Nous Podcast· 08 Jul 2026· 50:16

Historic Funeral in Iran: What It Means for West Asia and the World

Iran is witnessing a funeral procession of historic proportions—an event that many believe has no parallel in modern history. In this special conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with Akif Zaidi, an Islamic scholar and Indian researcher based in Iran, to understand the significanc…

Full Transcript

ईरान में इतिहास फिलहाल लिखा जा रहा है। तारीख दर्ज हो रही है। एक ऐसा प्रोसेशन, एक ऐसा फ्यूनरल देखने के लिए मिल रहा है जो शायद मॉडर्न हिस्ट्री में ना पहले किसी ने देखा और ना जाने आगे कभी देख पाएगा कि नहीं। इंटरनेशनल डेलीगेशंस आ रहे हैं तो कुरान की आयात की जो तिलावत की जा रही है मानादार अंदाज से। कहां हमने देखा? कुरान का इस तरह से डायरेक्ट किरदार डिप्लोमेसी में कहां हमने देखा है? वो 168 जो बच्चियां हैं उनको ईरान एक सेकंड भी भूलने के लिए तैयार नहीं है। काश ऐसा ही कोई गाजा के जो 20,000 जो हजारों बच्चे हैं उनके लिए कोई कर पाता। यहां पर ईरान में चाहे वो लीडरशिप [संगीत] हो, चाहे वो आम लोग हो उनके लिए जो गजा में हुआ है वो उनके लिए निहायत दर्दनाक है। जो हमेशा से एक एक जो खाई रही शिया और सुन्नी की क्या आपको लग रहा है उनकी शहादत ने इसको भी पाट दिया है? यही हम देखेंगे। हम देखेंगे जो जो इंतकाम का मुतालिबा अभी हो रहा है। यह इंतकाम का मुतालिबा दर हकीकत इंसाफ का मुतालिबा है। इस प्रोसेशन के थ्रू लोग ईरान से जज्बाती तौर पर भी जुड़ रहे हैं कि एक लीडर अगर ऐसा हो तो उसकी विदाई उसका आखिरी सलाम ऐसा होता है। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह [संगीत] की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि [संगीत] ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही [संगीत] आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। ईरान में इतिहास फिलहाल लिखा जा रहा है। तारीख दर्ज हो रही है। एक ऐसा प्रोसेशन, एक ऐसा फ्यूनरल देखने के लिए मिल रहा है जो शायद मॉडर्न हिस्ट्री में ना पहले किसी ने देखा और ना जाने आगे कभी देख पाएगा कि नहीं। मैं देख रही हूं कि कैसे वहां पर पूरी दुनिया के लोग वहां पहुंचे हुए हैं। वो लोग जो मुसलमान है वो भी, जो नहीं है वो भी, जो शिया हैं भी, वह भी, जो शिया नहीं है वो भी। इंटरनेशनल मीडिया से लेकर दुनिया भर के डेलीगेट्स वहां पर मौजूद हैं। अंदाजा यह लगाया जा रहा है कि तकरीबन ढाई से 3 करोड़ लोगों को ईरान इस दौरान होस्ट करने जा रहा है और होस्ट कर रहा है लगातार। जिस वक्त मैं इस इस प्रोग्राम को रिकॉर्ड कर रही हूं। उस वक्त शहीद आयतुल्ला अली खामनाई की नमाज़ जनाजा हो चुकी है। तेहरान में जो प्रोसेशन है वह भी खत्म हो चुका है। और अब ये कारवा जाने वाला है कुम और उसके बाद नजफ कर्बला मौला अली के रोज़ पर इमाम हुसैन के रोज़ पर और फिर उसके बाद मशद में होगी शहीद आयतुल्ला अली खामनाई की तदवीन। लेकिन ये तो एक कार्यक्रम है जो मैंने आपके सामने रखा है। इस सबका सिग्निफिकेंस क्या है? दुनिया इसको किस तरह से देख रही है? एक ऐसा लीडर जो जब हयात थे तब उनका एक अलग सिग्निफिकेंस था। दुनिया उनको एक अलग तरीके से देखती थी। जब वो शहीद हुए तो उनका मर्तबा कितना और ज्यादा आला हो गया है। लोग ऐसे वहां पर लौट रहे हैं ईरान से या अभी भी जो मौजूद हैं कि उनकी समझ नहीं आ रहा है कि कौन से वो अल्फाज़ लेकर आए जो इस वक्त वहां पर जज्बात है लोगों के उनको वो बयां कर सकें। लोग रो रहे हैं। लोग सीना पीट रहे हैं। आप उनको मातम भी कह सकते हैं। अल्लाहू अकबर की सदाएं हैं वहां पर। इमाम हुसैन को वहां जाहिर सी बात है याद किया जाएगा। या हुसैन के या अली के वहां पर नारे बुलंद किए जा रहे हैं। और जुबान पर सिर्फ एक ही नाम है और वो है शहीद आयतुल्लाह अली खामनाई का। और उनके जरिए दी गई कुर्बानियों का जिस हालत में उन्हें ईरान मिला और उन्होंने किस जगह ईरान को पहुंचाया। क्या उन्होंने विरासत अपनी छोड़ी है? उस सब के बारे में आज बात की जा रही है। ऐसा लग रहा है कि मानो शहीद आयतुल्लाह अली खामनाई इस दुनिया से जाकर फिर से जिंदा हो गए हो। मेरे भी जज्बात जो है वो उमड़ रहे हैं। मुझे एक तरह का एक अफसोस एक मलाल भी है कि मैं ईरान ना जा सकी और मेरी बड़ी दिली ख्वाहिश थी कि मैं वहां जाती और इसको खुद अपनी खुली नंगी आंखों से दर्ज करती और उसकी गवाह बनती। लेकिन फिर भी मेरी कोशिश है कि मैं जितना इसको कवर कर पाऊं मैं इसको कवर करूं और आप तक वो तमाम चीजें मैं पहुंचाऊं जो आपके लिए जानना जरूरी है और इसीलिए मैंने आज खास मेहमान को दावत दी है। मेरे साथ आकि ज़दी साहब जुड़ गए हैं जो कि इस्लामिक स्कॉलर हैं। वेस्ट मामलों के जानकार हैं। इस वक्त वो कुम में मौजूद हैं। आपने पहले भी उन्हें नाउ पर और मेरे प्रोग्राम में उन्हें देखा है और मुझे लगा कि उनसे बेहतर मेहमान कोई नहीं हो सकता इस वक्त क्योंकि वो जो वहां पर हो रहा है उसके गवाह भी हैं। उसको आपको बताएंगे कि वो खुद जो ये ये एक तारीखी जो एक मंजर है उसमें उसके जो गवाह बन रहे हैं वो कैसा महसूस कर रहे हैं। और इसके अलावा जो दुनिया बदली है इस जंग के बाद और इस आखिरी ये जो जनाजा है या प्रोसेशन है इसके बाद जो बदली है उसको वो कैसे देख रहे हैं? आकिब साहब बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका नाउ नेटवर्क में। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। शुक्रिया मुझे दावत देने का आपकी खिदमत में और सभी आपके नाजरीन की खिदमत में सलाम और आदाब अर्ज करता हूं। जी शुक्रिया आकि साहब कि आप ऐसे वक्त में जब आपके लिए भी यह बिल्कुल अलग तरह का मौका है और आप कुम में हैं। जब आपसे मेरी बात हो रही है। हो सकता है उसके कुछ देर बाद जो जनाजा है वहां पर पहुंच जाए और आप भी तेहरान में थे और अब आप कुम में हैं। मेरा पहला सवाल आपसे ये कि आप इसे इस पूरे प्रोसेशन को ये जो पूरा फ्यूनरल है इस सबको आप कैसे देख रहे हैं? ईरान कैसे देख रहा है और ईरान कितना बदला है इसके बाद और जो लोग वहां पर पहुंच रहे हैं जो अपने रियल टाइम अकाउंट्स को दर्ज करा रहे हैं उनको आप कैसे देख रहे हैं? देखिए मैं इस पर गुफ्तगू करने के लिए जाहिर सी बात है बहुत वक्त दरकार है और जो आजकल यह तारीख रकम की जा रही है हिस्ट्री इस बीइंग रिटन इसको समझने और उसको एनालाइज करने के लिए शायद सालों लगेंगे और आगे की जनरेशंस इन इन अयाम को स्टडी करेगी। मैं यहां पर सिर्फ एक गवाह नहीं, सिर्फ एक ऑब्जर्वर नहीं बल्कि एक पार्टिसिपेंट के तौर पर हूं कि जो इस सोग में अपने आप को शरीक समझता है और सोग के साथ-साथ जिस मिशन को लेकर शहीद आयतुल्लाह खामिनाई चले थे और उनके लाखों करोड़ों फॉलोअर्स लेकर चले हैं। मैं उस इंसानी और उस आलम मिशन में अपने आप को भी उसका एक हिस्सा समझता हूं। तो इसलिए यहां पर जो मैं देख रहा हूं जो महसूस कर रहा हूं वो जाहिर सी बात है कि वो तारीख उसके लिए अल्फाज़ मिलना मुश्किल