Nous Podcast· 25 May 2026· 1:17:54

Are Muslims Politically Abandoned? | Raju Parulekar on the Future of Indian Democracy

In this wide-ranging conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with journalist and political commentator Raju Parulekar on the deepening crisis within India’s opposition politics, the ideological rise of Hindutva, and the silence surrounding anti-Muslim rhetoric in public life. The dis…

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तो कांग्रेस सॉफ्ट टारगेट है बीजेपी के लिए तो कांग्रेस को हराना कभी भी आसान है क्योंकि कांग्रेस के अंदर एक आरएसएस है। एक राहुल जी छोड़े तो कांग्रेस के पास ऐसा कोई पावरफुल नेता नहीं है जो बीजेपी के खिलाफ लड़ सके जिसकी इंटीग्रिटी अभी भी है। ये एक पार्ट हो सकता है कि वो इलेक्शन मैनिपुलेशन कर रहे हैं और उसके जरिए वो सत्ता हासिल कर रहे हैं। लेकिन एक बहुत बड़ा वोट बैंक उन्होंने अपना बना भी तो लिया है 2014 से लेकर अब तक। मैं अपनी तरफ से माफी मांगता हूं आपकी और पूरे मुस्लिम कौम की क्योंकि हर हिंदू इतना ही कर सकता है क्योंकि मैं राहुल गांधी को नहीं समझा सकता या मैं अखिलेश यादव को नहीं समझा सकता। जो लोग वोट नहीं कर पाए जिनका वोटर लिस्ट में नाम नहीं है और वो करोड़ों लोग हैं अलग-अलग राज्यों को मिला लें। उनका आखिर फ्यूचर क्या है? सुवेंदु अधिकारी उन्होंने जो जेनोसाइड की स्पीच दी मुसलमानों के खिलाफ हत्या की स्पीच की है उसमें उन्होंने इजराइल का ही नाम लिया। तो हम यह कह सकते हैं कि टूल्स इजराइल के इस्तेमाल किए [संगीत] जा रहे हैं। लेकिन आईडियोलॉजी तो कहीं ना कहीं यहीं की पनपती हुई है। हिंदुओं ने जब फिल्में बनाई कांग्रेस के टाइम तो हर आतंकवादी मुस्लिम दिखाया। सबसे बड़ी एशिया में आतंकवादी संगठन एलटीटी थी लिट थी। उसके ऊपर हमने कभी एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं दिखाया। या देश का एक बड़ा तबका जो बीजेपी को वोट नहीं करता या जो आरएसएस की आइडियोलॉजी में यकीन नहीं रखता है वो खामोश क्यों है? क्या उनके ऊपर कोई ओनस नहीं है? तो बात यही है उमर खलीद ही याद रखा जाएगा। मुझे नहीं याद रखेंगे कोई क्योंकि उमर खलीद ने वो सहा है इस संविधान के लिए इस देश के लिए जो हम कोई नहीं हम में से कोई नहीं सह सकता। कोई नहीं मीडिया पूछता ना अल्टरनेटिव मीडिया पूछता ना मेन स्ट्रीम मीडिया पूछता कि भाई ये सब आपके नाम पर हो रहा है। आप इसको कंडेम क्यों नहीं करते हैं? नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। आज मेरे साथ मेरे पॉडकास्ट में बेहद खास मेहमान हैं क्योंकि ऑल द वे वो मुंबई से दिल्ली आए हैं इस पॉडकास्ट के लिए और आप सब उनको बहुत अच्छे से जानते हैं। उनको सुनना बहुत पसंद करते हैं और जिस बेबाकी से बहादुरी से वो अपनी बातों को रखते हैं सत्ता की आंखों में आंखें डालकर वो जिस तरह से सवाल पूछते हैं उसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा है और बहुत कुछ उन्हें उसके लेकर झेलना भी पड़ा है। आज हम इस पॉडकास्ट में बात करेंगे कि कैसे एसआईआर की वजह से जो बेसिक राइट है उस राइट से ना सिर्फ देश के मुसलमानों को बल्कि उस तबके को जिनकी शायद कोई आवाज नहीं है वो उनसे वो बेसिक राइट भी छीना जा रहा है। आज हम बात करेंगे मुसलमानों की उस हालत की जो फिलहाल 12 साल जो इस ये शासन है उसके बाद कहां आकर खत्म हो गई है और ये भी सवाल कि क्या अब फिलहाल जो मुसलमानों की स्थिति है क्या वो अब तक की सबसे ज्यादा खतरनाक और खौफनाक स्थिति में आकर पहुंच गई है सवाल यह भी कि विपक्ष इसको लेकर क्या कर रहा है? एक के बाद एक जिस तरह से इलेक्शन जीत रहे हैं नरेंद्र मोदी और अमित शाह उनके हौसले जिस तरह से बुलंद है इस सब में उन लोगों के लिए जो बीजेपी और आरएसएस की आईडियोलॉजी में बिलीव नहीं करते हैं या फिर वो मुसलमान जो लगातार इससे प्रताड़ित हो रहे हैं वो आखिर क्या सोच रहे हैं और उनके लिए क्या बचा है तो मेरे साथ आज हैं राजीव परलेकर जो कि सीनियर जर्नलिस्ट हैं पिटिकल एनालिस्ट भी हैं। लगातार आप उनको तमाम डिजिटल प्लेटफार्म पर अपनी बातों को बेबाकी से रखते हुए आप उनको देखते रहे लेकिन नाउ में वो पहली बार आए हैं। राजू जी बहुत स्वागत है आपका। जी नमस्कार। आई नो बहुत गर्मी है दिल्ली में और मुंबई की गर्मी से शायद थोड़ा सा आपको अलग लग रही होगी यहां पर। लेकिन सत्ता में भी बहुत गर्मी है और खासतौर पर जब हम यह देख रहे हैं कि हाल ही में बंगाल का और आसाम का इलेक्शन भारतीय जनता पार्टी ने जीता है। वो बंगाल जहां पर लग रहा था ममता बनर्जी एक शेरनी की तरह लड़ रही है। इस तरह की बातें की गई। लेकिन उसके बाद भी अगर भारतीय जनता पार्टी इलेक्शन द इलेक्शन जीतती हुई जा रही है। क्या आपको लग रहा है कि क्या एसआईआर ही सिर्फ इसका एक वाहिद आपको रीजन लगता है या इसके साथ आपको और भी रीज़ लगते हैं? और एसआईआर की इस पूरी प्रक्रिया को आप कैसे देख रहे हैं? क्या आपको लग रहा है एक तुर्क का एक ऐसा इक्का हाथ लग गया है भारतीय जनता पार्टी के कि अब उनके लिए कोई इलेक्शन हारना नामुमकिन सा है? देखिए बुशराज जी एक तो एसआईआर जो है यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन तो ये एसआईआर इलेक्शन के लिए नहीं है। ये एक स्मोक स्क्रीन है। एसआईआर का पर्पस बहुत भयानक है और उसके कॉन्सिक्वेंसेस उससे ज्यादा भयानक है। लेकिन उस पे बोलने से पहले मैं कहूंगा कि इलेक्शन जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी को एसआईआर की कोई जरूरत नहीं। उन्होंने ईवीएम से ले ईवीएम चलाने वाले जो अफसर है या इलेक्शन कमीशन है उसे कॉम्प्रोमाइज कर दिया था और 2019 से आज तक जितने भारत में इलेक्शन हुए उसमें जहां चाहे वहां भारतीय जनता पार्टी जीत हासिल की। यहां तक कि लोकसभा में खुद प्रधानमंत्री जिन्हें मेड प्रधानमंत्री जो है वो चुनाव जीते ही नहीं थे बनारस से। लेकिन उनकी जीत यह इलेक्शन की काउंटिंग बंद करके पांच छ घंटा फिर उनको जीते हुए डिक्लेअ कर किया गया। ऐसा देश में कई है। 316 सीट्स एक्चुअली इंडिया गठबंधन ने उस वक्त जीते थे और भारतीय जनता पार्टी की हार हुई थी। लेकिन उसे जीत में बदला गया। फिर 204 के आप 2014 के लोकसभा इलेक्शन उसके बाद इन्होंने समझा कि एक ऐसी स्मोक स्क्रीन खड़ी करनी चाहिए जो लोगों को लगे कि सिर्फ इसकी वजह से हम जीतेंगे। यानी सीधा यानी हम लोग अब लोकतंत्र को मानते ही नहीं है। ऐसा लगे और कोई फर्क नहीं पड़ता। यह लेवल पे आ गया वो और एसआईआर की प्रक्रिया जो है वो शुरू कर दी। उसमें इलेक्शन कमीशन को कुछ करने की देखिए इलेक्शन कमीशन पहले निष्पक्ष होता तो एसआईआर करता ही नहीं। तो वो पहले से निष्पक्ष था ही नहीं। आपको याद होगा 2019 की लोकसभा चुनाव के टाइम नमो टीवी नाम का एक टेलीविजन चैनल आया था। उस वो चलता रहा। किसने शुरू किया था, किसने चलाया कभी इलेक्शन कमिशन ने नहीं पूछा। तो मुझे लगता है राजीव कुमार थे इलेक्शन कमिश्नर। वो ही वो भी इतने ही भ्रष्ट थे, इतने ही कॉम्प्रोमाइज थे। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] इलेक्शन जिताने के लिए आपको समझना चाहिए कि जिनके तिल अभी उनके मास्टर्स हैं यानी इजराइल से सारी चीजें आती है इनकी। तो आपके फोन में पेगेस से लेके जो आपने देखा होगा कि भीमा कोरेगा जो वो हुआ उसके उसके जो आरोपी थे सारे इंटेलेक्चुअल्स थे और लेफ्टिस्ट थे शायद तो उनके कंप्यूटर में मारवेयर था वो अमेरिकन लैबोरेटरीज ने प्रमाण दिया उसको कि इसमें था मारवेयर डाला हुआ इनके ईमेल्स नहीं है और उसमें जैसे स्टैनस्वामी जैसे लोग थे जिनको स्ट्रॉ की बिना स्ट्रॉ के वो मर गए तो वो क्या ही करते देश के खिलाफ ऐसी ऐज भी नहीं थी और उनकी स्थिति भी नहीं थी। सब झूठ था लेकिन यह झूठ लादने के लिए लोगों पर हमारे पास जो मशीनरी आई हमारी रिजीम के पास सत्ता के पास वो इजराइल से आई। तो अब इलेक्शन जितनातना भारतीय जनता पार्टी के लिए इतना मुश्किल नहीं था। 2019 से और कभी मुश्किल नहीं था। हम जो आप समझिए केरल में अभी कांग्रेस की सरकार आई है या तमिलनाडु में विजय और कांग्रेस की सरकार आई है जोसेफ विजय और कांग्रेस की ये बहाल किए हुए ये है विक्ट्रीज है ये भारतीय जनता पार्टी दिखाना चाहती है कि तो बोल नहीं पाए कांग्रेस कि सब जगह हार जाते तो बोलना शुरू करते इलेक्शन लड़ना बंद कर दे तो एक झुनझुन हाथ में देना था एक लॉलीपॉप देना था तो केरलम दे दिया तमिलनाडु दे दिया तो आपको वही ये आपको लगता है कि वो एसआईआर भी अगर तमिलनाडु में तो एसआईआर हुआ है तो क्या आपको लग रहा है कि वहां पर यह सब करके भी इतने बड़े पैमाने पर शायद धांधली नहीं कर सकती। एसआर होने की वजह से स्टिन जी की हार हुई है। हम देखिए बीजेपी क्या करती है हमेशा एक स्ट्रांग प्रादेशिक पार्टी हो या लेफ्ट हो तो उनसे सीधा मुकाबला उनको नहीं करना है। तो स्ट्रांग प्रादेशिक पार्टी हो या लेफ्ट हो तो उनको बीच से हटा के वहां कांग्रेस आ जाती है। तो कांग्रेस सॉफ्ट टारगेट है बीजेपी के लिए। तो कांग्रेस को हराना कभी भी आसान है। क्योंकि कांग्रेस के अंदर एक आरएसएस है। कांग्रेस की जो मार्गदर्शक मंडल में जाने चाहिए। ऐसे लोग अभी भी कांग्रेस में हैं जो राहुल जी भी चाहते हैं कि वो मार्गदर्शक मंडल में जाए। लेकिन कुछ उनकी भी सीमाएं हैं। इसलिए उनको रखा गया है। तो वह लोग जो है वो बीजेपी को आरएसएस को मदद करते हैं या ऐसी बयानबाजी करते हैं या आद आखिर में जाके वह खुद जाते हैं बीजेपी। हम तो कांग्रेस एक बीजेपी की पगडंडी है जो पकड़ के बीजेपी फिर हाईवे बना लेती है। तो आप कहीं भी कांग्रेस आती है केंद्र में छोड़ के तो आप समझिए कि ये बीजेपी के चाहने से ही हुआ है। ओके बड़ी बात बोल रहे हैं आप। हां क्योंकि नहीं मैं देखिए लेवल प्लेइंग फील्ड नहीं है कांग्रेस के लिए। कांग्रेस की संगठन की जो शक्ति है उसको बीजेपी ने बहुत क्षीण कर दिया है। जो कद्दावर कांग्रेसी नेता थे उनको फोड़ के या तो अपनी पार्टी में शामिल कर दिया गया या फिर वो गए। एक राहुल जी छोड़े तो कांग्रेस के पास ऐसा कोई पावरफुल नेता नहीं है जो बीजेपी के खिलाफ लड़ सके जिसकी इंटीग्रिटी अभी भी है। कार्यकर्ता बहुत है। मैं जानता हूं पूरा देश ही कार्यकर्ता है कांग्रेस का। फिर भी ऐसा नहीं है। ऐसी स्थिति में आप यह समझिए कि एक राज्य पूरा कांग्रेस जीतती है तो वह चमत्कार ही मानना चाहिए और वह चमत्कार बिना मशीनरी तटस्थ रहे बिना नहीं हो सकता। लेकिन अगर बीजेपी के लिए देखें तो उनके लिए सबसे बड़ा कॉम्पिटिट जो है वो भी तो कांग्रेस पार्टी ही है। हां लेकिन इसलिए वो कांग्रेस को केंद्र में नहीं आने देंगे ना। एक राज्य देना कोई बड़ी बात नहीं है। वो कभी भी छीन सकते हैं। ऐसा अमित शाह मानते होंगे क्योंकि वो वो राज्य छीनने के लिए लोगों के पास जाने की उनको क्या जरूरत है? महाराष्ट्र में देखिए लोगों के पास गए ही नहीं वो। उन्होंने शिवसेना को फोड़ा और फिर राज्य ले गए। तो वहां की पार्टियां को फोड़ते हैं। जैसे कि अब शुभेंदु अधिकारी ये बने हैं। मुख्यमंत्री बने। सुेंदु अधिकारी वो सातवें मुख्यमंत्री हैं जो बाहरी पार्टी से आए हैं बीजेपी में। सात मुख्यमंत्री बीजेपी के बीजेपी के है ही नहीं। तो उनको चुनाव जीतकर राज्य में आने की जरूरत नहीं। देखिए कांग्रेस को आसान कर देते हैं चुनाव प्रक्रिया वो राज्य में केंद्र में नहीं उनका सीधा सामना अगर कांग्रेस से है तो केंद्र में है तो कांग्रेस के 100 सांसद आ गए एलओपी बन गए राहुल गांधी वो भयानक घटना थी बीजेपी के लिए हम इसलिए राहुल जी का जो एक जो उन्होंने बना के रखा था प्रोपगेंडा से उनका चरित्र हनन किया था उससे वो बाहर आ गए ये ये बहुत बड़ी बड़ी क्षति रही बीजेपी के लिए तो उन्होंने उससे सबक सीखिए। तो कांग्रेस को राज्य देते हैं का मतलब राज्य से केंद्र का कोई वो नहीं है। वो एक्चुअली आप सोचिए कि बीजेपी की आरएसएस की थॉट प्रोसेस ये है कि केंद्र ही सब कुछ है। वो राज्य कोेंस ही नहीं देते। वो राज्य को राज्यपाल के हाथ दे देते हैं। तो मुख्यमंत्री के सर पे वो बैठा रहता है। तो राज्य कांग्रेस को दे या और किसी को दे उनको फर्क नहीं पड़ता। बंगाल की स्थिति अलग थी। बंगाल मुस्लिम बहुल स्टेट है। बंगाल सीमावर्ती स्टेट है। 