7:30Waqf Properties: What Went Wrong With Their Management? nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=VFlC_b4wGZo&t=127s
In this thought-provoking conversation, Dr. Syed Zafar Mahmood joins Ali Javed to discuss the socio-economic and political empowerment of Indian Muslims. Drawing on decades of public service and work on minority rights, Dr. Mahmood reflects on his personal journey, the challenges confronting the …
यह आपने अभी ज़कात की बात की थी। तो ज़कात जो है ना इट्स अ वेरी स्मॉल सेगमेंट ऑफ़ एंटायर मैंडेट ऑफ़ अल्लाह। तो जो मेरे पास बच रहा है इन तीनों सूरतों में उसमें तो जमीन आसमान का फर्क है। उसको एक्सप्लेन करने के लिए सूर बकरा की आयत नंबर 219 में 2007 में मैं अभी 2014 की बात नहीं कर रहा हूं। 2014 के बाद हम फिर से उसको एक रीडिंग करने की कोशिश करेंगे कि भ व्हाट चेंज्ड मुस्लिम्स आर लैगिंग बिहाइंड एवरीबडी सोशल इकोनमी एजुकेशन तीनों फील्डों में और उसकी वजह ये है दे आर थोरली अंडर रिप्रेजेंटेड इन द गवर्नेंस ऑफ इंडिया और साथ में खुद जो कम्युनिटी है जो उसका पार्टिसिपेशन है जो आपने शुरू में भी इशारा किया तो वेयर इज द गैप प्राइम मिनिस्टर की हाई लेवल कमेट कह रही है जिसको कि कैबिनेट ने अप्रूव किया पार्लियामेंट में पेश हो गई आप जो है वो अंडर रिप्रेजेंटेड है बिकॉज़ ऑफ फौ्टी डीलिमिटेशन। तो उसमें आप भी एक रोड मैप का जिक्र करते हैं। विज़ होना चाहिए, एक तरीकेदार होना चाहिए जिससे मुसलमान अपने आप को खुद मुख्तार कर सकते हैं। सरसों को तो मैं सलूट करता हूं, सलाम करता हूं। बेहतरीन उनका जो उनका जो वजूद है उसी की वजह से दीन का वजूद है मुल्क में। वहां पे आपने कम से कम कोशिश की कि उस तरह के इंस्टटश इदारे मिसाली हो और वो और लोग भी उसको रेप्लिकेट कर सके। चश्मे नम जाने से उदा काफी नहीं फैज का है कि खाली आंखें नम कर लेना और दिल दिल को मुजमल कर लेना अरे भाई बड़ी परेशानी है इससे काम नहीं चलेगा नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के [संगीत] इशज़ पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंप्लीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउ को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। सबसे पहले और यू नो जो सबसे इंपॉर्टेंट सवाल मेरे लिए हमेशा यह रहता है कि एक इंसान का लिव्ड एक्सपीरियंस जो उसने जिंदगी जी होती है जिन ओहदों पे वो रहा होता है जो अह जो एक्टिविटीज उसने की होती है। उससे उसकी अंडरस्टैंडिंग शेप होती है। उसकी लाइफ से, उसके बैकग्राउंड से, उसकी एजुकेशन से, उसके प्रोफेशन से और वो जब पब्लिक लाइफ में जुड़ता है तो वो ये सारी चीजें अपने साथ लेके जुड़ता है। तो आपको लोग एज ए आईएएस ऑफिसर एज योर कंट्रीब्यूशन इन सच अर आपकी जो जो एनजीओस आपने जो बनाई हैं और उसका कंट्रीब्यूशन से तो बहुत लोग शायद जानते होंगे। लेकिन हम ये भी समझना चाहेंगे कि वो जर्नी कहां से शुरू होती है? क्यों आपको ये क्वेश्चंस इंपॉर्टेंट लगते हैं? और अल्टीमेटली जब आप एज एन ऑफिसर यू नो जॉइ करते हैं तो वो जो सिस्टम को आप अंदर से देख रहे हैं क्या गैप्स आपको लगते हैं जो कम्युनिटी फेस कर रहा है और क्या आपको लगता है कि सिस्टम सॉल्व कर सकता है और क्या आपको लगता है कि शायद सिस्टम सॉल्व नहीं कर सकता जो आप टेक अप करते हैं। देखिए एक तो बहुत शुक्रिया आपने मुलाकात का प्रोग्राम बनाया। बड़ा अच्छा लगा। दूसरी चीज जो मुझे आपको अ करनी है जो आपने सवाल पूछा उसके ताल्लुक से वो यह है कि पहले यानी कि आजादी के बाद से लेकर के 2014 तक एक फ था और 2014 के बाद से अब तक का आइंदा का आपका दूसरा फ है। तो इवन ज्यादातर जो रेलेवेंट आस्पेक्ट्स हैं मुस्लिम लाइफ इन इंडिया के उसमें मैं ये कहूंगा आपको कि इन दोनों फेस में बहुत कुछ ज्यादा फर्क नहीं है। अच्छा हां आप अगर गौर करें मैं ये बात क्यों कह रहा हूं वो ये है कि पहले बस इतना था कि आपको ये एहसास नहीं होगा कि आपके साथ कोई ज्यादती की जा रही है लेकिन ये कि ज्यादती की जा रही पहले भी थी जी हम और उसकी मैं समझता समझता हूं माकूल वजह है हम क्योंकि 800 साल तक मुसलमानों ने राज किया हम और उसके बाद 200 साल [गला साफ़ करने की आवाज़] तक अंग्रेजों के राज के दौरान जो है वो डिवाइड एंड रूल की पॉलिसी उनकी क्योंकि रही उसमें भी विलेन ऑफ़ पीस मुसलमान ही थे। हम और हजार साल जब गुजर गए हम उसके बाद फिर मुसलमान मुल्क का एक हिस्सा लेके अलग हो गए। जी ये जो फैक्टर्स है ना हम इन तीनों फैक्टर्स की बुनियाद के ऊपर हम आज का जो गैर मुस्लिम है हिंदुस्तान में हम वो अगर प्रजुडिस्ट मुसलमानों से ना हो हम तो ये बड़ी नेचुरल गैर फितरी बात है। जी क्योंकि हजार साल का बैकेज है। हम जब उस वक्त भी 800 साल जब थे जब मुसलमानों की हुकूमत थी उस वक्त भी मुसलमान बहुत माइनॉरिटी में थे। लेकिन रूल कर रहे थे। तो जाहिर है अगर मेजॉरिटी के ऊपर माइनॉरिटी रूल कर रही है तो उनका ज़हन कैसा चलेगा? जनरेशन आफ्टर जनरेशन उसका असर आगे तक आया है। हम मैं आपको अर्ज करूं कि बहुत पहले की बात है। मैं लीगल पढ़ता था जब तो मेरे साथियों में से एक बहुत अच्छे हमारे हिंदू दोस्त हैं। हम पंकज शर्मा अभी भी बड़ी दोस्ती है। उनसे बड़े ताल्लुकात है। खानदानी म से उन्होंने मुझसे ये बात कही थी। कि बहुत मजाक में बताया था लेकिन ये कि उन्होंने कहा था हमारे यहां बाथरूम को फैमिली में शुरू से ही पाकिस्तान कहा जाता है। तो ये उसी जो मैं आपको कह रहा हूं उसी फीलिंग का एक मैनिफेस्टेशन जबकि बीजेपी संघ परिवार कहीं दूरदूर तक नहीं थी उसको सुनने में नहीं आता। हां लेकिन तब भी ऐसा था तो वो समझने की बड़ा जरूरत है। लेकिन शुरू के जो वो साल थे 1947 से लेकर के और 2014 तक उसमें मुसलमानदगी में रहे। हम में इस तरह से रहे कि अपनी फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है। ठीक है? हमारी जो इज्जत समाज में होनी चाहिए वो चल रही है और हमारे कुछ लोग जो हैं वो कुछ ओदों के ऊपर बैठे भी हैं चाहे वो इनसिग्निफिकेंट ही हो लेकिन कुछ लोग नजर आते हैं ओदों पे बैठे हुए इधर उधर और हमारी लोकसभा में भी थोड़ी बहुत नुमाइंदगी है। हालांकि जो बात मैं अभी आपसे अर्ज कर रहा था कि बहुत फर्क नहीं है। आप पहली लोकसभा 1952 की थी तब से लेकर के अब तक कर लीजिए। हम तो जो वो है प्रोपोशनल रिप्रेजेंटेशन उसके हिसाब से अगर आप देखें तो कम से कम 77 मुस्लिम्स होने चाहिए लोकसभा में आउट ऑफ 542 जी लेकिन एवरेज 25 से ऊपर कभी नहीं एवरेज जी एक साल में वो थोड़ा बड़े थे लेकिन एवरेज अगर आप देखें तो 25 या उससे कम रहा है वो भी 80 में क्योंकि एक माहौल चला था और उसमें हां तो उसमें बड़ा पोर्शन तो 2014 से पहले का था जी जी तो उसमें भी वैसे ये समझता हूं कि मुसलमानों की अपनी कमी थी। हम क्योंकि उन्होंने उस पे अल्लामा इकबाल के उस मिसरे पे अमल नहीं किया कि अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर जिंदों में है। हम वो थोड़े से लोग जो है वो अपना अपना करते रहे जो जिनको थोड़े-थोड़े ओदे मिल गए। लेकिन एक मूवमेंट के तौर पर कि इंटरनली एमावर करना है कम्युनिटी को अपने को सोच समझ करके वो कोई किसी ने किया नहीं। हालांकि अगर आप गौर करें आज भी इतने जो गैर मुजबत हालात हैं इस वक्त उसमें भी मेरा ख्याल ये है बहुत कवी ख्याल कि मुस्लिम समाज जो है हिंदुस्तान का वो अंदरूनी तौर पे खुद कफील है इंटरनली सेल्फ सफिशिएंट है अभी भी हम द ओनली थिंग इस दैट वी आर नॉट गुड मुस्लिम्स हां अगर हम समझ ले कि दीन का पैगाम क्या है हम और उसके ऊपर अमल करना शुरू कर दे किसी हद तक भी हम तो वी आर इंटरनली सेल्फ सफिशिएंट एंड इनफैक्ट वी कैन टेक केयर ऑफ़ आवरसे एंड वी कैन टेक केयर ऑफ़ अदर्स आल्सो द ओनली थिंग कि हम उस पे गौर नहीं करते समझते नहीं है बहुत अभी और हम इंशा्लाह आपसे गुफ्तगू करेंगे लेकिन आपने जो मुझसे पूछा कि जो मेरा पहली जिंदगी रही और उसके बाद फिर मैंने गवर्नमेंट सर्विस जॉइन की और उसमें रहा तो गवर्नमेंट सर्विस में मैं आप उससे पहले अपना फैमिली फैमिली बैकग्राउंड भी बताइए क्योंकि उससे हल्का सा ये अंदाजा होता है कि आप जी मेरे वालिद साहब साहब ओरिजिनली जो जायज के थे हम लेकिन ये कि वहां उन्हें मेरे दादा साहब जो है बहराइच शिफ्ट हो गए शिफ्ट वहां वो हकीम थे हम और हमारे वालिद साहब जो है वकील थे अली यूनिवर्सिटी से उन्होंने एमए एलएलबी किया था अच्छा 1927 में फिर वापस बहराइच जाकर के वकालत शुरू की थी हमारे सुनने में यह आया है कि एक मौका बाद में आया था जब उन्होंने यह सोचा कि मैं बजाय बहराइच के लखनऊ शिफ्ट हो जाऊं। बड़ा शहर है दार था यूपी का। लेकिन उनकी वालिदा ने हमारे दादी साहिबा ने उनसे हमारी दादी साहिबा ने उनसे ये कहा कि तुम जाओ बेटा मैं तो यहीं रहूंगी। तो इस वजह से वो नहीं गए। उन्होंने बदल दिया। पूरी जिंदगी बहराइच में ही रहे। वो बहुत कामयाब वकील थे। हम हमें तो हमेशा यही याद है कि वो बार एसोसिएशन के प्रेसिडेंट है। बड़ी इज्जत होती थी उनके वकार लेकिन साथसाथ उनका दीनी रुझान बहुत ज्यादा था शक उन्होंने एक किताब भी लिखी बिल्कुल यानी कि आखिर में जब वो 1975 में हज के लिए तशरीफ ले गए थे। हम तो मसखत होते हुए गए थे। क्योंकि वहां पर मेरे एक बड़े भाई और एक छोटे भाई रहते अच्छा उनके साथ पास एक महीना गुजर के गुजार करके वहीं से फिर बड़े भाई मेरे नासिर साहब उनके साथ चले गए थे और फिर हत हुआ और उसके पांच दिन का और अगले दिन सुबह फजर की नमाज के बाद लेटे और वहीं पे इंतकाल हो गया तो वही मफून है और मेरी वालदा का इंतकाल हो गया था मैं तीन साल का था और ये मेरे वालिद का हुआ तो उसमें मैं 25 साल का था बहा लेकिन ये कि उन 25 सालों में उन्होंने उन्होंने इस कदर उम्दा हम लोग की तरबियत की सबकी तो पांचों वक्त नमाज़ मस्जिद में पढ़ना बा जमात और सुबा कुरान ये वो और अंग्रेजी और हिंदी और उर्दू और साइंस हर चीज के टीचर अलग रख के मैथमेटिक्स के ट्यूटर अलग रख के खुद जो जो पढ़ा सकते थे खुद पढ़ाते थे। होम स्कूलिंग है? हां हां हां होम स्कूलिंग है नहीं नहीं हमारे मॉन्टसरी स्कूल में हमारी प्राइमरी टीचिंग वो भी लर्निंग और उसके बाद फिर गवर्नमेंट इंटर कॉलेज बहराइच में 12 तक लेकिन इन एडिशन टू दैट वो एक्स्ट्रा के दिन आठआ 10 घंटे हम लोग पढ़ाते थे खुद पढ़ाते थे उस और अखबाल के अशार बड़े याद करवाना और या लाइन से खड़े हो के जो है कोरस में पढ़ना और नज़्म अखबाल की और उसके मायने समझाना और समझना और अखबार पे रोज तवज्जो देना और बड़ा टाइम लगाना अखबार पढ़वाना हैंडराइटिंग सही करवाना ये सब वो हमारे साथ और बड़ा एहसान है उसकी वजह से हम लोगों को बड़ा फायदा हुआ हमेशा ही तो उसकी वजह से मैं आपको बताऊं एक फायदा तो मेरा ये हुआ और जून की तालीम थी कि जब मेरी सर्विस में हो गया मैं गवर्नमेंट ऑफ इंडिया में आ गया और उसके बाद चार साल के बाद पहला वो होता है प्रमोट तो मेरा ऑल इंडिया जो वो थी लिस्टिंग यूपीएससी की उसमें 27वा नंबर था उस साल 1977 बैच में लेकिन जब अच्छा मैं अल्लाह से दुआ किया करता था कि सबके साथ मेरा भी इज्जत से प्रमोशन हो जाए तो जब लिस्ट निकली तो 27 के बजाय मेरा नाम नंबर एक पे था तो आई सुपरसीडेड 26 हम तो मैंने फिर मैं गया मिनिस्ट्री और पर्सनल में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया में पूछने के लिए कि ये हुआ कैसे हुआ? तो उन्होंने बताया रूल उस वक्त यही था पता नहीं। रूल ये है कि अगर पिछले 5 सालों में आपके रिपोर्टिंग ऑफिसर और उनके रिपोर्टिंग यानी कि हमारा रिव्यूइंग ऑफिसर ये 5 साल में 10 ऑफिसर हो गए। हम अगर इन सब लोगों ने ये आपको कहा है कि आप आउटस्टैंडिंग ऑफिसर हैं। तो गवर्नमेंट की ये ड्यूटी है कि वो आपको उठा के ऊपर बिठाएंगे। तो वो वो सब कैसे हुआ? क्यों आया? मैंने सोचा कि मैंने क्या ऐसी खास बात की जो दूसरे लोगों ने नहीं की तो अलावा इसके कि काम में अपनी 100 फीसद नहीं बल्कि 102% डडीिकेशन प्लस जो ताल्लुकात इंटर पर्सनल रिलेशंस थे अपने कोग से भी अपने सीनियर से भी अपने जूनियर से भी सबसे वो सब सीखने को मिला था मैं से तो वो उसके अलावा और मैं आपको अ करूं कि दो चीजें उनकी मुझे और भी याद है कि एक तो उन्होंने उन्होंने स्कूल कायम किए। अच्छा पहले से सिलसिला है। जी जी अल्हम्दुलिल्लाह है। और उन्होंने एक एक चैरिटी कायम की थी। उसका नाम तो कुछ नहीं रखा था और अपना ही अकाउंट एक अलग से खोल लिया था। तो इतना ज्यादा लोग उनके उनसे मुतासिर थे और तो वो कहते थे आप मुझे इतने पैसे दे दीजिए। तो उन्होंने कहा वकील साहब क्यों नहीं जितने पैसे कहते थे तो बड़ा मिकुलस उसका हिसाब रखना अपने और अल्लाह के बीच में था वो और जिसकी जरूरत हो उसको चुपचाप खामोशी से किसी दूसरे को पता ही नहीं चले उसकी वो उतनी बुरी मदद कर देना उसकी जैसी जरूरत है ये वो करते थे आजकल ये मिसिंग है जो दे रहा है वो सोशल मीडिया पे दिखा के दे रहा है फोटो के साथ [हंसी] जी तो वो ये दोनों चीजें हमारी घुट्टी में पड़ी हुई है एक तरह से जी तो तो इस तरह से वहां से सिलसिला शुरू हुआ 12्थ वहां से पास किया यूपी बोर्ड से और उसके बाद फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में वहां से बीएससी ऑनर्स फिजिक्स फिर टू पॉलिटिकल साइंस एमए क्योंकि हमें सिविल सर्विज में बैठना था और सिविल सर्विज में सिलेक्शन भी हो गया वहां पर प्रोफेसर हकी साहब हमारे हेड थे हम तो उनसे जब मैंने जाके कहा कि वालिद साहब से डिस्कस करने के बाद तो उनसे जाकर कहा कहा कि भाई मैं तो बीएससी ऑनर्स फिजिक्स कर चुका लेकिन अब मैं चाहता हूं कि पॉलिटिकल साइंस में आ जाऊं। ये डिसीजन आपने बाद में लिया कि सिविल सर्विज में जाना है। आफ्टर पहले फिजिक्स का पहले आपका ये जो मन था वो हो चुका था। या तो फिर जब मैंने प्रोफेसर अकी साहब मरहूम से कहा जाकर के वो हेड द डिपार्टमेंट थे। तो उन्होंने कहा अरे हम पहले ही कहते थे कि तुम लोग पढ़े लिखे लोग कहांवहां साइंस में फंसे हो। [हंसी] अच्छा बहाल वहां मेरा दाखिला हो गया और वो वहां भी आई स्टूड फर्स्ट और उसके बाद फिर वही कंपटीशन में बैठना शुरू कर दिया साथ-साथ यूजीसी की फेलोशिप भी मिल गई थी पीएचडी करने की हां वो भी कंप्लीट कर ली तो उसके बाद सिविल सर्विज में आ गए तो सिविल सर्विज का जब आप सोच रहे थे और क्योंकि आपने बताया कि वालिद साहब की लेगसी है एक अंडरस्टैंडिंग है और मुझे लगता है आप उस वक्त थर्ड जनरेशन फोर्थ जनरेशन लर्नर रहे होंगे जब आपके दादा साहब अगर वकील रहे हैं दादा वकील नहीं वालिद वालिद वकील थे तो एटलीस्ट सेकंड जनरेशन एजुकेशन तो रही होगी और उसमें तो क्या आपको अंदाजा था कि भ पार्टीशन के बाद क्या हुआ या फिर उसकी लेगसी क्या है या फिर मुस्लिम कंडीशन कुछ था उससे पहले आपके ज़हन में कुछ इस तरह की इंटरेक्शंस होते थे या फिर ये आपकी जब एजुकेशन एएमयू में आना वहां पे चीजें शेप हुई। नहीं नहीं ऐसा है कि वो तो वो सब चीज शुरुआत से ही थी। हम कि हमारे वालिद साहब मरहूम जितने अखबार अंग्रेजी के वहां आते थे वो मंगाते थे। जितने उर्दू के आते थे वो मंगाते थे। प्लस ये रेडियंस व्यूज वीकली जमात इस्लामी का वो मंगाते थे। हम और श जदीद मौलाना मौलाना अब्दुल माजिद दरियाबादी उनकी जिन्होंने बाद में तफसीर भी लिखी है जी उनका एक पर्चा निकलता था सिदीद वो भी मंगाते थे और हम लोगों के लिए खिलौना और हमारी आपा के लिए भी 20वीं सदी और ये सब चीजें वो मंगाया करते थे तो हमें ये था कि दुनिया से जुड़े रहना इसका पूरा इंतजाम उन्होंने रखा था और रोज मैंने आपको बताया तो रोज बैठ के अखबार पढ़ाते पढ़वाते थे। उसमें जो मुश्किल अल्फाज़ होते थे डिक्शनरी देके नोट भी करवाते थे और साथ-साथ उसके बाद ब्रेकफास्ट सुबह को या लंच पे डिनर पे भी डिस्कशन होता था। तो क्योंकि आपने रेडियंस की बात करी और मौलाना दरियाबादी की जूस के हवाले से बात की। किसी का आपके ऊपर फिक्री जो इंटेलेक्चुअली जो पुराने जो अह 1947 से पहले बहुत सारे जो मूवमेंट्स हुए जिसमें एक अंडरस्टैंडिंग डेवलप हुई मुस्लिम आइडेंटिटी को लेके किसी खास इंडिविजुअल का या किसी खास मूवमेंट का आपके ऊपर कभी कोई असर रहा। ये तो मैं नहीं कह सकता कि कोई असर उस वक्त का मेरे ऊपर रहा। मेरे ज़हन में तो कुछ ऐसा नहीं आता। लेकिन तुम्हारे वालिद साहब ही बहुत सोशल वर्क से मुसलमानों के लिए जुड़े हुए थे कम्युनिटी के लिए मिल्लत के लिए तो दीनी तालीमी कॉन्फिडेंस थी उसके कायम करने वालों में भी वो लोग थे दीनी तालीम और उससे बहुत ज्यादा वो जुड़े हुए रहते थे और उसके उसके जो वो थे सेशन बहराइच में भी हमारे वतन में भी जाहिर है वही करवाते होंगे होते थे वहां भी हम लोग जाते थे और बातें सुनते थे और उनके उस ताल्लुक से जो साथियों में जो लोग थे वो आकर के हमारे पास गेस्ट हाउस भी था। हमारे वालिद साहब ने गेस्ट हाउस बना रखा था घर ही में। अच्छा ये नहीं बड़ी को तो उसमें वो इसीलिए बनाया था उलमा इकराम को और लीडरों को बुला के वहां ठहराते थे। उनसे गुफ्तगू इंटरेक्शन तो उनहीं लोगों को मैं जानता था और बाकी सुन रखा है जो मेरा पर्सनल तो कुछ याद नहीं है मुझे जमीत उलमा के जो वो थे मौलाना हुसैन अहमद हुसैन अहमद उनसे बड़े थे वो भी तो इस तरह के जनरल सी बातें मुझे याद है तो आप आपकी पीएचडी पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में हुई, एमए पॉलिटिकल साइंस में हुई और फिजिक्स का आपका बैकग्राउंड रहा। जब आप हो गए, ऑफिसर हो गए तो क्या पोजीशन थी आपकी? कहां पे आप लोकेटेड थे? किस तरह के प्रोजेक्ट्स आपने शुरू में किए और कैसे आपकी जो कम्युनिटी से रिलेटेड जो आपका जो एक्सपीरियंस है, ताल्लुक है वो फ्रॉम योर प्रोफेशन वो आपको कहां यू नो इंटैक्ट करने को मौका मिला? मसूरी में जो हमारी पहले ट्रेनिंग मसूरी में होती फाउंडेशनल कोर्ट लाल बहादुर शास्त्री नेशनल स्टेशन वहां पर हम लोग जो मुसलमान प्रोफेशनर्स थे थे उन सब लोगों ने मिलकर के इंतजाम किया था और इट गोस टू द एडमिनिस्ट्रेटर ऑफ द एकेडमी उन लोगों ने उसको किया भी कि रमजान के जमाने में सहरी और इफ्तार अच्छा एकडमी में की तरफ से भी होता था इंतजाम होता था सारा और वहां के लोकल जो कुछ मुसलमान थे उनसे भी मुलाकात थी वगरा तो एक तो ये बात हुई बाद में फिर हम लोग चले गए नागपुर हम नागपुर में नेशनल एकडमी डायरेक्ट टैक्सेस है वहां साल भर की कुछ ट्रेनिंग होती तो वहां पर भी ढूंढा लोगों को तो एक मौलाना अब्दुल करीम पारिक साहब नागपुर के थे उनसे से हम लोग जुड़ गए अच्छा रहा मेरा और एक और साहब थे जो फिलोसफी के प्रोफेसर थे नागपुर यूनिवर्सिटी में वहां से रिटायर्ड थे वो नाम फिरुद्दीनुद्दीन साहब और वो हम लोग जब उनसे मिलने गए तो वो वही तरसद वाली ही कैप लगाए हुए थे पहने हुए हां और वही वही उनकी ड्रेस थी हम लेकिन उनको ये नहीं मालूम था कि हम लोग कुछ अलीगढ़ के हैं। तो लेकिन चायवा जब हो गई उसके बाद फिर बातें करते जब उन्हें ये मालूम हुआ कि हम लोग का ताल्लुक अलीगढ़ से है। फिर खड़े हुए बोले फिर से फिर मौका होना चाहिए। तो बड़ा अच्छा लगा और मौलाना पारिक साहब