Nous Podcast· 25 Apr 2026· 58:37

Historic Voting in West Bengal: Are Muslim Voters Being Targeted?

India is the world’s largest democracy — but what happens when citizens are asked to prove their right to vote? In this powerful conversation, we break down the historic 92% voter turnout in West Bengal and what it truly represents — participation, fear, or resistance. Featuring policy researcher…

Full Transcript

इलेक्शन कमिशनर कोई एसआईआर का मैनुअल नहीं फॉलो किया क्योंकि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी यह टर्म बीआर में नहीं था और यह सिर्फ बंगाल के लिए इन्वेंट किया गया। वी डील्स विथ डाटा इफ ही यूज़ एआई यू कैन प्रोब देम टू आइडेंटिफाई विथ अ मुस्लिम नेम टू आइडेंटिफाई एंड फ्लैग द डिस्क्रिपेंसी अमोंग देम इवन अ फुल स्टॉप। कि लेकिन फिर भी क्या आपको यह लग रहा है कि 2021 के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी इज गोइंग टू डू बेटर दिस टाइम? यू नो आई हैव नो हेजिटेशन इन सेइंग दैट इलेक्शन कमीशन इज़ अ पार्टी टू दिस दिस काइंड ऑफ़ इन ओवर अगेंस्ट द बंगाल सिटीजंस एंड दे हैव अ काइंड ऑफ़ हरासमेंट दे क्रिएटेड थ्रूउ द एंटायर एसआईआर प्रोसेस। क्या टारगेटेड मुस्लिम वोटर्स इसमें डिलीट किए गए हैं? और ये लाखों की तादाद में जो वोटर्स डिलीट हुए हैं उसमें कितनी बड़ी तादाद मुसलमानों की है। जैसे यहां जमीन खरीदना और बेचना भी बंद हो गया क्योंकि ये इफ यू आर अंडर एजुकेशन इफ योर वोटिंग राइट्स इन डिलीटेड योर वेलफेयर स्कीम विल बी आल्सो सस्पेंडेड। लेकिन क्या इसका जो लार्जर पिक्चर है साबर साहब क्या वो लोग समझ पा रहे हैं कि ये बैकडोर दरअसल एनआरसी है? हम लोग एक एक दूसरा रिसर्च भी कर रहा है। एसआर का इंपैक्ट मेंटल हेल्थ में क्या? मैं हम लोग को सेंटर जो लीगल एक्ट चला रहा आदमी आके रो रहा। भाई आई कांट एक्सप्लेन पीपल कितना परेशान है। दीज़ पिटिकल पार्टीज यू नो व्हेन इलेक्शन वाज़ देयर देयर वर देयर वर वैरी हाई इन स्पिरिट। इलेक्शन हो गया रिजल्ट आ गया एंड बूम गॉन। इस तरफ का जो नागरिक का जो एक्सप्लइटेशन हरासमेंट आई कैन फोरसी और आई कैन से इवन दे विल प्रिपेयर वेरी सून अ डिटेंशन कैंप इवन इन द बंगाल साबिर साहब आप बहुत इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं। आप ये कह रहे हैं कि आसाम मॉडल जो है वो वेस्ट बंगाल पे लागू होने जा रहा है। वन रे ऑफ़ होप दैट दिस टाइम पीपल विल वोट अगेंस्ट दिस एक्सप्लइटेटिव एसआईआर। सो थोड़ा ताकत यहां मिल जाएगा। दूसरा फॉर द मथुआ यू नो स्टिल देयर इज ए प्रोविज़न अंडर सीए टू गिव देम सिटीजनशिप एंड ब्रिंग बैक इन द फोल्ड ऑफ बट व्हाट इज देयर फॉर द माइनॉरिटीज नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुश्रा खानम फहाद। जब हम यह बात कर रहे हैं और आज का जब मैं पडकास्ट रिकॉर्ड कर रही हूं उस वक्त पश्चिम बंगाल में वेस्ट बंगाल में पहले फेस की वोटिंग मुकम्मल हो चुकी है और जो वोट प्रतिशत हमारे सामने निकल कर आया है वो 92% से भी ज्यादा है। यह वेस्ट बंगाल की तारीख में यह कहा जा सकता है कि अब तक का सबसे ज्यादा वोटिंग परसेंटेज है। इसको लेकर अलग-अलग तरह की बातें कही जा रही हैं। कुछ जो एक्सपर्ट्स हैं उनका यह कहना है टीएमसी भी यह दावा कर रही है कि एसआईआर के विरोध में दरअसल यह बंपर वोटिंग की गई है। वहीं अगर भारतीय जनता पार्टी की हम बात करें तो उनका कहना है कि ये टीएमसी के विरोध में वोटिंग की गई है और ममता बनर्जी का सूरज जो है वो डूब रहा है। लेकिन हम अगर पिछले कुछ एग्जांपल्स हम देखें तो हमने देखा है कि जो वीमेन वोटर है वो बहुत बड़ी तादाद में वोट कर रहा है। बिहार का एग्जांपल हमारे सामने है। इसके साथ-साथ प्रो इनकंबेंसी जो है वो भी वोटिंग हमने बड़ी तादाद में बिहार में भी देखी और वही एग्जांपल यहां पर भी पश्चिम बंगाल में भी एक्सपर्ट्स जो हैं वो देते हुए नजर आ रहे हैं कि ये प्रो इनकंबेंसी वोट हो सकता है। दूसरा इंपॉर्टेंट फैक्टर ये है कि अगर हम जब वेस्ट बंगाल की तारीख की बात करते हैं सियासी तारीख की बात करते हैं तो हमने देखा कि कांग्रेस किस तरह से एक लंबे वक्त तक पश्चिम बंगाल पर काबिज रही। फिर हमने देखा कि लगभग तीन दशक तक लेफ्ट पार्टीज का कब्जा रहा। ममता बनर्जी की अगर हम बात करें तो उन्हें अभी 15 साल ही हुए हैं। तो क्या ममता बनर्जी एक बार फिर से वापसी करने जा रही हैं? पश्चिम बंगाल का मिजाज थोड़ा इसी तरह का है। ठहराव पसंद वो चीजों को देखकर समझ कर ही वोट करते हैं। बंगाली अस्मिता उनके लिए बहुत इंपॉर्टेंट है। कम्युनल हम कह सकते हैं कि एक तरह से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश बहुत बड़े पैमाने पर भारतीय जनता पार्टी ने की है और इसमें वो बहुत हद तक कामयाब भी रहे हैं। लेकिन उसका काउंटर नैरेटिव भी जिस तरह से ममता बनर्जी ने दिया है वो भी खासा कामयाब हो रहा है कि अगर बीजेपी सत्ता में आती है तो कैसे आपकी मांस मछली ये सब खत्म हो जाएगी उनका ये कहना कि देखिए मंगलवार सोमवार और शनिवार इस तरह के डेज होंगे और आप आप सोच लीजिए कि क्या जो बंगाली मानुष है वो मछली बिना मांस खाए क्या एक दिन भी रह सकता है वहां तो पूजों में भी जो नॉनवेज है उसको एक तरह से भेंट किया जाता है तो वहां जो वह नैरेटिव है वह भारतीय जनता पार्टी उस तरह से सेट करने में उस तरह से कामयाब नहीं रही है। योगी आदित्यनाथ ने यह कहा कि यह काबा की धरती नहीं काली की धरती है। इस तरह की बातें उन्होंने कही। इतिहास को उन्होंने गलत तरीके से कोट किया। शुभेंदु अधिकारी ये कहते हुए नजर आए कि देखिए एसआईआर हुआ है तो बीजेपी यहां पर सत्ता में आने जा रही है। अब सवाल ये उठ रहा है कि एसआईआर जो हुआ है उसमें लाखों वोटर्स जो काटे गए हैं क्योंकि मैं लाखों इसलिए कह रही हूं क्योंकि पहले 90 लाख था ये आंकड़ा। फिर उसके बाद हमने देखा कि कुछ जो एजुडिकेशन में डाले गए थे उनमें से कुछ वोटर्स को शामिल किया गया है। फिर एंड मोमेंट पे 7 लाख वोटर्स को वोटर लिस्ट में शामिल किया गया है। तो एक फाइनल जो फिगर है वो अभी मैं अपने गेस्ट से जानूंगी कि अभी फाइनल फिगर क्या है और इसका असर कितने बड़े पैमाने पर देखने के लिए मिल रहा है? ये जो बंपर वोटिंग हुई है ये क्या कहती है? मुस्लिम इलाकों में क्या ज्यादा वोटिंग हुई है? हमने देखा कि बड़ी तादाद में जो मजदूर हैं, जो लेबर्स हैं वो अर्बन पॉकेट से वो बड़े पैमाने पर वो अपने घरों की तरफ गए यानी पश्चिम बंगाल गए। वहां पर जाकर उन्होंने वोट किया है और हमने देखा कि देर तक यानी कि 7 8:00 बजे तक भी लंबी कतारें अभी भी हमें वेस्ट बंगाल के अलग बूथ अलग-अलग बूथ्स पर देखने के लिए मिली। तो आप सोचिए कि कितनी बड़ी तादाद में लोग यहां पर अर्बन और रूरल दोनों पॉकेट्स में निकले हैं वोट करने के लिए। तो यह पैटर्न क्या कह रहा है? आसाम में भी हमने देखा कि वोटिंग परसेंटेज बहुत जबरदस्त रही है और उसमें ये कहा गया कि महिला वोटर और मुसलमानों ने बड़े पैमाने पर वोट किया है। और इस पर बात करने के लिए मेरे साथ बेहद खास मेहमान जुड़ गए हैं। मेरे साथ साबिर अहमद साहब हैं। ही इज़ दी फाउंडर, डायरेक्टर एंड लीड ऑफ दी सब्र इंस्टीट्यूट। अह अ पब्लिक पॉलिसी रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन बेस्ड इन कोलकाता, वेस्ट बंगाल। सबरी हैज़ बीन इंगेज्ड इन डेटा ड्रिवन रिसर्च फॉर ओवर अ डिकेड एंड हैज़ ड्रॉन सिग्निफिकेंट नेशनल अटेंशन इन द पास्ट सिक्स मंथ्स फॉर इट्स वर्क ऑन स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन और हमने ये देखा कि उनकी रिपोर्ट्स को काफी जगहों पर रिपोर्ट किया गया है। उनके बारे में मेंशन किया गया है। और अलग-अलग हम हमने वेबसाइट पे देखा, न्यूज़ एजेंसीज पे देखा कि सब इंस्टट्यूट की एसआईआर को लेकर जो एक्सटेंसिव उन्होंने डिटेल रिसर्च जो प्रोड्यूस की है उसको बहुत जगह पर कोड किया गया है। साबिर अहमद साहब सबसे पहले आपका बहुत-बहुत स्वागत इस्तकबाल नाउज़ नेटवर्क में। बहुत-बहुत शुक्रिया आज ये मौका देने के लिए। कुछ बात पश्चिम बंगाल से हम कहने जा रहा है। बहुत-बहुत शुक्रिया। जी साबिर साहब सबसे पहले मेरा आपसे सवाल। इससे पहले मैं एसआईआर की इन तमाम