Nous Podcast· 08 Apr 2026· 33:53

Did Iran Outplay the US? 40 Days War Explained | Ceasefire, Oil & Power Shift”

In this in-depth conversation with Amaresh Misra, we break down the recent US–Iran conflict and the events that unfolded over 40 days.

Full Transcript

यह जो सीज फायर हुआ है, इसको आप कैसे देखते हैं? क्या इस पर यकीन किया जा सकता है? अब तो और ज्यादा वो मुनाफे की तरफ बढ़ेगा और सेंश हट जाएंगे तब तक कोई इमेजिन नहीं कर सकता है कि कितनी बड़ी एक इकोनमिक पावर बनके ईरान उठेगा। पाकिस्तान जो इसमें सीज फायर में एक तरह से क्रेडिबल पीस मेकर के तौर पर सामने निकल कर आया है। यह रोल भारत भी अदा कर सकता था। पिटिकल लेवल पे वो पूरी तरह से फेल है। डिप्लोमेटिक लेवल पे वो पूरी तरह से फेल है। जियोपॉलिटिकल उनके साथ कोई खड़ा ही नहीं हुआ। ये जो 10 शर्तें रखी गई है 10 शर्तें इसको आप कैसे देख रहे हैं? और वाकई में अगर इस पर मोहर पूरी तरीके से लग जाती है तो इसका मतलब क्या है? कि अल्टीमेटली इजराइल को ऐसी पोजीशन पे ले आना कि वो लेबरन के मामले में गाजा के मामले में भी सरेंडर कर दे। कि जंग सिर्फ हथियारों से ही नहीं जज्बे से किस तरह से लड़ी जाती है वो ईरानी लोगों ने दिखाया कि प्रो इजराइल प्रो अमेरिकन जो फॉरेन पॉलिसी इंडिया की थी वो फेल [संगीत] आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहद जब दुनिया यह इंतजार कर रही थी कि ईरान के ऊपर कयामत बरसेगी उसी सुबह खबर यह आई कि सीज फायर हो गया है। सीज फायर वो भी दो हफ्तों का वो भी ईरान की शर्तों पर। यानी कि डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका ने पूरे तरीके से ईरान के सामने घुटने टेक दिए हैं। क्योंकि जो शर्तें ईरान ने रखी हैं वो देखने लायक हैं। अगर उन शर्तों को डोनाल्ड ट्रंप मानते हुए इस सीज फायर के लिए अगर राजी हुए हैं तो समझिए कि दुनिया की सो कॉल्ड ये वर्ल्ड पावर जो है वो कहां आकर खड़ी हो गई सिर्फ 40 दिनों में। एक ऐसी कंट्री ने जिसके ऊपर सालों से सेंशंस लगे हुए हैं। जिसको पूरी दुनिया से काट दिया गया। जिसकी पूरी टॉप लीडरशिप को खत्म कर दिया गया। इललीगल वॉर जो है वो छेड़ी गई। उस कंट्री ने 40 दिन में दुनिया की सबसे बड़ी पावर अमेरिका को घुटनों पर ला दिया और यह लाइव पूरी दुनिया ने देखा। अब ईरान का दबदबा पूरी दुनिया में इस तरह से कायम हुआ है कि अब वो खत्म होने नहीं जा रहा है। क्या यह एक नया वर्ल्ड ऑर्डर हम अपनी आंखों के सामने बनता देख रहे हैं या यह बन गया है? सवाल यह है कि क्या उस उस न्यू वर्ल्ड ऑर्डर में जो सुपर पावर कंट्रीज हैं उसमें अब ईरान भी शुमार हो गया है क्या? एक बार मैं आपको जो शर्तें हैं वो मैं आपको पढ़ के सुनाना चाहूंगी क्योंकि वो बहुत इंपॉर्टेंट हैं। ईरान ने जो 10 शर्तें रखी हैं जिसको अमेरिका ने मान लिया है और यह बाकायदा तौर पर डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पर इसको लिखा भी है वो यह है कि अमेरिका अब हमला नहीं करेगा। स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर ईरान का पूरे तरीके से कंट्रोल बना रहेगा। वो यूरेनियम एनरचमेंट जो है वो करता रहेगा। उसको मंजूरी दी गई है। सभी प्राइमरी सेंशंस हटाए जाएंगे। सभी सेकेंडरी सेंशंस को भी खत्म किया जाएगा। यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल के सभी प्रपोजल खत्म किए जाएंगे। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी के बोर्ड ऑफ गवर्नेंस के जो सभी प्रपोजल है वो भी खत्म किए जाएंगे। ईरान को मुआवजा दिया जाएगा जो उसका नुकसान हुआ है। इलाके से अमेरिकी फौजें हटेंगी और हर मोर्चे पर जंगबंदी होगी। जिसमें हिजबुल्लाह लेबनान के इस्लामिक रेजिस्टेंस के खिलाफ जो कारवाई है वो भी शामिल है। तो ये जो सीज फायर है वो सिर्फ ईरान तक महदूद नहीं है बल्कि लेबनान से लेकर और तमाम जगहों पर जो रेजिस्टेंस जहां जो फर्सेस हैं वहां तमाम जगहों पर ये होने जा रहा है। इसको किस तरह से देखा जाए? अमेरिका के हवाले से किस तरह से देखा जाए? जो एक क्रेडिबल पीसमेकर के तौर पर पाकिस्तान उभरा है उसको किस तरह से देखा जाए? इसी सब पर आज हम बात करेंगे और मेरे साथ बात करने के लिए वॉर हिस्टोरियन ऑथर वेस्टीज मामलों के जानकार अमरीश मिश्रा जी जुड़ गए हैं जिनको आप सुनना बेहद पसंद करते हैं। अमरीश जी बहुत स्वागत इस्तकबाल आपका नाउ नेटवर्क में। थैंक यू। थैंक यू। अमरीश जी आपके सबसे पहले आपका रिएक्शन ये जो सीज फायर हुआ है इसको आप कैसे देखते हैं? क्या इस पर यकीन किया जा सकता है? दूसरा मेरा सवाल कि क्या इस सीज फायर में इजराइल की कोई भूमिका है? क्योंकि अपने उस पूरे ट्वीट में उस पोस्ट में इजराइल या नितिन याू का नाम डोनाल्ड ट्रंप ने नहीं लिया है। क्या मायने हैं इसके? देखिए इजराइल को सबसे बड़ा नुकसान हुआ है क्योंकि इजराइल पूरी तरह से इक्वेशन से बाहर है। इस समय ये जंग शुरू हुई थी इजराइल अमेरिका ने जो 28 फरवरी को इमाम खामने का एक अससिनेशन किया था जिसमें इजराइल का बढ़चढ़ के हाथ था और पूरी जंग में इजराइल ने सैकड़ों अससिनेशन