली पैदा हो गई। तो उस तरह की चीजों में तो अब जो है काफी तब्दीलियों की जरूरत है। जिसकी हमने मिसाल दी मिसाल के तौर पे जजा के हवाले से और या हमने या हमने कहा कि जो इनके यहां बहस है कि साहब खोम की बहस कहते हैं कि यानी हम ऊपर जाए तो ये कि साहब जो है या सबसे अच्छी मिसाल है कि हमारे शली नमानी कहते हैं कि जो है अब पहले इल्म कलाम में यह बहस होती थी कि जो है आसमान में आसमान कोई अगर जाए ऊपर तो उस वो आसमान को ब्रेक कर सकता है कि नहीं यानी जैसे रसूल्लाह की मेराज हुई है ये वो तो उसको कहते हैं कि इल्तियाम की बहस हमारे यहां कहते हैं उसके लिए सही इंग्लिश क्या टर्म होगा लेकिन अब तो मौजूदा ये है कि मौजूदा साइंस ये कहती है कि आसमानी कोई चीज नहीं है उनके यहां जो वो चीज थी उनके यहां ये चीज थी जो इसमें कि वो जो ऊपर की जो सारी जो उनका उनका जो पूरा तसवुर है तो वो अफलाक हैं, नफूस है। यानी इन तमाम चीजों को इटरर्नल समझते थे और वो ये समझते थे कि खुदा की तरह से खुदा के इसमें वो वही सिफात रखने वाले हैं जिनको वो जिसको न्यू प्लेट जिस न्यू प्लेटिज्म में जिसको डिस्कस किया गया है ज्यादा अच्छी तरह से। तो ये सब सारी चीजें तब्दील हो गई है। अब जो है जो हमारे सामने जो मॉडर्न इल्म कलाम है उस मॉडर्न इल्म कलाम की जरूरत आज से 100 साल 150 साल पहले खुद सर सैयद ने महसूस की शिवली नमानी ने उसको डेवलप किया आगे बढ़ाया और उसमें इस बात को बहुत बुनियादी अहमियत दी कि आज के जो बड़े नजरियात है बड़े चैलेंजेस है जो मॉडर्न फिलॉसफी और साइंस से निकल कर के आए हैं उनको कैसे एड्रेस किया जाए दूसरी बात यह है कि इसी तरह से खुद उसी के हवाले से मिसाल के तौर पर सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि पहले यह क्वेश्चन नहीं था कि साहब रिलीजन का लेकिन आज जिस तरह से लॉजिकल पॉजिटिविज्म वगैरह ने जो है क्वेश्चन पैदा कर दिया है कि तो खुद रिलीजन जो है बहस में आ गया है बिल्कुल के रिलीजन आया ये ह्यूमन क्रिएटेड है। खुद एक जो है जो जो सोशल एवोल्यूशन हुआ ह्यूमन सोसाइटी का उसी के नतीजे में पैदा हो गया है या पहले ये सब चीजें नहीं थी। पहले तो इसको हम मान करके चल रहे थे कि ये अपनी एक हकीकत रखता है और तो ये सब चीजें इस बात की जरूरत है कि हमें जो है उसके उस तरह के इसको जो ग्रीक फिलॉसफी के उस हिस्से पर बेस्ड करते हैं उसको हटाया जाए। दूसरे जो हमने कहा कि जो है रेस्टोरेशन वाला इदा वाला तो रेस्टोरेशन यादा वाला तसवुर हमारा यह है कि यह ऐसा होना चाहिए। कि उसकी वह बहस जो आज भी वैलिड है उनको एज इट इज रखने की जरूरत है। जैसे मिसाल के तौर पे उनके यहां जो पूरी इस एपिस्टमोलॉजिकल जो डिबेट है पूरी की पूरी इल्म के तसवुर के तहत वो सारी बहस उसका बड़ा हिस्सा आज भी बहुत ज्यादा वैलिड है। तो हमारा जो इल्म कलाम है उसकी शुरुआत मिसाल के तौर पे यहां से होती है। इल्म की बहस शुरू होती है। नॉलेज के रिसोर्सेज क्या है? कैसे उसको कितना रिलायबल है? और उसके बुनियादी सोर्सेस क्या है? अकल का उसमें क्या रोल है? तो ये सब बहसे हैं एथिक्स के हवाले से जो खुद अरिस्टोटल की यहां बह उसने हमारी ट्रेडिशन को बहुत ज्यादा जो है इन्फ्लुएंस किया है। ये सब वो बहसे हैं। बुनियादी मुताद इल्म अकल नफ़्स ये तमाम बहस वहां जो चलती है वो उसके बहुत सारे से बहुत ज्यादा हमारे जो उसूल फ में भी उसने बहुत ज्यादा असर डाला है। इल्म कलाम के हवाले से भी बहुत ज्यादा असर डाला है। तो इससे को अलग नहीं किया जा सकता इन बहसों से। ज्यादा से ज्यादा ये है कि आज जो फिर उसके जो नई नए डायमेंशंस उसमें पैदा हुए हैं आज की मॉडर्न फिलॉसफी में उन डायमेंशंस को भी शामिल रखना चाहिए। इसीलिए हम ये देखते हैं कि जो पूरी मेडिवल एज में या मॉडर्न एज में जो जो मॉडर्न फिलोसफी जो सामने आई है तो उसमें भी वो सारी बहसें आज भी उससे जुड़ी हुई है। उससे हटी हुई नहीं है। उनहीं में नए अंदाज में नई चीजें सामने आई। तो हमारा इल्म कलाम जो है जो लोग इस तरह की बातें कहते हैं के आज का इल्म कलाम ये होना चाहिए जो बिल्कुल कुरान और हदीस पे इस तरह से बिल्कुल बेस करता हो। उसमें ग्रीक फिलॉसफी की कोई जरूरत नहीं है और उसमें आज की आज की यानी वेस्टर्न फिलॉसफी की कोई जरूरत नहीं है। बल्कि अपनी एक अलग ही एक हमारी एक इस्लामिक फिलॉसफी होगी। मुद लोग कहते हैं खुद वदुद्दीन खान ने कहा कि ये सारा का सारा ये है। कुछ माना मौदूदी के यहां भी इसी तरह की चीज है कि इस तरह की कोई बहसों की कोई जरूरत नहीं है। इस तरह के बड़े लोग इस तरह जावेद अहमददी साहब कहते हैं कि बिल्कुल ये सब कुछ भी जरूरत नहीं है। फरसूदा है। ये मैंने आपको नाम बताए। तो ये ये सही ये बात दुरुस्त नहीं है। यानी जो तसवुर हमारे हमारे शाला का था उसको आगे डेवलप किया खुद हमारे इकबाल ने सर सैयद अहमद खान ने शिवली ने उनके सामने ये अहमियत बहुत ज्यादा थी सैयद सुलेमान नदवी ने तो हम समझते हैं कि ये वाली जो चीज है वो मॉडर्न इल्म कलाम के कंस्ट्रक्शन में बहुत ही बुनियादी रोल रखती है। उसमें मुख्तलिफ़ नए पहलुओं का इज़ाफ़ा बहुत ज़्यादा ज़रूरी है। मिसाल के तौर पे पहला जो हमारा इल्म कलाम का पूरा वह था। वह खुद शिवली ने भी यह बात कुछ इस तरह से लिखी है। वह तो सिर्फ़ और सिर्फ़ जो हमारा वर्ल्ड व्यू या जो हमारा बिलीफ़ सिस्टम है उसको डिस्कस करता था। सिर्फ उसके सारे सारे डिबेट डिस्कशंस उस पे चलते थे। लेकिन जो जो जिसको हम शरिया कहते हैं यानी इस्लामी आमाल है अखलाक है एथिक्स है वो उस बहस में नहीं आती थी लेकिन हमारे शाह ये कहते हैं नवाानी कहते हैं कि पहली दफा शाह वलीला ने इसको शामिल किया ये बहुत अहम बात है। वो कहते हैं गुजरतगा के जरिए ये एक बड़ा इजाफा हुआ। एक तरह का नया इल्म कलाम की एक नई सूरत इस तरह से सामने आई कि उन्होंने इस्लामी शरीयत को भी इल्म कलाम का पार्ट बना दिया। पहले ये शरीयत और कलाम कलाम का पार्ट नहीं था। हमारी फका हमारी शरीयत कोई इल्म कलाम का पार्ट नहीं थी। बिल्कुल लेकिन आज की दुनिया को शरीयत के हवाले से जो खुद शरीयत क्या चीज है? क्यों ह्यूमन सोसाइटी के लिए इसकी ये इतनी जरूरी है? और फिर जो इस्लामी शरीयत में जो बहुत सारे अहकामात हैं, जिहाद है, खवातीन के हुकूक है, ह्यूमन राइट्स हैं वगैरह वगैरह कुछ शिवली ने भी उसकी बातें की है। अब इस पे बहुत ज्यादा बहस हैं, क्वेश्चन है, सवालात हैं। तो आज के इल्म कलाम के लिए जरूरी हो गया है कि वो इन सवालात को सा को डिस्कस करे। उसका जवाब सामने लाने की कोशिश करे। तो इस तरह से हमारा जो इल्म कलाम की हम जो बात करते हैं जदी इल्म कलाम मॉडर्न इल्म कलाम की जिसको हमने इसमें दिखाने की कोशिश की है उसको इन तीन एंगल से कुछ चीजों को हटाया जाए कुछ चीजों को वैसे ही रहने दिया जाए कुछ नए पहलुओं का उसमें इजाफा किया जाए ताकि जो है आज का इल्म कलाम आज के जो बड़े नजरियात हैं आज का जो प्रिवेलिंग वर्ल्ड व्यू है उसको क्वेश्चन कर सके उसको रिसोंड कर सके और उस हवाले से अपनी पोजीशन सामने रख सके। उनके साथ अपने आप को इंगेज कर सके। वही जैसे शुरू में भी वो जो मैं बात सोच रहा था, कह रहा था कि जब अल्लाह के रसूल सब ने अपनी जो जमाने की रियलिटीज हैं उससे कंप्लीटली डिसंगेज करके 100 यू नो 100% ऐसी चीज जो हर जर्रे जर्रे में नहीं हो। उससे ज्यादा यह होता है कि अद्ल और जस्टिस और जो निजाम ऐसा है कि भाई आप भी सोच सकते हैं कि अच्छाई की तरफ लेकिन आप वो परफेक्शन की तरफ नहीं जा पाएंगे। उसके लिए आपको वही की जरूरत या फिर ये सारी चीजों की जरूरत है। और जो फका और थियोलज का जो पूरा एक लंबा डिबेट चला उसके बाद भी ओवर द पीरियड ऑफ़ सेंचुरीज तो उस जमाने में भी क्योंकि ग्रीक फिलॉसफी की लिमिट्स जाहिर हुई है। गजाली ने सामने रखा और उसके बाद ये जब हम सर सैयद की बात कर रहे हैं तो साइंस और रिलजन और थियोलॉजियंस पहले ही थोड़ा बैक सीट पे आ चुके थे। उसका रिवाइवल थोड़ा बहुत शाह वली उ्ला के कॉन्टेक्स्ट में हुआ लेकिन उतने में ओवरऑल कंडीशंस ही बदल गई दुनिया की कि वो रिवाइवल से कुछ आगे चीजें उस तरह बढ़ती और रिफॉर्म होता उतने में कंडीशन बढ़ गई और सबसे पहला जो डिबेट सामने आया वो वही आया कि भाई साइंस या रिलीजन तो आज की डेट में जब हम जदीद इल्म कलाम और कलाम को रिफिट करने की बात करते हैं और उसमें क्या हटाया जाए क्या रिस्टोर किया जाए और क्या ऐड किया जाए। तो यह साइंस और रिलजन की डिबेट में यह जो पूरा का पूरा कि भाई आइदर साइंस और रिलीजन आप इस डिबेट को कैसे देखते हैं कि जब ये चेंजेस आएंगे कलाम में और कि मेथोलॉजिकली कैसे आएंगे और उसमें ये जो साइंटिफिक पैराडाइम है जो इमर्ज हो रहा है जिसमें बाद पहले हमने ये देखा कि भ ग्रीक फिलॉसफी का भी एक साइंटिफिक पैराडाइम था। उसमें भी वो चीजें सारी नहीं ले ली गई। एज़ इट इज़ उसकी रीजनिंग हुई। क्या इवैल्यूएट किया गया? क्या उसके अंदर भी ऑटमिज्म के अलावा भी बहुत सारे व्यूज थे। ऐसा तो नहीं है कि भ वहां पे वो एवर चेंजिंग हेरेकलाइटिस का भी व्यू था, परमनाइडीज का भी व्यू था। अह इनका भी, प्लेटो का भी, एरिस्टोटल का भी आगे भी जो हुए हैं। तो फिर यह जो पूरा का पूरा जो सिलसिला है आज जब साइंस का तो पिछले 100 150 200 सालों में ये जो सर सैयद से इकबाल शिवली इकबाल के सफर में वहां पे क्या चेंजेस आए कि कलाम वापस एक तरीके से इकबाल तक आते-आते कंप्लीटली एट ऑड्स या रीज़ल रीज़ जो है कंप्लीटली एज ये नहीं देखा गया कि भ ये तो देखिए 1000 सवा साल में जवाब नहीं दे पाए तो अब क्या देंगे अब उसकी फिर से जरूरत पैदा हुई तो वो क्या जर्नी है और उसमें क्या चीजें ऐसी हुई जो आपको लगता है कि जिसने फंडामेंटली कुछ जवाब दे दिए मसलन इकबाल के हवाले से पूछा जाए अगर या फिर मौलाना शुली नोमानी के हवाले से पूछा जाए क्या इन तीन कैटेगरीज में से कोई ऐसी चीज हुई कलाम के हवाले से जिससे ये बोला जा सकता है कि रिवाइवल का मूवमेंट देखिए सबसे बड़ा क्वेश्चन जो सामने आया हम ये देखते हैं 19 सेंचुरी में वो क्वेश्चन था साइंस का कि हमारा इल्म कलाम साइंस से किस तरह से अपने आप को इंगेज करता है क्योंकि बड़े क्वेश्चन जो लोगों के ज़हनों में आ रहे थे और हम ये देखते हैं कि ये मॉडर्न साइंस के आने की वजह से जिस तरह से क्रिश्चियन ट्रेडिशन में तदीली पैदा हुई जो आप देख रहे हैं तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] सबसे बड़ा क्वेश्चन खुद सर सैयद के सामने इकबाल के सामने सबसे बड़ा क्वेश्चन यही था। सर सैयद ने उसको अपने तौर पे इस तरह से एड्रेस करने की कोशिश की कि उन्होंने साइंस को एक बुनियादी हकीकत के तौर पे उन्होंने इख्तियार किया और उसको एक जो हमारे यानी इस्लामिक डोगमाज़ या बिलीव या जो हमारा पूरा जो एक सिस्टम है उसको उन्होंने साइंस के अकॉर्डिंग उन्होंने कंस्ट्रक्ट करने या रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश की। क्योंकि वो यह जान रहे थे कि सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि जो मॉडर्न साइंस के जो अपने कुछ दावे हैं और ऐसा लगता है कि के साइंस ने जैसे रिलीजन के डोमेन में आकर के अपनी बात रखनी शुरू कर दी है और अब रियलिटी वो होगी जिसको साइंटिफिकली प्रूफ किया जा सके। हुआ ये था कि जिस तरह से हमारे द 11वीं बार सदी में यह माहौल बना के रियलिटी वो है हकीकत वो है जिसको ग्रीक फिलॉसफी के आर्गुममेंट के तहत उसको प्रूफ किया जा सके डिसफ किया जा सके डिस्रूव किया जा सके आज हमारे सामने गोया 19वीं 20वीं सदी में बिल्कुल वही सुरते यानी वो जो हुआ वहां देख रहे हैं तो उसको खत्म करने के लिए उन्होंने ये किया मिसाल के तौर गली गली की पूरी तबत फिलसफा इसी पे थी उन्होंने ये दिखाया कितला रजाली ने के ये जो पूरा का पूरा जो स्ट्रक्चर हमारे मुस्लिम फिलॉसफर्स ने बनाया है अपने इसका वो उसमें खुद बहुत सारे पॉइंट्स मिसिंग है कंट्राडिक्शन है बहुत ज्यादा चीजें उन्होंने खुद समझी नहीं और दूसरी बात ये है कि उसको जो अप्लाई किया उन्होंने रिलीजन पे गजाली का असल एतराज ये था कि उन्होंने इस्लामिक मेटाफिजिक्स पे जिस तरह से ये ग्रीक फिलॉसफी को जाकर के अप्लाई कर रहे हैं ये सही नहीं है। उनका सारा एतराज इस पे था और इसीलिए अगर उस डोमेन में जाकर करके आप ग्रीक फिलॉसफी की बुनियाद पर अगर आप बात करते हैं तो वह हमारे लिए एक्सेप्टेबल नहीं है। उसमें इंटरवेंशन की इजाजत नहीं देंगे। उसकी बुनियाद पे उन्होंने तकफर की काफिर ठहराया अब सीना फराबी वगैरह जैसे मुस्लिम फिलॉसफर्स को क्योंकि वो उसको पूरी तरह से मजहब को इंटरप्रेट करने के लिए इनहीं