है। लोग कहते हैं तारीख है। लोग कहते हैं हमारी जिंदगी बदल गई। ऐसे जज्बात का हमें एहसास हुआ। अपने अंदर हमें पता ही नहीं था कि हमारे अंदर इस किस्म के जज्बात पाए जाते हैं। कल दो दिन मैं तेहरान में था। जहां पर मुसल्ला में जनाजों को रखा था। और आपने [गला साफ़ करने की आवाज़] आपके व्यूवरर्स ने देखा होगा किस तरह से लाखों बल्कि कुछ ऐतबार से चंद करोड़ लोगों की तादाद दो दिन में आई मुसल्ला से गुजर कर गई। मैं वहां कई काफी अरसा वहां मौजूद था और मैंने नजदीक से देखा लोगों के जज्बात क्या थे और मैं इस पर भी जोर देना चाहता हूं कि बात सिर्फ जज्बात की हद तक नहीं है। हमें ये गलतफहमी हो गई है हम में से कई लोगों को कि जहां जज्बात हैं वहां पर अक्ल काम करना छोड़ देती है। ऐसा नहीं है। जज्बात जब हद से आगे बढ़ जाते हैं तब अक्ल काम करना छोड़ देती है। लेकिन जज्बात और अक्ल मिलकर आमतौर पर काम करते हैं। तो मैंने वहां पर लोगों के शूर, अज्म और इरादे को भी देखा कि जो जज्बात के साथ-साथ एक पीक पर है कि आगे उस पर भी मैं थोड़ी सी रोशनी डालूंगा। अभी तेहरान में प्रोग्राम सड़कों पर अभी चल रहा है। और आज रात या कल सुबह किसी वक्त ये जनाजे लाए जाएंगे। जहां अब मैं आ गया हूं। कुम लाए जाएंगे। एक दिन कुम में फिर यह प्रोग्राम होगा और यहां फिर कसीर तादाद में लोग शिरकत करेंगे। यह अंदाजा लगाया गया है। पूरा शहर इस वक्त अपने आप को तैयार कर रहा है इस इवेंट से डील करने के लिए शरीक होने के लिए और जो दूसरे बहुत सारे शहरों से बल्कि बाज मुल्कों से ह हिंदुस्तान से लोग आए हैं खासतौर पर इसलिए अपना पैसा खर्च करके आए हैं लोग वो उनका इस्तकबाल करने के लिए यहां कुम में आमादगी और तैयारी दिखाई दे रही है हर तरफ। फिर उसके बाद इराक जैसे आपने कहा जो खुद अपने आप में बहुत बहुत ही सिग्निफिकेंट है कि एक दूसरे मुल्क में ये जनाजा जा रहा है। पता चला यहां के गवर्नमेंट स्पोक्समैन ने भी कहा कि कई मुल्कों से दरखास्त थी लेकिन हम सिर्फ एक ही मुल्क की दरखास्त को अकोमोडेट कर सके कि वहां ये जाए। ये कहां होता है कि किसी एक मुल्क के पिटिकल स्ट्रक्चर का कोई हेड उसके जनाजे को कांधा देने के लिए दूसरे मुालिक के लोग इसरार करें और दबाव डालें। कहां होता है ये? तो ये हम देख रहे हैं कि ये इराक में ऐसा होगा और इराक और ईरान के दरमियान आठ साल की जो है जंग रह चुकी है। लाखों दोनों तरफ शहीद हुए या मारे गए इस जंग में ऐसी कैफियत पाई जाती है। वहां के लोग वहां की हुकूमत ये इस्तकबाल कर रही है। वो इराक जिसका अभी भी जो भी तेल बिकता है उसका तेल का पैसा वो अमेरिका के पास जाता है। वहां से वो देता है थोड़ा बहुत इराक को। वो इराक अभी इस तरह से कर रहा है। वाक ये बहुत अहम और सिग्निफिकेंट पहलू है। इतने सारे मुालिक से लोग आए हैं यहां पे जो ऑफिशियल डेलीगेशंस आए हैं वो अब 100 मुल्क से ज्यादा ऐसे मालिक है जिनके डेलीगेशंस आए। लेकिन इसमें बड़े-बड़े कुछ ऐसे नाम है कि जो सबसे पहले जिन्हें दावत दी जाती है उनको तो दावत तक नहीं दी गई है। यूरोप के किसी मुल्क को दावत तक नहीं दी गई है। ये एक नई दुनिया है। ये एक नया तरीका है। ये कौन सी किस नए सम में पूरी दुनिया जा रही है। उस सब की ये अलामते हैं। तो बहुत सारे इसके रुख है। बहुत सारे इसके पहलू है। या लोगों का ना सिर्फ गमजदा होना। लोगों का इसको ऑर्गेनाइज करने में जो उनका किरदार है। अभी मैं कल और परसों तेहरान में था। मैं मुसल्ला के पास पैदल चल के जा रहा था। तो एक जवान मोटरसाइकिल पर आता है और मुझे आवाज देता है। मेरे शाने पर हाथ रखता है। कहता है आप तेहरान के रहने वाले हैं। मैंने कहा नहीं मैं दूसरे शहर से आया हूं। तो कहा आइए मेरे घर आइए। मेरे घर पर आइए। और मैंने वहां देखा इस तरह पैदल चलते हुए और बाइक पर बैठे हुए कई जवान थे। तलाश कर रहे थे कौन है जो दूसरे शहर से आया है और उसको अपने घर ले जाना चाह रहे थे ताकि उसकी मेजबानी करें उसकी खिदमत करें तो ये जो सपोर्ट है या खाना खिलाया जिस तरह जा रहा है सड़कों पर लंगर लगे हुए हैं इस पूरे इवेंट के इर्दगिर्द यानी यकीनन ये स्टेट का सपोर्ट है जाहिर सी बात है कि ये हेड ऑफ द स्टेट थे लेकिन ये स्टेट स्पों्सर्ड या जो कहा जाता है सरकार प्रायोजित ये उस टाइप का इवेंट नहीं है ये बुनियादी तौर पर इसमें लो पार्टिसिप वेट कर रहे हैं। लोग अपनेप खर्चे से जा रहे हैं। जब मैं कल रात को लौट रहा था बल्कि आज सुबह का तकरीबन वक्त था। अंधेरा अजान होने वाली थी सुबह की अजान। मैं लौट रहा था तेहरान से वापस कुम तो इस तरफ की सड़क जिस पर मैं था हाईवे पर था। वहां पर बहुत कम गाड़ियां थी। लेकिन जब मैं कुम के नजदीक आया मैंने देखा हाईवे और एक एक्सप्रेसवे है। उसके दूसरी साइड पर कई किलोमीटर का ट्रैफिक जाम लगा हुआ था। ये वो लोग थे जो मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों से कुम के पास से गुजरते हुए लेकिन मुल्क के मुख्तलिफ हिस्सों से तहरान जा रहे थे आज के वहां पर जनाजे में शिरकत करने के लिए अपना वक्त निकाल के अपना पैसा खर्च करके यानी जो ये पब्लिक इंगेजमेंट है यानी पब्लिक अपने आप को इसमें सोगवार समझ रही है। से जब किसी के घर में जब इंतकाल होता है तो घर वाले अपने आप को एक अलग कैफियत में देखते हैं और दूसरे लोग जो आते हैं ताजियत करने के लिए उनकी एक अलग कैफियत होती है। ईरान के सब लोग ये समझ रहे हैं कि हमारे घर में ये इंतकाल हुआ है। तो यह एक वाक यानी इस पर जितना जितने दिन बात की जाए जितने अलग-अलग पहलू से बात की जाए चाहे वो ईमान की रोशनी में हो जज्बात के बारे में हो स्ट्रेटेजिक इसकीेंस हो इसका जंग पर क्या ताल्लुक है वर्ल्ड ऑर्डर से क्या इतने पहलू है कि वाकई इस पर इतने सालों तक गौर किया जाएगा ना सिर्फ ये आज ही आजकल के ये अयाम ये जो तदवीन और तशक के अयाम है बल्कि जब से ये जंग शुरू हुई है तो ये मुनासिब होगा बहरहाल वक्त महदूद है। आए हम लोग आकर कुछ एस्पेक्ट्स पर डिटेल में बात करें। बिल्कुल। एक और बात जो मेरे जेहन में आ रही थी और शायद बहुत सारे लोगों के ज़हन में आ रही है आकि साहब वो ये कि एक ऐसा मुल्क जिसके ऊपर 40 साल तक सेंशंस लगे। उसको एक तरह से ये कहा गया जैसे उसको एक पिंजरे में कैद कर दिया गया हो कि सारी दुनिया से उसका ताल्लुक खत्म कर दिया गया। उसने अपने आप को तैयार किया और इस बेहतरीन तरीके से उसने अपने आप को तैयार किया कि दुनिया के सामने उसने एक ऐसा मॉडल पेश किया कि कैसे ये इस तरह की एसिमिट्रिक वॉर्स जो है वो ना सिर्फ लड़ी जा सकती हैं बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत कहलाए जाने वाले अमेरिका और उसके साथ खड़े उसका पिट्ठू इजराइल को कैसे घुटनों पर लाया जा सकता है। शायद इससे ज्यादा मलाल अमेरिका इजराइल को कभी नहीं हुआ होगा किसी मुल्क के साथ जंग छेड़ के जितना उसे ईरान के साथ हुआ है। एक तो वो हम उसका पहलू देखते हैं कि कैसे 40 दिन में जो कारनामा कर दिखाया ईरान ने और पूरे मैं कहूं कि 100 200 साल के अगर तारीख की भी बात की जाए तो मुसलमानों को शायद इतनी बड़ी जीत मुस्लिम वर्ल्ड से शायद ही देखने के लिए मिली हो। शायद देखने के लिए मिली ही नहीं है। ये मैं मैं दावे के साथ इसको कह सकती हूं और आप इसकी तस्दीक करेंगे। लेकिन उससे जुड़ा मेरा सवाल ये है आपसे कि फिर उसी जंग के दौरान जब अभी भी लग रहा है कि एक्सचेंज हो रहे हैं अमेरिका इजराइल के ईरान के बीच में इजराइल कभी भी ऐसा लग रहा है कि कुछ भी कर सकता है वो जिस तरह से बौखलाया हुआ है ना सिर्फ इस प्रोसेशन को ऑर्गेनाइज किया गया है बल्कि जिस तारीखी अंदाज में इसको ऑर्गेनाइज किया गया है बाहर से आए डेलीगेट्स को होस्ट किया गया 100 से ज्यादा मुल्कों से आए डेलीगेट्स और लोगों को वहां पर होस्ट किया जा रहा है। फ्री मेट्रोस दी जा रही है। 