5:04Inside India's Growing Religious Divide I nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation.
As concerns grow over the demonisation and dehumanisation of Muslims in India, former Rajya Sabha MP Mohammad Adeeb joins senior journalist Bushra Khanum for a deeply reflective conversation on the community's political future. Adeeb discusses the shrinking space for Muslim representation, questi…
किसी पिटिकल पार्टी ने कोशिश करी कि अपनी जमात में कोई ऐसा मुसलमान मजबूत देते जो मुसलमानों के मामलात को समझ सकता उसकी फिक्र कर सकता उसके लिए बोल सकता ओवैसी को लोग क्यों उसको पसंद कर रहे हैं या मुसलमानों में उसकी मकबूलियत है यही वो दर्द है वही फिलिस्टेशन है आप नेहरू और गांधी के साथ वाजपेयी को आप एक सांस में आप नाम ले रहे हैं लेकिन ऐसा क्यों ये तो वही वाजपेयी हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद को समतल करने की उन्होंने बात कही थी। किसी पार्टी में चौथा पांचवा मुसलमान इस हैसियत का है कि पंचायत का टिकट दिला दे। ज़हनी गुलाम बना दिया है आपको। ऐसा लगता है आप आप जूती उठाइए उनकी। तो सवाल ये उठ रहा है फिर कि उन वो लोग मुसलमान और खासतौर पर वो लोग जिन पर जुल्म ढाया जा रहा है। एससी, एसटीज, क्रिश्चियंस वो आखिर फिर जाए तो जाए कहां? वो किस तरफ देखें? हमने कोशिश की है कि जितनी भी जमातें हैं और जितने भी पीपल ऑफ सब्सटेंस है वो एक बार अपनी जमातों से ऊपर उठ के एक फैसला करें। वो सेकुलर पार्टियों से पूछे कि तुम हमारे साथ खड़े होगे जब हमारी मस्जिद गिराई जाएगी। जब हमारे बच्चे लिंच होंगे तुम्हारे दिल में दर्द उठेगा। कहां है अखिलेश यादव जो अभी मुसलमानों का वोट मांगेंगे। अभी आने वाले उत्तर प्रदेश के इलेक्शन में कहां है तेजस्वी यादव? कहां है और दूसरे लोग जो मुसलमानों के वोट के बिना जो खड़े ही नहीं हो सकते हैं। नाउंस में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद। अभी फिलहाल आप देख रहे हैं कि मुसलमानों के साथ किस तरह से जुल्म की हर इंतहा को पार किया जा रहा है। बर्बरियत की हर इंतहा को पार किया जा रहा है। उनसे उनके वजूद से जुड़े हर चीज पर एक सवालिया निशान लगा दिया गया है। आज मैं एक ऐसी शख्सियत के साथ मौजूद हूं जो फिलहाल सियासी गलियारों से लेकर और कोर्ट तक हर वो लड़ाई जो लड़ी जानी चाहिए उसमें वो अपनी कोशिशों को अंजाम देते हुए नजर आ रहे हैं। मैं यहां बात कर रही हूं मोहम्मद अदीब साहब की जिन्हें आप बहुत बेबाकी से लगभग हर प्लेटफार्म पर जहां कहीं भी मुमकिन होता है इन तमाम जरूरी सवालों को जो मुसलमानों से फिलहाल उनकी जिंदगी उनके हुकूक से जुड़े हुए हैं उन सबको उठाते हुए नजर आ रहे हैं। मुझे यह बताने की जरूरत नहीं है कि वो राज्यसभा के एमपी रहे 2014 तक आईएमसीआर फिलहाल वो हेड कर रहे हैं। एक इंग्लिश न्यूज़ पेपर है जिसको निकालने की बारहा कोशिश वह कर रहे हैं और आप उनको एक तरह से इस सारे मायूसी कुरा माहौल है उसमें आपको एक वो बहुत मजबूत कोशिश हर तरीके की वो करते हुए आपको नजर आएंगे। आज हम मोहम्मद अदीब साहब से बात करने जाएंगे कि मुसलमानों के जो मौजूदा हालात हैं उसमें क्या किया जाना चाहिए। आजादी से लेकर अब तक जो मुसलमानों की सियासत है उसको वो किस तरह से देखते हैं और आगे उनके मुस्तकबिल के बारे में वो क्या सोच रहे हैं। अदीब साहब बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका। शुक्रिया। मेरा पहला सवाल अदीप साहब आपसे। मैं पास्ट, फ्यूचर, प्रेजेंट सबके बारे में बात करना चाहती हूं। क्योंकि आप एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने जेपी आंदोलन से लेकर यानी सोशलिस्ट समाजवादी जो पूरा आंदोलन था उसका उरूज उसको बनते हुए उसका जवाल होते हुए भी आपने देखा है। आपने आरएसएस बीजेपी को बनते हुए और उसका उरूज होते हुए भी आपने देखा है। आप कांग्रेस के करीब रहे। आप समाजवादियों के करीब रहे। आप जब राज्यसभा का आपने इंडिपेंडेंटली जब आपने इलेक्शन ये जीता तो कांग्रेस, आरएलडी, समाजवादी पार्टी यानी इन सब ने आपको सपोर्ट किया। फिलहाल जो मुसलमानों के मौजूदा हालात हैं उनको आप कैसे देखते हैं? आपने अभी अपने इंट्रोडक्शन में ही वो बयान कर दिया। और पूरी दुनिया देख रही है। द आईडिया ऑफ इंडिया का जो तसवुर था हमारे बुजुर्गों का उस तसवुर के पड़ा उड़ गए हैं। कभी ये तसवुर किया नहीं था। मैंने नहीं किसी ने भी नहीं जिसने इस मुल्क के लिए अपनी कुर्बानियां दी। अगर उन लोगों को यह बात का इल्म होता कि हिंदुस्तान इस रुख पे जाएगा जहां इंसान इंसान को मार के जश्न मनाएगा। उस रुख पे जाएगा जहां एक मखसूस कौम को सताकर उस पर जुल्म ढाकर हुकूमते बनेंग तो शायद वो वो कुर्बानियां नहीं देते दयियों साल वो लोग अपने जेलों में रहे अपने घरों से हटे लेकिन ऐसी हवा बदली मुझे ऐसा लगता है कि आपने जैसे कहा कि मैं जेपी मूवमेंट से जुड़ा हुआ था और जेपी मूवमेंट से जुड़ने से पहले ही मैं जयप्रकाश नारायण के साथ जुड़ चुका था। जब मैं अलीगढ़ में प्रेसिडेंट था उस वक्त मैं जयप्रकाश नारायण जी को अलीगढ़ यूनिवर्सिटी ले गया था और उनको वहां लाइफ मेंबर बनाया था और नेहरू जी की फोटो के सामने उनकी फोटो यूनियन में लगवाई थी क्योंकि मैं सोशलिस्ट सोच को मानता था और मेरा ख्याल यह था कि वो जो मूवमेंट उस वक्त चल रहा था पहले यूरोप में चला फिर हिंदुस्तान में हुआ उससे मैं बहुत मुतासिर था। मैं ही नहीं बल्कि नेहरू खुद सोशलिस्ट थे। और कांग्रेस में दो सोचे थी जैसा आपने कहा कुछ लोग सोशलिस्ट थे ज़हन के जो नेहरू जिसको लीड करते थे। तो जब जयकार नारायण ने मूवमेंट शुरू किया तो यूपी में हम सिर्फ दो लोग जुल्फकार उ्ला साहब इलाहाबाद के जो बाद में जनता पार्टी में फाइनेंस मिनिस्टर बने मिनिस्टर ऑफ स्टेट हुए और एक मैं था उस वक्त मुझको मैंने जय प्रकाश जी से कहा था कि साहब आपके साथ तो जनसंघ के लोग बहुत आगे चल रहे हैं। तो उन्होंने कहा कि जनसंघ वाले तो सबसे ज्यादा मुझसे खफा है। लेकिन उनके पास संगठन है। हम इसलिए उनके साथ हैं। तुम फिक्र मत करो। कभी ऐसा होगा नहीं। और हमने एक गुनाह किया। जेपी मूवमेंट में शामिल हो गए। और जेपी मूवमेंट में शामिल होने का नतीजा यह हुआ कि छोटी-छोटी पार्टियां खड़ी होती चली गई। और मुसलमान किनारे लगता चला गया। इस मुल्क में मुसलमान कभी चीफ मिनिस्टर भी बना। कई स्टेट में बना। लेकिन किनारे की पोजीशन यह है कि अब मुसलमान के पास माइनॉरिटी अफेयर्स की एक डिपार्टमेंट फिक्स हो गया है। अब हम किसी उस जगह नहीं है जहां हम कह सके कि हम हिस्सेदार हैं। कांग्रेस जो कमजोर होती गई कांग्रेस की अपनी बहुत सी कमजोरियां थी। लेकिन उसका फायदा जो इंडिविजुअल पार्टियां खड़ी हुई और उन पार्टियों ने जिस तरीके से वोट बांटा और अब तो सोच ही बदल गई है। वो लोग जो ममता के लिए जान दे रहे थे ममता के हार से ही उसको भी छोड़ के चले गए। अब जब यह कुछ लोग इधर आ जाते हैं तो कह देते हैं कि यह सेकुलर हो गए। वो कम्युनल हो गए। हम लेकिन अंदर से आईडियोलॉजी जब खत्म हो जाए तो जिस्म बगैर रूह के दिखता है। यह जितने भी आपको दिख रहे हैं नेता सो कार्ड इनके अंदर रूह नहीं है। ये चलते फिरते एक रिपोर्ट है जिसे हम कहते हैं कि हिंदुस्तान की जो शक्ल बन गई है। लेकिन अदीप साहब क्योंकि आपने जेपी आंदोलन का आपने जब जिक्र किया और मैं इसलिए सवाल पूछ रही हूं कहीं जेहन से ना निकल जाए कॉन्टेक्स्ट में अगर मैं आगे बढूं जब आप जेपी आंदोलन की बात कर रहे हैं तो यह कहा जाता है कि वो तो एक सोशलिस्ट समाजवादी वो मूवमेंट था। लेकिन हम ये देखें कि वो मूवमेंट कामयाब ही इसीलिए हुआ क्योंकि उसको आरएसएस का सपोर्ट था। ये किस तरह का धोखा था मुल्क से। हमने देखा नीतीश कुमार उसी से निकले हुए। लालू प्रसाद यादव उसी से ही निकले हुए। मुलायम सिंह यादव उसी आंदोलन से निकले हुए। लालू प्रसाद यादव के अलावा किसी ने भी बीजेपी के साथ जाने में गुरेज नहीं की। तो ये फिर किस तरह का सोशलिस्ट समाजवादी मूवमेंट था? क्या ये देश के साथ एक धोखा था? ये कांग्रेस को कमजोर करने की या फिर जो सेकुलर समाजवादी जो ताकत असल ताकतें थी। क्या उनको कमजोर करने की या किसी एक तरह से साजिश थी? क्योंकि आप उसका हिस्सा रहे। इंटरनल पार्ट थे आप उसका। बिल्कुल आप सही कह रही हैं कि जिस तरह के अंदर बात हुई मैं एक वाक्य आपको बताऊं कि जेपी मूवमेंट में मैं उत्तर प्रदेश संघर्ष कमेटी का मेंबर था। सारे लोग गिरफ्तार हो गए और मैं भागते भागते इस मू से बाहर चला गया और उस वक्त बहुगुना जी चीफ मिनिस्टर थे। जब बहुगुनाथ जी को भी इंदिरा जी ने हटा दिया। वो मुझे गिरफ्तार नहीं कर रहे थे। और मेरा उनसे बड़ा करीबी रिश्ता था। वह फिर जनता पार्टी में मिनिस्टर बनकर दुबई आए। हम तो मैं उनसे मिलने के लिए जब गया तो उन्होंने कहा कि भतीजे तुमने बड़ा अच्छा किया। तुम चले आए और तुम्हारी स्लेट साफ है। जाओ जो चाहो फिर से लिख लो। तो मैं खुश था। कम उम्र थी, जोश था कि भाई इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाई है, हमारे हुकूक छीने हैं तो वह हारी है। लेकिन भोगनाथ जी ने यह मुझसे कहा कि भतीजे मुझसे बड़ा गुनाह हो गया। मैंने इंदिरा जी से लड़ाई करके देश तबाह कर दिया। मैं समझ नहीं पाया यह क्या कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि जनसंघ के लोग जो अपने आरएसएस के लोग जो अपना नाम लेने से डरते थे, छुपाते थे वो जड़ों में बैठ गए। मेरी तो उम्र तमाम हो गई। भतीजे तुम्हारा क्या होगा? मैं उसे समझ नहीं पाया। हम और जब मैं हिंदुस्तान वापस आया तो उस वक्त वीपी सिंह साहब प्राइम मिनिस्टर बन गए थे। वीपी सिंह साहब के साथ जनता पार्टी यानी वो जनसंघ लेफ्ट ये सब मिल गए। नतीजा हुआ कि रिकग्निशन मिल गया आरएसएस को और आरएसएस ऐसे दबे पांव आते-आते हाकीम वक्त बन गई। यह छोटी पार्टियां जो बनी थी इन्होंने कांग्रेस को तो कमजोर कर दिया लेकिन आरएसएस को वहां पहुंचा दिया जो अभी 200 साल वहां नहीं पहुंच सकते थे। तो आप ये कह रहे हैं कि ये जितनी सो कॉल्ड सोशलिस्ट समाजवादी ये जमातें हैं इन्होंने ही आरएसएस को मजबूत किया है। देखिए उसमें मैं आपने लालू प्रसाद का जिक्र किया। हम लालू के बारे में मैं जब वह जेल गए तो मैं उनसे जेल मिलने गया हम रांची में और मुझे देख के वो बहुत चौके कहा अरे आप मिलने आ गए तो मैंने उनसे कहा कि मैं यह नहीं कहता कि आप बहुत अच्छे रेलवे मिनिस्टर रहे या चीफ मिनिस्टर रहे मैं इसलिए आया हूं कि आपने आरएसएस से समझौता नहीं किया और हम वो लोग हैं जो एहसान फरामोश नहीं है। तो लालू के आंखों में एकदम आंसू आए और उन्होंने कहा कि मैं पूरी जिंदगी आरएसएस से समझौता नहीं करूंगा। लालू