से जो सुबह मुलाकात हो गई तो वो बाद तक चलती रही। फिर मैं 10 साल तक इस्लामिक सेंटर को बनवा रहा था। उस दौरान जो प्रोग्राम किया हमने उसमें फिर को हर साल ही तकरीबन बुलाते थे सीरत के जलसे को एड्रेस करने ये इस्लामिक इंटरनेशनल जी इस्लामिक कल्चर सेंटर जो है ना उसका आज की तारीख में मैं सीनियर मोस्ट मेंबर हूं अच्छा उसमें अभी तकरीबन 4000 मेंबर्स हैं और मैं मेंबर नंबर चार हूं अच्छा [हंसी] जी और ऊपर के तीन लोग प्यारे हो चुके हैं जी जी तो उस हिसाब से तो चौधरी आर साहब थे उनको जन्नत में जगह दे बहुत काम अच्छा अच्छा करके गया खामोशी से चुपचाप उनके में अल्लाह ने बात डाली थी इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर एक एक्चुअली इस्लाम कल्चरल तो बाद में जोड़ा इंदिरा गांधी इंडिया इस्लामिक सेंटर उनके में और मुझे याद है कि हम लोग जब उसकी सिविल सर्विस की तैयारी के लिए इम्तिहान देने के लिए महादेव रोड पे चौधरी साहब के बंगले में ठहरते थे तो नमाज पढ़ते थे और पार्लियामेंट सीट की मस्जिद में वहां चौधरी साहब जुमे की नमाज के बाद खुद ही अपने हाथ से एक बड़ा सा प्लाई कार्ड बना के और गले में टांग खड़े रहते थे यू उस पे लिखा था मैं दिल्ली में इस्लामिक सेंटर बनाने जा रहा हूं आप लोग मदद करें अच्छा जी वहां से बात शुरू हुई थी उनके ज़हन में ये थी बात फिर वो खुद ही गवर्नमेंट में थे एक्चुअली वो साइंटिस्ट साइंटिफिक ऑफिसर थे आईसीएआर में इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चर लेकिन उन्होंने अपना जो पर्सनल कांटेक्ट थे अपने अपना जो पर्सनल क्लाउड था उसका इस्तेमाल कम्युनिटी डेवलपमेंट के लिए यही यही मैं अर्ज कर रहा था कि हम अच्छे मुसलमान नहीं है वरना बस हम लोग कर सकते हैं और आप सोचिए आउट ऑफ नथिंग ही क्रिएटेड इंडिया इस्लामिक सेंटर पौने दो एकड़ जमीन अलॉट करवा के गवर्नमेंट से जाहिर उसके अंदर बहुत से लोग और जुड़े लेकिन सोच उनहीं की थी तो पर्स्यू किया सामने रखा लोगों को ऑन बोर्ड जाके लोगों से मिले और अलीगढ़ आए उस में अलीगढ़ पोस्टेड था हमारे पास ही ठहरे वहां के लोगों से मिले उन्होंने मेंबर तो शुरू में ही बना दिया था और हमने फंडिंग वंडिंग भी करवाई लेकिन उसके बाद जब 93 में मेरी पोस्टिंग हो गई दिल्ली में तो उन्होंने कहा उसी वक्त नई नई टीम आने वाली थी तो उन्होंने कहा अब आप संभाल ले इसको अब आप दिल्ली आ गए हैं ये तो अगले अगले 10 साल तक मैं फिर मूसा रजा साहब चौधरी साहब हम सब लोगों ने उस वक्त तक खंडर था बिल्कुल हम तो उसमें 10 करोड़ का प्रोजेक्ट था और कुल ₹40 लाख थे बैंक में अच्छा हां तो बाकायदा पूरे पैसे जमा करके और तीन मंजिला इमारत खड़ी करके उसमें लिफ्ट लगवा करके और टाइल्स ईरान से मंगवा करके सारा कर करा के सब हैंड किया तो गवर्नमेंट ने जमीन दी थी लेकिन जो उसको बनाने का खर्चा है वो सब कम्युनिटी से है वो सब कम्युनिटी से सब कम्युनिटी ने हीट किया जगह से उसमें भी मेजर रोल मूसा रजा साहब रहा आपका हज काउंसिल से भी ताल्लुक रहा आपका नॉट हज काउंसिल जी मैं इंडियन एंबेसी में सऊदी अरब में जी उसका वहां पर दो हिस्सों में एम्बेसी रियाद में और एक जद्दा में जद्दा में बड़ा एस्टैब्लिशमेंट है रियाद में छोटा तो जद्दे में मैं फर्स्ट सेक्रेटरी ऑफ द कंसिल हज हम यह था तीन तीन साल की पोस्टिंग थी गवर्नमेंट में। आई वास रिप्रेजेंटिंग इंडिया इन द हज मैनेजमेंट इन सऊदी अरब इन थ्रू द एम्बेसी और मैं वहां डायरेक्टर ऑफ इंडियन इंटरनेशनल इंटरनेशनल क्या एक्सपीरियंस था आपका वो वो पोजीशन को हेड करने में कि एज अ गवर्नमेंट हज को लेके इस चीज को जी जी वो तो बहुत बड़ा मजेदार था टाइम उसमें जब मैं पहुंचा था हम 1988 में हम तो आज अगला हज होने से थोड़े वकि शुरू में तो मैंने कहा कि मैं खुद ही वाकिफ नहीं हूं तो मैं आई मैं खाली सुनता था और देखता था वॉच करता था जहां जितनी जरूरत करते लेकिन ये है कि आहिस्ताआहिस्ता करके समझ में बात आने लगी तो उसमें बहुत से हम लोगों ने रेवोलशनरी चेंजेस हम लोग जब मैं कहता हूं तो हमारी टीम पूरी ऑफकोर्स हमारे जो सुपीरियर ऑफिसर थे वो तलमीज अहमद साहब बाद में वो कई कंट्री जी ईरान के हवाले से तो वो थे और उनके भी जो बॉस थे वो एंबेसडर थे वो इश अजीज साहब थे लेकिन ये काम सलमीस साहब और मैंने मिलकर के किया हम लोग इसमें जो हमने रिवोलशनरी चेंजेस किए एक तो ये था कि शिप चलता था उस वक्त हम और कहा ये जाता था कि शिप चलता है गरीब हाजियों को हज करवाने के लिए अच्छा हम यही कहा जाता था इसलिए चलता लेकिन हमने ये बात प्रूव कर दी कि शिप का गुर्बत से कोई ताल्लुक नहीं क्योंकि जो हाजी शिप में आता है वो ज्यादा पैसे खर्च करता है एस कंपेयर टू एयर अच्छा हां तो वो क्योंकि वो एक शिप था वही जाता था वही आता था वही जाता था वही आता था तो लिहाजा 20 दिन हर हाजी को मिनिमम 20 दिन एक्स्ट्रा ठहरना है किंगडम में आफ्टर हज एस एज कंपेयर टू एयर फील्ड भी हम कंपलसरीली ठहरना है। अब उस 20 दिन में वो खाना भी खाएगा रहने का इंतजाम भी करेगा अपने कंपलसरी क्यों ठहरना है इसी वजह से क्योंकि फ्लाइट तो फौरन शुरू हो जाती है। हम फ्लाइट कई कई दिन भर में जगहजगह ना शिप एक ही है। शिप एक ही है और वो फिर 20 दिन के बाद जाएगा आना और जाना मिला तो हमने सब किया और उसमें काफी मुखालिफत हुई क्योंकि उसमें बड़े वेस्टेड इंटरेस्ट थे बॉम्बे में उसमें जो कुली लोग थे वो कहलाते तो कुली थे लेकिन ये कि दे वर ऑल ट्रेडर्स हम तो वो अपना कंसाइनमेंट जाता था हाजी के नाम में वहां भेजते थे वहां से आता था कंसाइनमेंट यहां भेजते और भी उसमें थोड़ी बातें थी ठीक नहीं थी लेकिन ये हाजी के लिए मफाद में तो नहीं था तो वो फिर सब करके हज शिप बंद करवा दिया अच्छा शिप बंद करवा दिया और हज को फैसिलिटेट करवा दियाकि कई एडिशनल पिकअप पॉइंट्स एयर के क्रिएट हो गए साथ के साथ तो लिहाजा ये अच्छा यहां भी यहां भी जिसको हज शिप से जाना है उसे बॉम्बे तो जाना ही है और तो कम से कम तीन दिन पहले जाके ठहरना है वहां उसके साथ जो जाएंगे उनको भी ठहरना है वहां तीन दिन तो वो सब खर्चे भी हो रहे हैं वो सब जोड़ लिए तो एनीवे तो वो उसके बाद से काफी सहूलियत दूसरी चीज ये कि वहां जो मुल्लिम हजरात थे वो एक तरह से काफी एक्सप्लइट करते थे हाजियों को क्योंकि हमारी तरफ से गवर्नमेंट ऑफ इंडिया की तरफ से कोई इंतजाम नहीं था उस वक्त का हम वो जहां वो ठहरा दिए वहां ठहर जाते थे हम तो अच्छा वो पैसे पूरे लेते थे लेकिन ये कि उतनी क्वालिटेटिवली और पूरी इतनी जगह नहीं देते थे बल्कि ये भी सुनने में आता था कि हाजियों को चौथे में से उठा के हराम भेज दिया जाता है कि उठो यहां फला सो दूसरा सोएगा अच्छा वो पूरा इतना टाइट है हां इतना टाइट तो फिर हमने वहां पर बाकायदा कायम की वहां सऊदी अरब [गला साफ़ करने की आवाज़] हज मिनिस्ट्री से बातचीत कर कर आ कर के तो वहां मुअस कहलाता है हज का जो जो लोकल ऑफिस था मक्के में मुससा साउथ एशियन मुससा उससे बातचीत होती करके उसमें हमने वहां प्री अरेंज अकोमोडेशन स्कीम बाकायदा बना दी हम और हज कमेटी ऑफ इंडिया को उससे जोड़ दिया हम और अब ये हो गया कि जो भी हाजी आएगा वो पहले से उससे पैसे ले लिए जाएंगे हज कमेट के जरिए वो पैसे यक मुस्त एंबेसी में जाएंगे और एंबेसी से तीन चार उसमें किस्तों में जो है वो जो जिस एजेंसी कंसर्न है उसको पेमेंट हो जाएगा। हम लिहाजा यह कि वह कोई पैसे का खेल नहीं है। लेकिन वह तय हो गया कि कम से कम 2 मीटर बाय 1 मीटर की जगह हर एक पिलगिरी को मिलनी ही मिलनी है जो कि एयर कंडीशन भी होनी और बाथरूम अटैच होना वगैरह वगैरह तो उसकी वजह से जाहिर है पहले के मुकाबले मेंशन खत्म हो गया और तजुर्बा भी हुआ जाहिर वो तो हमेशा एक कंटीन्यूअस प्रोसेस है। तीसरा जो हमने वहां अलम्दुलिल्लाह बड़ा काम किया वो ये था कि जो पिगिम आते थे उनसे सऊदी मिनिस्ट्री जो थी वो कंपलसरी ड्यूस लेती थी तभी भी लेती होगी उसके लिए वो कहते थे कि हर पिल्गिम अपना ड्राफ्ट बनवा के लाए बैंक ड्राफ्ट इन टर्म्स ऑफ सऊदी अरे हम तो वो बनवा के ले जाते थे लोग लेकिन आपको अंदाजा होगा कि इंडिया के जो हाजी होते हैं इसमें ज्यादातर जो बहुत जफ होते हैं और बड़ी तादाद में जो है गांव वगैरह आते हैं और बहुतों के लिए पहली पहला सफर होता है। तो उस उसमें वो फिर अक्सर जो है वो लोगों का ड्राफ्ट खो जाता था। सफर में ही खो गया। इधर उधर हो गया मिल नहीं रहा है या कहीं गिर गया। तो उसकी वजह से पूरी फ्लाइट वहां रुकी रहती थी एयरपोर्ट के ऊपर। जब तक वो रिकंसाइल हो के पैसे नहीं मिल जाएंगे। हालांकि इंडियन एम्बेसी के लोग वहां रहते थे। लेकिन ये कि तो हमने ये कर दिया हज मिनिस्ट्री से बाकायदा वहां लोकल हज मिनिस्ट्री जो सऊदी की थी उनसे बात करके उनसे एग्रीमेंट करके कि हर हाजी आपको पैसे नहीं देगा सारे हाजियों के पैसे हज कमेट ले लेगी वो कंसुलेट में जमा कर देगी और कंसुलेट से जो है सेंट्रलाइज मैकेनिज्म सेंट्रलाइज मैकेनिज्म हो गया हर हाजी के कम से कम दो-ती घंटे ऑन द एवरेज एयरपोर्ट पे एक्स्ट्रा ठहरने के बच गए उसकी वजह से हरासमेंट बच गया वगैरह वगैरह इस तरह के जो है वो इंप्रूवमेंट्स करने की कोशिश की और डायरेक्टर ऑफ स्कूल के ऐसे से तो पांच नए शहरों में इंडियन एम्बेसी स्कूल कायम किए उस जमाने में और सबसे बड़ा स्कूल यदा का था उस वक्त लेकिन वो बहुत कम पढ़ता था 1964 में बिल्डिंग बनी थी 1600 बच्चों के लिए लेकिन जब मैं वहां पहुंचा हूं 1988 में तो उस वक्त 5000 बच्चे पढ़ते थे उसी स्कूल में जिस जो 1600 बच्चों के लिए बनी थी तो उसमें मॉर्निंग इवनिंग शिफ्ट कर दी गई थी लड़कों और लड़कियों की अलग-अलग लेकिन ये कि वो भी कंप्लीट इनसफिशिएंट और किराए की बिल्डिंग ली गई थी वो भी इनसफिशिएंट बल ये कि और वहां सऊदी गवर्नमेंट की तरफ से इजाजत नहीं थी नया स्कूल बनाने के लिए किसी भी एंबेसी को या फॉरेन कंट्री को तो वो उससे निपट करके सम हाउ द अदर तरकीबे लगा करके सऊदी नेशनल को इजाजत थी तो वो सब करके और फिर एग्रीमेंट करके उसके एग्रीमेंट की एक कॉपी रियाद में एंबेसी में भेज के और एक कॉपी वहां इंडियन यहां मिनिस्ट्री ऑफ ईस्टर्न अफेयर्स में दिल्ली में पहुंचा के पूरे अप्रूवल के साथ वो हो गया था। अब वहां बाद में 10,000 बच्चों का नया स्कूल बन गया। आप ऑलरेडी ऑफिस बियरर थे जब आपने जकात फाउंडेशन शुरू किया यू वर पार्ट ऑफ द सर्विसेस ना हां हां तो उस वो जो और क्या गैप्स है आपको इन द सर्विस जो रियलाइज हुए जो कम्युनिटी इशूज़ हैं और जिसकी वजह से आपको ये लगा के कम्युनिटी को बहुत सारी चीजें अपने आप करनी होंगी और वो गैप्स फिल करने होंगे सिस्टम में क्या आपको चैलेंजेस लगे ये आई एम ट्राइंग टू सेट द ग्राउंड बिफोर सच्चर के क्या-क्या चीजें हैं जो आपके सामने आई जो आपको लगा कि सच्चर तो लोग ऐसे देखते हैं ना लेकिन वो कलमिनेशन है। उससे पहले जो लोग हाई रेोल्यूशन में जो चीजों को देख रहे हैं वो ये पहले से जान रहे हैं ये चैलेंज है ये चैलेंज है ये चैलेंज है और उसकी वजह से एक रिक्वायरमेंट प्रोड्यूस हो रही है कि भ गवर्नमेंट को कि एक रिपोर्ट लानी चाहिए ये सारी चीजें हैं। तो क्या है वह जो पोस्ट 2007 का जो दौर है जिसमें फ्रॉम अ पर्सपेक्टिव ऑफ एन इनफॉर्म्ड इंडियन मुस्लिम हुस एन ऑफिसर और जिसकी एक रिलीजियस जिसे कहते हैं घराने में ट्रेनिंग है पैदाइश है क्या देख रहा है वो ऐसी चीजें जिससे वो परेशान हो रहे हैं पहली चीज तो आप ये कि मैं सिविल सर्विस में इस वजह से बैठा क्योंकि मैं अभी आप नाम लिया ना चौधरी आरिफ साहब का जी चौधरी आर साहब ने एक और काम किया। जी उन्होंने दिल्ली में कई मुसलमानों को जमा किया वेल प्लेस्ड गवर्नमेंट ने और दूसरी जगह रिटायर्ड और एक डेलीगेशन बना करके वहां वाइस चांसलर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर से बात करके कि हमें आपके यहां जो बच्चे टॉपर्स हैं डिफरेंट डिपार्टमेंट में पोस्ट ग्रेजुएट सेक्शन में हम तो टॉप थ्री हम उनसे बातचीत करनी है हम तो वो आए चार पांच घंटे के लिए सब लोग वहां वहां कनेडी हाउस बाकायदा मीटिंग रखी गई हम लोग कोई 50 60 लोग जमा हो गए थे 4050 तो उनको उन्होंने समझाया अच्छा उस वक्त तक कोई रुझान नहीं था वहां अलीगढ़ में सिविल सर्विस का कोई नाम ही नहीं लेते हम तो हमें भी कुछ ज्यादा वो नहीं था तो उन्होंने सब समझायाझाया बहाल उसका नतीजा ये हुआ कि हम एक मूवमेंट शुरू हो गया और वहां पर सेंटर भी कायम हो गया तभी से और उसमें फिर बैठना शुरू किया तो वो चीज मेरे ज़हन में थी और कामयाबी हुई बहुत से लोग सिलेक्ट हो गए हम तो उसको फिर हमने बाद में इंडिविजुअली मैंने खुद उसको चलाया हम जहां भी मेरी पोस्टिंग होती थी वहां से छुट्टी लेके और वरना इतवार शनि चरितवार जोड़ के और मैं अलीगढ़ यूनिवर्सिटी जाया करता था जामिया मिल जाए आया करता था और वहां आकर हॉस्टल में बच्चों से बात करना और उनसे उनको समझाना बुझाना और उनको तैयार करना कि तुम एकदम से करियर काउंसलिंग ये काम मैं तभी से कर रहा था उसके उस दौरान मेरी पोस्टिंग जब एक बार नागपुर हुई तो नागपुर में नागपुर पहले ट्रेनिंग में गया था फिर मेरी पोस्टिंग भी हो गई एस जॉइंट कमिश्नर तो उस दौरान मुझे मालूम हुआ कि वहां बहुत बड़ा मोहल्ला था मोमिनपुरा हज लेकिन आजादी के बाद से वो उस साल तक मेरे ख्याल में 19 93 था तब तक आजादी के बाद से वहां कोई मुसलमान किसी कमशन में बैठा ही नहीं था। अच्छा हां नागपुर से तो फिर वहां भी यही किया लोगों को जमा करके और एक मूवमेंट शुरू करवाया वहां अंजुमन स्कूल का कमरा लिया किताबों का इंतजाम किया बच्चों के घरघर जाते थे हम लोग मगरिब के बाद जाकर बच्चों को और सिलेक्टेड बच्चों को और बच्चियों को और उनके वालदैन को कन्वस करना तो बस मैं वहां वही साल था लेकिन दो साल मैं जब आने लगा था उसके पहले ही एक बच्ची का सिलेक्शन सिविल सर्विज में और एक लड़की के सिलेक्शन महाराष्ट्र सर्विस में सिलेक्शन हो गया तो वहां चल पड़ा था ये तो इस तरह से हमने ये तो कोशिश की कि जो कुछ हमने सीखा है दूसरों से वो हमको आगे तक पहुंचा वो सिलसिला बाद में तो चल ही रहा है आप देख ही रहे हमने वो इस तरह से ये कोचिंग गाइडेंस सेंटर फॉर कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन बना दिया आफ्टर जी और दूसरी चीज जो आपने मुझसे अभी पूछी थी इसके साथ वो ये देखिए ऐसा है कि मेरी पोस्टिंग मैंने आप सभी बताया हज संभालने के लिए हो गई। वहां बहुत इंप्रूवमेंट का मौका मिला। उसके बाद फिर मेरी पोस्टिंग एक हो गई थी 1999 में एडिशनल पोस्टिंग थी। मैं यहां एडिशनल कमिश्नर था दिल्ली में। एडिशनल चार्ज मुझे दिया था गवर्नमेंट ने एस एडमिनिस्ट्रेटर ऑफ द कंबाइंड व बोर्ड ऑफ पंजाब, हरियाणा, हिमाचल एंड चंडीगढ़। हम तो फिर मुझे मौका मिला करीब से देखने का। अच्छा 500 मस्जिदें थी जिनको वोट संभालता था और भी बहुत से काम थे तो लेकिन ये तो एक तरफ से आप देख तो जो इस्लाम के बुनियादी सुतून है उसमें से हज का मैनेजमेंट मैंने देख लिया और मसाजिद का मैनेजमेंट मैंने देख लिया अंदाजा ये हुआ कि हज का बहुत अच्छा इंतजाम है इंप्रूवमेंट तो हमेशा होना चाहिए लेकिन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया के तमाम महकमे लगे हुए हैं। वहां एम्बेसी लगी हुई है। भाई कंसलेट लगा हुआ है और इंतजाम हो रहा है एक मुनम उसी तरह से अगर आप नमाज को देखें दूसरा सुतून जो है उसकी लाखों मस्जिद हैं इंडिया में और वो हर मस्जिद में पूरा अमला है यानी कि इमाम और मुजिन के अलावा पूरी कमेट है होती है हर जगह उसमें मुतव्ली होते हैं सेक्रेटरी है वगैरह वगैरह तो एक निजाम वहां भी मौजूद है जी तो लेकिन मैंने यह सोचा कि जेहन में अल्लाह डाला कि जकात मेरे नजदीक इन पांचो में सबसे अहम सुतून है। क्यों? बाकी इबादत जो है ना वो अल्लाह और बंदे के बीच में इंडिविजुअल है। जी हां। लेकिन जो जकात है ना वो अल्लाह और बंदा उसके अलावा एक तीसरा है जो बेनिफिशरी है उसका इमीडिएट बेनिफिशरी तो इस वजह से इस ताल्लुक से देखा जाए तो बड़ा यूनिक खातून है और लेकिन उसका कुछ निजाम नहीं जबकि उसका निजाम होना शरीयत में मैंडेटेड है जेनेसिस में ही मैंडेटेड है हम हुजूर ससल्लम तशरीफ ले गए थे एक गज़वे में तो उन्होंने उन्होंने जिन लोगों को कहा था कि हमारे साथ चलो उसमें से तीन लोग रुक गए वो पैसे वाले थे सब बहुत से पैसे वाले हजरत अबू बकर पैसे वाले थे तो लेकिन ब समऊ वो रुक गए लेकिन बाद में उन्हें एहसास हुआ जब सब डेलीगेशन वहां चला गया वो सब लोग ग्रुप चला गया तब उन्हें एहसास उन्होंने अपने को खंबे में बांध लिया हम और कहा कि हम कुछ खाए पिएंगे नहीं और कुछ अपने को फ्री नहीं करने देंगे जब तक हुजूर वापस आ के हमें माफ नहीं कर देते और कोई तो उधर तशरीफ लाए और उनको बताया गया तो उन्होंने माफ कर दिया उन्हें खोल दिया तो क्योंकि पैसे वाले मनी लोग थे उन्होंने कुछ तबकात दिए को पेश किए तो उस वक्त कोई आयत नहीं उतरी कि करना क्या है इसका तो हुज़ूर के ज़हन में आया कि करें क्या इसका तो आयत उतरी तो पहली आयत थी जकात जकात उसमें ये था ये नहीं था अल्लाह ने ये हुक्म नहीं दिया कि उन तीनों से तुम कह दो कि वो फला फला मद में खर्च करे ये भी कह सकता था अल्लाह मगर ये नहीं कहा उनसे ले लो उनसे ले लो और इस इस तरह से उसमें इस्तेमाल करो तो क्या था तजीम पहले से ही जेनेसिस में ही कायम है तो सिस्टाइजेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑर्गेनाइज कलेक्शन एंड यूटिलाइजेशन ऑफ़ ये इनकंबेंट है वो बाद में किस तरह से वो इंडिविजुअलाइज हो गया हालांकि अब तो इस्लामी मुालिक में सभी जगह सिस्टमेटाइज है और बाकी गैर मुस्लिम सोसाइटी में भी बहुत सी तजीमे है जो कि बनी हुई है वगह तो मेरे ज़हन मेंकि ये बात आई थी तो मैंने फिर दिल्ली जब पोस्टिंग हो गई तो यहां मैं अपने दफ्तर में बैठा था एक दिन तो एक पर्ची आई असरार अहमद हम फिर मैंने बुला लिया उनको तो उन्होंने मुझसे कहा कि मेरा फला काम है और वो आपके महकमे में और रुका हुआ है तो मैंने खैर देखा भाला कि भाई क्यों रुका मल वहां तो हो जाना चाहिए था काम तो कानून के हिसाब थे। फिर मैंने उसी वक्त फोन पर करा कर उनका काम हो गया। तो लेकिन फिर मैंने उनसे ये कहा पहली बात तो ऐसा कोई दिल्ली का मुसलमान मुझसे मिलने आया था मेरी पोस्टिंग के बाद। तो मैंने उनसे कहा कि देखिए ऐसा है कि मैं चाहता हूं कि जकात को इ्तमाइयत के जरिए जो है मुनजम किया जाए। हम तो उन्होंने कहा हां बिलकुल बड़ा अच्छा है आप करिए हम आपके साथ है ही वास द फर्स्ट वाइस प्रेसिडेंट ऑफ अल्लाह यहां उनको रहमत करे कहने तो इस तरह से जकात फाउंडेशन कायम हुई और उसके बाद लोग जुड़ते गए उसका मोटो है कुरान की आयत है गड हेल्प्स दोस हु हेल्प तो वो अलम्दुलिल्लाह मुस्तकिल होता जा रहा है और तो ये जो क्योंकि रकात में जो असनाफ का एक पूरा आठ कैटेगरीज है या वो भी एक तरीके से एक पूरा निजाम का हिस्सा है कि आप किस तरह से उसको खर्च कर सकते हैं क्या तो उसके लेवल पे क्या जब आपने शुरू किया उससे और लोगों ने जो ज़कात को ऑर्गेनाइज कर रहे हैं और जो इंस्टीटश है कुछ आपने फर्क देखा या फिर एक इंस्टिट्यूशन है जो एक लिमिटेड लेवल पे ऑर्गेनाइज कर पा रहा है लेकिन एज अ होल अभी भी ज़कात को जिसे कहते हैं कि नॉट एज एन एमावरमेंट एमावरिंग इंस्ट्रूमेंट देखा जाता है। हां वो तो वो तो है देखिए ऐसा हिंदुस्तान इतना बड़ा मुल्क है कि हुकूमत एक जगह से नहीं चल सकती है ना तो हुकूमत के लिए भी एक इतने ही सूबे हैं और वो है यूनियन टेरिटरीज है और इतने जिले 800 से ज्यादा जिले हैं हर हर एक के अलग-अलग निजाम है तो उसी वजह से इसका भी निजाम जकात का यूनिफाइड नहीं हो सकता इतना बड़ा कॉन्टिनेंटल प्रोपोशन का मुल्क है हमारा तो इस वजह से उसमें जितने ज्यादा तजीमे जुड़ग उतना अच्छा है। और जाहिर है हर तजीम एक ही तरह से काम करे ये भी ठीक नहीं है। तो लेकिन ये कि जाहिर है जो शरीयत के जो बुनियादी उसूल हैं उनको तो ज़हन में रख के उनकी पासदारी करते हुए चलना है। इस पे मैं फिर से आऊंगा इस सवाल पे फ्रॉम अ डिफरेंट पर्सेक्टिव के हम इनको स्यूशन ओरिएंटेड कैसे इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन उससे पहले वो जो सामने प्रॉब्लम है के जिसकी वजह से सच कमेटी रिपोर्ट आई और उसमें क्या चीजें फाइंडिंग्स थी। आप उस दौर को किस तरह देखते हैं कि जो उसके बाद डिबेट्स हुई उस वक्त डिबेट्स हुई क्या चैलेंज था मुसलमानों के सामने या क्या चैलेंज है जो अब कंटिन्यू रहा 2007 में मैं अभी 2014 की बात नहीं कर रहा हूं। 