टूल्स को वो आजमा रहे थे। और गज़ाली का कहना था कि नहीं इसका ताल्लुक इससे अलग है। हमारी 20वीं सदी में अब इसी को देखेंगे कि क्या हुआ बल्कि 18 19वीं 20 सदी सब में लेकिन हमारे यहां जो खास तौर से इंडिया में हुआ तो हमारे जो सर सैयद अहमद खान जो थे तकरीबन वो भी वही काम कर रहे थे कि जिसको अबू अली सीना फराबी वगैरह ने किया अपने जमाने में अपने जमाने में साइंटिफिक पैराडाइम में बिल्कुल अपने साइंटिफिक पैराडाइम में उन्होंने उसको उसी तरह से वो किया लेकिन जब जो है सर सैयद के फौरन बाद यानी साथी ही थे बल्कि शिवली नोमानी को इसका जो बड़ा एहसास हुआ तो शिवली नोमानी ने जो अल कलाम लिखी है इसका काफी इमैक्ट पड़ा बल्कि मालूम होना चाहिए हमारे व्यूअर्स को और आपको के जदीद इल्म कलाम का जो टर्म है ये बुनियादी तौर पे गोया शिवली नमानी का दिया हुआ है या कम से कम दुनिया क्योंकि उनकी जो किताब आई है इल्म कलाम जदीद वही बुनियादी तौर पे अरबी में इंग्लिश में ट्रांसलेशन हो करके हर जगह उसकी तारीख में ये रहता है कि ये शिवली नमानी ने जदीद दिल में कलाम का टर्न लिया तो उनके यहां जो जदी दिल में कलाम का कासेप्ट था जो उन्होंने आगे करने की कोशिश की तो वो सरसय के नजरिए से अपने आप को इख्तलाफ कर करके अपने आप को अलग कर रहे थे उन्होंने उनका ये तसवूर रहा कि नहीं ये जो मॉडर्न साइंस है मॉडर्न साइंस को इस डोमेन में आकर के बात करने की जरूरत नहीं है। साइंस का अपना डोमेन अलग है और मजहब का डोमेन बिल्कुल अलग है। मजहब की रियलिटीज अलग हैं। साइंटिफिक रियलिटीज अलग हैं। इसलिए मजहब इस बात का मोहताज नहीं है कि वो अपने इसके लिए अपनी हकीकत को प्रूफ करने के लिए वो साइंटिफिक आर्गुममेंट लाए। और जब तक साइंटिफिकली कोई चीज प्रूफ ना हो जाए जब तक वो मजहबी कहलाने की है। क्योंकि मजहब या जो बिलीव या एतकाद वो नाम ही इस चीज का है कि उसको आप उस तरह से रशनलाइज नहीं कर सकते। नहीं कर सकते जिस तरह से जो दावा गोया के साइंस का होता है। तो जदीद इल्म कलाम में ये एक बहुत ही बुनियादी हकीकत है। बुनियादी डिबेट है कि ये देखना चाहिए कि के अ मजहब कहां खड़ा हुआ है और जदी साइंस कहां खड़ी हुई है? एक हमारे जो थे अल्लामा इकबाल उन्होंने रिकंस्ट्रक्शन में बुनियादी तौर पे सर सैयद से इख्तलाफ करते हुए मुख्तलिफ चीजों में क्योंकि वो सर सैयद को बहुत ज्यादा वो नहीं करते थे। लेकिन उसके बावजूद वो साइंस को एक बुनियादी टूल के तौर पे यूज़ कर रहे थे। हम और इसकी वजह से उन पे बहुत ज्यादा एतराजात भी हुए कि उन्होंने जो जदीद इल्म कलाम या इल्म कलाम को जो बनाने की कोशिश की है उसमें साइंस को जिस तरह से उन्होंने अहमियत दी है जिस तरह से यूज़ किया है वो वो सही नहीं है। ये उनके क्रिटिक्स उनप है ये। तो मेरा अपना जो व्यू है इसमें के जिस तरह से आप कुछ लोगों ने जैसे हमने कहा कि सर सैयद ने या और दूसरे लोगों ने जिस तरह से इल्म कलाम को खालिस साइंटिफिक पैराडाइव में कंस्ट्रक्ट करने की कोशिश की वो भी गलत है। लेकिन ये भी गलत है कि आप ये कहे कि बिल्कुल जो है हमें मॉडर्न फिलॉसफी मॉडर्न साइंस से कुछ लेना देना नहीं है और हमारी एक अलग से कोई एक इस्लामिक फिलॉसफी है। एक इस्लामिक ऐसा एक इल्म कलाम होगा जिसके सारे उसूल खुद हमारी अपनी इससे यानी कुरानो हदीस से इस्तमाबाद किए हुए और डिराइव्ड हो और उसकी बुनियाद पे कोई एक ऐसा इल्म कलाम बना बनेगा जो इल्म कलाम हमारे लिए जो है दूसरों को सेटिस्फाई करने वाला होगा जिस तरह से हमने कुछ नाम बताए तो ये ऐसा नहीं है एक फाइनल अथॉरिटी के तौर पर देखना साइंस को या मॉडर्न फिलॉसफी को वो एक बिल्कुल अलग बात लेकिन लेकिन आपको आज के जदी इल्म कलाम में आज की जो बहुत सारी जो लिंग्विस्टिक्स डिबेट्स है बहस हैं उनको आपको शामिल हर हाल में रखना पड़ेगा मसूस के फब में और वगैरह वगैरह जदी साइंस को आपको शामिल रखना पड़ेगा ताकि आप आज की दुनिया को आज के इसमें समझ सके। तो इस तरह से हम साइंस से अपने आप को साइंटिफिक नजरियात से अपने आप को अलग नहीं कर सकते। हां लेकिन यह के उसको हावी इस तरह से करना के साइंस को यह अहमियत देना के एक फाइनल अथॉरिटी की हैसियत रखती है मजहब के लिए। ऐसा नहीं है। तो जैसे इकबाल की जब बात हो रही है तो इकबाल साइंस की जो लैंग्वेज है उसको इस्तेमाल कर रहे हैं वो ऐसी चीजों को एक्सप्लेन करने के लिए जो रिलजन के डोमेन में थी और वो उस जमाने की लिंग्विस्टिक ट्रेडिशन में बयान हो पाए ताकि लोगों को समझ आए। क्योंकि अगर अल्लाह है तो उसने दुनिया को बनाया है। दुनिया को अगर उसने बनाया है तो रूल्स से उसके चल रहा है। और अगर वो ही प्रॉफिट्स को भेज रहे हैं और उनको मैसेज दे रहे हैं और उसमें कुछ बातें ऐसी हैं कि जिसमें फिजिकल चीजों की बातें हैं तो फिर एक दूसरा कंट्राडिक्शन जो इमर्ज होता है कि अगर कुरान शम्स की बात नहीं करता। तवाकिब की बात नहीं करता। ये मिथुराइट्स और इस तरह के स्टार्स की आसमानों की और इस तरह की चीजों की फिर वो बादल कैसे फॉर्म हो रहे हैं और बच्चा कैसे पैदा होता है बात करता है ये तो वो प्योरली वो जो डोमेन है वो एक तरीके से देखा जाए तो साइंटिफिक डोमेन है बहुत अहम सवाल है ये बात जरा सा समझने की है बहुत बेहतरीन बात आपने कही एक बड़ा मसला यही है कि हम ये देखते हैं कि खुद कुरान की आयात में और कुछ हदीसों में इस तरह के जो जो साइंस का मौजू है जो आपने बताया यानी चांद सूरज सितारे हैं से मुतालिक जो है या समुद्री आयात के बारे में और मुख्तल चीजों के बारे में इस तरह से गुफ्तगू साइंस में की कुरान में में की गई है। तो इससे एक ट्रेंड यह पैदा हुआ हमारे यहां खासतौर से 20वीं सदी में यह इमर्ज हुआ के साइंटिफिक नजरियात को उन्होंने कुरान से साबित करने की कोशिश की या दूसरे लफज़ों में साइंस को कुरान को साइंस के मुताबिक ढालने की कोशिश उन्होंने की जिसको हम कहते हैं तसी इल्मी एक ततावी साहब थे सबसे पहले बड़ा नाम उनका है अब इजिपशियन स्कॉलर उन्होंने ये दिखाया कि ये जो सारे साइंसी नजरियात है वो किस तरह से खुद कुरान उसका सोर्स है और उन्होंने जबरदस्ती इस तरह की कोशिश की कि किसी तरह से यह बताया जा सके के साहब यानी दुनिया कैसे बनी आसमान जमीन कैसे बने और किस तरह से जो तखलीक की बातें हैं और फिर जो इधर जो है ग्रेविटी और वगैरह वगैरह जो के जो चीजें हैं उन तमाम चीजों को जो है लेकर करके वो किसी तरह से ये बताते हैं कि जो है हत्ता एवोल्यूशन थ्योरी वगैरह को जो कुरान से साबित करने की कोशिश करते ये बिल्कुल ही गलत सी चीज है और आ और इस पे काफी अब जो है अभी जो है इस पे काफी बिल्कुल बहस रही है कि इस तरह से आप जो एक मेथडोलॉजिकल जो एक एरर पैदा होता है एक बड़ी जो प्रॉब्लम पैदा होती है कि वो आप ये करते हैं कि आज के जदी साइंसी नजरियात को आप कुरान के मुताबिक करने की कोशिश करते हैं या कहते हैं कुरान से डिराइव्ड है या हालांकि ये पिछले इसमें भी बात हुई थी कि उसमें मसला यह होता है कि आज जो चीज़ एक साइंटिफिक थरी या या फैक्ट के तौर पर समझी जाती है वो आगे चल के बदल जाती है। आपने कहा कि तो कुरान तो बिल्कुल ऐसे ही कह रहा है। कुरान तो बिल्कुल ऐसे ही कह रहा है के ये जमीन इस तरह से बनी आसमान ये गर्दिश वगैरह के बारे में या इस तरह की चीज़ कल होकर करके साइंस के वो नज़रियात तब्दील हो जाते हैं। तो कुरान की जो रियलिटीज़ है वो तो फिक्स हैं। एक नजरिया ये बन करके आया कि कुरान की जो अपनी जो चीज़ वो तो फिक्स है जबकि साइ नजरियात फिक्स नहीं है। लेकिन दूसरा जो एक बहुत ही दिलचस्प जो बात आती है वो बहुत ही अहम है। वो हमारे अल्लामाशाह कश्मीरी ने उनकी फैजुल बारी में उन्होंने इसको डिस्कस किया। उसका काफी आजकल जो है इस गुफ्तगू भी रहती है। उन्होंने कहा कि कुरान में जो इस तरह की बातें कही गई है उसके बारे में पहले तो यह समझना चाहिए कि कुरान का मौजू ये नहीं है। कुरान का मौजू इसको बताना ही नहीं है के यानी कायनात के हवाले से उस तखली कायनात के हवाले से उसका बुनियादी मकसद इतना बताना कि इस कायनात को बनाने वाली कोई जात है कोई हस्ती है और तुमको ये बिलीव करना है ताकि उससे जो तुम्हारी जो एक एथिकल लाइफ पे जो उसका वो वो पड़ता है कि भाई खुदा ने अगर ये कायनात बनाई है तो तुमको किस तरह से खुदा को मानना है और उसका शुक्र अदा करना है सब लेकिन ये कहा कि ये कैसे बनी कब बनी क्या हुआ कैसे इवोलशन हुआ किस तरह से ये सारी की सारी चीजें सिरे से मौजू ही नहीं है दूसरी बात जो बहुत ज्यादा अहम है वो ये वो ये कहते हैं कुरान जो इस तरह की बातें कहता है और जिससे कुछ कंट्राडिक्शन भी पैदा होती है जैसे मिसाल के तौर पर कुरान कहता है के आसमानों के बारे में कहता है या कुरान जैसा कि आपने कहा कि वो जो है कहता है कि बादलों से पानी आसमान से पानी बरसता है। हालांकि आसमान से तो पानी नहीं बरसता। जाहिर है बादलों से पानी होता है। अल्लामा शाह कश्मीरी ये कहते हैं कि इस तरह की बहुत सारी बातें जो कुरान में आई है दरअसल उसका कॉन्टेक्स्ट ये है कि इंसान जिस तरह से उसको इमेजिन करता है। यानी थिंग इन सेल्फ नहीं है। जो असल रियलिटी है उससे कुरान को कोई लेना देना नहीं है। कुरान तो आप जिस तरह से समझ रहे हैं कि सूरज गर्दिश कर रहा है। त मुस्तक मिसाल के तौर पे तो उसको इससे लेना देना नहीं है कि उसकी बुनियादी बेसिक साइंटिफिक रियलिटी क्या है इंसान कैसे उसको समझता है उसको बुनियाद बना करके कुरान में ये बात कही गई है ये बात कहते हैं अल्लामाशाह कश्मीरी फैजुल बारी में क्योंकि उसका मकसद जो है वो एथिकल मकसद है उसको इससे लेना देना नहीं है कि वो साइंटिफिक थ्योरीज बताए ये वो उसको तो सिर्फ इतना लेना देना है कि देखो खुद से ये वजूद में नहीं आया है। ये पूरी कायनात खुदा ने पैदा की है। खुदा चला रहा है। उससे कंट्राडिक्शन पैदा नहीं होता कि उस जमाने में फॉर एग्जांपल जो अरब है जिस जमाने में कुरान नाजिल हो रही है। उस जमाने की जो इंसानी वर्ल्ड व्यू है अगर उसके मुताबिक जिस तरह थिंग एज इज देखी जा रही है रेदर देन थिंग एज इटसेल्फ। तो उस डिबेट में जब आगे कॉन्टेक्स्ट बदलेगा और लोग तहकीक ज्यादा करने लगेंगे और थिंग एज इट इज की तरफ बढ़ने लगेंगे और मटेरियल को इवैलुएट फॉल्सिफाई और ऑब्जेक्टिवली मेजर कर पाएंगे तो फिर से ये रियलिटी क्योंकि कुरान तो आखिरत तक के लिए है क्योंकि शाह वली उल्लाह की जब हुज्जत की ही बात होती है जब वो आलम मिसाल और किस तरह से जो आपके फरिश्ते हैं वो किस तरह से मैसेज ऊपर से नीचे लाते हैं। फिर उस जमाने की जो वोकैबलरी है जो उनके वक्त तक अवेलेबल है। उस पूरी वोकैबलरी को डिप्लॉय करके वो हदीस की जो चीजें हैं या कुरान के हवाले से जो चीजें हैं या खुद इत्तेफाकात का जो उनका सिविलाइजेशनल डिस्कोर्स का हुआ है वो भी ऐसी चीज नहीं है कि कुरान उसके बारे में वो कर रहा है। तो कुरान एज अ सोर्स ऑफ़ थ्योराइजेशन कि वो थ्यरी बिल्डिंग की भी कि आज एक तो नजरिया ये है कि साइंस बदल जा रही है। एक नजरिया यह है कि जो साइंस में और जो भी अगर ओरिजिनल वर्ल्ड व्यू है कुरान का क्योंकि वह अल्लाह की तरफ से ही आया है और आखिरत तक के लिए उसका वादा है। तो जब भी चेंजेस आएंगे तो अगर उसने इस हवाले से कुछ बात की है तो उस जमाने का जो वर्ल्ड व्यू है इंसान का वो अगर कंफ्यूज हो गया तो फिर उसकी एथिक्स तो इसी से बचाने के लिए है ना ये जो सामने आया इनका जो नजर इनका जो आया सामने के जिस वक्त में कुरान नाजिल हो रहा था जिनकी तरफ नाजिल हो रहा था उस वक्त जिस तरह से वो लोग अपने उनका वर्ल्ड व्यू था जिस तरह से वो दुनिया को देख रहे थे उनके मुताबिक वो चीज नाजिल हुई इससे तो वेस्ट ठीक हो गया ना वो ये बोलते हैं के जो 1400 साल पुराना है रिडंडेंट हो गया अब अगर एक चीज रिडंडेंट हो सकती है मान लीजिए साइंटिफिक वर्ल्ड व्यू तो बाकी चीज क्यों नहीं हो सकती क्योंकि क्लेम तो और भी है दीनों का है तो उसको जो हमने पहले बताया कि असल असल में ये बात ये है कि कुरान का ये मकसद नहीं है। कुरान के मकसूद में ये शामिल ही नहीं है। तो उस वक्त एतराज शामिल होगा जब को वो कुरान के प्रोजेक्ट में शामिल हो। ये बताना कुरान एक एक बुक ऑफ एथिक्स है। वो कोई बुक ऑफ साइंस नहीं है। ये बात तो हमारे डॉक्टर फजुर रहमान भी इस कदर शिद्दत के साथ लिखते हैं। आप उससे साइंटिफिक साइंस के एलिमेंट्स लेने की कोशिश क्यों कर रहे हैं कि आपको ये कंट्राडिक्शन ले लग रहा है। ये वो वो जो कुछ भी कुरान में इस तरह से बातें की गई है वो बिल्कुल एक जिमनी बात है। बिलकुल एक जिमनी तौर पे कहा