1:39What Should Muslim Politics Offer?
What should Muslim politics contribute to India’s broader democratic and secular discourse? Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=JA83TwVx1DE&t=3363s
What does it mean to be a Muslim in a modern nation-state? How should Indian Muslims understand their identity, politics, and place in a rapidly changing world? In this wide-ranging and intellectually rich conversation, Ali Javed, Editor of Nous, sits down with Member of Parliament Ruhullah Mehdi…
इसीलिए यह आईडिया ऑफ जस्टिस एस्टैब्लिशमेंट ऑफ ह्यूमैनिटी अगर जब तक आप इस्लाम को इस जाविए से ना देखें तब तक आप चाहे मुसलमान ही क्यों ना हो और गैर मुसलमान क्यों ना हो आप खुद भी कंफ्यूज रहेंगे और लोग भी आपसे कंफ्यूज रहेंगे। इसीलिए इंटरनली खुद से अप्रोच करने की जरूरत है। नेशन स्टेट के [संगीत] की रियलिटीज में, चेंजिंग ग्लोबल ऑर्डर के रियलिटीज में। व्हाट इज इस्लाम? आप ऑफकोर्स कश्मीर के पर्सपेक्टिव से इस इंटरप्ले को देख रहे थे। इंडियन नेशनल पॉलिटिक्स में आपने पिछले एक डेढ़ साल में किस तरह की मुस्लिम पॉलिटिकल आइडेंटिटीज [संगीत] देखी। तो कुरान के नजरिए से मैं एक नेशन स्टेट नहीं हूं। मैं मुसलमान हूं। एक यूनिवर्सल यूनिवर्सिटी या एथिकल कोड का मैं एक स्टूडेंट हूं। बिलीवर [संगीत] हूं। कुरानास जहां पे भी हो हिंदुस्तान में हो यू शुड बी द बेस्ट सिटीजन ऑफ योर कंट्री। यू शुड बी अ सिटीजन हु कॉम्प्लीमेंट्स ह कंट्री एंड [संगीत] दैट कॉन्ट्रैक्ट द कॉन्स्टिट्यूशन एंड द सिस्टम ऑफ़ जस्टिस। उसका कोई मैपिंग [संगीत] है आपके सामने कि मुसलमान क्या कर रहा है? क्या उसकी डिसीजन मेकिंग की पर्सपेक्टिव है और कहां पे आके आपको लगा कि कंट्राडिक्शंस फेस हो रहे हैं। दो-तीन सवालों का जवाब ढूंढना जरूरी है जिसप एंगेज [संगीत] करने की जरूरत है। हम मुसलमान हैं हम हिंदुस्तानी भी हैं। हमारे जिओपॉलिटिकल इंटरेस्ट भी है, ग्लोबल इंटरेस्ट भी है। हाउ डू वी सी [संगीत] आवरसेल्व्स एस मुस्लिम्स? हाउ डू वी सी आवरसेल्व्स एस इंडियन मुस्लिम्स? क्या जो इस्लाम का रिकंस्ट्रक्शन पिटिकल थरी पे होना चाहिए? पिटिकल फिलॉसफी में होना चाहिए। क्या वो भी उस लेवल पे हुआ है या नहीं? मैं कहूंगा कुरान मुझसे कहता है इन जनस फजला। मैंने आयत बहुत जगहों पे कोट की है अपने तकारी में। ये गाइडिंग प्रिंसिपल है हमारे लिए। मुस्लिम पिटिकल फिलॉसफी में। ये जरिस प्रोडेंस है। हिंदुत्व एक पर्टिकुलर क्लेम ऑफ द हिंदू लॉजिक विद इन दिस टेरिटोरियल नेशन स्टेट। उसको आप किस तरह देखते [संगीत] हैं? उसकी क्या डिमांड है और उसके कंट्राडिक्शंस क्या है? जो स्पिरिट है कॉन्स्टिट्यूशन का जो जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ था हम सभी के दरमियान मुझको देख के नहीं हिंदुओं को देख के नहीं। आप अपनी पॉलिटिक्स को शेप कीजिए उस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे जिसको हम कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया कहते हैं। व्हाट डस यू नो दी करंट फॉरेन पॉलिसी इन टर्म्स ऑफ इजराइल, गजा यू नो [संगीत] ईरान ये जाहिर करता है हिंदुत्व के ग्रैंड जियोपॉलिटिकल प्रोजेक्ट। ये जो इंटरनल रिफॉर्म की बहुत ज्यादा जरूरत है। बिफोर दिस वी एंगेज [संगीत] विद राइट विंग। बिफोर दिस वी अप्रोच टू द सेुलर पॉलिटिक्स ऑफ इंडिया। हमें इंटरनल रिफॉर्म की जरूरत है। रीइमेजिनेशन रिकंस्ट्रक्शन की जरूरत है। नाउ एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउस को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। आज हमारे साथ एक बहुत खास मेहमान है आुल्ला मेहदी साहब। हमारा आगा साहब दूसरा पडकास्ट है। जी पहला पडकास्ट भी काफी धुआंधार था। अल्हम्दुलिल्लाह। रियलाइजेशन ये था कि डिस्पाइट द फैक्ट दैट हम लोग कंप्लीटली इंडियन पॉलिटिकल डिस्कोर्स और कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क के विदिन डिस्कशन कर रहे थे। लेकिन उसके बावजूद जो एजी डिबेट्स हैं इंडियन मुस्लिम आइडेंटिटी को लेके वो कितना ज्यादा पीपल स्पेशली जो जिस तरह का अपरेटस बन चुका है वो कितना ज्यादा उसको डिमीन करना चाहता है उन डिबेट्स को चाहता है कि वो शट डाउन हो जाए और ताकि जो अभी हम बात कर रहे थे जो रियल क्राइसिस है थ्रूउ द वर्ल्ड और वो सिर्फ मुसलमानों का नहीं है दुनिया में जो वैल्यू सिस्टम बेस्ड आइडेंटिटी के जितने भी तसवुरात हैं वो कहीं ना कहीं चैलेंज्ड और थ्रेटेंड फील करते हैं। पिछले 100 साल में जो सेकुलराइजेशन ऑफ पॉलिटिक्स के नाम पे ह्यूमन राइट्स की वैल्यूस को सामने रखते हुए ये वादा किया गया कि जो दुनिया अब आएगी वर्ल्ड वॉर टू के बाद वो दुनिया बहुत इक्वल दुनिया होगी। रिस्पेक्टफुल होगी। वहां वॉर्स नहीं होंगी। वहां पे अच्छे ताल्लुकात होंगे। वहां पे मल्टीकल्चरलिज्म, मल्टीप्लूरलिज्म ये सब वायदे बहुत कॉन्फिडेंटली और मीडिया का इस्तेमाल करके, एकेडमिया का इस्तेमाल करके बाकी सारी जो भी शोबाजी हो सकती है और इंटरनेशनल इंस्टीटशंस, यूएन, डब्ल्यूho, आईएमएफ एक ही कोर मैसेज था कि दुनिया इज गोइंग टू बी अ स्टेबल वर्ल्ड। वर्ल्ड वॉर वन, वर्ल्ड वॉर टू ये एक्सेप्शन था। बिलकुल। यह एक्सेप्शन इसलिए था कि जो एक्सेस ऑफ़ ईवल और एक्सेस ऑफ़ रेजिस्टेंस और एक्सेस ऑफ़ गुड जिस तरह की वैल्यू और वर्चू को दुनिया के सामने रखना चाह रहा था उस वक्त जरूरी था कि बदी और जो दुश्मन है जो दुनिया को खत्म करना चाह रहा है उसको चैलेंज किया जाए। और वो होली वॉर थी। फिर हमें समझ आया कि ये होली वॉर्स किस तरह से तब्दील होती रहती हैं। वो होली वॉर फिर कम्युनिस्टों के साथ हो गई फ्रॉम द रशियन पर्सपेक्टिव। फिर वहां पे भी जब मामला तय हो गया तो फिर उस जमाने में ये जो हंटिंगटन और बाकी सारी चीजें कि भ इट्स अ सिविलाइजेशनल वॉर होने वाली हैं। क्लैश ऑफ क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन होने वाले हैं। उस जमाने में बड़ा ऐसा लगता था कि बहुत ज्यादा क्रिटिक भी था कि ये क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन क्या होता है? और उसमें वो जो सात सिविलाइजेशंस का उनका जिक्र इस्लाम हिंदूइज़्म क्रिश्चियनिटी फिर वर्ल्ड और बहुत सारी चीजें ऐसा लगता है कई बार क्या वो प्रेडिक्शन था या फिर वो तैयारी थी दुनिया को ये बताने की कि भ ये आने वाला है ये आने वाला है क्योंकि हम यही करेंगे फॉर एन एकेडमिक जो बहुत क्लोजली ऑब्जर्व कर रहा होता है जियोपॉलिटिक्स को बाकी सारी चीजों को वो कई बार प्रेडिक्टिव एनालिसिस कर रहे होते हैं। इसका मतलब ये नहीं है कि ही इज़ पार्ट ऑफ़ दैट मशीनरी। हम क्या डिबेट्स हो रहे हैं? क्या डिस्कशन हो रहा है? कौन क्यों बोल रहा है? आज की डेट में हम बेंजमिन नितिन याहू को बोलते हैं कि भाई वो ही इज ग्रेटर इजराइल प्रोजेक्ट और फिर वो 20 साल पुरानी 25 साल पुरानी वीडियो भी जब आती है तो हमें रियलाइज होता है ये बात जब भी वो यही बोल रहा था। सही। तो डिस्कोर्स बनता कैसे है? किस तरह से आइडेंटिटीज कंस्ट्रक्ट होती हैं? और उन कंस्ट्रक्शन ऑफ़ मेजॉरिटेरियन आइडेंटिटीज़ में माइनॉरिटीज़ को किस तरह सिखाया जाता है? कि वो अपने बारे में कैसे सोचें? हम हम और 2014 के बाद एज ए सिविलाइजेशन अब हम इसको यह बोलते हैं कि भ ये यूजली लोग बोलते हैं कि भ एथनो नेशनलिस्ट स्टेट है। मेरा ये कहना है कि भ ए एथनो नेशनलिज्म तो आपने एक जेरिक टर्म ले लिया। एथनो नेशनलिस्ट तो बहुत सारे स्टेट्स हैं। वो सही भी हो सकते हैं, गलत भी हो सकते हैं। एथनो नेशनलिज्म अपने आप में अगर वर्चू के साथ है क्या डिफाइन कर रहा है। हालांकि उसका क्रिटिक किया जा सकता है। बट दिस इज स्पेसिफिकली अ वेरी यूनिक काइंड ऑफ सिविलाइजेशनल स्टेट आइडेंटिटी। जो एक पर्टिकुलर हिंदूइज़्म के भी एक पर्टिकुलर बहुत मखसूस जो मेटाफिजिक्स है उससे आती है। एक पर्टिकुलर क्लास एक पर्टिकुलर क्लास एक पर्टिकुलर कास्ट की हरार्की इंटरप्रिटेशन जो हिंदूइज़्म के विद इन भी मुख्तलिफ इंटरप्रिटेशन है उसके बियों्ड आती है। और ये हम लोग मुख्तलिफ स्टेट्स में देख रहे हैं। अलग-अलग तरीके से ये एक्सपेरिमेंट्स अलग-अलग जर्नीज़ अलग-अलग स्पीड से हुआ है। कश्मीर भी उसका एक बहुत इंपॉर्टेंट एग्जांपल है। लेकिन आसाम भी है, बंगाल भी है, गुजरात भी है, यूपी भी है। आज की डेट में केरला की भी उनकी लोकलाइज़ेशन और कर्नाटका की डिफरेंट है। हम डिफरेंट ट्रेजेक्टरीज़ लीडिंग टुवर्ड्स अ कन्वर्जेंट गोल। तो आप लास्ट टाइम जो हमारा डिस्कशन हुआ वो ज्यादातर डिस्कशन आपसे मेरा ये था कि एज ए कश्मीरी पॉलिटिशियन जो जस्ट इंडियन नेशनल पॉलिटिक्स में आया है। वो क्या दुख लेकर आया है? क्या फेस किया उसने अपनी जिंदगी के उस 10 साल 15 साल 20 साल ऑफ एक्टिव लाइफ में वो हमारा डिस्कशन था के कश्मीर का क्राइसिस क्या है आज की डेट में मैं आघा उल्ला मेहंदी को एक डेढ़ साल से ऑब्जर्व करने के बाद मैं सिर्फ कश्मीरी पॉलिटिशियन की तरह नहीं देखता मेरे सामने वो वफ का भी इशू उठाते हैं। वो गजा का भी इशू उठाते हैं। वो एसआईआर डीलिमिटेशन इस तरह की चीजों पे भी बात करते हैं। तो डेफिनेटली यू आर ट्राइंग टू डेवलप अ डिफरेंट काइंड ऑफ़ एन आइडेंटिटी। और स्पेशली उस वक्त जब इंडियन मुस्लिम्स पॉलिटिकली भी और बाकी जितनी भी आइडेंटिटीज के बेससेस हैं क्राइसिस से गुजर रहे हैं। तो उस पर्टिकुलर पर्सपेक्टिव से उस आइडेंटिटी को कंस्ट्रक्ट करना जहां पे कश्मीर को सबसे ज्यादा वनरेबल समझा जाता है। वहां से इंडियन मुस्लिम आइडेंटिटी को डेयर करना कंस्ट्रक्ट करना ये अपने आप में एक बहुत बड़ा चैलेंजिंग टास्क है। तो सबसे पहला मेरा आपसे सवाल ये है कि ये जो एक डेढ़ साल हैं इस ख्वाब के साथ जो आप आए आपने एक्चुअली क्या देखा कि किस तरह का पिटिकल क्लाइमेट यहां पर एकिस्ट करता है और आपको क्या चैलेंजेस सामने महसूस हुए? बहुत-बहुत शुक्रिया इस पडकास्ट के लिए फिर से और आपने जिस तरह से कंस्ट्रक्ट किया और जिस तरह से क्वेश्चन आपने पोज किया। आपने मेरे इंटरनल जो थॉट प्रोसेस है उसको प्रोवोक किया। जवाब मैं इतना ही कहूंगा टू बिगिन विद मुझे लगता है इस डेढ़ साल के एक्सपीरियंस के बाद और हालात देखने के बाद मुझे लगता है जाती तौर के मेरे लिए इससे बेहतरीन वक्त नहीं हो सकता था टू कम इनू नेशनल पॉलिटिक्स मैं जब पार्लियामेंट में आया अब मैं बैकग्राउंड को उसको छोड़ के टू कट द लॉन्ग स्टोरी शॉट जब मैं पार्लियामेंट में आया मेरी प्राइमरी रिस्पांसिबिलिटी मेरे जेहन में भी और मेरी एक्टिव पॉलिटिक्स में भी उस वक्त ये थी कि कश्मीर ने जो चैलेंजेस क्राइसिस जो फेस किए हैं एकिस्टेंशियल क्राइसिस जो जिसके हम शिकार है उसका इलाज और उसका जवाब कैसे ढूंढना है और उसको कैसे रिप्रेजेंट करना है। जू ही पार्लियामेंट में आके नेशनल पॉलिटिक्स के साथ इंटरेक्शन हुई, सोसाइटीज के साथ इंटरेक्शन हुई, मुस्लिम सोसाइटीज के साथ इंटरेक्शन हुई थ्रूउ इंडिया। राइट विंग, लेफ्ट विंग, लिबरल वगैरह सब कुछ और स्टेट के साथ जो इंटरेक्शन हुई नेशन स्टेट के साथ एट दिस लेवल इससे पहले जो स्टेट लेवल तक जम्मू कश्मीर के लेवल तक जो इंटरेक्शन था आई थॉट मुझे लगता है कि मेरे लिए इससे बेहतरीन वक्त कोई हो ही नहीं सकता था। क्योंकि क्राइसिस है, चैलेंज है ना सिर्फ कश्मीरियों के लिए और ना सिर्फ मुसलमानों के लिए बल्कि पूरे हिंदुस्तान की आबादी के लिए इंडियन सोसाइटी एस वी नो इट एक क्वेश्चन मार्क है कि हम क्या है? हम पिटिकली क्या है? हम एथनिकली क्या है? कल्चरली हम क्या है? रिलीजियसली हम क्या है? और 70 साल की जर्नी हमारी क्या थी? हमारा सफर क्या था? और जो अब क्वेश्चन मार्क लगा है 70 साल के सफर पे जर्नी जर्नी पे इसके बाद हमें क्या होना चाहिए? क्या वो सही था या जो क्लेम किया जा रहा है राइट विंग की तरफ से इंडिया को लेके क्या ये सही है? अगर यह सही है तो 70 साल के का जो सफर था वो किस पे मनी था? उसके बेसिस क्या थे? क्या वो एक ख्वाब था? गफलत थी, धोखा था, इल्लुजन था या वो हकीकत थी और ये आज आज का जो क्लेम है राइट विंग का ये गलत है दोनों में से। तो ये क्राइसिस और इन सब क्राइसिस में नेविगेट कैसे करना है इंडियन मुस्लिम्स को? इंडियन मुस्लिम्स को अपने लिए क्या रोल देखना है? अभी तक शायद इतना बड़ा इतने बड़े क्राइसिस नहीं आए थे। चैलेंजिंग टाइम्स में इंडिविजुअल और सोसाइटी की भी कैपेसिटी कैपेबिलिटी उसका कैरेक्टर रिवील हो जाता है। और ये मैं हदीस के बुनियाद पे ये बात कह रहा हूं कि चैलेंजिंग टाइम पावर वगैरह इसी तरह के सिचुएशंस इंडिविजुअल या सोसाइटी के कैरेक्टर्स को रिवील करती है। तो हमारा कैरेक्टर किस तरह का है इंडियन मुस्लिम्स? इस पे बात करने की जरूरत है। इसमें क्राइसिस है। आई एज एन इंडियन मैं अक्सर कहीं-कहीं पर प्राइवेटली ये बातें करता हूं क्योंकि मेरे इंटरव्यूज या पडकास्ट या पार्लियामेंट में इंटरवेंशंस ज्यादातर लगता है कि आई ओनली स्टैंड फॉर कश्मीरी मुस्लिम्स एंड देन इंडियन मुस्लिम्स और ऐसा है नहीं। दिस इज़ नॉट वेयर आई कम फ्रॉम। मेरी मेरी नजर में द पॉलिटिक्स फॉर मी इज बियों्ड दिस क्योंकि हम एक बड़ी रियलिटी का हिस्सा है। हिंदुस्तान का हिस्सा है। तो मैं आइडेंटिटी पॉलिटिक्स नहीं कर सकता हूं। आई डोंट बिलीव इन आइडेंटिटी पॉलिटिक्स। मगर चकि मुसलमान इस वक्त और बहुत सारी माइनॉरिटीज इसी इसी तरह की एक क्राइसिस का शिकार है। स्टेट के अग्रेशन का शिकार है। तो नेचुरली मुसलमानों की बात करनी पड़ रही है इस वक्त। तो ज्यादातर लगता है कि शायद मैं आई रिप्रेजेंट आई आई वांट टू रिप्रेजेंट मुस्लिम पॉलिटिक्स ओनली नहीं मैं हिंदुस्तान को जिस तरह से हमने या हमारे फाउंडिंग फादर्स ने इस इसका तसवुर किया था इस क्राइसिस के बाद फिर से रीइमेजिन करना चाहता हूं और क्योंकि मुसलमान का रोल इस वक्त क्वेश्चन में है। मुसलमान कैसे अपने आप को इस इस इन हालात में खुद को मुसलमान भी देखता है और हिंदुस्तानी भी देखता है। तो मेरे लिए इतनी सारी जो क्राइसिस है चैलेंजेस है यह जो सवाल का मैं जवाब दे रहा था टू एड्रेस दीज़ चैलेंजेस टू फाइंड आंसर टू दी क्राइसिस एंड टू इवॉल्व नॉट एज एन इंडिविजुअल बट कलेक्टिवली एस पार्ट ऑफ दी सोसाइटी इससे बेहतर टाइम नहीं हो सकता था टू कम इंटरनेशनल पॉलिटिक्स क्योंकि यहां से शेप दे देने में जो आप रोल कर सकते हैं जो अंडरस्टैंडिंग आप डेवलप कर सकते जो पॉलिटिक्स आप डेवलप कर सकते हो वो अदरवाइज नॉर्मल हालात में आप नहीं कर सकते। एक इंटरेस्टिंग बात आपने ये बोली के जो 70 साल के तजुर्बात हैं हिंदुस्तान के एक एज ये फॉर्मेटिव इयर्स थे एस अ नेशन स्टेट एस अ पॉलिटी और उसमें जो फाउंडिंग फादर्स के या फिर आइन कॉन्स्टिट्यूशन जिन बुनियादी उसूलों के को सामने रखते हुए वजूद में आया तो उसके जो पर्टिकुलर क्लेम्स थे वो 70 साल में टेस्ट हुए और मुख्तलिफ जो एक्टर्स हैं, ग्रुप्स हैं, इंडियन पॉलिटिकल जिसे कहते हैं लैंडस्केप में उनके इंटरेक्शंस हुए। एक डायनेमिक रियलिटी प्रोड्यूस हुई कि भाई लेफ्ट भी फॉर एग्जांपल या सोशलिस्ट भी जेपी मूवमेंट में आरएसएस से साथ ले सकते हैं। बिल्कुल। लोहिया भी ले सकते हैं। अभी हमने टीएमसी बंगाल में देखा कि किस तरह से हो रहा है मामलात। टीएमसी का खुद क्या ताल्लुक रहा। यू नो फ राइट पॉलिटिक्स से 15 साल का जो उनका पूरा जर्नी है उसके अलावा भी हर जगह पर कब कहां किसने अन्ना मूवमेंट बाकी सारी चीजें ये सामने तो उन सब चीजों को जब हम सामने रखते हैं 70 इयर्स में अनफॉर्चूनेटली जो आपने दूसरी बात बोली कि हमारा इसको आजादी बोले जो ऑफ कोर्स हिंदुस्तान के या फिर वो जो लार्जर ब्लॉक जिसे हिंदुस्तान समझा जाता था उसका पार्टीशन बोले उसके बाद मुसलमानों का हिंदुस्तान में नेचुरल जो रिस्पांस रहा वो आइडेंटिटी पॉलिटिक्स का रहा। वजह ये थी कि भ वो इमीडिएट जो क्राइसिस था लेकिन उसके बनिस्बत मुसलमानों की आईडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स क्या है? हम वो शायद सवाल पीछे छूट गया और 70 साल के इस एक्सपीरियंस के बाद वो सवाल उठाना जरूरी के हम एज ए टेरिटोरियली डिफाइंड मुस्लिम आइडेंटिटी भी किस तरह का देश नॉट जस्ट फॉर आवरसेल्व्स फॉर द लार्जर जो इंडियंस हैं वो क्या चाहते हैं तो ये एक डिफरेंट गेज है डिफरेंट लेवल है तो ये जो 70 साल का जो पिटिकल एक्सप्रेशन है मुस्लिम कम्युनिटी िटी में जब आपके सामने रियलिटीज आती हैं। कैपिटलिज्म और कैपिटलिस्ट स्टेट में डिफरेंस है। इसी तरह इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन के वादों में और इंडियन कॉन्स्टिट्यूशनलिटी के मैनिफेस्टेशन में वो स्टेट एक्टर्स जो स्टेट की पावर को अस्यूम करेंगे किस आइडियोलॉजी से लेकर आ रहे हैं वहां से इंटरप्रिटेशन और रीइटरप्रिटेशन होता है। और उस रिस्पांस में मुस्लिम पॉलिटिकल आइडेंटिटी कंस्ट्रक्ट रिकंस्ट्रक्ट होती चली गई। बिल्कुल। तो ये जो हैंगओवर है 70 साल के डिफरेंट काइंड ऑफ पॉलिटिकल मुस्लिम आइडेंटिटीज जिन्होंने अलग-अलग रूल्स लिए हम आप जब आए आप ऑफ कोर्स कश्मीर के पर्सपेक्टिव से इस इंटरप्ले को देख रहे थे। इंडियन नेशनल पॉलिटिक्स में आपने पिछले एक डेढ़ साल में किस तरह की मुस्लिम पॉलिटिकल आइडेंटिटीज देखी? हम उसका कोई मैपिंग है आपके सामने कि मुसलमान क्या कर रहा है? क्या उसकी डिसीजन मेकिंग की पर्सेक्टिव है और कहां पे आके आपको लगा कि कंट्राडिक्शन फेस हो रहे हैं। इसीलिए मैंने कहा कि देयर कुड हैव बीन अ बेटर टाइम फॉर मी टू कम इंटरनेशनल पॉलिटिक्स। मुझे कुछ कमियां लगी। चैलेंज है। चैलेंज के जवाब में रिस्पांस नहीं है। एक कंप्रहेंसिव पॉलिटिकल फिलॉसफी नहीं है। कुछ हम पे तोहमतें लगाई जाती है मुस्लिम सोसाइटी पे। उन तोहमतों का ना तो पॉलिटिकल जवाब है। ना इस तरह से एकेडमिक कोई काम किया गया है ना कोई एक फिलोसफी मुरतब की गई है जिसको लेके मुस्लिम सोसाइटी उस बात पे खड़ी हो जाती कि आप चाहे जितनी भी इंटरप्रिटेशन हमारे बारे में करो दिस इज व्हाट वी आर और रिएक्टिव पॉलिटिक्स मैंने देखी सिर्फ इस हद तक कि जितने भी मुस्लिम लीडरशिप पॉलिटिशियन या ऑर्गेनाइजेशंस आप आप देखें कहीं पे लिंचिंग होती कहीं पे इस तरह के राइट्स वगैरह भी हुए या बयानात आ जाते हैं राइट विंग की तरफ से पॉलिटिशंस की तरफ से लिबास पे खाने पे किसी एक इंडिविजुअल की लिंचिंग हो जाती है। उसके रिएक्शन में बातें होती है। वफ अमेंडमेंट बिल आया तो उसके रिएक्शन में बातें हुई। एक कंप्रहेंसिव जो ये कहा जाता है कि कंपैटिबिलिटी नहीं है मुस्लिम्स की। सवाल यही है ना इस वक्त क्राइसिस यही है। राइट विंग का क्लेम ही यही है आरएसएस का और बीजेपी का कि मुस्लिम्स आर नॉट कंपैटिबल विद दिस सोसाइटी और ये दुनिया में कहीं पे भी कंपैटिबल नहीं है। ये जहां पे भी है इनका कंफ्लिक्ट है सोसाइटीज के साथ। अ मैंने डिस पॉलिटिकल डिस्कोर्स में इसका जवाब कहीं पे देखा ही नहीं। इस चीज पे एंगेज करते हुए किसी को देखा ही नहीं। या तो अंडरस्टैंडिंग की कमी है इस इस हवाले से। या खुद में वो क्राइसिस है सवाल है जिनको क्ल क्लियर नहीं किया गया है अभी तक जिस क्लेरिटी के साथ आके राइट विंग को एंगेज करते और ये कहते कि नहीं आपकी ये जो क्लेम गलत गलत है और इस इस बुनियाद पे गलत है तो वो क्लेरिटी और वो फिलॉसफी उस पे काम नहीं हुआ है उस उसका कोई डिस्कोर्स ही नहीं है ना वो इंस्टीट्यूशनलाइज हुआ है ना वो पॉलिटिसाइज हुआ है इन इन बेटर टर्म्स वो वाला पॉलिटिसाइज नहीं एक पॉलिटिकल डिस्कोर्स नहीं बनाया गया है। तो व्हाट इज अ मुस्लिम सोसाइटी इन इन अ नेशन स्टेट कॉल्ड इंडिया? हाउ डस अ मुस्लिम सी हिमसेल्फ अ मुस्लिम एंड एज एन एस एन इंडियन एट द सेम टाइम? मुसलमान मुसलमान कैसे हो सकता है? और साथ ही साथ हिंदुस्तानी भी कैसे हो सकता है? या इसी इसी तरह यूरोपियन भी कैसे हो सकता है? किसी और मुल्क का अमेरिकन कैसा हो? कैसे हो सकता है? इस सवाल का कंप्रहेंसिव जवाब और फिलॉसफी अभी तक जो है ना मैंने डिस्कोर्स में देखी और ना पॉलिटिकल सतह पे वो वो डेप्थ भी देखी गोश्त पे बातें होती है। वेज नॉनवेज खाने पे बातें होती है। लिबास पे बातें होती है। लाउडस्कर पे बातें होती है। रिएक्टिव डिस्कोर्स यही है ना? जी। मुस्लिम पॉलिटिक्स इस हद तक अभी इवॉल्व नहीं हुई है कि राइट विंग जहां पे वो लूप होल्स जो हमने लूप होल्स छोड़े हैं उन लूप होल्स को देख के हमारी एकिस्टेंस पे सवाल करते हैं। हमारी कंपैटिबिलिटी पे सवाल करते हैं। उसका मैंने जवाब नहीं देखा है। एंड मैं ये कहता चलूं इसीलिए मैं समझता हूं कि इस तरह के मौके जो है एक खास किस्म की खिदमत करने का मौका दे देता है। शायद मेरे लिए एक एक अपोरर्चुनिटी है के हिंदुस्तान में ये पॉलिटिक्स कैसे की जाए पहले लेवल पे क्योंकि मुसलमान इस वक्त क्राइसिस का शिकार है इसलिए मुस्लिम सतह पे पॉलिटिक्स करने की जरूरत है। एक मुस्लिम पॉलिटिकल फिलॉसफी कैसे शेप की जाए ऑन द बेसिस ऑफ़ द टीचिंग्स ऑफ़ कुरान एंड सुन्न और जो हमारे असलाफ ने जो मिसाले छोड़ी है उनकी बुनियाद पे ये साबित कैसे किया जाए कि हम कंपैटिबल कंपैटिबल है और ना सिर्फ कंपैटिबल है वी वी कैन बी अ कंट्रीब्यूटरी फोर्स टू टू द सोसाइटीज उ्मा का जो कांसेप्ट है उसको रिशेप करने की कैसे जरूरत है हमने हमने कैसे उस कांसेप्ट को गलत