24 घंटे चल रही हैं। खाने का इंतजाम है। पानी का इंतजाम है। रहने का इंतजाम है। तो यह भी तो एक मिसाल ही पेश कर रहा है ईरान दुनिया के सामने कि एक तरफ डोन्ड ट्रंप कहते हुए नजर आ रहे हैं कि वहां लोग भूखे प्यासे मर रहे हैं। इसलिए हम उन्हें पैसे दे रहे हैं। और दूसरी तरफ ईरान कह रहा है हम तो पूरी दुनिया से आए लोगों को यहां खिला रहे हैं। उनको होस्ट कर रहे हैं। तो क्या इसमें भी ईरान का एक बड़ा मैसेज है दुनिया के लिए? ईरान इस पूरे प्रोग्राम के जरिए और जब मैं ईरान कह रहा हूं मैं बहुत वाज़ कर दूं कि मैं यहां पर मुराद मेरी सिर्फ हुकूमत नहीं है। पूरी सोसाइटी हुकूमत और लोग मिलकर जिस तरह मिलकर इस प्रोग्राम को ऑर्गेनाइज कर रहे हैं। जिस तरह से मिलकर मुख्तलिफ लेवल्स पर इनहीं ने कोऑपरेट किया है। आपको याद होगा जब जंग शुरू हुई थी तो मार्च के महीने में ये खबरें ईरान से आने लगी के यहां खाने पीने की कोई शॉर्टेज नहीं है। बल्कि कुछ चीजों की कीमतें तो गिरी हैं। उस वक्त यह रिपोर्टिंग हुई थी कि इसमें अहम किरदार पब्लिक का है कि पब्लिक ने जानबूझकर देखते हुए कि जंग चल रही है फिर भी जानबूझकर कोई भी पैनिकिक बाइंग और होल्डिंग नहीं की क्योंकि उसे पता है कि उसको कोऑपरेट करना है। तो वो जो गवर्नमेंट और पब्लिक के बीच में दोस्ताना ताल्लुकात और कोऑपरेशन की कैफियत रहती है। हां कभी-कभी रंजिश शिकायत भी होती है। लेकिन ये पता है कि कब कोऑपरेट करना है। ये पूरा मैसेज पूरी सोसाइटी की तरफ से ये दुनिया को जा रहा है। और वो मैसेज की अगर हम बात करें तो मुरा साहिबा देखिए यहां पर जब आप आपने विजुअल्स में भी देखा होगा के मुसल्ला है या जो आज सड़कों पर से कई किलोमीटर तक ये जनाजा जो है गुजारा गया ट्रक पर वगैरह तो दो रंग नजर आए एक तो हमने देखा कि काला रंग छाया हुआ है क्योंकि गम है सोग है मातम है तो काला रंग दूसरा आपने देखा होगा कि लाल रंग बहुत नजर आ रहा होगा आपको तमाम विजुअल्स में ये लाल रंग इसकी अहमियत है लाल रंग रंग कर्बला की तहजीब में और कल्चर में यह लाल रंग अलामत है इंतकाम के मुतालबे की और उन लाल परचमों पर अक्सर पर जुमला भी लिखा हुआ है या सारातिल हुसैन इमाम हुसैन के कातिलों से बदला लेने का नारा ये जो सोसाइटी इस वक्त इस तरह से जंग जब से शुरू हुई है और अभी इस वीक में और भी उसका एक क्लाइमेक्स और पीक दे देख रहे हैं। उसके अंदर जो सदियों से जो कर्बला की तालीमात का जखीरा जमा होता जा रहा है। एक के बाद एक लेवल हर जनरेशन के बाद ये वो चीजें हैं जो जब जरूरत पड़ती है तो इस तरह से वो सामने आती है और रंग अपना रंग दिखलाती है कि कितना बड़ा किरदार अदा किया जा सकता है। चाहे वो एक शख्स हो शहीद आयतुल्ला खामिना या पूरी सोसाइटी हो जो इस वक्त इस तरह से बेदार है और एक्टिव है। यहां पर इस इन आयाम में जो स्लोगन है आपके आपने शायद देखा भी होगा आपके व्यूअर्स ने देखा होगा कि इस वक्त स्लोगन जो दिया गया है वो अंग्रेजी में उसका तर्जुमा है वी मस्ट राइव वी मस्ट राइव और इसी यानी जो अगर इसको अगर कैंपेन थीम का नाम दिया जाए अगरचे ऐसे अल्फाज़ इस्तेमाल करने से इसका एक एक कमर्शियल सा फीलिंग आती है जो कि हरगज़ ऐसा नहीं है। लेकिन अगर कहा जाए समझाने के लिए कि कैंपेन की थीम है वी मस्ट राइज़ और जो उसका लोगो या सिंबल है वो इस तरह से है ये बंद मुट्ठी ये बंद मुट्ठी और ये या ये दर हकीकत ये बंद मुट्ठी ये याद है जला रही है दर हकीकत खुद शहीद रहबर कि जिनका एक हाथ 198081 में उन पर एक हमला हुआ था उस जमाने में एक वजह से उनका दाहिना हाथ काम नहीं करता था उनका सिर्फ बाया बाया हाथ ही काम करता था और यही बाएं हाथ की बंद मुट्ठी इसका लोगो है। सारे उनहीं ने काम सीखे लिखना सब कुछ और बाएं हाथ से फिर उनहीं ने सीखे थे। जब उनका जनाजा मलवे के नीचे मिला है तो इसी बंद मुट्ठी की शक्ल या इस इस कैफियत के साथ मिला है जो कि अलामत है एक मजबूत इरादे की मुकाबला करने की। तो इस तरह से ये पूरा ये प्रोग्राम हो रहा है। और दर हकीकत अगर बरा साहिबा मैं ये कहूं इस इसके जरिए यह चंद ये कई दिन तक चलने वाला जो यह प्रोग्राम है इसमें गम है सब कुछ है लेकिन मैं ये भी महसूस कर रहा हूं के ईरानी माशरा और उसके सपोर्ट में दुनिया में बहुत कसीर तादाद में मुसलमान और बाज गैर मुसलमान भी लेकिन खैर उम्मत में तो बहुत ज्यादा सपोर्ट है। बहुत सारी दरारें पुरानी लकीरें जो है वह इस जंग की वजह से इस पाक खून की वजह से मिटती हुई नजर आ रही है। तो ऐसा महसूस होता है कि इमाम खामनाई के चाहने वाले खास तौर पर ईरान में लेकिन बाहर भी इन इन प्रोग्राम्स के जरिए अपनी मुट्ठी को गोया इस तरह आमादा कर रहे हैं आहिस्ताआहिस्ते और ये प्रोग्राम खत्म होने के बाद हम एक्सपेक्ट कर सकते हैं कि और भी ज्यादा ताकत के साथ वो अपने मिशन को आगे लेकर चलेंगे जिसके अंदर क्या इसका मतलब है कि जंग होगी हां शायद जंग होगी लेकिन जंग उस तरह से मिलिट्री की जंग होना ना होना वो अपने आप में इतना अहम नहीं है। जैसी जरूरत होगी अगर जरूरत होगी अगर दोबारा हमला होगा तो जंग भी होगी। असल बात यह है कि वो कर्बला के पैराडाइम को वो इंसाफ के मिशन को वो इंसानियत के मिशन को कि जो कर्बला से शुरू होता है एक तरह से उसको आज की दुनिया में आगे बढ़ाने का जो इरादा है उसके लिए गोया ये मुट्ठी आमादा हो रही है आगे बढ़ने के लिए। [गला साफ़ करने की आवाज़] मिसाल के तौर पर अभी आपके कई व्यूवरर्स ने देखा होगा कि किस तरह से एक नई दुनिया बन रही है। हत्ता इस तरह से जब इंटरनेशनल डेलीगेशंस आ रहे हैं तो कुरान की आयात की जो तिलावत की जा रही है मानादार अंदाज से कहां हमने देखा? कुरान का इस तरह से डायरेक्ट किरदार डिप्लोमेसी में कहां हमने देखा है? हमारे लिए तो कुरान को हम समझते हैं कि कुरान तो हम बस किसी खास दिन में कोई किसी का इंतकाल हो गया तो सवाब के लिए उसको हम पढ़ उसको बखश दे। लेकिन दुनिया में बड़ी-बड़ी तब्दीलियां कुरान ला सकता है। ये सोसाइटी दिखा रही है कि हां ऐसा हो सकता है। और खासतौर पर मैं आकि साहब ये देख रही थी क्योंकि आप आयतों का जिक्र कर रहे हैं और मेरा सवाल भी इसी से जुड़ा हुआ था। इट वास वेरी फैसनेटिंग टू सी। और आप ये देखिए कि मुसलमान ही नहीं बल्कि मैं देख रही थी कि कुछ अमेरिकन पॉडकास्टर हु आर नॉट इवन मुस्लिम्स दे वर टॉकिंग अबाउट