Nous Podcast· 03 May 2026· 1:28:21

A Lawyer’s Life: Between the Bar and the Bench | Adv. Talha Abdul Rahman, Supreme Court of India

What does it truly mean to navigate the corridors of justice in India? In this insightful episode of the Nous Network, Dr. Nizamuddin Ahmad Siddiqui sits down with Talha Abdur Rahman, Advocate-on-Record at the Supreme Court of India, to explore the intricate realities of a life in law. Drawing fr…

Full Transcript

तो जो मुझे ऐसा लगता है कि उस्ताद का जो रोल रहा है ऑक्सफोर्ड में वो यह है कि पहली चीज आपको बताना कि भई आपको जो रीडिंग लिस्ट दी गई है वो रीडिंग लिस्ट नहीं है। क्या यह कहा जा सकता है कि द रीडिंग ऑफ कॉमन लॉ ट्रेडिशन इन इटसेल्फ इज कंपेरेटिव। कॉमन लॉ ट्रेडिशन तो आपको यहां भी पढ़ा रहे हैं। जी। बट प्रॉब्लम यह है कि आज के दौर में जो एम्फेसिस ऑन व्हाई है वो थोड़ा सा कम है। उसके अलावा डिफरेंस मेथड में डिफरेंस क्या है? लॉयर्स आर नॉट स्पोक्सपर्स फॉर देयर क्लाइंट्स। आई मीन एज एन एथिकल पॉइंट ऑफ व्यू। आपका पहला काम है कि आप लॉ एनफोर्समेंट में मदद करेंगे। ऑब्वियसली करेंगे। बट पर्सपेक्टिव है कि आपको लॉ का डेवलपमेंट का भी ख्याल रखना है। लॉ का सोशल फंक्शन क्या है? एट लीस्ट इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ इंडिया। माय प्रोफेसर प्रोफेसर अमिता ढांडा हैड मेंशंड आई बैक इन लॉ स्कूल एंड शी हैड फ्लैग्ड दिस एस अ सीरियस कंसर्न दैट लॉ स्कूल्स डू नॉट हैव द डायवर्सिटी दे आर एक्सपेक्टेड टू हैव लेकिन क्या ये डायवर्सिटी जो है वो प्रोफेसर्स पे भी अप्लाई होनी चाहिए आपकी जो फीस की डिमांड हो एज अ लॉयर इट शुड बी कमेंसरेट टू योर स्टैंडिंग बट बी ओपन एंड अवेलेबल टू आल्सो अपीयरिंग फॉर लिटिल और नो फीस इफ द सिचुएशन और द क्लाइंट्स डिमांड्स। आपने और आपके साथ और लोगों ने स्टार्ट करने की कोशिश की थी। आई थिंक आलिम उसका नाम था। उसके बारे में कुछ बताइए। एट एन इंस्टीट्यूशनल प्लानिंग कंट्री लेवल वी हैव टू हैव ऑब्वियसली वी हैव टू हैव मोर नंबर ऑफ़ क्रिमिनल जजेस बट आई थिंक वी नीड टू हैव डीक्लटराइज्ड सिस्टम ऑफ एडजुडिकेशन ऑन द सिविल साइड। उस किताब में सबसे इंटरेस्टिंग आस्पेक्ट जो मुझे लगा वो है फीस का चैप्टर। तो मैं तो ये कहूंगा कि आसाम वाज़ अ लैबोरेटरी जी। और इस वक्त पूरे मुल्क का आसामीफिकेशन हो रहा है। नाउ के इस पडकास्ट में आपका खैरमकदमम है। आज हमारे सामने एडवोकेट तल्हा अब्दुल रहमान साहब हैं। तल्हा अब्दुल रहमान साहब ने अपना बीएएलएलबी नालसार हैदराबाद से किया है। अपना मास्टर्स ऑक्सफोर्ड से किया है। और उसके बाद ही वो लॉ की प्रैक्टिस में लग गए। 2008 में उन्होंने इनरोलमेंट किया था और तकरीबन दो दहाई से सिंस टू डिकेड्स ऑलमोस्ट ही हैज़ बीन प्रैक्टिसिंग इन द सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट ऑफ इंडिया। अ मोर देन 10 इयर्स एगो एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड बने थे। ही इज अ वेरी रिकॉग्नाइज्ड नेम अल्हम्दुलिल्लाह इन द लीगल ट्रेटरनिटी तो तला साहब बहुत शुक्रिया आपका आज की पडकास्ट के लिए हम बहुत सारी चीजें डिस्कस करेंगे इंशा्लाह जो कुछ भी हमने पहले डिस्कस किया है। कुछ बैकग्राउंड कन्वर्सेशंस भी हैं हमारी। कुछ वो चीजें भी हैं जो आपके बारे में हमने मुख्तलिफ लोगों से सुनी फ्रॉम लीगल फ्रेटरनिटी। अ कुछ ऐसी चीजें भी हैं जो आपकी राइटिंग्स के थ्रू आती हैं। कुछ आपके केसेस के थ्रू आती हैं और कुछ ऐसे लोगों के थ्रू भी आती हैं जो इन्होंने आपके साथ काम किया है। तो वी विल ट्राई टू इनकरपोरेट ऑल ऑफ इट इंशा्लाह। और यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि लीगल प्रोफेशन को आम लोगों तक कैसे ले जाया जा सके। आम इंसान इसको कैसे समझे क्योंकि काफी टेक्निकल समझ में आता है और इससे आम इंसान कैसे इंगेज हो क्योंकि एट द एंड ऑफ द डे लॉ इज मेड फॉर द सिटीजंस। तो बहुत शुक्रिया आपका एक बार और तला भाई मैं स्टार्ट करना चाहता हूं हमारी कन्वर्सेशन एक शॉर्ट बायो से आपके हम अ आपका रुझान लॉ की तरफ व्हाई एन इंटरेस्ट इन लॉ क्योंकि इस वक्त बहुत ज्यादा रुझान है लोगों का लॉ में लेकिन 20 साल पहले वो रुझान नहीं था पहली चीज तो ये नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज बन चुकी थी। दे वर ग्रोइंग। यह बात सच है। लेकिन कम्युनिटी पर्सपेक्टिव से भी बहुत ज्यादा लोगों का रुझान नहीं था। तो एक तो वजह एक तो क्वेश्चन ये होगा कि व्हाई लॉ उस वक्त और जाहिर सी बात है कंपटीशन टफ रहा होगा। बहुत सारी चीजें हैं। और जहां तक मुझे याद है उस वक्त सबके कंपटीशनंस भी अलग होते थे। हम क्लाइट उस वक्त नहीं था। जी। तो एक तो ये है और उसके बाद आपकी जर्नी ऑक्सफोर्ड एक्सपीरियंसेस देन कमिंग बैक टू इंडिया वी विल स्टार्ट विद दैट इंशा्लाह। जी तो सबसे पहला जो आपने मुझे सवाल मुझसे पूछा है वो ये है कि भ आपने लॉ क्यों चुना अपने लिए? अ मैं फैजाबाद में पला बढ़ा हूं। मेरी क्लास 10थ की एजुकेशन फैजाबाद में रही है। अनलाइक द आउटसाइडर्स पर्सेपेक्टिव कि पूरे हिंदुस्तान जो है वो फैजाबाद के बारे में एक ऐसा सोचता है जी क्योंकि फैजाबाद और अयोध्या ट्विन सिटीज रहे हैं। जी फैजाबाद के जो खुद के लोग हैं उनका भी पर्सपेक्टिव कुछ इसी तरीके का रहा है रेस्ट ऑफ द कंट्री के बारे में कि हम लोग आपस में तो ऐसे रहते हैं लेकिन बाहर ऐसा दिखाया जाता है कि क्या हो रहा है और ग्रोइंग अप इन अ स्मॉल सिटी ऑफ़ फैजाबाद। जहां हम लोग एक दूसरे को जानते हैं। मोहल्ले में लोगों के घर आना जाना है। मिलके एक दूसरे के साथ खेलते हैं। गलियों में घूमते हैं। उस शहर का प उस शहर का जो बैकग्राउंड था वो ऐसा था कि मुझे लगा कि इट्स अ वेरी कोहेसिव सोसाइटी। तो मेरे लिए बहुत इंपॉर्टेंट था कि मैं सोसाइटी में एक इंपॉर्टेंट रोल प्ले कर पाऊं। क्योंकि मैं मुझे ऐसा लगता था कि बहुत सारे लोग हैं आसपास जो कि जिनको कि जरूरत है और मदद की या सिर्फ ये समझने की कि हाउ टू इंटरेक्ट विद हायर सिस्टम्स। अब आप अब फैजाबाद की जो पोजीशनिंग है अगर आप ज्योग्राफी में उसको समझें लखनऊ से वो करीब 3 घंटा उस वक्त अब तो 2 घंटा हुआ है। उस वक्त 3 घंटा दूर था और ईस्टर्न यूपी का गेटवे है एक तरीके से लखनऊ एक्सेस करने के लिए। तो अगर किसी को आजमगढ़, गोरखपुर, बस्ती से लखनऊ जाना है तो फैजाबाद होके जाना है। तो इनवेरिएबली जो आपका विज़ है अबाउट सोसाइटी स्पेशली रूरल या सेमी अर्बन सोसाइटी जो कि अर्बन स्पेसेस को या एडमिनिस्ट्रेशन को कांटेक्ट करना चाह रही है। वो फैजाबाद में दिखाई देता है। कि किसी को कोई काम के लिए लखनऊ जाना है। तो शुरू के शुरुआती दौर में मुझे ऐसा लगा कि यह सारे लोग हैं जिनको एडमिनिस्ट्रेशन से कुछ चाहिए और बिकॉज़ ऑफ़ एक्स रीजन और वाई रीजन नहीं मिल पा रहा है। और वो मेरे एक आई थिंक मेरे एक बैक ड्रॉप में मेरे माइंड में ये बात थी कि ये यही सोसाइटी है जो कि अपने राइट्स को एक्सेस नहीं कर पा रही है। बट लेकिन मुझे उस टाइम नहीं पता था कि मैं क्या करना चाहता हूं। तो बहुत सारे उन बच्चों की तरह जो उस वक्त इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे थे। आईआईटी के एग्जाम देना चाहते से मैं भी लखनऊ की तरफ भेज दिया गया 11 12th में कि मैथ्स लेके आईआईटी का एग्जाम देना है और इंजीनियरिंग के कोर्सर्सेस लेने हैं। आल्सो जब मैं 11th में पहुंचा तो आई आल्सो गॉट अपॉइंटेड ऑन लीडर स्मॉल लीडरशिप पोजीशंस इन स्कूल जब मैं फैजाबाद में भी था तो मैं बहुत साल मैंने स्कूल में अपने लीडरशिप पोजीशंस पे मैं रहा हूं। तो बिकॉज़ ऑफ दैट इन्फ्लुएंस ऑफ द सोशल अपब्रिंगिंग और लीडर लीडरशिप पोजीशंस में रहने की वजह से मुझे ऐसा लगा कि आई हैव टू बी इन अ प्लेस वेयर आई मीट पीपल एंड आई सी पीपल्स प्रॉब्लम एंड आई शुड ट्राई एंड मेक मसेल्फ यूज़फुल। और ये यही थॉट के साथ जो है मैंने घर में एक तरीके से कह सकते हैं कि उस वक्त बगावत करी कि भ मुझे लॉ पढ़ना है और बहुत मुश्किल से फिर मैंने घर वालों को अपने समझाया कि भ लॉ मुझे करना है इसलिए मैं 12th में इंजीनियरिंग का एग्जाम नहीं दूंगा या कम से कम सीरियसली नहीं दूंगा और मैं लॉ पे फोकस करूंगा। सो माय फादर हु वाज़ नॉट अ लॉयर ही वाज़ हिमसेल्फ एन इंजीनियर ही अग्रीड विद ग्रेट रिलक्टेंस एंड मेरे खानदान में बहुत सारे डॉक्टर्स भी हैं। सबका ये कहना था भाई तुम इतने जहीन हो और पढ़ने में अच्छे हो। नंबर तुम्हारे अच्छे आ रहे हैं। तुमको लॉक करने की क्या जरूरत है? तो मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था सिवाय इसके कि भाई मैं करना चाहता हूं। मुझे मजा आएगा। उसमें मैं करूंगा। तो खैर जो मुझे जो करना था मैंने किया विद द कंडीशन माय फादर एट दैट पॉइंट ऑफ टाइम सेड कि भाई तुम लॉ कर सकते हो लेकिन सिर्फ एक शर्त है कि तुम्हें बेस्ट इंस्टीट्यूशन से करना है और सेकंड बेस्ट तो हम मानेंगे ही नहीं। अच्छा मैंने कहा ठीक है दिस इज़ नॉट अ वेरी डिफिकल्ट कंडीशन। अ बिकॉज़ मैं भी अच्छी जगह से ही करना चाहूंगा। जी। तो फिर मैंने अपना पूरा जोर जो है वो लॉ एंट्रेंस की तरफ लगा दिया। उस वक्त अलग-अलग इंस्टीटश के अलग-अलग एग्जाम्स होते थे। तो वो टाइमिंग ऐसी थी कि सबसे पहले एनयूजेएस का एग्जाम होता था क्लोजर इन विंटर जाड़े के वक्त और उसके बाद फिर मार्च अप्रैल से ये बाकी एंट्रेंस एग्जाम्स होना शुरू हो जाते थे। तो मैंने एग्जाम दिया करके मेरा कुछ जगह एडमिशन हो गया देन आई गॉट एडमिटेड इन नालसार काफी दिन तक मेरे घर वालों को ये लगता था कि ये छोड़ के इंजीनियरिंग कर कर ले शायद। बट आई थिंक जब मैं थर्ड ईयर में था लॉकी ऑफ़ अ फाइव ईयर कोर्स। दैट्स द टाइम व्हेन माय फादर रियलाइज्ड कि ये जो कर रहा है लॉ ये ठीक कोर्स है। इतना बुरा नहीं है और उसका भी वाकया बहुत इंटरेस्टिंग है। अ मेरे फादर जो है वो बस से लखनऊ से इलाहाबाद जा रहे थे। अच्छा तो उस वक्त उनके साथ क्या हुआ कि बस में जो बगल में उनके मुसाफिर बैठे थे वो कोई जज साहब थे। अच्छा। तो उन्होंने पूछा कि भाई आपके बच्चे क्या करते हैं? तो उन्होंने बताया कि साहब हमारे तीन बच्चे हैं और जो छोटा वाला है वह फलानी जगह से लॉ कर रहा है। तो वो जज साहब ने बड़ी तारीफ करी एंड ही टूक इट वेरी सीरियसली कि आपका लड़का अच्छी जगह पढ़ रहा है। सो दैट वाज़ द एक्सटर्नल वैलिडेशन दैट माय फादर नीडेड टू अग्री कि आई हैव मेड डिसेंट चॉइससेस इन लाइफ। सो दैट इज हाउ आई स्टार्टेड आई मीन गेटिंग वैलिडेशंस फ्रॉम माय फादर। बट हैविंग सेड दैट कॉलेज के दौरान भी इट्स इट्स वेरी इंटरेस्टिंग हाउ लाइफ प्रेजेंट्स ओपोरर्चुनिटीज एंड इंस्टेंसेस व्हेन आई वाज़ सेवन इयर्स ओल्ड माय फादर हैड अ स्माल फैक्ट्री इन फैजाबाद एंड ही हैड सम लेबर ट्रबल अच्छा सम वर्कर वाज़ टर्मिनेटेड देन अदर वर्कर्स इन सॉलिडेरिटी वेंट ऑन अ स्ट्राइक एंड दैट लेड टू सम कंसिलिएशन प्रोसीडिंग्स सम लेबर इंडस्ट्रियल कोर्ट प्रोसीडिंग्स एंड आई आई वाज़ सेवन ईयर ओल्ड आई डिडंट नो मच बट आई न्यू दैट माय फादर वास वरिड एंड यू नो इट यूज्ड टू बी एक्सप्रेस्ड इन द हाउस वंस इन अ वाइल और लेकिन जाहिर सी बात है मैं घर का सबसे छोटा बच्चा हूं तो मेरे ऊपर तो कुछ जाहिर नहीं होने दिया जाएगा बट व्हेन आई वास फाइनली इन कॉलेज इन इन थर्ड ईयर अराउंड द सेम टाइम एस माय फादर मेट द जेंटलमैन इन द बस उस वक्त मेरे फादर पे उन्होंने मुझे फिर क्वेश्चन भेजे कि भाई ये मेरा लेबर का मुकदमा है अब यहां मैं फंसा हुआ हूं अब तुम मुझे इसका सशन बताओ अच्छा सो बिफोर आई कुड एनी रियली सॉल्व अ मूड प्रॉब्लम और आई कुड डू एनीथिंग एल्स। आई हैड लाइव प्रॉब्लम्स फ्रॉम माय फैमिली बीइंग सेंट टू मी अह कि भई ये प्रॉब्लम है। ये फैक्ट सिचुएशन है। यू डू द रिसर्च एंड टेल मी कि क्या करना है इसमें। सो देन मैं रिसर्च करा के फोटोकॉपी करा के फिर मैं वो लिफाफा में लेटर के साथ कवर लेटर पूरा इंस्ट्रक्शन बना करके फिर मैं वो भेजता था पापा को अब्बू को। तो वो फिर उसका ले के फिर देन ही यूज़ टू गिव इट टू हू लॉयर्स कि भ ये आया है इसमें। तो ये ये चीजें हैं। फिर हर बार जब मैं छुट्टी में घर आता था फिर वही प्रॉब्लम्स डिस्कस होते थे। फिर एक बार इनकम टैक्स का प्रॉब्लम आया। फिर एक बार वट का प्रॉब्लम आया। हर बिनेस वाले में हर फैक्ट्री ओनर को कोई ना कोई तो प्रॉब्लम रहती है। कई सारी इललीगल प्रॉब्लम रहती हैं। तो जाहिर सी बात है उसकी वजह से आई स्टडीड लेबर लॉ वेल। आई स्टडीड