गया। ये इंसान की अपनी अकल पे, अपनी डिस्कवरीज पे, अपनी कोशिशों पे छोड़ दिया गया है। असल जो उसका मकसद है साइंस का वो तो वो तो मकसद है खुदा को बताना। उसमें देखें कि कोई इम है कि खुदा ने क्रिएट किया है और उसके अंदर ये सिफात है कि वो कायनात को चला रहा है। और क्योंकि वो उसी ने क्रिएट किया है। उसी ने चला उसी चला रहा है। तो वो एक दूसरी दुनिया भी आएगी जिसमें तुमको उठना पड़ेगा। और अगर तुम दूसरी दुनिया पे बिलीव करते हो तो तुम्हारी जो है एक लाइफ जो होनी चाहिए वो इस तरह से होनी चाहिए। उसके लिए वो कुछ वैल्यूस देता है कि आपको इस तरह से लाइफ गुजारनी है। कुल बुनियादी मकसद उसका यह है। बाकी क्या सूरज क्या चांद किस तरह से वो आसमान है या नहीं है और कितना है क्या है उससे उसको कोई लेना देना नहीं है। वो गर्दिश कितना कर रहा है नहीं कर रहा है इससे लेना देना नहीं है उसको। एक चीज अगर वो साइंटिफिकली हमारे ये बात कुछ तो इस तरह की बात हमारे मौलाना अशरफ अली थानवी ने भी कही है। हालांकि ये सब ट्रेडिशनल उलमा है लेकिन इन लोगों के यहां भी बहुत सारी बातें जबरदस्त है। वो कहते हैं कि मिसाल के तौर पे जमीन की गर्दिश का है। इसको लेकर के जबरदस्त ये रहा है। अगर ये साबित हो जाता है कि है कि अच्छा साहब जो है जमीन गोल है या जमीन ही गर्दिश कर रही है। सूरज गर्दिश नहीं कर रहा है। और ये कुरान के मुताबिक है। बहुत अच्छी बात है। अगर यह नहीं होता है ऐसा तब भी कुरान पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। इसलिए कि कुरान को इससे कुछ लेना देना नहीं है। यह बात लिखते हैं। उनकी बहुत किताब है। उससे ये उसका मौजू नहीं है। ये आप ये इसी जो आपका अंडरस्टैंडिंग है वो कलाम के हवाले से जब ये आप अशरी पोजीशन में प्रॉफिटहुड और गॉड्स एकिस्टेंस आपका ये कहना है कि भ ज्यादातर जो डिबेट है वो गॉड के एकिस्टेंस पे है और गॉड के एकिस्टेंस को तो ज्यादातर लोग मानते हैं। हिंदू भी मान रहा है, मुसलमान भी मान रहा है, ईसाई भी मान रहा है। लेकिन जो चीज ये तय करेगी कि गॉड का एकिस्टेंस किस एथिक्स और पैराडाइम को प्रिविलेज करेगा वो डिसाइड होगा कि भ वो किताब या वो प्रॉफिट जो उसका लाने वाला है वो कौन है या उसका तो ये आपके हिसाब से ये क्या डिबेट है? इसके क्यों आपको ये लगता है कि भ प्रॉफेटहुड की जो बारे में बात ज्यादा होनी चाहिए रादर देन एकिस्टेंस ऑफ़ गॉड एंड नॉन एक्सिस्टेंस ऑफ़ गॉड। ये आज के ये जो आज के कंटेस्ट में देखें के [गला साफ़ करने की आवाज़] एकिस्टेंस ऑफ गॉड की बहस तो कई हजार साल से है ना। कोई नई बहस तो बिलकुल नहीं है। और उसके लिए जो आर्गुमेंट्स हैं वो आर्गुमेंट्स कोई इस्लाम के ही लिए यानी खुद मुस्लिम ट्रेडिशन ही में नहीं है। बल्कि नॉन मुस्लिम ट्रेडिशन में भी वो सारे मिसाल के तौर पे ये डिजाइन आर्गुमेंट वगैरह जो हमारे यहां चलते हैं वही तरह से क्रिश्चियन थोलॉजी में बिल्कुल वही है। इसलिए आज हमारे इस्लामिक थॉट को इस्लामिक ट्रेडिशन को ये वाला चैलेंज नहीं है कि खुदा के वजूद को साबित करना। असल तो इसका ये है कि इस्लाम जो अपना दावा पेश करता है के वो आगे बढ़ कर करके के खुदा के वजूद के मानने के साथ यह मानना कि प्रोफेट मोहम्मद पैगंबर है और उनके जरिए जो एक पूरा वर्ल्ड व्यू और एक पूरी शरीयत है एक पूरा जो वो मिला है वो रहती दुनिया तक के लिए उसको बाकी रहना है और वो हर सोसाइटी के लिए है तो ये एक बहुत बड़ा चैलेंज बहुत बड़ा दावा बन जाता है इसके लिए जरूर जरूरत होती है कि सबसे ज्यादा बहस इस बात पे हो रिसालत पे प्रोफेटहुड पे रेवोलेशन पे एक बड़े बड़े स्कॉलर है जदी कलाम पे इराियन स्कॉलर है अब्दुल जब रिफाई साहब उनकी बहुत सारी किताबें हैं मॉडर्न इल्म कलाम पे तो वो कहते हैं खुद अल्लामा इकबाल ने भी कि एक बहुत बड़ा जो सवाल है कि भाई ये रेवोलेशन का सिलसिला वही का सिलसिला खत्म क्यों हो गया ये पूरी ह्यूमन हिस्ट्री में तो हम कहते हैं कि वो चल रहा था चल रहा था और फिर प्रोफेट मोहम्मद के बाद बिलकुल खत्म हो गया। इकबाल भी इसको उठाते हैं और फिर उसका कोई जवाब देने की कोशिश करते हैं। और बिल जब रेफाई जो इनका बड़े एक्सपर्ट है इसके वो कहते हैं आज के दौर का ये सबसे बड़ा क्वेश्चन है ये। एक तो ये उसी से रेवोलेशन की हकीकत क्या है? वही क्या है? इस तरह से वह वही क्योंकि हमारा पूरा प्रॉफ़ेटहुड का बुनियाद तो इसी पे है ना कि खुदा के रसूल के पास एक वही आई है। उस वही के ज़रिए सारी शरीयत आई है। तो ये वही या उसका जो रेगुलेशन का जो पूरा कांसेप्ट है वो कैसे वसूल होती है वो एक इंटरनल प्रोसेस है। एक्सटर्नल प्रोसेस है। सर सैयद ने कहा कि एक इंटरनल प्रोसेस है। यह कोई ऐसा नहीं कि बाहर से आकर के कोई वही देता हो यह वह और कुरान इसलिए देखते हैं कि कुरान वाली डिबेट कि वह मुतला के यहां भी वही थी कि आया वो इटरर्नल है या ये अशरा पोजीशन नहीं ये थी कि वो इटरर्नल है वो कहते थे कि नहीं वो तो क्रिएशन है कुरान के बारे में वहां भी वो बात चल रही थी मौजूदा दौर में ये चीज आज भी इसी तरह से इस पे बहस है बल्कि आज ज्यादा बहस पैदा हो गई है तो प्रॉफेटहुड की पूरी हैसियत को मौजूदा मॉडर्न इसमें पैराडाइव में उसको समझना इंटरप्रेट करना फिर उसके जरिए पूरा जो दीन मिला है मुसल है वो तो रसूल्लाह के जरिए मिला है यानी प्रोफेट की जात इसलिए एक बुनियादी सोर्स बन जाती है कि अब वही जरिया है रसूल्लाह की की जात कि उसके जरिए अब हम जो है अपना वर्ल्ड व्यू भी बना रहे हैं क्योंकि कुरान भी उन्हीं के जरिए हमें मिला है इसलिए भी उनकी हैसियत आती और फिर सबसे बढ़ के जो बात हमने पहले बताई थी वो इस्लामिक शरिया आज जो मॉडर्न दुनिया में जितनी बहस हैं वो इस पे भी नहीं है। यानी खुदा के वजूद या प्रोफेटहुड पे बहुत बड़ी तादाद कहती है बिल्कुल रसूल हो सकते हैं। उसमें कोई वो नहीं है। जिस तरह से बिबिक प्रोफेट को हम मानते हैं इनको भी मान सकते हैं। लेकिन जो इस्लामी शरिया को की बुनियाद पे जो हमारा दावा है कि ये इस्लामी शरिया रहती दुनिया तक के लिए है। हर सोसाइटी के लिए है। हर तरह के चैलेंजेस को रिसोंड करने के लिए है। और अब यही एक अब एक फाइनल जो है हमारे यूनिवर्सल क्लेम यूनिवर्सल क्लेम है। और ये फाइनल अथॉरिटी के बाद कोई और वो सिखों का गुरु या किसी और का वो भी हो सकता है। अगर मतलब वो तो फिर नेवर एंडिंग हो गया ना कि वहीं क्यों रुका और वहीं रुकने के बाद जो तहयात जब तक आखिरत नहीं आती तब तक क्यों वैल्यू और अब सवाल ये है कि ये जो इस्लामी शरिया एक खास टाइम एंड स्पेस में उसका कंस्ट्रक्शन हुआ यानी खास स्पेस एंड टाइम में हुआ यानी एक अरब के अपने माहौल में हुआ। उसकी अपनी जरूरत थी। उसका अपने वो थे। लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है कि जो खास टाइम एंड स्पेस में जो चीजें तैयार हुई हो। अब वो हजारों साल तक के लिए और पूरी दुनिया के लिए हर जगह के लिए वो वैलिड है। ये बहुत बड़ा क्वेश्चन उठता है। उठाया जाता है। इसलिए एक बहुत बड़ी तादाद खुद मुस्लिम स्कॉलर्स की जो हिस्टोर इस्म के तहत के कांसेप्ट के तहत वो ये कहते हैं मुस्लिम स्कॉलर्स बहुत बड़ी तादाद है। वो कहते हैं कि नहीं ये जो चीजें हैं वो खास एक अरब माहौल के तहत है। तो इसलिए अब इनका कोई रेलेवेंस नहीं रहा। वो इस तरह के मसाइल को हल करने की कोशिश करते हैं। यानी जो भी हम ह्यूमन राइट्स के हवाले से बात करते हैं मिसाल के तौर पे और जो भी हमारी बहस अखलाक के हवाले से वुमस राइट के हवाले से जो भी एक वो है वो कहते हैं कि नहीं वो एक खास टाइम स्पेस पे है। इसलिए अब उसका कोई वैल्यू नहीं रहा और इनवैलिड हो गया। इसलिए अब हमें इन तमाम चीजों में एक मॉडर्न सेुलर कॉन्टेक्स्ट में हमें नए सिरे से ये सारी चीजें फॉर्मुलेट करने की जरूरत है। सिर्फ इतनी बात के खुदा है प्रॉफिट है। लेकिन कुरान की जो का जो ये सारे अहकामात बताए गए हैं ये वो अब वो इरिलवेंट हो के रह गए। उसकी अब कोई जरूरत बाकी नहीं रही क्योंकि एक खास इसमें तो ये एक बहुत बड़ा चैलेंज सामने आता है और ये सब इल्म कलाम का मौजू है जैसे देखिए शाह ने कहा कि शाह्लाह को अभी मॉडर्न इसका जो चैलेंजेस का सही अंदाजा नहीं था वो अपने जिस इसमें रह रहे थे अगर यूरोप में काफी तब्दीलियां आ चुकी थी नए ट्रेंड्स नए स्कॉलर्स फिलॉसफर पैदा हो रहे थे लेकिन जाहिर है मुगल पीरियड में उसको यहां उसका ट्रांसमिशन नहीं हुआ इसलिए शाला को इतना अंदाजा नहीं था लेकिन लेकिन शाहगा में ये मान करके चल रहे हैं। शुरू ही में ये बात लिख रहे हैं कि मौजूदा दौर में इस्लामिक शरिया को रशनलाइज करना जरूरी है। शरीत मुस्तफिया उनका जुमला है। उसको आज हम बुरहान के फ्रेमवर्क में हम लाना चाह रहे हैं। उन्हीं का जुमला है बुरहान यानी रैशन प्योर रशलिटी डेमोंस्ट्रेटिव प्रूफ में उसमें लाना है हमको। और ये पूरा जो उन्होंने फिर हकामात जो उन्होंने हर हर चीज एक तो पहले हिस्से में उन्होंने वर्ल्ड व्यू जो इस्लाम का है उसके मुताबिक उसको रशनलाइज करने की कोशिश की लेकिन उसका जो सेकंड पार्ट है बालगा उसमें इन अहकामात को यानी शरीयत को एक तो पहले शरीयत की फिलॉसफी बताई उन्होंने शरीयत क्यों जरूरी है क्या है ह्यूमन नेचर से उसका क्या ताल्लुक है क्यों ये दावा हम कैसे कर सकते हैं कि हर सोसाइटी के लिए वैलिड है हमेशा के लिए ये है ये सारी बहस शू लौटाते हैं और और फिर उसको अपनेप तौर पे नमाज रोजा से लेकर के हज जकात कुर्बानी जो हमारी चीजें हैं उन तमाम चीजों को एक एक रैशन इंटरप्रिटेशन देते हैं वो उसका अपने तौर पर मेटाफिजिक्स और फिर वो ऐसा लगता है कि एक जगह आ गई रादर देन बिल्कुल मेटाफिजिक्स एंड बिल्कुल इसी के हवाले से जब आप बोलते हैं कि कलाम को एक दर्जा देते हैं आप अगर हम इस्लामी उलूम की बात करें इस्लामिक साइंस की बात करें तो इल्म कलाम जो है वो खुद गज़ाली के नजदीक वो हदीस तसीर दीगर जो उल है फका इन तमाम में इल्म कलाम की हैसियत सबसे ऊपर आ जाती है एक डोमिनेंट पोजीशन उसको मिल जाती है वो इसलिए के खुद गजाली के बकल के सबसे पहले या ये इल्म कलाम है जो एक फाउंडेशन बनाता है वो अकली तौर पे खुदा और रसूल के वजूद को और उसकी उसकी हकीकत को साबित करने का जरिया है। तो इसलिए जो है दूसरे जो उलूम है खुद जो है फका और दूसरी चीजें वो इल्म कलाम के बाद आती है। यानी अल इल्मुल आला जो है जो बड़ा इल्म है वो इस तरह से इल्म कलाम है क्योंकि वो पूरे एक उनके बगल की जो है वो पूरे मुतकि पूरे यूनिवर्स को सामने रख कर करके बात करता है। इसमें एक यूनिवर्सल आईडियोलॉजी वो देता है, क्रिएट करता है। इस तरह से एक फाउंडेशन मजहब के लिए बनाता है। तो आपकी किताब का इस बार जो बड़ा मौजू है वो फख खुद भी है कि उसका एक हिस्सा है। कलाम के बाद अब दूसरे तौर पे हमने में को किस तरह से हमें आज इज्तहाद की बुनियाद पे हमें उसको एस्टैब्लिश करना है और एक तरह से एक्टिवेट करना है। लगता है कि फिक जो है जिस तरह से इल्म कलाम में कुछ तब्दीलियों की जरूरत है क्योंकि हम तब्दीलियों की जरूरत की बात कर रहे हैं तजदीद की तो इसी तरह से जो फिक वाला जो हिस्सा है उस फिक में भी तजदीद की रिकंस्ट्रक्शन की जरूरत है और उसमें जो एक बुनियादी अहमियत जो है वो इ्तहाद की वो कहीं लगता है जिसका मातम तो इकबाल ने भी किया लोगों ने किया तो हमें इ्तहाद को मौजूदा दौर में उसको री अप्लाई करने की जरूरत है। आपने थोड़ी देर पहले जो हमारी बात हुई इाला इजाफा तो अगर हम अब फिक की रिकंस्ट्रक्शन की बात करेंगे तो ये पैराडाइम क्योंकि अहले सुन्न जमा या फिर ओवरऑल जो टेक्सचुअल हमारे पास जो जखीरा है उसमें जो भी चीजें हैं रिवायत हैं सारी चीजें हैं। वो कैसे फिट होता है? वो कैसे फिट होगा? एक तरफ स्पेशली जो रिमूव क्या किया जा सकता है? ऐड क्या किया जा सकता है? ठीक है? रिस्टोर किया गया। बहुत सही। देखिए ये तो वैसे हमने बुनियादी तौर पे इल्म कलाम के हवाले से ये एक पैराडाइम बनाया है हमने। दोनों में फर्क ये है कि देख इल्म कलाम तो प्योरली एक रेशनल एक्सरसाइज का नाम है। शाह व्लाह कहते हैं कि मैं इल्म कलाम के हवाले से तो मैं एक इज्त रवैया रखता हूं। और मैं किसी का मुकलिद किसी की तकलीद करने वाला नहीं। हम इसलिए के जो है उनका अपना जुमला है कि यह मंसूस नहीं है। यानी यह कोई कुरान और हदीस से दोद चार की तरह से इसके उसूल डिराइव नहीं है। इसके बारे में कोई रिलीजियस टेक्स्ट नहीं है। मंसूस नहीं है वो। लेकिन जहां तक की बात है फिक की इससे एक अलग सी चीज है। अलग सी चीज ये है कि इसका जो की जो फाउंडेशन है इसकी जो