टेक्निकल पहलुओं पर मैं आऊं और मैं आपसे उस पे डिटेल में बात करूं क्योंकि आज का दिन ऐसा है जिस दिन हम ये कार्यक्रम रिकॉर्ड कर रहे हैं जिस दिन वेस्ट बंगाल में फर्स्ट फेज की वोटिंग हुई है। आप खुद वहां पर बंगाल में मौजूद हैं आप वहां के वोटर भी हैं। आप कैसे देख रहे हैं इस वोटिंग परसेंटेज को क्या बताती है? क्या ट्रेंड बताती है और किस तरफ जा रहा है यह वोटिंग परसेंटेज क्या कहता है? जैसे आप इंट्रोडक्शन में यह बताया 90% से ऊपर आज वोट किया आदमी और यह सारे रूरल क्षेत्र में है और यहां मतलब जैसे मुर्शिदाबाद और सब कई डिस्ट्रिक्ट में जो आज ये ये माइनॉरिटी डोमिनेटेड डिस्ट्रिक्ट्स है पहले भी इन बंगाल रूरल एरिया में इस तरह का वोटिंग पैटर्न हम लोग पहले भी देखा पर इस बार ज्यादा हम लोग परसेंटेज वाइज़ देख रहा तो इसका दो-तीन कारण हम लोग जो फील्ड से बात किया जो हम लोग को यह एक तो यह एसआईआर का खिलाफ एक एक मैंडेट है क्योंकि अगर मुर्शिदाबाद का पिछले जो इलेक्शन का आंकड़े देखेगा वहां वुमेन वोटर ज्यादा वोट किया इस बार सारे जो माइग्रेंट वर्कर बंगाल छोड़ के जो जो बाहर में है जैसे ये दिल्ली में हो सकता है पुणे दिल्ली और केरला ये सब जगह से पिछले 10 दिन हम हम लोग ये रेलवे स्टेशन में अब्सॉर्ब कर रहा बहुत सारे माइग्रेंट वापस आ रहा अब ट्रेन से कुछ-कुछ जो एफोर्ड कर सकते हो फ्लाइट से इसीलिए फ्लाइट का आप हक बहुत ज्यादा हो गया मुंबई दिल्ली और साउथ इंडिया से फ्लाइट का रेट भी बहुत ज्यादा हो गया 15000 हो गया 2000 हो गया ये कारण है दे वांट टू पार्टिसिपेट इन द इलेक्शन प्रोसेस क्योंकि एक रमर भी मतलब फैलाया गया जो अगर इस बार वोट नहीं देगा तो उस वोट नाम कट जाएगा। पहले तो एक परसेंटेज का नाम ऑलरेडी कटा हुआ अननेसेसरी बिकॉज़ ऑफ़ द एसआर जिसका बचा हुआ दे वांटेड टू कम एंड पार्टिसिपेट इन द वोटिंग एक्सरसाइज। तो जैसे हम लोग देखा मुर्शिदाबाद पिछले लोकसभा और विधानसभा में सबसे ज्यादा वोटर वुमेन था। पर इस बार देखने मिला वुमेन मेन दोनों इकट्ठा होके एकदम सुबह-सुबह 1:00 बजे से पहले 60% हो गया। दो तो इसका एक जो आदमी कितना एंथस्टिकली पार्टिसिपेट कर रहा और आपको यह जानकारी भी होगा इवन सुप्रीम कोर्ट जज ने कहा आप लोग हर हर चीज में पॉलिट पॉलिटिकली बात करते तो बंगाल सोसाइटी इज़ अ पॉलिटिकल सोसाइटी पॉलिटिकली बहुत एवर होता इसीलिए ये एक मतलब राय देने आया वो किसके पास जाएगा मालूम नहीं है बट वो ये प्रोसेस में पार्टिसिपेट किया जबरदस्त पार्टिसिपेट किया इसका रिफ्लेक्शन आज दिन भर देखने मिला। 1:00 से पहले 60% अह करीब वोट हो गया। मुर्शिदाबाद में स्पेशली ऑफ़ शमशेरगंज जहां सबसे ज़्यादा वोटर का नाम कट गया। वहां सबसे ज़्यादा वोट किया। तो ये एक क्लियर इंडिकेशन है। अह ये नागरिक उसका जो हिस्सा है डेमोक्रेटिक प्रोसेस में पार्टिसिपेट करना। ये खुलकर आज पार्टिसिपेट किया और एक मैसेज भी देने चाह रहा। वी आर पॉलिटिकल सोसाइटी वांट टू टेक क्लियर डिसीजन ऑन दिस। जी। क्या ये आप गुस्सा इलेक्शन कमीशन के को लेकर एसआईआर को लेकर एक उनका जो बेसिक राइट है वो छीने जाने को लेकर क्या आपको लग रहा है कि इसलिए बड़ी तादाद में लोग निकल कर आए क्योंकि उनको लग रहा है कि अगर वोटिंग राइट ही उनका छीन गया तो कल को उनका आधार कार्ड छीन सकता है उनका राशन कार्ड छीन सकता है वो एक देश में एक ऐसे नागरिक बन सकते हैं जिनके पास कोई अधिकार ना हो और सिर्फ वो रह रहे हों और या ये कुछ लोगों को मैंने रोते हुए भी देखा जो ये कह रहे थे खासतौर पर मुस्लिम वोटर्स कि उनको डिटेंशन सेंटर भेज दिया जाएगा और अजीब सी एक हालत मतलब जो एक एक इंसान के तौर पर जो आपके आपके दिल को भी बहुत तकलीफ पहुंचाती है। एक तो आप सही कहा क्योंकि ये सिर्फ इलेक्शन कमीशन पिछले तीन चार महीना से अपना खुद सिटीजन को जैसे मतलब जिस काइंड ऑफ जो प्रॉब्लम में खड़ा कर दिया पासपोर्ट है बर्थ सर्टिफिकेट सारे डॉक्यूमेंट के बावजूद उसका नाम नहीं है। तो यह एक डिग्निटी का की बात होता इलेक्शन कमीशन एक ऑटोनॉमस बॉडी है। यह पिछले 1952 से इलेक्शन कंडक्ट कर रहा। इसका एक ऑटोनॉमस रेस्पेक्ट मिलता। अभी एक मेरा दोस्त बताया हम इलेक्शन कमीशन के ऊपर काम करता है एज अ जर्नलिस्ट। बट अभी पॉलिटिक्स कवर कर रहा लग रहा। इतना एंबगिटी और 3 महीना में इतना बड़ा एक्सरसाइज क्यों करने का फैसला लिया? इसका नियत मकसद क्या है? यह सवाल उठाना चाहिए। क्योंकि 3 महीने में ये करने वाला काम नहीं है। इतना कॉम्प्लिकेटेड प्रोसेस है। आदमी को लाइन में खड़ा होने पड़ा। सारे डॉक्यूमेंट्स मतलब 100 साल के ऊपर डॉक्यूमेंट जमा करने के बाद उसका पासपोर्ट जमा देने के बाद भी उसका नाम डिलीट हो गया। ये मतलब ये दर्द हो रहा आदमी नौजवान से बुड्ढा आदमी सारे परेशान होके फोन कर रहा है कि इसका बाद क्या होगा? हम लोग का क्या या मतलब ये डिटेंशन कैंप में जाने पड़ेगा और कहां जाने पड़ेगा? ये निर्वाचन कमीशन का जो रोल था ये ये हम लोग को एज ए डेमोक्रेटिक कंट्री ये एक ऑटोनॉमस बॉडी था। यह यह सिर्फ़ इस इलेक्शन के लिए पूरा देश का डेमोक्रेटिक जो पिलर है, इसका ऊपर एक अटैक बोल सकते हैं क्योंकि अह इलेक्शन कमीशन बिहार में जो किया उससे बढ़कर यह किया जो लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी अंडर एजुकेशन जो टर्म सुनने मिला ये इलेक्शन कमीशन एसआईआर मैनुअल में नहीं है। जब जो मर्जी है WhatsApp द्वारा ऑर्डर देके ये ये एग्जीक्यूट किया। ये कोई डेमोक्रेटिक कंट्री खुद का सिटीजन के लिए इतना खिलवाड़ नहीं हुआ था अभी तक। तो ये ये सारे नौजवान जो जिसका नाम कट गया है यह पूरा ट्रस्ट उसका डेफिसिट हो गया इसके ऊपर जो इलेक्शन कमीशन के ऊपर क्योंकि इतना दिन से हम लोग देखा वो फेयर एंड फ्री इलेक्शन नहीं काम कर रहा मगर ये देख रहा एक कोई पार्टी का सत्ता के लाने के लिए ये कोशिश कर रहा ये एकदम साफ नजर में आ रहा बाहर से माइक्रो ऑब्जर्वर लिया गया बाहर से सारे ऑब्जर्वर लेके गया जिसका ये बंगाल का बारे में कोई जानकारी नहीं कोई ऑब्जेक्ट इसके बारे में कोई नॉलेज नहीं है। इसी को इस्तेमाल करके आदमी का डेमोक्रेटिक राइट्स के ऊपर इतना बड़ा अटैक हम लोग मतलब मेरा जिंदगी में और हिस्टोरिकली ऐसा कुछ कभी नहीं हुआ। जी मैंने ये भी देखा कि कितने बड़े पैमाने पर यहां पर सीआरपीएफ और सेना वहां पर लगाई गई। एम्बीबियंस ये कहा गया कि एक तरह से जो टैंक्स हैं वो वहां पर भेजे गए जिसकी वीडियो बड़ी हमने सोशल मीडिया पर वायरल होती देखी। लोगों ने कहा कि ऐसा तो नॉर्थ ईस्ट और कश्मीर में भी हमने इतने बड़े पैमाने पर मोबिलाइजेशन नहीं देखा जितने बड़े पैमाने पर हम पश्चिम बंगाल में देख रहे हैं। लग रहा है कि वोटिंग नहीं वहां पर कोई जंग जैसी कोई सिचुएशन हुई भी हुई है और उस सब के बाद भी हमने कुछ यहां पर इस तरह के इंसिडेंसेस भी देखे जिस दिन वोटिंग हो रही थी कि बीजेपी के नेता को दौड़ाया गया जहां वोटिंग हो रही थी वहां से इस तरह के कई इंसिडेंसेस भी हमें देखने के लिए मिले। ये जो मैं एसआईआर पर आ रही हूं और उसके डिटेल में मैं बात करूंगी साबिर साहब। लेकिन क्या आपको यह लग रहा है कि ये ज्ञानेश कुमार भारतीय जनता पार्टी एसआईआर क्या इस सबका यह गुस्सा है जो बड़े पैमाने पर हम वोटिंग परसेंटेज में क्या हम हम देख रहे हैं और क्या आपको ये प्रो इनकंबेंसी आपको वोट लगता है कि तमाम तरह के हथकंडे अपनाने के बाद जिसको कहते हैं हिंदी में साम दाम दंड भेद जो बीजेपी जिसके लिए जानी जाती है उसके बाद भी अगर एक्सपर्ट ये कहते हुए नजर आ रहे हैं कि दिस यू नो वोटिंग परसेंटेज स्टेटिंग एंड एंड यू नो यहां पर ये कहती हुई नजर आ रही है वोटिंग परसेंटेज कि ये दीदी को वापस लाने के लिए है। तो ये तो बड़े ताज्जुब की बात है फिर। या आई आई थिंक इट्स अ क्लियर इंडिकेशन। जैसे यू हैव राइटली कॉल्ड इट्स लुक्स लाइक अ वॉर ज़ोन। यू नो आई गेट फाइव 10 मिनट्स लेट। बिकॉज़ इन सिटीज़ लाइक कोलकाता। वी हैव नेवर सीन्स द सिक्योरिटी फ़ोर्स इस मैनेजिंग इवन अ ट्रैफिक। दैट इज एक् इट्स नॉट एक्सेप्टेड इन वी हैव नेवर सीन दिस सिचुएशन इवन द होल फोर्सेस फ्रॉम द आरपीएफ टू सीआरपीएफ अह होल प्रोसेस इज़ नाउ केम इन टू डिप्लॉय इन द इन द वेरियस पार्ट ऑफ द वेस्ट बंगाल एंड इट्स लुक्स लाइक नॉट ओनली