Nous Podcast· 11 Jul 2026· 2:10:30

From Anti-Conversion Laws to Dalit Christian Rights: The Reality of Christians in India | John Dayal

In this powerful episode of Nous Podcast, Ali Javed speaks with senior journalist, human rights activist, and Christian community leader John Dayal about the history and contemporary realities of Christians in India. Drawing on more than five decades of reporting and advocacy, Dayal discusses the…

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हालांकि मैं जानता था कि जो मैं लिख रहा हूं जिनके बारे में लिख रहा हूं वो मेरे को नहीं पड़ेंगे। हम मगर जो लिख रहा हूं वो आज नहीं 50 साल बाद भी पढ़ा जाएगा। जो हिस्ट्री ऑफ़ वायलेंस अगेंस्ट क्रिश्चियंस है स्पेसिफिकली उसका नेचर क्या रहा? वो कब हुआ? कहां हुआ? क्यों हुआ? उसके अराउंड [संगीत] डिस्पोर्स क्या था? मुसलमानों के ऊपर जो वायलेंस ईसाइयों के ऊपर कुछ वायलेंस है। मिरर इमेज है। क्यों ना हो हिंदुत्व की ओरिजिनल किताबों में तीन दुश्मनों में से दो दुश्मन यही है। जो पर्टिकुलर कम्युनिटीज हैं और माइनॉरिटीज हैं उनके जो मोड्स ऑफ एकिस्टेंस है उनको कंप्लीटली बाउंड किया जा रहा है। तो इसमें पर्टिकुलरली एंटी कन्वर्शन लॉस को आप किस तरह देखते हैं? तकरीबन पहला ही मेजर कॉन्स्टिट्यूशन अमेंडमेंट था प्रेसिडेंशियल ऑर्डर ऑफ 1950 जिसके मातहत दलित प्रिविलेजेस सिर्फ हिंदुओं को [संगीत] दी जाएंगी। इन अनदर वे जिसको मैं कहता हूं इट वास आल्सो द फर्स्ट एंड द लार्जेस्ट एंटी कन्वर्शन लॉ क्योंकि विदिन जो आपकी स्ट्रक्चर है हरार्की जिससे आपने 1000 साल 2000 साल कैपिटल को एक्सट्रैक्ट [संगीत] किया जैसे कार्ल मार्क्स बोलते हैं रिजर्व आर्मी ऑफ लेबर चाहिए आपको कोई भी एफसीआर का पैसा अगर आता है इंस्टिट्यूशन के लिए तो 99% कॉमन इकॉनमी में चला जाता है और उसके जो इंटरमीडिएट बेनिफिशरीज होते हैं हिंदू होते हैं जो स्टेट स्टेट ने अपने कोजन मैकेनिज्म से जैसे मुसलमानों में बहुत सारे [संगीत] लोगों को चुप कर दिया है। क्या एक्टिविज्म विद इन क्रिश्चियनिटी या [संगीत] क्रिश्चियन कम्युनिटी अपने लो पे हिंदुस्तान में पंचायत हिंदू होगी। थानेदार हिंदू होगा, मुख्यमंत्री हिंदू होगा, प्रधानमंत्री हिंदू होगा, कौन डिफरेंट किसके ऊपर कर सकता है? तो आपको कोई और बहाना ढूंढना पड़ेगा तो लगाने के लिए। देखता हूं मुसलमानों में भी कोई वोकैबलरी नहीं है कि [संगीत] जो यूनिवर्सल वोकैबलरी हो जिसमें आप ह्यूमन राइट्स एंगेजमेंट को कर सकें। द क्रिश्चियन कम्युनिटी इज बरे ऑफ अ जेन्युइन पॉलिटिकल लीडरशिप रियल ऑर्गेनिक लीडरशिप है नहीं। नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया [संगीत] प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस [संगीत] को एंप्लीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउस को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। डॉक्टर दयाल आपका नाउस के पडकास्ट में खैरमकदमम है। आपने खुद जो पढ़ाई की है आपका फिजिक्स का बैकग्राउंड रहा है। उसके बाद उसके बाद आपने सेंट स्टीफंस के बाद आपने जो आपका करियर है वो जर्नलिज्म में रहा। तो एक सवाल तो यूजुअली मेरे ज़हन में ये था कि भस [गला साफ़ करने की आवाज़] एस अ क्रिश्चियन हु हैड स्टडीड इन वन ऑफ द बेस्ट कॉलेजेस इन इंडिया फिजिक्स की टॉप डिग्री है उसके बावजूद आप जर्नलिज्म में क्यों शिफ्ट लेते हैं और उससे जुड़ी हुई जो आपकी जर्नी है कि आपने जो कम्युनिटी को क्योंकि आज 2014 के बाद जिस तरह से देखा जाता है एंटी कम्युनल वायलेंस एंटीनेटरी वायलेंस को 70ज 60 50ज में ये कहीं ना कहीं जो लोग इसके लिए बोल भी रहे थे वो वो एक एक छोटी कम्युनिटी थी। आज की डेट में ये सिविल सोसाइटी रिलेटिवली बड़ी है। व्हाई डिड यू थिंक दैट इट वास नेसेसरी के आप वो शिफ्ट लें। आपने क्या ऑब्जर्व किया जो आज से मेल खाता है? शिफ्ट तो एक्सीडेंटल होते हैं। बहुत सोच समझ के ना फिजिक्स पढ़ी ना कुछ भी शुरू के 15 20 साल में क्या बच्चे के पास समझ मजबूरी होती है। तो वो तो सब एक्सीडेंटल थे। इंसिडेंटल थे। मां-बाप के कहने पे थे। मार्क्स अच्छे आ गए थे तो आगे होने लगा। तो वो तो रहा पढ़ाई का। जब आए ही गए जर्नलिज्म में तो फिर बात अपने हाथ में आ जाती है। किस तरीके का जर्नलिज्म किया जाए? इकोनमिक जर्नलिज्म किया जाए जिसमें कंपनी का उतारचाव देखा जाए। कंपनी क्या कर रही है? चेयरमैन क्या बोल रहा है? पीआर वर्क किस तरीके से? या सिर्फ एडिटोरियल लिखे जाए बैठ के थरेटिकल या फिर रिपोर्टर की तरह ग्रासूट्स में जाया जाए देखा जाए अपनी आंखों से कि क्या हो रहा है उसको किस तरीके से बताया जा सकता है किसकी तरफ से बताया जा सकता है किसके लिए बताया जा सकता है तो कई ब ऐसा भी होता है कि जिन अखबारों में मैं काम कर रहा था कुछ वामपंथी थे कुछ सेंट्रिस्ट थे कोई एक्सट्रीम राइट का था जानबूझ के नहीं था ना तो वो मेरे को रखते और ना मैं उनके साथ काम करना मांगता मगर कई ब ऐसा होता था कि जिन लोगों की बात मैं कर रहा हूं वो शायद मेरी लिखी हुई बात खुद नहीं पढ़ेंगे कोई और पढ़ेगा क्योंकि वो मजबूर हैं मजदूर हैं किसान हैं लेबर है अखबार नहीं पढ़ते [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं और मैं अखबारों में लिखता हूं मगर तब भी जरूरी है कि उनकी बात उन तक पहुंचाई जाए तो शायद उनके हालात में कुछ फर्क कर सके। कुछ इंटरवेंशन कर सके, कुछ पार्लियामेंट में बात कर सके, कुछ किताबें लिख सके, कुछ एकेडमिक डिस्कोर्स पैदा कर सके। तो हालांकि मैं जानता था कि जो मैं लिख रहा हूं जिनके बारे में लिख रहा हूं वो मेरे को नहीं पढ़ेंगे। मगर जो लिख रहा हूं वो आज नहीं 50 साल बाद भी पढ़ा जाएगा। और यह बात टेस्ट ऑफ टाइम मान गए हैं। इमरजेंसी की मेरी किताब 50 साल बाद अभी भी हर साल शायद जब भी इमरजेंसी की एनिवर्सरी आती है आती है। बेघरों के ऊपर जो काम है सिख वायलेंस भोपाल गैस ट्रेजडी बहुत सारे ऐसे और हिंदू मुस्लिम वायलेंस में तो कोई एक्सपर्टीज की जरूरत नहीं थी। मगर मेरे लिए कभी भी रेफर हो जाते हैं कभी-कभी मुरादाबाद के जैसे पुराने लेख क्योंकि उनमें जो सच्चाई थी और जो घायल लोग थे उनकी जो बात थी उसकी जो सच्चाई थी मेरी सच्चाई तो उनहीं की सच्चाई थी वो आज भी एक बैकग्राउंड बनाती है जिसमें आज की बात समझ में आती है 30 साल पहले 40 साल पहले क्या हो रहा था जो हमको शायद याद नहीं है जब तक कि हम इन प्रेस क्लिपिंग्स को दोबारा ना जीवित कर पाए पाए या फिर किसी जिंदा आदमी से ना सुन पाए। तो जिन वजह से मैं जर्नलिस्ट बना और जर्नलिज्म के खास रास्ते पे चलने की कोशिश की टेस्ट ऑफ टाइम ने मेरे को कहा कि आपने ठीक किया। कोई और रास्ता चुनते तो शायद गलत हो जाता। यूजली ऐसा देखा गया है कि जो पब्लिक की मेमोरी होती है वो बहुत ज्यादा लंबी नहीं होती क्योंकि डिस्कोर्स बदलता उठता गिरता रहता है जिसके हाथ में पावर होती है ताकत होती है वो पब्लिक कॉन्शियसनेस को शेप करता है। आज जब हम देख रहे हैं कि पूरी करिकुलम को बदला जा रहा है या जो पब्लिक में नैरेटिव है मेन स्ट्रीम डिस्कोर्स में वो पूरा बदला जा रहा है। तो यह जो आपका एक 50 साल का करियर है अक्सर शुरू में भी मैंने बोला कि 2014 के बाद के जो हिंदुस्तान को हो वो बहुत ज्यादा डिफरेंट देखा जाता है कि एज इफ एवरीथिंग वास राइट बिफोर दैट तो व्हेन इट कम्स टू एंटी माइनॉरिटी वायलेंस या क्रिश्चियंस के खिलाफ, मुसलमानों के खिलाफ सिखा आपने इन सब चीजों में काम किया है। नेचर क्या था इसका? कौन इनवॉल्वड थे? क्या देखा आपने जो अब और पुराने में टाइम में अलग है और क्या चीज ऐसी है जो आपको लगता है कि पैटर्न मेरा तजुर्बा 50 साल का नहीं है 57 साल का है तो काफी तजुर्बा है तजुर्बे का मतलब है काफी मेमोरी है मेरी और मेरे जैसे और लोगों की जो कई मेरे से भी ज्यादा लंबी जर्नलिज्म मैं बता चुकी हूं मेरे एक दोस्त हैं उनका तकरीबन 65 साल का तजुर्बा है इन तजुर्बों में मेमोरी आती है। मेमोरी याद रखती है। चाहे कंप्यूटर की हो या इंसान की हो। मेमोरी इंक्रिमेंटल होती जाती है। इंक्रीमेंटल से पैटर्न्स बनते जाते हैं। बेंचमार्क्स बनते जाते हैं। ये सब बहुत अहम है। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो चाहे कोई भी चीज हो, चाहे सोने का दाम हो, जब मेरी शादी हुई थी, सोने का क्या दाम था? आज क्या दाम है? राजनीति क्या थी? आज की राजनीति क्या है? हिंदू मुसलमान के रिश्ते कैसे थे? ऐसा नहीं था कि वायलेंस नहीं होता था। आज कैसे रिश्ते हैं? जिस दिन मेरी शादी हुई 7 जुलाई पुरानी दिल्ली में हिंदू मुस्लिम झगड़ा हुआ। मगर ढाई दिन में कंट्रोल हो गया। और जो मेन झगड़ा था वो उसी दिन कंट्रोल हो गया। उसी दिन कंट्रोल हो गया। कैसे हो गया? अब हफ्ते चलते रहते हैं। महीनों चलते रहते हैं। उसमें जो कंट्रोल हुआ जो गुनहगार थे वो पकड़े गए। पुलिस तब भी घस लेती थी आज भी घस लेती है। तो घस वाली बात नहीं थी। मगर पुलिस को कुछ डर था के कानून और कल अगर इंक्वायरी हुई तो क्या होगा? उनके ऊपर उनके जो हाकिम थे उनका ऐसा आर्डर नहीं था कि हिंदू पकड़ो या मुसलमान पकड़ो यहां पे गुनहगार बनाओ फला को वहां गुनहगार करो फला को सशन हमको ये दो ये नहीं था ये था कि आप जाइए उनरा रोकिए जिन्होंने कहा है उनको पकड़ के अंदर बाद में देखा जाए वो चीज आज गायब है कम नहीं हुई है गायब है डिटरमिन है सब कुछ आजकल बताया जाता है कि 202 में कि तीन दिन आप हमको दीजिए बाकी जगह ढाई दिन दीजिए एक दिन दीजिए कुछ घंटे दीजिए और उसके बाद फिर पुलिस को ही कहा जाता है कि आप फला को पकड़िए फला को पकड़िए कागज के ऊपर बराबर 200 बताइए मगर असल में आप यही करिए तो कागज पे अगर आप देखेंगे तो बताएंगे कि दोनों दोनों तरफ से पकड़े। मगर जब यह देखेंगे किस तरीके से पकड़े हैं और किस वजह से पकड़े हैं। क्या कसूर लगाए गए हैं तो आपको पता लगेगा कि फला के ऊपर तो खून का जुर्म है। फला के ऊपर चोरी का जुर्म है। लीगल अपेरेटस पूरा इसी में लीगल अपेरेटिस क्वालिटेटिवली वेरीफाई करता है। विक्टिमाइज करता है। हम क्वांटिटेटिवली ऐसा लगता है कि बराबर है। राजा दोनों आंखों से देख रहा है। उससे बड़ा फर्क हो जाता है किस कौम की आंख में भय है। डर है। किस कौम की आंख में भय नहीं है। हम देखते थे चाहे भिवंडी हो या मुरादाबाद हो या दिल्ली हो। फ्लैग मार्च हुआ तो शांति आती थी। आर्मी की वर्दी देखी तो सब बराबर हो जाता था। हम के अब ठीक है कर्फ्यू लगता था तो हिंदू इलाके में भी सुबह दूध मिल जाएगा और मुस्लिम इलाके में भी सुबह बच्चों के लिए दूध मिल जाएगा ऐसा नहीं है कि दूध वाले को जाने से रोका जाएगा आज ऐसा नहीं है। आज अगर कर्फ्यू लगता है तो एक मोहल्ले पे लगता है। एक मोहल्ले की गलियां बंद होती है। दूसरे मोहल्ले की गलियां खुली रहती है। लोग बाहर सड़क पे मोटरसाइकिल चला रहे होते हैं। ले घूम रहे होते हैं, डंडे ले घूम रहे होते हैं, नारे लगा रहे होते हैं। यह विजुअल जो है विजुअल एकदम बदल गया है। इसमें स्टेट का इन्वॉल्वमेंट एकदम टिकट है। और ये सिर्फ हिंदुस्तान की बात नहीं है। इंटरनेशनलली भी आप देख सकते हैं। चाहे गाज़ा हो या ईरान हम इजराइल की लड़ाई हो। एक जगह टोटली बैन है रिपोर्टिंग दूसरी जगह आप जा सकते हैं तो जहां बैन है वहां पे लोग तलवार लेके घूम रहे हैं उनको कोई रिपोर्टिंग करने वाला नहीं मिलेगा आपको हम तो क्या आप दिखाना मांग रहे हैं क्या नहीं दिखाना मांग रहे हैं दोनों फर्क हो जाते हैं और मेरा ख्याल है पिछले 57 साल का मेन फर्क ये हो गया है कि आज स्टेट अपेरेटस एक तरफ से देखता है एक नजर से खुद देखता है दूसरे लोगों को देखने को मजबूर करता है। एक डीटोर क्वेश्चन है। आप कहां से हैं? आपकी जो बचपन है, आपकी जो बैकग्राउंड है, हम दक्षिण भारतीय हैं। हम मेरे पर्सनल बैकग्राउंड में तेलुगु और मलयालम केरला मेरी बीवी भी मलयाली है। तो एक तरीके से हम मेरे बच्चे मलयालम बोलते हैं। तो दक्षिण भारतीय हमको कहिए आप। मगर क्योंकि मेरे पिता एक ऐसी सरकारी नौकरी में थे जिसकी वजह से वो एक्सट्रीम उत्तर में उनकी नौकरियां लगती थी हम कश्मीर में शिमला में डहडून में अंबाला में दिल्ली में तो इन जगह में मेरा बचपन बीता है मैं छ महीने का था जब कश्मीर में गया तीन साल का वहां से निकला तीन साल से सात साल तक शिमला में रहा सात साल से 12 14 साल तक देहरादून में रहा और उसके बाद दिल्ली आया तो एक दक्षिण का हो एक्सट्रीम साउथ का और एक्सट्रीम नॉर्थ में मेरा जीवन गुजरा है केरला में तो क्योंकि ईसाइयों की आबादी ज्यादा है लेकिन क्योंकि आपकी जो जिंदगी है आप बता रहे हैं कि एक तरीके से कांस्टेंट हिजरत मूवमेंट से डिफाइन रही है। तो एज अ माइक्रो माइनॉरिटी क्योंकि मुसलमान फिर भी जगह-जगहों पे एक्सिस्ट करते हैं। पॉकेट्स में हैं। तो क्रिश्चियंस क्या उतना कंसोलिडेटेड नॉर्थ में आपको एक्सपीरियंस मिला। आप किस तरह से अपनी कम्युनिटी से का एक्सपीरियंस आपसे अटैच्ड रहा। कहां पे आपको लगा कि एक डिस्टेंस है साउथ कि मेरी चीजों मेरे जिस्म में कुछ ऐसी चीजें जो मिट नहीं सकती है। मेरा रूप रंग जुबान तो जब मैं नॉर्थ में कई जगह होता था को छोड़ के जो बड़ा शहर था वहां पे हम लोग तकरीबन टोटली अकेले थे। धर्म अकेला शक्ल सूरत अकेली खाना पीना अकेला। तो आप समझ सकते हैं कि हम कितने अकेले जैसे किसी विदेश में हो एक परिवार सिर्फ पूरे मोहल्ले में एक परिवार ईसाइयों का साउथ इंडियन ईसाइयों का हम तो अकेलापन तो होता है मगर वो फर्क हिंदुस्तान था वो नेहरू का हिंदुस्तान था हम पड़ोसियों ने कभी हमको शक की नजर से नहीं देखा हमेशा प्यार की नजर से देखा मेरी मां ने दाल बनानी सिखा सीखी कढ़ी बनानी सीखी हम रोटी बनानी सीखी हम हमारे खाने में तब्दीली आ गई हम क्योंकि पड़ोसियों ने हमको अपना समझा जब तक दिल्ली ना आ गए यहां पर रेफ्यूजीस का शहर था उन दिनों हम हम पाकिस्तान से हिंदू आए थे कड़वाहट थी अभी भी दिल्ली कैसे डिफरेंट था दिल्ली डिफरेंट था मैं क्योंकि आपने कहा था कि मैं इलेट कॉलेज में आऊं तो वहां पे अमीरों के बच्चे आते थे। मगर जहां हम लोग रहते थे एपीडीपी कॉलोनी ईस्ट पाकिस्तान डिस्प्लेस पर्सन पार्क उन में रिपोर्टर बन चुका था इनके बीच में रहता था इनकी कहानियां इनके कड़वाहट इनके एक्सपीरियंस हम जो आप समझ सकते हैं कि पाकिस्तान से आया सब कुछ खो के आया है उसके दिल में मुसलमान वालों के खिलाफ एक किस्म को खौफ होगा ऐसा हम और आप सोचते जो ईस्ट पाकिस्तान से आया है उसके दिल में मगर मैं कहता हूं आज खुलेआम कहता हूं कि उन्होंने शायद सब कुछ खोया और हिंदुस्तान से जो मुसलमान भाग पाकिस्तान पे उन्होंने भी सब कुछ खोया और इसकी भी बात हमको तजुर्बा है क्योंकि मेरा कॉलेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी के थोड़ा पीछे ही चंद्रावल है सब्जी मंडी है वो मुसलमानों की बस्तियां थी गायब हो गई हम कत्लेआम वहां पर हुए देना के तलाव पे कत्लेआम हुए मुसलमानों के कब्रिस्तान पर रेफ्यूजी कॉलेज बनाए गए। कब्रों के पत्थर के ऊपर रेफ्यूजी औरतें सिलबट्टा बना के चटनी पीसती थी। तो था मगर उतनी हेटेड नहीं थी जितनी आज बिना किसी वजह से हेट कैंपेन की वजह से आई है। ये मैं तजुर्ब के साथ एस अ रिपोर्टर और बाशिंदा और इलाकों का कह सकता हूं। और ये मेरे को अभी भी मैं सोचता हूं कभी सोचता हूं किताब लिखी जाए के जिन्होंने एक्चुअली मुक्ता ईस्ट पाकिस्तान में वेस्ट पाकिस्तान में उनके मन में कम मनमुटाव है उन पंजाबियों के उन बंगालियों के मन में कम मनमुटाव है बनिस्बत आज के बच्चों के जो महाराष्ट्रियन है जिन्होंने से सफर भी नहीं किया जिनके मां-बाप ने कभी सफर [गला साफ़ करने की आवाज़] किया। सिर्फ उन्होंने सुना है टीवी पर। इंटरेस्टिंग है। कोई खास वजह जो आपको लगती है? मेरा ख्याल है क्योंकि पार्टीशन के घाव हरे नहीं है। हम भरे भी नहीं है मगर हरे भी नहीं है। हम उनको दोबारा कुरदना आज की राजनीति के लिए मजबूरी बन जाता है। इसी वास्ते फेक मीडिया, गोदी मीडिया रीाइटिंग टेक्स्ट बुक्स सड़क के ऊपर पोस्टर इलेक्शन डिस्कोर्स सब उन गांव को पूरे की कोशिश कर रहा है और उन लोगों में जिनमें 47 के भी वो घाव नहीं थे हम महाराष्ट्र में गुजरात में मध्य प्रदेश में झारखंड में इनमें घाव थे हम उत्तर प्रदेश में आप कह सकते हो उत्तर प्रदेश में घाव की स्थिति थे मुसलमान लोग के थे हिंदुओं पर घाव नहीं थे और यूपी में रेफरी भी नहीं आके ज्यादा फसे मगर वहां पर जिस तरीके की ट्रेड फैलाई जा रही है उसके बारे में सोचने को मजबूर हो जाते हैं। क्या वजह है? क्या वजह है? तो हम पाकिस्तान को जब ट्रॉप बनाते हैं इसका रियलिटी से कोई लेना देना नहीं है। इसका सिर राजनीतिक एक हवा खड़ा करना है तो वोट बैंड बना रहे हैं। 