किए। कम से कम 100 से ऊपर ईरान के जो मिलिट्री लीडर्स हैं, आईआरजीसी के लोग हैं, वो पॉलिटिशियंस हैं, उनका अससिनेशन हुआ है। अभी तक हुआ है परसों तक और मोसाद इसमें बहुत परफेक्ट माना जाता है कि वो अससिनेशन की राजनीति कर सकता है। लेकिन इजराइल एक चीज भूल गया। अससिनेशन इज नॉट पॉलिटिक्स। जब आप एक अससिनेशन आपने किया उसके बाद यह जो प्रिजमशन था और यह नितनऊ ने ट्रंप को बताया था कि इमाम खामने का अससिनेशन हो जाएगा और भी टॉप लीडर्स का अससिनेशन हो जाएगा तो रिजीम कोलैप्स हो जाएगी। रिजीम कोलैप्स नहीं हुई बल्कि ईरान ने फाइट बैक किया। फिर ये हुआ कि लारेजानी का असिनेशन कर दिया जाए और वहां पर प्रोटेस्ट उभर जाएंगे। लेकिन मतलब वहां पर प्रोटेस्ट फिर से शुरू हो जाएंगे और मोसाद जो अपना उनका नेटवर्क है ईरान में बहुत जबरदस्त नेटवर्क है और हमने देखा जनवरी में लेकिन अब सवाल यहां पे ये था कि लारजानी वो इंसान थे जिन्होंने उस प्रोटेस्ट को एक तरह से लीड किया था दबाने में जनवरी वाले प्रोटेस्ट को तो इजराइल ने ये लाइन दी कि अगर लारीजानी को 16 या 17 मार्च को उनका अससिनेशन होगा। अगर उनका अससिनेशन होता है तो फिर से प्रोटेस्टर्स को हम सड़क पर ले आएंगे और उसके साथ-साथ बासज के बहुत सारे ऑफिसिसेस उन पे हमले हुए पुलिस स्टेशन पे हमले हुए जो तैरान के पुलिस चीफ है उनका भी असरसनेशन हुआ लेकिन जनता सड़क पे नहीं आई बल्कि उल्टा हुआ जो उस समय रमजान चल रहे थे जो ईरान की सरकार समर्थक जनता वो सड़क पे आ गई वो भी इफ्तारी के पहले तो मैं ये कहना चाह रहा हूं कि इस जंग में ये ऐसी जंग कभी दुनिया ने नहीं देखी हाइब्रिड वॉर इसको हाइब्रिड वॉर कहते हैं। यहां पर सिविल रेजिस्टेंस भी हो रहा है। वो कल रात को भी दिखा जब जनता पावर प्लांट्स के सामने आ गई। जिन पावर प्लांट्स को ट्रंप बमार्ड करने की बात कर रहे थे। तो देखिए अब अब वॉर का आप लेवल देखिए कि एक तरफ मिसाइल्स चल रही हैं। एक तरफ जनता का मोबिलाइजेशन हो रहा है। सड़क पर जनता आ रही है। दूसरी तरफ उसमें ये भी दिखाई पड़ा साइकोलॉजिकल डायमेंशन बहुत ज्यादा है। साइबर डायमेंशन बहुत ज्यादा है। एक एक छोटी-छोटी घटनाओं पे बड़े-बड़े नैरेटिव्स गाड़े जा रहे हैं। जैसे इस वाहन की लड़ाई जो वहां पर पायलट गिरा वहां पर ट्रंप ने इतनी बड़ी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डाली कि एक पायल एक पायलट को हमने बचाया। लेकिन वो उन पर उल्टा पड़ गया क्योंकि वो जो उन्होंने कह दिया कि 155 प्लेन लेके हम गए थे तो कोई मानने को तैयार नहीं कि 155 प्लेन एक पायलट को बताने बचाने के लिए गए थे वो सीधे-सीधे उनकी अंतिम कोशिश थी ईरान का जो एनरच यूरेनिया में इसान उसको उठाना वहां वो बुरी तरह से फेल हो गए। तो जो ये प्रेस कॉन्फ्रेंस थी जो ट्रंप की जो लेटेस्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस थी जो अभी हुई और जिसमें उन्होंने क्लेम किया कि बहुत बड़ा ऑपरेशन अमेरिका ने किया वो सबसे बड़ा फेलियर निकला। अब देखिए अजीब तरह की चीजें यहां हो रही है। डलेक्टिकल यानी जो दिखाई पड़ रहा है उससे ठीक उल्टी सच्चाई उससे ठीक उलट है और वो सच्चाई ऐसी है कि जो छुप नहीं पा रही कि ट्रंप ने बखान दिया बड़ा लेकिन सच्चाई ये है कि अमेरिका फेल हो गया इस वाहन में यूरेनियम उठाने के लिए और वहां पर अमेरिकन अमेरिकन मिलिट्री ने भी यह कह दिया कि देखिए यहां अगर हम स्पेशल कमांडो ऑपरेशन करते भी हैं। एक फेल हो गया है। दूसरा भी हम करते हैं। तीसरा भी करते हैं तो वो भी फेल होगा। ईरान में लोग टॉकस हैं। उनकी सारी जो विंग्स है आईआरजीसी बासेज, पीपल्स मिल पुलिस कमांडो यूनिट्स सब कोऑर्डिनेटेड है और वो हमको इस तरह से नहीं होने देंगे। जब तक कोई लार्ज स्केल इन्वजन नहीं होता। यानी एक तीन से चार लाख अमेरिकन सोल्जर्स नहीं उतरते तब तक हम स्पेशल ऑपरेशंस के माध्यम से ईरान के यूरेनियम को नहीं छू सकते हैं। या हम यह सोचे कि हम खरग गाइल पे कब्जा कर लेंगे। या हम यह सोचिए किसी लीडर को मजदूरों की तरह उठा लेंगे। यह सब संभव नहीं है। ट्रंप ने पूरी कोशिश की जब यह हो गया कि मिलिटरीली वो किसी भी एंगल से कामयाब नहीं हो सकते हैं तब उन्होंने ये हार मानी। तब फिर जो पाकिस्तान को जो बीच में रखा था उसके बाद पाकिस्तान से भी जो बात हो रही थी कल एक खबर आई कि ईरान नेगोशिएशन तोड़ दिए। वो ईरान की प्रेशर टैक्टिक्स थी कि हम नेगोशिएशन तोड़ रहे हैं। हमें बात नहीं करनी। या तो हमारे पॉइंट्स मानो वरना ये बातचीत खत्म है और ट्रंप जो भी करना चाहते हैं करके देख ले हम उसका जवाब देंगे। जब यह पूरी बात आ गई और जीसीसी कंट्रीज भी परेशान हो गई कि ईरान को जो जवाब आएगा बहुत ही खतरनाक होगा और इसलिए वह भी उनका भी प्रेशर पड़ गया तो अल्टीमेटली ट्रंप को मानना पड़ा ये ट्रंप की बहुत बड़ी हार है। उन्होंने यहां तक मान लिया कि जो स्टेट ऑफ हुरमूस है उसमें उन्होंने जो ट्रंप का स्टेटमेंट आया है कि उस कौन कंट्रोल करेगा इस पर बातचीत होगी। इसका मतलब ही और चाइना ये पहले स्टेटमेंट दे चुका है कि स्टेट ऑफ होमस में ईरान को अलग नहीं किया जा सकता। यानी 28 फरवरी के पहले की जो स्थिति स्टेट ऑफ हुरमूस की थी कि वो एक इंटरनेशनल वाटर वे था। वो स्थिति बरकरार नहीं रह सकती है। इस नई परिस्थिति में ईरान के साथ कौन और फर्सेस होंगी? चाइना होगा, रशिया होगा। अमेरिका भी कोशिश करेगा आने की लेकिन उसको आने नहीं दिया जाएगा। ये सारी बातें ट्रंप ने मान ली। सोचिए कि मतलब इससे बड़ा सरेंडर दुनिया में आज तक किसी का नहीं हुआ है। अब ये दुनिया दूसरी है। 