तरीके से समझा है। जिन लूप होल्स को देख के शायद हम पे उंगलियां उठाई जाती है। उन गैप्स को फिल करने की कैसे जरूरत है? उसको रीइमेजिन करने की कैसे कैसे जरूरत है? देखिए हम क्राइसिस का शिकार खुद भी है। मुसलमान क्राइसिस का शिकार खुद भी है विद इन। इसीलिए हम हम कहीं पे वो इतना फ्रजाइल बन जाते हैं कि राइट विंग उसका फायदा उठाते हैं। हम उमा है। ये भी हमारे अंदर एक एक डिजायर भी है। एक ड्राइविंग फोर्स भी है। साथ ही साथ हम इस मुल्क का हिस्सा भी है। ये दोनों चीजें जो है हमारे अंदर जो है कभी कबभार क्लैश लाती है। अगर आप इस्लाम की तरफ चले जाए, इस्लामिक फिलॉसफी की तरफ चले जाए जो 1400 साल के अंदर जो इवॉल्व हुई है पिटिकल फिलॉसफी तो उसमें ये क्लैश नहीं है। उसमें तसवुर ही अलग है। कुरान में भी तसवुर ही अलग है। हदीस में भी तसवुर ही अलग है। और फिर इस्लाम ज ही दूसरी सोसाइटीज तक एक्सपेंड करता गया। फिर लीडर्स के जो जितने भी मुजद्दि उठे उनके बिहेवियर में या उनके काम में भी वो दिखता है कि तसवुर ही अलग है। क्लैश नहीं है। अ ये इस्लाम जो ही एक्सपेंड होता है इन इट्स स्पिरिट ये कंपैटिबल भी है, कंट्रीब्यूटर भी है और ये क्लैशिंग भी नहीं है। मुस्लिम सोसाइटी जो है थ्रूउ इंडिया इस तरह से इस इस डिस्कोर्स पे इन्होंने काम नहीं किया है। इस इस डिस्कोर्स पे काम करने की जरूरत है ताकि नंबर एक राइट विंग के खिलाफ एक सब्सटैंशियल और प्रैक्टिकल जवाब भी हो जो प्रैक्टिसिंग हमारा कैरेक्टर हो उस प्रैक्टिसिंग कैरेक्टर से भी जवाब मिले। पॉलिटिकल डिस्कोर्स मिले। पॉलिटिकल आईडियोलॉजी मिले। दूसरा हिंदुस्तान में बहुत सारी ऐसी मैं अभी भी कहूंगा कि मेजॉरिटी है जो राइट विंग नहीं है। उनके साथ एंगेज करने में आसानी हो जाए। उनका हमारे साथ एंगेज करने में उनके लिए भी आसानी हो जाए। वी कैन हैव अ कॉमन ग्राउंड जहां पे वो उस मुस्लिम या इस्लामिक फिलॉसफी के साथ आइडेंटिफाई करने में भी कोई दिक्कत ना समझे। उस नुकसान ना समझे और उसके साथ मिलके वो काम भी कर सके। तो मेरे लिए आई थिंक दो-तीन सवालों का जवाब ढूंढना जरूरी है जिस पे हम एंगेज करने की जरूरत है। हम मुसलमान हैं, हम हिंदुस्तानी भी हैं। हमारी जिओपॉलिटिकल इंटरेस्ट भी है, ग्लोबल इंटरेस्ट भी है। हाउ डू वी सी आवरसेल्व्स एस मुस्लिम्स? हाउ डू वी सी आवरसेल्व्स एस इंडियन मुस्लिम्स? हाउ डू वी सी आवरसेल्व्स एट वी आर वी द ग्लोबल इंडियन मुस्लिम्स एंगेजिंग इन द ग्लोबल लैंडस्केप? ग्लोबल लैंडस्केप। तो इन सब चीजों पे बात करने की जरूरत है। इवॉल्व होने की जरूरत है। डिबेट्स करने की जरूरत है। आइडियाज डेवलप करने की जरूरत है। मैं जो बातें करूंगा इट्स नॉट नेसेसरी। जरूरी नहीं है कि सब की सब सही हो। बट एक डिस्कसिव नेचर है और डिस्कशन का होना बहुत जरूरी है। आपने दो तीन चीजें बहुत इंटरेस्टिंग कही और उसमें सबसे इंपॉर्टेंट जो चीज कही आपने कि भ हमारे पास मौजूदा दौर की पिटिकल फिलॉसफी शायद नहीं है। और आपका इशारा ये भी रहा कि इस्लाम के अब वजूद में तो वो शुरू से है। हमारे अपने अकीदे के हिसाब से हजरत आदम अल सलाम से इस्लाम की शुरुआत है। और हजरत मोहम्मद सल्लल्लाह वसल्लम के दौरान पे वो उस उस टाइम की जो पिटिकल रिक्वायरमेंट्स हैं उसकी ऑर्गेनाइजेशन और जिसे कहते हैं इंस्टीट्यूशनलाइजेशन का फाइनल दौर के लिए नेचर है और उसमें इंप्लसिट आर्गुमेंट ये है कि दुनिया का जो फाइनल लेग है उसमें इस पिटिकल फॉरमेशन की जो थ्योरी एज अ प्रैक्टिकल एप्लीकेशन प्रॉफेट मोहम्मद सल्लल्ला वसल्लम ने अप्लाई की अपनी जिंदगी में उसमें हाइपोथेटिकली स्पीकिंग ऑल दी पॉसिबल पोटेंशियल्स ऑफ कंस्ट्रशंस एंड रिकंस्ट्रशंस अवेलेबल हैं। दूसरी बात आपने बोली के 1400 साल में हम एज ए उमैटिक सिविलाइजेशन नॉट एज ए रीजनल पर्टिकुलर एथेनिक ग्रुप बिलोंगिंग टू दी इस्लामिक वर्ल्ड व्यू और बीइंग अ मुस्लिम। उसने [नाक से की जाने वाली आवाज़] एक तरीके का एक्सपेंशन देखा और उसमें उसने जो कम्युनिटीज आती चली गई उनके लिए जुरिस्प्रूडेंशियल लॉजिक दिया। अब जैसे फॉर एग्जांपल अक्सर ये बात होती है कि भ जो मौजूदा मॉडर्निटी है उसने लीगल प्लूरलिज्म दिया। बट ये बात गलत है। लीगल प्लूरलिज्म का जो प्रॉपर जुरिस्प्रुडेंशियल फॉर्म है वो इस्लाम ने दिया है। लेकिन अगर हम इसको क्रिटिकली देखें ये 1400 इयर्स ऑफ़ ट्रेडिशन इज अ ट्रेडिशन वेयर इस्लाम इज डिफेक्टो दी सोवरन पर्सपेक्टिव थ्रू व्हिच स्टेट्स आर बीइंग कॉन्स्टिट्यूटेड एंड कंस्ट्रक्टेड। 1857 के बाद हिंदुस्तान में और 1923 के बाद जनरली स्पीकिंग पूरी दुनिया में जो एक बड़ा क्राइसिस ये आया कि प्रॉफिट की पोस्ट मदीदन पॉलिटिक्स का इंस्टीट्यूशनलाइजेशन एक 1400 साल रहा लेकिन उनकी जो मैकन पॉलिटिक्स है जहां पे स्टेट का भी कंसेप्चुअलाइजेशन फ्रॉम द इस्लामिक पर्सपेक्टिव है भी नहीं लेकिन पॉलिटिक्स का है रेजिस्टेंस का है वैल्यूस का है आपको को क्या लगता है कि फ्रॉम आवर ऑफ कोर्स ये डिबेट्स 20थ सेंचुरी में हुई है। लेकिन क्या वो डिबेट्स इवन फ्रॉम स्कॉलरली पर्सेक्टिव इन इस्लाम एक तो उसका एकेडमिक हो गया है कि उसका पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशनलाइजेशन हो गया। लेकिन उसकी एक्चुअल फिककी अकायद के लेवल पे क्या जो इस्लाम का रिकंस्ट्रक्शन पॉलिटिकल थ्यरी पे होना चाहिए? पॉलिटिकल फिलॉसफी में होना चाहिए। क्या वो भी उस लेवल पे हुआ है या नहीं? नहीं हुआ है। मैं इंडियन कॉन्टेक्स्ट में बात करूंगा। कम से कम यहां पे नहीं हुआ है। मैं ये टर्म यूज़ करूंगा शायद कहीं पे ना हो। लूज टर्म फिकु सियासत जो है हम पिटिकल जुरिस प्रूडेंस जो होनी चाहिए थी जिसको लेके जो गाइडिंग प्रिंसिपल होता हमारे लिए पता होता कि उसूल क्या होते हैं? मकासिद क्या होते हैं? एज अ माइनॉरिटी [गला साफ़ करने की आवाज़] आप उसप कहीं कभी बात ही नहीं हुई है। कभी हमने लेफ्ट विंग को अपनाया है। उनके वैल्यूज को अपनाया है। कहा है कि हम इनके साथ आइडेंटिफाई करते हैं। कभी हमने लिबरल मूवमेंट को अपनाया कहा है कि किसी हद तक हम इनको अपनाते हैं। बाय नेचर हम राइट विंग के साथ अक्सर आइडेंटिफाई करते हैं विदाउट रिलीजियस पर्सेक्टिव रिलीजियस पर्सेक्टिव विदाउट सेइंग दैट तो मगर हां क्योंकि हमारे रिलीजन के नाम पे नहीं होता है वो राइट विंग एक्टिविज्म या राइट विंग पॉलिटिक्स इसलिए हमें उसके साथ नफरत है। अगर हमारे रिलीजन के नाम पे हो उसको सेलिब्रेट करते हैं। हम उसको सेलिब्रेट करते हैं। तो हम जैसा कि मैंने पहले भी कहा हम रिएक्टिव है। हमने खुद से कभी कोई पॉलिटिकल उसूल जो है नहीं बनाया है। मुरत्तब नहीं किया है। चाहे राइट विंग होता, चाहे लिबरल मूवमेंट या आईडियोलॉजी होती, चाहे लेफ्ट विंग होता। हम किसी से इफेक्ट नहीं होते। कोई हमें गाइड नहीं करता या कोई हमें अट्रैक्ट नहीं करता। हम चीजों को अट्रैक्ट कर पाते या हम चीजों को कॉम्प्लीमेंट कर पाते। लेट्स नॉट से अट्रैक्ट कॉम्प्लीमेंट कर पाते या हम करेक्शन दे पाते। हमने हर डायरेक्शन में आइडेंटिफाई जाने जाने के बाद खुद को उनके साथ आइडेंटिफाई करने की कोशिश की है। म खुद से एक प्रिंसिपल बना के खुद से इंप्लीमेंट करके वो इंस्पायर करने की कोशिश नहीं की है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] देयर इज़ अ लॉट दैट वी कैन इंस्पायर अदर्स विद। अगर हम दो तीन चीजों को छोड़ दें अगर हम खुद भी खुद से राइट विंग निकाल दें कि अथॉरिटेरियनिज्म होना चाहिए इस्लाम के नाम पे पहले ये चीज अगर हम निकाल दे दूसरा अगर वो तसवुर निकाल दे कि ये जरूरी है इस्लाम में कि आप जहां पे भी है इस्लामिक लॉज़ 100% उसी लिटरली उसी तरीके से इंप्लीमेंट होंगे जिस तरह से हुजूर ने मदीना में इंप्लीमेंट किए थे। लॉज़ मैं प्रिंसिपल्स की बात नहीं कर रहा हूं। समझ अगर इस इसको हम डिबेट करके इस इस हद तक इवॉल्व हो सकते हैं कि नहीं लॉज़ के बजाय हुजूर के प्रिंसिपल्स को इंप्लीमेंट करने की जरूरत है उसप काम पे काम करने की जरूरत जरूरत है। लॉज़ को इमिटेट करने की एज दे वर लिटरली जरूरत नहीं है। गुंजाइश नहीं है और रिक्वायरमेंट भी नहीं है। कुरान ने हमसे ऐसा नहीं मांगा है। सीरत में ऐसा नहीं मिलता है। और बाकी के जो उसके बाद सिलसिले मिलते हैं उसमें हमें ऐसा नहीं मिलता। अगर वो अर्ज या वो जरूरत उस पे डिबेट हो और उससे फिर निकला जाए तो हम एक फिलॉसफी बना सकते हैं। जिस फिलॉसफी के बुनियाद पे हम कॉम्प्लीमेंट भी कर सकते हैं और अटैक भी कर सकते हैं। हमें कभी लेफ्ट विंग गाइड नहीं करेगा। हमें कभी लिबरल मूवमेंट गाइड नहीं करेगी। हमें कभी राइट राइट विंग ना इंटिमेडेट करेगी ना गाइड करेगी। हम चीजों को थोड़ा शेप करने में मदद कर सकते हैं। तो ये सब करने क्या इस तरह से कुरान को पॉलिटिकल डिस्कोर्स में कितना लाया है? बीफ को आपने पॉलिटिकल डिस्कोर्स में लाया है? आपने लाउडस्पीकर को पॉलिटिकल डिस्कोर्स में लाया है। सड़क पे नमाज पढ़ने को आपने पॉलिटिकल डिस्कोर्स में लाया है। क्या आपने इन सब चीजों को पहले कुरान के साथ क्रॉस चेक किया है? फिर इन सब चीजों से भी बड़े ऑब्जेक्टिव्स हैं। यूनिवर्सल ऑब्जेक्टिव्स हैं कुरान में। क्या आपने उनको पॉलिटिकल डिस्कोर्स में लाया है? कभी मैं हिंदुस्तान के मुसलमानों से ये सवाल पूछ रहा हूं। आप पूरा मुझे लगता है मौलाना आजाद के बाद शायद ही इस तरह का काम हुआ हो। हम जो उनके काम में भी मुझे लगता है बहुत हद तक इस इस लिमिट तक नहीं गए हैं। वो कुरान के प्रिंसिपल्स को ह्यूमन वैल्यूस को यूनिवर्सल वैल्यूस को पिटिकल डिस्कोर्स बनाने की कोशिश कब की है मुसलमानों ने? वो फिलॉसफी मुरतब करने की कोशिश कब की है मुसलमानों ने? कुरान क्या कहता है मुझे? मैं हिंदुस्तानी हिंदू के साथ कैसे जिंदगी करूं? किन बुनियाद पे? किन उसूलों पे? व्हाट एम आई टू हिम? व्हाट डू आई ब्रिंग टू हिम? मैं उसके लिए क्या हूं? यह डिस्कोर्स हमने कब बनाया है? यह बात हमने हिंदुस्तानी हिंदू सोसाइटी तक कब पहुंचाई है? हमने जब भी पहुंचाई है बात या सड़क पे हमें नमाज पढ़नी है या बीफ खाना है या लाउडस्कर पे अजान देनी है या मस्जिद के डेमोलिशन पे जो है रिएक्टिव बात होगी। उस पे बात होना जरूरी है। मगर वो रिएक्शन में है ना। इससे बाहर ज्यादा से ज्यादा लिबास पे बात होगी। ज्यादा से ज्यादा लैंग्वेज पे बात होगी। गेटवाइजेशन पे बात होगी। इससे ज्यादा बात कब हुई है? ठीक है? इकोनॉमिक्स पे बात हो हुई है किसी हद तक। सोशल स्टेटस क्या है मुस्लिम्स का वगैरह। पर हम मुस्लिम आइडेंटिटी की बात कर रहे हैं ना। तो मुस्लिम कम्स फ्रॉम इस्लाम। इस्लाम पहले है क्या? जो डेवलपमेंट पर्सपेक्टिव से भी जो बात हुई है वो मर्तिया सेन ने क्या कहा? डेवलपमेंट पैराटर्स क्या हैं? गोल्स क्या होने चाहिए? उसके वो भी कोई इस पर्सपेक्टिव से नहीं हुआ कि इक्वलिटी के इकोनॉमिक उसूल क्या होने चाहिए? नेचर ऑफ़ कॉन्ट्रैक्ट ऑफ इकोनॉमिक्स क्या होना चाहिए? मार्केट का नेचर क्या होना चाहिए? आप खुद क्लेम करते हैं इस्लाम एक मुकम्मल जाबे हयात है। आपने वो जाबते हयात को लोगों के सामने पेश किया लोगों के सामने कैसे पेश किया? जितना भी किया है दैट इज वो क्लैशिंग है। प्री मॉडर्न स्पिरिचुअल पर्सपेक्टिव से ये बोल दिया कि भ ऐसे हुआ करता था। हुआ करता था। एंड विदाउट अंडरस्टैंडिंग दैट आप चाहते हैं कि उसको उसी तरह से इंप्लीमेंट करें। नहीं ऐसा ऐसा नहीं है। इसीलिए ये क्लैशेस है। इस पे काम करने की जरूरत है। तो एक और चीज जो बीच-बीच में आई वो ये आई कि हमारा जो सेुलर आईडियोलॉजीस हैं उनसे भी जो रिलेशन है वो क्या रहा है? क्योंकि अक्सर हम जब बात आप भी बोल रहे हैं, हम भी बोलते हैं यूजली हम राइट विंग एज एन आईडियोलॉजिकल फ्रेमवर्क ने जो हमारे खिलाफ जो चीजें कर रहे हैं या करी वो हमारे सामने ज्यादा विज़िबल रहती हैं। और सेकुलर पॉलिटिक्स को भी देखने के अब दो नजरिए हो गए हैं। अब एक नजरिया वो हो गया है कि जो प्योरली जीरो सम गेम की तरह उनको यह होल हार्टेडली कि भई दे आर द पीपल जिनकी वजह से अब हम इस हालत में हैं। रादर देन ये देखना कि भ किसी भी कॉम्प्लेक्स डेमोग्राफिक रियलिटी में कॉन्ट्रैक्ट नेगोशिएशंस मूवमेंट्स और पॉजिटिव अलाइनमेंट्स में जब आपको स्पेस मिलती है आप क्या इंस्टीट्यूशनलाइजेशन करते हैं और उससे फर्दर नेचर ऑफ द पॉलिटी और सोसाइटी कैसे इवॉल्व होता है और दूसरा ये है कि जिसमें हम लोगों ने कंप्लीटली उनके ताबे हो गए जी के दो एक्सट्रीम्स में हम लोगों ने देखा तो आज की डेट में आप जब अपोजिशन पार्टीज के साथ भी इंटैक्ट करते हैं। राहुल गांधी को लोग आइकॉन बताते हैं या फिर यूपी में यादव हैं या फिर इधर यादव है बिहार में या कर्नाटका में कोई और है। महाराष्ट्र में कोई और है बंगाल में देयर इज़ ऑलवेज अ सेुलर फिगर जैसे ममता बनर्जी को सामने रखा गया सारी चीजें। कहां आपको लगता है कि वो एक तो लिमिट्स ऑफ कोर्स हमारी अपनी है जो हमारी पॉलिटिकल थियोलॉजी होनी चाहिए इंडियन कॉन्टेक्स्ट में लेकिन थियोलॉजी अगर वर्ड हटा दें सिंपल पॉलिटिकल फिलॉसफी रखें सेकुलरिज्म की उनके भी एक अपने मकासिद हैं। उनके भी उसूल हैं। तो आपके पर्सपेक्टिव से क्या वो उसूल क्योंकि अक्सर अब जैसे बंगाल हादसे चला गया। अरे मुसलमानों ने वोट नहीं दिया। बिहार में फलानी जगह पे मुस्लिम कुछ जगह लड़ लिए। अरे ये मुसलमानों की वजह से हुआ वोट वो ये सारी चीजें हो गई। वो जो इमीडिएट अपने लॉस का पूरा भार मुसलमानों पर डाल देना और पूरे 15 साल से 16 साल से 2014 के बाद जो पिटिकल फिलॉसफी और एक्टिविज्म आपने दुनिया के सामने रखा हिंदुस्तान में हिंदुओं के सामने। मुसलमान तो आपको वोट कर ही रहा है। आपने हिंदुओं को और दूसरे रिलीजन के जो लोग हैं उनको कन्विंस नहीं कर पाया या दूसरे कि भ आपको वोट दें। ये जो कंट्राडिक्शन है सेुलर पॉलिटिक्स का जानते हुए कि वो हमारे अलाइस हैं। आगे हम उसको डील भी करेंगे। लेकिन उनकी तरफ से क्या कोताही आपको लग रही है कि हो रही है? वो भी आइडेंटिटी क्राइसिस का शिकार है। कभी उनके उनको लगता है कि मुस्लिम्स के लिए या मुस्लिम राइट्स के लिए हमें एक हद तक जाना चाहिए। फिर लगता है कि नहीं हम ज्यादा ही शायद मेजॉरिटी पापुलेशन से दूर हो रहे हैं। कुछ मिसाले छोड़ के अक्सर जगहों पे यही देखा जाता है इन पॉलिटिकल पार्टीज में क्लेरिटी ऑफ़ और कन्विक्शन ऑफ स्टैंड फॉर द प्रिंसिपल्स वो नहीं है। मैं अगर इनसे एंगेज करूं मैं इस बात पे एंगेज नहीं करूंगा कि आप मुसलमानों के लिए खड़े हो जाए। आप मुसलमानों के लिए इन्वेस्ट करें सेकुलरिज्म को। नहीं मैं उनसे इतना ही इतनी ही तवकको रखूंगा एक्सपेक्टेशन रखूंगा कि यू फॉल बैक टू द प्रिंसिपल्स ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन जो स्पिरिट है कॉन्स्टिट्यूशन का जो जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ था हम सभी के दरमियान मुझको देख के नहीं हिंदुओं को देख के नहीं आप अपनी पॉलिटिक्स को शेप कीजिए उस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे जिसको हम कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया कहते हैं। आप भी उतना ही ऑनेस्ट रहिए उस कॉन्ट्रैक्ट के साथ। हमसे भी एक्सपेक्ट हमसे भी वही जो है आप डिमांड कीजिए कि हम उस कॉन्ट्रैक्ट के साथ उतने ही ऑनेस्ट रहे और डेडिकेटेड रहे कॉन्ट्रैक्ट को हम कॉन्स्टिट्यूशन को हमने छोड़ दिया है। कॉन्स्टिट्यूशन के स्पिरिट को प्रोटेक्ट करने की जो अर्ज है नीड है इस वक्त होनी चाहिए थी वो नहीं है। हमारे सामने इंस्टिट्यूशन कॉन्स्टिट्यूशन ये सब कुछ खत्म हो रहा है। और आइडेंटिटी पॉलिटिक्स चाहे वो सेकुलरिज्म हो चाहे वो राइट विंग हो चाहे सेकुलरिज्म वि मुस्लिम हो माइनॉरिटीज हो ये सब आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के दायरे में ही फंस चुका है। प्रिंसिपल्स और जो जिसे कहते हैं ना स्टैंडर्ड वो मीजान मीजान की स्टैंडर्ड की और प्रिंसिपल की प्रिंसिपल्स की पॉलिटिक्स नहीं होती है। अगर कांग्रेस इसी तरह से समाजवादी पार्टी डीएमसी डीएमके अब ऐसे ही टीवी टीवी के जो नई पार्टी आई है साउथ में और बहुत सारी पॉलिटिकल पार्टीज इफ दे फॉल बैक ऑन आइडेंटिटी पॉलिटिक्स के बजाय छोड़े मुस्लिम्स के लिए किसी इशू पे बात करना नहीं करना ये सब छोड़ दीजिए आप आप ओवरऑल जो हमारा कलेक्टिव कॉन्ट्रैक्ट है जिसे कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया कहते हैं उसके स्पिरिट उसके कंप्लीट इंप्लीमेंटेशन और फंक्शनल डेमोक्रेसी के लिए आप डेडिकेटेड हो जाए और वहां पे कहे नो कॉम्प्रोमाइज इंस्टीट्यूशन जहां पे में कंप्रोमाइज होता है हम खड़े हो जाएंगे। चाहे वो मुसलमान के खिलाफ हो कंप्रोमाइज चाहे वो हिंदू के खिलाफ हमें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। कॉन्स्टिट्यूशन शुड बी फंक्शनल डेमोक्रेसी शुड बी फंक्शनल। ये फंक्शनल होनी चाहिए। मुसलमान के लिए भी, हिंदू के लिए भी, सिख के लिए भी, ईसाई के लिए भी। अगर इस स्पिरिट पे अगर इस पॉलिटिकल आईडियोलॉजी पे सेकुलरिज्म वापस आ जाता है तो बहुत सारी चीजों का इलाज हो जाएगा। बहुत सारी क्लेरिटी आ जाएगी। बहुत सारी चीजें आसान हो जाएगी सेकुलर पॉलिटिक्स के लिए। वो खुद परेशान है। वो उनकी पॉलिटिकल आईडियोलॉजी राइट विंग के रिएक्शन में है। कभी सेुलर होना चाहते हैं, कभी सेुलर होने से डरते हैं। इश्यूज उनको पता नहीं है। रिएक्टिव इशूज़ है। इकॉनमी पे कभी बात करते हैं मगर फिर अचानक से वो डिस्कोर्स वो डिस्टेंट हो जाता है। गैप आ जाता है। जो स्ट्रीट पे एक आम हिंदुस्तानी है वो उस इकॉनमी के डिस्कोर्स में वो गैप आ जाता है। फेडरेशन पे बात करनी जरूरी है। बजाय इसके कि वो किसी खास एक आइडेंटिटी पे बात बात करे। एक आइडेंटिटी को लेके मतलब मुस्लिम आइडेंटिटी को लेके पॉलिटिक्स करें। सेकुलर पार्टीज वो कल्चरल आइडेंटिटीज की प्रोटेक्शन को लेके अगर पॉलिटिक्स करें। सेंटर के ओवर रीच के खिलाफ अगर वो खड़े हो जाए। फेडरेशन के लिए स्टेट्स की प्रोटेक्शंस के लिए अगर वो पॉलिटिक्स करें। इसमें ना मुस्लिम आइडेंटिटी है ना हिंदू आइडेंटिटी है। कश्मीर में भी अपनी कल्चरल आइडेंटिटी है। साउथ में भी अपनी कल्चरल आइडेंटिटी है। बंगाल में भी अपनी कल्चरल आइडेंटिटी है। अस वाइल अवध में यूपी में बिहार में अपनी कल्चरल आइडेंटिटी है। अगर ये सारी आइडेंटिटीज कल्चरल आइडेंटिटीज अगर कॉन्स्टिट्यूशनली प्रोटेक्टेड रहे फेडरेशन अगर बने इनको प्रोटेक्शन प्रोटेक्शन मैकेनिज्म अगर मिलता है। अगर उस मैकेनिज्म के लिए कॉन्स्टिट्यूशन में स्पिरिट में है। फेडरेशन मगर लेटर में फेडरेशन नहीं है। अगर इन सब चीजों पे सेुलर जो पॉलिटिक्स है अगर इन इन सब चीजों पे काम करें बजाय इसके कि वो किसी मुस्लिम के लिए किसी हिंदू के लिए आइडेंटिटी पॉलिटिक्स करें तो शायद उनको भी हजार चीजों का जवाब मिल जाए। क्लेरिटी मिल जाए। इसमें मुस्लिम आइडेंटिटी भी प्रोटेक्टेड रहेगी। हिंदू आइडेंटिटी भी प्रोटेक्टेड रहेगी। कल्चरल रीजनल आइडेंटिटी लैंग्वेजज़ भी प्रोटेक्टिव रहेगी। और कॉन्स्टिट्यूशन की क्स्टिट्यूशनलिटी जो है मुल्क में उसको लेके पॉलिटिक्स होगी। डेमोक्रेसी को फंक्शनल डेमोक्रेसी होने के लिए पॉलिटिक्स होगी मुल्क में जिसमें मुसलमान भी प्रोटेक्टेड होगा। हिंदू भी प्रोटेक्टेड होगा, पीसफुल होगा और वही जवाब है राइट विंग की एक्सट्रीमिस आइडियोलॉजी के खिलाफ इस सारी क्राइसिस के खिलाफ। उसमें हमारा रोल क्या है? मुस्लिम व्हाट डू वी ब्रिंग टू द टेबल? उसमें हमें अंदर इंटरनली पहले यह डिस्कोर्स खड़ा करना है। व्हाट डू वी बी? पहले सेुलर पार्टी जो है अगर वो इन सब चीजों पे जमा हो जाए। अगर वो प्रॉमिस करे कि हम ये पॉलिटिक्स करने के लिए खड़े हो जाएंगे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] मैं फिर जवाब दूंगा। आप जैसे लोग फिर जवाब देंगे। मगर इंटरनली हम रिफ्लेक्ट करके डिस्कोर्स करके डिस्कशंस करके एक पॉलिटिकल फिलॉसफी हम टेबल पे लाएंगे। व्हाट डू वी ब्रिंग टू द टेबल? जो इस सारी पॉलिटिक्स के साथ जो अभी तक मैं बात कर रहा था उसके साथ साथ क्लैश नहीं करती है बल्कि कॉम्प्लीमेंट करती है। मुस्लिम पॉलिटिक्स का इसमें कंट्रीब्यूटरी रोल है। इसमें क्लैशेस नहीं है। वी ब्रिंग कंट्रीब्यूशन टू द टेबल। वी कॉम्प्लीमेंट दिस डिस्कोर्स। उस पे अगर हम सब जमा हो सकते हैं तो अगर सेुलर पार्टीज इस तरह से काम कर सकती है फिर हमें पहले इंटरनली जो है मुस्लिम सोसाइटी को बात करने की जरूरत है डिस्कशन छेड़ने की जरूरत है एक फिलॉसफी डेवलप करने की जरूरत है वो फिर सेुलर इंडिया के सामने रखने की जरूरत है जिसमें हम ये साबित कर सके और मैं साबित कर सकता हूं अल्हम्दुलिल्लाह शायद गलत हूं मुझे भी पता चले कि मैं शायद गलत हूं और अभी तक मेरी समझ से मैं समझ समझता हूं कि हम कुरान की बुनियाद पे हदीस की बुनियाद पे यह साबित कर सकते हैं। वी डू नॉट हैव अ क्लैशिंग रोल। वी हैव अ कंट्रीब्यूटरी रोल कॉम्प्लीमेंट्री रोल टू द जनरल सोसाइटी कॉल्ड। क्योंकि आपने यह बात रखी कि अगर जो सेकुलर पॉलिटिक्स है जो कॉन्स्टिट्यूशनल पॉलिटिक्स है अगर वह प्रिंसिपली अस्यूम कर ले अपने फॉर्म्स को और अपने वर्चूस को तो उसके अंदर पोटेंशियल है वो इतनी रोबस्ट है कि वो इंडिया की मल्टीप्लूरल जो आइडियोलॉजिकल और ग्रुप और कल्चरल आइडेंटिटीज है उसके साथ इंगेज कर सके और दूसरी