2014 के बाद एक ये तो है कि मुसलमानों के बारे में बहुत बात हो रही है। मुसलमान खुद भी अपने बारे में बहुत बात कर रहा है। लोग भी लेकिन ईसाइयों के बारे में अभी भी बहुत कम मेन स्ट्रीम में जो जिस नैरेटिव की जरूरत है क्योंकि वो भी मुझे ऐसा लगता है जब मैं देख रहा था कि मिरर इमेज है एक तरीके से ज्यादातर जो वायलेंस मुसलमानों के साथ हो रहा है वो ऑलमोस्ट सिमिलर पैटर्न्स आपको ईसाइयों के साथ भी मिलते हैं। तो पहले इसमें आने से के ईसाइयों का ओरिजिन क्या है यहां पे? उससे पहले मैं यह समझना चाहूंगा कि जो यह 1947 के बाद जो हिस्ट्री ऑफ वायलेंस अगेंस्ट क्रिश्चियंस है स्पेसिफिकली नॉट एनी अदर माइनॉरिटी उसका नेचर क्या रहा? वो कब हुआ? कहां हुआ? क्यों हुआ? उसके अराउंड डिस्कोर्स क्या था? एंड हु वर द पीपल हु वर रिसोंसिबल? उसके तीन ओरिजिनल डॉक्यूमेंट में से मैं तीसरा हूं। दो मर गए। दो कौन? फादर जॉन वालाभट्टम जिन्होंने शुरू किया उनका इंतकाल हो गया। डॉक्टरसी का भी इंतकाल हो गया और उन तीन का मैं हूं अभी। मगर जो आपका [गला साफ़ करने की आवाज़] सवाल है के मुसलमानों के ऊपर जो वायलेंस है ईसाइयों के ऊपर कुछ वायलेंस है। मिरर इमेज है। क्यों ना हो? हिंदुत्व की ओरिजिनल किताबों में तीन दुश्मनों में से दो दुश्मन यही है। तीसरा कम्युनिस्ट। तीसरा कम्युनिस्ट है। मगर आपने सवाल पूछा था ईसाइयों का वायलेंस क्यों है? कब है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] और क्या कानून बने उनको इंगित करने के लिए, उनको आइसोलेट करने के लिए, उनको पॉइंट करने के लिए बहुत कम लोग जानते हैं। एकेडमिक डिस्कोर्स भी बहुत कम है इसके ऊपर। पहली बात तो है आज के जमाने में 1857 के बाद गलतफहमी हो गई है लोगों की के ईसाई धर्म अंग्रेज लाए ईसाई धर्म धर्म के नाम से और लोगों के नाम से तकरीबन ईसा मसीह के मरने के चार पांच साल बाद ही शुरू हुआ था स थॉमस आए थे कोई वीजा नहीं लिया था तो डेट एक्सैक्ट क्या पता नहीं मगर जिस तट पर आए थे मलाबार कोस्ट इसका उस इलाके से जहां पे यशु मसीह पैदा हुए थे और एक तरह से आप कह सकते हैं जहां इस्लाम भी पैदा हुआ था वेस्ट एशिया से उससे भी सैकड़ों सदी पहले का ताल्लुकात जहाज आते थे जाते थे जहाज सिर्फ हिंदू देशों के नहीं आते थे चीन के जहाज आते थे रुकते थे और जाते थे हम इनो चाइनीस स्टेट वाया इंडिया होके यमन और बाकी जगह जाती थी। तो कोई शक नहीं है के एक समसी का आदमी कोई अगर आएगा इस तरफ तो केरला के कोस्ट पे आएगा। गुजरात के कोस्ट पे आएगा। यहां पे पहले उनके नाव रुकती थी। या पहले उनके रिश्तेदार थे। पहले उनकी दुकानें थी। पहले उनके कुछ लोग यहूदी लोग थे। हम जो ऑलरेडी सेटल [गला साफ़ करने की आवाज़] थे जो ऑलरेडी सेटल थे। 2000 साल से ज्यादा हो चुकी है। केरला में फैला मगर केरला के बाहर नहीं आया। उसके लिए तकरीबन 1500 साल का इंतजार करना पड़ा जब वास्कोडगामा आया। जो केरला में ईसाई बने थे उनको आप अपर कास्ट कह सकते हो। हम ट्रेडर्स बिग फार्मर्स जो कि अपर कास्ट हिंदुओं से सौदा करते थे। गेहूं बेचते थे। नहीं चावल बेचते थे। हाथी, लकड़ी जो उनकी जरूरत थी उनको बेचते थे। ट्रेडर्स को बेचते थे। मालदार थे। मालदार थे इस वास्ते घर छोड़ के आगे जाना नहीं मांगते थे। हिंदुस्तान में और घूम के तजारत नहीं करना मांगते थे। जब वास्को डगामा आया। उसने दुकानदारों को और बड़े किसानों को छोड़कर नाविक नाव जो चलाते थे जो नाव पर चढ़ के मछली पकड़ते थे मछुआरे जो मछली बेचते थे जो छोटे काश्तकार थे खेती करते थे उनको बनाया और फिर कोस से अंदर आए तो एक क्लास भी हो गया एक तरीके से। दूसरा जो एकिस्टिंग थे उनमें खलबली भी मची कि क्यों नीचे जात के लोगों को मना रहे हैं इंटरनली ये कास्ट अभी भी हमारे कौम को दिक्कत दे रहा है जब से चालू है बड़ा आपस में इनका झगड़ा भी हुआ अच्छा के आप जो ईसाइयत लाए हैं यूरोपियन ईसाइयत उस जमाने की यूरोप आज के नहीं लैटिन में आप कह रहे हो हर कोई बाइबल पढ़ सकता हम हम आप मशीन से छपी हुई बाइबल लाए हो हम सब कोई पढ़ सकता है अपने आप जो एस्टैब्लिश्ड सोशल ऑर्डर है उसको डिस्टर्ब कर रहे हो ऑर्थोडॉक्सी से हटके कोई एक नया सोशल हायरार्की का मैकेनिज्म लेकर आए हैं। मगर उसके आने से एक बात हुई ईसाइयत वेस्टर्न घाट्स और समुद्र के दायरे से फंसी हुई जो थी निकल कर हिंदुस्तान में पूरे में फैल गई क्योंकि इंडिया की जो पोर्चुगी बंगाल आए हम घूम के बंगाल में सेटअप हुआ लोग कम जानते हैं पोर्चुगी डच आए फ्रेंच आए हम फिर इंग्लिश आए इंग्लिश आखिर में आए हम औरत एक तरीके से फैली हम कॉलोनियल रिजीम के साथ कॉलोनियल रेजीम से हटकर कॉलोनियल रेजीम के खिलाफ बताइए तीनों का कॉलोनियल रेजीम के साथ आई बास्केट गांव के साथ आई हम मगर उसको छोड़ के तजारतियों के साथ आई हम उनको छोड़ के पारियों के साथ अंदर आई तीन लेवल पे स्ट्रैटिफाइड मूवमेंट चल वो एक तरीके से आई। इसी तरीके से डच और फ्रेंच भी आए। आपने इस पैसे से मैंने कहा कि खिलाफत में आए। अंग्रेज सोचते हैं अंग्रेज ईसाइयत लाए। हम वो ईसाई उनकी नावों पे उनकी शिप्स पर आए ईसाई पादरी। हम मगर अंग्रेजों ने जो राज किया भारत पर आखिर तक 47 तक यहां के राजा महाराजाओं के साथ मिलके किया। हम सबों ने हिंदुस्तान को दगा दिया अंग्रेज के साथ में चाहे जितने प्रिंसली स्टेट्स हो सबका रोल रहा है चाहे नवाब हो राजा हो महाराजा हो छत्रपति हो अब सब क्लेम करते हैं सारे ब्राह्मण हम सारे कायस्त हम इनके कारिंदे थे हम भारत के उच्च जातियां भारत के रजवाड़े अंग्रेजों के साथ थे हम जब आपके पादरी लोगों को ईसाई बना रहे हैं गरीब को ईसाई बना रहे हैं हम मजदूर को ईसाई बना रहे हैं। उसको कह रहे हैं कि सब भाई बराबर हम दुआ इकट्ठे मांगेंगे हम तो आप फिर दोबारा सोशल ऑर्डर को डिस्टर्ब कर रहे हो। हम तो अंग्रेजों ने विलियम केरी कोलकाता से भगाया और वो डच एरिया में सिंगापुर में जाके उसने अपना प्रेस खोला और आगे अपना काम किया। ऐसा जहां जहां पर रेलवे या फौजिया थी अभी दिल्ली में भी आप देख लीजिए दो किस्म के चर्च मिलेंगे आपको एक मिलेगा जो कंटोनमेंट के अंदर है हम जहां पर अफसर जाया करते थे जहां पर अंग्रेज कलेक्टर वगैरह वगैरह करते थे एक है चर्च बहुत दूर कैथलिक चर्च हम वहां पे दूसरे लोग करते थे दिल्ली में गोलका चर्च है और ये राष्ट्रपति भवन के पड़ोस में प्रोटेस्ट चर्च है जो चर्च ऑफ इंग्लैंड का चर्च था जो राजशाही क्रिश्चियनिटी का एक था और ये एक ओपोनेंट्स थे आपका तो आर्गुमेंट ये है कि जैसे हर कम्युनिटी में इंक्लूडिंग इस्लाम की भी जो हिस्ट्री है जैसे सूफियों को स्ट्रटिफाई करें। फिर ताजिरों को फिर ये जो हुकूमतें आई हैं। उसी तरह जब आप देखें कि चाहे कोई ब्रिटेन से आ रहा हो, कहीं से आ रहा हो, लेकिन वहां के भी जो इंटरनल सोशल मूवमेंट्स हैं जो वहां की हायरार्की को चैलेंज कर रहे हैं तो वो ट्रैवल करके जब आ रहे हैं तो एकिस्टिंग जो ब्रिटिशर्स हैं उन्हीं को चैलेंज फील हो रहा है कि ये क्रिश्चियनिटी के जिस वर्जन को ला रहे हैं वो हमारे लिए चैलेंजिंग है। पिटिकल साइंस का ट्रुथ तो हमेशा रहेगा ना। हम वो तो कोई भी आए। तो एक तरीके से लिबरेशन थियोलॉजी की तरह क्रिश्चियनिटी या लिबरेशन थ्योरी आज का है मगर उसकी झलक हम पास्ट में आपको हर जगह मिलेगी हम जब दलित ईसाई बने उन्होंने अपरकास्ट को चैलेंज किया पोर्चुगीज़ के साथ मिलकर हम वो एक लिमिटिंग फोर्स था। थोड़ा इसको और अनफोल्ड करते हैं के हिंदुस्तान है। हिंदुस्तान में कास्ट हायरार्की है। आपका ये कहना है कि जो ब्रिटिशर्स आए ऑफ कोर्स ये हिस्टोरिकल रिकॉर्ड्स में भी और जो यहां के जो अपर कास्ट रूलिंग क्लास थी वही उनके साथ मिलके उस जो ऑप्रेसिव इकोसिस्टम है उसमें ऑपरेट कर रहे थे। तो व्हाई आर पीपल कन्वर्टिंग सबों को फायदा है। तो एक होती है कि भ व्हाई क्वेश्चन व्हाई आर पीपल कन्वर्टिंग? इसको थोड़ा और अनटेंगल करते हैं। देखिए आज के जमाने में लोग कन्वर्ट हो रहे हैं। मन की शांति, तन की शांति। हम बहुत ऑपरेशन है, भुखमरी है, नौकरियां नहीं है। साइकोलॉजिकल क्राइसिस है। कोई कहता है आपको मन की शांति देते हैं। हम बीमारियां है। हम दवाई बीमारदारी बहुत महंगी है। हम हीलिंग। लोग ऐसा मानते हैं कि ईसा मसीह हील करती है। जिसके पास बीमारी है थक गया है दवाई ईमानदारी से हो नहीं रहा है। उसको कुछ भी सॉलिश मिलेगा वो जाएगा। हम आज की तारीख में 21 सदी में मेन कन्वर्शन का रीज़ है हीलिंग मिनिस्ट्री। नए कन्वर्ट है। दूसरा है लिबरेशन फ्रॉम द करंट बॉन्डेज। हम अगर आप दलित हैं पीएचडी स्कॉलर्स में खुदकशी कर रहे हैं ना हम जवान लड़के लड़कियों का कत्ल हो जा रहा है उन्होंने इंटरकास्ट शादी करने की कोशिश की गई आज की तारीख में कास्ट जितना हाइट बाउंड हिंदुस्तान में है शायद एकलव्य के जमाने में भी उतना ही होगा उससे कम नहीं है ये मैं कहता हूं क्योंकि कास्ट एज अ सोशल टेक्नोलॉजी आज उतना ही जितना 2000 3000 साल पहले था क्योंकि इसके रेपकशंस इसका फिजिकल एविडेंस अपनाइए। सारी चीजें जो बीच में सोशल लिबरेशन के लिए हुई वो सारी आपका कहना है अनडू हो गई है। क्योंकि मैं थोड़ा विज्ञान पढ़ा था। आज का एविडेंस क्या कह रहा है? [गला साफ़ करने की आवाज़] क्यों इतने दलित खुदकशी कर रहे हैं। [हंसी] सबसे बड़ा मेरे दोस्त कहते हैं खून में एक या दो आदमियों का हाथ होता है। जिसने खंजर चलाया जिसने उसको पैसा दिया। खुदकशी में हम सब गुनहगार है। कॉम्प्लेसिट है। हम सब कॉम्प्लस है क्योंकि हमने समाज बनाया है। हम जिसमें लड़का खुदकशी कर रहा है। ये लड़की खुदकशी कर रही है। हम तो उसमें अगर आप देखते हैं आज क्या समाज हो गया? कानून कहां है यहां पर? हम सोशल कहां है? खा पंचायत क्यों इतनी चोट से है? पुलिस क्यों नहीं काम कर रही है? पुलिस में कास्ट क्यों है? तो ये जो एविडेंस है ट्रेजडी का हम अगर आज से 4000 साल पहले बाद कोई खोजेगा तो कहेगा तो वही बराबर है। 3000 साल पहले मानुष ने लिखा था 3000 साल बाद भी वही चल रहा है। क्या फर्क आया है? उतने ही लोग मर रहे हैं। उतनी लड़कियों का रेप हो रहा है। उतने ही लोग जेल में मरे हुए हैं। हम उतने ही लोग नौकरी नहीं कर पा रहे हैं। व्हाई इज इट एक्सेप्ट? पार्लियामेंट में 85 बाय लॉ 15% दलित है बाय लॉ। हम आज की तारीख में 85 दलित है। कानून को छू नहीं पा रहे हैं। पिटिकल टोटली डिस्पाइमावर्ड है। 85 मेंबर्स ऑफ़ पार्लियामेंट है और टोटली डिसपावर्ड कम्युनिटी है। ऐसे कैसे हो गया? कॉन्सिट्यूशन कैसे टोटली बदल गया? [गला साफ़ करने की आवाज़] हम के 85 एमपीस होते हुए भी एक कम्युनिटी टोटली असहाय है। मुसलमान ईसाई को बात छोड़ दीजिए आप। हमारे तो कुछ एमपी नहीं है। यहां पर 85 एमपी है बाय लॉ टोटलीवर्ड। 45 एमपी है ट्राइबल्स और टोटली डिस्पावर्ड है। कैसे आज कुछ चंद आरएसएस के लोग उनको कठपों की तरह खेल रहे हैं। आपस में रहे हैं। एक एमवर्ड कम्युनिटी को बाबा साहब अंबेडकर कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया जवाहरलाल नेहरू महात्मा गांधी एमावर किया और आपने 75 साल में आपको इतना डिसएवर कर दिया कि कोई हद ही नहीं है। कैसे हो गया ये सब? आंखों के सामने हो गया हमारे हम देखते रह गए और पिछले 14 साल में तो जो कानून थे वो वेपनाइज हो गए कानून अनदेखा हो जाए एक बात है कानून को पूरी तरह आप नहीं कर पा रहे हैं पुलिस मिल गई है एक और पता है कानून खुद वेपनाइज हो जाए पुलिस को अधिकार मिल जाए पड़ोसी को अधिकार मिल जाए कि आपको गुनहगार साबित कर दे एंटी कम्युन लॉ में एंड एंटी कन्वर्शन लॉ में क्या हो रहा है? इस वाले थीम पे हम लोग आगे आएंगे जिसमें हम लोग डिटेल में डीकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश करेंगे कि जो लॉ है वो किस तरह से वेपनाइज हो रहा है और कॉन्स्टिट्यूशन का नेचर अपने आप में कैसे बदल रहा है। उससे पहले मैं कुछ चीजें पहले से ही हम लोग डिस्कस कर लें जो इल्जाम है। फॉर एग्जांपल जो हिंदुत्ववादी हैं मुसलमानों के खिलाफ भी वही सेम एग्जाम इल्जाम है। लेकिन थोड़ा सा अ रुझान में डिफरेंस है के ईसाइयत को जब देखा जा रहा है हिंदुस्तान के कॉन्टेक्स्ट में तो हिंदुत्ववादियों का क्लेम ये है कि ये प्रोसिडाटाइजिंग मिशन का हिस्सा है। दे वांट टू कंप्लीटली चेंज दी डेमोग्राफी ऑफ इंडिया जिसमें फॉरेन फंडिंग, पैसा ये सारी चीजें और जो मिशन है वो यह नहीं है कि किसी को स्पिरिचुअल जो आपने बोला कि उसकी जिंदगी में स्पिरिचुअल एब्सेंस है या फिर वो अपने आपको गॉड कॉन्शियसनेस की तरफ ले जाके अपने आपको लिबरेट करना चाह रहा है। इट्स ए पिटिकल मिशन जिसमें जो ग्लोबल क्रिश्चियनिटी है और जो उसकी जो पावर है वो इनवॉल्वड है। इसको आप किस तरह देखते हैं? देखिए ग्लोबल क्रिश्चियनिटी रोमन एपरर जो जर्मनी आज जर्मनी है उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा और उसके ऑस्ट्रिया वाले दुश्मन यहां पर होली रोमन एपरर कहला वो एक तरीके से आखरी ईसाई एपरर था दुनिया का आज की तारीख में ग्लोबल क्रिश्चियनिटी नाम की कोई चीज नहीं है वेस्ट में क्रिश्चियनिटी टोटली लिबरलाइज हो गई है। पहचान में नहीं आ रही है। जिनको हम लोग होमोसेस कहते हैं। एनजीपीटी की प्रीस्ट बन रहे हैं। अनसुनी बात थी। बिशप बन रहे हैं। अनसुनी बात थी। एक भूकंप आया हुआ है धर्म में। किसी के पास टाइम नहीं है हम कि ग्लोबली ईसाई धर्म को फैलाना है। ऐसा बैठ के सोचे हम जो अब जहां पर है बच जाए आने वाले एक्सिस्टेंशियल [गला साफ़ करने की आवाज़] क्राइसिस है ऑलरेडी धर्म है और सब धर्मों में है हम जनरली ये ट्रू इट्स इट्स ट्रू फॉर एवरीबॉडी सबों में है तो लिबरलाइज्ड क्रिश्चियनिटी ऑफ़ लॉर हैज़ नो इंटरेस्ट इन इंडिया और इन एशिया जीरो इंटरेस्ट जीरो इंटरेस्ट नेगेटिव इंटरेस्ट ऐसा नहीं होता तो 2 करोड़ हिंदुस्तानी अमेरिका में है। हम पहले उनको पकड़ के ईसाई नहीं बना लेते। हम ये नहीं कहते कि वीजा उन्हीं को मिलेगा जो ईसाई हैं। हम क्या गल्फ कंट्रीज नहीं कहती कि हम सिर्फ मुसलमानों को ही नौकरी देंगे हम या उनको ही नौकरी देंगे जो मुसलमान बनता है। तो 5 करोड़ तो वैसे ही बन जाते नौकरी की तलाश में। ऐसा नहीं होता है। पैसे से अगर ईसाई बनता कोई तो पैसा जब खत्म हो जाता है दूसरे दिन वो मुसलमान बन जाएगा, सरदार बन जाएगा, हिंदू बन जाएगा। ना उसको दो पैसे ज्यादा मिलेंगे। हम तो तो तिजारत होगी। धर्म तिजारत शायद नहीं है। अपने कठोर हिस्से में भी नहीं था। इंपीरलिज्म में भी तिजारत नहीं थी। चाहे मुसलमान हो या हिंदू हो या ईसाई हो सभी कौमों ने बुद्धिज्म ने भी दूसरे देशों पे हिकमत की है। अब अपना राज किया है। कितने कत्लम हुए हैं। मगर अभी भी आज की तारीख में भी ऐसा कोई देश नहीं है जहां पे 100% एक ही कौम हो। जी। सब में माइनॉरिटी है। सब में अगर डिनोमिनेशन माइनॉरिटी है और हिंदुस्तान में इतने साल मुसलमान रहे रजिया सुल्तान को कितने साल हो गए? 1000 साल पूरा हो गया। अभी 15% मुसलमान है सिर्फ। 