21 सेंचुरी है। इसलिए कोई ऐसी सेना ले ट्रंप आ रहे थे और वो वो घुटनों पे आ गए सरेंडर के लिए तो वो नहीं वो आपको नहीं देखने को मिलेगा। लेकिन इस समय ट्रंप उसी स्थिति में है। अगर ये 200 साल पहले की बात होती या 100 साल पहले तो ऐसे ही होता। यही हुआ है कि ट्रंप सरेंडर कर गए घुटनों पे आ गए। लेकिन अब ये है कि वो क्योंकि हम एक ऐसे वर्ल्ड में रह रहे हैं जहां बहुत सारी हाइब्रिड वॉर का जमाना है। बहुत सारी ऑनलाइन वॉर भी चल रही है। जमीन पे भी लड़ाई चल रही है। तो इसको आप ये मानिए कि ट्रंप का ये कहना ये चीज ये लाइन लिखना कि ईरा कि स्टेट ऑफ हु भुरमूस में अब आगे बात होगी। इसका कंट्रोल रहेगा और उसमें ईरान का उन्होंने ये नहीं कहा कि बट इट विल नॉट बी इन द हैंड्स ऑफ ईरान जो वो पहले कह रहे थे। ये उन्होंने नहीं कहा अपने मैसेज में। तो यह सीधी बात है कि वो ईरान के आगे झुक गए हैं। और दिस इज अ अर्थ शटरिंग मोमेंट। इसमें देखिए न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की जो बात आ रही है वो कहां बात वर्ल्ड वॉर से शुरू हुई थी और कहां न्यू वर्ल्ड ऑर्डर की बात आ गई है। उस न्यू वर्ल्ड बॉर्डर में दो दिन से मैं इस बात को कह रहा हूं कि चाइना, रशिया, ईरान मिलके अब डॉलर को सीधे चैलेंज करेंगे और वो ये कहेंगे कि स्टेट ऑफ गुरमूस पे ना केवल ईरान, चाइना, रशिया का कंट्रोल होगा बल्कि जो वहां से जहाज गुजरेंगे वो डॉलर में पेमेंट नहीं लेंगे। जो तेल जा रहा है वो डॉलर में ही पेमेंट हो। ये जरूरी नहीं है बातचीत होगी दो हफ्ते और उसमें यन और रूबल और रूपी भी जो प्यूटिन का एक फ्रेमवर्क था कि ब्रिक्स का कि हम बास्केट ऑफ करेंसी यूज़ करेंगे। ये चीजें वहां पहुंच गई। किसी ने उम्मीद नहीं की थी कि इतनी जल्दी वहां पहुंच जाएंगी। बहुत महत्वपूर्ण था कि वो तो डिप्लोमेटिक बात है, लंबी बात है। अमरीश जी लेकिन सवाल मेरा यह है आपसे कि ये 10 पॉइंट्स हैं जो ईरान ने अपनी शर्तें दी हैं जिसको एक तरह से जो डायरेक्टली ना सही लेकिन अमेरिका ने डोन्ड ट्रंप ने ये माना है कि वो उनको एक्सेप्ट करके उस पर आगे बातचीत के लिए तैयार है। इसका क्या मतलब है कि सारे सेंशंस क्या हटेंगे स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर? यह कहा जा रहा है कि अब ओमान और ईरान यह साझा तौर पर इसको एक तरह से रन करेंगे और जो शिप्स वहां से गुजरेंगी उसमें जो पेमेंट है वो जो तय होगा वो लिया जाएगा जो ओमान और ईरान दोनों में बटेगा। अब वो यूरेनियम एनरच कर पाएंगे। क्या ये भी अब सवाल उठ रहा है कि क्या अब न्यूक्लियर पावर ईरान को बनने से क्या अब कोई नहीं रोक सकता है? ये जो 10 शर्तें रखी गई है 10 शर्तें इसको आप कैसे देख रहे हैं और वाकई में अगर इस पर मोहर पूरी तरीके से लग जाती है तो इसका मतलब क्या है? नहीं ये तो सीधी बात है कि स्टेट ऑफ हुरमूस अब ओमान और ईरान मिलके करें रशिया और चाइना पीछे रहे जो भी है अमेरिका का अमेरिका का हस्तक्षेप नहीं रहेगा अमेरिका को छोड़ना पड़ेगा स्टेट ऑफ हुर्म दूसरी बात ये है कि जो सेंशंस हैं उनको हटाने की बात हुई है बिल्कुल उसके डिटेल्स अभी तक नहीं आए लेकिन ये बड़ी चीज है 40 साल पुराने सेंशंस वह अगर हट रहे हैं या जिस भी स्तर पे हटे अभी दो हफ्ते में बातचीत होगी जो दो हफ्ते का टाइम है इसमें 10 अप्रैल को बातचीत है तो वहां ये डिस्कशन होगा कि सेंशंस किस रूप में हटेंगे दूसरा अमेरिका ने कंपनसेशन की बात मान ली वो सोच नहीं सकता था कि अमेरिका कंपनसेशन की बात मान लेगा कि ईरान को हम कंपनसेेट करेंगे जो जो जंग हुई है उस भी बातचीत हो उसमें भी तो हर तरह से ईरान ने देखिए एक तो ईरान जैसे अमेरिका और इजराइल का रोज एक बिलियन डॉलर खर्च हो रहा था इस जंग में जो 40 दिन की जंग है इसमें रोज एक बिलियन आप रफली लगा लीजिए अमेरिका और इजराइल का खर्च हुआ ईरान का उसका 10% खर्च हो रहा था क्योंकि ईरान एक अलग तरह की लड़ाई लड़ा था सस्ते ड्रोंस थे मिसाइल्स भी उसकी अपनी थी तो इसलिए ईरान ऐसी कोई महंगी लड़ाई महंगी जंग नहीं लड़ रहा था इसके लिए वो उसने लंबी तैयारी की थी सारा पूरा कॉस्ट एक तरह से कॉस्ट इफेक्टिव जंग लड़ रहा था और अभी उसको फायदा सबसे ज्यादा हुआ है क्योंकि 178 मिलियन ियन बैरल जो तेल जंग के बीच में ट्रंप ने रिलीज रिलीज होने दिया ईरान का उससे 14 बिलियन डॉलर का का फायदा ईरान को होगा वो तो पहले की बात है। अभी जो जिस तरीके से जो कंपनसेशन की बात है उसमें सीधी सी चीज है कि ईरान को एक बड़ा अमाउंट मिलेगा। उसके बाद तीसरी बात कि जो स्टेट ऑफ गुरमूस से जो बीच में भी अभी जो एक तरह से टोल है वो ऑलरेडी ईरान चार्ज करने लगा था। तो उससे भी उसका उसके वॉर