बात कि इस्लाम का इसमें कंपैटिबिलिटी का रोल है मुसलमानों का और इनकंपैटिबिलिटी का नहीं है। इसका एग्जांपल हमें मिलता है जो लेट 19थ और अर्ली 20थ सेंचुरी में जो मुस्लिम्स के विद इन डिबेट्स हुए या फिर मुसलमानों का नेशनल मूवमेंट्स में पार्टिसिपेशन का जो पूरा का पूरा सिलसिला है और उसमें मेजरली फ्रॉम ऑल दी रिलीजियस पर्सपेक्टिव्स प्योरली जो ट्रेडिशन में रूटेड है वहां से इंक्लूडिंग इकबाल इकबाल क्योंकि उनका इंतकाल हो गया उससे पहले कि जब तक जिन्ना अपनी पॉलिटिक्स को कंसेप्चुअलाइज करते जब तक फेडरेशन का जो आईडिया था वो वो इट वास नॉट ए यू नो पार्टीशन आईडिया। जितनी भी रिलीजियस ट्रेडिशन से जो आइडियाज आए वो कोई भी सेपरेटिज्म की तरफ नहीं थे। वो सिर्फ और सिर्फ ये कोशिश कर रहे थे कि हमारी जो अपनी रिप्रेजेंटेशन है वो प्रोटेक्टेड वो प्रोटेक्टेड रहे और अलग-अलग जगहों पे अलग-अलग तरीके की चैलेंजेस थे क्योंकि इतना बड़ा था हिंदुस्तान और उस लिव्ड रियलिटी के पर्सपेक्टिव से वो पर्सपेक्टिव यूनिवर्सलाइज हो रहे इसलिए क्लैश में बजाहिर लगते हैं। हालांकि वो क्लैश में नहीं है। तो उस कॉन्टेक्स्ट में कंट्राडिक्शन कहां है सेकुलर पॉलिटिक्स को के जब आपके पास रोबस्ट प्रिंसिपल्स हैं और वो रोबस्ट प्रिंसिपल्स नेशनल मूवमेंट में टेस्टेड हैं कि उस टाइम पे भी हिंदू नेशनलिज्म ये सारा जो डिस्कोर्स हम आज की डेट में देखते हैं। वो आपको बंगाल पार्टीशन 1905 के टाइम पे वो आपको आनंद मठ और वंदे मातरम के टाइम पे वो आपको हिंदू महासभा के जितने भी चैलेंजेस उस जमाने के कांग्रेस में रहे वो सब और उस सब के विदिन मुस्लिम पॉलिटिक्स का एंगेजमेंट और फॉरमेशन विद ऑफकोर्स सम ऑफ़ द लिमिटेशंस दैट वी कंटेस्ट कि अगर ये होता उस टाइम पे भी बेहतर होता। हम तो आज भी फ्रॉम दिस पर्सेक्टिव वेयर वी हैव अ रोबस्ट कॉन्स्टिट्यूशन लेट्स से चैलेंज क्यों है इनको? चैलेंज इसलिए है क्योंकि प्रिंसिपल बेस्ड पॉलिटिक्स डाइलट हो गई और वो हर तरफ हो गई। आप मुझे आज भी एक भी शख्स दिखा दीजिए बारिंग फ्यू अगर हो मुस्लिम पॉलिटिक्स में भी जो अह प्रिंसिपल बेस्ड पॉलिटिक्स करता हो जो प्रिंस इस्लामिक मुस्लिम प्रिंसिपल इस्लामिक प्रिंसिपल्स लाता हो पॉलिटिकल डिस्कोर्स में उनके दिफा के लिए उनके इंप्लीमेंटेशन के लिए काम करता हो पॉलिटिक्स करता हो चाहे सब कुछ सैक्रिफाइस हो जाए इसी तरह से सेुलर पॉलिटिक्स में भी ये वैल्यूज 1947 के बाद ये डाइल्यूट होते रहे वैल्यू से दूर होते इलेक्टोरल पॉलिटिक्स ने प्रसीड किया टेकओवर किया इक्शंस जीतने हैं इलेक्शंस जीतने हैं पावर में रहना है डेमोग्राफी को इंजीनियर करना है डेमोग्राग्राफी को इंजीनियर करना है फेडरेशन के साथ टपर करना है जो कांग्रेस या जो फाउंडिंग फादर्स जिन्होंने इस ऑर्गेनाइजेशन को बनाया उन्होंने ही हिंदुस्तान को भी बनाया उन्होंने ही कॉन्स्टिट्यूशन को को भी बनाया कांग्रेस फिर उसी की कंटिन्यूटी थी तो बजाय इसके कि यह कांग्रेस उन प्रिंसिपल्स को अगरचे ये हिंदुस्तान लेटर में फेडरेशन नहीं था मगर स्पिरिट में फेडरेशन था। बजाय इसके कि ये उस फेडरेशन को और ज्यादा मजबूत करते। उस कॉन्स्टिट्यूशन को कॉन्स्टिट्यूशनलिटी को और ज्यादा मजबूत करते। इन्होंने ही फेडरेशन के साथ टपर किया। छेड़छाड़ किया। ओनली फॉर वन पर्पस कि पावर में बने रहना है। इंस्टीटशंस कंप्रोमाइज होते रहे। फिर फैसले उसी तरह के लेते गए। एक फैसले से एक कम्युनिटी को राजी करने के लिए जब देखा कि दूसरी कम्युनिटी नाराज हो रही है तो इमीडिएटली उस तरह के फैसले दूसरी कम्युनिटी को राजी करने के लिए फिर इंस्टीटश को कंप्रोमाइज करके उस तरह के फैसले लिए गए तो डाइल्यूट होता गया प्रिंसिपल्स कंप्रोमाइज होते गए जो प्रायोरिटी बनी वो पावर पॉलिटिक्स बनी यही इसी चीज ने गैप बनाई वैक्यूम बनाया जिसको फिर राइट फिंग ने फिल किया अगर ये सेकुलर जो पॉलिटिकल पार्टीज है अगर ये कॉन्स्टिट्यूशनल पॉलिटिक्स की तरफ लौट आए। कॉन्स्टिट्यूशन बेस्ड ऑन द स्पिरिट्स ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन। अगर ये उसकी तरफ लौट आए मैं फिर से दोहराऊंगा। ना इन्हें मुसलमानों की बात करने की जरूरत है ना इन्हें हिंदुओं की बात करने की जरूरत है। ये लेटर उस स्पिरिट की बात करें। कॉन्स्टिट्यूशन उसकी इंप्लीमेंटेशन की फंक्शनल डेमोक्रेसी की बात करें। इंस्टीटश की बात करें। ये सब कुछ खुद ब खुद ठीक हो जाएगा। इनको कम्युनिटीज और सोसाइटीज की ये कम्युनिटीज की और आइडेंटिटीज की बात करने की जरूरत नहीं है। वो डाइल्यूशन आपके सवाल का जवाब है। ये खुद डाइलट हुए। तलाक के हवाले से एक फैसला आया तो इमीडिएटली मस्जिद के ताले खोले गए। ठीक है? इसी तरह से एक फैसले की वजह से देखा कि हमारा वोट बेस खराब हो रहा है या इफेक्ट हो रहा है। तो कॉन्स्टिट्यूशन के प्रिंसिपल्स को कंप्रोमाइज किया गया। फैसले उस तरह से लिए गए कि वोट बैंक जो है वो इंटैक्ट रहे। हम रीजंस में कहीं देखा कि फ़ जो है बन रहा है। रीजनल फ़ बन रहा है। वह शायद सेंट्रल लीडरशिप को चैलेंज कर रहा है। तो स्टेट्स के ऊपर गवर्नर ऑफिसिसेस के जरिए प्रेसिडेंट्स ऑर्डर्स के जरिए फेडरेशन ओवर रीच किया गया। कश्मीर तो बहुत बड़ा शिकार है। उसका अल्टीमेट शिकार है उसका। मगर उसके हजारों मिसाले हैं इंडिया में जो कांग्रेस के जमाने में भी हुए। उम्मीद है कि इनको अब वो रियलाइजेशन हो कि इनसे वो गलतियां हुई है। उन्हीं गलतियों की वजह से वैक्यूम बना जिस वैक्यूम में बीजेपी और राइट विंग जो है पनप पाया। अगर वो उन गलतियों से सीखे है और वापस वो अगर वो कोर्स करेक्शन करने के लिए तैयार है तो सेुलर पॉलिटिक्स जो है वो ठीक हो सकती है। उस सूरत में मुसलमानों का रोल क्या है? मैं फिर से उसी हमारा एक कॉन्ट्रैक्ट है। मैं फिर से कहूंगा आप कॉन्ट्रैक्ट पे लौट के आइए। मेरा यह पैगाम है सेुलर पार्टीज के लिए। आप मुसलमानों के लिए पॉलिटिक्स मत कीजिए। आप मुस्लिम आइडेंटिटी के लिए पॉलिटिक्स मत कीजिए। आप हिंदुओं के लिए पॉलिटिक्स मत कीजिए। आप हिंदू आइडेंटिटी के लिए पॉलिटिक्स मत कीजिए। आप कॉन्ट्रैक्ट पे पॉलिटिक्स कीजिए। जो हम सभी का मुसलमानों का हिंदुओं के साथ, हिंदुओं का, मुसलमानों के साथ, सिख का, ईसाई के साथ, ईसाई का, हिंदू के साथ, मुसलमानों के साथ, सिख के साथ हम सभी का एक कॉन्ट्रैक्ट है आपस के आपस में। उस कॉन्ट्रैक्ट को हमने कहा है कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया। उस कॉन्ट्रैक्ट को हमने कहा है द नेशन ऑफ इंडिया। आप मुझसे सवाल पूछिए। आपका रोल क्या है इसमें? बहसियत मुस्लिम। मैं कहूंगा कुरान मुझसे कहता है इन जनस फजला। मैंने एक आयत बहुत जगहों पे कोट की है अपने तकारी में। ये गाइडिंग प्रिंसिपल है हमारे लिए। मुस्लिम पिटिकल फिलॉसफी में ये जरिस प्रोडेंस है। ये आयत। ये कहती है इफ दे इनिशिएट पीस। बाकी के लोग आप मुस्लिम हैं। आप दूसरी सोसाइटी में हैं। हमें क्या करना है? दूसरी सोसाइटीज में रह के बाकी लोगों के साथ क्या करना है? आई एम एन इंडियन। हम मैं एक नेशन स्टेट में रहता हूं। व्हाट इज माय रोल? व्हाट इज माय रिलेशनशिप वि हिंदू सिख क्रिश्चियन अदर सोसाइटी जो जितने भी हमारे डिनॉमिनेशंस हैं। कुरान क्या कहता है? कुरान कहता है इफ दे इनिशिएट पीस एस्टैब्लिश दैट पीस। हम अगर वो इनिशिएट करें इनिशिएट तो वो करेंगे ना अब जब उन्होंने किया तो वो अपने टर्म्स पे करेंगे ना कुरान ये नहीं कहता कि अगर वो मुस्लिम है तो एस्टैब्लिश पीस अगर वो शरिया को मानते हो तो एस्टैब्लिश पीस मैंने आयत आपको दे दी फसिल फजला कुरान कुरान का गाइडिंग प्रिंसिपल है मेरे लिए जरिस प्रूडेंस बन जाता है पिटिकल जरिस प्रूडेंस इफ दे इनिशिएट पीस एस्टैब्लिश दैट पीस व्हिच मींस हमने उन्होंने कॉन्स्टिट्यूशन के जरिए अपनी आइडेंटिटी को शेप किया ना क्लैशेस थे 1947 में क्लैशेस थे जिसको हंटिंग कहता है क्लैश ऑफ सिविल सिविलाइजेशन आज के हिंदुस्तान में क्लैशेस ऑफ कल्चरर्स एंड आइडेंटिटीज भी है हम गांधी जी ने कहा अंबेडकर ने कहा नेहरू ने कहा फाउंडली फादर्स ने कहा नहीं जी हम साथ में रहेंगे एक एक मुल्क बनाएंगे ड्रेविडियन को कहा नॉर्थ इंडियन के साथ रहो नॉर्थ इंडियन को कहा ड्रेविडियन के साथ रहो गुजराती को कहा बंगाली के साथ रहो बंगाली को कहा आप गुजराती के साथ रहो। राजस्थान राजस्थानी को कहा, हरियाणवी को कहा, पंजाबी को कहा कि आप आसामी के साथ रहो। हम सभी के क्लैशेस है। हां। ये साथ में आके क्राइसिस बन जाता है। इसका जवाब क्या है? मुस्लिम को कहा हिंदू के साथ रहो। हिंदू को कहा कि आप मुस्लिम के साथ रहो। सिख को कहा कि आप हिंदू मुस्लिम दोनों के साथ रहो। और उस जमाने में क्लैशेस है। इस क्लैशेस का जवाब क्या है? फाउंडिंग फादर्स ने कहा, अंबेडकर ने कहा, गांधी जी ने कहा, नेहरू जी ने कहा क्या? वी विल एस्टैब्लिश पीस। हम यही कहा ना वी विल एस्टैब्लिश पीस। पीस किस बुनियाद पे? दे सेड वी विल एस्टैब्लिश अ कॉन्स्टिट्यूशन ऑन दोज़ ये हमारा कॉन्ट्रैक्ट है। इस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे वी विल एस्टैब्लिश पीस। कुरान कहता है कि अगर आप इस सोसाइटी में रहते हैं। इफ दे इनिशिएट पीस। अगर वो आपके साथ पीस इनिशिएट करते हैं। एस्टैब्लिश दैट पीस फजना ला पकड़ लो उसे। और उसके बाद हम यह जब कॉन्ट्रैक्ट बनाते हैं ना यह जो पीस वहां से आया हमने एस्टैब्लिश किया कुरान का हुक्म है सी आम्र है फजला ऑप्शन नहीं है सिम्र है डू इट इनकंबेंट अपॉन अस डू इट उसके बाद हमारा एक दूसरे के साथ कॉन्ट्रैक्ट बन जाता है हमने एक दूसरे के साथ वादे दिए ऑन द बेसिस ऑफ़ कॉन्स्टिट्यूशन कॉन्स्टिट्यूशन सिटीजनशिप वादा है ऑन द बेसिस ऑफ़ दिस कॉन्स्टिट्यूशन कुरान कुरान क्या कहता है याना आनुद जो आपके वादे है उस पे अमल करो हम ये कुरान का ये दूसरा मैं आपको जरिस प्रूडेंट प्रिंसिपल दे रहा हूं पॉलिटिक्स के लिए अवल अगर पीस इनिशिएट हो रहा है एस्टैब्लिश दैट पीस दूसरा आपने कॉन्ट्रैक्ट किया जिस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे पीस एस्टैब्लिश हो रहा है जो यह कॉन्ट्रैक्ट है आपने एक दूसरे के साथ वादे किए उफद उनकी पाबंदगी करो पाबंदी करो एक्ट अपॉन दोस प्रॉमिससेस बाय दोस प्रॉमिससेस इनको तोड़ो मत इसका जवाब आपसे ना सिर्फ कोर्ट ऑफ लॉ में पूछा जाएगा बल्कि आखिरत में भी पूछा जाएगा दिस इज इस्लाम ऑन द बेसिस ऑफ़ व्हाट कुरान क्या चाहता है कि किसी का नाम रामनाथ जी है उसके साथ कंट्रागा बनाओ पीस एस्टैब्लिश करो और शर्त ये है कि वो नमाज़ पढ़े वो बीफ खाना शुरू करे वो जो है वो कलमा पढ़े नहीं कुरान ये सब ये सब क्राइटेरिया कुरान का है ही नहीं। दो तीन क्राइटेरिया है। पीस एस्टैब्लिश अगर हो रहा है पीस अल्टीमेट डिजायर इज टू एस्टैब्लिश जस्टिस। पीस एस्टैब्लिश हो रहा है। पीस एस्टैब्लिश करो। कॉन्ट्रैक्ट अगर आप दोनों के बीच में हो रहा है। सोसाइटीज के बारे में हो रहा है। यू हैव टू अबाइड बाय दैट कॉन्ट्रैक्ट। ये कुरान हमें कह रहा है। हिंदुओं के साथ आपका कॉन्ट्रैक्ट है। अबाइड आप अबाइड बाय दैट कॉन्ट्रैक्ट। हिंदू के साथ आपका पीस एस्टैब्लिश वो पीस इनिशिएट कर रहे हैं। एस्टैब्लिश दैट पीस। कॉन्ट्रैक्ट में आपके एक दूसरे के साथ प्रॉमिससेस है। उस उन प्रॉमिससेस की पाबंदगी करो। पाबंदी करो। तीसरा इन सारे प्रॉमिससेस ऑफ पीस के जरिए सिर्फ एक गज़ है। याज़ना आमुन का बिल किस्त एस्टैब्लिश जस्टिस इस्लाम में लेबल इंपॉर्टेंट नहीं है। फ्रूट इंपॉर्टेंट है। लेबल जो भी हो अगर वो फ्रूट आ रहा है उस लेबल से इस्लाम का काम हो रहा है। इस्लाम में जस्टिस इंपॉर्टेंट है। लेवल्स इंपॉर्टेंट नहीं है। अगर इस कॉन्ट्रैक्ट के जरिए, इस पीस के जरिए, इस कॉन्स्टिट्यूशन के जरिए अगर जस्ट जस्टिस एस्टैब्लिश हो रहा है, यू हैव टू अबाइड बाय दैट कॉन्स्टिट्यूशन, दैट एग्रीमेंट, दैट पीस, यू हैव टू फैसिलिटेट, यू हैव टू बी अ पार्टिसिपेंट ऑफ़ दैट पीस। यू हैव टू बी अ पार्टिसिपेंट, एक्टिव कंट्रीब्यूटर ऑफ़ दैट कॉन्ट्रैक्ट, यू हैव टू फुलफिल दोज़ प्रॉमिससेस, यू हैव टू एस्टैब्लिश जस्टिस। अगर ये सिस्टम जस्टिस एस्टैब्लिश कर रहा है। अल्लाह सुभाना ताला इस सिस्टम को प्रेफर करेगा। बनिस्बत जिसका लेवल इस्लामिक हो मगर जस्टिस एस्टैब्लिश ना कर रहा हो। जस्टिस को रद रहा हो। अल्लाह विल नॉट प्रेफर दैट सिस्टम। अल्लाह के नजदीक कुरान की आयात मैंने आपको दी। अल्लाह के नजदीक प्रेफरेबल सिस्टम वो है जिसके जरिए एस्ट जस्टिस एस्टैब्लिश हो रहा है। उसका लेवल कुछ भी हो। बनिस्बत उस सिस्टम के अगर उसका नाम इस्लाम मुस्लिम एस्टब्लिशमेंट है मगर जस्टिस रौदा जा रहा है अल्लाह के सामने वो अल्लाह सुान ताला के सामने वो प्रेफरेबल नहीं है दीज़ आर गाइडिंग प्रिंसिपल्स अगर सेुलर पिटिकल पार्टीज इस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे कॉन्स्टिट्यूशन अगर मैं उस कॉन्ट्रैक्ट को अब थोड़ा सा कंस्ट्रक्ट कर पाया अपने इस जवाब में उस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे जो हम सभी के बीच में जिसे हम कॉन्स्टिट्यूशन कहते हैं उस प्रॉमिससेस के बुनियाद पे जो हम सबके बीच में जिसे हम प्रएमबल्स कहते हैं कॉन्स्टिट्यूशन के उस वादे के बुनियाद पे जिसे हम सिटीजनशिप कहते हैं इक्वल सिटीजनशिप एंगेज करती है सेुलर पॉलिटिकल पार्टीज विद द रेस्ट ऑफ द इंडिया अगर ये पॉलिटिक्स करना चाहती है तो व्हाट डू वी ब्रिंग एस मुस्लिम्स मैं अपने मुस्लिम भाइयों की तरफ चला जाऊंगा ऑन दी प्रिंसिपल्स ऑन दीज़ गाइडिंग प्रिंसिपल्स ऑफ़ कुरान हम पे इनकंबेंट है टू ब्रिंग अपॉन द टेबल द कंट्रीब्यूटरी कॉम्प्लीमेंट्री पार्ट ऑफ द सोसाइटी कॉल्ड मुस्लिम्स टू दिस पॉलिटिक्स ये कॉन्ट्रैक्ट की बात कर रहे हैं कॉन्स्टिट्यूशन की बात कर रहे कुरान हमसे कहता है कि अगर ये पीस इनिशिएट करते हैं एस्टैब्लिश द पीस ये ये कॉन्ट्रैक्ट की बात कर रहे सिटीजनशिप की बात कर रहे अगर ये इक्वलिटी ऑफ़ सिटीजनशिप की बात कर रहे हैं इंडियन इंडियन सिटी व्हाट आर वी ऑल अगर कांग्रेस डीएमके अ इसी तरह से टीएमसी टीवी के इसी तरह से अखिलेश जी की पॉलिटिकल पार्टी ये सब अगर इक्वल सिटीजनशिप पे बात पॉलिटिक्स करें। मैं नहीं चाहता हूं इनसे ये मुस्लिम पॉलिटिक्स आइडेंटिटी के लिए पॉलिटिक्स करें। ये हिंदू आइडेंटिटी के लिए पॉलिटिक्स करें। अगर ये इक्वल राइट्स इक्वल सिटीजनशिप ऑफ एवरीवन के लिए पॉलिटिक्स करें मुस्लिम्स पे कुरान के हुक्म के मुताबिक इनकंबेंट है हम पे वो पॉलिटिक्स करना इनका साथ देना ये ये पीस की बात करें कि पीस एस्टैब्लिश होगा इट्स अन इनकंबेंट अपॉन अगर ये इनिशिएट करते हैं तो हम पे इनकंबेंट है टू एस्टैब्लिश दैट पीस अगर ये कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया के साथ वादा बंद होने की पॉलिटिक्स करते हैं। इसमें ना मुस्लिम है ना हिंदू है ना सिख है। मुस्लिम के लिए इनकंबेंट है। उफ बिलकूद इन वादों पे अमल करो। हम पे इनकंबेंट है। तो दोनों तरफ की बातें मैं आप बातें मैंने आपको कह दी। सेकुलर पार्टीज को इन बेसिस पे पॉलिटिक्स करनी चाहिए ना कि मुस्लिम हिंदू पे बातें करनी चाहिए। पॉलिटिक्स करनी चाहिए। अगर ये इन प्रिंसिपल्स पे पॉलिटिक्स करें तो उसमें कुरान क्या कहता है मुसलमानों को कि आपको किस तरह का रोल करना है? दो तीन चीजें अगेन मेरे लिए काफी इंटरेस्टिंग है क्योंकि होता यह है कि आइडेंटिटी क्राइसिस का मामला है। मुख्तलिफ पर्सपेक्टिव से आप जिस लिव्ड एक्सपीरियंस से जा रहे हैं। मैं जिस लिव्ड एक्सपीरियंस से जा रहा हूं। हम सिमिलर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं। और मेरे लिए भी जो सबसे इंपॉर्टेंट चीज है वो ये है कि वन ऑफ दी के इंडियन कॉन्टेक्स्ट में वो पॉलिटिकल थ्यरी और पॉलिटिकल फिलॉसफी क्या होगी? तो उसमें क्योंकि आपने जिक्र किया कॉन्ट्रैक्ट थ्यरी का और बजाहिर सुनने में ये और ज्यादातर जो हिस्ट्री ऑफ वर्ल्ड है उसमें एक्चुअली कॉन्ट्रैक्ट्स अब दुनिया में होते रहे हैं लेकिन कॉन्ट्रैक्ट की प्रॉपर वेल डेवलप्ड थ्यरी जिसका जरिस प्रूडेंशियल लॉजिक हो वह इवन वेस्ट में जिसको मॉडर्निटी को सिग्निफायर है वह भी 50 100 साल से ज्यादा नहीं वेस्ट फेलियन कॉन्ट्रैक्ट एक पुराना समझा जाता है। लेकिन वह एक वेग नेशन स्टेट का सिटीजनशिप का एक वो कॉन्ट्रैक्ट है जो सिर्फ और सिर्फ सिटीजनरी के लेवल पे इमेजिंड है। उसकी मशत क्या होगी? उसकी सोशल कंस्ट्रक्ट क्या होगा? सोशियोलॉजिकल इंटरेक्शंस क्या होंगे? वो एक जो मुकम्मल जो एक निजाम होता है जो उसका एक-एक शोबा होता है उसमें कॉन्ट्रकुअल देरी का इंस्टीट्यूशनलाइजेशन होना वो इस्लाम की रगों में है। वो उसकी जिसे कहते हैं अकीदे उसकी जो लॉजिक है उसका इंटरनल हिस्सा है। बिल्कुल। और उस लॉजिक को जब हम सामने रखते हैं, कॉन्ट्रैक्ट को हम सामने रखते हैं तो मैं अक्सर जब हमारे दोस्तों में डिस्कशन होता है, मैं यह बोलता हूं कि अगर वो हिंदू राष्ट्र चाहते हैं तो वो चाह लें। मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है। मेरा सवाल यह है कि उस हिंदू राष्ट्र में मैं कौन हूं? मेरा क्या रिलेशन है? मेरा क्या वर्चू है? या दलित का क्या रिलेशन है? या औरत का क्या रिलेशन है? या बच्चे का क्या रिलेशन है? क्या वो जो उसूल हैं मकासिद हैं जो ह्यूमन सोसाइटी को प्रोिफरेट होने के लिए उसकी स्टेबिलिटी के लिए उसकी बका के लिए क्या वो आप उसको कुछ भी लेबल लगा दें आप उसको सेकुलर राष्ट्र बोल दें इस्लामिक राष्ट्र बोल दें हिंदू राष्ट्र बोल दें वो प्रिंसिपल्स क्या है तो इस पर्सपेक्टिव से हमको ये पता है कि भ कॉन्स्टिट्यूशनल लॉजिक ये है ये एक तरीके का कॉन्ट्रैक्ट है कि जिसमें मल्टी पार्टीज जो म्यूचुअली कंट्राडिक्टरी क्लेम्स के बावजूद जूद भी एक लेवल पे आके मुत्तहद हो गए कि भाई ठीक है इस मामले में हम आपको परेशान नहीं करेंगे। यह हमारी पर्सनल स्पेस है। यह हमारी पब्लिक स्फेयर की स्पेस है। ये हमारी जरिस प्रूडेंशियल लॉजिक है। ये हमारा इकोनमिक लॉजिक है। ऐसे रिजर्वेशन होगा। इस तरह से पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन होगा। इस तरह से ये चीजें होंगी। तो इस सबके बनिस्बत मुसलमानों ने अपना कॉन्ट्रैक्ट फाइन कर लिया। हिंदुत्ववादियों ने शुरू से कॉन्स्टिट्यूशनल लॉजिक को डिनाई किया। एक तरफ आप मुसलमानों को बोल दीजिए कि भ उन्होंने भी एक डिफरेंट मांग की। चलिए उनको एक दो मुल्क आज की डेट में या उस जमाने में एक मुल्क मिल गया। उसमें उन्होंने एक अपना एक कॉन्स्टिट्यूशनल लॉजिक लगाया तो वो अब इस मॉडर्न इंडियन स्टेट के कॉन्ट्रक्चुअल लॉजिक के विदिन नहीं है। जो मुसलमान रह गया उसका कॉन्ट्रैक्ट है। लेकिन जो हिंदुत्ववादी रह गया उसका कॉन्ट्रैक्ट नहीं है। तो आपके लिए जब आप इस हिंदू हिंदुत्व की जो पॉलिटिक्स है जब आप उससे इंगेज करते हैं और इस कॉन्ट्रकुअल थरी के विदिन उसको लोकेट करते हैं तो आपने भी और बाकी लोग भी हम भी प्रैक्टिकली तो ये बोलते ही हैं कि भ हिंदू राष्ट्र फंक्शनली और ऑपरेशनली एक्सिस्ट करता है। चाहे उसको लेबल ना दिया गया हो क्योंकि उनको ये लगता है वो लेबल लेना ज्यादा भारी है। जब उसके बगैर ही काम हो रहा है। तो हिंदुत्व है क्या आपके लिए? हमने सेकुलरिज्म को डिजाइन कर लिया। मुस्लिम आइडेंटिटी के क्राइसिस को डिजाइन कर दिया। अब ये जो राइट विंग फर्सेस हैं ये बुनियादी तौर पे हिंदुत्व का जो लॉजिक हिंदूइज़्म भी एक ब्रॉडर स्ट्रीम है जिसके अपने-अपने पॉलिटिकल फॉरमेशंस हैं। जैसे आपको इस्लाम में भी मल्टीपल पॉलिटिकल क्लेम्स मिल जाएंगे। आपको सेकुलरिज्म में भी मल्टीपल थ्यरीज़ मिल जाएंगी। हिंदुत्व एक पर्टिकुलर क्लेम ऑफ द हिंदू लॉजिक विद इन दिस टेरिटोरियल नेशन स्टेट। उसको आप किस तरह देखते हैं? उसकी क्या डिमांड है और उसके कंट्राडिक्शंस क्या है? मेरे आखिरी जवाब के तसलसुल में मैं यही जवाब देना चाहूंगा जो हमारा कॉन्ट्रैक्ट था हमारी डिसए्रीमेंट जो है आरएसएस के हिंदुत्व से आरएसएस बीजेपी के हिंदुत्व से हिंदूइज़्म से नहीं सनातन से नहीं आरएसएस के हिंदुत्व गोल वर्कर सावरकर के हिंदुत्व से ये वो कॉन्ट्रैक्ट तोड़ रहे हैं 70 साल के बाद ये हमारे साथ वो कॉन्ट्रैक्ट तोड़ रहे हैं। 