तो ये रहे। लालू तो समाजवादी पार्टी के बहुत छोटे लीडर थे। बड़े लीडरों में नाम जॉर्ज फर्नांडिस का आता है। ऐसा जालिम, ऐसा धोखेबाज इंसान गुजरात में जब बच्चों के मांओं के पेट से बच्चे निकाले गए तो वो बेशर्म वाजपेयी जी की सरकार में रह के क्या बोल रहा था? ये जो बड़े नेता इनके बने थे। ये सबके ऊपर से सब गर्द हट गई। ये खुलेआम सिर्फ पावर चाहते थे। लेकिन अब जिस वक्त ये सरकार बनी ये नीतीश कुमार साहब अब इनके बारे में कोई क्या कह सकता है? इनका भाषण क्या हुआ? नायडू जो अपने को सोशलिस्ट कहते थे। अब वो उन्होंने खरीदना शुरू कर दिया। अब उन्हें नायडू की जरूरत नहीं है। अब वो कुछ दिन में आके फिर कहेंगे कि साहब बड़ा शितम हो रहा है। बीजू पटनायक के जी के बेटे साहब वो हमेशा ये करते रहे खुद कहां चले गए? हम ये सब के सब खत्म हो जाएंगे। लेकिन सवाल सिर्फ ये है कि कांग्रेस कब जमीन पर आएगी? वो समझ ये रहे हैं कि प्रेस का्फ्रेंस से हम सब कुछ कर लेंगे। आप देखिए ना कि वोट का जो चोरी का राहुल गांधी ने सारा इंकलाब निकाला। उनकी पार्टी को चाहिए था हर जिले में हर तहसील में जाके सड़कों पर जाते कि यह चोरी हुई है। जी लेकिन जब यह परसेप्शन हो जाए कि हम twिटर पे लिख देंगे हम प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देंगे तो फिर उनका हश्र वही होगा। मैं कांग्रेस में आऊंगी अदीप साहब। लेकिन अ जब हम जेपी आंदोलन और उसके बाद इन सोशलिस्ट समाजवादी इन तमाम चेहरों की हम बात करते हैं। इनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा। जिन जातियों से वो आए जिस जाति आधारित जो उन्होंने अपनी सियासत की यादवों की सियासत की, कुर्मियों की सियासत की, अलग-अलग पार्टियां जिन्होंने इस तरह से अपने-अपने दल बनाए और उनका दूसरा सबसे बड़ा वोट बैंक रहा मुसलमान। जी। मुसलमानों ने उन्हें अपना नेता माना। मुसलमानों ने उन्हें झोली भर-भर के वोट दिया। एक बार नहीं हर बार दिया कई बार दिया। उनके साथ टोकनिज्म की सियासत की गई। उनके उनमें से कुछ नेताओं को कुछ डिपार्टमेंट्स दे दिए गए। मिनिस्ट्री में उस राज्य में उन जगहों पर कुछ रिप्रेजेंटेशन उनको दे दिया गया। क्या आपको नहीं लगता कि ये जमातें सबसे बड़ी जिम्मेदार हैं जो मुसलमानों का आज समाजी और सियासी जो हाल है उसके लिए क्योंकि वो अपने आप कभी उभर ही नहीं पाए। हमेशा वो जो एक सवाल किया जाता है दरी बिछाने वाले अगर मैं वो दरी बिछाने वाले ना कहूं लेकिन एक तरह के टोकनिज्म की सियासत के चलिए कुछ तो मिल रहा है हमारी बात तो कर रहे हैं कम से कम यह तो कह रहे हैं लेकिन जो उनके जरूरी सबसे बड़े सवाल थे उनके बारे में कभी किसी ने बात ही नहीं की तो क्या आपको नहीं लगता कि बीजेपी और आरएसएस से ज्यादा ये लोग जिम्मेदार हैं बिल्कुल अरे ये तो आप आपने सही कहा दरी बिछाने वाली बात तो अब आई हकीकत है अगर ओवैसी कह रहे हैं तो गलत क्या कह रहे हैं हम हकीकत तो यही है। मैंने तो अपनी जवानी में 50 साल 60 साल हो गए सियासी गलियारों में घूमने में। पहले एक परसेप्शन था कि कहीं मियां नाराज ना हो जाए। 2014 में मोदी साहब जब इलेक्शन लड़ने आए तो उन्होंने ये कहा कि हम माइनस मुसलमान हकी में वक्त बनेंगे। हम अब 10 साल की कांग्रेस की इनकंबेंसी थी। उनका 2002 का बैकग्राउंड था कि वो किस सोच के आदमी हैं और कितने उनकी सोच क्या है। नौजवानों की एक उम्मीद थी कि शायद कुछ नया होने वाला है। वो हाकीम वक्त बन गए। और सबसे पहले एंथोनी साहब की रिपोर्ट आई कि हम इसलिए हार गए कि हम मुस्लिम नवाज थे। उसके बाद हर पार्टी ने कहा भाई इनसे दूर रहो। ये जाएंगे कहां? ये तो मजबूर है हमें घूमने। अब वही एंथोनी साहब के बेटे बीजेपी के अहम लीडर हैं केरल में। ये है सिचुएशन। हम हमारे साथ यह हुआ कि हम धीरे-धीरे किनारे होते गए और अब माइनॉरिटी अफेयर्स के मिनिस्टर हैं कभी नमाज वो भी नहीं है। नहीं अब तो अब वो भी नहीं है लेकिन जब आएंगे हम वजह क्या हुई है कि मुसलमान जो भी जिस पार्टी में गया उसकी कौम उसके साथ नहीं थी। जब आपके साथ आपकी कौम ना हो तो आप सिर्फ एक नमूना है जिसको रख दें। लेकिन फिर उन्हें वोट कौन कर रहा था? अगर आप यह कह रहे हैं कि कि कम्युनिटी उनके साथ नहीं थी। कम्युनिटी उनके साथ नहीं है। क्यों नहीं है? मौके थे अगर कांग्रेस पार्टी या समाजवादी पार्टी या लालू की पार्टी अपने मुसलमान रिप्रेजेंटिव को इतनी पावर दे देता कि वो अपनी कम्युनिटी के बारे में कुछ कर सकते। हम तो फिर वो लीडर बन जाते और लीडर उनको बनाना नहीं था। हम मिसाल के तौर पे मुजफ्फरनगर में फसाद हुआ। 66 मुसलमान एमएलए थे। एक भी नहीं बोला। बोलने की हिम्मत ही नहीं थी। किसी को ये पावर नहीं दी थी कि तुम जाओ मुजफ्फरनगर में और जाके अपनी कौम के साथ जो कत्लेआम हुआ है जो सितम ढाए गए हैं उसके लिए आवाज उठाओ। मुजरिम हम भी तो है ना। बिल्कुल। हमने जब ये कंप्रोमाइज कर लिया मैं तो बहुत से लीडरों को जानता हूं जो नए कोशिश कर रहे हैं नौजवान अफसोस की बात है जो लीडरशिप आने वाली है वही लीडरशिप के है कि हमें मुलायम सिंह का टिकट दिला दीजिए अगर यह नहीं मिल रहा है तो मायावती को दिला दीजिए कांग्रेस के दिला दीजिए यानी बगैर किसी आईडियोलॉजी के कि लूठ मचानी है उनकी समझ में ये बात आ गई जितने निकम्मे हैं जो दुनिया में कुछ कुछ नहीं कर सकते। वो सियासत में जाना चाहते हैं। आप जिम्मेदार किसको मानते हैं इसका? क्या आपको लगता है कि जो मुस्लिम हमारे लीडर्स रहे जिनको कम्युनिटी ने एक लीडर के तौर पर देखा मौलाना आजाद से लेकर और मैं अब तक की हम बात मैं बात कर रही हूं। जिनको अच्छी पोजीशंस भी मिली पार्टीज में। क्या उन्होंने अपने से सेकंड, थर्ड, फोर्थ एक लाइन आप तैयार करते हैं। के वाले जो होता है वो अपने बच्चे को तैयार करता है कि भ मेरे बाद यह बच्चा जो है वो मेरा कारोबार या मेरी कोई भी चीज जो है वो संभालेगा या कुछ और भी अपने मुस्तकबिल में वो बेहतर करेगा। अगर हम उन्हीं मुसलमान लीडर्स को भी हम देखें तो क्या वो इसमें पूरी तरीके से फेल रहे कि उन्होंने आगे की कोई कोई सियासी लीडरशिप उन्होंने तैयार ही नहीं की या इंटेंशनली आपको लगता है नहीं वो इतने सेल्फिश थे कि उन्होंने नहीं की। हकीकत में अगर आप देखें ये करीब 100 साल से आप ये देखिए कि जो मुसलमानों की बराबरी थी एक लीडर पैदा हुए जिन्ना। हम उन्होंने एक मुल्क का नारा दे दिया बगैर इस तसवुर के कि वह बनेगा कैसे वह चलेगा कैसे किस पार्लियामेंट पर होगा वहां से हमारी लीडरशिप को देखिए जो परेशानी आई हमने मौलाना आजाद को नहीं माना मौलाना आजाद तो यही कह रहे थे ना हम कि तुम एक कौम को बांटने जा रहे हो जमीन नहीं बांटने जा रहे हो और कौम बटी हमने कहा कि नहीं साहब बनके रहेगा पाकिस्तान और जिना साहब ने पाकिस्तान का नारा तो दे दिया। ये तक नहीं बताया कि ये क्यों दिया जो पहली स्पीच दी उन्होंने जाके पाकिस्तान में लाहौर में हम कहा ये सेकुलर मुल्क है। अगर सेकुलर मुल्क था तो फिर तो ये बंटवारा क्यों किया? हमने वहीं से अपनी कब्र खोद ली। इस मुल्क में जब हम रह गए तो हमारे पास सिर्फ एक ही चीज बची थी वो अंबेडकर का जो कास्टिट्यूशन था और जिसको नेहरू ने सन 52 में मैंडेट के तौर पर रेफरेंडम के तौर पर इलेक्शन लड़ा कि हम इस मुल्क को सेुलर मुल्क बनाएंगे और कॉन्स्टिट्यूशन हमारी गाइडलाइन होगा। अब जो कहा जाता है कि आप भाग जाइए हम तो हम उन लोगों से यही कहते हैं कि तुम भी एक रेफरेंडम करा दो और अगर रेफरेंडम में ये हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हो तो बना लो। हम एक आवाज नहीं उठाएंगे। लेकिन तुम इलेक्शन लड़े हो उस कास्टिट्यूशन पर जिसकी वजह से तुम आज प्राइम मिनिस्टर हो। वो कास्टिट उनसे कहता है कि तुम हम पर सितम नहीं ढा सकते। अगर तुम्हें हम पर सितम ढाना है, का्सिट्यूशन को तोड़ना है तो रेफरेंडम करा लो और रेफरेंडम सिखों से पूछ लो कि वो हिंदू राष्ट्र में रहेंगे। वो क्रिश्चियन से पूछ लो। हिंदू राष्ट्र में रहेंगे। साउथ के हिंदुओं से पूछ लो। वो हिंदू राष्ट्र में रहेंगे। हम उन लोगों से पूछ लो जो रावण की पूजा करते हैं हिंदू राष्ट्र में रहेंगे राम के राज में अगर फिर भी वो तुम जीत जाओ तो जितने सितम चाहते हो कर डालो लेकिन ये सितम जो तुम हम पर करते हो तुम धोखा देते हो तुम कास्टिट्यूशन का वायलेशन करते हो अफसोस और दर अफसोस जो सेुलर पार्टियां हैं उनको दिखाई नहीं पड़ रहा है। वो आज भी इस चक्कर में है कि कहीं मेरा हिंदू वोट ना भाग जाए और जो अपीजमेंट की एक बहुत बड़ी साजिश आडवाणी साहब ने रची थी कि कहीं अपीजमेंट के नक्कर में हम ना फंस जाए। ये सिचुएशन आज हमारे साथ है। और मैं खुले आम कहता हूं उन लोगों से। मुझे बराबर मेरे उसप आता रहता है। तुम पाकिस्तान चले जाओ। अरे हम पाकिस्तान क्यों जाएंगे? इसलिए कि हमने तो अपने खून को बांट दिया था। ठुकरा दिया था जिना को हमने इसलिए हिंदुस्तान आप किया था कि तुमने ऐलानिया यह कहा था कि हम ये सेकुलर हिंदुस्तान बनाने जा रहे हैं और उसकी तस्दीक करी थी अंबेडकर के उस कास्टिट्यूशन को अडॉप करके बराबर के हकदार हम हैं। लेकिन हमारे साथ मुश्किल अब यह हो गई है कि अब कोई लीडर मैं तो कहता हूं कि अगर हम मौलाना आजाद को नहीं पैदा कर पाए तो हिंदू भी कोई नेहरू नहीं ला पाए और कोई जिन कोई गांधी पैदा नहीं कर पाए। तुम भी उतने ही मुजरिम हो। यह धोखे के गांधी ढुलाते हो और हिंदू उतना ही मुजरिम है जब वह कहता है कि यह विश्व गुरु हमारा पैदा हो गया गजब खुदा का जहां नेहरू प्राइम मिनिस्टर रहा हो जहां इंदिरा जी प्राइम मिनिस्टर रही हो जहां अटल बिहारी वाजपेयी प्राइम मिनिस्टर रहे हो वहां ऐसा शख्स जो रोज और रोज आंखें बंद किए बैठा है चलो हमारे ये तो चुप कर दी तुमने। वो जो तुम्हारे आरएसएस वालों ने जो मंदिर बना के रखा है उस उसप जो लूट मची है उसी पे कुछ बोल देते। आप नेहरू और गांधी के साथ वाजपेई को आप एक सांस में आप नाम ले रहे हैं। जी मैं बात लेकिन लेकिन ऐसा क्यों? ये तो वही वाजपेयी हैं जिन्होंने बाबरी मस्जिद को समतल करने की उन्होंने बात कही थी। क्या आरएसएस की आईडियोलॉजी वो तो आरएसएस की आईडियोलॉजी से उसी से ही थे। वो जनस थे। मैं आपसे बताऊं वाजपेयी जी से मेरा इंटरेक्शन था। वाजपेयी जी के बारे में एक बात तो यह बात आपको माननी पड़ेगी कि वो डेमोक्रेट थे। उन्होंने कभी कॉन्स्टिट्यूशन के वायलेशन की बात नहीं करी। पहली बात ये जी और पढ़े लिखे आदमी के साथ-साथ मुहज्जब थे। तो क्या हम एक मोहज्जब संघी एक्सेप्टेबल है? क्यों? मोहजब का संघ एक्सेप्ट आप कह रहे हैं देखिए एक तरीका वो है आप एक कॉन्स्टिट्यूशन की बात कर रहे हैं लेकिन जब उन्होंने यह कहा कि बाबरी मस्जिद को उन्होंने समतल करने की बात कही बहुत नुकीले वो