टैक्स एंड सीपीसी ऑल ऑफ दीज़ सब्जेक्ट्स देन आई मीन बिकॉज़ आई वाज कंफ्रंटेड विद सॉर्ट ऑफ़ पर्सनल प्रॉब्लम्स। अह यू बिकम फैमिली। एडवोकेट बिफोर यू ग्रेजुएट। यू कुड से सो यू कुड से सो एंड दैट रियली हेल्प मी बिकॉज़ एज़ अ रिज़ल्ट आय थिंक एज़ अ रिज़ल्ट ऑफ़ एक्स्ट्रा एफर्ट्स दैट आय पुट इन दोज़ सब्जेक्ट्स आय गॉट गोल्ड मेडल फॉर लेबर लॉ। अच्छा! एंड दैट एक्स्ट्रा एफर्ट आल्सो हेल्प मी बिकम स्टैंडिंग काउंसिल फॉर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट एट अबाउट 23 24 इयर्स ऑफ़ एज। अह बिकॉज़ मैंने ऑलरेडी इनकम टैक्स मतलब लोगों को समझने में जितना टाइम लगता है वो मैंने सीए की किताब भी अंडरग्रैड में ही पढ़ के खत्म कर दी थी। क्योंकि दैट वाज़ रेलेवेंट टू अंडरस्टैंड माय फादर्स केसेस। सो आई हैड टू यू नो स्टडी देम एनीवे आउट ऑफ शर नीड टू हेल्प माय फादर और दैट्स हाउ आई यू नो डेवेलप माय अंडरस्टैंडिंग ऑफ इनकम टैक्स एट दैट पॉइंट ऑफ़ टाइम। बहुत सारे लोग होते हैं कि वो ग्रेजुएशन के बाद फिर वो सारे प्रॉब्लम्स आते हैं तो वो किताब उठाते हैं तो वो देखते हैं। बट मेरे साथ ये सब हो चुका था पहले। तो इन अ वे नाउ दैट आई लुक बैक। आई मीन यू कुड से दैट इट इज डेस्टिनी कि आपके लिए खुदा ने ऐसी प्रॉब्लम्स भेजी सो दैट दे आल्सो सेंट अ प्रॉब्लम सॉल्वर इन अ वे दैट यू नो अगर मैं इंजीनियरिंग कर रहा होता आई वुड हैव बीन ऑफ नो यूज़ टू माय फादर अगर लेकिन मैंने लॉ किया और लॉ में भी देन ही वास एबल टू आस्क मी क्वेश्चन क्वेश्चंस आई कुड हेल्प हिम देन आई स्टडीड दोज़ सब्जेक्ट्स सो यू नो इट्स क्वाइट इंटरेस्टिंग एंड क्वाइट क्वाइट फैसिनेटिंग बट दैट्स दैट्स हाउ आई यू नो सो सम पार्ट ऑफ़ माय जर्नीज़ आई एम एम एबल टू कनेक्ट द डॉट्स फ्रॉम द पास्ट। तो तला साहब ये जर्नी घर से नालसार तक की और नालसार में आपकी पढ़ाई और केसेस आपने कैसे डील किए? यह कनेक्शन ये है। लेकिन नालसार से फिर यू वेंट टू ऑक्सफोर्ड। तो यह जो जर्नी है इसके पीछे क्या रीजन है? क्या राज है? देखिए माय जर्नी फॉर प्रिपेयरिंग फॉर ऑक्सफोर्ड एक्चुअली स्टार्टेड फ्यू मंथ्स आफ्टर आई एंटर्ड नालसा। रीज़ फॉर दैट इज दैट इन फोर्थ और फिफ्थ ईयर आई कांट बी स्टार्टिंग अ जर्नी टू डू समथिंग इन द थर्ड ईयर बिकॉज़ द प्रिपरेशन और एंड द एक्सपेक्टेशन एंड द कंपैरिजन द ग्लोबल कंपैरिजन दैट अप्लाई फॉर कैंडिडेट्स इज़ वेरी हारश व्हेन इट कम्स टू गोइंग अब्रॉड। सो आई थिंक मेंटली मैंने ज़हन में ये सोच लिया था कि मुझे अपने कोर्स के बादस्टर्स करना है। दो चीजें मैंने सोची थी। एक कि मैं प्रैक्टिस करूंगा और दूसरा कि मैंस्टर्स करूंगा हम औरस्टर्स प्रैक्टिस से पहले करना था। यह इसलिए क्योंकि मैं प्रैक्टिस को छोड़ के नहीं जाना चाहता थास्टर्स करने। हालांकि मेरे अब व्यूज थोड़े से डिफरेंट हैं। लेकिन उस टाइम कम से कम जो बचकाने व्यूज थे मेरे वो यही थे कि मुझे पहले मास्टर्स करना है। तो जब मैं कॉलेज पहुंचा तो मुझे ये लगा कि भ यहां तो मैं आ गया और अगले 5 साल में मैं ये देखूंगा कि यहां की पढ़ाई किस तरीके से होती है। लेकिन इसके आगे की क्या जर्नी है? इसके आगे और मुल्कों में कैसी पढ़ाई होती है लॉ की? वो मैं देखना चाहता था। और उसका एक और वो मैं क्यों देखना चाहता था? उसका एक फैक्टर ये था कि मुझे ऐसा लगा कि जो हमारे फ्रीडम स्ट्रगल के एक्टर्स हैं, इंपॉर्टेंट कंट्रीब्यूटर्स हैं टू द फ्रीडम स्ट्रगल या कॉन्स्टिटुएंट्स असेंबली डिबेट्स के जो टॉप लॉयर्स हैं, जो पार्टिसिपेंट्स हैं उसमें दे हैड एक्सपोज़र फ्रॉम द आउटसाइड। हम तो व्हाट इज इट दैट दे हैव गेन दैट आई शुड आल्सो गेन। हम तो मैं कम से कम ये देखना चाहता था। हालांकि इस बात का अंदाजा नहीं था मुझे उस वक्त कि एक साल कास्टर्स प्रोग्राम जो है वो काफी छोटा होता है। इसको समझने के लिए लेकिन इनफ था वो कि मुझे कम से कम उसने एक स्टार्टिंग पॉइंट तो बता दिया कि ये स्टार्टिंग पॉइंट है उसका। तो उसकी प्रिपरेशन के लिए मैंने फिर सेकंड सेमेस्टर ऑनवर्ड से फिर आर्टिकल्स, पब्लिकेशंस अ के ऊपर काम शुरू करना कर दिया। अच्छा पब्लिकेशंस का फायदा बहुत होता है। नॉट ओनली इन टर्म्स ऑफ कि आपका एक सीवी में एक एंट्री हो गई बट फ्रॉम स्पेसिफिकली फ्रॉम द पॉइंट ऑफ व्यू ऑफ़ राइटिंग। या आपकी एनालिसिस इंप्रूव होती है और एनालिसिस के साथ एक्सप्रेशन भी इंप्रूव होता है। तो फ्रॉम माय सेकंड ईयर ऑनवर्ड्स आई सेकंड सेमेस्टर ऑनवर्ड्स आई हैड स्टार्टेड पब्लिकेशन एंड स्टार्टेड राइटिंग आर्टिकल्स। तो उसमें आर्गुमेंट फ्रेम करना है। उसके काउंटर आर्गुमेंट्स को डील करना है। फिर और रिसर्च करना है कि किसने ये ये चीजें लिखी हुई है। क्या लिखा हुआ है? इस पे और सब्जेक्ट क्या है? ये आर्गुमेंट जो है वो बॉर्डर लाइन किस आर्गुमेंट पे है? उस केस के बीच में क्या रिलेशनशिप है? ये सारी चीजें जो है वो सेकंड सेमेस्टर से मैंने करना शुरू कर दिया था। एंड आई थिंक बिकॉज़ ऑफ़ दैट फिफ्थ ईयर तक आते-आते मेरी एक रीज़नेबल प्रेजेंटेबल सीवी हो गई थी फॉर द पर्पस ऑफ़ एडमिशन इन ऑक्सफोर्ड एंड आल्सो कैंडिडेटर फॉर सिक्योरिंग अ स्कॉलरशिप। अच्छा। तो आई वाज़ वैरी फॉरर्चूनेट दैट आई सिक्यर्ड अ स्कॉलरशिप एंड एडमिशन टू ऑक्सफोर्ड। आई मीन आई हैड अह ऑफर्स फ्रॉम अदर कॉलेजेस आल्सो। बट आई थिंक ऑक्सफोर्ड का स्कॉलरशिप केम थ्रू द फर्स्ट एंड इट वाज़ वन ऑफ़ द बेटर कॉलेज बेटर यूनिवर्सिटीज़ कंपेयर टू द अदर्स। सो आई हैड टेकन अप दैट ऑफर। इसी इसी कॉन्टेक्स्ट में तल्हा साहब एंड दिस आई थिंक विल बी वेरी रेलेवेंट जो लोग लॉ पढ़ते हैं स्पेशली द स्टूडेंट्स जो लीगल एजुकेशन का एक्सपीरियंस है ऑक्सफोर्ड में और इंडिया में थ्यरेटिकली लोगों को मालूम है। ज्यादा रिग्रेस है। उनका ट्रेडिशन बहुत पुराना है। और क्योंकि वह इतना एक्सपोज़र आपको देते हैं। वह जाहिर सी बात है आप बहुत लर्न करते हैं। सिर्फ किताबों से नहीं आप एनवायरमेंट से आप बिल्डिंग से लर्न करते हैं। इंस्पायरिंग है वो। लेकिन उसके अलावा डिफरेंस मेथड में डिफरेंस क्या है? मैं किस एक्सपेक्टेशन से पूछ रहा हूं? आई विल टेल यू द रीज़ कि क्या वो एक ऐसा मेथड है जिसको हम इंस्टीट्यूशनली अगर ना भी पॉसिबल हो कि साहब हमारे यहां करिकुलम बहुत डिफरेंट है तरीका अलग है ऑब्जेक्टिव्स अलग है अगर वो इंस्टीट्यूशनली भी पॉसिबल ना हो तो क्या कोई स्टूडेंट बजाते खुद इंडिविजुअली क्या उस तरीके से पढ़ाई कर सकता है कि अगर वो ना भी जाए वहां पे क्या वो उस तरीके का एक्सपोज़र मिले एटलीस्ट फ्रॉम द टेक्स्ट एनवायरमेंट से ना मिले लोगों से ना मिले लेकिन क्या लर्निंग के थ्रू खुद सेल्फ लर्निंग के थ्रू क्या वो उसको अचीव कर सकता है और वो किस तरह का मेथड होगा देखिए मुझे ऐसा लगता है काफी लेयर्ड है आपका सवाल आई मस्ट से जो पहला पहला जो इसका लेयर है वो ये है कि यहां की पढ़ाई और वहां की पढ़ाई में मुझे क्या फर्क महसूस हुआ मैं ये नहीं कह रहा हूं क्या फर्क है बट मुझे क्या फर्क महसूस हुआ मुझे ऐसा लगता है कि जो यहां की पढ़ाई का जो लिमिटेशन है वो ये है एंड मे बी दैट्स अ लिमिटेशन ऑफ अंडर ग्रेजुएट कोर्स कि अंडरग्रेजुएट कोर्स का स्टाइल ही यही होता है कि वो ये बताते हैं कि आपको व्हाट इज लॉ जी वहां पर जब आप जाते हैं मास्टर्स के लिए तो द एम्फेसिस इज नॉट सो मच ऑन व्हाट क्योंकि व्हाट तो आप सेक्शन पढ़ के देख लेंगे बट द एम्फेसिस इज व्हाई अच्छा और व्हाई इन योर कंट्री अब इंडिया में अगर चाइल्ड टेस्टिमोनी का लॉ एक तरीके से ग्रो हुआ है तो ऑस्ट्रेलिया में कैसे ग्रो हुआ है तो कनाडा में कैसे ग्रो हुआ है और इंटरनेशनलली जो उस पे लीगल रिजीम है अगर कोई तो वो उसमें क्या फॉलो करती है तो इट अलाउस अ ग्रेटर कंपैरिजन एंड ग्रेटर डेप्थ। अब मुझे नहीं पता कि यहां के पढ़ाने के अंदाज में कितना टीचर्स या स्टूडेंट्स खुद इस बात को एनकरेज करते हैं कि मैं यह देखूं कि यह प्रोविजन है क्यों। जब तक आप यह नहीं समझेंगे कि यह प्रोविजन क्यों है, आप वह गलतियां करते रहेंगे जो कोर्ट्स भी कर रहे हैं और कोर्ट के फैसले को आप फैसले की तरह लेंगे ना ही आप ना कि आप उसको एकेडमिक डिस्कोर्स की तरह लेंगे। जबकि एज अ स्टूडेंट आपको अप्रिशिएट करना है कि फैसला क्या है और फैसले की रीजनिंग क्या है और रीजनिंग में क्या कमी है या क्या ये फ्यूचर से बात कर रहा है। जी ये एक एक पहलू है इसका। दूसरा जो आप का सवाल था कि क्या खुद से हम पढ़ सकते हैं? मेरे हिसाब से तो पढ़ सकते हैं लेकिन होता क्या है कि आपको जो उस्ताद होता है वो सिर्फ आपको एक उंगली पकड़ के बताता है कि भाई देखो ये देख लो ये देख लो ये देख लो ये देख लेना। ठीक। अब आप एक सर्टेन लेवल अगर आपको अगर आती है चीजें तो उस लेवल के ऊपर आपको काम करना है। तो जो मुझे ऐसा लगता है कि उस्ताद का जो रोल रहा है ऑक्सफोर्ड में वो यह है कि पहली चीज आपको बताना कि भाई आपको जो रीडिंग लिस्ट दी गई है वो रीडिंग लिस्ट नहीं है। वो लिस्ट ऑफ 20 आर्टिकल्स हैं जो मुझे बहुत पसंद आए। लेकिन 20 के अलावा भी 2000 और हो सकते हैं। आप पढ़ लीजिएगा। मैं आपको बताऊंगा नहीं। आपके पास पूरा डेटाबेस है। लाइब्रेरी है गो रीड। एंड दैट इज द फर्स्ट अप्रोच टू थिंग्स। नाउ दे विल हैव केस लॉस फ्रॉम वेरियस जुरिसडिक्शन कि भ यूएस, यूके, कनाडा, इंडिया, साउथ अफ्रीका मे बी अदर कंट्रीज आल्सो आप उसको पढ़िए। वहां प्रॉब्लम्स को कैसे सॉल्व कर रहे हैं वो देखिए। और ये अप्रोच हम लोग हिंदुस्तान में भी करते हैं। बट हम लोग उसके पीछे की जो रीजनिंग है उसको नहीं एप्रिशिएट करते हैं। फॉर एक्ट फॉर अस इशू इज ये ऐसा है। यह जान लो। यह आप कर सकते हैं या आप नहीं कर सकते। तो आईडिया ऑफ लॉ फॉर लॉयर्स इज नॉट टू मेक लॉ अबाइडिंग सिटीजन। जी हमें पॉइंट बताया आपने। मैं हम ये नहीं चाहते कि आप लॉ को इस तरीके से पढ़ें कि भाई ये रूल है। ये फ्रेम है। आपको ये फॉलो करना है तो यू आर इनसाइड यू आर आउटसाइड। ये तो लॉयर का काम नहीं है। ये लीगल टेक्नशियन का काम हो सकता है। जी लॉयर का काम ये है कि यस दिस इज द फ्रेम आई अंडरस्टैंड। बट इन दिस फैक्ट्स वेदर दिस फ्रेम विल फिट और नॉट व्हाट आर द वीकनेसेस ऑफ द फ्रेम वेदर द फ्रेम शुड एक्सपेंड और शुड कॉन्ट्रैक्ट तो ये जब तक दायरा नहीं हम स्टूडेंट्स में डालेंगे वी विल नेवर एंड अप मेकिंग गुड लॉयर्स लॉयर्स आर नॉट स्पोक्सपर्सन फॉर देयर क्लाइंट्स आई मीन एज एन एथिकल पॉइंट ऑफ व्यू आपका पहला काम है कि आप लॉ एनफोर्समेंट में मदद करेंगे ऑब्वियसली करेंगे बट पर्सेक्टिव है कि आपको लॉ का डेवलपमेंट का भी ख्याल ख्याल रखना है। तो मुझे बहुत कभी-कभी बहुत अफसोस होता है कि भ एज लॉयर वी आर नॉट डूइंग इनफ टू टेल द कोर्ट कि भाई यह चीज तो कॉन्स्टिट्यूशनली नहीं हो सकती। तो ये चीज आप मत करिए। आई थिंक ये बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है और जो आपने एक चीज यू नो हाईलाइट किया ना आई थिंक इट्स वेरी वेरीेंट। आपका ये कहना है कि प्लेसेस लाइक ऑक्सफोर्ड में लॉ की एजुकेशन जब होती है तो वहां पर अलग-अलग जुरिसडिकशंस को टच किया जाता है केसेस के बेसिस पे। क्या यह कहा जा सकता है कि वहां पर कॉमन लॉ ट्रेडिशन की पढ़ाई की जाती है? यू लर्न कॉमन लॉ ट्रेडिशन और क्योंकि कॉमन लॉ ट्रेडिशन इन सारे कंट्रीज में रन करता है। आप उन सबको पढ़ते हैं। क्या यह कहा जा सकता है कि द रीडिंग ऑफ कॉमन लॉ ट्रेडिशन इन इटसेल्फ इज कंपेरेटिव। देखिए मैं पहली बात जो मैंने केवियट पहले लगाया था कि हम आई अंडरवेंट एन अंडर ग्रेजुएट कोर्स। जी व्हिच इज बीए एलएलबी। नाउ बीए एलएलबी के अपने चैलेंजेस हैं। मास्टर्स लेवल की अलग स्टाइल ऑफ पेडागोजी होती है और पीएचडी लेवल की अलग होगी। जी। तो हम किस लेवल के स्टूडेंट से डील कर रहे हैं उस पे भी वेरीरी कर सकता है। लेकिन लेकिन जो हिंदु जो हमारा एक्सपीरियंस रहा है एटलीस्ट जो मेरा रहा है या और कॉलीग्स का फ्रॉम डिफरेंट लॉ स्कूल भी रहा है। उसमें ये है कि कॉमन लॉ ट्रेडिशन तो आपको यहां भी पढ़ा रहे हैं वो। जी। बट प्रॉब्लम यह है कि आज के दौर में आज के खास आजकल के दौर में जो एम्फेसिस ऑन व्हाई है वो थोड़ा सा कम है। हम सिलेबस पूरा करना एक बात है। ऑब्वियसली सिलेबस है। आप भी पढ़ाते पढ़ा चुके हैं। सो यू आर अवेयर कि भई सिलेबस पूरा करने का इट्स अ ह्यूज प्रॉब्लम। ठीक है? सम टाइम्स यू वांट टू डिस्कस बट द टाइम डजंट अलाउ बिकॉज़ यू हैव टू कंप्लीट द सिलेबस। ऑब्वियसली दैट्स अ चैलेंज। बट विद इन दैट चैलेंज एवरीबडी हैज़ टू फंक्शन। जी तो बहुत सारी चीजें