Nous Podcast· 03 Apr 2026· 1:19:34

How the US–Israel War on Iran Could Disrupt the Global Economy | Atul Aneja

The Israel–Iran confrontation has moved beyond a regional flashpoint, emerging as a structural risk to the global economy. With vital shipping routes under pressure, energy markets unsettled, and the possible return of Donald Trump shaping strategic calculations, the stakes are increasingly global.

Full Transcript

ट्रंप के इस एड्रेस टू नेशन को आप कैसे देख रहे हैं? क्या जितना उन्होंने बताया और जो नहीं बताया क्या जो नहीं बताया उस पर बात करना जरूरी है? बूट्स ऑन ग्राउंड को लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा है। न्यूक्लियर अटैक को लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा है। मेरे को लगता है मार्केट्स ने भी डाइजेस्ट कर लिया है कि ट्रंप का कहना ना कहना कुछ खास मायने नहीं रखता क्योंकि लोग अब एक्शन के ऊपर आ गए हैं। वो बात कर रहे थे वियतनाम की। वो बात कर रहे थे इराक वॉर की। बता रहे थे कि इतने साल वो चली, आठ साल इराक की वॉर चली। यहां तो अभी एक ही महीना हुआ है। 1973 में आपने उसी तरह से यू आर टू जस्ट रन आउट ऑफ वियतनाम। कंबोडिया की फ्लाइट थी। एंबेसडर बैठा है। ईरान की रिजीम चेंज की नहीं। हम फिर यूएस की रिजीम चेंज की बात करते हैं। अगर बॉडी बैग्स आने शुरू होते हैं। फिर उसके बाद वो आप अफगान सिचुएशन करें। कुछ भी करें क्योंकि उसमें ट्रंप की पिटिकल सर्वाइवल रहेगी कि इनकी रजामंदी से हो रहा है। क्या आपको नहीं लगता कि अभी सिचुएशन एक महीने के बाद ऐसी है कि ईरान इज डिसाइडिंग। तो ऑफ कोर्स जंग में ये सबसे इम्पोर्टेन्ट होता है कि कितना आप इमिनेशन जो है वेपन्स जो है आप इस्तेमाल कर रहे हैं और उसके साथ-साथ आप कितना प्रोडक्शन कर रहे हैं। वो छह बैटरी साल की प्रोड्यूस करता है और 600 मिसाइल सिर्फ साल की प्रोड्यूस कर सकता है। इंडस्ट्रियल कैपेसिटी नहीं है। अमेरिका इस गेटिंग एक्सपोज ऑन दैट। ये अलग तरह की गोरिल्ला वॉरफेयर है। इट्स अ वैरी हाइब्रिड वॉर। अब ये 21 सेंचुरी की एक तरह से गोरिल्ला वॉरफेयर है। ये ईरान के पास तरकश में और कितने तीर बाकी हैं। आइडियोलॉजी है डॉक्टर मिलिट्री प्रिपरेशन। एंड हाउ कैन यू डिफिट देम? एंड आई एम 100% श्योर इनके पास न्यूक्लियर कैपेबिलिटी है लेकिन वार्म नहीं है। अपने ट्रूप्स ऑन द ग्राउंड या इस तरह का काम यह रशिया कर सकता है। यह चाइना नहीं करेगा। चाइना बैकअप कर सकता है रशिया को। तो एक जो तरकश में तीर है वो डिसिटलाइजेशन प्लांट्स का है। और जब हम न्यूक्लियर अटैक की बात करें जाहिर सी बात है कि वो आखरी स्टेप होगा। लेकिन अगर मोहम्मद सफा जैसे जो कि यूएन में काम कर रहे हैं डिप्लोमेट अगर वो रिजाइन करें। ईरान भी बड़ा प्राउड कंट्री है। यू नो दे विल नॉट से कि भ आप हमें प्रोटेक्शन दो। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद। डोन्ड ट्रंप अमेरिका को यानी कि अपने देश को खिताब उन्होंने किया और इसका इंतजार पूरी दुनिया कर रही थी कि इस जंग के बीच में पहली बार जब वो देश को खिताब करने जा रहे हैं तो आखिर क्या स्पेशल और क्या डिफरेंट वो कहने जा रहे हैं। लेकिन वही नाउदी हाथ लगी और जो ट्रंप ने कहा वो उन्हीं तमाम बातों को उन्होंने रिपीट किया जो अब तक वो कहते आ रहे थे। उन्होंने वही बातें कही कि ईरान की नेवी खत्म हो गई है, आर्मी खत्म हो गई है। हमारा जो पर्पस थे वो ऑलमोस्ट हमने वहां पर हासिल कर लिए हैं। उन्होंने ये कहा कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस के लिए कि हम इसको लेकर इस सब में अब नहीं फंसना चाहते हैं। जिसके इंटरेस्ट हैं वो हॉर्मोस को खुलवाएं। उन्होंने आगे यह भी कहा कि अगर नेगोशिएशन की टेबल पर ईरान नहीं आता है तो दो-ती हफ्ते के अंदर वो बड़ा हमला करेंगे। उम्मीद ये लगाई जा रही थी कि शायद बाजार भी ये उम्मीद कर रहा था। अमेरिका के लोग भी ये उम्मीद कर रहे थे और दुनिया भी ये उम्मीद कर रही थी कि 19 मिनट का जो उन्होंने देश के नाम अपना संबोधन किया उसमें वो कुछ अलग कहेंगे। कुछ स्पेशल कहेंगे। कुछ ऐसी बात कहेंगे या तो जंग को बंद करने की हो या फिर हमें लगे कि जंग की इंटेंसिटी और बढ़ने जा रही है। एक इंपॉर्टेंट बात जो उन्होंने कही उसमें वो ये कि दो से तीन हफ्ते के अंदर बड़ा हमला ईरान के ऊपर करेंगे अगर ईरान उनकी शर्तों को नहीं मानता है या फिर नेगोशिएशन के लिए आगे नहीं बढ़ता है। बूट ऑन ग्राउंड को लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा है। न्यूक्लियर अटैक को लेकर उन्होंने कुछ नहीं कहा है। जाहिर सी बात है ये बातें डायरेक्टली जब वो देश के नाम संबोधन कर रहे हैं तब वो नहीं कहेंगे। ऑयल गैस के प्राइस बढ़ता हुआ इनफ्लेशन इस सब पर भी उन्होंने कोई बात नहीं की है। मैं ये इसलिए कह रही हूं क्योंकि इससे पहले जब ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर और जब ऑस्ट्रेलिया के प्राइम मिनिस्टर ने अपने देश के नाम संबोधन किया तो उन्होंने इन तमाम बातों को रखा। उन्होंने यह कहा कि कैसे इस मुश्किल घड़ी में देश जो है जिस मुश्किल घड़ी से गुजर रहा है उसमें एक कंट्री के हेड के तौर पर वो क्या करने जा रहे हैं वो आगे किस तरह के मेजर्स लेने जा रहे हैं। लेकिन ट्रंप ने तो यह भी नहीं कहा और वही बातें जो लगातार वो कहते आ रहे हैं कि देयर ही हैज़ वन द वॉर और अब कुछ नहीं बचा है। वही तमाम बातें उन्हों वो करते हुए नजर आ रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि यहां से यह वॉर कहां जाती हुईज़ आ रही है? दो-ती हफ्ते में बड़ा हमला इसका क्या मतलब है? क्या वॉर की इंटेंसिटी बढ़ने जा रही है? जब ट्रंप ये कह रहे हैं कि हमने अपने मकसद हासिल कर लिए हैं तो क्या मकसद थे जिनको वो हासिल करने की बात कर रहे हैं। रिजीम चेंज अब उनका मकसद नहीं है ये भी उन्होंने कहा है कि वो हो चुकी है। तो क्या जो अब रिजीम है उससे वो खुश हैं। इतनी अजीब सी बात है कि समझ नहीं आता है कि इन तमाम चीजों को मेंशन भी किया जाए या नहीं किया जाए। अब आगे वॉर के किस तरह से आयाम क्या होंगे? ईरान इसको किस तरह से देख रहा है? तेहरान का रिएक्शन क्या होने जा रहा है? इस सब पर आज हम बात करने जा रहे हैं और मेरे साथ बेहद खास मेहमान आज जुड़ गए हैं। स्क्रीन पर आप देख सकते हैं मेरे साथ अतुल अनेजा जी हैं। अतुल जी सीनियर जर्नलिस्ट तो हैं ही। वेस्ट एशिया मामलों के जानकार हैं और पिछले लगभग दो दशक से उन्होंने अलग-अलग कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन फ्रॉम काबुल टू कायरो, बैरूत टू तेहरान। उन्होंने ये सब कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन जो है वो कवर किए हैं और छ साल तक वो चाइना में भी रहे हैं एज अ जर्नलिस्ट। तो आप समझ सकते हैं कि इन तमा इस पूरे कॉन्फ्लिक्ट पर उनसे बेहतर बात करने के लिए और कोई नहीं हो सकता था। तो इसीलिए आज मैंने उन्हें इनवाइट किया है। अतुल जी बहुत-बहुत स्वागत। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। थैंक यू सो मच उषा जी। इट्स रियल प्रेशर। अतुल जी मेरा पहला सवाल आपसे कि ट्रंप के इस एड्रेस टू नेशन को आप कैसे देख रहे हैं? क्या जितना उन्होंने बताया और जो नहीं बताया क्या जो नहीं बताया उस पर बात करना जरूरी है या फिर जो बताया है वो भी आपको लगता है कि बहुत क्रिटिकल है? देखिए वो जो ट्रंप का आज का जो भाषण था या जो भी कहे उसको मैं तो एक रैंबलिंग स्पीच कहूंगा। उसमें नया कुछ नहीं है। तो इसलिए उसमें से कुछ डिराइव करना डायरेक्शनली डिराइव करना मुझे नहीं लगता कुछ उसमें है। उसी वजह से हम देख रहे हैं कि इमीडिएटली जो मार्केट्स ने रिसोंड किया है जैसे ऑयल प्राइसेस इमीडिएटली शूट अप की है। तो अह अब मार्केट्स यूजुअली पहले जो अपने इनकी तकरीर होती थी तो उससे मार्केट्स का एक पीछे रहता था एक बैकग्राउंड में कि यू हैव टू काम द मार्केट्स ऑयल प्राइसेस कम रहे हैं। मेरे को लगता है मार्केट्स ने भी डाइजेस्ट कर लिया है कि अब ट्रंप का कहना ना कहना कुछ खास मायने नहीं रखता क्योंकि लोग अब एक्शन के ऊपर आ गए हैं कि कंक्रीट एक्शन क्या है वो बताइए। बातें बहुत हो गई हैं। तो मुझे नहीं लगता ये हमें इसको बहुत ही कोई इनसाइटफुल किस्म का यह कोई एड्रेस रहा है और स्थिति वही है। उसी तरह से फंसे हुए हैं डोन्ड ट्रंप। आई डोंट थिंक ही होल्ड्स द कार्ड्स। वो कार्ड्स जो है उसके बारे में हम बात कर सकते हैं। वो ईरान के पास है और एक डेस्पिरेशन की फिर से अपील थी कि भ बाकी के जो नाटो देश हैं जो यूरोपियन देश हैं वो फिर मिलके उसको खोलें। वही कि मैं तो अब जा रहा हूं यहां छोड़ के लेकिन फिर भी मैं वापस आ सकता हूं। तो वो कंट्राडिक्शंस वैसी की वैसी ही रही हैं। बूट्स ऑन द ग्राउंड के बारे में कोई बात नहीं कही गई तो स्टेटस को वहां भी फ्रोजन है और मुझे लगता है उसके बारे में बात कर सकते हैं कि ऑप्शन नहीं है बूट्स ऑन द ग्राउंड की और क्यों नहीं है उसकी हम एनालाइज कर सकते हैं। और एक है जी कि जो ट्रंप कह रहे हैं वो जो आके देश को बोल रहे हैं जो उन्होंने एड्रेस किया। एक तो यह आस्पेक्ट है। दूसरा यह कि ट्रंप एक डेस्पिरेट इनको अटेम्प्ट नजर आता है कि वो इस जंग से किसी भी कीमत पर बाहर निकलना चाहते हैं। कभी दो दिन का अल्टीमेटम देते हैं। फिर 5 दिन का देते हैं फिर 10 दिन का देते हैं। अब दो-तीन हफ्ते में बड़े हमले की बात कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि वाकई में वो जो कह रहे हैं वो खुद कह रहे हैं या अगर वो बाहर भी निकलना चाहे तो इट्स नॉट इन हिज कंट्रोल एनीमोर नाउ। या शुरू से ही नहीं था। और ये सब कुछ ड्राइव किया जा रहा है। जो जस लॉबी है जो नितिन याू है अगर वो चाहे भी तो नहीं निकल सकते हैं जब तक जस लॉबी ना चाहे। बिल्कुल क्योंकि ये हमको दो थिएटर्स में बात करने की जरूरत है। एक तो अमेरिकन थिएटर है और एक जो है इजराइल का थिएटर है। अब जब तक दोनों में सहमति नहीं होगी कोई कंक्रीट स्टेप हो नहीं सकता। उसका कारण आपने बिल्कुल कह दिया कि जो जइश लॉबी या इजराइयली लॉबी जो यूएस में है वो बहुत स्ट्रांग है। उसको आप डिफाई नहीं कर सकते क्योंकि आपका जो कंट्रोल है सेनेट में हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में फंडिंग जो होती है वहां पर इलेक्शंस में उसका मीडिया जो है हर फील्ड में फाइनेंसियल फील्ड में वॉल स्ट्रीट में वो जो जुइश लॉबी की पकड़ बहुत मजबूत है। तो आप अगर उसको डिफाई करते हैं तो फिर आपकी सर्वाइवल बहुत मुश्किल है। देन इट इज़ पॉलिटिकल सुसाइड। तो दोनों की रजामंदी इस वक्त बहुत जरूरी है और वह मुझे नहीं लगता कि इस वक्त इजराइल के जो खास करके उसके इंटरेस्ट है या जिसकी वजह से ये ये जंग छिड़ी है वो पूरे पूरे हुए हैं। ईरान के पास मिसाइल लॉन्चिंग कैपेबिलिटी है। 2000 कि.मी. के मिसाइल्स हैं। न्यूक्लियर प्रोग्राम जो एनरचमेंट का है वैसे के वैसे बरकरार है। तो एक तरह से उनके इंटरेस्ट तो कोई उस वक्त पूरे नहीं हुए। तो अगर आप इस इंटरेस्ट पूरे नहीं हुए तो आप छोड़ के कैसे जा सकते हैं? दूसरी बात एक और है कि अगर ट्रंप साहब सोचते हैं भ मैं एग्जिट ट्रप लेता हूं। मैं निकल जाता हूं। जैसे अफगानिस्तान में किया था 2021 में कि आपने रातोंरात बंद किया गोरी बिस्तरा बांधा और निकल गए। उससे एक तो आपकी इजराइली लॉबी पर्सनल पॉलिटिकल सर्वाइवल मुश्किल होगी। आपकी ओवरऑल क्रेडिबिलिटी रीजन में क्योंकि अगर आप जा रहे हैं तो आप पीछे किसको छोड़ के जा रहे हैं जो गल्फ के खाड़ी के देश हैं। सो फॉर द फ्यूचर यू आर बर्निंग योर ब्रिजेस और एक तरह से जो वैक्यूम क्रिएट होगी कौन फिल करेगा? एक बड़ी वैक्यूम है। अगर ईरान उसमें फिल करता है उस वैक्यूम को क्योंकि एक तरह से ईरान को स्ट्रेंथन करने वाली बात हुई अगर आप मैदान छोड़ के भाग रहे हैं। तो विल यू एक्सेप्ट इट के एक नई शक्ति वहां से आएगी। वैक्यूम फिल करने के लिए चाइनीस भी आएंगे, रशियंस भी आएंगे। इट्स अ फ्री फॉर ऑल आफ्टर दैट। आपकी फंडिंग जो होगी स्टॉक एक्सचेंज वगैरह में वो पेट्रो डॉलर्स में होती है। अगर यह सिस्टम स्टेट ऑफ हार्मोस में आप डॉलर्स की पेमेंट की जगह युवान में चले गए या किसी और करेंसी में पेट्रो डॉलर्स आपके पास नहीं होंगे। पेट्रोल डॉलर्स नहीं होंगे तो आप न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज में जो फंडिंग करते हैं एआई कंपनीज की या डेप्ट सर्विसिंग जो करता है यूएस वो पेट्रो डॉलर से आती है। अगर पेट्रोल डॉलर्स की पाइपलाइन किसी तरह से डिस्ट्रप्ट होती है देन इट इज़ डॉलर कोलैप्स और डे सर्विसिंग आप नहीं कर सकते तो आपकी मार्केट में यू आर गॉन बेसिकली इकोनॉमिक कोलैप्स की तरफ फिर हम जाते हैं। तो इस तरह से आप सबको नाराज करके निकल नहीं सकते। ये प्रॉब्लम है इस वक्त ट्रंप साहब के बाद तो दे आर ऑल बैड ऑप्शंस हां आपको लग रहा है कि ऐसे ऐसे जाल में फंस गए हैं वो कि अब उससे निकलना उनके लिए बिल्कुल नामुमकिन सा है क्योंकि वो जिक्र कर रहे थे इस अगर आपने इस स्पीच में देखा हो वो बात कर रहे थे वियतनाम की वो बात कर रहे थे इराक वॉर की बता रहे थे कि इतने साल वो चली आठ साल इराक की वॉर चली यहां तो अभी एक ही महीना हुआ है सो इज ही इंडिकेटिंग दैट यू नो दिस वॉर कैन गो फॉर इयर्स और क्या जिस तरह तरह से ईरान ने रिटेलिएट किया है। उनको यह लग रहा है कि यह महीनों में तो खत्म होने नहीं जा रही है। देखिए यह एक सिग्नल आप कह सकते हैं कि भ लॉन्ग ड्रॉन वॉर हो सकती है। अब लॉन्ग ड्रॉन का मतलब क्या हुआ कि आप अपनी बूट्स ऑन द ग्राउंड आपको लाने पड़ेंगे। वियतनाम की अगर बात करें तो दैट वाज़ अ यू नो जंगल्स के अंदर वॉर हुई एक मिलियंस डाइड। उसके बाद फाइनली 1973 में आपने उसी तरह से यू हैव टू जस्ट रन आउट ऑफ वियतनाम। कंबोडिया की फ्लाइट थी। एंबेसडर बैठा है। एंड यू नो इट वाज़ वो अभी भी हम अगर 70ज के विजुअल्स देखें तो बड़े कमाल के हैं वो वियतनाम वर्क के। तो आप अभी बूट्स ऑन द ग्राउंड लाएंगे क्योंकि अगर आप कंपैरिजन करें दोनों में तो इट इट्स अ लॉन्ग फाइट। बूट्स ऑन द ग्राउंड आप लैंड जैसे ही करते हैं, बीच लैंडिंग्स करते हैं, ईरानियंस तैयार हैं। जैसे आप देखें खर्ग आइलैंड के ऊपर आइलैंड है उसके पीछे ज़ग्रोस माउंटेंस हैं। जहां ईरानियंस डग इन है। आप स्लोली मैंने बीच लैंडिंग्स देखी हुई है। वो बहुत ही स्लोली उनकी एक्सरसाइज देखी हैं। हकीकत में नहीं कि बहुत स्लोली वो एफीबियस बोट्स आती हैं। उसके बाद उतरते हैं सोल्जर्स फिर बीच का कब्जा करते हैं। बट टिल दैट टाइम जब तक वो पूरा कार्यक्रम खत्म नहीं करते। दे आर सिट इन डक्स ईरानी आर वेटिंग तो बीच लैंडिंग आप ऐसे नहीं कर सकते दूसरा है एयर ड्रॉपिंग करेंगे हेलीकॉप्टर से करेंगे छोटा एरिया है आप प्लेेंस के ऊपर क्योंकि उसके ऊपर आप इट कैन बी सो एक्यूरेट हेलीकॉप्टर स्लो मूविंग है जो एंटी एयरक्राफ्ट इनके पास है रशियन ने सप्लाई की है इगला वगैरह शोल्डर फाइट सब कुछ है सो दैट यू विल नॉट बी एबल टू स्क्रीट बॉडी बैग्स जाएंगे इमेजिन अ सिचुएशन कि अगर आप कोशिश करते हैं बॉडी बैग्स जाते हैं यूएस इतनी ऑलरेडी एंटी वॉर सेंटीमेंट्स है। वहां तो बवाल मच जाएगा। बल्कि मैं किसी से बात कर रहा था कि फिर हम बात करते हैं ईरान के रिजीम चेंज की नहीं। हम फिर यूएस की रिजीम चेंज की बात करते हैं। अगर बॉडी बैग्स जाने शुरू होते हैं। सो दैट ऑप्शन ही डज़ नॉट हैव। ही मे टॉक अबाउट वियतनाम। लेकिन वो ऑप्शन कहां है? हकीकत में प्रैक्टिकली अब कैसे करोगे उसको? तो वो मिलिट्री ऑप्शन भी नहीं है। तो फाइनली ही हैज़ टू डिसाइड। डिसीजन एक तरह से हो सकता है। बूट्स ऑन द ग्राउंड के दो एलिमेंट हो सकते हैं। एक दूसरा फ्रंट खोलें या दूसरा चैनल खोलें। आफ्टर ऑल सऊदी अरेबिया और पाकिस्तान के बीच में एक डिफेंस पैक्ट है। विल यू ट्राई एंड गेट पाकिस्तानीज? क्योंकि बॉर्डर लगता है। जाहिदान की तरफ आप आ सकते हैं। क्या पाकिस्तान उसके लिए तैयार होगा? अगर पाकिस्तान आर्मी की ही कंपोजिशन जो जितना मैं पढ़ रहा हूं पाकिस्तान आर्मी में पाकिस्तान आर्मी इस नॉट इंटरेस्टेड टू गेट ड्रॉन इंटू दिस। लेकिन अगर करते भी हैं कंपोजशन देखें पाकिस्तान आर्मी की 30% शियास हैं वहां पर पाकिस्तान की मिलिट्री के अंदर 30% अब ये गिलगट बाल्टिस्तान वगैरह सारा नर्दन लाइट इनफेंट्री इज़ ऑल शिया यू आर थ्रेटनिंग अ रिवोल्ट इनसाइड पाकिस्तान वो अगर बात नहीं उनकी आपकी माने तो वो ऑप्शन भी मुझे उसमें भी लगता है कि वो पाकिस्तान ऑप्शन जो है वो भी बूट्स ऑन द ग्राउंड के लिए कोई एक्चुअली हकीकत में वायबल नहीं हो सकती। सो यू आर एक्चुअली कॉट। इनका तरीका सब है जब हम ओरिजिनल बात पे आते हैं। जब इजराइल में मंशा चेंज हो। बिकॉज़ इजराइल इज अ स्मॉल कंट्री। आप कल देखें 200 के करीब मिसाइल्स दागी गई है। इट्स अ स्मॉल एरिया। इजराइल का टेरिटरी इतना कम है। अगर वहां पर विल होती है यार ओके वी कांट टेक इट एनी मोर। और फिर सहमति बनती है देन वी कैन थिंक ऑफ अ ऑफरप। उस सो द बॉल इज़ रियली इन इजराइल कोर्ट। अगर इसको खत्म करना है और इजराइल के अंदर अगर आप देखें डिपेंडेंसी उनके पास कोई स्ट्रेटेजिक रिजर्व्स नहीं है। चहान पाइपलाइन एक आ रही है। ऑयल पाइपलाइन अगर उस पे अटैक होता है दे आर उनका एनर्जी सिक्योरिटी फिनिश्ड। अभी रिफाइनरी दूसरी हाइफा पे है। हाइफा पे ऑलरेडी दो अटैक्स ईरान के हो सकते हैं। आगे निकल रहे हैं। विजुअल्स आ रहे हैं उसके। सो समवेयर इजराइल मे हैव टू गिव वे एंड बाय टाइम। उनकी लेबिन में जो वॉर हो रही है दैट्स आल्सो नॉट गोइंग वेल। वहां से भी बॉडी बैग्स आने शुरू हो गए हैं। तो ऑलरेडी एक साइकिल इजराइल के अंदर भी आ रहा है कि मे बी वी शुड रिथिंक अगर प्रेशर निटन्या पे आता है और इजराइल भी समझता है वी नीड एटलीस्ट अ पॉज कुछ देर के लिए कि ये अब बहुत ज्यादा हो गया है एंड देन अमेरिका और इजराइल मिलके फिर उसके बाद वो आप अफगान सिचुएशन करें कुछ भी करें क्योंकि उसमें ट्रंप की पॉलिटिकल सर्वाइवल रहेगी कि इनकी रजामंदी से हो रहा है इजराइली की क्या मुझे वही लगता है वो थिएटर सिचुएशन में बहुत इंपॉर्टेंट और बहुत यू नो आपने जो एनालिसिस यहां पर किया है वो आई एम श्योर कि जो ऑडियंस है उसको खासा पसंद आएगा क्योंकि ये आस्पेक्ट जो है वो अभी बहुत कम बाहर निकल कर आया है। मेरा सवाल आपसे ये है कि आपको नहीं लगता हम अमेरिका और इजराइल की बात करते हैं कि यू नो दे विल बी द वन हु विल डिसाइड वेदर दे विल कम आउट फ्रॉम दिस वॉर ऑ नॉट? क्या आपको नहीं लगता कि अभी सिचुएशन एक महीने के बाद ऐसी है कि ईरान इज डिसाइडिंग? क्योंकि अगर आज ईरान ये तय कर ले कि ठीक है वी विल स ऑन द टेबल ऑफ द नेगोशिएशन। हम बातचीत के लिए तैयार हैं। चलिए हम आ जाते हैं। हम आपकी कुछ शर्तें आप हमारी मानिए। कुछ आप हम आपकी मानते हैं। तो ये जाहिर सी बात है कि वॉर बिल्कुल कंप्लीटली डिफरेंट इसमें टर्न आ जाएगा। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि अभी वॉर आगे चलेगी नहीं चलेगी। ईरान इस ड्राइविंग ऑल ऑफ़ दैट? अब्सोलुटली ऑल इस वक्त ईरान का पलड़ा बिल्कुल भारी है। अब लेकिन हम इसको आगे की प्रोजेक्शन देखें। अब गेम क्या चल रही है? ईरान मिसाइल्स फाइल कर फायर कर रहा है गल्फ के बेसिस पे और इजराइल के ऊपर। अब उसके प्रोटेक्शन के लिए आपके पास लेयर्ड एंटी एयरक्राफ्ट डिफेंसेस हैं। उसमें आपका आयरन डोम सिस्टम है, एरो सिस्टम है और फिर थर्ड जो अमेरिकन सिस्टम है। अगर आप इन इस पे देखें कि इनकी प्रोडक्शन कैपेसिटी क्या है? भ आपके पास कुछ रिजर्व्स हैं जो आप यूज़ कर रहे हैं। अभी उनका एक ड्रोन आता है। आपको फायर करने पड़ रहे हैं। ये राइट? यह मिलियंस ऑफ डॉल का इक्विपमेंट है। लेकिन टोटल आपकी कैपेसिटी जो है मेसोफिशियस में प्लांट है जैसे पेट्रियोट की बात करें वो छह बैटरी साल की प्रोड्यूस करता है और 600 मिसाइल सिर्फ साल की प्रोड्यूस कर सकता है। इंडस्ट्रियल कैपेसिटी नहीं है। अमेरिका इस गेटिंग एक्सपोज ऑन दैट। अब बात करते हैं कंपैरिजन में। ईरान के पास अगर अपने स्टक्स हैं अगले दो-ती महीने जैसे चलाने के लिए वो अंडरग्राउंड है। पूरी तरह से तैयार किए हुए उन्होंने और वो डिस्ट्रॉय नहीं हुए हैं या नहीं होंगे। तब ईरान विल एक्सपोज। तो अभी तो कार्ड्स डोमिनेंस ईरान की है। लेकिन हम अगला सवाल पे आते हैं। कब तक रहेगी वो गेम इस पे आती है कि बैलेंस ऑफ मिसाइल्स किसके पास लास्टिंग पावर किसके पास ज्यादा है? उस पर डिपेंड करता है पिटिकल वेल का जो अभी एक इंपॉर्टेंट ट्रेवल है क्योंकि अभी हमें पता नहीं है कि ईरान हालांकि वो फायर करी जा रहा है। अभी ऐसा नहीं लग रहा कि उसके एग्जॉस्ट हो रही है मिसाइल्स बट फॉर हाउ लॉन्ग कैन यू प्रोलोंग दो महीना तीन उतने हैं रिजर्व्स अगर रिजर्व्स के अलावा इंडस्ट्रियल कैपेसिटी अंडरग्राउंड आपके पास फैक्ट्रीज हैं जो चल रही है जिसको रिप्लेस करेंगे आपके पास रॉ मटेरियल उतना है वो डिटेल हमें पता नहीं है लेकिन अगर हम अस्यूम करें कि इनके पास मिसाइल्स रहेंगी आगे अगले लेट्स से टू मंथ्स के लिए फिर तो दे आर कंप्लीटली इन द ड्राइवर सीट वो एक कैबिट मैं ऐड करना चाहता हूं कि डोमिनेंस है ईरान की इस वक्त कंपैरिजन होगा दोनों के बीच में। आप कोरिया से ला रहे हैं पेट्रिएट मिसाइल्स वगैरह इस थिएटर में यूक्रेन से ला रहे हैं। सो यू आर इन ट्रबल दैट इज़ अमेरिकन आर इन ट्रबल। वो वो क्लियर है और उनकी प्रोटेक्शन कैपेसिटी हमें पता है। जो इमंडरेबल हमारे पास नहीं है ईरान की कैपेसिटी के। एक बार वो हम एक्सपर्ट से बात करें जी। उन्होंने ये कहा कि ऑफ कोर्स जंग में ये सबसेेंट होता है कि कितना आप इमिनेशन जो है वेपन्स जो है आप इस्तेमाल कर रहे हैं और उसके साथ-साथ आप कितना प्रोडक्शन कर रहे हैं। तो ये तो साफ तौर पर लग रहा है कि अमेरिका और इजराइल के बात करें तो कंप्लीटली एग्जॉस्टेड है क्योंकि यूक्रेन में भी जिस तरह से वहां पर हेल्प हो रही थी और इसके अलावा लेबनान और फिर उसके बाद गाजा यहां पर जिस तरह से अलग-अलग फ्रंट्स जो खोले हुए हैं इजराइल ने तो ईरान क्योंकि इस वॉर में फ्रेश है। 12 दिन की जंग हुई। उसने उससे बहुत कुछ सीखा और उसके बाद और अपने आप को तैयार किया। बिकॉज़ ईरान न्यू कि ये दे आर गोइंग टू कम बैक एंड कम बैक विद मोर पावर। और लोगों का वहां ये कहना है ईरान के जो एक्सपर्ट्स हैं दे आर सेइंग कि हाथों हाथ जो है वो प्रोडक्शन भी बड़े पैमाने पर हो रहा है। क्योंकि वो तैयार कर रहे हैं अपने आप को सालों की जंग के लिए। क्या डू यू डू यू बाय दिस? क्या आपको लगता है कि ईरान ने 40 साल जो अपने आप को तैयार किया है एक तो उनके पास अभी स्टॉक मौजूद है मे बी फॉर फ्यू मंथ्स मे बी फॉर अ ईयर और आगे वो साथ-साथ प्रोडक्शन भी कर रहे हैं बिकॉज़ एक्सपर्ट्स फ्रॉम ईरान आर सेइंग द सेम देखिए एक वो सिनेरियो है एक अगर प्रोडक्शन कैपेसिटी हिट नहीं होती है। अब आप एक चीज देखेंगे कि जितना टाइम बीतता है आपको मोसाद वगैरह को भी पता लगता रहेगा कि कहां-कहां स्टर्ड है। यू सी दैट प्रोसेस इंटेलिजेंस गेम चल रही है साथ-साथ। तो कितनी डेप्थ के अंदर मिसाइल्स आपकी हैं? आपके पास ये बंकर बस्टर बॉम्ब्स होते हैं वो एक खास डेप्थ तक जा सकते हैं। उसके नीचे नहीं जा सकते। इफ यू आर डग इन कंप्लीटली देन यू आर प्रोबब्ली कंप्लीटली सेफ। तो ये सिनेरियोस हैं। इसकी इस वक्त ऑब्जेक्टिवली देखें तो यू आस्क मी आई डोंट नो कि एग्जैक्ट सर्वाइवेबिलिटी कितनी है और कितना क्वांटम है। जो पता है वो है लीडरशिप का। बिकॉज़ आई हैव बीन टू ईरान। आई हैव सीन दोज़ पीपल। मैंने आठ साल तक उन्होंने ईरान इराक वॉर देखी है। वहां पर इमाम कोनी का जो मोजोलियम है उसके पास में एक सिमिट्री है। बहेश ज़हरा करके मैं वहां गया हूं। मीलों तक वो सिमिट्री है। लोग आते हैं। कितने लोग मरे थे वो एट ईयर जो सदाम हुसैन के साथ वॉर हुई थी। सून आफ्टर रेवोल्यूशन 80 टू 88। तो कैपेसिटी अब अगर आप एयरपोर्ट से होटल लेते हैं चांस यह होगा कि आपका टैक्सी ड्राइवर का एक लिंब नहीं होगा या कुछ ऐसी प्रॉब्लम होगी क्योंकि वो तब की बात है उसके जो असर आज तक दिखते हैं। सो दे हैव दे नो सफरिंग और वो फिर शिया डॉक्ट्रिन में चली जाती है। सो वी नो दैट। तो कैपेसिटी ऑफ़ ईरानियन लीडरशिप टू विस्टैंड उसमें कोई शक नहीं है। राइट? और अब बल्कि अगर हम देखें तो आईआरजीसी के जो कंप्लीट बैटल हार्टनर लोग हैं दे आर एट द हेल्म ऑफ अफेयर्स। तो कैपेसिटी टू टेक सफरिंग टू टेक सेटबक्स गो बैक और तैयारी यह सब बिल्कुल रिजीम वाज़ मेंट फॉर सर्वाइवल फर्स्ट क्योंकि वो एक्सपीरियंस ऐसा रहा है उसमें शक नहीं है। जो एक दूसरी बात थी जो इजराइल और अमेरिकनंस की एजमशन थी कि भ आप डीकपिटेशन स्ट्राइक करोगे या आयतुल्लाह खामिनी को हटाओगे तो पॉपुलर रिवोल्ट हो