अमित शाह अलोंग विथ द इलेक्शन फोर्स एंड ऑल द फोर्सेस इस बैटलिंग विथ द बंगाल द बंगाली नेस सो दिस इज़ अ क्लियर इंडिकेशन दिस इज़ प्रो इनकंबेंसी बिकॉज़ एज़ आई अर्लियर सेड आल्सो ये अह पीपल डोंट डोंट वांट टू वेस्ट एनी सिंगल वोट दे हैव इवन इन द फियर दे है फोटोकॉपीड द वोटिंग स्लिप दे हैव गिवेन जस्ट टू प्रिजर्व दैट दैट वी वांट टू कीप इट सिक्योरिटी एज़ अ प्रूफ वी हैव वोटेड सो दे वांट टू प्रूव दैट वी हैव वोटेड दिस टाइम यू नो अनलाइक प्रीवियस टाइम हम लोग का दो-तीन पार्टी का स्लिप मिलता था इस बार इलेक्शंस कमिशन और कई तरह एज़ अ मतलब रेडिकुलस रूल्स दे हैव ब्रॉट दे हैव बैंड द बाइक दे दे इवन दे वुड नॉट अलाउ मेड टू कम इन द बिग हाउसिंग ऑन द वोटिंग डेट्स। दिस काइंड ऑफ़ आई डोंट नो इट्स वेरी अनप्रेसिडेंटेड इन द इले इलेक्शन हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया पर से। सो आ द बंगाल पीपल यू नो दे आर डिसाइडेड टू अ गिव अ लेसन एंड दैट वुड बी द बिगेस्ट रिग्रेट ऑफ द रूलिंग कंपन डिस्पेंशंस इन दिल्ली। ah दे कुड नॉट कंकर लाइक द लास्ट वीव ऑफ द किंग बिकॉज़ दे हैव ओन द बिहार, ओसा, असम। बट बंगाल द स्पिरिट ऑफ़ बंगाल दे कांट कनक्वेयर देट दैट विल बी द बिगेस्ट रिग्रेट डिस्पाइट डिप्लइिंग ऑल काइंड ऑफ़ फोर्सेस इंक्लुडिंग इलेक्शन कमिशन। यू नो आई हैव नो हेजिटेशन इन सेइंग दैट इलेक्शन कमिशन इज़ अ पार्टी टू दिस दिस काइंड ऑफ़ यू नो ओवर अगेंस्ट बंगाल सिटीजंस एंड दे हैव अ काइंड ऑफ़ हैरासमेंट दे क्रिएटेड थ्रूउ दी एंटायर एसआईआर प्रोसेस। आई थिंक दिस इज़ अ ब्लो टू एंड द बंगाल पीपल विल अगेन प्रूफ दैट डिस्पाइट यूजिंग ऑल सॉर्ट्स ऑफ अनकंस्टीटूशनल मीन्स टू विन द विन द स्टेट्स बट बंगाल पीपल आर इन यूनाइटेड आई थिंक दे विल वोट इन फे इन फेवर इट्स अ प्रो इन लाइक प्रो ममता वोट्स आई कैन क्लियरली सी हम वेरीेंट पॉइंट्स यू हैव मेड और ये क्लियरली लग भी रहा है ये ये लग भी रहा है कि ये एक अग्रेसिव वोटर है जो बाहर निकल कर आया है उसके लिए उसकी बंगाली अस्मिता जो नॉर्थ नॉर्थ इंडिया का जो कल्चर है उसे जो थोपने की कोशिश की जा रही है उसको लेकर एक तरह से उसने अपना रेजिस्टेंस जो है वो दिखाया है वो भी साफ तौर पर लगता है ममता बनर्जी ने भी इसको बहुत अच्छे से भुनाया है और उनकी जो पूरी इलेक्शन कैंपेन रही है वो भी बहुत क्लेवर रही है वो भी हमने देखा है और उसका भी एक फायदा यहां पर मिलता हुआ नजर आ रहा है। हम हुमायूं कबीर जैसे लोगों को जो खड़ा किया गया उसका पूरी तरीके से मुसलमानों ने उसको पूरी तरीके से नकार दिया है। यह भी साफ तौर पर दिख रहा है। और एक चेहरा ममता बनर्जी के सामने जो खड़ा किया जाना था कि इफ नॉट ममता बनर्जी देन हु तो अगर शुभेंदु अधिकारी को खड़ा किया जाए तो जाहिर सी बात है लोगों को लग रहा है कि भ ये तो पहले टीएमसी में थे बीजेपी में आ गए और जिस तरह की कम्युनल भाषा वो इस्तेमाल कर रहे हैं। भले ही पश्चिम बंगाल को उन्होंने कमुनियर कर दिया हो लेकिन उतना नहीं अभी भी कर पाए हैं कि वह शिवेंदु अधिकारी जैसे शख्स को शायद उस तरह से एक्सेप्ट करें कि लेकिन फिर भी क्या आपको यह लग रहा है कि 2021 के मुकाबले भारतीय जनता पार्टी इज गोइंग टू डू बेटर दिस टाइम? दो-तीन सवाल आप जो पूछे इसमें थे। पहले एंटी इनकंबेंसी 15 साल में होना जरूरी है। होता है, बनता है। बट दिस बार बिकॉज़ ऑफ़ द एसआर बिकॉज़ एसआर डायरेक्टली रिलेटेड टू इट्स सिटीजनशिप, डिग्निटी एंड एज अ ह्यूमन बीइंग इट्स ए ब्लो। सो आदमी सारे जैसे हुमायन कबीर वगैरह जो मुद्दा उठाया ये सारे बैक सीट में चला गया इस बार चुनाव में। क्योंकि अभी एग्ज़िस्टेंस के सवाल है, सर्वाइवल का सवाल है। इसीलिए सारे जो एंटी इनकंबेंसी फैक्टर जैसे बंगाल में मुस्लिमों का अंदर कुछ एंटी इनकंबेंसी फैक्टर था। ये तीन चार महीने पहले भी था। वाकफ का लेके थोड़ा एंगर था क्योंकि ये सेंट्रल गवर्नमेंट का पॉलिसी के वजह से कोई प्रोटेस्ट हुआ ओबीसी रिजर्वेशन बट ये सारे इस बार माइनॉरिटी ने ये सब हटा के क्योंकि जो सामने खड़ा हुआ हम लोग का पास सामने ये एग्जांपल है आसाम में क्या हो रहा जोगी साहब क्या कर रहा है ये जो बुलडोजर पॉलिटिक्स हुई है ये सब ये बंगाल का साथ एकदम नहीं जाएगा और जो पोलराइज बात करने जा रहा एक एक एसआर इवन फॉर द नॉन नॉन नॉन मुस्लिम इज़ आल्सो बैक पार्टी क्योंकि ये बीजेपी बहुत दिन से मतवा कम्युनिटी जो ईस्ट पाकिस्तान और बांग्लादेश से आया उसको भी सिर्फ लीव सर्विस देते जा रहा। यहां याद एक चीज भी याद रखने है ममता ममता बनर्जी का गवर्नमेंट का जो सोशल सिक्योरिटी प्रोग्राम जैसे लक्ष्मी भंडार जैसे ये शास्त्रों साथी और युवा साथी ये बीजेपी भी इसको डिस्कर्ड नहीं कर पाए। इसका पैसे ज्यादा देगा बोलकर तो ये एक्सेप्टेंस हो गया। तो इस बार जो हो सकता बीजेपी का पास क्या है पोलराइजेशन का पॉलिटिक्स है ये वो कुछ कुछ हद तक कर सके बट बट इस बार जो लग रहा एक्सेप्ट इन अर्बन एरिया रूरल एरिया में सारे आदमी को लाइन पर खड़े होने पड़ा कि मेरे साथ एक यंग लड़का काम करता है वो बोला मेरा दोस्त जिस दिन मेरा इंटरव्यू का फर्स्ट कॉल आया उस दिन एसआईआर का हियरिंग का भी कॉल आया तो हम ये फर्स्ट इंटरव्यू छोड़ के यह नॉन मुस्लिम एक यंग नौजवान लड़का है। उसको शायर हियरिंग में खड़े होना पड़ा। सब डॉक्यूमेंट लेके उसको जाने पड़ा। तो ये बोला दिस बार दिस टाइम आई हैव टू थिंक वेदर आई हैव डीड मिस्टेक बाय सपोर्टिंग बीजेपी इन द पास्ट। सो दिस काइंड ऑफ़ यूथ कैन सी द काइंड ऑफ़ द हरेसमेंट मीटेड आउट टू देयर फैमिलीज़। यह इस बार यह लग रहा है यह बीजेपी के लिए एक शॉकिंगली नंबर कम हो सकता। मगर इसका जो एक खूबी है पोलराइजेशन का पॉलिटिक्स और सारे मिशनरी का यूज़ करने का जो तरीका है ये थोड़ा डर में है। इसी के वजह से कुछ वोटिंग परसेंटेज बढ़ सकता है क्योंकि अर्बन एलट जो होता है उसका ये ये सब देने लेने का नहीं है। जैसे सीएसआय का पूरा विक्टिम गरीब आदमी हुआ तो यह अर्बन रीच आदमी का वजह से और पोलराइजेशन का पार्ट में क्योंकि उसका नारायण है ये बंगाल में बांग्लादेश रोहिंग्या भर गया और ये कुछ-कुछ सेक्शन इसको मतलब एक्सेप्ट करने शुरू कर लिया और मुस्लिम लोग सारे नौकरी खा रहा इस टाइप का जो नैरेटिव नफरत का जो नैरेटिव बनाया इसमें कुछ वोट जा सकता है क्योंकि बीजेपी पिछले 10 साल से इस तरफ का वेरी साइलेंटली ये काम किया तो मतलब फिर भी जितना शहर का वजह से जितना ये लोग को आदमी को झेलना पड़ा आई थिंक वोट विल बी गो अगेंस्ट द बीजेपी। तो जाहिर सी बात है ये लग रहा है कि जैसे अति का अंत होता है वो होता हुआ यहां पर नजर आ रहा है। इतने अग्रेसिव होकर लोगों ने वोट किया है और शायद बीजेपी को ये लग रहा होगा कि बिहार वाला मॉडल बंगाल में भी काम करेगा। लेकिन जैसे मैं सियाली घोष को सुन रही थी। उन्होंने कहा कि यह मध्य प्रदेश नहीं है, हरियाणा नहीं है, दिल्ली नहीं है, बिहार नहीं है, पश्चिम बंगाल है। और क्या वही क्या होता हुआ नजर आ रहा है? ये एक बड़ा सवाल जरूर है। लेकिन अब मैं साबर साहब एसआईआर पर आना चाहती हूं। एसआईआर की जब हम बात करते हैं तो हम इसकी बात करते हैं कि देखिए कितनी बड़ी तादाद में लाखों वोटर्स हटा दिए गए। किस तरह से अलग-अलग तरह के एजुडिकेशन और अलग-अलग तरह की टर्मिनोलॉजीस और ये सब जो है वो इंट्रोड्यूस की गई। उसको और ज्यादा मुश्किल बनाया गया। आपने जो ये रिसर्च की है उसमें खासतौर पर मुसलमानों के हवाले से मैं ये जानना चाहती हूं। उसमें आपने क्या बड़े पैमाने पर देखा है? क्या टारगेटेड मुस्लिम वोटर्स इसमें डिलीट किए गए हैं? और ये लाखों की तादाद में जो वोटर्स डिलीट हुए हैं उसमें कितनी बड़ी तादाद मुसलमानों की है? पहले ये हम लोग को गर्व करना चाहिए जब नवंबर में ये प्रोसेस शुरू हुआ और उसका फर्स्ट लिस्ट दिसंबर में पब्लिश हुआ था। उस टाइम जहां मुस्लिम ज्यादा है मैप पापुलेशन ज्यादा था। यह पूरा हम लोग डाटा दे के निकाला। जैसे मुर्शिदाबाद में फरक्का, भगवान गोला, शमशेरगंज जहां भी जाओ वहां सबसे ज्यादा मैप्ड पॉपुलेशन मैप मतलब क्या होता 2002 से जुड़ा हुआ लिंग सबसे ज्यादा मुस्लिम को मिला और कौन 2% से नीचे अनमैप पापुलेशन था। ये मतलब एकदम खुल के उखर के आया था और हम लोग कहां