बुनियाद है वो वही पे है। यानी ये इसकी इल्म कलाम की अगर अक्ल पे है बिल्कुल इसलिए इसका नाम भी कलाम है। फिक जो है वो तो अंडरस्टैंडिंग ऑफ दीन का नाम है। तो दीन की अंडरस्टैंडिंग में बुनियाद जो चीज है वो है टेक्स्ट और टेक्स्ट में गोया के कुरान। तो इसकी जो फाउंडेशन है फिक की वो उसूल फिक है जो कुछ हम प्रिंसिपल्स बनाते हैं जिसको हम इल्म उसूल फिक कहते हैं। उसूल फिक के जो बुनियादी मुकदमात हैं वो दो तरह के हैं। यानी कुछ तो अकली है। उसमें भी इल्म की बहस मिसाल के तौर पे आती है। इल्म हम कैसे हासिल करते हैं? और किस तरह से उसको जांचते हैं? कितना वैलिड है? कितना वैलिड नहीं? इल्म के सोर्सेस वगैरह वगैरह सारी की सारी चीजें वगैरह-वगैरह। कुछ चीज़ तो वही है जो कलाम वाली आ जाती है। लेकिन जो हम पूरी शरीयत पे जो एक पूरा उसका एक स्ट्रक्चर बनाते हैं, ढांचा बनाते हैं उसमें बुनियादी तौर पे जो उसकी उसमें जो रोल होता है वो जिसको हम कहते हैं उसके लिए टर्म कि इल्म में नकली का होता है। यानी इल्म दो तरह का हम कहते हैं कि एक अकली और एक नकली। तो नकल का मतलब यह है कि उसमें बुनियादी काम जो है नसूस का होता है। रिलीजियस टेक्स्ट का होता है। कुरान और साबित सुन्नत का होता है। तो इस तरह से फका की जो चीजें हैं उसमें फिक्स चीजें बहुत ज्यादा है। यानी कुरान को मिसाल के तौर पे एक बुनियादी उसूल ये है कि हमारी जो शरीयत जो के जो सोर्सेस है वो क्या है? तो उसमें कुरान की जो अपनी पोजीशन है उसमें कोई दूसरी बात नहीं की जा सकती। कुरान को बुनियादी सोर्स के की हैसियत हासिल है। हदीस को सेकंड सोर्सेस की उसके बाद हासिल है। उसके बाद तीसरी चौथी वगैरह वगैरह तो कुछ चीजें हदी इसमें फिक के हवाले से बिल्कुल फिक्स है। और पूरी हमारी जो बहस उसूल फिक की है और फ की वो इसी पे है कि एक चीज अगर कुरान में मोहकात में आ गई है या मुव सुन्नत में एक चीज आ गई है। रसूल्लाह के अमल में वो चीज आ गई है। तौर पे आ गई है या अमल के तौर पे आ गई है। अब वो हमारी शरीयत का हिस्सा है। बिलकुल एकदम अब वो फिक्स है। इस पे बात नहीं होगी किसी हालत में कि नमाज़ इस इस वक्त में क्यों पढ़ी जाती है? इतनी ही रकातें क्यों पढ़ी जाती है? जकात इतनी ही लोगों को क्यों दी जा सकती है? क्यों दूसरों को नहीं दी जा सकती? क्योंकि ये दो दो चार की तरह से हमारे टेक्स्ट में यानी नस से साबित है। तो अब इस पे कोई अकल की जरूरत नहीं है। ये फका का अपना जो है। हां लेकिन तो जो बात होती है उसकी तजदीद की उसमें ये बात है कि ये वाला जो पार्ट है इसको कोई तजदीद नहीं हो सकती। उसको रिकंस्ट्रक्ट नहीं किया जा सकता। अब इस दोबारा बहस नहीं हो सकती। क्योंकि यह मनकूलात है नकल पे यानी टेक्स्ट पे बेस्ड है। अलबत्ता उसका वो पार्ट जिसका ताल्लुक जो है नस से नहीं है तो उसमें इ्तहाद होगा। हमारे उलमा जो है उनके सामने ये दोद चार की तरह से ये है कि इ्तहाद वहां होता है जिसमें नस ना हो। रिलीजियस कोई टेक्स्ट ना हो। जिसमें कोई न जिसमें इ्तहाद सिर्फ उसी उन मसालों में मिसाल के तौर पे आज की जितनी भी साइंटिफिक डिस्कवरीज हुई है या मेडिसिन के मैदान में अब जाहिर है किडनी ट्रांसप्लांटेशन ब्लड डोनेशन की बात तो कुरान हदीस में होने से रही तो आज जो ये सारे के सारे जो बहस जो चल रही है चाहे वो मेडिसिन इकोनॉमिक्स पॉलिटिक्स तो इसमें जो है हम जो फका को क्या करना है उसप ज्यादा गुफ्तगू है कि उसमें हम किस तरह से इ्तहाद का जो एक कासेप्ट खुद खुद रसूल्लाह ने दिया है। दो चार की तरह थे हमारे इस साबित है और रसूल अल्लाह ने इस पर खुशी का इज़हार किया कि अब के एक दौर ऐसा आएगा कि कुछ ऐसी इशज़ रहेंग कि जिसमें ना तो कुरान की आयतें होंगी ना रसूल्लाह की सुन्नत होगी। रसूल्लाह ने पूछा कि फिर जो है तुम क्या करोगे? तो कहा कि फिर हम कयास करेंगे इजहाद करेंगे। तो रसूल अल्लाह बहुत ज्यादा खुश हुए। तो यह वाला इजहाद कि अब जहां पे कुरान और हदीस खामोश हो जाते हैं तो वहां पे किस तरह से हमें किन उसूलों के तहत उसको हमें रिकंस्ट्रक्ट करना है और आज के दौर में सबसे बड़ा चैलेंज इसको लेकर के है। उसको लेकर के नहीं है कि जो नकल पे जो बेस जो चीजें हैं उसको कोई प्रूफ करने का ये कोई चैलेंज नहीं है। यह तो बात समझ आती है कि जैसे टेलीफोन के हवाले से, लाउडस्कर के हवाले से, फोटोग्राफी के हवाले से यह चीज है कि भाई इसकी बहुत ज्यादा कोई मेंशन नहीं है। बहुत ज्यादा कोई मेंशन नहीं है कि आगे क्या टेक्नोलॉजी होगा। लेकिन इसमें दो चीज़ हैं जो आपने बात की। एक तो ये बात की कि जो उस वक्त इश्तहाद किया जा सकता था। डिसीजन लिया जा सकता था वो इंस्टीट्यूशनल प्रैक्टिस और वो इंस्टीट्यूशनल मोबिलिटी उस प्रोसेस को कि भ आज ये कोई चीज इन्वेंट हुई है इस चीज को अभी दो दिन बाद इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं उसको समझने की सलाहियत आपका आर्गुमेंट ये है कि जब वो नॉर्मेटिव हो जाता है ऑलरेडी फिर आप उसको अंदर खाने एक्सेप्ट कर लेते हैं इसको थोड़ा सा आप इस प्रोसेस को समझते हो हो यह रहा है आपने खुद ही कुछ वाज़ कर दिया हो यह रहा है पिछले 200 सालों से तकरीबन खास तौर से लेकिन 20 वी सदी में ये जो नए इशज़ आए नए मसाइल आए नई इन्वेंशन इजादात वगैरह हुई तो पहले उसमें बड़ा ही एक रिजर्वेशन हजिटेशन रहा कैसे इसको क्या किया जाए क्या ये वो हो फिर आ तौर से रवैया ये रहा कि जब वो चीज सोसाइटी का हिस्सा बने जाती है और वो एक इनविटेबल गया पार्ट बन जाती है कि उससे अब कोई राहे फिरार नहीं है तो फिर वो हमारी एक तरह से फका का हिस्सा बन जाता है। यानी वह हमारी फसा की इसला में उसको कहते हैं के अगर एक उम बलवा हो जाए एक इस्तिला है बलवा की वो चीज़ इतनी प्रिवेलिंग है इतनी फैल गई है और जिससे अब हम जैसे फोटोग्राफी है कि अब उससे तो कोई ऐसी सोसाइटी कोई ऐसी इस्लामिक हुकूमत भी नहीं बन सकती जहां टीवी ना हो जहां कैमरे ना हो फोटो ना खींचे तो अब जो है जो मुब्तला बही है मुतला बेही का मतलब ये है कि जिसको ये हालात पेश आ चुके हैं जो जो इंडिविजुअल है जिसके लिए अब जो है उससे उससे वो बाहर नहीं आ सकता। तो गुंजाइश निकल जाती है कि भाई ठीक है वो अब कभी ऐसा लगता था कि साहब जो है जैसे आपने बताया लाउडस्कर या बैंकों में ख के पैसे रखना और इस तरह के 50ों सैकड़ों चीजें फोटोग्राफी वगैरह वगैरह बाद में वो इसके ये जो ये जो सशन है तो हम ये समझते हैं कि ये सॉल्यूशन काफी नहीं है। इस तरह से कोई सशन नहीं निकलता। हमें बुनियादी तौर पे ये उसूल इ्तहादी बुनियाद पे बनाना पड़ेगा। मिसाल के तौर पे एक उसूल है बुनियादी तौर पे के उफ आदाद की तब्दीली सोशल कस्टम्स की तब्दीली की वजह से हकाम में तदीलियां पैदा होती है। तो अब एक उसूल के तहत हमें उसको आज के दौर में अप्लाई करना पड़ेगा कि बहुत सारी चीजें तदी तब्दील हो गई। या ये हुआ कि साहब जो है जरूरत जो है वो हराम चीजों को भी ममू चीजों को भी जायज कर देती है। जब जरूरत की अब इस पर लंबी चौड़ी बहस होगी जरूरत क्या है? कैसी है? कितनी हद तक जरूरत? तो हमें कुछ बुनियादी उसूलों को सामने रख कर कर करके इस तरह से उसको अप्लाई करना पड़ेगा मौजूदा दौर में ताकि जो है हम आज के बड़े इश्यूज को कवर कर सके और बड़े उसका हल हम पेश कर सके। यानी सिर्फ और सिर्फ यानी चंद मसलों में एक फतवा दे देने से या कोई हल पेश कर देना यह इसका हल नहीं है। बल्कि हल यह है कि पूरी इस्लामी शरीयत को सामने रखते हुए इसके मिजाज को सामने रखते हुए हमें खासतौर से जिसको मकासिद शरिया कहा जाता है। द हायर ऑब्जेक्टिव ऑफ़ शरिया। शरीयत का मकासिद क्या है? उन मकासद को बुनियादी तौर पर सामने रखते हुए फिर उसको आज हमें इ्तहाद के फ्रेमवर्क में उसूल ऐसे बनाने पड़ेंगे जिनको अप्लाई कर करके आज के बड़े मसाइल को हम हल कर सके तो इसकी मेथडोलॉजी क्या होगी आप इ्तमाइयत की बात करते हैं इसमें या इसकी इंस्टिट्यूशनल लॉजिक क्या होगा आजकल जैसे हमने कहा मुकासिद शरिया आजकल इस पे बहुत ज्यादा डिबेट है बड़ी बहस है पिछले 50 साल 60 साल से खासतौर से ताहिर इबने आशूर में मुकास शरिया इस्लामिया लिखी और उसको जो है उन्होंने एक तरह से उसूल फिक में एक एक वो चीज थी जो मकासिद शरीयत वाली बिल्कुल दबी हुई थी। अब उसको उभार कर करके उन्होंने सामने लाने की कोशिश की और अब इस पे इतनी बड़ी डिबेट है कि सैकड़ों किताबें इस मौजूद है। यानी देखना चाहिए कि कोई जो शरीयत है उसका बुनियादी मकसद उसके पीछे क्या है। जब हम अब उसके जासिरदा की बिल्कुल वो भी एक्सपर्ट है इसके काफी। अभी जासदा जो है कुरान की मकासद शरिया के फ्रेमवर्क में वो हां वो एक तफसील लिख रहे हैं लेकिन इसके जो बड़े जो काम किए मकासद शरी इस्लाम ताहिर बिन आशूर ने तो वो काम बहुत ज्यादा आगे बढ़ा एक ही चीज नहीं है खुद हमारे यहां जो इ्तहाद का जो पूरा का पूरा तसवुर है आ तो उस इ्तहाद को भी तकरीबन जो है पिछले हजार सालों से एकदम बिल्कुल पूरा डिस्काउंट होकर करके रह गया है। यानी ये हुआ कि अब ये चंद स्कूल ऑफ़ थॉट बन गए हैं। अब जो कुछ भी है उनका एक तरह से तयशदा जो फ्रेम वर्क है हम इससे बाहर नहीं जा सकते। अब इससे एक बहुत बड़ी तंगी हो गई। अगर आप ये कहे कि साहब जो है देखिए ये हदीस है। सहाबा का अमल है। ताबेन का अमल है। हम ऐसा कर सकते हैं। लेकिन कहा जाएगा कि नहीं इसलिए नहीं कर सकते कि ना ये बात अबू हनीफा ने कही ना इमाम शाफ ने कही ना इमाम मालिक ने कही ना इमाम अहमद ने कही। हालांकि दूसरे जो है बड़े फका मौजूद थे या ताबेहीन थे जो ऐसा करते थे इसको सही समझते थे। ऐसी कोई मिसाल जिसमें एग्जांपल के तौर पर यूज़ कर सके। जी मिसाल के तौर पे तलाक का मसला है। तीन तलाक का चारों उलमा चारों जो स्कूल ऑफ थॉट है उसमें ये कहा गया कि जो मिसाल के तौर पे तीन तलाक जो है एक सिंग की तीन तलाक बिल्कुल वो वो तलाक हो जाती है नाफिज़ हो जाती है। अब इसको ये चारों लेकिन इस मुत्तफ है। लेकिन इससे हट कर कर करके बाद में इब्न तैमिया ने कहा कि नहीं साहब यह सही नहीं है क्योंकि अब्दुल्ला बिन अब्बास की एक रिवायत है वो कहते हैं कि हजरत अबू बकर के जमाने में और हजरत खुद रसूल्लाह के जमाने में ऐसा था कि ये जो तीन तलाक यानी एक सीटिंग की जितनी भी तलाक है वो एक ही तलाक होती है। तो अब ये है आम तौर से जैसे हमारे यहां जो हदीस है उसको इख्तियार कर लेते हैं। क्योंकि उनके चारों इमामों का मसला कुछ नहीं है। लेकिन ये जो चार स्कूल ऑफ़ थॉट वाले वो कहते हैं चारों इमामों से हटी हुई बात है। तो इस तरह के मसाइल खास तौर से बहुत सारे मामलात में पिछले इसमें हमने शायद कुछ बताया था। कहना है कि हिस्टोरिकल पीरियड में अल्लाह के रसूल के बाद 200 300 साल के बाद जो भी इसी प्रोसेस ऐसी बनी कि उसमें ये तीन तलाक को हज़त उमर ने नाफिज़ किया। और भी चीज़ें जैसे वो जो उस टाइम पे इश्तेहाद हुआ वो इश्तेहाद एक तरीके से उसमें बदल गया फिक्स्ड फ्रेमवर्क में और फिर उसके बाद बस वो रिपीट जिसे तकलीद मिल गया इसी उसूलों को इन्हीं एग्जांपल को जो उन्होंने कहा उसी फ्रेमवर्क में बिल्कुल बिल्कुल तो हमें देखिए दो तीन सतहों पे काम करने की जरूरत है इस हवाले से एक तो यही है कि जो नसूस हमारे सामने है जो पूरा ये है ऐसा नहीं समझा जा सकता के ये हमारे फका की जो कोशिशें थी वो बिल्कुल फिक्स हैं और उनसे इख्तलाफ नहीं किया जा सकता बल्कि वही कुरान है वही सुन्नत है वही सहाबा की सीरत अकवाल है और वो सारी की सारी चीजें बाद की नस्लों को भी हासिल है उनको भी ये हक होता है कि वो उन चीजों को समझने की कोशिश करें यानी ये किसने कह दिया कि आ के कि जितनी भी शरीयत की समझने की का जो काम है एक तरह से वो सारा पहली नस्लों के लिए तय हो चुका और आने वाली नस्लों के लिए अब कोई काम नहीं रहा ये तो एक अजीब सी बात होगी। तो इसलिए ऐसा नहीं है कि अब बाद की नस्लों का काम सिर्फ तकलीद है। नहीं बाद की नस्लें भी उसी तरह से उनहीं कुरान और सुन्नत को सामने रख कर करके इ्तहाद कर सकती है। क्योंकि वो सारा टूल्स सारा सारी चीजें उनके पास भी वही है। बल्कि बल्कि मुख्तलिफ हमारे जो मिसाल के तौर पे खासतौर से हमली जो उलमा का ये मुस्तकिल मौक है कि बाद के दौर में इ्तहाद के सोर्सेस ज्यादा हमारे पास अवेलेबल है। और आज हम देखें तो हमारे पास जितने ज्यादा सोर्सेस हैं वो उस वक्त इ्तहाद के सोर्सेस उनके पास नहीं थे। उतनी कलेक्टेड नॉलेज इतनी कलेक्टेड सारी सारी मीडिया वजूद आ चुकी है। आप हदीस को देखना चाहे तो आपको सिर्फ एक क्लिक करने की जरूरत है। सारी हदीसे एक साथ आपके पास आ जाती