200 साल ईसाइयों ने किया। हिंदुओं के थ्रू राज किया। रजवाड़ों के थ्रू राज किया। एक भी सही नहीं बनाया सिर्फ दो बारी कन्वर्शन में एक बारी आंध्र और तमिलनाडु में और एक बारी पंजाब में लाहौर से लेके और अंबाला तक अंग्रेजों के जमाने में इसको आप कह सकते हैं मास कन्वर्शन और ये सिर्फ हुए दलितों के और इसमें राज का लेना देना बहुत कम था ये एक प्री अंबेडकराइट रेवोल्यूशन हम रिजेक्शन था रिजेक्शन था ब्राह्मणिज्म का हम जिसकी वजह से आज पंजाब में सारे के सारे दलित एक तरीके से या मजहबी सिख है या मजहबी ईसाई पंजाब में ट्रेडिशनल पंजाब में आपको एक भी अपर कास्ट पंजाबी मुसलमान नहीं पंजाबी ईसाई नहीं मिलेगा मस सिख मिलेंगे और मस बी क्रिश्चियन मिलेंगे जो जात के स्वीपर्स है जमाल है मैं एक पंजाबी पडकास्ट देख रहा था जहां पे पंजाब का जाट सिख बता रहा था कि हमारे यहां दलित ईसाइयों को चूड़ा कहा जाता है हम एक ही अर्थ है स्वीपर का और ईसाई का एक ही अर्थ है पाकिस्तान में लाहौर में भी यही बात है पंजाबी है वो कि जब आप एक शब्द धर्म को भी और काम को भी एक ही बात है तो आप समझ सकते हैं कि कौन लोग थे जो ये बने और क्यों बने तो इमरलिज्म के साथ धर्म ज्यादा टिकता नहीं है ना ग्लोबली और इमरियलिज्म ग्लोबल क्रिश्चियनिटी ग्लोबल मनी का कोई राज नहीं है दूसरी बात आती है फोर्स की तो पैसा का मैंने बता दिया पैसा जिस दिन खत्म हो गया आज हिंदुस्तान में ईसाई सबसे गरीब है सबसे क्योंकि अंग्रेजों के जमाने में काश्तकार नहीं था। उसके पास जमीन नहीं थी। बहुत कम जैसाइयों के पास जमीन है। कुछ रेड्डी है आंध्रा में, कुछ तमिलनाडु में है, कुछ बिहार में है, कुछ केरला में है। इंटरेस्टिंगली अगर ब्रिटिश का इंटरेस्ट भी होता तो वो कन्वर्शन में मैसिव लैंड्स और ये सब चीजें भी देते हैं। डांट्स नहीं देते। मुगल भाषाओं के साथ डांस नहीं देते। देते तो लैंडेड पेजेंट्री लैंडलेस पेजेंट्री एग्रीकल्चर लेबर यही सही काम करते हैं आंध्रा में तमिलनाडु में केरल में भी [गला साफ़ करने की आवाज़] ओसा में गरीब है और क्योंकि वो गरीब है [गला साफ़ करने की आवाज़] अस्पताल खुद नहीं खोल सकते इच्छा रहते हुए भी इस वास्ते बाहर का पैसा आता है हम बाहर का पैसा ईसाइयों को तनता देने के काम में नहीं आता है। ईसाइयों को खाना खिलाने के लिए नहीं आता है। ऐसा नहीं है कि जितना पैसा आया पहले ईसाइयों के पास जाएगा। जो बच गया वो अस्पताल में जाएगा। ऐसा नहीं है। ये धर्तमी नहीं है। ये तोमत है। हम पैसा आता है सीआरएस से आता है। कैसे भी आता है? अगर स्कूल के लिए आया तो स्कूल खोलेंगे। हॉस्पिटल के लिए हॉस्पिटल खोलेंगे और दोनों चीजें उस जगह नहीं खोलेंगे जहां पर ईसाई है। उस जगह खोलेंगे जहां पर इनकी जरूरत है। यहां पे सरकार नहीं जा पा रही है। यहां पे रजवाड़े नहीं जा पा रहे थे। यहां पे करोड़पति नहीं खोलना मांगते। वहां पर जाते थे। नर्सेज कैसे शुरू हुई हिंदुस्तान में? यहां पे छुआछूत थी। यहां पे कास्ट थी। जहां पे औरत पर्दे में रहती थी। सर्विस वहां से शुरू होती है। किसी दूसरे का खून और पस पहुंचना पराई औरत का बड़ी बात है। हम वहां से शुरू न शुरू की है। नर्स नर्सेस धार्मिक महिलाएं भी कोई नहीं सेवा कर रहा है। हम करेंगे उसको अगर आप दूसरे तरीके से देखें वुमेन का लिबरेशन भी वैसे होता है। आज हर एक अस्पताल में उच्च जाति की लड़कियां नर्सेज है। मुसलमान कितनी नर्सेज है। ब्राह्मण लड़कियां नर्सेज है। सिखिया नर्सेस है। मलयाली ईसाई तो है ही है। हम तो ये जो सर्विस सेक्टर है किस तरीके से फैला और पैसा कहां लगा? ये पैसे का डिस्ट्रीब्यूशन बहुत जरूरी है। अगर आप हमारे सर से यह तोत हटाना मांगते हैं। ये पैसा ना पादियों के लिए आया ना जान दयाल के लिए आया। ये पैसा आया और आज भी आ रहा है। स्क्रू अस्पताल हॉस्पिस जहां पे मरता वहां भी रखा जाता है। सोर्स ऑफ़ मनी क्या है जो बाहर से? सबसे पहला तो है एसआईओ का टाइप। जितना भी आप कमाते हैं एक बटा 10 आपको दान देना है हम गरीब को और अमीर को और गरीब का एक पैसा अरबपति के करोड़ों रुपए से ज्यादा है हम विडोस माइट कहलाता है किसी ने अपने पेट से काट के ₹ रख दिया और कोई चेक काट रहा है एक लाख का बराबर की चीज है अमेरिका और इंग्लैंड में दान जाता है। अरबपति पैसा देते हैं। विधवाएं मर जाती है। विपरीत कर जाती है। हमारे मरने के बाद हमारा जमीन जायदाद बेच के उसका पैसा को दे दीजिए। सोशल वर्क के लिए विक्री करते थे। कुछ कॉलेज को देते हैं, कुछ के लिए देते हैं। तीसरा कुछ देशों में जो निक देश है और जर्मनी वहां पर रिलीजियस टैक्स है दो% मगर वो टैक्स हिंदुओं को भी जाता है। हम क्योंकि रिलीजियस टैक्स है। उसको दुनिया के सारे रिलेशंस को वो बराबर बांट देंगे। ईसाइयों को भी जाएगा, [गला साफ़ करने की आवाज़] हिंदू मांगेंगे उनको भी जाएगा और हिंदुस्तान में जर्मनी का पैसा हिंदुओं को आता है। बहुत कम लोगों को पता है। मैं आपको बता रहा हूं आगे। हम बताइए इसके बारे में। क्योंकि जर्मनी में रिलीज टैक्स है। हम वो टैक्स हर नागरिक को देना पड़ता है। और उस टैक्स से विदेश में धर्म संस्थाएं चलती हैं। हम हिंदुस्तान का कोई अस्पताल चाहे उसको हिंदू चला रहे हो या ईसाई चला रहे हो वह अप्लाई कर सकता है उसको मिलता है मिल सकता ही नहीं मिलता है एफसीआर सिर्फ ईसाइयों के पास नहीं है हिंदुओं के पास है लोग समझते हैं कि ईसाइयों के पास एफसीआर है बहुत हिंदुओं के पास है तीसरी बात जोर जबरदस्ती से हाम थे बना लिया आज तो हाकिम नहीं है। कोई तलवार नहीं है। क्यों गरीब ईसाई है? क्यों अभी भी ओसा में ईसाई झुग्गी में रहता है। मेरे जैसा लंबा आदमी उसके घर में घुसने के लिए आधा झुकना पड़ता है। दरवाजा छोटा है। और ये बाकी धर्मों के बारे में बता सकते हैं। कि क्यों गरीब अभी भी अपने धर्म के लिए है। सो की बात है क्यों नहीं और पैसा ले बन जाता है और जबरन कह रहे हैं आप हिंदुस्तान में पंचायत हिंदू होगी थानेदार हिंदू होगा कलेक्टर हिंदू होगा जज हिंदू होगा मुख्यमंत्री हिंदू होगा प्रधानमंत्री हिंदू होगा कौन किसके ऊपर कर सकता है उसकी गर्दन भी काट के फेंक देंगे। ऐसी आज के जमाने में क्या सब है? तो आपको कोई और बहाना ढूंढना पड़ेगा थॉमस लगाने के लिए। जोर जबरदस्ती आपने कानून में लिख दिया। और आप पुलिस वाले से पकड़वा रहे हैं। कैसे आप महंगी जोर से कर रहे हैं? एक यह तो हमें समझ आता है कि दलितों का कन्वर्शन या लोअर कास्ट हिंदू का कन्वर्शन इस वजह से हो रहा है कि या हुआ है कि वो अपने आप को उस कास्ट हायरार्की से लिब्रेट करना चाहते हैं। दूसरी तरफ ट्राइबल्स हैं। ट्राइबल्स अपने आप को उससे मुख्तलिफ समझते थे। उनको एसटी स्टेटस वगैरह बाद में मिला भी। उनकी भी एक हिस्ट्री है। तो वहां पे आपको क्या लगता है? क्यों? ट्राइबल्स के साथ एक तरीके से अन्याय हुआ है। ट्राइबल्स आदिवासी हैं। इस देश में जो एनसेेस्ट साउथ इंडियन डीएनए है उसके एक तरीके से रेसिपिएंट है वो कंटेनर है। उत्तर भारत के सारे लोग बाद में आए बहुत बाद में तो किसी भी किसी भी तरीके से वो हिंदू नहीं है जो आदमी ऋग्वेद के आने से 3000 साल पहले यहां पर होगा उसको आप हिंदू कैसे कहेंगे हम और 30 साल तो मैं कह रहा हूं वो 30ज़ आदमी हो सकता है हम वो तो आप हिंदू नहीं कह सकते ना कैसे आप उसको ईसाई नहीं कह सकते हम ये पिछले 100 साल में हो है इनको असिमिलेट करने की। मगर शुरुआत में सिर्फ ईसाई ही इनकी जरूरतों को कुछ पूरा कर पाए। सबसे बड़ी जरूरत थी मेडिसिन की। महामारी के क्षेत्र है ये। एस्कारमेंट डेकन प्लेटो और नर्थ के बीच में जो जंगलात है राजस्थान से ले बंगाल तक वहां के लोग हैं। डेवलपमेंट से बहुत दूर पुरानेस्ट शहरों से झगड़ों से बहुत दुख चोला एंपायर से बहुत दूर बंगाल के नवाबों से बहुत दूर साल अकेले छोड़ दिए गए थे तो इंपीरियल एज में एंट्री शुरू हुई और तकरीबन बराबर ही एंट्री शुरू हुई ईसाइयों की और हिंदुओं की और मिशन और जो मिशनंस हैं हम ये एंटर किए और एसआई एंटर किए कोलकाता प्रेसिडेंसी से और मद्रास प्रेसिडेंसी से स्कूल लाए अस्पताल लाए कंगोर जंगलों में बड़े-बड़े स्कूल खोले 18 19 सेंचुरी और स्कूल सिर्फ नहीं खोले हॉस्टल खोले मुझे पढ़ाने का तो तरीका हो सकता है या बच्चों को स्कूल लाओ या स्कूल बच्चों के पास ले जाओ। बच्चों के पास स्कूल दिल्ली में ले जा सकते हैं। जंगलों में नहीं ले जा सकते क्योंकि एक गांव में 20 बच्चे हैं। एक गांव में 20 बच्चे हैं। दोनों गांव के बीच में 40 किलोमीटर का फर्क है। तो आपको एक सेंट्रलाइज जगह में हॉस्टल छोड़ना पड़ेगा। यहां पे आप हजार बच्चा ले आएंगे। 200 गांव से और पढ़ाएंगे उन्हें। ये कैथोलिक्स ने किया, ईसाइयों ने किया। आप सोच सकते हैं जयपुर से ले औरक आगे तक हॉस्टल खोले कंसट किया पढ़ाया 150 साल से स्कूल और कॉलेज है वहां पर कितनी जनरेशन निकल चुकी है कितनी जनरेशन निकल चुकी है और आज की तारीख में उनमें से कुछ हिंदुस्तान के बेहतरीन कॉलेजेस में से सजेवियर्स उड़ीसा में उससे ज्यादा अच्छा उस इलाके का कोई कॉलेज नहीं है। तो आप उस उन दिनों खोला आपने और ट्राइबल्स उसकी वजह से बहुत तादाद में ईसाई बने खासकर और कुछ और जातियां थोड़े कम मगर बाकी जातियां काफी तादाद में अब आप उनको कह रहे हो कि ये हिंदू से ईसाई बने वो सरना से ईसाई बने वो अपने आदि धर्म से ईसाई बने आप उनको हिंदू नहीं कह सकते और आप आज रबर एक तरीके से सेंसस के जरिए और और जरिए से उनको आप हिंदुइज कर रहे हैं। हिंदुइज भी कर रहे और हिंदू बना के लिख भी रहे हैं। आपने ये बात बोली कि इंपीरियल दौर में दोनों ईसाई और हिंदू आर्कमिशन दोनों ने ये कोशिश की कि उन्होंने दे एंटर्ड द प्रोसेस ऑफ के जहां पे वो ट्राइबल्स के साथ काम करें डेवलपमेंट सेक्टर। और इसके ऊपर एक और अच्छी बात ये है कि हिंदू मिशनरी कब पैदा हुई? हम हिंदू धर्म बड़ा एक्सक्लूसिव धर्म था। हम बड़ा एक्सक्लूसिव धर्म है। उसमें और किसी को पढ़ने की इजाजत नहीं है। हम वन सिस्टम में आप अपना काम कीजिए। बस दान दीजिए। मंदिर दूर से देखिए आप मिशनरी स्पिरिट कब पैदा हुआ? राजा राम राममोहन रॉय आपके मिशन मिशन है पैटर्न क्रिश्चियन मिशन के ऊपर है उन्होंने जाके अपने खोले कैसे क्रिश्च खोलते थे आर के मिशन जंगलों में खोले यहां पर दो किलोमीटर दूर पर क्रिश्चियंस थे उनका मिशनरी एक तरीके से आप कह सकते हैं इच्छा जा रहे थे कंपेटिटिव नेचर से के हम भी शायद ये कर सकते हो हम्। और रिफॉर्म्स हिंदू धर्म में आए वह तो अलग बात है। इन दैट प्रोसेस उनको मिशनरी बनने के लिए वह रिफॉर्म की स्पिरिट लानी पड़ी। क्योंकि एक्सेप्ट आप किसी को ये जाके कि भई आप कन्वर्ट हो जाइए लेकिन आप मेरे से नीचे रहेंगे। तो वो ये बोलेगा भाई मैं तो ऑलरेडी एक्सिस्ट करता हूं। जैसे भी एक्सिस्ट करता हूं। सो व्हाट इज द डील? एक महापुरुष से पूछा किसी ने कि आप ट्राइबल्स को कन्वर्ट तो कर रहे हो? क्या इनको आप फला मंदिर में इजाजत देंगे? नहीं इनके लिए यहीं पर छोटे मंदिर बनाए जाएंगे। तो हमारे दोस्त जो अकबर नवीस थे उन्होंने हेडलाइन दी थी लो कॉस्ट टेंपल्स फॉर लो कास्ट इंटरेस्टिंग। बल्कि पेरियार के काम में तो ये रिफ्लेक्ट भी करता है कि किस तरह से जो ब्राह्मणिकल थ थियोजाइजेशन है फर्स्ट मिलेनिया में उसमें किस तरह से जो लोअर कास्ट कॉर्ड्स हैं उनको एक लार्जर एप्रोप्रिएशन एप्रोप्रिएशन तो है तो शिवा सबसे बड़े एप्रोप्रिएटेड थोड़ी शुरू में जब आपने ये बात रखी थी के जो साउथ में जो 2000 साल पहले क्रिश्चियनिटी आई वो ज्यादातर जो उसका अट्रैक्शन था मरकज बना उसका वो अप्पर कास्ट कन्वर्ट्स थे और बाद में जो आए वो लोअर कास्ट में हुआ तो एक क्लास और कास्ट की डायनामिक्स इमर्ज हुई। तो आज जब मुझे आप कुछ कहना नहीं मैं कह रहा था कि अपपर कास्ट वर्ड मैं बहुत ही घिनौलाना हम समझता हूं क्योंकि हम नहीं कह रहे वो लोग मानते हैं अपने आप को हम ऊपर मानते हैं मैं हमेशा कहता हूं सो कॉल्ड अपर कास्ट सेल्फ स्टाइल्ड अप कास्ट अभी जो अटैक्स जब हम देख रहे हैं और मैंने आपकी जो राइटिंग्स वगैरह देखी और बहुत सारी चीजें तो एक ये पहली बार मेरे सामने आया कि भ हाउस चर्चेस पे अटैक है रादर देन जो इंस्टीट्यूशनलाइज्ड जो चर्चेस हैं उसके बनिस्बत और कहीं ना कहीं वो जो क्लास और सो कॉल्ड कास्ट का जो पैटर्न है वह मिमिक करता है। तो हु इज रियली अंडर अटैक व्हेन इट कम्स टू क्रिश्चियंस देमसेल्व्स? या उसकी रेंज क्या है? या उसमें एक आज अगर लो कास्ट हो रहा है या लो क्लास हो रहा है तो कल को वो किस तरह से शेप करेगा? आपने थियोलॉजी की बात कर दी। थोलजिकली अगर देखूं तो ये समस्या अंडर अटैक है। हम उनका लिबरेटिंग एस्पेक्ट जिससे लोग डरते हैं। शर्मादार डरता है। के लिबरेट हो जाएंगे तो हमारा काम कहां जाएंगे? मगर फंसता गरीब आदमी है। किसान फसता है, मजदूर फसता है। उसकी बीवी फंसती है। उनके ऊपर अटैक होता है। हाउस चर्च में हाउस चर्च क्या है? मेरी झुकी है। मेरे घर में बाइबल है। मेरे दोस्त पादरी हैं। इतवार को आते हैं। हम मैं रिश्तेदारों को, दोस्तों को, पड़ोसियों को बुलाता हूं। मिलके हम दुआ करते हैं। क्योंकि ईसाई धर्म [गला साफ़ करने की आवाज़] कम्युनिटी का धर्म है। अकेले भी दुआ कर सकता हूं मैं। मगर मेरे को जमात लगानी पड़ेगी। इतवार के इतवार कोई भी दिन हर रोज क्योंकि जैसे कह गए थे कि जहां भी दो या तीन हो मैं वहां तो अकेले तो आप हमेशा मान के चलते हैं मगर जमात ही [गला साफ़ करने की आवाज़] एक तरीके से कम्युनिटी कॉग्रगेशन ईसाई धर्म का एक स्पिरिट है ट्रेड मार्क हाउ चर्च में इतवार के इतवार लगती है या कभी कोई बीमार हो गया उसकी चारपाई के आसपास किसी और की झुकी में वहां पर अटैक हो जाता है अच्छा हो जाता है एज अपोज टू शहर में ब्रिक एंड मन चर्च जो है हम जहां पर लोग भी होंगे ज्यादा शायद पुलिस वाले भी हो हम तो उनप अटैक होता है जरूर होता है वो भी तोड़े जाते हैं जलाए जाते हैं कम होता है हम मगर जैसे गमाल में हुआ जैसे और जगह हुआ जैसे मणिपुर में हुआ वो भी जलाए गए जब जलाए गए तो तो अर्बन और रूरल सेक्शन में भी कोई डिफरेंस है आपके हिसाब से जब कयामत आती है तो कोई डिफरेंस है मगर इतवार के इतवार रूरल चर्च बहुत ही वरेबल है हम बहुत ही वरेबल है क्योंकि वहां पर पड़ोसी पुलिस वाला अखबार लवस कोई भी कह सकता है कि कन्वर्शन हो रहा है हम और जैसे ही कोई कहता है कन्वर्शन हो रहा है वो टारगेट बन जाता है सबों का इकट्ठा हम गुंडे आएंगे 20 पांच पुलिस वाले साइड में आएंगे दो आदमी अपने फोटोग्राफी के लिए आ जाएंगे [नाक से की जाने वाली आवाज़] सब मिलके उसको आप एक तरीके से कह रहे हो कि यहां पर कन्वर्शन हो रहा है। कौन सा कन्वर्शन हो रहा है? किस पर कन्वर्शन हो रहा है? कन्वर्शन की क्या डेफिनेशन आप मान के चल रहे हो? यह यूजली जब हम लोग हिस्टोरिकल एपिसोड्स देखते हैं या फिर आजादी के बाद का भी जो ज्यादातर वो देखते हैं कम्युनलाइजेशन अर्बन सेटिंग्स में ज्यादा रहा है और इंटरेस्टिंगली अभी जो वनरेबिलिटीज है वो रूरल सेटिंग में ज्यादा आप जैसे मैं आप जो बता रहे हैं और इवन फॉर मुस्लिम्स फॉर एग्जांपल क्योंकि अर्बन सेंटर ज्यादा कंसोलिडेटेड है। वहां सिविल सोसाइटी स्ट्रांग है। वहां का एक अपनी अंडरस्टैंडिंग है चीजों को लेके नेटवर्क हैं। विलेजेस में अर्बन सोशियोलॉजी है। फर्क अर्बन सोशियोलॉजी है। रूरल में आपको बताऊं कि हद कहां तक हो जाती है? छत्तीसगढ़ में जैसे आजकल आप छत्तीसगढ़ में लाश को दफनाने नहीं दिए जा रहे हैं। अच्छा एक दो नहीं 148 केस हो चुके हैं। हम जहां पे लोग कह रहे हैं कि मेरी मां मर गई है। इसको मैं अपने खेत में दफना मांगता हूं। वो कह रहे नहीं हम तुम ऐसा बन जाओ। इस गांव में नहीं रह जाएगा। हम तो जहां पर यह सब हो रहा है नौकरियां नहीं मिल पा रही है वहां पे दुकानें नहीं लगा शादियां नहीं करने दे रहे हैं ये अर्बन सेटिंग में थोड़ा डिफिकल्ट डिफिकल्ट है अभी जैसे कुछ टाइम पहले ओपन डोर्स वर्ल्ड वॉच की लिस्ट आई थी उसमें ये कि लोअर रैंकिंग है अब हिंदुस्तान की व्हेन इट कम्स टू ऑपरेशन ऑफ क्रिश्चियंस और आप पे इसका एक अपना एक व्यू है जो आपने लिखा के रैंकिंग्स आर रिलेटिव पर्सक्यूशन इज लिफ्ट और कहीं पे ज्यादा हो रही है और हमारे से बनिस्बत तो एक ऊपर नीचे एक दो हो भी गया तो जो लार्जर जो सिनेरियो है आप इनको जो रैंकिंग्स हैं और ये सारी चीजें आपने शुरू में नंबर्स के बारे में भी बात की थी। नहीं मैं देखिए मैं कह रहा था वहां पर भी मैंने कहा सूडान में नाइजीरिया में ईसाई कर रहे हैं वहां पे सिविल वॉर है वहां पे कोई नहीं कह रहा हम सेकुलर रिपब्लिक है यहां पे हम कह रहे हैं हम सेुलर रिपब्लिक है हम हम रूल ऑफ लॉ है हम हम सभ्य समाज है हम हिस्ट्री ऑफ़ को एक्सिस्टेंस है तब भी 148 लाशे नहीं दफनाए दे रहे। कौन सा क्या हो गया ये? किस क्या रैंकिंग देंगे आप इसको? मेरे हिसाब से एक नंबर की रैंकिंग है। क्योंकि सूडान में 48 लोग एक चोट में मरते हैं। 