2014 के बाद हम फिर से उसको एक रीडिंग करने की कोशिश करेंगे कि भ व्हाट चेंज्ड। बट इन 2007 या बिफोर 2007 और बिटवीन 2004 क्या चैलेंज था जो मुसलमान ने आइडेंटिफाई किया उसको किस तरह से आपने देखा क्या मोबिलिटी पैदा हुई उसके आने की वजह से किस तरह के लोग जुड़े क्या वो सीरियस इनफ हुए लोग मैं सबकी नहीं एक्सेप्शनंस तो हर जगह होते हैं लेकिन एज अ होल कि जब आप देखा जाए कि इस वक्त जब मुसलमान अपने एक्सट्रीम सिक्योरिटी क्राइसिस से गुजर रहा है उसके बावजूद भी मुझे चारप साल हो गए हैं बट इंडिविजुअल्स तो मुझे बहुत सारे देखते हैं लेकिन ओवरऑल मुझे अभी भी नहीं लगता कि शायद लोग उतने ज्यादा सीरियस हैं एक साथ काम करने के लिए। अभी भी वो जो डिफरेंसेस है वो गालिब है। ये लगता है मुझे मैं गलत हो सकता हूं इसमें। जी हां जी हां जी नहीं आप बिल्कुल सही फरमा रहे हैं कि पहली चीज तो ये है कि सिस्टर कमेट बनी क्यों? हम बाय द वे उसका ऑफिशियल लेंथ है प्राइम मिनिस्टर हाई लेवल कमिट टू राइट अ रिपोर्ट ऑन सोशल इकोनमिक एंड एजुकेशन स्टेटस ऑफ़ मुस्लिम कम्युनिटी ऑफ़ इंडिया लेकिन जाहिर है इतना बड़ा लंबा नाम कैसे लिया जाएगा तो मीडिया ने बाद में उसका नाम सच्चा चर्चा किया ठीक रखा तो वो बनी इस वजह से कि गवर्नमेंट को उस वक्त ये एहसास हुआ हम कि भाई वो तो जीत के मुसलमानों की ही वजह से आए थे हम लेकिन लेकिन ये कि मुसलमानों की पोजीशन तो ठीक है नहीं। उनकी हेल्प होनी चाहिए। उनके लिए कुछ स्पेशल होना चाहिए। जो कि कॉन्स्टिट्यूशन है मैंडेटेड है। उनके ज़हन में क्यों आया ये उस टाइम पे इस वजह से आया किकिकि उसी वक्त ज्यादाज़ा रिजल्ट निकला था। हम और रिजल्ट में वो तमाम एक्सपेक्टेशंस के खिलाफ वो जीत गए थे। हम हम जो मैं उस वक्त बैठा हुआ था न्यूयॉर्क में इंडियन काउंसिल जनरल के पास। हम और हम लोग डिस्कशन कर रहे थे और रिजल्ट आने वाले थे दोपहर तक सुबह की बात है ये तो उस वक्त ये बात चल रही थी सब लोग इससे मुत्तफिक थे मैं भी था मुत्तफिक कि वो बीजेपी ही दोबारा आएगी और लेकिन ये हो सकता है कि मदद लेनी पड़े कुछ पार्टियों से लेकिन जब रिजल्ट निकले तो पूरा उल्टा था रिजल्ट तो वो गवर्नमेंट ने रियलाइज किया नई गवर्नमेंट ने कि हम क्योंकि मुसलमानों की वजह से जीत के आए हैं। इस वजह से हमें कुछ जेन्युइन काम करना चाहिए और क्योंकि मनमोहन सिंह साहब थे तो वो जेन्युइन आदमी भी थे। तो वो इस वजह से उनके ज़हन में आया। तो इस वजह से वो ये हुआ कि पहले स्टडी कर लो एक बेसिक बेस बनवा बना लो उसके बाद कुछ करने की जरूरत है। उससे पहले क्या डिस्कशन था लोगों के सामने कि भ ये चैलेंजेस है क्या? इंडिविजुअल लेवल पे एकेडमिक लेवल पे चीज़ नहीं उसमें कोई ऐसा यूनिफाइड कोई वो नहीं था ना कोई एहसास था ना एक जनरल सी बात लेकिन आई एम श्योर कुछ लोग जाके जरूर उनसे मिले होंगे वो तो मुझे मालूमात नहीं है कि कौन लोग जाके उनसे मिले और कहा कि ये बनाइए कमेट मैं तो उस वक्त आगरा में कमिश्नर पोस्टेड था तो मुझे तो बुला लिया गया था कि भाई इसमें ओएसटी कैसे काम करना है उसके बाद फिर ओनली आई केम टू नो कि ये काम होने वाला नहीं है तो उसके पहले ऐसा कोई मुल्क के अंदर कुछ नहीं था लेकिन ये कि एक अच्छा खुशी खुशी का माहौल था कि भाई ठीक है हम हमारी पसंद से हमारी हमारी मदद से मदद से गवर्नमेंट बनी है तो फिर कुछ ना कुछ तो अच्छा करना चाहिए उनको लेकिन अगर आप और करें तो पूरे जो मैंने अभी आपसे अ कर रहा था शुरुआत में पूरा 1947 से लेकर के तब तक जो है वो कोई ऐसा सिस्टमैटिक बाकायदा स्टडी करके मुसलमानों के लिए कुछ काम करना और उनका हक उन्हें देना हम इसके ऊपर कोई काम नहीं हुआ। हम इंडिविजुअल इंडिविजुअल के जरिए कुछ अपना थोड़ा थोड़ा थोड़ा सिस्टमेटिकली ना गवर्नमेंट ने किया ना कम्युनिटी खुद किया अपने लिए कुछ तजीमे जरूर है जमीत उलमा जमात इस्लामी वगैरह ये सब तंजीमे हैं उन्होंने कुछ कुछ काम किया लेकिन बाकायदा प्रॉब्लम्स को स्टडी करके और प्रॉब्लम्स को डायग्नोस करके और उनको सोच समझ करके उनका सशन निकालना होलिस्टिकली नहीं हां मसला यही आप देखिए कि सिविल सर्विसेस में या किसी भी कॉमटीशन में बैठने का या बच्चों को बिाने का कोई निजाम 1947 के बाद कई दहाइयों तक था ही नहीं। हम थोड़ा थोड़ा सा जब ये 1991 में आकर वो भी चार दहाइयां पूरी हो गई। हम 1991 में आकर के तब वो हमदर्द में स्टडी सर्किल बना था। हम उससे कुछ काम अच्छा शुरू हुआ था और उसके बाद फिर जब से कमेट आ गई और वह रिपोर्ट आ गई और ये हो गया कि मुसलमान सबसे पीछे हैं हर मैदान में और उसकी वजह ये है किकिकि गवर्नमेंट में रिप्रेजेंटेशन उनका कम है। रप्चर हुआ तो उसके बाद फिर ज़हनों में आने की बात शुरू हुई। तभी हमने भी जकात फाउंडेशन तो 97 से चल रही थी। लेकिन उसमें फिर हमने सैयद कोचिंग गाइडेंस सेंटर फॉर कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन फाइन किया और कामयाबी अल्लाह का शुक्र फिर और लोगों ने काम किया उसके ऊपर फिर उसके बाद कुछ दिनों के बाद जामिया मिलिया ने भी काम शुरू कर दिया फिर कुछ दिनों बाद हज कमेट ऑफ इंडिया ने ये काम शुरू किया धीरेधीरे लोगों ने पिक अप किया जाना अलीगढ़ में मैं उसका एग्जीक्यूटिव काउंसिल का और कोर्ट का मेंबर था वहां ये बात मैंने उठाई इसी में कि भाई जो यहां पर अलीगढ़ में सेंटर है बहुत पुराना सेंटर था लेकिन अपनी कामयाबियां बहुत कम होती हम तो फिर मुझसे बादशाह सर ने ही कहा जनरल जमीरुद्दीन शाह साहब से बादशाह कि आप ही करिए इसको संभालिए देखिए क्या करना है स्टडी किया कुछ थोड़ा उनको बताया कि यहां यहां ये इंप्रूवमेंट हो सकते हैं इस बीच में उनका टेन्योवर भी खत्म हो गया था बहरहाल तो ऑनगोइंग प्रोसेस है आपका सर्च कमेट का जो पूरा फॉरेशन है या बाद में जो रनिंग है आपका क्या उसमें रोल रहा क्या आपने वहां पर एक्सपीरियंस किया एज अ प्रोसेस किस तरह से चीजें हो रही थी, क्या चीजें हुई? क्या चीजें आपको लगा कि जो सामने आई जो ज्यादा इंपॉर्टेंट है फॉर एग्जांपल कई बार मिस हो जाती है लोग। जी हर कोई उससे एक डिफरेंट वो लेता है। कुछ चीजें होती है जिसको जो जिस हर इंसान का अपना एक गेज होता है, पर्सपेक्टिव होता है। आपको क्या लगता है कि सबसे इंपॉर्टेंट जो प्रॉब्लम्स थी वो आपके हिसाब से कम्युनिटी एज अ होल। देखिए प्रॉब्लम्स तो सारी हैं। एजुकेशन भी, हेल्थ भी होगी। लेकिन एक हायरार्की होती है कि जिसके पर्सपेक्टिव से इंसान उसको गेज करता है। तो आपकी क्या अंडरस्टैंडिंग है? उसमें आपका क्या रोल रहा वहां पे? आपने क्या महसूस किया? क्योंकि इतने सारे लोग जब एक साथ काम कर रहे थे और ऑफ कोर्स ऐसा रहा होगा कि बहुत ही डवर्स और डिफरेंट पॉइंट ऑफ व्यूज के भी लोग होंगे या तो व्हाट वास योर एक्सपीरियंस? नहीं ऐसा कोई डवर्जेंस ओपिनियन तो खास था नहीं। सब लोग बड़े पॉजिटिव और जस्टिस साहब खुद ही बड़े पॉजिटिव वो बड़े खुले दिल के आदमी तो अपनीप बात कह देना लेकिन ये कि कन्वर्जेंस ऑफ़ ओपिनियन में कभी कोई प्रॉब्लम नहीं वो मीटिंग होती थी वहां और उसके अलावा ये कि ये अबू साल शरीफ साहब माशा्लाह थे अभी तक वो लगे हुए हैं काम में और राकेश वसंत साहब जो थे वो उसके थे आईआईएम अहमदाबाद के और बड़े पॉजिटिव और खुले दिमाग के बाकी बाकी मेंबर जो है वो और चेयरमैन साहब अब गुजर चुके हैं लेकिन ये कि जैसे सैयद आमिर साहब मरहूम वो सबसे सीनियर मेंबर थे वो जब आते थे मीटिंग के लिए तो पहले मेरे कमरे में आते आके वहां बैठते थे और फिर थोड़ा ब्रीफिंग पहले से ही ले लेते थे और मैं भी चाहता था कि वो यहां उधर बैठे तो मैं उनको अपनी बातें तो बता दूं हम अक्सर ऐसा होता था कि मैंने नोट बनाया कोई कि भाई यह काम ऐसे होना चाहिए और सैयद हामिद साहब को पेश किया और सैयद साहब ने पढ़ा ही वास ऑलवेज कन्विंस्ड उन्होंने उसको साइन कर दिया उन्होंने साइन कर दिया फिर जब जस्टिस सच साहब के सामने मैं रख देता था तो कर देते थे वो इसी तरह से जो बातें हुई उसमें से एक ये भी था कि जो ओरिजिनल मैंडेट था उसके अंदर व कुछ नहीं था कहीं भी हम वफ का कोई नाम ही नहीं लेकिन मैंने नोट बना के पेश किया सैयद आमि साहब को सैयद आमि साहब ने साइन किया और उसके बाद फिर जस्टिस अच्छा साहब ने भी उसको अप्रूव कर दिया कि व का भी एक चैप्टर होना चाहिए तो उस तरह से व इंक्लूड हुआ क्योंकि आपका अपना एक्सपीरियंस व के साथ रहा आपने उसको देखा जी तो क्या आपने वक्त के हवाले से जो आपके आप बहुत पहले से चीजें बोलते आए हैं कि मिसमनेजमेंट है इंटरनली जो भी बोर्ड की चीजें हैं हालांकि अब तो बिल उसको बहुत सारी चीजों को वेपनाइज करता है। लेकिन खुद आपका क्या एनालिसिस था कि इतनी बड़ी जो हमारे पास कलेक्टिव प्रॉपर्टी रही वो अब तो एकिस्टेंशियल चैलेंज है उसका। लेकिन फिर भी उसका क्या पोटेंशियल आपको दिखता था आपको क्यों लगा कि जी क्योंकि मैं वो पंजाब हरियाणा हिमाचल चंडीगढ़ का एडमिनिस्ट्रेटर था वहां का तो [गला साफ़ करने की आवाज़] कुछ बहुत करीब से देखने का मौका मिल गया था मुझको वहां पर 33 थाउज प्रॉपर्टीज थी हम इन चार स्टेट्स के थे जिसमें से आधे से ज्यादा लिटिगेशन में थी हम इवन उसकी एक्सिस्टेंस उसका वजूद एज व मोर देन 50% जी मोर दे उसके ऊपर 300 वकील लगे हुए थे जो मुकदमे करते थे हमारे जो व बोर्ड को रिप्रेजेंट करते थे जाहिर है उसके ऊपर खर्चा भी होता था जो तो ये जो लिटिगेशन है वो विदिन कम्युनिटी है या ज्यादातर या फिर बिटवीन कम्युनिटी ज्यादातर वहां तो ज्यादातर बिटवीन कम्युनिटी इसलिए वहां तो कम्युनिटी है ही नहीं ना उतनी ज्यादा नहीं जी वो तो क्योंकि पंजाब का तो पूरा पंजाब सब लोग चले गए पाकिस्तान तो वहां पर तो वो यही एनिमी प्रॉपर्टी और बट ड मैटर इस वजह से कि पूरे मुल्क में तो विद इन द कम्युनिटी ज्यादा है। पूरे मुल्क में विद इन द कम्युनिटी एनीवे तो दूसरी चीज जो मैंने वहां गौर की वो ये था कि जो औकफ थे उनके लिए डॉक्यूमेंटेशन प्रॉपर नहीं था। हम नहीं डॉक्यूमेंटेशन तो था लेकिन उसका डिजिटाइजेशन नहीं था। हम तो वो मैंने वहां करवाना शुरू कर दिया। डिजिटाइजेशन और द ओरिजिनल डॉक्यूमेंटेशन। हम वो तीसरी चीज यह थी कि वहां कोई सिस्टमैटिक ऑडिट नहीं होता था। हम प्रॉपर्टी का जो इनकम आ रही है एक्सपेंडिचर हो रहा है उसका ऑडिट होना चाहिए। तो वो ऑडिट हमने शुरुआत करवाई चौथी चीज उसमें एडमिनिस्ट्रेशन में भी काफी इंप्रूवमेंट्स की है अल्हम्दुलिल्लाह। तो वो तजुर्बात थे मुझे तो मैंने कहा कि वो तजुर्बात इंडिया लेवल के ऊपर होने चाहिए। इनफ हमने वहां इमामों के तनख्वाएं बढ़ा के फिक्स की थी। इसलिए कि मैं समझता हूं कि इमाम जब तक मुमई और खुश नहीं होगा तब तक कैसे लीडरशिप करेगा। तो वो फिर बाद में एक तजीम थी इमामों की वो वहां चली गई सुप्रीम कोर्ट में उसी को लेकर के आर्डर को जो मैंने पास किया था और कहा कि इसको पूरे मुल्क में इम्लीमेंट करो। तो बोर्ड में जब रिसोर्सेस थे लेकिन ये कि इंप्रूवमेंट इज ऑलवेज पॉसिबल और उसको ज़हन में रख के फिर ये था कि इसके ऊपर सिस्टमैटिक क्योंकि एक मौका है नेशनल लेवल के ऊपर काम करने का तो दैट शुड बी अ पार्ट ऑफ दिस स्टडी एंड रिपोर्टिंग आल्सो तो इस वजह से उसको फिर बनाया उसमें से फिर पूरे व बोर्ड जितने पूरे इंडिया के थे उन सबको जोड़ा और सबसे हमने क्वेश्चन दे दे के जवाबात लिए। स्टैटिस्टिक्स ली उसको जमा किया और कोकोलेट किया और सबकी राय ली और राउंड टेबल कॉन्फ्रेंसेस की और जगह-जगह सूबों में जाकर के उनसे मुलाकात हुई और तो उसकी बुनियाद के ऊपर फिर रिपोर्ट तैयार हुई। तो उसमें फिर ये था कि भ ये ये ये चेंजेस होने चाहिए। हम उसमें व एक्ट में उस वक्त 1995 का व एक्ट चलता था उसमें ये तब्दीलियां होनी चाहिए पैरेलल एक काम ये चल रहा था कि जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेट उस वक्त बैठी हुई थी और के रहमान खान साहब उसके चेयरमैन थे जी फिर उसी बीच में सच कमेटी की रिपोर्ट तो हो गई उसके बाद फिर जगा फाउंडेशन के सदर के हैसियत से फिर मैं जाके के रहमान खान साहब से मिला उनको सब प्रेजेंटेशन किया ये तो वो भी बड़ा मुमन उन्होंने बड़ी सपोर्ट दी फिर हमने यह रखा कि भाई जस्टिस कमेट ने यह कहा है और जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेट ने ये कहा है कमेट ऑफ़ सेक्रेटरी ने ये कहा है अगर आपको याद हो तो 2010 में एक बिल आया था हालांकि उस वक्त यूपीए की गवर्नमेंट थी लेकिन 2010 में एक व अमेंडमेंट बिल आया था लेकिन ये वो बहुत खराब बिल था उसमें जो सेक्टर कमेट ने कहा था और जो जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेट ने कहा था उस सबसे हट के उसने शायद वो नीचे ऑफिसर्स पर ही छोड़ दिया गया था। किसी ने पिटिकल लेवल के ऊपर उसको स्टडी करके बाकायदा वो नहीं किया था कि समझबूझ करके उसको वेट करें प्रॉपर्ली वो हुआ नहीं था। बहाल जो बिल पेश हो गया लोकसभा में पास भी हो गया मतलब आननफानन में पास हो गया तो यह जो आप बोल रहे हैं कि नीचे लेवल पे तो जनरल जो ब्रोक्रेसी है उसको शायद रियलाइज हुआ कि भ व्हाई शुड वी एमावर व टू मच और उसको एक तरीके से मतलब मशीनरी एक पैरेलल पोस्ट 2014 से पहले की भी एक ब्यूरोक्रेसी के लेवल पे भी चलती है वही हमेशा सही है तो वो तो आप सही फरमा रहे हैं वो तो हर फील्ड में जो डीलिमिटेशन है वहां भी यही मामला है सब सारा मामला ऑफियल मशीनरी का है एनीवे तो वो फिर बिल जब पेश हो गया और लोकसभा से पास भी हो गया इत्तेफाक से उसी वक्त मैं चला गया था बॉस्टन बच्चों के पास तो वहां पर 45 डेज मुझे रहना था बॉस्टन में और सब बच्चे सब खुश थे कि हम घूमने आए उनके साथ लेकिन वो पूरे 45 डेज मैंने हर दिन 810 घंटे घंटे काम किया स्टडी करके व बिल को इन द लाइट ऑफ सिस्टर कमिट जेपीसी एंड कमेट ऑफ़ सेक्रेटरी पूरा एक चार्ट बुक बुकलेट बनाई चार्ट फॉर्म में डिफरेंट कलर्स के और ये ये गलत हुआ है फला इशू के ऊपर और ये होना चाहिए हम और यहां आने के बाद उसको प्रिंट करवा करके यहां आने के बाद फिर मीडिया कॉन्फ्रेंस में ला करके और सब उसको रिलीज किया और देन इट बिकम अ नेशनल इशू तो फिर जेपीसी के मेंबर से खुद मुलाकात की वगरा वगैरह फिर अल्लाह का शुक्रिया हुआ और भी लोग उसमें शामिल हुए तो वो फिर वो फिर बिल जो है वापस कर गवर्नमेंट ने उसको लौटा दिया उसने पार्लियामेंट ने सॉरी पार्लियामेंट ने उस बिल को डिपार्टमेंट को मिनिस्ट्री को लौटा दिया कहा उसको रिकंसिल किया जाए हालांकि लोकसभा पास कर चुकी थी लेकिन ये ताकत थी क्योंकि वो बाकायदा सिस्टमेटिकली स्टडी करके और बातें सामने रखी गई थी उसको पर्सू किया गया पर्सवरेंस के जरिए तो वो वापस हो गया बिल फिर दोबारा जब पेश हुआ तो उस 20 में हमने अपने पूरा काम कर लिया था और वो फिर 2013 में बिल जब पेश हुआ दोबारा तो अच्छा था दैट वास दी पर बेस्ट व लॉ इन द होल वर्ल्ड सो फ तो बाद में फिर तो आप जानते हैं क्या-क्या हुआ उसके साथ तो ये जो जर्नी है सचर कमेट के आने तक की रियलाइजेशन की मुस्लिम मोबिलाइजेशन की तो उससे पहले जो स्टेट में एक्टर्स हैं वो या तो सेकुलर गवर्नमेंट्स हैं या ब्यूरोक्रेसी है मुस्लिम इंस्टीटशंस हैं। मुसलमानों का रिप्रेजेंटेशन खुद जो ब्यूरोक्रेसी में जो रोल हो सकता था कहां-कहां आपको लगता है कि जो चीजें होनी चाहिए थी जिस तरह से कहां रियल प्रॉब्लम्स आई एक तो गवर्नमेंट के लेवल पे कि कांग्रेस ने किया मुस्लिम क्वेश्चन को या फिर सेुलर पार्टी में नॉट जस्ट कांग्रेस आप समाजवादी ले लें दूसरी ले लें जिनका सोशलिज्म या फिर सेकुलरिज्म या फिर ये कि भ कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी एक तरीके से मैसेज था और साथ में खुद जो कम्युनिटी है जो उसका पार्टिसिपेशन है जो आपने शुरू में भी इशारा किया तो वेयर इज द गैप गैप जो है मैं आई विल पुट द ब्लेम स्क्वायरली ऑन द शोल्डर्स ऑफ द कम्युनिटी हम जिसमें मैं भी शामिल हूं आप भी शामिल है। सब लोग शामिल है। ऐसा नहीं किसी दूसरे पे हम नहीं कर रहे हैं। लेकिन जो मैकेनिज्म क्या है उस गैप का कि मतलब क्यों वो गैप है? क्या कौन लोग थे जिनके पास वो पोजीशन थी कि वो जो कर सकते जैसे आप रहे पोजीशन में तो आपने जो हो सकता था अपने लेवल पे वो डिसीजंस लिए। सो व्हिच पार्ट ऑफ द कम्युनिटी अगर आप कम्युनिटी की भी बात कर रहे हैं। नहीं वो तो देखिए ऐसा है कि हम मैंने आपसे जो अर्ज किया था अभी दोबारा कहूंगा कि बिकॉज़ वी आर नॉट गुड मुस्लिम्स। हम गुड मुस्लिम्स हम क्यों नहीं है? क्योंकि हम खुदा का पैगाम जानते ही नहीं। हम हम तो खाली बस तिलावत किया अपने झुकझुक करके और उसके बाद जुदान बांधा और ऊपर रख दिया हम लेकिन उसमें अल्लाह का पैगाम क्या है ये बहुत कम लोग समझते हैं कोशिश भी बहुत कम होती है हम दैट इज द मेन क्रक्स ऑफ़ द इशू इवन जो खुद जुने के खुद हैं उनके अंदर भी जो है कोई सिस्टमेटिक प्लानिंग के जरिए हम कुछ अल्लाह का पैगाम प्रॉपर्ली पहुंचाया जाए समझबूझ करके और रिसर्च करके हम वो उसका का कोई क्योंकि इंतजाम नहीं है। इस वजह से कुछ ये तो मैं नहीं कहूंगा जीरो इंतजाम है। कुछ जगह तो बहुत अच्छे-अच्छे खुद होते हैं। लेकिन वेरी फ्यू एंड फॉर इन जनरल वो इशू है। तो उसकी वजह से तरबियत भी अच्छी नहीं है तो तरबियत भी क्योंकि अच्छी नहीं है। इस वजह से जो है वो उतना कॉनशस जो जनरेशन मैच्योर हो के आती है ना वो अपने बारे में अपने वजूद के बारे में अपने अपना कम्युनिटी से ताल्लुक के बारे में उतनी कॉन्शियस नहीं होती जितनी की जरूरत है होने की दैट इज द क्रक्स ऑफ द इशू एक्चुअली जाहिर है अगर हम ये बहुत आसान है कि हम किसी पार्टी को और गवर्नमेंट को हम ब्लेम कर दें कि भाई उन्होंने ये नहीं किया हमारे साथ नहीं किया तो क्या करोगे हम लेकिन क्या हुजूर