जाएगा। दैट इज़ अ कंप्लीट मिथ। क्योंकि मैं जब खुद वहां जाता था, बहुत से लोग जो थे वो खफा थे रिजीम से। लॉट ऑफ़ वुमेन वर अनहै। नॉट इन जो जिस तरह से दिखाया जाता है वेस्टर्न मीडिया में बिकॉज़ वुमेन की एंप्लॉयमेंट बहुत है ईरान में। अगर आप किसी होटल में जाते हैं तो रिसेप्शन पे आपको दिखेंगी औरतें खातून वहां पर क्योंकि सिर्फ एक हेड्ाफ होगा। बाकी दे आर फंक्शनिंग। ड्राइविंग वो कर रही हैं। अब डॉक्टर्स, नर्सेज वगैरह में वुमेन आर ऑल ओवर। यह सऊदी अरेबिया वाला वो वो मॉडल रहा ही नहीं है। लेकिन ऑफ कोर्स एक ड्रेस कोड है जिसके अगेंस्ट रिजेंटमेंट वगैरह रही है। लेकिन वो क्रिटिकल रिेंडनमेंट नहीं है कि रिजम को ही हटा दो। दे वांट रिफॉर्म्स विद इन द सिस्टम। दे डोंट वांट टू थ्रो आउट द सिस्टम। और वही हुआ है। अब अब क्या हुआ है कि सारी पपुलेशन जो जो नाराज भी थी हार्ड लाइनर्स के साथ वो सब जुड़ गई है। दे आर कंसोलिडेट। सो लीडरशिप इज़ वन पीपल आर वन जज्बा है, आईडियोलॉजी है, डॉक्ट्रिन है और मिलिट्री प्रिपरेशन है। हाउ कैन यू डिफिट देम? तो इसलिए अब सिर्फ एक एलिमेंट है लास्टिंग पावर। वेपनरी कितनी है? प्रिपेयर किया है आपने बट दूसरे आपको इजराइली को हल्के में नहीं लेना है। दे आर आल्सो लुकिंग एट कहां पर आपके पॉइंट्स ऑफ वनरेबिलिटी है। आपकी उस तरह से नेवी नहीं है। बट यू आर यू आर प्रिपयर्ड फॉर अ एसिमिट्रिकल वॉरफेयर। अब गोरिल्ला वॉरफेयर हमने देखी है चाइना में चेयरमैन माओ वगैरह के टाइम पे एक वो फज़ था। ये अलग तरह की गोरिल्ला वॉरफेयर है। इट्स अ वेरी हाइब्रिड वॉर। अब ये 21 सेंचुरी की एक तरह से गोरिल्ला वॉरफेयर है जिसमें ईरान का मॉडल जो है वो सामने आ रहा है। इट्स वेरी इंटरेस्टिंग एज अ ऑब्जर्वर ऑफ़ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स एस वेल कि ये किस तरफ जाएगी लेकिन कमिंग बैक देयर आर सम एरियाज वी डोंट नो लेकिन ओवरऑल द कार्ड्स आर विद ईरान एंड इट इज़ ऑन अ डोमिनेंट पोजीशन। जी यह बिल्कुल यह एक्सपर्ट्स भी कह रहे हैं और जैसा आप भी कह रहे हैं कि एसिमिट्रिकल जो वॉर है उसका एक तरह से मॉडल पूरी दुनिया को ईरान ने दिया है कि कैसे जो वर्ल्ड पावर्स हैं जिनके आगे ज्यादातर जो पावर्स हैं वो एक तरह से सरेंडर करती हुई नजर आती थी उसको एक ऐसी कंट्री ने जिसके ऊपर 40 साल से सेंशंस लगे जिसका बिल्कुल कट ऑफ दूसरे तमाम हम कहें कि दुनिया से रहा और एक उन्होंने अपना एक निजाम एक सिस्टम उन्होंने पूरा क्रिएट किया और वो दुनिया को बता रहे हैं कि देखिए वो सिस्टम कितना कितना कामयाब है और किस तरह से उन वर्ल्ड पावर से वो लड़ते हुए नजर आ रहे हैं जो जब 28 फरवरी को वॉर शुरू हुई थी और एक महीने के बाद द सिनेरियो द पर्सपेक्टिव द नैरेटिव अराउंड ईरान हैज़ कंप्लीटली चेंज्ड और ये वो एक्सपर्ट्स हैं जो अमेरिका में बैठे हुए हैं जो जो ये सब बातें जो है वो कहते हुए नजर आ रहे हैं। मेरा सवाल आपसे ये है अतुल जी कि क्या अभी आपको क्या लग रहा है कि ईरान के पास तरकश में और कितने तीर बाकी हैं? क्योंकि आप देखें कि अगर स्टेट ऑफ हार्मूस की बात करें उन्होंने कंप्लीट कंट्रोल कर रखा है। वो जिस तरह से जीसीसी में स्ट्रेटेजिकली जो अटैक कर रहे हैं वो भी उनके बहुत कामयाब हैं। इजराइल में जो अटैक किए जा रहे हैं वो भी बहुत कामयाब होते हुए नजर आ रहे हैं। क्या आपको लगता है बाबल मंदब के अलावा और भी बहुत सारी चीजें हैं जैसे कहा जा रहा है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस में जो केबल्स बिछी हुई हैं अगर वहां पर माइंस लगा दी तो पूरी दुनिया का 25% ऑफ़ द इंटरनेट विल सफर। तो अभी आपको क्या लग रहा है कि इस वॉर में और कौन सी ऐसी हिडन या तरकश में और कितने तीर हैं ईरान के जो बाकी हैं व्हिच द वर्ल्ड डस नॉट नो? नहीं दे नो बट दे हैव नॉट बीन एक्ससाइज्ड। देखिए केबल्स वगैरह की बात पता है। प्रॉब्लम फूड सिक्योरिटी की बहुत बड़ी आएगी क्योंकि फर्टिलाइजर का जो सामान है, केमिकल्स है वो स्टेट ऑफ हॉर्मोस से जाते हैं। सो अराउंड सितंबर अक्टूबर उसकी फूड सिक्योरिटी आएगी। हीलियम जाती है। हीलियम किसमें यूज़ होगी? एआई प्रोडक्ट्स में, फार्मासटिकल्स में दवाइयों की प्रॉब्लम शुरू हो जाएगी क्योंकि बहुत सारा यहां से जा रहा है। तो यह तो बाकी और एक ऑप्शन क्या है? मुझे लगता है इरानियंस हेसिटेट करेंगे। हालांकि दैट इज द अल्टीमेट इफ अगर एकिस्टेंशियल इशू आता है तब आता है डिसलनाइजेशन प्लांट्स। पानी का इशू। अब अगर हम देखें गल्फ से जो एक बड़ी पाइप लाइन जा रही है 500 किलोमीटर की सऊदी अरेबिया की वाटर पाइप लाइन ईस्ट कोस्ट से जा रही है परशियन गल्फ के कोस्ट से अगर आप उसको हिट करते हैं और डेजर्ट एरिया है देन सर्वाइवल विल बी डिफिकल्ट उसी तरह से कुवैत में है उसी तरह से यूएई में है सब रेंज में है ईरान के जो ट्रंप अब धमकी दे रहे हैं ना विल ऑब्लिटरेट विल बी अ मैसिव अटैक ऑन यू वो यह तभी एक्सरसाइज होगी यह ऑप्शन अगर आप ईरान के जैसे तेल के भंडार यू गॉट दिस गैस वेल्स यू नो ऑस्ट्रेलिया ये साउथ पार्स वगैरह अगर इसको आपने एक तरह से अटैक किया या ईरान के चश्म आइलैंड के ऊपर भी डिसेनालाइजेशन प्लांट्स हैं। अगर ईरान के सर्वाइवल के लिए आपने किया। अब अगर पैटर्न देखें बुशरा जी तो ईरान पहल नहीं कर रहा लेकिन वो आई फॉर आई पे भी है कि जैसे ही आप अटैक करोगे मैं काउंटर अटैक करूंगा तो ये मोरल जस्टिफिकेशन से हो रहा है राइट तो लेकिन अगर ईरान के पावर प्लांट्स ऑयल वेल्स डिसेनालाइजेशन प्लांट्स क्रिटिकल इंफ्रास्ट्र अल्ट्रा क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पे अटैक होता है तो एक जो तरकश में तीर है वह डिसेइजेशन प्लांट्स का है। यू माइग्रेशंस यू कैन इमेजिन क्या उससे हाहाकार मच सकती है अगर वो उस लेवल पे गए तो वो एक है। आई हैव स्टडीड ईरानियन न्यूक्लियर प्रोग्राम एंड आई एम 100% श्योर इनके पास न्यूक्लियर कैपेबिलिटी है लेकिन बॉम्ब नहीं है। सो वो ऑप्शन नहीं है ईरान के पास। यह प्रॉब्लम आती है एक्सिस्ट्रेशन अगर इजराइल इस पर पहल करने की कोशिश करता है देन व्हाट व्हाट विल ईरान डू और वो उस लेवल ऑफ एस्केलेशन पे हम बुशा जी अभी गए नहीं है बट व्हाट आई फियर इज