30% 30% मुस्लिम्स हैं। और बंगाल को एक अपनी अस्मिता है। बांग्ला तो हिंदी हिंदू हिंदुस्तान की जो व्याख्या जैसे जायोनिज्म की तरह नहीं बने। ऐसा राज्य था तो उसको पूरी तरह से नष्ट करना। उनकी अस्मिता को कुचल डालना। आप गारगा चतारजी देखिए वहां की बांग्ला के लिए काम करते हैं भाषा के लिए संस्कृति के लिए उनको जेल में डाला गया फौरन बीजेपी की सरकार आने के बाद तो पूरी तरह से वो बंगाली बंगाल की अस्मिता को धराशाई करेंगे इसलिए उनको राज्य चाहिए था वरना उन्हें ममता बनर्जी मुख्यमंत्री होने से बहुत बड़ी क्षति पहुंच रही थी केंद्र में ऐसा कुछ भी नहीं है या बंगाल बहुत उपजाऊ राज्य था ऐसा भी नहीं है उनके लिए बहुत इंपॉर्टेंट ये था कि हिंदुत्वकरण हां बंगाल का हम एक ही राज्य था जिसका हिंदुत्वकरण साउथ छोड़ के एक ही राज्य बचा था उत्तर पूर्व उत्तर पूर्व और पश्चिम में जो हिंदुत्वकरण नहीं कर पा रहे हैं। हम तो उस बांग्ला बंगाली बंगाल पंजाब अब पंजाब देखिए पंजाब बीजेपी के पास जाएगा। पंजाब कांग्रेस था तो पहले अगर बड़े पैमाने पर वोट चोरी का जो वो किया तो उन्होंने बीजेपी ने जो बीजेपी के साथ गठबंधन किए हुए चुनाव आयोग उनकी प्रक्रिया ने जो टेस्ट केस है वो पंजाब में करके देखा और कांग्रेस की जगह आप पार्टी आ गई क्योंकि बीजेपी सीधा नहीं आ सकती थी तो आप पार्टी अब आप पार्टी की पराजय होगी और बीजेपी आएगी जैसे दिल्ली में हुआ है। हां, यह पगडंडिया बनाएंगे फिर उसके रास्ते बनाएंगे। तो इससे विपक्ष की किसी भी पार्टी की जीत असल में जीत नहीं है। वहां पर बीजेपी पैसिव हो जाती है। चुनावी प्रक्रिया में दखल अंदाजी नहीं करती ताकि उनका रास्ता साफ हो। वो आते हैं तो बीजेपी तय कर लेती है। वो उनके पास पेशेंस है, पैसा है। तय कर लेती कि हम नेक्स्ट टाइम देख लेंगे इनका। आप ये कहना चाह रहे हैं राजू जी कि बीजेपी जितने भी चुनाव जीत रही है और खासतौर पर आपने 204 की आपने बात की 2019 से 19 से आप ये कह रहे हैं कि वो सारे ऑर्गेनिक नहीं है। आप ये कह रहे हैं कि वो चुनाव आयोग की मदद से ये इलेक्शन जो है वो जीते जा रहे हैं। तो फिर जो हम इतने बड़े पैमाने पर जो हम हेट देखते हैं जो इतने बड़े पैमाने पर हम मुसलमानों के खिलाफ होते हुए वो तमाम अत्याचार हम देखते हैं या फिर जो जिन लोगों को उन मोदी की उन रैलियों में या फिर हिंदुत्व की बात करते हुए या हिंदुत्व प्राइड की बात करते हुए ये सब कुछ हम जो देखते हैं वो लोग फिर वो लोग कहां से वो भी तो वो भी तो वही तो वोटर है बीजेपी का तो आप ये एक एक आपस में एक कंट्राडिक्शन लगता है कि ये एक पार्ट हो सकता है कि वह इलेक्शन मैनपुलेशन कर रहे हैं और उसके जरिए वह सत्ता हासिल कर रहे हैं। लेकिन एक बहुत बड़ा वोट बैंक उन्होंने अपना बना भी तो लिया है 2014 से लेकर अब तक। बीजेपी की जीत ऑर्गेनिक नहीं है। सिंथेटिक है। ये मैं कहने कहने पहले से कह रहा हूं। हम लेकिन यानी दो लोग हैं जो कंसिस्टेंटली वोकल रहे हैं। एक मैं और दूसरे परकला प्रभाकर साहब। दोनों का ये कहना है कि विपक्ष को इलेक्शन का बहिष्कार करना चाहिए। बांग्लादेश में हुआ वैसे। खैर विपक्ष सुनेगा नहीं। वो हम कौन होते हैं? लेकिन इस पर आप कहिए कि समझिए कि यह बात हम कहने वाले हम ही नहीं है। खुद राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके वोट चोरी को सामने लाया था। तो वोट चोरी होते हैं। अगर सत्ता में बीजेपी बैठी है तो वोट चोरी करके भी वो खुद नहीं जीते। ऐसा कोई इंतजाम करेगी क्या? उनके लिए जो ठीक है वही पार्टी सत्ता में आएगी या तो फिर खुद आएंगे। हम तो वोट चोरी का यही मतलब तो यह कह सकते हैं कि भाई देखिए विपक्ष तो यह इल्जाम लगाएगा ही क्योंकि वो सत्ता में नहीं आ रहे थे बीजेपी पे इल्जाम लगा रहे हैं। अन्य टाइम पे अन्य नेता इल्जाम लगाना अलग बात है। कांग्रेस की प्रेस कॉन्फ्रेंस पार्टी की नहीं अकेले राहुल गांधी राहुल गांधी एक तो पहले कभी झूठ ही नहीं बोलते। पुख्ता सबूत ना होते तो वो बोलते नहीं। और उन्होंने पूरे उदाहरणों के साथ पूरे तर्क के साथ आपको उन्होंने लोगों को ही बुलाया था। जिन्होंने वोट दिए और उनके आए नहीं। रिफ्लेक्ट ही नहीं हुए। हम तो वोट चोरी का मुद्दा जो है वह मैं नहीं कह रहा हूं कि ऑर्गेनिक नहीं है। सिंथेटिक है। यह सिद्ध हो चुका है। उसके ऊपर चक्रवर्ती साहब ने बहुत बड़े एस्स लिखे हैं। वायर ने उसके कितने आर्टिकल्स उसने पब्लिश किए। तो ये तो आम बात है। हम लोग मुस्लिम्स का जो पूरी तरह से लिंचिंग से लेके अब जेनोसाइड तक बात आ गई है। उस पर आने से पहले आपका जो पहला सवाल था एकदम पहला जो एसआईआर का उस पे मैं पहले आता हूं। जी देखिए मुसलमानों के अ मानवाधिकार का हनन 2014 से निरंतर शुरू हुआ। 2016 से उसको गति प्राप्त हुई और अब अब तो ऐसा हो गया है कि कभी भी मुसलमानों का जेनोसाइड कोई भी कर सकता है और ये एक ऐसा लगता है अब ये तो फैशन हो गया है कोई भी मुस्लिम चाचा देखे बुजुर्ग व्यक्ति देखे तो उनको ऐसा पकड़ो जय श्री राम बोलने के लिए ना उनकी आप एजुकेशन लिखो हैसियत देखो उम्र देखो कुछ भी नहीं देखते इस देश का युवा भ्रमित हो गया है हिंदू युवा उसका भ्रमित किया गया है लेकिन ये इस पर हम आएंगे वो वो किसने किया, कैसे किया? आपने जो पूछा उसका जवाब दूंगा। लेकिन एसआईआर की प्रक्रिया पे पहले बात करता हूं। मुसलमानों की आइडेंटिटी को, उनकी अस्तित्व को चैलेंज सबसे बड़ा आजादी के बाद अगर किसी ने दिया होगा तो अमित शाह ने जब सीएए एनआरसी वाला मामला पटल पर रखा तब आया था। लेकिन उसमें सिटीजन शब्द था। तो आपको समझ में आया कि ये सिटीजनशिप को वो कर रहे हैं। मुसलमानों के सिटीजनशिप को खारिज करेंगे। नाम डॉग एंड शूटिंग काइंड ऑफ स्ट्रेटजी थी उसमें लेकिन [नाक से की जाने वाली आवाज़] उनके उसको इतना बैकलैश होने के बाद उनको समझ में आया कि इसको अलग तरीके से लाना चाहिए। तो अलग रूप धारण करके एसआईआर लाया गया। आप समझिए कि बंगाल में 1 लाख मतदाताओं को डिलीट कर दिया गया। तमिलनाडु में एक सॉरी बंगाल में 1 करोड़ वोट मतदाताओं को डिलीट किया गया। तमिलनाडु में एक करोड़ को डिलीट किया गया है। 2 करोड़ 83 लाख वोटर्स को यूपी से डिलीट मारा गया। ऐसे ही देश में मारे जाएंगे। महाराष्ट्र में शुरू हो रहा है। तो आप समझिए ये इजराइलनाइजेशन है भारत का। यानी इजराइल सिर्फ यहूदियों का देश है। वैसे यह हिंदुओं का देश है। यह बीजेप बीजेपीकरण जो भाजपाकरण आरएसएस करण जो भारत का होना है वो इजराइल द्वारा हो रहा है। वी आर एनस्लेव्ड बाय इजराइल। ट्राई टू अंडरस्टैंड। और ये इस्लामाोफोबिया है। ये कल्टीवेटेड है बाय इजराइल। हमने देखिए जो नित्यन नेहू गाजा और लेबनॉन में कर रहे हैं। मोदी रिजीम भारत में ही अपने ही संविधान पसंद शांति अमन पसंद लोगों के खिलाफ 2014 से एक तरफा जंग छेड़ के वही कर रही है। साइकोलॉजिकल वॉरफेयर से मुसलमानों को गाजा में जो फिजिकल किया गया वो साइकोलॉजिकल और कुछ हद तक फिजिकल भी किया। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] एसआईआर के माध्यम से उनको पूरे उनका अस्तित्व को ही मिटा देंगे। मुझे इतने मैसेज आते हैं। आपको मैं बताता हूं। मुझे बेंगलुरु से मैसेज आते हैं। मुझे साउथ से ज्यादा आते हैं। मुस्लिम मेरे दोस्त या चाहने वाले अब मैं जिनको जानता नहीं उनके कि यहां तक गए लोग बोलते हैं कि मैं अपने बच्चों को मुंह क्या दिखाऊं। नाम ही नहीं कहीं रखेगा। मेरे पास पासपोर्ट है। मैं सेना भारतीय सेना में काम किया है। मैंने ये जंग लड़ी है। वो जंग लड़ी है। कारगिल में मैं था। फिर भी मेरा नाम नहीं है। तो मेरे बच्चों को क्या करूं मैं? हम तो करना क्या है ये मुसलमानों को नहीं मालूम और इन उनको यह भी नहीं बताया जा रहा है विपक्ष द्वारा कि बीजेपी जो कर रही है इजराइल के कहने पर वो मास्टर्स के लिए कर रहे हैं। देखिए बीजेपी के जो भी सत्ता में है वो इजराइल की वजह से है। वो मोसाद की वजह से है। दे आर इनफिल्ट इनफिल्ट्रेटेड एवरीवेयर जुडिशरी में चुनाव आयोग में आप वो हिंदुस्तानी भी है। आप समझिए कि ब्रिटिश शासन के लिए काम करने वाले सारे ब्रिटिश नहीं थे। हम हां। सारे गोरे नहीं थे। सारे काले ही थे। गोरे 300 ही थे। वैसे सारे इजराइली आपको दिखेंगे नहीं। इजराइल का इनफिल्ट्रेशन का मतलब माइंडसेट वो कर दिया है। सेट कर दिया उनको। तो ये कहा जा सकता है कि आप बहुत एक्सट्रीम बात कर रहे हैं। एक्सट्रीम क्या है? आज तक का एक जर्नलिस्ट है। मैं आपका नाम बताऊं आपको। नाम अगर चाहिए तो मैं बताता हूं। आप समझ गई होगी नाम कौन है। वो जिस तरह से बात करता है तो वो उसके हाथ में चार बम दे तो वो खुद जा गा डाल दे। तो यहां तक बात आ गई गोदी मीडिया तक। ईरान को टेररिस्ट नेशन तो आप मुझे बताइए तो मैं कौन सी एक्सट्रीम बात कर रहा हूं जो दिख रहा है वो अंधे होकर देखे नहीं तो फिर तो आप ये कह रहे हैं कि हर तरीके बात एक्सट्रीम हो गई है मैं कर नहीं रहा हूं मैं जो हो रहा है वो बोल रहा हूं मेरा काम पोस्टमन का है बीजेपी को मुझसे आपसे दुश्मनी इसलिए होगी कि हम लोग सच में सच्चे मैसेज पहुंचा रहे हैं वो चाहते हैं कि लोगों की इंफॉर्मेशन के जरिए सारे काट ताकि लोगों को पता ही नहीं चले कितने मुस्लिम मारे गए हैं। कितने मुस्लिमों के नाम निकाले गए हैं। कितने तो जब आप यह कहते हैं राजू जी कि भारत का इजराइलीकरण हो रहा है। तो एसआईआर तो उसके सबसे बड़ा उदाहरण है और एसआईआर ना मानवतावाद है ना संविधान की तरह हो रहा है। ये एक देशद्रोह का काम हो रहा है। वही कह सकते हैं कि भाई हम तो जैसे शुद्धिकरण जिस वर्ड का उन्होंने इस्तेमाल किया है कि भ जो लोग मर गए जो लोग वहां से चले गए या जिनके एक जगह से दो दो से ज्यादा जिनके वोटर आईडी में उनकी वोटर लिस्ट में नाम है हम तो उनका वो कर रहे हैं तो इसमें आप हर चीज आपको इस पे विपक्ष को एक सेकंड सॉरी मैं डिस्टर्ब यानी मैं इंटरप्ट इसलिए किया क्योंकि मुझे दिमाग में एक बात आई कि एक करोड़ लोग जो बंगाल के हैं एक करोड़ तमिलनाडु के हैं 2 करोड़ 83 लाख उत्तर प्रदेश के महाराष्ट्र के भी करोड़ निकलेंगे। हम ये सारे जिंदा लोग एक्चुअल नागरिक हैं। उनमें से कहीं सेना में कहीं कुछ ना कुछ उन्होंने लाइफ में देश के लिए किया है। ये सारे लोग जब तक प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सामने खड़े होकर नहीं कहते कि भाई साहब हम नागरिक हैं। हमने देश के लिए आपसे ज्यादा किया है तब तक वो आपको यहां सूर्य और यहां जयद्रथ जैसे महाभारत में था वैसा नहीं पता चलेगा। ये लेवल पे बात आ चुकी है और विपक्ष इनको ला नहीं रहा है रास्ते पर। नहीं वही मेरा सवाल है। मैं उसी पे ही लाने वाली थी कि जब हम ये बात करते हैं कि बंगाल में 1 करोड़ लोग जो हैं उनको किस तरह से वोटर लिस्ट से उनको हटा दिया गया है। डिलीट किया गया अलग-अलग तरीके से। 