48 के 48 दफना दिए जाते हैं। 148 लाशें दफनाने दी जा रही है छत्तीसगढ़ में। कहां क्या रैंकिंग दूंगा मैं इनको? जबकि एक भी हिंदुस्तानी एक भी हिंदुस्तानी कनाडा में या अमेरिका में घायल हो जाता है। यहां पे एंबेसडर को नोट भेज दिया जाता है। क्या गरीब ईसाई की मां की लाश सड़क पे सड़ सड़ी रहेगी 14 दिन तक? ये कौन सा तहजीब वाला देश है? कौन सी सिविलाइजेशन है ये? और सारी जो चीजें हो रही है वो सिविलाइजेशन के नाम पर ही हो रही है। कौन सी सिविलाइजेशन है यहां पर? इजिप्ट में लोग बिल्ली को भी मॉडिफाई करते। कोई सड़ने के लिए नहीं छोड़ता था। लोग कहते मैं अभी भी जब मैं छोटा था अभी भी लाश गुजरती है हिंदू की और मुसलमान की सलाम किया जाता है। उसको टोपी उतारी जाती है। नमस्ते किया जाता है। जानते भी नहीं हम किसकी लाश है। देखो छोटे छोटे बच्चे भी करते हैं हम अलविदा करता है वो हम लोग इंसान है जानवर नहीं है और अब आप कह रहे हो कि हमारे इंटरनल अफेयर्स में आप इंटरवीन कर रहे हो ये कह के ये आपका है कंट्री ऑफ़ कंसर्न हो गए आप कंट्री ऑफ़ कंसर्न हमको अपने आप को डिक्लेअ करना चाहिए कि जब तक हमारे सर से तोम दूर ना हो जाए। हम लोग आंख उठा के नहीं जिएंगे। पुलिस वालों से पूछेंगे हर रोज क्या हो रहा है तुम्हारा? कलेक्टर से पूछेंगे क्यों तुम्हारे डिस्ट्रिक्ट में ऐसा हो रहा है? मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री से रोज पूछा जाएगा और पूछा पूछता हूं मैं रोज कि क्यों मेरे देश में आपके राज में इस औरत की लाश सड़क पर है। उसका क्या जवाब है आपके पास? बेसिक डिग्निटी एक आफ्टर लाइफ की की भी यहां पर के दफन होने की वो भी आज की डेट में वो सिर्फ इंसानियत के लिए है बाय लॉ ऑर्डेंट द राइट टू लिव इज द राइट टू डाई वि डिग्निटी सुप्रीम कोर्ट का ऑर्डर है मेरा नहीं है द राइट टू डाई वि डिग्निटी टू बी बेरिड टू बी क्रिमेटेड थोड़ी देर पहले हम एंटी कन्वर्जन लॉस की बात कर रहे थे और किस तरह से जनरली भी यह बोला जा रहा है कि बिना हिंदुत्व स्टेट डिक्लेअर किए हुए भी या हिंदू राष्ट्र डिक्लेअ किए भी जो कॉन्स्टिट्यूशनल रीडिंग हो रही है या फिर जो नए लॉज़ वजूद में आ रहे हैं वो जो बेसिक नेचर ऑफ इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन है जो इक्वलिटी राइट टू प्रोफेसर ओल्ड रिलजन राइट टू सेल्फ ऑर्गेनाइज ये सारी चीजें चैलेंज हो रही हैं। सुप्रीम कोर्ट का जो इन रेफरेंस स्टैनिस लॉज़ 1977 का जो जज जजमेंट है प्रोपगेट डज़ नॉट इंक्लूड अ राइट टू कन्वर्ट अनदर मतलब ये जो पूरी जो रीडिंग है कहां पे कन्वर्शन मुसल्लत हो रहा है कहां पे इंसान ये कौन तय करेगा कैसे होगा और इसके बेस पे जब इन जजेस की खुद रिटायरमेंट के बाद और इन कोर्ट के जजेस से मेरी भी बात हुई हम के दो कमियां रह गई थी एक तो केस पूरी तरह तैयार नहीं नहीं किया गया था तो इनको चैलेंज नहीं कर पाए थे एक थोलजिकल पॉइंट पे हम कोई किसी को कन्वर्ट नहीं करता है ये खतना नहीं है कि डॉक्टर ने कर दिया आदमी कन्वर्ट होता है चाहे सिखिज्म में जाए या इस्लाम में जाए या हिंदू बने वो जब तक कहेगा नहीं कि मैं बनना मानता हूं किसी की मजाल नहीं है कि उसके ऊपर गंगाजल डाल के उसको हिंदू बना दे या उसके मुंह में कुछ डाल के चिरा कि आप साथ से आप मुसलमान हो या उसके ऊपर क्रॉस लगा दिया कि आज से आप ईसाई हो। ऐसे थोड़ी कोई बनता है। कन्वर्जन की जो आप स्टेज बता रहे हो एक कम्युनिटी के अंदर एंटर होने की बात है। कन्वर्शन तो बहुत पहले हो चुका है। ये गृह प्रवेश अलग चीज है। आप ईसाई बनके ईसाई लड़की से शादी करना मांगते हो। ईसाई बनके ईसाइयों के साथ गला मिलाना मांगते हो। ईसाई बनके आप इतवार को हमारे महफिल में आना मांगते हो वो एडमिशन कन्वर्शन आपका हो चुका कोई पादरी आपको सिर्फ रिचुअलाइज्ड एडमिशन देता है कन्वर्शन आप खुद करते हो अपने आप को अगर आप नहीं ईसाई बनना मांगते कोई आपको कान पकड़ के कितना भी बोले एसआई आप नहीं बनोगे तो ये गलत बात है ये एंट्री हो दाखिले को अब ये केस वो शामली के एक लड़के जो मुसलमान हो गया उसका बीच में काफी वायरल हुआ। बहुत उसको कोशिश की गई। उसने बोला कि मैं मुसलमान ही रहूंगा। और उसकी एक मुसलमान लड़की से जो शादी हुई थी जिसके ऊपर इल्जाम लगाया गया कि आप लव जिहाद कर रही हैं। तो उनको और उनके फादर को जेल में डाल दिया गया। अभी परसों जब वापस वीडियो आई तो उसका चेहरा उतरा हुआ है लेकिन वो वापस घर वापसी कर चुके हैं और वो एक आरती कर रहे हैं। तो एक तरफ ये जो आपने शुरू में कहा कि हिंदुस्तान जहां पे ज्यादातर जो अह ब्यूरोक्रेटिक पोजीशंस हैं या फिर पॉलिटिकल ऑफ़िसिसेस हैं या जो इवन सिक्योरिटी फोर्स हैं सब में जो हिंदू है और वह अपर कास्ट हिंदू है वो डोमिनेट करता है और उसके हाथ में है और उस कॉन्टेक्स्ट में फोर्स कन्वर्शन जबजब सारी रिसोर्सेज एफसीआरए स्क्वीज़ सब कुछ और उसके बनिस्बत वो रियलिटी जो जहां पे कि इंसान की जो अपनी एक्सिस्टेंशियल चॉइस होती है तो ये ये तो एक तरीके से हिंदुस्तान का गरीब आदमी आदमी की कोई सेल्फ रिस्पेक्ट है कि नहीं है? हम उसकी कुछ आत्मा है, कुछ कॉन्शियस है। उसकी फ्रीडम ऑफ़ कॉन्शियस है कि नहीं है? ये सिर्फ अमीरों के लिए है। पढ़े लिखे लोगों के लिए लंबे चौड़े आदमियों के लिए है। हम कि गरीब आदमी की फ्रीडम ऑफ़ कॉन्शियस नहीं है। कल को कुछ भी चाहे वो हिंदू बनना मांगता हो। हम अल्टीमेटली तो यही राइट गया है ना कि राइट ऑफ़ फ्रीडम ऑफ़ कॉन्शियस। मैं कंप्लीटली एक्सिस्टेंशियली मेरे पास वह चॉइस ही नहीं रही कि मैं डिसाइड कर सकूं। यह जो कानून बनते हैं अल्टीमेटली यह तंग करने के लिए तो बनते ही है। इनके पीछे का राज सिर्फ धर्म बचाना नहीं है। हिंदू धर्म बचाना नहीं है। जो साजिश है हम वह साजिश है कि हिंदू धर्म के वह बेचारे लोग उनको बेचारे रखूंगा जिनको आपने अपने अंगूठे के नीचे रख रखा है वो वही रहे आज की तारीख में भी पांच ब्राह्मण अगर ईसाई बन जाए या मुसलमान बन जाए अखबारों में चू नहीं होगी बल्कि शर्म आएगी सबों को हम कि शर्मा जी कैसे ईसाई बन गए दो दलित बन जाए तो कहेंगे उनको खरीद लिया गया। तो यह धर्म दिखाने का तरीका नहीं है। ये अपने सर्वेंट्स को अपनी कैद में रखने का बॉन्डेड लेबर रखने का है। और कोई वजह मेरे को दिखाई नहीं देती। क्योंकि अगर 1 लाख, एक करोड़, 10 करोड़, 100 करोड़ हिंदू कम हो जाएगा तो किसको क्या फर्क पड़ता है? तादाद कम होती रहती है, ज्यादा होती रहती है। शायद हिंदू दुगना हो जाए। आप शायद सारे पाकिस्तान के और श्रीलंका के और बाकी देशों के चाइना के क्या लोग हैं? पूरे कन्फशन है। सबों को आप हिंदू बना लो। तो क्या फर्क पड़ता है? आपके आपका कानून क्या कहता है? हिंदू कौन है? जो मुसलमान और ईसाई और बुद्धिस्ट और यहूदी नहीं है वो हिंदू है। यही डेफिनेशन है ना कॉन्सिट्यूशन में तो कोई हिंदू की डेफिनेशन नहीं है। सिर्फ माइनॉरिटीज कमीशन एक्ट के अंतर्गत डेफिनेशन आती है। माइनॉरिटीज है मुसलमान, ईसाई, सरदार, बुद्धिस्ट, जैनी और पारसी। बाकी जो ये नहीं है वह सब हिंदू है। फिर इनकम टैक्स एक्ट के अंतर्गत सिख और बुद्धिस्ट और जैन भी हिंदू है। हम तो आप पहले हिंदू की डेफिनेशन दीजिए। फिर बताइए कि इसको छोड़ के जाने वाले को क्या किया जाए? एक और चीज के पिछले 70 80 साल में जितने भी फोर्स कन्वर्शन के केसेस हुए उसमें आपका कहना है कि बेयरली फ्यूअर देन फाइव क्रिश्चियंस हैव एक्चुअली बीन कन्विक्टेड नहीं मैंने कहा जिस तारीख को मैंने बोला था मैंने कहा है बीन ओनली टू कन्वर्शन कन्विक्शंस हम बोथ हैव बीन मुस्लिम्स ऑन लव जिहाद हम कोई कैसे पकड़ा जाएगा जब होगा तब पकड़ा जाएगा ना हम आपने पर्दे बंद कर दिया। प्रूफ नहीं है आपके पास। आपने इंदौर में दो नन और 20 लड़कियों को पकड़ा। हम का कन्वर्शन हो रहा है। सबके माता-पिता ईसाई दादा-दादी ईसाई सब थाने आ गए। हम 10 महीने केस चला सब छूट गए। जिस बच्चे का मांबाप दादा-दादी ईसाई है उसको आप कह रहे हो हिंदू है और पकड़ लिया हम ट्रेन में कि इसको ले जा रहे थे। तो यह जो केसेस हैं ये तंग करने के लिए हैं। इनमें कोई दम नहीं है। ओवरऑल पर्पस क्या है इनका? व्हाट इज द पर्पस दैट दे सर्व टू कंसोलिडेट द हिंदू वोट बैंक। माइनॉरिटीज को तंग करने का और कोई वजह नहीं है। क्योंकि तंग तो हिंदू गरीब को भी करते हैं। हम दलित को मार मार के खड़ उजाड़ देते हैं। उसकी हम उसकी बीवी का गैंग रेप जितना दलित की पत्नियों का होता है। कहीं नहीं किसी का होता। मैं नहीं बोल रहा ये तो उसका क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो बोल रहा है ना और वो भी क्योंकि उनको दलित के लिए मैंडेटेड है कि पता लगा है। उनको ये मैंडेट नहीं है कि कितने मुसलमानों की पिटाई हुई और कितने ईसाइयों का खून हुआ ये बताओ। ये मैंडेट नहीं है। क्योंकि कॉन्स्टिट्यूशन में दलितों के ऊपर वो है तो उनको बताना पड़ता है कहते हुए। तब हमको पता लगता है कि दलितों के साथ क्या अत्याचार हो रहा है। आपने यह भी आर्ग्यू किया है कि किस तरह से इवन जो आपकी लॉफुल वाइफ हो सकती है या है उसको भी किस तरह से फ्रेमिंग जो हो रही है एंटी कन्वर्जन लॉस की ये एक्चुअली मुसलमानों के केसेस में भी हो रहा है। लेकिन ईसाइयों के केसेस में इसमें तो हमने थोड़ा बहुत कवर किया है। क्रिश्चियन केसेस में मुझे बहुत ज्यादा वाज़ नहीं था कि एंटी कन्वर्शन किस तरह ऑपरेट कर रहा है। क्या उसकी लेयर्स हैं और कहां तक जो हिंदुत्व एज अ सिविलाइजेशन स्टेट है और उसके जो एंकर्स हैं, पॉलिटिशियंस हैं क्योंकि अक्सर हम ये देखते हैं कि भ जो चीज आसाम में मॉडल बनाया जाता है फिर वो इमीडिएटली जब अ वेस्ट बंगाल आता है तो एक महीने जो चीज आपको 10 साल 14 साल लग गए एज अ मशीनरी बनाने में और जो मशीनरी बनाने में आपको गुजरात में 60 साल लग गए वो 14 साल फिर वो एक महीने मतलब इतना फास्ट है इस वक्त मैकेनिज्म कि अह जो चीजें अलग-अलग स्टेट्स में अलग-अलग तरीके से वेपनाइज हो रही हैं, वह अल्टीमेटली हर नए स्टेट में कन्वर्ज होती चली जाती हैं। और उसमें जो एंटी कन्वर्शन लॉज़ हैं या फिर ये जो फ्रीडम ऑफ जिसे कहते हैं सेल्फ प्रैक्टिस भी है, यूनिफॉर्म सिविल कोड और बाकी सारी चीजें वक्फ है ये सारी चीजें। तो ये बिल्कुल जिसे कहते हैं कि बेस में है जो कंस्ट्रक्ट करता है कि नेशन स्टेट अगर एक एक स्पेस है उस नेशन स्टेट में उस स्पेस में किस तरह कौन ऑपरेट कर सकता है उसके लॉ डिफाइन करेंगे और वो लॉज़ इस तरह कंस्ट्रक्ट और कॉन्स्टिट्यूट किए जा रहे हैं कि बहुत स्पेसिफिक जो पर्टिकुलर कम्युनिटीज हैं और माइनॉरिटीज हैं उनके जो मोड्स ऑफ एकिस्टेंस है उनको कंप्लीटली बाउंड किया जा रहा है। चाहे वो एफसीआरए हो, चाहे। तो इसमें पर्टिकुलरली एंटी कन्वर्ज़ लॉस को आप किस तरह देखते हैं? सरकार के पास बड़ी दुविधा है। हम क्योंकि कानून तो कहता है कि कानून बनाओ तो सब पे लागू हो। हम एंटी कन्वर्शन कानून भी हिंदुओं पे भी लागू होते हैं। एक तरीके से देखा जाए तो अगर वो किसी को मगर उनका पॉलिटिकल इंपेरेटिव ये है कि किस तरीके से इसमें ईसाइयों और मुसलमानों को फंसाया जाए। तो पहले अंग्रेजों के राज में भी उसके बाद जो भी एंटी कन्वर्शन लॉस बने ईसाइयों को फसाने के लिए बने। ओसा में सबसे पहले बना मगर उसके बाद उनको ट्वीट करने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई कि मुसलमानों को भी पकड़े। क्या ऐड करना था? मैरिज। हम और कुछ नहीं ऐड करना था। कन्वर्शन बाय मैरिज अगर आप कर देते हैं तो मुसलमानों को पकड़ा जा सकता है लव जिहाद के चक्कर में हम और वो जो वेपनाइज किया उन्होंने उसकी वजह से बीसीियों या सैकड़ों मुसलमान जवान जेल गए कुछ अरसे के लिए खासकर आसाम में तो मैं और हर्षवंदर एक दिन थे तो वहां पर धरपकड़ हो रही थी मुसलमानों की जिन्होंने पिछले 15 20 दिनों में शादियां की थी हम तो ट्वीट करना कानून को और जो आपने कहा कि लैब में 60 साल लगे बेंच टेस्ट में 10 महीने लगे एक्चुअल प्रैक्टिस में दो दिन लगे बिल्कुल बंगाल असम गुजरात तो टाइम फ्रेम कंस्ट्रिक्ट होता जाता है ये बड़ा साइंटिफिक है इसमें तो कोई नहीं दिया उन्होंने मगर जब ये कहते हैं कि मृत्युदंड दिया जाएगा तो बात खड़कती पहले जमाने में कहा जाता था कि गौ हत्या का मृत्युदंड होता है। बाकी सबका 14 साल की सजा या 20 साल की सजा विद रेप है तो शायद आजीवन का आवास बाबू शकत उसको बोला जाता था। अभी कन्वर्जन के लिए क्या कैसे प्रूफ करेंगे आप बियों उसको सजा मौत और किस क्राइम से आप कंपेयर कर रहे हैं क्या किसी को पहली बात तो जैसे मैं 2500 बारी कह चुका हूं कोई किसी को फोर्सबली कन्वर्ट नहीं कर सकता और कोई कन्वर्ट होना मांगे तो उसको कौन रोक सकता है आपको बताएगा नहीं कन्वर्ट हो जाएगा मन में कहेगा पहले जमाने में कविताओं में और कहानियों में कहा जाता है हमने इसको मन से पति मान लिया तो हमने मन से उसको ईश्वर मान लिया क्या हमारा कर लेंगे आप कोई पगड़ी पहनना जरूरी थोड़ी है सरदार बनने के लिए या ईसाई बनने के लिए कुछ खास कुछ करना है मूछ कटवानी है या कुछ करना है ऐसा तो कुछ नहीं है आप मानिए तो ये क्यों आपने मृत्युदंड की बात कही और खासकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने क्यों कही किसको डराने के लिए क्या वजह है कोई कोर्ट पाने की नहीं मृत्युदंड सब जानते हैं हिंदुस्तान की घटिया से घटिया कोर्ट भी मोस्ट बिगेटेड जज भी नहीं कहेगा कि फला को आपने ईसाई बनाया इस वास्ते आपको इस पादरी को लटका दो क्यों आप ऐसे कानून बना रहे हैं और कह रहे हैं जो आप इंप्लीमेंट नहीं कर पाओगे क्योंकि वो उनकी बुनियाद जो किसी चीज पे नहीं रखी गई है। इलजिटेट है वो। उनकी बुनियाद इलजिटेट है। इलिसिट है। कैसे उसके ऊपर आप बनाओगे? मगर तब भी आप कह रहे हो तो आपके दिल में खोट तो है कहां पे किसको डरा रहे हो? क्यों डरा रहे हो? और अगर कोई डर गया तो फिर कल सारे खत्म हो जाएंगे कन्वर्शनंस। मगर ऐसा तो नहीं हुआ। आप कह रहे हो कि रोज कन्वर्शन हो रहे हैं। तो एक ही अर्थ है कि कोई ईसाई डर नहीं रहा है आपसे। इसका अर्थ तो यही है रोज कन्वर्शन हो रहे हैं कानून आप एक से एक बद से बदतर करते जा रहे हो और तब भी कह रहे हो कन्वर्शन हो रहा है तो बात साफ है कि कोई भी ईसाई आपसे डर नहीं रहा है तो डराया मेजॉरिटी को जा रहा है तो फिर क्या वजह है मेजॉरिटी को आप डरा रहे हो