सल्लम ने किसी गवर्नमेंट का सहारा लिया था अपनी बात पहुंचाने के लिए या अपना काम करने के लिए तो हम उनके अगर अच्छे सिपाही है तो हमें भी उस सुन्नत पे चलना चाहिए कि भाई अपनी दुनिया आप पैदा कर अगर दो में हम तो हमें तो अपनी दुनिया खुद पैदा करनी है इतने मैंने आपसे अभी अ किया था कि कम्युनिटी जो है खुद कफील है इंटरनली तो सेल्फ सफिशिएंट है हम लेकिन ये कि हम इफ वी आर गुड मुस्लिम्स तो फिर हम उसका उसका इस्तेमाल करके और लोगों को जो जिनको अल्लाह ताला ने जो है उतना नहीं बखशा है उनको उठा के कम से कम आधी ऊंचाई तक तो हम ला सकते हैं। उसके लिए हमें अपने काम करने पड़ेंगे। मैं आपको अ करूं किचन कमेट से पहले की बात कि वो मैं वेस्टर्न यूपी में एक जगह इनवाइट किया गया था एस चीफ गेस्ट ऑन सर सैयद डे तो शाम को 5:00 बजे मैं पहुंचा था और 8:00 बजे प्रोग्राम था। उस बीच में जो उसके इंतजाम करने वाले लोग थे वो लोग सारे जो एएमयू वर्ल्ड बॉय एसोसिएशन में ऑफिस बैर थे वो सब लोग बैठे थे मेरे साथ बातचीत चल रही थी मालूम ये हुआ कि उनमें से हर एक के पास 10 या 15 एकड़ जमीन है। अच्छा हां तो मैंने उनसे ये पूछा कि आप उस जमीन का क्या करते थे? हम तो उन्होंने कहा हम उसमें से अनाज खाते हैं। आप सोचिए 101 एकड़ जमीन से एक जनरेशन पूरी सिर्फ अनाज खाती है। फिर वो अगली जनरेशन में चला जाता है। फिर वो अनाज खाती है। तो मैंने कहा आपकी मफित मुश्किल है। क्यों? अल्लाह का है हुकुम है यह कह रहा है कि तुम्हें हुजूर से सूर बकरा में आयत नंबर 219 में अल्लाह ताला फरमा रहे हैं कि आपके साथी लोग आपसे पूछ रहे हैं कि अल्लाह की राह में कितना करना है आप उनसे कह दीजिए कि हमने उनको जो कुछ बखशा है उसमें से जो उनकी वाजिब जरूरत है और उनकी न्यूक्लियर फ की जो लोग उन डिपेंडेंट है उनकी जो वाजिब जरियात है वो रोक के बाकी सब करना है हम मैंने कहा जब आपके पास 15 एकड़ जमीन है उसमें से आप अपने लिए खाली खा रहे हैं तो बाकी तो आपका है ही नहीं हम तो ये एक्चुअली ये एक एक ही मिसाल जो है ना वो पूरे समाज को दर्शाती है कि भाई ये दफा था आईडिया ऑफ़ ओनरशिप की जो फिलॉसफी है वही डिफरेंट होनी चाहिए वो जो यस वो तो दीन तो कहता है कि वेल्थ माना वहां पूरी जो अर्थ है पूरी जमीन है ना उसका मालिक तो अल्लाह है। हम लोग कुछ दिनों के लिए कुछ हिस्से के मालिक बन जाते हैं। लेकिन हम उसके हमारे जो मैंडेट है उसको करने का इस्तेमाल उसको हम पूरा नहीं करते। ये आपने अभी जकात की बात की थी तो जकात जो है ना इट्स अ वेरी स्माल सेगमेंट ऑफ एंटायर मैंडेट ऑफ़ अल्लाह। हम उनका जो बड़ा मैंडेट है जो बड़ी तस्वीर है वो है कि वेल्थ शुड बी पीप ऑन सर्कुलेटिंग इन द सोसाइटी। ये अल्लाह का मैंडेट है। वेलोसिटी ऑफ़ वेल्थ और मनी होना चाहिए। वो सर्कुलेट कर सर्कुलेशन होना चाहिए। जिस तरह से खून दौरान कौन करता है बॉडी के अंदर इंसान के उस तरह से वेल्थ भी चल घूमते रहना चाहिए। शुड नॉट गेट स्टक इन फ्यू हैंड्स। यही आयत है कुरान। तो उसके उसको इम्लीमेंट करने के लिए उसकी जो वो है कुछ इंस्ट्रूमेंटिटी उसमें से एक जकात है वो भी एक नुमाइंदा किस्म की है यानी कि वो टोटल एक्सॉस्टिव नहीं है वो ढाईस जकात है आप सोचिए कि अगर मेरे पास फर्ज कीजिए कि जो मेरी तारीख तय होगी उस तारीख को मैं जकात दूंगा साल भर का अपना कैलकुलेशन करके उस साल में अगर फर्ज कीजिए कि मेरे पास टोटल बचे मान लीजिए ₹1 लाख तो उसमें से मैं ढाई परस निकालता हूं एक तो है ना तो बाकी मेरा है 97% लेकिन अगर मेरे पास 10 करोड़ है हम और मैं उसमें से ढाई परस निकालता हूं तो बाकी भी मेरा है हम अगर मेरे पास 1000 करोड़ है हम उसमें से भी मैं 2.5% निकाल रहा हूं फिर बाकी सब मेरा है। तो जो मेरे पास बच रहा है इन तीनों सूरतों में उसमें तो जमीन आसमान का फर्क है। हम उसको एक्सप्लेन करने के लिए सूर बकरा की आयत नंबर 219 है। जकात एक वन ऑफ़ द इंस्ट्रूमेंट्स है। इस्लाम के जो इकोनमिक थिंकिंग है उसमें सोशल जस्टिस में देयर आर अदर इंस्ट्रूमेंट्स जो बाकी प्रॉब्लम्स को आइडेंटिफाई करके सॉल्व करते हैं। ये जो जुमे का खुदबा होता है आप देखेंगे गौर करेंगे तो उसमें आखिर में जहां इख्तताम होता है जुमे के खुद का इन्सान ये जब आयत शुरू होती है तो बस इतनी इसकी सिग्निफिकेंस है लोग समझ जाते हैं नमाजी लोग अब खुद बखत अब खड़े हो जाओ जबकि इस आयत के लिए तमाम मुफसरीन ने ये लिखा है कि अगर पूरा कुरान नहीं उतरता और सिर्फ ये आयत उतरती तब भी अल्लाह का पैगाम मुकम्मल था। हम इतनी मुजरब आयत है ये। उसमें अल्लाह में अद और एहसान के फर्क के बारे में बता रहे हैं। हम अद और एहसान में क्या अल ये है इसको बहुत लूजली ट्रांसलेशन करें तो जस्टिस हुआ। एहसान को करें तो कंपैशन हुआ। तो अगर तुम इतना कर लोगे मिनिमम तो तुम दोजख में नहीं जाओगे। ठीक है हम तुम्हें माफ़ कर देंगे। लेकिन अगर तुम चाहते हो कि अपने को अल्लाह का महबूब बंदा बनाओ तो तुम्हें अपने को उठा के ऊपर ले जा के ऊपर का जो ऑर्बिट है दायरा है एहसान का कंपैशन का उसमें ले जाना होगा और उसमें तुम्हें एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी एफर्ट करनी होगी अपने वजूद को साबित करने अपने वजूद को जस्टिफाई करने के लिए और तुम्हें जो कुछ अल्लाह ने दे रखा है उसको भी जस्टिफाई करने के लिए तो तुम्हें अगले अगली की मदद करनी है और वो तो पपस ऑफ क्रिएशन ऑफ़ ह्यूमैनिटी में अल्लाह ताला ने बता ही दिया है 11.7 अगर आप उस रोशनी में देखेंगे तो जकात जो है ढाई परस वो अद से कवर होती है बाकी 97% ये करता है गवर्न करता है एहसान को सदका है आपका वो है वो सारी चीज़ ऐसी चीजें हैं जो वो है ही नहीं आपका हमसे ज्यादा जो है वो तो दूसरे लोग कर रहे हैं दुनिया में जो लोग अपना दुनिया में तमाम से बड़े-बड़े वो चल रही है फिलथ्रोपीस चल रही है 50% बल्कि उससे भी ज्यादा दे देते हैं लोग कि साहब ये हमने दे दिया चैरिटी में दे दिया वो है एक्चुअली उसको अल्लाह ने कहा है ले गए तसलीस के फरज मिरास खलील हजरत इब्राहिम सलाम ने जो सिखाया था जो हमें सीखना था उसप अमल करना था वो तो क्रिश्चियंस ले गए वो तो वो कर रहे हैं इम्लीमेंट उसको इंटरेस्टिंगली वो हजरत उमर और हजरत अबू बकर का जो किस्सा है जरूरत के हिसाब से फरान में उसमें आज भी है कि भाई आप लोन दो जो आपको जिसका आधा वेल्थ और जो आपके पास अभी है जमा है या पूरा दे देने वाला कि मतलब वो भी मिसाल है। हालांकि उसको क्योंकि वो एक आप एहसान की आला मिसाल है। उसको आम नहीं किया गया। हर कोई नहीं कर पाएगा लेकिन वो मिसाल आ गई। जी जी लेकिन ये वही मैं आपसे बार-बार कह रहा हूं कि जितना डिस्कशन हमारा आपका आज है ना उसका क्रक्स जो है रनिंग थीम वो यही है कि हिंदुस्तान के मुसलमानों को अपने को इंप्रूव करना है और दीन की रोशनी तो ये जो आप सेल्फ सफिशिएंसी की बात कर रहे हैं मुझे लगता है इसको और डीकंस्ट्रक्ट करते हैं के आपके हिसाब से जो ये कम्युनिटी है हिंदुस्तान में जो माइनॉरिटी है सेकंड लार्जेस्ट मेजॉरिटी है जो देखा जाए तो 20 करोड़ है। नॉट अ स्माल नंबर इट्स अ नेशन एंड इटसेल्फ। उसकी अपनी इकॉनमी है। उसकी अपनी प्रॉपर्टी है। उसके अपने रिलेशंस हैं। उसकी अपनी सोशलिटिकल रियलिटी हैं। वो सब अपने आप में जो एक आपका कहना है कि वो अपनी एक इकॉनमी और अपनी एक रियलिटी को क्रिएट कर सकते हैं। तो एक तो ये है कि जो स्टेट है कि स्टेट में दो वो आ गए हमारे कि भ ब्रॉडली स्पीकिंग दो टाइप्स ऑफ पॉलिटिकल फोर्सेस हु रन द स्टेट। वह एक फोर्स वैसी है कि जो सेुलर है जो बाजा आपके खिलाफ हो सकता है कि एक्टिवली नहीं है लेकिन क्योंकि वो आप नहीं है पूरी तरह से तो आपको जरूरी नहीं है कि एक्टिवली स्टडी भी करें तो उससे जो आप नेगोशिएट कर सकते हैं वो आपको अपनी जो एजेंसी है उसको सामने रखते हुए करना होगा। दूसरा हिस्सा जो हमने 2014 के बाद आम देखा मतलब वो खासतौर पे तो स्टेट्स और उसके लेवल पे होता रहा उसको हम बाद में डिस्कस करेंगे। लेकिन ये जो हिस्सा है और जो आपका सेल्फ सफिशिएंसी का आर्गुमेंट है उसको किस-किस तरह की ऐसी रिसोर्सेज हैं कम्युनिटी में जो रही हैं या जो आज भी एकिस्ट करती हैं जो अगर प्रॉपर्ली यूटिलाइज हो या उसकी अंडरस्टैंडिंग किस तरह से डेवलप हो या जहां पे एक्चुअली खुद मुख्तार या सेल्फ सफिशिएंट हुआ जा सकता है तो वो आप थोड़ा सा कि आपके अपने एक्सपीरियंस में और आपने क्या-क्या उस वजह से एक्टिविटीज करी जिससे आपने कम से कम अपने लेवल पे या जो अपने एतराफ आपकी जो जिसे कहते हैं इनफ्लुएंस है वहां पे आपने कम से कम कोशिश की कि उस तरह के इंस्टटश इदारे मिसाली हो और वो और लोग भी उसको रेप्लिकेट कर सके। आपने मिश्रा सुन रखा होगा चश्म नम जाने शरीदा काफी नहीं फैज का है कि खाली आंखें नम कर लेना और दिल दिल को मुजमहिल कर लेना अरे भाई बड़ी परेशानी है इससे काम नहीं चलेगा और [गला साफ़ करने की आवाज़] तो क्या करना होगा? एक्टिव जो आप फरमा रहे हैं अगर वह हम करने लगे आगे बढ़ के और इसका एहसास कर ले अखल की इस मिशरे की कि फर्द फर्द कायम र मिल्लत से है तन्हा कुछ जी अगर आप सोचिए और करीब मिसाल देते हैं मौज का हम कि मौज जो है जब तक दरिया में है तभी तक वो मौज है हम अगर दरिया से निकलेगी तो मौज ख़ उसकी मौज मौज एक्सिस्ट ही नहीं करती फिर अगर दरिया से निकल गई तो मौज की तरह फर्ज भी है मिल्लत का फर्क हम अपने को ये समझे कि जब तक हम मिल्लत के लिए काम करेंगे तभी तक हमारी अहमियत है इसकी इस चीज को रियलाइज करना बड़ा जरूरी है। वही है लेकिन उसके लिए अपने पास जो कुछ है उसको इस्तेमाल करके और उसमें सिर्फ रुपया पैसा नहीं है। हम उसमें हमने एक वो बनाया है एक हाइपोथेसिस मफ्रूजा फाउंडेशन में उसका नाम रखा ट्रेल 33 ट्रेन 33 ट्रेल आर ए आई एल जी ट्रेल ट्रेल 33 तो ट्रेल जो है वो एक एक्रोनिम है शॉर्ट फॉर्म [गला साफ़ करने की आवाज़] टी इज फॉर टाइम हम आर इज फॉर रिसोर्सेज हम वक्त और रिसोर्सेज मीन्स वसाइल हम एंड ए इज इज फॉर एसेट्स जमीन जायदाद हम आई इज फॉर इनकम आमदनी हम एंड एल इज फॉर लव जज्बा मोहब्बत हम ये पांचो फीचर्स जो है वो कुल लफ वाली जो आयत है 2.29 उसमें शामिल है। सिर्फ रुपया पैसा नहीं है। सब चीजें शामिल है। मेरे पास जो वक्त है 24 घंटे का मल्टीप्लाई बाय सो मेनी डेज जितने दिन मुझे जिंदा रहना है। जितनी सांसे हैं मेरी उस सबका मुझे 33 क्यों रखा हमने? वन थर्ड हर एक का वन थर्ड मुझे अपने ऊपर या अपनी न्यूक्लियर फर्स्ट नहीं करना। किसी और पे करना। अगर ये मान करके हम चलने लगे और उसका थोड़ा सा भी इम्लीमेंटेशन कर दे देन द प्रॉब्लम सॉल्व। कोई प्रॉब्लम है ही नहीं है। इसलिए कि सेक्सुअली अगर हम ये मॉडल पेश कर देते हैं तो आई एम शोर पूरा हिंदुस्तान भी हमसे सीखेगा। पूरी दुनिया भी हमसे सीखेगी कि भाई ये तो मॉडल बहुत अच्छा है। तो उसको हमें अपनी जिंदगी में बाकायदा अमल उसके ऊपर कर करके क्योंकि हमने बेमली रखी इस ताल्लुक से अपने वो फिर प्रॉब्लम आ गई। मसलन मैं आपको देखिए हमारा रिप्रेजेंटेशन क्योंकि अभी मैं आपको सर कमेट ने ये क्या कहा कि भाई मुस्लिम्स आर लैगिंग बिहाइंड एवरीबडी सोशल इकोनमी एजुकेशन तीनों फील्डों में और उसकी वजह ये है दे आर थली अंडर रिप्रेजेंटेड इन द गवर्नेंस ऑफ इंडिया अब गवर्नेंस ऑफ़ इंडिया में अगर हम अंडर रिप्रेजेंटेड है तो गवर्नेंस दो तरह की है। एक लेजिसलेटिव और एक एडमिनिस्ट्रेटिव लेजिसलेटिव में लोकसभा मैंने अभी आपसे अ किया था कि आजादी के बाद से आज तक देख लिए तो हम थोलीजेंट हमेशा रहे हैं। हमेशा जो रहे उसको इम्रूव करने का तरीका हमारे ही पास है जो कि हमने नहीं किया। स्टडी नहीं किया कभी हमने। अब सच कमेट ने कम से कम गवर्नमेंट इतना कर दी। गवर्नमेंट ने इतना कर दिया कि वो स्टडी करके आपको बता दिया। कि कहां कहां इशू है आपका? उसने कहा कि अगर आप लोकसभा में और असेंबली में और लोकल बॉडी में अंडर रिपजेंटेड है तो उसकी जो बुनियादी वजह है वो कोई और पिटिकल नहीं है बुनियादी वजह पिटिकल हो सकती है 1% 2% लेकिन जो बुनियादी वजह है वो है पार्टी डीलिमिटेशन हम प्राइम मिनिस्टर की हाई लेवल कमेट कह रही है जिसको की कैबिनेट ने अप्रूव किया पार्लियामेंट में पेश हो गई वो गवर्नमेंट कह रही है ऐसा हम कि आप आप जो है वो अंडर रिप्रेजेंटेड है बिकॉज़ ऑफ फौ्टी डीलिमिटेशन। अब फौ्टी डीलिमिटेशन को डील करना जो है इसको एक्सप्लेन करिए व्यूअर के लिए डीलिमिटेशन क्या है? फौ्टी कैसे हो रहा है? उसका मैकेनिज्म क्या है? जी देखिए ऐसा है कि कॉन्स्टिट्यूशन में ही दस्तूर में ही ये लिखा हुआ है कि हर 10 साल के ऊपर मर्द शुमारी होगी। सेंसस होगा और दस्तूर में ही दूसरी जगह ये लिखा हुआ है कि उस मर्द शुमारी जो सेंसस है जनगणना उसके जो आदाद शुमार जो स्टैटिस्टिक्स हो पब्लिश हो उसकी रोशनी में हर 10 साल के बाद तमाम कॉन्सीटुएंसी और तमाम वार्ड्स उनकी बाउंड्रीज जो है जहांजहां जरूरत हो हम नई स्टैटिस्टिक के हिसाब से वो चेंज कर देनी चाहिए। हम इस पूरे प्रोसेस को कहते हैं डीलिमिटेशन। उसका वो क्या होता है? मतलब क्यों करना चाह रहे हैं? उसका क्या अचीव करना चाह रहे हैं? उसको रीस्ट्रक्चर करके व्हाट इज द एंड गोल? ऐसा है ना देखिए कि आबादी बढ़ती रहती है। आबादी मूव भी होती रहती है। हम या कुछ और एडमिनिस्ट्रेटिव ऐसे जैसे एक ट्रेन नहीं चलती थी कहीं वहां ट्रेन चला दी गई। अब दी गई तो उसकी पटरी आ गई। उसकी पटरी आ गई तो हिस्सा दो हिस्सों में डिवाइड हो गया वगैरह। जबकि रूल्स ये है कि ट्रेन के अंदर ही अंदर का हिस्सा होना चाहिए पूरे एक एक वार्ड में। इस तरह की एक मोटी मोटी सी बात मैं आपको समझा रहा हूं। इसकी उसके लिए यह रखा हुआ बहुत अच्छा है। उसके उसका लॉ भी बहुत अच्छा है। यह जो कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविज़न है इसकी रोशनी में डीलिमिटेशन एक्ट बना हुआ है। और उसकी रोशनी में लोकसभा और असेंबली के लिए जो रूल्स एंड रेगुलेशंस है वो सेंट्रल इलेक्शन कमीशन ने बना रखे हैं। और जो लोकल बॉडीज के लिए हैं उसके रूल्स हर स्टेट गवर्नमेंट खुद बनाती है। ये सारे ऑन द होल्ड मोटा मोटी बात यह है कि रूल्स एंड रेगुलेशन लॉ सब बहुत अच्छे हैं। गवर्नेंस को बेहतर करने के लिए ताकि मैनेजबल गवर्नेंस नहीं रिप्रेजेंटेशन रिपजेंटेशनल जस्टिस ये है एक्चुअली फोकस उसके अंदर डेमोक्रेसी जो है वो सारा बेस है रिप्रेजेंट प्रॉपर रिप्रेजेंटेशन के ऊपर तो रिप्रेजेंटेशनल जस्टिस होना चाहिए ना उसको मेंटेन करने के लिए जहां जो आबादी में चेंजेस हो रहे हैं और दूसरे चेंजेस हो रहे हैं उसकी रोशनी में हर 10 साल पे गौर कर लिया जाए कोई मैंडेटरी नहीं हर जगह चेंज होना ही होना है। लेकिन जहां जरूरत हो वहां पर डीलिमिटेशन चेंज कर दिया जाए। बाउंड्री को बदल दिया जाए व तो उसके लिए बड़े अच्छे रूल्स है। बड़ा अच्छा लॉ है। लेकिन उसका इंप्लीमेंटेशन जो है लॉ और रूल्स का दैट इज फौ्टी। वो बताया सेंचर कमेट ने। जब उन्होंने ये बताया तब फिर हमने जकात फाउंडेशन ने एक नया सेगमेंट कायम कर दिया। उसका नाम रखा डीलिमिटेशन सेल। हम 12 13 साल से चल रहा है हम डीलिमिटेशन से पहले तो उसने यह काम किया कि सारी स्टडी कर ली पूरा डाटा गवर्नमेंट डाटा पूरा कलेक्ट करके उसको कोेट करके तैयार कर दिया कि किस किस सूबे में कहां कहांहां किस लेवल पे क्या दफा हम और उसके बाद फिर जमीनी सतह के ऊपर हमने काम करना शुरू किया मसलन मैं आपको एक मिसाल देता हूं जमीनी स जो हमारा काम है ना उसमें 70% से लेकर 100% तक कामयाबी है। डीलिमिटेशन को जो हमारा ग्राउंड लेवल वर्क है सक्सेस रेट इज बिटवीन 70 एंड 100% क्या एक्टिविटी है? मैं आपको मिसाल दे रहा हूं। एक जैसे कई साल पुरा पहले की बात है इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया ने नोटिफिकेशन जारी किया कि हम सहारनपुर को जी आपके [हंसी] आपकी कास्टिट्यूएसी को रिजर्व करने जा रहे हैं। जी ये कहा उन्होंने हम रिजर्व करने जा रहे हैं। कोई ऐतराज हो तो बताओ। किसी ने कोई ऐतराज ही नहीं किया। हमने जकात फाउंडेशन ऑफ इंडियाकि सब काम कर चुके थे। डाटा हमारे पास मौजूद था। हम लॉ ये कहता है कि आपको रिजर्व वो कॉन्स्टिट्यूएंसी है करनी है जहां पर शेड्यूल कास्ट जिसके लिए आप रिजर्व कर रहे हैं शेड्यूल कास्ट की परसेंटेज हाईएस्ट हो हम वहां करनी है आपको ये लॉ कह रहा है हम लेकिन ये कि वहां तो शेड्यूल कास्ट की कॉन्स्टिट्यूएंसी बहुत कम परसेंटेज बहुत कम थी जबकि दूसरे कॉन्स्टिट्यूएंसी हैं उसी जगह आसपास ही जहां पर एससी परसेंटेज बहुत हाई है हम तो हमने ऑब्जेक्शन फाइल कर दिया सब अपनेप शुमार दे दिए उन्हें तो बाकायदा उसकी वजह से पूरी तीनों पूरी बेंच उठ के सहारनपुर गई वहां पर उन्होंने हियरिंग की पब्लिक हियरिंग उसमें हमने सब बात उनको समझाई बुझाई सब डॉक्यूमेंटेशन पेश किया तो उनका आर्डर आ गया कि हम ऐसा करने जा रहे थे लेकिन जकात फाउंडेशन की बात सही है हम उसको नहीं कर रहे थे हमने जो अल्टरनेटिव उनको दिए थे उसमें से एक दौरे उन्होंने कर दिया इंटरवेंशन हो तो इनफॉर्म इंटरवेंशन अगर हो तो आप मशीनरी को वो कर सकते हैं। या दैट्स व्हाट स्ट्रक्चर कमिट टोल्ड अस कि डीलिमिटेशन के इंप्लीमेंटेशन में खराबी है। इस वजह से जो है उस दूसरी मिसाल अच्छा इसी वाले सवाल में एक और एक लेवल पीछे कि भ फौल्टी का मतलब क्या है कि फौल्ट ये है कि भ गुड इंटेंशन है डीलिमिटेशन का लेकिन रीजनिंग सही नहीं की या फिर इंटेंशन ऐसा है कि जिसमें ये है कि पर्टिकुलरली इस तरह से कॉन्फ़िगरेशन जैसे जेरी मेंडरिंग होती है बाहर एक्सैक्टली वही जो उसको वहां यूएस में जेरी मेंडरिंग कहते हैं वही इशू है यहां तो उसको [गला साफ़ करने की आवाज़] डील करने के लिए अपने पास तरीके हैं। राइट टू इन एक्ट हम ये काम करते हैं जहां पर यहां सहारनपुर वाले में तो इलेक्शन कमशन ने ही वो दे दिया था नोटिफिकेशन तो हमने उसी को डायरेक्ट जवाब दे दिया लेकिन जहां पर हम सोचते हैं कि लिमिटेशन में खराबियां है स्पेसिफिक उसकी मिसाल देता हूं मैं आपको अब ग्रेटर बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन हम उसमें हमने स्टडी करके पता लगाया कि ये जो 30 वार्ड है इनके डीलिमिटेशन में इनका जो रूल है महाराष्ट्र लेजिस्लेचर से बना हुआ जो रूल है वो फला फला रूल फला फला वार्ड में वायलेट हो रहा है। स्पेसिफिक 10 पेज का नोटिस तैयार करके हम और इलेक्शन से एक साल पहले इलेक्शन होने वाले जब थे तो उससे एक साल पहले महाराष्ट्र स्टेट पब्लिक उसके महाराष्ट्र स्टेट इलेक्शन कमीशन के ऊपर सर्व कर दिया हम आरटीआई में और उससे ये पूछा कि ये जो खराबियां है ये आप कब तक दूर कर देंगे हम तो सोची कितना आसान है हम तो उन्होंने उसको बहुत सीरियसली लिया उसके ऊपर हियरिंग लगी और हमारे यहां से रिपजेंटेशन हुआ उसमें पूरा साल भर लग गया बाय द टाइम साल भर हुआ खत्म तो उन्होंने 30 के 30 वों का डीलिमिटेशन चेंज कर दिया अकॉर्डिंग टू व्हाट जकात फाउंडेशन है सेट हम चेंज हो गया उसका नतीजा क्या हुआ अब फौरन इलेक्शन का टाइम आ गया इलेक्शन हो गया फौरन ही तो जो पिछला इलेक्शन हुआ था उसमें 23 व्स के मुस्लिम उम्मीदवार इलेक्ट हुए अब जो इलेक्शन