27 लाख लोगों को तो ये कह दिया गया कि इस बार नहीं तो आप अगली बार कर दीजिएगा। वोट जैसे कोई हलवा है कि अभी नहीं तो थोड़ी देर बाद खा लीजिएगा। मीडिया जुडिशरी कह रही है। जुडिशरी कह और शुभेंदु अधिकारी और इसके अलावा जेनोसाइड का उन्होंने पूरा वो किया आवाहन किया। तो बंगाल में भी कई जो मुख्यमंत्री बिहार के ही मुख्यमंत्री वो ये कह रहे हैं कि जिनके पास वोटर आईडी नहीं है या वोटर लिस्ट में नहीं है उनको सरकारी जो स्कीम्स हैं उनका फायदा भी नहीं मिलेगा। तो आप ये आखिर मेरा सवाल बार-बार मेरे ज़हन में जो सवाल आता है राजू जी वो ये कि जो लोग वोट नहीं कर पाए जिनका वोटर लिस्ट में नाम नहीं है और वो करोड़ों लोग हैं अलग-अलग राज्यों को मिला लें। उनका आखिर फ्यूचर क्या है? नहीं नहीं उनका कोई फ्यूचर नहीं है। उन्हें यह समझना चाहिए उनके लिए उनको रास्ते पर ला रहे हैं। सरकार मोदी सत्ता उसको उनको रास्ते पर ला रही है। तो उनको रास्ते पर आना चाहिए। अगर ला ही रहे हैं तो आना चाहिए। उनको क्या लग रहा है? कुछ देखिए आप एक घर में अगर वोट कटते हैं तो उनको लगता है चलो वोटिंग नहीं कर पाए। वो ये बात नहीं है। उनको इससे ठीक से समझना चाहिए। आपका वोटिंग नहीं कटा है। सिर्फ वोटिंग नहीं कटा है। आपका पासपोर्ट भी जाएगा। आपकी सिटीजनशिप जा रही है। आप किसी भी देश के पृथ्वी धरातल पर नागरिक नहीं रहोगे। और ऐसे लोगों की गिनती आखिर में कुछ सालों में यह होगा कि देखिए पूरे देश में 50 करोड़ ऐसे लोग थे जो मुसलमान होंगे कि जिनका कोई भारत से संबंध ही नहीं है। हम और उनको क्या करें? तो जेनोसाइड की बात आती है। तो बाहर का कोई देश लेने वाला नहीं है। तो 50 करोड़ जो लोग है वो बोझ है भारत पे। ये ये आपको पढ़ाया जाएगा हिंदुओं को। तो ये कल्टीवेटेड जो आप कह रहे हैं कि ये जो नफरत है ये जो हिंसा है ये भारत की नहीं गंगा जमीनी तब भी भारत की है। तो फिर ये कहां से आ गई? तो ये इजराइल से आ गई। और दूसरा बीजेपी के पास सत्ता है, मोदी के पास सत्ता है, शाह के पास सत्ता है। तो उनके पक्ष में बोलने के लिए सब तैयार है। उनके जो समर्थक है वो भले 30% हो भारत में लेकिन वो वोकल है और आपके समर्थक 70% होंगे तभी बोलेंगे नहीं चुप बैठेंगे क्योंकि वो डरे हुए हैं। हम तो आपको ये लगता है कि उनके समर्थक ज्यादा है क्योंकि बोल रहे हैं। आपके समर्थक जिस दिन बोलेंगे ना उस दिन वो खुद भी बोलना बंद कर देंगे। दो चीजें मैं यहां पर आपसे पूछना चाह रही एक जब आप ये कहते हैं कि वो वोकल है और जब आप ये कहते हैं कि देखिए ये हमारी तो गंगा जमुनी तहजीब है और ये इजराइल से ये आया हुआ है। लेकिन हम देखें तो आरएसएस तो पिछले 100 साल से है और आरएसएस लगातार ये काम कर रही है। आरएसएस ऑलमोस्ट घर-घर है और वो किस तरह से ब्रेन वाशिंग से लेकर तमाम तरह का जो काम किया जा रहा है। बीजेपी ऐसे ही तो सत्ता में नहीं आ गई। दो से वो किस तरह से 300 300 के पार तक वो पहुंच गई। तो इसका मतलब तो ये है कि एक बड़ा चंक एक बड़ा वोट बैंक है जो उनकी आईडियोलॉजी में जो इन सब में जो है वो एक तरह से यकीन करता है। तो हम ये कह सकते हैं कि टूल्स इजराइल के इस्तेमाल किए जा रहे हैं। लेकिन आईडियोलॉजी तो कहीं ना कहीं यहीं की पनपती हुई है। आरएसएस के जो समर्थक है वो 1920 पकड़ो लेकिन 100 सालों में ना बड़े हैं ना कम हुए हैं। आरएसएस मैदान में नहीं मन में होती है। तो जो समर्थक थे उतने ही हैं। यह जो आप आंकड़े बताएं इलेक्शन से जीते हुए सीट्स के वह 2014 से ही झूठ है। क्योंकि 2014 में अचानक 200 के ऊपर से 44 पे कांग्रेस नहीं आ सकती थी। ये तो कांग्रेस का आत्मभान खत्म हो गया है कि उन्हें लड़ने की ताकत ही नहीं बची। हम वरना कांग्रेस हारी ही नहीं थी इतनी बुरी तरह से और वो निरंतर हारती चली गई। इसका इसकी वजह कोई उनको हरा रहा है तो उसका यह यह हमारा काम नहीं है ना कांग्रेस को जिताना या कांग्रेस को कौन हरा रहा है देखिए लोगों ने कांग्रेस को भरभर के वोट दिया विपक्ष को भरभर के वोट दिया और उनके 316 सीट्स आ गए हमने अभ्यास से पता कराया पर कला प्रभाकर ने वो बोल भी दिया [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन वो 316 सीट आपके और हमारे वोट्स जो है वो एक हम ट्रस्टी के पास देते हैं। वो ट्रस्टी कभी विपक्ष कोई भी पार्टी होती है तो कांग्रेस के पास दिए तो वह हमारे वोट है उनका वो उनको बचा के रखने हैं उनकी ट्रस्टीशिप है वो हमारा ट्रस्ट है उनके ऊपर हमने दिया वोट तो ट्रस्ट है तो वो अपना वोट चोरी हो गया है यानी हमारा वोट अब चोरी होता है बीजेपी द्वारा तो हम नहीं लड़ेंगे हमारे ट्रस्टी है क्यों रखे हैं तो हमारा ट्रस्ट विपक्ष में भी नहीं रहेगा क्योंकि हमारे वोट जो उनको दिए हैं उनकी ट्रस्टीशिप जो है वो उन्होंने निभाई नहीं हम लेकिन तो आप समझिए कि नंबर है 303 वगैरह कभी नहीं मिले थे बीजेपी को नॉर्मल नेचुरल आज भी इलेक्शन होते हैं और बैलेट पेपर पे होते हैं और पूरी तरह से आजाद होते हैं यानी 1952 में हुए थे वैसे होते हैं तो बीजेपी को 100 सीट भी नहीं मिलेंगे। आरएसएस कितने भी ताकतवर संगठन हो आरएसएस ताकत नहीं है। ताकत सत्ता में होती है। मैं सत्ता में अगर 10 लोगों के साथ बैठूं ना तो 10 लोगों का पूरा देश को सुना के दिखेगी। यह देश ऐसा है कि गुलाम होने के लिए हमेशा बेकरार होता है। लेकिन क्यों आपको नहीं लग तो यह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को आप नहीं मानते कि सांप्रदायिक [गला साफ़ करने की आवाज़] ध्रुवीकरण बीजेपी का एक सबसे बड़ा एसेट है कि वो कहीं भी इलेक्शन होता है। आप देखें बंगाल की हम बात करें। अचानक से जय श्री राम बोलने वाले लोग कहां से आ गए? जय बांग्ला से जय श्री राम कैसे हो गया? अचानक वो लोग वो सड़कों पर हमें सब क्यों देखने के लिए मिल रहे हैं? कहीं ना कहीं कई एक्सपर्ट से मैंने बात की बंगाल इलेक्शन के बाद जो बंगाल के ही है और उन्होंने कहा कि इस पर लगातार यह काम हो रहा था एक जो पार्टीशन की पूरी पूरी जो का इतिहास है बंगाल खासतौर पर बंगाल में और जो एक बहुत बड़ा कम्युनल राइट वहां पर हुआ तो एक एक आप नॉर्थ के कम्युनल जो उनका पूरा एक एथोस है और जो यहां का है उसको आप अलग तरीके से देखें लेकिन आप यह नहीं कह सकते कि बंगाल में कभी बंगाल कभी कम कम्युनल था ही नहीं। हाउ डू यू सी दिस? देखिए हिंदुस्तान का हर आदमी कम्युनल है। लेकिन हिंदुस्तान का हर आदमी निर्मम नहीं है और अमानुष नहीं है। हर व्यक्ति गंगा जमीनी तहजीब को मानता है और मानवतावादी रहा है। दंगे तो आजादी के बाद भी हुए, आजादी से पहले भी हुए। लेकिन फिर साथ में भी रहे हम प्यार से रहे, इज्जत से रहे। और बंगाल की जहां तक बात है मैं आपको दावे के साथ कहता हूं फ्री एंड फेयर इलेक्शन और लेवल प्लेइंग फील्ड पे इलेक्शन होते हैं तो आज भी ममता ही जीतेगी वो आपको वोकल दिखता है जो मारकाट जो रस्ते पे और आपको मैं बात बताता हूं आपको हंसी भी आएगी जो औरत जापान में जाकर मोदी जी आए तो भगवान आए करके रो रही थी वही नॉर्वे में थी उनका गेटअप अलग था तो ये जय श्री राम के नारे लगाने के लिए एक मोबाइल यूनिट है आरएसएस के ऑिलरी स्ट्रक्चर का वो गुजरात, यूपी जैसे-जैसे इलेक्शन बढ़ता है वैसे ट्र से भेजे जाते हैं। ज्यादातर गुजरात से आते हैं, यूपी से आते हैं तो उनका कैडर ही जाता है। वहां बंगाली बन जाते हैं वो। तो वहां की यूनिट के लोग उतने ही हैं। वो ट्रेन करते हैं इनको। कैसे बात करना या बंगाल में क्या करते हैं? तुम मच्छी हाथ में ले घूमना। खाओ नहीं तो कम से कम हाथ में ले घूमना। बाद में हम देख लेंगे। इनको निपटा देंगे सबको। तो ये सारी चीजें हैं। ये जैसे डायस्पोरा जाता है यहां के यहां से ही जाता है। डायस्पोरा जो रोती है ना औरतें वो कोई एनआरआई नहीं होती। वो तो एक लड़की का तो आप ग्रो पे डाल के देखिए। उन्होंने बताया ये सेम औरत है। मैंने मेरे Twitter ट्वीट पे है। Twitter पे है। उधर चश्मा लगाए और रो रही है और यहां पर बिना चश्मा लगाए ऐसे होके रो रही है। [हंसी] तो बात समझिए यही जय श्री राम के साथ है। ये जय श्री राम के नारे देकर मुसलमानों के प्रति जो नफरत फैलाने वाला यूनिट है वो हर राज्य का आरएसएस का बीजेपी का ऑक्सिलरी स्ट्रक्चर यूनिट आता है। उनके नाम अलग-अलग होते हैं। युवा वाहिनी हो, कहीं उसका अलग नाम होगा। कहीं देश संगठन हो कहीं राष्ट्र प्रथम होगा अलग-अलग नाम क्योंकि क्योंकि आरएसएस बेसिकली रजिस्टर्ड ऑर्गेनाइजेशन ही नहीं ना तो उसका कोई कागज ना खाता ना वही जो अमित कहे वही सही ये लाइन पे चलती है वो तो वो मोबाइल जो स्ट्रक्चर है वो आपको लगता है अरे बाप रे महाराष्ट्र में इतने नफरती चिंटू भरे हैं तो आप देखते हैं महाराष्ट्र का इलेक्शन खत्म हो गया चिंटू खत्म हो गए तो चिंटू बंगाल में गए चिंटू वहां भगवा लहराने लगे वहां के 10 देखिए देखिए फैशन आती है ना तो 50 गांव के लोग भी बेलवाटम पहनने लगते हैं। वैसे लोकल 50 मिल ही जाते हैं जो शाम को दारू पीते हैं। ₹50 में पआता है जिनके लिए वो सब मिल जाते हैं उनको। लेकिन इसमें देखिए और दूसरा इसमें एक ऐड है जैसा पआ है ना यानी पवा दारू का वैसे WhatsApp भी है कुछ लोगों के लिए। तो WhatsApp पे मैसेज फॉरवर्ड होते हैं। तो वहां के कुछ पढ़े लिखे मूर्ख होते हैं ना या अंकल्स जो सोसाइटी के नीचे बैठते हैं तो उनको बैठे-बैठे कुछ काम नहीं जवानी में नेहरू फेलोशिप मिली थी। अब बस मोदी जी सहारा है तो वो बैठे हैं वो साथ में हो जाते हैं। तो इससे आप भारत के बारे में तर्क मत कीजिए। लेकिन विपक्ष क्या कर रहा है? आप ये देखिए जो करोड़ों जो वोटर्स हैं जो कटे पहले बिहार आपने एक यात्रा निकाली वो सक्सेसफुल यात्रा रही। वोट चोरी यात्रा उससे पहले प्रेस कॉन्फ्रेंसेस वगैरह की गई। वहां पर भी हमें लगा कि आरजेडी और कांग्रेस के बीच में चीजें नहीं ठीक चल रही हैं। और फिर हमने एसआईआर का नतीजा ये देखा कि वहां पर प्रो इनकंबेंसी हुई और फिर से भारतीय जनता पार्टी आ गई और अब भारतीय जनता पार्टी का ही मुख्यमंत्री है वहां पर। वहां जो करोड़ों वोटर्स जो जो बंगाल में और बिहार में जो काटे गए लाखों बंगाल में काटे गए। लाखों अब अब बिहार और बंगाल में मिलके काटे गए हैं। उन लोगों की एजेंसी कौन है? कौन देख रहा है उनको? कौन बात कर रहा है उनसे? बीजेपी इलेक्शन जीत गई। वह चैप्टर क्लोज हो गया। वह अब वहां पर सत्ता में है। तो फिर विपक्ष