एक्सपेंसेस वो पूरे हो रहे थे। जी ये जो बातचीत होने जा रही है 10 अप्रैल को इसको आप किस तरह से देख रहे हैं अमरीश जी और पाकिस्तान के रोल को आप कैसे देख रहे हैं? जब पूरी दुनिया इसका इंतजार कर रही थी या पूरी दुनिया में एक तरह से एक डर था कि ना जाने एक पागलसनकी आदमी जिसका नाम डोनल्ड ट्रंप है जो जिस तरह के ट्वीट कर रहा है गाली गलौज एक तरह से उन ट्वीट्स में थी पूरी सिविलाइजेशन को खत्म करने की बात थी ईरानियों को वो इंसान नहीं बल्कि जानवर की कैटेगरी में वो रख रहा था और उस सबके बीच अचानक ये सीज फायर और उसमें एक क्रेडिबल मिडिएटर के तौर पर पाकिस्तान का आना और ये यह भी कहा गया कि एंड मूवमेंट पर चाइना का भी इंटरवेंशन हुआ। जिसके बाद यह सीज फायर जो है उसको अमेरिका ने भी माना है और ईरान ने भी माना है। इस सारे सिनेरियो को आप कैसे देख रहे हैं? देखिए मिश्रा जी क्या मैंने पहले भी कहा ये हाइब्रिड वॉर थी। हाइब्रिड वॉर का मतलब जो एक देश ईरान अमेरिका इजराइल से लड़ रहे थे। एक तरफ दूसरी तरफ उसके चारों तरफ दुनिया के कई देश इनवॉल्व थे कूटनीति में। यानी उस उस जंग के जो का जो फॉल आउट है डिप्लोमेटिक जो फॉल आउट है वो भी साथ साथ चल रहा था। ऐसा बहुत कम हुआ है कि मतलब सेकंड वर्ल्ड वॉर चल रही हो और जर्मनी और इंग्लैंड या जर्मनी और रिया या सोवियत सोवियत यूनियन उस समय था वो आपस में लगातार बात कर रहे हो। ऐसा नहीं हुआ था। यह लेकिन जंग का नया फॉर्म जो 21 सेंचुरी में लगातार बातचीत चल रही थी और उसमें ट्रंप यह देख रहे थे कि जो सैनिक तौर पे हमने वो कह रहे थे कि हमने बर्बाद कर दिया। हमने उनकी नेवी डिस्ट्रॉय कर दी। हमने एयरफोर्स डिस्ट्रॉय कर दी। हमने उनके कमांड सेंटर्स डिस्ट्रॉय कर दी। हमने ये कर दिया। हमने वो कर दिया। आप सबने सुना उस चीज को। जब यह ट्रंप कह रहे थे तब वो यह एसएस कर रहे थे पर्दे के पीछे कि हमारे साथ कितने लोग खड़े हो रहे या हमारी बात में कितने लोग आ रहे हैं। उनकी बात में आप जो ईरान के साथ हैं चाइना और रशिया वो तो नहीं आए। चलिए वो तो छोड़िए। पाकिस्तान नहीं आया जो अमेरिका का एक एलआई बन गया है। जीसीसी कंट्री नहीं आए जो पिट रहे थे। जिन जीसीजीसी कंट्री में अमेरिकन बेसिस को इतनी बुरी तरह से मारा कि उसके हजारों सोल्जर्स डिस्लोकेट हो गए अमेरिका के डिस्प्लेस हो गए वापस जाना पड़ा उनको कई लोगों को अमेरिका में बड़ी बुरी हालत है उनकी वहां यहां पर भी जहांजहां वो भागे फिर होटलों में ढूंढढ के ईरान ने मारा तो अब यहां पर ट्रंप को यह लगा कि यार ये तो हमारे साथ कोई खड़ा नहीं है। हमारे हर हमारे सैनिक जो है उनकी सुरक्षा कोई नहीं है। इब्राहिम लिंकन को पीछे कर दिया यह ईरान ने। डरल्ड फोल्ड जो है वह तो आया ही नहीं आगे मैदान मैदान जंग में और इजराइल बुरी तरह से पिट रहा है। इतना पिट रहा है कि अभी जो लास्ट प्रेस कॉन्फ्रेंस थी उसमें ट्रंप ने चार बार कहा कि हम तो एक तरह से इजराइल के लिए लड़ रहे हैं। इजराइल रहेगा ही नहीं। अब ये भी ट्रंप ने दो तीन बार कहा इजराइल रहेगा ही नहीं। अगर ये जंग आगे नहीं बढ़ती। तो इसका क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि ट्रंप ये देख रहे थे कि भाई पॉलिटिकल लेवल पे वो पूरी तरह से फेल है। डिप्लोमेटिक लेवल पे वो पूरी तरह से फेल है। जिओपिलिटिकल उनके साथ कोई खड़ा ही नहीं हुआ। तो अकेले वो चाहे जितनी बड़ी सुपर पावर हो वो कैसे वो जंग नहीं लड़ सकते हैं क्योंकि अकेले आपके पास चाहे जितनी बड़ी मिलिट्री हो और ट्रंप ने हजार बार कहा कि मेरे पास जो मिलिट्री है वो दुनिया के पास नहीं। मेरे पास जो मिलिट्री है वो दुनिया के पास नहीं हो। यह बात सच भी है। ठीक है। तुम्हारे पास मिलिट्री है। लेकिन जो इमाम खामई ने कहा था कि जी बिल्कुल और ये साफ तौर पर हमने देखा और हमने ये भी देखा इन 40 दिनों में कि जंग सिर्फ हथियारों से ही नहीं जज्बे से किस तरह से लड़ी जाती है वो ईरानी लोगों ने दिखाया। जब यह लग रहा था कि ईरान पर कयामत बरस सकती है, उसी रात हमने देखा कि लाखों की तादाद में ईरानी अपने घरों के बाहर निकले। जिन जगहों पर जिन एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर कहा जा रहा था इनको निशाना बनाया जाएगा। वहां पर ह्यूमन चेन्स बनाई गई। उन इंफ्रास्ट्रक्चर के बाहर म्यूजिशियन एक बैठकर बाकायदा तौर पर म्यूजिक प्ले कर रहे हैं और लोग लाखों की तादाद में सड़कों पर आए और फिर हमने देखा कि उन्होंने वही लोग जो लाखों की तादाद में इकट्ठा उन्होंने जीत का जश्न भी मनाया। जहां पर एक कैंपेन चलाई गई कि लोग कितना इसमें शामिल होते हैं। जान फिदा उस पर कुछ ही घंटों में 14 मिलियन लोगों ने रजिस्टर करा दिया अपनी जानों को फिदा करने के लिए अपने देश के लिए। सवाल यही पूरी दुनिया पूछ रही है क्या ऐसी कोई तस्वीर या ऐसी कोई भी चीज या कोई भी जज्बा क्या इजराइल या अमेरिका में किसी भी तरीके से देखने के लिए मिला? तो ना जंग सिर्फ वेपन से नहीं बल्कि एक जज्बे से भी लड़ी जाती है जो एक शहादत का जज्बा तो है ही लेकिन अपने देश को बचाने का और एक आरपार की लड़ाई का वो भी हमने इन 40 दिनों में