मेजॉरिटी को कह रहे हो कि अलग हो तो कट हो गया जो भी वो कहते हो कंसोलिडेशन अपने वोट बैंक का है वोट हमेशा से कहते हैं वोट बैंक सिर्फ हिंदू वोट बैंक है। बाकी कोई कोई वोट बैंक नहीं। इस कॉन्टेक्स्ट में जब हम इसको देखते हैं और हम यह देखते हैं कि एक तरफ हिंदूइज़्म का एक पर्टिकुलर इंटरप्रिटेशन जिसको आज लोग बोल रहे हैं कि एक पर्टिकुलर जो कास्ट की जो हायरार्की है या जो लोग बोलते हैं कि मनुस्मृति का जो एक पर्टिकुलर इंटरप्रिटेशन है हिंदूइज़्म का उसको आप पॉलिटिसाइज या पॉलिटिकल हिंदूइज़्म में या हिंदुत्व में बदल रहे हैं एज अ पिटिकल स्टेट। तो हिंदूइज़्म में भी अपनी कंपिटिटिव कंपिटिटिव यू नो पैराडाइम्स रहे हैं। जिसने ये बोला कि भ ये रिफॉर्म होना चाहिए या फिर उस टाइम पे इंटरप्रिटेशन गलत था या फिर ओरिजिन में ऋग्वेद में आप जा जब जाएंगे जैसे स्वामी विवेकानंद या दूसरे लोग बोल रहे हैं कि भदांतिक फिलॉसोफी में जाएंगे तो आपको जाति और वर्ण में डिफरेंस एक डिबेट है। अब उसमें नहीं जा रहे हैं कि वो सही है या गलत है। लेकिन उनके विदिन एक डिबेट है कि जिसमें वो अपने यहां पे जो सोशल स्ट्रैटिफिकेशन है उसको या तो चैलेंज करने की कोशिश करते हैं या समझने की कोशिश करते हैं। उसके विदिन एक पर्टिकुलर स्ट्रैंड या उसको अपनी राजनीति के हिसाब से होल्ड करना मांग रहे हैं। समझाना मांगते हैं। समझाना मांग रहे हैं। तो जो अभी का जो हिंदुत्व है या जो हिंदुत्व [गला साफ़ करने की आवाज़] जिसे कह सकते हैं वो एक पर्टिकुलर इंटरप्रिटेशन ऑफ हिंदूइज़्म जिसमें आप कंसोलिडेशन ऑफ पावर आप सिर्फ इसलिए कर पा रहे हो क्योंकि आपने एनिमीज़ कंस्ट्रक्ट किए। क्योंकि विदिन जो आपकी स्ट्रक्चर है हरार्की जिससे आपने 1000 साल 20 हज़ार साल कैपिटल को एक्सट्रैक्ट किया। जैसे कार्ल मार्क्स बोलते हैं रिजर्व आर्मी ऑफ़ लेबर चाहिए आपको कि जिसका जिसको आपको कम सैलरी देनी पड़े जभी तो आपके जो मर्केंटाइल कास्ट्स हैं आप अमीर बन पाओगे। आप अमीर बन पाओगे। क्योंकि अगर आप सबको सेम उसके 8 घंटे का या 10 घंटे का उसका रिटर्न दे रहे हैं तो फिर आप अमीर कैसे बनेंगे? तो वहां पर फिर वो उसको डराना कि भाई अगर आपसे भी बदतर जिंदगी पॉसिबल है और वो यह है तो उसमें एक लॉ है जिसको हम लोग आपसे पहले भी उस पे हमने बाइट्स लिए हैं आर्टिकल 341 हिंदुस्तान में कानून है कि कोई भी अगर हिंदूइज़्म से कन्वर्ट होता है इस्लाम में या फिर ईसाइयत में पहले उसमें बुद्धिज्म और सिखिज्म भी था तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो जो एससी और एससी का स्टेटस स जो अंबेडकर ने नेगोशिएट किया कि एक जो दलित है क्योंकि वो हिस्टोरिकली उसको अप्रेस किया गया है तो अब आपको उसको कंपनसेेट करना पड़ेगा इक्वल ओपोरर्चुनिटी देके और वो इक्वल ओपोरर्चुनिटी आप जब दे सकते हैं जब उसको रिजर्वेशन मिलेगा पॉलिटिकल रिजर्वेशन मिलेगा इकोनमिक रिजर्वेशन मिलेगा एजुकेशनल रिजर्वेशन मिलेगा ताकि वो उस सोशल कैपिटल जो उसके पास एक्सिस्ट नहीं करता है वो उससे कंपनसेेट कर सके और जब इसको यह बोला गया कि भ जब मुसलमान में कन्वर्ट हो गया ईसाई में कन्वर्ट हो गया तो आपने तो बेसिकली एक लिबरेशन का पाथ ले लिया है तो अब आपके साथ वो चैलेंजेस नहीं है। यह अस्यूम किया जाता है। तो आप इस लॉ को किस तरह देखते हैं? अभी रिसेंटली सुप्रीम कोर्ट का आंध्र प्रदेश के जजमेंट में अभी रिसेंटली फैसला आया और उसमें उन्होंने ये मान लिया कि भ अगर आप कन्वर्ट होते हैं तो आपकी जो सोशियोलॉजिकल कंडीशंस हैं मैजिकली चेंज हो गई। इस पूरी डिबेट को आप किस तरह देखते हैं? और अल्टीमेटली हाउ डस इट सर्व दी हिंदुत्व पर्पस? इलाहाबाद कोर्ट का भी जजमेंट है कि आपको फ़ौरन उसी दिन से सारी सहूलियतें हटा देनी चाहिए। दोनों जजमेंट एक ही जजमेंट है एक तरीके से देखा जाए और ओरिजिनल जजमेंट भी एक था। जी मैं कैसे देखता हूं 1950 दोबारा जाना पड़ेगा। काट असेंबली की डिबेट्स मैंने भी पढ़ी है। आपने भी शायद पढ़ी हो। साफ है। ईसाइयों ने नहीं मांगा था। हिंदुओं का ही था कि ईसाई बनने में आपको टू टॉक अबाउट रिलजन इवेंज बहुत जरूरी बात है आपके लिए आपको बताना दूसरे को कि यीशु मसीह के अंदर जीवन है। ये आपका कोर फेथ है। आप इसको कोई कोर फेथ है। आपको सिर्फ कोर फेथ ही नहीं है। हम खुद माने चुप रहें। नहीं हमको जाके चढ़ाई पे जब आपको सच्ची बात पता लग गई तो हम दूसरों को भी बताएंगे। टेस्टिफाई करना पड़ेगा। तो ये आपका कोर फेथ है और ये कॉन्सिट्यूशन ऑफ़ इंडिया ने माना। हम इन पे डिबेट्स हुए और डिबेट्स के बाद ये मानी गई बात टू प्रोफेस प्रैक्टिस प्रोफेस प्रोपगेट योर फेथ। तो जिस कॉन्स्टिट्यूशन में ये लिखा गया जिन लोगों ने लिखा फिर उनप क्या मुसीबत आई कि उनको 341 को अमेंड करना पड़ा। प्रेसिडेंट ऑर्डर 1950 क्यों लाना पड़ा? वही अंबेडकर थे जो दलितों के लिए लड़े थे जिन्होंनेशन ऑफ़ कास्ट लिखी थी। जिन्होंने कहा था कि शायद मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ हूं मगर मरूंगा नहीं। जिन्होंने कहा था कि यहां की जमीन में डिस्क्रिमिनेशन है। तो कास्ट भारतवर्ष की जमीन में है और जमीर में भी है। जमीन में कास्ट है। तो आप अपने आप को कहते हैं कि मैं आज से दलित नहीं हूं। आपका पड़ोसी आपको छोड़ा कह रहा है। उसने जो आपको बचपन से कहा है वो आज भी आपको वैसे ही आइडेंटिफाई कर रहा है। आप अपने आप को कुछ भी कह ले। आप अपने आप को आज बोल रहे हैं मैं राजा हूं। आप राजा थोड़ी हो जाएंगे। वो आपको कह रहा है। आप जुड़े हैं। आप अपनी बेटी की शादी सिर्फ अपनी जाति में ही करा सकते हैं। हम्म। चाहे वो किसी भी धर्म की हो रहे आप [गला साफ़ करने की आवाज़] अपने लोगों के साथ ही रह सकते हैं। ब्राह्मणवाद में नहीं जा सकते आप। आपको जहां दलित रहते हैं वहीं रहना पड़ेगा। तो आपकी दुनिया तो दलित आपकी दुनिया तो दलित ही रही। तो फिर क्या बचा? क्यों आपको फिर अलग किया जा रहा है? आपका संबंधी दलित है, हिंदू है। आपका बहनोई, दलित है, सरदार है। आप खुद ईसाई दलित है। पंजाब के गुरदासपुर की बात कर रहा हूं। तीनों एक ही जगह रहते हैं। तीन लड़कियां हैं। एक ईसाई से ब्याही गई है। एक सिख से और एक हिंदू से। रिलीजियस हार्मोनी भी है और डिसहार्मोनी भी है। दो जवाइयों को नौकरी मिल सकती है। ईसाई को नहीं मिल सकती है। तो जब तक सोसाइटी से आप नहीं कह सकते कि अनटचेबिलिटी नहीं है हमारे देश में। हम आज की तारीख में क्या है? अनटचेबिलिटी है। आप पब्लिकली आप प्रैक्टिस नहीं करेंगे। घर में आप मैथ रानी को नहीं घुसने देंगे। उसको सिर्फ टॉयलेट साफ करेंगे। किचन आप खुद ही साफ करेंगे या किचन साफ करने के लिए आप किसी और को रखेंगे। ये अनटचेबिलिटी होती है। आप आईएएस है मगर आपका पीएन जो अपर कास्ट का है आपको पानी नहीं पिलाएगा। ये हम नहीं कह रहे हैंडी में हो चुका है। ये केस चला [गला साफ़ करने की आवाज़] है। आपका सबोर्डिनेट आपका इज्जत नहीं करेगा क्योंकि आप रिजर्व है। रिजर्व कैटेगरी से आए हैं। कलेक्टर आपको नौकरी तो देगा ही मजबूरी है। मगर नॉन एग्जीक्यूटिव नौकरी देगा जहां पे आप किसी का भला ना कर पाए। आप अगर रिजर्व कैटेगरी के हैं आईएएस तो आप कलेक्टर नहीं बनेंगे। 100 में से एक आदमी कलेक्टर बनेगा। आप एसएसपी नहीं बनेंगे। आपका रैंक होगा मगर आपकी नौकरी होगी हाउसिंग बोर्ड में। आप एग्जीक्यूटिव नहीं बन पाएंगे। आप डीजीपी नहीं बन पाएंगे। एडिशनल डीजीपी बन जाएंगे। इंचार्ज ऑफ़ पुलिस लाइंस। आप आईबी के डायरेक्टर नहीं बन पाएंगे। तो कास्ट आपको चस कर रही है। आपके पीछे पड़े हुए हैं कुत्तों की तरह। और आप कह रहे हैं कि जमीन पे कास्ट नहीं है। ईसाई को व रहना है। मुसलमान को व रहना है। सरदार को व रहना है। उनके प्रिविलेज ले रहे हैं। क्या प्रेशर आया था नेहरू पर? क्या प्रेशर आया था अंबेडकर को के ये कैबिनेट नोट तैयार करना पड़ा। प्रेसिडेंशियल ऑर्डर का प्रेशर ये आया था कि उन प्रकाश ने कांग्रेस के प्रकाश ने जिन्होंने एक तरीके से हिंदू कोविड मान लिया था। अपनी मर्जी के खिलाफ उन्होंने कहा कि इसको आप नहीं कर सकते। आपने कॉन्सिट्यूशन में दे दिया आपको कॉन्सिट्यूशन बदलनी पड़ेगी। सो वन ऑफ़ द फर्स्ट कॉन्सिट्यूशन अमेंडमेंट्स तकरीबन पहला ही मेजर कॉन्सिट्यूशन अमेंडमेंट था प्रेसिडेंशियल ऑर्डर ऑफ़ 1950 जिसके मातहत दलित प्रिविलेजेस सिर्फ हिंदुओं को दी जाएंगी। इन अनदर जिसको मैं कहता हूं इट वास आल्सो द फर्स्ट एंड द लार्जेस्ट एंटी कन्वर्शन लॉ 15% हिंदुओं को आपने कह दिया आपके पास धार्मिक स्वाधीनता नहीं है आप हिंदू में रहेंगे यही मरेंगे यही आपको नौकरी दी जाएगी आप और कुछ नहीं बन सकते आपकी नौकरी जाएगी आपकी जमानत जाएगी एक तरीके से कह सकते तो एक तरफ जो आपको रिजर्वेशन दिया अगर विद इन हिंदू रहते हुए भी तो उसमें भी आप कहां रीच कर सकते हैं वो भी आपकी कास्ट डिसाइड करेगी जैसा आपने बोला और अगर आप बाहर जाने की कोशिश करते हैं तो जो प्रिविलेज हम तुम्हें दे भी रहे हैं वो प्रिविलेज भी हम तुमसे छीन लेंगे फौरन तो आपका एक तरीके का वो सोच घेराबंदी हो गई घेराबंदी हो गई दरवाजे बंद कर दिए गए ऑल द स्टेबल डोर्स वर लॉक्ड उस तरह से तो हिंदुत्व के लिए जितने भी लॉज़ हैं उनको सामने रख दें और इस एक लॉ को सामने रख दें ये दे विल नेवर लेट इट क्यों करेगा? उसके सारे घोड़े भाग जाएंगे। देव लॉक द स्टेबल डर्स। हालांकि हम लोग खुद हर रोज कहते हैं कि दलितों को सुविधा दो। उनकी शेड्यूल ट्राइब और शेड्यूल कास्ट स्टेटस स्टोर करो। मगर शायद हम अपने मन में जानते हैं कि शायद ये ना हो कभी। क्योंकि हिंदू धर्म टूट जाएगा। मेरा ख्याल है। हमने एंटी कन्वर्शन लॉस डायरेक्टली देखे। फिर हमने [गला साफ़ करने की आवाज़] देखा कि जो आर्टिकल 341 है वो भी आपका आर्गुममेंट है लार्जली एंटी कन्वर्शन लॉ है एक तरीके से सिर्फ एंटी कन्वर्जन लॉ और क्या है और क्या है और इसी तरह उसके जो प्यूरिटिव पार्ट्स हैं वो किसी मृत्युदंड से कम नहीं है हम आप उसको एक सोशल सिचुएशन में रखना मांगते हैं उसकी टोटल पंख काट दिया आपने हम तो एट द एंड ऑफ द डे क्रिश्चियनिटी इस्लाम को एक तरीके के बाउंड्स पिंजरे में बंद पिंजरे में बंद कर रहा है उसी इसी का एक इकोनमिक पर्सपेक्टिव भी है जो थोड़ी देर पहले आप बता रहे थे एक पॉजिटिव लाइन से कि भ एफसीआरए का जो पैसा आता है वो अच्छे कामों में इस्तेमाल होता है और वो ऐसी जगहों पे इस्तेमाल होता है जहां पे ईसाई हैं होते भी नहीं है बहुत जगहों पे स्कूलों में दूसरी जगहों पे तो ये जो एफसीआरए का जो क्रैकडाउन है और एफसीआरए से सिर्फ इनको नहीं आ रहा है ईसाइयों को नहीं आ रहा है या फिर ये जो लार्ज एनजीओस जो हिंदुओं के हैं वो भी लार्जली आज की डेट में जो अमेरिका से दूसरी जगहों से जो भेजा जा रहा है वो तो अभी पूरी कैरवान की रिपोर्ट थी कि जो नेटवर्क पूरा जो हिंदुत्व का जो इकोसिस्टम है नॉन बैंकिंग सोर्सेस है वो तो अलग है वो अलग तो एफसीआरए का जो क्रैकडाउन है वो अल्टीमेटली क्रिश्चियन इंस्टीटश के पर्सेक्टिव से अगर देखा जाए व्हाट इज इट दैट दे आर डूइंग नहीं देखिए आपने खुद भी कहा और मैंने भी कहा कि एफसीआई का पैसा कहां खर्च हो रहा है इंडियन इकॉनमी में भी जा रहा है ना हम किसी भी क्रिश्चियन स्कूल में 80% टीचर्स हिंदू होते हैं। बच्चे नहीं ज्यादातर नहीं बच्चों की बात अलग है। बच्चों से तो पैसा आ रहा है। खर्च खर्च की बात 80% टीशर्स हम हिंदू होते हैं। तकरीबन 90% स्टाफ हिंदू होता है। हम कहां से आएगा स्टाफ? लोकल आएगा। एक्सटर्नल जो खर्चा है ओवरहेड्स, लिपाई, पुताई, गार्डनिंग, पानी, बिजली सरकार के खाते में जाता है। कोई भी एफसीआर का पैसा अगर आता है इंस्टिट्यूशन के लिए तो 99% कॉमन इकॉनमी में चला जाता है और उसके जो इंटरमीडिएट बेनिफिशरी होते हैं हिंदू होते हैं ओवर देश बेनिफिट करता है और जो पर्स बेनिफिट करते हैं ज्यादातर हिंदू होते हैं पांच कैथोलिक न्स एक स्कूल चलाती है पांच एक प्रिंसिपल एक मैनेजर एक इंग्लिश टीचर एक बहुजन लोग बाकी सारे हिंदू है तकरीबन जहां पर हिंदू है मुंबई में दिल्ली में शायद थोड़ा थोड़ा ज्यादा हूं पर बाकी जगह तो नहीं है तो क्या होता है उसमें और कई जगह तो कलेक्टर की भी नहीं रही भी काम करती है अच्छा कई जगह मैंने देखा है और क्यों ना करें इंग्लिश पढ़ाती है पढ़ी लिखी लड़की है हम तीन साल उसकी पोस्टिंग रहेगी तीन साल पढ़ाएगी उस बाद में उसके बच्चे भी वहां पे मुफ्त में पढ़ लेते हैं हम तो दोनों फायदा हो जाता है तो एफसीआरए देश के लिए अच्छा है गरीब देश है हमारा हमको को बैंकिंग सोर्सेस से जो पैसा आ रहा है, इसका लेजिटमेट यूज़ हो रहा है, उन जगह पर जहां पर स्टेट नहीं खर्च कर पा रहा है, राजनीति की वजह से, पैसे की कमी की वजह से या कोई और वजह से वहां पर अगर कुछ हो रहा है तो क्या उसमें से अगर आप कह रहे हैं कन्वर्शन के लिए खर्च हो रहा है तो आप पकड़िए। आपके कानून है आपके ऑडिट सिस्टम है कोई पकड़ा जाता कैंसिल कर दिया आपने इतने कैंसिल कर दिए 20000 कैंसिल कर दिए और सारे ईसाई नहीं थे उतश में जा रहा था हर स्कूल में भी पैसा नहीं जाता ऐसी बात भी नहीं है तो मेन चीज है के आप सोच रहे हैं कि ऐसा करने से ईसाइयत को स्टारफ कर देंगे रिसोर्सेज से रिसोर्सेज से स्टाफ कर एज अ कम्युनिटी डायो आउट हो जाएगी जो है कम्युनिटी तो डाउट क्या होगी कम्युनिटी हिंदू बन जाएगी हम धर्म डाउट करने की आप कोशिश कर रहे हैं कम्युनिटी को आप डाउट करेंगे आप हिंदुस्तानियों को मारेंगे बड़ी खराब बात होगी ईसाई आखिरकार हिंदुस्तानी तो है ना और अगर आज मैं हिंदू बन जाऊं तो हम तो आप मेरे को तो भूखा नहीं मार रहे हो आपकी जो इच्छा है कि जो आपके ग्रंथों में लिखा है, सावरकर के ग्रंथों में लिखा है। इस देश से ईसाइयों को भगाना है और अगर रहेंगे तो उनको सेकंड कास्ट सिस्टम के रहना है। तो आप भारतवर्ष से ईसाइयत खत्म करने के लिए बात कर रहे हैं। जो कि पैसे की मोहताज नहीं है। पैसे की मोहताज नहीं है। एफसीआर आने से पहले भी जिंदा थी। एफसीआरए इंदिरा गांधी की लाइफ थी। और मैं कहता था कि एफसीआर सिम में पैदा हुआ है। गुनाह के अंधेरे में पैदा हुआ है। क्योंकि इसको लाई थी वो अपने राजनीतिक ओपोनेंट्स की तरह। तो आज आप हमको अपना राजनीतिक ओपोनेंट समझ रहे हो। मेरा मोदी से सवाल सादा है। इंदिरा गांधी लाई थी अपने राजनीतिक ओपोनेंट्स को कंट्रोल करने के लिए। आप मेरे को मेरे धर्म को मेरे लोगों को अपना राजनीतिक ऑपोनेंट समझ रहे हो कि हम आपको उखाड़ मांगते हैं। ये आपका चार्ज है। आप हमको कह रहे हो कि हम एंटी नेशनल है। हम बहुत बड़ा हम आप राजद्रोह का आप चार्ज लगा रहे और हालांकि थोड़ी देर पहले आपने खुद बोला कि जो हिंदू एज अ सिविलाइजेशन का जो क्लेम रहा है कि हम एक्सक्लूजनरी रहे हैं एक तरीके से फ्रॉम द टेरिटोरियल पर्सपेक्टिव या फिर हमारा कभी भी एक्सपेंशनिज्म हमारा वो नहीं रहा। लेकिन आज की डेट में मैं ये भी सच नहीं है। हां नहीं बिल्कुल वही मैं शास्त्रों में भी नहीं लिखा। आपका एक शब्द है छत्रपति चक्रधारी छत्रपति कहां से किसके ऊपर राज करेंगे तब आप छत्रपति बनेंगे। हम घोड़ा छोड़ा गया था अश्वमेद के अश्वमेद और इवन पुरुषमेध अश्वमेद के अलावा तो उसमें भी जो अब जैसे मैं सुनता हूं बहुत सारे ऐसे प्लेटफॉर्म्स हैं जो हिंदू राइट मीडिया प्लेटफॉर्म्स [गला साफ़ करने की आवाज़] हैं उसमें कुछ लोग सुनते रहते हैं कभी-कभी तो पिछले दिनों मैंने सुना कि हम अब्द हिंदूइज़्म को अब ये अपने ऊपर जिम्मेदारी लेनी होगी कि 10 साल में 10 करोड़ मुसलमानों की घर वापसी करना हमारी जिम्मेदारी है। और दूसरा अभी मोहन भागवत साहब का जो बयान था कि हिंदूइज़्म को आज की डेट में दुनिया के सामने कि कैसे हिंदू वे ऑफ लाइफ एक बेहतर वे ऑफ़ लाइफ है। हमें लोगों के