70 साल पहले हमें यह नहीं बताया गया था कि एक पर्टिकुलर राइट विंग आईडियोलॉजी पे, एक थियोक्रेसी पे यह मुल्क चलाया जाएगा। अगर वो उस वक्त हमें बताया गया होता तो उस वक्त डिसीजन लेने की आजादी होती। बहुत सारे लोगों के पास। ना सिर्फ मुसलमानों के पास बल्कि बहुत सारे ऐसे हिंदू भी होते शायद जो उस हिसाब से डिसीजन लेते। बहुत सारे रीजंस ऐसे होते जो उस हिसाब से डिसीजन लेते। यह क्लेम करना 70 साल के बाद इस सारे सफर के बाद कि यह थियोक्रेसी पे एक राइट विंग सुपरमेसिस्ट आईडियोलॉजी पे ये मुल्क चलेगा। रेसिस्ट आईडियोलॉजी पे चलेगा। ये आज हमारे साथ स्टीजन के साथ मैं नहीं कह रहा हूं मुसलमान के साथ सिर्फ स्टीजन के साथ धोखा है। ये उस कॉन्ट्रैक्ट के मुनाफी है जो हमने किया है। इसीलिए हमारी इनके साथ इख्तलाफात है। पॉलिटिकल अडाइस है। औरेंस ये है कि नॉट जस्ट मुस्लिम्स जो आपने बोला कि सिखों के साथ, ओबीसीस के साथ, दलितों के साथ, जैनों के साथ कोई भी जो आइडेंटिटी है, ओरिजिनल आइडेंटिटीज हैं, कल्चरल आइडेंटिटीज हैं, लिंग्विस्टिक आइडेंटिटीज हैं वो पूरा कॉन्ट्रैक्ट आप रिकंस्ट्रक्ट कर रहे हैं। ये 70 साल पहले ही बताया गया होता तो शायद हकीकत कुछ और होती। दलितों की सिटीजनशिप के हवाले से मुस्लिम्स की ड्रेविडियंस की बंगालीज की आसामीज की नॉर्थ ईस्टर्न की कश्मीरियों की हकीकत शायद कुछ और होती क्योंकि डिसीजंस उसी हिसाब से लिए जाते हैं। पर जो डिसीजंस कलेक्टिव डिसीजन लिया गया ये सिर्फ स सावरकर और गोलवर्कर ने डिसीजन नहीं लिया। सिर्फ आरएसएस ने डिसीजन नहीं लिया। सिर्फ एक पर्टिकुलर रिलीजन के पर्टिकुलर क्लास ने कास्ट ने डिसीजन नहीं लिया। ये हजारों आइडेंटिटीज ने कलेक्टिव डिसीजन लिया। सैकड़ों फेथ्स ने कलेक्टिव डिसीजन लिया और उस वक्त एक कॉन्ट्रैक्ट किया गया सबका आपस में। तब वादे किए गए। मैं खुद को भी उसी मीजान पे उसी स्केल पे ठहराऊंगा जो कुरान मुझसे कहता है कि अगर वादा किया उस पे अमल करना है। उफ मेरे लिए भी वही सही है और दूसरे पे भी वही अप्लाई होता है। तो मेरा सवाल ही यही है। अगर इस सिटीजन इंडियन सिटीजन से वादा किया गया 70 साल पहले चाहे कोई भी हो रीजनली कल्चरली एथिकली रेशली लिंग्विस्टिकली और रिलीजियसली वो कोई भी आइडेंटिटी हो उनके साथ जो वादा किया गया है वो कॉन्ट्रैक्ट किया गया है उस पे अमल होना चाहिए वही कॉन्ट्रैक्ट वो वादा इंप्लीमेंट होना चाहिए उसके पाबंद हर कोई होने चाहिए हिंदू भी उतना है और मुसलमान भी उतना है राइट विंग आईडियोलॉजी एक्सट्रीमिस्ट आईडियोलॉजी जो है आरएसएस की आरएसएस की हिंदुत्व आईडियोलॉजी सनातन नहीं हिंदू हिंदूइज़्म नहीं ये उस कॉन्ट्रैक्ट को तोड़ रहे हैं ये सुप्रीमिज्म को ला रहे हैं और ये दे आर इंस्पायर्ड दे दे आर इट्स नॉट अ सीक्रेट वो नाजी आईडियोलॉजी से इंस्पायर्ड है दे ओन दैट इंस्पिरेशन वो चाहते हैं कि पर्टिकुलर एक क्लास एक कास्ट एक पर्टिकुलर रिलजन का एक उनका एक पर्टिकुलर रोल हो और दूसरों के कर्टेड डाइल्यूटेड राइट राइट्स हो रूल हो सोसाइटी में और अथॉरिटी एक पर्टिकुलर कास्ट एंड रिलजन के पास रहे। ये ये खिलाफ वर्जी है ना कॉन्स्टिट्यूशन की उस कॉन्ट्रैक्ट की हमारे इलाफात इनके साथ वही है। बनाए हिंदुत्व के बुनियाद पे राइट विंग मुल्क बनाए। थियोक्रेसी के बुनियाद पे राइट विंग बनाए मुल्क बनाए। कोई हर्ज नहीं है। क्लॉक को वापस ले। कैलेंडर को वापस ले और बाकियों को चाहे वह मुस्लिम है, हिंदू है, सिख है, ईसाई है, कल्चरल डायवर्सिटीज है। क्लॉक को वापस लेके उनके सामने ये हकीकत रखे और उनको कहे कि आप चूज़ करें। आपके पास फ्रीडम ऑफ चॉइस है। क्या आप इस कॉन्ट्रैक्ट के साथ, इस नेशन स्टेट के साथ जो इस कॉन्ट्रैक्ट पे चलेगा रहना चाहते हैं या आप कोई और डिसीजन लेना चाहते हैं। वो मुमकिन नहीं है। हमने खून दिया है। हम सभी ने खून दिया है 70 साल में। इस इस रियलिटी के लिए कि हमारा नेशन स्टेट इंडिया होगा बेस्ड ऑन दिस कॉन्ट्रैक्ट उस कॉन्ट्रैक्ट कॉन्स्टिट्यूशन के लिए उन अनुवादों के लिए उस पीस के लिए कलेक्टिव एक्सिस्टेंस के लिए हम सभी ने खून दिया है। आरएसएस उस सबको अनडू करना चाहते हैं। थियोलॉजी के बुनियाद पे दूसरी चीजों के बुनियाद पे हमारी लड़ाई इनके साथ हुई है। आखिर मैं यही कहूंगा लेवल इंपॉर्टेंट नहीं है। कोई चीज इंपॉर्टेंट नहीं है। जस्टिस इंपॉर्टेंट है। ये जस्टिस रौंद रही है। यहां पे जस्टिस कंप्रोमाइज हो रहा है। इमाम अली ने फरमाया अल अद असासुल मुल्क किसी भी सोसाइटी मुल्क नेशन स्टेट की बुनियाद इस्लाम की नजर में सिर्फ एक है। अद पीस जस्ट जस्टिस अगर जस्टिस कंप्रोमाइज हो रहा है। आपको उसके साथ टक्कर लेनी है। चाहे वो मुसलमान कंप्रोमाइज कर रहा है, इनजस्टिस कर रहा है, चाहे वो हिंदू या ईसाई या क्रिश्चियन इनजस्टिस कर रहा है या अदल के खिलाफ जा रहा है। आपको उनके साथ टक्कर लेनी है। आपको एस्टैब्लिश करना है अद जो जो कोई भी कर रहा हो वो मुल्क सही है अलसासुल मुल्क यह जस्टिस कंप्रोमाइज कर रही है ये इनजस्टिस है हम चाहते हैं कि जस्टिस के बुनियाद पे जो नेशन स्टेट एस्टैब्लिश हुआ था जस्टिस की बुनियाद पे वो फंक्शनल हो क्योंकि यहां पे कोई जो हिंदुत्व का प्रोपोनेंट है वो नहीं बैठा हुआ है तो फॉर अ मोमेंट टाइम आई विल ट्राई टू बी द डेविल्स एडवोकेट जी सुनते हैं उनको थोड़ा सा तो उस वजह से तो एक जो आर्गुमेंट रखा जाता है वो ये रखते हैं कि वो जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ उसमें हमें पार्टी हम जो मेजॉरिटी थे हमको उस वक्त जो कॉन्ट्रैक्ट बना वो कॉन्ट्रैक्ट हम पे मुसल्लत हुआ और आज की डेट में जिस तरह से चीजें अमेंड होती हैं लॉजिक अमेंड होता है तो उस तरह से दिस इज द डिजायर ऑफ द दिस इज द ट्रू डिजायर ऑफ ऑफ द पीपल ऑफ ये वो बोलते तो इसके दो चीज़ हैं। दो में भी सब जगह पे भी बहुत जगहों पे नेचर ऑफ जो टेरिटरी है या नेशन है वो चेंज भी होता है और उसकी एक्सेप्टेबिलिटी भी होती है। उसकी डिनाबिलिटी भी होती है। तो एक ये क्या सिर्फ प्रिंसिपल के ये कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। अगर कोई बोले मेरे साथ गलत कॉन्ट्रैक्ट हुआ था। दूसरा ये जो आपने बात बोली कि वो जस्ट क्लेम है या नहीं के उस जमाने में जो कॉन्ट्रैक्ट हुआ वो एक लार्जर अगर आप टेरिटरी को ले और उसमें जो डेमोग्राफिक कंपोनेंट्स रखे हैं उसमें जो आपका एक आप अपर कास्ट अपर क्लास वर्ल्ड व्यू के हिसाब से एक माइनॉरिटी हैं आप मेजॉरिटी नहीं है और आप जो टोटिटेरियन पर्सपेक्टिव लोगों के सामने रख रहे हैं और उसको इंजीनियर कर रहे हैं अपनी पॉलिटिकल इकॉनमी के जरिए वो कोई कॉन्ट्रक्चुअली स्पीकिंग इट इज नॉट रिप्रेजेंटेटिव ऑफ दी सम टोटल ऑफ द डेमोग्राफी दैट इज प्रेजेंट हियर। तो आप जो बोल रहे हैं बात आप ये बोल रहे हैं कि वो जो जस्टिस का जो पैरामीटर है आपका जो हिंदुत्व का लेबल है वो उसको फिट नहीं हो रहा। अगर फिट हो तो ले लो। हमें कोई हर्ज नहीं है। इन प्रिंसिपल ये बात इन प्रिंसिपल वर्चू को सामने रखते हुए हो रही है कि लेबल लगा लो। बिल्कुल। लेकिन ये जो 1000 आइडेंटिटीज हैं या 500 आइडेंटिटीज हैं इनसे आप कॉन्ट्रक्चुअल नेचर पे बात करो कि मेरा राइट क्या है? आपके हिंदू राष्ट्र के कंसेप्चुअलाइजेशन में मैं कौन हूं? वो टोटिटेरियन प्रोजेक्ट है। वो ना नेगोशिएट हो रहा है ना वो डिस्कस हो रहा है। वो सिर्फ मुसल्लत हो रहा है। और वो सब पे हो रहा है। आपने खुद जवाब दिया इस सवाल का भी। ये फ्लॉड आर्गुमेंट है कि हम पे थोपा गया। हम किसने थोपा? आप मुझे फाउंडिंग फादर्स का नाम ले लीजिए। उसमें से थोपने की पोजीशन में ना इन टर्म्स ऑफ नंबर और आपके लोग भी मौजूद थे कॉन्स्टिट्यूशन असेंबली। हिंदू महासभा भी मौजूद थी। यही सब मौजूद थे ना अक्रॉस पॉलिटिकल आईडियोलॉजीस जिनके जो भी हो। मगर रिलीजन के हिसाब से थोपने की पोजीशन में गैर हिंदू कोई था ही नहीं। हम तो इट वाज़ अ मैटर ऑफ़ चॉइस। ये एक डिसीजन लिया गया जिसके बारे में वो जानते थे। दे वर अवेयर ऑफ इट। थोपा नहीं किसी ने। ये इजीली दे कुड हैव टेकन अ डिसीजन कि पाकिस्तान एक रिलजन के नाम पे बना। वी विल एस्टैब्लिश दिस कंट्री ऑन ऑन द बेसिस ऑफ़ दिस रिलजन। मगर इन्होंने जो आउट रीच किया ना प्रिंसली स्टेट्स और बाकी स्टेट्स के साथ इसी तरह से कश्मीर के साथ अलग सोसाइटीज के साथ डायवर्सिटीज के साथ वो आउटरीच क्या था ये राइट विंग जो है जो अभी बात कर रहे हैं ये फैक्ट्स लेके आए उस पे बात करी वो आउटरीच क्या था वो किस बुनियाद पे था ये सरदार पटेल को उनको क्लेम करते हैं ये समझते हैं कि शायद उनको क्लेम करके इनके आई इनकी आईडियोलॉजी जस्टिफाई हो जाए। एक जगह भी साबित करें कि उनकी जो आउटरीच की क्लेम थी वो आज का जो कॉन्स्टिट्यूशन है इसके कंटरी थी। या दैट वाज़ इन लाइन विद हिंदुत्व लॉजिक एंड आइडियोलॉजी नहीं था। द बेस्ट एग्जांपल द बेस्ट क्लेम फॉर देम सरदार पटेल इनके लिए जो ये कोशिश करते हैं। हालांकि उनका इनके साथ दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। ये वहां पे भी साबित नहीं कर सकते है कि जो आउटरीच था उस वक्त रेस्ट ऑफ इंडिया जो आज का इंडिया है इसमें जो स्टेट्स और प्रिंसली स्टेट्स और रीजंस ऐड किए गए उन तक जो आउटरीच किया गया वो इस बुनियाद पे किया गया जो ये क्लेम करते हैं वो कॉन्स्टिट्यूशन के बुनियाद पे किया गया प्लुरलैरिटी की बुनियाद पे किया गया डायवर्सिटीज की प्रोटेक्शन की बुनियाद पे किया गया उस कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे किया गया जिसे हम कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया कहते हैं जस्टिस इक्वलिटी सबके साथ बराबरी का इमेजिन हमें यह कहा जाए कि आप कश्मीर के लोग आइए एक्सेशन कीजिए इंडिया के साथ। ओके वी आस्क क्वेश्चन व्हाट डू यू ऑफर दैट पाकिस्तान डस नॉट ऑफर हम जी हिंदुत्व के नाम पे आरएसएस की आईडियोलॉजी आरएसएस के हिंदुत्व के नाम पे एक पर्टिकुलर कास्ट अपर कास्ट के विम्स एंड विशेस पे इस मुल्क को चलाएंगे। इमेजिन क्या कश्मीरी उस वक्त वो फैसला लेता वास दैट पॉसिबल? डाउन साउथ आप चले जाइए। बस मुस्लिम आइडेंटिटी को आप छोड़ दीजिए। डाउन साउथ ड्रेविडियन कल्चर सोसाइटी आईडियोलॉजी जो भी है उनको आप ये क्लेम लेके आप उन तक जाइए। ये ऑफर लेके आप उन तक जाइए 1947 में वुड दे बी पार्ट ऑफ दिस आईडियोलॉजी? नहीं। अब वो सारा 70 साल के बाद वह सारा हिंदुस्तान बना के वो आउट रीच करके वो कॉन्ट्रैक्ट करके ये आज इलेक्टोरली एक पर्टिकुलर आईडियोलॉजी इलेक्टोरली एक कमांडिंग पोजीशन पे आ गए इसका वो गलत इस्तेमाल करके दिस दे यूज़ दिस अपोरर्चुनिटी टू चेंज द नेचर ऑफ़ दिस कंट्री टू चेंज द नेचर ऑफ़ द फंक्शनिंग ऑफ़ दिस कंट्री टू चेंज द नेचर ऑफ़ दैट कॉन्ट्रैक्ट टू अनडू दैट कॉन्ट्रैक्ट और थोप रहे एक चीज को व्हिच मींस कि वो आउटरीच ये सवाल फिर पूरे हिंदुस्तान पे आता है एक पर्टिकुलर क्लास पे नहीं क्या वो फिर आउटरीच वो धोखा था वो लैंड रिक्लेम करने की या लैंड क्लेम करने की कोशिश थी डायवर्सिटी की आड़ में कॉन्स्टिट्यूशन के आड़ में अब जब वो लोग सब वो लैंड क्लेम हो गया अब आपके लिए वो लोग जरूरी नहीं है वो डायवर्सिटी जरूरी नहीं है उनके एस्पिरेशन जरूरी नहीं है वहां वहां की जमीन जरूरी है। क्या कन्याकुमारी से ले कश्मीर तक इस जमीन पे नजर थी? उस जमीन को क्लेम करने के लिए एक यूनिट बनाने के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट कॉन्स्टिट्यूशन प्रिंसिपल्स, डायवर्सिटी, प्लुलरिटी, सेकुलरिज्म या जो भी जस्टिस उसके आड़ में हमने एक आउटरीच किया और 70 साल के बाद जब वो जमीन कंसोलिडेट हो गई, थोड़ा सा स्टेट मजबूत हो गया। स्टेट के पास डिफेंस है, आर्मी है, पुलिस है, इंस्टीटश है। अब ये कंट्रोल कर सकता है किस किसी भी डिसेंट को। तो अब अगर कोई डिसेंड करता है उसको कहते हैं कि यू आर आउट क्लास्ट। आपकी आपकी जरूरत नहीं है। आप दफा हो जाओ। हमें जमीन की जरूरत है। आपकी जमीन हमारा हिस्सा है। आप हमारा हिस्सा नहीं है। आपकी एस्पिरेशन हमारी हिस्सा नहीं है। सो इट ब्रिंग्स अ क्वेश्चन टू द बिहेवियर टू द कैरेक्टर ऑफ़ द नेशन इटसेल्फ। यह सिर्फ हिंदुत्व पे सवाल नहीं है। यह कैरेक्टर पे सवाल है। बल्कि मैं यह कहूंगा जवाब में नहीं यह कैरेक्टर जो यह पेश कर रहे हैं वो नहीं था। असल में हिंदुस्तान का कैरेक्टर वही था और है भी जो उस वक्त आउट रीच हुआ था। केरला तक जो आउटरीच हुआ था जिस बुनियाद पे जिस कॉन्ट्रैक्ट की बुनियाद पे आउटरीच हुआ था। जिन प्रॉमिससेस पे कश्मीर तक आउटरीच हुआ था। नॉर्थ ईस्ट से लेके गुजरात तक जिस कॉन्ट्रैक्ट की बुनियाद पे जिस कॉन्स्टिट्यूशन के बुनियाद पे जिस इक्वलिटी के बुनियाद पे जस्टिस के बुनियाद पे आउट रीच हुआ था। इंडिया के कैरेक्टर में वही है। यह हिंदुत्व नहीं है। ये राइट विंग नहीं है। किसी भी मजहब के नाम पे राइट विंग नहीं है। तो सवाल इन पे है। हम पे नहीं है। इनका सवाल इट ब्रिंग्स अ डिगस्टिंग क्वेश्चन टू द एकिस्टेंस ऑफ इंडिया। हिंदुस्तान है क्या? और मैं इस इस सवाल के जवाब को यहीं पे कंक्लूड करूंगा। मैं आगे रिफ्लेक्ट करना चाहूंगा। इंडिया हैड अ ग्रेट अपोरर्चुनिटी व्हिच इट अेल फॉर गुड फाइव सिक्स डेकेड्स। ये जो आपने पहले सवाल में जो एग्जांपल्स दिए ना क्राइसिस वेस्टर्न वर्ल्ड के विजावी सेकुलरिज्म उनके कल्चरल क्राइसिस उनके आइड आइडेंटिटी क्राइसिस किस तरह से क्लैशेस हुए और वो मिसफिट कैसे हो रहे उनकी उनकी रिलीजन रिलीजियस एस्पिरेशंस आइडेंटिटीज और पॉलिटिकल एस्पिरेशन इकोनमिक एस्पिरेशंस क्लैश कैसे बना फिर रिलजन उसका कैसे से कुर्बानी बना इंडिया हैड एन अपोरर्चुनिटी एंड इट अवेल दैट अपोरर्चुनिटी फॉर गुड फाइव सिक्स डेकेड्स टू प्रूव टू द रेस्ट ऑफ द वर्ल्ड कि सेकुलरिज्म की असली इंटरप्रिटेशन क्या है? तो आगा साहब अभी तक बहुत इंटरेस्टिंग बातें हुई। अक्सर जो बातें या तो अलऊ नहीं की जाती या फिर हम लोग खुद प्रिपयर्ड नहीं है और इनफॉर्म नहीं है वो करने के लिए कि 1940 के बाद 1970 80 तक वो दौर चला कि दुनिया ने अपनी टेरिटोरियल बाउंड्रीज को रीड्रॉ किया। 1920 से शुरू हो गया था। वो आप ऑटोमन एंपायर का कोलैप्स ले लीजिए। फिर ये सारी चीजें एक सिलसिला शुरू हुआ जिससे वेस्ट फेलियन आईडिया ऑफ रियासत कैसे तामीर होगी और उसके उसूल क्या होंगे और रियासतों के बीच के रिलेशनशिप्स क्या होंगे या ट्रांस नेशनल सिस्टम्स क्या होंगे और ये सारी चीजों के ऊपर एक पूरा एक सिलसिला चला और उसका रिजल्ट ये हुआ कि आइडेंटिटीज जो एक जमाने में ज्यादा बड़े ख्ते में या ज्यादा बड़ी ज्योग्राफी में ईजीली मूव करती थी और उनके के कल्चरर्स ईजीली एक्सेसबल थे। आप इसी को ले लीजिए साउथ एशिया को और इंडिया को ले लीजिए एज अ होल कि जब पाकिस्तान, हिंदुस्तान और बांग्लादेश की एक एंटिटी था तो उन पॉपुलेशंस के बीच में क्या फ्लो था? ये आप कोडिश पॉपुलेशन के लिए ले सकते हैं। ये आप मुख्तलिफ जितनी भी चीजें हैं उस हवाले से हम लोगों ने ये बात सामने रख दी कि हिंदुस्तान में जो आइडेंटिटी कंस्ट्रक्ट होती है इंडिया की खुद और इंडिया में रहने वाले बाशिंदों की जिनकी अपनी आईडियोलॉजिकल कमिटमेंट्स हैं। तो उसमें हिंदुस्तानी मुसलमान क्या है? क्योंकि हम बहसियत हिंदुस्तानी मुसलमान ये डिस्कशन कर रहे हैं। हिंदुस्तानी मुसलमानों का अपने आप से क्या वायदा है? अपने अकीदे से कुरान से वो क्या डिराइव करते हैं? उनका अपनी रीजनालिटी से और अपनी नेशनल स्केल से क्या रिलेशन है? मुसलमानों का गैर मुसलमानों से जो सेुलर लिबरल या फिर जस्टिस ओरिएंटेड या डेवलपमेंट ओरिएंटेड सियासत करते हैं उनसे इनके क्या ताल्लुक है? किस तरह का कॉन्ट्रैक्ट वजूद में आया? और आज का जो हिंदुत्ववादी एलिमेंट है वो इस पूरे नेचर ऑफ कॉन्ट्रैक्ट को जो सिर्फ मुसलमानों से नहीं हुआ। जो पूरे इस जमीन की जिस टेरिटरी के जितने भी सिटीजंस जो बाद में कहे गए उनके साथ हुआ वो किस तरह से चैलेंज हो रहा है उस लेवल को हम कैसे डिफाइन करते हैं रिीडफाइन करते हैं इस तक हम पहुंचे लेकिन अभी भी जो एक हिस्टोरिकल जो हमने बोला जो कल्चरल फ्लूइडिटी थी जो मोबिलिटी थी नेशन स्टेट ऑर्डर्स की वजह से वो मोबिलिटी रिस्ट्रिक्ट हुई और उससे वो जो कल्चरल कंटिन्यूटीज थी या फिर वो चीजें जो आम लगती थी कि जैसे आज की डेट में अगर बात करी की जाए कि सावरकर ने खिलाफत मूवमेंट को कैसे देखा या बाद में कैसे देखा जा रहा है और उस टाइम पे हमारे जो उलमा इकराम थे उनके लिए वो एक साथ वो गांधी के साथ भी हैं और खिलाफत के भी लीडर्स हैं और गांधी जी भी उस मूवमेंट के और गांधी जी भी उस मूवमेंट के पार्ट हैं। हम तो ये जो पॉलिटिकल टेक्नोलॉजी ऑफ़ सेल्फ थी ये टेक्नोलॉजी ऑफ़ सेल्फ पिछले 70 साल में ना यहां पूरी दुनिया में इरेज हुई कि आपके टेरिटोरियल कमिटमेंट्स होने के बावजूद आप लार्जर कम्युनिटी ऑफ वर्ल्ड को भी बिलोंग करते हैं। अब ऐसा तो है नहीं कि भई अगर आप उत्तर प्रदेश के बाशिंदे हैं तो आप हिंदुस्तान के नहीं हैं। यूपी में आप सहारनपुर से आते हैं। सहारनपुर में आप फलाना मोहल्ले से हैं। मैं आपका ये हाउस नंबर है तो उसमें फिर आके ये यहां क्यों रुक जा रहा है? तो अब सवाल ये है कि इसको मैं और ज्यादा कॉन्टेक्स्चुअलाइज कर दूं। पिछले तीन चार साल में गज़ा का जो जेनोसाइड हुआ फिलस्तीनियों का बड़ा अफ़ोसनाक मंजर पूरी दुनिया में अ लोगों के सामने आया जिसको लाइव जेनोसाइड दुनिया का पहला लाइव जेनोसाइड भी कहा गया और उसी के साथ ईरान जिसको बहसियत सिर्फ एक शिया मुल्क के देखा जाता था उसकी एक इमेज लोगों के सामने आई कि इंपीरियलिस्ट वेस्ट के खिलाफ एक ताकत जिसकी अपनी लिमिटेशंस हो सकती हैं। उसकी अपनी क्रिटिक हो सकता है। उसकी अपनी अचीवमेंट्स हो सकती हैं। लेकिन एक मुताहिद हुई दुनिया इस बात पे कि जो ये इंपीरियलिस्ट नेचर है ग्लोबल ऑर्डर में ग्लोबल पावर में स्पेशली यूएस का उसको चैलेंज किया गया और वहां पे जो शहादत हुई आयतुल्लाह खामनही साहब की उसमें शियाओं के साथ-साथ इवन सुन्नी वर्ल्ड इस पे भी हम बात करेंगे लेकिन एक रिस्पांस आया और हिंदुस्तान का बीजेपी के अंडर जो जिओपॉलिटिकल नेचर है या फॉरेन पॉलिसी है वो वो हम पिछले कई सालों में चेंज होते हुए देख रहे हैं। इजराइल की तरफ उसका क्या रुख है? उसका बाकी जो मुस्लिम वर्ल्ड है उसकी तरफ क्या रुख है या और ग्लोबल जियोपॉलिटिक्स में वो क्या पोजीशन ले रहा है? तो इससे दो चैलेंजेस है जिस पे हम बात करेंगे। पहला चैलेंज वही आ जाता है कि मेरी आइडेंटिटी यहां रहते हुए मैं मुसलमान हूं, मैं शिया हूं। मैं सुन्नी हूं। मैं फलाना दुनिया भर की जो आप डिबेट्स ले सकते हैं, आइडेंटिटीज को तोड़ सकते हैं। मेरा कमिटमेंट किसी और जगह पर रहने वाले सिमिलर रिलीजियस बिलीफ, सिमिलर ह्यूमैनिटेरियन कंडीशन, सिमिलर वो वो टेरिटोरियलिटी और नेशन स्टेट के रहते हुए कैसे हो सकता है? आपने बहुत खूबसूरत सवाल पूछा। यह सवाल है जिसको एड्रेस करने की जरूरत है और जिस जिस बात को छेड़ा नहीं जाता सरफेस के नीचे यह सारी क्राइसिस जो है ये सवाल जो है ये जिंदा है और इसी के कॉन्सक्वेंसेस हम फील करते हैं फेस करते हैं। हमने इस सवाल को हेड ऑन लाइन लिया है। राइट विंग भी हमसे यही सवाल पूछती है। इंडियन सोसाइटी इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन भी हमसे यही सवाल पूछता है। हमारी अपनी अंडरस्टैंडिंग भी यही सवाल पूछती है। हमने हेड ऑन लेने की कभी कोशिश ही नहीं की है। और यह वही बात आ जाती है जो मैंने पहले कहा कि क्लेरिटी हमें पहले खुद में क्लेरिटी एस्टैब्लिश करनी है। एक दफा जब क्लेरिटी हो जाए फिर हम रिएक्शनरी नहीं होंगे। हमारा ना हमारी क्लेरिटी की वजह पे हमारी अपनी फिलॉसफी होगी। हम हमारी अपनी कंट्रीब्यूशन होगी। हमारी अपनी जगह होगी और हम चीजों को शेप करेंगे। हम रिएक्ट नहीं करेंगे। और हमें गाइड नहीं किया जाएगा। हमारे नैरेटिव को गाइड नहीं किया जाएगा या तोड़ा मरोड़ा नहीं जाएगा। हमारी बहुत सारी हकीकतें हैं और जिसे हंटिंग भी कहते हैं क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में कि आइडेंटिटी सब्जेक्टिव और यही यूनिवर्सल हकीकत है एंड पोस्ट मॉडर्न वर्ल्ड और जब से स्टेट नेशंस नेशन स्टेट्स जो है एस्टैब्लिश हुए बाउंड्री जो जैसा कि आपने कहा सिविलाइजेशन का इंटरेक्शन उधर इधर जाना लोगों का उधर जाना बंद हो गया क्योंकि बाउंड्रीज आ गई खास्ता या ना खास्ता तो सही है गलत है दैट्स अ डिफरेंट डिबेट पर हर जगह पे अब बाउंड्रीज है। 