अनमैप पॉपुलेशन मिला ये 10% क्लोज टू 10% कोई-कोई जगह 15% अनमैप था ये मतुआ बेल्ट था जहां ईस्ट बंगाल से आया हुआ आदमी बसा हुआ था उसमें ये देख के इलेक्शन कमीशन को तज्जुब लगा तो ये हम तो नहीं करने चाह रहा ना हम लोग तो मुस्लिम को बात देने जा रहा तो ये एक उसका बाद जब डॉक्यूमेंट एग्जामिन शुरू किया वो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके करके ये सब डॉक्यूमेंट चेक करें। तो इसका बाद ये टर्म वो लोग निकल के लाया लॉजिकल डिस डिस्क्रिपेंसी। ये क्या होता मेरा नाम जैसे सबीर अहमद एस ए बी आई आर ए एच एम ईडी होना चाहिए मगर मेरा हेड मास्टर बीच में एक ए डाल दिया गिफ्ट कर दिया। यह आ गया उसका इलेक्शन कमीशन का नजर में यह लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी है। इलेक्शन कमीशन को कौन ऐसा पावर दिया मेरा छह बच्चा रहेगा कि 10 बच्चा क्योंकि यहां तो चाइनास पॉलिसी टू टू चाइल्ड पॉलिसी नहीं है। तो पिछले जमाने में माइनॉरिटी और दलितों में छह से भी ज्यादा बच्चा हो सकता। ये भी हुए लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में डाला कि आपका छह बच्चा क्यों है? क्यों इतना सिबलिंग्स है? यह कोई कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी भी नहीं है। कहीं ऐसा मैनुअल में लिखा है और मोहम्मद आईब हो गया आयु मोहम्मद यह उसका गलती से हुआ। ये सारी लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी तो हम लोग जब फर्स्ट लिस्ट निकाला था तो पपुलेशन के हिसाब से फॉर एग्जांपल भवानीपुर जहान ममता बनर्जी लड़ाई कर रही हैं या 20% मुस्लिम है। उसी हिसाब से एएसजीडी नाम में आया था। और जब लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी आया यह पूरा डबल हो गया। 40% से ज्यादा यह मुस्लिमों का अंदर हो गया और दूसरा कम्युनिटी जैसे पॉपुलेशन है वैसे ही है और पकड़िए मेटियाबू जहां 60% मुस्लिम है वहां चला गया 90% लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी ये पैटर्न सारे बंगाल में हम लोग देखने शुरू किया फिर उसका बाद अंडर एजुकेशन में उन लोग को लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी के पास उन लोग को पब्लिक हियरिंग में बुलाया सारे डॉक्यूमेंट्स माइनॉरिटी और नॉन माइनॉरिटी जो है पासपोर्ट से लेकर सारे जितना डॉक्यूमेंट्स था वो जो जो बोला ये सब सारे डॉक्यूमेंट जमा करने का जमा किया फॉर एग्जांपल हम पर्सनल बात नहीं करने चाहे मेरा भाई और अब्बा का अंडर एजुकेशन में आया दोनों का पासपोर्ट है अब्बा बाहर भी गया था अगर किसी के पास पासपोर्ट है वो बाहर जा चुका तो एक नॉर्मल एक रिगरस एग्जामिनेशन हुआ उसका बाद ही तो उसको पासपोर्ट मिला इस तरह का लाखों आदमी का इस तरह का डॉक्यूमेंट जमा किया उसका बाद मेरा अब्बा का हो गया अप्रूव हो गया पोर्टल लिस्ट में ना आए। मेरा उसका लड़का का हो गया डिलीटेड। वो पासपोर्ट होल्डर है। इस तरह का पूरा सारे बंगाल में जहां मुस्लिम कंसंट्रेटेड है डिस्रोपोशननेटली अंडर एजुकेशन में डाल दिया। और कौन इसको देखने आया? जुडिशियल ऑफिसर बंगाल और बंगाल के बाहर जिसको बांग्ला पढ़ने नहीं आता। सारे डॉक्यूमेंट्स बांग्ला में होता और ये एक एक ही एक ही डॉक्यूमेंट्स देख के और एक जुडिशियल ऑफिसर का ऊपर इतना क्योंकि उस टाइम 1 करोड़ से भी ज्यादा सिटीजन को अंडर एजुकेशन में डाल दिया था। तो ये ह्यूमनली पॉसिबल नहीं है। ये सारे डॉक्यूमेंट जुडिशियल ऑफिसर 15 दिन के अंदर यह इसको खत्म करके देगा। यह यह हो नहीं सकता है। क्यों इतना जल्दबाजी से यह किया और देखा गया। इसका बाद 27 लाख फिर से डिलीटेड हो गया। कुल मिलाकर 91 लाख वोटर को डिलीट किया। इसमें इसका अंदर कुछ आदमी जो डेड हो गया उसको आप निकाल भी दीजिए। हम लोग देखा जैसे नंदीग्राम का हम हम ये दिल्ली प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये भी दिखाया नंदीग्राम में 25% मुस्लिम और डिलीट हुआ 95% मार्क टीट जब हम दो नंदीग्राम में एक मैसेज किया भाई दो बंदे को नाम भेज दो जो मीडिया से बात कराना मेरा पास 10 मिनट का 200 आदमी का नाम आया और जो पत्रकार लोग नॉन मुस्लिम को ढूंढ रहा है जिसका नाम सिर्फ पूरा कॉन्स्टिट्यूएंसी में 219 नॉन मुस्लिम का नाम कट गया। इसका वजह हो सकता है डेट हो गया आपके दूसरा हो सकता है तो जब यह ढूंढना भी मुश्किल किसका और आपको याद होगा शुभेंदु अधिकारी वहां से चुनाव जीता सिर्फ करीब 1000 के आसपास 3000 का करीब जो अगर नाम कट गया तो यह अगर टारगेटेड नहीं होगा तो कैसे ये डिस्रपोर्शननेटली आप उत्तरबंग में जाइए आप मुर्शिदाबाद में जाइए कोलकाता का अंदर भवानीपुर जोड़ासा को पोर्ट एरिया में हर जगह हम लोग डाटा एकदम रॉ डाटा हम लोग पब्लिश भी कर दिया। आप चेक कर सकते हैं। हम लोग को जो साइट है उसमें हम लोग पूरा डाटा निकाल के दे दिया। जो कितना डिलीश हुआ उसमें कितना मुस्लिम है कितना नॉन मुस्लिम है। एकदम आंकड़े के साथ ये समझाने की कोशिश कर रहा। इसमें एक पैटर्न पूरी तरह से नजर आ रहा। जहां जितना माइनॉरिटी है जो पहले मैप पॉपुलेशन था यह मार्क कीजिए जो 2002 का साथ आराम से जोड़ पाए थे वो अभी सबसे बाहर निकला गया। इसीलिए हम लोग जो प्रोटेस्ट देखा मालदा में मुर्शिदाबाद में यह आदमी ये मतलब अंदर से आ रहा और यह प्रोटेस्ट का एक रिफ्लेक्शन आज वोट में दिखा रहा ये भी हम लोग का एक बीिटिंग रिप्लाई है जो अन्याय हम लोग से हुआ है इसका जवाब हम देने चाह रहा ये लोग जो इलेक्शन कमीशन कोई एसआईआर का मैनुअल नहीं फॉलो किया क्योंकि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी ये टर्म बीआर में नहीं था और यह सिर्फ बंगाल के लिए इन्वेंट किया गया अंडर एजुकेशन एक लीगल टर्म और उस टाइम जो सिटीजन है उस खुद का रिप्रेजेंट का करने का कोई मौका भी नहीं था। सिर्फ यूनिटरी जुडिशियल ऑफिसर इसको डिसाइड किया। कुछ-कुछ जगह 60% से भी ज्यादा उसको डिसए्रूव किया। तो ये सब देख के पूरा दिस क्लियरली इंडिकेट्स दिस इज़ अ टारगेटेड इंटरवेंशन बिकॉज़ वी नो वी डील्स विथ डाटा। इफ यू यूज़ एआई यू कैन प्रॉब देम टू आईडेंटिफाई विथ अ मुस्लिम नेम टू आईडेंटिफाई एंड फ्लैग द डिस्क्रिपेंसी अमोंग देम इवन अ फुल स्टॉप। आई विल शो यू न्यूमरस सच एक्सक्लेमेशन एमडी डॉट एंड समटाइम्स पीपल राइट फुल मोहम्मद। सो देयर इज़ ए 10 टाइप ऑफ़ मोहम्मद कैन बी रिटेन शेख कैन बी रिटेन। शबीर कैन बी रिटेन शब्बीर शब्बीर। दिस केम अंडर ए लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी। इलेक्शन कैफेशन सो फार वाज़ वेरी अकोमोडेटिव इन इन द पास्ट इलेक्शन बट दिस टाइम्स दे बिकम सो रुड एंड रिजिड इन डिटरमिनिंग दिस काइंड ऑफ़ फ्लॉस। नॉट नॉट बिकॉज़ ऑफ़ द सिटीजन इटसेल्फ बिकॉज़ सम ऑफिशियल हैज़ डन सम मिस्टेक एंड द सिटीजन हैज़ टू बियर द ब्रांट ऑफ दिस काइंड ऑफ़ यू नो इनजस्टिस टू देम। हम साब साहब तो आप ये कह रहे हैं कि जो प्रोसेस सबसे आसान होना चाहिए था यानी कि जो जो हक जो जो हमें राइट मिला हुआ है वोट करने का जो सबसे बेसिक हमारा राइट है और खासतौर पे जब हम एक लोकतांत्रिक निजाम में रहते हैं तो ये हमारा सबसे इंपॉर्टेंट राइट है। उसी को सबसे मुश्किल बना दिया गया। यानी कि आपका एक वोटर बनना अब सबसे मुश्किल काम हो गया है। आप ट्रिब्यूनल के सामने आप अपीयर होइए। आप लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी में आप आ गए तो फिर आप अपने आप को सही साबित करते रहिए। आप अपने डॉक्यूमेंट्स दिखाते रहिए। आपको डिलीट कर दिया गया। क्योंकि बहुत सारे लोग ऐसे भी आए जो जिंदा हैं और जिनको डेड की लिस्ट में डाल दिया गया। कुछ लोग ऐसे हैं जो वहीं रहते हैं और उनको माइग्रेटेड वहां से दिखा दिया गया। कुछ लोग ऐसे हैं जो वहीं रहते हैं और कहा गया कि नहीं दो-दो जगह उनका नाम है जबकि दूसरी जगह उस तरह से नहीं है। तो ये जो डुप्ली डुप्लीकेसी और ये तमाम चीजें ये हमने देखा और खासतौर पर मैंने जो इकट्ठा हुए लोगों को एक तरह से प्रोटेस्ट करते हुए और अपनी बातों को रखते हुए जो देखा जितनी खबरें मीडिया के सामने आ पाई वो ज्यादातर मुसलमान थे। तो क्या आप आपने अभी एक्सप्लेन किया? क्या आप ये ये कह रहे हैं कि ये एक तरह से जो तमाम चीजें हैं वो टारगेटेड मुसलमानों को उनके हक से महरूम करने के लिए ये की गई है