लगभग हर रोज ईरान में देखा इस पर तो मैं चाहूंगी कि अमरीश जी आप अपनी बात को रखें| लेकिन अब मेरा सवाल यह है कि आगे दुनिया और कितनी बदलने जा रही है? क्या आपके मन में कोई दिल में कोई इस तरह का डर भी है कि जब ये दो हफ्ते का ये सीज फायर है डोनल्ड ट्रंप जैसा शख्स क्या कोई धोखा दे सकता है? क्या आपको लग रहा है कि इजराइल अभी भी प्रेशर बना सकता है? क्योंकि उस पूरे ट्वीट में या उस सोशल मीडिया पोस्ट में नितिन याू इजराइल का जिक्र नहीं है। जो कैंट ये कह रहे हैं उन्होंने बाकायदा तौर पर वीडियो बनाई है और उनका ये कहना है कि इजराइल इससे बहुत अपसेट है और वो एक तरह से हमला कर सकता है। तो ये देखना होगा कि कहीं ऐसा ना हो कि इन पीस कॉन्वर्सेशन के दौरान इजराइल अपनी कोई हरकत जो है उसको अंजाम दे। नहीं इजराइल तो कुछ भी कर सकता है। देखिए इजराइल डेस्पिरेट है। इजराइल हार चुका है बुरी तरह से। उसकी जनता जहां ईरान की जनता अपनी सरकार के पक्ष में सड़क पे आ रही है। इजराइल की जनता अपने सरकार के विरोध में सड़क पे आ रही है। अमेरिका की जनता अपनी सरकार के विरोध विरोध में सड़क पे आ रही है। और कितनी कितने सर्वे हैं कि दिस इज एन अनपॉपुलर वॉर इन अमेरिका। ट्रंप के खिलाफ है लोग। इस वॉर को नहीं चाहते। जो ट्रंप के सपोर्टर्स है रिपब्लिकनंस उनका भी बड़ा हिस्सा आधे से ज्यादा इस जंग को नहीं चाहता। तो यह तो देखिए अब इजराइल यहां पर कुछ कर दे कोई टैक्टिकल न्यूक्लियर वेपन चला दे ईरान के ऊपर डेस्पिरेशन में वो कुछ भी कर सकता है क्योंकि इजराइल टूट रहा है इजराइल इसके बाद क्या होगा अभी वो देखना बाकी है लेबन में इजराइल ने कहा है कि लेबन के सीज फायर को हम नहीं मानेंगे तो वो नहीं माने वहां पर इतना हिजबुल्ला मार रहा है जो सच्चाई है इतना मार रहा है कि इजराइल की अब मैं कोई शब्द उसके लिए नहीं है नानी याद आ गई या जो जो भी लेकिन जो स्थिति देखिए 100 से ज्यादा मरकबा टैंक उड़ चुके हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ। 100 प्लस गिनती ही करना बंद कर दी लोगों ने कि जितने माने जो पूरा इजराइल का ये था किल्ला खत्म हो गया है और हमें एक बफर जोोन बनाना है। बफर जोोन का मतलब यही है कि लेबन के एक हिस्से को ले लेना है। उसको इजराइल में मिला लेना। जैसे सीरिया के एक हिस्से को मिलाने की अभी जद्दोजहद चल रही है ईरान द्वारा। इसके बाद हिजबुल्ला ऑफेंसिव पे आ गया। यानी हजबुल्ला जो है अब ईरान को सॉरी इजराइल को लेबनन से साउथ लेबन में जहां तक अंदर भी थोड़ा बहुत घुसा इजराइल वहां से भी खदेड़ देगा अगर जंग चलती है और अगर जंग नहीं चलती है तो इजराइल को वैसे ही विड्रॉ करना पड़ेगा तो इसलिए देखिए अभी बहुत कुछ ऐसी चीजें हैं जो होनी है गाजा का सवाल है गाजा में हमारी रिपोर्ट है कि हमास मजबूत हुआ है अब इस पे वो आगे अच्छा हमास को डिसार्म करने की बात थोड़ी तेज हुई है लेकिन हमास ने मना किया और अभी ये जो सीज फायर हुआ है इसका क्या असर पड़ेगा? जाहिर सी बात है ईरान का तो स्टैंड है कि हमास डिसाम नहीं होना चाहिए। वो हमास ने कह दिया हम डिसाम नहीं होंगे। और फिर से अगर इजराइल जंग शुरू करना चाहता है गाजा में तो करके देख ले। उधर जो यमन की बात है यमन भी एक लेटर स्टेज में जंग में आया और आपको एक चीज और बता दें यह भी एक बहुत महत्वपूर्ण बात है। ईरान ने कहा था कि स्टेट ऑफ हुर्मूस तो बंद ही है। अगर अमेरिका ने हमारे इंफ्रास्ट्रक्चर पे हमला किया तो हम बाबल मंदाब स्टेट भी बंद कर दे। तो अब दो दुनिया के जो चोक पॉइंट्स है जहां से दुनिया का व्यापार होता है 20% व्यापार स्टेट ऑफ हुरमुस बंद करने से प्रभावित हुआ। अगर बाबल मंदाब जो कि सीधे यमन के कंट्रोल में है। अगर वह भी बंद कर दिया जाता तो क्या? यूरोप का माल पहुंच ही नहीं सकता था एशिया। कोई तरीका नहीं था। इससे भी इससे भी ट्रंप घबरा गई। यानी अब देखिए हाइब्रिड वॉर कि ईरान जो जंग लड़ रहा है हथियारों से लेकिन वो एक ट्रेड वॉर भी लड़ रहा है अपना ले उसके उसका जो उसके एलआई है उनको वो लेवरेज कर रहा है एज अ बारगेनिंग चिप कि अगर यहां से अगर अमेरिका ने हमला किया तो हम स्टेट ऑफ मंदाब भी बंद कर देंगे। स्टेट ऑफ मंदाब के बंद करने का मतलब है कि दुनिया का अगर दोनों हुरमूस भी बंद रहे मंदाब भी बंद बंद रहे तो दुनिया का कम से कम 60% व्यापार जी दो तीन मेरे सवाल हैं बस लास्ट में अमरीश जी एक तो ये कि दो हफ्ते के बाद जब हम बात कर रहे हैं कि माना कि सीज फायर सिर्फ दो हफ्ते की ही है। हालांकि कुछ एक्सपर्ट्स का ये मानना है कि दो हफ्ते से शुरुआत हो रही है। लेकिन उसके बाद यह परमानेंट में भी तब्दील हो सकती है। क्योंकि जो शर्तें ईरान ने रखी हैं उन शर्तों को अगर अमली जामा पहना दिया जाता है तो इसका मतलब यह है कि ये एक परमानेंट सीज फायर में भी तब्दील हो सकता है। क्या आपको ऐसी उम्मीद है और अगर यह परमानेंट में तब्दील नहीं होता है और ये सिर्फ दो हफ्ते के लिए होता है तो फिर क्या? क्या फिर उसी बैक टू यू नो उसी पोजीशन में आ जाएंगे जब सीज फायर से पहले वाली फिर क्या होगा? फिर से वही हमले वही तमाम चीजें यह शर्तें