हुआ तो उसमें वन थर्ड एक्स्ट्रा 30 व ओनली बिकॉज़ ऑफ़ दिस इंटरवेंशन एक सवाल मेरे ज़हन में आ रहा है कि आप लोगों के पास डाटा है आपने डीलिमिटेशन के लिए काम किया। मैं अक्सर देखता हूं इवेंट्स होते हैं, प्रोग्राम्स होते हैं डीलिमिटेशन के नाम पे मुस्लिम ऑर्गेनाइजेशन के हम डीलिमिटेशन पे काम करें। कितने लोगों ने आपको रीच आउट किया कि भ लेट अस वर्क टुगेदर। आपका एक सॉलिड प्रूफ मॉडल है जिसके थ्रू आप इंटरवेंशन कर सकते हैं। क्या कोई कोलैबोरेशन कोशिश लोग करते हैं कि भ आपके डेटा से आपके एक्सपीरियंस से ये समझने की कोशिश करें कि प्रोसेस को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है? एफिशिएंट बनाया जा सकता है। देखिए मैं नाम तो नहीं लूंगा। नाम नहीं मैं एक जनरल जिसे कहते हैं। लेकिन ये कि मैं आपको अर्ज कर रहा हूं। दो तंजीमों ने हमें अप्रोच किया और दोनों ने ये बात कही कि साहब बल्कि तीन कह सकते हैं आप तीन तंजीों ने अप्रोच किया हमने कहा कि अच्छी बात है। हम तो ये काम कर ही रहे हैं। कोई प्रॉब्लम नहीं है। आपकी मदद करेंगे और हम मिलकर के करते हैं। एक तजीम ने तो उनसे कहा कि मैंने कहा कि आप ये मवाद है ये लिंक्स है ये वो आप समझ लेंगे अदर वाइज आप ट्रेनिंग सेशन ट्रेनिंग सेशन करने जा रहे थे इस साल से आप करने जा रहे हैं उसमें कोई यू कैन कनेक्ट मी आल्सो ऑनलाइन भी मैं उनको समझा सकता हूं हमारे जो साथी लोग हैं जो लीड का काम कर रहे हैं उन्हें जोड़ दो तो आसानी हो जाएगी आपको उसके बाद आप करते रहिए हम तो उसके लिए राजी नहीं नहीं हुए नहीं दूसरा जो है वो एक दूसरी तंजीम है उन्होंने क्यों आपको लगता है कि राजी नहीं हो ऐसे ये क्योंकि देखिए ये हम आपने जोन बात की ना एजेंसी की मेरे लिए इंपॉर्टेंट इश्यूज इसलिए हैं क्योंकि एजेंसी अगर इंडिविजुअल पे हो भी गई लेकिन ये जो इतनी बड़ी इ्तमाई लेवल पे जो काम हो रहे हैं अगर वो कोलैबोरेटिव नहीं हो पाए तो वो आइसोलेटेड वो रह जाएंगे। नहीं ऐसा नहीं कोलबेटिव होंगे तो और अच्छे होंगे बेहतर होगा लेकिन जो लोग अलग-अलग कर रहे हैं वो भी अच्छी बात है लेकिन उसमें अगर एक दूसरे से कोलबोरेशन होने से और अच्छा हो समझ ले बेस्ट प्रैक्टिससेस आ जाती समझ में आ जाती है उसी तरह से दूसरी एक तजीम जिससे गुफ्तगू हुई तो उन्होंने उनका मकसद ये था कि इंडिया लेवल के ऊपर बहुत बड़ा काम किया जाए और बुलाया जाए लोगों को समझाया जाए और वो जलसा किया जाए मैंने वो मना किया जलसा तो मत करो वरना ये पोलिटिसाइज हो जाए ये बात ठीक नहीं हमने भी आपने देखा होगा आपने कहीं पढ़ा नहीं होगा जगह फाउंडेशन ये काम कर रहे हैं तो वो तो चुपचाप खामोशी से करते रहिए उसमें कामयाबी मिलती रहेगी उसमें विद इन द कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क काम हो रहा है उसमें तो फिर वहां भी मैंने खुद ही मना किया कि नहीं अब वो मत काम तो मत करिए डीलिमिटेशन के हवाले से जो आप बातें बोल रहे हैं ये फौ्टी लाइन है रिस्ट्रक्चर हो जाता है उससे जो नेचर ऑफ डेमोग्राफी होती है कॉन्स्टिट्यूएंसी की वो बदल जाती है और उससे फिर जो वोटिंग पैटर्न है वो बदल जाएगा जो उससे फिर लेजिस्लेचर में आएगा वो फिर एक तरीके से एक तरह का इंसान ही है जिसको प्रिविलेज मिलेगा तो डीलिमिटेशन जो अब पूरी एक्सरसाइज होने जा रही है वेरी ब्रीफली स्पीकिंग आपको क्या लगता है कि अगर ये एक्सरसाइज जिस तरह से लोगों ने अभी एकिस्टिंग इमेजिन की है जो भी पावर में है। अगर उसको राइट इंटरवेंशन नहीं होता तो किस तरह का हिंदुस्तान डेमोग्राफिकली स्पीकिंग वजूद में आएगा या आ सकता है और किस तरह की जो जिसे कहते हैं डेमोक्रेसी बनाम डेमोक्रेसी ही रहेगी। जरूरत नहीं है बट उसका एक तरीके का लॉजिक बदल जाएगा। मेरे ख्याल में अब क्योंकि जैन जी जो है वो कॉनशस हो गई है और कुछ एक्टिवेट हो गई है और तो शायद सिचुएशन आएगी नहीं क्योंकि ये तो जो बेसिक स्ट्रक्चर के ऊपर ही बात आ रही है ना तो उसमें तो पूरे मुल्क की जो सिटीजनरी है जो शहरी है मुख्तलिफ उम्रों के उनको खुद ही जोड़ के एक बार मैंने जस्टिस साहब से बात करी कहा कि ये बताइए वो सब पेशवेश हो चुका था पर रिपोर्ट रिपोर्ट उसके बाद की बात है बड़ा मुसिम रहे आख तक तो उनसे मैंने कहा था कि ये बताइए कि जब वो कहीं कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही हो हर तरफ से फैसले आ रहे हो अनमोक्रेटिक तरीके से तब क्या करना तो उन्होंने कहा तब सड़क पे उतरना है अच्छा तो जाहिर है मेरे बस का तो नहीं है सड़क पर उतरना लेकिन ये कि जो लोग समझते हैं वो अपना अपना काम करते रहे हैं वो लेकिन कॉन्स्टिट्यूशनल वे में बाकायदा पूरा पासदारी रखते जो प्रोटेस्ट तो कॉन्सिट्यूशन के विन अलाउड है वो आपको सारी जो अल कर रहा है तो मेरे ख्याल में वो भी एक मजबूत वो है मजबूत पिलर है डेमोक्रेसी का प्रोटेस्ट का तरीका है आपने जो थोड़ी देर पहले बात हुई वक्त के हवाले से जफात के हवाले से लेकिन अभी क्योंकि डीलिमिटेशन की बात हो रही है रिप्रेजेंटेशन की बात हो रही है आपने स्पेसिफिकली जो बताया था कि यूपीएससी को के हवाले से आप लोगों ने जो कोचिंग सेंटर या कोचिंग इंस्टट्यूट जो कायम किया उसके बारे में थोड़ा बताइए क्या है वह उसकी क्या अचीवमेंट्स हैं कितने लोग उससे गुजरे हैं और क्या वो जो रिप्रेजेंटेशन होने से यू नो जितने भी लोग जा रहे हैं ब्यूरोक्रेसी में उसका क्या कोई इंपैक्ट होता है कि एक तरीके से जब पूरा स्ट्रक्चर सुपरस्ट्रक्चर होता है वो आपको कंटेन कर दे आपकी एजेंसी को एज अ ब्यूरोक्रेट एज अ सिटीजन एज एन इंडिविजुअल एक बाउंड्स बना दे तो फिर वो जो सिलेक्शन है या जो वहां जा रहा है क्या वो कुछ अचीव कर पाता है या फिर वो भी लिमिट हो जाता है तो ये जो पूरा प्रोसेस है आपके ज़हन में क्यों आपने ये सोचा कि भाई इस तरह से लोग होने चाहिए क्या आपको लगा कि उससे किस तरह के अचीवमेंट्स हुए हैं देखिए जी मैं अभी आपसे कह रहा था रिप्रेजेंटेशनल जस्टिस वाली बात हम वो गवर्नेंस में रिप्रेजेंटेशन जस्टिस तो रहना चाहिए वरना डेमोक्रेसी ही नहीं है फिर तो जी तो रिप्रेजेंटेशन जस्टिस जो है वो अभी तो हम बात कर रहे लेजिसलेटिव लेकिन एडमिनिस्ट्रेटिव पे अब हम आ जाते हैं उसमें भी रिपजेंटेशन जस्टिस होना जरूरी है और उसका प्रोविजन भी है कॉन्स्टिट्यूशन में इसी वजह से आप शेड्यूल कास्ट रिजर्वेशन जो मिला हुआ है उसमें वो इसीलिए है क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन में प्रोवाइडेड है और कॉन्स्टिट्यूशन में कास्ट का लफज़ खाली नहीं है। उसमें ग्रुप्स का भी लफज़ है। ऐसे ग्रुप्स जिनको गवर्नमेंट ये पाती है कि वो पीछे चल रहे हैं दूसरों के मुकाबले में उनको उनकी पोजीशन इंप्रूव करने के लिए स्पेशल एक्टिविटी करनी चाहिए। स्कीम्स बनानी चाहिए। तो उसको जेहन में रखते हुए कॉन्स्टिट्यूशनल जो जो स्पिरिट है उसको भी जेहन में रखते हुए तो ये जरूरी है कि इसी वजह से जस्टिस कमिट बनी थी कि भाई अगर मुसलमान पीछे है तो उनके लिए कुछ करना चाहिए जो कि कॉन्स्टिट्यूशन का मैंडेट है उसी चीज को ध्यान में रखते हुए तो उन्होंने बताया कि अंडर रिप्रेजेंटेड है मुस्लिम ये डाटा तो फिर उसके लिए काम तो कम्युनिटी को करना होगा। तो इस वजह से हमने ये काम कायम किया कोचिंग एंड गाइडेंस सेंटर फॉर कॉम्पिटिटिव एग्जाम और आपको ये जान के शायद खुशी होगी और ताज्जुब होगा कि सरसियत क्यों नाम रखा हमने उसका? जी ससियत इसलिए नहीं रखा कि उन्होंने अलीगढ़ मिनिस्ट्री कायम की थी या वो जो इदारा बन गया। वो खुद भी ब्यूरोक्रेट थे। नो दैट्स नॉट द रीज़। जी उसकी वजह तीसरी है। जी। 1883 में सर सैयद ने एक तंजीम कायम की थी। उसका नाम था मोहम्मदन सिविल सर्विसेस फंड एसोसिएशन। अच्छा 1883 उस जमाने में वो रिप्रेजेंटेशनल जस्टिस के तो उन्होंने यह कायम की और उसमें 500 मेंबर बनाए थे। हर मेंबर दो सालाना देता था। इतना पैसा काफी हो जाता था कि हर साल वो 15 नौजवानों को उस जमाने में शिप ही चलता था। शिप के जरिए इंग्लैंड भेजते थे सिविल सर्विस का इम्तहान लेने के लिए आईसीएस का। हां मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं। यस और सुनिए। दूसरी चीज 1887 में एक महाराष्ट्र का जिला है तो उसका डिस्ट्रिक्ट गजटियर है। हर जिले का एक डिस्ट्रिक्ट गजटियर होता है। जिसमें लिखा होता है। उसकी हिस्ट्री लिखते जाते हैं। कलेक्टर लिखवाते हैं। तो उसमें आज भी लिखा हुआ है 1887 में यहां पर बहुत बड़ी तादाद में सरकारी आसामियां खाली हुई थी और अनाउंस हुई थी कि इसको हमें फिल करना है। इसके लिए इम्तिहान होगा 15 तारीख को हम हालांकि यहां पर मुस्लिम आबादी सिर्फ 10% है। हम लेकिन यूपी से सैयद अहमद नाम का एक आदमी इम्तिहान से कुछ महीने पहले यहां आया हम और उसने पता नहीं क्या किया यही लिखा है उसने कि जब रिजल्ट निकला तो 50% से ज्यादा आसामियां मुसलमानों को चली अच्छा ये दो वजह है जिसकी वजह से इसका नाम हमने रखा सर सयद कोचिंग एंड गाइडेंस सेंटर फॉर कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन उसमें सिर्फ इतना करना है एवरीथिंग अकॉर्डिंग टू कॉन्सिट्यूशन वो कहता है कि ठीक है कॉन्सिट्यूशन ही ये भी कहता है कि आप जो मुल्क को सुधारने के लिए बेहतर बनाने के लिए जो भी इंडिविजुअल एफर्ट होनी चाहिए वो करे वो उसकी ड्यूटी है कॉन्सिट्यूशन ड्यूटी में आता है ये तो उसका भी पासदारी रखने के लिए ये काम किया गया कि उसमें ये हुआ कि पूरे मुल्क से जो बेहतरीन बच्चे हैं काबिल तरीन उनको अपने कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन के जरिए सेलेक्ट करना हर साल और उनको बेहतरीन कोचिंग प्रोवाइड कर देना जो मुल्क में है। प्रोफेशनल कोचिंग हम नहीं देते कोचिंग कोच जो प्रोफेशनल कोचिंग इंस्टट्यूट्स है जिनके खुद का सक्सेस रेट बहुत हाई है उनके जरिए उन्हें कोचिंग दिलवा देना उसको मॉनिटर करना और उनको और भी किताब वगैरह की जो जरूरत है वो भी वही फैसिलिटेट करवाते हैं। हां वो तो उसके नतीजे में ये हुआ कि माशा्लाह से सिलेक्शन यानी कि सक्सेस रेट बढ़ना शुरू हो गई और तो इन कैंडिडेट से आपका भी इंटरेक्शन रहता है। जी इन कैंडिडेट से जिनको आप लोगों कोर्स यस कंटिन्यूस जो सिलेक्ट है उनसे तो रहता ही है जो अभी सिलेक्शन के प्रोसेस में चल रहे हैं उनसे भी रहता है। तो रहता ही है। तो क्या जो कम्युनिटी रिलेटेड इश्यूज होते हैं उन लोग की कॉन्शियसनेस 100% शायद मुझसे और आपसे ज्यादा तो डॉक्टर साहब 2007 के बाद एक इंटरेस्टिंग चीज जो कि मैं तो बहुत छोटा था मैं बहुत बाद में ये चीजें देख रहा हूं 2013-14 के बाद कॉन्शियसनेस डेवलप हो रही है चीजों की और यूजली होता ये है कि क्योंकि आपका के ऊपर आपने बताया आपके वालिद साहब का बहुत असर है हमारे ऊपर हमारे वालिद साहब का भी काफी असर है तो वो भी 2011 11 12 में मुस्लिम विज़ और ये सारी चीजें रोड मैप और विज़ इस तरह और भी लोग बहुत एक्टिविटीज इस तरह की कर रहे थे। क्योंकि जब एक तरह से एक यू नो नेशनल कॉन्शियसनेस में एक इशू आया तो लोगों ने सोचना शुरू करा कि भ इसकी होलिस्टिक रीजनिंग होनी चाहिए। इसका कोई एक रोड मैप होना चाहिए। विज़न होना चाहिए। किस तरह से अब ये जो कम्युनिटी है इसको मोबिलाइज़ किया जा सकता है अपनी बेहतरी के लिए। और सिर्फ अपनी बेहतरी के लिए नहीं। ओवरऑल मुल्क में भी जब एक बड़ी कम्युनिटी ग्रो करेगी तो उसका जो रिलेशन है सबसे तो उसमें इकोनमिक मोबिलिटी भी होगी और भी बहुत सारी चीजें होंगी। तो आप का भी जो क्योंकि आपकी जो पूरी वेबसाइट है जकात फाउंडेशन की और बहुत सारी जो चीजें आपकी एक्टिविटीज उसमें रहती है तो उसमें आप भी एक रोड मैप का जिक्र करते हैं। विज़ होना चाहिए। एक तरीकेदार होना चाहिए जिससे मुसलमान अपने आप को खुद मुख्तार कर सकते हैं। अपनी एजेंसी को जो हम इतनी देर से सेल्फ सफिशिएंसी की बात कर रहे हैं उसको उसमें एक्टिव हो सकते हैं। क्या विज़न है आपका? क्या रोड मैप है कम्युनिटी को लेके? उसका क्रक्श तो अल्लामा इकबाल का एक मिश्रा है कि तमाम सामा है तेरे सीने में। तू भी आईनासाज हो जा। आईनासा किसे कहते हैं कि मैं अपना आईना बनाऊंगा कि मैं कैसा दिखना चाहता हूं दुनिया में। जी जी तो वो हम हम में से हर एक को आईना सा बनना होगा अपना ही आईना साथ यानी कि अपना आईना खुद ही बनाओ तो उसके लिए एक बाकायदा सिस्टमेटिकली आप देखेंगे वेबसाइट के ऊपर पड़ा हुआ है कि ये रोड मैप कैसे होना चाहिए क्या होना चाहिए किसको इनफरादी तौर के ऊपर क्या काम करना है तो उसमें हमने एक अखबल की टर्मिनोलॉजी है कीमिया घर कीमिया घर का इकबाल का कासेप्ट ये है कि वो कहता है कि एक्चुअली वो उस दूसरे कॉन्टेक्स्ट में है। वो कलबे सलीम एक कुरान का तसवुर है। बल्कि जो लोग कयामत के दिन कलबे सलीम लेके आएंगे तो और बात है। वरना ना औलाद काम आएगी ना दौलत काम आएगी। तो कलबे सलीम क्या है? और उसको भी उन्होंने एक्सप्लेन किया। तो वहां से हमने लिया है। वो ये कहते हैं अल्लामा कहते हैं कि अल्लाह मियां ने इंसान को एक तांबे का दिल दिया है। हम और इंसान का काम ये है अच्छे इंसान का अच्छे मोमिन का काम ये है कि उस तांबे के दिल को ठोस सोने के दिल में तब्दील करने की कोशिश करे। किस तरह से? अल्लाह की मखलूक की खिदमत करके अपने पास जो रिसोर्सेज है उसका इस्तेमाल जाती रिसोर्सेज इस्तेमाल करके उसकी रोशनी में उन्होंने एक टर्म निकाला है अखवाल ने कीमिया घर तो कीमिया घर के मतलब कि वो वो आदमी जो कि तांबे को सोना बना दे तो हमने अपने इसमें रोड मैप में यही कहा है कि कीमिया घर अपने को कह ले हम और ग्रुप बना ले कीमिया घर पिटिकल कीमिया घर एडमिनिस्ट्रेटिव केजीपी एंड केजी ए ये दो ग्रुप्स बनने हैं और इसमें अलग-अलग तरह के लोग होने हैं केजी ए में एडमिनिस्ट्रेशन वो लोग होने है जो कि उससे रखते हो ना केजीपी में तो पिटिकल है दो दूसरे लोग भी आ सकते हैं सब लोग उसका एक अपना एनुअल प्लान तैयार करें एक ग्रुप बनाना है और उसका एक एनुअल प्लान तैयार करें एक फाइव ईयर प्लान तैयार करें और एक और भी और भी लंबा प्लान तैयार उसकी रोशनी में हमें जगह जगह काम करना है। मसलन केजीपी का जो है पिटिकल उसमें जिस भी कास्टिटुएंसी में आप रह रहे हैं जहां भी ग्रुप बना है ना उसको पहले स्टडी करें ना हम उस जो इंतखाबी हका है उसके उसका जो नक्शा है जो डेमोग्राफी है उसकी उसको स्टडी करके उसमें मिल्लत का क्या रिप्रेजेंटेशन है पापुलेशन में पहले मालूम तो हो ना जब हमें मालूम ही नहीं होगा तो कैसे होगा अब मैंने इस ये सब तफसील जो है स्टडी के बेसिस की और अपनी वेबसाइट पे डाल रखी है बाकायदा फैसिलिटेट करने के लिए कि मुल्क में कौन कौन सी लोकसभा की ऐसी कास्टिट्यूएंसी है और वहां पर कितने कितने परसेंटेज है मुसलमानों के आप समझ लीजिए कि 11 तो कास्टसी ऐसी है जिसमें 51 से 68% हम उसमें से ज्यादा ज्यादातर मुसलमान सिलेलेक्ट नहीं होते हम उसकी जिम्मेदारी पूरे मुसलमान होती है तो बहाल उसमेंकि काम नहीं होता कोई हम खाली रिजल्ट आने के बाद अफसोस मलते हैं कफ वही चश्म नम जाने से काफी तो हम वो करते रहते हैं बैठे हुए पहले से सोच समझ करके हम ये नहीं करते कि भाई हम यहां पर यहां के हम वोटर हैं। यहां पर और कौन लोग वोटर है हमारा प्रॉपर रिप्रेजेंटेशन होना चाहिए। अगर नहीं हो रहा है तो उसके लिए हम लोग मिलकर के क्या करें ताकि हमारा वोट डिवाइड नहीं हो और प्रॉपर एक तो पड़े जरूर वोट दूसरी ये कि डिवाइड नहीं हो वगैरह वगैरह तो वो चीज किया जाएगा तो किसी हद तक वो इंप्रूवमेंट होने लगेगा और ये मैं आपसे सिर्फ जुबानी बात नहीं कर रहा एक्चुअली हम ये काम कर चुके हैं और बहुत कामयाबी उसके अंदर रही है दूसरा जो है वो है स्टडी ग्रुप्स बनाने होंगे जगह जगह जगह जगह स्टडी ग्रुप बनाने होंगे होंगे। उसके अंदर बाका एक कमरा देखिए अपना अपना एक कमरा देना होगा। अपने मकानों में से एक कमरा देना होगा। अदर वाइज दूसरा आसान तरीका है कि मस्जिद की जो कमेट है उसको तैयार कर लिया जाए। इमाम साहब और मोज़िन साहब को तैयार कर लिया जाए। तो मस्जिद में जो सबसे छोटा कमरा हो उसको बना दो। वो एक रीडिंग रूम एंड इनेशन सेंटर के तौर के ऊपर काम होना है। अगर कहीं मस्जिद में नहीं मिल पाए तो अपने घर के ऊपर कर लो। हम वहां से काम शुरू होना है और उसमें फिर जो मोहल्ले में बच्चे हैं जो पढ़े लिखे बच्चे पढ़े लिखे बच्चों की कमी नहीं बहुत से हजारों दों हजार की तादाद में थे 12्थ पास करने के बाद ड्रॉप आउट कर जाते हैं हम वो सबसे ज्यादा पोटेंशियल उसके अंदर है। क्यों मैं आपसे ये अर्ज कर रहा हूं काम तो हमने ज्यादातर सिविल सर्विस का अब तक किया है। लेकिन पिछले पांच छ सालों से हम इतने नतीजे पे पहुंचे 29 प्रोविंशियल पब्लिक सर्विस कमिशन है 25 हाई कोर्ट्स है ये हर साल रिक्रूटमेंट करते हैं सारे जितने आप डिस्ट्रिक्ट कोर्ट्स है ना आप चले जाइए किसी भी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में ऊंची मेज कुर्सी के ऊपर जज साहब बैठे हैं नीची मेज कुर्सी पे चार लोग और बैठे हैं उनके बगैर वो काम नहीं कर सकते जी वो जो चार लोग हैं मल्टीप्लाई बाय द नंबर ऑफ कोर्ट्स इन इंडिया तो द हजार लोग उसमें आपका प्रॉपर रिपजेंटेशन हो उसके लिए क्या कम्युनिटी करने का भी कोई काम किया कभी नहीं किया कितने ही सारे मिनिस्टरों सारे सेक्रेटरीज और सारे कलेक्टर्स और सारे एसपी और सारे ऑफिसर्स के पास हमेशा एक पीए रहता है हम पर्सनल असिस्टेंट वो भी सरकारी मुलाजिम होता है मेरे पास भी डे वन से रहा हम तो ये अब अब आपको जो मैं अब अर्ज कर रहा हूं ये बड़ा मानी आप उसको उजागर करके बताएं लोगों को कि हर साल सेंट्रल गवर्नमेंट और सारी स्टेट गवर्नमेंट एडवर्टाइजमेंट करती है कि हमें इतने पीएस चाहिए स्टेनोग्राफर्स और शॉर्ट हैंड उनको आना चाहिए स्टेनोग्राफी और शॉर्ट हैंड तो कहीं उसको स्टेनोग्राफर कहते हैं कहीं पीए कहते हैं तो जितनी वैकेंसी होती है ना उतने एप्लीकेशन नहीं आती आप सोच लीजिए जी अगर मैं और आप अपने बच्चों को जो 12th पास है उसकी कमी नहीं या पास होने वाले हैं उनको एक्सटोग्राफी और शॉर्ट हैंड का कोर्स करवा दे और उनको टेक्निकली इक्विप कर दे वो कॉमटीशन में बैठ जाए डायरेक्ट फॉरेन सिलेक्शन होगा एंड दे विल एंड अप इन अ सीनियर पोजीशन वेरी पावरफुल पोजीशन देन यू विल हैव एनी नोट्स जो से कमेट ने कहा है किकि आपका रिप्रेजेंटेशन है ही नहीं गवर्नेंस इसकी वजह जैसे आप पीछे चल रहे हैं जगह-जगह वो चीज़ आना शुरू हो जाएगी। वो चीज़ स्टडी सेंटर्स के जरिए काम होगा। ये मूवमेंट के तौर पर खामोशी से वििन द फोर कॉर्नर्स ऑफ लॉ एंड कॉन्स्टिट्यूशन ये एमावर का काम होना है। तो इस तरह के काम जो है ना ये मैंने आपसे जो अर्ज किया कि ये हमारे लेजिसलेटिव विंग में भी इम्रूवमेंट हो सकता है थ्रू पिटिकल वर्क और एडमिनिस्ट्रेटिव विंग में भी हमारा ये काम हो सकता है। स्लोली स्लोली आहिस्ता आहिस्ता करके और ये मैं आपको ये मैं आपको जो कर रहा हूं ये सब हम कर रहे हैं। बहुत दिनों से कर रहे हैं और बहुत कामयाबी एक मैं आपको मिसाल दे रहा हूं हमारा एक चलता है सेंटर तो वहां परकि सबसे बैकवर्ड है मोस्ट बैकवर्ड डिस्ट्रिक्ट