दैट न्यूक्लियर एलिमेंट कमिंग इन और अगर आता है या उसके अंदे आते हैं फिर रूस चीन न्यूक्लियर वेपन पार्ट्स ये क्या करेंगे विल दे अलाउ इट टू हैपन और विल देयर बी अ न्यूक्लियर अम्ब्रेला गिवेन टू ईरान वायरस वो एक सिनेरियो इस फार अवे मे नॉट इवन कम लेकिन अगर हम उसको एंड तक सोें फाइनल एनालिसिस में ग्रेजुएटेड रिस्पांस एक तरह से स्टेप बाय स्टेप एस्केलेशन लेडर पे जाए तो उस लैडर के ऊपर भी मुझे लगता है कि देन वी हैव टू लुक एट द ट्रैक बिटवीन ईरान एंड रशिया कि उधर क्या हो रहा है। चाइना नहीं आएगा बीच में। आई नो चाइनीस। चाइनीस विल आप उसको सपोर्ट करेंगे, मशीनरी दे देंगे, वह सब कर देंगे। लेकिन अपने ट्रूप्स ऑन द ग्राउंड या इस तरह का काम ये रशिया कर सकता है। ये चाइना नहीं करेगा। चाइना बैकअप कर सकता है। रशिया को पीछे से सपोर्ट कर सकता है। बट फ्रंट पे नहीं आएगा। यह वो कैरेक्टर है और वो उनकी अपनी प्लान्स हैं। उनको ताइवान आऊंगी लेकिन आपने इंटरेस्टिंग बात जो आपने कही है रश और और चाइना की जो आपने बात कही है क्योंकि आप चाइना में छ साल आप रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि इन एंड आउट यू नो हाउ दे ऑपरेट और क्या उनका इस पूरी वॉर में क्या उनकी स्ट्रेटजी हो सकती है। मैं न्यूक्लियर पे आऊंगी क्योंकि जिस तरह से यूएन के एक डिप्लोमेट ने रेिग्नेशन दिया है उसके बारे में बात हो रही है। तो दैट इज वेरीेंट एंड आई विल कम टू दैट पॉइंट बट मैं पहले रशिया और चाइना की बात करना चाहती हूं। अ जब भी ईरान की बात हो रही है उसमें लोग एक सांस में चाइना और और रशिया का भी नाम ले रहे हैं। क्या वाकई में वो इतने इंपॉर्टेंट प्लेयर अभी साबित हो रहे हैं ईरान के साथ? क्या वाकई में जो प्रिसाइज प्रसिशन से जिस तरह से अटैक ईरान कर रहा है। क्या आपको लग रहा है कि चाइना की बैकिंग है? क्या एमुनेशन वेपन्स क्या रशिया प्रोवाइड कर रहा है? व्हाट व्हाट डू यू थिंक अबाउट रशिया एंड चाइना इन दिस वॉर? या फिर ईरान को एक तरह से कम आंकते हुए उनको जब एक्सपर्ट्स बात करते हैं क्या ज्यादा उनको हाई पडिस्टल पर रखते हैं? ओके लेट्स से वन बाय वन। हम देखते हैं चाइना की बात। अब चाइना और ईरान का रिलेशनशिप सेंशंस में क्या था? देखिए प्रॉब्लम थी चाइनीस कंपनीज़ को क्योंकि अमेरिका सेकेंडरी सेंशंस लगा सकता था। तो खुलेआम इतनी चाइनीस इन्वेस्टमेंट गई नहीं है ईरान के अंदर। प्रोक्योरमेंट ऑफ ऑयल हुआ है। क्रूड के रिजर्व्स जो उनके भंडार हैं उसको चाइना ने खरीदा है बहुत बड़े पैमाने पे। बट इन्वेस्टमेंट इतनी नहीं गई चाइनीज़ इन्वेस्टमेंट। बिकॉज़ चाइनीज़ वर स्केर्ड यार अगर हम इनको यहां इन्वेस्ट करते हैं और फिर अमेरिका पे नहीं कर सकते इन्वेस्ट तो हमको इस वक्त अमेरिका को नाराज नहीं करना है ईरान के कारण। तो वो इन्वेस्टमेंट कम लेकिन बड़ी क्रिटिकल एरियाज में गई हैं। एक तो है आपका जो फाइबर ऑप्टिक केबल है जिससे सारा इंटरनेट चल रहा है वहां का वो Huawei को मिला था। कंट्री वाइड Huawei ने वहां लगा दिया। ये जंग से पहले दूसरा उनकी एक और कंपनी है ZTE स्विच बोर्ड राउटर्स जो भी इलेक्ट्रॉनिक हार्डवेयर में ZT और इन्होंने दोनों ने काम किया। जो प्रिपरेशन फेस था एक तरह से वो ओपनली किया। फिर है कुछ कंपनीज़ अगर आप देखेंगे हांगकांग में और शजन में शजन इज देयर हाईटेक कैपिटल इन अ वे ट्रेडिंग कंपनीज़ हैं। राइट? उनके नाम मैंने पर्सनल रिसर्च कर रहा था। तो काफी वो इंटरेस्टिंग नाम निकले। इस वक्त मेरे पास नहीं है। आई रेड इट आउट टू यू। तो ये कंपनीज़ ने क्या किया है? इन्होंने बहुत सारे जो कन्वेंशनल चिप्स होते हैं ना वो इंपोर्ट किए हैं अमेरिका से और फिर जो है उनको एक्सपोर्ट कर दिया है ईरान। अब ईरान ने उसका कैसे इस्तेमाल किया? अपनी मिसाइल्स में किया, ड्रोंस में किया, कैसे किया? वी डोंट नो दैट प्राइस सस्पेक्ट वो उस तरह से किया होगा। फिर एक बहुत दिलचस्प तरीका है। यू नो सेंशंस जब आप पे लगती हैं तो आप आप अलग-अलग तरीके सर्वाइवल के निकालते हैं। आप सिंपल चीज़ है लैपटॉप्स। लैपटॉप्स में बहुत सारे चिप्स जाते हैं। अब लैपटॉप्स के एक्सपोर्ट के ऊपर कोई बैन नहीं है। तो एक तरह से चाइना से बहुत सारे लैपटॉप एक्सपोर्ट हुए हैं। ईरान अब ईरान ने उसमें कैनबुलाइज करके निकाले हैं और जो अपने ड्रोंस और उसमें यू कांट रूल दैट आउट। तो डायरेक्टली चाइना की सपोर्ट वैसे नहीं रही है बट इनडायरेक्टली यह रहा है। तीसरी बात है कि बेडू सेटेलाइट सिस्टम है। जैसे हमारा जीपीएस है अगर आप कार चलाते हैं तो आपको Google मैप्स मिलते हैं। वैसे बेडू एक सिस्टम है चाइनीस का। आई डोंट नो ये रिपोर्ट्स में देखा है कि बेडूस नेविगेशन सिस्टम जो है वो वो हेल्प कर रहा है ईरानियंस को। पॉसिबल इट्स पॉसिबल कि चाइनीस की उस तरह से सपोर्ट है व्हिच विल कंटिन्यू आप अनलेस उनकी सेटाइट मार गिराएंगे तब तक वो सेटाइट काम करेगी और इनको वो इंफॉर्मेशन मिलती रहेगी लोकेशनल इन कौन सी चीज कहां है ये चाइनीस कैरेक्टर में है लेकिन बूट्स ऑन द ग्राउंड या हथियार दे देना ये नहीं करेंगे चाइनीस सो दैट इंड बट इट्सेंट चाइनीस रोल रशियन रोल रशिया और ईरान के बीच में ऑलरेडी एक समझौता हो चुका है डिफेंस एक्ट इट इट इज नॉट लाइक जैसे सऊदी और पाकिस्तान में हो गया कि आपने ट्रूप फेल हो गए बट एक फ्रेमवर्क एग्रीमेंट है जिसके अंदर S300 मिसाइल्स गई है। S400 भी जा शायद गई हैं। हार्ड टू कंफर्म बट शायद गई है। बिकॉज़ है जो एयरक्राफ्ट हैं हैवी लिफ्ट एयरक्राफ्ट जिसको कहते हैं जिसमें आप सामान पहुंचा सकते हैं। उनकी लैंडिंग्स हुई है ईरान के अंदर। सो रशियन सपोर्ट हैज़ बीन देयर। इट हैज़ बीन मटेरियल सपोर्ट और वो पहले से वो पिछले साल की अटैक्स के पहले के वो डेटर करने के लिए अटैक्स के लिए वो वो समझौते हुए हैं। अब स्थिति आती है जी व्हिच वी गो टू द नेक्स्ट लेवल। ईरान भी बड़ा प्राउड कंट्री है। यू नो दे विल नॉट से कि भ आप हमें प्रोटेक्शन दो। यह एक खासियत वहां की है कि वो और रशिया के साथ भी दे गो बैक टू द हिस्ट्री जब वर्ल्ड वॉर टू में 1942 में स्टिन की फर्सेस ईरान में घुसी थी एज अ विद अलाइड ट्रूप्स तो वो उनकी मेमोरी ईरानियन की मेमोरी में है वो