200 से भी ज्यादा नेशन स्टेट्स हैं। नेशन स्टेट्स के अंदर अलग-अलग आइडेंटिटी है। आप एक तो उन नेशन स्टेट के सिटीजंस है। उन नेशन स्टेट में आप के अपने बिलीव्स है। आपके कल्चर है, आपकी सोसाइटीज है, आपका नेबरहुड है, आपका घर है, फैमिली है, आपकी फेथ है। ये सारी आइडेंटिटीज है। सब लेवल पे नीचे-नीचे लेवल पे और जैसे कि मैं फिर से कहूं ने यह कहा कि आइडेंटिटी देते वक्त इंसान यह नहीं कहता कि मैं कौन हूं। यह कहता है कि मैं कौन नहीं हूं। क्योंकि हर कोई हम बाय नेगेशन अपनी आइडेंटिटी एस्टैब्लिश करता है। दो लोग जब जमा हो जाते हैं वो एक इंसान ये कहता है कि मैं कैसे तुम्हारे जैसा नहीं हूं। फॉर एग्जांपल हम यहां पे चार पांच लोग हैं। बाहर का कोई यूरोप से कोई आए हमसे पूछे आप कौन है? कहां के? हम कहेंगे हम हिंदुस्तान के हैं। और हम इंटरनली अगर वही सवाल एक दूसरे से पूछे मैं आपसे पूछूं आप कहां के हैं? आप मुझसे पूछे आप कहां के? मैं आप नहीं कहेंगे हम हिंदुस्तान के। आप कहेंगे मैं यूपी से हूं। दिल्ली से हूं। हम कहेंगे हम कश्मीर से हैं। कश्मीर में मुझसे यही सवाल कोई पूछे कि आप कहां से हैं? मैं ये नहीं कहूंगा कि मैं कश्मीर से हूं। मैं कहूंगा मैं बड़गांव से हूं। वो कहेगा मैं श्रीनगर से हूं। तो आइडेंटिटीज यही है। सब्जेक्टिव है। हर कोई ये कहता है कि मैं कौन नहीं हूं? हम मेरी अपनी इंडिविजुअलिटी कैसे है? मेरी अपनी इंडिविजुअल आइडेंटिटी कैसे है? तो ये सवाल हर जगह है और ये सवाल हिंदुस्तान में भी है क्योंकि हिंदुस्तान माशा्लाह डायवर्सिटीज का यूनियन है। मजमुआ है। यहां पे लिंग्विस्टिक आइडेंटिटीज भी है, कल्चरल आइडेंटिटीज भी है, एथनिकल आइडेंटिटीज भी है, रीजनल आइडेंटिटीज भी है, आइडेंटिटी बेस्ड फेथ है, रिलीजन है। और फिर एक नेशन स्टेट आइडेंटिटी है। पॉलिटिकल डिस्कोर्स में भी आप देखेंगे यह है कि वी आर इंडियन हम हिंदुस्तानी है। इंटरनली जब डायलॉग होता है पॉलिटिकल डायलॉग होता है। बंगाली बंगाली प्राउड बंगाली है। मराठी प्राउड मराठी है। ड्रेविडियंस तमिल केरला वगैरह कर्नाटका में अपनी-अपनी आइडेंटिटीज को रीइंफोर्स किया जाता है। सो ये हकीकत है। ये हर कोई जानता है। इसी तरह से कोई हिंदू है, कोई मुस्लिम है। लिंग्विस्टिकली हम फिर अलग-अलग है। कश्मीर में ही आप मिसाल ले लीजिए। हम कश्मीरी अलग-अलग आइडेंटिटी से है। लिंग्विस्टिकली कोई कश्मीरी है, कोई पहाड़ी है, कोई गुर्जर है, कोई डोगरा है, कोई लद्दाखी है, बलती है। अब सवाल इन सब आइडेंटिटीज को छोड़ के एक आइडेंटिटी को लेके हम क्योंकि हम मुस्लिम डिस्कोर्स में मुस्लिम पॉलिटिकल फिलॉसफी पर बात कर रहे हैं और क्राइसिस पे बात कर रहे हैं कि सवाल यह है कि हम क्या हैं? हम मुस्लिम हैं। हम इंडियन मुस्लिम्स भी हैं। हमारी एस्पिरेशन जो है नेशनल एस्पिरेशन भी है। हमारी रीजनल एस्पिरेशन भी है। हमारी रिलीजियस एस्पिरेशंस भी है। और हम आइडेंटिफाई करते हैं जो एक यूनिवर्सल मुस्लिम उमा है, ग्लोबल मुस्लिम उम्मा है उसके साथ भी। तो अगर मुझसे इन इंडियन सोसाइटी में कोई सवाल पूछे तो इन सब आइडेंटिटीज को लेके आपका जवाब क्या है? आप क्या हो? हाउ शुड अ स्टज लाइक समवन एस अस बिहेविंग इन अ नेशन स्टेट लाइक इंडिया आई विल कम बैक टू मैं वापस पलट जाऊंगा कुरान की तरफ और वही दो चार प्रिंसिपल जो जो प्रिंसिपल्स है कुरान के उनको एस्टैब्लिश करना चाहूंगा शायद मैं गलत भी हो सकता हूं वि द डिस्क्लेमर आई एम ओपन फॉर करेक्शन शायद मैं गलत भी हो सकता हूं कुरान मुसलमान से कैसे एड्रेस करता है इन सब आइडेंटिटीज के बारे में। अगर मैं मुसलमान हूं, मैं एक मुल्क का हिस्सा हूं, तो मुझसे कुरान की एक्सपेक्टेशन क्या है? कुरान ने इस आइडेंटिटी को इस यूनिट को एज अ नेशन स्टेट कभी एड्रेस ही नहीं किया। मुस्लिम क्योंकि अगर वैसे होता तो आज मॉडर्न नेशन स्टेट्स में यह क्लैश ही होता ना। वी वुड हैव बीन अ प्रॉब्लम इंस्टेड ऑफ अ स्यूशन। तो हम कोई नेशन स्टेट एड्रेस नहीं हुए हैं। हम उम्मत एड्रेस हुए हैं। उम्मत एक प्रिंसिपल मोरल बैकग्राउंड में यकीन रखने वाले एथिकल बैकग्राउंड में यकीन रखने वाले जो यूनिवर्सल है। दोज़ आइडियाज़ ऑफ जस्टिस प्रिंस उसके प्रिंसिपल्स ये ये हर जगह के लिए हर कहीं के मुसलमान के लिए सेम है। मैं मुसलमान इसलिए हूं क्योंकि मैं कुछ प्रिंसिपल्स में बेसिक फंडामेंटल प्रिंसिपल्स में यकीन रखता हूं। सबसे बड़ा प्रिंसिपल उसमें यह है कि आप तौहीद पे अल्लाह की वाहदानियत पे यकीन रखते हैं। क्रिएटर के एक होने पे यकीन रखते हैं। फिर नबूवत का सिलसिला जो है जो इ्तताम पे पहुंचता है हुजूर के जात मुकद्दस पे। उसके बाद आई एस अ सोशल बीइंग मैं क्या हूं? मैं उसके बाद फाउंडिंग प्रिंसिपल्स क्या है कुरान के? क्या मैं नेशन स्टेट हूं जिसको हर एक दूसरे नेशन स्टेट अ के साथ लड़ाई करके उनको अपने अंडर लाना है एक्सपेंड करना है इस नेशन स्टेट को या मैं एक एथिकल एंड मोरल बेस्ड ऑन प्रिंसिपल्स एक यूनिट हूं जो एक यूनिवर्सिटी से स्कूल से पढ़ के निकला है वो स्टूडेंट कभी मल्टीीनेशनल कंपनी में भी होता है कहीं आप यूनिवर्सिटी की मिसाल ले लीजिए यूनिवर्सिटी में एक करिकुलम पढ़ाया जाता डिसिप्लिन पढ़ाया जाता है, एक सिलेबस पढ़ाया जाता है। आपको उस करिकुलम सिलेबस डिसिप्लिन के बाद आपको दुनिया में छोड़ा जाता है। आप जाते हैं। उसी यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट स्टूडेंट प्राइवेट सेक्टर में भी है। उसी यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट गवर्नमेंट सेक्टर का में भी है। उसी यूनियन यूनिवर्सिटी का स्टूडेंट हर हर एक सेक्टर में है। द क्वेश्चन इज़ क्या वो स्टूडेंट उन एथिक्स को, प्रिंसिपल्स को, डिसिप्लिन को जो उसने सीखा उसको लेके उन इंस्टिटशंस को कंप्रोमाइज करना चाहता है, इनवेड करना चाहता है या यूनिवर्सिटी से निकल के वो स्टूडेंट उस इंस्टीट्यूशन का जो जहां पे भी हो कंट्रीब्यूटर बन जाता है, कॉम्प्लीमेंट बन जाता है व्हिच एड्स टू द वैल्यू ऑफ़ दैट इंस्टीट्यूशन। अगर इस्लाम को एज यूनिवर्सिटी जो आपको एथिकल मोरल कोड दे देता है, प्रिंसिपल्स दे देता है। उसके बाद आपको नेशन स्टेट एड्रेस नहीं करता है। उसके बाद आपको स्टूडेंट ऑफ दोज़ कोड्स एड्रेस करता है। आप जाओ दुनिया में आप बरकतें फैलाओ। वैल्यू एडिशन लाओ। नाउ कंट्रीब्यूट टू द सोसाइटी। इसी चीज को मैं यहां पे लाना चाहता था। कुरान में खुदा ताला हमसे एड्रेस करते हैं कुम खरा उम्मत उजतस ये नहीं कहा कि कु मुल्कस तुम बेहतरीन नेशन स्टेट हो जिनको लोगों के लिए उठाया गया कुम खैर आप बेहतरीन उम्मत हो जिनको इंसानियत के लिए उठाया गया है जिनको इंसानियत के लिए उठना है सो इफ यू स्टडी दी डिसिप्लिन्स यूनिवर्सिटी की मिसाल ज़हन में रख के इस्लाम के ये डिसिप्लिन मोरल एथिकल कोड्स लॉजिकल कोड्स अगर आप समझ के सीख के ये डिसिप्लिंस सीख के अगर आप बाहर निकलते हैं आप जिस भी सेक्टर जिस भी नेशन स्टेट जहां पे भी जाए आप कॉम्प्लीमेंट्री कंट्री ये हकीकत बन जाए उस उस नेशन स्टेट के आप कंट्रीब्यूटर बन जाए आप वैल्यू एडिशन लाए उम्मत का तस्सवुर ये है कि कुम खतनास जहां पे भी हो उजत नास लोगों के लिए आप उठो बेहतरी लाओ। तो कुरान मुझसे ये चाहता है कि अगर मैं हिंदुस्तानी मुसलमान हूं इस नेशन स्टेट में मेरी प्रेजेंस कॉम्प्लीमेंट करनी चाहिए टुवर्ड्स एस्टैब्लिशमेंट ऑफ जस्टिस एक्सीलेंस इक्वलिटी जो भी एक प्रोग्रेस होती है स्टेट की। आई शुड बी अ स्टूडेंट ऑफ अ ऑफ अ बिलीफ ऑफ अ यूनिवर्सिटी अ यूनिवर्सल यूनिवर्सिटी। विद दोज़ बिलीफ्स शुड ऐड टू द एक्सीलेंस ऑफ द सोसाइटी। दिस इज हाउ कुरान एक्सपेक्ट्स फ्रॉम मी। ये कुरान का मेरे साथ राब्ता है। फिर आप ये कहेंगे जी मैं हिंदुओं के लिए क्यों उठूं? मैं हिंदुओं की बेहतरी के लिए क्यों ये सब करूं? वो हिंदू है। मैं मुसलमान हूं। मुझे उनके इंसाफ के लिए क्यों उठना है? मुझे सिर्फ जब मुस्लिम सोसाइटी मिलेगी तभी जो जस्टिस की बात करेंगे, प्रोग्रेस की बात करेंगे, इक्वलिटी की बात करेंगे और इनके साथ दोस्ती नहीं रख सकता हूं। ये बराबर के नहीं है। ऐसे सवाल आ सकते हैं रिलीजियसली या बाय बिलीफ या किसी भी तरीके से हम अलग है वो अलग है। इनके साथ रवैया हमारा मुस्लिम्स के साथ रवैया हमारा अलग-अलग होना चाहिए। कुरान उस चीज को भी नेगेट करता है। एक और प्रिंसिपल है पिटिकल फिलॉसफी के लिए या फिर पिटिकल जुरिस प्रूडेंस के लिए और इसमें जवाब है राइट विंग के लिए भी जो ये कहते हैं कि इस्लाम यही सिखाता है मुसलमानों के लिए मजबूरी है या जरूरी है कि वो तलवार उठाए और हर किसी को जो है मुसलमान बनाए जबरदस्ती और जंग करते रहे। ये सब डिस्कोर्स जो चलाया जाता है। अल्लाह ताला फरमाते हैं कि मैंने तुम्हें कभी मना नहीं किया है। रोका ही नहीं है। इससे कि आप उनसे बराबरी का रिश्ता इंसाफ पे मनी दोस्ती का रिश्ता कायम करो। चाहे मुसलमान हो गैर मुसलमान हो। लम दी वम वो लोग जिन्होंने आपके साथ आपके दीन की वजह से आपके साथ लड़ाई नहीं किया की है आपको मारा नहीं है दीन की वजह पे आपके फथ की बुनियाद पे आपको नहीं मारा दूसरे जिनोंने आपको आपके घरों से नहीं निकाला आप अन के आप उनसे दोस्ती और अद जस्टिस इस पे मबनी रिश्ता कायम करो। इन्लाह मुसदी अल्लाह ताला ने ये नहीं कहा कि इस प्रिंसिपल में इन्लाह मुस्लिम जो भी आपके साथ एक पीसफुल इसमें कॉन्ट्रैक्ट में रहना लाइफ में रहना चाहता जिंदगी गुजारना चाहता है। पीसफुल माशरे में उसके साथ कुरान का हुकुम ये है उस हिंदू ईसाई सिख गैर मुस्लिम जो भी हो यहूदी हो नसरानी हो अगर उसने आप दीन की वजह से आपसे लड़ाई नहीं की है आपको मारा नहीं आपको घर से नहीं निकाला इट इज इनकंबेंट अपॉन द मुस्लिम उ्मा उनके साथ मोहब्बत इक्वलिटी और अद के बुनियाद पे माशरा कायम करें जिंदगी ऑर्डर कायम करे सिस्टम कायम करें इन अल्लाह मुसदी कंक्लूड ऐसे होती है आयत जो जस्टिस एस्टैब्लिश करते हैं अल्लाह ताला उनहीं को पसंद करता है। ये नहीं कहा कि इन्लाह मुस्लिमीन यहां पेकि दो कैटेगरीज की बात हो रही है ना। एक वो जो मुसलमान है, दूसरी कैटेगरी वो जिन जिनके साथ मुसलमान लड़ाई कर रहे हैं। तो कंक्लूड होनी चाहिए थी आयत हमारे लॉजिक के हिसाब से इन दो कैटेगरीज के बुनियाद पे अल्लाह ताला मुस्लिमों को पसंद करता है। अल्लाह ताला इन दो कैटेगरीज के बुनियाद पे एक गाइडिंग प्रिंसिपल बनाते हैं। जो जस्टिस एस्टैब्लिश करता है अल्लाह ताला उनको पसंद करता है। सो हमारा हमारे हमारी एकिस्टेंस के लिए सवाल कुरान हमें इजाजत नहीं देता किसी के साथ। लड़ाई करने की, झगड़ने की, इनकलिटी की, इनजस्टिस की, अदरिंग की, पोलराइजेशन की, किसी को सेकंड क्लास सिटीजन बनाने की। अगर सेकंड क्लास सिटीजन बनाने की गुंजाइश होती तो इंसाफ अद किस्त लफज़ का इस्तेमाल नहीं होता। बराबरी और किस्त के बुनियाद पे इनके साथ माशरा कायम करो। स्टेट कायम करो। तो अगर वह पहले जो सवाल में मैंने जो गाइडिंग प्रिंसिपल्स बताए कॉन्ट्रैक्ट के बुनियाद पे, प्रॉमिस के बुनियाद पे, पीस के बुनियाद पे अगर एक माशरा आपने कायम किया और उस माशरे में ये शरायत पूरे होते हैं तो आपको जस्टिस की बुनियाद पे एक माशरा सिस्टम नेशन स्टेट अगर आपको मिलता है, आप उसके हिस्से हैं। आपको उस नेशन स्टेट को एस्टैब्लिश करना है। उस नेशन स्टेट के जरिए जस्टिस एस्टैब्लिश करना है। तो कुरान के नजरिए से मैं एक नेशन स्टेट नहीं हूं। मैं मुसलमान हूं। एक यूनिवर्सल यूनिवर्सिटी या एथिकल कोड का मैं एक स्टूडेंट हूं। बिलीवर हूं। वो स्टूडेंट दुनिया में जहां पे भी हो उन एथिक्स के बुनियाद पे उन मोरल्स के बुनियाद पे उन प्रिंसिपल्स के बुनियाद पे कुमतनास जहां पे भी हो हिंदुस्तान में हो यू शुड बी द बेस्ट सिटीजन ऑफ़ योर कंट्री। यू शुड बी अ सिटीजन हु कॉम्प्लीमेंट्स ह कंट्री एंड दैट कॉन्ट्रैक्ट द कॉन्स्टिट्यूशन एंड द सिस्टम ऑफ जस्टिस बेटर देन एनीवन एल्स एक ये बात तो हमारा इंडिविजुअल एकिस्टेंस हम खुद को कैसे देखते हैं द अंडरलाइनिंग इज जस्टिस जितनी भी मैंने आपसे बातें की अभी तक और जो कुरान की आयातों को की उनमें अंडरलाइनिंग है जस्टिस इसलिए हमारे साथ-साथ जितनी भी सोसाइटीज इंडिया में रहती है ये उनके लिए भी हमारे लिए भी कंडीशन इज जस्टिस। अगर आप जस्टिस के बुनियाद पे हमसे एंगेज करते हैं तो कुरान ही हमें मजबूर करता है कि आपके साथ एंगेज करे पीसफुली ऑन द बेसिस ऑफ़ जस्टिस एस्टैब्लिश करे प्लीज और इन इंस्टीटश को प्रोटेक्ट करे इन इंस्टीटश को एस्टैब्लिश करें। ऑन द बेसिस ऑफ़ जस्टिस दिस इज़ हाउ इंडियन मुस्लिम या जहां का भी मुसलमान हो वो खुद को उसकी रिस्पांसिबिलिटी टुवर्ड्स जो नेशन स्टेट है वो उसको देखनी है। उसके बाद है बाकी की हकीकत है। उसके बाद है पाकिस्तानी मुसलमान, अफगानी मुसलमान, ईरानी मुसलमान, सऊदी मुसलमान, यूएई मुसलमान, टर्किश मुसलमान, फस्तीन का मुसलमान। इनके साथ मेरी रिलेशनशिप क्या है? एक चीज हमें माननी पड़ेगी। ये एक हकीकत है। जैसे कि पहले ही मैंने कहा हमारी आइडेंटिटीज अलग-अलग है और ये आइडेंटिटीज एस्टैब्लिश्ड है। इनके रूल्स ऑफ एंगेजमेंट भी एस्टैब्लिश्ड है। ये रियलिटीज ये लिविंग रियलिटीज है। नेशन स्टेट्स की भी अब अपनी-अपनी आइडेंटिटीज है। ईरानी मुझे मुसलमान मानेगा मगर ईरानी कभी नहीं मानेगा। हम अरब के रहने वाले लोग मुझे अरब मानेंगे मगर अरब कभी नहीं मानेंगे। हजारों मिसाले हैं। एक्सपर्ट्स कितने हैं हमारे हिंदुस्तान से चाहे मुसलमान हो चाहे गैर मुसलमान हो। कुवैत से लेके यूएई में, कतर में, बहरेन में, सऊदी अरेबिया में जिनने खून पसीना बहाया है उन मुल्कों के बनाने में मजदूरी की है। खून पसीना सब कुछ जो मजदूरी वहां के मुसलमान खुद नहीं कर पाते हैं। 50-50 55 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में वो यहां से जाने वाला मुसलमान भी गैर मुसलमान भी वहां पे करता है। व्हेन इट कम्स टू सिटीजनशिप एंड इक्वलिटी ऑफ़ राइट्स। क्या वो अरब के लोग यहां के मजदूरों को जिन्होंने वो मुल्क बनाया जो मॉडर्न उनके इस वक्त जितने भी इंस्टीटश है इकोनमिक ग्रोथ्स जितनी भी है उसमें कंट्रीब्यूशन यहां के खून पसीने का है। क्या उन मुसलमानों को जो हिंदू हिंदुस्तान से जाने वाले मुसलमान वहां रहते हैं उनको वो कभी अरब मानेंगे? उस नेशन स्टेट का हिस्सा मानेंगे? उस नेशन स्टेट के सिटीजन का इक्वल राइट देंगे? नहीं देंगे। कभी नहीं देंगे। मैं कल को जाना चाहूंगा सऊदी अरेबिया मैं कल को जाना चाहूंगा यूएई बहसते मजदूर मजदूर खून पसीना बहाऊंगा सब कुछ करूंगा 50 55 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में सब कुछ करूंगा 20 साल गुजारूंगा उस मुल्क को बनाऊंगा 20 साल के बाद ये कहूंगा कि मुझे और आपके यहां के सिटीजन के इक्वल राइट्स है मुझे वही स्टेटस दे दीजिए जो उसका है नहीं देंगे वो आप सिटीजन नहीं मानेंगे मैं जाना चाहूंगा ईरान सब कुछ वही करूंगा जो खून पसीना उस मुल्क के लिए हो बहाऊंगा। फिर उसके बाद यह यह एक्सपेक्ट करूं उनसे कि आप मुझे अपने मुल्क का सिटीजन बनाइए और इक्वल राइट दे दीजिए अपने मुल्क के सिटीजन के बराबर नहीं होगा। इसी तरह से हमारी रियलिटी भी है। हमारा भी एक नेशन स्टेट है। हमारी भी अपनी आईडियोल आइडेंटिटीज है। स्टेट की आइडेंटिटीज है। यूपी का मुसलमान और कश्मीर का मुसलमान। कश्मीर का मुसलमान और बंगाल का मुसलमान। कहीं ना कहीं पर आइडेंटिटीज अलग-अलग है। एस्पिरेशंस अलग-अलग है। रीजनल एस्पिरेशंस अलग है। हालांकि हम सभी एक दूसरे को जब एज अ फेथ देखना हो तो एक यूनिट देखते हैं। मगर उसके बाद भी कुछ रियलिटीज है जो एस्टैब्लिश्ड है। और ये हिपोक्रेसी होगा कि उस उन डिफरेंसेस उन आइडेंटिटीज को आप रियलाइज ना करें। उनको हकीकत ना माने और उनकी बुनियाद पे आप अपनी प्रेजेंस को जहां पे भी है आप शेप करें। फिर अपनी रिससिबिलिटीज को शेव करें उन हकीकत की बुनियाद पे। तो वो जो लार्जर हकीकत है वो लार्जर हकीकत इस हद तक है कि हम उस यूनिवर्सिटी के मानने वाले हैं। जिसकी मैं मिसाल दे रहा था मैं मेटाफोरिकली कह रहा हूं। हम उस उस बिलीफ सिस्टम के मानने वाले हैं। उस बिलीफ सिस्टम से जो मोरल्स, एथिक्स, प्रिंसिपल्स, राइट्स, आईडिया ऑफ जस्टिस जो मिलता है आई ब्रिंग टू माय ओन सोसाइटी। उसके बाद मैं अपनी सोसाइटी का हिस्सा हूं। जहांजहां पे भी रहता हूं। उस जस्टिस की बुनियाद पे अगर उनके साथ कभी ज्यादती होती है, आई आइडेंटिफाई विद देम। इट डजंट मीन कि मैं उस नेशन स्टेट के साथ खुद को आइडेंटिफाई करता हूं। वह भी मेरे साथ आइडेंटिफाई नहीं करते। मैं भी उनके साथ ऑन द बेसिस ऑफ नेशन स्टेट आइडेंटिफाई नहीं करता हूं। एंड ऑन द कंट्री अगर वो उस कोड को वायलेट करते हैं जिस जिस यूनिवर्सल कोड की हम बात करते हैं जिसकी वजह से हम मुसलमान हैं। मैं उनके साथ आइडेंटिफाई नहीं करता हूं। वो मेरे आइडल्स नहीं बन जाते और मैं उनके लिए आइडियल नहीं हूं। वो मुझसे आइडेंट आइडेंटिफाई नहीं करते। जब भी आप देखते हैं कि मुसलमानों का दिल कभी धड़कता है जिसको राइट विंग उठा के एक केस बनाते हैं। फस्तीन में ज्यादतियां होती है। ठीक है? उसमें गाइडिंग प्रिंसिपल ये गाइडिंग फैक्टर ये भी हो सकता है। है भी कि वो मुसलमान है। ठीक है। मगर वो उस तरह के मुसलमान है जो जेनुइनली ऑप्रेस हो रहे हैं। जो अपने राइट के लिए खड़े हुए हैं और उनको ऑप्रेस किया जा रहा है। पूरी ह्यूमैनिटी उस जेनोसाइड को एकनॉलेज कर रही है। उनको उस आइडेंटिटी की वजह से ऑप्रेस किया जा रहा है। वो उस आइडेंटिटी की वजह से दूसरों को ऑप्रेस नहीं कर रहे। उस आइडेंटिटी की वजह से उनको ऑप्रेस किया जा रहा है। उनका जेनोसाइड किया गया। तो नेचुरली उसके लिए बात करेगा। कोई भी मुसलमान हो। कोई भी सही सोच रखने वाला इंसान कहीं पर क्यों ना हो वो बात करेगा। वहां पे वो दे स्टैंड फॉर दैट राइट। और इसी तरह से बांग्लादेश में एक दो केसेस आए या कुछ केसेस आए जब हिंदू माइनॉरिटीज के साथ कुछ ज्यादियां हुई वहां पे जो नहीं होनी चाहिए। मेरी नजर वो टेररिज्म के बराबर है। उससे भी घटिया है। नहीं होनी चाहिए थी। यहां से भी बातें उठी। क्या हम अपनी हिंदू पापुलेशन को ये कहे कि आप बांग्लादेशी हिंदू हो। आपको उन आपका उनके साथ क्या लेना देना है? उस वक्त मुसलमानों की भी हिंदू की भी इक्वल रिससिबिलिटी है उसके लिए बात करें। सो व्हाट आई मीन टू से हम उम्मत सिर्फ तब तक है इन यू ग्लोबल टर्म्स। हम उम्मत के उस यूनिट से आइडेंटिफाई करते हैं। और ये हमें भी खुद भी इंटरनली समझना चाहिए। हम बाय डिफॉल्ट किसी के साथ रिलेटेड नहीं है। एज लॉन्ग एज दोज़ गाइडिंग मोरल प्रिंसिपल्स आर आर आर टेकन केयर ऑफ। दे अबाइड बाय दोज़ गाइडिंग प्रिंसिपल्स, मोरल प्रिंसिपल्स, एथिकल प्रिंसिपल्स जो इस्लाम के हैं। बहुत सारी ऐसी मिसाले हैं जिन्होंने वायलेट किया इस्लाम के प्रिंसिपल्स को, मोरल प्रिंसिपल्स को, एथिकल ह्यूमन प्रिंसिपल्स को मुस्लिम्स थ्रू आउट द वर्ल्ड उनके साथ आइडेंटिफाई नहीं करते। दाश के साथ कौन आइडेंटिफाई करता है? आपने कितने लोग देखे करो करोड़ों मुसलमान है हिंदुस्तान में। कितने लोग उठे दाइश के साथ? क्योंकि वह उसके बरक्स है। इस तरह की बहुत सारी मिसालें आपको मिलेगी क्योंकि वह उसके बरक्स है। फस्तीन में जो हो रहा है वो उसके बरक्स है। वो ऑप्रेस्ड है और उनके ऑप्रेस होने की प्राइमरी वजह ये है कि वो मुसलमान है। प्राइमरी वजह ये है कि वो मुसलमान है। तो हमारी रिस्पांसिबिलिटी टुवर्ड्स द यूनिवर्सल यूनिट कॉल्ड उमा। इट्स ओनली ऑन द बेसिस ऑफ अ मोरल कोड और गाइडिंग प्रिंसिपल्स जो है और हमारे बिलीफ्स जो है यूनिवर्सल कोड जो है हमारा के ये इस्लाम की टीचिंग्स है इन मोरलिटीज पे इन गाइडिंग प्रिंसिपल्स पे जो भी मुस्लिम यूनिट कहीं पे भी यूनिवर्सली काम करता है हम उनकी एप्रिसिएशन के लिए बात करेंगे। हम उनसे सीखना चाहेंगे। जो नहीं करता है हम उनसे दूरी इख्तियार करेंगे। वो हमारे ग्लोबल यूनिट का हिस्सा नहीं है। वो उम्मत का हिस्सा नहीं है। तो उम्मत का हिस्सा मेरिट है। क्वालिटी है। इंडिविजुअल नहीं है। आइडेंटिटी नहीं है। तो जब तक वो मेरिट और क्वालिटी वो क्राइटेरिया फुलफिल ना होता हो। हम और ग्लोबल यूनिट नहीं है। ग्लोबल यूनिट के लिए सिर्फ एक ही गाइडिंग प्रिंसिपल है। कुतनास जो भी जहां भी दुनिया में लोगों के लिए बेहतर हो। वो खैर उम्मत है। वही मुसलमान है। वही यूनिवर्सल उमा है जिसकी कुरान हमसे ताकी करता है। क्योंकि मैं खुद इस मौजू का रिस्चर भी हूं और आप भी इसके रिस्चर हैं। आपने भी इशारा किया आप एक किताब लिखना चाहते हैं। मेरा भी इरादा है कि मैं इस पे किताब लिखूं के जो इस्लामिक पॉलिटिकल फिलॉसफी है उसको हम जो बात भी कर रहे थे कि अक्सर ये हुआ है कि पिछले 100 200 300 सालों में के प्रॉफेट मोहम्मद सल्ल वसल्लम की जो 23 इयर्स का वो पीरियड है कि जब उनको रेवोलेशन आ रहे हैं। जी उस पीरियड के डिफरेंट फेसेस को लोगों ने सेलेक्टिवली अपने कंडीशनलिटीज को मद्देनजर रखते हुए उसको थराइज किया। उसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन जब आप उसको यूनिवर्सलाइज कर दें उस पर्सपेक्टिव को कि अब वो हर जगह इक्वली एप्लीकेबल है तो मसले पेश आते हैं कि आपने एक एक कॉन्टेक्स्चुअल रियलिटी विद इन द प्रोफेटिक लाइफ को आपने एक मेटाफिजिकल ट्रांसेंडेंटल पॉलिटिकल क्लेम में बदल दिया। वह एंड ऑफ़ द लाइफ में भी है कि अगर आपने स्टेट कायम किया, रियासत कायम की, खिलाफत कायम करी कि वह ही फेज़ है जो पॉलिटिकल थ्यरी है। अगर उसको इस तरह देखा जाए कि जब पहली अल्लाह के रसूल सल्लम के ऊपर आयत नाज़िल होती है इरा की उसमें जो पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट है सोवनिटी के बेस पे नफ़्स और रूह का वो अल्लाह की जात और उसके हुकुम से है। तो वहां पे भी इकामत दीन हो रहा है। और मुत्तहदा कौमी अथोरी है क्योंकि काम कौम वहां पे वह फैकल्टीज हैं जो इंसान के विद इन मल्टीपल हैं। वह विदान भी हो सकता है। वो कलब भी हो सकता है। वो अलग-अलग जो आपकी फैकल्टीज के मैनिफेस्टेशन है उनके बीच में कॉन्ट्रैक्ट प्रोड्यूस हो रहा है अल्लाहज़ विल का सोवनिटी का। और उसके बाद वो आपकी फैमिली अलग-अलग फेसेस में आपके फ्रेंड्स फिर आप अपनी लोकालिटी में मक्का के विदिन आप लोगों को दावत देते हैं कि भ ये होना चाहिए और हर डेमोग्राफी के एडिशन में जो पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट या सोशल कॉन्ट्रैक्ट कहिए। पॉलिटिकल कॉन्ट्रैक्ट सोशल कॉन्ट्रैक्ट का एक सब कैटेगरी है कि उस सोसाइटी के कंस्ट्रक्ट्स को अब आप फॉर्मल कॉन्ट्रक्चुअल कैटेगरी में बदल रहे हैं। तो उस [नाक से की जाने वाली आवाज़] 23 इयर्स में डिफरेंट काइंड्स ऑफ कॉन्टेक्स्ट्स में वो यूनिवर्सल प्रिंसिपल्स जिसको आप यूनिवर्सिटी बोल रहे हैं उन यूनिवर्सल प्रिंसिपल्स का एप्लीकेशन हो रहा है खैर के लिए। जब आप मदीने में जा रहे हैं तो आप मार्केट का बहुत इजी एग्जांपल है बाकी चीजों में जिसमें सब लोग आ रहे हैं तो उनमें यहूदी भी जो आपके मुखालिफ हैं या दूसरे लोग हैं वो भी फायदा उठा रहे हैं। तो एक तो ये कि ये जो कंस्ट्रक्शन ऑफ पॉलिटिकल फिलॉसफी है वो एक्चुअली मच मोर फ्लेक्सिबल है और प्रिंसिपल्ड है। उसमें अलग-अलग अब जहां पे 80 90% मुसलमान हो गए और वहां पे कंसेंसस बिल्ड हो गया। जिस तरह यहां पे कंसेंस बिल्ड