में से बहराइच एक आता है उसमें भी शहर से 20 किलोमीटर दूर एक बच्चा वो वहां पांचवे तक सिर्फ पढ़ पाया उसके बाद उस वहां इस वजह से प्रॉब्लम थी कि वहां कोई स्कूल ही नहीं था छठे से तो वो फिर वहां से निकल के दूसरी किसी दूसरी जगह कहीं गया आसपास की तहसील वगैरह में वहां जब वो 12व तक पहुंचा तो उसको किसी ने बताया कि शहर में एक जकात फाउंडेशन का की फैसिलिटी है वहां हॉस्टल है रहने का फ्री खाना फ्री और कोचिंग फ्री वो आ गया वो बोला अपना बैग उठा के और उसने कहा मैं तो साहब आ गया मैंने पढ़ा था रख लिया गया उसको एडमिट कर लिया गया ये विद इन सिक्स मंथ्स एग्जाम हुआ उसकी तैयारी इतनी हो चुकी थी उसकी वो जेल वार्डन हो गया कानपुर में पहली पोस्ट 12 के बाद इस तरह से मिसाल एजुकेशनेशनल रिक्वायरमेंट की भी जरूरत नहीं है बहुत सारी पोस्ट के लिए और उसके लिए लाखों वैकेंसी फिर होती है क्लास 12थ की बेसिस के ऊपर हर साल गवर्नमेंट की डिफरेंट लेवल्स के ऊपर तो उतना तो ऑलरेडी हमारी जो कम्युनिटी है बहुत ज्यादा पढ़ भी रही है इतने लेवल तक कि आप अभी सोचे कि भ सिर्फ हायर एजुकेशन के लेवल पे पहुंच के ही ये अचीव होगा जो बहुत मखसूस जो फॉर एग्जांपल पोजीशंस है साथ-साथ ये जो सी लेवल, बी लेवल, डी लेवल जितने भी फ्रेमवर्क वहां पे भाई आप नहीं जाएंगे तो दूसरा जाएगा। जी फिर आप शिकायत करेंगे हमारे साथ जाती होती है। तो हम खाली शिकायत करने के लिए हैं। हम अपने वी डू नॉट विजुअलाइज और उसके लिए पहले से कोशिश करना तकदीर करना वो तकदीर जबकि हमारे दीन का हिस्सा है। लेकिन हम वो तकदीर ही नहीं करते। उसी तरह से तीसरी चीज ये है कि गवर्नमेंट की स्कीम्स है। सेंट्रल गवर्नमेंट के भी और स्टेट गवर्नमेंट की। वेलफेयर स्कीम्स भरी पड़ी हुई है। उनको सिस्टमेटिकली आइडेंटिफाई करना। बाय द वे सब चीजें मैं आपको बार-बार अर्ज कर रहा हूं। ये हम सब काम कर रहा है। लेकिन और लोगों को भी काम करना पड़ेगा। ये गवर्नमेंट के स्कीम्स को आइडेंटिफाई करना। वही जो हर जिले में हर कास्टिटुएंसी में जो एक रूम हो वहां कुर्सी हो कंप्यूटर हो वही ये बैठ बैठ के काम करना और स्कीम्स को आइडेंटिफाई करके डाउनलोड करके उसकी स्कीम को अगर तर्जमा करना हो तो वो कर ले और उसको फॉर्म जो स्कीम में एप्लीकेशन का फॉर्म होता है वो डाउनलोड करना प्रिंट करके अपने पास रखना और मोहल्ले में जो उसके प्रोस्पेक्टिव बेनिफिशरी हो पॉस पॉसिबल बेनिफिशरी हो उनको आइडेंटिफाई करना रीच आउट टू देम के भाई तुम ये स्कीम से फायदा उठा सकते हो लाओ तुम्हारा मैं फॉर्म भर देता हूं उसको बैठ के बुला के उसके पूछ पूछ करके उसका फॉर्म भरना दस्तखत करके उसको रजिस्ट्री कर देना बहुत कामयाबी से काम हो सकता है लेकिन हमें हम लोग बहुत इसमें पीछे चल रहे स्किल डेवलपमेंट है स्किल डेवलपमेंट में गवर्नमेंट में तो अभी तक ज्यादा अभी हुई नहीं गवर्नमेंट से लेकिन ये कि अपने को हम एमावर कर सकते हैं ना हमने अगर अपना एक ये बना लिया नजबुल कि हमने अपनी हमारे यहां ये है ये जस्टिस कमेट ने भी कहा था और ये हमारे करंट प्राइम मिनिस्टर का भी यही मोदी साहब का भी कि तालीम के साथ साथ स्किल डेवलपमेंट बड़ा जरूरी इसीलिए उन्होंने अलग से मिनिस्ट्री बनाई हम तो उसको हम अपने मिल्लत के लेवल के ऊपर भी हम उसके ऊपर वर्क करें कि जो लोग स्किल्ड है उनको रीस्किल करके और उसको जो लेटेस्ट डेवलपमेंट्स है उसी फील्ड में उससे उसको रोशनास करवा देना और प्रैक्टिस करवा देना उसके लिए बुनियादी तौर के ऊपर कुछ छोटे-छोटे इदारे कायम करके और ये एक कमरे में भी एक काम हो सकता है। कोई आजकल एआई रेवोल्यूशन आ रहा है और कोई उस पे कवरेज नहीं है। हालांकि चीजें इतनी आसान हो गई है और बेहतर हो गई है लेकिन बहुत ज्यादा फोकस कम्युनिटी का नहीं है। वो एक जो सिलसिला चल जाता है एक तरह की चीज का वो अडप्ट भी नहीं कर रहे हैं कि नई चीजें क्या आ रही है। डेटा साइंस के हवाले से विजुअलाइजेशन के हवाले से बहुत सारी चीजें हैं। इनफैक्ट अभी जो मैं आपसे उसकी बात कर रहा था इमामों की ट्रेनिंग वगैरह थी। हम वहां भी यह बड़ी जरूरी है कि जो इमाम साहिबान खुदबे देते हैं ना उनको भी लेटेस्ट टेक्नोलॉजी से दूस बड़ा जरूरी है। अगर वो होंगे तो वो उसको भी अपना पार्ट बनाएंगे। मैं आपको अ कर एक यूएस में कहीं कई साल पहले की बात है। मैं आई वास इनवाइटेड इन ए चर्च। हम वहां पर जो चर्च के पादरी साहब खुदबा दे रहे थे इतवार के दिन वो जो बोल रहे थे वो सारा ऊपर जो है स्क्रीन के ऊपर चल रहा था हम आप सोचिए अगर जुमे का खुदबा ऐसा हो कि जो इमाम देख रहा है वो सारा अगर आता रहे हैं उसमें तो तकरीर तो फिर भी ठीक है लेकिन जो अरबिक का पोर्शन है खुद का उसका ट्रांसलेशन वो किसी के समझ में नहीं आता लेकिन उसमें बड़े अच्छे पैगामात अगर स्क्रीन के ऊपर आपने स्कूल इसकी एआई की बात कही वो बिलकुल सही है और भी उसके अलावा भी इतनी स्कीमें जो मैं आपको अर्ज कर रहा हूं स्कीम टू प्रोवाइड क्वालिटी एजुकेशन इन मदरसा गवर्नमेंट ऑफ इंडिया स्कीम चलती आ रही है अक्रॉस द पिटिकल पार्टीज 1996 से कितनी पार्टी बदल गई सेंटर में वो स्कीम चलती चली आ रही है बंदी नहीं हुई आज तक लेकिन उसका बहुत कम लोगों को पता है और बहुत कम लोग उससे इस्तफादा करते हैं। देन जो मदरसे हमारे हैं मदरसों को तो मैं सलूट करता हूं, सलाम करता हूं। बेहतरीन उनका जो उनका जो वजूद है उसी की वजह से दीन का वजूद है मुल्क में बड़ा अच्छा है। लेकिन उसको हमारी आपकी जिम्मेदारी ये बनती है कि उसको और इंप्रूव करें। हम तो उसमें सच कमेट ने यह कहा था उसकी वजह से गवर्नमेंट का यह फैसला है बाकायदा और जो कि मैं ज्यादा जानता ही ना हूं कि एनआईओएस जो है ना नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ़ ओपन स्कूलिंग उसमें अपने को रजिस्टर करवा करके और उसमें अपने बच्चों को पढ़ाइए आप खुद ही जैसा पढ़ा रहे हैं वैसे ही उसी की बुनियाद पे उन्हें एनआईओएस में बिठा के क्लास 10थ और 12्थ पास करवा दीजिए उसके बाद फिर गवर्नमेंट का ये फैसला है सब है बाकायदा उसको खाली इस्तेमाल करना कि कुछ यूनिवर्सिटी में ब्रिज कोर्सेस होने चाहिए कि जो लोग इस तरह से पास हो के आए उनको ब्रिज कोर्स करवा करके उसके बाद उनका अंडर ग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में एडमिशन वगैरह ये एक मूवमेंट का हिस्सा बन सकता है। दिस इज ऑल जो सेल्फ डेवलपमेंट है। मैं आपसे कह रहा था कम्युनिटी इंटरनली सेल्फ सफिशिएंट है। अपना बहुत काम कर सकता है। तो और अब हमने एक दूसरा तजुर्बा किया जो एक तरबियत जो मिल्लत की तरबियत जनरेशन आफ्टर जनरेशन तरबियत एक तो जुमे के खुदबे के जरिए तरबियत हो सकती है बाकी अगर आप गौर करें तो अल्लामा इकबाल की जितनी शायरी है ना वो शायरी है ही नहीं वो तो सारा बिल्कुल बिलकुल एक तरह से कोड ऑफ कंडक्ट है कि ये करना है ये नहीं करना कुरान हदीस की रोशनी में तो उसको आगे बढ़ाने के लिए हमने एक कायम कर रखी है अखबार एकडमी इंडिया उसके प्रोग्राम भी होते रहते हैं। उसकी वेबसाइट भी अलग है इंडिया. और उसके तीन महीने तो रिसाले भी निकलते रहते हैं और नौजवानों को जोड़ने की कोशिश रहती है। ये मूवमेंट भी जगह-जगह चलने की जरूरत है। क्योंकि बनी बनाई चीज एक मौजूद है बिल्कुल आपके पास। हम तो उसके ऊपर हमने कॉफी टेबल बुक भी बनाई है। इसका टाइटल है जहान मकाफात हम उसमें सारे एक पेज के ऊपर एक ही शेर है और उसका उसका डिफरेंट जबानों में तर्जिमे और जो डिपिक्ट करते हुए उसकी तस्वीर है वो भी वहां देखने में अच्छी भी लगे ड्राइंग रूम में रखी है कॉफी टेबल बुक कहीं से भी खोल के पढ़ ले यार तो आदमी ज़हन में बैठ जाता है। वो छोटे-छोटे उसके वो बना के स्टिकर्स बना के वो भी आप लगा सकते हैं। जैसे एलिवेटर में लगा दिया, लिफ्ट में लगा दिया, कहीं जीने पे लगा दिया तो चलते बच्चा देख रहा है। उसको कुछ समझ रहा है। अपने घरों में लगा लिया कहीं और बताऊं मैं आपको मेरी पोस्टिंग थी आगरा में 2003 चार तो उस वक्त तो ताजमहल से जाहिर है ज्यादा देखने का मौका मिला। हम तो फिर यह हुआ कि मैंने आया नहीं आ तौर से लोग ताजमल को खाली ये सोचते हैं सोर्स ऑफ़ ड्यूटी हम या या इट्स अ रिमाइंडर ऑफ़ लव हम लेकिन ताजमहल की एक तीसरी खूबी है और वो ये है कि इट इज अ व्हीकल टू कैरी गॉड्स मैसेज डिवाइन मैसेज टू ह्यूमैनिटी हम उसके ऊपर जो कुछ लिखा हुआ है हम उसकी स्टडी 10 साल तक हमने की हम तो अंदाजा ही हुआ कि ये तो किसी को नापसंद कोई पैगाम ना आए इसका कोई सवाल ही नहीं। बेहतरीन पैगामात उसके अंदर तो हमने एक किताब कॉफी टेबल बुक ताजमहल स्पिरिचुअल मिस्टे अच्छा हम कॉफी उसी जमाने में अभी कब ये अभी 10 साल हो गए 10 साल हो गए यहां इस्लामिक सेंटर में भी उसको हमने रिलीज किया था और मुल्क के बाहर की जगह न्यूयॉर्क में भी रिलीज हुई वहां इंडिया के जो रिप्रेजेंटेटिव हैं काउंसिल फॉर सेक्रेटरी उन्होंने रिलीज किया उसको वगैरह इस तरह से है वो तो एक और भी बड़ा पॉसिबिलिटी है जो काम अच्छा हो सकता है आप गौर करिएगा वो ये है कि हज जो आदमी करता है तो जाहिर है सऊदी अरब का भी रूल है ये कि जिस मुल्क में जितने मुस्लिम पापुलेशन है उसका 1% आ सकता है मैच के लिए अच्छा ये रूल ठीक है जाहिर है वहां तो लिमिटेड है ऐसा तो हो नहीं सकता कि पूरी पूरे मुसलमान पूरे दुनिया के चले आ रहे हैं सब चल जाएगा कि कोटा बनाया गया कोटा बनाया लेकिन उसकी वजह से और ये अल्लाह का भी निजाम है ऐसा नहीं है कि हर मुसलमान हज कर ही लेगा हम ये ना जरूरत है उसकी मैंडेट भी नहीं है मैंडेट ये है कि अगर आपके पास रुपया पैसा इतना है कि आप हज कर सकते हैं बचत है आपके पास और दूसरे आपकी सेहत भी इजाजत दे रही है तभी आपके ऊपर हर्ज फर्ज है वरना आपके ऊपर हज फर्ज है ही वो मैंडेट लेकिन बहरहाल जो लोग हज करने के मैंडेटेड है वो और जो नहीं भी है वो हर साल अप्लाई करते हैं हज कमेट ऑफ इंडिया को कि मैं हज कर लूं हम लेकिन उसमें से बहुत कम लोग हज कर पाते हैं उनका भी लिमिटेड कोटा है जी है ना लेकिन ये कि वो जिन लोग जो लोग अप्लाई कर रहे हैं उनके पास पैसा तो है ना जी तभी तो हज के लिए अप्लाई कर रहे हैं कुछ लोग यह है कि मैं आज से आठ साल के बाद हज करूंगा, पांच साल के बाद हज करूंगा, पैसे जमा कर रहे हैं। तो जो पैसा जमा है जो कि हज के लिए इस्तेमाल नहीं हो रहा है किसी भी साल में। उसको अगर आप जोड़े तो बिलियंस बनता है। 10्स ऑफ़ बिलियंस जो कि स्टैटिक पैसा है वो इस्तेमाल नहीं हो रहा। हमारा एक कांसेप्ट है एक प्रोजेक्ट है फाउंडेशन ऑफ इंडिया का उसका नाम है हज फंड ऑफ इंडिया हम उसका एक बेसिक बात यह है कि साहब आप ने जो कुछ पैसा आपने जमा किया है हज के लिए उसमें से आप थाउजेंड या उसके मल्टीपल्स में आपका अकाउंट हम खोल लेते हैं अपने पास फाउंडेशन में वो पैसा आप जमा कर दीजिए हमारे उसकी मिल गई और आप जब कहेंगे तो आपको पैसा आपको वापस इतना वो जो मनी है वो एक्टिविटीज में लग जाएगा और उससे देखिए कितने ही रिक्शे वाले ऐसे हैं जिनका रिक्शा अपना नहीं है। वो रिक्शा किसी दूसरे का है। जिसने उसको फाइनेंस कर रखा है। तो विचित्र पैसे दिन भर कमाता है। उसमें से थोड़े पैसे उसको अच्छे खासे देने पड़ जाते हैं शाम को दूसरे को। वो रिक्शा अगर उसका हो जाए तो वो भी पैसे उसको मिलने लगेंगे। हम तो वो एक जो हज का पैसा है आपको उसकी बरकत में इजाफा हो जाएगा। जब भी आप हज करेंगे तो आपको पैसा आपको वापस मिल जाएगा। नो प्रॉब्लम। वो कैसे वो रिकवरी कैसे होगी आपकी? मतलब किससे रिकवरी? फॉर एग्जांपल जो आप पैसा स्पेंड भी करेंगे। मान लीजिए मैंने आपको ₹1000 दिया तो आप उसको स्पेंड करेंगे तो जब आपको मुझे वापस देने की जरूरत होगी। ₹1000 आपके पास होने चाहिए। हां। देखिए इसमें तो इसी तजीम का फायदा है। तंजीम का जैसे जकारात फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया ऑलरेडी चल रही है। उसमें तमाम प्रोजेक्ट चल रहे हैं। और ये भी मैं आपको बता दूं मैंने आपसे अभी अ किया था कि हमारा मोटो है शुरू गड हेल्प्स दोज़ हु हेल्प ह कॉल्स। तो कभी कोई प्रॉब्लम आई नहीं। अल्लाह का शुक्र है। नए-ए हम प्रोजेक्ट शुरू करते हैं। बरकतों से हमेशा भरा रहता है। अल्हम्दुलिल्लाह। तो लिहाजा यह एक आइसोलेटेड कोई प्रोजेक्ट नहीं है। यह ऐसा नहीं है कि बस यही एक प्रोजेक्ट चल रहा है और उसमें पैसा आया उसको कैसे वापस करेंगे? तो उसमें वापसी के पैसे की के लिए तमाम सा पैडिंग मौजूद है। दूसरी चीज मैं आपको ये बताऊं कि पूरे हिंदुस्तान में जो ये छोटे-छोटे चल रही है। जगह जगह प्रोजेक्ट चल रहे हैं। जिससे मैं मैं भी अच्छी तरह वाकिफ हूं। जहां पर माइक्रो फाइनेंसिंग जी के प्रोजेक्ट चल रहे हैं उसमें रिकवरी का सक्सेस रेट 9095% से ज्यादा है। जी जी सब जगह क्योंकि छोटा-छोटा थोड़ा थोड़ा अमाउंट दिया जाता है। वो सब जानते हैं कि अल्लाह की खुशनदी के लिए हमें दिया गया है वो उसमें कोई रिकवरी में कोई प्रॉब्लम नहीं आती। लेकिन अगर आए भी कहीं तब भी क्योंकि देयर इज हज पैडिंग अवेलेबल जो कि जो लोग फाउंडेशन को अपने पैसे दे रहे हैं क्या तो वो जानते हैं कि अच्छे कामों में ही लगाएंगे तो उसका सब हर चीज मौजूद रहती है उसका हिसाब किताब मौजूद रहता है एवरीथिंग इन पब्लिक डोमेन तो उसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है उसके वजह से लेकिन ये कि ये एक एक सोर्स ऑफ एक फंड हो जाएगा जिसको इस्तेमाल करके एक मैसिव मोबिलाइजेशन हो सकता है और ये डोरमेंट ये स्टैटिक मनी है। वैसे भी वेलोसिटी होनी चाहिए। मूव करना चाहिए मनी वैसे भी जो ओरिजिनल का्सप्ट है इस्लाम की स्पिरिट के खिलाफ क्या ये बहुत अच्छा काम है जो कि हो सकता है। देन जो अभी मैं आपसे अ कर रहा था कि कुरान को लोग समझते नहीं। उसके लिए भी कोशिश हम करते रहते हैं। एक डॉक्टर फस उस्मान साहब थे। अल्लाह उनको गरीब रहमत करे। वो उसके अला यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमरिटस इजिप्ट बाद में फिर वो अमेरिका चले गए कैलिफोर्निया में वहां उन्होंने ये उमर अल खब इंस्टट्यूट ऑफ़ इस्लामिक कानिंग कायम किया हम बहुत किताबें उन्होंने पब्लिश की और बहुत अच्छे उनकी एक किताब है कॉनसेप्ट्स ऑफ़ द कुरान अच्छा हां बहुत थे बहुत उम्दा मैं उसको रिकमेंड करता हूं कि मैं उसकी कॉपी मंगा करके उसकी कर भी लेता हूं। प्रोवाइड भी करता हूं। का क्या नाम है? फतेह उस्मान फतेह उस्मान एफ ए टी एच आई फ उस्मान तो उसकी उनकी जो किताब है कासेप्ट ऑफ़ द कुरान वो बहुत बेहतरीन अभी जो मैं आपसे अ कर रहा था मैंने वही से लिया। वो कहते हैं कि अगर तुम अपने तुम नेक बंदे हो तुम समझते हो अल्लाह के तुम अपने को बहुत नेक बंदे हो। उसकी वजह यह है कि तुम पांच वक्त मस्जिद नमाज पढ़ते हो तो जान लो कि तुम्हारी नमाज की अहमियत इससे तय होती है अल्लाह के नजदीक दो नमाजों के बीच में जब तुम मस्जिद से बाहर होते हो तो क्या करते हो उससे तय होती है नमाज की अहमियत तो वो इस तरह की बहुत अच्छी-अच्छी बातें उसके अंदर लिखी हुई तो वो उसको हमने लेकर के उसका तर्जमा कर दिया उर्दू में कुरान के तसवुरात पांच जिलों में और वो भी अपने वेबसाइट के ऊपर डाल दिया है तो तरह-तरह से मिल्लत को एमावर करके और उनको फ्रॉड करके कि भाई आप बहुत कुछ कर सकते हैं जो कि आपका मैंडेट है आप पैदा होने से पहले अल्लाह से वादा करके आए रब तो उसका उसकी पासदारी रखने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। एवरीबडी इज एबल टू डू सो मच ऑफ़ वन। मैं अभी आपसे कह रहा था कि करने को बहुत कुछ है। वो लोगों को असल में एक जो बड़ा चैलेंज आता है सर मैंने ये देखा है कि हमारी जनरेशन हो पुराने जनरेशन हो वो क्योंकि विज़िबल रोड मैप नहीं होता कि आप अपनी एनर्जी को किस तरह मोबिलाइज करें। तो अक्सर इंसान की ये सोच में निकल जाता है कि मैं करूंगा। मैं ये करना चाहता हूं। बट कुछ जब रेडीमेड सशंस होते हैं और जब उसमें एक तरीके की क्रेडिबिलिटी होती है कि भ हां दिस मनी या दिस एनर्जी विल बी यूटिलाइज्ड इन अ बेटर वे तो वो शायद अभी भी लोगों को गैप है कि देयर आर नॉट इनफ इंस्टीटश देयर आर इंस्टीटश देयर आर पीपल वर्किंग बट इतनी बड़ी पपुलेशन है और इतना एक्सपेंसेस है कि उतने नहीं है शायद जितने होने चाहिए। हां वो तो हमेशा ऐसे ही रहेगा लेकिन ये कि एवरीबडी हर एक को इंफरादी तौर पे खुद मुतमाइन होना कि मैं अल्लाह को अच्छा जवाब दे सकता हूं कि नहीं दे सकता और आजकल के जो थोड़ा सा चैलेंजिंग हालात है ना तो वो अच्छा मौका है मैं समझता हूं उसको अच्छा मौका थोड़ा सा रिट्रीट करके जबरदस्ती जबरदस्ती अपने को अननेसेसरीली पब्लिक उसमें काम करते रहो चुपचाप खामोशी से अपना अंदर से अपने को मजबूत करने की कोशिश करनी चाहिए। साथ साथ ये भी मैं आपके जरिए पैगाम देना चाहूंगा कि बाकायदा प्रोजेक्ट बना के अहले वतन हम के साथ अच्छे ताल्लुकात पैदा करने की प्रोएक्टिव कोशिश कर वो जो आपका हार्मोनी पे काम है उसके हवाले से आप इसको जरा थोड़ा और उसी के लिए हमने ये किया कि एक वो तो 2000 पांच में ही बना दी थी लेकिन जाहिर है वो 2005 में क्यों आपको ये जरूरत महसूस हुई? क्यों सोचा? वो तो ऐसा तो नहीं होता है कि जब जरूरत महसूस हो तभी कर दे आदमी। लेकिन ये कि कभी कुछ ना कुछ जैसे आपको बताया जकात फाउंडेशन ज़हन में था कि बनाना है कुछ करना है तो इसरार अहमद साहब आ गए तो बहुत मौका हो गया तो उसी तरह से एक साहब और भी एक आ गए थे। उन्होंने बना कर रखा है कि अपना नाम हमारा नाम ना ले। हम तो उन्होंने कहा ऐसी बात है उसमें काम होना चाहिए तो ठीक है तो हमने इंटरफेस कोशन फॉर पीस कायम किया उसमें हर सतह के ऊपर हर जो मेजर कम्युनिटीज है इंडिया की हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई चारों रिप्रेजेंटेड है और भी सारे है लेकिन ये चारों तो खुसूसन हर हर लेवल के ऊपर रिपजेंटेड है उसके करीब 24 सूबों में उसके काम भी इस तरीके पर होते रहते हैं उसका मेन काम यह है कि जो कॉमनटी है एक इंसानियत के तकाजे के तौर के ऊपर सारे मजहब में कॉमन तो बहुत है अब वो किसी मजहब की किसी किताब में किसी मैंडेट में कहीं कुछ डीजनरेशन आ गया वो बात अलग हो लेकिन कॉमनलिटी तो है तो ये तो हमारा ही दीन कहता है कि हर इंसान ओरिजिनली जो है वो उसकी फितरत बहुत अच्छी है और वो खूब अच्छी तरह जानता है। बाकी ये है कि कुछ की जो है डोरमेंट हो जाती है। उसको ठीक करना है अपने कोशिश कर करा तो उसको हमें कॉमनलिटीज के ऊपर जोर दे के और ये करना है कि आप उसकी मिलकर के काम करें उसमें जो खाली ये नहीं जबानी काम कि हमारे दीन में ये लिखा है। आपके दीन में ये लिखा है और ये कॉमन है और चलो ठीक वो भी अच्छा है। लेकिन उसको प्रैक्टिकल शेप देने के लिए एक क्रिश्चियनिटी का एक कासेप्ट है वो है प्रैक्टिस कहते हैं इसको पी आर ए एक्स आई एस जमीनी सतह के ऊपर काम करना दूसरों की मदद करने के लिए तो जो प्रैक्टिस के काम है जैसे ये एमावरमेंट का काम है एकमिया में प्रैक्टिस को बोलते हैं कि थ्यरी जमीन पे जब उतरती है तब वो प्रैक्टिस [हंसी] तो ये ये हम वहां उसका इस्तेमाल करके और उसको करने की कोशिश करते हैं। उसके लिए उसके लिए लोग बात आगे तक पहुंचाना