ऐसी होती हैं जो आप क्लास में खासतौर पे डिस्कशन के तौर पर लाना चाहते हैं। सो दैट पीपल एंगेज विद इट। एंड वन वेरीेंट फैक्टर दैट माय प्रोफेसर प्रोफेसर अमिता ढांडा हैड मेंशंड आई बैक इन लॉ स्कूल एंड शी हैड फ्लैग्ड दिस एस अ सीरियस कंसर्न दैट लॉ स्कूल्स डू नॉट हैव द डायवर्सिटी दे आर एक्सपेक्टेड टू हैव। अनलेस यू हैव डायवर्सिटी, यू विल नॉट हैव डिफरेंट पर्सपेक्टिव्स ऑन हाउ द लॉ ऑपरेट्स फॉर डिफरेंट सेट्स ऑफ पीपल इन द सेम सोसाइटी। अब्सोलुटली। सो, यू हैव टू हैव पीपल फ्रॉम द रूरल बैकग्राउंड। यू हैव टू हैव पीपल फ्रॉम स्मॉल स्पेसेस। यू हैव टू हैव पीपल फ्रॉम अर्बन स्पेसेस, बिग सिटीज। यू हैव टू हैव पीपल फ्रॉम फार ऑफ प्लेसेस लाइक लद्दाख एंड कश्मीर एंड द नॉट द नॉर्थ ईस्ट। यू हैव टू हैव दोज़ पीपल इन द क्लासरूम। बिकॉज़ वी आर टॉकिंग अबाउट लॉ व्हिच ऑपरेट्स वेरी डिफरेंटली फ्रॉम डिफरेंट पीपल। डिफरेंट पीपल हैव डिफरेंट एक्सपीरियंसेस विद अह लॉ इनफोर्समेंट एजेंसीज़ विद द लैंड लॉज़ फॉर एग्जांपल्स। सो अनलेस यू ब्रिंग ऑल ऑफ़ दोज़ पर्सपेक्टिव्स इन द क्लासरूम बाय मींस ऑफ़ डिस्कशन। इट इज़ नॉट पॉसिबल। सो आई मीन द सिलेक्शन प्रोसेस दैट हैपेंस फॉर मास्टर्स। फॉर एग्जांपल उसमें यह खास ध्यान देते हैं वो लोग कि आप को एज अ डायवर्सिटी फैक्टर हम लाएंगे क्लास में। हम और एक्सपेक्टेशन ये होती है आपसे कि आप क्या कंट्रीब्यूट करेंगे एकेडमिक डिस्कोर्स में। तो मेरा जो ऑक्सफोर्ड का स्टेटमेंट ऑफ पर्पस था फॉर द पर्पस ऑफ एडमिशन आई रिमेंबर वेरी विविडली डिस्क्राइबिंग दैट हाउ एम आई डिफरेंट फ्रॉम वेरियस अदर पीपल फ्रॉम इंडिया हु मे बी अप्लाइंग टू योर कोर्स एंड हाउ माय पर्सनालिटी और माय एक्सपीरियंसेस और माय अंडरस्टैंडिंग एंड यू नो एवरीथिंग दैट माय सीवी हैड टू स्पीक एट दैट पॉइंट वो कैसे बताएगी कि मैं क्या कंट्रीब्यूट करूंगा क्लास में तो ये एक फैक्टर हमको रखना है लॉ स्कूल्स में भी कि ऑल सेड एंड डन हमको एक डायवर्सिटी फैक्टर इंक्लूड करना ही चाहिए। बिकॉज़ अदरवाइज क्लासरूम में डिस्कशन नहीं होगा। इट्स अ डेड क्लासरूम। यू आर टीचिंग टू नोबडी। यू आर माइट एज वेल टीच टू एन एम्प्टी क्लासरूम। जी। तो डिस्कशन क्या होगा? अच्छा डिस्कशन का मतलब ये है कि अलग-अलग व्यू पॉइंट्स आएंगे। अगर सारे लोग जो है वो साउथ दिल्ली अर्बन स्पेस के ही हैं क्लासरूम में तो दे विल एकको ईच अदर। नया तो कुछ आएगा नहीं ना। वो तो जो फॉर एग्जांपल जो कहीं फार ऑफ प्लेस में कहीं रह रहा होगा उसका एक्सपीरियंस ऑफ हाउ जेंडरर्ड द लॉज़ आर इज़ कंप्लीटली डिफरेंट फ्रॉम हाउ अ वूमन इन साउथ दिल्ली वुड बी फ्रेमिंग इट। आई मीन शी विल हैव हर ओन सेट ऑफ़ एक्सपीरियंस। गुड, बैड, अगली, डिफरेंट बट इट विल हैव टू बी प्लेस्ड इन क्लासरूम फॉर पीपल टू अप्रिशिएट इट। तो वो चीज वहां पर पॉसिबल है इन सो कमिंग बैक टू व्हाट प्रोफेसर ढांडा हैड सेड शी सेड दैट लुक इन योर क्लास इट स्टिल यू नो देयर इज़ स्टिल डवर्सिटी बिकॉज़ ऑफ़ व्हाटएवर रीज़ंस बट इन द सब्सीक्वेंट बैचेस आई फाइंड दैट डायवर्सिटी मिसिंग एट दैट पॉइंट ऑफ़ टाइम शी हैड सेड दैट आई डोंट नो व्हाट इज़ द सिचुएशन टुडे बट इट इज़ समथिंग दैट विल मेक द क्लासरूम मोर वाइब्रेंट एंड रिच एंड वंस वी डू दैट वी विल बी एक्चुअली इक्वि इक्विपिंग द टीचर्स एंड देन द स्टूडेंट्स फॉर अ मोर डवर्स क्लासरूम एंड हेंस अ मोर डवर्स डिस्कशन टॉपिक्स एंड रिच एकेडमिक डिस्कोर्स इन द क्लास। आपने जो जो मैंने सवाल किया था ना यू हैव आंसर्ड इट बट इन अ डिफरेंट सेंस फॉर एग्जांपल आई सेड कि भ वो एक्सपीरियंस क्या हम यहां पे ला सकते हैं या नहीं? कॉमन लॉ ट्रेडिशन का एक्सपीरियंस। तो वो जो आप यू नो योर आंसर इज़ वै इंटरेस्टिंग। हां यू आर सेइंग कि अगर आप वो बिल्डिंग वो इंफ्रास्ट्रक्चर या वो हिस्ट्री नहीं ला सकते वो सिर्फ वो लेगसी नहीं ला सकते एटलीस्ट डायवर्सिटी के थ्रू आप बहुत सारी चीजें ला सकते हैं देखिए इंफ्रास्ट्रक्चर बिल्डिंग लेगसी तो पॉसिबल नहीं है। जी बट मैं कह रहा हूं कि एकेडमिक एक्सीलेंस तो स्टिल पॉसिबल है। अब्सोलुटली क्योंकि आपको हम ठीक है। हम आपको ग्लास बिल्डिंग्स नहीं दे सकते लेकिन हम सीमेंट की बिल्डिंग तो दे सकते हैं। जी लेकिन हम आपको एक्सेस टू डेटाबेस तो अभी भी दे सकते हैं। बिल्कुल। और हम आपको ये कम अगर हम आपको अच्छा टीचर नहीं दे सकते कम से कम आपको हम फ्रॉम व्हाटएवर रिसोर्सेज टुडे टेक्नोलॉजी परमिट्स कम से कम ये तो बता सकते हैं कि ये देख लो ये देख लो ये देख लो या इस तरीके से एनरिचमेंट होना चाहिए प्रोसेस में। एंड देन जहां पे आप गलत कर रहे हैं वहां आपका हाथ पकड़ के रोकें कि भाई देखो तुम वकील बनने जा रहे हो। यू आर गोइंग टू बी द आर्किटेक्ट ऑफ फ्यूचर लॉस। एंड देयर फॉर यू नीड टू अंडरस्टैंड द पिटफॉल्स ऑफ द लॉ प्रेजेंट, पास्ट एंड फ्यूचर। यह आपको करना है। तो आपको इसलिए आपको ऐसे वकील बनाने हैं जो कल का कल की जो कोर्ट रूम की एडवोकेसी होगी उसका लेवल ऊपर करें, एलिवेट करें। देखिए हमारे साथ लॉ में तो एक बड़ा बहुत बड़ा प्रॉब्लम ये भी है कि हम 1970 650 के प्रेसिडेंट्स आज भी साइड कर रहे हैं। जी जी। ठीक। 10 5 साल पहले का भी जजमेंट जिससे रीसेंट जजमेंट दैट वी साइड तो हमारे साथ तो प्रॉब्लम ये है कि लॉ ऑफ़ प्रेसिडेंट डेवलप ही इस तरीके से हो रहा है कि यू आई मीन फॉर बेटर फॉर डिसिप्लिन और फॉर व्हाटएवर यू मे कॉल इट वी वांट टू स्टिक टू अ लॉ सो दैट इज़ सर्टेनिटी कि हां भाई इस सिचुएशन में ऐसा ही होता है। दैट्स द रीज़न व्हाई वी हैव प्रेसिडेंट्स। बट द प्रॉब्लम इज़ दैट दैट प्रेसिडेंट शुड नॉट करेल द ग्रोथ ऑफ़ द लॉ। एंड द ग्रोथ ऑफ द लॉ विल हैपन व्हेन द लॉयर्स देमसेल्व कम आर्म्ड विद एडवांसमेंट ऑफ नॉलेज एंड देन प्रेजेंट इट इन कोर्ट एंड द जज विल आल्सो फील कि हां भाई ये तो कुछ नई चीज लेके आए मैं भी थोड़ी मेहनत करूं मैं भी देखूं कि क्या है व्हाट कैन आई कंट्रीब्यूट अदरवाइज ही इज़ गोइंग टू फॉल बैक ऑन व्हाट इज देयर इन 1980 वेरी इंटरेस्टिंग वेरी वेरीरी इंटरेस्टिंग आई मस्ट से क्योंकि एक्चुअली तीन सवाल मेरे ज़हन में है लेकिन मैं कोशिश करता हूं कि इसको मैं वन आफ्टर दे लूं ट्राई टू बी एस ब्रीफ एस पॉसिबल बट बट आई विल स्टार्ट विद द मोस्टेंट क्वेश्चन और मोस्ट इंटरेस्टिंग क्वेश्चन आई वुड से जनरली अंडरस्टैंडिंग ये है कि लॉ का डिटरमिनेशन जुडिशरी करती है। सारा प्रोसेस कि क्या लॉ है क्या होना चाहिए? क्या इसका फ्यूचर होना चाहिए? किस डायरेक्शन में जाना चाहिए? यह जजेस करते हैं। लेकिन यह जो आपने अभी बात कही है, इट्स वेरी वेरी इंटरेस्टिंग कि जो जुडिशियल प्रोसेस है या जो जजमेंट राइटिंग है काफी हद तक वो एडवोकेट्स के आर्गुमेंट से निकलता है। आप जो आर्ग्यू करते हैं वही इनकर्पोरेट होता है। उसके अलावा भी होता है बट वो तो होता ही है। वो तो होता ही है। तो जितना अच्छा आप आर्गुमेंट लाएंगे उतना ही अच्छी क्वालिटी आपको जजमेंट में मिलेगी और वह जो आर्गुममेंटेशन का जो प्रोसेस है वो कहीं ना कहीं कहीं ना कहीं लॉ स्कूल की ट्रेनिंग में बेस्ड है। जो आपने 5 साल जो आपकी ट्रेनिंग हुई अगर वो अच्छी ट्रेनिंग हुई है। अगर आपको अच्छा एक्सपोज़र मिला है या अगर आपको डायवर्सिटी मिली है तो आप बहुत सारी चीजों को समझ पाएंगे। वो जो आपने बात बोली फ्रेम की तो आपको यह समझ में आएगा कि फ्रेम बड़ा कहां करना है या छोटा कहां करना है। तो आई थिंक दैट्स अ वेरी वेरीरी इंटरेस्टिंग ऑब्जरवेशन। अ जो दूसरी चीज मेरे जेहन में थी वो ये कि जो जो डायवर्सिटी का एलिमेंट है वो जनरली क्लासरूम के कॉन्टेक्स्ट में देखा जाता है। एक एक्सपेरिमेंट आईडीआईए भी है इंक्रीजिंग डायवर्सिटी बाय इंक्रीजिंग एक्सेस बाय प्रोफेसर श्यामनाथ बशीर हु इज नो मोर विद अस अनफॉर्चूनेटली तो एक तो वो है लेकिन क्या ये डायवर्सिटी जो है वो प्रोफेसर्स पे भी अप्लाई होनी चाहिए दैट यू शुड हैव अ डवर्स सेट ऑफ टीचर्स जो डवर्स बैकग्राउंड से आए और वो वो आपको पढ़ाने की कोशिश करें। क्या ये भी इंपॉर्टेंट है? आई डोंट सी व्हाई इट शुड नॉट अप्लाई टू टीचर्स आल्सो। बिकॉज़ अगेन इफ द टीचर्स आर ऑफ द सेम बैकग्राउंड और हैव द सेम काइंड ऑफ़ एक्सपीरियंसेस। दे आर दे आर मोर लाइकली टू रेप्लिकेट देयर ओन एक्सपीरियंसेस। तो हमको चाहिए कि एक दूसरे के एक्सपीरियंसेस को चैलेंज भी होना चाहिए टीचर्स के पॉइंट ऑफ व्यू से। जी। दैट इज़ गुड फॉर ग्रोथ। एनीथिंग दैट ब्रिंग्स डायवर्सिटी विद इन द एकेडमिक स्पेस दैट इंक्रीसेस द स्कोप ऑफ अंडरस्टैंडिंग और मेक्स दी अह थिंकिंग डीपर शुड बी ब्रॉट इन। भाई देयर इज़ अ रीज़न। यू मे हैव यू मे हैव ऑल सॉर्ट्स ऑफ़ रेस्ट्रिकशंस बट एकेडमिक फ्रीडम इज़ समथिंग दैट गोज़ मच डीपर। जी। एंड बाय अलविंग ऑल सॉर्ट्स ऑफ़ पीपल टू कम विद इन द एकेडमिक डिस्कोर्स यू आर एक्चुअली एनरचिंग दैट डिस्कोर्स। भ किताब आप लिखते हैं किताब में आपके एक्सपीरियंसेस होते हैं। या जिसकी किताब आप पढ़ रहे हैं उसके एक्सपीरियंसेस होते हैं या उसने किसी और की एक्सपीरियंसेस उसमें लिखे होते हैं। तो अगर किताब मैं बोलूंगा कि भ ये सब्जेक्ट पे ये चार किताबें हैं। लोगों ने अलग-अलग पर्सपेक्टिव से लिखी हैं। तो आप आप उसको प्रेजेंट होना प्रेजेंट करने का मौका दीजिए टीचर्स को। सो ऑब्वियसली दैट हैज़ शुड बी डायवर्सिटी। आई डोंट नो अबाउट द सिलेक्शन प्रोसेस एसेट्रा एंड हाउ सब्जेक्टिव अह शुड दे बी और आर टू बी मेड बट एंड आई डोंट सी रीज़न व्हाई दैट सिलेक्शन ऑफ़ टीचर्स इटसेल्फ शुड नॉट एम एट सम अमाउंट ऑफ़ डवर्सिटी। एंड इनफैक्ट आई मीन आई आई वुड एक्चुअली गो एज़ फार एज़ सेइंग दैट द फोर्स रिजर्वेशन दैट द कॉन्स्टिट्यूशन प्रोवाइड्स। जी। फॉर ब्रिंगिंग इन सम ग्रुप ऑफ पीपल हु हैव अह बीन ट्रेडिशनली एक्सक्लुडेड एज पीपल हु हैव टू बी देर इन द एकेडमिक सेटअप इज़ एन अटेम्प्ट इन ब्रिंगिंग डायवर्सिटी बिकॉज़ आई मीन फॉर एग्जांपल इफ यू गोइंग टू हैव अ डिस्कशन ऑन इक्वलिटी यू इन इन द इंडियन कॉन्टेक्स्ट द इशू ऑफ़ रीजन द इशू ऑफ़ कास्ट द इशू ऑफ़ रिलीजन हैज़ टू कम अप। जी। एंड हु बेटर देन पीपल हुस जनरेशंस हैव सफर्ड दैट। सो यू ब्रिंग दैट इन लेकिन इसमें तला साहब एक डिबेट और आ जाती है व्हिच एटलीस्ट ड्यूरिंग माय टाइम एट एनयूजीएस एटलीस्ट मैंने ये देखा फ्रॉम 2014 टू 17 तीन साल के टाइम में कि ये जो रिप्रेजेंटेशन का मामला है कि कि ड्राइवर्सिटी आपको लानी चाहिए या जो लोग लैकिंग हैं उनको लाना चाहिए। हम वो कई बार हिट होता है आपके ज्योग्राफी से वेस्ट बंगाल में लोकेटेड है तो डोमिसाइल के बेसिस पे ज्यादा रिप्रेजेंटेशन होना चाहिए ये डिबेट एनएलएस बोर में भी काफी दिनों तक है रही अब हो सकता है अभी भी हो तो ये ये जो डिबेट है आप इसको अपने एकेडमिक साइड से कैसे देखते हैं आई एम नॉट आस्किंग यू टू लुक एट फ्रॉम योर एडवोकेट साइड देखिए फ्रॉम लुक एट फ्रॉम फ्रॉम द फ्रॉम अ स्टूडेंट पॉइंट ऑफ व्यू आई जस्ट वांट द बेस्ट टीचर्स। जी फ्रॉम अ स्टूडेंट पॉइंट ऑफ व्यू आई वांट द बेस्ट टीचर्स। बट बट टीचर एंड स्टूडेंट्स दोनों के इस कॉन्टेक्स्ट में कह रहा हूं मैं कि वो जो ज्योग्राफी का जो एक रिप्रेजेंटेशन है हाउ डस इट अफेक्ट अह इन इन द वे यू लुक एट इट? देखिए ज्योग्राफी का इंपॉर्टेंट फैक्टर यह है कि व्हेन यू बिकम यू इफ दी इंस्टीट्यूशन इज़ एट द टॉप। जी। देन पीपल फ्रॉम फार ऑफ़ प्लेसेस आल्सो कम एंड स्टडी इन दोज़ प्लेसेस। जी। एंड सो आर द पीपल हु आर नॉट लोकल ऑफ़ दैट प्लेस। बट व्हाट हैप्पेंस नॉट सो मच इन स्टूडेंट्स बट अ लॉट इन टीचर्स इज़ आल्सो दैट इट इज़ अ टाइम ऑफ़ द लाइफ व्हेन यू हैव टू हैव अ स्टेबल फैमिली लाइफ। सो, यू वांट टू बी इन अ ज्योग्राफी। आई मीन वेयर यू नो, यू सॉर्ट ऑफ़ इन दैट फेज़ ऑफ़ लाइफ वेर यू नो योर फैमिली कैन लिव, योर स्पाउस कैन वर्क, योर चिल्ड्रन कैन गो टू स्कूल। सो यू आल्सो वांट टू बी इन दैट स्पेस बट फॉर स्टूडेंट्स दैट्स नॉट द केस रियली बिकॉज़ यू नो देयर मेन फोकस इज़ कि मुझे इल्म हासिल करना है। उसके लिए मुझे सात समुंदर या सात रेगिस्तान भी पार करके जाना हो तो मैं जाऊंगा। आई मीन वो अलग बात है कि बहुत सारे पेरेंट्स अपने बच्चों को इतना दूर नहीं भेजना चाहते। व्हिच इज़ अ मेजर प्रॉब्लम विद एक्सेस एक्सेसिंग लॉ। अ बट ये प्रॉब्लम है। नाउ कमिंग बैक टू द इशू तो टीचर्स के पॉइंट ऑफ व्यू से इट्स एन एंप्लॉयमेंट अपोरर्चुनिटी वेयर द फैमिली आल्सो नीड्स टू सेटल। सो देयर आर वेरियस अदर देन कंसीडरेशंस अदर देन दी एकेडमिक