क्या कर रहा है? उनके बारे में कौन बात कर रहा है? कौन बात करेगा उनके बारे में? देखिए विपक्ष सत्ता का ही हिस्सा होता है। हमारे देश की रचना ऐसी हुई है कि एक सत्ता का वर्ग होता है। विपक्ष उसी का हिस्सा है। विपक्ष का मतलब आप रेवोल्यूशनरी मत समझिए। रेवोलशनरी फोर्सेस तैयार किए जाते हैं। विपक्ष कोई रेवोलशनरी फोर्स नहीं है। वह जनता से आते हैं। विपक्ष जनता से नहीं आया है। अखिलेश के पिता राजनीति में थे इसलिए अखिलेश बन गए। अब बाकी अन्यों के तो आप देख ही रही हैं। मैं नाम क्यों लूं है ना? अखिलेश जी का मैंने इसलिए नाम लिया क्योंकि उनसे मेरी कोई पर्सनल वो नहीं है। मैंने इसलिए नाम लिया क्योंकि योगी जी ने जब बारी-बारी से नमाज पढ़ो नहीं तो दूसरा रास्ता अपनाना पड़ेगा कि हां। तो कांग्रेस का एक पैसिव अप्रोच मैं समझ सकता हूं। कांग्रेस की कोई पृष्ठभूमि नहीं रही है उत्तर प्रदेश में। लेकिन अखिलेश को डायरेक्ट चोट पहुंच रही है। फिर भी वो बोले नहीं उस पे। इसलिए मुझे याद आया उनका नाम बस मैंने बोल दिया। बाकी सबका वही देखिए। ममता वैसे नहीं थे। ममता जी का अपना वोट बेस है। उन्होंने खुद तैयार किया और वो एनडीए के साथ भी रहे। लेकिन एनडीए के साथ रहने के लिए इतना बड़ा दोष उनको देना है। तो 2004 से लेके 14 तक यूपीए की सत्ता देश में तब अमित शाह और नरेंद्र मोदी के बारे में 2002 से जो हुआ था गुदरा में उसके लिए जो करना चाहिए था राज धर्म का पालन कांग्रेस को वो उन्होंने नहीं किया उसके लिए कौन दोषी पकड़े उनको अगर ममता भी दोषी है तो बीजेपी के कांग्रेस ने भी 2004 से 14 तक मदद की शरद पवार साहब ने भी की है वो तो संजय राउत ने अपने इंटरव्यू में ही बोला अम पटेल साहब ने की है तो इसका कौन दोषी क्या उसी का भुगत रहे हैं ये लोग 100% वो नहीं हम भुगत रहे हैं वो कुछ नहीं भुगत रहे आप समझ कि एक पॉइंट माइंड के बाद वो भूल जाते हैं क्योंकि संसद में आप जाते हो प्लेन से घूमते हो आपको सारी सुविधाएं आप प्रिविलेज्ड हैं तो आपको भुगतना तो कुछ नहीं पड़ता कभी कबभार भुगतना पड़ता है अब देखिए राहुल इंटीग्रिटी वाले व्यक्ति हैं ऐसे ही कुछ है जो इंटीग्रिटी वाले व्यक्ति हैं वो लड़ते हैं वो भुगतते हैं उनका सब कुछ होता है लेकिन आप समझिए कि ओवरऑल जो सांसद हैं देश के तो वो रविकिशन है बीजेपी के उन्होंने होम फ्रॉम वर्क करिए बोले अब वर्क फ्रॉम होम और होम फॉर्म में फर्क भी उनको मालूम नहीं ठीक है कोई बात नहीं उन्होंने कहा मेरे चार बच्चे हैं क्योंकि कांग्रेस ने वो नसबंदी का प्रोग्राम ठीक से नहीं किया था ऐसा कुछ ऐसे भी कुछ बोलते रहते हैं वो तो बात ये है कि ऐसी बातें करने वाले वो दूसरे दुबे साहब है वो वो तो कुछ भी बोलते हैं जो ऐतिहासिक नहीं है जो वास्तविक नहीं है वो बोलते हैं तो ऐसी बातों से विपक्ष बना हुआ है वो रेवोलशनरी फोर्स नहीं है। आप समझिए रेवोलशनरी फोर्स जनता से बनता है और जनता से ही बनेगा। तो आपको आपको लग रहा है कि किसानों का जो मोर्चा आया था दिल्ली में वो रेवोलशनरी फोर्स था। किसान और मजदूर हमेशा रेवोलशनरी फोर्स बनाते हैं। इसलिए मोदी और शाह उनसे डरते हैं। और मैंने जहां तक इजरायलीकरण का बात बोली उस पे दो बातें बताना चाहूंगा मैं। सुेंदु अधिकारी जो मूलता ममता के साथ थे। तृणमूल कांग्रेस के थे। उन्होंने जो जेनोसाइड की स्पीच दी मुसलमानों के खिलाफ हत्या की स्पीच की है उसमें उन्होंने इजराइल का ही नाम लिया। जैसे गाजा में किया इजराइल ने किया वैसे ही करना चाहिए। तो ये सारी बातें हैं। ये सारी जो बातें हैं उसको मैंने जो बोला वो प्रूव करने के लिए काफी है। इसके लिए कोई आपको अलग जाके ढूंढने की जरूरत नहीं है। खुफिया तंत्र की जरूरत नहीं है। मोसाद की जरूरत नहीं है जो बीजेपी को पड़ती है। तो मोसाद बीजेपी के साथ है। हमारे साथ नहीं है। तो देखिए पहली बार इजराइल हमारा मित्र देश था। लेकिन हमारे देश में दखल अंदाजी करने का दुस्साहस नेत्या हो और इजराइल ने किया है। क्योंकि आरएसएस गुलामी का ही उनका चरित्र रहा है। वो जब हिटलर जोरों पर था तो हिटलर के पैर दबाते थे यानी उनके जैसे यूनिफार्म पहनते थे। फिर ब्रिटिश जीतेंगे ऐसा लगा तो ब्रिटिशों का साथ देने का वादा श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 42 के आंदोलन के खिलाफ दिया था। लेखी लिखित रूप में दिया था। उनके किताब में है उनका खत। फिर वो ब्रिटिश चले गए तो अब इजराइल मिले उनको। तो इजराइल के अब इजराइल तो वो देश बना है। उसके बारे में हम बाद में कभी भी बात कर सकते हैं। लेकिन हिटलर के एंटीसेमेटिज्म की वजह से बना है। तो हिटलर भी उनको चलता है। इजराइल भी चलता है। लेकिन 1960 से जनसंघ के इजराइल के साथ संबंध रहे हैं। और उनकी गुलामी को उन्होंने हंस हंस के हमारे देश में लाया है। और हमारे हमें बेचकर यानी हमारे 140 करोड़ लोगों को हम हमें बेचकर उन्होंने अपनी अय्याशी और अपनी सुविधा को खरीद लिया है। तो देश के बदले का सौदा है ये। तो आप कह रहे हैं कि इजराइल [गला साफ़ करने की आवाज़] के साथ ये देश के बदले जो है ये सौदा तो और क्या होता है? यानी देखिए कि क्रोनस जो है इस देश के उनको कौन कहां से झायोनिज्म की वजह से पनप रहे हैं। उनके हाथ में देश जा चुका है। देश के जंगल, जल, जमीन किसी का परवाह नहीं है। हम तो अब परसों ईडी की कस्टडी से बाइ्जत बरी हो गए एक मुस्लिम उद्योजक तो उनके पूरे इंडस्ट्री को किसने ले लिया कब्जे में? तो ये सारी जो कहानियां हैं वो मैं अपने मन से मनगढ़ंत तो नहीं है। मैं आपको एक-एक 10 उदाहरण दे सकता हूं। ये बात को इसका ठोस सबूत ये है। लेकिन एक पॉडकास्ट में इतना वक्त नहीं रहता इसलिए मैं नहीं दे सकता। लेकिन मैं आपको ठोस बता सकता हूं कि आज यह हो रहा है और एसआईआर जो है उसमें मुसलमान और नॉन बीजेपी वोटर जो है उसको नॉन सिटीजन और बेवारिस बनाकर खत्म करने की यह साजिश है। ये इजराइल के माध्यम से आई है और इसको अंजाम जो दे रहे हैं वो मोदी सत्ता दे रही है। मोदी की शासन प्रणाली दे रही है। जो लोकतांत्रिक तो बिलकुल नहीं है और लोकतांत्रिक तरीके से चुन के भी नहीं आए हैं। तो फिर कैसे होगा बदलाव? अब इसका उत्तर तो एक ही है जनता और राजता तो आप समझिए कि एसआईआर की प्रक्रिया में पूरे देश को खत्म करने की और बालकनाइजेशन हो जाएगा नहीं तो देश का देश टूट जाएगा। आप ऐसे एसआईआर को हल्के में मत लीजिए। मैं कई बार कई लोगों को बोल चुका हूं कि एसआईआर वोटिंग के सिलसिले में नहीं है। एसआईआर मेनली सिटीजन वोटिंग क्या है? उनको इलेक्शन चुराने के लिए कामयाबी 19 से मिली है। 14 से मिली है। वोट चुराने के लिए उनको एसआईआर की जरूरत नहीं है। फिर क्या करेंगे इन लोगों का वो? उनको पहले सेकंड सिटीजन बनाएंगे। उनको कहीं का नागरिक नहीं रखेंगे। और फिर क्या है? आपने सोचा था 2014 से पहले कि मुसलमान व्यक्ति को इस तरह से रास्ते पे ही कहीं जय श्री राम बोलने के लिए कहीं भी मार डालेंगे। इतना लिंचिंग हुआ। किसने उफ किया विपक्ष में? मैं लिंच किए हुए सारे जो मुस्लिम्स हैं उनकी एक मेरे पास लिस्ट है। उसके ऊपर किताब लिख रहे हैं हमारे मित्र। तो मैंने ही उनको कहा ये इस पे किताब लिखिए करके। वो लिख रहे थे। तो पहला लिंचिंग का मुस्लिम बलि महाराष्ट्र से हुआ है। ओके। तो मुझे मालूम है तो वहां के हमारे सोलापुर के एक मित्र हैं। तो उनके साथ सरफराज अहमद उनका नाम है। उन्होंने वो पूरा लिस्ट मुझे दिखाया पहले तब तक वो नहीं वो बढ़ता ही गया बाद में। मैंने उनको मिला उसके बाद बहुत बढ़ा उतना ही बढ़ा। फिर और अब तुम्हें लग रहा है कि काउंट करना। तो ये जो जो एसआईआर में जाएंगे एक एक करोड़ दो करोड़ तीन-ती करोड़ तीन करोड़ लोग यूपी में आप विश्वास रखेंगे तीन करोड़ लोग ऐसे ही बाहर से आए हुए हैं। इतनी जनसंख्या तो किसी भी देश की नहीं है। तो ये 50 एक करोड़ पूरे देश में लोग हैं। उनको आप नॉन सिटीजनशिप लेस बनाएंगे। कोई उनका पासपोर्ट नहीं बनेगा। उनको कोई सरकारी सुविधाएं मिलेगी नहीं। कुछ नहीं। उनके बच्चे बच्चे सब बेवारिस हो जाएंगे। ये योजना है अब वो सक्सेसफुल होती है नहीं होती है वो देश के लोगों के व्हील पे है इच्छा पे है लेकिन उनको बनाकर फिर उनको आपकी हत्या भी कर दी जेनोसाइड भी कर दिया गैस चेंबर्स में भी डाल दिया कौन पूछेगा वो थे ही नहीं यहां के नागरिक ऐसा कोई मरा ही नहीं जब आप रास्ते पर आएंगे ही नहीं तो आप मरे ही नहीं आप थे ही नहीं आप सारे पाकिस्तानी थे आप सारे बांग्लादेशी थे लेकिन फिर मेरा वही सवाल है राजू जी कि इतने बड़े पैमाने पर यह जो वोट काटे जा रहे हैं और फिर हमें लगातार वही ज़हन में सवाल आता है कि फिर इन लोगों का क्या होगा और विपक्ष के रोल की तो हम बात कर ही रहे हैं। लेकिन अब मैं आऊंगी मुसलमानों के सवाल पर और यह सवाल इसलिए बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि मैं देख रही थी कि पश्चिम बंगाल में इलेक्शन बीजेपी जब से जीती है तब से अब मुसलमानों को ये लगता है कि कहीं भी अब कुछ भी हो सकता है। 30% वहां पर मुसलमान है। मुसलमान हमेशा वहां पर वोकल रहा है, अग्रेसिव रहा है और एक तरह का टोकन ही सही लेकिन उनको एक रिप्रेजेंटेशन वहां पर मिला है। अभी मैं देख रही थी कि वहां पर बकरा ईद आने वाली है और उसको लेकर जिस तरह के की बातें जो है वहां सरकार करती हुई नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश में तो आपने देख ही लिया योगी आदित्यनाथ क्या कहते हुए नजर आ रहे हैं बकरा ईद की नमाज को लेकर। मुसलमानों 12 साल से वो ये सब कुछ देख रहे हैं और इसमें सिर्फ हमें इजाफा देखने के लिए मिल रहा है। आप इसको कहां जाता हुआ देख रहे हैं? कहां रुकता हुआ देख रहे हैं और मुसलमान ऐसे में क्या करें? सबसे बड़ा सवाल यह है। देखिए आप विपक्ष की बात कर रही थी तो मैं यह जो मुस्लिम का सवाल है यानी प्रश्न है आपका जितने मुख्यमंत्री इंपोर्ट किए हैं बीजेपी ने जैसे शुभेंदु अधिकारी एक है। उनके तो वीडियोस आए हैं कि वो पैसे ले रहे हैं। भ्रष्टाचारी है। वो हिंदूवादी या मुस्लिम या नफरती या प्यार भरे वो कुछ भी नहीं है। वो भ्रष्ट है। औरकि उनको अपने आप को बचाना है, अपनी साख को बचाना है, जेल नहीं जाना है। जैसे कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंद ने किया, असम में हेमंता जी कर रहे हैं। यानी इनको कभी ना कभी इनके बारे में बीजेपी ने इतने भ्रष्टाचार के आरोप किए हैं और बाद में उनको बीजेपी वाशिंग मशीन में धुलाई करके उनको मुख्यमंत्री पद पे विराजमान किया। उनको इसलिए विराजमान नहीं किया कि उनको ये इसका अवार्ड नहीं है उनके भ्रष्टाचार का। उनको भ्रष्ट होने की वजह से यानी हमारे जो चुनाव आयुक्त है उनके ऊपर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे। तो ऐसे जो भ्रष्ट लोग होते हैं उनकी फाइल आने के बाद अ हमारे गृह मंत्री हैं उनके लिए अच्छा जाता है क्योंकि उनको नस मिल जाती है उनकी तो उनको दबाकर कुछ भी करवाया जा सकता है उनसे कुछ भी बुलवाया जा सकता है तो अब शुभेंदु कुछ भी बोलेंगे यानी वो अगर उनको कहा जाए कि मैं मुसलमानों की हत्या करो जो उन्होंने कहा डीएनोसाइड के बारे में तो वो इसलिए कह रहे हैं क्योंकि खुद के भ्रष्टाचार को दबाना चाहते हैं वैसे ही उनके पड़ोस वाले राज्य में वैसे ही उनके पड़ोस वाले वैसे ही महाराष्ट्र में वैसे ही हर जगह समस्या यह है कि भाजपा इतनी भ्रष्ट है कि वो देश को बेच रहे हैं। लेकिन बाकी पार्टियों के छोटे-छोटे भ्रष्टाचार की फाइलें लगाकर उनको जेल का डर दिखाकर वो उनके नेताओं को नेताओं से वो करवा रहे हैं जो अमानवीय है और आपके भाई का कत्ल करने के लिए कह रहे हैं। अपने भाई को कत्ल करने के लिए कह रहे हैं और ये बात उनसे करवा के ले रहे हैं। यानी आसान हो जाता है। यानी आपको गैंग मेंबर बनाने के लिए हमेशा एक पहले छुड़ा दिया जाता था और कहा जाता था घुप के आओ उसको मार के आओ। तो अब जाके आप गैंग के लॉयल मेंबर बने। ऐसा ही इनको बनाए थे। पहले आप जेनोसाइड पे स्टेटमेंट दे दो। पहले आप मुसलमानों के खिलाफ बोलो। पहले 10 लिंचिंग तुम्हारे राज्य में होनी चाहिए। 