हो गए उनको समतल कर लिया जाए ये तो अनकस्ट्टिट्यूशनल सबसे बड़ी बात तो उन्होंने यही अन्नट्यूशन बाबरी मस्जिद गिरने के बाद उन्होंने उसको कंडेम भी किया था देखिए वो डिप्लोमेट थे वो आरएसएस के आदमी थे इसमें कोई दो राय नहीं हम लेकिन ऐसे मंजर आपने आपने देखे कि हिमाचल प्रदेश के चीफ मिनिस्टर की बेटी की शादी उस दिन उसको गिरफ्तार कराने कौन गया था? यह हिंदुस्तान की तहजीब है। आप मासूम अपोजिशन के लीडरों को जेल में भेज दें। ये आपकी तहजीब है। इसलिए मैं वाजपेयी जी के बारे में कह रहा हूं कि उनकी अपनी आईडियोलॉजी थी। लेकिन ये सितम नहीं थे। और जिस वक्त वो गुजरात में कत्लेआम हुआ है तो वह तारीख तकरीर भी उनकी मौजूद है कि तुम्हें अपना राज धर्म निभाना पड़ेगा। आज क्या हो रहा है? आज तो आप एक लफ्ज बोलने को तैयार नहीं है और खुले आम यह कहते हैं कि हर वो शख्स तो ये इसलिए मैं कहता हूं कि वाजपेयी मेरी मेरी सोच से हो सकता है अलग हो आईडियोलॉजी उनकी अलग थी मेरी अलग है लेकिन एक मुजब आदमी थे जिन्होंने जिनके बारे में मैं समझता हूं जाती तौर पर आप इलाफ कर सकते हैं। एस ए प्राइम मिनिस्टर वो उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं की जो कॉन्स्टिट्यूशन के वायलेशन के बाद तुमने ओथ लिए और ओथ लेने के बाद जिस तरीके से इंस्टिट्यूशन पे कब्जा किया है वो तो उन्होंने नहीं किया था। तो मैं तो साफ ये बात कहता हूं। मुझे इंदिरा गांधी से इख्तलाफ था इमरजेंसी की वजह से। मैं हूं कांग्रेसी बाय हार्ट। पार्टी में किसी की नहीं हूं। लेकिन इंदिरा गांधी का एक बड़प्पन यह भी था इसलिए कहता हूं बड़ा उनको इमरजेंसी की बात लगती है। इमरजेंसी के बाद उन्होंने फेयर इलेक्शन करवाया हार गई। ये फेयर इलेक्शन कराएंगे। यह जो एमसी चल रही है इसके बाद कोई तसवुर कर सकता है। फेयर इलेक्शन ना हो इसलिए नॉमिनेटेड इलेक्शन कमीशन बना दिया। नॉमिनेटेड इसलिए कहता हूं कि जब तुमने चीफ जस्टिस को नेचुरल एंपायर को हटा दिया तो नॉमिनेटेड तो हो ही गया। बिल्कुल। तो अब क्या यह इलेक्शन फेयर होगा? और यह हमारे घुसपैठिए के नाम पर यह जो मुसीबतें ढाई हुई है इसीलिए मैं बार-बार कहता हूं और आपसे भी कह रहा हूं हर जगह कहता हूं कि एक बार मुसलमान ये ऐलान कर ले कि भाई अब हम इलेक्शन से हट रहे हैं। क्योंकि हम कैटलिस्ट हैं इस मुल्क में हुकूमत वो बनाता है जो हम पर सितम ढा है। जब हम हट जाएंगे तो फिर रोजीरोटी पर लड़ाई होगी। अब उसकी वजह से कितने नुकसानात हो रहे यानी इलेक्शन कमीशन को बर्बाद कर दिया क्योंकि घुसपैठियों के नाम से नाम काटने थे। अरे हम हट जाए खुद ही नहीं वोट डाल रहे हैं। तुम नाम कहां तक काटोगे भाई हम तो शायद वो फेल हो जाए। अभी तो जाने कितनों के नाम में कांटे दे रहे हैं। तो यह तो जो सेकुलर पार्टीज हैं इनके लिए भी लगातार यह कहा जा रहा है। यह बोला जा रहा है कि भाई आप एक इलेक्शन में आप पार्टिसिपेट मत करिए। वैसे भी तो आप हार ही रही हैं। तो आप यही बात जो है मुसलमानों के लिए आप बोल रहे हैं कि मुसलमानों को ना करें। फिर तो खुला मैदान नहीं हो जाएगा। नहीं खुला मैदान होने दीजिए। देखिए वजह क्या है? सेकुलर पार्टियां क्या मुल्क के लिए लड़ रही हो? अपने वजूद के लिए लड़ती हैं। हम ममता बनर्जी को मालूम नहीं था। कि वह हराई जाएंगी। उनको मालूम नहीं था कि उनके वोट काटे गए हैं। उनको मालूम नहीं था कि वहां फौज तैनात की गई है कि क्या करना है। लेकिन 25 सीटें छोड़ने को तैयार नहीं थी। इसलिए कि हम हमको बनना है आखिर। हर पार्टी अपनी वजूद के लिए लड़ रही है। और आपको मालूम ही है ये झगड़े भी क्या है? बिहार में क्या हुआ? यूपी में अभी क्या होगा? अलायंस होगा। हम जहांजहां मुसलमान का्ससी है वहां झगड़ा होगा। इसलिए कि मुसलमान का वोट उनको विनिंग सीख दिलाता है। तो जब ये फिर झगड़े होंगे अपनी पार्टी को करने के लिए मुल्क के लिए अगर तुम कुर्बानी देना चाहते हो तो सारे इख्तलाफात छोड़ दो। एक होके लड़ लो। पूरी तरीके से तुम्हारे साथ हैं। लेकिन तुम तो अपनी पार्टी के लिए लड़ रहे हो भाई। हम गर्दनें हमारी जा रही हैं। बंगाल में ममता बनर्जी हार के लिपट गई। बुलडोजर किस पे चल रहे हैं? घर किसके लूट रहे हैं? घुसपैठी के नाम से हमारी कौम पर और और यूपी में भी यही होगा और सब जगह यही होगा। तो एक बार सबकी औकात को पता हो जाना चाहिए। यह मेरी सोच है। लेकिन मुश्किल यह है कि मुसलमान को कोई 5 साल पूछता नहीं है। इलेक्शन के वक्त कुछ आगे पीछे लोग आ जाते हैं। कुछ गाड़ियों में बिठा दिए जाते हैं। कुछ की जेब में पैसे डाल दिए जाते हैं। और वो इलेक्शन को एक त्यौहार समझते हैं। वो समझते हैं कि कोई ये त्यौहार है, कोई मेला है, कोई जश्न है। इलेक्शन जश्न नहीं है। तुम्हें आगे के 5 साल 10 साल के लिए तुम्हें खाका तैयार करना है। कौन रहबर कौन लीडर तुम्हारा आएगा? इस मुल्क में यह बात समझने के लिए लोग कासिर हैं। मैं यह नहीं कहता एक सबके पास तो होया है। किसके पास नहीं गए? कांग्रेस के साथ रहे। कांग्रेस को हराने के लिए मुलायम सिंह के साथ उनके साथ वो सब खत्म हो गए। निपट गए। कोई बचा और जब कोई नहीं बचा तो तुम्हारे पास ऑप्शन क्या है? कहते हैं एतेजाज करो। एतेजाज का हक तो हम पर है ही नहीं। इसलिए कि नहीं है कि शाहीन बाग में एक गांधेनियन मूवमेंट खवातीन ने किया। उनके लोग आज भी जेलों पर बंद है। वो हक भी हमसे छीन लिया गया। कोई पूछता है इन लोगों से जिनके बच्चे जेलों में है। उनके घर में क्या हो रहा है? कैसा मातम है? उनकी माएं किस तरह से अपने दरवाजे पर देख रही है कि मेरा बेटा कब आएगा? वो हक भी हमारे पास नहीं है। रैलियों से नाम भी नहीं लिया जाता है उन लोगों का। शाहीन बाग मूवमेंट जो हुआ उसमें पॉलिटिकल प्रिजनर्स जो जेलों में हैं छछ साल से बिना ट्रायल के उनका नाम लेना भी कोई गवारा नहीं करता। उनकी बात करना तो बहुत दूर की बात है। नहीं देखिए आप मैं आपको वाक्य बताऊं मैं जस्टिस कार्डू साहब के साथ एक डिबेट में था हम जस्टिस कार्जू साहब से मैंने कहा कि हिंदुस्तान में आजाद हिंदुस्तान में दो गांधरी मूवमेंट हुए एक किसान मूवमेंट और एक शाहीन बाग का मूवमेंट उनके सेकुलर क्रेडेंशियल्स में कोई डाउट नहीं लेकिन उनके मुंह से क्या निकला अरे भाई वो तो मुसलमानों का मूवमेंट था तो मैंने ने कहा क्या ये हक भी छीन लिया हमसे तो घबरा गए। जब उनके दिमाग में ये था कि ये मुसलमान इकट्ठे हो गए तो सोचिए उन लोगों के हाल क्या होगा जिनके ज़हन जंग आलूद है और जो शख्स ये कह दे कि या ऐसा बटन दबाओ कि करंट वहां तक पहुंच वो जब हाकी में वक्त लेकिन एक तरफ हम पिटिकल पार्टीज को देखते हैं। हम आरएसएस बीजेपी को देख रहे हैं। ये तमाम जो पिटिकल पार्टीज हैं हम इनको देख रहे हैं। और दूसरी तरफ हम आवाम को देख रहे हैं। ये जो आवाम है खासतौर पे जो मेजोरिटी है ये क्या आपको लगता है हमेशा से ही इतनी ही बटी हुई थी या बीजेपी के पावर में आने के बाद अचानक से रनुमा हो गई या हमेशा से यह था। यह जहन उसी तरीके से आरएसएस ने जो 100 साल काम किया उनके ज़हन को उन्होंने उसी तरह से पाला और परवरिश किया वो सब हमें सब सामने देखने के लिए मिल रहा है। वरना कैसे हो सकता है अदीब साहब ऐसा कि आपका पड़ोसी आपके ऊपर शक करने लगे। वो ये मानने लगे कि हां ये अगर कुर्ता पजामा पहनते हैं दाढ़ी है तो ये ये टेररिस्ट हो सकते हैं। ये जिहाद कर सकते हैं। इनकी औरतें तो ऐसी होती हैं। ये तो थूक के ही खिलाते होंगे। ये तो मस्जिदों में इनके कैंप्स इसी तरह से चलते होंगे। ये ऐसे कैसे एक आम शख्स कैसे यकीन कर सकता है? मैं आपको हिंदुस्तान की बात छोड़ दीजिए। अमेरिका में अभी मैं सफर पे था। मेरे बहुत प्यारे दोस्त लोग मेरे साथ पढ़ते थे। और उनका पूरा खानदान हार्ड कोर्स है। कोई अंदाजा नहीं होता था हिंदू मुसलमान हम लोगों के बचपन में थे ही नहीं। वो लोग भी अब हिंदू राष्ट्र का ख्वाब देख रहे हैं। हम तो क्या आपसे बयान करें? अब ये एंड दे वर सेुलर। जी उनके उन्होंने जिस तरह से मुझसे बातें की मेरा कलेजा फट गया। मेरे 50 60 साल पुराने दोस्त लोग। अब उनको कोई कैसे समझाए कि तुम कभी हिंदू राष्ट्र थे ही नहीं ना बन सकते हो। क्योंकि कहते हैं भारत माता की जय। अब अंग्रेजों के आने से पहले या मुगलों के आने से पहले कितनी माताएं थी भाई? कितनी माताओं के साथ बात करें? हकीकत तो हिंदुस्तान का तसवुर मुगलों ने कलेक्ट किया और अंग्रेजों ने कंसोलिडेट किया। तुम्हारे हाथ में दे दिया। कहते हैं हम ओल्डेस्ट डेमोक्रेसी हैं। हिंदुस्तान की तारीख में कभी डेमोक्रेसी नहीं रही। बादशाहत रही। एक राजा दूसरे राजा से लड़ता रहा। एक स्टेट दूसरे स्टेट से लड़ती रही। कहते हैं कि साहब मुगलों ने हमारे पास बड़ा जुल्म किया। मुगलों की हुकूमत किसने चलाई? यही राजपूतों ने जिनको हम राजा के पूत कहते हैं। वही राजा के पूत आज यूपी के चीफ मिनिस्टर हैं। यह हमेशा से राजा के पुत रहे। अब हुकूमत उनकी आ गई। लेकिन कुछ लोग तो ऐसे हैं जिस तरह से इन्होंने तैयार किया है। दो गुनाह किए हैं आरएसएस ने बहुत बड़े। और मैं हमेशा कहता हूं। एक तो यह कि इंफिनिरिटी कॉम्प्लेक्स में पूरी कौम को धोल दिया। यानी 20% 80% को खा जाएगा। हम एक खौफ पैदा कर दिया उनके अंदर और दूसरा वह मजहब जिसमें बेहिसाब टॉलरेंस था यानी हम राम को भी मानते हैं, कृष्ण को भी मानते हैं, ब्रह्मा को भी मानते हैं। शंकर को भी मानते हैं। सभी को मान रहे हैं। उस मजहब में उन्होंने पैदा कर दिया मेरिटेंसी। बजरंग दल, फला धमाका। अब यह सबसे लेटेस्ट मजहब है दुनिया का जिसको हिंदुत्व कहते हैं। जो सनातन धर्म या वैदिक धर्म है वो ओल्डेस्ट धर्म है। हम ये जो हिंदुत्व धर्म है ये नया धर्म है जो नफरत की बुनियाद पर है। लेकिन कौन आईडियोलॉजी? जो अब इस बात पे देखिए ना कि मस्जिदों के अंदर नवरात्रि का इतना अहम इनका त्यौहार है। हम अब मस्जिदों की छत पे चढ़ के तलवारें चला के मनाया जाता है। कहते हैं हम सनातन धर्मीय हैं। सनातन धर्मी तो ये है नहीं। सनातन धर्मियों से अगर बात करनी है तो शंकराचार्यों से बात करें। लेकिन एक ऐसा माहौल तैयार हुआ है। लेकिन यह सब इस वजह से हुआ है। कि जो अदालतों ने अपना रवैया अख्तियार किया अगर यह अदालतें चाहती और अगर यह मुंसिफ होती तो जरूर उनको पूछना चाहिए था। मुहाफिज थे कास्टिट्यूशन के बचाने की जिम्मेदारी उनकी थी। हम लेकिन ऐसेसे बयानात आ रहे हैं। ऐसे जजेस आ रहे हैं। रोज मस्जिदें तोड़ी जा रही हैं। और अब हालत ये है कि पहले तो लिंच करते रहे। कोई नहीं बोला। अब उन्होंने कहा कि आखिरी हरबा ये है कि इनकी इबादतगाहों को तोड़ो। कुछ तो बोलेंगे। तब भी नहीं बोल रहे। अब वो करें तो क्या करेंगे? मैं इस पर आ रही हूं और मेरे इससे जुड़े हुए आपके कई सवाल हैं। मैं इस उस