हो गया कि इस कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क पे रियासत कायम होगी और वहां वो कंसेंस बिल्ड हो गया तो वहां वहां वैसे हो गई। बट इसी से रिलेटेड एक सवाल है जो फॉलो अप सवाल होता है राइट रिंग का क्योंकि ये कॉन्टेक्स्ट ना हमारे लोगों को पता कि पॉलिटिकल फिलॉसफी की भी एक मेटा पॉलिटिकल पर्सपेक्टिव है अगर आप ऊपर से देखें तो उसमें अक्सर ये होता है कि आप यहां पे जिन प्रिंसिपल्स की डिमांड कर रहे हैं एक स्टेट के फॉरमेशन में और आप दो एक्चुअली सवाल हैं। एक तो ये है कि यूक्रेन में भी अगर ये हो रहा है इंपीरियल स्टेट के खिलाफ तो फिर हम वही सेम लेवल ऑफ डोनेशंस और अकीदत क्यों नहीं ला पा रहे? हम ईरान और कजा की तरफ ही क्यों ला पा रहे? और दूसरा ये होता है कि आपकी जो पॉलिटिकल सोवनिटी के जो प्रिंसिपल्स हैं जिनको आप डिमांड कर रहे हैं यहां पे एक तरह के क्यों कर रहे हैं? यहां पे आपको डेमोक्रेसी क्यों चाहिए? और आपको ईरान में, आपको सऊदी अरब में या आपको तुर्की में या आपको मुख्तलिफ जितने भी मुस्लिम मेजॉरिटी स्टेट्स हैं जैसे यहां हिंदू मेजॉरिटी है वहां पे आपको थियोक्रेटिक स्टेट्स क्यों चाहिए? बहुत अच्छा सवाल है और इसको यह सवाल जेन्युइन है। इसको एड्रेस करने की भी जरूरत है। अगर इस सवाल को एड्रेस नहीं किया तो फिर अदरवाइज ये हिपोक्रेसी को रिवील करता है। ऐसा नहीं है कि जो थियोक्रेसीज है ईरान में है दूसरी जगहों पे है। ये यूनिवर्सली एक्सेप्टेड है विद इन मुस्लिम्स। तो राइट विंग जब ये सवाल करता है यह सवाल ही बिल्कुल गलत है मुस्लिम्स से के तो वहां पर क्यों सही है उसके लिए ऑब्जेक्शंस विद इन मुस्लिम्स अच्छा शियाओं में आपने ईरान की मिसाल दी शायद ऐसा लगता हो के विलायत फकी का जो तसवुर इंप्लीमेंट किया गया ईरान में वो शिया थियोलॉजी ने यूनिवर्सली वो एक्सेप्ट किया होगा या उसमें बिलीव रखते होंगे और वो शिया थियोलॉजी का कलेक्टिव कंक्लूजन जने नहीं शिया थियोलॉजी में अक्सर लोगों ने उस उसप पे क्रिटिक भी किया है। उस पे डिस्कशन डिबेट भी किया और बहुत सारे जरिस्ट जो है स्कॉलर्स जो है उसके हक में नहीं है। तो इन सब थ्योरीज के बारे में हक में भी है और उसी तरह से खिलाफ भी है। जिन सोसाइटीज में ये थ्योरीज इंप्लीमेंट की गई विद इन दोज़ सोसाइटीज जो है उसके खिलाफ क्रिटिसिज्म भी हुआ है, डिबेट भी हुआ है, बात भी हुई है। सो मुसलमानों से ये कहना कि आप वो वहां पे क्यों पसंद करते हैं? यहां पे क्यों नहीं पसंद करते हैं? सवाल ही पहले ही गलत है। क्योंकि मुसलमान यूनिवर्सली वो प्रिंसिपल हर जगह पे लागू नहीं करते। विद इन मुस्लिम वर्ल्ड दैट इज़ डिबेटेबल। अब उसके मेरिट्स और डिसमैरिट्स पर बात करना चाहूंगा। मैं शायद यह वक्त नहीं हो। मैं एक जनरल सा जवाब दूं। आई बिलोंग टू इंडियन सोसाइटी। मैं यहां पर रहता हूं। मैं चाहता हूं यहां पे रहने वाले लोग जो है वो कलेक्टिवली एक डिसीजन ले। और जो यह कलेक्टिवली एक डिसीजन ले जिसको हम कॉन्ट्रैक्ट कहते हैं एक नतीजे पर पहुंचते हैं ऑन द बेसिस ऑफ जस्टिस वो ऑर्डर जो है एस्टैब्लिश बाय द विल ऑफ द पीपल इसी तरह से ईरान में वहां के लोग इफ बाय देयर विल एंड विश कलेक्टिवली कोई ऑर्डर एस्टैब्लिश होता है। दैट इज देयर ओन विल एंड विश। मैं कितना भी उसके खिलाफ क्यों ना हो मैं उस सोसाइटी का हिस्सा नहीं हूं। एस आई सेड मैं उस नेशन स्टेट का हिस्सा नहीं हूं। मेरी विल वहां पर काम नहीं करती है। उनकी विल यहां पे काम नहीं करती। ईरान में शायद यह वहां से रिस्पांस हो कि इट वाज़ एस्टैब्लिश्ड बाय द विल एंड विश ऑफ़ द पीपल। हमने इसके लिए वोट लिया। जिस तरह से यहां पे कॉन्स्टिटुएंट असेंबली बनी। कॉन्स्टिटुएंट असेंबली के लिए वोट लिया। क्सिटुएंट असेंबली ने पार्ल कॉन्स्टिट्यूशन बनाया हमने वोट लिया इट केम इनू बीइंग बाय बाय वर्चू ऑफ़ डेमोक्रेसी ईरान शायद अपनी तरफ से ईरान के लोग ये कहे कि हमने ये जो विला फकी का सिस्टम जो है एस्टैब्लिश किया इसके लिए हमने वोट लिया लोगों से जो कि लिया गया था मगर क्या हर कोई इसके हक में है नहीं हर कोई इसके हक में नहीं मेरे पर्सनली उसके भी उसके डिसमैरिट्स उस पे मैंने बहुत बात की है इंडिविजुअली मेरे लिए अगर मैं चाहूं अगर मेरे हाथ में हो और मुझसे कोई पूछे क्या आपकी विश एंड विल के हिसाब से ईरान में क्या होना चाहिए? मैं ये कहूंगा कि इक्वलिटी ऑफ सिटीजनशिप अगर मैं इंडिया में चाहता हूं वही इक्वलिटी ऑफ़ सिटीजनशिप ईरान में भी होनी चाहिए। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] बट क्या मेरी चाहत ईरान में कोई चेंज ला सकती है? एम आई पार्ट ऑफ दैट पॉलिटिक्स? एम आई पार्ट ऑफ दैट सिस्टम? एम आई पार्ट ऑफ दैट नेशन? नहीं मैं चाहता हूं कि सिटीजनशिप क्लासिफाई ना हो। राइट्स जो है लिमिटेड ना हो। एक फेथ के लिए दूसरे फेथ के लिए कम और एक फेथ के लिए ज्यादा। अथॉरिटेरियन सिस्टम ना हो। ये मैं चाहता हूं। ये और मैं ओपनली कहता हूं। ये ये उसके डिसमैरिट्स है। मगर उसके मेरिट्स भी अपनी जगह आते हैं। क्या मेरे चाहने से वो होगा? नहीं होगा। हम हिंदुस्तान की बात कर रहे हैं। हम यहां के रहने वाले हैं। आई एम अ इक्वल सिटीजन ऑफ दिस कंट्री। क्योंकि हमसे मांगा गया ना आप इस मुल्क का हिस्सा बनो। हमसे पूछा गया ना कि हम इस बुनियाद पे आपको इस मुल्क का हिस्सा बनाना चाहते हैं। हम हमें जब ये अपॉर्चुनिटी दी गई हम हमसे कुछ वादे किए गए। उस बुनियाद पे मैं इस मुल्क का हिस्सा हूं। यहां पे हम जो चाहते हैं दैट हैस एन इंप्लिकेशन ऑन हाउ द सोसाइटी फंक्शनंस। तो जस्टिस के बुनियाद पे जो मैं यहां पे चाहता हूं उसको मैं एस्टैब्लिश करने के लिए कोशिश कर सकता हूं और हो सकता है। मगर ईरान में ऐसा नहीं हो सकता है। मेरे चाहने ना चाहने से नहीं होगा। उसके अपने डिसमैरिट्स हैं। वो डिसमेरिट्स मैं यहां पे भी कंटेस्ट करता हूं। वो मैं ईरान पे में भी करता हूं। उसके अपने मेरिट्स हैं। वो मेरिट्स जब जाहिर हुए हमने सब उसको एप्रिशिएट किया। उसके साथ आइडेंटिफाई किया। वो मेरिट्स जब इंडिया में जाहिर होते हैं वी प्राउडली एसोसिएट आवरसे आइडेंटिफाई आवरसे विथ दैट। जिसके लिए हमने खून दिया है। वहां के लिए पैसा ही दिया ना नारे ही लगाए ना या इससे ज्यादा कुछ किया। आपने डोनेशन की बात की। चलिए राइटरिंग हमसे कहेगा कि आपने पैसे दिए वहां वहां के लिए पैसा ही दिया ना। हमने इस मुल्क के लिए दहाइयों से पैसा भी दिया है, खून भी दिया है, सब कुछ दिया है। तो मेरिट्स जब यहां से जाहिर होते हैं, वी एसोसिएट विद मेट्स अपने मुल्क के भी। मेरिट्स अगर मुस्लिम यूनिट के किसी एक सेक्शन से कहीं और पे जाहिर होते हैं। वी एसोसिएट विथ दैट। आई विल कम बैक। ये यूनिवर्सल आइडेंटिटी है ऑन द बेस ऑन कुरान के हिसाब से। कुरान केतनास खतनास। तो वो यूनिवर्सिटी टू सिंप सिंपलीफाई इट एलुमिनाई हर कोई खुद को आइडेंटिफाई करता है ना क्लेम करता है ना मैं फला यूनिवर्सिटी से फला इंस्टिट्यूशन से एलुमिनाई हूं फिर उसको सेलिब्रेट भी किया जाता है वो एलुमिनाई किसी यूनिवर्सिटी का इंडियन भी होता है अमेरिकन भी होता है यूरोपियन भी होता है बांग्लादेश भी होता है द वर्ड इज़ एलुमिनाई जो जहां पे भी है वो एलुमिनाई है उसका मतलब यह नहीं है कि वो इंडियन नहीं है वो अमेरिकन नहीं है वो यूरोपियन नहीं है वो बांग्लादेश नहीं है वो पाकिस्तानी नहीं है। वो एलुमिनाई होने का जो क्लेम करता है देयर इज़ अ एसोसिएशन विथ दैट मेरिट। इसी तरह से जब वो मेरिट कहीं कहीं से जाहिर होता है। ईरान ने जो रिसेंटली इन टर्म्स ऑफ इट्स स्टैंडिंग अगेंस्ट द इंपेरलिस्टिक पावर्स फॉर फॉर द सेक ऑफ़ द पीपल ऑफ़ पैलेस्टाइन एंड फॉर द सेक ऑफ इट्स ओन सोवनिटी इट स्टुड अगेंस्ट द इंपेरलिस्टिक कॉलोनियल पावर्स। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो उस एलुमिनाई इंस्टिटशंस जहां का हम जहां के हम सभी एलुमिनाई है उम्मत है उसके मेरिट्स जाहिर हुए हम उस मेरिट के साथ आइडेंटिफाई करते हैं डिसमैरिट्स हम वहां भी रिजेक्ट करते हैं ना पसंद करते हैं यहां भी आई विल रिपीट डिसमैरिट्स उसमें यही है इक्वलिटी ऑफ़ सिटीजनशिप अगर मैं यहां पे भी चाहता हूं मैं चाहता हूं ईरान में भी हो सऊदी अरेबिया में भी हो हर जगह हो नहीं है वो डिसिरिट्स है डू आई एसोसिएट विथ दैट नो डू आई अपोज दैट यस क्या मैं चाहता हूं कि यहां पे भी हो नहीं इसीलिए क्योंकि मैं चाहता हूं कि यहां पे भी ना हो मैं चाहता हूं वहां पे भी ना हो वहां के कुछ मेरिट्स है यहां के मेरिट्स है क्या इक्वल सिटीजनशिप है आई स्टैंड फॉर दैट यहां पे कॉन्स्टिट्यूशनल इक्वलिटी है आई स्टैंड फॉर दैट हमने जान दी है यहां की फॉरेन पॉलिसी कंप्रोमाइज हुई है क्या इंटरनल मेरिट्स की वजह से मैं एक्सटर्नल डिसमैरिट्स के साथ भी आइडेंटिफाई करूं खुद को उसको भी ऑन करूं अगर इंडिया की फॉरेन पॉलिसी 10-15 साल से कॉम्प्रोमाइज हुई है। इट्स टिल्टेड टुवर्ड्स इंपेरलिज्म। इट्स टिल्टेड टुवर्ड्स ग्लोबल पावर्स। अमेरिकास हैजमनी इजराइल्स अग्रेशन। इंडिया के अपने मेरिट्स से इंटरनल मेरिट्स से कॉन्स्टिट्यूशनल मेरिट्स है। ग्लोरी है। क्या उसकी वजह से मैं अह इन डिसमेरिट्स को भी ओन करूं क्या मैं मजबूर हूं? क्योंकि इंडिया में ये सारी ये सारे मेरिट्स हैं इंटरनली। इस वजह से मुझे एक्सटर्नल जो डिसमेरिट्स है जो हम बुली हो गए हैं या सरेंडर किया है इंपीरियल पावर्स के सामने उसको भी मुझे ओन करना है। एग्जजेक्टली इसी तरीके से ईरान के मेरिट्स मुस्लिम वर्ल्ड के मेरिट्स के साथ खुद को आइडेंटिफाई करने से या ओन करने से इट डजंट ऑटोमेटिकली मीन कि मैं उनके डिसमेरिट्स भी ओन करता हूं। आई हैव इक्वल अप्रहेंशन एंड आई इक्वली कंटेस्ट द डिसिरिट्स ऑफ दोज़ नेशन स्टेट्स एज आई कंटेस्ट डिसमेरिट्स विद इन माय ओन स्टेट आई डिस इट्स ओनली बेस्ड ऑन प्रिंसिपल्स जो प्रिंसिपल वहां यहां पे लागू होता है वही प्रिंसिपल वहां पे लागू होता है अच्छाई कहीं किसी भी नेशन से जाहिर होती है किसी भी यूनिट से जाहिर होती है ओन दैट एलुमिनाइ डू ओन द एक्सीलेंस ऑफ़ देयर फेलो एलुमिनाइज़ थ्रूउ द वर्ल्ड इसी इसी तरह से मुस्लिम्स डू ऑन द एक्सीलेंस ऑफ द मुस्लिम्स जहां पर भी जाहिर होती है थ्रू आउट द वर्ल्ड और इसी तरह से दे डू डिसओन डिसोसिएट वि द डिसिरिट ऑफ द मुस्लिम्स अराउंड द वर्ल्ड जहां पे भी जाहिर होते हैं। वन ऑफ़ द इंटरेस्टिंग थिंग्स जो आप बोल रहे हैं कि जिसका इंप्लसिट आर्गुमेंट ये भी है कि कोई भी जो आइडेंटिटी है वो एक मल्टीप्लसिटी ऑफ इंगेजमेंट से बन रही है। तो उसमें एक टेरिटोरियल इंगेजमेंट है। एक इंगेजमेंट सोसाइटी के लेवल पर है। एक एंगेजमेंट मशत के लेवल पर, एक इंटरनेशनल ऑर्डर के लेवल पर है। अगर हम यह बोले कि दुनिया में 200 इंडिविजुअल्स हैं। मतलब 200 मुल्क हैं। तो ईरान चाइना का दोस्त है। चाइना उसको पीछे से मदद कर रहा है। लेकिन परसों यूएस के जो ट्रंप साहब हैं जो चाइना को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझ रहे हैं। वो अपने सारे मेजर सीईओस को लेके वो उसी सिस्टम के साथ नेगोशिएट करने जा रहे हैं। तो अगर एक तरीके से देखा जाए तो एक यूएस की फॉरेन पॉलिसी है और एक यूएस की इकोनॉमिक पॉलिसी है और जो एक उसकी टेरिटोरियल पॉलिसी है। अगर उसी को इंडिविजुअल के लेवल पर लाया जाए कि एक मेरी टेरिटोरियल पॉलिसी है जिससे मेरी सिटीजनरी डिफाइन हो रही है। वो कब एक्टिवेट होती है? एक मेरी इकोनॉमिक अब फॉर एग्जांपल इंडिया ही है। अडानी है फॉर एग्जांपल अडानी को इस वक्त हिंदुस्तान के सबसे बड़े इंपॉर्टेंट सिटीजंस की तरह देखा जाता है अंबानी को। तो उनका इन्वेस्टमेंट दूसरे मुल्कों में क्यों है? अगर देखा जाए तो वो आपका मनी जो है वो आउटसाइड फ्लो हो रहा है। लेकिन वो एक डिफरेंट कमिटमेंट के तौर पर सोचा जा रहा है। कैसे वो मनी बैक भी फ्लो करेगा या ग्रो भी करेगा। तो जो आपकी सिटीजनशिप की टेरिटोरियल आइडेंटिटी है उसको शायद ये जो टोटिटेरियन प्रोजेक्ट्स हैं नेशन स्टेट्स के वो उसको कंप्लीटली एक वजूद में कोलैप्स करने की कोशिश करती है। हालांकि जो एक इंडिविजुअल होता है खुद नेशन होता है वो नेगोशिएट करना जानता है। बिल्कुल। और इस्लाम में एक्चुअली जो आपने बताया कि यह बहुत फर्स्ट डे से यह कॉम्प्लेक्स जो रियलिटी है वो उसके जरिस प्रोडेंशियल लॉजिक में इंटरइंड है क्योंकि प्रॉफिट अपनी जगह भी थे। फिर उन्होंने हिजरत भी की वो दूसरे लैंड में गए। उस लैंड में भी उन्होंने गवर्नेंस किया और अपने पुराने लैंड से भी उन्होंने लड़ाई भी करी और उससे इंगेजमेंट भी रखा। फिर वो दूसरे तो वो जो लोकलिटी, लोकल रेजिस्टेंस, जिओपॉलिटिक्स वो एक्सपीरियंस ऑफ दी ट्रेडिशन में एंबेडेड है। तो दूसरा जो एक सवाल यह भी आता है कि इंटरेस्टिंगली विदित इन मुस्लिम कम्युनिटी क्योंकि एक तरफ हम हिंदुत्व और बाकी सारी चीजों को अगर साइड भी रख दें तो शी और सुन्नी जो डिफरेंसेस हैं जो बहुत होस्टाइल हो चुके थे या कभी क्लोज कभी हॉस्टेलिटी जिस तरह और आइडेंटिटीज में डिफरेंसेस और वो होते हैं खासा देखा गया गजा की वॉर के बाद और ईरान पे जो अब यह पूरा इंपीरियलिस्ट अटैक हुआ कि वो आइडेंटिटीज जिनके दो बिल्कुल मुख्तलिफ कमिटमेंट्स हैं बहुत सारी चीजों में वहां पे भी एक मैक्सिमलिस्ट ओवरलैप देखा गया। हम मतलब मैं इसको कंपेयर करने की कोशिश कर रहा हूं कि अब यह भी सुन्नी भी अपने आप को फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ़ पॉलिटिकल थ्यरी एक डिफरेंट कमिटमेंट समझता है कि उसका जो कांसेप्ट ऑफ टेरिटोरियलिटी स्टेट वो डिफरेंट है। वो वहां पे इमामत से आ रहा है। शियाओं में यहां पे खिलाफत से आ रहा है। इन दोनों के बीच है। खैर लेकिन उसके बावजूद आप जब इंपीरियल फोर्सेस के खिलाफ जो आप की टेरिटरी को कब्जे में कर रहे हैं तो यहां के भी जो नॉन मुस्लिम्स हैं वो भी बहुत सेलिब्रेट करते हुए दिखे और वो वहां गए भी अभी रिसेंटली ये बहुत सारे तो ये काफी इंटरेस्टिंग चीजें हैं जो ये सिर्फ हम नहीं मतलब ये बाकी लोग भी एक्सपीरियंस करते हैं। जैसा आप साहब ने बोला बांग्लादेश के हवाले से जो यहां का हिंदू है आपको क्या हक है उस हिंदू के लिए एड के लिए पैसा देना एक एक और आयत आपकी इजाजत से कोट करता हूं अल्लाह ताला कुरान में फरमाता है फितरत्ती फनासहा इंसान की जो फितरत है ना ये ये यूनिवर्सल है ये कॉमन है और ये खुदा की फितरत है खुदा फरमा अल्लाह ताला फरमाते है कि अल्लाह ताला ने अपनी फितरत पे लोगों को खलब किया चाहे मुस्लिम हो गैर मुस्लिम हो जो भी हमारी डेमोग्राफीस है इनकी ह्यूमन अर्ज जो है सेंस ऑफ ह्यूमैनिटी जो है वो यूनिवर्सल है तो ये जो अंदर की फितरत है ना जो यूनिवर्सल है चाहे हिंदू हो मुस्लिम हो सिख हो ईसाई हो इंडियन हो पाकिस्तानी हो बांग्लादेशी हो जिसमें वो फितरत एसेंस अभी भी जिंदा हो इंसानियत अभी भी जिंदा हो और ये ये मैं कोई मेटोफोरिक नहीं कह रहा हूं। ये कुरान के लिटरल ये वर्ड्स है। ये सब ये सबके अंदर वो खूबसूरती है। ये एसेंस है। अल्लाह ताला ने अपने एसेंस पे सबको बनाया है। तो जहां पे भी ह्यूमैनिटी क्वेश्चन में आ जाती है ना सारे ये ये डिफरेंसेस ये लाइंस ये फेड हो जाती है। ह्यूमन वैल्यूस के बुनियाद पे इंसान एक हो जाता है। अल्टीमेटली एंड इट कंक्लूड्स जो मेरा आर्गुमेंट था तब से। ह्यूमन वैल्यूस पे इंसान खुद ब खुद एक हो जाता है। बांग्लादेश में अगर किसी हिंदू को जलाया जाए सही एसेंस जिसकी अंदर अभी जिंदा है वो मुसलमान हिंदुस्तान में भी उसका दिल जलता है उसके लिए खड़ा हो जाता है हिंदू भी पैलेस्टाइन में जैसे कि आपने मिसाल दी जो कुछ हुआ और ईरान के कॉन्टेक्स्ट में आप बात कर रहे थे ईरान में जो हुआ इसने ये फेड कर दी ये लाइंस शिया सुन्नी वाली ये खत्म हो गई इवन इवन दूसरे दूसरे हिंदूज भी नॉन नॉन मुस्लिम सब कुछ खड़े हो गए हो कम्युनिस्ट हो लिबरल हो जो दुनिया भर के लोगों ने व्हाट वास द रीज़न? अगर आप इन सब से पूछे कोई यह नहीं कहेगा कि मैं मुसलमान हो गया, मैं शिया हो गया। इसी रातोंरात में मैं शिया हो गया। इसीलिए मैं ईरान के लिए आयतुल्लाह खामने के लिए दूसरे दिन से मेरा दिल धड़कने लगा। कुछ ह्यूमन वैल्यू सामने आए। कुछ कोई ह्यूमैनिटी सामने आई। उस ह्यूमैनिटी के साथ ज्यादती सामने आई। उस ह्यूमैनिटी में ब्रेवरी दिखी। जवाब में कैरेक्टर दिखा। ह्यूमन कैरेक्टर देख दिखा। उस ह्यूमन कैरेक्टर के अराउंड सब वो एसेंस जिनके अंदर वो जिंदा है फितरत्ती फस जिनके अंदर वो फितरत अभी भी एसेंस वो जिंदा है चाहे जो भी है वो उसके अराउंड खुद ब खुद जमा हो गए दिस इज व्हाट इस्लाम इनवाइट्स यू टू कुरान कुरान कॉल्स यू टू इसीलिए ये आईडिया ऑफ जस्टिस एस्टैब्लिशमेंट ऑफ ह्यूमैनिटी अगर जब तक आप इस्लाम को इस जाविय से ना देखें तब तक आप चाहे मुसलमान ही क्यों ना हो और गैर मुसलमान क्यों ना हो। आप खुद भी कंफ्यूज रहेंगे और लोग भी आपसे कंफ्यूज रहेंगे। इसीलिए इंटरनली खुद से अप्रोच करने की जरूरत है। नेशन स्टेट के की रियलिटीज में, अलग-अलग सोसाइटीज की रियलिटीज में, मॉडर्न कैपिटलिस्ट वर्ल्ड की रियलिटीज में, चेंजिंग ग्लोबल ऑर्डर के रियलिटीज में। व्हाट इज इस्लाम? ये है क्या? इसकी व्हाट डस इट्स प्रेजेंस मीन? मुसलमान क्या है? इसकी प्रेजेंस क्या है? जब तक आप इसको उस जाविव से ना देखें। यूनिवर्सल ह्यूमन मेरिट ह्यूमन कैरेक्टर आप खुद भी कंफ्यूज रहेंगे बाकी भी आपसे कंफ्यूज रहेंगे। इस ये जो बीच-बीच में ये खूबसूरती है इसका एसेंस जाहिर होता है कहीं पे और उसके इर्द-गिर्द सब जमा हो जाते हैं। और ये खूबसूरती कहीं पे भी जाहिर हो। ये सिर्फ ईरान की बात नहीं है। गजा में जो हो रहा है। क्या गजा के इर्द-गिर्द बाकी के सब के जमा नहीं होते? यूरोप में इंडिया से ज्यादा प्रोटेस्ट हुए। यूरोप में पाकिस्तान से ज्यादा प्रोटेस्ट हुए। सऊदी अरेबिया में प्रोटेस्ट बैन हुए गजा के हक में। मगर यूरोप में प्रोटेस्ट हुए। और यूएई में हां बैन हुए। यूरोप में प्रोटेस्ट हुए गजा के हक में। वो कौन से रातों रात मुसलमान बने या सुन्नी बने या गजा के रहने वाले बने। ह्यूमन एसेंस जहां पे भी जाहिर हो जाती है, ह्यूमैनिटी जहां पे भी जाहिर हो जाती है, कैरेक्टर जहां पे भी जाहिर हो जाता है, दुनिया भर के लोग दे रिवॉल्व अराउंड इट, दे आइडेंटिफाई विद इट। सो इसीलिए कुतनास वो खैर वाला इंसान इस्लाम लनास बेहतरी वाला इस्लाम लिनास जब तक कि आप खुद को उम्मत का कांसेप्ट एज एलुमिनाई ना समझे कि हम यूनिवर्सिटी ऑफ़ खैर से है बेनिफिशरीज बेनिफेक्टर्स कंट्रीब्यूटर्स फॉर द ह्यूमन वर्ल्ड हम उसके एलुमिनाइज है तब तक आप खुद भी कंफ्यूज हो जाएंगे और जब हम खुद को वो एलुमिनाई समझे और वो एस्टैब्लिशमेंट इस्लाम की यूनिवर्सली एस्टैब्लिश करें ह्यूमन वेल बेहतरीन ह्यूमैनिटी के लिए खैर ह्यूमैनिटी के लिए जिस दिन हमने वो किया जैसे ईरान के लिए लोग खुद ब खुद रिवॉल्व हो जाते हैं। रैली हो जाते हैं। गजा के लिए रैली हो जाते हैं। बांग्लादेश के हिंदू के लिए रैली हो जाते हैं। कहीं पे भी जाती उसी तरह से आपके अराउंड भी रैली हो जाएंगे। इस कांसेप्ट के इस इस्लाम के अराउंड भी खुद ब खुद रैली हो जाएंगे। जब तक ये वो जो चैलेंजेस जो हमारी अपनी जहालत की वजह से हमने खुद क्रिएट किए और जिस जाविय से राइट विंग की तरफ से देखा जाता है इस्लाम कन्फ्यूजन का शिकार रहेगा। इस्लाम मजलूम रहेगा। हमारे हाथों से भी और गैर मसलूम के हाथों से भी। एक जो एसोसिएटेड वी विल एंड द जियोपॉलिटिकल आर्क फ्रॉम दिस क्वेश्चन कि एक तरफ तो हमने ये बयान कर दिया कि एक फितरत है जो फितरा वो है जो अच्छाई की तरफ है उसी तरफ फितरत ना वर्ड भी अगर उसका इस्तेमाल किया जाए और ये कि भाई जो एक नेगेटिव टिलिटेरियन विल है इनसाइड द ह्यूमन क्योंकि हमारे लिटरेचर में तसव्वूफ में हैवानियत और एंजेलिक जो दोनों एसेंसेस हमारे वजूद में शामिल है। तो दूसरी तरफ जो वो वाला एलिमेंट है जो कंट्रोल चाहता है टिलिटेरियन वो चाहता है। अच्छा अगर इंजेलिक पार्ट भी वो जरूर चाहेगा कि भ जो अच्छे प्रिंसिपल्स हो लोग उसको माने। लेकिन वो किस तरह मानेंगे कि भ आप उनको कन्विंस करेंगे। आप उनके सामने बेहतर रखेंगे। आप उनके सामने ऑप्शंस रखेंगे। उनको दिखाएंगे। अल्लाह के रसूल ससल्लम की पूरी जिंदगी में सुलह हुदैबिया इंक्लूडेड वो जिस तरह से इस्लाम को हां अगर उनकी अग्रेशन भी हुई जंगों में तो वो अग्रेशन एक एक जिसे कहते हैं रिस्पांस है डिफेंस डिफेंस है और अगर कहीं पे ये भी लग रहा है कि अग्रेशन है तो वो हक है जिसमें तो उस कॉन्टेक्स्ट में जो टोटिटेरियन अगर कोई प्रोजेक्ट है और जो अपनी इस तरह की नेगेटिव फितरत को जब जाहिर करता है और उसकी भी एक जियोपॉलिटिक्स मैनिफेस्ट होती है कि एक तरफ अगर जो हम थोड़ी देर पहले बात कर रहे थे कि इन हिंदुस्तान में टू दो 200 मिलियन मुस्लिम से ज्यादा है 20 करोड़ कुछ लोग 25 कहेंगे डिपेंडेंट ऑन व्हाटएवर स्टैटिस्टिक्स दैट वी यूज़ हिंदुस्तान एज अ नेशन स्टेट में 15% से ज्यादा मुसलमान वो मुसलमान जिसकी लार्जर कनेक्शंस मुस्लिम वर्ल्ड से अब हिंदुस्तान के एक्सपर्ट फैट्स की जब बात हो रही तो 30% ऑफ द पीपल वर्किंग इन यूएई आर इंडियन मुस्लिम्स। सिर्फ यूएई और बाकी गर्ल्स को मिला के जो बैलेंस ऑफ ट्रेड है उसमें जो वो इंडिया और उसके उसमें 150 बिलियन डॉलर और इजराइल से तीन चार बिलियन डॉलर सो ऑलमोस्ट 40 टाइम्स मुस्लिम वर्ल्ड से ऑफ कोर्स मुस्लिम वर्ल्ड की अपनी नंसेस और ईरान से चाहबार और ईरान पर्शनेट जो पूरा लेगसी है 1000 साल की जो इंटरेक्शन है सिविलाइजेशनल कल्चरल उस सबके बावजूद जो बीजेपी और हिंदुत्व के अंडर जो कैरेक्टर एज अ फॉरेन पॉलिसी या एज अ जिओपॉलिटिक्स वो जो ये गवर्नमेंट ले रही है वो किसी भी नेचुरल रैशनलाइजिंग प्रिंसिपल से आपको मुख्तलिफ लगेगा। हैना इसमें बोलती है कि जो सिविलाइजेशनल स्टेट्स होते हैं वो ये नहीं देखते कि उनका मटेरियल बेनिफिट्स फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ़ ओवरऑल सिटीजनशिप क्या हो रहा है। उनका एक बिल्कुल मकसूस पर्पस है और उस बेसिस पे वो अपने आइडियोलॉजिकल अलायंसेस बनाते हैं। व्हाट डस यू नो दी करंट फॉरेन पॉलिसी इन टर्म्स ऑफ़ इजराइल, गज़ा यू नो ईरान ये जाहिर करता है हिंदुत्व के ग्रैंड जिओपॉलिटिकल प्रोजेक्ट। ये जो करंट फॉरेन पॉलिसी है फ्लॉड भी है, काउंटर प्रोडक्टिव भी है एंड इन द लॉन्ग रन इट्स डैमेजिंग फॉर इंडिया। मुसलमान आबा आबादी को आप दो मिनट बाहर निकाल दीजिए इस इक्वेशन से। उसके बावजूद यह फ्लॉड है, डैमेजिंग है, काउंटर प्रोडक्टिव है। इंडिया की ग्लोबल स्टैंडिंग के खिलाफ है। क्लेम टू लीडरशिप जो है, ग्लोबल क्लेम टू लीडरशिप जो है इंडिया की ये उन प्रिंसिपल्स के खिलाफ है। जिन प्रिंसिपल्स ने और जिस प्रैक्टिस ने ग्लोबल लीडरशिप के मुकाम तक इंडिया को पहुंचाया था। अब वी आर नॉट एनी मोर देयर। पहुंचाया था। यह उन एफर्ट्स और प्रिंसिपल्स के खिलाफ है। कोई माने या ना माने। अब क्योंकि यह मजाक बन चुका है आज के हिंदुस्तान में। मगर हकीकत 2014 तक के हिंदुस्तान की यही थी और इसके प्रोग्रेस की का ड्राइविंग फैक्टर यही था ग्लोबली कि इट टूक मोरल स्टैंडिंग ग्लोबली। इट गव मोरल लीडरशिप। मिलिट्री पावर इंडिया के पास नहीं था। आज भी हम कोई ग्लोबल मिलिट्री पावर नहीं है। हम कोई इतनी बड़ी इकोनमिक पावर है नहीं। यह कहा जाता है कि हम चौथी बड़ी इकॉनमी है। बट चौथी बड़ी इकॉनमी हम सिर्फ जीडी जीडीपी के लिहाज से हैं। पर कैपिटा जीडीपी के लिहाज से हम आज भी बहुत ज्यादा पीछे है। गरीब मुल्कों में आज भी शुमार है। तो हमारी इकॉनमी इतनी कोई बड़ी नहीं है कि हम इकॉनमी के बुनियाद पे ग्लोबल लीडरशिप की पोजीशन जो है क्लेम करें। ना मिलिट्री क्लेम है हमारी। ना इकोनमिक क्लेम है हमारी। 