सामने पेश करना होगा। ये दावत का ही तो पैराडाइम है। ये इनविटेशन ही तो एक तरीके का मिशनरी आपने अब पूरे स्टेट को मिशनरी बना दिया। योगा ये सारी चीज़ है। तो आप किस चीज की बात कर रहे हैं? कई साल पहले मैं अमेरिका में बोला ऑल पार्लियामेंट ऑफ रिलिजंस में। जी उसी जगह जहां पर स्वामी विवेकानंद ने 1880 में [नाक से की जाने वाली आवाज़] और मेरा भी स्पीच सेशन का आखरी स्पीच था मेडिटेरी था हम तो मैंने यही बोला था कि आपको विवेक ने एक हिंदुस्तान दिखाया था मैं आपको दूसरा हिंदुस्तान दिखाता हूं उसी हिंदुस्तान का दूसरा भाग दलित ट्राइबल आदिवासी अल्पसंख्यक करीब आधा घंटा मैंने उनको दिखाया हिंदुस्तान वो भी हिंदुस्तान मैंने स्वामी जी का नाम यू लिया क्योंकि वो मिशनरी थे हम और वो पहले मिशनरी नहीं थे उनके पहले मिशनरी हुए हिंदुस्तान में आप कह सकते हो कि मिशनरी केरला से पैदा हुए और नौवीं सदी में ऊपर आए शराचार्य वही मिशनरी बिल्कुल वो पूरा चार धाम मठ आपने जो ऊपर नीचे जाके बनाया मिशनरी हिंदू धर्म अपने आप को मिशनरी ना कहे तो मेरे को बुरा लगेगा मिशनरी अपना कोई बुरी बात नहीं है ना उनको मिशनरी होना चाहिए एक मिशन होना चाहिए लोगों को अच्छाई बताने का बुद्धा तो मिशनरी सबसे बड़े और उन्होंने मिशनरीज पूरी दुनिया में भेजे आज सारा बुद्धिज्म सब जगह है इंसान को छोड़ के हम तो मिशनरी होना कोई बुरी बात नहीं है मगर शायद इसलिए जो बुद्धिज्म आपका आप आज तलवार के जोर पर मिशन चला रहे हो। हम आप इमरियलिज्म की हद कर रहे हो। आप एंपायर बना रहे हो और आप कत्ल कर रहे हो लोगों का धर्म के नाम पर। मैंने लिंचिंग की बहुत विधवाओं से जाके मिला। बहुत 100 आंखों में आप देख बहुत इंसानों से मिला हूं जिनका बेटा लिंच हो गया हो जिनका भाई लिंच हो गया हो एक भाई लिंच हो गया तो दूसरी जेल भेज के दौतिया में तो जो वेपनाइजिंग से खून बहा है मैं मैंने देखा है और ये आपके मिशन का हक है आपके मिशन में खून बह रहा है तो आपने जो बाकी लोगों से कहा कि आपके लोगों ने खून मारा था। तलवार के चौर पे आए थे। आप भी तलवार के चौर पे आ रहे हो। तलवार का नाम बदल गया है। हम आप खून फैला रहे हो और अपने जुबान से कत्ल कर रहे हो। वो बोलते हैं कि मंदिर तोड़ के मस्जिद बनाई गई। आज की डेट में जो आप मस्जिदें और चर्च तोड़ रहे हैं लॉ और उसके नाम पे तो वो आज की डेट में ये तो बिल्डिंग्स हैं। ऊंचा आएगा तो मस्जिद भी गिरेगी, मंदिर भी गिरेगा, चर्च भी गिरेगा। आपकी जुबान से जो कत्ल हो रहे हैं इनोसेंट बच्चे लोग महिलाएं प्रेग्नेंट वमेन उसका क्या होगा उनको कौन रिकंस्ट्रक्ट करेगा कौन मुआवजा देता है मुआवजा जिंदा लोगों को दिया जाता है कि आपका रिश्तेदार मर गया आप पैसे ले लो लाश तो कोई नहीं है ना उस मुआवजे से आप मुआवजा ना भी तो क्या तो ये जो मोहन भागवत अपने आपको और राम अपने आप को बहुत बड़ा फिलॉसफर समझते हैं। ये बहुत आदमी बात करते हैं। राम माधव की बात कर बहुत आदमी बात करते हैं। बहुत छोटी बात करते हैं। और अल्टीमेटली ये अकलमंद हिंदू लोगों की अकल का तोमा देते हैं। इंसल्ट करते हैं। मोहन भागवत की बातों से बड़ा सतही मामले पर वो बात करते हैं। बहुत ही सतही मामलों पे और बहुत ही खास किस्म का बेवकूफ ईसाई और मुसलमान होगा जो उनकी बातों पे यकीन कर ले। जब वह बोलते हैं तो उनकी आंखों में कोई प्यार नहीं होता है। कोई ऑनेस्टी नहीं होती, कोई इंटेग्रिटी नहीं होती है। उनकी आंखों में जो दिखता है सबों को दिखता है और जो उनकी जुबान पे बोला जा रहा है। उसमें और उनकी आंख में बहुत फर्क हो जाता है। उसको समझना बहुत जरूरी है। मेरा ख्याल है सारे ही लोग समझते हैं इस बात को। उनकी बात को कोई विश्वास नहीं करता। अभी तक जो हमने बातें की हैं वो इंडिविजुअल लेवल पर मान लीजिए क्रिश्चियनिटी की बात हुई या फिर कम्युनिटी ऑर्गेनाइज कर रही है सेल्फ ऑर्गेनाइज कर रही है उसके लेवल पर हुई स्टेट के लेवल पर जो ऑपरेशन मणिपुर में देखा गया उसमें जो एथेनिक कॉन्फ्लिक्ट हुआ बिटवीन मेथी एंड कोकीज़ बट ये भी है कि कोकीज़ जो ट्राइबल्स हैं वो ज्यादातर ईसाई हैं। तो इसका एक इंटरप्रिटेशन आपने भी किया है। एक तो वह इंटरप्रिटेशन है कि भाई दो ट्राइब्स हैं, दो एथनिसिटीज हैं। उनके बीच का एक कॉन्फ्लिक्ट है जो एक स्टेट लेवल पे मणिपुर के लेवल पे हो रहा है। लेकिन उसकी एक वो कोरिलेशन भी है जो रिलीजन से जुड़ा हुआ है। वो कितना है? क्या है आपके हिसाब से? बहुत था। हम क्योंकि मैथी में शायद 5% ईसाई नहीं थे। हम कुकी 100% ईसाई थे। तो एक कुकी मरा तो एक ट्राइबल मरा मगर एक ईसाई भी मरा। एक मैथ मरा तो हिंदू में भी मरा। तो धर्म तो था बीच में। बहुत बड़ी तादाद में था। मगर लड़ाई [गला साफ़ करने की आवाज़] जमीन की थी। को जमीन के ऊपर कब्जा करना मांगते हैं। शेड्यूल ट्राइब स्टेटस ले उनकी जमीन पर कब्जा करना मांगते हैं। मगर क्योंकि धर्म की बात आ गई थी और आज तक आ गया है। अब उसको पढ़ाया जा रहा है नागास को लेके नागा कुकी विवाद पैदा कर दिया है। क्योंकि नागा भी ईसाई है और कुकी भी ईसाई है। हम तो ईसाइयों को आपस में लड़ा के आपने जो पहले ईसाइयों को मारा था। कैसे लड़ाया आपस में? क्या वजह बनी? आपस में लड़ाई कंपटीशन [गला साफ़ करने की आवाज़] है। ट्राइबल जमीन के ऊपर लड़ा दिया हम और दोनों तरफ से कोई छह-छह लोग मरवा दिए और छह-छह लोग मरवा दिए और दोनों कौमों ने फिर एक दूसरे के ऊपर एक तरीके से वॉर छेड़ दी। हम तब वहां पर लड़ाई ट्रायंगुलर हो गई है। हम कुकी वर्सेस नागा। कोकी वर्सेस मैथ नागा वर्सेस कुकी और नागा व मेथी तो नागा व मेथी अभी कम है मगर हो जाएगी क्योंकि जो भारत सरकार है इसी के कारिंदे जो इस एरिया [गला साफ़ करने की आवाज़] में ड्रग ट्रेड है हम इसी के कारणों के कंट्रोल में है वो हम और वो कंट्रोल अपने से हटने नहीं देना वहां पे और उस कंट्रोल में नागा महती को की पीस नुकसानदायक हो सकती है क्योंकि इसमें बात बड़ी अजीब है कि जो मुख्यमंत्री थे बिरन वही जो मेन मुंडा पार्टी थी जो कत्ल करी थी उसके पेट थे और इनहीं के लोग ड्रग ट्रेड के इंचार्ज [गला साफ़ करने की आवाज़] है तो वहां की ड्रग ट्रेड को अपने कंट्रोल में रखने के बहुत जरूरी है कि वहां पे किस्म का कंट्रोलोल्ड अपीव रहे। कंट्रोल अपीव रहे। उसके बहुत अपवाद है। बहुत किस्म के कंट्राडिक्शन है। म्यांमार में बर्मा में भारत सरकार को भी सपोर्ट देती है। जो हुता सरकार है वहां की जनता जिसको आ जाता है फौजी सरकार उसको भी मदद देती है और उसके खिलाफ जो एक कुकी ग्रुप लड़ रहा है उसको भी मदद देती है। तो ये कॉम्प्लेक्स सिचुएशन में एक हल्का वायलेंस रहे। यह भारत सरकार और ड्रग के हक में जाता है। तो इसमें जो रिलीजियस आइडेंटिटी है वो इंसिडेंटल है रादर देन शुरू में थी बहुत जोर से क्योंकि सारे को साइड पे हम नागास के आने से वो थोड़ा डाइलट हो जाता है। हम क्योंकि दोनों ग्रुप्स आपस में एक ही रिलजन के लड़ रहे हैं। अच्छा ये तो हमने देखा कि ओवरऑल जो स्टेट की मशीनरी है या फिर क्रिश्चियन एज अ माइनॉरिटी किन-किन चीजों से जूझ रहा है। लेकिन उसके अलावा जैसे आप मुस्लिम्स में भी देखेंगे स्पेशली पोस्ट 2014 बहुत चीजें वाज़ हो गई है। उससे पहले भी 2002 के गुजरात दंगों के बाद ये ग्रुप बना था। वजूद में आया था मुस्लिम राष्ट्रीय मंच। तो एक तरीके से जो आरएसएस है या जो उसकी आईडियोलॉजी है वो सिर्फ इन्वेस्ट इस पे नहीं कर रही है कि वो कैसे सोच रहे हैं मेजॉरिटी कैसे सोच रही है वो इन्वेस्ट इस पे भी कर रही है कि भ ट्राइबल्स कैसे सोच रहे हैं दलित कैसे सोच रहे हैं ईसाई कैसे सोच रहे हैं मुसलमान कैसे सोच रहे हैं और उसका रिजल्ट हमें दिखता है कि जब 2014 में सरकार आ रही है 10 साल बाद जो इंस्टीट्यूशनल कैप्चर इंस्टीटशंस को कैप्चर करने के लिए जो लोगों की जरूरत है जामिया में भी आपके वीसी हैं आप वहां पे भी जिन लोगों को इंस्टॉल करते हैं एएमयू में भी वो बजाहिर सब मुसलमान नाम के लोग हैं। लेकिन एट द एंड ऑफ द डे एक स्ट्रेटिफिकेशन है कि आप कम्युनिटी को किस तरह से कंफ्यूज्ड स्टेट में रखें। जब इसको हम क्रिश्चियंस के केस में देखने की कोशिश करते हैं तो जो केरला में क्योंकि जो क्रिश्चियंस हैं वो पावर में है उस उसका हिस्सा है बनिस्बत इसके जो नॉर्थ में जो ईसाई है या जो इस बेल्ट में है नॉर्थ ईस्ट की बेल्ट में है जो हमने डिस्कशन किया तो क्या डिफरेंस है कि एक तरफ केरला का जो ईसाई है वो तिरसूर में एक लोकसभा की सीट फर्स्ट एवर क्रिश्चियन सपोर्ट से हिंदुत्व का आदमी जीतता है। हम लोग आरएसएस भाजपा के हाथों में खेल गए वहां पर। हम और इसका कुछ खामियाजा और कुछ रीज़ंस वाकई इस्लामोफोबिया का भी है। हम क्योंकि केरला के बड़े चर्चेस में कई लोग बड़े इस्लामोफोबिक के है क्योंकि वहां के राजनीति में मुसलमान और ईसाई कंपटीशन में है। हम इकोनमिक कॉमटीशन नौकरियों के कॉमटीशन स्कॉलरशिप के कॉमटीशन और ईसाई समझते हैं कि सरकार ही हम खासकर मार्क्स सरकार 10 साल में मुसलमानों के साथ थी हम और जिससे ईसाइयों को नुकसान हुआ हो हम एक ये वजह थी तो पर्सनल लेवल पर कुछ केसेस हो चुके थे जहां पे ईसाई लड़कियों ने मुसलमानों से शादी की ईसाई लड़कियों ने हिंदुओं से शादी की उनका बहाना मिल किया हम तो और सीपीएम से कुछ तक कहते थे वो हार गए बाद में तो तो उस सबके होते हुए एक सीट निकल गई मगर इस बार इलेक्शन में नहीं नहीं हो पाया फिर वो मगर उस खेल में भाजपा एक बात समझती है शायद कि वो बिशप्स को खरीद सकती है मोदी बुला लेता है उनको फोटो खींच विश्वा रहता है। उसमें कुछ आ जाते हैं। प्यार से आ जाते हैं। कुछ धमकी से आ जाते हैं। कुछ ईडी से आ जाते हैं। मगर कम्युनिटी ना तो फिलॉसफी फलसफा ना रिलजन और ना राजनीति में ईसाई बिशप्स के हाथ में है। नहीं है तीनों में। तो यहां पर मोदी की बहुत बड़ी भूल है कि वो चार बिशप के साथ फोटो खिंचवा के या पांच बिशप को धमकी देके कम्युनिटी को कंट्रोल कर लेगी। ये उसकी बहुत बड़ी भूल है क्योंकि बिप्स को हमारा साफ कहना कहना होता है कि आप जो चर्च में बोल रहे हैं सिखा रहे हैं वो आपका काम है। जो स्कूल में सिखा रहे हैं वो आपका काम है। राजनीति में आपका दखल काम नहीं है। तो राजनीति में बहुत कम ईसाई होंगे जो बहुत कम क्या कोई भी ईसाई नहीं होगा जो बिशप से वोट देता हो जिसकी आपने बात की वहां पे लोगों में इस्लामोफोबिया था तो वहां पे बिशप उस इस्लामोफोबिया में आगे उसने बढ़ा दिया मगर ओवरऑल उसके आगे बात बढ़ नहीं पाई तो ये भाजपा का और आपने कहा मंच ईसाई मंच भी है। एक वही आदमी इंद्रेश चला रहा है। अच्छा थोड़ा बताइए उसके बारे में। ये तो मैं पहली बार सुना। इंद्रेश जी ने राष्ट्रीय मुस्लिम मंच बनाया। हम उन्होंने राष्ट्रीय ईसाई मंच भी बनाया हुआ है। हम बड़े जोर शोर से साल में एक दो महफिलें करते हैं। मगर कोई सुन नहीं रहा है। कोई आ नहीं रहा है वहां। दो चार लोगों को मोदी के साथ फोटो खिंचवा देते हैं। कुछ लोगों को तंखाबंदी होगी। मगर कोई उनके नाम पर कोई थूक नहीं रहा है। आप कह सकते हैं कुछ नहीं है उनका क्योंकि और कुछ ना हो पिछले कुछ दिनों में आरएसएस की असलियत लोगों ने समझ ली है मेरा ख्याल है। हम या ऐसी मेरी उम्मीद है आप कह सकते हो या कि लोगों ने समझ ली होगी क्योंकि इनकी दाल इसमें गल नहीं रही है। बिल्कुल नहीं गल रही है। तो जो एक अह सवाल उठता है कि एक तरफ़ लंच डिप्लोमेसी है, दूसरी तरफ़ अह इंगेजमेंट है। डिफरेंटली आरएसएस बहुत अलग-अलग स्ट्रैटिफाइड लेयर्स में काम कर रही है। वो कम्युनिटीज़ पे भी काम कर रही है। बहुत सारी ऐसी चीजें हैं। तो लेकिन जब हम मुस्लिम कम्युनिटी को भी देखते हैं। एक सिविल सोसाइटी में कुछ लोग हैं वो चीजें करते हैं। कुछ प्रोग्राम्स होते हैं। बट वो लार्जर कम्युनिटी का जो मोबिलाइजेशन हो सकता है राइट्स के लिए जो जमीन पर जाके जो चीजें हो सकती हैं या ऐसा जो इंटरेक्शन है कि जो लीडरशिप है किसी कम्युनिटी की वो उसके लोगों से जुड़ी है या नहीं? तो ये सवाल क्रिश्चियंस के केस में भी मेरे ज़हन में आता है कि क्या जो ईसाइयों की जो लीडरशिप है हिंदुस्तान में क्या उसकी कोई मैच्योर एक सिविल सोसाइटी के विद इन उसका अप्रोच है लार्जली स्पीकिंग। मैं एक्सेप्शनंस की नहीं बात कर रहा हूं। बहुत सारी चीज़ क्या कोई एक अंडरस्टैंडिंग है इस वक्त जो हिंदुस्तान में हो रहा है? क्या चीजें हो रही हैं? क्यों हो रही हैं? इसको कैसे एड्रेस किया जा सकता है? उसमें किस तरह से जब एक तरफ दूसरी माइनॉरिटीज हैं जैसे सिख्स हैं, मुसलमान हैं। उनके बीच के आप डिस्कोर्सेस कैसे बनाएंगे? क्या आपकी अलायंसेस होंगी? कौन से ऐसे कानून है जो आज इनके लिए आ रहे हैं? कल हमारे ऊपर भी आ सकते हैं। जैसे वफ का कानून है। इस तरह की क्या डिबेट्स डिस्कशन विद इन क्रिश्चियन कम्युनिटी हो रही है क्या? या फिर जो स्टेट ने अपने कोजन मैकेनिज्म से जैसे मुसलमानों में बहुत सारे लोगों को चुप कर दिया है। क्या एक्टिविज्म विद इन क्रिश्चियनिटी या क्रिश्चियन कम्युनिटी अपने लो पे है। ट्राइबल इंडिया जिसमें नॉर्थ ईस्ट भी आता है और केरल को छोड़कर कोई डिस्कोर्स चल नहीं रहा है। फायर फाइटिंग चल रही है। छत्तीसगढ़ में, झारखंड में हम मध्य प्रदेश में ओसा में हम ह्यूमन राइट्स को लेके फायर फाइटिंग चल रही है। हम वहां पे जिंदगी और मौत का सवाल है। हम फायर फाइटिंग तकरीबन ऑल इंडिया बेसिस पे चल रही है। हम केरल में कम तमिलनाडु में शायद थोड़ी कम नागालैंड में शायद थोड़ी कम बाकी जगह जहां इंसिडेंट्स हो रहे हैं फायर फाइटिंग जमी है। किसी को होश नहीं है, टाइम नहीं है, लार्जर में कोई बात करे, कोई जिक्र करे, कोई डिस्कोर्स बना है। चर्च में पादरी या फादर या पास्टर अंदर बैठा हुआ चुप है। सिविल सोसाइटी से कोई राब्ता नहीं है। एक्टिविस्ट है, फायर फाइटिंग में लगे हुए हैं। आपस में कोई राब्ता नहीं है। डिनमिनेशनल डिवाइड्स हैं। सीएनआई और सीएसआई के बीच में कोई राब्ता नहीं है। कैथलिक्स और प्रोटेस्ट के बीच में कोई राब्ता नहीं है। सत तौर पर है। बिशप्स इकट्ठे हो जाते हैं एक रैली के लिए। मगर जमीनी तौर पर इकट्ठे होके कोई बात की जाए ऐसा है नहीं कुछ। पिटिकल लीडरशिप इवॉल्व हो रही है सिर्फ ट्राइबल एरिया में। बाकी जगह पिटिकल लीडरशिप का सिर्फ इतना ही विसिबिलिटी है कि किस करंट पिटिकल लीडर के साथ कौन सा ईसाई लड़का या लड़की है। किसी अमीर बाप का बच्चा हो सकता है। कोई स्टूडेंट लीडर हो सकता है या किसी रिश्तेदार का दोस्त हो सकता है। जो मंत्री से मिला हो उसके साथ उभता हो। इवॉल्विंग लीडरशिप कम्युनिटी में है नहीं। पंजाब में दलितों में कुछ है मगर जितने लोग हैं उनको नीचे खींचने वाले उतने ही लोग हैं। तो टुडे अंग्रेजी में कह सकते हैं द क्रिश्चियन कम्युनिटी इज ब्रेवफ ऑफ अ जेन्युइन पॉलिटिकल लीडरशिप। कोई रियल ऑर्गेनिक लीडरशिप है नहीं। नई राइजिंग भी कोई आपको नहीं दिखती कि कुछ मूवमेंट्स या वगैरह। बहुत कम लोग हैं यूनिवर्सिटीज में हर ग्रुप में ईसाई है मगर आपस में कोई राब्ता नहीं है कोई ईसाई थॉट्स नहीं है उनमें अभी और शायद जरूरत भी नहीं है आज की तारीख में अगर हम बाकी लोगों को एमावर कर सके तो अच्छा रहेगा काफी रहेगा क्योंकि आपने पब्लिक डिस्कोर्स की बात करी और पब्लिक डिस्कोर्स जो होता है वो किसी वोकैबलरी पे बेस्ड होता है कहीं ना कहीं जो आरएसएस है उसने जिस तरह की पॉलिटिकल इंजीनियरिंग की है उसमें आपस में ही जो माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ हैं या विद इन माइनॉरिटी कम्युनिटीज़ भी जो डिफरेंट ग्रुप्स हैं वो उनको लड़ा देता है। मुसलमानों में भी आपस में कुछ हो सकती है विद इन क्रिश्चियंस भी या मुस्लिम्स क्रिश्चियंस के बीच में फॉर एग्जांपल जो इशू आज की डेट में मुस्लिम ओनली इशू लगेगा वो