पर आऊंगी फेस पर। लेकिन जो आपने अदालतों की बात की है आप कह रहे हैं कि ये मुल्क जो है अंबेडकर ने जो हमें कॉन्स्टिट्यूशन दिया डॉक्टर अंबेडकर ने और फिर उसके बाद नेहरू की आप बात करते हैं उस आईडियोलॉजी की आप बात करते हैं उस पर ये ये मुल्क जो है वो टिका हुआ है लेकिन अभी आपको नहीं लगता कि एक तरफ हिंदू राष्ट्र की बात हो रही है। कुछ एक्सपर्ट कहते हैं कि दिस इज ऑलरेडी एन अनडिक्लेयर्ड हिंदू राष्ट्र ये अनडिक्लेयर्ड हिंदू राष्ट्र है। ये कहा जा रहा है। यह भी कहते हुए नज़र आ रहे हैं कि पूरी तरीके से यहां पर एक इज़राइली मॉडल जो है वह नाफ़िज़ किया जा रहा है। यानी कि इजराइल जो गाज़ा में करता है, जो लेबनान में कर रहा है, जिस तरह से वो इंसानी हुकूक की और इन सब की खिलाफवर्जी करता है, वो सब अब हिंदुस्तान में हो रहा है और उसको धीरे-धीरे करके उसको नाफिज़ किया जा रहा है। अदालतें एक ऐसा इंस्टिट्यूशन जहां पर ये लगता था कि कहीं से अगर आपको इंसाफ नहीं मिलेगा तो आप सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे। आप हाई कोर्ट का रुख करेंगे। अगर वही अदालत ये कह दे लाखों लोगों से इस बार नहीं तो अगली बार दे दीजिएगा आप। अगर वहां का चीफ जस्टिस ये बोल दे कि उन्हें भगवान की शरण में जाना पड़ा ये जजमेंट देने से पहले तो फिर आपने किस बिना पर ये जजमेंट दिया है? जब आप और प्रधानमंत्री दोनों खड़े होकर उनके घर में पूजा करते हुए नजर आए। जी तो सवाल ये उठ रहा है फिर कि उन वो लोग मुसलमान और खासतौर पर वो लोग जिन पर जुल्म ढाया जा रहा है एससी एसटीज क्रिश्चियंस वो आखिर फिर जाएं तो जाएं कहां वो किस तरफ देखें पॉलिटिकल एजेंसी आपने उनसे छीन ली उनके लीडर्स खामोश बैठे हुए हैं वो कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं है वो हैं सिर्फ नाम भर के लिए हैं वो वहां पर खासतौर पर मुसलमानों की एससी एसटी तो फिर भी मैं देखती हूं कि उनकी फिर भी एक पॉलिटिकल एजेंसी है उनको लेकर फिर भी एक तरह का एक डर है उनको रिप्रेजेंट रिप्रेजेंटेशन देने का भी एक डर है। मुसलमानों के साथ तो वह भी खत्म हो गया है। तो फिर वो जाएं कहां? ये एक अजीब तरह की एक मायूसी का माहौल है। देखिए जो आदमी कहता है ये कि यह मुल्क सेकुलर मुल्क है तो वो झूठ बोलता है। हम ये मुल्क सेुलर मुल्क नहीं रहा है। और आप कह रहे हैं इन 12 सालों में नहीं रहा है या उससे पहले भी आपकी बात कर रहे हैं। बिल्कुल बिल्कुल ये सेकुलर मुल्क बिल्कुल नहीं है। जो कहता है वो झूठ बोलता है। आपने अभी इसराइल की और इनकी बात करी। यूएन की रिपोर्ट आने के बाद कि 20,000 बच्चे मार दिए गए और मोदी की जुबान से एक लफ्ज नहीं निकला। दोस्ती किस लिए है? दुनिया को मालूम है कि इसराइल मुसलमानों का सबसे बड़ा दुश्मन है। सिर्फ यही कनेक्शन है। आइडियोलॉजिकल अलाइनमेंट। बस यही एक कनेक्शन है कि हमने अपनी पूरी फॉरेन पॉलिसी को तहसनहस कर दिया। उन लोगों का साथ छोड़ दिया क्योंकि एक तो है हमने के मरने पर ताजियत नहीं की। उसके बाद बहुत से ऐसे मुल्क थे जो अभी भी इसराइल के खिलाफ नहीं थे। लेकिन यूएन रिपोर्ट आने के बाद पूरी दुनिया दहल गई कि यह किस किस्म का इंसान है। यह कैसी कौम है और नहीं बोला तो हमारा प्राइम मिनिस्टर नहीं बोला। जब ये बुनियाद बन जाए और उसके बाद भी लोग खामोश रहे जो सेकुलर हमारे हिंदू भाई हैं इनकी चुप्पी ने बहुत नुकसान पहुंचा दिया। हम तो डूबेंगे ही लेकिन यह मुल्क डूब जाएगा और फिर इसका एहसास उनको अभी हुआ नहीं है। हम जानते हैं कि बहुत से हमारे हिंदू दोस्त हैं जो उतने ही परेशान है जितने हम परेशान है। हमारी वजह से वो भी देशद्रोही कहलाते हैं। लेकिन मसला सिर्फ यह है कि वह विश्व गुरु जो हैं उन्होंने एक जो सपना दिखा दिया है। मैंने एक प्रोग्राम में यह कहा था नेहरू को 24 घंटे गाली ये देते हैं। आप तसवुर कीजिए कि मैं एक आईआईटी में बोलने नौजवानों से गया था। बुलाया था मुझे। तो मैंने वहां उनसे दो तीन सवाल किए। मैंने कहा हमसे नफरत क्यों करते हो भाई? हम कभी यहां हाकिम रहे होंगे अब तो तुम्हारे पंचर बनाते हैं। नौकरियां हमें मिलती नहीं। तुम्हारी गाड़ियां धोते हैं। ये हमसे शितम क्यों हमसे क्यों नफरत करते हो? नफरत तो बराबर वाले से की जाती है। ना हम नौकरियों में ना फौज में ना घर में कहीं। जब उसने सब बातें सुनी दूसरी बार वो मेरे घर आया और उसने मुझसे कहा कि साहब मैं आपको आईआईटी का स्टूडेंट तो उसने कहा कि मुझे ये अदर साइड ऑफ द पिक्चर मालूम नहीं थी। तो मैंने उससे पूछा कि तुम नेहरू को मुसलमान समझते हो। उसने कहा कि नहीं आईआईटी का बच्चा है वो अब अमेरिका में इस उसने कहा कि नेहरू नहीं मोतीलाल मुसलमान हो गए थे हम ये WhatsApp है जो चलता है इनका जो आरएसएस वालों का फिर मैंने कहा कि नेहरू के बारे में उनका बहुत अ्याश आदमी था। यानी आप देखिए उसने इस मुल्क में ऐसी बुनियादें रखी। अब मोदी साहब का मसला यह है कि उनको हमारी फिक्र बहुत है। हमारी जायदादों पे वफ की जायदादों पे बड़ा नुकसान हो रहा है। हम मुसलमानों की जायदादें ठीक करेंगे। और जो अपनी जायदाद पे लूट है उस पे चुप रहेंगे। हम मुसलमान औरतों के साथ बड़ा सितम हो रहा है। हम कानून लाएंगे। अपनी बीवी से लेकर सारी हिंदू औरतें जो बेचारे सालों से बीमार घूम रही हैं और जिनको तलाक नहीं मिल रही है उस पर चुप रहेंगे। तो जब यह परसेप्शन पैदा हो जाए, यह सोच हो जाए कि हम तुम्हारे मजहब के अंदर दखल देंगे, अपने मजहब को नहीं पढ़ेंगे। ये सिचुएशन जब पैदा हो गई है, अफसोस सिर्फ सबसे बड़ा यह है कि जो सेकुलर पार्टियां हैं जिस दिन वो इस मुल्क के लिए खड़ी होंगी और जिस दिन वो हमको यह समझेंगे कि हम इस मुल्क के से बाहर नहीं है और अगर वो ये समझेंगे कि हमको हमारे खिलाफ जुल्म होने पे आवाज उठाने से डरना बंद कर देंगी। एक तरह से वह हिंदू कौम को बुरा भला कह रही है। उनके जेहन में यह है कि अगर मुसलमानों के लिए बोल दिए हम उन पे सितम हो रहा है। अगर हमने आवाज उठा दी तो हमारा हिंदू वोट चला जाएगा। मैं उन सेुलर पार्टियों से कहना चाहता हूं तुम हिंदुओं के का मजाक उड़ा रहे हो। क्या सारे हिंदू कम्युनल है? अरे हमारा वजूद तो हिंदुओं की वजह से है। सेकुलर हिंदुओं की वजह से है। फिर डर क्यों रहे हो? खुल के क्यों नहीं आते हो? और यह भी तो अदीप साहब थे। उसके बाद भी तो आप हार ही रहे हैं। उसके बाद भी तो आप हार ही रहे हैं। आप बताएं कि आप कहीं पर भी तो आप देखिए बिहार में आपने कहा कि आप आप लड़ लेंगे। बिहार में आप हार गए बुरी तरीके से। 20 साल की एंटी इनकंबेंसी वहां पर काम नहीं की। वहां तो ये कहा जाता था ममता बनर्जी वो तो शेरनी है और क्या-क्या उनको नाम दिए जाते थे। वो भी देखिए। शेरनी का हमने सब कुछ जिगर और सारा सब कुछ देख लिया। उनका क्या हाल हुआ। इसके अलावा भी कांग्रेस पार्टी को भी आप ये देखिए कि अगर आप अगर आप उनके जायज सवाल मुसलमानों के नहीं उठा रहे हैं या उनके बारे में आप खुलकर बात नहीं कर रहे हैं तो भी तो भी तो आप कुछ हासिल नहीं कर पा रहे हैं। अभी एक मीटिंग हुई जिसमें उनके मुस्लिम विंग के कुछ लोग वहां पर नुमाइंदे मौजूद थे। राहुल गांधी ने कहा कि अगर हम माइनॉरिटी नहीं अगर हम मुसलमान नहीं बोलेंगे तो फिर वो कांग्रेस पार्टी से फिर एक तरह की उन्होंने कहा कि वो गद्दारी है फिर वो कांग्रेस पार्टी नहीं है। अब आप यह सोचिए कि अगर हम यहां आकर खड़े हो जाएं कि हमारे लिए सिर्फ यह अहमियत हो जाए और उस पर मुसलमान नाचतेगाते हुए नजर आ रहे हैं कि राहुल गांधी ने यह बोल दिया है कि मुसलमान अब मुसलमानों को मुसलमान कहा जाएगा। माइनॉरिटी नहीं कहा जाएगा। तो हमारी बारगेनिंग पावर जो है मुसलमानों की बारगेनिंग पावर जो है वो कहां आकर मैं आपसे अ कर दूं मेरा साका रहा है सोनिया जी से के साथ काफी साल रहा मैं निहायती शरीफ औरत हम अनफॉर्चूनेट उनकी सेहत खराब हो गई जब वो हाकिम बनने की उम्मीद थी प्राइम मिनिस्टर तो तरह-तरह के इल्जामात लगाए कि तुम बाहर की हो फला हो डवाका हो और जब कोई हिंदुस्तानी इंग्लैंड का प्राइम मिनिस्टर नस्ल का बन बन जाए तो जश्न मनाते हैं। और वही सोनिया गांधी जिसने इतनी बड़ी कुर्बानी दी मैं उनको क्यों सबसे बड़ा समझता हूं? क्योंकि उन्होंने अपने अपनी मोहब्बत में अपने मजहब को छोड़ा, अपने कल्चर को छोड़ा, अपना मुल्क छोड़ा और फिर उस जिसके लिए उसने मोहब्बत की उसको यहीं के लोगों ने उसके पड़ा जिस्म के उड़ा दिए। जिसको उसने अपनी मां बनाया उसकी गोद में उसने आखरी सांस ले ली। कोई दूसरी औरत होती तो लानत भेजती इस मुल्क पर चली जाती। लेकिन उसने अपने बच्चों को यही रखा। उस औरत की बीमारी के बाद राहुल गांधी जो कोशिश कर रहे हैं उनको अनफॉर्चूनेट यह है कि उनको चाहिए था कि जो पुराने कांग्रेस के लोग थे जिन्होंने कांग्रेस की आईडियोलॉजी को समझा था जिस पर काम किया था उनसे मशवरा करना चाहिए था और ये जो सिर्फ आज के दौर का आया है कि Twitter पे ले दो और फला भेज दो और प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दो। सड़क पे आना चाहिए था। जहां तक मुसलमानों का सवाल है, हकीकत तो यही है कि हमारा नाम लेने के लिए काफिया मिलाया जाता है। दलित, बैकवर्ड बेच सबके नाम जोड़ दिए जाते हैं। एंड मैन आरटीज सितम पे हम पे हो रहा है। क्या किसी सिख पे हो रहा है? उसकी हिम्मत है सिख को मारने की? किसी जैन पर हो रहा है। क्रिश्चियंस है या मुसलमान है। पूरा इंस्टट्यूट चेंज करना पड़ेगा। जहां तक आपने इलेक्शन की बात की इलेक्शन से अब आप इनको नहीं हरा सकते। फिर क्या जरिया है? एसआई आर जो कॉन्स्टिट्यूशनल एक कॉन्स्टिट्यूशनल निजाम आप लोकतांत्रिक निजाम में हैं। गांधी गांधी कह चुके थे। कह के एक फार्मूला दे गए थे। नॉन कोऑपरेशन हम सड़कों पर और नॉन वायलेंस पूछो इनसे यह पार्लियामेंट में क्या होगा? यह चलने देंगे। यह तो सिर्फ इस चक्कर में है कि टू थर्ड मेजॉरिटी जैसी आए हम अपने सारे कानून बना दें। यूसीसी से लेकर से लेकर सब क्योंकि जब हम पार्लियामेंट में थे तो हम लोग बोलते थे स्पीकर सुनता था। हम अब स्पीकर बोलता है अगर आप बोलेंगे तो बाहर हो जाएंगे 100-100 लोग 100-100 मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट एक दिन में खारिज बिल्कुल और फिर कहते हैं ये डेमोक्रेसी है हम ये सेकुलरिज्म है ना यहां डेमोक्रेसी बची है ना यहां सेकुलरिज्म बचा है आप राहुल गांधी के बारे में क्या सोचते हैं राहुल गांधी ने एक यात्रा निकाली एक ऐसे दौर में जहां सिर्फ नफरतों की बात हो रही थी मोहब्बत की उन्होंने बात की अकेला आदमी है जिसने आरएसएस से झगड़ा किया लेकिन कांग्रेस कांग्रेस की आईडियोलॉजी आपको बता दूं। सबसे पहले कांग्रेस में राहुल गांधी ने आरएसएस पे डायरेक्ट अटैक किया। हम