है। उसके अलावा अब्दुल जितने सबा इकराम के अकवाल हैं उनके सारे के सारी चीजें छप चुकी है। मिसाल के अब्दुल्ला इब्न अब्बास, अब्दुल्ला इब्न मसूद और हजरत अली सबकी फका की किताबें सारे अखवाल छप चुके हैं। पहले वो हजारों किताबों में बिखरे हुए थे। तो एक मुजहिद के पास वो सारी की सारी चीजें नहीं थी। इस तरह से आप देखें आज दुनिया जिस तरह ग्लोबलाइज वर्ल्ड में ये हो गई है कि इजमा वगैरह यानी जो कंसेंस होता है और ऑनलाइन इतना ऑनलाइन इतना आप आसानी से कर सकते हैं बिल्कुल पहले वो नहीं था कौन कहां रह रहा है अब कैसे आप एक शहर में कर लें और दूसरे अप्लाई करना आसान ना रहे ग्लोबल उस तरह से बिल्डिंग भी अब पोटेंशियली पॉसिबल है पॉसिबल है बिल्कुल टेक्नोलॉजी स्पीड और ये सारी चीजों लोग मिल रहे हैं उठ रहे हैं अवेलेबल जो रिसोर्सेज हैं वो बिल्कुल दोदो चार की तरह से हमारे फिंगर प्रिंट के नीचे मौजूद है। और उसके अलावा जो है उसके अलावा जो है हम इस तरह के एक दुनिया में रह रहे हैं कि एक दूसरे से इतना जुड़े हुए हैं कि हम किसी भी मसले पे किसी की राय किसी तरह से बहस इसलिए आज के दौर में इ्तमाई इ्तहाद की बात बहुत ज्यादा शिद्दत के साथ हो रही है। और हम जो देखते हैं कि इस्लामी शरीयत को लेकर के बहुत सारे मसाइल हैं और जिसको लेकर के खुद इस्लामी शरीयत भी एक मजाक बनती रहती है। बहुत सारे ऐसे फतावे सब आते हैं सऊदी से मिस्र से जिस बड़ी हंसी उड़ती है। बड़े मजाक बनते हैं। उसकी वजह ये है के हम जो है हमने जो है अपने आप को इस तरह से इ्तहादी जो एक इ्तमाई इ्तहाद की कोशिश होना चाहिए और जिसमें आज के सारे इसको मौजूदा अवेलेबल रिसोर्सेज को सामने रख करके जो हमारा एक कलेक्टिव जो एफर्ट होना चाहिए वो नहीं हो रहा है। नहीं हो रहा है तो मसाइल हल नहीं हो रहे हैं। नहीं हो रहे हैं तो अब ऐसे वैसे बहुत सारे उलमा मुफ्ती आकर के अपने तौर पे इधर-उधर की बातें कहते हैं। ऐसे वैसे कहते हैं मीडिया में वो चीज उछलती है। एक मजाक बनता है। हम तो कोई एक ऐसा इंस्टीट्यूशनल अपेरेटस नहीं है कि जहां पे इवन अ एक जिसे कह सकते हैं मेथोडोलॉजिकल रीजनिंग और एक मेथोडोलॉजी इवन इश्तहाद करने की या उसका एक एनवायरनमेंट प्रोड्यूस हो। तो उससे जो क्लेम भी कर रहा है तो वो उसके ऊपर क्योंकि कोई ऑब्जर्विंग बॉडी या यू नो सेट ऑफ इंटेलेक्चुअल्स नहीं है तो वो भी हाथ से निकल रहा है। तो इसी का कॉन्टेक्स्ट में जब आप ये बोलते हैं शुरू में कि भ कुछ चीजें ऐसी हैं नुसूस से रिलेटेड हैं जो कंप्लीटली यू नो फिक्स्ड है जिनके बारे में क्लियर ऑब्जेक्टिव अंडरस्टैंडिंग है। क्लियर ऑब्जेक्टिव स्टेटमेंट्स हैं कुरान में और वो चीजें जिनके बारे में नहीं है। वो खासतौर से इबादत हैं। इबादत हैं। ये मैं ज़हन में रख खास तौर से यानी इबादत का जो पूरा का पूरा जो सिस्टम है जो सारे रूल्स रेगुलेशन है लेकिन मामलात में भी लेकिन मामलात हैं पॉलिटिक्स है तो उसमें तो तब्दीलियां पैदा होंगी जाहिर है लेकिन पूरा पॉलिटिकल ढांचा तब्दील हो गया देखें वो बिल्कुल 30 साल के बाद हम देखते हैं 40 साल के बाद तब्दील हो गया इसलिए कि जैसेजैसे सोसाइटी तब्दील हुई पूरा पिटिकल ढांचा तब्दील हो गया और फिर उसी तरीके से मामलात में जो है सारी जो है तजारत और सारे सारे मामलात सोसाइटी के फॉर्म में तब्दील होंगे। हालांकि पता नहीं इस वाले एपिसोड का मौजू नहीं है। लेकिन क्योंकि मेरी अपनी जो रीडिंग्स हैं और उसमें जो मैं कोशिश कर रहा हूं पढ़ने की जो वह 23 साल है अल्लाह के रसूल ससल्लम की उसमें अगर आप मक्की दौर में मर्केंटाइल सोसाइटी एक तरीके का कैपिटलिज्म कास्ट हायरार्की ट्राइबलिज्म फिर सिटी स्टेट है वो जैसे आज नेशन स्टेट है तो सिटी स्टेट और नेशन स्टेट में बॉर्डर का तसवुर शेयर हेरिटेज हिस्ट्री माजी फिर वो कि भाई जब एक्सपेंशन हो रहा है तो फिर मदीने में जाके आप अपना ऑर्डर बना रहे हैं। फिर मदीने से जब मक्का फतेह हो रही है तो दो सिटी हो गई। तो नाउ इट हैज़ बिकम अ लार्जर स्टेट ओरिएंटेड वो फिर फतेह हो रहा है। तो इवन जितने भी स्टेट फॉरमेशंस वो एक एक तरीके से बहुत सारी चीजें प्रिमिटिव असले मक्के से नहीं है। मक्के की अपनी सुरते हाल तो ये थी पहले से लेकिन खुद रसूल्लाह के अपनी कोशिश या अपना इफर्ट ये नहीं था कि वो एक कोई मक्के में रहते हुए किसी इस यानी एक स्टेट की फॉर्मुलेशन की कोशिश करें या उसको चाहें या उसको कोई वो ये सब कुछ जो है सारा प्रोसेस जो हुआ है यह मदीने में जाकर के हुआ। नहीं वही आर्गुमेंट है मेरा कि उससे हमें सब कुछ मिल रहा है कि मतलब अगर हमारे पास नहीं भी है कंडीशनलिटीज आपकी जो कंडीशनलिटी ज्यादा अ माइनॉरिटी या एबसीनिया वो सारी चीज़ तो आपके पास इवन आज भी जितने तरीके के जितने कन्फ़िगरेशंस हैं उसकी पॉलिटिकल फिलॉसफी पॉसिबल है। मेनली पॉसिबल है यानी मक्के को भी शामिल करें। आपने देखिए एक बहुत बड़ी बात है जो फिलोसफी की बात कर रहे हैं ना हुआ ये है मिसाल के तौर पे क्योंकि रसूल ने स्टेट मदीने में बनाया शेप दिया अब जो हमारी पूरी पिटिकल फिलॉसफी जो बनी वो सिर्फ मदनी मॉडल को सामने कर के बनी अब जब मुसलमान 20वीं सदी में 20 सेंचुरी में ये हुआ कि अब जो है मुसलमान पूरी दुनिया में बिखरे और माइनॉरिटीज के तौर पे मुख्तलिफ कंट्रीज का हिस्सा बने तो अब जो है वो वो सारी बड़ी-बड़ी इशज़ सामने आई। उसके नतीजे में अब कुछ फॉर माइनॉरिटीज़ यानी फुल अकलियात वगैरह की चीज़ आई। अगरचे बहुत बड़ी तादाद अभी भी वो चीज़ हज़म नहीं होती। ये मक्की मॉडल के तहत है। तो कहने का मतलब है कि रसूल्लाह की अगर पूरी जिंदगी एक मॉडल है। जाहिर है। जाहिर है तो मक्की जिंदगी भी इतनी ही वैलिड है। इतनी ही हमारे लिए एक बड़े मॉडल की हैसियत रखती है। लेकिन हमारी पॉलिटिकल फिलॉसफी में मक्की मॉडल बहुत पीछे रह गया। पिटिकल फिलोसफी में भी मैं क्योंकि इसी पेपर और मेरा काम है। इवन इकोनॉमिक पॉलिसी में, इवन सोशल पॉलिसी में, इवन ह्यूमन राइट्स का डिस्कोर्स जो वहां पे हो रहा है, वह सारा जो वह है कि जब आप एक बार स्टेट बना लेते हैं, तो एज अ मेजोरिटी या फिर रूल ऑफ़ लॉ जब आपके हाथ में है, तो वह क्योंकि आपने वही देखा जब तक कॉलोनियल पीरियड नहीं आया, तो आपका पूरा जो ट्रेडिशन है, वह एक तरीके से एक बायस है उसमें इन पर्टिकुलर पीरियड की तरफ। तो उससे जो फिक वजूद में आ रही है जो सारी इसका मतलब यह नहीं है कि ट्रेडिशन में मवाद नहीं है तो इसी वजह से तो फिर लोग वापस जा जा के वो चीजें निकाल इस बहुत अच्छा काम किया यासीन मज़र सिद्दीकी साहब ने ये जो है यासीन मज़र सिद्दीकी साहब जो अलीगढ़ के प्रोफेसर थे अभी चंद साल पहले उनका इंतकाल हुआ कई दर्जन किताबें उन्होंने सीरत पे लिखी है प्रोफेट के तो उसमें जो है मक्की उस नवी पे उन्होंने बहुत ही जबरदस्त उनका काम है इस वो पढ़ने की चीज है अच्छा तो इससे जो रिलेट पूरा ये मामला के जो बात हो रही थी फिर वुमेन का जो स्टेटस है इनहेरिटेंस है या जिटस है नॉन मुस्लिम आपकी खास तवज्जो है और जस्टिस एक मुकासदशरिया के पर्सेक्टिव से कि आपकी ये खास तवज्जो है ये तीन चार क्योंकि ये ऐसी चीजें हैं जिसप बहुत ज्यादा कंट्रोवर्शियल डिबेट्स होती है तो इनको अगर टेस्ट बना तजदीद या रिकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है तो क्या बोला गया जैसे फॉर एग्जांपल औरतों के हुकूक और उनकी जो फॉर एग्जांपल जो उनका स्टेटस है उसके हवाले से क्यों बोला गया? क्यों रीजनिंग में अगर था तो इशू था? क्या उसमें रिवीजन बाद में सोचा जाए? उसका टेक्स्चुअल जिसे कहते हैं एनालिसिस। वो कहां से टेक्स्ट से ही आ रहा है। अगर वो टेक्स्ट से नहीं आ रहा है तो फिर वो वही बात हो गई कि भ आप इश्तेहाद के नाम पे तजद्दुद कर रहे हैं। सही। अगर वो इश्तेहाद है तो फिर उसको किस तरह से तो वो सही। हमने देखिए तीन इशज़ को उठाया है। खासतौर से बड़ी लंबी गुफ्तगू तो इस पे नहीं की जा सकती। लेकिन बहरहाल एक तो इस्लामी पॉलिटिकल फिलॉसफी है जो हमने कहा कि इसमें बहुत ज्यादा मेजर यानी तब्दीली और तजदीद की जरूरत है। मेजर लेवल पे तदीद की जरूरत है कि पूरी पॉलिटिकल फिलॉसफी एक खास अहद में तरह से पीरियड में तैयार हुई है। इसलिए उसको बहुत ही ज्यादा दूसरे नंबर पे हमने ये जो लिया है वो वुमस राइट का इशू है। हमारे इस्लामिक ट्रेडिशंस में जिस तरह से औरतों को देखने की कोशिश की गई है यानी औरत की जात को उसकी पर्सनालिटी को जिस तरह से देखने की कोशिश की गई है और उसकी बुनियाद पे जिस तरह से रूल्स बने हैं जिस तरह से हमारी इस्लामिक फिक ने जिस तरह से फिर औरत की हैसियत को पर्सनालिटी को डिफाइन करते हुए जो जो जिस तरह से रूल सामने में आए हैं। तो हमने खासतौर से इस पे बहुत तसील के साथ गुफ्तगू की है कि इसमें जो है इस बात की जरूरत है कि इस पूरे जो फ्रेमवर्क को चेंज किया जाए और वो इस तरह से है के मिसाल के तौर पे लंबी बहस है जाहिर है के ये महसूस किया गया के बुनियादी जो फ्रेमवर्क है हमारे हमारी इफ्तका का वो ये के औरत की जो हैसियत है वो मर्द के मुकाबले में हैसियत रखती है और वो सबनेट है उसके बिल्कुल ताबे है और उसके पास अकल की मर्द के मुकाबले में कमी है अकल है तो उसकी जो पूरी शख्सियत अकल और और पूरी पर्सनालिटी के बारे में जो बनती है कि वो मर्द के मुकाबले में उसकी हैसियत बिलकुल निस हैसियत रखती है असल में हुआ यह है कि जो है इसीलिए आप [गला साफ़ करने की आवाज़] देख मिसाल के तौर पे ब्लड मनी जो है दत तो मर्द के मुकाबले में औरत की सिर्फ निस्फ है। अच्छा गवाही वगैरह के बारे में खुद कुरान के है कि औरत की मर्द के मुकाबले में निस्स है। अच्छा एक जगह तो है लेकिन जैसे ब्लड मनी की बात है। ये कुरान में नहीं है ऐसा लेकिन ये कि जो है मर्द के मुकाबले में उसकी निस्स है। अच्छा अकल के ताल्लुक से कुछ हदीस में इस तरह की बात है। लेकिन तो उस बहुत तफसीली बात है हमारी के हदीस में ये बात कही गई है कि औरत नासातुल अकल है नासुल अकल है आधी अकल रखने वाली है तो हमारे फका में ने इस पे काफी गुफ्तगू की और ये बताने की कोशिश की जो हैकि औरत के पास एक फुल फ्लेज अकल नहीं है अकली सलाहियत नहीं है तो उसको जो है उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता इस तरह के मामलात में और उसके जो भी इस्लामिक सोसाइटी में जो भी ऐसे काम जिसमें इसमें यानी ऐसे ऐसी फोर्स ऐसी जिम्मेदारी रिससिबिलिटी उसको नहीं दी जा सकती। तो इसीलिए आप देखते हैं कि पॉलिटिकल इसमें उससे उसको बिल्कुल ही दूर रखा गया है। एकदम यानी एक तो एक ना सिर्फ ये कि वो हेड ऑफ़ द स्टेट नहीं बन सकती क्योंकि उसके बारे में एक अलग से बात है। उसकी भी बात हमने उठाई है। लेकिन ये के दूसरी जो भी इस तरह की बड़ी जिम्मेदारियां है औरत वो औरत पे उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इसका जो दो बुनियादी बात है कि यानी वो मर्द की शख्सियत के मुकाबले में इसकी शख्सियत की हैसियत हो इक्वल नहीं है उस तरह से। दूसरी बात ये है कि खुद उसकी अकली जो कैफियत है वो भी मर्द के मुकाबले में बिल्कुल कम है। आधी है। तो ये मौजूदा दौर में इसने बहुत ज्यादा बहस पैदा की है। बहुत ही ज्यादा बहस की है। आप ये देखें कि ये जो हार्ड कोर फेमिनिज्म जो पैदा हुआ है उसमें यही सब जो चीजें उनके नजरियात बने। ऐसा नहीं है कि हम उससे इनफ्लुएंस हो के कोई ट्विस्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। यह बिल्कुल ऐसी बात नहीं है। देखना यह चाहिए कि खुद शरीयत में कितनी क्या गुंजाइश है। तो मुख्तलिफ स्कॉलर्स ने जासिदा ने खुद इस पे बहुत ज्यादा बातें की है। मुख्तलिफ लोगों ने बातें की है। कि अब जो है इस बात की जरूरत है कि जरा सा यह देखने की कोशिश की जाए कि औरत को उस को हम मेडिल में जिस तरह से फुखा ने देखा था जिस फ्रेमवर्क में देखने की कोशिश की थी वह क्या था और हम आज उसको किस तरह से देख सकते हैं। हमने इसमें यह बात की है कि बुनियादी तौर पे औरत के बारे में जो तसवुर ग्रीक फिलॉसफी में था यानी खुद प्लेटो और मुख्तलिफ जो वो थे अरिस्टोटल भी औरत को ये लोग वो हैसियत नहीं देते थे। प्लेटो कहता था कि हम जो है औरत से पैदा हुए हैं। ये हमारे लिए शर्म की बात है। इस तरह की बातें खुद यानी ग्रीक फिलोसफी में औरत को बहुत ही एक तरह से इन ह्यूमन कम दर्जे में देखा कम दर्जे में देखने की कोशिश की गई है काफी। तो हमारे यहां जो ग्रीक फिलोसफी जो आई है उसका एक बहुत ही जो बुरा जो इमैक्ट पड़ा है वो औरत के बारे में और आपने तो अभी रुद है आप देखेंगे कहीं भी तो इब कहता है कि औरत बच्चे की