और ये दिखाने के लिए भी कि देखिए ये रोहिंग्या बांग्लादेशी घुसपैठिए थे और हमने इनको हटा दिया तो दो पर्पस सॉल्व हो रहे हैं। एक तो वो एजेंडा जो आप जो नैरेटिव गढ़ रहे हैं उसको आप सही साबित करवा रहे हैं और दूसरा आप उन वोटर्स को हटा भी रहे हैं तो वो सीधे तौर पर वोट ही नहीं कर पाएंगे। वो लड़ते रहेंगे। न जाने कब आएगा फिर उनका नाम। सो जो डिलीटेड वोटर्स हैं व्हाट वुड दे डू नाउ दैट इज द बिगेस्ट क्वेश्चन दूसरा ये सिर्फ वोटिंग राइट ना इसका साथ सिटीजनशिप डिग्निटी भी जुड़ा हुआ ये ये जमीन में पैदा हुआ इसका ये फोरफादर जो भी है हम एक बार रिक्वेस्ट किए सारे फ्रेंड को भाई आपका फोरफादर और नाना जहां कब्रिस्तान में दाखिले ये कब्रिस्तान का फोटो थोड़ा डाल दीजिए ये मेरा दादा का 15 1905 लिखा हुआ ये कब्रस्तान ये ये जमीन में वो लोग दाफन भी हुआ और ये सवाल इंडिपेंडेंस के इतना दिन बाद आपका ये डिग्निटी का बात भी है तो ये मतलब ये आदमी रो रहा क्योंकि यहां जन्म हुआ कोई रिश्ता कोई दूसरा कंट्री से नहीं है या ये ये कंट्री बनाने में उसका भी जिम्मेदारी है क्योंकि सारे फोन आ रहा जो स्टेट सेक्रेटेरिएट में पोस्टेड है आज तक उसका अंडर एजुकेशन में ये सिर्फ मुस्लिम नाम के वजह से जुडिशियरी में जुड़ा हुआ आर्मी में काम किया। मेरा सारे दोस्त जो कॉलेज में पढ़ रहा पिछले इस बार भी इलेक्शन कंडक्ट कर रहा है। उसमें वोटर लिस्ट में नाम नहीं है। ये पिछले 10 15 साल से इलेक्शन ऑफिसर रहा। ब्रोक्रेट्स है, जुडिशियरी है। इस तरह का कैंडिडेट वो खुलकर बता नहीं सकते क्योंकि गवर्नमेंट जॉब में है। तो ये जो है और जुडिशियरी का बात हम कर नहीं सकते। हैव फुल फेथ ऑन द जुडिशरी बार। मगर किस तरह का रोल वो लोग निभाया सिंपैथेटिकली यह निभाना चाहिए था उस तरह देखने नहीं मिला जो जिस लेकिन आप की बात कर रहे हैं मैं आपको रुक रही हूं साबिर साहब और आप कह रहे हैं कि वी हैव फुल फेथ बट द क्वेश्चन इज कि इतने दिन से एसआईआर को लेकर सुनवाई चल रही है बिहार का इलेक्शन हो जाता है अब बंगाल का इलेक्शन हो रहा है तमिलनाडु का हो रहा है वहां क्योंकि वहां पर भी एसआईआर हुआ और आप यह देखें कि अभी तक कोर्ट ये तक नहीं डिसाइड कर पाया है कि वेदर एसआईआर इज कॉन्स्टिट्यूशनल और अनकस्टिट्यूशनल और इसका बाद बंगाल का बारे में जितना जजमेंट आया जैसे कुछ दिन पहले बोला 21 तारीख तक जिसका नाम आ जाएगा आज हम लोग आप मेरा Twitter हैंडल में देख लीजिएगा सारे प्रोसेस के बाद सिर्फ वन बिलो 200 का नाम आया ये ये एपिलेट अथॉरिटी और सेवंथ अप्रिल ये अपील प्रोसेस का सारे एसओपी पब्लिक डोमेन में आना चाहिए था यह सुप्रीम कोर्ट जजेस ने बताया अभी तक क्या प्रोसेस चलेगा? एक ट्राइबनल बना। उसका नाम है नाम भी देख लीजिए। श्यामा प्रसाद मुखर्जी सेंटर ऑफ़ समथिंग ये ट्राइबनल के लिए चुना गया। ये ये डेमोक्रेसी के साथ खिलवाड़ हो रहा। हां। और अभी भी 27 लाख आदमी का कोई मतलब यह कोई क्लियर डिस्टिंक्शन नहीं है। आई एम रिसीविंग फोन कॉल एवरीडे फ्रॉम अ पुअर पीपल टू ब्यूरोक्रेट्स। से हम लोग को क्या होगा? ये सारे एक डॉक्टर जिस एक दिन छुट्टी लेने का उसका मौका नहीं मिलता वो एक दिन छुट्टी लेके मेरे पास आया हमको कैसे अपील करना है ये दिखा दीजिए और अपील प्रोसेस भी इतना कैमबसम है ये ऑनलाइन आप जानते हैं इंडिया में कितना डिजिटल डिस्पेरिटी है ये ये भी 1000 शब्दों के अंदर यह ऑनलाइन डिजिटल एप्लीकेशन कर सकता आपको कितना एजुकेटेड होना पड़ेगा तो ताकि यू कैन अप्लाई ऑनलाइन यह भी 1000 का एक वर्ल्ड लिमिट है। ये मतलब मतलब कैसे ये लोग ऐसा सोचता और जो ऑफलाइन में किया गया था उसका रिसीविंग भी नहीं देना था। कहां का ही फेंक दे रहा है ये भी हम लोग को नहीं पता था। फिर भी हम लोग कोशिश किया सारे सिटीजन सोसाइटी सिविल सोसाइटी और जो लॉयर प्रोनो इसको सपोर्ट करके दिया। बट हम लोग के पास कोई क्लियर रोड मैप नहीं जे ये लोग जो ट्राइबनल बना 19 जजेस वो लोगक में बैठेगा। आप सोचिए आप बंगाल में आए कि जो कोचबीहार डिस्ट्रिक्ट है यहां से 1000 किमी दूर है। वहां से आदमी को आने पड़ेगा ट्राइबनल के लिए और हम जो खबर मिला हम एसओपी के बारे में थोड़ा जानकारी मिला एक लंबा प्रोसेस चलते रहेगा। पॉलिटिकल पार्टीज भूल जाएगा इसका बाद और इसका साथ-साथ ये सारे जो एंटाइटलमेंट है ये सब बंद हो जाएगा क्योंकि यह सारे लिंक्ड रहते हैं वोटर कार्ड के साथ। जैसे यहां जमीन खरीदना और बेचना भी बंद हो गया। क्योंकि ये इफ यू आर अंडर एजुकेशन इफ योर वोटिंग राइट्स इन डिलेटेड योर वेलफेयर स्कीम विल बी आल्सो सस्पेंडेड। ये काइंड ऑफ़ हैरेसमेंट फॉर द पीपल। आई कांट एक्सप्लेन पीपल कितना परेशान है। हाउ देयर इज़ नो स्ट्रगलिंग विथ दिस काइंड ऑफ़ यू नो इवन सम ऑफ़ द एनगोस आइ कांट डिस्क्राइब ऑनलाइन द पीप द काइंड ऑफ़ हैरेसमेंट देयर पीपल सफर्ड बिकॉज़ ऑफ़ दिस यू नो अंडर एजुकेशन सीनियर बुरोकर से लेके अह एकदम डोमेस्टिक वर्कर तक ये सारे आदमी एकदम अह फ्रॉम नॉन पर्सनलिटी मैं वही सोच रही हूं साबर साहब कि जितना पैशनेटली आप इन चीजों को कर रहे हैं और आप समझा रहे हैं और ये बहुत ही एक डिग्निटी का सवाल तो है ही कि कैसे आपने एक उस देश में जिसमें आप पैदा हुए पले बड़े जिसमें आपके बाबाओ अदाजद यानी कि आपके यू नो एक लेगसी आपकी रही। आपके दादा परदादा और आपकी जनरेशंस यहां पर रही। अचानक से आप उनसे पूछ रहे हैं कि कागज दिखाओ कि आप इस देश के नागरिक हैं या नहीं। क्योंकि लोग क्या समझ रहे हैं? लोग इसे सिर्फ वोटिंग तक समझ रहे हैं कि वोट नहीं देने दिया जा रहा। अब इसमें क्या है भाई अगर आप डेड हैं, माइग्रेट कर गए, ये कर गए प्रूफ करिए अपने आप को और वोट कर दीजिए। लेकिन क्या इसका जो लार्जर पिक्चर है साबिर साहब क्या वो लोग समझ पा रहे हैं कि यह बैकडोर दरअसल एनआरसी है कि आपको आपको एक तरह से ये प्रूफ करना पड़ रहा है कि आप इस देश के नागरिक हैं या नहीं और अगर आप आपके पास वोटर आईडी नहीं है। आपको उस वोटर लिस्ट में नहीं है तो आप जिस तरह से कह रहे हैं कि आपको वो तमाम जो पॉलिसीज हैं सरकार से जो आपको फायदे वो तमाम चीजें मिलते हैं वो भी नहीं मिलेंगे। यानी कि बस आप इस देश में रह रहे हैं और कब तक रह रहे हैं शायद यह भी नहीं पता। ये ये इसीलिए हम पहले से इसको बता रहे हैं। ये सिर्फ इस चुनाव का मुद्दा नहीं है। इसका लॉन्ग टर्म जो कॉन्सिक्वेंसेस है क्योंकि यह सवाल ये सिटीजनशिप से भी जुड़ा हुआ। आप सेंसस नहीं कर पाए। 5 साल इसको हटाया। दूसरा डाटा नहीं निकल रहा। ये आपका पास ठोस एविडेंस मिल रहा। आप आप दिखाएगा। देखिए इतना सारे आदमी आपका सिटीजनशिप वोटर राइट्स का डॉक्यूमेंट दिखा नहीं पाया। यह यह उठाएगा। बावजूद ये सारे आदमी पासपोर्ट बर्थ सर्टिफिकेट और बोर्ड एग्जामिनेशन सब कुछ देके फिर भी इसको प्रूफ करने पड़ रहा थोड़ा फुल स्टॉप थोड़ा हाई पेन लेके आप लड़ाई कर रहा और आपको या पता होगा जे बंगाली सारे वोटर लिस्ट एक्सेप्ट कोलकाता ये बांग्ला में है और उर्दू अरबी फारसी ओरिजिन नेम को अगर बांग्ला में लिखा जाए और उसको इंग्लिश में ट्रांसलेट कर किया जाए एक आदमी का एक एक फ्रेंड आया था उसका का नाम है अब्दुल जब्बर वो वोटर लिस्ट में जब ट्रांसलेट किया आ जबब्बर आ गया संतू पाल आ गया सब्जी पाल इस तरफ का मतलब ये सारे चीज हम लोग के पास सारे एविडेंस आया हम लोग स्क्रीनशॉट लेके लेके रखा से किस तरफ का इनफिशिएंसी आप इलेक्शन कमीशन का द्वारा दिखाया इसका जो प्राइस है ये सिर्फ ये इलेक्शन में नहीं जाएगा ये जो दर मतलब किया इसमें इसका जो अह मतलब एक दुख हुआ ये जल्दी जाने वाला नहीं है और उसका साथ एक यंग लड़का दोबारा वोट करने जा रहा मुर्शिदाबाद से फोन किया वो रात में सो नहीं पा रहा क्योंकि उसके रात भर यही याद रहा क्यों क्यों हमको कि ये डिटेंशन कैंप में जाने पड़ेगा उसका परिवार बाबा का आया फादर का आया मां का उसका नाम नहीं आया तो किस तरफ का ये चीज हो रहा वो सो नहीं पा रहा हम लोग एक एक दूसरा रिसर्च भी कर रहा है एसआर का इंपैक्ट मेंटल हेल्थ में क्या हम लोग को सेंटर जो लीगल एक्ट चला रहा आदमी आके रो रहा भाई मतलब रो रहा इसको कितना दिन तक इसको खींचेगा और और चीज भी हम लोग को रिसर्च में दिखाया इसका इकोनॉमिक और सोशल कॉस्ट देखिए एक दिन में ज़ेरॉक्स करना एक जगह से