70 साल के दौरान हमारी क्लेम टू लीडरशिप क्या थी और फैक्टर क्या था जिसे हमने ग्लोबल लीडरशिप का मुकाम दिलाया था वी वर ऑल ऑलमोस्ट देयर वो वी टूक मोरल स्टैंड वी गव मोरल डायरेक्शन टू द रीजनल पॉलिटिक्स एंड ग्लोबल पॉलिटिक्स एज वेल इससे उस वजह से हमें इज्जत की मुकाम निगाह से देखा जाता था और इज्जत का मुकाम दिया जाता था और लीडरशिप रोल हमें मिला था इससे वह सारा कंप्रोमाइज हुआ यह जो यूएस की हेजमेनी के सामने हमने सरेंडर किया है। ये जो इजराइल की अग्रेशन और उनके जाइनिज्म के के साथ हमने खुद को रिलेट भी किया है। सरेंडर भी किया है। एंड वी हैव स्टार्टेड टू बिकम पार्ट ऑफ़ दैट। मॉडल हमारी पोजीशन मोरल स्टैंडिंग हमारी पहले ही खत्म हो गई है। कंप्रोमाइज हो गई है। इंडिपेंडेंस हमारी रही नहीं। ना रीजनल इंडिपेंडेंस रही ना ग्लोबल इंडिपेंडेंस रही। वो आपने रिसेंटली देखा जब ईरान पे स्ट्र्राइक्स हुए उसके बाद किस तरह से इंडिया ने बिहेव किया उसमें सीधे नजर आता है कि हमारी इंडिपेंडेंस अब है ही नहीं। रीजनल इंडिपेंडेंस नहीं है। ग्लोबल इंडिपेंडेंस नहीं है। ट्रेड डील के हवाले से दैट्स अनदर एग्जांपल। हमारी इंडिपेंडेंस नहीं है। ट्रेड डील अभी तक भी फाइनललाइज नहीं हुई है। हालांकि कितना भी उसको राइट विंग मीडिया ने और गोदी मीडिया ने कितना भी बढ़ा चढ़ा के पेश किया हो। टेरिफ्स हम पे लगे और वो टेरिफ्स अभी भी घटाए नहीं गए। डील नहीं हुई। हम पर कंडीशंस लगी कि कब रशिया से तेल खरीदना है, कब नहीं खरीदना है। यूएस के कहने पर हमने तेल खरीदा और तेल खरीदना छोड़ दिया। ईरान के साथ जो अग्रेशन हुआ उस उसके बारे में हमने ना कंडेमिनेशन किया, ना हमने कंडोलेंस किया, ना कोई स्टैंड लिया। इनफैक्ट वी वेंट टू इजराइल बिफोर टू डेज बिफोर दिस स्ट्राइक। तो हम हमारी ना अब ग्लोबल लीडरशिप अह की पोज़शन बची है, ना हमारी ग्लोबल इंडिपेंडेंस ना रीजनल इंडिपेंडेंस बची है। एक ये मुस्लिम्स को आप निकाल दीजिए। मैंने मुस्लिम फैक्टर को अभी तक टच ही नहीं किया। दूसरा इमीडिएट इकॉनमी की हमारी डोमेस्टिक इकॉनमी की आप रिक्वायरमेंट्स देख लीजिए। उस हवाले से भी इफ यू वांट टू बी प्रगमेटिक अदरवाइज जो मैं अभी तक बात कर रहा था वो ख्याल ही नहीं था। वो भी प्रगमेटिक ही है। प्रगमेटिकली टॉक अबाउट इकॉनमी। आपके आपकी एनर्जी जो आती है वह सारा पोर्शन गल्फ से होते हुए आता है। आपकी एनर्जी डिपेंडेंसी सारी की सारी उसी पोर्शन पोर्शन गल्फ पे डिपेंडेंट है। आपके इंपोर्ट्स जो है एनर्जी इंपोर्ट्स वो इन्हीं मामालिक से आते हैं। फर्टिलाइज़र्स हो, गैस हो, पेट्रोलियम हो, पेट्रोल, डीजल वगैरह जितना भी है जो आपके इंजन को इंडस्ट्रियल इंजन को जो चलाते हैं, एग्रीकल्चर इंजन को जो चलाते हैं वो यहां से ही आता है। एक्सपर्ट्स और वर्कर्स जो हमारे हैं वो बिलियंस ऑफ डॉल जो हमारा ट्रांजैक्शन है उनकी वजह से गल्फ की कंट्रीज के साथ। इसके मुकाबले में एस यू सेड हमारा ट्रेड जो है वो इजराइल के साथ नॉमिनल है और उसमें शायद इंपोर्ट ही हम ज्यादा करते हैं एक्सपोर्ट नहीं करते। इन सब चीजों को इकॉनमी को रीजनल सिक्योरिटी को एनर्जी सिक्योरिटी को अगर आप मदेजर रखें एनर्जी सिक्योरिटी रीजनल सिक्योरिटी इकोनमिक सिक्योरिटी के हवाले से दिस रीजन जो इनकी नजर में मुस्लिम रीजन है जो है भी ईरान से ले जीसीसी कंट्रीज तक दिस इज फॉर मोरेंट टू अस देन इजराइल इजराइल इट डजंट मेक एनी सेंस अगर मैं इस नेशन को चला रहा हूं मैं इस नेशन का हिस्सा हूं मैं एनर्जी सिक्योरिटी को कैसे कंप्रोमाइज करूं? मैं कॉमर्स को कैसे कंप्रोमाइज करूं? मैं रीजनल सिक्योरिटी को कैसे कंप्रोमाइज करूं? उसके बदले में मिल क्या रहा है मुझे इसराइल से? कुछ ऐसा नजर नहीं आ रहा है। इट मेक्स नो सेंस। ज्यादा से ज्यादा वही है कि वो आइडियोलॉजिकल अलाइनमेंट है जाइनस रिजीम के साथ और कुछ नहीं है। यह कहा जाता है कि डिफेंस इंपोर्ट है वहां से। डिफेंस इंपोर्ट के बुनियाद पे आप एनर्जी इंपोर्ट को स्टेक पे नहीं लगा सकते। डिफेंस इंपोर्ट तो 90ज में भी था। 90 में भी था और रशिया के साथ और हमारा डिफेंस इंपोर्ट डवोर्स होना चाहिए। ये इजराइल पे डिपेंडेंट कब से हुआ? इतना डिपेंडेंट क्यों? ऐसी वल्लरेबल स्टेट्स है जो कल को अब अगर देखा जाए कि वहां की जो जियोपॉलिटिक्स है उस हिसाब से कल को वो स्टेट को अगर चैलेंजेस फेस हुआ तो आपकी तो डिफेंस की पूरी पॉलिसी खत्म हो जाएगी। खत्म हो जाएगी। और उसकी वजह से आप एनर्जी इंपोर्ट जो है उसको स्टे पे लगा रहे हो। डजंट मेक एनी सेंस। एक ही चीज सेंस बनाती है और जो कि विज़िबल भी है जो हकीकत भी है और जिसको प्राइम मिनिस्टर ने वहां पे जाके एक्सेप्ट भी किया कि मोदी का हिंदुस्तान मोदी की गवर्नमेंट आरएसएस का हिंदुस्तान किसी भी सूरत में जाइनेस इजराइल के पीछे खड़ा रहेगा। सबोर्डिनेट बनके। बिकॉज़ उनका प्रोजेक्ट और इनका प्रोजेक्ट एक ही है। वो भी उनका प्रोजेक्ट भी एंटी मुस्लिम है। इनका प्रोजेक्ट भी एंटी मुस्लिम है। उनका प्रोजेक्ट भी सुपीरियर रेस की सुपीरियरिटी के बुनियाद पे है। इनका प्रोजेक्ट भी एक रेस की सुपीरियरिटी के बुनियाद पे है। अथॉरिटेरियन निज्म के बुनियाद पे सुपीरियरिटी के बुनियाद पे अथॉरिटेरियन आईडियोलॉजी उनकी भी है। इनकी भी है। तो पॉलिटिकल अलाइनमेंट है। पॉलिटिकली आईडियोलॉजिकली वो आइडेंटिकल है इन देयर कलेक्टिव हेयर टुवर्ड्स मुस्लिम। अब वापस आते हैं हम लोग के हमने हिंदुस्तान में मुसलमानों की जो आइडेंटिटी क्या है? उसकी आपके पर्सपेक्टिव से वो एज एन इंडिविजुअल क्या है? ऑफ कोर्स स्टेट के रिलेशन में उसकी दूसरी ग्रुप आइडेंटिटीज के क्या रिलेशन है? उसकी नेशनल आइडेंटिटी के साथ क्या रिलेशन उसकी जिओपॉलिटिकल आइडेंटिटी के भी स्टैंड्स को हमने इंगेज किया। अब हम वापस जब इंडिया की तरफ आते हैं और ये देखते हैं कि इस सब फिलॉसफी और पॉलिटिकल फिलॉसफी के कॉन्टेक्स्ट में जो हिंदुत्व का लॉजिक है जो हम अभी सिविलाइजेशनल स्टेट के पर्सपेक्टिव से बात कर रहे हैं उसकी बुनियाद में उन्होंने एंटी इस्लाम एंटी मुस्लिम फ्रेमवर्क को ही अपने वजूद का हिस्सा रखा और उसमें वो जो पूरी जो आपकी राइट्स की डिस्कोर्स हैं जो आपको कॉन्स्टिट्यूशन ने आपकी रिलीजियस इंस्टीटशंस आपके पर्सनल लॉज़ आपके औकाफ आपकी जितनी भी सिविल लिबर्टीज और पर्सनल लिबर्टीज आपको और दूसरी माइनॉरिटीज को अब तो वो हमसे शुरू कर रहे हैं तो वो दूसरों पे भी जाएंगे क्योंकि उनके लिए वो सारे चैलेंजेस हैं और टेरिटोरियलिटी के पर्सेक्टिव से भी कि भाई कहां से रीजनल चीजों को वो करना है और इस पे एक अलग पडकास्ट आपसे कभी इंशाल्लाह होगा और हो सकता है। लेकिन मैं अस्यूम कर रहा हूं इन रियलिटीज को। ये कैसे बनी, कैसे बनती हैं, कैसे बड़ा ये हम लोग कभी और इसको ले सकते हैं। अब ये रियलिटी है आपके सामने और आप एक कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी में आप एक पॉलिटिशियन हैं जो लॉज़ को बनाने में कंट्रीब्यूट करना, उनको चैलेंज करना, उनके सामने खड़े होना। एट द एंड ऑफ द डे एक कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी में आपकी जो थ्यरी ऑफ चेंज है एक तो सोशल थ्यरी ऑफ़ चेंज है लेकिन वो सोशल थ्यरी ऑफ़ चेंज भी आरएसएस को भी बीजेपी के थ्रू पॉलिटिक्स में इंस्टीट्यूशनलाइज करना पड़ेगा जभी वो इदारों में आपके स्टेट के इदारों में वो रिफ्लेक्ट करेगा। हम तो वो जो थ्यरी ऑफ चेंज फ्रॉम द पॉलिटिकल पर्सेक्टिव है आपको क्या मैसेज है कि हाउ शुड इंडियन मुस्लिम्स एंगेज विद पॉलिटी वीजा वी इट्स ओन आइडेंटिटी एज अ रीजनल प्लेयर एज अ नेशनल प्लेयर एज अ प्लेयर इन एंगेजमेंट विद सेकुलर पॉलिटिक्स एंड एज अ प्लेयर इन रेजिस्टेंस टू द टोटिटेरियन प्रोजेक्ट ऑफ द हिंदुत्व रिजीम कंक्लूड मैं इसी बात पे करूंगा जो मैं बात कर रहा था तसलसुल से और जो जनायात के की मदद से मैंने एक चीज को एस्टैब्लिश करने की कोशिश की कि मुस्लिम इन इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ इंडियन मुस्लिम इस सोसाइटी में इसके लिए क्या क्या रोल है इस्लाम की नजर से तो वो एज अ सिटीजन दो हमारी दो क्वेश्चंस हैं जिनको एड्रेस करना चाहिए वो मैं कंक्लूड करूंगा ज्यादा लंबा नहीं दो क्वेश्चन एक मेरी कलेक्टिव आइडेंटिटी मेरा कलेक्टिव रोल और मेरा इंडिविजुअल रोल एंड मेरी इंडिविजुअल आइडेंटिटी मुस्लिम इंडिविजुअली इन टर्म्स ऑफ़ फेथ क्या है? और मुस्लिम इन टर्म्स ऑफ़ सिटीजनशिप सिटीजनरी जो भी आप कहे वो क्या है? उसका रोल क्या है? उसकी रिस्पांसिबिलिटी क्या है? एज अ सिटीजन एस एन इंडियन सिटीजन जो मैं अभी तक बात कर रहा था यह तसुल जो बात कर रहा था यह रोल है इंडियन सिटीजन का मुस्लिम का जो कुरान उससे एक्सपेक्ट करता है या डायरेक्शन देता है मेरा इंडिविजुअल मेरी इंडिविजुअल आइडेंटिटी क्या है फेथ उसके हवाले से क्या यहां पे हिंदू धर्म भी है सनातन धर्म भी है मुस्लिम धर्म भी है तो कुछ ऐसी ऐसे क्लशेस है जिनके बारे में कुरान में जिक्र भी है। तो उन क्लशेस को ले मैं क्या करूं? मैं इसी सोसाइटी में रहता हूं। तो कलेक्टिव हमारा वही है। एज अ सिटीजन हमारी रिस्पांसिबिलिटीज वही है। एज एन इंडिविजुअल हमें किसी के मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। आप कोई भी कैटेगरी कर दीजिए दे दीजिए इनके। उसके लिए भी कुरान का गाइडिंग प्रिंसिपल है लकुम दीनक व दीन आपके लिए आपका दीन मेरे लिए मेरा दीन लेट मी प्रैक्टिस माय रिलजन लेट यू प्रैक्टिस योर रिलजन और मैं आपके लिए थ्रेट नहीं हूं आप मेरे लिए थ्रेट नहीं है दिस इज अ यूनिवर्सल ऑर्डर ऑफ कलेक्टिव एकिस्टेंस तो आपको अपना अपनी फेथ भी कंप्रोमाइज नहीं करनी है। सरेंडर नहीं करना है। यू एज अ मुस्लिम इन टर्म्स ऑफ़ फेथ रिलीजियस प्रैक्टिससेस यू हैव टू अबाइड बाय दैट। आपको वो करना है, चलना है, यू हैव टू कीप यू हैव टू प्रोटेक्ट दैट। और उसी तरह से दूसरे भी है जो शायद आपके प्रैक्टिससेस के कॉन्टरी है। तो ये कैसे कोए एक्सिस्ट कर सकता है? कुरान उसके लिए भी यही गाइडिंग प्रिंसिपल दे देता है। दीनकुम व्दी दीन आपके प्रैक्टिस आपकी आपकी बिलीफ आपका फेथ आपके लिए मेरे लिए मेरा फेथ। उसके बाद इससे मस्जिद से निकल बाहर निकल के मंदिर से बाहर निकल के हमारी कलेक्टिव रिससिबिलिटी कलेक्टिव आइडेंटिटी है। वी लिव टुगेदर उसके बारे में कुरान क्या कहता है? मुस्लिम को क्या करना चाहिए? मैंने इस पडकास्ट के जरिए दौरान आपके सवालों को जवाब दिया कि रिससिबिलिटी ऐसी है। एक और आयत मैं शायद ज़हन में आ रही है। तो शायद पूरा मत याद नहीं आ रहा हो। अल्लाह ताला ने यह फरमाया कि अल्लाह ताला ने अलग-अलग रास्ते बनाए हैं अल्लाह ताला तक पहुंचने के लिए अलग-अलग रास्ते बनाए और आखिर में यही कहते हैं फस तकुल खैरात बेहतरी में एक दूसरे के साथ मुकाबला करो टू कंट्रीब्यूट कमट इन कंट्रीब्यूशन मंदिर से आप निकले मैं मस्जिद से निकला आप कौन सी इबादत करके आए मैं कौन सी इबादत करके आया जब हम एक साथ बाहर आए वी आर इंडियंस आप हिंदू है वो अपनी जगह मैं मुसलमान हूं अपनी जगह कुरान मुझसे क्या कहता है जब आप कलेक्टिवली बाहर जमा होगे आपकी रिसोंसिबिलिटी नेशन कॉन्स्टिट्यूशन स्टेट जो भी है दफ्तर में है बिनेस में है सोसाइटी में है फकुल खैरात फस सबकुल खैरात आप बेहतरीन में एक दूसरे के साथ कमपीट करो जो ज्यादा बेहतर लाएगा टू द ह्यूमैनिटी जो ज्यादा कंट्रीब्यूट करेगा टू द ह्यूमैनिटी वो बेहतर है आप में से दीज़ आर गाइडिंग प्रिंसिपल्स ऑफ़ कुरान। ये हम एब्स्ट्रैक्ट में डाल के इनको नजरअंदाज करके मिस डायरेक्शन में नहीं जा सकते। मुसलमान होने का क्लेम नहीं कर सकते। जब तक यूनिवर्सल स्यूशन ना हो इस्लाम के पास इट कैन नॉट क्लेम टू बी यूनिवर्सल। तो अगर यूनिवर्सल सशंस हम डिराइव नहीं कर पाते हैं हमारे बिहेवियर की वजह से अह मुसलमानों को देख के यह डिराइव नहीं कर पाता है कि इस्लाम यूनिवर्सल स्यूशन है। वह हमारे कंडक्ट और अंडरस्टैंडिंग में प्रॉब्लम है। तो इंटरनल रिफॉर्म की बहुत ज्यादा जरूरत है। बिफोर दिस कि वी एंगेज विद राइट विंग बिफोर दिस वी अप्रोच टू द सेुलर पॉलिटिक्स ऑफ इंडिया। हमें इंटरनल रिफॉर्म की जरूरत है। मुस्लिम्स को रीइमेजिनेशन रिकंस्ट्रक्शन की जरूरत है। रीइमेजिनेशन ऑफ द वर्ल्ड एंड वर्ल्ड रियलिटीज इसकी जरूरत है। रिकंस्ट्रक्शन ऑफ पॉलिटिकल फिलॉसफी ऑफ द मुस्लिम सोसाइटीज इसकी जरूरत है। कुरान कैसे इंगेज करता है? क्या ये क्लैश करता है? और इट कंट्रीब्यूट्स इट कॉम्प्लीमेंट्स। इस सबको रिक रिकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है। मेरी नजरों में जो आयात मैंने आपके सामने पेश की अगर इन चीजों को मद्दे नजर रखा जाए। गाइडिंग प्रिंसिपल्स ये है यू आर अ कंट्रीब्यूटर। कमट इन एक्सीलेंस कंट्रीब्यूशन में कमट करो। अल्लाह ताला वही चाहते हैं। तो ये कुछ आइडेंटिटीज इसके लिए कुरान ने डिस्कशन को छोड़ा नहीं है। हर किसी आइडेंटिटी को एकनॉलेज किया है कुरान ने क्योंकि खुद बनाया है ना कुरान ने। अच्छा एक और आयत ज़हन में आई इन शबा इनका ये सारी आइडेंटिटीज एकनॉलेज की है कुरान ने और उनकी वजह भी बताई है ये जो ये कास वगैरह है ये तुम्हारी आइडेंटिटी ये सिर्फ एड्रेस के लिए एड्रेस के लिए ताकि पता चले सिंपलीफाई हो जाए एड्रेस कोई किसी पे सुपीरियर नहीं है सुपीरियर कौन है जो अल्लाह ताला अल्लाह ताला के लिए काम करे और अल्लाह ताला क्या काम चाहता है आपसे याना किस इट ऑल एंड्स एट द सिंपल वर्ड बेहतर आप में से कोई भी नहीं किसी कास्ट रेस की बुनियाद लैंग्वेज की बुनियाद पे रीजन पे की बुनियाद पे कोई नहीं ये कुरान है बेहतरीन वही है जो अल्लाह ताला के लिए काम करे जो अल्लाह ताला के लिए उठे अल्लाह ताला क्या काम चाहते है कुरान ही कहता है जस्टिस एस्टैब्लिश करो जस्टिस के लिए क्या करना में कंट्रीब्यूट करने में एक दूसरे के साथ कमपीट करो। सुपीरियरिटी में एक दूसरे के साथ कमपीट करो। ये कहीं पे भी कुरान में नहीं मिलेगा। टोटल टोटिटेरियन में या टोटिटेरियनशिप में एक दूसरे के साथ कमट करो। ये कहीं पे भी नहीं मिलेगा कुरान में। सो दीज़ मैसेजेस जब आप इनकी तरफ पलट के आए दीज़ आर यूनिवर्सल। कुरान इज़ कॉम्प्लीमेंट्री टू द ह्यूमैनिटी। ये ह्यूमैनिटी की ग्रोथ को प्रोग्रेस को कॉम्प्लीमेंट करता है। ड्राइव करता है बहुत ज्यादा। इट इट डज़ नॉट क्लैश विद इट। और अगर क्लैश करता तो इसकी क्लेम सही नहीं होती कि ये यूनिवर्सल है। एंड इट विल एक्सिस्ट टू द लास्ट डे ऑफ द वर्ल्ड। बट व्हेन यू गो टू द एसेंस ऑफ़ कुरान इट ट्रूली इज़। बट हमें खुद समझने की जरूरत है। इंटरनल रिफॉर्म करने की जरूरत है। रिकंस्ट्रक्ट करने की जरूरत है। रीइमेजिन करने की जरूरत है। पिटिकल फिलॉसफी पिटिकल जरिस प्रूडेंस बनाने की जरूरत है। और मैं इस बात पे कंक्लूड करूं जो बात रह गई थी। नॉट ओनली इंडिया ग्लोबली हैड एन अपोरर्चुनिटी एंड हैड द कंडीशंस टू शो टू द वर्ल्ड कि डवर्सिटीज कैसे रह सकती है? सेकुलरिज्म के असली मायने क्या है? कंप्रोमाइज के बजाय कॉम्प्लीमेंट कैसे कर सकते हैं रिलीज एक एक दूसरे को और इंडिया ने वो बहुत हद तक किया इसीलिए वो जगह मिली थी वेस्ट के सेकुलरिज्म से इंडिया का सेकुलरिज्म कितना ज्यादा इंक्लूसिव है अच्छा है प्रैक्टिकल है इट मेक्स सेंस वेस्ट का सेकुलरिज्म रिलजन के रोल को कम से कम से कम करता आया है इंडिया के आईडिया ऑफ़ सेकुलरिज्म में रिलीजंस एक दूसरे को कॉम्प्लीमेंट करते हैं और ज्यादा से ज्यादा होते आया है। इसी तरह से इंडियन मुस्लिम यह वो एलुमिनाई हो सकता है अगर वो उम्मत का कांसेप्ट जो मैं एलुमिनाई की हैसियत से समझाने की कोशिश कर रहा था और मैं मेटाफोरिकली वो यूज़ कर रहा हूं ब्रॉडर सेंस में उस यूनिवर्सिटी का ये वाला एलुमिनाई कुड सेट एन एग्जांपल टू द अदर एलुमिनाई थ्रू आउट द वर्ल्ड कि मुस्लिम एलुमिनाई एक सोसाइटी में कॉम्प्लीमेंट्री फोर्स कैसे हो सकता है वैल्यू एडिशन कैसे हो सकता है क्योंकि हमारे चैलेंजेस आर टोटली डिफरेंट टू देयर चैलेंजेस। मुस्लिम वर्ल्ड में आप जाइए इन 50 कंट्रीज में माइनॉरिटीज बहुत कम मिलेगी आपको। डायवर्सिटी आपको बहुत कम मिलेगी। लिंग्विस्टिक, एथिकल, कल्चरल, डायवर्सिटी, रिलीजियस डायवर्सिटी बहुत कम मिलेगी आपको। और उसी से उनका जरिस प्रिडेंस है क्योंकि वो एब्सोलुटली क्योंकि वो उन कंडीशंस में उन रियलिटीज के साथ इंटरेक्ट करते हैं। और जरिस प्रूडें भी उसी तरह से डेवलप होता है। हमारे कंडीशंस दे आर डवर्स। हमारी कंडीशंस ही कुछ और है। दे आर ब्यूटीफुल। हमारी इंटरेक्शन इट्स विद मल्टीपल फेथ्स, मल्टीपल कल्चरर्स, मल्टीपल एथनिस्टीज, मल्टीपल रीजनल अंडरस्टैंडिंग्स, मल्टीपल एकेडमिक अंडरस्टैंडिंग्स, फिलॉसफीज़ इतनी बरकत आपको सोसाइटी में कहीं और नहीं मिलेगी। इस सबके बीच में हाउ हाउ डस इस्लाम प्ले अ रोल और इस्लाम का जुरिस प्रूडेंस इस सबके बीच में कैसे इवॉल्व हो सकता है? व्हिच कॉम्प्लीमेंट्स एंड अकोमोडेट्स एवरीथिंग एल्स। ये सिर्फ एक इंडियन मुस्लिम दिखा सकता है दूसरे एलुमिनाई को दूसरी यूनिट्स ऑफ़ मत को। जो जुरिस प्रूडेंस जो पिटिकल फिलॉसफी सोशल फिलॉसफी इंडियन मुस्लिम दे सकता है वो शायद ही कोई और दे सकता है। बट वी हैव टू फॉल बैक टू टू द बेसिक्स। और बाहर के बजाय हमें खुद से इस्लाम को समझने की जरूरत है। वो एकेडमी यार। सो अगेन फाइनल रिमार्क्स वो एग्जैक्टली वही बात है। मैं अभी बहुत जगहों पे कहता हूं कि जो इंडियन मुस्लिम की कंडीशनलिटी हैज़ अ्रेस्ड माइनॉरिटी वो उस टाइम की है मक्कन पीरियड की जहां पे फाउंडेशंस ऑफ इस्लाम को वजूद में लाया गया। वो इंटेलेक्चुअल डिबेट है। वो मदीने की डिबेट नहीं है। जो इंस्टीट्यूशनल डिबेट है। तो जो यहां से इस्लाम की रिकवरी होगी। वो पूरी दुनिया के लिए मिसाल होगी। क्योंकि यहां पे इंटलेक्चुअल फाउंडेशंस ऑफ यूनिवर्सल मोरल्स यहीं से दिए जा सकते हैं और कहीं से नहीं दिए जा सकते। इंक्लूडिंग गज़ा भी फ्रॉम दैट पर्सेक्टिव नहीं ले सकता क्योंकि वो स्टिल मेजोरिटेरियन मुस्लिम फॉर ग्राउंडिंग के विद इन एक ऑप्रेस्ड रियलिटी है। लेकिन इंडियन मुस्लिम्स जो रिप्रेजेंट कर रहे हैं वो एक डिफरेंट काइंड ऑफ पोजीशन वो हबशा के एबिससीनियंस की भी नहीं है कि जहां पे प्रोटेक्टेड माइनॉरिटी हो। है ना आप मदीना के मुसलमान हो जो आप पार्ट ऑफ दी रिजीम है स्टेट है आपका आपका स्टेट है आप वो मिडिल में है जहां पे आपको रियली पिटिकल और फिलोसोफिकल और इंटेलेक्चुअल थिंकिंग प्रोड्यूस करनी है यूनिवर्सल्स को प्रोड्यूस करने के लिए तो बहुत इंटरेस्टिंग आपके साथ एज यूजुअल कन्वर्सेशन रहा बहुत ओवरलैपिंग जिसे कहते हैं इंटरेस्टिंग आइडियाज भी हैं और मैं सबको कहना चाहूंगा कि नाउस का हमेशा जो एक मकसद रहता है वो वो ये नहीं है कि अली जावेद क्या सोचता है या दूसरे लोग क्या करते हैं वो दूसरों पे मुसल्लत किया जाए। हम इस वक्त डिस्कर्सिव जिसे कहते हैं ट्रांजिशन में है कि एज अ कम्युनिटी एज अ सिस्टम हम लोग मुख्तलिफ जो चीजें सोच रहे हैं वो खैर की हैं। वो इंटरेक्शंस बहुत जरूरी हैं। वो कन्वर्सेशंस बहुत जरूरी हैं और वो कन्वर्सेशंस आम होना जरूरी है। अनफॉर्चूनेटली अभी हम ये कन्वर्सेशन सिर्फ आपस में कर पा रहे हैं। और ये शुरुआत भी है। हमें ये कन्वर्सेशंस सबके साथ करनी है। हमें ये सेकुलर लिबरल्स के साथ करनी है। हमें कम्युनिस्ट के साथ करनी है। हमें आरएसएस के साथ भी करनी है कि हम एज ए उम्मत एज ए कम्युनिटी एज इंडियन मुस्लिम्स हम क्या चाहते हैं क्यों चाहते हैं उससे अदल यहां नहीं सब जगह कैसे वो हो सकता है और उन बेसिस पे कॉन्ट्रैक्ट्स नेगोशिएशंस और लिव्ड रियलिटीज कैसे प्रोड्यूस हो सकती हैं तो आप लोग बने रहिए इसी तरह आगा साहब से ये दूसरा एपिसोड है तीसरा ऑलरेडी मटेरियल यहां पे अवेलेबल था हो नहीं पाया इंशाल्लाह अगली बार बहुत शुक्रिया बहुत-ब शुक्रिया अली भाई आपके साथ हाथ होके फिर से एक बार अच्छा लगा मजा आया और यही जो आपने बात कही वह मैं भी दोहराना चाहूंगा। दीज़ आर जस्ट आइडियाज़ वी आर ओपन फॉर करेक्शन। हम मैंने कहीं पे क्लेम नहीं किया कि मेरी ही बात हरफ आखिर है। परफेक्ट है। मुझे लगता है आपका भी वैसा ही क्लेम है कि आपकी भी बात कोई हरफ आखिर नहीं है। दीज़ काइंड ऑफ़ डिस्कशंस आर नीड ऑफ़ द आर। डिबेट डिस्कशन करने की जरूरत है। बात करने से ही बात खुल सकती है और कंस्ट्रक्ट हो सकती है। बहुत-ब शुक्रिया।