एक्सीलेंस दैट आल्सो कमिंग दैट देयर आर लेजिटमेट ह्यूमन नीड्स व्हिच यू कांट इग्नोर राइट आई मीन फॉर एग्जांपल ठीक है यू हैव टू आल्सो कंसीडर कि भई फैमिली लाइफ ऑफ़ अ पर्सन तो आपको उनकी फैमिली के लिए उनको खुद को देखना होगा कि भई क्या है प्लस इफ इट्स अ न्यू इंस्टीट्यूशन दैट इंस्टीट्यूशन शुड आल्सो बेनिफिट सम अ लोकल लोकल पीपल इन दैट सेंस सो यू हैव टू टेक दैट इंटू अकाउंट बिकॉज़ यू सी द पॉइंट इज़ अगर हम सुप्रीम कोर्ट की सुप्रीम कोर्ट का भी एंथ्रोपोलॉजिकल स्टडी करें अगर और यह देखें कि यहां कितने लोग कहां-कहां से आए हैं तो यू विल फाइंड सम पीपल कमिंग फ्रॉम बिहार सम पीपल कमिंग फ्रॉम यूपी सम पीपल कमिंग फ्रॉम गुजरात सम फ्रॉम कर्नाटका सम फ्रॉम केरला। सो एसेंशियली द क्वेश्चन इज़ अ एंड सेम फॉर जजेस आल्सो दे कम फ्रॉम डिफरेंट पार्ट्स ऑफ़ द कंट्री। नॉट एवरीबडी इज़ गोइंग टू आय मीन एट फ्रॉम अ दिल्ली यूनिवर्सिटी पॉइंट ऑफ व्यू यू विल हैव अ लार्ज नंबर ऑफ़ जजेस हु स्टडीड इन दिल्ली यूनिवर्सिटी देन वेंट बैक टू प्रैक्टिस इन देयर स्टेट्स एंड देन हैव कम बैक हियर इन अ न्यू अवतार एज़ जज इट टू दिल्ली राइट बट देयर आर आल्सो पीपल हु स्टडीड लोकली बाय लोकल टीचर्स एंड देन दे आर कमिंग हियर सो इन दैट सेंस यू नो एट सम पॉइंट इन लाइफ इट डज़ बिकम लाइक अ मेल्टिंग पॉट व्हेयर इट अकोमोडेट्स पीपल फ्रॉम डिफरेंट बैकग्राउंड्स बट इफ यू लुक एट इट फ्रॉम अह डिफरेंट पॉइंट ऑफ व्यू एंड यू विल लुक एट इट हिस्टोरिकली देन इवन दो वी आर ऑल टुगेदर वी आर एट द एंड ऑफ़ द फेडरेशन ऑफ़ स्टेट्स। जी सो ईच स्टेट हैज़ सम राइट। एंड द कॉन्स्टिट्यूशन आल्सो कंटेंप्लीट्स द सेम। सब्जेक्ट टू रिस्ट्रिक्शंस ऑन हायर एजुकेशन एंड द मेंटेनेंस ऑफ़ क्वालिटी एंड स्टैंडर्ड्स। इट्स द मेन मेन पार्ट ऑफ द स्टेट दैट हैज़ टू डू इट। जी। इन इन दैट कॉन्टेक्स्ट लेट अस ट्राई टू पिक द आईडिया यह थिंग समथिंग सिमिलर आपने और आपके साथ और लोगों ने स्टार्ट करने की कोशिश की थी। आई थिंक आलिम उसका नाम था। उसके बारे में कुछ बताइए। क्या है? तो एक्चुअली नॉट मेनी पीपल नो अबाउट आलिम्स ओरिजिन। इट वाज़ एसेंशियली समथिंग दैट केम आउट ऑफ़ कन्वर्सेशन विथ श्यामनाथ एंड ह कोलीग्स एट आईडीआईए एट द टाइम बिकॉज़ दे सेड दैट लुक व्हाइल वी आर वर्किंग विद आईडीआईए टू इंक्रीज़्ड डायवर्सिटी फ्रॉम वेरियस डिसएडवांटेज ग्रुप्स एंड ओवर द इयर्स वी हैव डन इट बट वी हैव रियलाइज़्ड दैट व्हाइल पीपल फ्रॉम डिफरेंट कास्ट एंड रिलीजन सॉरी डिफरेंट कास्ट एंड रीजंस कम इन एंड द द मुस्लिम स्टूडेंट्स आर नॉट फोर्थ कमिंग जी एंड वी वांट टू डू एन आउटरीच फॉर देम वी वांट टू सी वेयर द मुस्लिम स्टूडेंट्स आर बिकॉज़ यू नो आवर कंट्री हैज़ सब्सटैंशियल मुस्लिम पापुलेशन एंड वी कांट टेक द कंट्री अहेड विदाउट इंक्लूडिंग देम इन द प्रोसेस। सो वी हैव टू हैव देयर रिप्रेजेंटेशन आल्सो इन द क्लास रूम इन नहीं इन द इन द क्लासरूम इन द लीगल प्रोफेशन बिकॉज़ अल्टीमेटली आईडीआईएस एम इज़ लीगल प्रोफेशन जनरली आई मीन क्लासरूम इज़ वन पार्ट ऑफ इट तो अब जस्ट जस्ट फॉर द व्यूअर्स आईडीआईए फोकसेस ऑन जो अंडर प्रिविलेज लोग हैं या अंडर रिप्रेजेंटेड बच्चे हैं उनको फैसिलिटेट करना अच्छे लॉ इंस्टीटश में पढ़ाई करना के लिए फिर उस कॉलेज में एडमिशन हो जाने के बाद वहां कॉलेज में थ्रूउ उनके में हैंड होल्डिंग होती है। क्योंकि कई बार बच्चे आउट ऑफ प्लेस फील करते हैं। उनके पास फाइनेंससेस नहीं होते हैं। उनके पास स्कॉलरशिप्स नहीं होती हैं। उनके पास इंटर्नशिप अपोरर्चुनिटीज नहीं होती हैं। बिकॉज़ आप समझ रहे हैं ना इनेबिलिटी टू फ्रेम अ सेंटेंस इन इंग्लिश कि मैं एक सेंटेंस इंग्लिश का ठीक से नहीं बोल पा रहा हूं या मैं ईमेल नहीं ठीक से लिख पा रहा हूं। उस वजह से आपकी इंटर्नशिप एप्लीकेशन रिजेक्ट होती चली जाएगी। जी। एंड वो अपने आप को रीअर्म करता चला जाएगा। रिजेक्ट हो चुका है। तो उससे बाहर निकालने के लिए नॉट ओनली वन नीड्स टू वर्क ऑन गेटिंग द स्टूडेंट्स फ्रॉम स्कूल्स जी टू लॉ स्कूल्स बट आल्सो ड्यूरिंग देयर जर्नी यू सॉर्ट ऑफ हैंड होल्ड देम कि भाई तुम चलो हम तुम्हारे साथ चल रहे हैं और हमारे साथ पूरा एक कोहोट है तुम परेशान मत हो और उसके बाद जब वो प्रोफेशन में जाना चाहे तो उसको फैसिलिटेट करना फैसिलिटेट करना और प्रोफेशन में भी थोड़ा सा उनका हाथ थामना कि भ चलो देखो और लोग भी हैं हम मिलवा देते हैं बिकॉज़ फर्स्ट जनरेशन का तो अपने चैलेंजेस होते ही हैं। जी। उसके बाद फिर उसके ऊपर से उनके जो रीजनल चैलेंजेस होंगे, जो लिंग्विस्टिक चैलेंजेस होंगे, जो कास्ट चैलेंजेस होंगे वो अलग से तो उन सबके लिए आईडिया ये एक तरीके से इंक्रीज्ड डायवर्सिटी इन द लीगल प्रोफेशन उसका ऑब्जेक्टिव है। हां। तो अब अब उसी के अब उस कॉन्टेक्स्ट में आलिम तो जब शमनाथ से ये बात हुई तो शमनाथ ने ये कहा कि भाई मुसलमान बच्चे कहां हैं? वो क्यों नहीं आते हैं? दला साहब आलिम का मैं फुल फॉर्म पे बता रहा हूं। तो तो शमनाथ से जब ये बात हुई हमारी और दो हमारे साथी और थे तो हम लोगों ने जो है कहा कि अच्छा ठीक है आप आईडीआईए कर रहे हैं हमको पता करने दीजिए कि क्या बात है। तो हम लोगों ने आपस में तीन लोगों ने मिलकर के एक इनफॉर्मल सा एसोसिएशन टाइप का हम लोगों ने बनाया जिसका नाम था एक्सेस टू लीगल एजुकेशन फॉर मुस्लिम्स। आईडिया बीइंग कि भ हम आपको स्कूल से एनकरेज करेंगे कि आप आए इन लॉ स्कूल में या लॉ की पढ़ाई करें और उसके बाद मेन तो ये था कि लॉ की पढ़ाई आप करें। तो हमने क्या किया कि हम शुरू-शुर के दौर में हम लोग कुछ स्कूलों में भी हमने विजिट करी बात करी स्टूडेंट से बोला कि भाई आप लोग लॉ क्यों नहीं पढ़ रहे हैं? तो वो अलग किस्सा है। अलग ही एक उसका एक टेंजेंट है कि क्या जवाब मिलते थे कि लॉ क्यों नहीं करना चाहते हैं लोग? बट एनीवे सो वी ये हमारा कोशिश थी कि स्टूडेंट्स जो 11 12th वाले हैं वो लॉ के लिए पढ़ाई करें और एग्जाम दें लॉ एंट्रेंस का। तो उसमें फिर हमने आइडेंटिफाई किया मान लीजिए 10 या कुछ 12 लोग मिले तो हमने उसमें से कहा कि अच्छा आप आईडीआईए के ही थ्रू तो हमने आईडीआईए से भी बात करी लोगों से कि भाई आप हमारे बच्चों को जो है हमारे बच्चों को क्या मतलब आइडेंटिफाई किया हुआ है माइनॉरिटी स्कूल्स के बच्चे हैं आप इनको अपने ही उसमें संरक्षण में ले लीजिए ताकि ये जहां आपके इतने सारे बच्चे तैयारी कर रहे हैं क्लैट की तो ये दो और कर लेंगे तो समथिंग लाइक दैट तो फिर कुछ लोगों ने करा कुछ ने नहीं करा बट देन फिर क्या हुआ कि हम क्योंकि हम तीनों लोगों का हम लोग ने इसको इंस्टीट्यूशनलाइज नहीं कर पाए और मैं प्रोफेशन में बिजी होता चला गया। फिर लोग आगे बढ़ते चले गए। लेकिन अब ये है कि एट अ पर्सनल लेवल हुएवर इज़ एबल टू डू व्हाटएवर दे आर एबल टू डू। एंड वी आल्सो सिलेक्टेड सम पीपल फ्रॉम डिफरेंट लॉ स्कूल हेल्प देम इन गेटिंग इंटर्नशिप्स। अह सॉर्ट ऑफ़ कनेक्टेड देम विथ पीपल इन डिफरेंट फील्ड्स इन अह ऑर रीजंस अह टु व्हिच दे बिलोंग। सो फॉर एग्जांपल इफ समबडी वाज़ फ्रॉम आसाम एंड सो देन आई हेल्प देम कनेक्ट विद एज़ पीपल लॉयर्स फ्रॉम आसाम सो दैट यू नो दे आर एबल टू कम्युनिकेट देम विथ देम फ्रीली यू मेक देम में देयर मेंटर्स कभी-कभी होता है कि भ मैं ये लिखूं कि वो लिखूं कि मैं क्या करूं कि मैं इंटर्नशिप कहां करूं? हमने कहा भ ये तुम्हारे मेंटर हैं। तुम्हारे गुरु हैं। इनके चरणों में पड़ जाओ। अब ये तुमको आगे नैया पार लगाएंगे। इट जस्ट हेल्प्स पीपल टू यू नो हेल्प। सो दैट्स द काइंड ऑफ़ एक्सरसाइज दैट वी डिड फॉर सम टाइम। बट देन वी गॉट बिजी एंड बिजी इन आवर ओन प्रोफेशन। सो नाउ इट्स बीइंग डन मोर ऑन अ पर्सनल बेसिस। बट द एंड आई रियलाइ आई हैव नॉट बीन एबल टू गेट बैक टू आईडीआईए ऑन वेदर देयर ओन प्रोग्राम हैज़ बीन एबल टू मेक अ हेडवे इंटू गेटिंग मोर पीपल फ्रॉम माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ स्पेसिफिकली मुस्लिम्स एंड क्रिश्चियंस आल्सो इन देयर ओन प्रोग्राम। इफ आई रियली डोंट नो व्हाट्स द ग्राउंड पोजीशन ऑन दैट। तल्हा साहब आप वी आर ट्राइंग टू स्विच गिय्स अ लिटिल बिट। वी कम टू योर बुक नाउ। आपकी जो नई किताब है बहुत इंटरेस्टिंग किताब है। उसकी वजह यह है कि उस टॉपिक पे एटलीस्ट फ्रॉम एन एकेडमिक पर्सेक्टिव मेरी नजर के सामने से तो किताब नहीं गुजरी। जो इस तरीके से प्रोफेशन को इंगेज करें। स्पेशली उन लोगों के लिए जो एंटर करना चाहते हैं उस प्रोफेशन में। थोड़ा सा अपनी किताब का बैकग्राउंड अगर आप दे दें व्यूअर्स के लिए मैं थोड़ा सा बता दूं किताब के बारे में एंड वी विल गो टू योर स्टोरीज। अ द बुक इज ऑल अबाउट द प्रैक्टिस ऑफ लॉ। लॉ की प्रैक्टिस में जब आप एंटर होते हैं तो उसमें जो डिफिकल्टीज होती हैं चाहे ब्रीफ बनाना हो या रिसर्च करनी हो या या यू नो आर्गुममेंट करना हो या क्लाइंट से इंगेज करना हो या प्रोफेशनल एथिक्स के मामलात हो दीज़ आर ऑल दैट हैव बीन डिस्कस्ड बाय तला साहब इन द बुक व्हिच आई थिंक इज वेरी वेरीेंट बट मोर ऑन दैट फ्रॉम योर साइड बट बिफोर दैट स्टोरी स्टोरी उसकी मैं जानना चाहूंगा क्योंकि हमारी आपकी एक कन्वर्सेशन हुई थी जिसमें आपने ब्रीफली इंडिकेट किया था व्हिच आई थिंक इज अगेन वै इंटरेस्टिंग। सो उसकी स्टोरी ऑफ द बुक इज दैट बुक वाज़ अवेलेबल वेरी ब्रॉडली इन एन ऑनलाइन ट्रेनिंग वीडियो पब्लिश्ड बाय ईबीसी लर्निंग इन आई थिंक 2017-18 समटाइ उसका स्टोरी ये है कि आई वाज़ टॉकिंग टू अ सीनियर ऑफ़ माइन अभिनंदन हु स्टार्टेड ईबीसी लर्निंग एंड ही आस्क्ड मी इफ आई आई वुड बी इंटरेस्टेड इन रिकॉर्डिंग लॉ कोर्स ऑन द यू नो लाइक अ वेब फॉर्मेट वेयर इट्स रिकॉर्डेड अह विद विद प्रॉपर एडिटिंग एटसेट्रा सो आई टोल्ड हिम दैट लुक आई हैव बीन विद मिस्टर गोपाल सुब्रमण्यम एंड आई हैव डन क्रिमिनल मैटर्स सिविल मैटर कमर्शियल मैटर्स ऑल काइंड्स ऑफ़ मैटर्स बट आई वुड नॉट एट दिस स्टेज क्लेम टू बी एन एक्सपर्ट इन एनी सब्जेक्ट सो टू कम आउट नाउ एंड से कि भ ये एक मैं कोर्स बना रहा हूं जो कि आर्बिट ेशन पे है या सिविल प्रोसीजर पे है या ट्रांसफर ऑफ़ प्रॉपर्टी पे है। दैट विल नॉट बी पॉसिबल फॉर मी। सो ही सेड लुक इफ यू आर अ जनरल लॉयर एंड यू स्पेंड सो मच टाइम जस्ट यू नो बिटवीन बॉम्बे अह एंड कोर्ट ट्राइबनल्स एंड बॉम्बे देन लखनऊ एंड देन दिल्ली नाउ एंड सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट एंड वेरियस ट्राइबनल्स हियर एंड यू हैव एन अंडरस्टैंडिंग ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव लॉ? देन व्हाई डोंट यू मेक लाइक अ जनरल कोर्स ऑन लिटिगेशन? बिकॉज़ ही सेड एंड इन ट्रू आल्सो ही सेड लुक अ लॉट ऑफ पीपल स्पेशली द फर्स्ट जनरेशन लॉयर्स व्हेन दे एंटर लिटिगेशन दे आर कंप्लीटली एट लॉस एंड दे डोंट नो वेयर टू बिगिन तो उनके लिए जो है ये कोर्ट्स तुम बनाओ और उस एंगल से तुम इसको बनाओ वेरी बेसिक। तो फिर मैंने कहा ठीक है दिस इज समथिंग दैट आई लाइक टू डू बिकॉज़ लाइक आई सेड माय माय गाइडिंग प्रिंसिपल फ्रॉम कॉलेज फ्रॉम स्कूल वास टू बी हेल्पफुल एंड दैट्स व्हाई टेकन अप लॉ सो आई से ठीक है अगर मैं ऐसा कुछ काम करता हूं ऐसे बहुत सारे नए लोगों को मदद मिलती है तो ठीक है आई एम आल्सो अ फर्स्ट जनरेशन लॉयर सो आई आल्सो नेविगेटेड ऑल ऑफ़ दीज़ थिंग्स तो मैंने पहले वीडियो कोर्स बनाया उनके लिए जिसमें यह था कि ब्रीफ क्या होता है हमारे लैंग्वेज में ब्रीफ किसे कहते हैं? उसमें फाइल्स, पेपर्स, ऑर्डर्स कहां पे अरेंज करने हैं? उसमें क्या पढ़ना है? कोर्ट में मैटर्स जाते हैं तो क्या फाइलिंग का प्रोसेस होता है? कब टेक अप होता है? कॉज लिस्ट होती है। कितनी तरह की कॉज लिस्ट होती है? फिर तुमको किस कॉज लिस्ट को ध्यान रखना है। कब तुमको अलर्ट रहना है कि कौन सा मैटर? ऐसा नहीं हो कि तुम बाहर बैठे हो और तुम्हारा मैटर टेक अप हो जाए और वो खत्म हो जाए और तारीख पड़ जाए। सो यू नो दोस दोस काइंड ऑफ थिंग्स एंड अगर आप अगर आप नए हैं प्रोफेशन में तो ये सारी चीजें आपको बहुत परेशान करेंगी। तो उसको ज़हन में रखते हुए जो है फिर मैंने एक कोर्स बनाया और उसकी रिकॉर्डिंग हुई। अ दैट कोर्स वाज़ देयर देन देन आई अह सॉर्ट ऑफ़ ओवर द इयर्स अह लर्नड मोर एंड बिकॉज़ आई देन अह स्टार्टेड हैविंग माय ओन जूनियर्स। व्हेन आई वास डूइंग दिस कोर्स आई वास अ जूनियर मसेल्फ जस्ट गॉन इंडिपेंडेंट आई हैड नो जूनियर्स फिर मैंने जूनियर रखे जूनियर्स को फिर उनका आ जाता था कि