100 होनी चाहिए। अब 1000 करो 10,000 करो तो बंगाल का वातावरण जो है वो बदला हुआ है। आपने वो तो एक WhatsApp का पवा अलग रखिए आप। उसका अलग ही स्वैग है। तो वो तो अलग ही लोग हैं। मेरे सोसाइटी में तो राम का चित्र बनाया एक ने और उसकी हमारे सोसाइटी के वो वो है में यानी मैनेजिंग कमेटी में है वो। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो उन्होंने उसके पैसे भी लिए चित्र बनाने के लिए। तो तो ये अलग ही है। ये ये स्वैग अलग है। इसके ऊपर हम अलग से बात कर लेकिन ये लोग जो हैं जो सत्ता में बैठे हुए ये भ्रष्ट होने की वजह से और ये लोगों ने जो आतंक मचा के रखा है उससे एक्चुअली कंट्रोल जो है उसे वो आरएसएस करती है। तो बेसिकली मैं हमेशा यह कहता हूं कि आरएसएस इज अ बेसिकली टेररिस्ट ऑ्गेनाइजेशन और इजराइल ये देश नहीं है। टेरर प्रोजेक्ट है तो इनका मिलन ऐसे ही फल लाएगा। कोई फिलॉसफी नहीं नफरत और इस्लामाोफोबिया इनके लिए बहुत आसान है। क्योंकि एक्चुअल जो ये धन की चोरी कर रहे हैं। जल जंगल जमीन की चोरी कर रहे हैं। उसको छिपाने के लिए आपको ये दिखा रहे हैं। वो देखो वो देखो अब्दुल का वो करना पड़ेगा आपको बंदोबस्त ताकि सारा सारी जनता देख रही है अब्दुल की तरफ तब तक जनता का आप देखिए आज 9798 हो गया बिटकॉइन के सामने रुपी की कीमत जीरो हो गई 100 तो लगाएगा और आपको मुझे लगता है गोणी में भर के पैसे लेके जाएंगे तब एक ब्रेड आएगा ऐसे दिन बहुत जल्द आने वाले हैं तो मैं लोगों से ये कहूंगा कि घर में पैसे रखिए ये ये माध्यम है तो बताना जरूरी जरूरी है। घर में पैसे रखिए, अनाज रखिए, तेल रखिए और जो सरकार कहती है उसके विपरीत करिए तो आपका भला होगा। सरकार ने कहा निशंक रहिए, आराम करिए तो आप बिल्कुल आराम नहीं करना, मेहनत करना। [हंसी] जब सरकार कहे मेहनत करो तो आराम करना। कोई टेंशन नहीं है। देशभक्ति के नाम पर जो जो जुर्म किए जा सकते हैं वो सारे बीजेपी आरएसएस ने मर्यादाओं को लांग दिया है। मानवता के इतने बड़े दुश्मन मैंने अपने जीवन में पहली बार देखे शायद सबने हमने पहली बार देखे और बात तो लेकिन वो सभ्यता की कल्चर की नहीं कल हमारे नॉर्वे में जो एंबेसी के प्रतिनिधि है एम्बेसी तो वो जिस तरह से बात कर रहे थे कल या दो-चार दिन पहले प्रधानमंत्री जी को एक सवाल पूछा इसलिए वो गुस्सा हो गए थे तो उनको पता नहीं क्या गुस्सा हो गया प्रधानमंत्री है तो सवाल पूछेंगे यानी वो प्रधानमंत्री नहीं है इसलिए वो गुस्सा हो गए एक्चुअली नेचुरल प्रधानमंत्री जो नेहरू से ले मनमोहन सिंह तक थे उनको सवाल पूछना ही उनका प्रधानमंत्री पद दिखाई देता था। यह मेड ऑफिसर है। ये चुन के नहीं आए हैं तो लोगों को उत्तरदाई नहीं तो आप सवाल क्यों पूछ रहे हैं भाई? आपको सवाल पूछना है नेते को पूछिए। ऐसा उनका कहना था। यानी मोरल ऑफ द स्टोरी ये थी। बता क्या रहे थे? वो 1947 वाली बात है। हमारे 5000 पुरानी सभ्यता है। हमारा एक संविधान है। हमारा एक कोर्ट है। अरे कोर्ट है तो उमर खलीद अब तक जेल में क्यों है? मुझे बताइए उसकी मां का ऑपरेशन उसके लिए 15 दिन का पैरोल नहीं मिला। राम रहीम बाहर पैरोल ही उसके लिए नियम बना था। राम रहीम जेल में कभी-कभी पांच दो दिन वो खुद की मर्जी से जाता था। उस दिन मैंने दूसरा वो कोई बुआ बाबा देखा उसके साथ एयर कंडीशन चल रहे हैं जेल में। जी बिल्कुल वो उसका नाम ही भूल गया मैं। ऐसे बाबा तो हर जगह गली नुक्कड़ पे पनप रहे हैं। बाबा एक्चुअली आरएसएस के स्लीपर सेल हैं। वो यही नफरत अब आर मैं श्री श्री रविशंकर सद्गुरु और एक लोकल बाबा और धीरेंद्र शास्त्री सबको अलग नहीं मानता। वो इंग्लिश में बोलते हैं इसलिए आपको लगा होगा कि वो पढ़े लिखे और इंटेलेक्चुअल को बात करते हैं। उनकी पेंग्विन किताबें निकाल अरे कुछ नहीं। वो किताबों में वही कूड़ा लिखा है जो वो बोलते हैं और वही कूड़ा बोलते हैं जो करते हैं। खुद का जब न्यूरोलॉजिकल प्रॉब्लम आया तो न्यूरोसर्जन के पास गए थे सद्गुरु लेकिन फिर ये सवाल है मेरा बहुत मेरे जेहन में बार-बार ये सवाल आता है कि जैसे रामदेव साइकिल चलते-चलते गिर गए ना वैसे ही मोदी इस अर्थव्यवस्था का करते-करते अर्थव्यवस्था ही गिर गई। धाराशाही हो गई। बिल्कुल वो सब हम देख रहे हैं। उस क्वेश्चन में मैं आऊंगी फॉरेन पॉलिसी और इस सब पर बड़ा क्योंकि आजकल इसको लेकर बहुत ज्यादा बात हो रही है क्योंकि आप इजराइलीकरण की बात कर रहे हैं तो ये बात करना बहुत जरूरी है। लेकिन मैं ये सवाल ये आपसे पूछना चाहती हूं कि जो इस देश के वो हिंदू जो हिंदुत्व में नहीं यकीन करते जो आरएसएस और बीजेपी की आइडियोलॉजी में नहीं यकीन करते। हिंदुत्व के नाम पर जो हिंदूइज़्म दिखाकर जो परोसा जा रहा है जो बताया जा रहा है जो उनके नाम पर किया जा रहा है वो सामने आकर क्यों नहीं ये कहते कि नॉट ऑन माय नेम मेरे नाम पर आप ये नहीं कर सकते वो लोग क्यों वोकल नहीं है वो लोग क्यों खामोश होकर तमाशा देख रहे हैं बंगाल का भी एग्जांपल ले लीजिए बंगाल के वो लोग जो इंटेलेक्चुअल जिनको कहा जाता है कि नहीं बंगाल ऐसा नहीं है वहां तो बहुत पढ़े लिखे लोग हैं। जब यह सब कुछ हो रहा है तो वह खामोश क्यों हैं? वह बोल क्यों नहीं रहे हैं? या देश का एक बड़ा तबका जो बीजेपी को वोट नहीं करता या जो आरएसएस की आइडियोलॉजी में यकीन नहीं रखता है वो खामोश क्यों है? क्या उनके ऊपर कोई ऑनेस्ट नहीं है? तो मिश्रा जी ऐसा है कि यह जो बात आपने कही उसके लिए यह पूरे देश में बहुत बड़ा हिंदुओं का तबका जो मौन रहा है जो पैसिव रहा है जो तटस्थ रहा है वो सब जिम्मेदार है। मैं अपनी तरफ से माफी मांगता हूं आपकी और पूरे मुस्लिम कौम की क्योंकि हर हिंदू इतना ही कर सकता है क्योंकि मैं राहुल गांधी को नहीं समझा सकता या मैं अखिलेश यादव को नहीं समझा सकता या मैं फला फला को नहीं समझा सकता। मैं फला फला को तटस्थ रहने के लिए वो तटस्थ क्यों रह रहा है वो नहीं समझ सकता। मैं इतना ही कहूंगा कि मैं वेद और उपनिषद और पुराण जो हिंदुओं के हैं वो इनमें से आरएसएस और बीजेपी और शाखा में जाने वाले किसी भी व्यक्ति से ज्यादा अच्छी तरह से जानता हूं। और ये जो कर रहे हैं ये मैं हिंदू कोई धर्म नहीं मानता। बताओ जीवन की एक पद्धति है। हिंदू शब्द ही बेसिकली फारसी है यानी ईरान से आया हुआ है और सनातन शब्द बुद्ध धर्म से आया है। सन धना एस धम्मो सनातन तो ये दोनों शब्द है ही नहीं अपने तो ये एक ब्राह्मण धर्म है तो मैं ब्राह्मण भी हूं। तो मैं आपको स्पष्ट रूप से बताता हूं। ये कोई धार्मिक चीज है ही नहीं। यह मानवता के खिलाफ जंग छेड़े हुए आतंकवादी संगठन द्वारा किया गया देश के खिलाफ किया गया एक बहुत बड़ा षड्यंत्र है जिसमें हमारी आजादी हमारा मुल्क हमारी अर्थव्यवस्था और हमारे सारे जल जंगल जमीन दांव पे लगे हैं और मुसलमानों के जान को आदिवासियों के जान को और दलितों के जान को बहुजनों की जान को बहुत बड़ा खतरा है और इसके लिए हर हिंदू जिम्मेदार है और आपको एक बात मैं बताता हूं कि ये भी दिन जाएंगे तब आप गुनहगारों की लिस्ट बनाएंगे। उसमें मुझे भी आप एक्सेप्शनल मत मानिए क्योंकि कहीं ना कहीं हम उसका हिस्सा होंगे। अगर नहीं होते तो कोई भी हिंदू ऐसा नहीं बात करता। नहीं लेकिन आप अपने आप को शामिल ना करें क्योंकि आप तो इसके खिलाफ लगातार बोलते रहे। बोलने से क्या होता है? देखिए मैं एक बात बताऊं। आप अपनी कैपेसिटी में आप जो कर सकते हैं आप देखिए ये जो मेरी जो जागृति है या एनलाइटनमेंट है उसकी एक प्रक्रिया है। है ना? लेकिन बेसिकली ये बीज जो है वो हिंदुओं में आया ही कहां से? हम जब देखिए हिंदुओं ने जब फिल्में बनाई कांग्रेस के टाइम में भी तो हर आतंकवादी मुस्लिम दिखाया। सबसे बड़ी एशिया में आतंकवादी संगठन एलटीटी थी। लिटें थी प्रभाकरण की। जी। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो उसके ऊपर हमने कभी एक भी हिंदू आतंकवादी नहीं दिखाया। उसको तो बाला साहब ठाकरे भी डरे थे एक बार। तो उनको कभी नहीं दिखाया हमने। हमने हमेशा मुसलमानों को दिखाया। उसका कोई हिंदू ने विरोध किया। हमने बड़े चाव से वो फिल्में देखी। वो भी हमारा गुनाह है। और मुसलमान भी उसके लिए थोड़े जिम्मेदार हैं। क्योंकि किसी भी मुस्लिम एक्टर्स जो उस टाइम में बहुत बड़े पावरफुल लोग थे। व्हाट आई से गोस टाइप के तीन तो खान ही उन्होंने कभी यह नहीं कहा इंडस्ट्री को कि आप मुसलमान दिखाएंगे आतंकवादी तो आपके प्रोडक्शन के साथ हमारा आप तो नहीं कह सकते लेकिन तब कह सकते थे आपके प्रोडक्शन हाउस के साथ हम काम नहीं करेंगे कहा नहीं कहा तो वो हिंदू वो मुसलमान वो हर पावरफुल शख्स हिंदू होने की वजह से ही आप पावरफुल बनते हो और हिंदू ब्राह्मण होने से बहुत पावरफुल बनते हो इनहेरिट करते हो आप वैसे ही आप इंडस्ट्री में जो सुपरस्टार बनते हैं वो पावरफुल बनते हर वो पावरफुल आदमी जिसने मुसलमानों के खिलाफ आम मुसलमानों के खिलाफ जो भी गलत हुआ उसको सहा और नजरअंदाज किया वो इस कर्म का और पाप का जिम्मेदार और भागीदार है। लेकिन ऐसा क्यों नहीं होता कि जब कहीं दूर दराज किसी किसी कंट्री में कहीं पर कुछ भी हो उसके लिए हर मुसलमान को जिम्मेदार ठहराकर उससे सवाल पूछा जाता है कि आप इसको कंडेम करिए। हर माइक जो है उनके मुंह पर जाकर लगा दिया जाता है। कभी ये जो मस्जिदों के सामने जो भगवा लहराया जाता है या अलग-अलग जगहों पर जो लिंचिंग की जा रही है किसी को ट्रेन में पकड़ कर अभी मैं कल की ये परसों की वीडियो देख रही थी। एक महिला जा रही थी आसाम में शायद उनको कैसे पूरी तरीके से डिमी किया गया। उनकी एक-एक चीज को खोल कर देखा गया। खाने से लेकर, बैग से लेकर हर चीज चेक की गई। तो अब महिलाओं को भी नहीं बख्शा जा रहा है। कभी भी उनके सामने माइक लगाकर कोई नहीं मीडिया पूछता ना अल्टरनेटिव मीडिया पूछता ना मेन स्ट्रीम मीडिया पूछता कि भाई ये सब आपके नाम पर हो रहा है। आप इसको कंडेम क्यों नहीं करते हैं? आपको क्या लगता है कि आरएसएस बीजेपी और ये जो तथाकथित हिंदूवादी संगठन है वो हिंदू धर्म की सेवा कर रहे हैं? नहीं ऑफ कोर्स नो नहीं करते। ये मैं आपको मैं आगे आगे की बात बताता हूं। यह दौर जब खत्म होगा हम तो इन्होंने जिस धन का नाम लिया वो भी खत्म होगा क्योंकि उन्होंने ही वह खत्म किया है। मुझे खुद को इंटरनेशनल कम्युनिटी