मानना एक थोड़ा सा एक कंफ्यूजन तो पैदा होता है इसको लेकर। नहीं देखिए दो हफ्ते के बाद अगर जंग शुरू भी होती है तो इस तरह की नहीं होगी। पहले की तरह की जो अभी हो रही है या ट्रंप पावर प्लांट्स डिस्ट्रॉय कर देंगे। ऐसा नहीं होने वाला है। अब वो जंग होगी तो फिर ग्राउंड ऑफेंसिव अमेरिका को करना करना पड़ेगा जिसके लिए अमेरिका तैयार नहीं है। पब्लिक सपोर्ट नहीं। तो मेरे ख्याल से ये दो हफ्ते से ही मियाद ये मियाद बढ़ती जाएगी। अभी दोद हफ्ते दिए हैं ट्रंप कहेंगे एक हफ्ता और फिर कहेंगे एक हफ्ता और इस बीच में जैसेजैसे यह मियाद बढ़ती जाएगी इजराइल कमजोर होता जाएगा तो ये ये देखिए वो है कि अल्टीमेटली इजराइल को ऐसी पोजीशन पे ले आना कि वो लेबन के मामले में गाजा के मामले में भी सरेंडर कर दे ये देखिए एक बड़ी राजनीति जो ईरान इस समय खेल रहा है और जिसको लोग नहीं देख पा रहे वो ये भी है कि ये जो सीज फायर जब तक रहेगा ये इजराइल पगलाया रहेगा इजराइल को दबाना बहुत आसान है और इजराइल को फोर्स करके इजराइल से वो कंसेशन लिए जाए गाजा और लेबन में खासतौर पे मतलब और सीरिया में भी जो जो सीरिया में घुस गया तो देखिए अभी मैं तो दो हफ्ते बाद क्या होगा वो तो एक अलग सवाल है लेकिन सवाल बात ये है कि दो हफ्ते में क्या हो जाएगा दो हफ्ता ऐसे नहीं होंगे बातचीत चलेगी केवल दो हफ्ते में भी मिलिट्री मैन्युअर्स होंगे और खासतौर पे इजराइल वर्सेस ईरान मिलिट्री मैन्युवर्स का मतलब ये नहीं है कि सीधे जंग वो बहुत सारी चीजें हो सकती है वो दबाव हो सकता है वो वो यह भी हो सकता है। कुछ छोटी मोटी झड़पें भी हो सकती है। बहुत कुछ हो सकता है। उसके साथ जीसीसी स्टेट्स में भी देखिए कल इराक से खबर आई कि कुवैत से एक अमेरिका ने मिसाइल दागी जो कि इराक में गिर गई और बसरा में गिर गई। वहां जनता निर्दोष लोग मारे गए। अब उसको लेके ये स्थिति है कि कल बसरा की जनता कुवैत के काउंसिलेट पे चढ़ गई। कुवैत का झंडा उतार दिया और यह हुआ कि कुवैत पे हमला करो। तो जीसीसी स्टेट्स भी इन दो हफ्तों में उनका क्या हाल होगा? बहराइन का क्या हाल होगा? क्या ईरान वापस बहराइन को अपने उसमें लेगा या वहां पर कोई तख्ता पलट होगा? अभी तो ये भी तो देखना है जिस कंट्रीज में क्या होने जा रहा है? अभी दो हफ्ते में इन्हीं दो हफ्तों में कुछ तख्ते क्योंकि 100% तख्ता पलटेंगे जो और उसके बाद यह भी हो सकता है कि जो इराक है ये है और इस तरह के अगर जनता का मूड बनता है तो उनको उनको कैप्चर भी किया जा सकता। जैसे कुवैत जैसे देश हैं वह तो बहुत ही वंडरेबल है। बहराइन बहुत ही वंडरेबल है। ओमान के साथ ऑलरेडी ईरान के अच्छे रिश्ते हैं। यूएई बहुत ही ज्यादा वंडरेबल है इस वक्त। तो इसलिए देखिए अभी दो हफ्तों में बहुत कुछ वर्ल्ड ऑर्डर जो बदल गया है उसका रूप दिखाई पड़ेगा। अभी ये महत्वपूर्ण है सबसे ज्यादा। जी। अह तो फिर इसमें सवाल यह है कि जो कहा जा रहा है कि जो अह पूरे अमेरिकन जो बेस है, जो अमेरिकी सैनिक यहां पर मौजूद है जो शर्त है उसमें एक ये भी शर्त है कि उनको हटाया जाएगा। तो क्या इसका मतलब ये है कि जीसीसी में जितने भी अमेरिकन बेसिस हैं जो अमेरिकी सैनिक हैं क्या उनको भी हटाने की इसमें बात की जा रही है? देखिए मुझे लगता है कि इन प्रिंसिपल ट्रंप मान लेगा इस बात को कि उनको हटाया जाए। इन प्रिंसिपल उसमें लॉजिस्टिक्स इन्वॉल्व्ड है हटाने में। उसमें कई महीने लगेंगे क्योंकि इतने 400 सैनिकों को उसमें से कई तो भाग गए हैं जो बचे हैं फिर भी 25 30 उनको रीोकेट करना उनको कहां रखना तो वो अमेरिका कहेगी मुझे टाइम दो अभी एक महीने का टाइम दो मुझे दो महीने का वो एक लेकिन इन प्रिंसिपल तो शुरू हो गई रिट्रीट ये बहुत बड़ी बात है जो सालों से अमेरिका की सुपर पावर का एक सिंबल था कि अमेरिका के पास मिडिल ईस्ट में बेससेस है दुनिया दुनिया के बहुत सारे देशों में अमेरिका के बेस ऑस्ट्रेलिया में भी है, यूरोप में भी है, साउथ कोरिया में भी है, जापान में भी है। लेकिन मिडिल ईस्ट में बेस उसका मेन था। क्योंकि यहां पर इसका मतलब था कि वो पूरे तेल को डोमिनेट कर रहा है। तेल के व्यापार को डोमिनेट कर रहा है। तो मिडिल ईस्ट से अमेरिकन सोल्जर्स का हटना चाहे जितनी देर लगे उसकी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इन्हीं दो हफ्तों में। क्या करेंगे फिर ये कंट्री? यूएई, सऊदी अरब, बहरेन जो एक तरह से गुलाम बने हुए थे अमेरिका के, इजराइल के भी और लगातार जिस तरह की रिपोर्ट्स इस पूरे जंग के दौरान आती रही अगर वहां से अमेरिकन बेसिस हट जाते हैं तो इसका मतलब तो ये सीधे तौर पर जो इजराइल एक पावर बनना चाहता था इस जीसीसी में यहां का एक तरह से गुंडा दादा जो बनना चाहता था। अब ये अब सीधे तौर पर ये दिख रहा है इन 40 दिन के बाद कि यहां पर अगर किसी का राज स्थापित होगा। अगर इसको इस तरह से भी ना देखें तो एक तरह से जो डोमिनेंस है अगर किसी कंट्री का होगा तो वो ईरान का है साफ तौर पर और उसने अपने ताकत अपने बलबूते अपनी सलाहियत पर ये हासिल किया है। बिल्कुल हासिल किया है। और ईजीसी कंट्रीज जो है उनको अल्टीमेटली ईरान के सामने