पहली बार हम मैंने बयान दिया और वो इंकलाब में हमारे दोस्त ने छापा कि नेहरू के बाद ये पहला शख्स है जिसने आरएसएस पे डायरेक्ट अटैक किया। इसकी इतनी हिम्मत तीन चार दिन के बाद जब वो दिल्ली मध्य प्रदेश जा रहे थे तो कमलनाथ ने कहा ये शिव भक्त हैं और ये ब्राह्मण है। जलेधारी ब्राह्मण है। हम मैंने फिर एक बयान दिया कि ये क्रिश्चियन मां पारसी बाप के बेटे हैं। ये झूठ बोलते हैं ये लोग। क्या जरूरत थी आपको बताने के लिए कि यह ब्राह्मण है। इनकी रगों में नेहरू का खून बह रहा है। इनकी रगों में इंदिरा गांधी का खून बह रहा है। इनकी रगों में शरीफ प्राइम मिनिस्टर राजीव गांधी का खून बह रहा है। तो कांग्रेस के लोगों ने मुझसे कहा कि साहब आप तो हमेशा कांग्रेस की बुराई करते हैं। ये है सोच हम डरने की क्या बात है? कि क्या क्या आपको लगता है कि राहुल गांधी जो बात करते हैं राहुल गांधी जो कह रहे हैं और जो पूरी कांग्रेस है उसमें आपस में आपको तालमेल की कमी नजर आती है क्योंकि आप ये देखिए अदीप साहब जब आप देखते होंगे अलग-अलग डिबेट्स और इन सब में जैसे ही राम मंदिर की बात आती है तो डिफेंड करने के लिए वो ये कहते हैं कि आप हमसे कहेंगे राजीव गांधी ने तो ताला खुलवाया था बाबरी मस्जिद का। जी तो ये डिफेंड करने के लिए कहा जाता है। अब आप ये देखिए कि जो दिग्विजय सिंह है वो यात्रा निकाल रहे हैं और कह रहे हैं कि जो मैंने सबसे पहले जो मैंने दान दिया वो पैसा मेरा वापस करिए उज्जैन से लेकर अयोध्या की वो यात्रा की बात कर रहे हैं। सो डोंट यू सी दिस इज अ वेरी कंफ्यूज्ड कांग्रेस। एक तरफ राहुल गांधी हैं जिनमें थॉट्स की क्लेरिटी लगती है। जो सबके को साथ ले चलने की बात करते हैं, जो हिस्सेदारी की बात करते हैं, जो मुसलमानों की बात करते हैं। हालांकि उतनी खुल के नहीं करते हैं जितने एससी, एसटी की बात करते हैं, ओबीसीज की बात करते हैं। उतनी मुसलमानों की बात नहीं करते। लेकिन चलिए कि इस पूरे दौर में एटलीस्ट कोई तो है जो बात करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन मेरा सवाल वही है कि जब मुसलमानों के घर बुलडोज किए जाते हैं। जब उनके उनके दर्सगाहों को उनको तोड़ा जाता है। लीगल बताकर इललीगल सबसे बड़ा काम किया जाता है। जब वो हर घड़ी नुक्कर चौराहे पर मारा पीटा जा रहा है। जब भी उनकी जो औरतों की इज्जत है उनको अलग-अलग तरीके से उसे किस तरह से बिल्कुल मतलब मुझे कहते हुए बहुत अजीब लगता है कि उनके साथ क्या कुछ उनकी किया जा रहा है? किस तरह के अल्फाज़ उनके लिए इस्तेमाल किए जाते हैं? तब ये लोग आखिर चुप क्यों रहते हैं? जब आप ये आरएसएस से लड़ने की बात कर रहे हैं। तो क्या आपको मुसलमानों के साथ उसी तरीके से खुलकर बात सिर्फ एक वीडियो पर ट्वीट लिखकर कर देना या फिर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर देना। इज दिस इनफ? कहां है अखिलेश यादव जो अभी मुसलमानों का वोट मांगेंगे अभी आने वाले उत्तर प्रदेश के इलेक्शन में कहां है तेजस्वी यादव कहां है और दूसरे लोग जो मुसलमानों के वोट के बिना जो खड़े ही नहीं हो सकते हैं यही तो दर्द है मेरे सीने में यही तो मैं देख रहा हूं कि मेरे साथ क्या हो रहा है ये दर्द हम बयान नहीं कर सकते आपसे हम हम ये तसवुर भी नहीं कर सकते थे कभी आप मिसाल के तौर पर मुलायम सिंह जी मेरे अच्छे दोस्त रहे। हम लोग काफी रहे। [नाक से की जाने वाली आवाज़] उनके एक बड़े लीडर थे आजम खान। हम इलेक्शन में उनको एक हेलीकॉप्टर दिया जाता था कि जाओ मुसलमानों में हमारा वोट लेके आओ। पिछले दो इलेक्शन से जब से मोदी साहब आए हैं उनको साइकिल भी नहीं दी जाती। स्टेज पे नहीं बिाला जाता। ये हालत है हर पार्टी की। और ये वो लीडर है आजम खान जिनकी तूती बोलती थी। जी जी और नहीं जिसकी वजह से मुलायम सिंह मुलायम सिंह बने मुसलमानों की वजह से लेकिन अब उनको लगा भाई मेरा हिंदू वोट ना भाग जाए तो मुसलमान तो मजबूरी में मुझे वोट देगा। इसीलिए मैं कहता हूं ये मजबूरी खत्म करो। एक बार इनसे कहो तुम अगर मेरे साथ खड़े हो हिस्सेदारी दे रहे हो तो साथ आओ। यह आज से नहीं है। मैं आपसे अर्ज करूं कि हर पार्टी ने तीसरा चौथा पांचवा सेकंड तो छोड़ ही दीजिए। किसी पार्टी में चौथा पांचवा मुसलमान इस हैसियत का है कि पंचायत का टिकट दिला दे। किस बात का जश्न? क्यों ताबेदारी करो भाई? ज़हनी गुलाम बना दिया है आपको। ऐसा लगता है आप आप जूती उठाइए उनकी। हम ओवैसी को के को लोग क्यों उसको पसंद कर रहे हैं या मुसलमानों में उसकी मकबूलियत है यही वो दर्द है वही फ्रिस्टेशन है लेकिन मुसलमान तो बीजेपी को हराने के लिए ओवैसी को वोट भी नहीं देता कि भाई ओवैसी क्योंकि जीत नहीं पाएंगे इसलिए उनको वोट नहीं देता लेकिन वो दर तो समझने की कोशिश है किसी पिटिकल पार्टी ने कोशिश करी कि अपनी जमात में कोई ऐसा मुसलमान मजबूत देते जो मुसलमानों के मामलात को समझ सकता, उसकी फिक्र कर सकता, उसके लिए बोल सकता तो फिर किसी मुस्लिम पार्टी की जरूरत नहीं थी। हिंदुस्तान में किसी भी मुस्लिम जमात को मुसलमानों ने वोट नहीं दिया। क्या इसको गलती मानते हैं आप? गलती मानते हैं क्या? गलती नहीं। हम वो आज भी सेुलर हिंदुस्तान को लेकिन वो सेकुलर हिंदुस्तान लेकिन मेरा सवाल हमेशा यह होता है अदीप साहब कि जब मुसलमान कभी अपनी कोई पार्टी बनाने लगता है तो वो कम्युनल हो जाता है कि वो मेरा आप सवाल सुनिए कि वो कम्युनल हो जाता है कि वो एक मुसलमानों ने अपनी पार्टी बना ली एक मजहब के नाम पर वो पार्टी बना रहे जातियों पर पार्टी बनाने वाले कभी कम्युनल नहीं होते क्या सिखों की अपनी पार्टी नहीं है सिखों की अपनी पार्टी है एससी एसटीज में अलग-अलग छोटी-छोटी जो जातियां हैं किसी का 1% वोट किसी का 2% वोट उनकी अपनी पार्टियां हैं। एससी एसटीज के नाम पर, मायावती की, दलितों के नाम पर बनाने वाली उनकी अपनी पार्टी है। जब वो कम्युनल नहीं होती हैं तो मुसलमानों की पार्टी होती है। वो कम्युनल क्यों हो जाती है? देखिए 15 अगस्त को हम दूसरे दर्जे के शहरी मान लिए गए थे। आप 15 अगस्त से बोल रहे हैं। आप सन 47 दोनों कौमों ने ताली बजाई और जमीन बट गई। और 16 अगस्त को हम मुजरिम करार पाए। सारा इल्जाम हमारे ऊपर लगाया गया। यही मौलाना आजाद ने कहा था कि मजहब के नाम पे अगर डिवीजन करोगे तो उतना हयात हिंदुओं का तासुब झेलना पड़ेगा। हम उसके शिकार हैं और इसीलिए हम जिन्ना से नफरत करते हैं और उन लोगों से नफरत करते हैं जो हमें हमारे हाल पर छोड़ के अपनी दुनिया बसाने चले गए। लेकिन हम उस वक्त तक अपना हक नहीं छोड़ेंगे जब तक कि यह कॉन्स्टिट्यूशन मौजूद है। हम कोई ऐसी बात नहीं करते हैं कि हमको कोई स्पेशल ऑफर दिया जाए। जिस बुनियाद पर हमने अपने खून को बांटा था वो बुनियाद थी कि हम जमहूरी मुल्क में रहेंगे और यही वजह है कि मुसलमानों ने किसी भी मुस्लिम जमात को आजाद हिंदुस्तान में यूपी में और पूरे नॉर्थ इंडिया में डॉक्टर फरीदी से बड़ा कोई कायद नहीं दिया। मेरी खुशनसीबी थी मैं उनके बहुत करीब था। डॉक्टर फरीदी को भी दो और 3% वोट से ज्यादा नहीं मिला। हालांकि उन्होंने पार्टी दलितों के साथ मिलकर बनाई थी। उस वक्त मुझसे कांशीराम ने यह बात कही थी जब मैं हिंदुस्तान बहुत दिन के बाद आया था। उन्होंने कहा कि डॉक्टर फरीदी ने जो दलितों की परिहार के साथ मीटिंग करी थी। उसके बाद मैंने डीएस फोन बनाई थी। जो आज मैं यहां हूं और तुम्हारी कौम ने डॉक्टर फरीदी को भुला दिया। तो जो हमने हम कर सकते थे अगर तो वह था जो डॉक्टर फरीदी ने कहा था कि दलित और पिछड़े हम इनके साथ कोई जमात बनाओ वो हमने नहीं बनाई कांशीराम ने कोशिश करी तो अब आपके पास कोई इशारा नहीं सब कोशिशें कर ली अगर यह सेकुलर पार्टियां हमसे ऐसे ही डरती रही और यह समझती रही कि मजबूरन हम वोट देंगे मैं तो आपके चैनल के जरिए अपने मुसलमान भाइयों से कहता हूं एक तजुर्बा करके देख लो तुम हट जाओ एक इलेक्शन से उस वक्त तक जब तक कि ये तुम्हें हिस्सेदारी ना दे कब तक ताबेदारी करोगे और ताबेदारी ये सब पार्टियां अभी देखिए यूपी में इलेक्शन होने जा रहा है एक-एक सीट पे झगड़ा होगा अलायंस तो कर रहे हैं जहांजहां मुसलमान है वो कांग्रेस भी लड़ना चाहेगी, मुलायम सिंह भी लड़ना चाहेंगे पूरी सीटों को। हम यानी हमारी सीटों पर तलवारें चलेंगी और फिर नतीजा ये होगा बंटवारा होगा। हम हट जाओ एक बार देख लो। फिर देखेंगे। मुझसे यह बात बहुत साल पहले मैंने ये बात करी थी। कुलदीप नयर साहब ने मुझसे कहा था ये हिमाकत की बात बंद कर दो। अगर तुम यह करोगे तो ठाकुर कुर्मी से उसे पंडित से लड़ेगा। पंडित उनसे लड़ेगा। वह उनसे लड़ेगा। लेकिन हम एज अ कैटलिस्ट हमने सबको जोड़ दिया। इनके यहां एक चानिका का एक सेइंग है कि अगर तुम्हें अपनी सरकार चलानी है अपने ऐब छुपाने हैं तो एक विलेन तैयार करो। तो एक विलेन तैयार हो गया। इस मुल्क में बर्बादी के सारे जिम्मेदार मियां हैं। तो जब ये बच्चों बच्चों में पहुंच जाए तो आप सोचिए हम जिस सोसाइटी में रहते हैं बहुत ही अच्छे बेहतरीन लोग हैं। अकेला मुसलमान हूं। अब 10 साल के बाद मुझे पता लगा कि जब मैं गया था तो हर घर में ये फिक्र थी एक मुसलमान यहां कैसे आ गया। हम और फिर उन्होंने धीरे-धीरे हम ये कहना शुरू किया कि आप मुसलमान नहीं लगते। यानी मेरे पास दाढ़ी नहीं है। दाढ़ी नहीं है, टोपी नहीं है, ऊंचा पैजामा नहीं है। मेरे बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ते हैं। पढ़ रहे हैं। तो वो हम उनको जो दिमाग में बिठाला गया जब ऐसी इलीट क्लास में जब यह बात हो तो उन वोटों को देखिए। हम एक क्या इसके लिए आप आप कहीं मुसलमानों को भी जिम्मेदार मानते हैं कि वो भी अपनी एक एक खाम खयाली की एक दुनिया में एक ऐसे चले गए कि उन्होंने जो एक तरह का एक एक इंटर रिलजन एक डायलॉग होना चाहिए था एक जो बातचीत होनी चाहिए थी जो उनके यहां तक पहुंचना चाहिए था जैसे आप देखें कि अगर किसी तरह के खिदमत खल्क के भी कोई काम हो रहे होते हैं तो हम ये देखते हैं कि सिखों की जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं वो वो काम करती हैं और उसको बहुत प्रचार और प्रसार भी उसका बड़े पैमाने पर किया जाता है। मैं यह नहीं कह रही कि मुसलमान नहीं करते हैं। वो भी करते हैं। लेकिन उसमें मैं देखती हूं कि उस तरह का प्रचार प्रसार जो है उतने बड़े पैमाने पर नहीं किया जाता है। या फिर उन्हें और बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है जो अब शायद अकल थोड़ी आ रही है। थोड़ा करते हुए नजर आ रहे हैं। क्या जो अभी मुसलमानों के मौजूदा हालात हैं, हम ये तो क्रिटिसाइज कर रहे हैं कि जो लीडरशिप है वो उसके लिए जिम्मेदार रही। उन्होंने अपने से दूसरे तीसरे नंबर की लीडरशिप को कभी पनपने नहीं दिया। इसीलिए