के सामने दुनिया भर में मैं जाता हूं तो मैं हिंदू हूं। यह कहने के लिए देखिए गांधी जी का नाम लेकर हिंदू कहने के लिए सम्मानजनक लगता था। क्योंकि गांधी ने हमेशा यह कहा कि मैं एक बहुत ओरिजिनल हिंदू हूं। लेकिन गांधी जी ने कभी पूजा नहीं की। किसी भगवान के सामने हाथ नहीं जोड़े। उनका कोई बाबा नहीं था। ना उन्होंने निर्माण किया। उन्होंने बाबा जो निर्माण किया वो नेहरू बोस ऐसे बाबा निर्माण किया। उन्होंने आजाद लोहिया ये बाबा थे उनके। तो उनको मारने वाला जो गोडसे था उसका हिंदूइज़्म है ये। तो ये हिंदू धर्म की सेवा नहीं है। ये हत्यारे नफरती और पूरी तरह से देश को बांटने वाली ताकतें हैं जिनकी वजह से धर्म भी उनका खत्म हो जाएगा। और मैं आपको विश्वास दिलाता हूं इस बात का कि हर वो शख्स जो हिंदू धर्म को मानता है। सो कॉल्ड हिंदू धर्म। मैं मैंने कहा कि इट्स अ पाथ। इट्स नॉट अ रिलजन इसको द बुक या द प्रॉफिट नहीं है हम तो जो भी मानता है और जिस जो असल धर्म को जानता है जिसमें अपशावा उपनिषद करके पहला ही उपनिषद है उसका पहला श्लोक है ना वो भी जिसने शिद्दत से पढ़ा है उसे वो ज्ञान हो गया जो एक सच्चे मुस्लिम को होता है ये दुनिया पूर्ण है उसने बनाई है और उस पूर्ण में हम कोई पूर्ण नहीं है हम सब पूर्ण और हम उसका हिस्सा है और वो हमारा हिस्सा है। उसमें खत्म हो जाता है सब कुछ। इतना पावरफुल है। इसमें कहीं भी हिंसा की कोई भी बात नहीं है। हिंसा की बात पुराणों में आती है। वो कहानियां है। इलियर्ड और ओडेसी जो रोमन सॉरी ग्रीक कहानियां है जो होमर ने लिखी है। वैसे रामायण और महाभारत महाकाव्य है। वो महाकाव्य है। लेकिन वो एक मिथक है। अपने आप में उसमें जो कैरेक्टर्स है उनको भगवान नहीं बनाना है। क्योंकि ऐसा उपनिषदों में ही लिखा है। वेदों में हिंदू शब्द ही नहीं है। वेदों ने धर्मों का कभी वो वही नहीं किया है। तो ये सब जो ब्यूटी है ना जो एक्चुअली 108 उपनिषद है छोटे-छोटे लेकिन मेन तो 10 है ईश केन कठ प्रश्न मुंड मांडुक्य तैत चांदोग्य और वृद्धणक्य ये 10 के 10 उपनिषद जिसने भी पढ़े हैं उसको ये पता चलेगा कि ये आरएसएस वाले एक नंबर के ढोंगी और ब्लासफेमी करने वाले धर्म विरोधी लोग हैं। क्योंकि इनको अगर आप पूरा वंदे मातरम बोलने के लिए कहो वो बोल नहीं पाएंगे। मैं बोल सकता हूं पूरा पूरा भी और जो रविंद्र नाथ टैगोर ने बाद में बनाया हो आप मोदी जी और शाह जी को अचानक जाके बोलिए कि बोलो आप पूरा वंदे मातरम नहीं बोल पाएंगे ये इनके सारी आरएसएस कल्ट की मूढ़ता को और दुष्टता को इन्होंने थोप दिया है भारत की भोलीभाली जनता पर और बेच दिया है भारत की जनता को दुनिया के बाजार में सरेआम इस देश का उन्होंने सौदा किया है। लेकिन इजराइल के साथ जी बहुत महत्वपूर्ण आप बात कह रहे हैं और बहुत मेरे ख्याल से बहुत खुलकर आप आप कह रहे हैं। मेरा सवाल ये है कि नोटबंदी होती है। नोटबंदी रॉस चाइल्ड के लिए हुई। हम देखिए आपको एक बताता हूं। अब सोने पे नजर है उनकी। मोदी जी हम बात करते हैं। अब सोने की सिवाय कोई बात नहीं करते। इसकी वजह ये है कि कैश ब्लैक मनी नहीं है। देखिए अमेरिका में आप कैश देखते हैं। अमेरिकन फिल्मों में देखते हैं ना बैग भर के कैश लेके जा रहा है। वो अमीर हो गया। है ना? तो कैश कभी भी ब्लैक मनी नहीं रही है। कैश लिक्विडिटी है। आम छोटे व्यापारी एमएसएमई वाले उनकी रोज कैश आती है। अब वड़ा पाव वाला अगर रोज के 2 लाख कमा रहा है तो कैश में ही आएंगे ना। हम तो उसको आपने डिजिटल पेमेंट में कन्वर्ट करके किया क्या? उसके ऊपर सरकार का नियंत्रण लाया। इसका मतलब उसकी आजादी को आपने ठेस पहुंचाई। उसका धंधा चौपट करने के लिए नए-नए हथकंडे अपनाए और जीएसटी का उसका ट्रैप में उसको फंसा दिया। जीएसटी ओरिजिनली जो पहले यूपीए गवर्नमेंट के टाइम में रचा गया था वो ऐसे नहीं था। ये जो बीएस जीएसटी है वो जायोनिज्म को मदद कर। देखिए देश के जो सारे बैंकर्स हैं देखिए आपको क्रेडिट कार्ड मिलता है या आप लोन में होती हो तो डायरेक्टली नहीं इनडायरेक्टली आप किसी ना किसी जायोनिस्ट के गुलाम हो क्योंकि ब्याज का व्यवसाय है सारा जािस्ट करते हैं उनके हाथ में तो किसी भी इतने बड़े देश का ब्याज अगर डूब रहा है तो जािस्टों को 70 साल दर्द तो हुआ होगा रॉसेल्ट को तो मोदी के आते ही उन्होंने पहला एजेंडा ये रखा जब एस्टिन फाइल के लिए 14 2014 में बात हुई ना 2016 का एजेंडा यही था कि आप पहले कैश बाजू करो ताकि लोग दुबले हो जाए और सरकार के कब्जे में आए सरकार तो उनके कब्जे में है हम तो ऐसे वो कैश निकाली गई और इस्लामाोफोबिक होने का एक और वजह है क्योंकि इस्लाम ब्याज के खिलाफ है हम बिल्कुल वो आदमी को आजाद करता है हम समझे तो ये एक बहुत बड़ा साइकोलॉजिकल फिलॉसोफिकल इकोनॉमिकल बहुत सारी सारी वॉर है ये। एक बड़े युद्ध के अंदर बहुत सारे युद्ध छिपे हुए हैं और उसको जानने वाला, पहचानने वाला, उसकी स्ट्रेटजाइज करने वाला, उसके खिलाफ अपनी स्ट्रेटजी बनाने वाला, अपने संसाधनों को बचाकर उनके संसाधनों को खत्म करने वाला कोई नेता अभी आने वाला नहीं है। आप ही अपने नेता हो। जी। सवाल यही है मेरा कि लड़ना है। हां। बदलाव कैसे होगा? बदलाव अगर मैं बदलाव कर सकता हूं तो मैं करूंगा। आप कर सकते हो आप करो लेकिन ये चेतना जागेगी कैसे तो अब हम बोल रहे हैं तो कम से कम 10 लोगों में तो चेतना जागेगी ना तो 10 और 10 लोगों में जगाएंगे लेकिन राजू जी ये तो देखिए संतोषी माता ऐसे ही फैली देश में 1975 तक संतोषी माता नाम की कोई हिंदू देवता नहीं थी संतोषी माता फिल्म आई और थिएटरों में लगी और शोले उस वक्त हिट हुई थी 1975 में संतोषी माता भी हिट हुई संतोषी माता हिट होने के बाद गांवगांव में गली गली-गली में संतोषी माता के व्रत करने लगे व्रत हम तो आप समझिए चेतना एक व्यक्ति में जागे तो समझिए 150 करोड़ में जागेंगे संभावनाएं जहां होती है हम वहां आप अपने मंजिल तक पहुंचते हैं। अगर इलेक्शन दर इलेक्शन वो जीतते जा रहे हैं। पूरे देश का एक तरह से अलग-अलग राज्यों का भगवाकरण किया जा रहा है और वो दिखाते हैं पूरा ऑरेंज देखिए मैप पर कैसे-कैसे ये ये बदल रहा है। मेरा सवाल यह है कि अगर एक के बाद एक तरह से सत्ता उन्हें मिल रही है। तीसरी बार वह केंद्र में है। विपक्ष हमें उस तरह से काम करता हुआ नजर नहीं आता है। वो ऐसा लगता है कि एक तरह की एक पार्ट टाइम जॉब है जो वो कर रहे हैं। उनके सर पे आके कुछ पड़ जाता है। तो एक मोर लाइक अ यू नो ब्लॉगर वो काम करते हुए नजर आते हैं। जैसे यूट्यूबर ब्लॉगर सड़क पर बहुत कम नजर आते हैं। लोगों को ऐसा लग रहा है कि उन्होंने अपनी एक तरह से किस्मत मानकर वो वो बैठ गए हैं। वो लड़ते हुए नजर आते हैं। कुछ हद तक फिर उसके बाद किस्मत मान के अपनी बैठ जाते हैं। तो ये तो बहुत बड़ा संकट नहीं है इस देश के ऊपर इस लोकतंत्र के ऊपर संविधान के ऊपर मुझे जिस दिन वेस्ट बंगाल की इलेक्शन बीजेपी ने चुराई उस दिन एक भक्त मिला था हम मुझे नहीं मालूम था वो भक्त है मुझे कोर्ट में मिला तो उसने मुझे कहा कि सर हम अब 70% भारत जीत चुके हैं। मैंने कहा एक अफगानिस्तान छोड़कर पूरा हिंदुस्तान पाकिस्तान सहित श्रीलंका सब कुछ ब्रिटिशों के कब्जे में था। उनके पास तो 100% था भाई और 42 के आंदोलन में भी किसी को आत्मविश्वास नहीं था कि हम आजाद होंगे। आपको मालूम होगा कि श्यामा प्रकसाद मुखर्जी ने जनसंघ के खत लिखा था ब्रिटिश गवर्नमेंट को कि इनका बंदोबस्त करना चाहिए। कांग्रेसियों का आजादी मांग रहे हैं और मैं पूरी सहायता दूंगा और मेरी पार्टी आपकी सहायता देगी। खत है उनका। मैं अपनी बात नहीं कर रहा हूं। मैंने ऐसा कोई लिखा नहीं है। उन्होंने लिखा है और मेरे पैदा होने से कई दशकों पहले। तो बात यह है कि इतने कॉन्फिडेंट श्यामा प्रसाद मुखर्जी और ब्रिटिश शासन पतन तो हुआ ना तो इनका भी पतन होगा। यह बात आप मत समझिए कि पतन नहीं होगा। नित्यान का भी पतन होगा। परिस्थितियां बदलेगी। लेकिन आपको हमेशा मुझे और जो लोग सुन रहे हैं उनको मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि आपको राइट साइड ऑफ द हिस्ट्री रहना चाहिए। अभी अय्याशी कर सकते हैं आप इनके साथ रह के लेकिन आपका नाम बदनाम हो जाएगा। आपका इतिहास में कुछ नहीं रहेगा। काले पन्ने पर नाम आ जाएगा। आज जिस तरह से गोडसे का नाम हम लेते हैं वैसे ही इनका नाम लेंगे और साथ में आपका भी नाम लेंगे। चलेगा। अगर ऐसा होता तो हर संगी अपने बेच्चे का नाम नथूराम रखता ना नहीं रखा ना किसी ने। हम तो अंतरात्मा सबको होती है और चुभता सबको है बस दिखाते नहीं है। जी मैं आना चाहती हूं थोड़ा मैं फॉरेन पॉलिसी के बारे में बात करूंगी और उससे पहले मैं आपसे जानना चाहती हूं कि आप अपने एक्सपीरियंस से आप मुसलमानों को क्या कहना चाहते हैं कि उन्हें अभी क्या करने की जरूरत है? क्योंकि देखिए हर रोज किसी ना किसी तरीके से उनके ऊपर एक तरह का हमला होता है। एसआईआर के बाद मॉब लिंचिंग आती हुई प्रोपगेंडा फिल्म्स सोशल मीडिया गोदी मीडिया अ तमाम इंस्टीटशंस हर चीज ऐसे लगती है कि उनके खिलाफ काम कर रही है। यहां तक कि जुडिशरी पर भी अब सवाल उठते हैं। तो सवाल मेरा यही है कि अभी मुसलमानों को क्या करना चाहिए? व्हाट शुड बी देर स्ट्रेटजी? मैं कुछ सलाह देने लायक आदमी नहीं हूं। मुसलमानों को सलाह दूं। तो इतना बड़ा भी नहीं हूं मैं क्योंकि उनकी सलाह तो मिल चुकी है उनको। मैं बताता हूं उसके बारे में। लेकिन मैं एक पहली बात मैं रिक्वेस्ट करना चाहता हूं। आप ये सुन्नी शिया के मामले में मत उलझिए। आप सिर्फ मुसलमान हो। ये बात पे कायम रहिए तो ज्यादा अच्छा होगा। मुझे लगता है ईरान के बाद शायद ये फार बहुत हद तक मैं हां एक और जहां तक मैं क्या बताऊं वो मैं क्या बताऊं। हुसैन साहब बता कर गए हैं। जहां भी सत्य अकेला दिखे वहां आप हुसैन को याद करना। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] बस उनके उनका जीवन ही उनका उनकी बात कहता है। देखिए कही हुई बात कुछ नहीं होती। अली और हुसैन की जी हुई बात है वही बात है। तो कर्बला में जो किया उन्होंने आपको ये नहीं देखना है कि आपके पास संसाधन कितने हैं? नंबर्स कितने हैं? आप जीतेंगे या हारेंगे। ये सब बाद की बातें हैं। आप सही बाजू के लिए सत्य के लिए आप लड़ते हो या नहीं अपने वक्त। लेकिन लेकिन जब वो जुल्म के खिलाफ आवाज उठाता है तो उसी का घर बुलडोज कर दिया जाता है। आप समझिए कि हुसैन साहब का कौन सा अलग निय डेस्टिनी थी? उनकी नियति भी तो ऐसी थी लेकिन आज उन्हीं को मैंने याद किया ना इतने सालों बाद उनके खिलाफ जो गए उनके में से एक का नाम याद आया क्या रखा है कहीं लिखा हुआ? नहीं ना। तो बात यही है उमर खलीद ही याद रखा जाएगा। मुझे नहीं याद रखेंगे कोई क्योंकि उमर खलीद ने वह सहा है इस संविधान के लिए इस देश के लिए और इस लोकतंत्र के लिए जो हम कोई नहीं हम में से कोई नहीं सह सका वो देखिए उसको केस लड़ने की भी मोहलत नहीं मिली जो हमको मिली हमारे ऊपर भी बहुत सारे केसेस हुए हम तो कम से कम लड़ रहे हैं उसको लड़ उसको सीधा पकड़ा और ठूस दिया अंदर और उसकी मां का ऑपरेशन है तब भी उसको नहीं छोड़ रहे हैं तो उसकी कुर्बानी सबसे श्रेष्ठ है बिल्कुल और उसी तरह के तमाम लोग उमर खालिद हैं या शजील इमाम है, खालिद सैफी हैं। इस तरह के तमाम और देखिए सब लोग जेल में हैं। इजराइल हो या ब्रिटिश हो हमेशा मुसलमानों के खिलाफ क्यों रहे और या मोदी शासन क्योंकि वो ब्रिटिश और इजराइल की हमेशा गुलाम रहना चाहते। मोदी यानी आरएसएस उस टाइम में ब्रिटिशों के साथ थी। अब इजराइल के साथ है। हम इन लोगों को मुसलमानों से प्रॉब्लम क्या है? हिंदुस्तान के 1857 से ले आज तक अपने वतन के साथ खुददारी के साथ खड़े रहकर लड़ना मुसलमान ही जाने। मुसलमानों की इतनी बड़ी गरीबी आजादी के बाद आप समझ लीजिए कि उसकी वजह क्या है? उसकी वजह उन्होंने ब्रिटिशों के खिलाफ पूरा 100% बगावत की। इससे विपरीत कई संस्थान थे जहां हिंदू राजा थे। उन्होंने कॉम्प्रोमाइज किया ब्रिटिशों के साथ। उनके बेटे पोते परपोते आज मंत्री है। उनके पास अक्षुण संपत्ति है। मुसलमान राजाओं की उस टाइम में वहां के सुल्तान या नवाबों की संपत्ति उनसे कई गुना ज्यादा थी। लेकिन उन्होंने वतन पे लुटा दी उसको। देशद्रोही का टैग लग जाएगा आपके ऊपर। देशद्रोही क्या? मैं मैं वो शतरंज के खिलाड़ी का जो अवध के नवाब है उनका देखिए वोक गए। हम वहीं पे उनके अाय जैसे एक तरह से निष्कांचन होकर उनकी मृत्यु हो गई। वो वहां पर उन्होंनेक की अलग बिरयानी बनाई वो अलग है। लेकिन उसकी कहानी आपको मालूम है आंख में आंसू आ जाएंगे। यहां की जो बिरयानी है उसमें गोश्त होता है। तो वहां पर उनका गोश्त ही खत्म हो गया। पैसे ही नहीं थे खरीदने के लिए। तो उसमें आलू डाले। हम जाहिर सी बात है कि ये बड़ा मुश्किल दौर है उन तमाम लोगों के लिए जो इस आईडियोलॉजी में यकीन नहीं रखते हैं और मुसलमानों के लिए तो है ही क्योंकि उनकी कोई नहीं और मैं कहना चाहूंगी। बहुत सारे हिंदूवादी लोग यह हिंदुत्व पे इसलिए विश्वास रखते हैं क्योंकि उन्होंने हिंदुओं के जो सो कॉल्ड हिंदुओं के यानी जो धर्म ग्रंथ कहे जाते हैं उनको पढ़ा ही नहीं है। जैसे उन्होंने वंदे मातरम भी कभी पढ़ा ही नहीं। कंठस्थ होना तो बहुत दूर की बात है। कई श्लोक है यानी मैं आपको एक श्लोक बताता हूं। संस्कृत का कि अष्टादश पुराणु व्यास वचनम द्वयं परोपकाराय पुण्य पापाय परपडनम आकाशात परितम तोय यथा गच्छति सागरम सर्वदेव नमस्कार केशव प्रतिगच्छति अब इसका मतलब यह है कि 18 पुराणों में अष्टादश 108 पुराणों में व्यास ने यही कहा है कि दूसरे पे परोपकाराय परोपकार करो तो उसी में पुण्य है। पापाय परपीडनम यानी दूसरे को पीड़ा दो तो वह पाप है। उसमें कहीं भी हिंदू या मुसलमान का जिक्र नहीं है। अगर यह बात है संस्कृत में है और ठोस है तो इसका मतलब आरएसएस धर्मद्रोही भी है। देशद्रोही तो है ही। आतंकवादी तो है ही लेकिन धर्मद्रोही भी है। किसी भी मंदिर में किसी भी मंदिर को हाथ लगाने की इनके किसी भी व्यक्ति की योग्यता नहीं है। क्योंकि यह बेसिक आपको जो सीख दी जाती है उसके खिलाफ वो बर्ताव कर रहे हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो पापाया परपडनम अगर व्यास कह रहे हैं तो आप कौन होते हो भागवत वही बात है कि आप वही इसीलिए बार-बार ये कहना बहुत जरूरी हो जाता है कि हिंदूइज़्म और हिंदुत्व इन दोनों को कैसे अलग-अलग करने की जरूरत है और बीजेपी आरएसएस जैसे जैसे यहूदियों को औरज्म को अलग करने की जरूरत रेफरी सेक्स बोल रहे हैं जो मेरी तरह बोल रहे हैं पूरे जायोनिज्म के खिलाफ वो खुद यहूदी हैं। हम एंटीसेमेटिक नहीं है। हम जाज्म के खिलाफ हैं। बिल्कुल और कई यहूदी है जो जाइनिज्म के खिलाफ है। हम चाहे उनकी तादाद बहुत छोटी है बट दे आर देयर। हम जाइनिज्म के खिलाफ है इसलिए हिटलर के कुकृतियों का सपोर्ट नहीं करेंगे कभी क्योंकि वो हरा यानी वो उन्होंने जो किया वो सारे इंसानियत पे दाग था। बिल्कुल बिल्कुल मैं आना चाहूंगी यहां पर बस दो तीन आखरी सवाल मेरे आपसे और मैं फॉरेन पॉलिसी को लेकर मैं आपसे पूछना चाह रही थी कि फिलहाल हम देख रहे हैं कि हाल ही में प्रधानमंत्री के शायद कुछ देश ही बचे होंगे जिनको वो शायद कवर करना चाहते हैं तो वो कवर कर रहे हैं। लेकिन सबसे पहले वो गए यूएई। जब युद्ध होने वाला था, जब जंग होने वाली थी, उससे पहले गए वो इजराइल और अब दोबारा लग रहा है कि शायद जंग हो सकती है तो वो उसके बीचोंबीच तब गए हैं जब ब्रिक्स की यहां पर सबमिट हो रही थी और विदेश मंत्रियों की उसमें अराची यहां पर थे और उसके फौरन बाद उनसे मिलकर हाथ मिलाकर वो चले गए यूएई और वहां पर जाकर जो उन्होंने अपनी रील बनवाई है जो पूरी धुरंधर वाली वो पूरी तरीके से आपने देखा होगा कैसे हाथ फैलाकर वो मिले हैं और धुरंधर वाली नहीं वो वो वो वो मैंने कहीं एक दूसरे एपिसोड में बोला वो रील देख के मुझे राजेंद्र कुमार की 60 के दशक की फिल्मों की हीरोइनों की याद आती है। वो ऐसे टाइट चूड़ी पहन के ऐसेसे नाचती थी ना आती थी उतर के [हंसी] वो मुझे याद आया। असल में एक्चुअली ऐसा कोई करता है क्या? ऐसा कोई गले लगाने के लिए सिर्फ प्रियतमा के गले लगाने के लिए हीरो और प्रिय अपने जो अपने प्रियंसी है उनको गले लगाने के लिए प्रियतमा ऐसे आती थी 60 के दशक में ऐसा होता था और आखिर में 70 के दशक में ये चाल रही नहीं तो फिर एक हीरोइन थी जिसका मैंने किसी और एपिसोड में भी जिक्र किया है वो राजेश खन्ना की द ट्रेन में बेबी नंदा वो ऐसे टाइट कपड़े पहन के ऐसे वो वो द ट्रेन फिल्म में ऐसे ही करती है वो आप देखिए वो मुझे बिना वजह यानी मैंने मेरा कोई पर्सनल दुश्मनी नहीं है ऐसे स्टाइल से लेकिन मुझे याद [हंसी] आता रहा और मुझे वही हॉर्न कर रहा है तो वो मैं देखता हूं तो वो धुरंधर वाला वो आप मोदी जी का थंडर क्यों चुराना चाहते हैं उसमें थंडर नहीं है आप देखिए आप इतने उतावले हो रहे हो एक यानी कम से कम दिखावे के लिए मुसलमान जो है शेख है हम उसको [नाक से की जाने वाली आवाज़] मिलने के लिए और आपके देश के मुसलमानों को आपके लोग मार रहे हैं तो आप लोगों को कितने दिन तक इस तरह से भ्रमित करते रहेंगे। हम आपके पैसे, आपके दोस्तों के पैसे, आपके इंटरेस्ट और आपकी सत्ता इजराइल की यह ऑिलरी स्ट्रक्चर के जायोनिस्ट कुछ यूएई के लोग हैं। उनके पास उनके हाथ में है। तो ये जैसे कि वो राजा का राजा का प्राण उस तोते में होता था वैसे वो तोता है। तो उसके सामने आप पंख फैला के जाएंगे और यहां का मुसलमान दिखा तो आप कहेंगे कि कार के नीचे भी कुत्ते आते हैं। या कपड़ों से आप पहचानते हैं या उन्होंने जितना बोला है ना मैं आपको बोलूं कि उन्होंने 2002 से आज तक मुसलमानों के खिलाफ औरतों के खिलाफ आदिवासियों के खिलाफ और दलितों के खिलाफ जितना बोला है उतना बोलने की मोहलत किसी भी सभ्य समाज में किसी भी आम या खास व्यक्ति को मिलनी नहीं चाहिए। बिल्कुल लेकिन अभी मैं देख रही थी कि प्रधानमंत्री अभी मिलोनी जो है उनसे मिले हैं और मेलडी दिया है और जिस तरह से वो ऐसे हाथ करते हुए उनके साथ पिक्चर खिंचवा रहे हैं और आप देखिए रील की बाढ़ आएगी पूरी [नाक से की जाने वाली आवाज़] हम देखेंगे और उनके साथ मतलब फॉरेन पॉलिसी कितनी इंपॉर्टेंट चीज हुआ करती थी मजाक बनके रह गई है वो नॉर्वे में जिस पत्रकार महिला ने उनको सवाल पूछा वो इंटीग्रिटी वाली लेडी है हम उनको वह जवाब दिए नहीं और यहां पर उसके चरित्र का हनन करने में कुलपति से लेकर कुलगुरु तक आरएसएस के लगे हुए हैं। बिल्कुल मोदी जी खुद तो उनके इशारे के या उनके सहायता के बिना तो लग नहीं सकते। हम उसका इंस्टा और Facebook अकाउंट वो तो जािस्ट जुकरबर्ग तो वो सारी चीजें जो हो रही है हिंदुस्तान में वो जाइनिज्म के इशारे पे हो रही है क्योंकि मोदी उनके बल पे ही बैठे हैं तख्त पे तो क्या आपको लग रहा है आज जो भारत भुगत रहा है वो इस सरकार की फॉरेन पॉलिसी में जिस तरह से एक धुरी के साथ जो वो खड़े हो गए हैं इजराइल अमेरिका और यूएई क्या उसकी वजह से भी भुगत रहा है क्योंकि अभी अब्बास अराची जो है उनका का एक बयान है। जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके जहाज निकलने दिए जाएंगे? तो उन्होंने कहा कि हम तो हमेशा से सस्ता तेल भारत को देते थे। भारत ने हमसे लेना बंद किया। अगर वो फिर से उसने भी यही कहा वही तो क्या ये जो अभी दिखाया जा रहा है कि एक बहुत बड़ा इकोनमिक क्राइसिस है। होगा ऑफ कोर्स हॉर्मोस बंद हुआ है वो इकोनमिक क्राइसिस है। लेकिन क्या इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि हमारे फॉरेन पॉलिसी चाबार पोर्ट होता हॉर्मोस स्टेट स्टेट ऑफ़ हॉर्मोस का बात ये किसको बता रहे हैं? चाबार पोर्ट अगर ईरान का होता तो स्टेट ऑफ़ हॉर्मोस की जरूरत ही नहीं। आप ज्योग्राफी देखिए आप चाब से सीधा ईरान से तेल ले सकते थे। हम सवाल विलिंगनेस का था और विलिंगनेस लूढ़ी हो गई इनकी क्योंकि इनकी सत्ता उनके हाथ में थी। हम और जो राहुल गांधी कहते हैं कि इज़ अ कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम। तो यही अलग भाषा में इसको कॉम्प्रोमाइज ही कहते हैं। यानी वॉइसराय आता था या गवर्नर का जनरल वो कॉम्प्रोमाइज्ड होता था। क्योंकि वो ब्रिटिश सल्तनत की हित की जो बात है वही करता था ना हिंदुस्तानी लोगों के। इसलिए एक करोड़ लोग यहां के बंगाल के फेमिन में मरे। अब आगे जाकर देखिए क्या होता है। यही बंगाल होगा, यही अनाज होगा। मोदी जी ये कह रहे हैं कि आप फर्टिलाइजर यूज़ मत करो। क्यों कह रहे हैं भाई? कह रहे हैं भू माता को दर्द होता है। अरे इनको क्या मालूम भू माता क्या है? क्योंकि 35 साल तो भिक्षा मांग कर खा रहे थे। भू माता को दर्द नहीं होता। प्रॉब्लम ये है यूरिया खरीद नहीं सकते। यूरिया आ नहीं रहा है। और ऑर्गेनिक जब खाना हम बना रहे थे तो हम भीख मांग रहा था भारत। अमेरिका से जो पशुओं को खिलाते हैं वो गेहूं आता था हमारे लिए। मैंने नहीं खाया लेकिन मेरे फादर ने तो खाया है। वो बोल रहे थे हमेशा जब तक थे वो बोलते थे कि अमेरिका से आता था। पर इंदिरा जी ने फिर ग्रीन रेवोल्यूशन की। फिर सारा जो खाद है वो बदल गया। हमारे यहां पूरा धान होने हम एक्सपोर्ट करने लग गए वो। फिर वहीं पटरी पे लाके खड़ा करेंगे मोदी जी। मोदी जी इस देश को तोड़ सकते हैं। मोदी जी इस देश को बेच सकते हैं। मोदी जी इस देश में सृजन नहीं ला सकते। तो उसको कॉम्प्रोमाइज कहेंगे या नहीं कहेंगे आप? हम और वो किसी के कहने के लिए कहने पर और किसी के लिए कर रहे हैं। वो खुद के लिए भी नहीं कर रहे हैं। खुद की कुर्सी बचाने के लिए कर रहे हैं। यस। और उनके मित्रों की आबादी के लिए कर रहे हैं। और उनके मित्र तीन चार ही है। बस बिल्कुल लास्ट मेरा सवाल आपसे 2029 में क्या आप कुछ बदलता हुआ देख रहे हैं? अब भारत में चुनाव से कुछ नहीं बदलेगा। भारत में जनता अपनी तकदीर खुद लिखेगी तभी बदलेगा। 2029 ऐसा कोई टाइम नहीं होता उसके लिए। जनता जब चाहती है अपना सरकार चुनती है। सरकारें जनता चुन रही है एसआर के माध्यम से। यह खतरनाक है। ये जनता को मालूम हो जाएगा तब जनता सरकार को चुनेगी और वो सरकार ये नहीं होगी। ओके। बहुत-बहुत शुक्रिया राजू जी आपका। आई आई थिंक हम लोगों ने बहुत सारे इसमें चीजों को ऑलमोस्ट हमने कवर कर लिया। आपने बहुत वक्त दिया। थैंक यू सो मच फॉर कमिंग टू नाउ। थैंक यू।