इट। और वह उसकी सिग्निफिकेंस को वह बता रहे थे कि कैसे जब तालिबान आए हैं तब कौन सी आयतें पढ़ी गई हैं। अ जब सऊदी से जो डेलीगेशन आया जिनको शायद शायद इनवाइट भी नहीं किया गया था या फिर इनवाइट किया गया था लेकिन उनका नाम उसमें नहीं था। कोई कन्फर्मेशन नहीं थी। आप इसको बताइएगा कि क्या है इसके पीछे की बात। वो जब आए तब क्या पढ़ा गया और बाकी दूसरे मुल्कों से जब हमास का डेलीगेशन था या हिज्जबुल्लाह का डेलीगेशन था। जब वो आए तब किस तरह की आयतें पढ़ी गई। सो हाउ वेल ऑर्गेनाइज्ड एंड थॉटफुली डन दिस वाज? ये हर चीज में जो ईरान का एक मैसेज है वहां की जो गवर्नमेंट का जो तमाम जो लोग हैं उससे जुड़े हुए उन लोगों का जो मैसेज है बहुत ज्यादा उसकी तरफ सोचने के लिए मजबूर कर रहा है कि आखिर इस सब दौर में इस पूरी चीजों में इन तमाम चीजों की समझ भी आखिर कैसे आई? ये मतलब मेरा सवाल भी थोड़ा हड़बड़ा गया है ये पूछने में क्योंकि मेरे जेहन में भी इस तरह के कई कई सवाल थे अगर आप इस पर रोशनी डाल सके जो सोसाइटी अपने आप को इस्लाम के उसूलों पर डेवलप करने का इरादा कर लेती है एक एक आदमी नहीं एक घराना नहीं बल्कि पूरी सोसाइटी तो उसके लिए जो ताकतों और बरकात का सिलसिला शुरू होता है जो खुदा के वादे पूरे होना शुरू होते हैं उसके हक में ये हम मुसलमानों का ये नस ना सिर्फ ईमान और अकीदा है बल्कि अब ये तजुर्बा ये दिखा रहा है कि ऐसा ही होता है। ये फैसला लिया गया ईरान की सोसाइटी के ओवरवेल्मिंग हिस्से ने कि वो इमाम हुैनी को सपोर्ट करेंगे रेवोल्यूशन आएगा और फिर रेवोल्यूशन को जारी रखेंगे पायदार रहेंगे। मुख्तलिफ मुश्किलात का आप जानते हैं कि आपने अभी कहा पिंजरे में गोया जैसे बंद करने की कोशिश की गई इस मुल्क को। कितनी जंग इस पर थोपी गई। कितने किस्म के इसके अंदर मुख्तलिफ अंदर फितने पैदा किए गए वगैरह वगैरह कितना प्रोपगेंडा दुनिया में हुआ इस मुल्क के खिलाफ और अभी भी वो खत्म नहीं हुआ है। लेकिन एक अम्म और इरादा हो गया था कि मुकाबला करना है। देखिए आप अगर और मुकाबला करने के नतीजे में फिर ये ताकतें और स्ट्रेंथ नजर आ रही है। अगर आप देखें ईरान का अगर क्योंकि अभी जो चंद दिन से लोग हैरान है। जिस तरह से ईरान ने एक खुली जंग में अमेरिका जैसे मिलिट्री सुपर पावर को शिकस्त दे दी और वाकई हैरानी की बात है क्योंकि ईरान का मिलिट्री बजट अमेरिका के मिलिट्री बजट के मुकाबले में 1% है 1% लेकिन उसने खुले जंग में नई कोई गोरिल्ला वॉरफेयर नहीं कही जाएगी। खुली हुई जंग थी। एकदम टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करते हुए उसको शिकस्त दी है। और यह शिकस्त को लेकर बड़ी तादाद दुनिया में हैरान है। लेकिन मुशरा खान ये मैं या हम लोग बाज लोग जो यहां इसको गहराई से और भी दुनिया में भी कुछ लोग जो कई साल से इसको फॉलो कर रहे थे। हकीकत तो ये है कि जब ये जंग शुरू हुई है तो हम लोगों ने पहले दिन ही यह डिक्लेअ करना शुरू कर दिया था। कॉन्फिडेंटली किसी उम्मीद और ख्वाब की दुनिया में रहते हुए नहीं मालूमात की बिना पर कि इस जंग का खात्मा ईरान की जीत के साथ होगा। आपसे भी बात हुई थी उन अयाम में आपको शायद याद हो ये गुफ्तगू हमारी। बिल्कुल मुझे याद है और मैं उस वक्त ये सोचती थी आकिब साहब कि आप इतने कॉन्फिडेंस से कैसे बोल रहे हैं? आप कहते थे मुझसे कि जब ये जंग खत्म हो जाएगी ईरान जीत जाएगा तब हम इसके बारे में इसके इन पहलुओं पर बात करेंगे। और तब मुझे लगता था ये शायद आकिब साहब का थोड़ा ओवर कॉन्फिडेंस है या मे बी लोगों को एक थोड़ी तसल्ली देने के लिए शायद वह यह कर रहे हैं। मुझे नहीं पता था कि चंद महीने भी नहीं गुजरेंगे और हम बात कर रहे होंगे और उस जीत का की बारे में बात कर रहे होंगे। तो ये इस बात को तो मैं जरूर कहूंगी कि शुरू दिन से जब से मेरी आपसे बात शुरू हुई है तब से आप आपके अंदर ये कॉन्फिडेंस था। कॉन्फिडेंस किसी एक ठोस बुनियाद के बेस पर था। सिर्फ ये नहीं था कि कोई मोज यानी ये जो हुआ है दुनिया इसको मोजजा कह रही है ईरान की जीत को। हकीकत यह है कि यह मोजजा नहीं है। यह वो इनएविटेबल नतीजा है खुदा के बनाए हुए उसूलों को फॉलो करने का। कोई इसमें मोजजे का पहलू नहीं। कॉज एंड इफेक्ट है और इसलिए ईरान जो मैसेज दे रहा है इस वक्त दुनिया को दुनिया भर के तमाम कौमों को जहांजहां मजलूम है लेकिन खासतौर पर मुसलमानों को और भी ज्यादा क्योंकि मुसलमानों के अंदर मैसेज को कैच करने की रिसेप्टिविटी की ताकत ज्यादा है सबको ये मैसेज दे रहा है कि जो कामयाबियां हमें मिली है और अभी तो मैं फिर ये एम्फसाइज करूंगा। अभी ये सिर्फ शुरुआत है। जो कामयाबियां हमें ईरानी ये कह रहे हैं जो मिली है ऐसी कामयाबियां सबको मिल सकती है। रास्ता वही है कि किस तरह से सोसाइटी अपने आप को खुदा की तालीमात और उसूलों के तहत अमल पैरा होने के लिए अपने आप को तैयार करे। कुर्बानियां दे, जद्दोजहद करे, कोशिश करे। तो उसके नतीजे में ताकतें आ। कोई मोजजा नहीं है। इसको मोजजा कहना मुबालगा है, एकजुरेशन है। एक पैटर्न है, एक कॉज ऑन इफेक्ट है। और हर सोसाइटी के लिए दरवाजा खुला है। हत्ता हम लोगों के लिए भी जो हिंदुस्तान में इतने चैलेंजेस का सामना कर रहे हैं। जी बिल्कुल। और उनको भी एक कहीं ना कहीं एक तरह की हिंदुस्तानी जो मुसलमान हैं जो बहुत जुल्म और बर्बियत से गुजर रहे हैं। मैं अक्सर ये कहती हूं कि ईरान ने जिस तरह से अपने आप को तैयार किया। खामोश रहकर जो अपने ऊपर काम किया मुझे लगता है यह मुस्लिम वर्ल्ड और जहां कहीं भी जुल्म सितम का शिकार मुसलमान हो रहे हैं उन सबके सामने एक तरह का एक एग्जांपल पेश किया है और शानदार एग्जांपल पेश किया जिससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। क्या आपको यह भी लग रहा है आकि साहब जब तालिबान वहां पर पहुंचते हैं या सऊदी डेलीगेशन वहां पर पहुंचता है और आखिरी सलाम वह पेश करते हैं शहीद आयतुल्लाह अली खामनाई को तो वो भी एक मैसेज देने की क्या कोशिश कर रहे हैं क्या आपको लग रहा है कि उनकी शहादत ने जो हमेशा से एक एक जो खाई रही शिया और सुन्नी की हो सकता है लोगों में उतनी ना हो लेकिन ये कहने में कोई गुरज नहीं होना चाहिए जो कंट्रीज के जो हेड्स हैं उनमें जरूर रही एक शिया सुन्नी हमने डिवाइड देखा और जिसको लेकर आयतुल्लाह अली खामनाई अपनी रहे जिंदगी में इसको लेकर हमेशा बात करते रहे और यह कहते रहे कि इसको खत्म किया जाना चाहिए। क्या आपको लग रहा है उनकी शहादत ने इसको भी पाट दिया है और क्या यह उसकी एक मिसाल थी जब सऊदी और खासतौर पर तालिबान का डेलीगेशन जो कि कट्टर सुन्नी आप कह दें या कुछ और नाम से कहा जा सकता है जब उन्होंने उसमें शिरकत की। कई लोगों ने यह कहा है कि इस शहादत ने इन फासलों को और दरारों को बहुत कम किया है। शायद यह कहना कि पूरी तरह खत्म हो गए हैं। शायद अभी जल्दी है। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि वो दरारें काफी कम हुई है। इसी कुर्बानी और इसी शहादत के नतीजे में और कोई ताज्जुब की बात नहीं है। मुरा साहिबा देखिए अगर ये शहीद इमाम खामनाई ये उस पाए की शख्सियत है कि अगर ये आज से 1400 साल पहले होते वहां पर मक्का मदीना में तो ये खास सहाबियों में से होते यानी उनका वो दर्जा है। अगर वो इमाम अली के जमाने में होते तो उनके खास साथियों में होते। यानी ये इस टाइप की शख्सियत जाहिर सी बात है कि असर जो है उसके खून का तो कोई ताज्जुब की बात नहीं कि हम लोग ये चीजें देख रहे हैं। जहां तक रही शिया सुन्नी दरार की बात हकीकत आपने भी सही फरमाया कि आवाम में उस हद तक दवा दरार नहीं थी और जितनी भी थी वो भी तसन्नुई थी। यानी उसको क्रिएट किया गया था। जो दरबारों में या हुक्मरानों में थी वो भी मैं यह कहना चाहूंगा कि वो भी शिया सुन्नी की दरार नहीं थी। वो दर हकीकत अपने मफाद को खतरे अपने मफादात और इंटरेस्ट को अपनी सत्ता और कुर्सी को खतरे में देख रहे थे और अभी भी कुछ हद तक देखते हैं। क्योंकि जो चीज इंकलाब इस्लामी यानी ईरान में जो इस्लामिक रेवोल्यूशन आया है जो चीज वो रिप्रेजेंट करती है वो उनके लिए खतरनाक है। वो क्या है? बुनियादी तौर पर इज्जत नब्स, डिग्निटी, आजादी लोगों को यानी जस्टिस और इंसाफ कायम करने की कोशिश और इत्तहाद पर जोर ये तमाम वो चीजें हैं जो कई सारे हुक्मरानों के लिए मुसलमान मुालिक के हुक्मरानों के लिए या उनके नेताओं के लिए ये खतरे का बायस है। क्योंकि उनकी हुकूमत इन्हीं सब चीजों को कुचल कर जो है वो इस्टैब्लिश की गई या कायम रखी गई है। कहीं पर कोई बादशाह है, कहीं पर कोई सुल्तान है, कहीं पर कोई फौजी जनरल है वगैरह। तो जाहिर सी बात है कि इस टाइप के जो आइडियाज है वो बहुत खतरनाक रहे हैं। तो एक्चुअली जैसे आपने कहा आवाम में तो बहुत कम थी शिया सुन्नी मुखालिफत जो हुक्मरानों में भी जो ईरान को लेकर बयानबाजी होती थी या दुश्मनी का इजहार होता था वो दर हकीकत उसका मजहबी देश तो था ही नहीं। वो तो सिर्फ अपने सत्ता और अपने पावर को खतरे में क्योंकि देख रहे थे ईरान जो मैसेज दे रहा है उसकी वजह से ईरान जो ईरान कुछ ना भी करे यानी जरूरी नहीं कि ईरान पहले इंटरफेयर करे उनके मुल्क में ईरान का खुद वजूद उनकी आंखों में चुबता था और आज भी चुभता है। क्यों? क्योंकि जब यह उनके मुल्क के जब आवाम देखेंगे ईरान को कि भाई ईरान तो गुलामी नहीं कर रहा है या जो ईरान तो तलवे नहीं चाट रहा है। ईरान तो ये नहीं कर रहा तो फिर वो जब वो तरक्की कर सकता है आगे बढ़ सकता है तो क्या जरूरत है कि हमारे मुल्क में इतने सारे अमेरिकन अड्डे होंगे तो ही हम तरक्की करेंगे। क्या जरूरत है कि हमें गुलामी करनी पड़ेगी, अपने तेल की दौलत देनी पड़ेगी तो ही हम तरक्की करेंगे। यह सवाल उठते हैं। ईरान अगर कुछ भी ना करे तो भी यह सवाल उठते हैं। तो जाहिर सी बात है कि यह एक मुश्किल का वायस है। और अभी भी यह मसला पूरी तरह हल नहीं हुआ है। लेकिन हल होने के नजदीक है। क्योंकि ये हुक्मरानों को समझ में आ गया है कि वो जो फौजी अड्डे अमेरिका ने बनाकर रखे थे वो इनके प्रोटेक्शन के लिए नहीं थे। बल्कि इनके अंदर वो फौजी अड्डे बनाए गए थे ताकि इनकी आबादियों को एज अ ह्यूमन शील्ड इस्तेमाल किया जाए उन फौजी अड्डों को महफूज़ रखने के लिए। लेकिन वो अड्डे ना अपनी हिफाजत कर पाए और जो उन्होंने झूठे दावे किए थे कि इन मुालिक की हिफाजत करेंगे वो भी दावे पूरे नहीं हुए। तो दुनिया तब्दील हो रही है और अब अभी वो चेंजेस का भी हम वो फ गुजर रहा है। अभी सेटल नहीं हुआ है। अभी सिचुएशन सेटल नहीं हुई है। शायद साल भर दो साल और लगेंगे। लेकिन तब्दीलियां बहुत तेजी से हो रही है। एंड मोस्टली फॉर द बेटर। जी इमाम खुमैनी और आयतुल्ला अली खामनाई इन दोनों के प्रोसेशन में आप क्या बड़ा फर्क देखते हैं? एक तो ये जरूर है कि उनकी एक नेचुरल डेथ थी। यहां आयतुल्लाह अली खामनाई की शहादत हुई है और शहादत भी एक ऐसे वक्त में हुई जब एक मुल्क ने हमला किया और वो भी दुनिया के सबसे पावरफुल मुल्क ने और उसके बाद हमने ये देखा कि कैसे ईरान फिर इस जंग को जीता और वो वो उसने वो कामयाबी हासिल की जिसके बारे में दुनिया आज बात कर रही है। लेकिन मैं इसमें तीन चीजें को लेकर मैं सवाल आपसे पूछना चाह रही थी। इमाम खुमैनी फिर आयतुल्ला अली खामनाई इन दोनों का प्रोसेशन और अब आयतुल्लाह अली खामनाई के बेटे को जाति मैं विरासत तो नहीं कहूंगी क्योंकि इस तरह से वहां ईरान में ऐसे नहीं किया जाता है कि कोई विरासत दी जाए लेकिन जो उन्हें नया सुप्रीम लीडर चुना गया है कहीं ना कहीं उनकी शक्ल में क्योंकि वो उनके बेटे हैं इससे दरकिनार नहीं किया जा सकता इस बात को लोग उनको देखने की कोशिश करेंगेI तो क्या आपको लगता है कि मुस्तफा खामनाई पर एक पहले से एक प्रेशर एक होगा| और इन दोनों के प्रोसेशन में इन दोनों को जिस तरह से लोग याद कर रहे हैं या दोनों का जिस तरह का जनाजा उसमें आप क्या बड़ा फर्क देखते हैं? क्या यह भी कि दुनिया तब से लेकर अब तक बहुत बदल चुकी है। अब लोग सोशल मीडिया पर 4K में लाइव उन तमाम चीजों को हर मिनट की बारीकी और जो भी ईरान एक मैसेज देना चाहता है वो लोगों के ज़हन तक घरों तक पहुंच रहा है। क्या ये भी एक बड़ा फर्क है? सवाल आपने पूछा कि क्या ये फर्क है? जाहिर सी बात है बाज जो चीजें आपने का इशारा की वो यकीनन ऐसा ही है। एक तो मीडिया के माहौल चेंज हो गया है। ईरान की की सलाहियत और एबिलिटी इतने बड़े इवेंट्स को ऑर्गेनाइज करने की वो भी बहुत उसमें इजाफा हुआ है। बहुत बढ़ी है। उस तरह से ऑर्गेनाइजेशन और डिसिप्लिन उस जमाने में नहीं था जब 1989 में इमाम हुैनी का इंतकाल हुआ था। अ ये सारी चीजें अपने में अहम है। लेकिन मुझे लग रहा है कि शायद एक बड़ा फर्क जो है वो आपकी बातों में उसी की तरफ भी इशारा था कि इमाम उमैनी रहमतुल्लाह अलह का इस दुनिया से जाना वो शहादत के उस अंदाज से नहीं हुआ था। उनको उस खुदा ने उस किस्म की शहादत अता नहीं की जिसके नतीजे में जो असरात होते हैं कि शहादत की खुदा की राह में जो खून बहता है उसके जो असरात होते हैं वो असरात उस तरह से नमूदार नहीं हुए फरी तौर पर इरेनियन सोसाइटी में और इसलिए उनके इंतकाल का एक बहुत जाहिर सी बात है मोहब्बत गम ये सारी चीजें थी लेकिन इस वक्त शहीद इमाम खामिनाई के इंतकाल के बाद ये हर तरफ ये महसूस हो रहा है ना सिर्फ ईरान में बल्कि बाहर भी ये महसूस हो रहा है कि यह जो कुर्बानी दी गई है यह दुनिया को बदल रही है और वो भी रिलेटिवली शॉर्ट टाइम में बदलना इसने शुरू कर दिया और करेगी। ये सेंस 1989 में इमाम खुैनी की शहादत के बाद नहीं था। बल्कि इमाम इमाम खुमैनी के इंतकाल के बाद नहीं था। इमाम कुमैनी के रहलत के बाद इंतकाल के बाद यकीनन उनको बड़ी अजमत से आलम इस्लाम में याद किया गया। खराज अकीदत पेश किया गया। दोबारा फिर वही शिया सुन्नी वाली तफरीक उस वक्त भी कुछ हद तक मिट गई थी इसकी वजह से वो सारी चीजें थी लेकिन उसके बाद ईरान के अंदर फिर फोकस हो गया कि जंग के बाद अपने आप को हमें कैसे रिबिल्ट करना है क्योंकि अभी हाल ही में आठ साला जंग खत्म हुई थी जो इराक के जरिए वेस्ट ने और बाज अरब मुालिक ने थोपी थी इराक को इस्तेमाल करके तो