उनको झुकना होगा। या झुकना ना भी हम यूज़ करें। ईजीसी कंट्रीज को ईरान के साथ अपना एडजस्टमेंट नया बनाना पड़ेगा। अदरवाइज और कोई तरीका नहीं है। बुरी तरीके से जीसी कंट्रीज जो है वह इस समय अस्तित्व के संकट में है। अस्तित्व के संकट में इजराइल भी है। जीसी कंट्रीज भी है। दोनों तो ये देखिए एक इसका एक वो हो जाएगा कि जो मिडिल ईस्ट में नया ऑर्डर है सबसे पहले मतलब या या यूं कहिए कि वर्ल्ड ऑर्डर जो नया बनेगा उसमें सबसे पहले उसका असर मिडिल ईस्ट पे पड़ेगा। दिस द फर्स्ट थिंग फर्स्ट इफेक्ट ऑफ द वर्ल्ड और मिडिल ईस्ट में आप देखिएगा कैसे इंटरनल रेबेलियंस होते हैं या ईरान के साथ नया कॉन्फ़िगरेशन होता है और फिर जो उनकी संपदा है जो एनर्जी है वहां पर जीसीसी में एनर्जी सोर्सेस है सब कुछ है उसमें अमेरिका की भागीदारी कम होने जा रही है। सबसे बड़ी बात यह जी जो कि बहुत इंपॉर्टेंट है और साफ़ तौर पर यह लग रहा है कि जिस तरह से पूरा क्राइसिस पूरी दुनिया में पैदा हो रहा था स्टेट ऑफ़ हार्मोस बंद होने के बाद और या फिर ये कहें कि जो ईरान जिस तरह से कहता है कि दुश्मनों के लिए बंद होने के बाद जाहिर सी बात है कि वो साफ तौर पर हम ये देख रहे हैं कि वो भी इस सीज फायर का एक सबसे बड़ा रीजन बनता हुआ नजर आ रहा है। आखिरी मेरा सवाल अमरीश जी पाकिस्तान जो इसमें सीज फायर में एक तरह से क्रेडिबल पीस मेकर के तौर पर सामने निकल कर आया है। यह रोल भारत भी अदा कर सकता था। अगर भारत ने अपनी साइड केयरफुली चूज़ की होती, अगर वो एक एक न्यूट्रल एंटिटी के तौर पर होता तो आप सोचिए कि हम ग्लोबल साउथ का हिस्सा हैं। हम ग्लोबल साउथ का लीडर हम बनना चाहते हैं। हम ब्रिक्स का हिस्सा हैं। और हम इजराइल और अमेरिका के साथ खड़े हुए लगातार हम नजर आए और पूरी दुनिया ने उसको देखा और इसलिए काफी परेशानियां भी सामने जो आम इंसान है चाहे वो गैस की हो, तेल की हो वो किल्लत उसे देखने के लिए मिली। ये रोल पाकिस्तान ने निभाकर हिंदुस्तान निभा सकता था। लेकिन हिंदुस्तान ने कुछ और चुना। इसको आप किस तरह से देखते हैं हिंदुस्तान के हवाले से कि अगर पाकिस्तान जो कि हमारा पड़ोसी है जिसको दुश्मन देश के तौर पर देखा जाता है वो अगर पीसमेकर की भूमिका में है। तमाम जो पावर्स हैं वो इस्लामाबाद में इकट्ठा होंगी 10 अप्रैल को। देखिए इसमें एक पाकिस्तान की मानना पड़ेगा कि डिप्लोमेसी की फील्ड में फॉरेन पॉलिसी की फील्ड में पाकिस्तान ने एक एक जीत हासिल की। ये बात इसमें कोई दो राय नहीं है। इंडिया के पास मौका था लेकिन इंडिया ने मौका गवा दिया जब 26 फरवरी को वहां पर इजराइल आप चले गए। तो इसलिए देखिए इंडिया को तो इंडिया की फॉरेन पॉलिसी पूरी तरह से फेल है। इस पर हम लोग बहुत लंबे समय से बात कर रहे हैं। लेकिन उसका रिजल्ट आज निकल के सामने आया है कि प्रो इजराइल प्रो अमेरिकन जो फॉरेन पॉलिसी इंडिया की थी वो फेल और इसको एक्सेप्ट करने में कोई भी जो राष्ट्रवादी भारतीय है उसको कोई समस्या नहीं होनी चाहिए। इंडिया हैज़ फेल। ईरान से पेजिशियन मोदी की बात तक हुई जंग के बीच में। ट्रंप ने भी मोदी को कॉल किया। शायद वो चाहते थे कि मोदी मध्यस्था करें लेकिन मोदी की मध्यस्था नहीं मानी गई। ईरान ने उसको विश्वसनीय नहीं माना क्योंकि बहुत सारी घटनाएं हुई है। मैं उनको रिपीट नहीं करना चाहता हूं जिसकी वजह से ईरान की जो ईरान भारत को विश्वसनीय नहीं मानता। तो ऐसी पूरी परिस्थिति में इंडिया को अब अपनी फॉरेन पॉलिसी पे पुनर्विचार करना होगा। बहुत सारे हो सकता है इस्तीफे भी हो नहीं भी होते हैं जो इस सरकार में बड़ी समस्या है। तो अब इस सरकार को यह तय करना होगा कि वो किधर जाएगी। उनकी जग्राफी सब कुछ यही दिखा रही है कि उसको ईरान, रशिया, चाइना के के साथ जाने में उसको कोई हिचक नहीं होनी चाहिए। लेकिन अगर वो हिचक होती है वो बरकरार रहती है। अभी भी ये गलती करते हैं मूड को रीड करने में इंटरनेशनल मूड को रीड करने में तब तो फिर भगवान ही माने। क्या कहा जाए? जी बिल्कुल बिल्कुल बहुत महत्वपूर्ण बात आप कह रहे हैं और देखिए यह कहा गया था यूक्रेन और रिया की वॉर में कि पापा ने वॉर रखवा दी। लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि अगर इसको रिफ्रेम किया जाए सेंटेंस को कि पॉप ने तो वॉर नहीं रुकवाई लेकिन पड़ोसी ने जरूर वॉर रुकवा दी। जिसको बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत है हिंदुस्तान को अपनी फॉरेन पॉलिसी तमाम चीजों को देखते हुए कि आखिर ये जो मिडिएटर के तौर पर क्रेडिबल मीडिएटर के तौर पर जो पाकिस्तान ये उभरा है वहां भारत आगे क्या सोचने जा रहा है। दो हफ्ते बहुत महत्वपूर्ण है। इन दो हफ्तों में जो कुछ होगा वो आगे सब कुछ ये डिसाइड करेगा कि क्या होने जा रहा है इस जंग का। लेकिन फिलहाल हम यह कह सकते हैं कि एक बड़ी और पॉजिटिव खबर जो है वो जो जो इंसानियत में जो लोग यकीन रखते हैं जंग के जो खिलाफ हैं उनके लिए भी है। बहुत-बहुत शुक्रिया अमरीश जी आपका इस प्रोग्राम का हिस्सा बनने के लिए। वक्त देने के लिए बहुत शुक्रिया। शुक्रिया आप तमाम ऑडियंस का भी। थैंक यू। थैंक यू।