उसको इस तरह से पेश किया जाएगा जैसे सिर्फ मुस्लिम जैसे वक्फ के बाद अब नेक्स्ट ये है कि भ जो प्रॉपर्टीज क्रिश्चियंस की हैं। तो ऐसा क्यों हो रहा है कि जो ये माइनॉरिटीज हैं उसमें मैं इसमें मेरा ये कोई बिल्कुल नहीं है कि भ उसमें क्रिश्चियंस रिस्पांसिबल है मुस्लिम्स रिस्पांसिबल है। मैं ये देखता हूं मुसलमानों में भी कोई वोकैबलरी नहीं है कि जो यूनिवर्सल वोकैबलरी हो जिसमें आप ह्यूमन राइट्स एंगेजमेंट को कर सकें। तो क्या ये जो पब्लिक डिस्कोर्स है वो वोकैबलरी ना होने की वजह से है? एक सवाल जैसे मेरे ज़हन में आता है क्या जो लेफ्ट लिबरल और अंबेडकराइट जो डिस्कोर्स है वो जो खुद की जो इंडीजीनस आईडियोलॉजी जो होती है वो उसको अगर सिंथेसाइज ना कर पाए प्रॉपर्ली अपने लिव्ड एक्सपीरियंस में तो क्या वो उतना सक्सेसफुल हो पा रहा है? देखिए मैं इनके खिलाफ कुछ बोलूंगा नहीं और मैं अपने आप को वामपंथी मानता हूं। हम मगर दलित डिस्कोर्स जो है वो अपना डलशन से बहुत बचता है। किसी और को इंक्लूड नहीं करना मानता। हम तो किसी और के सपोर्ट में आना उसको बड़ा मुश्किल हो जाता है। तो दलित बहुजन कह तो देते हैं मगर उन बहुजनों में ईसाइयों का जिक्र नहीं होता। वो सेम मुस्लिम्स में भी होता है। लेकिन क्यों? मतलब आपको क्या लगता है कि क्या ऐसी एंजाइटटी है मैकेनिज्म है जो ये रियलिटी प्रोड्यूस करती है इतना कमजोर है दलित वर्ग खुद हम के उनको दिखता नहीं कि उनके पास कोई स्पेश शक्ति है एनर्जी है जो दूसरों पे खर्च कर पाए हम पहली बात दूसरी बात उनके पास उतनी ऊर्जा भी नहीं है कि शेयर कर पाए हम तीसरी बात उनको शक है कि अगर हमारे भीतर लोग बाहर के आए तो हम जो अभी 70 साल अंबेडकर की वजह से ले पाए हैं वो भी खो बैठेंगे तो उनका डर कुछ हद तक वाजिब है। इस वजह से वो सिविल सोसाइटी में हमारा जिक्र नहीं कर पा रहे हैं। सिविल सोसाइटी खुद इतनी कमजोर है लचर गई है। हमारा जिक्र नहीं कर पा रही है। पार्लियामेंट में बहुत मुश्किल होती है हमको एक सवाल उठवाने में। हम पार्लियामेंट में बहुत कम लोग हैं हमारे। मंत्री तो कोई है ही नहीं। कितना बड़ी बात है कि राज्य का कोई मंत्री नहीं है और बहुत सालों से नहीं है एक तरीके से देखा जाए तो कैबिनेट मिनिस्टर तो पिटिकल आवाज हमारी है नहीं जिन स्टेट्स में है बड़ी लिमिटेड आवाज है अपनी स्टेट के बाहर वो आवाज उठा नहीं सकते कुछ कॉन्सिट्यूशन बदल के है केरला खुद कानून डाल नहीं सकता लाएगा नहीं एंटी कन्वर्शन लॉ मगर यूपी के बारे में कैसे बोलेगा कि आप एंड लॉ है? फेडरलिज्म में प्रॉब्लम आएगा। एजेंसी है वो स्टेट की। हां। मगर दलितों के लिए बोल सकता था बोला नहीं। हम ये मजबूरियां है। कुछ फेडरल फेडरलिज्म की कुछ मजबूरियां है। कुछ सिविल सोसाइटी की कुछ मजबूरियां है। कुछ राजनीतिक पार्टीज का कुछ फायदा नहीं है। ईसाइयों की मदद करने में। क्यों करेंगे? ऑलमोस्ट कितने? 2014 से 2026 12 13 साल हो चुके हैं जो हम एक तरीके की जो हिंदुत्व की जो गवर्नमेंट है आरएसएस की बीजेपी का जो गवर्नमेंट है उसको देखते हुए एक्सट्रीम फॉर्म ऑफ अप्रेशन हर लेवल पे चाहे वो लीगल हो चाहे डिमोलिशन हो चाहे बुलडोजर हो चाहे एंटी कन्वर्शन लॉज़ हो वक हो एफसीआरए हो हर तरह से आपके केजेस बना दिए गए हैं। घेराबंदी घेराबंदी हर तरह जहांजहां पे भी आपका एक जिसे कहते हैं स्पेस था फ्रीडम था उस उस जगह पे आपने घेराबंदी कर दी है और एक बहुत ही लिमिटेड फॉर्म ऑफ एक्सिस्टेंस पॉलिटिकल फिलॉसोफी में अगंबन इसको बेयर एक्सिस्टेंस तक बोलते हैं कि आपको उस वजूद में ले आए कि और बल्कि जब वो यह बोलते हैं कि भ जब आपकी एक बेयर एक्सिस्टेंस होती है तो आपको कोई भी मार सकता है इस वजह से क्योंकि उसकी कोई भी सजा क्योंकि आप स्टेट ऑफ एक्सेप्शन में है कहीं कहीं ना कहीं ईसाइयों को अगर देखा जाए दलित दलितों को देखा जाए मुसलमानों को खासा इन तीन उनको क्योंकि सिखों का यह है कि भ उनके पास एक अपनी पंजाब में कंसोलिडेटेड गवर्न गवर्नमेंट है और उनको आप इंडिक सिस्टम के हिसाब से एज एन आउटसाइडर डिक्लेअर नहीं कर सकते अगर आप वो एक आईडियोलॉजिकल आपकी कंट्राडिक्शन आपके सामने आती है लेकिन ये जो मुसलमानों का ईसाइयों का कम्युनिस्ट्स का इस्पेशली जो कंस्ट्रक्शन है ये एलियन आईडियोलॉजीस की तरह है पूरी पूरी तरह तो वो जो बेयर एक्सिस्टेंस सामने है और हम इस इस लेवल ऑफ ऑपरेशन से गुजर रहे हैं तो आगे आने वाला जो भी मूवमेंट होगा या उसकी वोकैबलरी होगी या इंटरेक्शन होगा उसके क्या प्रिंसिपल्स होंगे आपके हिसाब से व्हाट इज इट दैट इज मिसिंग जो अगर हम लोग करना शुरू कर दें ऐसे डिफरेंट कम्युनिटीज किन डायलॉग्स की जरूरत है किन इंटरेक्शंस की जरूरत है क्या समझने की जरूरत है हमको अपना क्रिटिकल बनाना पड़ेगा। हम अभी आपने ठीक कहा क्रिटिकल वास था हमारा उसको बड़ा डिसिपेट कर दिया है। फ्रेगमेंट कर दिया है। हम उसको वी विल हैव टू रीसेट अ क्रिटिकल मास व्हिच इज साइजबल व्हिच इज 20% उसको वापस लाना पड़ेगा कॉमन प्लेटफार्म पर ऐसे प्लेटफार्म पर जिससे सिविल सोसाइटी डर ना जाए। हम आज रात बुरा ना माने तो मैं कहूंगा आजकल सिविल सोसाइटी मुसलमानों से डरी हुई है। हम उनके खुली सपोर्ट में नहीं आ पाती है। ऐसी बात नहीं है कि खाना नहीं मांगती डर जाती है। वो डर सिविल सोसाइटी के सिविल सोसाइटी से मतलब है हिंदू सोसाइटी। और कौन सी सिविल सोसाइटी होगी? हिंदू सोसाइटी से जो सिविल सोसाइटी बन रही है उसका डर मिटाना होगा। उसकी किस तरीके से उसके ऊपर जो भाजपा ने रंग ठोपे हैं उसको गलत सबक सिखाए हैं उसको डी एजुकेट करना पड़ेगा एक तरीके से अपनी वोकबलरी अपने सच्चाइयां दोबारा उसको दिखानी पड़ेगी एक ये नहीं कहना पड़ेगा कि हम भले आदमी है वो तो है हम मगर ये जरूर उनको बताना पड़ेगा कि आपके मन में जो डर है गलत है आप बताइए क्या डर है आपका हम बताएंगे कि कहां पे कर रही है आपका गलत क्या है जो आईडियोलॉजिकल मिसरप्रिटेशन और मिसअंडरस्टैंडिंग्स होती हैं वो भी कहीं ना कहीं आप ईसाई हैं मैं मुसलमान हूं मैं कहीं ना कहीं आपके बारे में कुछ स्टेरियोटाइप्स लेके चल रहा हूं मैं एक एग्जांपल की तरह बता रहा हूं और वो पब्लिक डिबेट और डिस्कशंस भी नहीं हो रहे हैं डिफरेंस पे तो बहुत बातें हो रही है एंगेजमेंट्स पे नहीं हो रही है एंगेजमेंट पे नहीं हो रही है किन बूथों पर हो एंगेजमेंट उसके ऊपर अभी हम डिसाइड नहीं कर पा रही है। इंटरफेस डायलॉग, इंटर कम्युनिटी डायलॉग और दोनों में थोड़ा फालका फर्क है। नहीं हो पा रहा है क्योंकि अभी शायद मौसम भी शायद ठीक नहीं है। भाजपा डर जाएगा हम बहुत और कुछ आप ला सकता है। कि आपस में मिल रहे हैं। हम मगर आपस में मिले तो क्या बात करें? आपस में मित्रों से मार नहीं रहे हैं। हम काट नहीं रहे हैं। क्या बात करें? इस बात पर तो हो नहीं सकता कि कुरान शरीफ में बाइबल में क्या एक जैसा क्या फर्क है उस थोलजिकल डिस्कोर्स हो जाएगा 1000 साल से चल ही रहा है हम बहुत किताबें लिखी गई है उससे ज्यादा किताबें किसी और चीज पे लिखी नहीं गई है हम डिस्कोर्स अ रिवाइवल ऑफ द कॉन्संसी असेंबली डिबेट होना चाहिए रिवाइवल मैंने अभी यहां पे कॉन्स्टिट्यूएंट असेंबली लिखा और आपने क्रिटिकल मास बोला क्योंकि क्योंकि मेरे ज़हन में ये चल रहा था कि जब आपने क्रिटिकल मास बोला और वो डिबेट्स हुई उसमें एक्चुअली डिफरेंट जो माइनॉरिटी ओपिनियंस है आईडियोलॉजिकल उन्होंने नेगोशिएट किया और उस नेगोशिएशन से एक दस्तूर वजूद में आया जिसने हमें 70 इयर्स 80 इयर्स तक शांति दी है। मतलब अक्सर लोग बोलते हैं कि भ कॉन्स्टिटुएंट जो ये कॉन्स्टिट्यूशन है मुसलमानों में एक डिबेट छिड़ा कुछ साल पहले ये एंटी मुस्लिम है। तो मैंने ऐसे ही बोलता था मुझे कि भ देखिए कोई भी जो सेंट्रिस्ट डॉक्यूमेंट होगा उसमें नेगोशिएशन होता है तो एंटी हिंदू भी है या एंटी सिख भी एंटी क्रिश्चियन भी है बहुत बुरी तरह एंटी हिंदू था जी हिंदू को मिलकर बिल्कुल बिल्कुल और उसमें होता ये है कि जब 10 कम्युनिटीज बिल्कुल मुख्तलिफ यूनिवर्सल्स को क्लेम कर रही होंगी और उन यूनिवर्सल्स के बीच में फिलॉसोफिकल कंट्राडिक्शंस होंगे के एक तरफ मतलब सोचने वाली बात है कि एक अंबेडकराइट डिबेट और और एक ब्राह्मणिकल अंडरस्टैंडिंग आप एक तरीके से अगर देखा जाए एनालेशन ऑफ़ कास्ट एनालेशन ऑफ़ रिलजन इंपॉसिबल है लेकिन उन इंपॉसिबल्स को नेगोशिएट करके एक डॉक्यूमेंट के बेस पे सिटीजनशिप को वजूद में ला पाना [नाक से की जाने वाली आवाज़] इट वाज़ एन अचीवमेंट उसमें मुसलमानों का भी रोल है। मुत्तहदा कौमियत का मिरेकल है। मिरेकल है। और उस मिरेकल को अनडू करना भी आसान है। इस वजह से क्योंकि वो जो डिबेट्स हुई वो डिबेट्स कंटिन्यूड नहीं रही। वो नेगोशिएशंस, इंटरेक्शन धीरे-धीरे स्टेट्स ने कंपार्टमेंटलाइज करते चले गए कि भाई यहां पे राइट करवा दो तो यहां पे ये हो जाएगा तो फिर ये भी डर जाएंगे। कल हमारे साथ भी हो सकता है। तो ये आपकी ही बात से मैं देख रहा था कि ये वो है लेकिन इससे रिलेटेड एक क्वेश्चन मेरे ज़हन में आता है। मैं अक्सर देखता हूं आपकी ऐज क्या होगी? 78 अल्हम्दुलिल्लाह 78 एंड स्टिल शाइनिंग। इसी तरह पोस्ट 70 70ज के बाद के बहुत सारे लीडर्स हैं। अदीप साहब हैं। सर हमारी तरफ भी हैं। सारी चीजें हैं। वो इकट्ठे होते हैं। दोस्तों दोस्त हैं। सब है बट मुझे एक शिकायत होती है। आपका यंग क्रिश्चियन एक्टिविस्ट की उंगली या फिर मुसलमान जो है वो कब पकड़ेगा? मैं आपकी तरफ नहीं बोल रहा हूं। मैं एक जनरल एक मैं ये देखता हूं कि अगर ये जो क्रिटिकल मास है जिन्होंने एक 50 साल मूवमेंट रखा सबको अल्लाह की तरफ जाना है। सबको ईश्वर की तरफ जाना है। मौत तो लिखी हुई है। हम जो आगे आने वाले जो हिंदुस्तान है जिसमें ये कंसोलिडेशन ऑफ हिंदुत्व और उसका जो ऑपरेशन है वो बढ़ने ही वाला है। व्हाट इज इट? व्हिच इज जो बचने वाला है अगर मतलब सिविल सोसाइटी को देखा जाए, लीडरशिप को देखा जाए यंग लोगों को कैसे जोड़ा जाएगा? बिल्कुल एब्सेंट है। मतलब हो सकता है आप दो लोग को जानते हो, चार लोगों को जानते हो। लेकिन एक जैसे क्रिटिकल मास सिविल सोसाइटी में या फ्यूचर इंडिया हिंदुस्तान इज अ प्लूरल नेशन। उस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने वाले लोग मुझे नहीं दिखते हैं। आप लोग क्या रोल प्ले कर सकते हैं उसमें? हो सकता है मैं गलत हूं। नहीं आप बिल्कुल ठीक कह रहे हैं और बहुत संजीदा बात है ये। बहुत सैड बात है। तो मैं बहुत परेशान होता हूं ऐसे। एक तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अपना एग्जांपल लेके करना तो है जो करना है मगर इमीडिएट रिलीफ नहीं मिलेगा। ये बच्चों को सोचना है। दूसरा इमीडिएट फल लो हैंगिंग फ्रूट्स की तरफ नहीं जाना है। आज नौकरी के लिए सिर्फ जिंदगी नहीं है। लोग बहुत ही लो हैंगिंग फ्रूट्स की तरफ जा रहे हैं। इससे कम्युनिटी का कोई फायदा नहीं है। यह है अफसोसन बात कोई चेला बनाने का कौन कह सकता है कि मैं चेले बनाता हूं। लोग तंगा देके भी नहीं बना पाते। मगर ठाकुर बोल गए टैगोर बोल गए हैं कि अगर आपके बुलाने से कोई नहीं आता तो अकेला चलो। अकेला चलो। मगर एक भी अगर आ जाता है तो आ जाता है। और मेरा ख्याल है आपने इतने मेरे दोस्तों का नाम लिया। मुसलमान दोस्तों का सब हम उम्र बड़े हैं अरसे से जानता हूं 30 40 साल 50 साल से लोग इन सबों को जानता हूं और कितनों का इंतकाल हो गया उनसे भी सीखे ही है तभी तो आगे बात पर आ रहे हैं मगर मैं बिना उम्मीद नहीं हूं उम्मीद है कोई कोई और होगा शायद मैं उसको ना जानता हूं शायद वो मेरे को जानता हो या ना भी जानता हो क्या फर्क पड़ता है जो अभी अकेला चल रहा है कल शायद लोग उसके साथ चलेंगे तो इतना बेयकीन क्या कह सकता हूं मैं बे उम्मीद नहीं हूं कि ये कहूं कि हम लोगों के साथ ही छोटी बहुत लड़ाई चल रही थी खत्म हो जाएगी एक आखिरी सवाल कि आपने कांदमाल हो दूसरी जगह हैं आपने जो और दूसरी जगह जहां मुसलमानों का बिल्कुल जहां पे और मुसलमानों का हुआ सिख राइट्स साहब ने जिक्र किया उसमें आप क्योंकि कारवान मोहब्बत मैंने हर्षवंदर साहब का इंटरव्यू भी किया है। एक अच्छा लंबा इंटरव्यू किया था उनका। आप लोगों ने एक सिविल सोसाइटी की एक मेथडोलॉजी डेवलप करी कि जिसमें आर्काइविंग हो, डॉक्यूमेंटेशन हो और डॉक्यूमेंटेशन अपने आप में एक रिकॉर्ड होता है। क्या आपको लगता है कि जो आपकी करियर है उसमें इस रिकॉर्ड ने क्या रोल प्ले किया है? क्यों यह होना चाहिए? और फ्यूचर में जब हालात बेहतर होंगे व्हाट इज इट दैट ऑल ऑफ दिस एफर्ट जो कई बार लोगों को बहुत मीनिंगफुल नहीं लगता। लेकिन ये सारी चीजें कब कहां कितना मरा था? क्या उसकी कंडीशनलिटीज थी? क्यों हुआ? क्या स्टेट ने रोल प्ले करा? कौन लोग थे परपरेटर्स? कौन एक्शन क्या हुआ? क्या नहीं हुआ? हाउ डस दैट मैटर 20 इयर्स फ्रॉम नाउ? और 20 साल पहले जो आपने किया वो आज कैसे मैटर किया? मैंने इमरजेंसी की बात की थी और कहा था कि 50 साल बाद भी अगर किसी को रिसर्च करनी है तो मेरी किताब पढ़नी पड़ेगी। ये अपने मुंह ही कह रहा हूं मैं और क्या कह सकता हूं मजबूरी भी है मेरी कम्युनिटी की अगर आपको ईसाई धर्म की कंटेंपरेरी सिचुएशन नॉन थियोलॉजिकल सिचुएशन पिटिकल सिचुएशन पढ़नी है तो कहीं ना कहीं तो मेरी दिखावट आपको सामने आएगी ही हम यहां किसी की नहीं मिलेगी। मेरे कुछ शब्द मिलेंगे आपको। मेरा ख्याल है एक जिंदगी के लिए काफी है। हम मेमोरी है ये। ये कल को इवन जो आपको क्लेम करना है मतलब कम्युनिटी को के व्हाट इज द जस्टिस दैट आई नीड एंड व्हाट इज द जस्टिस जो मैं डिर्व करता हूं। उसके लिए वो तारीख को देखना और उसके पंदे पलटना बहुत जरूरी है। और अगर वह तारीख ही लिखी ना जाए और वो डॉक्यूमेंटेशन ना हो तो फिर आप मांगे क्या-क्या? आप आप तो कंप्लीटली उस तारीख के कुछ पन्नों पे मेरे दस्तखत मिलेंगे आपको। बहुत जबरदस्त इंशा्लाह। बहुत शुक्रिया डॉक्टर जाम दयाल साहब। बहुत अच्छा लगा आपसे बात हुई। हमेशा हम लोग आपको बहुत रिस्पेक्ट की नजर से देखते हैं। आपका काम हमारे पहली बार तो मैं ये आर्टिकल थ्री फौ्ट इवेंट के हवाले से आपसे आके बाइट्स भी लिए। बाकी चीजें भी। उसके बाद से आपका क्योंकि काम सामने से गुजरता रहा। हम लोगों के लिए यह बड़ी उम्मीद की चीज होती है कि क्रिटिक अपनी जगह है। एक होता है क्या? हर जनरेशन अपने आप को यह समझता है कि मैं हूं। ये एक नेचर होता है। गर्व गरम खून होता है। नई अंदाज होती है। नई चीजें होती हैं। लेकिन जब आप सिंसियरली पास्ट की तरफ देखें तो आपको ऐसे लोग ऐसे चेहरे और ऐसे लेख मिल जाते हैं कि जो ये गवाही दे रहे होते हैं कि मैं तुम अकेले नहीं हो। यह यह रास्ता मैंने भी चला है और उससे फिर हमें उम्मीद जागती है कि हम अपने आप को यह समझ रहे हैं कि हम अकेले हैं, तन्हा हैं, कोशिश करते हैं ये करें और फिर यह नहीं हो पाएगा। लेकिन जब हम उस लेगसी को देखते हैं और उसके सक्सेसेस को देखते हैं और उसके बाद हम ये देखते हैं कि भ दिस इज अ कंटिन्यूड जिसे कहते हैं कि मूवमेंट और वो ऐसी जगह पे जो एक प्लूरल सोसाइटी होती है वो किसी एक कम्युनिटी का नहीं है। आंधी [नाक से की जाने वाली आवाज़] में खड़े रहना ही जीत है। आंधी को फैलाने की जरूरत नहीं होती है। खड़े रहे हैं। चली जाएगी आंधी। मेरा है वो जीत तो हम गए। जी तो मुझे उम्मीद है जब तक आप एक्टिवली जब तक आप पर्स्यू कर रहे हैं इस करियर को हमेशा बहुत सारी चीजें होती रहेंगी चेंजेस आते रहेंगे दो फ्लोर चढ़ना इस ऐज में और जब [हंसी] जब आपका दो फ्लोर उतरना भी है जी तो मैं गुनहगार भी समझ रहा हूं अपने आपको के अगली बार मुझे बजा दिया जी जी जी आपके पास आके आपसे लेना चाहिए ये हमारी गुस्ताखी है कि हमारी तरफ से यह हुआ। इंशा्लाह बहुत शुक्रिया। आप आए शुक्र आए।