पैदाइश में औरत का सिरे से कोई रोल ही नहीं होता है। सिर्फ मर्द का रोल है। ये इब्न का कहना है कि सिर्फ मर्द का रोल है। औरत का कोई रोल नहीं है। वो पैसिव इतनी है कि अपना कोई चीज बच्चे को पैदा करने में खुद उसकी अपनी कोई एक्टिविटी नहीं होती है। ये किस बेसिस पे कह दिया उन्होंने यह वही फिलोसफी अगर बिल्कुल देखा जाए तो सारा रोल ही औरत का है मर्द का तो हां लेकिन वो कहते हैं कि नहीं इस बच्चे को वो जो पूरा जो प्रोसेस होता है जो मर्द और औरत का जो आपस में उसमें मर्द ही की वजह से ये पॉसिबल होता है वो सिर्फ एक खाली डब्बा हुआ जाने एक तरह से प्रोवाइड करती है हां कुछ ऐसे ही बिल्कुल एक खाली डब्बा उससे ज्यादा उसका अपना कोई एक्टिव रोल नहीं होता तो यह सब सारी चीजें वो थी जो ग्रीक फिलॉसफी से हमारे यहां आई और औरत के बारे में खास तौर से ग्रीक फिलोसफी ने बहुत ज्यादा मुतासिर किया। उसकी पूरी पर्सनालिटी को जो समझने की कोशिश की गई वो उस इसमें समझने की कोशिश की जो आप कुरान और हदीस के और फिर हम जो कुरान हदीस में जो बात हम कर रहे हैं दूसरा जो एंगल है इन चीजों को समझने का वो समझने का एंगल ये है कि मिसाल के तौर पे रसूल्लाह ने जो ये कहा के औरतें नाकसातुल अक्ल है नास यानी आधी अक्कल रखने वाली है तो ये देखना चाहिए कि क्या ये किसी एक लीगल कॉन्टेक्स्ट में ये बात कहने की कोशिश की गई थी। आज इस पे यह सवाल है और हमारा भी है कि नहीं अगर आप उसको कॉन्टेक्सुअलाइज करने की कोशिश करें तो रसूल्लाह ससल्लम ने जो बात कही थी वो इस पैरा में थी ही नहीं जिसको बुनियाद बना कर करके एक पूरा फकी ढांचा बनाया गया है कि क्योंकि औरत के पास अकल नहीं है तो वो यह भी नहीं कर सकती। यह भी नहीं कर सकती। इस पे यह भी भरोसा नहीं किया जा सकता। यह भी नहीं किया जा सकता है। यह भी नहीं किया जा सकता। या इसी तरह से युसुफजा भी मिसाल के तौर पे औरतों के बारे में यह बात है कि क्या वो हेड ऑफ़ द स्टेट हो सकती है कि नहीं? रसूल्लाह की एक हदीस है के जो उसके बारे में ईरान के में जो नहीं यानी जो ससानी पीरियड में जो कसरा के इंतकाल के बाद उसकी बेटी बनी थी तो रसूल्लाह ने कहा था कि ऐसी कौम कैसे फलाह पा सकती है? उसको कैसे कामयाबी मिल सकती है कि जो किसी औरत को अपना जो है रूलर बना ले और अपना वो बना ले। तो इस बुनियाद पे फका का ये तसवुर बना कि औरत किसी इस्लामिक स्टेट की सरबराह नहीं हो सकती। हेड नहीं बन सकती। लेकिन मिसाल के तौर पे आज जो बातें आई है युसुफावी बड़ा नाम है। युसुफाबी है मोहम्मद अल गजाली है। इजिपशियन बहुत बड़े स्कॉलर है। युसुफी का तो इतना इमैक्ट है। आपको भी अंदाजा होगा। वह कहते हैं कि नहीं यह एक खास सुरते हाल में बात कही गई थी वो खास ईरानियन इसमें कि वहां जो है औरत को वो वाली हैसियत दे दी गई थी जो एक तो उस तरह से कि यानी उसको वो हैसियत हासिल थी के एक खुदाई दर्जे में उसको हैसियत मिल गई थी और एक उसको एक ऐसा एब्सोल्यूट पावर उसको हासिल था कि वो जो चाहे फैसला करे जिस तरह से फैसला करे लेकिन अब मौजूदा दौर में डिसीजन मेकिंग एक बडी होती है। वो मिलकर कर करके फैसला करती है। वो किसी एक के पास वो अब्सोल्यूट पावर नहीं होता। ये बात युसुफ कजावी नहीं कहते। हत्ता मौलाना अशफ अली थानवी तक कहते हैं। उनप भी ऐतराज हुआ कि अब औरत के साथ वो वाला मसला नहीं है कि जब पहले जिस तरह से होता था कि एक डिग्री जारी किया और वही फॉलो होगा। बल्कि आज जो का जो पूरा मॉडर्न पॉलिटिकल सेटअप है उसमें वो उसका एक हिस्सा होती है। तो इसलिए औरत भी बन सकती है। तो हम ये समझते हैं कि ये जो इज्तहाद या तजदीद का जो हमारा फ्रेमवर्क है उसमें इन चीजों को इंगेज इन चीजों को सोचने दोबारा रीथिंक करने की जरूरत है। इसमें ये बात नहीं है कि दोद चार की तरफ से कोई फैसला कर दिया गया हो कि बिल्कुल जो है ये बात है और ये बात है। इसमें सिर्फ और सिर्फ गौर फ़िक्र करने की दावत दी गई है कि यह सारी चीज़ वह है जिसकी बुनियाद पे हमारी जो इस्लामी फ़िक्र है, इस्लामिक थॉट है उसको इन सवालात से इंगेज होना चाहिए और उसको इस तरह से इस कॉन्टेक्स्ट में इन मसाइल को सोचने और इसका हल पेश करने की कोशिश करनी चाहिए। बस ये है इसका मकसद। उस फ्रेमवर्क के हिसाब से अगर देखा जाए तो क्योंकि आज की डेट में जो खवातीन है वो भी नौकरियां नौकरी पेश है, कमा रही है, घर चला रही है। तो इनहेरिटेंस के हवाले से जो क्लासिकल डिबेट है क्योंकि औरत के ऊपर से बर्डन नहीं है हाउस होल्ड को चलाने का इस वजह से उसको इनहेरिटेंस में भी इक्वल राइट नहीं है एक तरह की लोगों ने ये सब सवालात उठाए लेकिन उनके पास ये मालूम नहीं है कि इनहेरिटेंस में मुख्तल दूसरे हवाले एक बेटी की हैसियत से आप देखते हैं कि बेटे के मुकाबले में कम मिला लेकिन दूसरी तमाम हैसियतों में आप जोड़ करके देखें तो मर्दों से ज्यादा उसको मिलता है यानी उसके पास रिससिबिलिटीज बर्डन बहुत कम है उसके मुकाबले में जो मुख्तलिफ हैसियतों से जो औरत को इनटेंस मिलता है वो मर्दों से ज्यादा है। हालांकि सारी कफालत सारी जिम्मेदारी मर्दों पर डाली गई है। औरत पे ये बर्डन बिल्कुल ही नहीं डाला गया है। इस्लामिक इसके ऐतबार से औरत को अपना अपना घर अपनी जिंदगी चलाने के लिए भी सोचने की जरूरत नहीं है। ये सब मर्द की जिम्मेदारी है। लेकिन पॉइंट ऑफ व्यू तो ये है ना कि जमाना बदल गया है। जमाना बदल गया है। जिसमें बहुत सारी जो खवातीन है वो जॉब करती है फिर बच्चा भी पालती है फिर सारी तो फिर उसके बाद जब ये कंडीशन बदल गई जैसे ये दूसरे हवाले से जब ये बात की जा रही है तो वो सेम जो रीजनिंग है वो यहां पे क्यों अप्लाई ना बड़ा क्वेश्चन तो है ये यानी मिसाल के तौर पे कुरान में ये बात कही गई है कि मर्द कवाम है यानी उनको एक तरह के सस्टेनर या उनको अपनी एक उसकी हैसियत हासिल है तो और ये कहा गया है कि वो उनको फज़लत कुछ हासिल है और फज़लत की बुनियाद ये है के वो औरतों पे खर्च करते हैं। यानी उसकी माली जिम्मेदारी वो उठाते हैं। और इसलिए मर्दों को ये फज़लत दी गई है। तो जो आपकी बात क्वेश्चन ये वैलिड है कि अब मौजूदा दौर में औरतें खुद कमा रही हैं। वो खुद घर चलाने की पोजीशन में है। बहुत सारे इसमें तो वही ज्यादा कमा रही है। मर्द कम कमा रहे हैं। वो फैमिली चला रही है। अब औरतों की क्या पोजीशन बनेगी? किस तरह से उसको देखा जाएगा? लेकिन उसके बावजूद यानी यह वो चीजें जिसको कुरान में दोद चार की तरह से एक बात कही गई है उसकी हैसियत और एक इज्त ऐसे मसाइल में जो कुरान की आयतों से हटकर के दोनों इक्वल नहीं है। जैसे वो पहले जो बात हो रही थी कि हाफ अब जैसे जैसे हमने कहा कि जो है कुरान के हेड ऑफ़ द स्टेट हो सकती है या नहीं हो सकती। का कुरान का कोई इशू नहीं है। इससे लेना देना नहीं है। नहीं जैसे फाइनशियल कॉन्टेक्स्ट में हाफ का फिर आपने बोला कि हदीस के हवाले से ये बात रखी गई कि भ आधी अकल या बाद में तो फिर वहां पे भी फिर वो चैलेंज आ जाता है कि भ आधी अकल वाली बात भी कुरान से इसका ताल्लुक नहीं है। तो मैं एक बात जो है समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि देखें कुरान में दो एक चीजें हैं। जैसे गवाही से मुतालिक या इनहेरिटेंस से मुतालिक ये एक बड़ा इशू नहीं है। जैसे हमने अभी आपने जिसकी बात की कि उनकी फजीलत वगैरह की बात यानी देखा जाए तो ये बात ऐसी बात सारी दुनिया में तकरीबन चल रही है कि फैमिली लाइफ में किसी एक की ऐसी पोजीशन होना जरूरी है कि वो के उसको जो है यानी अगर आपस में तनाजा हो आपस में डिसीजन लेना हो तो कोई एक की अगर हैसियत सिर्फ एक को जरा सा अगर ऊपर रखा जाए तो वह मर्द की पोजीशन बनती है। यह ऐसे ही सिस्टम यानी फैमिली सिस्टम को चलाने के लिए ऐसा नहीं हो सकता कि सबको एक ऐसे इख्तियारात हो कि जो चाहे जैसे चाहे वो करे और हर की चीज जो है नाज़ की जाएगी। तो और मर्द को इस बुनियाद पे जो एक हैसियत दी गई है वो हैसियत रहेगी बरकरार। यानी वो हैसियत डलट बिलकुल नहीं हो जाएगी। और कुरान यही कहना चाहता है। यानी फैमिली लाइफ में जहां मर्द भी अपना काम कर रहे हैं। औरत भी वो कर रही है। मर्द ज्यादा कमा रहा है या कमा रहा है। अगर ना भी कमाए तब भी वो जो आप कह रहे हैं कि अगर ना कमाए तो उसकी वो पोजीशन हो जाएगी। औरत के मशवरे तो हर जगह चलेंगे। लेकिन किसी एक को कुछ ऐसा बा इख्तियार बनाना पड़ेगा। ये एक देखा जाए तो इसके बगैर वो ढांचा फैमिली वो बनता नहीं है कि आप जो है किसी एक को ऐसा तस्लीम ना करें। तो ये फैमिली के लिए एडजस्टमेंट के लिए इस तरह की बात इजाफी तौर पे मर्द के साथ रखी गई है कि अगर वो ना कमा रहा हो तो ऐसा नहीं है कि अब उसकी वो वाली हैसियत खत्म हो जाएगी बल्कि उसकी हैसियत बरकरार रहेगी। उसके बावजूद इसका ताल्लुक अकल से नहीं है या उससे नहीं है। आपने ये जो धम्मी जो नॉन मुस्लिम्स के ऊपर जो टैक्स है या जो उसका स्टेटस है ये हिंदुस्तान के हवाले से बहुत बड़ी डिबेट रही है। स्पेशली जब अकबर ने जो जिजिया हटा दिया वो और फिर बाद में जो औरंगजेब है उन्होंने जिया लगाया तो एक इस्लामिक स्टेट अगर होता है तो उसमें जो नॉन मुस्लिम होता है जो स्पेशली अहले किताब की कैटेगरी से बाहर है जिम्मी स्टेटस तो वैसे उनको दिया गया उसके बाद उसमें एनएफसी स्कूल में रीजनिंग हुई कि नहीं और भी जो बहुत सारी कम्युनिटीज है सोसाइटी है उनको भी इस कासेप्ट के वििन रखा रखा जा सकता है कि जिसमें प्रोटेक्टेड माइनॉरिटी अगर वह प्रोटेक्टेड माइनॉरिटी अगर वह अपने ड्यूस दे रही है या टैक्स के तौर पे तो उसको हिस्टोरिकली एक पॉइंट के बाद वो देखा गया कि भ वो एक डिमिनिंग या डिग्निटी इक्वल डिग्निटी स्टेटस विद इन यू नो स्टेट वो शायद चैलेंज होता है और जब हिंदुस्तान में आज मुसलमान क्राइसिस को फेस करते हैं तो ये बोलते हैं कि हमें दूसरे दर जगह शहरी बनाया जा रहा है। हमें हमारे इक्वल सिटीजनशिप का राइट है। तो यह जो एक पूरी डिबेट है दुनिया में कि आपकी अंदर हिपोक्रेसी है एज अ कम्युनिटी। एक तरफ आपको जहां पे भी दूसरी जो हुकूमते हैं चाहे वो सेकुलर हुकूमतें हो। इस्लामी हुकूमते ना है जिस भी तरह की चाहे वो कोई हिंदू राष्ट्र बनाना चाह रहा हो कोई बुद्धि बुद्धिस्ट राष्ट्र बनाना चाह रहा हो कोई लिबरल वर्ल्ड व्यू से या कम्युनिस्ट वर्ल्ड व्यू से अपने स्टेट को चलाना चाह रहा हो वहां सब जगह पे आप एक इक्वलिटी और इक्विटी की बात करते हैं पैरिटी की बात करते हैं लेकिन जब भी ये बात आती है कि नहीं हमारा अपना निजाम होगा तो फिर एकदम से आपका जो वर्ल्ड व्यू है उसमें आप हमने खासतौर पे इसी पॉइंट को ज्यादा उठाया इसके तहत यानी नॉन मुस्लिम्स जो माइनॉरिटीज है इन द मुस्लिम कंट्रीज उनके हवाले से हमने यही बात ज्यादा उठाया है हमने और उसप बात करने की कोशिश की है। तो एक तो ये है कि हमने ये बताने की कोशिश की हम ये समझते हैं कि ये जो पूरा जो प्रोटेक्टेड माइनॉरिटी वाला जो पूरा पैराडाइम है जिम्मी वाला जिम्मा वाला ये जिम्मा वाला अब जो ये तस्सवुर है ये खत्म हो गया। ये पूरा का पूरा अब ये इस ये रेलेवेंट नहीं रहा। इसलिए कि अब मौजूदा जो पूरा पिटिकल सेटअप है दुनिया का उसमें यह बराबर के शहरी हैं। यह एक मुश्तका शरीयत है। चाहे मुस्लिम हो या नॉन मुस्लिम हो उनकी जो सिटीजनशिप हमारी इस्लामिक फक्ट में उस मेडिवल एज में जिस तरह का पॉलिटिकल सेटअप था उसमें जिस रिलीजन की बुनियाद पे एक सोसाइटी रन कर रही थी तो उसमें ये तय किया गया था के जो उस रिलजन से हट के होंगे एक तरह से उनकी सिटीजनशिप हाफ होती थी तो जिम्मा का वाला जो तस्सवुर था वो एक कंप्लीट सिटीजनशिप वाला तसवुर मिडिव एज में कहीं भी नहीं था यह अह अगर प्रॉफ़िट की जो लाइफ उसके बाद फिर मिडिवल फिर अब आप यह जो पूरे टाइम पीरियड में जो जिम्मा या जिम्नी स्टेटस है वो क्या कंटीन्यूअसली सेम रहा है अब मॉडर्निटी आते-आते या उसमें भी हां मडिवल ऐज में हम ये देखते हैं कि जो जिम्मा का जो पूरा कांसेप्ट रहा है वो इसी तरह से रहा है। प्रॉफिट के टाइम से प्रॉफिट के टाइम से अच्छा जिम्मा के तसवुर के ताल्लुक से वैसे ये रखना चाहिए जिजिया और जिम्मा के ये कोई इस्लाम ने शुरू नहीं किया यानी जिजिया का तसवुर तो पहले से था इतना ज्यादा कि खासतौर से ईरानी जो सिविलाइजेशन में ये लोग जिया का लफज़ भी नॉन अरबिक है वहां से वो जिया लेते थे ये वो पहले से चला आ रहा था कुछ गज़ियत या कोई लफज़ था जिसको जिया कुरान में यूज़ किया गया है तो ये ये चीज़ जो है जिया खास तौर से दूसरी सिविलाइजेशन से और ये जो जिम्मा वाला जो पूरा का पूरा कांसेप्ट है वो