आज फगदान है। कोई हमारे पास कोई ऐसा चेहरा ही नहीं जिसे हम ये कह सके कि हां यह है लीडर। इसके पीछे जाएंगे मुसलमान या ऐसा लीडर होना चाहिए। एक एक एग्जांपल के तौर पर। लेकिन एक समाज के तौर पर, एक कम्युनिटी के तौर पर भी आप क्या खामियां देखते हैं? मुसलमान को आपको दो हिस्सों में देखना पड़ेगा। हम एक साउथ का मुसलमान, एक हिंदी स्पीकिंग मुसलमान। साउथ का मुसलमान सारी कम्युनिटी से ज्यादा काम कर रहा है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसने 1857 नहीं देखा था। पार्टीशन नहीं देखा। उसने 1947 नहीं देखा था। उसने वो मज़ालिम नहीं देखे थे जो भागलपुर से शुरू होके और गुजरात तक चले। बिल्कुल। तो यह एक डिफरेंस दहा साउथ में और नॉर्थ में नॉर्थ में यकीनी तौर पर हम मुजरिम है। ऐसा नहीं है कि नॉर्थ में अगर आप देखें जब मुल्क आजादी से पहले कहते हैं कि हिंदुस्तान में मुसलमान ने पढ़ा नहीं। सर सैयद पहले शख्स थे जिन्होंने जदीद तालीम की शमा गाजीपुर में शुरू की थी। सन 62 में एक इंग्लिश स्कूल खोला था और फिर सर अलीगढ़ यूनिवर्सिटी आपके सामने सर सैयद ने जब वो यूनिवर्सिटी बनाई कॉलेज बनाया उस वक्त उनके बाद हर कॉलेज हर जिले में एक इस्लामिया स्कूल था। आज भी है। कोई जिला ऐसा नहीं है यूपी का बिहार का जहां मुसलमानों के मॉडर्न स्कूल यानी एजुकेशन स्कूल ना बने हो। लेकिन 47 के बाद उन स्कूलों पर कोई तवज्जो नहीं हुई। और आज वही स्कूल सबसे पीछे चले गए। हम जब आप स्कूलों की बात कर रहे हैं तो मैं एक सवाल मेरे ज़हन में आ रहा था कि आप मैं हूं या मेरे घर के और बच्चे हैं या मेरी बेटी है या और आप देखें किन स्कूलों में पढ़ रहे हैं वो कॉन्वेंट स्कूल्स में पढ़ते हैं। कॉन्वेंट स्कूल्स यानी कि क्रिश्चियंस के जरिए शुरू किए गए स्कूल। आप इसको कह सकते हैं कि भाई क्योंकि ब्रिटिशर्स यहां पर रहे उस वक्त से शायद इसकी इन सब की शुरुआत रही होगी। लेकिन मुगल भी रहे और उसके बाद मुसलमानों का जो पूरा एक दौर रहा क्या आपको नहीं लगता कि तालीम के हवाले से जो काम किया जाना चाहिए था जितनी बड़ी परसेंटेज में मुसलमान हैं जो आला तालीम स्कूल उनके होने चाहिए थे जिस तरह के होने चाहिए थे कि अगर कोई मुसलमान ये सोचे कि नहीं इस स्कूल में मुझे भेजना है या कोई भी खाली मुसलमान के दायरे में मैं इसे नहीं बांध रही हूं या कोई भी तो वो उस स्कूल में भेजें ऐसे आपको कितने स्कूल से नजर आते हैं फिर आप नॉर्थ और साउथ में इस में फर्क देखते हैं बिल्कुल देखिए मैं यही आपसे अ कर रहा था नॉर्थ का मुसलमान हम डिफेंसिव हो गया। नॉर्थ का मुसलमान 47 के बाद वो डिफेंसिव हो गया। और मुझे याद है कि जब मैं स्कूल जाता था ये 50 की बात कर रहा हूं। अर्ली 52 हम तो मेरे स्कूल के बच्चे मुझसे कहते थे पाकिस्तान बन गया। तुम यहां क्यों रहते हो? ओ तब बोल रहे हैं आप तो। हां। मैं मैं समझता नहीं था पाकिस्तान क्या है। हम तो मैं वालदैन से आके पूछता था कि हम यहां क्यों रह रहे हैं? हमारा तो कोई अलग मुल्क हो गया है। ये हमारे बचपन के वाक्यात तो पहले दिन से जब आपने डिफेंसिव कर दिया और जो कौम डिफेंसिव हो जाए या डर जाए। यही वजह है कि जो इस्लामिया स्कूल था वो आज भी वही कॉलेज है। उसमें मॉडर्न एजुकेशन नहीं गई। जो तालीम का मसला है साउथ में इक्वल है। आप आप देख लीजिए कि कि तमिलनाडु में मुसलमान 4% है और वहां सरकारी नौकरियों में 10% है। ये ये फर्क है वहां। वही तालीम ले रहे हैं। उनकी लैंग्वेज एक है। हमारे साथ ये सारी मुश्किलें हुई अगर हमारे यहां सच में अगर हम सिंसियर होती हमारी लीडरशिप और सेकुलर पार्टियों ने मुस्लिम लीडरशिप को कभी उभरने नहीं दिया। मैं फखुद्दीन साहब को जानता हूं कि वो आखिरी शायद थे जिनको इंदिरा गांधी ने फुल पावर दी हुई थी। उसके बाद से कोई भी ऐसा लीडर नहीं आया और जो भी लीडर आए वह पार्टी के लिए काम करते रहे। आज की सिचुएशन यह है कि हमारा कहीं वजूद ही नहीं है। हम कहीं है ही नहीं। दो तीन मेरे आपसे सवाल लास्ट एक तो यह कि क्योंकि आप मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के आप बहुत पुराने मेंबर हैं और जब हम मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बात करते हैं तो हमें लगता है कि मुसलमानों के जितने मिल्ली मसाइल हैं अ उनका एक तरह से कहीं ना कहीं स्यूशन या उनके लिए आवाज उठाने का काम शायद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड करेगा। इसके अलावा जो और दूसरी मिली जमातें हैं उनके रोल को आप किस तरह से फिलहाल देखते हैं मैं ये पाती हूं कि जब बात वफ की होती है तो हम देखते हैं कि बहुत बड़ी तादाद में जलसा हो जाता है उसमें लाखों लोग इकट्ठे हो जाते हैं या इसी तरीके से जब कोई इस तरह की कोई बात हो रही होती है जहां हिजाब की या इस तरह की रिलीजियस मामलों की तो हम देखते हैं कि लोग इकट्ठे हो जाते हैं। मैंने खुद इस तरह की बात काफी सारी चीजों को मैंने खुद कवर किया है। लेकिन जब बात लिंचिंग की होती है, जब बात उनके कॉन्स्टिट्यूशनल राइट की होती है, जब उनके वोटिंग राइट की होती है, जब इस तरह से मस्जिदों को जिस तरह से ढाया जा रहा है या हर गली नुक्कड़ चौराहे पर जिस तरह से वो मारे जा रहे हैं तब मैं इतना बड़ा प्रोटेस्ट या इतनी बड़ी कोई जलसा या इतनी बड़ी कोई चीज नहीं देखती। ऐसा क्यों है? अदीप साहब यह किस बात का डर है? मेरे आप जिस मजहब की नुमाइंदगी करने के लिए आप बने हैं। अगर आप उन्हीं की नुमाइंदगी नहीं कर रहे हैं। और अगर आप डर रहे हैं तो आपके साथ जो इतने लोग मौजूद हैं जो आपको एक उम्मीद की तरह से देखते हैं फिर वो क्या करेंगे? आपने बिल्कुल ठीक कहा के अगर हम सियासी जमातों से मानूस है तो हमें मिल्ली जमातों ने भी बहुत मायूस किया और हम खासतौर से आपको बताएं के मिल्ली जमातों के साथ हमारा रवाबित है और हम बहुत मायूस हैं उन लोगों से इसीलिए हम एक कोशिश ये हम लोगों ने जो कोशिश करी इसमें पढ़े लिखे मुसलमानों को दानिशों को एक प्लेटफार्म पे लाए हैं कि भाई आप आगे आइए कब आएंगे बाहर आप कोई और वक्त आएगा तो जो हजरात जिन्होंने दुनिया में हिंदुस्तान में और कई जगह अपने नाम पैदा किए हैं। अपनी सर्विज में अपने नाम पैदा किए हैं। अब रिटायर हैं। तो आके बैठिए कि क्या किया जाए। अब हम लोग जो अपनी छोटी सी ऑर्गेनाइजेशन चलाते हैं, इसमें रिटायर्ड जजेस हैं, रिटायर्ड फौजी है, प्रोफेसर्स हैं, लॉयर्स हैं। यही कोशिश कर रहे हैं जो हमें 25 साल पहले, 50 साल पहले करनी चाहिए थी। और इसी मसले पर हमने अभी इसी महीने 24 तारीख को हिंदुस्तान के कोई 150 लोगों को बुलाया है कि बैठ के फैसला करिए कि अब इसके बाद कोई और जगह जाना है या नहीं जाना है। क्या करना है क्योंकि अब किसी की हैसियत नहीं है कि उसको लोग फॉलो कर सके। ना हमारे पास अली बिरादरान है ना मौलाना आजाद है। ना कोई भी ऐसा लीडर हमारे पास नहीं है। अब कलेक्टिव लीडरशिप की जरूरत पड़ेगी हम और कलेक्टिव लीडरशिप जो सेकुलर हिंदू हैं क्रिश्चियंस हैं सिख हैं डिप्राइव क्लास है उनके साथ मिलकर इस तूफान को जो नफरत की आंधी चल रही है उसको रोकने का एक तरीका अपनाना पड़ेगा। हमारी लीडरशिप कलेक्टिव अब होनी चाहिए। हम हमने कोशिश की है कि जितनी भी जमातें हैं और जितने भी पीपल ऑफ सब्सटेंस है वो एक बार अपनी जमातों से ऊपर उठ के एक फैसला करें वो सेकुलर पार्टियों से पूछे कि तुम हमारे साथ खड़े होगे जब हमारी मस्जिद गिराई जाएगी जब हमारे बच्चे लिंच होंगे तुम्हारे दिल में दर्द उठेगा तुम्हें तो वोट चाहिए अगर कोई दलित खुदकशी कर ले हर पलिटिकल पार्टी वहां जाती है वोट की वजह से। हम गुड़गांव में सात लोगों के लिंच हुए। हम तरसते रहे कि कोई तो आके पूछे इन लोगों का कसूर क्या था? तो उस वजह से अगर ये पूरी कौम ये बात तय कर ले तो उस वक्त अखिलेश यादव को मुसलमान को स्टेज पर बिालने से डर नहीं लगेगा। और राहुल गांधी को मुसलमान के साथ आवाज उठाने में कोई परेशानी नहीं होगी। हमको अपनी आइडेंटिटी अपनी पहचानवानी पड़ेगी। अपनी रेलेवेंस साबित करनी पड़ेगी। कैसे? लेकिन अदीब साहब रेलेवेंस इसीलिए साबित होगी अगर हम मुसलमान कौम अपने को अशराफ, पासवांदा फला मंसक, फला बिरादरी इससे उठकर खड़ा होना पड़ेगा। क्योंकि आप अगर खड़े हो जाए तो आप यकीन करें। मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि बहुत सा सेुलर हिंदू आपकी तरफ देख रहा है। बहुत सा सेुलर हिंदू आपकी तरफ देख रहा है। आप उसके साथ खड़े हो। पहले अपने को मजबूत करें। बदनसीबी यह है कि मुसलमान के लिए एक जश्न है, मेला है इलेक्शन। अब उससे कहिए आप इलेक्शन से हट जाइए। अरे साहब मैंने जब शुरू में ये बात कही थी तो लोगों ने कहा खुद तो पार्लियामेंट होया है। अब मरने वाले हैं तो हमसे कह रहे हैं मर जाओ। तो अब आप क्या बताएं आपको? हम लेकिन हम हमने सोचना बंद कर दिया है। और मुकाबला किससे है? उन लोगों से जिनों 100 साल पहले सोच लिया था कि हम कैसा लेकिन अदीब साहब यह लोग यह तो पूछ रहे हैं कि सवाल रिप्रेजेंटेशन का किया जा रहा है कि रिप्रेजेंटेशन नहीं मिल रहा मुसलमानों को और उनकी कयादत उनकी सियासत पूरी तरीके से खत्म कर दी गई है। उनका कोई अब ना तो उनकी ना वो कन्विंसिंग पावर उनके पास रही है ना ही वो इस तरफ शायद सोचते हुए नजर आ रहे हैं। उनको लगता है जो कुछ आका रहम कर दे मिल जाए वो उतना ही बहुत है। लेकिन साथ में जो मुसलमान भी हैं उनको लिए भी मुझे लगता है कि आजादी के इतने बरस बाद भी उनका एक वाहिद मुद्दा बनकर रह गया उनका तहफुज़ कि आप हमें जिंदा रहने दीजिए बाकी हम खुद कर लेंगे। हमारे गली नुक्कड़ पे क्या हो रहा है वो आप छोड़ दीजिए। गंदी गलियां हैं, स्कूल नहीं है, अस्पताल नहीं है। वो हम देख लेंगे। वो तब होगा ना जब हम जिंदा रहेंगे। जब आप हमारे लिए कुछ छोड़ देंगे। एक तो ये ये सवाल है। दूसरा ये कि क्या एक ऐसे दौर में जब मुसलमान अपने बदतरीन दौर से गुजर रहा है। आजादी के बाद के सबसे खतरनाक दौर से एक तरह से वो गुजर रहा है। अफसोसनाक दौर से गुजर रहा है। तब उसे रिप्रेजेंटेशन की बात करनी चाहिए या फिर उसको अपने ऊपर काम करने को लेकर आगे बढ़ना चाहिए। या फिर आपको लगता है एवरीथिंग कैन गो साइमलटेनियसली एंड वी शुड वर्क विद एवरीथिंग। मतलब हर तरीके से काम करने की फिलहाल जरूरत है। क्योंकि मैं एक एग्जांपल यहां पर आपको देना चाहूंगी। हम ईरान को देख रहे हैं। फिलहाल ईरान को एक पिंजरा बना दिया गया। सारी दुनिया से कट ऑफ कर दिया गया। 40 साल तक सेंशन लगे। 