सर ये क्यों हो रहा है ऐसे क्यों हो रहा है तो अब मैं क्या करूं तो फिर उनके सवाल जवाब से भी मुझे लगता है कि भ ये चीजें हैं जो मुझे हैंडल करनी है एंड आई थिंक ऑल ऑफ माय जूनियर्स आर फर्स्ट जनरेशन लॉयर्स तो उसको ज़हन में रखते हुए फिर मैंने थोड़ा सा और क्वेश्चंस को रिवाइज करा एंड देन आई कन्व्टेड इंटू अ बुक फॉर्म पोस्ट पोस्ट कोविड क्योंकि मुझे कोविड में लगा कि भाई एटलीस्ट एक काम तो ऐसा करके जाओ कि लोग याद रखें थोड़ा तो फिर मैंने कहा कि फिर मैंने उस किताब पे काम किया एंड फिर आई सेंट इट टू ईस्टर्न बुक कंपनी फॉर कंसीडरेशन फॉर अ मैनुस्क्रिप्ट। सो आई गॉट वेरी गुड फीडबैक फ्रॉम देम। देयर वाज़ वेरी वेरी लिटिल एडिशन दैट आय हैड टू मेक ऑन वन चैप्टर ऑन एथिक्स। एंड वन मोर चैप्टर दे सेड ऑन द रिसर्च दैट दी एडिटर हैज़ दे हैव देयर ओन इन हाउस गाइडेंस ऑन हाउस टू यूज़ एस सीसी बिकॉज़ दैट्स अ वेरी इम्पोर्टेन्ट थिंग यू नो पीपल डोंट इवन नो हाउ टू यूज़ एस सीसी एंड विदाउट देयर इज़ नो सर्वाइवल। सो देन दे ऐडेड दैट चैप्टर एंड देन सो फाइनली द बुक वाज़ आउट लास्ट ईयर इन जून बट बिकॉज़ ऑफ़ वन रीज़न और दी अदर द वी कुड नॉट हैव अ बुक रिलीज़ अ फॉर्मल बुक रिलीज़ इवेंट फॉर दैट। सो दैट्स द स्टोरी बिहाइंड द बुक दैट आई वांटेड अ बुक व्हिच वाज़ एम्ड एट फर्स्ट जनरेशन लॉयर बट वाज़ नॉट एम्ड वाज़ नॉट सरमनाइजिंग देम एंड नॉट लीविंग क्वेश्चंस अनआंसर्ड। हम बीच में कोई चीज नहीं छोड़नी है। एंड तक ये नहीं कि कॉज लिस्ट देख लो। कॉज लिस्ट देख लो डजंट मीन एनीथिंग। वो बेचारे को कॉज लिस्ट ही नहीं पता है। तो माय बुक आल्सो टेल्स देम कि भाई कॉज लिस्ट में कॉज का क्या मतलब है? कॉज लिस्ट क्यों बनती है? कितने तरह की कॉज लिस्ट हो सकती है? है। आई मीन मैंने तो एक जनरल जनरल सी टर्मिनोलॉजी यूज़ करी है। अलग-अलग कोर्ट्स में अलग-अलग नाम से कहलाती है। कहीं एडवांस है, कहीं सप्लीमेंट्री है, कहीं रेगुलर है, कहीं मिसलेनियस है। अलग-अलग नाम से अलग-अलग कोर्टों में होती है। लेकिन चार पांच तरह के कॉज लिस्ट होती है। तो मैंने कहा कि भ ये ये एक कोर्ट में फॉलो होती है। तुम्हारे यहां किसी दूसरे नाम से हो सकती होगी। बट जस्ट बी ऑन अ लुक आउट फॉर दीज़ काइंड ऑफ़ थिंग्स। तो दैट्स हाउ द बुक इज़ डिज़। उसमें एक चैप्टर एथिक्स पे भी है। एक चैप्टर ऑन फीस है। फी अरेंजमेंट फॉर लॉयर्स। देन देयर इज़ अ चैप्टर आल्सो ऑन यूजिंग टेक्नोलॉजी देयर इज़ आल्सो अ चैप्टर ऑन एंड व्हिच इज़ माय फेवरेट इज द चैप्टर ऑन डिसीजन मेकिंग। अच्छा आई होप टू डू कन्वर्ट इट इंटू अ बिगर प्रोजेक्ट एट सम पॉइंट बट सो इट हैज़ वेरियस थिंग्स यू नो दैट हाउ टू जस्ट नेविगेट द लीगल प्रोफेशन। एंड इन द इंट्रोडक्शन ऑफ दैट बुक माय अंडरस्टैंडिंग इज दैट यू सी द इनेशन और द काइंड ऑफ ट्रेनिंग दैट हैपेंस इन द लीगल प्रोफेशन हैपेंस एकजेक्टली द सेम वे इट है यूज्ड टू हैपन विद सूफीस अच्छा आप उनके साथ बैठ के उनके साथ रह के उनकी खिदमत करके सीखते थे हम ये नहीं कि मैं गया हूं और एक सूफी का क्लासरूम है और वहां 40 उनके बैठे हुए हैं स्टूडेंट्स और उन्होंने अपना ब्लैक बोर्ड पे कुछ पढ़ा दिया। कोई सवाल ही नहीं होता। इफ द फर्स्ट लेसन फॉर यू इज टू लर्न ह्यूमिलिटी इन फॉर सूफीस। दे आई मीन फॉर जनरली फॉर एवरीबडी बट फॉर सूफीज़ देन ही विल मेक यू कमिट अ मिस्टेक एंड टिल द टाइम योर बैकबोन इज़ ब्रोकन सो दैट यू लर्न हाउ टू बेंड। ही विल नॉट मूव ऑन टू दी अनदर लेसन। फॉर एग्जांपल, आई मीन वी हैवड सूफी स्टोरीज ऑफ़ दोज़ काइंड्स वेयर यू नो द किंग्स हैव गॉन एंड दे हैव रियली नॉट टेकन इट वैरी ना वेरी वेरी वेल। सो दैट्स द काइंड ऑफ़ अप्रोच दैट द बुक एम्स टू डू बट यू नो कीपिंग इन टाइम्स विद अह कीपिंग इन टेंडम विथ टाइम्स इट इज़ इन अ रिटन फॉर्म। सो द आईडिया इज़ दैट इनेशन इज़ नाउ हियर। इफ यू डोंट गेट एक्सेस टू अ गुड चेंबर व्हिच यू मे नॉट बिकॉज़ यू नो द पीपल द ट्रेनर्स आर लेस एंड द टेकर्स आर मोर बिकॉज़ वी आर हैविंग मोर एंड मोर लॉ स्टूडेंट्स ग्रेजुएटिंग एव्री ईयर एटलीस्ट यू हैव अ बुक टू लैच ऑन टू दैट्स दी आईडिया ऑफ द बुक उस किताब में सबसे इंटरेस्टिंग आस्पेक्ट जो मुझे लगा वो है फीस का चैप्टर करेक्ट क्योंकि वो सबसे स्लिपरी पाथ है जो करियर स्टार्ट कर रहा है क्योंकि उसको पैसा पैसा भी कमाना है, क्लाइंट भी बनाना है तो अगर वो ज्यादा फीस रखेगा या ठीक से मांग नहीं पाएगा या मांगने में हिचकिचाहट करेगा तो उसका काम नहीं होगा। करेक्ट है। एकदम सही है। और ये इतने टची इश्यूज हैं कि अगर आपने कम मांग लिया जो मैंने अपने दोस्तों से समझा है क्योंकि मैंने तो कभी नहीं किया प्रैक्टिस। कभी आपने कम मांग लिया तो उसको यह लगेगा यह छोटा एडवोकेट है। यह छोटा है। यह काम नहीं कर पाएगा। आपने ज्यादा मांग लिया। अच्छा वो इस प्रिजंपशन से जा रहा है कि आप जो भी मांगेंगे ज्यादा मांगेंगे जो हिंदुस्तान का कल्चर है। हां बिल्कुल देन यू नेगोशिएट वो आप नेगोशिएट करेंगे। अब उसमें आप उसको डायरेक्टली नेगोशिएट करें या इनडायरेक्टली नेगोशिएट करें या उसको प्रोसेस का पैसा बनाएं या अपनी प्रैक्टिस का पैसा बनाएं। आई थिंक कि ये इतना इंपॉर्टेंट आस्पेक्ट है उसको थोड़ा सा आप बताइए। नॉट इन मच डिटेल ऑफ कोर्स वन शुड रीड द बुक बट थोड़ा सा अगर आप बताएं तो आई थिंक दैट विल बी वै इंटरेस्टिंग फॉर पीपल। देखिए व्हाटएवर योर फ्री अरेंजमेंट इज जी। पहले तो ये बार काउंसिल रूल्स के हिसाब से होना चाहिए। जी। तो क्लाइंट आपके पास ही आएगा। वो क्लाइंट कई बार क्लाइंट आते हैं। वो दे वांट टू टेक अ चांस। जी के अगर हो गया वकील साहब तो आपको मैं इतनी फीस दूंगा। अगर नहीं हुआ तो मैं इतनी फीस दूंगा। सो दिस काइंड ऑफ कंटेंजेंट फी अरेंजमेंट हमारे कंट्री में इसकी इजाजत नहीं है। हालांकि इन अदर कंट्रीज द लॉ हैज़ इवॉल्वड लेकिन हमारे यहां अभी इसकी इजाजत नहीं है। तो और ये सबसे कॉमन है जो क्लाइंट लेकर के आता है। स्पेशली दोज़ क्लाइंट्स हु आर वाचिंग दीज़ Netflix सीरीज क्योंकि वहां पे यही होता है। वो यही देखते हैं तो उनको लगता है कि यही हम ऑफर कर देंगे। तो यह इससे बचना है बिकॉज़ दिस इज़ नॉट वेरी एथिकल देन यू स्टार्ट हैविंग एन इंटरेस्ट इन द आउटकम ऑफ़ द केस। आई थिंक तो पहला चीज तो ये है। दूसरा ये है कि आपकी जो फीस की डिमांड हो एज अ लॉयर इट शुड बी कमेंसुरेट टू योर स्टैंडिंग। बट बी ओपन एंड अवेलेबल टू आल्सो अपीयरिंग फॉर लिटिल और नो फीस इफ द सिचुएशन और द क्लाइंट्स और डिमांड्स। जी। सो इफ समबडी इज़ इन अ एक्सट्रीम पेन्योरी समबडी इज़ यू नो इन अ समबडीज़ हाउस इज़ बीइंग डेमोलिश्ड समबडीज़ फैमिली इज़ इन अ वेरी डेस्पेरेट सिचुएशन देन यू डोंट टेक एडवांटेज ऑफ अ देयर डिफिकल्टी देन यू से लुक दिस इज़ माई फीस इफ यू आर नॉट एबल टू अफोर्ड मी देन आइदर यू रेफर देयर पर्सन टू समबडी एल्स हु विल यू नो डू इट डू देयर मैटर्स फॉर अ रिड्यूस्ड फीस बट समबडी इज़ रेस्पोंसिबल। इफ यू डू आर टू बिज़ी टू यू नो गिव एनफ टाइम टू देयर केसेस। और अदरवाइज देन यू अदरवाइज यू टेक इट अप। बिकॉज़ यू हैव टू आल्सो एप्रिशिएट दैट इट इज़ अ प्रोफेशन। इवन दो इंक्रीसिंगली डे बाय डे इट इज़ बिकमिंग लाइक अ सर्विस एंड बीइंग व्यू एस सर्विस। इट इज़ अ प्रोफेशन एट दी एंड ऑफ़ द डे। सो व्हाइल यू आर हियर टू अर्न मनी यू आर नॉट हियर टू मेक मनी। सो दैट डिस्टिंशन यू मस्ट बेर इन माइंड। सो डू आस्क फॉर फीस व्हिच पीपल ऑफ योर स्टैंडिंग आस्क और इफ द टाइम सो डिमांड्स। आई मीन जैसे कोई आया क्लाइंट बहुत अर्जेंट मैटर है। एंड इफ ही इज़ एबल टू पे देन यू टेक दैट यू आस्क कि भ आपको इतनी अर्जेंसी में कराना है। आई विल हैव टू आल्सो स्पेंड डिस्रपोर्शननेट अमाउंट ऑफ़ माय टाइम ईटिंग अपॉन माय फैमिलीज़ टाइम, माय पर्सनल टाइम। क्योंकि 24 घंटे तो आपके पास लिमिटेड ही हैं। तो देन यू यू से दैट लुक द फीस फॉर इट विल बी दिस मच। बट कमेंसुरेट टू योर स्टिल टू योर स्टैंडिंग एंड इन एप्रोप्रियट केसेस यू रिड्यूस द फीस। अगर आपको लगता है कि कोई गरीब है बहुत साल से जेल में है नहीं दे पाएगा देन यू रिड्यूस द फीस। सो आई मीन व्हाइल बट इट इज़ गुड टू हैव अ बेंचमार्क। जी ये मेरी अप्रोच रही है और मैं ये बोलूंगा कि आप कम्युनिकेट कर दीजिए। अगर आप यूजुअली इफ यू अरेंजमेंट इट इज़ बेटर दैट यू नो इट इज़ डिसकस्ड बाय अ थर्ड पर्सन रादर देन यू योरसेल्फ गेटिंग इंटू इट। बिकॉज़ यू एज अ लॉयर शुड नॉट हैव एन इंटरेस्ट इन दी फाइनेंसियल पार्ट सो मच। योर फोकस शुड बी ऑन द आई मीन आल्सो एज एन एडमिनिस्ट्रेटिव चेंबर प्रैक्टिस पॉइंट ऑफ व्यू इट्स बेटर लेफ्ट टू पीपल टू डिसाइड। तला साहब आई थिंक ये एक ऐसा सवाल है जो किसी भी नॉर्मल इंसान के ज़हन में है और ये इसका जवाब काफी तवील हो सकता है। काफी लंबा जवाब हो सकता है। बट अगर उसको हम समरी में समझे तो कैसे समझेंगे? स्टार्टिंग फ्रॉम द इंसिडेंट या तो घर डिमोलिश हुआ या मर्डर हुआ या चोरी हो गई या झगड़ा हो गया या कॉपीराइट इशू है साहब कि हमने गाना लिखा था हमको पैसा ही नहीं दिया इन्होंने तो ये जितने सारे इशू स्टार्टिंग फ्रॉम द इशू टिल द जजमेंट जो स्टेजेस हैं इसमें खासतौर पर वकील के कॉन्टेक्स्ट में कि साहब फाइल करना है उसको कैसे फाइल करना है कैसे ब्रीफिंग होगी क्या है या फिर जब हियरिंग हो रही है तो एड्जर्नमेंट है फिर उसमें एक एप्लीकेशन आ रही है इंटरवन इंटरवेंशन है या ये अगर आप इसको बहुत ब्रीफली अगर आप समझा सकें क्योंकि मुझे ऐसा लगता है ना कि लोगों को कुछ टेक्निकिटीज पता होनी चाहिए कि ये आखिर ये प्रोसीड कैसे करता है? क्योंकि अक्सर लोगों के ज़हन में यह बात है कि यार जबरदस्ती केस बढ़ता चला जा रहा है। कई बार ऐसा भी होता है कि केस को बढ़ना जरूरी होता है क्योंकि इशू ही इतना कॉम्प्लेक्स है कि एक पार्टी के हिसाब से नहीं हो सकता। उसमें लोगों को आएंगे तभी होगा। वो इतना कॉम्प्लिकेट जब तक नहीं होगा नहीं वो। कई बार जबरदस्ती खींच रहा है। तो आई थिंक अगर इसको थोड़ा सा भी आप एक्सप्लेन कर दें तो आई थिंक वो वो काफी बेनिफिशियल होगा। देखिए पहले तो सबको यह बात जानना बहुत जरूरी है कि देयर इज नो सिंगल लॉ देयर आर लॉज़। हम मतलब यह कि एक ही चीज को डील करने के लिए एक ही चीज पर बहुत सारे सेट ऑफ लॉज़ लगते हैं। अब आपको एग्जांपल के तौर पे ले लीजिए कि एक एक घर है अगर तो वो घर जिस जमीन पर खड़ा है उसकी ओनरशिप का इशू हो सकता है। फिर वो घर किस तरीके से बना है? उसकी टाउन प्लानिंग रूल्स के हिसाब से म्यूसिपल रूल्स के हिसाब से उसके क्या नक्शा पास होने की जरूरत है या नक्शा पास हुआ? या आप किस एक्सटेंट तक कंस्ट्रक्शन रेज कर सकते हैं। तो डिफरेंट-डिफरेंट सेट्स ऑफ लॉज़ गवर्न डिफरेंट एस्पेक्ट्स और उसके लिए अलग-अलग रेमेडी होती है। जी। ठीक है? तो आम लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि सिचुएशन क्या है? कौन सी मोस्ट एप्रोप्रियट रेमेडी है? वो आपको लेना जरूरी है। कई बार यह होता है कि ये बहुत मैंने देखा है वकीलों के साथ कि आप किसी वकील के पास जाते हैं तो वो आपको ना नहीं करेगा। वो अंडरस्टैंड कर लेगा। वो समझ जाएगा कि हां यह इसमें प्रॉब्लम है। लेकिन क्योंकि अगर उसकी प्रैक्टिस सिविल की होगी तो वो आपसे सिविल का केस डलवा देगा। क्रिमिनल का कुछ मर्डर केस में तो नहीं करेगा। बट मान लीजिए जैसे पड़ोसी का झगड़ा हो गया तो कुछ उसमें सिविल का डलवा देगा अपने हिसाब से। उसकी जो प्रैक्टिस है उससे डिसाइड होगा कि मुकदमे में क्या होगा। हम तो वेरी रेयरली जो है हमारे पेशे के जो भाई हैं हमारे वकील भाई वो लोग करेक्ट एडवाइस हो सकता हो ना दें आपको तो यू मे हैव टू और थ्री रेमेडीज सो यू विल हैव टू चूज़ व्हिच वन टू टेक भाई किसी ने आपके पैसे नहीं दिए तो आप सिविल भी कर सकते हैं लेकिन आप क्रिमिनल के पास जाएंगे तो क्रिमिनल वाला कहेगा साहब ये तो धोखाधड़ी है तो आपसे एक एफआईआर भी करा देगा अब प्रॉब्लम क्या है एंड दिस इज़ एन इंस्टीट्यूशनल प्रॉब्लम एंड रिलेटेड टू डिले इज़ सिविल सिस्टम हमारे हमारे मुल्क में काम नहीं कर रहा है। सूट्स सूट्स एक बार इंजक्शन मिल गया तब उसमें इशू फ्रेम हो रहा है। ये हो रहा है। वो हो रहा है। आर ऑलेंट स्टेजेस बट डिस्रपोशननेटली टाइम लग रहा है। अब दिल्ली में क्या है कि सूट्स मूव फास्टर लेकिन बाकी मुल्क में ऐसा नहीं होता है। सूट मतलब जैसे जमीन किसकी है? हां जमीन किसकी है? या साहब आपने डेफिमेशन का ही सूट कर दिया। फॉर एग्जांपल या सूट फॉर रिकवरी कर लिया कि