Companion article

A record kept on purpose

John Dayal, 78, opens by explaining why he became a chronicler of violence he knew those responsible would never read: "I knew that what I was writing, the people I was writing about, would not read it. But what I write will be read not today, but even 50 years from now." That conviction has largely been vindicated — his account of the 1975 Emergency is still cited whenever its anniversary comes around, and his documentation of anti-Sikh violence, homelessness, the Bhopal gas tragedy and communal violence continues to be referenced. Dayal, a physics graduate of St Stephen's College who moved into journalism, describes a 57-year career built on the conviction that even when the people affected by violence — labourers, farmers, the poor who don't read newspapers — will never see his reporting, documenting their reality could still eventually enable intervention: in Parliament, in courts, in the historical record.

That instinct for documentation is, in his telling, inseparable from a simple fact about memory: it accumulates, and accumulation produces patterns and benchmarks. Dayal repeatedly returns to a comparison from his own life. On the day of his wedding in Delhi — 7 July, decades ago — a Hindu-Muslim clash broke out in the city. It was brought under control within two-and-a-half days, the culprits identified and arrested without any political instruction to target one community over another. "Today," he says, "riots run for weeks, months." The difference, in his account, is not that violence has necessarily increased in raw quantity, but that the state's posture toward it has fundamentally changed.

What changed in the state's gaze

Dayal's central argument is that policing and administrative machinery once treated communal disorder as something to be controlled impartially — even if imperfectly, even if police still took bribes — because officers feared future inquiry. Today, he argues, curfews are selectively imposed on one community's neighbourhood while another's streets stay open for men to parade with weapons; police themselves are sometimes directed on whom to arrest, with charges calibrated by community rather than by evidence of an actual crime — a "qualitative" rather than "quantitative" form of bias that is much harder to see on paper. "It matters whose eyes carry fear and whose don't," he says, describing how, in earlier decades, an Army flag march or a curfew still allowed milk to reach children in both Hindu and Muslim areas — a basic uniformity of treatment he says has since vanished.

He extends the comparison internationally, noting that the same asymmetry of access and reporting restrictions that shape whose suffering the world sees applies as much abroad — in Gaza, or in the Iran-Israel conflict — as within India, arguing that control over what the public is allowed to witness is itself an instrument of power exercised deliberately by state authorities, in India as much as elsewhere.

A history predating the British

A recurring thread in the conversation is Dayal's insistence that the popular assumption — that Christianity in India is a colonial import — is simply wrong. Christianity arrived on the Malabar coast within a few years of the death of Jesus, brought by St Thomas via maritime trade routes that long predated European contact, into a region already tied by trade to West Asia and China. For roughly 1,500 years, Christianity remained largely confined to Kerala, spreading further only after Vasco da Gama's arrival opened a new, larger wave of conversion.

Dayal traces a caste dynamic within that history that he says is often erased: the earliest converts on the Malabar coast were, by his account, from prosperous, land-owning, trading upper-caste backgrounds who had no economic incentive to move. It was the Portuguese missionary wave — reaching fishermen, small cultivators and lower castes — that provoked internal backlash from existing elites and created what Dayal describes as the first real caste tension within the community: pointed criticism that missionaries who preached "everyone reads the same Bible, everyone is equal" were disturbing an established social hierarchy. He credits Christian missionary institutions with material achievements that shaped this spread further: schools and hospitals built deep in India's forest belts — from Rajasthan to Odisha — targeting Adivasi and tribal communities the colonial state, princely rulers and wealthy Indians alike had neglected, along with medical missions addressing epidemic disease in regions with no other access to healthcare. He also credits this history with the origins of India's nursing profession, since caring for strangers' wounds crossed caste and purdah norms that domestic women otherwise could not.

Why people convert, in his account

Asked directly why conversions happen today, Dayal lists what he calls the real, non-coercive drivers: psychological and physical distress — "peace of mind, peace of body" — amid poverty, unemployment and the psychological toll of daily life; a "healing ministry" that he identifies as the dominant driver of contemporary conversion, particularly for those who cannot afford healthcare; and liberation from caste bondage, which he argues remains as rigid today, measured by its real-world consequences, as in any earlier era — citing continuing honour killings over inter-caste marriage, PhD scholars driven to suicide, and Dalit political representation of roughly 85 reserved Lok Sabha seats that translates, he argues, into almost no actual power. He is emphatic that no one can force another person to convert against their will — "no one can pour Ganga water on someone's head and make them Hindu, or put something in their mouth and make them Muslim" — arguing that what critics call "conversion" for legal purposes is often simply formal, ritualised admission into a community whose actual, internal conversion of belief happened earlier and independently.

He is equally dismissive of claims that foreign funding drives mass conversion, walking through where money channelled via the Foreign Contribution Regulation Act (FCRA) actually goes: roughly 80 percent of teachers and 90 percent of support staff in Christian-run schools are Hindu, and the bulk of any FCRA money entering an institution flows straight into the local economy through salaries, maintenance and utilities — meaning, in his telling, most of the practical benefit of this funding accrues to Hindus, not Christians. He also notes, pointedly, that Germany's church tax — often assumed to fund only Christian institutions in India — is legally required to be distributed proportionately, meaning German tax revenue also reaches Hindu institutions in India, a detail he says is rarely acknowledged.

The "first and largest anti-conversion law"

The most striking argument in the conversation concerns Article 341 and the Presidential Order of 1950. Dayal describes this as, in effect, the first and largest anti-conversion law in independent India — one of the earliest major amendments to the Constitution, restricting Scheduled Caste reservation benefits (in education, employment and political representation) to Hindus, later extended to Sikhs and Buddhists, but withheld from Dalits who convert to Islam or Christianity. He frames this as a direct contradiction of the freedom of conscience the Constituent Assembly itself had debated and enshrined — the right to profess, practise and propagate one's faith — arguing that the same document that guaranteed this freedom was almost immediately amended to penalise Dalits for exercising it. Citing his own conversations with retired judges, he argues that a 1977 Supreme Court judgment on anti-conversion laws (in the Stainislaus case) was inadequately challenged at the time, partly on a theological point he considers decisive: no person can convert another person against their will; only the individual converts themselves, with a religious ceremony merely formalising an already-completed personal decision.

Dayal argues the practical effect of denying Dalit converts continued reservation benefits is to trap the poorest, most vulnerable citizens inside caste hierarchy regardless of what they call themselves — since neighbours, marriage networks and social status continue to identify a convert by their prior caste position regardless of new religious label. "Your world remains a Dalit world," he says, describing cases of Dalit Christians and Muslims still barred from certain jobs, still facing water and access discrimination, even while relatives across faiths in the same family remain unaffected by comparable barriers. He frames the broader anti-conversion law apparatus — including recent rhetoric around death penalty provisions from state leaders — not as protecting genuine religious sentiment, but as a mechanism to keep a captive, economically dependent lower-caste population from ever fully exiting a hierarchy that benefits those above it: "This isn't about saving religion. It's about keeping bonded labour in your court."

Enforcement without convictions

On enforcement, Dayal states that despite decades of anti-conversion prosecutions, actual convictions of Christians for forced conversion have been vanishingly rare — he cites a case in Indore in which two nuns and 20 girls were detained on conversion allegations, only for the case to collapse after ten months once it became clear the girls' entire families, including grandparents, were already Christian. He argues such cases function as harassment mechanisms rather than genuine law enforcement, serving primarily to consolidate a "Hindu vote bank" rather than address any real pattern of coercion — pointing out that if Christians were truly frightened by escalating anti-conversion legislation, conversions would have stopped, yet the same voices claim conversions continue daily regardless of the law.

Violence, geography and Manipur

Dayal draws a distinction between urban and rural vulnerability, arguing that rural Christian communities — with weaker civil society networks and greater exposure to unverified accusations of "conversion" — face disproportionate risk, citing what he says are 148 documented cases in Chhattisgarh alone of families being denied the right to bury their dead in their own villages. He contrasts this with international rankings of religious persecution, arguing that a country describing itself as a secular republic under rule of law should be judged more harshly for enabling such denial of basic burial rights than countries experiencing open civil war.

On the ethnic violence in Manipur between Meitei and Kuki communities, Dayal argues the underlying driver was land and Scheduled Tribe status rather than religious conflict per se — since Kukis are almost entirely Christian while only a small fraction of Meiteis are — but that religious framing was deliberately introduced and later extended to Naga-Kuki tensions despite both communities being Christian, which he attributes partly to competing interests around regional drug trade networks that benefit from sustained, low-level conflict.

A community without political leadership

Dayal is unsparing in his assessment of Christian political organisation in India, describing the community as "bereft of a genuine political leadership" with no real organic leadership structures, in contrast to Kerala, where Christians hold meaningful institutional power. He attributes the RSS's cultivation of a "Rashtriya Christian Manch," paralleling its Muslim Rashtriya Manch, largely to failure — a platform, he says, that draws little genuine following. He is candid that Christian civil society itself remains fragmented along denominational lines, with limited coordination between Catholic and Protestant bodies, and that younger activists have not yet emerged to build on the "critical mass" his generation once represented — a gap he describes as troubling and one he hopes younger Christians and Muslims will begin to fill, even without immediate reward.

A constitutional negotiation under strain

Dayal closes by locating the current moment within a longer constitutional story: the Constituent Assembly debates, in his account, produced a "miracle" — a negotiated citizenship framework in which fundamentally incompatible worldviews (an Ambedkarite critique of caste, a Brahminical understanding of social order, competing religious claims) were reconciled into a single founding document that gave India seven or eight decades of relative peace. That negotiation, he argues, has since been deliberately unwound by a state strategy of compartmentalising communities against one another, discouraging the kind of interfaith, cross-community dialogue that produced the original settlement. His closing message is one of qualified hope rather than despair: comparing his own decades of activism to standing steadfast in a storm — "you don't need to defeat the storm; you only need to still be standing when it passes" — while acknowledging that rebuilding a critical mass of civil society solidarity across India's religious minorities remains, in his own words, largely unfinished work.

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