40 दिन में उसने दुनिया की सबसे बड़ी पावर को घुटनों पर ला दिया और दुनिया को बता दिया कि कैसे ताकत मनवाई जाती है और कैसे लड़ा जाता है। क्या आपको नहीं लगता कि एक एक मॉडल जो है मुसलमानों के सामने पेश की पेश किया गया है? हालांकि हालात मुख्तलिफ हो सकते हैं। यहां के और वहां के बिल्कुल अलग-अलग चीजें हैं। वो एक मुस्लिम मुल्क है। यहां भी एक सेकुलर निजाम में है। लेकिन सीख तो आप कहीं से भी ले सकते हैं। देखिए ईरान ने तो सबक दिया है इस पूरी दुनिया को और यही पेट्रोल अरब मुालिक में भी आ रहा था। इनकम थी। वो माहौल बनाते रहे। बड़े-बड़े पैलेसेस बनाते रहे। ईरान पे सेंशन लगने के बाद भी वो उन्होंने अपना तहफुज के लिए अपने असराहे तैयार किए और ऐसे बनाए कि दुनिया हैरत में रह गई। उन्होंने एक एक खाका तैयार किया हुआ था। हमारे पास कोई खाका नहीं था। अब पानी सर से ऊपर उठ गया है। हम बहुत वक्त लगेगा अगर हम आज जाग जाए जब अगर आज से कोशिश करें तब जाके हम कहीं दों साल के बाद आगे हम उनसे 20 साल ऑलरेडी पीछे हो चुके हैं। और अगर [नाक से की जाने वाली आवाज़] अगर यह सरकार इंकलाबी शक्ल पर इलेक्शन की बात जहां तक आप कह रही थी ये एसआईआर बना क्यों है? हम हमारे वोट काटने के लिए। अब इसके बाद डीलिमिटेशन शुरू होगा। यूसीसी उसमें भी साफ़ हो जाएंगे। यह बात मुसलमान क्यों नहीं समझ रहा है कि तुम कभी 50 पार्लियामेंट में होते थे। अब 15 आ गए। पांच भी नहीं रहोगे। शौक अपना बंद कर दो। हम अपना काम, अपना वजूद को पहचानवाओ। अपनी तालीमगाहों को, अपने कारोबार को बढ़ाओ। देखिए मुसलमानों की जो कौम है यह सब तमाशे नहीं करती है। चाहे वह बोरे हो, मेमनल हो, आखानी हो, उनकी हैसियतें क्या है? इस शौक ने हमको कहां से कहां ले जाके खड़ा कर दिया है। ये सब सोचना पड़ेगा। इसीलिए मैंने कोशिश कर रहा हूं जी कि ये सब लोग अपना एजेंडा तैयार करें। कश्मीर हिंदुस्तान का पार्ट है। हम इन बाकी मुसलमानों ने कश्मीर की तरफ पलट के नहीं देखा कि कहीं हम देशद्रोही ना कहलाए डर गए उन कश्मीरों पे क्या हशर हुआ इन्होंने कहा था कि हम 370 तो लेंगे लेकिन स्टेटहुड वापस कर देंगे क्या सितम हो रहा है हम में हिम्मत नहीं है कि कश्मीर के लिए बोल सके बिल्कुल वही वही साफ तौर पर एक मायूसी यही देखने के लिए मिलती है कि और आखिरी मेरा बहुत ही कम अल्फाज में अगर आप जवाब दे सकें कि मायूसी हमें नजर आती है हम ये देख रहे हैं कि क्या कुछ मुसलमानों के साथ हो रहा है। वह तमाम चीजें हमारे सामने एक तरह से आईने की तरह साफ है और आगे भी हम देख रहे हैं कि यह हालात बद से बदतरीन ही अब होने जा रहे हैं। अब पासपोर्ट का लेकर आ गए हैं कि भाई वो आपकी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। तो आप बताया जा रहा है कि कोई कार्ड जो है वो लाया जाएगा जो आपकी नागरिकता बताएगा। ये सब घुसपैठियों के लिए हो रहा है। ये आपके लिए है। उससे बेचारे दूसरे शहरी भी मर रहे हैं। ये हर चीज जो है ये घुसपैठियों को पकड़ने की है। जो ये बिहार से पकड़ रहे थे। लेकिन अदीब साहब मर तो आप तब भी रहे हैं मर आप अब भी रहे हैं। आपके हुकूक आपसे तब भी छीने जा रहे हैं। अब भी छीने मतलब आप किसी भी कंडीशन में हो तो आपके साथ वही रहा है जो हो रहा है। अगर किसी शख्स को लिंच किया जाता है। माना कि कोई एक शख्स भी एक शख्स को लिंच कर रहा है। वो ऐसे हाथ करके पिट रहा होता है। हाथ तो आपके भी दिए गए हैं। जी तो मर तो आप ऐसे ही रहे हैं। तो आपको नहीं लगता कि एक आवाज जो उठनी चाहिए वो जो हिम्मत वो जो हौसला होना चाहिए वो इतना पस्त आखिर क्यों हो गया है ये जेहन में बार-बार जो है वो सवाल होता है बहुत संक्षेप में अगर आप देखिए हिंदू समाज की तारीख रही है उसने अपने ही लोगों में कुछ दलित तक एक तबका पैदा किया उस दलित तक पे इतने सितम ढाए घोड़ी पे नहीं बैठेगा मूछ नहीं रख सकेगा शादी में गाने बजाने नहीं कर पाएगा। वो करता रहा अब वो पढ़ गया। उनको दूसरी कौम चाहिए थी। वो मुसलमान तैयार कर लिया। मुसलमान ऐसा तैयार हुआ है कि सब कुछ करने को तैयार है। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जय श्री राम के नारे लगते हैं और वहां का टीचर वहां का असाजा चुप है। जामिया मिलिया इस्लामिया जिसकी आजादी की तारीख से जुड़ा हुआ है। वहां सर सरवार करके 100 साला जश्न मनाने की बात होती है। यहां पहुंचा दिया है मुसलमान उन इंस्टिटशंस को हम जहां से यह कहते थे कि यह अब्र यहां से उठा सारे जहां पे बसेगा हम उन इंस्टीटशंस के ये हाल कर दिया है ये सोचने का मुकाम है किसी और का नहीं मुस्लिम दानिशों की जिम्मेदारी बनती है। मुस्लिम अकाबलीन की जिम्मेदारी बनती है। मुस्लिम उलमाओं की जिम्मेदारी बनती है। ये पांच व की नमाज पढ़ के आपने काम तमाम कर लिया। वो फराज है आपके। बिल्कुल। अल्लाह ने नमाज, रोजा, जकात, खैरात पर जन्नत का वायदा नहीं किया। वो फर्ज है आपके ऊपर। वो फर्ज है। मजलूम के खिलाफ आवाज उठाने पर आपको जन्नत का वादा दिया है। बेगुनाह की मदद करने पे जन्नत का वादा किया है। ये हमने नहीं समझा कभी। बिल्कुल। आप बिल्कुल सही कह रहे हैं अदीप साहब मेरे पास अभी भी मुझे लगता है कि बहुत सवाल थे जिन पर शायद ये एक ऐसी गुफ्तगू है जो शायद घंटों चल सकती है लेकिन हमारी भी वक्त की एक लिमिट है आपने वक्त दिया बहुत-बहुत शुक्रिया आपकी जो फिक्र है जो जज्बा है आपका वो आपकी आंखों आपके अल्फाज़ आपकी हर चीज से बयां होता है और मुझे लगता है कि आप जैसे बहुत सारे लोगों की मुस्लिम समाज को जरूरत है जो डरे नहीं आपने एफआईआर अपने ऊपर ली है आपने सब कुछ किया आप सुप्रीम कोर्ट तक गए ऐसे अगर चंद हजार लोग भी इकट्ठे हो जाए तो मुझे लगता है कि बहुत कुछ बदल जाएगा। मैं मुझसे अक्सर लोग पूछते हैं कि भाई आप क्यों बोल रहे हैं? चुप हो जाए। मेरे घर वाले भी कहते हैं हम सेहत खराब है, उम्र हो गई कोई तो कुछ बोल नहीं रहा है। मैं सिर्फ ये बाबर करना चाहता हूं। चाहे वो अमित शाह हो, चाहे योगी हो या मोदी हो। हम मैं तुमसे डरूंगा नहीं। इसलिए के अगर हम डर गए तो तुम चाहते हो मैं आखरी सांस ले मरना पसंद करूंगा। तुमसे डर के कंप्रोमाइज नहीं करूंगा। और ये मैं अपनी कौम से भी कहता हूं अगर तुमने कोई गलत काम नहीं किया तो डर किस बात का? तुम्हें यह डराएंगे। बहुत से लोग डरते हैं। मेरे ऊपर एफआईआर की गई। विड्रा करनी पड़ी इसलिए कि मैंने उनके ऊपर मुकदमा दायर कर दिया। तो जब यह आपको जब आपने कमाई है लोग क्यों डरते हैं? अनाप शनाप रुपया आपने कमाया है। दौलत कमाई है। वो ना छीन जाए आपसे। तो वो उसके शौक अगर आपको दौलत का जुनून पैदा हो जाए तो यकीनी तौर पर कलब सिया हो जाता है। मेरे पास दो गज जमीन नहीं है कब्र की। मैं क्यों डरूंगा इनसे? मैंने अपने बच्चों को पढ़ाया। मेरे बच्चे अल्लाह का शुक्र इस पोजीशन में है। जो मैं चाहता हूं वो करता हूं। मैं क्यों इनसे डरूंगा? बहुत शुक्रिया आपका वक्त देने के लिए और शुक्रिया आप तमाम लोगों का भी।
Companion article
Mohammad Adeeb has watched India's political currents from close range for over half a century — through the socialist movement's rise and fall, the birth of the RSS-BJP combine, and stints of proximity to both the Congress and the socialist bloc before winning a Rajya Sabha seat as an independent candidate backed by the Congress, the RLD, and the Samajwadi Party. Speaking to Nous, he begins with a confession he frames as generational: that his own generation's participation in Jayaprakash Narayan's movement against Indira Gandhi's Emergency, however well-intentioned, ended up being the vehicle through which the RSS entered the mainstream of Indian politics.
Adeeb recalls warning JP directly that Jana Sangh members were marching prominently within his coalition. JP's reply, as Adeeb remembers it, was that the Jana Sangh was more upset with him than anyone, but that it had organisation the movement needed, and that there was nothing to fear. What followed, in Adeeb's account, was fragmentation: small parties splintered off from the movement's socialist core, and Muslims were steadily pushed to its margins. He recalls a former chief minister, Hemwati Nandan Bahuguna, telling him after the Emergency that opposing Indira Gandhi so fiercely had been "a great sin," because it let the very Jana Sangh cadres who once hid their RSS affiliation entrench themselves at the grassroots. When V.P. Singh became prime minister soon after with Jana Sangh-descended support, Adeeb argues, the RSS received the formal recognition it needed to become, in his words, "the master of the era" — a slow, unhurried ascent enabled by the parties that positioned themselves as its opposition.
Adeeb is unsparing about the movement's other legacy: politicians who built entire careers on caste-based mobilisation — the "Yadav politics," the "Kurmi politics" that produced Bihar and Uttar Pradesh's regional parties — treated Muslims as their second-largest vote bank without ever building comparable Muslim political power in return. Muslims, he says, gave these parties their votes "again and again, not once," and received tokenism in exchange: a ministry here, a departmental portfolio there, never real authority.
He illustrates the point with Azam Khan, once so central to Mulayam Singh Yadav's Samajwadi Party that he was given a helicopter during election campaigns specifically to bring in the Muslim vote. In the two elections since Narendra Modi's rise, Adeeb notes, Azam Khan has not even been given a party bicycle symbol to campaign with, let alone a platform — a leader once so influential, now sidelined by his own party for fear of alienating Hindu voters who, in Adeeb's telling, the party assumes will stay regardless because it believes Muslims have nowhere else to go. "This is the servitude I want to end," he says. "How long will you keep serving them?"