एक जगह ताल्लुकात में जाना थोड़ा टिफिन किया इसको हम पकड़ रहा ₹100 खर्चा हुआ और एक दिन का रोज किया नारेगा का जोर ₹400 का जो तनख्वाह मिलता है यह सब जोड़ के ₹000 करोड़ खर्चा हुआ सिटीजन को ये एक्सरसाइज में अब तक पार्टिसिपेट करने के लिए और 1 करोड़ 16 लैक्स टाइम वेस्ट हुआ स्कूल में क्लास नहीं हुआ सारे बीएलओ को यह काम में इस्तेमाल किया तो कितना बड़ा नुकसान पहुंचा ये इलेक्शन कमीशन जो 2 साल के लिए 1 साल के लिए यह करना चाहिए 3 महीना में जबरदस्त करना चाहिए। इसका जो इकोनॉमिक इंपैक्ट्स ये भी बहुत ज्यादा जो जो अभी एपिलेट में दो-तीन दिन बेचारा आदमी आ रहा आज के लाइन में खड़ा होके ये सब कर रहा तो इसका जो क्सकेंसेस है ये जिंदगी में ये सारे भूल नहीं पाएगा। खुद दिस स्टेट इज डीलिंग विथ ओन सिटीजन इन ए वेरी क्रूड मैनर। दिस आई थिंक दे शुड गेट सम रिप्लाई बिकॉज़ ऑफ़ दिस बिहेवियर। या एंड दैट इज़ व्हाई आई बी सीइंग यू नो सच हाई वोटिंग परसेंटेज बिकॉज़ यू नो पीपल आर रिप्लाइंग इन दिस वे बिकॉज़ दिस इज़ द ओनली राइट दे हैव दे यू नो दिस इज़ हाउ दे कैन रिप्लाई तो वो साफ तौर पर जो है वो देखने के लिए मिल रहा है और यह एक तरह से दिल को चीर देने वाली चीजें हैं जो आप बता रहे हैं कि कैसे एक नागरिक को एक सिटीजन को अपने आप को सिर्फ सिटीजन बने रहने के लिए एक वोटर प्रूफ करने के लिए किन-किन मुश्किलात से गुजरना पड़ रहा है। किस तरह के मेंटल टॉर्चर से, किस तरह के इकोनॉमिक टॉर्चर से उसे एक तरह से गुजरना पड़ा है। आप सोचिए एक शख्स को सिर्फ अपने सारे डॉक्यूमेंट्स को इकट्ठा करना, इकट्ठा करके एक जगह से दूसरी जगह दूसरी जगह से तीसरी जगह जाना वो एक मजदूर है। वो एक एक यू नो दिन भर में 500 700 ₹800 वो कमाता है। वो तो उसका गया ही और उसके बाद वो वोटर भी नहीं बन पा रहा। उसे जो फायदे सरकार से मिल रहे वो भी उसके हाथ से गए। यह इलेक्शन भी गया। तो अब सवाल ये उठ रहा है साबिर साहब और इससे पहले मैंने परकला प्रभाकर के साथ भी मैंने इंटरव्यू किया था। जी और जी और उन्होंने कहा कि ये एक तरह का पॉलिटिकल ब्लडलेस जेनोसाइड है। आई थिंक बहुत ही उन्होंने सही फ्रेज का सही सेंटेंस का उन्होंने इस्तेमाल किया है। लेकिन मेरे मैंने उनसे भी यह सवाल पूछा था और आपसे भी मैं यह सवाल पूछ रही हूं और शायद उसका ठीक से जवाब मुझे मिल नहीं पा रहा है कि इन लोगों का आखिर होगा क्या? परकला जी सेड दैट यू नो दे आर मेकिंग टू काइंड ऑफ यू नो हिंदुस्तान वो बना रहे हैं। एक वो जिनके पास वोटर आईडी और तमाम तरह के डॉक्यूमेंट्स तमाम हक होंगे। एक वो जिनके पास वोटर आईडी तो गया उसके साथ-साथ उनके तमाम वो हक भी उनसे छीन लिए जाएंगे। लेकिन फिर यह सवाल कि उन लोगों का क्या होगा? यह लाखों लोग जाएंगे कहां? और बिहार में जिन लाखों लोगों का वोट छीन लिया गया उनके साथ क्या? उनकी बात भी कोई नहीं कर रहा है। दीज़ पॉलिटिकल पार्टीज यू नो व्हेन इलेक्शन वाज़ देयर देयर वर दे वर वेरी हाई इन स्पिरिट इलेक्शन हो गया रिजल्ट आ गया एंड बूम गॉन आई थिंक ये ये सवाल जो हम देखने मिल रहा है जो एक तो अ सेंस ऑफ़ सेकंड क्लास सिटीजनशिप यू नो मेरा एक एक सेंस ऑफ़ सिटीजनशिप है वो अभी मतलब शुरू हो गया जे मेरा क्या होगा इसका बाद और इलेक्शन के बाद ये सारे पॉलिटिकल पार्टीज भूल जाएगा जो ये सिटीजन का इलेक्शन का टाइम आप लोग जनता ही जनता ही वीआईपी है आपका ऊपर निर्भर बट जब इलेक्शन खत्म हो जाएगा पास में किसी को नहीं मिलेगा और ये जो लड़ाई चलेगा ये एक दिन में खत्म होने वाले होने वाला नहीं है क्योंकि वी हैव सीन द रोल ऑफ जुडिशियर बिकॉज़ दे हैव टॉक्स फॉर द पास्ट फ्यू डेज व्हाट विल बी देयर पार्क्स व्हाट विल बी द सिक्योरिटी बट दे हैव नेवर स्पोकन व्हाट विल बी द हाउ फ़ास्ट वी कैन एनसीयू द रेस्टोरेशन ऑफ ये सारे जो वोटर है उसका यह नागरिक जो अधिकार है इसको कितना जल्दी इसका बारे में इवन सुप्रीम कोर्ट ने बताया ये ये जल्दबाजी का काम नहीं है क्यों आप ये इतना 3 महीने में इतना बड़ा काम करने दिया ये भी हम लोग को पूछने चाहिए और अभी बोल रहा है जी ये 3 महीने में 2 महीने में होले में लाइए और जो एसओपी निक आएगा जो जिस जब सो फार जितना हम नॉलेज गैदर किया यह लड़ाई अभी चलते रहेगा आसाम का जो ट्राइबनल का एक्सपीरियंस हम लोग देखा इवन ए डेड द फैमिली मेंबर हैव प्रोड्यूस द डेड बॉडी इन फ्रंट ऑफ़ द ट्राइबनल भैया ये बंदा मर गया अभी इसको छोड़ दीजिए इस तरफ का जो नागरिक का जो एक्सप्लइटेशन हरासमेंट आई कैन फोर्सी और आई कैन से इवन दे विल प्रिपेयर वेरी सून अ डिटेंशन कैंप इवन इन द बंगाल दोज़ सम पीपल डोंट हैव हैव फॉर एग्जांपल एक्स दोज़ पीपल लिविंग ऑन द रिवर जहां रिवर इरेशन हुआ जहां सारे डॉक्यूमेंट खो गया उसका वो कहां मिलेगा जो होमलेस बंदा है जो रेड लाइट एरिया में रहता है जो थर्ड जेंडर है उसका पास भी तो डॉक्यूमेंट्स नहीं आए क्योंकि स्टेट ने नहीं दिया हम लोग सारेक शहर में जो फ्लाई ओवर का नीचे रहने वाला आदमी है हम लोग जब 15 साल पहले काम किया तो इलेक्शन कमीशन वाज़ सो जेनरस बोला था जो इसका पास जो इलेक्ट्रिक पिलर है वही उसका एड्रेस बन जाएगा और अभी देखिए इतना सारे डॉक्यूमेंट के भी बावजूद यह लोग डिनाई कर रहा तो यह जो साबिर साहब आप बहुत इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं। आप ये कह रहे हैं कि आसाम मॉडल जो है वो वेस्ट बंगाल पे लागू होने जा रहा है। क्या आप इस तरफ इशारा कर रहे हैं? आप यह कह रहे हैं कि यह जो लाखों वोटर्स खासतौर पर जो मुस्लिम वोटर्स हैं जिनको डिलीट कर दिया गया है या फिर उनको एजुडिकेशन में डाल दिया गया है। लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी जो है उस लिस्ट में वो हैं और अगर माना कि वो वोटर लिस्ट में वापस नहीं आ पाते हैं तो क्या आप यह कह रहे हैं कि एक आसाम मॉडल जो है वो वेस्ट बंगाल में पूरी तरीके से लागू हो सकता है। इवन इफ ममता बनर्जी कम्स बैक इन पावर? हां बिकॉज़ देयर आर यू नो डिस्पाइट ममता बनर्जी केम्स टू द पावर वंस अगेन आई नो द वे द सेंट्रल गवर्नमेंट हैज़ यू नो एग्जीक्यूटेड द वर्क ऑफ बिल और सारे जो जो सेंट्रल फोर्स लेके आई कैन सी सम हाउ इन दिस इज़ माय अप्रिहेंशन सीइंग द इंस्टेंस ऑफ़ असम एंड एल्स वेयर यू नो दे विल ट्राई आई डोंट हैव अ कंफर्म इनेशन बट दे स्टार्टेड आइडेंटिफाइंग द प्लेसेस फॉर कंस्ट्रक्शन क्शन ऑफ़ डिटेंशन कैंप इन टू लोकेशन यू नो दे हैव स्टार्टेड दैट यू नो आई डोंट हैव अ कंफर्म इनफेशन बट बट वी शुड नॉट ट्रस्ट देम बिकॉज़ द वे दे हैव ट्रीटेड द माइनॉरिटीज़ इन इंडिया स्पेशली इन इन बंगाल एंड आसाम है द आसाम मॉडल कैन बी रेप्लिकेटेड हियर यू नो आई इ एंड व्हाट अबाउट द व्हाट अबाउट द हिंदू वोटर्स जो जो इसमें शामिल नहीं है जिन मथुआ की आप बात कर रहे थे उनका क्या दलित वोटर्स जो जो है उनका क्या क्योंकि इसमें सिर्फ मुसलमान नहीं है इसमें हिंदू भी है और जब हमने आसाम में एनआरसी देखा था तो हमने ये देखा कि मुसलमानों से ज्यादा बड़े पैमाने पर हिंदू थे जो उस लिस्ट में शामिल थे और इसीलिए वो एक तरह से फेल एक्सरसाइज साबित हो गई फिर या वन रे ऑफ़ होप दैट दिस टाइम पीपल विल वोट अगेंस्ट दिस यू नो एक्सप्लइटेटिव एसआर सो थोड़ा ताकत यहां मिल जाएगा दिस दूसरा फॉर द मथुआ यू नो स्टिल देयर इज़ ए प्रोविज़न अंडर सीए टू गिव देम सिटीजनशिप एंड ब्रिंग बैक इन द फोल्ड डॉग। बट व्हाट इज़ देयर फॉर द माइनॉरिटीज़? डिस्पाइट बीइंग दे हैव नो कनेक्शन विथ एनी अदर कंट्री डिस्पाइट द बीइंग फैक्ट द ऑल सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स दे हैव गैदर्ड बिकॉज़ ऑफ़ द फियर ऑफ़ द एनआरसी दे हैव स्टार्टेड कलेक्टिंग। दैट्स व्हाई 2002 से दे कैन लिंक विथ द मोस्ट ऑफ़ द पर्सन। बट ये लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी का आई थिंक द जुडिशियल प्रोब शुड कंडक्ट व्हाट हैज़ हैपेंस इन द नेम ऑफ कंडक्टिंग एसआर एंड दिस ऑफिशियल शुड बी ब्रॉट इन द अंडर लॉ टू द काइंड ऑफ़ थिंग्स अनलॉफुल एक्टिविटीज़ दे है आई थिंक आई थिंक द काइंड ऑफ़ थिंग्स दे हैव डन अह डिसरिस्पेक्ट इन द सिटीजन राइफ दैट इट दैट दैट शुड बी आल्सो लुक इंटू वेरी इम्पोर्टेन्ट पॉइंट साब साहब यू हैव जस्ट जस्ट मेंशंड कि और मैं इसलिए