उसमें ये भी करते हैं। जैसे जैसे कुछ ऐसे कासेप्ट्स है जो कि कॉमन है हर मजहब के अंदर फास्टिंग है। रोजा रखना तरह तरह से लोग व्रत रखते हैं, रोजा रखते हैं। वो किसी ना किसी हद तक वो अपने को दूर रखते हैं खाने पीने से कुछ दिनों कुछ देर के लिए किसी तरह से तो उसमें क्या-क्या प्रैक्टिससेस है आपस में कंपेयर करना एक नमाज और और वो है योगा योगा उनको उसमें भी काफी कंपैरिजन बहुत सी चीजें कॉमन है इसके जी जी लेकिन ये कि कंपैरिजन उसमें करना और कंस्ट्रक्टिव कंपैरिजन कंस्ट्रक्टिव बहुत तो इस तरह की चीजों करके प्लस जो जो वो है रिलीजियस प्लेसेस उनका इस्तेमाल इंक्लूडिंग मसाजिद इंक्लूडिंग खानका और दूसरे मजहब के जो है उनका भी इस्तेमाल जो है वो सोशल प्रोग्रेस को मजबूत बनाने के लिए और फरवर देने के लिए उसको करना तो हमने जैसे जामा मस्जिद दिल्ली जामा मस्जिद में एक इवेंट किया था उसमें सब मजहब के लोग आए थे। अच्छा हां तो फिर रमजान में ही गया था तो इफ्तार पे ही खत्म हुआ तो उसमें एक दूसरे की बात समझी भी और एक दूसरे जगह में दिल में जगह भी पैदा होती है उसकी वजह से तो ये ये कोशिश जिसकी वजह से जो है देन इसमें जो फील्ड और है वो है अभी आपने भी जिक्र किया था शुरू में कि एक्सटेंडेड फैमिली कि जो जनरल कासेप्ट है समाज में अक्रॉस द फथ्स वो यह है कि जो न्यूक्लियर फैमिली है दैट इज द यूनिट ऑफ़ सोसाइटी हम लेकिन मेरी जो अंडरस्टैंडिंग है जकात फाउंडेशन के तालुक से और हम सब लोगों की वो ये है और इंटरफ के से भी कि इस्लाम के हिसाब से जो न्यूक्लियर फैमिली है दैट्स नॉट द बेसिक यूनिट ऑफ सोसाइटी चैलेंजिंग वहां एक चैलेंज दिया गया है कि जो एक्सटेंडेड फैमिली है यानी कि मुझसे जितने भी लोग जुड़े हैं खून के रिश्ते से या शादी के रिश्ते से वो सब लोग मेरे एक्सटेंडेड फैमिली होंगे तो मेरा एक अंदाजा ये है कि करीब 8085 लोग हर आदमी के साथ जुड़े होते हैं जिसकी शादी हो चुकी है तो उनमें सब लोग बराबर के नहीं होते ये मैं आपसे कह रहा था ना कि मिल्लत अंदरूनी तौर पर खुद कपील है हर एक्सटेंडेड फैमिली भी अंदरूनी तौर पे खुद का अपील होती है। जी उसमें कुछ लोग ऊंचे होते हैं, कुछ लोग बहुत नीचे हैं। तो ऊंचे वालों को लोग सिर्फ पैसे पैसे से नहीं तरह से तालीम के ऐतबार से भी तो नीचे वालों को उठा के ऊपर तक ले आना। ये एक बेसिक मैंडेट काम हो सकता है। कम्युनिटी के लेवल के ऊपर। दूसरा है नेबरहुड पड़ोस। उसके बारे में आप देखिए कितने जबरदस्त अहकामात है। इनफ इन दोनों टॉपिक्स के ऊपर हमारे मज़ामीन मेरे अपने मज़ामीन जो है 111 लैंग्वेज में वेबसाइट के ऊपर मौजूद है। हां इसी काम के लिए ताकि लोगों तक बात पहुंचे और उसको किसी तरह से इस्तेमाल करके और अपने को और और मिल्लत को बेहतर बनाने की कोशिश करते रहे। हम तो बहुत सी चीजें मुमकिन है लेकिन ये कि और जो ये जो हालात है जिसकी रोशनी में खासतौर से गुफ्तगू हो रही है वो उसके लिए अल्लामा इकबाल का एक शेर है कि शो नमरूद है रोशन जमाने में तो क्या शोले नमरूद समझ गए हजरत इब्राहिम सलाम लेकिन उस उससे उसके चैलेंज को कबूल करके अपने अपने वजूद का पूरा इस्तेमाल करके और अपने को और मिल्लत को आगे बढ़ाते रह। एक आखरी सवाल कि क्योंकि जो आपने लास्ट बात बोली स्टेट का एक कॉन्टेक्स्ट है आज की डेट कि हमारी जो पोस्ट सच कमेट जो अपलिफ्टमेंट की तरफ चीजें बढ़ी चाहे वो स्टेट के लेवल पे हो स्कॉलरशिप्स हो माइनॉरिटी कमीशन के हवाले से चीजें हो या फिर जो एक्टिविटीज शुरू हुई जैसा आप लोगों ने शुरू करी बहुत सारी चीजें हैं। तो अह जिस तरह से अह यू नो अह प्रेजेंट गवर्नमेंट वर्क कर रही है कि वो नए इनिशिएटिव्स इस तरह के वजूद में भी नहीं आ पा रहे हैं। तो जिन लोगों ने शुरू कर दिया है जो इस तरह से फंक्शन करते थे। लेकिन जो नई जनरेशन है वो कहीं ना कहीं उससे जुड़ी हुई नहीं है उन चीजों से। एक लेवल तक तो जुड़ी रहती है कि जैसे आपने बोला कि आपकी एक्सटेंडेड फैमिली या लोग हैं जो जानते हैं एक सर्कल तो होता है लेकिन जो नया प्रोडक्शन हो रहा है नए लोग आ रहे हैं नए उसमें आ रहे हैं वो कई बार जिस तरह का माहौल है वो कहीं ना कहीं उससे अपने आप को हिलादा यूनिवर्सिटीज में भी अगर आ रहे हैं दूसरी जगह पे भी आ रहे हैं तो जो सेंस ऑफ़ कम्युनिटी है और बिलोंगिंग है वो काफी रिसीड हो चुकी है और इस सब के कॉन्टेक्स्ट में अगर आज आप देखें अपने आपको आपने एक 30 साल सर्विस में दिए 30 साल आपकी की एक्टिव लाइफ है जो इस तरह के इशज़ में जो एज एन इंडिविजुअल एज ए कम्युनिटी पर्सन नॉट जस्ट डिपेंडेंट ऑन द गवर्नमेंट आपने अपनी एक्टिविटीज करी आज अगर आप अपने आप को देखें और आप अगर अपने आप शुरुआत करते होते व्हाट इज द मैसेज टुडे क्योंकि कंडीशंस डिफरेंट है मतलब एक तरीके से अगर मैं क्योंकि 93 बॉर्न हूं और मैंने जिस तरह का हिंदुस्तान देखा है दो तरीके का देखा है अपनी जवानी में एक वो के जहां पे मैं कॉन्फिडेंट सहारनपुर में मुसलमान अच्छे खासे ये भी है कि उनके पास जमीन जायदाद भी है। अच्छे स्कूल्स में भी पढ़ रहे हैं। हालांकि हर जगह हर तरह का इंसान होता है। और हमारे जो रिश्ते हैं वो नॉन मुस्लिम्स से बहुत अच्छे हैं। मेरे दोस्त हैं जो सिख हैं ये हैं हिंदू हैं, पंजाबी हैं। उसमें भी सारी चीजों का घर आना जाना है। और एक कॉन्फिडेंट इंसान की तरह रिलेशनशिप है कि एज अ मुस्लिम कभी मुझे ये सोचने की या मुझे ये महसूस नहीं हुआ कि मैं किसी से नीचे हूं। बल्कि कई बार ऐसा हुआ कि हम लोग अच्छे परफॉर्म कर रहे हैं तो लोग हमें बड़े हाई रिगार्ड में देख रहे हैं। बट वो रियलिटी तब्दील हो चुकी है। आप फिर हम हमारे अब जो जेंजी जिसे कहा जा रहा है या फिर लेट मिलेनियल्स हैं वो जिस हिंदुस्तान में उन्होंने अपने आप को पाया या जिस एक्सपीरियंस से वो गुजरे वो सेम कॉन्फिडेंस वो सेम इंटरेक्शंस वो सेम कम्युनल फीलिंग्स नहीं है। तो आज की डेट में किस तरह से इस नई जनरेशन को क्योंकि मेरा जो अपना एक्सपीरियंस है इन द मिड ऑफ ऑल ऑफ दिस आई सी देयर इज अ गैप तो ये एक गैप बन रहा है पपुलेशन बढ़ रही है नए लोग आ रहे हैं पुराने लोग जा रहे हैं सिस्टम्स इन प्ले है लेकिन वो डायनेमि शायद जिससे नई जनरेशन जुड़ सके तो क्या करना चाहिए क्या हमारा इस रोड मैप के अलावा क्योंकि ये तो ब्रॉडर विज़न है मतलब यह तो एक्टिविटी होनी ही है इनके थ्रू होना है। लेकिन अगर आज आप मैसेज देना चाहे यंगर जनरेशन को व्हाट इज व्हाट इज यू नो फ्यू थिंग्स दैट दे नीड टू डू जो यूनिवर्सिटीज में है जो अभी पढ़ रहे हैं वो क्या उनको अपनी साइकोलॉजिकल ओरिएंटेशन करनी चाहिए किस तरह की एक्टिविटीज डे टू डे करनी चाहिए टू मेक देमसेल्व्स अ बेटर पर्सन बेटर मुस्लिम एंड बेटर कंट्रीब्यूटर टू सोसाइटी देखिए एक तो ये कि अल्लाह का पैगाम भी यही है कि अपने को पहचानना बड़ा जरूरी है कि मैं इस दुनिया में क्यों लाया गया जी है ना और कोई मैंडेट होगा तभी मैं लाया गया हूं उस मैंडेट को ज़हन में रख के समझना पहले तो बहुत कम लोग समझने की कोशिश मैंने भी नहीं की थी उस उम्र में जिस उम्र की आप बात कर रहे हैं लेकिन ये कि आप ये बात पूछ रहे हैं और लोगों तक पहुंच जाए तो अच्छी बात है ये कि अपना अपने वजूद को पहचानना और ये कि हम हमारा वजूद क्यों हुआ? दूसरी बात ये कि अगर वजूद है तो हमारे क्या कैपेसिटी है? उस कैपेसिटी को पहचान और उस कैपेसिटी का इस्तेमाल करना अपने लिए भी और समाज के लिए भी। ये अगर उसके ऊपर हर नौजवान कोशिश करने लगे। जाहिर है आजकल तो हर चीज फिंगर टिप्स में मौजूद है तो उसमें स्टडी कर सकता है किसी भी दीनी किताब को पढ़ ले या किसी फिलोसफिकल बुक को पढ़ ले सोच उसको समझे पढ़ ले स्टडी कर ले उसके बाद खुद उसमें नतीजा करें कि क्या मैंडेट है हमें हम क्यों लाए गए हैं दुनिया में और उसकी और हमें हमारी क्या कैपेसिटीज है हम और उस कैपेसिटी का इस्तेमाल करके मैं किस हद तक अपने जरिए जरिया बन सकता हूं समाज को ऊंचा उठाने के लिए उसको बेहतर समाज बनाने के लिए उसके लिए मेरी क्या कंट्रीब्यूशन मेरा क्या हो सकता है इकबाल का खुद ही का जो तसवुर है कि खुद ही का जो उनका पूरा फलसफा है उससे ज्यादा वो है कि वो तू अगर मेरा नहीं बनता ना बन अपना तो बन तू बन ये अल्लाह कह तुम ठीक है मेरे नहीं बन रहे हो लेकिन अपने तो बनो कम से कम अपने को पहचानो और तुम बहुत कुछ हो तो उस इस कॉन्टेक्स्ट में मैं आपको एक तरफ और ले चलता हूं वो ये है कि अगर आप इसे एक जेनेरिक बात है क्योंकि उसी रोशनी में आप बात कर रहे हैं वो ये कि अगर आप देख तो पूरी दुनिया में जो पूरी दुनिया की जो पापुलेशन है जो पूरी दुनिया की जो डेमोग्राफी उसको अगर आप गौर करें तो सात तरह के लेवल्स हैं, यूनिट्स हैं। उसमें सबसे नीचे आता है विलेज गांव। उसके ऊपर आइए तो कस्बा आ जाता है या टाउनशिप आ गई। ये उसके ऊपर आइए तो एक डिस्ट्रिक्ट आ गया। उसके ऊपर आइए तो रीजन आ गया। उसके ऊपर आइए तो सूबा आ गया। हम उसके ऊपर पढ़िए तो मुल्क आ गया और उसके ऊपर पढ़िए तो कॉन्टिनेंट आ गया। हम ये सात तरह के वो है यूनिट्स जिसके जरिए जिसका पपस सिर्फ ये है कि इंसान की लाइफ को किस तरह से बेहतर बनाया जाए। फैसिलिटेट किया जाए कि उसकी जिंदगी अच्छी गुजर जाए। अच्छी से अच्छी गुजर जाए। सब फैसिलिटेटरी मैकेनिज्म है सब। हम अगर आप और करें तो इसमें से छह यूनिट्स जो है ना वह अपना फर्ज किसी ना किसी हद तक पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं और होता है कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन एक लेवल ऐसा है जिसमें किबन वो डगरस हो गए अपने बेसिक मैंडेट से और उसमें बड़े इंप्रूवमेंट की जरूरत है और वो है मुल्क पढ़ स्टेट मुल्क स्टेट नहीं मुल्क स्टेट तो हो गया प्रोविंस ऑफ नहीं मतलब स्टेट हम लोग पिटिकल साइंस तो ये जो मुल्क है इसके इसको तो यह पहली चीज़ इसको रियलाइज़ करना। यह भी नौजवानों को रियलाइज़ करना चाहिए। हम इसको गौर करें कि वो अपनी अपना मैंडेट क्यों क्रॉस कर गया वो लेवल उसमें तरहतरह की कमियां क्यों है आज के जमाने में? पूरी दुनिया से आप देख लीजिए सब जगह यही हाल है। पूरी दुनिया आजकल ट्रंप साहब क्या कर रहे हैं? है ना? वो अपने टू इंडिया नहीं है। इंडिया के लिए यूनिक नहीं है। इस वक्त ये पूरी दुनिया पूरी दुनिया में ऐसे ही है। लेकिन ये कि हर हर हर शख्स जो है सिर्फ अपने मुल्क का बाशिंदा नहीं है। बल्कि वर्ल्ड सिटीजन भी है हर आदमी। दुनिया तो एक है। तो उसकी रोशनी में कम से कम इस बात को रियलाइज करना और सोचना और उसके बाद उसमें बारे में ये सोचना कि इस सिचुएशन को कैसे इंप्रूव किया जाए। कम से कम रियलाइजेशन की स्टेज तो आनी चाहिए ना। अभी तक रियलाइजेशन की स्टेज भी नहीं है उस लेवल के ऊपर। तो ये जो अपकमिंग जनरेशन है उसको ये ये पैगाम आप मेरी तरफ से दें कि वो इसके ऊपर भी गौर करें और उसको देखे कि भाई ठीक है आज मैं बहुत यंग हूं। आज से 60 70 साल के बाद 80 साल के बाद मुझे दुनिया से निकल जाना है। तो उस दौरान मैं इसको इस सिचुएशन को कैसे इंप्रूव करके जाऊं। हम ये मेरे ख्याल में एक अगर गौर किया जाए इसके ऊपर तो उसमें बड़ा मैंने इस सिलसिले में जब जो बाइडन साहब वो बने थे प्रेसिडेंट तो उनको एक खत लिखा था। अच्छा वो हमारी वेबसाइट पर भी पड़ा हुआ है। इसीलिए लिखा था मैंने कहा भाई आप जो है सबसे एज वाइज सबसे सीनियर प्रेसिडेंट अब तक बने हैं यूएसए के। अब यूएसए के प्रेसिडेंट जो है दुनिया में एक मुकाम रखता है। तो इस बात पे आप भी गौर करिए। कि भाई इस सिचुएशन को इम्रूव करने के लिए क्या किया जा सकता है? इसलिए इवन स्टेट जो है ना ओनली फैसिलिटेटरी मैकेनिज्म फॉर ह्यूमैनिटी यूनाइटेड नेशंस का जो मैंडेट है वो भी ये कहता है कि उसमें इंडिविजुअल डिग्निटी जो है ना दैट इज सुपरमोशन। हालांकि वह यूनाइटेड नेशंस कहला रहा है। लेकिन उसका जो बेसिक मैंडेट है वह इंडिविजुअल डिग्निटी को मेंटेन करने के हम तो इंडिविजुअल डिग्निटी को मेंटेन करने के ताल्लुक से इस पे बड़े गौर करने की जरूरत है कि इफ कभी-कभी मैं सिविल सर्विज के मॉक इंटरव्यूज में भी सवाल पूछता हूं कि अगर कोई मौका कभी ऐसा आ जाए व्हेन यू सी दैट देयर इज अ क्लैश ऑफ बिटवीन ए क्लश बिटवीन अह नेशनल इंटरेस्ट एंड ह्यूमन इंटरेस्ट देन अकॉर्डिंग टू यू वि वन शुड प्रिवेंट आई थिंक मैं उसका जवाब नहीं दूंगा। यह क्वेश्चन मैं आपके जरिए जो है वो छोड़ देता हूं नौजवानों के ऊपर उसको गौर करने के लिए कि इसके उसका जवाब क्या होना चाहिए और उसकी रोशनी में क्या आज के समाज में इम्रूवमेंट करने के लिए हमें खुद कोशिश [गला साफ़ करने की आवाज़] करनी चाहिए इंडिविजुअली तो बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहब आपसे फिर से बात हुई मुलाकात हुई हमेशा की तरह बहुत कुछ जानने को मिला पिछली बार हम लोगों ने जब वफ का पूरा बिल आया था तो आपसे पहला एपिसोड किया था हमने ने 12 के करीब उस पे एक्सप्लेनर्स और पडकास्ट किए। उसमें आपका सबसे पहला था और डाटा के हवाले से बहुत ज्यादा गहरा था और इस बार हमें यह समझने का मौका मिला कि आपका जो अपना लिव्ड एक्सपीरियंस है एस एन ऑफिसर आपने जो चीजें देखी है एस अ मुस्लिम जो आपने चीजें देखी एज अ सिटीजन जो आप चीजें देख रहे हैं और उसमें ये के एक जैसे एजेंसी बेस्ड आप किस तरह से चीजों को एक्ट कर सकते हैं रादर देन पैसिवली सब चीजों को देखें उसको बयान करें वो डायग्नोसिस फॉर द पर्पस ऑफ़ चेंज डायग्नोसिस नॉट जस्ट फॉर द पर्पस ऑफ़ डिस्कशन। तो उसके लिए बहुत अच्छी चीज ये है कि आपने हर वो चीज जो समझी कि जरूरी है उसको इदारा उसके अराउंड कायम किया। एक सिस्टम कायम किया। एक मैकेनिज्म कायम किया कि जिससे वो ऑपरेशनलाइज हो सके। वो प्रैक्टिस की जो हम बात कर रहे थे कि वो सिर्फ थ्यरी ना रह जाए। वो प्रैक्टिस पे आए तो मंजरेआम पे आए तो लोग या तो उसी से जुड़ जाए या उसको एक मिसाल बना के अपने आप भी उस तरह की चीजें कर सकें। तो मेरा तो यही मैसेज रहेगा इस गुफ्तगू के बाद के एक जो चीज मुझे एस एन इंडिविजुअल लगती है कि जानने की जरूरत है क्या काम हुए हैं क्या काम हो रहे हैं जुड़े अगर जुड़ नहीं सकते तो उसको समझ के अपने लेवल पे करें और बेहतर जो आपने लास्ट में बोला कि इंडिविजुअल एजेंसी की बहुत जरूरत है कि सिर्फ बैठे ना रहें आईन और दस्तूर के नजरिए और उसकी लिमिट्स को सामने रखते हुए उसकी जो एमावरिंग नेचर है उसको सामने रखते हुए अपने आप को इनेबल करें। तो बहुत शुक्रिया डॉक्टर साहब आपसे हम आगे भी इस तरह की डिस्कशन करते रहेंगे। एक मैं आपको और खत हो गया आपका ऐसी कि हमारे वालिद साहब जब जा रहे थे हज करने तो पहले मस्क गए थे उसके वहां से एक महीने बाद हज करने चले गए थे। लेकिन जब जा रहे थे तो मैं उसको स्टूडेंट था। तो ये था कि हमको दिल्ली में से हवाई जहाज पकड़ना है। बुकिंग मैंने ही आगे यहां करवाई थी और यहां उनके ठहरने के लिए हमारे पंकज शर्मा दोस्त है। जी उनके वालिद साहब का गेस्ट हाउस था। सबसे बड़े आदमी थे। उनका गेस्ट हाउस था तो उसी गेस्ट हाउस में वो ठहरे। तो जैसे आज शाम को वो लेटे हैं और हम लोगों ने आसपास सब लोग बैठे हुए हैं और कल उन्हें चले जाना है। तो उन्होंने लेटेेटे कहां गालिब का मिशरा पढ़ा किसके घर जाएगा सलाबे बला मेरे बा मतलब उन्होंने डायरेक्ट सवाल पूछा उन सब से किसके घर जाएगा सलाबे बला मेरे बा तो मुझे तो याद नहीं था लेकिन हमारी हमशीरा उनका भी एक इंतकाल हो गया। एक ही बहन है घर से बड़ी। उन्होंने मुझे याद दिलाया। उसके सब लोग खामोश रहे और मैंने उस पर कहा था कि मेरे घर जाएगा। [हंसी] तो वो एक तरह से उन्होंने पार्टिंग सवाल पूछ लिया। उसको जवाब भी उनको मिल गया और वहां जाकर उन्होंने मुझे कब लिखा था कि मैंने आपके लिए खुसूसी दुआएं की है यहां हरम में वगैरह। ये ये उनका मिश्रा मुझे याद है कि उन्होंने जिम्मेदारी ज ले ली थी तो ये मैसेज जो बहुत इंपॉर्टेंट है कि जिम्मेदारी ले लें जब मौका है जब ले लें क्योंकि बाद में शायद मौका मिले शुक्रिया
Companion article
Dr. Syed Zafar Mahmood spent thirty years inside the Indian government before spending the next quarter-century building organisations meant to work around it. A 1977-batch Indian Administrative Service officer, he ran Haj operations for the Government of India in Saudi Arabia in the late 1980s, later administered the combined Wakf Board of Punjab, Haryana, Himachal Pradesh and Chandigarh, and served as an Officer on Special Duty during the drafting of the Prime Minister's High Level Committee report on the status of Indian Muslims, popularly known as the Sachar Committee report. Since 1997 he has run the Zakat Foundation of India, and since 2005 the Interfaith Coalition for Peace, alongside a coaching centre for competitive exams, an Iqbal studies academy, and a delimitation-monitoring cell that has quietly reshaped municipal wards in Mumbai.
In a follow-up conversation with Nous, after an earlier data-heavy episode on the Waqf Amendment Bill, Mahmood was asked a more personal question: what does his own career, inside and outside the state, reveal about where the real gaps lie for India's Muslims, and what can be done about them that does not depend on any government's goodwill. His answer combined a bureaucrat's granular knowledge of how delimitation, waqf administration and civil service recruitment actually function with a theologian's insistence that the community's deepest problem is internal — a failure, in his words, to be "good Muslims" in the fullest sense of living out the faith's economic and social mandate.
Mahmood's grounding in this worldview began at home in Bahraich, where his father, a lawyer trained at Aligarh Muslim University in the 1920s, built what amounted to a private curriculum around his children. Alongside formal schooling, the household ran daily sessions of eight to ten hours covering Arabic and Urdu texts, English and Hindi newspapers, Iqbal's poetry recited in chorus and explained line by line, and handwriting drills. English-language papers, Urdu papers, and the Jamaat-e-Islami's Radiance Views Weekly all arrived at the house; his father also ran a private charity and a school, and kept a guest house specifically to host visiting Islamic scholars and community leaders. Mahmood's mother died when he was three; his father died when he was twenty-five, by which point, he says, the habits of daily reading and communal responsibility had already been set.