अपनी तफसील के साथ जिस तरह से आप ये देख रहे हैं इस्लाम के साथ लगा लेकिन दूसरी सिविलाइजेशन में भी अदर रिलजन वाले के लिए इक्वल राइट का तसवुर नहीं था। मैं ये कहना चाह रहा हूं। अब जो इस्लाम आया और और जो कानून बना रसूल्लाह के जमाने में सबा के जमाने में आगे बढ़ा तो उसमें ये तसवुर तो पाया जाता है लेकिन हम ये समझते हैं कि इस तरह की जो के जो कानून इस्लाम में है इस तरह का कानून पिटिकल सेटअप सोसाइटी के बदलने की वजह से पिटिकल सेटअप के बदलने की वजह से बदल जाते हैं। अब कुरान में यह कहा गया था कि जब तुम उनसे लड़ कर करके जिहाद कर करके उनसे तुमको तुम उनको मलूब कर लो उन पर गालिब आ जाओ अब तुम उनको जो सिटीजन बनाओ तो उनसे कुछ टैक्स लो अब मौजूदा दौर में क्या हुआ मौजूदा दौर में वो इल्लत इस तरह से खत्म हो गई कि अब जो मिसाल के तौर पे जो कॉलोनियल पीरियड के बाद अब जो मुस्लिम जो कंट्रीज आजाद हुई है उनको आजाद करने में मुस्लिम नॉन मुस्लिम सब के सब शामिल है तो इक्वल लाइफ मिलनी चाहिए उनको। तो इसलिए अब वो वाली चीज की साहब जो है जो मेडिव एज में था वो चीज अब मौजूदा दौर में जिस तरह से वतनियत के कांसेप्ट ने एक तो आपने खुद ही बताया कि अब जो है दुनिया वो वाले तसवुर से बाहर आ गई जिसको हम दारुल इस्लाम दारुल हरम वाला तस्सवुर कहते हैं कि साहब जो इस्लाम का हाउस ऑफ़ इस्लाम और हाउस ऑफ़ क्या कहते हैं के नॉन इस्लाम वो तो वो ख़ हो गया पूरा का पूरा। यह जो जिम्मा वाला कासेप्ट तो उससे खासतौर से उससे ताल्लुक रखता था उस पूरे दौर में। अब आज के दौर में देखें कि 40 45% तो खुद मुस्लिम्स जो है वो नॉन मुस्लिम कंट्रीज में रह रहे हैं। तो यानी एक तरफ तो बताया कि इसलिए जिम्मा किया तसवुर इनवैलिड हो गया। लेकिन दूसरी तरफ अगर आप इसको जिम्मा जजिया लेते हैं और उनको एक प्रोटेक्टेड माइनॉरिटी कहते हैं तो आपको भी फिर नॉन मुस्लिम कंट्रीज में उस हैसियत को कबूल करना चाहिए। लेकिन आपने खुद बताया कि ऐसा तो मुमकिन नहीं है। बिल्कुल। यानी आप नहीं चाहते कि आपको दूसरी जगह पे वो सिटीजनशिप मुकम्मल ना मिले और इक्वल राइट्स आपके ना हो। आप जब वहां चाहते हैं कि आपको फुल राइट्स मिलने चाहिए। उसका भी तसवुर यह है कि आपको भी अपने यहां उसको फुल राइट्स देने चाहिए। इसलिए अभी जो है कहीं भी जिम्मा और जिया का तकरीबन इस इत्तफाक हो गया उलमा के नजदीक हां आज जिम्मा और जिया वाली बात नहीं है खत्म तो ये जो पूरा हमारी डिस्कशन है के एक तरह से हम लोग रिवाइवल की जब बात कर रहे हैं कलाम की में जो जरूरत है मोबिलिटी की इ्तहाद की और मकासद शरिया की बात हुई मकासिद है तो मकसद है वो मकसद क्या उसका जो मकसद का जो यू नो जो सबसे इंप्लसिट प्रिंसिपल होगा इस्लामी फ्रेमवर्क में वो क्या होना चाहिए? आप अल की बात करते हैं, जस्टिस की बात करते हैं तो जस्टिस का भी एक अपनी अंडरस्टैंडिंग है इस्लाम की कुरान की ट्रेडिशन की। वो ऐसी चीज है कि इक्विटी आप बोल रहे हैं। एक हिंदू बोल रहा है। एक ब्राह्मण बोल रहा है। एक दलित बोल रहा है। एक बुद्धिस्ट बोल रहा है। एक लिबरल बोल रहा है। वो सेम वर्ड का मुख्तलिफ इमेजिनेशंस है। तो इसी तरह से जब हम इस्लाम की बात कर रहे हैं आज की डेट में और उसका प्रिंसिपल एक डिराइव करने की कोशिश कर रहे हैं जो इस पूरे थिंकिंग प्रोसेस को और इस मोबिलिटी को डिराइव और मोबिलाइज कर सकता है। तो वो आप असल में क्यों सोचते हैं? और आज की डेट में जो इंडियन मुस्लिम्स का क्राइसिस है या ग्लोबल मुस्लिम्स का जो क्राइसिस है चाहे वो गज़ा में हो चाहे वो वेस्ट में हो चाहे वो इवन वो कंट्रीज है जहां मुसलमान अपने आप जिसे कहते हैं कि मेजोरिटी है लेकिन उसके बावजूद वहां पे कोई प्रोग्रेस उस तरह की नहीं दिखती है जो एक तरीके की इस्लामिक जिसे कहते हैं मुल्क में दिखनी चाहिए बेहतरी होनी चाहिए थोड़ा ऊंचनीच का तसवुर कम होना चाहिए वहां जकात शुरू और वो जो पूरा इस्लामिक इकोनमिक पैराडाइम है जो इनकलिटी को कम करना चाहता है तो असल फ्रेमवर्क क्या होगा इसमें जो उसका उसका यू नो मोटिवेटिंग प्रिंसिपल क्या होगा उसका ड्राइविंग प्रिंसिपल क्या होगा आपके हिसाब से हमने बताया के [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारा जो दीन का तसवुर है वो अपनी जगह दोद चार की तरह से बुनियादी तसवुर वेल डिफाइंड है बिल्कुल वाज़ है लेकिन हमारी जो इस्लामी फिक है हमारी जो इस्लामी शरीयत है मौजूदा दौर में खासतौर से इस शरीयत के हवाले से उसके रोल को आज की मॉडर्न दुनिया में शरीयत को किस तरह से उसी से सारी चीजें फिर बसी जुड़ी हुई है यानी इ्तहाद वगैरह की और सारी पॉलिटिक्स और सारी चीजें इस्लामी शरीयत को हमें मौजूदा दौर में इस्लाम यानी दीन के बुनियादी मकासिद को सामने रखते हुए दीन के बुनियादी उसूलों को सामने रखते हुए कुरान और सुन्नत के बुनियादी फ्रेमवर्क में बुनियादी फ्रेमवर्क में रहते हुए ले और दूसरी तरफ जो है अपनी ट्रेडिशन से से बाहर ना जाते हुए अपनी ट्रेडिशन में रहते हुए इस बात की कोशिश करना है कि किस तरह से उन उसूलों को उससे ड्राइव किए हुए उसूलों को आज की दुनिया में हम किस तरह से इंप्लीमेंट करें। हमारी जो सुरते हाल है वो यह कि जो हमारी जो इस्लामिक ट्रेडिशन है उसका पूरा कासेप्ट और उसी में हम फिर इस्लामिक शरिया को हम देखते हैं वो बहुत ही रिडंडेंट है बहुत ही जामिद हो गया है। हमें इस बात की जरूरत है कि उसको जरा सा ज्यादा हमें उस पूरे इसको यानी हमारी जो इस्लामी रिवायत इस्लामी फिक्र जो लगता है कि एक तरह से जमूद की शिकार हो गई है। उसको ज्यादा से ज्यादा थोड़ा एक्सपेंड करने की जरूरत है। आज के मौजूदा जो अवेलेबल टूल्स हैं उनको सामने रखते हुए आज के के यानी आज के वोकबरीज और आज के नजरियात को सामने रखते हुए उसमें जो है हमें इस बात की जरूरत है कि इस पूरे एक इंटेलेक्चुअल एक्सरसाइज इस तरह से की जाए कि हम आज के बड़े इशज़ का बड़े मसाइल का हल पेश कर सके। यानी दो बातें बुनियादी है। थोड़ी सी ज्यादा बात थोड़ा सा फैल गई। थोड़ा सा वो हो गया। बुनियादी बातें दो है। एक तो ये कि जो है ट्रेडिशन का तसवूर हमारे यहां बहुत ही ज्यादा एक मुंजमिद सा हो गया और ऐसा लगता है कि इस्लामी ट्रेडिशन का मतलब होता है बिल्कुल फिक्स। कि जो कुछ हो गया पहले से तयशदा है उसके मुताबिक। बस सिर्फ हमें अब इस वक्त अमल करना है, इम्लीमेंट करना है। इस पूरे तसवुर को जरा सा ज्यादा रिथिंक करने की जरूरत है। ट्रेडिशन जो है वो ट्रेडिशन अपने दौर के मुताबिक उसमें बहुत सारी तब्दीलियां आती रहती है। उसको रिकंस्ट्रक्शन उसको रिकंस्ट्रक्ट करना पड़ता है। वो अपने आप में बहुत ही जामिद और रिडेंटेंट नहीं है। वह खुद अपने दौर से बहुत सारी की चीजों को अखज़ कर करके वो एक अपना एक मुतहरिक वजूद रखती है। बहुत ही मुतहरिक वजूद लेकिन ऐसा लगता है कि वो मुतहरिक नहीं बहुत ही गैर मुहर इनक्टिव हो के रह गई है। तो उस उस रिवायत को बनाने में कंस्ट्रक्ट करने में खुद तमाम नस्लों का अपना एक रोल होता है। ऐसा लगता है कि अब मौजूदा नस्ल का उसमें मौजू जनरेशन का उसमें कोई रोल नहीं रहा। दूसरा जो तसवुर जो हमारे यहां है जो जिस पर हमने इ्तहाद की बात की वो लगता है कि बिल्कुल जो है कहीं दूर हो गया है। रसूल्लाहम ने की हदीस के मुताबिक भी इस्लामी शरीयत को इस्लामिक थॉट को मौजूदा और आइंदा तमाम ज़मानों के लिए जो चीज मुतिक बनाती है मुतिक मैं इसलिए कह रहा हूं इकबाल की इस्तलाह है जो उनके छठा खुदबा है वो इ्तेहाद पे है जिसके लिए वो मोबिलिटी की इस्तलाह इस्तेमाल करते हैं तो वो यह स्पिरिट जो इ्तहाद की है वही दीन को मुतहरिक रखता है लेकिन इ्तेहाद ऐसा महसूस हुआ कि वह बिल्कुल पूरा का पूरा तस्सवुर खुद बल इकबाल के कि एकदम रुक गया ठप सा हो गया। मौजूदा जनरेशन की बहुत बड़ी जिम्मेदारी ये है कि वो इन दो शोबों में खासतौर से काम करने की कोशिश करे और और इस तरह से जो है मौजूदा जमाने के चैलेंजों को समझे और दूसरी तरफ अपने तरास अपने इस्लामिक ट्रेडिशन को सामने रखते हुए इन मसाइल को देखने और उसका हल पेश करने की कोशिश करें। बहुत शुक्रिया डॉक्टर वारिस मजरी साहब आपकी दूसरी किताब पर भी अच्छी गुफ्तगू रही और यह समझने की का मौका मिला कि एक तरफ तो न्यू कलाम न्यू थियोलॉजी नए का मतलब लोग समझते हैं कि भाई समथिंग बिल्कुल आउट ऑफ जिसे कहते हैं न्यू ओरिजिनल पिछले उससे कोई ट्रेडिशनल कनेक्शन नहीं है। न्यू का मतलब कई बार यह भी होता है कि चीजें एक्सपेंड कर रही है तो उसको इस्लामिक फिक्र और उसकी जो आइडियोलॉजिकल बैंडविथ है उसके सामने रखते हुए उसको एनालाइज करना जो एक जमाने में ग्रीक फिलोसफी के साथ हुआ उसका कुछ छोड़ देना कुछ रख लेना वो रख लेना जो एक्चुअली आप ही की बात दूसरी वोकबलरी में की जा रही हो लेकिन वो आप पहले से मौजूद है तो आप दूसरे लेवल पे के दुनिया में जो बहुत सारी चीजें ऐसी भी हो रही है क्योंकि एक्सपैंड कर रही है चीज़ हो रही टेक्नोलॉजिकल एडवांसमेंट हो रहा है। सोशियोलॉजिकल चेंजेस आ रहे हैं। तो वहां पे जो न्यू रियलिटीज़ इमर्ज हो रही है उसमें वही उसूल जिनकी वजह को जिनको इस्तेमाल करके जिन मकासद को सामने रखते हुए वो अलग-अलग वक्त में जो टारगेट सेट किया गया है कि भाई सोसाइटी ऐसी होनी चाहिए। तो अल्टीमेटली आपकी रीजनिंग को आपके स्ट्रक्चर को इस तरह से इवॉल्व करना है सामने कि आप उन टारगेट्स को अचीव कर पाएं और वो टारगेट्स में अदल है, जस्टिस है, इक्वलिटी है, इक्वलिटी का हमारा एक अपना एक एक तसवुर है कि जिसमें ड्यूटी बाउंड भी है कि भ इक्वलिटी का मतलब ये नहीं है कि भ ये क्लास और ये कप और ये कंप्लीटली इक्वल है। मतलब हर चीज में हर जात की अपनी डिफरेंसेस भी हैं। तो यहां पे इक्वलिटी का मतलब यह है कि भई उसके डिफरेंसेस को सामने रखते हुए उसको इक्वल ओपोरर्चुनिटी उसकी जो उसके वजूद की जो सलाहियत है उसको निखारने की जो पूरी की पूरी प्रोसेस है और उसके लिए जो वजूद में लाने का निजाम है और उसमें अदल और जस्टिस और राइट्स और हुकूक तो ये सारी जो वोकैबलरी है जो मॉडर्निटी और ये सारी चीजें ऐसे पेश करती है कि जैसे इससे पहले ये चीजें हुई ही ना हो। वो हमारे यहां 1400 साल के लिटरेचर में यही बातें हुई। अल्लाह के रसूल सल्लम के व में बल्कि ज्यादा थी क्योंकि वो 23 साल में ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड दौर एक साथ जल्दी जल्दी गुजरे जो हमारा एक बहुत इंपॉर्टेंट फाइंडिंग जिसमें मेरी अपनी खुद की बहुत ज्यादा इंटरेस्ट और रिसर्च है कि उन 23 साल को फिर से सीरतु नबी के हवाले से रिवज़िट करते हुए उस पूरे 23 साल को से रिकंस्ट्रक्शन करने की जरूरत है। क्या चीज है वो पिटिकल थोलजी हो चाहे वो इकोनमिक सिस्टम हो वो सारी चीजें जितनी भी सारी हमारी ट्रेडिशन में मौजूद है मौजूद है उनको रिवजिट करना उनको करना और यहां पे री्लाई री अप्लाई करना उनको एक्टिव करना जो चीज पैसिव हो गई है जिनका कॉन्टेक्स्ट कई बार ऐसा होता है कि भ कोई एक चीज होती है जो ज्यादा हावी हो जाती है तो लोग सोचते हैं वही है बस आपके प्लेट में बट देयर इज अ बफे जिसमें बहुत सारी चीजें अवेलेबल है तो बहुत शुक्रिया जजाक अल्लाह खैर आपसे हम फिर मिलते रहेंगे और इन टॉपिक्स पे कई बार डीप डव लेने की कोशिश करेंगे। इ्तहाद अपने आप में, मखासद अपने आप में, उसूल फिक अपने आप में ये जितनी चीज़ हैं कहीं शाह व्लाह पे ही मुझे लगता है कि अपने आप में पूरा एपिसोड हो सकता है। हो सकता है इकबाल पे अपने आप में एपिसोड हो सकता है। बहुत शुक्रिया। बहुत शुक्रिया आपका भी।
Companion article
Dr Waris Mazhari has spent much of his scholarly career asking an uncomfortable question: why did a civilisation once responsible for major advances in philosophy, law and science come to see itself as intellectually stagnant? Returning to Nous Podcast for a second, extended conversation, Mazhari used the release of his new book, "Fikr-e-Islami ki Tajdeed" (The Renewal of Islamic Thought), to revisit that question in detail. The book follows his earlier "Jadeed Ilm-e-Kalam" (Modern Theology), which had opened a debate about what a contemporary Islamic theology would need to look like. This time, Mazhari narrows the lens to specific, contested episodes in roughly two centuries of Muslim intellectual history, from the colonial-era shock of civilisational decline to present-day debates over law, gender and citizenship.