मुझे याद आया कि शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि उनसे पूछा गया कि जो मथुआ कम्युनिटी है अह जिसको आपने यह कहा कि भाई आप उसको वोटर बनाएंगे। बड़े पैमाने पर उनके वोट कटे हैं और वो तो बीजेपी वोटर हैं। तो उन्होंने कहा कि नहीं सीएए के तहत हम उनको सिटीजन बना लेंगे। तो उनका मसला तो वहां पर हल हो जाता है। लेकिन वही बात जो आप बिल्कुल एग्जैक्टली आपने बहुत ही सही बात यहां पर बोली कि फिर मुसलमानों का क्या उनके साथ क्या होगा? तो क्या उनके लिए वो डिटेंशन सेंटर हैं? या फिर आप लग आपको लग रहा है कि जुडिशरी अभी भी आपको लग रहा है कुछ इंसाफ की उम्मीद आपको उनसे लग रही है। क्या आगे कुछ हो सकता है? क्योंकि 4 मई को तो ये पता चल जाएगा दीदी आई या गई। बट व्हाट इज व्हाट इज लेफ्ट आफ्टर दैट फॉर द वोटर्स हु आर हु आर हु आर नॉट एबल टू वोट और स्पेशली द मुस्लिम वोटर्स? आई थिंक फाइट फॉर द जस्टिस ऑफ वोट डिलीटेड वोटर शुड नॉट एंड विथ फोर्थ मे। आई हैव ए बिग होप इन बंगाली इंटेलेक्चुअल हु विल हु शुड इन अ सस्टेन मैनर रेज़ दिस इशू टू द नेशनल ऑडियंस नेशनल पीपल सिटीजन ड्रॉ द अटेंशन। दिस इज़ नॉट ओनली कंफ टू द वेस्ट बंगाल। इट शुड बी एप्लीकेबल टु एनीवेयर। सो कम टुगेदर एंड द फाइट फॉर द जस्टिस ऑफ़ द डिलीटेड वोटर शुड गो ऑन एंड सो दैट पॉलिटिकल पार्टी शुड आल्सो स्पीक एंड इन दिस लाइन एंड एंड सेकंड थिंग आई थिंक सम एम्पैथेटिक और सिंपैथेटिक रोल फ्रॉम द जुडिशियरी बिकॉज़ वी इन द पास्ट वी हैव सीन जुडिशियरी हैज़ प्लेड वेरी एक्टिव रोल इन इंश्योरिंग द राइट्स ऑफ़ द डिफरेंट माइनॉरिटीज़। सो, दे शुड कम फॉरवर्ड सीइंग द प्लाइट ऑफ द पीपल हु इज देयर हु इज़ आवर ओन सिटीजंस दे दे डोंट बिलोंग टू एनीवेयर। दैट कैन बी से विथ सम डिग्री ऑफ़ सर्टेनिटी। नो डाउट अबाउट दैट देयर ऑल सिटीजन बिकॉज़ ये जो मुद्दा उठाया जे ये बांग्लादेश एंड रोहिंगा इलेक्शन कमिशन हैज़ कैटेगोरिकली सेज़ दिस इज़ नॉट आवर जॉब। होम मिनिस्टर से दैट दे दैट इलेक्शंस कमीशन शुड बट फ्रॉम द वेरी बिगिनिंग ऑफ़ द एसआईआर एक्स डाटा एनालिसिस डूइंग नो सिंगल इंस्टेंट्स ऑफ रोहिंग्यास आर बांग्लादेश केम इंटू फोरफंड सो अस हु आर द रोहिंग्यास वी आर नॉट विथ द पीपल हु आर कमिंग फ्रॉम द फॉरेन कंट्री बट दिस इज़ आवर ओन पीपल आवर ओन वोटर सो द कंट्री एज़ अ लार्ज द राइट माइंडेड पीपल अक्रॉस द कंट्री शुड कम फॉरवर्ड रेज़ रेज़ देयर वॉइस बिकॉज़ द ओनली ऑप्शन लाइज विथ अस रेज़ आवर वॉइस। वी कांट एग्जिट टू अदर नेशन बिकॉज़ दिस दिस मिट्टी दिस नेशन इज़ बिलोंग टू एज़ अ मुस्लिम टू टू दिस इंडिया इटसेल्फ। सो आई थिंक द कंसर्न सिटीजन विल नॉट ओनली वेस्ट बंगाल। अक्रॉस द अक्रोस द कंट्री शुड रेज देयर वॉइस टू रेस्ट्रो द जस्टिस रेस्टोर द राइट्स ऑफ द वोटर्स हु आर जस्ट माने रोंगफुली नो डिलीटेड सो आई थिंक वी प्रे एंड वी अपील टू द पीपल टू कम फॉरवर्ड टू जॉइन हैंड्स टुगेदर फॉर द रेस्टोरेशन ऑफ द राइट्स ऑफ द पीपल ऑफ देयर ओन पीपल बिल्कुल मेरा आखिरी सवाल आपसे और मैं यह सोच रही थी जब आप ये तमाम बातें कह रहे थे कि आजादी के इतने साल बाद भी मुसलमानों का सबसे बड़ा मुद्दा उनका तहफुज, उनकी सिक्योरिटी, उनका वोटिंग राइट कि वो शहरी हैं या नहीं ये बनकर रह गया। आप सोचिए जरा कि उनके यहां अच्छे स्कूल्स होने चाहिए। उनकी सड़कें वहां साफ होनी चाहिए जहां वो रह रहे हैं। उनको बेसिक अम्युनिटीज मिले। वो कैसे बेहतर कारोबार जॉब्स कर सकते हैं। वो अपने बच्चों का फ्यूचर कैसे बेहतर बना सकते हैं। यह सब अब सेकेंडरी हो गया है। या फिर अभी फिलहाल जिस तरह से जिस मुश्किल में उनको डाल दिया गया है एसआर एसआईआर नाम की ये बला लाकर वो आप ये सोचिए कि उनके लिए सब कुछ अब ये रह गया है कि वो शहरी बने रहे। वो इसी देश में रहे। बाकी तमाम चीजें वो कर लेंगे। तो यहां आकर खड़ा कर दिया गया है और हो कहां रहा है? वेस्ट बंगाल जैसे जगह में शायद जहां का कभी सोचा नहीं गया था और उस सब से भी उस सबके बीच डीलिमिटेशन जैसी एक एक प्रोसेस भी लाकर उसको ट्राई किया जाता है कि चलिए नॉर्थ साउथ के बीच में जो है एक खाई और पैदा की जाए और नॉर्थ साउथ की जरूरत ही ना पड़े और नॉर्थ से ही हम अपनी सीटें लेकर सत्ता में बने रहे तो ये सब भी किया जा रहा है। इसको भी अंडरमाइंड नहीं किया जा सकता है। लास्ट मेरा क्वेश्चन बस साबिर साहब कि अगर बीजेपी वापस बीजेपी सत्ता में काबिज होने पर कामयाब अगर हो जाती है वन% जस्ट गिवेन दिस सिनेरियो सो देन व्हाट विल हैपन और अगर ममता बनर्जी वापस आ जाती हैं तो क्या ममता बनर्जी पर यह पूरा ओनस है कि वो वोटर्स जो उनके रहे जो उन्होंने क्लेम किया उनको वो पूरी लड़ाई लड़ के वो वापस उनको उस लिस्ट में लेकर आए क्या ऐसा वो कर पाएंगी और अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर क्या अगर ममता बनर्जी सत्ता में फिर वापस लौट आए इसका टॉप प्रायोरिटी होना चाहिए जितना वोटर रोंग पुली जिसको डिलीटेड किया है उसको रिस्टोर करना आई थिंक दैट शुड बी द टॉप प्रायोरिटी और उसका लिए जो लड़ाई करना है सिर्फ बंगाल में नहीं दिल्ली में जाके शी इज़ अ फाइटर आई थिंक शी शुड फोकस्ड यू नो आई विल आई विल वी विल आल्सो एज़ अ मेंबर ऑफ़ सिटीजन सिविल सोसाइटी ऑर्गेनाइजेशन विल मेक एन अपील दैट शुड बी द फर्स्ट प्रायोरिटी 90 डेज के अंडर यह एक मतलब दबाव बना के एक मूवमेंट बना के उसको रिस्टोर में उसका राइट रिस्टोर करने के लिए ये लड़ाई में लड़ाई में जारी रहना चाहिए। ये आई थिंक दैट शुड बी द टॉप प्रायोरिटी फॉरगेट अबाउट अदर अदर कमिटमेंट शी हैज़ मेड। दिस इज़ शुड बी द टॉप प्रायोरिटी ऑफ़ ममता गवर्नमेंट स्कूल। अगर बीजेपी आएगा आई थिंक ये सिर्फ बंगाल के लिए नहीं है। अह सारे देश के लिए जे जो जितना पावर का इस्तेमाल किया यह एक मतलब अगली वे ऑफ़ शोइंग पावर यह डायरेक्ट ब्लो टू द कॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यू डायरेक्ट ब्लो टू द डेमोक्रेटिक प्रैक्टिस। आई थिंक दिस इज़ बैड फॉर इंडिया। दिस इज़ नॉट अबाउट द बंगाल इशू। दैट विल बी द बैड प्रेसिडेंट। दे कैन डू एनीथिंग टू एनीवेयर डिस्पाइट ओवरऑल मेनी पीपल वांट टू वोट फॉर अ अगेंस्ट देम द काइंड ऑफ फैसिज्म दे हैव शोज बट दिस विल बी बैड फॉर लेटस सी आई थिंक बंगाल पीपल इज़ अ वेरी प्रूडेंस दे हैव वाइसली बोर्ड अ दे हैव अ लॉन्ग ट्रेडिशन ऑफ सोशल कोइश एंड हार्मोनी द कंसेप्ट ऑफ यू नो वन ऑफ़ द बुक हियर बाय भारत हिंदू मुसलमान जुक्त साधना द कल्चर ऑफ वर्किंग टुगेदर अह इट्स नॉट ओनली इन थ्योरी बट इन प्रैक्टिस दे शो रेस्पेक्टिंग ईच अदर यू नो दैट टू अफेक्ट दैट कॉन्स्टिट्यूशनल वैल्यू आई थिंक बंगाल विल शो द पाथ एंड देयर इज़ ए थ्योरिटिकल आस्पेक्ट बोथ प्रैक्टिकली बिकॉज़ द कल्चरल इंटिमेसी व्हिच इंडिया नीड़ टू प्रोटेक्ट इट्स कंस्टीट्यूशनल वैल्यू द बंगाल कैन शो द पाथ टू द एंटायर अह इंडिया सो विथ दिस होप आई थिंक अह विल वेट फॉर फोर्थ मे। बिल्कुल फोर्थ मे का इंतजार करना होगा। फोर्थ मे के बाद अगर ममता बनर्जी की वापसी होती है तो क्या ममता बनर्जी की टॉप पे प्रायोरिटी में क्या यह होता है और अगर नहीं होता है तो क्या सिविल सोसाइटी और तमाम लोग जो हैं वो क्या उनके ऊपर उतना प्रेशर बनाने में कामयाब रहते हैं क्योंकि लगातार भारतीय जनता पार्टी की ये कोशिश कि पश्चिम बंगाल में वो अपनी सरकार बनाएं। सत्ता में आए वो एक तरह से उनका ख्वाब रहा है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की धरती वो कहते हुए कहते हैं कि वहां से ही शुरुआत हुई थी और वहां वो सरकार बनाना चाहते हैं। लगातार उनकी कोशिशें नाकाम हो रही हैं। पिछली बार हमने देखा कि उन्होंने किस तरह से वो एक बड़े कंटेंडर के रूप में वो उभरे हैं और इस बार भी उन्होंने अपने तमाम कह सकते हैं कि जैसे घोड़े होते हैं ना वो सब खोल दिए हैं। तो देखना यह है कि कामयाबी मिलती है या फिर नहीं मिलती है और उसके बाद इन तमाम वोटर्स का फ्यूचर क्या होता है इस पर अभी भी एक क्वेश्चन मार्क ही है ये तमाम बातें करने के बाद भी बहुत-बहुत शुक्रिया साबिर साहब आपका नाउ नेटवर्क के साथ जुड़ने के लिए अपना वक्त देने के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया बहुत शुक्रिया बहुत शुक्रिया