He read Physics Honours at Aligarh Muslim University, topped his class, and then switched to a Master's in Political Science to prepare for the civil services — a decision his physics professor, on hearing it, greeted with amused resignation. He also completed a PhD in Public Administration. When the 1977 results came out, Mahmood had ranked 27th on the all-India list; four years later, at his first promotion review, he found his name placed first, ahead of the twenty-six officers who had outranked him at entry. He attributes it to what superiors told him was near-unanimous praise across ten reporting officers over five years — evidence, he suggests, that competence and interpersonal trust travel further in the bureaucracy than seniority alone.
Two postings shaped Mahmood's sense of what organised, patient administration could achieve. Posted to the Indian Embassy in Jeddah in 1988 as First Secretary in charge of Haj affairs, he found a system riddled with quiet inefficiencies that had gone unquestioned for decades. Pilgrims travelling by the Haj ship — long justified as a service to the poor — were shown, once he examined the numbers, to be spending more than air travellers once mandatory extra stays in the Kingdom were counted; local moallim agents were extracting full payment from pilgrims while sometimes turning them out of promised lodgings mid-stay. Working with his superior, the diplomat Talmiz Ahmad, Mahmood's team discontinued the Haj ship, negotiated a pre-arranged accommodation scheme directly with Saudi Arabia's Haj Ministry, and centralised pilgrim payments through the Haj Committee of India and the embassy — cutting the hours pilgrims spent stranded at the airport and removing an entire layer of exploitation. His office also built five new Indian embassy schools in Saudi cities, expanding capacity for a student population that had outgrown its buildings several times over.
A decade later, an additional charge as administrator of the combined Wakf Board for Punjab, Haryana, Himachal Pradesh and Chandigarh gave him a close look at how badly a core Islamic institution was being run. Of roughly 33,000 waqf properties under the board, more than half were tied up in litigation, with some 300 lawyers permanently retained to fight cases — many of them disputes within the community itself rather than with outsiders. Documentation existed but had never been digitised; there was no systematic audit of income and expenditure. Mahmood introduced digitisation, instituted regular audits, and fixed and raised imams' salaries, reasoning that an underpaid, dissatisfied imam cannot be expected to lead a community. That salary order was later cited in a Supreme Court case and, he says, ordered implemented nationally — a rare instance of a state-level administrative fix becoming country-wide policy.
Mahmood's signature institution, the Zakat Foundation of India, grew directly out of a theological observation he had been sitting with since his time overseeing Haj and mosque administration: of Islam's five pillars, zakat is the only one with an institutionalised third-party beneficiary built into its very origin. He traces this to the account of three companions of the Prophet who, having stayed back from an expedition, bound themselves to a pillar in penance; when Quranic revelation followed to address what should be done with the charity they then offered, it commanded the Prophet to "take from them" — establishing, in Mahmood's reading, that organisation and collection of zakat was mandated from the outset, not left to individual discretion. Founded in 1997 with the backing of Asrar Ahmed Khan as its first vice-president, the Foundation's motto is drawn from the Quran: "God helps those who help others."
But Mahmood is emphatic that zakat, at 2.5 percent of surplus wealth annually, is "a very small segment" of what he calls Islam's larger economic mandate: that wealth should circulate through society the way blood circulates through a body, rather than pooling in a few hands, per Surah al-Baqarah 2:219. He illustrates the point with arithmetic — a person with one lakh rupees who pays 2.5 percent zakat keeps 97 percent for themselves; a person with ten crores or a thousand crores who pays the same percentage keeps a vastly larger absolute sum, meaning the obligation to also observe ihsan, or voluntary compassion beyond the legal minimum, scales with wealth in a way zakat alone does not capture. Zakat, in his framework, satisfies the baseline of adl (justice); ihsan, the higher and effort-demanding orbit, is what philanthropic traditions elsewhere — he points to Christian charitable giving reaching well beyond 50 percent of income in some cases — have arguably practised more consistently than modern Muslim communities have.
The panel that produced what the press named the Sachar Committee report carried the formal title of the Prime Minister's High Level Committee to write a report on the social, economic and educational status of the Muslim community of India. Mahmood locates its origin in the shock of the 2004 general election: the Congress-led coalition, which had been widely expected to lose, won partly on the strength of Muslim votes, and Prime Minister Manmohan Singh's government concluded it owed the community a genuine accounting of its condition before designing any response. Before the committee's report, Mahmood argues, there had been no systematic, government-backed study of Muslim conditions in India since independence — only scattered individual and organisational efforts, including his own coaching centre and a study circle that had begun at Hamdard in 1991.
Mahmood describes a functioning, low-friction drafting process rather than a fractious one: he prepared notes that were reviewed first by the committee's senior-most member, Syed Hamid, and then placed before Justice Rajinder Sachar, both of whom he says were consistently persuaded. It was through this process that waqf entered the report at all — the original mandate given to the committee did not mention waqf, Mahmood says, and it was his note, endorsed first by Hamid and then approved by Sachar, that resulted in waqf receiving its own chapter. He also recalls being consulted informally before the committee was even constituted, while posted as Commissioner in Agra, though he says he was not told at the time what shape the effort would eventually take.
Asked to locate the single most consequential finding in the Sachar report, Mahmood points not to education or employment statistics but to political representation, and specifically to what the report called "faulty delimitation." India's Constitution requires a census every ten years and mandates that constituency and ward boundaries be redrawn periodically in light of new population data, a process intended to preserve what Mahmood calls "representational justice." The laws and rules governing this, he says, are sound; what fails is implementation. Since the first Lok Sabha in 1952, Muslim representation has averaged around 25 seats out of 543 — against a proportional expectation of roughly 77 — and Mahmood attributes the shortfall less to any single party's politics than to a bureaucratic machinery that redraws boundaries without adequate regard for demographic accuracy, producing outcomes he likens to gerrymandering.
The Zakat Foundation's Delimitation Cell, running for twelve to thirteen years, claims a 70 to 100 percent success rate on the ground-level interventions it has pursued, using Right to Information requests and legal objections rather than public campaigns. In Saharanpur, when the Election Commission proposed reserving a constituency for Scheduled Castes despite a neighbouring constituency having a higher SC population share — a violation of the law's own stated criterion — the Foundation filed objections backed by its own demographic data; a three-member bench travelled to hold a public hearing and reversed the notification. In Greater Mumbai, after the Foundation documented specific violations of Maharashtra's own ward-delimitation rules across all 30 wards under scrutiny and petitioned the state election commission a year ahead of elections, every one of the 30 wards was redrawn according to its submissions. In the election that followed, the number of Muslim corporators elected rose from 23 to over 30 — an increase Mahmood attributes entirely to that single administrative intervention.
Mahmood's prescription for the community draws its name and logic from Muhammad Iqbal's image of the kimiyagar, or alchemist — someone who transforms a heart of copper into one of gold through service to others. He has built this into a two-track organisational model published on the Zakat Foundation's website: Kimiya Ghar Political (KGP) groups and Kimiya Ghar Administrative (KGA) groups, meant to form in every locality. KGP groups are asked to study their own constituency's demography and electoral map — a step he says most communities skip entirely, mourning election results after the fact rather than organising to prevent vote-splitting beforehand — while KGA groups are asked to identify young people for careers beyond the Indian Administrative Service alone: the 29 state public service commissions, 25 High Courts and their subordinate courts, and the thousands of stenographer and personal-assistant posts that state and central governments advertise annually and frequently fail to fill for lack of applicants.
The infrastructure this requires, in Mahmood's telling, need not be elaborate: a spare room in a home, or the smallest room in a mosque, turned into a reading room and orientation centre, staffed initially by whoever in the neighbourhood already has the qualifications. He describes one student from a village near Bahraich, one of India's most backward districts, who reached Zakat Foundation's hostel and coaching facility after being unable to complete schooling locally, and became a jail warden in Kanpur within six months of intensive preparation — evidence, in Mahmood's account, that opportunity rather than aptitude is usually the scarce resource. He also urges attention to skill development and artificial intelligence literacy, arguing the community has been slow to adopt new technical tools even as they become more accessible, and suggests imams could deliver more effective sermons using screens and multimedia, citing a Friday sermon he once watched projected in a church in the United States as a model worth adapting.
One of Mahmood's more striking proposals concerns the billions of rupees that sit dormant in Haj savings accounts. Because Saudi Arabia caps annual pilgrim numbers by country, many applicants to India's Haj Committee wait five to eight years for their turn, setting aside savings for a pilgrimage that will not happen for years. Mahmood's proposed Haj Fund of India would let savers deposit these idle sums with the Zakat Foundation, which would deploy the money productively — his example is financing rickshaws for drivers currently renting them from owners — and return the principal when a depositor's turn for Haj arrives. He points to microfinance programmes elsewhere in India recording repayment rates above 90 to 95 percent as evidence the model is viable, arguing that letting large sums of money sit static rather than circulating violates the same Quranic principle about wealth that underlies zakat itself.
He is similarly insistent that existing government provisions are underused rather than absent. A central government scheme to fund quality education components within madrasas has run continuously since 1996 across multiple changes of ruling party, he notes, yet remains little known and little claimed. He points madrasa students and their families toward the National Institute of Open Schooling as a route to formal class 10 and 12 certification alongside religious education, which several universities' bridge courses can then convert into undergraduate admission — a pathway, he argues, that requires no new government commitment, only better information reaching families who do not know it exists.
Since 2005, Mahmood has also run the Interfaith Coalition for Peace, active across some 24 states with representation from Hindu, Muslim, Sikh and Christian communities at multiple levels. Its guiding idea, borrowed explicitly from the Christian concept of "praxis," is that shared ethical ground between faiths is only meaningful once translated into joint action rather than left as a talking point — comparative study of practices such as fasting across religions, or events like a multi-faith Iftar gathering the coalition organised at Delhi's Jama Masjid, are offered as examples of theory "coming down to the ground."
Mahmood also argues that Islamic social ethics locate the basic unit of society not in the nuclear family, as is commonly assumed across faith traditions, but in the extended family — the roughly 80 to 85 people connected to any married adult by blood or marriage — with an obligation to lift up its less fortunate members, followed by an equivalent obligation toward neighbours. He has published extensively on both themes, in 111 languages, through the Zakat Foundation's website, alongside a parallel project, Iqbal Academy India, which produces a quarterly journal and a coffee-table book, Jahan-e-Mukafat, pairing individual verses of Iqbal with translations and illustrations meant for casual, repeated reading rather than sustained study. A separate ten-year study of the Quranic calligraphy inscribed on the Taj Mahal produced another coffee-table volume, arguing the monument functions not only as a mausoleum or symbol of love but as what he calls "a vehicle to carry God's message to humanity."
Pressed on what younger Muslims, raised in a visibly less confident climate than the one he associates with his own early career, should actually do differently, Mahmood returned to a framework of self-recognition: understanding why one exists, identifying one's own capacities, and then deploying them for both individual and communal benefit. He invoked Iqbal's philosophy of khudi, or selfhood, summarised in the line urging a person who will not become God's to at least become fully themselves, as the starting point for any programme of communal improvement.
He widened the frame further, arguing that of seven levels of human social organisation, from village to continent, the nation-state is uniquely failing its basic mandate worldwide, not only in India — citing, without elaboration, the current politics of the United States as one example. He noted he had once written to Joe Biden, as the oldest person elected to the American presidency, urging him to consider the state's proper mandate of protecting individual dignity, consistent with the United Nations' founding purpose, a letter still posted on the Zakat Foundation's website. He left the harder version of that question, about how individuals should act when national and human interest collide, open for younger listeners to answer themselves, saying only that the reflection itself needed to begin.
He closed the conversation with a memory of his father's departure for Haj in 1975: on his last evening in Delhi, his father recited a line of Ghalib asking whose house calamity would visit once he was gone, and the young Mahmood, prompted by his sister, answered that it would come to his own. His father died in Mecca five days after completing the pilgrimage. Mahmood's own reading of that exchange, decades later, is direct: responsibility should be claimed the moment it presents itself, because the chance to claim it may not return.
7:30This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=VFlC_b4wGZo&t=127s
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1:46“If there is an informed intervention, then you can do that to the machinery.”
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13:24This is an excerpt from a longer conversation.
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