सोवियत यूनियन का वो फज़ 40ज का दे डोंट फॉरगेट थिंग्स ईजीली लेकिन अब बात और स्थिति पे आती है अगर इंटेलिजेंस मिलती है यह शायद ईरान को ना मिले और शायद प्रेशंस को मिले क्योंकि कैपेबिलिटी ज्यादा है कि भ इजराइल जो है न्यूक्लियर ऑप्शन की तरफ जा रहा है बिकॉज़ दे आर डेस्पेट एवरीथिंग इज गॉन नाउ और सेकंड स्ट्राइक हो नहीं पाएगी ईरान के पास है नहीं तो स्ट्राइक करने के टाइम पे है आई थिंक दैट्स अ टाइम व्हेन रशियंस एंड ईरानियंस विल कम इन रशियंस विल कम टू सपोर्ट ऑफ़ ईरान के मैं आपको न्यूक्लियर अंब्रेला देता हूं और ये अमेरिकनंस को बता दिया जाएगा कि अगर स्ट्राइक हुई तो काउंटर स्ट्राइक हम करेंगे। फिर लिटिल डिफिकल्ट फॉर रश टू डू इट आल्सो बिकॉज़ एक और कॉम्प्लेक्सिटी है कि रशियन जूस बहुत सारे चले गए हैं 80 लेट 80 में बहुत सारी लोग रशिया से जस्ट बिफोर द कोलैप्स सोवियत यूनियन वो वहां गए हैं। सो दे वांट टू डू अ स्ट्राइक लाइक दैट। ये ये हम बात कर रहे हैं अल्ट्रा एक्सट्रीम सरकमस्ट्ससेस। लेकिन ईरान को बचाना शायद उस अब कॉस्ट बेनिफिट देखते हैं। वो बहुत जरूरी है। क्योंकि ईरान अगर गिर गया यहां रिजीम चेंज हो गई फिर रशिया एक्सपोज होता है। पूरा यूरेशिया एक्सपोज हो जाता है। फिर रिजीम चेंज का जो जो कैरा है जो शुरू हुआ युगोस्लाविया से गया मिडिल ईस्ट में और अब सीरिया और फिर ईरान वो जाएगा चीन और रूस के डायरेक्शन में ही। सो दे डोंट वांट ईरान टू फॉल। इट इज़ देयर फर्स्ट डिफेंस लाइन। तो इंटरेस्टिंग। सो देयर फॉर द रशियंस हैव अ स्ट्रेटेजिक मोटिवेशन टू सपोर्ट इरान। ऑलरेडी सीरिया गिर गया है। जो फर्स्ट डिफेंस लाइन थी वो सेकंड डिफेंस लाइन पे आ गए हैं। इसको वो छोड़ेंगे नहीं। इसलिए जो है जो लोग कहते हैं कि रशियंस कुछ नहीं करेंगे। मैं उनसे डिफर करता हूं। मुझे लगता है कि ये रशिया के लिए भी क्रिटिकल है। ये ईरान में रिजीम सर्वाइवल। एंड देयर फॉर दे विल गो ऑल आउट। और अगर वहां पर न्यूक्लियर डायमेंशन आता है सो आई विल नॉट बी सरप्राइज इन रशियन एक्ट एंड डेटर दैट गैप आएगा डेटर के बाद यूजेज आता है डेटर पे ही रुक जाएगी बात लेकिन वो वो साइकिल शुरू हो सकता है पहल ईरान से नहीं होगी पहल ईरान इजराइल से होगी जो शुरू में हमने बात की या तो इजराइल में पॉज आएगा ये सोचेंगे ट्रंप के साथ मिलके यार अभी हम नहीं करते क्वाइट पॉसिबल या एक वो मेसियानिक वाली आईडियोलॉजी लेके भी दी आर रेंट टाइम्स क्योंकि वो भी बड़ी खतरनाक आईडियोलॉजी चल रही है और दोनों तरफ चल रही है कि भ नाउ इट इज द एंड ऑफ़ द वर्ल्ड फिर दो मसीहा का आना यहां पर शिया 12 स्कूल का आ जाता है ईरान में कि हिडन इमामल का वो वहां पर इजराइल में यही चीज है कि उनको अब यू नो द सेकंड कमिंग ऑफ आई एम फॉरगेटिंग द नेम यशोवा और सम नेम दे हैव इट तो ये सारा कुछ फिर देन यू गो इंटू अ वेरी डिफरेंट काइंड ऑफ अ फेस एंड फिर आपका न्यूक्लियर वगैरह आ जाता है। बट रैशनली आई डोंट थिंक दैट शुड बी द काइंड ऑफ़ अ सिचुएशन वी विल रीच। सो बहुत इंटरेस्टिंग जाहिर सी बात है ये पूरा जो आपने सिनेरियो बताया है। मेरा सवाल अब ये है अतुल जी अब आपसे कि हम जब इस इस सारे सिनेरियो की जब हम बात कर रहे हैं और जब हम न्यूक्लियर अटैक की बात कर रहे हैं जाहिर सी बात है कि वो आखिरी स्टेप होगा। लेकिन अगर मोहम्मद सफा जैसे जो कि यूएन में काम कर रहे हैं डिप्लोमेट अगर वो रिजाइन करें वो पेपर उसको लीक करें और वो ये कहें कि यूएन इसके लिए प्रिपेयर कर रहा है तो कितना डेंजरस आप इसको मानते हैं क्योंकि क्या आपको लग रहा है कि एक तरफ तो ये दिखाया जा रहा है कि दो-तीन दिन में हम वॉर को खत्म कर रहे हैं। बट अदरवाइज वो बूट्स ऑन ग्राउंड की भी तैयारी कर रहे हैं। लगातार अपने ट्रूप्स वहां पर भेज रहे हैं। एंड आल्सो फ्रस्ट्रेशन में या लास्ट रिसोर्ट के तौर पर दे आर आल्सो थिंकिंग अ बारार अबाउट यूजिंग द टेिकल न्यू न्यूक्लियर वेपंस। क्या आपको ये लग रहा है कि ये एक लास्ट रिसोर्ट हो सकता है? क्योंकि जैसा आप कह रहे थे कि इजराइल भी इसको उसी तरह से सोच रहा है कि ढाई साल से ज्यादा जो गजा में उसने किया। लेबनान और सीरिया में उसने मोर्चा खोला ही हुआ है। बड़े पैमाने पर नुकसान उसका इजराइल में हो ही गया है। ईरान में उसने एक महीने से ज्यादा से वो लड़ रहा है। अब उसको लग रहा है कि दिस इस गोइंग टू बी द फाइनल वॉर जो उसका वो है थर्ड टेंपल के बारे में जो बात करता है या फिर जो ग्रेटर इसराइल के बारे में वो बात करता है। क्या आपको लग रहा है कि दिस वॉर कैन गो टुवर्ड्स दैट टू? देखिए इन टर्म्स ऑफ़ प्लानिंग इट इट आई एम श्योर दे फ्रॉम द इजराइली साइड वो चली गई होगी। ठीक है? और उसके अंदर आईडियोलॉजी हम फ्यूज करके देखते हैं जो व्हाई सो व्हाई इट कैन बी लेजिडमाइज्ड वो बात भी हो रही है। जी लेकिन इसमें एक बड़ी एजम्पशन है उषा जी एजम्पशन ये है कि काउंटर स्ट्राइक हम पे नहीं होगी। राइट? और काउंटर स्ट्राइक क्यों नहीं होगी? बिकॉज़ इजराइल को पूरी तरह से पता है कि ईरान के पास बम नहीं है। नाउ डिलीवरी सिस्टम मे बी 2000 कि.मी. की मिसाइल्स हैं। सो डिलीवरी सिस्टम मे बी बट द मेन वॉर हेड इज़ नॉट देयर। और ये पूरी तरह से ये जो एनरचमेंट हुई है उसके रीज़न मैं आपको बता रहा हूं वेरी क्विकली कि 2007 में नेशनल इंटेलिजेंस एस्टीमेट्स आए थे यूएस की तरफ से। इट्स अ कंपाइलेशन ऑफ रिपोर्ट्स। सारी इंटेलिजेंस एजेंसीज एकजुट होके एक फाइनल डॉक्यूमेंट बनाती है। दी आर कॉल्ड नेशनल इंटेलिजेंस एस्टीमेट्स। 2007 की बात है। जब उनका आया था एनआई की रिपोर्ट वो ये थी कि 2003 में ईरान ने अपना जो न्यूक्लियर एलिमेंट था ना न्यूक्लियर बॉम्ब एलिमेंट बंद कर दिया था। 