भाई आपने मुझसे ₹25,000 लिए थे। आपने वापस नहीं किए। आप मेरे दोस्त हैं। आपने ₹25,000 वापस नहीं किए। ठीक। तो अब आप मैं आपके भाई मेरी क्या रेमेडी है आपके? मैं वकील के पास जाता हूं तो वकील कहेगा इनके ऊपर एफआईआर कर दो। या वकील कहेगा इनके ऊपर सूट फॉर रिकवरी दाखिल कर दो। दोनों रेमेडीज हैं। एफआईआर तब बनेगी जब आपका क्रिमिनल इंटेंशन हो पैसे ना वापस करने का शुरू से। मीन दैट्स अ लीगल पॉइंट कि आपने मुझसे पैसे तो ले लिए बहला पुसला करके लेकिन आपका कभी पैसा देने वापस देने का मंशा ही नहीं थी तब क्रिमिनल केस बनेगा या मैंने आपको अमानत रखवाई और आपने अमानत मेरी खयानत कर दी तो क्रिमिनल केस बनेगा। लेकिन अगर आपने मुझसे सिर्फ कर्जा लिया और आप नहीं दे पा रहे हैं। आपके हालात ऐसे हैं कि आप नहीं दे पा रहे हैं तो उस केस में सिविल सूट बनेगा ताकि एंड में डिग्री आए और आपके पास जो भी घर में सोफा बेड पंखा वंखा जो भी है उसकी कुर्की करा के अटैच करा के उसका सेल करा के मैं आपसे ₹25,000 ले पाऊं। ठीक? अब प्रॉब्लम कहां पर है? प्रॉब्लम टू फोल्ड है। एक तो यह कि वकील साहब को सही राय देनी है आपको। दूसरा यह कि वकील साहब आपको यह भी कहेंगे यार देखो बनता तो सिविल है। लेकिन सिविल में कुछ होगा नहीं। तुम्हारा ₹25,000 भी मिलेगा नहीं। और जब मिलेगा तो तुम मर चुकेगे और तुम्हारे बच्चों को मिलेगा और ₹25,000 की कोई वैल्यू रह नहीं जाएगी। तो एक काम करो एफआईआर करो। दो बार पुलिस आके डंडे बजाएगी तो यह आदमी तुमको पैसे दे देगा। तो सिविल सिस्टम के ना काम करने की वजह से क्रिमिनल सिस्टम पर स्ट्रेस पड़ रहा है। अभी आप एक तराजू में समझ लीजिए जो इंसाफ का तराजू है इसके अगर दो पार्ट्स हैं। एक सिविल और एक क्रिमिनल सारा लोड क्रिमिनल पे क्यों है? क्योंकि सिविल सिस्टम काम नहीं कर रहा है। अगर सिविल सिस्टम काम करेगा तो क्रिमिनल पे लोड कम पड़ेगा। जब क्रिमिनल सिस्टम अवेलेबल रहेगा तब असली जो केस हैं रेप के, मर्डर के और इस तरह के जो वायलेंट क्राइम्स हैं या जो सीरियस इकोनमिक क्राइम्स हैं वो वहां पे डील होंगे। हम क्योंकि उसमें भाई कोर्ट कहेगी यार इनके 25,000 के मुकदमे से मुझे फुर्सत मिले तब तो मैं इनका 2500 करोड़ का मुकदमा देखूं। जज तो उतने ही हैं आपके पास। जी। सो वी हैव टू आई मीन एज एन इंस्टीट्यूशनल लेवल आई मीन दिस इज़ आई मीन अगेन आई एम डिट्रैक्टिंग फ्रॉम योर क्वेश्चन। बट एट एन इंस्टीट्यूशनल प्लानिंग कंट्री लेवल वी हैव टू हैव ऑब्वियसली वी हैव टू हैव मोर नंबर ऑफ क्रिमिनल जजेस बट आई थिंक वी नीड टू हैव डीक्लटराइज्ड सिस्टम ऑफ एडजुडिकेशन ऑन द सिविल साइड और कई बार कोर्ट रिपीटेडली कहती है भाई सिविल केस है आप क्रिमिनल केस क्यों दाखिल कर रहे हैं सिविल केस है पार्टीज के बीच में आप क्यों कर रहे हैं किसी ठेकेदार का पैसा नहीं दिया वो क्रिमिनल का एफआईआर करके बैठा हुआ है जो है मियां बीवी में लड़ाई हो गई बीवी अपनी ज्वेलरी लेके चली गई सास की भी कुछ ज्वेलरी लेके चली आपने 406 का मुकदमा कर दिया। तो आई मीन आई मीन जरूरी ठीक है पैसे ले गई वो मैट्रिमोनियल कॉन्टेक्स्ट में बट यह तो सिविल में भी देखा जा सकता है ना जी लेकिन आप क्रिमिनल कर रहे हैं उसको तो और जो जेन्युइन केस है क्रिमिनल में वो फिर डील नहीं हो पा रहे हैं। तो नंबर वन इज दैट यू हैव टू हैव करेक्ट एडवाइस। जी एंड एंड आई एम ओनली टॉकिंग अबाउट कोर्ट। अभी ट्राइबनल का तो मैंने जिक्र भी नहीं करा। जो 5000 ट्राइबनल है हमारे मुल्क में उनके बारे में तो मैंने अभी बोला भी नहीं है। अभी सिर्फ सिविल और क्रिमिनल कोर्ट के बीच में ही यह दास्तान चल रही है। और उसके बाद जो है फिर ट्राइबनल्स में भी इशू आता है कि अच्छा अब आपके पास सिविल में भी कंज्यूमर है। फॉर एग्जांपल जब हमारे फलानी चीज हमने ली थी डिफेक्टिव निकल गई। जी तो आप सिविल सूट करेंगे कि कंज्यूमर में जाएंगे तो वो भी आपको बताएगा वकील साहब कि सिविल जाइए कि कंज्यूमर जाइए। वो प्रोजन कौन सा? हो सकता है वो कंज्यूमर का केस करता हो। कहता हो कंज्यूमर कर लो। हो सकता है वो सिविल का केस करता। हो सकता है वो सिविल ही कर ले। आप सिविल कोर्ट में पहुंचे। सिविल जज कहेगा भैया आप लोग कंज्यूमर में लेके जाओ ना। यहां मेरे पास क्यों लेके आए हो? तो चार डेट के बाद वकील साहब उसको रेजिस्ट करेंगे कि हम बचा लें। इसी कोर्ट में चल जाए। हमारा रोज यहीं आना होता है। कौन जाएगा कंज्यूमर? वो 25 कि.मी. दूर है। मजाक नहीं कर रहा हूं मैं। जी। लखनऊ का डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर फोरम लखनऊ शहर के बाहर है। अच्छा मतलब शहर के बाहर है। है डिस्ट्रिक्ट में ही लेकिन शहर के बाहर है। तो अब वहां वकील भी जाने से कतराएगा जिसको रेगुलरली जाना नहीं हो और क्लाइंट को भी तकलीफ है वहां जाने में। जी। तो आई मीन उन्होंने ये सोचा कि भ शहर फैलेगा तो वहां पहुंच जाएगा तो 15 साल बाद ही शहर के अंदर आ जाएगा और यहां बड़ी जगह मिल रही है। ठीक है। बट दीज़ आर ऑल दीज़ आर ऑल आई मीन प्लानिंग डिजास्टर फ्रॉम अ लेटेंट पॉइंट ऑफ व्यू। अगर मैं यहां निजामुद्दीन में रहता हूं या मैं यहां रहता हूं साउथ दिल्ली में और आप मेरा जो कंज्यूमर कोर्ट है वो अगर आप द्वारका में बना दीजिए तो मैं तो कान पकड़ लूंगा कि द्वारका कौन जाएगा यार आप सेल्फ इंपोज पनिशमेंट हो जाएगी फॉर पर्सुइंग माय ओन केस जी तो आई मीन तो द क्लाइंट द लॉयर विल देन से लुक इट विल बी अ पनिशमेंट फॉर इफ यू हैव टू गो दैट फार सो यू माइट ए वेल फाइल इन साकेत साकेत इस क्लोजर वी विल डू इट हियर हम सो दीज़ आर ऑल सो व्हाई व्हाई डिले तो अब ये तो हो गया कि आपने रेमेडी कौन सी चूज़ करी उसके ऊपर बहुत ज्यादा ज्यादा डिले होता है। मीन आई हैव डॉक्यूमेंटेड एकेडमिक डिस्कोर्स ऑन इट बिकॉज़ आई हैव एक्चुअली फ्रॉम अ सेम कॉज़ ऑफ़ एक्शन देयर वर थ्री कंपनीज़। उन्होंने अलग-अलग कोर्ट में दाखिल करा। सेम कॉज ऑफ़ एक्शन। एक एक जीत के सुप्रीम कोर्ट आई उसका हो गया। एक एक दूसरे था उसने उसको फॉलो करके दूसरे हाई कोर्ट में लगाया। उसका हो गया। उसमें से एक ने सिविल सूट फाइल करा था। वो 10 साल पहले उसमें इश्यूज भी नहीं फ्रेम हुए थे। 1980 का केस था 82 का। हम तो जस्ट द रेमेडी दैट यू चूज़ विल डिपेंड दी आउटकम। सेम इशू सेम इशू सेम इशू उसमें इशू ब्रॉडली ये था कि देयर वाज़ मीन इन इंडिया सिंस यू वांट टू लिसन देयर इज़ दिस कंपनी कॉल्ड एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन। हिंदुस्तानी एक्सपोर्टर्स को कहती है कि साहब आप छोटे-छोटे मुल्क हैं। यहां एक्सपोर्ट करिए। हमको फॉरेन करेंसी आएगी। आप एक्सपोर्ट करिए। कई बार होता है कि छोटे मुल्कों में सामान जा रहा है। अब वहां पे कौन है? कौन नहीं है? वहां से पैसा आएगा कि नहीं आएगा? ये रिस्क एक्सपोर्टर लेना नहीं चाहता है। भाई क्यों लेगा भाई? मैं अपना क्यों 1 करोड़ का सामान वहां भेजूंगा। मुझे पता ही नहीं वो आदमी कौन है। तो एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन का काम ही यही था कि आप भेजिए। हम गारंटी करेंगे कि वो आए नहीं आएगा तो हम आपको पैसा देंगे। ठीक? गवर्नमेंट की ये स्कीम सो दैट फॉरेक्स कम्स इन द 80 इंटरेस्टिंग स्कीम है ये तो बहुत नहीं नहीं जेन्युइन स्कीम है मीन गवर्नमेंट हैज़ टू एनकरेज बिनेसेस टू आई मीन हाउ विल द फॉरेक्स कम टू इंडिया अदरवाइज तो अब कोई एक छोटी कंट्री में कु हो गई वहां पे सारे पेमेंट स्टप हो गए लोगों ने कहा मुझे पैसा भेजना ही नहीं है कहीं जी तो अब तीन लोग फंस गए उसमें एक दोक की कंपनी थी और एक बॉम्बे की थीक वाले वालों ने एक शायद बिहार की थी या एकक की थी बट एनीवे उधर उधर की थी। उन्होंने रिट फाइल करा। हाई कोर्ट ने उसको डिसमिस कर दिया यह कहते हुए कि भ एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन इवन दो इट इज़ ओनड एंड कंट्रोल बाय गवर्नमेंट बट रिट विल नॉट लाई। दिस इज़ योर कमर्शियल डिस्प्यूट यू गो फाइल सिविल सूट और व्हाटएवर योर रेमेडीज यू डू दैट। उसके बाद वो सुप्रीम कोर्ट में आए। सुप्रीम कोर्ट में आए और सुप्रीम कोर्ट ने लंबा चौड़ा जजमेंट दिया। कहा कि साहब आप स्टेट हैं। आपकी जिम्मेदारी है। आपने कॉरपोरेशन है। आपने इन लोगों से इसी बेसिस पर आपने इनसे वहां बिज़नेस करवाया कि आप उसको इंश्योरेंस गारंटी देंगे। और अगर अब आप नहीं दे रहे हैं तो ये बहुत गलत बात है। ये आर्टिकल 14 का वायलेशन है। आपका बिहेवियर इस तरह का नहीं चलेगा। जी गुड केस तो वो वहां से जीत गए। उनके बाद अब पैसा मिला कि नहीं मिला? अब अस्यूमिंग केस के बाद ईसीजी ने लड़भड़ के पैसा दे दिया होगा। इसी को फॉलो करते हुए दूसरे हाई कोर्ट ने भी रिलीफ दे दिया। तो तीन में से दो लोगों को मिल गए। एक भाई साहब ने सिविल सूट फाइल करा बॉम्बे में क्योंकि उनका हेड ऑफिस बॉम्बे में था तो उन्होंने बॉम्बे में सिविल सूट फाइल करा तो वो सिविल सूट मैं 2000 89 में कंपनी का ड्यू डलिजेंस कर रहा था उस टाइम पर वो सूट आया उसका मतलब लिस्ट में पेंडिंग लिटिगेशंस में वो आया एक तो मैंने देखा ये पेंडिंग लिटिगेशन क्या है तो मैंने प्लेंट पढ़ा पूरा तो मुझे समझ में आया कि ये उस केस जो उसके बारे में हमने कॉलेज में पढ़ा था वो केस डिसाइड हो गया था ये उसका ही एक भाई है जो यहां वहां पे इन्होंने सूट दाखिल किया था और उसमें स्टेज क्या थी कि साहब आज तक इशू ही नहीं फ्रेम हुए हैं। तो जस्ट द काइंड ऑफ़ रेमेडी दैट यू चूज़ विल डिटरमिन वेदर यू आर फास्ट ट्रैक्ट और यू आर ऑन अ स्लो रेमेडी। एंड दीज़ आर दिस इज़ व्हाई यू नो द लॉय दैट्स आई मीन अगेन द लॉयर विल डिटरमिन वेदर इट इज़ अ केस ऑफ फॉलोइंग द फ्रेम एक्सपेंडिंग इट और कंस्ट्रक्टिंग इट। जी भाई वह लॉयर जो था उस टाइम पे कोई लॉ नहीं था कि इस तरह के मैटर्स में रिट लाई करेगी कि नहीं करेगी। किसी लॉयर का बढ़िया अंडरस्टैंडिंग था कि नहीं ऐसा कैसे हो सकता है कि गवर्नमेंट है। आप गवर्नमेंट एजेंसी हैं। आपके कहने पर मैंने अपना करोड़ों का सामान भेजा तो आपने हमसे इंश्योरेंस जब दिया है तो आप देंगे ना। दिस अ पब्लिक लॉ इशू? व्हाई शुड आई गो इन अ सिविल सूट एंड स्पेंड इयर्स टुगेदर? जी। तो उन्होंने रिट फाइल करी। अब वो इवेंचुअली सुप्रीम कोर्ट में आकर डिसाइड होगी। टू सम लॉयर हु स्टडीड हिज़ कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ वेल। ही एक्सपेरिमेंटेड दैट एक्सपेरिमेंटल एक्सपेरिमेंट फेल्ड इन द हाई कोर्ट वर्क्ड इन द सुप्रीम कोर्ट टू हिज़ बेनिफिट। हम्म सो दैट्स हाउ यू एक्सपेंड द बाउंड्रीज़ ऑफ़ लॉ फॉर द बेनिफिट ऑफ़ योर क्लाइंट। सो व्हेन कमिंग बैक टू योर क्वेश्चन, कमिंग बैक टू आंसरिंग लॉ पीपल। सो इट्स वेरी डिफिकल्ट टू से कि भई क्या सीधा रास्ता है और क्या हाउ टू अवॉयड एड्जमेंट्स एटसेट्रा? इट्स वेरी डिफिकल्ट। सम इन सम केसेस एड्जमेंट्स आर इंस्टीट्यूशनल फॉर एग्जांपल देयर आर पी देयर आर जजेस लोअर कोर्ट ट्रायल कोर्ट जजेस हु डोंट हैव अ स्टेनोग्राफर जी सो ऑब्वियसली दे विल नॉट बी एबल टू राइट जजमेंट्स हम तो कौन टाइप करेगा जी तो उसकी वजह से इशू होता है देयर वाज़ अ जज आई आई नो ऑफ दैट जज दैट जज कुड नॉट डिक्टेट जजमेंट्स हेल्ड अप फॉर सिक्स मंथ्स बिकॉज़ द स्ट दे डिड नॉट हैव अ हिंदी स्टेनो एंड दे वर अ लेबर कोर्ट जज दे सेड माय ऑब्लिगेशन इज टू गिव जजमेंट्स दैट माय लिटिगेंट कैन अंडरस्टैंड जी माय लिटिगेंट कैन नॉट अंडरस्टैंड इंग्लिश आई कैन फिनिश एंड डिक्टेट इन इंग्लिश बट दैट विल नॉट हेल्प माय क्लाइंट ही विल नॉट बी एबल टू अंडरस्टैंड भाई लेबर है मजदूर आदमी है उसको हिंदी में फैसला नहीं देंगे उसको समझ में नहीं आएगा तो क्या फायदा हम उसके लिए लिख रहे हैं ना जी उसको समझ में आना चाहिए तो दे डिड नॉट नॉट। सो द ऑल द सब मैटर्स में जजमेंट स्टेज पे लगा है। डेट लग रही है, डेट लग रही है। जब तक स्टेनो बाबू आएंगे नहीं, नए स्टेनो अपॉइंट ही नहीं होंगे कोर्ट में तब तक फैसला नहीं आएगा। सो सम रीज़ंस फॉर एडजमेंट आर आल्सो इंस्टीट्यूशनल। ठीक? एंड सम रीज़ंस आर ऑब्वियसली यू नो लॉयर्स आल्सो ट्राई टू अवॉयड समटाइम्स कि वहां बिजी हैं, वहां बिजी हैं, वहां बिजी हैं तो नहीं आएंगे। ठीक है, आई मीन आई सी दैट। बट इट्स अ लिटिगेंट चॉइस टू स्टिक थ्रू दैट लॉयर कि भई मेरा राइट टू चॉइस है कि मैं यही वकील से अपना मुकदमा कराऊंगा। जी एंड कोर्ट्स आल्सो आउट ऑफ ट्रेडिशन एंड रिस्पेक्ट दे आल्सो सॉर्ट ऑफ अकोमोडेट। ठीक है? कई बार ये होता है कि 10:00 बजे वकील नहीं है। 