Pressed on why he mentions Atal Bihari Vajpayee in the same breath as Nehru and Gandhi, given that Vajpayee once spoke of "levelling" the Babri Masjid, Adeeb draws a careful distinction. Vajpayee, he argues, was a democrat and a man of education and civility who never spoke of violating the Constitution, even if his party did, and who condemned the Babri Masjid's demolition after the fact and publicly urged Narendra Modi, then Gujarat's chief minister during the 2002 riots, to uphold his "raj dharma." Adeeb concedes Vajpayee's RSS affiliation and ideological differences with his own but insists that as prime minister, Vajpayee did not seize control of independent institutions the way he says has since occurred. He extends a similar, qualified respect to Indira Gandhi, whom he opposed over the Emergency but credits with holding a free election afterward and losing it — a test, he implies, the current government would not permit today, pointing to what he calls a "nominated" Election Commission following the removal of the Chief Justice from the body appointing it.
Adeeb's most provocative proposal is that Muslims should, as an experiment, withdraw entirely from voting in a single election cycle. His logic: Muslims function as a "catalyst" whose presence lets ruling coalitions form around opposing them, and whose absence would force politics back onto ordinary material concerns — jobs, prices, livelihoods — while also depriving the Special Intensive Revision of electoral rolls of its justification, since voter list purges are conducted, he argues, expressly to remove Muslim names under the pretext of catching "infiltrators." He recalls the veteran journalist Kuldip Nayar warning him decades ago that such a step would only fracture Hindu society along caste lines instead. Adeeb's rejoinder is that Muslims currently function as society's unifying scapegoat — "if you want to run your government and hide your own flaws, create a villain," he says, quoting Chanakya — and that removing the community from the electoral equation would strip that villain of its political utility, forcing secular parties to finally offer partnership rather than convenience.
Adeeb reserves particular anger for the parties that call themselves secular. He argues they have failed not from a lack of courage alone but from calculation: raising Muslim grievances risks the departure of Hindu votes they fear losing, so all-in-one-line political statements — a tweet, a press conference — substitute for the organisational fight he says the moment actually demands. He recounts a Congress meeting where Rahul Gandhi told party members that failing to speak up for Muslims and minorities would itself amount to a betrayal of Congress's own identity — a stance Adeeb credits as more direct on the RSS specifically than any Congress leader since Nehru, while noting that Congress state leaders like Digvijaya Singh and Kamal Nath simultaneously chase religious symbolism, such as pilgrimage yatras and reminders of Rajiv Gandhi's own decision to unlock the Babri Masjid site, producing what Adeeb calls "a very confused Congress."
He is equally scathing about Muslim voting behaviour toward All India Majlis-e-Ittehadul Muslimeen leader Asaduddin Owaisi, arguing that even Muslims who admire Owaisi's willingness to speak for the community decline to vote for him because his party cannot actually win — a hesitation Adeeb reads as evidence of political timidity rather than strategy. Asked why Muslim-led parties are branded communal while caste-based parties representing Sikhs, Dalits, or other groups are not, he calls the double standard explicit: parties built entirely around Dalit or Sikh identity face no comparable stigma, while a party built around Muslim identity is treated as inherently sectarian — a framing he traces to the trauma of Partition, after which, he says, Muslims who chose to remain in India were treated as accused parties rather than equal citizens from the day after independence itself.
Adeeb turns the same critical eye on Muslim leadership itself, arguing that community representatives — from the Muslim Personal Law Board to state-level politicians — have failed just as thoroughly as secular parties, in part by hoarding influence rather than cultivating successors. He names Dr. Syed Mahmud and Fakhruddin Ali Ahmed as among the last Muslim leaders granted genuine authority within Congress, arguing that no comparable figure has emerged since, and that even Dr. Abdul Jalil Faridi, who attempted a Dalit-Muslim political alliance decades ago with backing from Kanshi Ram, secured barely 2–3 percent of the vote and was subsequently forgotten by the very community he tried to organise. Faridi's approach — an alliance between Muslims, Dalits, and other backward groups — is, in Adeeb's account, precisely what should have been built and was not.
He identifies a further split within the Muslim community itself: south Indian Muslims, he argues, have advanced educationally and economically far more than their north Indian counterparts, because the south never experienced 1857, Partition, or the successive waves of communal violence — from Bhagalpur to Gujarat — that left north Indian Muslims permanently defensive. He cites Tamil Nadu, where Muslims are roughly 4 percent of the population but hold around 10 percent of government jobs, as evidence of what parity in education can produce. In the north, he argues, the modern school network founded by Sir Syed Ahmad Khan — starting with an English school in Ghazipur in 1862 and culminating in Aligarh Muslim University — went uninvested-in after 1947 and has fallen behind ever since, even as Muslim families with means increasingly send their own children to Christian-run convent schools rather than community institutions.
Adeeb describes founding a small organisation of retired judges, retired military officers, professors, and lawyers to attempt, in his words, work that "should have been done 25 or 50 years ago" — convening around 150 people this month to decide a collective path forward, precisely because, he says, no individual Muslim leader today commands the following to be followed. His proposed remedy is explicitly cross-community: a "collective leadership" built jointly with secular Hindus, Christians, Sikhs, and other deprived communities, on the theory that a storm this size cannot be weathered by any one community alone. He argues that internal community divisions — distinctions of biradari and sect, Ashraf versus Pasmanda — must be set aside first, insisting that once Muslims organise coherently, "a great many secular Hindus are watching you, waiting for you to stand up," and that visible unity is the precondition for allies to act rather than the other way around.
He offers Iran's decades under sanctions as a model of resilience worth studying, while carefully noting the disanalogy — Iran is a Muslim-majority state operating on its own terms, India a secular republic in which Muslims are a minority — arguing that the lesson to draw is not the specific method but the discipline of building capacity for the long term rather than reacting event by event.
Running through the conversation is Adeeb's insistence that the Constitution, and specifically the secular settlement Nehru sought a mandate for in 1952, remains the only ground Muslims have left to stand on — not a request for special treatment, but the basic bargain struck when the community "divided its own blood" at Partition rather than migrating to Pakistan. He directs a challenge at Hindu nationalist politicians who invoke Hindu Rashtra: hold a referendum, he says, and ask not only Muslims but Sikhs, Christians, south Indian Hindus, and any group outside the mainstream Hindutva fold whether they wish to live in a Hindu nation — if the vote favours it, he says, Muslims will not raise their voice again, but a government elected on the existing Constitution has no standing to violate it unilaterally in the meantime.
He closes by describing his own refusal to be silenced despite his advancing age, a withdrawn FIR filed against him for a defamation counter-suit, and family pressure to stop speaking publicly. "I don't have two square feet of land for a grave," he says. "Why would I be afraid of them?" His parting message to the community he has spent his career trying to represent is less consoling than demanding: that prayer and ritual observance are not, on their own, the fulfilment of religious duty — that duty, in his reading of the faith, lies in raising one's voice for the wronged and standing beside the innocent, an obligation he believes the community's own institutions have too long treated as optional.
5:04This is an excerpt from a longer conversation.
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6:06This is an excerpt from a longer conversation.
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5:14This is an excerpt from a longer conversation.
56:39In the first episode of Emerging Perspectives, Sania Ismailee joins Wardah Beg for a conversation about the philosophical questions that lie beneath India’s debate on the Uniform Civil Code. For eight years, through her PhD research, Sania examined the UCC through the questions of secularism and …
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
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