His starting observation is that explanations for Muslim intellectual decline tend to split into two camps. One camp, which Mazhari calls traditionalist, treats the crisis as essentially moral and spiritual: Muslims strayed from correctly practising their faith, and heresy and innovation followed. A second camp, which he identifies with secular modernist scholars, argues that Islamic thought's basic categories have simply become irrelevant with the passage of time, and that Muslims must adopt the same rationalist, Enlightenment-derived framework the West used to reform Christianity, then rebuild Islamic thought on that foundation. Mazhari stakes out a third position: some rethinking is necessary and overdue, he argues, but it has to happen inside the boundaries of Islam's own foundational commitments, not by importing an alien one.
The distinction that organises Mazhari's whole argument is between what he calls foundations (the matters of belief, or imaniyat) and interpretation (ta'beer). Certain claims, he says, are simply not subject to human reasoning: the existence of God, prophethood, angels, the afterlife, revelation itself. These are accepted as matters of faith, whether or not unaided reason can fully grasp them. Everything else, in his framing, is interpretation, layered onto those foundations over roughly fourteen centuries, and interpretation can always be revisited, debated and, where warranted, discarded.
He uses Sir Syed Ahmad Khan as a cautionary example of where that line gets crossed. Sir Syed's biblical-critical reading of the Quran denied the literal existence of angels, treated heaven and hell as psychological states rather than places, and reduced revelation to an internal process within the Prophet's own mind rather than an external communication. Mazhari, who says he holds Sir Syed's broader contribution in great respect, nonetheless argues that this specific move subordinates revelation to reason so completely that Islam's foundational claims dissolve into relativism -- reducing scripture, angels, God and revelation to culturally particular constructs with no claim to universal truth.
Mazhari's book turns on a distinction between two Urdu terms that are often used loosely and interchangeably: tajdeed (renewal) and tajaddud (modernism, in the sense of a rupture). He insists the Islamic intellectual tradition already contains enormous internal disagreement -- Ghazali and Ibn Taymiyyah, for instance, read the tradition in almost opposite ways, and Ibn Arabi's metaphysics were controversial enough that a substantial body of scholars accused him of unbelief, even as his admirers call him "Shaykh al-Akbar," the greatest master. None of that internal argument, Mazhari says, counts as tajaddud. What counts as tajaddud is a complete break with the discursive tradition -- adopting an entirely external interpretive framework, untethered from what the texts themselves can support, the way postmodern hermeneutics or Arab modernists such as Mohammed Arkoun and Nasr Hamid Abu Zayd have effectively declared the classical framework's authority void and rebuilt from outside it.
Asked to test the framework against a living, contested figure, Mazhari discusses the Pakistani scholar Javed Ahmad Ghamidi. He disagrees with Ghamidi on many specific points, he says, and thinks some of his positions are simply wrong. But he resists classifying Ghamidi as having stepped outside the tradition altogether, pointing out that canonical figures such as Shah Waliullah held equally idiosyncratic minority positions -- denying certain reported miracles, or holding that matter is eternal -- without being read out of the fold. "We cannot build a framework," Mazhari says, "that applies fully to twentieth-century scholars but exempts scholars already absorbed into our own tradition." Disagreement conducted with textual argument, in other words, stays inside tajdeed; disagreement that discards the texts' authority altogether becomes tajaddud.
Much of the conversation returns to Muhammad Iqbal's 1930 lectures, published as "The Reconstruction of Religious Thought in Islam." Mazhari credits Iqbal with two distinct achievements: building an epistemological defence of religious knowledge against the logical positivism then fashionable in Western philosophy, and reviving the idea of ijtihad, independent legal reasoning, as what Iqbal called Islam's own "principle of movement" -- the subject of his celebrated sixth lecture.
Mazhari does not treat Iqbal as beyond criticism. Iqbal leaned heavily on contemporary Western thinkers -- Bergson, Einstein, William James -- to make his case for religion's rational credibility, and critics, including his own student Burhan Ahmad Farooqi, accused him of effectively making the Quran subordinate to science. Mazhari's response is that this criticism, while understandable, misses a pattern that recurs throughout Islamic intellectual history: Abu al-Hasan al-Ashʿari and Ghazali built classical theology on the back of Greek philosophy, using its logical tools to defend the same core religious claims their own contemporaries said could not be rationalised at all. Ashʿari, Mazhari notes, had to write an entire book defending the very legitimacy of theological reasoning against scholars who considered it heretical. Iqbal's use of early twentieth-century science and philosophy, in this reading, is simply the latest iteration of a very old method, not a departure from it -- and Iqbal himself, in his preface, explicitly invited future generations to disagree with him.
A large section of the conversation traces how ijtihad came to be seen as closed. In the third and fourth Islamic centuries, Mazhari explains, the sheer volume of scholars issuing contradictory rulings from often-conflicting hadith created what he calls real social confusion -- a practice deemed permissible by one authority and forbidden by another. Consolidating around four major Sunni schools of law was, in his account, a pragmatic, temporary containment measure for that disorder, not a permanent theological verdict. No caliph or council ever formally declared ijtihad closed; it simply calcified through centuries of practice into an assumption that reasoning outside the four schools' settled positions was illegitimate.
The jolt that revived interest in reopening it, Mazhari argues, was colonial-era humiliation. The Lebanese thinker Shakib Arslan's tract asking why Muslims had fallen behind other civilisations crystallised a widespread sense that something in Islamic thought itself needed correcting. Yemen's Muhammad al-Shawkani, the Cairo-based Al-Manar movement associated with Muhammad Abduh and Rashid Rida, and eventually Iqbal's own chapter on ijtihad were all attempts, across several decades, to reactivate a tool Mazhari says had been effectively discarded. Reopening it, he stresses, does not mean discarding the four schools; it means drawing more widely on positions preserved outside them too -- the Zahiri, Jaʿfari and Zaydi schools, or precedents from among the Prophet's companions and their successors that later jurists simply did not incorporate into the four schools' settled rulings. He cites the Ottoman Empire's late nineteenth-century Majalla codification project as one earlier attempt to draw on this wider inheritance for commercial law.
Turning to twentieth-century Islamism, Mazhari discusses Abul A'la Mawdudi and Sayyid Qutb with evident respect for their scholarship and influence, while sharply disputing their political theology. Their doctrine of iqamat-e-deen, establishing God's rule, made building an Islamic state the near-obligatory centre of what it means to be a practising Muslim, in Mazhari's reading -- a doctrine he says was shaped disproportionately by the trauma of colonial rule dismantling Muslim political structures worldwide. Politics, he argues, is genuinely part of Islam, but elevating it to the defining axis of the faith is an exaggeration the texts do not support.
He traces how this played out organisationally: Hasan al-Hudaybi, the Muslim Brotherhood's second leader, broke publicly with Qutb's framework in a book titled "Du'up la Qudah" -- "we are preachers, not judges" -- rejecting the idea that Muslims could declare secular governments and the societies that accept them to be in a state of jahiliyyah, pre-Islamic ignorance. Qutb's more radical readers pushed that logic further into the al-Hijra wal-Takfir movement in Egypt, which held that ordinary mosques were themselves un-Islamic and that emigration and armed struggle against the surrounding society were obligatory.
Mazhari's own alternative reading returns to the chronology of the Prophet's life. The Meccan period, when Muslims lived as a persecuted minority with no political power at all, is as legitimate a prophetic model as the Medinan period that followed it, he argues -- yet Islamic political philosophy has almost entirely been built on the Medinan, state-building phase, treating it as the template rather than one contextual response among several. That imbalance matters urgently today: an estimated 40 to 45 percent of the world's Muslims already live as minorities in non-Muslim countries, a share Mazhari expects to keep rising, and a political theology that treats anything short of an Islamic state as an unfinished religious obligation leaves that growing population permanently, and unnecessarily, in crisis.
Mazhari is equally critical of a different twentieth-century reform project: the Islamization of Knowledge movement associated with Naquib al-Attas and, more systematically, Ismail al-Faruqi, who built an institutional movement around the idea in the 1970s and 1980s, aiming to reconstruct entire disciplines, from history to the social sciences, on explicitly Islamic epistemological foundations. Mazhari notes that even the movement's own later leaders, including Taha Jabir al-Alwani and Abdul Hamid Abu Sulayman, eventually acknowledged in their own writing that the project had stalled.
His objection is both practical and historical. Practically, he argues, no coherent programme for actually "Islamizing" mathematics, physics or economics ever materialised. Historically, he points out that classical Islamic civilisation never demanded such a filter in the first place: Muslim scholars absorbed Greek astronomy, Indian mathematics and Persian statecraft directly, without first converting them into an "Islamic" version, and nobody at the time asked Ashʿari, Ghazali or Ibn Arabi to justify borrowing from Aristotelian logic before they used it. Tagging every field of knowledge with a confessional label, Mazhari argues, walls Muslims off into what he calls an island, since a body of knowledge stamped "Islamic" becomes, by definition, something non-Muslims have no reason to accept -- destroying the common ground genuine intellectual dialogue requires. He notes that Fazlur Rahman made much the same criticism of the movement in his own writing.
For the constructive half of his argument, Mazhari borrows a three-part framework from Shah Waliullah's "Hujjat Allah al-Baligha," originally used to describe how prophetic reform relates to existing custom: some practices are abolished outright (izala, as with the Quran's total prohibition of wine), some are retained essentially unchanged, and some are reformed and adapted (islah) while their underlying spirit survives, as with blood-money law or the restructuring of prayer and pilgrimage around pre-existing Arabian rites.
Applied to theology, Mazhari argues that the portions of classical kalam built on Aristotelian physics and cosmology -- a fixed hierarchy of celestial spheres, a physical "sky" that can be pierced or cannot be, debates over whether matter is infinitely divisible -- are now simply irrelevant and should be shed, since the science underneath them has been superseded. The epistemological core of the discipline -- how knowledge is acquired, how reliable different sources of knowledge are, what role reason plays -- remains fully valid and should be retained. And new material, particularly from modern linguistic philosophy and contemporary science, needs to be added to address questions the classical scholars never faced.
He is unsparing about one popular response to this challenge: tafsir 'ilmi, the practice, associated with the Egyptian writer Tantawi Jawhari, of reading modern scientific findings directly out of Quranic verses. Mazhari calls this methodologically mistaken, since today's science routinely revises itself, leaving yesterday's "proof text" attached to a theory that no longer holds. He prefers the older position associated with Allama Anwar Shah Kashmiri and, separately, Ashraf Ali Thanvi: the Quran is a book of ethics, not a book of science, and where it describes the physical world -- clouds, the sun's motion, the sky -- it speaks in the everyday idiom available to its first audience, without staking any claim on the underlying physical reality. Its purpose in doing so, Kashmiri argued, was always to establish that a creator exists and deserves gratitude, not to settle astronomy.
Mazhari applies the same removal-retention-addition logic to Islamic law. Rulings drawn directly and unambiguously from scripture -- the number of prayer cycles, fixed inheritance shares explicitly stated in the Quran -- are, in his account, simply fixed and not open to renegotiation. But a large portion of fiqh was built through ijtihad on matters scripture never addressed directly, and that portion, he argues, should be treated as genuinely open to reconsideration using today's available tools and knowledge, not treated as permanently settled by early jurists.
On women's status, Mazhari traces the classical doctrine that women possess "half reason" (naqisat al-'aql) -- drawn from a single hadith -- partly to Greek philosophical influence rather than scripture itself. He cites Plato's remark that being born of woman was a source of shame, and Ibn Rushd's claim that women play no active biological role in conception, as examples of how deeply the classical tradition's view of women was shaped by imported Greek assumptions rather than the Quran. He argues the hadith on women's reason needs to be read in its original legal context rather than generalised into a blanket judgment on female judgment as such. On whether women can lead a state, he notes that even the conservative jurist Ashraf Ali Thanvi and, more recently, Yusuf al-Qaradawi revisited a hadith long read as a categorical bar, arguing it responded to a specific Sasanian context of unchecked, semi-divine monarchical authority rather than to the collective, consultative decision-making of a modern political system.
On inheritance, he acknowledges the frequently raised objection that women's shares are often smaller than men's despite many now working and contributing financially, but argues the calculation has historically balanced against men's exclusive, non-negotiable obligation to financially support the household -- a balance he says needs to be revisited, not dismissed, now that many women earn and increasingly share or carry that burden themselves. On the treatment of non-Muslim minorities, Mazhari argues that the classical dhimmi framework, and the jizya tax historically levied on non-Muslims under Muslim rule, belonged to a medieval political order without a concept of equal citizenship anywhere in the world, Muslim or otherwise, and is now obsolete under the modern nation-state, where non-Muslims took an equal part in winning independence and are due equal citizenship as a result. He points to an inconsistency he thinks Muslim communities need to confront honestly: demanding full, equal citizenship in India or Western countries while continuing, elsewhere, to defend a historical framework that denied exactly that to non-Muslim minorities under Muslim rule.
Mazhari closes by distilling the conversation into two linked failures that need correcting. The first is treating tradition itself as something already finished, requiring only implementation rather than the ongoing engagement every generation is entitled to bring to it. The second is the specific atrophy of ijtihad, which he says needs to be reactivated collectively, ijtihad ijtima'i, rather than left to scattered individual muftis issuing the kind of inconsistent, sometimes embarrassing fatwas that circulate online today and invite ridicule. He argues that collective reasoning is far more achievable now than in earlier centuries, given instant digital access to the full hadith corpus and centuries of accumulated legal opinion that once sat scattered across thousands of separate manuscripts.
His closing image is of a buffet rather than a fixed plate: the Islamic tradition, across fourteen centuries, already contains far more material, and far more internal argument, than most Muslims today realise is available to them. The task Mazhari sets out is not to invent a new cuisine from imported ingredients, but to serve more of what is already on the table.
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