12:00 बजे तक आ जाता है। लेकिन तब तक होता है कि भाई अब तो डेट पड़ चुकी है। अब तो अगली डेट पे आइएगा। तो वो भी होता है ट्रायल कोर्ट में कि अब तो डेट पड़ गई। और दूसरी पार्टी चाहती है कि डेट पड़ जाए जल्दी से। जी। तो हम भी जाए। तो आई मीन दीज़ आर ऑल आई मीन इट्स वेरी डिफिकल्ट टू से इन अ पर्टिकुलर केस व्हाई इट जजमेंट्स। एक आखरी चीज जो एंड जज आर ओवर बर्डन नाई दैट यू हैव टू एक्नॉलेज दैट जज आर ओवर बर्डन यस दैट आई अंडरस्टैंड कि अब अब तो खैर उनको हर रोज शाम में बताना होता है उन्होंने क्या किया है दिन भर में हां दैट इटसेल्फ इज अ जॉब दैट इटसेल्फ इज अ जॉब यस या आखरी चीज जो तला साहब व्हिच आई वुड लाइक टू यू नो टच इज़ योर वर्क एंड योर एक्सपीरियंस विद दी आर्म्ड फोर्स ट्राइबनल्स इन आसाम नॉट आर्म्ड फर्सेस फॉरेनर्स फॉरेनर्स ट्राइबनल्स आसाम आपका जो एक्सपीरियंस है फॉरेनर्स ट्राइबनल्स का एक तो स्टोरी ये है कि यू नो सिटीजनशिप का इशू है। ट्राइबनल्स में जो है वो जुरिसडिक्शन का मैटर है। केसेस बहुत ज्यादा है। एविडेंसेस का इशू है। ये अपनी जगह है। एविडेंस गिविंग का इशू है। बहुत सारी चीजें हैं। लेकिन इस वक्त जो बहुत ज्यादा लोगों को यू नो परेशान कर रही है चीज एंड व्हिच आई आल्सो पर्सनली वुड लाइक टू अंडरस्टैंड। क्या इसको हम एसआईआर के कॉन्टेक्स्ट में देख सकते हैं? जो इस वक्त एसआईआर हो रहा है थ्रू आउट द कंट्री। टेकिंग आसाम एस दी जिसको कहते हैं एस दी प्रिज्म क्या साहब वहां जो हो रहा है या उसकी तरह चीजें और जगह हो रही हैं या फिर आसाम में ही एसआईआर कैसे हो रहा है या कैसे होगा अनफोल्ड विद रिस्पेक्ट टू जो सिटीजनशिप इश्यूज हैं जो इमीग्रेशन इश्यूज हैं इसको क्या एसआईआर के थ्रू देखा जा सकता है एसआईआर के थ्रू देखा जा सकता है या आसाम का एसआईआर तो बहुत साल पहले हो चुका है। जी और आज तक जो फॉरेनर्स ट्राइबनल केसेस देख रहे हैं काफी तादाद उसमें उसी एसआईआर की है। तो मैं तो यह कहूंगा कि आसाम वाज़ अ लैबोरेटरी जी। और इस वक्त पूरे मुल्क का आसामीफिकेशन हो रहा है। हर आसाम में तो आपने लोगों को डाउट कर दिया कि भाई आप तो सिटीजन है ही नहीं। अचानक आपने बहुत सारे लोगों का नाम में डी वोटर लगा दिया उनको 97 में। कई सारी उसमें औरतें हैं। जी ज्यादातर उसमें एक्चुअली औरतें हैं। और अब बिहार में आपने वही किया और बंगाल में आपने वही किया। मीन वी हैव लाइव एग्जांपल्स बट देयर आर टू वेरीेंट डिस्टिंगशंस फ्रॉम आसाम एंड बिहार एंड बंगाल। बिहार में द सुप्रीम कोर्ट रियलाइजिंग द ग्रेविटी ऑफ द प्रॉब्लम एंड द स्केल ऑफ द प्रॉब्लम डायरेक्टेड लीगल एड टू बी प्रोवाइडेड टू ईच ऑफ दोज़ पर्संस हु एवर डाउटेड ओवर एक्सक्लूडेड फ्रॉम द लिस्ट ठीक नेवर डन इन आसाम सेकंड थिंग इन बिहार इज़ दैट बिहार हैज़ एन अपील प्रोसेस इफ योर नेम इज़ एक्सक्लूडेड एंड दोज़ अपील्स आर डिसाइडेड बाय रिटायर्ड हाईकोर्ट जजेस अच्छा राइट नाउ नाउ व्हिच इज़ द फाइट दैट इज़ गोइंग ऑन यू नो इन द सुप्रीम कोर्ट आल्सो वेयर द कोर्ट इज़ सेइंग दैट लुक वी हैव आल्सो प्रोवाइडेड रिटायर्ड हाईकोर्ट जजेस वी हैव कॉल्ड देम यू गिव देम रूम्स मेक देम सीट गिव देम स्पेस यू नो हैव कोर्ट रूम पीपल हु आर एक्सक्लूडेड दे विल हैव देम एडजुडकेट ऑन द इशूज़ ऑफ़ दैट एंड एवरीबडी हु सेइंग आई एम एक्सक्लूडेड कोर्ट इज़ सेइंग गो टू टू दैट एपिलेट ट्राइबनल एंड दी एपिलेट ट्राइबनल इज़ प्रिसाइडेड बाइ नो लेस देन अ रिटायर्ड हाईकोर्ट जज व्हाट इज़ हैप्पेनिंग इन फॉरेन रनर्स ट्रिब्यूनल इन आसाम समबडी हु इज नॉट इवन एलिजिबल टू बी अ डिस्ट्रिक्ट जज जी आर बीइंग मेड मेंबर्स ऑफ़ द फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल। इनिशियली इट स्टार्टेड विद सम ऑफ़ द रिटायर्ड डिस्ट्रिक्ट जजेस। देन राइट नाउ द क्वालिफिकेशन इज़ लोअर्ड बाय एडमिनिस्ट्रेटिव ऑर्डर्स। एंड देन यू हैव पीपल हु आर जस्ट रिक्रूटेड। एंड देन दे आर गिवेन वन पीपीटी प्रेजेंटेशन ऑन ओरिएंटेशन और बीइंग एफटी मेंबर्स एंड देन दे हैव टू प्रिसाइड ओवर द ट्राइबनल्स। सो इफ यू जस्ट लुक एट द शियर डिस्पैरिटी ऑफ़ द लीगल प्रोटेक्शन दैट हैड बीन अफोर्डेड इन बिहार जी दैट इज़ बीइंग अफोर्डेड इनक एंड दैट वाज़ अफोर्डेड इन आसाम एंड नाउ देयर इज़ अ ह्यूज गैप। सो पीपल ऑफ आसाम, पीपल ऑफ बिहार, पीपल ऑफ वेस्ट बंगाल आर इक्वली सिटीजंस ऑफ इंडिया। दे ऑपरेट अंडर द सेम कॉन्स्टिट्यूशन। दे आर अंडर द प्रोटेक्शन शैडो एंड अंब्रेला ऑफ द सेम इक्वलिटी क्लॉज़ इक्वल प्रोटेक्शन गारंटी। बट द ट्रीटमेंट इज़ डिफरेंट। सो समथिंग दैट इज़ बीइंग डन नाउ फॉर वेस्ट बंगाल। दैट इज़ द एक्सक्लूजन एंड द एपेलेट प्रोसेस इज़ समथिंग दैट शुड हैव बीन प्रोवाइडेड इन आसाम। 20 इयर्स एगो देयर वाज़ एक्चुअली वन लेजिसलेशन कॉल्ड आईएमडीटी एक्ट व्हिच वाज़ स्ट्रक डाउन बाय द सुप्रीम कोर्ट ऑन द बेसिस दैट इट प्रोवाइड्स टू मच टू मच प्रोटेक्शन दैट हाउ कैन यू अफोर्ड पीपल हु आर एलएच टू बी फॉरेनर्स हाउ कैन यू गिव देम सो मच प्रोटेक्शन लेट देम प्रूव वेदर दे आर इंडियन सिटीजंस बट यू आर नॉट आस्किंग एन एजुकेटेड पर्सन हु लैंड्स एट इंडियास बॉर्डर एज़ एन एयरपोर्ट बट दीज़ आर ऑल पीपल हु हाउसेस हैव बीन स्वेट लेफ्ट अवे रिपीटेडली बाय ब्रह्मपुत्रा हु हैव मूव्ड फ्रॉम वन विलेज टू अनदर ओवर पीरियड ऑफ़ फोर फाइव सिक्स डेकेड्स हु हैव सफर्ड दी ऑन स्लॉट ऑफ़ नेचर ऑन स्लॉट ऑफ़ वेरियस नेचुरल एंड अदरवाइज़ फोर्सेस। यू आर आस्किंग देम टू प्रोड्यूस डॉक्यूमेंट। एंड देयर दे नो लीव नो गारंटी। नो कंसिस्टेंसी अल्सो। इन हाउ द सिस्टम इज़ अप्लाइड। सो दी फॉरेनर्स ट्राइबनल इन माय असेसमेंट डस नॉट सैटिस्फाई द बेसिक्स ऑफ द रूल ऑफ लॉ गारंटी दैट शुड बी अवेलेबल टू एव्री सिटीजन इन दिस कंट्री एंड व्हिच इज़ एक्सिमलीफाइड बाय द सुप्रीम कोर्ट्स ऑर्डर इन वेस्ट बंगाल केस इफ यू आर डाउटेड इन द वोटर लिस्ट दैट यू मे बी एन आउटसाइडर बंगाली स्पीकिंग पर्सन लिविंग इन वेस्ट बंगाल एंड यू हैव गट योरसेल्फ एनरोल्ड देन व्हाई शुड नॉट अ डिव वोटर ऑफ आसाम हु इज आल्सो बीइंग डाउटेड ब्रॉडली ऑन द सेम ग्राउंड जी बी गिवन द सेम काइंड ऑफ़ प्रोटेक्शन व्हेन द सिटीजनशिप लॉज़ आर अ सेंट्रल लेजिसलेशन गवर्निंग द होल ऑफ़ कंट्री। नाउ दे मे से दैट देयर इज़ अ स्पेशल लेजिस रिजीम फॉर आसाम। एंड देयर इज़ अ स्पेशल बट दैट रिजीम डज़ नॉट प्रोवाइड एन एक्सेप्शन ऑफ़ द काइंड दैट यू विल नॉट बी अफोर्डेड अ ट्राइबनल दैट इज़ फुल्ली एंट्रेंड्ड इन द कॉन्स्टिट्यूशन। अब्सोलुटली। द ट्राइबनल मेंबर्स एक्चुअली द ट्राइबनल मेंबर्स आर ऑन अ थ्री ईयर कॉन्ट्रैक्ट जी अर्लियर सो देन देयर पीपल हु वर टर्मिनेटेड एंड दोज़ पीपल वेंट इन रिड पिटीशन टू द हाई कोर्ट एंड देट जजमेंट इज़ वेरी इंस्ट्रक्टिव एंड आई थिंक यू शुड मेक इट अ पार्ट ऑफ दिस पॉडकास्ट दैट जजमेंट नोट्स द कंटेंशन्स ऑफ द काउंसिल्स एंड वन ऑफ़ द काउंसिल्स देयर आर्ग्यूज़ प्रैक्टिकली इज़ आर्ग्यूइंग दैट आई कैन नोट बी डिसकंटिन्यूएड फ्रॉम माय पोस्ट ऑफ ऑफ़ मेंबर्स फॉर एन अ ट्राइबनल बिकॉज़ आई चूज़ टू डिसाइड इन अ पर्टिकुलर वे। एंड दैट्स हाउ द कॉन्ट्रैक्ट्स आर बीइंग रिन्यूड। एंड अब वो क्वाइट अपार्ट स्टेनो नहीं मिला, स्टेशनरी नहीं मिलती। वो लोग सब चीजें अपनी जेब से लगाते हैं। वो सब भी उसमें नोटेड हैं। बट दैट आई एम नॉट ऑन दैट। आई एम ऑन योर ओन डिसिशनल इंडिपेंडेंस इज़ दैट सफ्फिशिएंटली सेफगार्डेड। द फॉरेनर्स एक्ट 1946 रिपील बाय अ न्यू लेजिसलेशन बट नो सच गारंटीज़ फोर्थ कमिंग इवन इन दैट। एंड इफ यू लुक एट द वाइट पेपर ऑन आसाम व्हिच एक्सप्लेंस ऑन व्हाई दीज़ ट्राइबनल्स आ वाज़ क्रिएटेड इन 1964 ah बाई द फॉरेनर्स ऑर्डर ट्राइबनसल्स ऑर्डर 1964 द आइडिया वाज़ बिकॉज़ इन द इंटरनेशनल कम्युनिटी दे वाज़ समरली थ्रोइंग पीपल ऑफ द बॉर्डर। सो दे सेड लुक इंटरनेशनल कम्युनिटी में बहुत थू-थू हो रही है हमारी दैट वी आर नॉट फॉलोविंग द लॉ। वी कांट जस्ट कलेक्ट पीपल एंड यू नो डिस अ गेट रेड ऑफ़ देम। सो दे सेड ऑलराइट वी विल हेव अह एन एडमिनिस्ट्रेटिव हियरिंग फॉर देम। सो द आईडिया इन 64 बाय क्रिएटिंग अ ट्राइबनल वाज़ टू गिव एन एडमिनिस्ट्रेटिव हियरिंग टू सेटिस्फाई द क्लैमर इन द इंटरनेशनल कम्युनिटी दैट वी आर नॉट फॉलोविंग द रूल ऑफ लॉ एंड इन 6 देयर एनी मोर हां अब तो इंटरनेशनल लॉ इंटरनेशनल लॉ नहीं इंटरनेशनल लॉ तो इस आई मीन हमारे पर्सपेक्टिव से जो भी इंटरनेशनल लॉ था यूनिवर्सल डिक्लेरेशन ऑफ ह्यूमन राइट है या जो बेसिक गारंटीज हैं ऑल ऑफ दिस आर प्रैक्टिकली नाउ एंबेडेड इन आवर ओन लॉ। आई डोंट थिंक इन टुडेेस टाइम एंड डेट यू कैन से कि भ यूडीएचआर इज़ इंटर पार्ट ऑफ इंटरनेशनल लॉ जिससे हमें कोई लेना देना ही नहीं है। जी बिकॉज़ ऑल ऑफ़ दैट इज़ सो बेसिक। आई मीन दैट्स हाउ यू नो द सोसाइटी आल्सो द लॉ आल्सो एडवांस। यू मे से दैट कॉन्स्टिट्यूशन इन 1950 डिड नॉट से डिड नॉट हैव अ ड्यू प्रोसेस क्लॉज़ एंड देयर फॉर व्हाट इज़ दिस ड्यू प्रोसेस गारंटी? आई विल नॉट बिलीव इन दैट। यू मे से फॉर ऑल यू वांट टू। बट द लॉ इन दिस कंट्री हैज़ रिकग्नाइज्ड आर्टिकल 21 एस प्रोवाइडिंग अ ड्यू प्रोसेस। सो द लॉ अगेन गोइंग बैक टू द सेम फ्रेम एग्जांपल इट इज आवर रिस्पांसिबिलिटी एस लॉयर्स टू आर्ग्यू एंड एलिवेट द डिस्कशन एंड आवर सबमिशंस टू अ लेवल दैट द कोर्ट आल्सो फील्स कंसर्न एंड पुश् टू एडवांस द लॉ। ठीक है? लॉ और लेडाउन तो कोर्ट ही करता है। दे मे रिजेक्ट दे मे नॉट रिजेक्ट। दे मे एक्सेप्ट। बट इट इज आवर जॉब टू पर्सुएट देम। और टू टेल देम दैट लुक द हिस्ट्री इज गोइंग टू लुक एट यू फॉर हाउ यू एक्सरसाइज योर डिस्कशन इन अ वे एंड वी कांट बी रिग्रेसिव वी कांट बी गोइंग बैक टू 1950 एंड से नो नो नो दिस रिग्रेसिव स्टैंडर्ड विल अप्लाई एक बार हमने प्रोग्रेस कर लिया सिविलाइजेशन ने ह्यूमन बीइंग ने ह्यूमैनिटी ने तो पीछे जाने का तो सवाल ही नहीं उठता एक आखरी क्वेश्चन मैं चाहता हूं थोड़ा सा इसको पॉजिटिव नोट पे वी एंड इफ आई आस्क कि लॉ का सोशल फंक्शन क्या है? लॉ की रेलेवेंस क्या है? इन अ सिंपल ले मैन टर्म्स क्यों पढ़ना चाहिए? क्यों इंगेज करना चाहिए? क्यों भागना नहीं चाहिए? क्यों समझने की कोशिश करना चाहिए? लॉ का सोशल फंक्शन क्या है? एट लीस्ट इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ इंडिया? आई थिंक जस्ट टू बी रिस्पांसिबल फॉर योर ओन सेल्फ एंड बीइंग रिस्पांसिबल टू अदर्स यू शुड नो व्हाट द लॉ एक्सपेक्ट्स ऑफ यू वन टू इज़ दैट इफ यू फील ओब्लाइज्ड एज अ ह्यूमन बीइंग टू हेल्प अदर ह्यूमन बीइंग्स और इवन एनिमल्स देन यू हैव टू हैव एन अंडरस्टैंड िंग ऑफ नॉट ओनली योर राइट्स बट देयर राइट्स एंड हेल्प देम एक्सरसाइज दैट राइट। आई मीन वी से वेरी ऑफन इन आवर डिस्कोर्सेस एंड एंड इट्स समथिंग दैट वेरी डीपली एंट्रेंच सेड बाय ग्रेट थिंकर्स दैट आई मे डिसए्री विद यू बट आई विल स्टिल प्रोटेक्ट योर राइट टू डिसएग्री विद मी जी एंड आई विल प्रोटेक्ट योर राइट ऑफ़ फ्री स्पीच। सो इन दिस प्रोसेस आई एम अंडरस्टैंडिंग व्हाट माय राइट्स एंड ऑब्लिगेशंस एंड लिमिटेशंस आर बट सो इज योर्स एंड इफ यू आर नॉट एबल टू रियलाइज इट देन एज अ सोसाइटी वी आर नॉट डेवलपिंग बिकॉज़ सोसाइटी का जो जो डेवलपमेंट होता है वो एक कांस्टेंट एक मंथन से होता रहता है जिसे हिंदी में आप कहिए। तो जब तक वो मंथन नहीं होगा तब तक जो है वो ठहराव आ जाएगा और ठहराव सोसाइटी को आगे लेके तो नहीं जाएगा। तो दैट्स दैट आई फील इज द बिगेस्ट सोशल फंक्शन ऑफ अंडरस्टैंडिंग द लॉ कि मैं यह समझूं कि भाई आपके क्या हक हैं? आपकी क्या जिम्मेदारियां हैं? मेरे क्या हक हैं? मेरी क्या जिम्मेदारियां हैं? और आई विल एक्सरसाइज माय राइट्स एंड परफॉर्म माय ड्यूटीज एंड आई विल हेल्प यू डू द सेम। बहुत-बहुत शुक्रिया साहब। बहुत मजा आया। इट वास अ वंडरफुल कॉन्वर्सेशन। एंड आई थिंक वी विल हैव अ लॉट टू लर्न फ्रॉम दिस। एटलीस्ट बहुत सी चीजें इसमें ऐसी निकल के आई हैं जो शायद मैंने भी नहीं सोचा होगा। एटलीस्ट फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ कि लॉयर्स की जरूरत क्या है? क्या फंक्शन है उनका? और बहुत शुक्रिया आपको इसलिए भी क्योंकि आप जो है वह वह नॉलेज आप कॉमन लोगों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। द बुक इज एन एग्जांपल ऑफ दैट। आलिम इनिशिएटिव इज एन एग्जांपल ऑफ दैट। तो आई थिंक आई थिंक इट यू नो वी हैव अ लॉन्ग वे टू गो इंशा्लाह। एंड एंड दिस इज गोइंग टू ब्रिंग फ्रूटफुल रिजल्ट्स इन फ्यूचर। बहुत शुक्रिया। थैंक यू।