Companion article
Aga Syed Ruhullah Mehdi came to national politics from Kashmir about a year and a half ago, and in his second conversation with the Nous Podcast he tells host Ali Javed something that might seem counterintuitive. Looking back on that time in Parliament, Mehdi said he could not have picked a better moment to arrive, because the crisis facing Indian society is large enough to force basic questions. What are Indians politically, ethnically, culturally and religiously? What was the seventy-year journey of the republic built on: a real settlement, or an illusion? And where do Indian Muslims stand in it?
Javed pushes back throughout, at one point playing devil's advocate for Hindutva. The episode, which runs a little over two and a half hours, is best read as an extended attempt to answer those questions from inside an Islamic vocabulary without giving up the constitutional one. Mehdi says openly that some of what he offers may be wrong.
Mehdi's diagnosis of Muslim politics is blunt. What he has seen since entering Parliament, he says, is a series of responses to events: a lynching, a remark by a right-wing politician, the Waqf Amendment Bill, a controversy over food, dress or the loudspeaker. Each produces statements and protests. None, in his view, adds up to a comprehensive political philosophy that Muslims can stand on when the RSS and the BJP tell them they are not compatible with Indian society, or with any society they live in. He says he has not seen anyone answer that charge with clarity, and that the debate stays stuck at the level of meat, clothing and prayer in the street.
He extends the criticism backwards. Muslims in India, he argues, have not built a political ethic of their own. They have not adopted the values of the left or of liberal movements, and they instinctively side with right-wing politics when it speaks in the name of their religion while objecting to it when it does not. He asks when Indian Muslims last tried to turn the universal principles of the Quran into a political discourse, and suggests that after Maulana Azad it has hardly been attempted, and that Azad did not go as far as the task requires. He uses the loose term fiqh-e-siyasat for the body of political jurisprudence he thinks is missing: guiding principles and objectives (maqasid) for people living as a minority.
Two ideas would have to go for such a philosophy to exist, he says. One is that Islam demands authoritarianism. The other is that Islamic law must be implemented literally, everywhere, as it was in Medina. What the Quran and the Prophet's life offer, he argues, are principles, and it is the principles that should be carried forward.
Mehdi is careful about how this should be framed. "I don't believe in identity politics," he says, and he does not see himself as speaking only for Kashmiri Muslims, or even only for Muslims. He speaks of Muslims because, in his account, they are the primary target of state aggression at the moment, and he says he wants to reimagine India as its founders imagined it.
A large part of the conversation concerns the parties Muslims are told to rely on. Javed raises a familiar pattern: after electoral losses, as in Bengal or Bihar, Muslim voters are blamed, though they were already voting for the secular side while those parties failed to win over Hindu voters. He asks Mehdi where secular politics is failing.
Mehdi's answer is that these parties are themselves in an identity crisis. Sometimes they think they should go far for Muslim rights, then fear drifting from the majority. His message to them is deliberately unusual. He does not ask them to stand up for Muslims or to invest in secularism as a favour to Muslims. He asks them to fall back on the spirit of the Constitution, which he calls the contract between all Indians, and to be as honest to it as they demand Muslims be. They should not do politics for Muslim identity or for Hindu identity, he says; they should do it for the contract.
His account of how the vacuum arose is a critique of Congress in particular. Principle-based politics, he argues, was diluted after 1947 in every camp, with electoral calculation taking over. He gives two examples: a ruling on divorce after which the locks of a mosque were opened to placate another community, and the use of governors and presidential orders to override states when a regional party seemed to challenge the centre. India was federal in spirit if not in letter, and parties tampered with that spirit to stay in power. The right wing grew in the vacuum this left. He names the Congress, the Samajwadi Party, the DMK and the TMC as parties that could still change course.
His prescription is a politics of federalism, institutions and functional democracy. If secular parties defended the protections of states and their cultural identities, whether Kashmiri, Bengali, southern or Awadhi, and stood against the centre's overreach, he says, Muslim and Hindu identity alike would be protected without either being named.
Having asked secular politics to return to the contract, Mehdi turns to what Muslims bring to it, and here he is most explicit about sources. He builds what he calls a political jurisprudence from three ideas in the Quran, citing verses from memory and paraphrasing them.
The first is peace. If others initiate peace, he says, the Quran tells believers to establish it, and it attaches no condition that the other party be Muslim, follow the sharia, give up beef or recite the creed. The second is fidelity to agreements: promises made must be honoured, and a citizen who has entered the constitutional compact is bound by it, answerable in a court of law and, he adds, in the hereafter. The third is justice. He points to the Quranic word qist and argues that it rules out second-class citizenship, since justice rests on equality.
From this he draws the point that gives the discussion its edge. In Islam, he says, the label does not matter; the fruit does. A system with an Islamic name that tramples justice is less pleasing to God than one without the name that establishes it. He cites a saying he attributes to Imam Ali that justice is the foundation of a state. On this reading, Indian Muslims are obliged, not merely permitted, to take part in a constitutional order that promises equal citizenship, to abide by its terms and to help it deliver justice. He sums up the resulting role in a phrase: Muslims have a contributory role, not "a clashing role."
Javed asks the question the conversation has been heading towards: how does Mehdi read Hindutva within contract theory? Mehdi separates the Hindutva of the RSS and BJP, of Golwalkar and Savarkar, from Hinduism and from Sanatan dharma, with which he says he has no quarrel. His charge is that this project is breaking a contract made with every Indian community. Seventy years ago, he says, nobody was told the country would be run on a particular right-wing ideology, a theocracy or a supremacist idea. Had they been, many people, Muslims and Hindus and whole regions, might have chosen differently.
Javed, voicing the argument Hindutva's advocates make, says the contract was imposed on a majority and that a nation's character can change through amendment and the people's will. Mehdi replies that the claim of imposition fails on the facts. The Constituent Assembly included the Hindu Mahasabha and figures from across the ideological spectrum, and by religion nobody but Hindus was in a position to impose anything. Founding a country on religion was an available choice, as Pakistan showed, and the founders chose otherwise. He then asks what the founders' outreach to princely states and regions such as Kashmir actually offered, and argues that it rested on plurality, diversity and the protection of identities. Neither Kashmiris nor the Dravidian south, he says, would have joined a project defined by RSS Hindutva, and even Sardar Patel, whom the right claims, cannot be shown to have offered that.
Javed observes that the same logic covers Dalits, Sikhs, OBCs, Jains and linguistic communities. Mehdi goes further, in the passage that is most clearly his own argument. If the outreach was made on the strength of the Constitution and is now being undone once territory is consolidated and the state has an army, police and institutions, he asks, was it a way of claiming land under cover of diversity? He does not conclude that it was. He says the character of India is what was offered then, and that it is the current project, not Muslims, that is on trial.
His conclusion is that anyone who wants a Hindu state should turn the clock back, put the reality before every community and let each choose again. That, he says, is impossible, because everyone has given blood for the republic as it exists.
The second half turns to a tension Javed says is rarely faced head on. If Indian Muslims are citizens of a nation-state, how do they relate to Muslims elsewhere, and to Gaza and Iran, where recent events have shaken the world?
Mehdi begins with identity. Nobody answers the question of who they are by naming the whole, he says. Asked by a European, an Indian says he is from India; asked by another Indian, he says Delhi or Uttar Pradesh; asked in Kashmir, he says Budgam rather than Kashmir. Identity is layered and subjective, and everyone defines himself partly by whom he is not. An Indian Muslim carries linguistic, regional, national and religious identities at once, and none has to cancel another.
The Quran, he argues, never addresses a nation-state. It addresses an ummah, a community of belief in a shared moral and ethical code, and calls it the best community raised up for humanity. His metaphor is a university and its alumni. Islam is the discipline and curriculum; its graduates go into every sector and country, and the question is whether they contribute to the institutions they enter or undermine them. "The best citizen of your country" is what such a graduate should be. Ummah, in this sense, is a matter of merit and conduct rather than birth, and those who violate the code, such as ISIS, are outside it. Millions of Indian Muslims, he notes, did not identify with them.
He offers a hard-edged illustration of why the nation-state cannot be wished away. Indians who work in the Gulf, Muslim or not, help build those societies, yet would not be given citizenship or equal rights and would not be regarded as Arabs. The identities of nation-states are established, he says, and it would be hypocrisy to pretend otherwise. He says Muslims speak up for Palestinians because they are oppressed for what they are, and equally when Hindus are attacked in Bangladesh, violence he calls equivalent to terrorism.
Javed puts the sharpest form of the challenge on the table, one he expects from the right: why demand democracy and equal citizenship in India yet celebrate or defend theocratic states elsewhere, whether Iran, Saudi Arabia or Turkey? Mehdi calls it a genuine question that must be answered or it exposes hypocrisy, but says it is wrongly framed, because Muslims do not universally endorse those systems. The Iranian doctrine of guardianship of the jurist, he notes, has been criticised by scholars inside Shia thought itself.
His own answer rests on will. An order that people establish collectively, as India's Constituent Assembly did, belongs to them. He does not belong to Iranian society and his will does not act there. Asked what he would want if it did, he says he would want the equality of citizenship he defends in India: no classification of rights by faith and no authoritarian system. He would contest those demerits in Iran as he does at home while still counting its merits, among them, in his account, its stand against imperial powers for the people of Palestine and for its own sovereignty. Identifying with a merit, he says, does not mean adopting the demerits, just as admiring India's constitutional achievements does not mean endorsing its foreign policy.
On humanity, he cites the Quranic idea of fitrah, an innate human nature, to explain why people who share no faith rally together when moral character shows itself. Nobody became a Muslim or a Shia overnight, he says; they responded to visible courage and to injustice.
The conversation then turns to the present government's foreign policy. Javed sets the context: India's closeness to Israel while Gaza and Iran are under attack.
Mehdi argues that the policy is flawed, counterproductive and damaging to India in the long run even if the Muslim population is left out of the equation. His reasoning is material. India's energy, including the fertiliser, gas and petroleum that drive its industry and agriculture, comes largely through the Gulf region; its workers and remittances are there; trade with Israel is nominal by comparison. Defence imports, he says, do not justify staking energy security on Israel, and India bought defence equipment elsewhere in the 1990s. What remains, he argues, is ideological alignment with a government whose own project is built on racial superiority and authoritarianism.
He ties this to a loss of India's moral standing. India, he says, was never a military or economic superpower, and its claim to global leadership rested on taking moral positions. He argues that has been surrendered, pointing to India's response to strikes on Iran, which he says involved neither condemnation nor condolence, and to a US trade deal he says is still unfinalised while tariffs remain. These are Mehdi's assessments, offered as opinion.
Asked for a theory of change, since a constitutional democracy requires ideas to be carried through politics, Mehdi returns to the two roles he has been developing. As a citizen, the Indian Muslim is bound by the contract and by the duty to contribute to justice. As an individual, he keeps his faith without compromise and grants the same to others. For this he cites the Quranic line that each has his own religion, and a verse urging believers to compete with one another in good works. Coming out of mosque and temple alike, he says, people are Indians competing to contribute more to humanity.
He insists that internal reform must come before any engagement with the right wing or with secular politics. If Islam is universal, people should be able to see that from Muslim conduct, and if they cannot, the fault lies in Muslim understanding and behaviour. Muslims, he says, need to reimagine the world, reconstruct their political philosophy and show how the Quran complements humanity rather than clashing with it. India, he adds, had a chance to show the world a secularism in which religions complement one another, unlike the Western model that minimises the role of religion.
He also argues that the conditions of Indian Muslims, living among many faiths, languages and philosophies, could produce a jurisprudence that accommodates everyone, unlike Muslim-majority countries with little diversity. That, he says, is something an Indian Muslim can show the wider community. Javed gives the idea a historical frame, likening the Indian Muslim position to the Meccan period, an intellectual rather than institutional one. He adds that Indian Muslims are neither a protected minority like the refugees in Abyssinia nor part of a ruling order as in Medina, which puts them in a position to produce philosophical thought that speaks to universals, something he says Gaza cannot do while it remains grounded in oppression.
Both men close in the same spirit. Neither claims the last word, and Mehdi says these are ideas he is open to having corrected. Javed says the aim of Nous is not to impose one person's views, and that these discussions for now take place mostly within the community. The point, they suggest, is to begin the argument and then carry it to everyone else.
1:39What should Muslim politics contribute to India’s broader democratic and secular discourse? Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=JA83TwVx1DE&t=3363s
9:03This is an excerpt from a longer conversation.
14:27This is an excerpt from a longer conversation. Watch the full conversation.
9:31Has secular politics in India lost its ideological clarity? Why are Muslims often blamed for opposition defeats, and what does this reveal about the deeper crisis facing secular parties?
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
3:25:59What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
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