Companion article

A "Smoke Screen" Called SIR

The conversation opens on the Special Intensive Revision, or SIR, of India's electoral rolls — the process that has deleted an estimated one crore voters in West Bengal, a crore in Tamil Nadu and nearly 2.83 crore in Uttar Pradesh, with Maharashtra now beginning its own revision. Speaking to host Bushra Khanam, Raju Parulekar, a senior journalist and political analyst, insists the exercise has little to do with winning elections. "SIR is not for elections," he said. "It's a smoke screen" — one whose real purpose, in his telling, is to render non-citizens of people the ruling party would rather not count as voters at all. He argues the BJP did not need SIR to keep winning: in his account, the Election Commission and EVM administration were already compromised well before it, pointing to what he calls the disputed 2019 count in Varanasi and describing the 316 seats he says the India alliance actually won in 2024 before being "converted" into defeat — a claim he attributes to the same argument made publicly by Rahul Gandhi's "vote chori" press conferences and by the political economist Parakala Prabhakar.

Congress as the "Soft Target"

Asked why the BJP nonetheless tolerates opposition state governments in Kerala and Tamil Nadu, Parulekar argues that Congress is deliberately allowed occasional wins because it poses no real threat to the centre. "Congress is a soft target for the BJP," he said, describing the party as internally compromised and lacking, in his assessment, any leader besides Rahul Gandhi with the standing to take on the BJP directly. Where a strong regional party or the Left stands in the way, he argues, the BJP prefers to see Congress installed instead, precisely because it can be defeated more easily later — as, in his account, happened when the Shiv Sena was split to hand Maharashtra to the BJP-aligned faction, and when Suvendu Adhikari, whom he numbers among seven chief ministers the BJP has "imported" from rival parties, rose in West Bengal. Bengal, he argues, mattered more than most states to a "saffronisation" project because of its large Muslim population, its Bangla identity, and its position as one of the last major states — alongside the northeast — not yet absorbed into a Hindi-Hindutva template.

The "Israelisation" Thesis

Pressed on how the BJP's continued electoral dominance can be squared with genuine popular support, Parulekar advances his most contested claim: that India's ruling apparatus has effectively been "Israelised," with tools, strategy and even intent supplied by Israel and, in his account, elements of Israeli intelligence embedded across Indian institutions — the judiciary and the Election Commission among them. He points to the malware findings by international forensic labs in the Bhima Koregaon case, and to the mass disenfranchisement under SIR, as evidence of what he calls a deliberate project to strip Muslims and government critics of citizenship before subjecting them to violence with impunity — a scenario he compares, at its most extreme, to genocide, invoking Suvendu Adhikari's own reference to Israel's conduct in Gaza as the explicit model. These are grave, largely unproven allegations that Parulekar presents as certainty rather than hypothesis, and Nous is reporting them here as his stated views rather than established fact. He is careful to note that the ideology itself, in his view, is homegrown — "the ideology is brewing right here," he said — with Israel supplying instruments rather than authorship, and traces the RSS's history of aligning with dominant outside powers back to its wartime approach to the British.

"Vote Is Not Halwa"

Parulekar is particularly exercised by the fate of voters deferred rather than outright deleted under SIR — some 27 lakh in Bengal alone, he says, told they could simply re-register "next time." He rejects the idea that this is a minor bureaucratic inconvenience. "Vote is not halwa," he said — not something to be handed out later at the state's convenience — arguing that a deferred or deleted voter risks losing not just a ballot but a passport and, eventually, citizenship itself. He describes the trajectory he fears: a population first rendered voteless, then stateless, then, in his most extreme framing, disposable — "you were never citizens here, so no one will ask what happened to you." He is careful to frame this as where the current process could lead rather than something that has already occurred, but insists the opposition has not adequately warned people what is genuinely at stake.

A Vote Bank, or a Manufactured Majority?

Challenged that the RSS's decades of grassroots organising suggest genuine, organic support rather than manipulation alone, Parulekar's response is that the RSS's real base has remained roughly constant for a century, while its parliamentary numbers have not: he argues the 2014 collapse of Congress from over 200 seats to 44, and the swing to over 300 BJP seats since, cannot be explained by ideology alone. He describes the "vocal minority" phenomenon — supporters loud precisely because critics are, in his telling, frightened into silence — and dismisses viral images of BJP supporters weeping with devotion abroad as choreographed "mobile units" of party volunteers bussed in from Gujarat and Uttar Pradesh to manufacture crowds and slogans at will.

A Trustee Who Broke Faith

Parulekar offers his own theory of why the opposition, rather than street revolt, remains the default response to what he describes as systematic vote theft. A vote, he argues, functions like something held in trust: citizens hand it to a party as trustee, expecting it to be protected and represented. When that trust is betrayed — when, in his account, votes are stolen after being cast — citizens' faith collapses not only in the ruling party but in the very idea of trusting any party with their vote again, which he offers as one explanation for public passivity in the face of mounting disenfranchisement. He is equally unsparing about India's elected opposition, arguing that MPs enjoy enough personal comfort and privilege — official travel, security, status — that few of them personally bear the costs of the fight they nominally lead. Rahul Gandhi, he concedes, is a partial exception, someone who has "borne it" in a way most parliamentarians have not; he singles out BJP MP Ravi Kishan's public confusion between "work from home" and "home from work," and remarks by another BJP MP blaming Congress-era family planning policy for his own four children, as evidence of the intellectual thinness he says now passes for opposition-adjacent political discourse.

Political Prisoners and the Price of Dissent

Parulekar reserves some of his sharpest language for the continued incarceration of activists including Umar Khalid, Sharjeel Imam and Khalid Saifi, arrested in relation to the 2020 Delhi riots case. Invoking the memory of Imam Hussain at Karbala, he argues that history will remember Umar Khalid for what he has endured — including, he says, being denied parole to be with his mother during her surgery — in a way it will not remember those who prosecuted him. He extends this into a broader argument about religious minorities and dissent under British rule, contrasting what he describes as Muslim rulers who lost their wealth resisting the British with Hindu princely families he says compromised and whose descendants remain politically prominent today — pointing, by way of illustration, to the folklore around the last Nawab of Awadh's reduced circumstances in exile.

An Apology, and a Question for Silent Hindus

Pressed by Khanam on why the large section of Hindus who reject Hindutva remain publicly silent while all this unfolds, Parulekar does not deflect. "On my own behalf, I apologise to you and to the entire Muslim community," he said, arguing that passive, "neutral" Hindus bear real responsibility for what has been allowed to happen, even as he admits he cannot explain why prominent opposition figures have stayed quiet on specific abuses. He extends the same charge to Bengal's intelligentsia, long assumed to be a bulwark against communalism, asking pointedly why they too have said so little as the state's politics have shifted. He does not exempt himself either, telling Khanam he expects history to eventually draw up a list of the guilty and that he will not claim exception from it — "if we were, no Hindu would speak the way I do."

Hinduism Versus Hindutva

A significant portion of the conversation is devoted to Parulekar's argument — offered, he says, as someone raised Brahmin who has read the Vedas, Upanishads and Puranas — that Hindutva bears no relationship to Hindu scripture. He cites a Sanskrit verse from the Puranas, attributed to Vyasa, holding that helping others is virtue and causing others pain is sin, arguing that nothing in the classical texts sanctions targeting a religious minority. On this basis he calls the RSS not only what he terms an "anti-national" and "terrorist" organisation but, in his words, "dharmadrohi" — a betrayer of the very faith it claims to defend — while stressing that Gandhi, whom he calls an original Hindu, never built temples to himself or worshipped through an intermediary "baba," unlike, in his telling, the godmen who have flourished under the current political order.

Foreign Policy as Theatre

Turning to foreign affairs, Parulekar is scathing about the government's diplomacy with the Gulf, Israel and the United States, describing recent viral clips of the Prime Minister greeting Gulf leaders as choreographed theatre reminiscent of old Hindi film romances, and arguing that a government simultaneously courting Muslim-majority states abroad while presiding over anti-Muslim violence at home cannot indefinitely paper over the contradiction. He also links the country's economic difficulties, following the closure of the Strait of Hormuz to some Iranian oil shipments, to what he calls a foreign policy realigned toward the interests of a small circle of allies rather than ordinary citizens — dismissing the government's professed environmental rationale for reduced fertiliser subsidies, and drawing a contrast with the food shortages of decades past.

Demonetisation, GST and a Theory of Economic Capture

Parulekar extends his broader thesis to economic policy, arguing that 2016's demonetisation and the design of the Goods and Services Tax were not primarily anti-corruption measures but mechanisms to force India's cash-dependent small traders and informal workers into a digitally surveilled, centrally controlled economy — cash, he insists, is liquidity for the ordinary vendor, not inherently "black money." He connects this, speculatively, to what he calls global financial interests uncomfortable with India's cash economy and, by extension, to Islam's own prohibition on interest-based finance, framing the entire episode as one front in a wider economic and psychological contest rather than a domestic tax reform. This is, again, an interpretation Parulekar offers with total conviction but little documentary evidence, and readers should treat it as his opinion rather than settled fact.

What Happens Now

Parulekar's closing message is that little should be expected from the ballot box in its current form. Real change, he argues, will not arrive through an election in 2029 but only when ordinary citizens — and he points specifically to farmers' and labourers' protests as the model of what he calls a genuinely "revolutionary force," as distinct from opposition parties that remain, in his view, part of the existing power structure rather than outside it — assert their own agency. Until then, he offers Muslims and other minorities little concrete counsel beyond the example of resistance itself: to stand, as he puts it, on the right side of history, regardless of the immediate cost.

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