उस पर इंटरनल स्ट्रेंथ और इंटरनली री अपने आप को रिबिल्ड करने पर चली गई लेकिन इस वक्त ऐसा महसूस होता है कि इस वक्त ऑलरेडी यानी अभी तो अभी तो सब मैटर सेटल भी नहीं हुए हैं। अभी तो वो जंगी कैफियत अभी भी बाकी है। लेकिन दुनिया के कोने-कोने में हत्ता अमेरिका के पेट्रोल पंप पे और ऑस्ट्रेलिया में और फला हर गोशे में लग रहा है ऐसा महसूस हो रहा है कि तब्दीलियां बहुत तेजी से आ रही है। और जिस जो तब्दीलियां कहीं ना कहीं इस्लामिक रेजिस्टेंस एक्शन एक्शन के फैसलों से डिटरमिन है। चाहे वो 7 अक्टूबर का वो कयाम हो तूफान उल अा की शक्ल में हो या दूसरे जो वाकयात रहे हैं चाहे वो सैयद हसन नसुल्लाह की शहादत हो मोहम्मद ये मोहम्मद सिवार की या सवार की शहादत हो या अबू उबैदा की शहादत हो यानी ये जो ये जो शहादत है और फिर उसमें एक क्लाइमेक्स के तौर पर जो इमाम खामिनाई की शहादत है और हमें लग रहा था अब इसके आगे क्लाइमेक्स नहीं हो सकता लेकिन ये तदफीन और तश दिखा रहा है कि नहीं क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स एक के बाद एक बड़ा आता जा रहा है तो ये चीजें डिटरमिन कर रही है चेंजेस और वो भी दुनिया के हर गोशे में। तो ये एक बहुत बड़ा यानी वर्ल्ड चेंजिंग जो वो भी रिलेटिवली शॉर्ट टाइम फ्रेम में जो वर्ल्ड चेंजिंग हम सिफत और क्वालिटी इमाम खामिनाई की शहादत के जमाने में देख रहे हैं वो हमने उस वक्त इमाम कुमैनी की शहादत में नहीं देखा। ये इंपॉर्टेंट आप आप बात बोल रहे हैं। क्या आपको ये भी लग रहा है आकि साहब कि एक तरह का एक तो लोगों ने पहले ईरान की ताकत देखी। अब उसके बाद ईरान जिस तरह से अपने सुप्रीम लीडर को आखिरी सलाम पेश कर रहा है वो भी दुनिया के सामने एक मिसाल बन रहा है कि अगर लीडर ऐसा हो जो किसी के लिए एक वालिद की तरह शफकत भरा हाथ हो तो किसी के लिए एक भाई की तरह हो तो किसी के लिए किसी और शक्ल में हो मतलब उनकी अलग शक्ल एक है लेकिन लोग उन्हें अलग-अलग तरीके से देख रहे हो जिस तरह से वो बच्चों से बात करते थे जिस तरह से वो खवातीन से बात करते थे या जब वो एक लीडरशिप उस तरह के एक पूरे एक्शन मोड में होते थे। अलग-अलग तरीके से जब वो बयान करते थे। लोगों ने हर तरीके से उन्हें देखा है। अ जब उनका ये आखिरी ये प्रोसेशन पूरा ये हो रहा है। क्या आपको लग रहा है कि इस प्रोसेशन के थ्रू लोग ईरान से जज्बाती तौर पर भी जुड़ रहे हैं कि एक लीडर अगर ऐसा हो तो उसकी विदाई उसका आखिरी सलाम ऐसा होता है। मुझे लगता है कि वेस्टर्न वर्ल्ड से लेकर और पूरी दुनिया मुस्लिम वर्ल्ड को अगर मैं अगर थोड़ी देर के लिए साइड भी करूं तो जो वेस्टर्न वर्ल्ड है वो भी एक देख रहा है। शायद उसने भी पहले कभी इस तरह का कि आखिरी विदाई किसी की नहीं देखी होगी। जहां एक-एक लीडर को इतनी इज्जत के साथ, इतने महीनों के बाद भी लोग उस तरह से बिलख रहे हैं, रो रहे हैं और साथ के साथ वो रिवेंज की बात भी कर रहे हैं। इस शहादत के रिवेंज की बात भी कर रहे हैं तो अपना मकसद भी नहीं भूल रहे हैं। जी आपने सही कहा कि शहीद रहबर की रहबरियत ने और उनकी जिंदगी ने दूसरे लीडर्स के लिए बहुत आला मयार कायम कर दिया है। और ये बहुत अच्छी चीज है। क्योंकि दुनिया में सबसे ज्यादा बुरे हालात वहां पैदा होते हैं जहां की जनता जहां की आवाम ये एक्सेप्ट कर लेती है कि जो लीडर है जो लीडर्स हैं जो नेता है वो तो जाहिर है करप्ट होंगे ही वो तो जाहिर है बुरे काम करेंगे ही ये जहां इंटरनलाइज हो जाता है फिर वहां पर बुरे लोगों को रोकने और कंट्रोल करने के लिए तकरीबन नामुमकिन हो जाते हैं हालात और जहांजहां फिर ये जिस हद तक भी इस इंटरनलाइज्ड इन मरात को तोड़ा जा सके और चैलेंज किया जा सके। जैसे कि शहीद इमाम कामिनाई की शख्सियत जिंदगी चैलेंज करती है और तोड़ती है। यह बहुत बहुत मुफीद और फायदेमंद है। और ये उनका एक लास्टिंग उनके मुख्तलिफ लास्टिंग कंट्रीब्यूशन में से एक लास्टिंग कंट्रीब्यूशन उनकी जिंदगी का ये भी रहेगा और उम्मीद है कि दुनिया के हर गोशे में हत्ता हिंदुस्तान में भी हम लोग इससे सबक सीखेंगे और फायदा हासिल कर सकेंगे। दूसरी चीज जो इसी ताल्लुक से मैं कहना चाहता हूं कि इमाम खामनाई की पर्सनालिटी अपने तौर पर जितनी भी एक्सेप्शनल और यूनिक रही है और यकीनन है और इसके मुख्तलिफ पहलू समझने में अभी बहुत साल भी लगेंगे। लेकिन इसे हम एकदम एक एक रे एक ऑडिट ही ना समझे। यानी ये ना समझे कि ये चीज आउट ऑफ द ब्लू कहीं से एकदम से आ गई। नहीं ये नतीजा है दर हकीकत इस्लाम की तालीमात पर अमल करने का। तो गरचे इसका मतलब ये नहीं कि जो भी चाहे वो फौरन उनकी तरह से बन सकता है। नहीं लेकिन रास्ता है रास्ता है। चाहे इंडिविजुअल लेवल पर चीजों को देखा जाए चाहे सोसाइटी के लेवल पर देखा जाए। मकतब है, टीचिंग्स हैं, प्रिंसिपल्स हैं, उसूल हैं जो सदियों से डेवलप होकर आगे बढ़े हैं और हम अपने जमाने में उसका नतीजा देखते हैं। इमाम खामनाई जैसी शख्सियत यही रास्ता अभी भी मौजूद है। इसको जितना आगे कोई और बढ़ा सके कोई दूसरी सोसाइटी तो वैसे ही उसको नताइज और असरात भी मिलेंगे। जी दो मेरे आखिरी और इंपॉर्टेंट सवाल आपसे कि एक तो मैं देख रही थी कि शहीद आयतुल्ला अली खामनाई के जो तीनों बेटे हैं उनकी आजजी और उनकी इंकसारी जो है उनकी सादगी जो है वो दुनिया को बहुत मुतासिर कर रही है। एक तो दूसरे नंबर के उनके बेटे जो कि अब सुप्रीम लीडर हैं मुस्तबा खामनाई लेकिन जो उनके तीन और बेटे जिनको हमने नमाज़ जनाजा में देखा और उनके पास कोई ऐसी मैं उनके बारे में पढ़ रही थी कि कोई उनके पास ऐसी कोई पोस्ट नहीं है। कोई वालिद एक सुप्रीम लीडर थे। उसका उन्होंने कोई एडवांटेज लिया हो ना ही वैसा कुछ नजर आता है। मशद में जो आयतुल्ला अली खामनाई का घर है। वो घर देखकर ताज्जुब ये होता है कि आज भी ऐसे ऐसे लीडर मौजूद रहे। अब तो वो शहीद हो गए। वो रहे कि जिनका घर इस तरह से है, इतनी सादगी भरा घर कि आप इमेजिन भी नहीं कर सकते और उतनी ही सादगी से शायद उनके बेटे भी रहते हैं। तो एक तो ये सवाल कि इसमें भी क्या एक तरह का एक एक मैसेज है दुनिया को कि एक लीडर कैसा होना चाहिए? एक लीडर का को यह नहीं जैसे हम देखते हैं कि सिर्फ अपना घर भरना, सिर्फ अपना परिवारवाद करना जिसका आप जिक्र कर रहे थे। वैसा कुछ भी नहीं था। जब उनको पहली बार सुप्रीम लीडर चुना गया उनको बताया गया उससे पहले उन्हें पता भी नहीं था और वह आजकल वीडियो वायरल भी है कि वह हक्का बक्का रह गए क्योंकि उनको अंदाजा था कि उनके ऊपर कितनी बड़ी जिम्मेदारी आ रही है और उस जिम्मेदारी को उन्होंने किस बखूबी से निभाया अपनी आखिरी सांस तक आज वो दुनिया देख रही है। एक तो ये और इसी से जुड़ा एक और सवाल [नाक से की जाने वाली आवाज़] मैं यह भी देख रही थी आकिब साहब कि ईरान से बहुत कुछ सीखने के लिए है। बहुत कुछ सीखने के लिए दुनिया को। एक ये भी कि मिनाप की जिन बच्चियों का कत्ल किया गया जिस बर्बरियाता से उनके ऊपर जो बम्ब्स गिराए गए उन बच्चियों को कत्ल किया गया अमेरिका और इजराइल के जरिए ऐसा लगता है कि हर एक ईरान का शख्स