Companion article

When Iran, Israel and the United States traded fire for forty days this year, most capitals had braced for the war to widen further, not end abruptly. Instead, on the morning a fresh American strike on Iran's power infrastructure was widely expected, news broke instead of a ceasefire — a two-week truce struck, notably, on terms Tehran itself had set. War historian and defence-affairs commentator Amrish Mishra, speaking to Aadab News Network host Bushra Khan Fahad, argued that the shape of that truce amounted to one of the more consequential diplomatic reversals of the year, one that reordered assumptions about American power in the Middle East and left India's regional standing looking diminished by comparison.

Ten conditions, and an American climbdown

According to Mishra, the ceasefire rests on ten conditions that Iran placed before Washington — terms he said Donald Trump effectively accepted and posted about on social media. As read out in the conversation, they include a US commitment not to strike Iran again; continued Iranian control over the Strait of Hormuz; permission for Iran to keep enriching uranium; the removal of both primary and secondary sanctions; the withdrawal of related United Nations Security Council resolutions and International Atomic Energy Agency Board of Governors proposals; compensation to Iran for war damage; the withdrawal of American forces from the region; and a ceasefire extending to every front, including Hezbollah's confrontation with Israel in Lebanon.

Mishra framed the fact that Washington entertained these terms at all as remarkable, given Iran has lived under sanctions for decades and had, in his telling, its top military leadership targeted during the war. “This is the biggest surrender the world has seen,” he said, adding that in an earlier century such an outcome would have meant a formal capitulation; in the present era of hybrid warfare, it instead takes the form of a negotiated statement. He pointed in particular to Trump's own language on the Strait of Hormuz — that its future control would be discussed — as notably short of the earlier US position that the strait would not remain in Iranian hands.

A war fought with assassinations and a war fought back

Much of the conversation turned on why, in Mishra's reading, Israel ended up “out of the equation” despite an assassination campaign he said had killed more than a hundred Iranian military commanders, IRGC officials and politicians. The premise behind those killings, he said, relayed to Trump by Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu, was that removing figures such as Ali Larijani would trigger the kind of unrest last seen in Iran in January and topple the regime. Instead, Mishra argued, government-supporting crowds — not protesters — filled the streets, including gathering outside power plants that Washington had reportedly threatened to bomb, with musicians performing to the assembled crowds. He cited a mobilisation campaign in which some 14 million people registered within hours to pledge themselves in defence of the country.

Mishra described this as a hybrid war in a fuller sense than the term usually carries: missile exchanges running alongside civil mobilisation, a psychological and narrative contest, and diplomacy continuing in parallel with combat — a combination he said had no real precedent in a major twentieth-century war. He pointed to Trump's press-conference claim that 155 aircraft had been deployed to rescue a single downed pilot as a boast that, in his view, was read by many as evidence of failure rather than strength, tied to what he described as a failed American attempt to retrieve Iran's enriched uranium stock. Seizing that material by special forces, he argued, was not realistic without a ground invasion on the scale of three to four hundred thousand troops — an option he said Washington was not prepared to take, given weak domestic support for the war among the American public, including within the Republican base.

The economics of a forty-day war

Mishra put the daily cost of the war to the United States and Israel at roughly a billion dollars, against what he estimated at a tenth of that for Iran, which he said fought a comparatively low-cost campaign built around domestically produced drones and missiles. He also pointed to Iran's finances being cushioned by the roughly 178 million barrels of oil Trump allowed to be released onto the market during the war, which Mishra estimated brought Iran close to fourteen billion dollars, on top of tolls Iran had already begun charging on Hormuz shipping traffic — funds he said effectively covered its war expenses.

On the mechanics of the strait itself, Mishra said the emerging arrangement involves Oman and Iran jointly administering Hormuz and sharing toll revenue from ships passing through, with US involvement excluded and China and Russia positioned in the background. He linked this to a broader claim he has been making for several days: that Iran, China and Russia would use their position on the strait to challenge dollar-denominated oil payments, in favour of a basket of currencies including the yuan, the rouble and the rupee — an idea he associated with a framework Vladimir Putin has floated for BRICS nations.

Two choke points and sixty percent of world trade

A recurring theme was Iran's leverage over global shipping lanes. Mishra noted that closing the Strait of Hormuz alone affects roughly a fifth of world trade, and that Iran had signalled it would also close the Bab-el-Mandeb strait — under Yemeni control — if the United States struck Iranian infrastructure directly. Together, he said, closure of both chokepoints could affect some 60 percent of global trade, cutting off European goods from Asian markets entirely. He described this as Iran running a trade war alongside its military one, using allied forces as a bargaining chip against Washington.

What two weeks might become

Asked whether the truce would hold beyond its stated two weeks, Mishra said he expected the timeline to keep extending rather than collapse back into the intensity of the war's earlier weeks, since renewed fighting on the previous scale would require a ground offensive the US is not ready to mount. He suggested the pause itself functions as leverage on Israel — keeping it “desperate” and easier to pressure into concessions in Lebanon and Gaza — while cautioning that talks alone will not prevent military manoeuvres, localised skirmishes, or instability in Gulf states during the interim. He pointed to an incident in which a US missile fired from Kuwait struck Basra in Iraq and killed civilians, prompting crowds to pull down the Kuwaiti flag at its consulate there, as a sign of how exposed Gulf capitals such as Kuwait, Bahrain and the UAE now are; he described Oman, by contrast, as already on comparatively good terms with Tehran.

Mishra also raised the possibility that Israel, which he characterised as internally divided with domestic protests against the war mirrored by similar sentiment in the United States, could still act unilaterally out of what he called desperation — including, he said, the risk of a tactical nuclear strike. He noted Israel's stated refusal to honour a separate ceasefire with Hezbollah in Lebanon, where he said more than a hundred Merkava tanks had been destroyed, and said Hezbollah was now positioned to push Israeli forces out of southern Lebanon if fighting there resumes. On Gaza, he said Hamas has emerged strengthened from the war and has refused Israeli and American calls to disarm.

On the withdrawal of US troops from Gulf bases — one of the ten conditions — Mishra said he expected Washington to accept the principle even if the logistics stretch over months. He framed a reduced American military footprint in the Gulf as symbolically significant, given that regional bases have long underpinned US dominance over Middle Eastern oil markets, and predicted Gulf states long dependent on Washington and Israel would have to recalibrate their relationships with Tehran.

Pakistan's opening, and India's absence

The conversation closed on the ceasefire's diplomatic authorship. Mishra credited Pakistan with emerging as a credible mediator, with further talks expected in Islamabad on April 10, and said Islamabad had scored an unambiguous diplomatic win. He contrasted this with India, arguing that New Delhi had a comparable opening to act as a neutral broker — consistent, he said, with its aspirations to lead the Global South and its place in BRICS — but instead was seen visibly aligned with Israel and the United States through the war, including a visit to Israel on February 26 that he cited as illustrative. He said Iran had not regarded Indian mediation, reportedly floated through contact between Narendra Modi and Trump during the war, as credible, and argued this should prompt a rethink of India's foreign policy posture toward Iran, Russia and China. Host Bushra Khan Fahad closed the discussion by thanking Mishra for his time and analysis as the segment wrapped.

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