Companion article

A Record Turnout, Read as a Protest

On the day West Bengal's first phase of voting closed, turnout crossed 92 percent — by most tallies the highest ever recorded in the state. Political camps read the number in opposite directions: the Trinamool Congress called it a rebuke to the Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls; the Bharatiya Janata Party called it a rejection of Mamata Banerjee's fifteen years in power. Sabir Ahmed, a Kolkata-based researcher who has spent over a decade studying West Bengal's electoral rolls, sees something more specific in the numbers: an angry, organised response from precisely the districts where the SIR cut deepest.

Ahmed points to Murshidabad, a Muslim-majority district that lost large numbers of names in the revision. There, he says, migrant workers travelling home from Delhi, Pune and Kerala paid inflated fares — flights that normally cost a couple of thousand rupees selling for fifteen thousand — rather than lose their chance to vote, driven partly by rumours that skipping this election could cost them their names a second time. "They wanted to participate in the election process," he says of the returning migrants. In Shamsherganj, one of the constituencies with the heaviest deletions, turnout by early afternoon had already crossed 60 percent among both men and women. To Ahmed, that is less an electoral swing than "a political society" insisting on being heard.

Inside the Special Intensive Revision

The SIR set out to re-verify West Bengal's electoral rolls from scratch, tracing each voter's lineage back to the 2002 rolls. Ahmed's research began by mapping where the exercise flagged people as unlinked to that base year. In Muslim-majority pockets of Murshidabad — Farakka, Bhagawangola, Shamsherganj — the "unmapped" share was under 2 percent, he says, while it ran to 10 or even 15 percent in the Matua belt, settled by families who migrated from East Bengal. That contrast, he argues, embarrassed the Election Commission, which did not want the exercise to look like it was singling out Muslims. What followed, in his account, was a shift to document-by-document scrutiny using artificial intelligence — and the emergence of a new category with no basis in the SIR manual: "logical discrepancy."

Ahmed illustrates the category with his own name — Sabir Ahmed, which a schoolteacher once rendered with an extra letter — and with the dozens of ways Mohammad, Sheikh or Shabbir can be transliterated across documents. Large families drew scrutiny too. "Why do you have six siblings?" was, in his telling, treated as a red flag, though nothing in the constitution limits family size. In Bhabanipur, Mamata Banerjee's own constituency and roughly 20 percent Muslim, Ahmed says the share of logical-discrepancy cases came in far higher than that — over 40 percent. In Metiabruz, a roughly 60-percent-Muslim area, he puts the discrepancy share at 90 percent. "This clearly indicates this is a targeted intervention," he says, arguing that probing voter rolls for Muslim names is trivial once artificial intelligence is used to flag them.

The Weight of "Under Adjudication"

Names flagged for logical discrepancy were pushed into a category called "under adjudication," requiring citizens to appear before a hearing with documentary proof — passports, birth certificates, decades of paperwork. Ahmed offers a family example: both his brother and his father were placed under adjudication despite holding passports, which themselves require rigorous prior verification. His father's name was eventually restored to the rolls; his brother's was not. He says the hearings were often conducted by judicial officers posted from outside Bengal who could not read the Bengali-language documents in front of them, working through a caseload of more than one crore citizens in roughly two weeks — a pace he calls "not humanly possible."

The numbers, in his account, kept growing. An initial figure near 90 lakh flagged names was followed by a further 27 lakh deletions after adjudication, taking cumulative deletions to roughly 91 lakh voters — a total Ahmed says includes some genuinely deceased people, but far more than that can explain. In Nandigram, the constituency Shubhendu Adhikari won by a margin of around a thousand votes, Ahmed's team crowdsourced deleted names from residents and found the deleted list was overwhelmingly Muslim in a constituency that is roughly a quarter Muslim; journalists searching for non-Muslim names among the deleted found barely over two hundred in the entire seat. He says his organisation has published similar raw, constituency-level breakdowns for Murshidabad, north Bengal and Kolkata neighbourhoods like Bhabanipur, Jorasanko and the Port area, all showing the same skew.

Compounding this, Ahmed says, is a translation problem: voter rolls outside Kolkata are compiled in Bengali, and Arabic, Persian or Urdu-origin names lose their form when transliterated into Bengali and back into English — Abdul Jabbar rendered as "A Jabbar," Santu Pal as "Sabzi Pal." He says his team has kept screenshots of dozens of such errors as evidence of the process's unreliability, alongside cases of living people marked dead, residents marked "migrated," and voters deleted over duplicate entries they had no chance to contest before the fact.

Costs Beyond the Ballot

Ahmed frames the SIR's consequences as extending well past voting day. Because welfare entitlements are linked to the voter card, he says being placed under adjudication has, in practice, frozen land transactions and suspended access to government schemes for affected families. A separate strand of his organisation's research has looked at the exercise's toll on mental health: he describes people arriving at their legal-aid centre in tears, and a young man from Murshidabad who told him he could no longer sleep, afraid his family would be sent to a detention camp after his parents' names dropped off the rolls even as his own remained.

His team has also tried to price the exercise in economic terms — photocopying, travel between offices, a day's wages lost by daily-wage workers navigating the hearings — arriving at an estimate running into thousands of crores of rupees spent by citizens simply to prove they belong on a list they were already on, alongside an estimated 1.16 crore hours of lost school time as booth-level officers, many of them teachers, were redirected to the exercise. "The state is dealing with its own citizens in a very crude manner," he says.

A Slow, Unequal Appeal

Ahmed is scathing about the appeals process that followed. The tribunal set up to hear challenges was named after Shyama Prasad Mukherjee, a choice he calls symbolically loaded given the numbers involved — of the lakhs excluded, he says barely under 200 names had been restored through the appellate route by the time of the interview. The application process itself, he argues, favours the already privileged: appeals must be filed online with a 1,000-word cap, a serious barrier in a country with wide digital disparity, while offline filers were not even issued receipts. Groups with the least documentation to begin with — homeless residents, sex workers, transgender people, families displaced by river erosion, people whose only past address proof was an electricity pole the Election Commission had once agreed to accept — are, in his account, the ones least equipped to fight their way back onto the rolls.

Echoes of Assam

Ahmed repeatedly draws the comparison to Assam's National Register of Citizens, calling the Bengal exercise "a backdoor NRC" — a process that, whatever its stated purpose, ends in citizens having to prove they belong to the only country they have ever known. He notes that Assam's NRC ultimately excluded large numbers of Hindus as well as Muslims, which he says is one reason it came to be seen as a failed exercise, and that Bengal's Matua community — of East Bengal origin like many Muslim voters affected here — has at least a legal route to citizenship under the CAA that does not exist for Muslims left off the rolls. He says his own analysis of Election Commission data turned up no confirmed case of a Rohingya or Bangladeshi national voting fraudulently in Bengal, even as politicians invoked exactly that narrative to justify the revision. "These are our own citizens, our own voters," he says.

What Comes After the Count

Ahmed's closing argument is that the fight over deleted voters should not end with the election result. He wants the restoration of wrongly deleted names to be the first priority of whichever government forms next — and says civil society intends to press that demand regardless of outcome. He also appeals for Bengal's intellectuals and civil society to carry the issue to a national audience, arguing the pattern he has documented is not confined to one state. Whatever the scoreboard shows after counting, he suggests, the deleted voters' cases will still be open, and so will the question of who is willing to keep fighting them.

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