उन मिनाब की बच्चियों को जी रहा हो जैसे आप एयरपोर्ट पे उतरे तो आपको सबसे पहले वो नजर आएंगे जहां सारा प्रोसेशन है वहां उन बच्चियों की पिक्चर नजर आएगी जब अरा जाते हैं तो उस प्लेन पर वो मैसेज होता है आप हर जगह देखिए कि उन वो 168 जो बच्चियां हैं उनको ईरान एक सेकंड भी भूलने के लिए तैयार नहीं है। और यह बता रहा है इस एपस्टीन गैंग को कि हमारे लिए हमारी बच्चियां कितनी कीमती और कितनी अहम है। काश ऐसा ही कोई गाजा के जो 2000 जो हजारों बच्चे हैं उनके लिए कोई कर पाता। देखिए ये जो चाहे बच्चियां मीना की हो, चाहे गजा की हो। यह सब हमारी ही बच्चियां है। फर्क बस इतना है कि दुनिया की सियासत में अभी इसकी गुंजाइश ज्यादा पाई जाती है कि हर मुल्क अपने सिटीजंस के हक में बात करे और उनके उनके इंतकाम का मुतालबा ज्यादा आसानी से करें। दुनिया के ज़हन जो है वो इसको मकबूल कबूल करने के लिए तैयार है। यहां पर ईरान में चाहे वो लीडरशिप हो चाहे वो आम लोग हो उनके लिए जो गज्जा में हुआ है वो उनके लिए निहायत दर्दनाक है। आज भी ऐसा है। जैसे कि हिंदुस्तान में मुसलमानों के लिए और बाज गैर मुसलमानों के लिए आज भी ऐसा है। तो वो गज़ा को भुलाया नहीं गया है। कदम ब कदम बा आगे बढ़ बढ़ रही है कहानी। यहां तक कि फिलिस्तीन पूरी तरह से आजाद हो और यही हम देखेंगे। हम देखेंगे जो जो इंतकाम का मुतालिबा अभी हो रहा है ये इंतकाम का मुतालबा दर हकीकत इंसाफ का मुतालबा है और इंसाफ का ये तकाजा है के मुजरिमीन को सजा मिलनी चाहिए। जो आखिरत में मिलेगी वो तो मिलेगी लेकिन हम उसका मुतालबा थोड़ी कर रहे हैं कि आखिरत में मिलेगी। वो हम मुतालबा करें ना करें। वो तो खुदा का निजाम है। आखिरत में तो बहुत बड़ी सजा है इन लोगों के लिए। इस दुनिया में सजा मिलनी चाहिए। यहां से शुरू होना चाहिए उनका अज़ाब। और यहां के चाहे वो जिम्मेदार हो। आज मैं देख रहा था कि बयान दिया है यहां के चीफ जस्टिस ने ईरान ने के चीफ जस्टिस ने फोकस किया है कि ये जो जनाजे के इर्दगिर्द सबका मुतालिबा यही है कि इंसाफ होना चाहिए। इंतकाम होना चाहिए है। ये बहुत अच्छा कदम है। और इसके जरिए दुनिया में अद्ल और इंसाफ कायम हो गया। जब इतने बड़े-बड़े मुजरमीन को सजा मिलेगी और मेरी तो यही उम्मीद है कि बाकायदा कोर्ट में इनको लाया जाए, केस हो और बड़े नज्म और ज्त के साथ और बड़े सुकून के साथ फिर जो भी जिस सजा के ये मुस्तहक है और हम अंदाजा लगा सकते हैं कि किस सजा के मुस्तहक है वो उनको बाकायदा मिले ना ये के कहीं पर अचानक से इनकी किसी धमाके में या किसी ऐसी चीज में मौत हो जाए। वो उतनी सेटिस्फाइंग शायद नहीं होगी। दुनिया के लिए उतनी मुफीद नहीं होगी। क्योंकि जितने बड़े इनहीं ने जुर्म किए हैं खासतौर पर फिलिस्तीन में इसकी सजा जो है मिलेगी तो जाके दुनिया संभलना शुरू होगी और एक बैलेंस की तरफ बढ़ेगी। नहीं तो फिर इफ देयर आर नो कॉन्सिक्वेंसेस तो ये तो इनकी उम्रें वैसे भी खत्म ही होने वाली है इन जल्लादों की। अगले जल्लाद आ जाएंगे और इसी सिलसिले को आगे जारी रखेंगे। बिल्कुल। आखिरी मेरा सवाल आपसे कि आप देख रहे हैं कि अह फिलहाल की जो मौजूदा हुकूमत है और खासतौर पर आरएसएस और बीजेपी की मैं बात करूंगी कि फिलहाल मुसलमानों के ऊपर किस तरह के जुल्म और सितम हो रहे हैं। उनको समझ नहीं आ रहा है कि इसका वे आउट क्या है? रिप्रेजेंटेशन का घटने से लेकर लिंचिंग से लेकर उनके हुकूक जिस तरह से पामाल किए जा रहे हैं वो सब हमारे सामने हैं। मेरा सवाल आपसे यह है और संक्षेप में क्योंकि वक्त की कमी है आकि साहब कि क्या ईरान की ने जिस तरह से जीत हासिल की है अपनी पूरी तैयारी के साथ क्या आपको लगता है कि ये मुसलमानों के लिए हिंदुस्तान के मुसलमानों के लिए भी क्या इसमें कोई मैसेज कोई सबक है? क्या आप इसको इस तरह से देखते हैं? मजलूम कौमों के लिए सबक और मैसेज रखती है जिसको एक तरह से ये जीत चीखचीख कर वो पैगाम दे रही है। सवाल यह है कि कौन सी मजलूम कौमे हैं जो सुन सकेंगी, समझ सकेंगी और इससे सबक ले सकेंग। दैट इज द क्वेश्चन। और वो पैगाम के कुछ अगर अहम उनसूद या एलिमेंट्स पर बात अगर मैं इशारा करूं वक्त ही कम है तो उसके कुछ अहम पहलू ये हैं कि बुनियादी तौर पर बुनियादी तौर पर अपने आप को मजबूत करना होगा। अपने आप को ताकतवर करना होगा। किसी और पर डिपेंड नहीं किया जा सकता। अभी ईरान ने जब मुकाबला किया है तो उस जमाने में कोल्ड वॉर थी। एक यूएसएसआर था। ईरान उससे भी नजदीक नहीं गया। उससे भी फासला रखा। अभी चंद दिन पहले मैं एक इंटरव्यू देख रहा था रशियन एक सिक्योरिटी ऑफिशियल करके जिसने जिन्होंने कहा वो अपने नजरिए से कह रहे थे। उन्हीं ने कहा कि ईरान ने बहुत बड़ी गलती की। हमने ईरान को कॉम्प्रहेंसिव डिफेंस पैक्ट ऑफर किया जिसके अंदर न्यूक्लियर अंब्रेला भी शामिल था। लेकिन ईरान ने पता नहीं क्यों ठुकरा दिया हमारा ऑफर। उन्हें उन्हें नहीं पता क्यों ठुकरा दिया। मुझे पता है हमें पता है क्यों ठुकरा दिया ईरान ने ये अनबिलीवेबल ऑफर वो इसलिए क्योंकि ईरान इस अकीदे पर चल रहा है कि सिर्फ और सिर्फ खुदा के ही अंब्रेला के तहत काम हो सकता है और फिर अपने पैरों पर खड़ा होना पड़ेगा फला पार्टी आकर हमको बचाएगी फला दल बचाएगा फला जो भी आप अलग-अलग फला हम दूसरों को हम सपोर्ट करेंगे हां सबसे दोस्ताना ताल्लुकात हमें रखना है हिंदुस्तान की मैं बात कर रहा हूं लेकिन ये कि कोई और हिस्सा फला जो अच्छे अच्छे लोग हैं, फला जो सेुलर लोग हैं। इतना तल्ख तजुर्बा 70 80 साल का हो गया है कि हमें ये समझ में आ जाना चाहिए उस तजुर्ब की बिना पर और अभी ये ईरान की जीत के बिना पर के इस्लामी उसूलों पर अमल करते हुए अपने पैरों पर जब खड़े होंगे तो फिर कामयाबियों का सिलसिला शुरू होगा। अपने पैरों पर खड़े होने का क्या मतलब है? जाहिर सी बात है हर मुल्क और हर माशरे के तकाजे अलग होते हैं। वो चीज जो प्रैक्टिकल है ईरान में वो वही चीज प्रैक्टिकल नहीं है इंडिया में। लेकिन उसूल कंसिस्टेंट है। हर जगह वही कुरान है। हर जगह वही सुन्नत है। उसी में उसूल पाए जाते हैं। उसके मुताबिक जब हम चलेंगे आगे तो हमें वो कामयाबी मिलेगी। ये है ईरान का बुनियादी मैसेज जो हम सबके लिए हत्ता हिंदुस्तान में भी यही मैसेज पाया जाता है। जी बिल्कुल। अभी क्योंकि फिलहाल मैं इस प्रोसेशन और उसके इर्द-गिर्द जो सवाल हैं उस पर मैं कंसंट्रेट करना चाहती थी अपना आज का ये पॉडकास्ट तो इसीलिए सवालों के सिलसिले को मैं यहीं पर ही रोकूंगी लेकिन बहुत सारे अभी भी ज़हन में सवाल हैं। ये जो जीत है इसके बाद ये जो प्रोसेशन है और उसके बाद जो एमओयू साइन हुआ है उसके बाद किस तरह से चीजें बदलेंगी आगे किस तरह से जाएगा। ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिस पर अभी बात करना बाकी है और किसी और रोज आकि साहब को फिर से परेशान किया जाएगा। लेकिन फिलहाल आकि साहब बहुत-बहुत शुक्रिया आपका एन हाउस नेटवर्क में अपना वक्त देने के लिए और इस पडकास्ट का हिस्सा बनने के लिए। बहुत-बहुत शुक्रिया मुझे दावत देने के लिए। बहुत-बत शुक्रिया।