Companion article

A factory dispute in Faizabad

Talha Abdul Rahman did not set out to become, in his own words, a "family advocate before he had even graduated." Growing up in Faizabad — the twin city of Ayodhya, a place he describes as tightly knit despite its outside reputation, where neighbours moved freely in and out of each other's homes — Rahman was steered, like many bright students of his generation, toward an engineering entrance exam. He chose law instead, against considerable resistance from a family of engineers and doctors who could not understand, as he told Nous, why someone doing well in maths would abandon it. His father, an engineer who ran a small factory in Faizabad, agreed only on the condition that his son attend nothing less than the best institution in the country.

The turn toward law solidified almost by accident. When Rahman was seven, a labour dispute at his father's factory — a worker's termination triggering a solidarity strike and conciliation proceedings — became a recurring worry discussed at home. Years later, as a law student at NALSAR Hyderabad, his father began forwarding him the same ongoing dispute, asking him to research the applicable law, photocopy the relevant material, and send back instructions with a covering letter for the family's actual lawyers to use. What began as filial duty became a genuine legal education: Rahman worked through labour law and tax law so thoroughly, to help his father navigate an income-tax dispute and VAT troubles alongside the labour case, that he won a gold medal in labour law at NALSAR and was appointed standing counsel for the Income Tax Department at the age of twenty-three or twenty-four — a credential he attributes directly to having effectively studied tax law as a teenager out of necessity rather than curriculum.

What Oxford taught him that law school didn't

After NALSAR, Rahman went to Oxford for a masters, funded by a scholarship, deliberately completing it before beginning full-time practice rather than after — a sequencing he now views with mixed feelings but doesn't regret. His account of the difference between Indian undergraduate legal education and an Oxford-style masters turned on a single distinction: Indian legal training, in his experience, spends most of its energy on what the law is, while a comparative masters programme is organised around why a rule developed the way it did in a given jurisdiction, and how the same problem was solved differently elsewhere. An Oxford tutor's job, he said, was less to teach content than to demolish the illusion of the reading list: "the reading list you've been given isn't a reading list — there are two thousand more articles beyond the twenty I happen to like. Go read." That posture, he argued, produces a different kind of lawyer: not someone trained to recite that a rule applies and a person is inside or outside it — "that's a legal technician's job" — but someone trained to interrogate whether a legal frame fits a given set of facts, where the frame is weak, and whether it should expand or contract. Lawyers, he said pointedly, are not mere spokespersons for their clients on an ethical view of the profession; alongside the obvious duty to assist law enforcement, a lawyer carries responsibility for the law's own development.

Rahman credited his NALSAR professor Amita Dhanda with first flagging, while he was still a student, that Indian law schools lack the classroom diversity they are meant to have — geographic, caste, religious, linguistic — without which, in his account, a classroom simply cannot generate the range of perspectives that legal argument about a genuinely diverse society requires. He extended the point further than his interviewer expected, arguing that faculty diversity matters just as much as student diversity, since teachers of similar backgrounds tend to reproduce their own experiences, and defending constitutional reservations in academic hiring as a legitimate, purposeful tool for bringing perspectives — on caste, religion, region — that are otherwise structurally absent from the room.

Why courts keep citing decades-old judgments

Pressed on why Indian courts often lean on precedents from the 1970s and 1980s rather than more recent reasoning, Rahman located the answer not in judicial conservatism but in the courtroom itself. Judgment writing, he argued, is downstream of argument: a judge builds substantially on what the advocates in front of them actually present, so the quality of precedent a court can draw on is capped by the quality of research and framing lawyers bring into the room. If law schools fail to train advocates who can locate the weaknesses in an existing legal frame — where it should expand, where it should contract — then courts, lacking better material to work with, will keep falling back on whatever settled the question decades ago. Elevating "tomorrow's courtroom advocacy," in his framing, is therefore a training problem as much as a judicial one: a lawyer who arrives armed with genuinely new research and analysis gives a judge a reason to engage freshly with a question rather than defaulting to 1980s precedent.

That argument fed directly into a related debate Rahman has watched play out inside national law schools for years: whether geographic or domicile-based admission quotas dilute or strengthen an institution's ability to build a truly national bench and bar. Speaking from a student's vantage point, he said he simply wants the best teachers regardless of where they come from — but acknowledged that geography shapes faculty recruitment in ways it does not shape student admissions, since students migrating for a five-year professional degree are pursuing knowledge almost by definition, while faculty are also choosing a place to build a stable family life, a factor institutions cannot simply wish away. He pointed out that an anthropological study of the Supreme Court's own bench would find judges who trained locally under regional teachers before returning to Delhi in "a new avatar," alongside those funnelled through a small number of national universities — evidence, in his view, that the legal profession has always functioned as something of a federal meeting point, one the Constitution itself contemplates by leaving higher education substantially to the states, subject to baseline standards.

Aalim, and the students who don't apply

That concern for representation was not only theoretical. Rahman described co-founding an informal, three-person effort called Aalim — Access to Legal Education for Muslims — after conversations with the late Professor Shamnath Basheer, who ran the diversity-focused IDIA programme (Increasing Diversity by Increasing Access). Basheer's team had succeeded in bringing students from various castes and regions into national law schools, he told Rahman, but had noticed Muslim students simply weren't coming forward, and wanted to understand why a community of India's size was effectively invisible in the applicant pool. Rahman and two colleagues began visiting schools, talking to students directly about why they weren't considering law — an exercise he says surfaced answers interesting enough to deserve their own separate conversation — and worked to identify eleven- and twelfth-graders willing to prepare for the national law entrance exam, connecting a handful of them to IDIA's own mentorship networks organised by region so that, for instance, a student from Assam could be paired with an established Assamese lawyer. The effort never became a formal institution; Rahman's own legal practice absorbed him, and the outreach continued, in his telling, more as informal personal mentorship than as an organised programme, leaving him uncertain, by his own admission, how much headway IDIA's parallel effort has since made in recruiting more Muslim and Christian students into the profession.

A guidebook for first-generation lawyers

Much of the conversation turned to Rahman's recent book, published by Eastern Book Company, which grew out of an online training course he was invited to record years earlier by a senior colleague who had started a legal e-learning platform. Rahman was reluctant to present himself as a subject-matter expert on any one field of law, so his colleague suggested something more useful: a course built from his years shuttling between courts and tribunals in Bombay, Lucknow and Delhi, aimed squarely at the practical disorientation of a first-generation lawyer entering litigation with no chamber tradition to fall back on — what a "brief" actually is, how to organise files and orders, how cause lists work and which one to watch so a matter isn't taken up and dismissed while a young lawyer waits outside the wrong courtroom. He revised and expanded the material after fielding years of questions from his own juniors, all of them first-generation lawyers themselves, and converted it into a book during the pandemic. The manuscript needed almost no editing beyond a chapter on legal ethics and an added chapter, at the publisher's insistence, on the proper use of the Supreme Court Cases citation system — "people don't even know how to use SCC, and without it there's no survival," he said.

The book's most quietly practical chapter, he said, is the one on fee-setting, a subject he described as unusually fraught for a young advocate trying simultaneously to build a client base and pay rent. Contingency fee arrangements — where a client offers to pay only if the case succeeds — are common requests, fuelled partly by legal dramas on streaming platforms, but remain flatly impermissible under Bar Council rules, and taking such an arrangement risks giving a lawyer a direct financial stake in a case's outcome. His broader rule was that fees should be set commensurate with a lawyer's standing while remaining genuinely open to reduced or waived fees for clients in real distress — someone facing a demolition, or a family in acute crisis — without ever letting a client's desperation become leverage. He also argued that fee negotiations are best handled through a chamber's administrative staff rather than the arguing lawyer directly, so that a lawyer's own financial interest never visibly colours the advocacy itself: "you are here to earn money, not to make money" — a distinction he said should discipline every fee conversation a lawyer has.

Assam as a laboratory

The conversation's most consequential turn was toward Rahman's direct experience with Foreigners Tribunals in Assam, the quasi-judicial bodies that adjudicate contested citizenship claims arising from the state's National Register of Citizens process. Rahman drew a sharp comparison between the legal protections now being extended in Bihar's ongoing Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls — where the Supreme Court has directed that legal aid be provided to every person doubted or excluded from the voter list, with appeals heard by retired High Court judges — and what he called the total absence of equivalent safeguards for Assam's D-voters (people arbitrarily marked "doubtful" as far back as 1997, disproportionately women), whose citizenship claims are instead adjudicated by Foreigners Tribunal members who, in his account, need not even meet the qualifications required of a district judge, are hired on renewable three-year contracts, and have in documented cases been terminated after ruling in ways the state disfavoured.

"Assam was a laboratory," Rahman said, "and right now the entire country is being Assamified" — a process he traces through West Bengal's own SIR exercise and the same mechanics now surfacing in Bihar. His constitutional objection was precise: Indians in Assam, Bihar and West Bengal are equally citizens operating under the same equal-protection guarantee, yet the tribunal apparatus available to a doubted voter differs by state for no principled reason tied to the underlying citizenship law, which is a central, national piece of legislation. He located the origin of Assam's weaker Foreigners Tribunal regime in the 1983 Illegal Migrants (Determination by Tribunals) Act, struck down by the Supreme Court decades ago for extending, in the court's reasoning, too much procedural protection to people alleged to be foreigners — a ruling Rahman argued ignored that most of the affected population were not educated arrivals at an international airport but families repeatedly displaced by the Brahmaputra's shifting course over generations, asked to produce documentation despite decades of natural upheaval and administrative inconsistency. In his assessment, the Foreigners Tribunal system as currently constituted does not meet the basic rule-of-law guarantee the Constitution promises every citizen — a gap he believes the rest of the country is now at risk of importing, one SIR exercise at a time.

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