Companion article

A procession without precedent

Rarely, if ever, has a single funeral drawn the kind of attention now converging on Iran. Across several days, an estimated two-and-a-half to three crore (25–30 million) people are being hosted by Iran as mourners and delegations arrive to accompany the body of Ayatollah Ali Khamenei, killed in the recent war, from Tehran to Qom, and onward to Najaf and Karbala in Iraq before final burial in Mashhad. Delegations from more than 100 countries have arrived, official and unofficial, including from Afghanistan's Taliban government and, notably, a Saudi delegation — though several Western governments were reportedly not even extended an invitation.

Discussing the scene with host Bushra Khanam Fahad, Islamic scholar Aqib Zaidi, speaking from Qom where he had travelled after two days in Tehran, described witnessing the procession not merely as an observer but, in his words, as a participant in the mourning. He pushed back on the idea that the outpouring of grief was purely emotional and therefore irrational: "emotion and reason usually work together," he said, arguing that what he saw on the ground combined mourning with clear resolve. He noted that ordinary Iranians were personally funding their own travel to attend, seeking out visitors from other cities to host them, and that free meals, transport and lodging were being organised through a mix of state support and grassroots volunteering — not, he stressed, a purely state-orchestrated event.

Iraq's gesture, and a changed regional mood

One striking detail Zaidi highlighted: Iraq's government said it could accommodate only one country's request to have the funeral procession pass through its territory to Najaf and Karbala — Iran's. He called this remarkable given the two countries fought an eight-year war in the 1980s with hundreds of thousands killed on both sides. For Iraq's government and public — a country whose oil revenue still flows substantially through the United States — to host this procession, he argued, reflects how much the regional mood has shifted.

Zaidi connected the scale of the event to the broader outcome of the recent war between Iran and the US-Israel alliance. He argued Iran had shown the world, over roughly 40 days of conflict, that a nation could withstand and ultimately defeat what is considered the world's most powerful military — a result, he said, without parallel for the Muslim world in a century or two. He rejected the framing of this outcome as some kind of miracle, calling it instead the "inevitable result" of a society organising itself around religious principle, cause and effect rather than chance. He was careful to add that Gulf rulers' historical unease with Israel and hostility toward Iran, and Sunni-Shia tension more broadly, had less to do with genuine sectarian feeling among ordinary people than with regimes fearing that Iran's example — refusing subservience to the US while still developing — posed a threat to their own hold on power, which he argued rests partly on hosting American military bases whose real purpose, he said, was to use local populations as a "human shield" for the bases rather than to protect them.

Symbols on the streets

Two colours dominated the visuals from the procession: black, for mourning, and red, a colour with deep resonance in Karbala's tradition as a symbol of the demand for retribution — banners often carried the phrase "Ya Sarat al-Hussain," invoking vengeance for the killers of Imam Hussain. The campaign's declared slogan, Zaidi noted, translates to "We Must Rise," accompanied by a clenched-fist logo. He explained the fist's specific resonance: Khamenei's right hand had been disabled since an assassination attempt in 1981, leaving him to write and function using only his left hand for the rest of his life — and it was his left hand, in a clenched fist, that was reportedly found when his body was recovered from the rubble, a detail he described as symbolising unbroken resolve.

Reciting Quran as diplomacy

Fahad noted an aspect of the coverage that had drawn attention even from non-Muslim commentators: as international delegations arrived, specific Quranic verses were recited for each — different verses reportedly chosen for the Taliban delegation, for a Saudi delegation whose invitation and attendance had been uncertain, and for delegations from Hamas and Hezbollah. Zaidi framed this as part of a broader message — an unusually direct role for scripture in the conduct of diplomacy, one he said Muslims are more accustomed to associating with private religious observance than statecraft, and one he argued showed how such teachings could be mobilised at a societal scale.

Comparing two funerals

Asked to compare this funeral to that of Ayatollah Khomeini in 1989, Zaidi identified both technical and spiritual differences. Media capability and organisational sophistication have grown enormously in the intervening decades. But he argued the deeper difference lay in the nature of each man's death: Khomeini died of natural causes, while Khamenei's killing came in the course of a war against the world's most powerful state — a killing Zaidi described as carrying a spiritual and political charge that a natural death does not. He linked it to a chain of similar losses — the deaths of Hassan Nasrallah, and of other resistance commanders — arguing that each had seemed to be the peak of what could be absorbed, only for the next to exceed it, and that this pattern of sacrifice was itself driving accelerating change in the region and beyond.

Succession and simplicity

Khamenei's son, Mostafa Khamenei, has since been named the new Supreme Leader — a process Zaidi was careful to note is not hereditary succession in form, though he acknowledged public perception would inevitably be shaped by the family connection. He and Fahad both noted footage of Mostafa Khamenei's evident shock upon learning of his selection, and the modesty of the family home in Mashhad, arguing this contrasted with leaders elsewhere who use power to enrich family and dynasty.

A message for the region — and for India

Fahad raised the recurring reference, throughout the procession, to 168 girls killed in Minab — a reference that appeared on aircraft and across memorial imagery — and drew a parallel to the thousands of children killed in Gaza, asking whether the world might extend similar remembrance there. Zaidi agreed the demand for "revenge" being voiced by mourners was, in substance, a demand for justice — accountability through due legal process, he said, rather than covert reprisals, so that those responsible face consequences in this world rather than relying solely on judgment in the next.

Asked what lesson this holds for Muslims elsewhere, including in India, Zaidi's answer centred on self-reliance: Iran, he noted, had declined a Russian offer of a comprehensive defence pact including a "nuclear umbrella" during the war, on the principle that security should rest on divine guidance and a society's own preparation rather than dependence on external powers. He recalled that even during the Cold War, Iran had deliberately kept its distance from the Soviet bloc rather than trade one dependency for another — a choice he said has been repeatedly vindicated. The specifics of what "standing on one's own feet" means, he said, will differ by country and context — what is practical in Iran will not always be practical in India — but the underlying principle is, in his view, consistent everywhere: the same scripture, the same prophetic example, applies regardless of geography, and societies that organise themselves around those foundations, however patiently and however long it takes, eventually see results. That, he said, is the basic message Iran's war has sent not only to Muslims facing persecution elsewhere, but specifically to Indian Muslims navigating discrimination, mob violence and shrinking representation at home — a door, he insisted, that remains open to every society willing to walk through it.

Unfinished business

Fahad closed by noting how much remained unexamined in a single conversation — the terms of the memorandum of understanding, its implications for the wider balance of power, and how the post-war order would actually take shape in the months ahead — promising a follow-up conversation with Zaidi once more of those details became clear. For now, she said, the scenes from Tehran, Qom and the roads between them stood as their own kind of testimony: an attempt, however contested its interpretation, to give an assassinated leader a farewell equal to the movement he claimed to represent.

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