2003 इज़ेंट बिकॉज़ 2003 में सद्दाम हुसैन की रिजीम टॉपल हो गई। इसलिए तब उसके बाद ईरान को कोई खतरा नहीं रहा और इसलिए तब से वो न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम खत्म और वो सिविलियन न्यूक्लियर प्रोग्राम की तरफ थे। उसके बाद जो है आयतुल्ला खामिनी का ये फतवा आया और वो रिलीजियस टर्म में कहा गया कि हम न्यूक्लियर कैपेबिलिटी होगी पावर प्रोड्यूस कर सकते हैं। लेकिन बॉम्ब या अटैक नहीं करेंगे। तो ये रिस्ट्रेंट्स रहे हैं। इजराइल नोस दिस। अब अगर इसके घटनाक्रम के बाद बदले विद आईआरजीसी कमिंग एंड वो पॉसिबिलिटी है उसको मैं रूल आउट नहीं करता एंड खामिना इज़ नॉट इन द इक्वेशन अब ह सन मुस्तफा खामिनी उनकी क्या मंशा है आईआरजीसी की क्या है वी डोंट नो दैट एट्स इंप्रे लेकिन आई विल नॉट बी सरप्राइज अब ईरान को अगर न्यूक्लियर प्रोग्राम को आफ्टर दिस वॉर रिवाइव करे वेपन प्रोग्राम को लेकिन अभी तक नहीं है इसलिए इजराइल को यह है कि अगर आप अटैक करते हो तो काउंटर स्ट्राइक नहीं होगी। इसमें सिर्फ एक प्रॉब्लम आ सकती है और वो हमने अभी थोड़ी देर पहले बात की। इसमें आएगी रशिया की इशू और अगर ईरान में तबाह होता है देन इट्स अ ह्यूज इशू फॉर रश वो नहीं अफोर्ड कर सकता। ब्रजिंस्की ने एक किताब लिखी थी ग्रैंड चेसबोर्ड अमेजिंग बुक। उसने पिवटल स्टेट्स की कुछ बात की थी और दो पिवटल स्टेट्स की बात जो बहुत इंपॉर्टेंट है। एक ईरान क्योंकि उसकी जग्राफी की वजह से और दूसरा यूक्रेन। पिवेटल स्टेट्स के ऊपर आपका कंट्रोल बहुत जरूरी है फ्रॉम ए ग्लोबल पर्सपेक्टिव। तो ये चीज रशिया भी जानता है। और ईरान की ज्योग्राफी जो है वो वो वो बिल्कुल साथ में है। यूरेशिया की हार्टलैंड के साथ में ईरान जा रहा है। राइट? इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जो है वो रशिया के बाद इट कम्स कैस्पियन सी वो पार करके फिर ईरान बंदरबाज़ एंड देन यू आर देयर टुवर्ड्स मुंबई ये इसलिए प्रॉक्सिमिटी बहुत ज्यादा है रशिया की वहां से तो मुझे नहीं लगता कि ये कामयाब होगा लेकिन इसके पीछे प्लानिंग हो सकती है वेरी मच सो जो रेजिग्नेशन आया है दैट्स द फर्स्ट बिग रेड फ्लैग वी हैव के ऐसी कोई सोच चल रही है बट इट्स गुड के ये सामने आ रही है बात बिकॉज़ यू कैन नॉट अफोर्ड अ न्यूक्लियर वॉर ये अब होल वर्ल्ड हैज़ टू अंडरस्टैंड क्योंकि यह वॉर लोकलाइज़ वॉर है ही नहीं। इसका जो इकोनॉमिक डायमेंशन है ग्लोबल है और अगर इसमें न्यूक्लियर एलिमेंट आ रहा है तो सिक्योरिटी वाइज भी ग्लोबल है। सो द वर्ल्ड कैन नॉट इग्नोर दिस वॉर। इसीलिए ये वियतनाम वॉर से ज्यादा इसके जो इंप्लिकेशंस है इस इस वॉर के इट्स इट्स इट्स मैसिव ये जो हो रहा है। टू थ्री टू थ्री मोर क्वेश्चंस। क्योंकि बहुत इंटरेस्टिंग ये पूरी कन्वर्सेशन चल रही है। मेरा आपसे सवाल ये है कि जब हम न्यूक्लियर वेपन की बात करते हैं तो मैं कुछ एक्सपर्ट्स को सुन रही थी। उनका ये कहना था कि पहले अमेरिका ट्रूप्स ऑन ग्राउंड भेजेगा। वहां पर ऑफकोर्स ब्लड बाथ और प्रिजनर्स जो है वो बनाए जाएंगे। उसके बाद एक सिंपैथी गेन करने के लिए वो अपने कुछ सोल्जर्स को कुर्बान करने के लिए तैयार हैं और पहले भी ऐसा किया जा चुका है और उन्होंने ये कहा कि इस तरह से एक सिंपैथी जो है जो अभी ज्यादातर पपुलेशन अमेरिका की अगेंस्ट दिस वॉर है और हमने देखा कि नो किंग्स जो जिस तरह की रैली निकली एक करोड़ के करीब लोग बाहर थे तो वो एक सिंपैथी होगी कि देखिए इन इतना होस्टेजेस जो है बना लिया गया है। इतने लोग इतने सोल्जर्स मर गए हैं। नाउ वी हैव टू प्रोटेक्ट आवरसेल्फ। अब हमें ईरान को खत्म करना है तो वो इस ये सारा एक ग्राउंड बनाकर न्यूक्लियर अटैक कर सकते हैं। डू यू बाय दिस फैक्ट? क्या आपको लगता है कि ऐसा हो सकता है और क्या और फिर जो 200 बिलियन डॉलर जो चाह रहे हैं कि कि मिले डोनल्ड ट्रंप को कांग्रेस से क्या आपको लग रहा है कि इस सब के थ्रू ये सारी प्लानिंग जो है वो की जा रही है? देखिए ये थ्योरेटिकल पॉसिबिलिटी डेफिनेटली है। हम जो आपने कहा कि आप ट्रूप्स ऑन द ग्राउंड आपको पता है अमेरिकनंस नो कि ब्लड बाथ होगा बॉडी बैग्स जाएंगे जब वो जाएंगे या नहीं भी जाएंगे हाउ टू रिट्रीव द बॉडीज वो एक अलग मसला है तो वो जो जब इस तरह का होगा तो आपके जो नेशनल सेंटीमेंट्स हैं वो राइज होंगे अराउ होंगे उसका क्या किधर हाउ वेयर विल दैट गो वो जो वियटना वॉर में हुआ था ना ड्राफ्ट कंपलसरी मिलिट्री सर्विस दैट वाज़ अ क्रिटिकल मोमेंट आप इस नेशनलिस्ट पेट्रियोटिक फीलिंग में ड्राफ्ट करेंगे और फिर उसके बाद भर्ती करना शुरू करेंगे। देन वी आर इंटू अ न्यू ज़ोन। फिर वो एंडलेस वॉर की तरफ वो चला जाता है। उसमें न्यूक्लियर करने की जरूरत नहीं होगी। एक कन्वेंशनल वॉर बिटवीन अमेरिकनंस एंड एंड एंड ईरानियंस और वो एक नया साइकिल एक शुरू होता है। इसमें लेकिन बड़ी प्रॉब्लम क्या है? अब आइडियोलॉजिकली ट्रंप को जिताया किसने था? मेगा बेस मेक अमेरिका ग्रेट अगेन बेस इज टोटली अपोज्ड टू एनी अदर वॉर। यह उसके लिए भी क्योंकि उनको पता है कि इकोनॉमिक डिक्लाइन जो अमेरिका का हुआ है वो एंडलेस वॉार इज़ अ मेजर कंट्रीब्यूटरी फैक्टर और वो भी तगड़ा बेस है, स्ट्रांग बेस है। बल्कि इंटरेस्टिंग बात ये होगी कि मुझे लगता है कि ये अब इंटरनल डायनामिक्स जो चल रहा है अमेरिका के अंदर कि भ ट्रंप इज फिनिश्ड। नया मेगा को एक नया चेहरा चाहिए बल्कि एलेक्स जॉनस जैसे जो जिनका चैनल चलता है इनफो वॉर्स हार्ड कोर पिछले 10 साल से ट्रंप को सपोर्ट कर रहे हैं। कल की अपनी ब्रॉडकास्ट पे एलेक्स जॉन सेस ट्रंप इज फिनिश्ड ही टेक्स अ क्लोज अप व्यू ऑफ हिज फीट स्वेलिंग है एंकल्स के ऊपर ही सेज़ ही गॉट हार्ट हार्ट प्रॉब्लम एंड ही इज़ ही इज़ बैबलिंग ही इज़ लॉस्ट एट हज़ अपपर स्टोरी इज़ नॉट फंक्शनिंग एलेक्स जों्स हार्ड कोर मेगा सपोर्टर्स में से एक है। तो वो एक एंटी ट्रंप सेंटीमेंट ऑलरेडी जाग चुका है। तो अगर ऐसी स्थिति अगर यह ड्राफ्ट की तरफ लेके जाएंगे मुझे लगता है कि समबडी फ्रॉम मेगा बेस विल से कि इट्स इनफ ऑफ़ दिस थिंग अह अह इनफ ऑफ़ ट्रंप और फिर जे डी वैन्स मोस्ट प्रोबब्ली जेडी वैन्स को आप बिकॉज़ ही इज़ द मेन नाउ अह रिप्रेजेंटेटिव ट्रंप के बाद उनका ही नाम आ रहा है। उनको बनाओ और एक तरह से फिर एक फ्रेश इलेक्शन होगी। तो मुझे लगता है कि बहुत ज्यादा पॉसिबिलिटी उसकी है कि यह बॉडी बैग्स वाला अपने लोगों को मरवा के और फिर सेंटीमेंट पैदा करके आई थिंक एक और चीज हो गई है। ये वियतनाम वॉर वाली स्थिति नहीं है। ये सोशल मीडिया का ऐज है। यू नो यो इंफॉर्मेशन फ्लो लोगों के पास बहुत आ रहा है। टू पुल इट ऑफ इन 21 सेंचुरी यू नो 2026 में क्योंकि कैरेक्टर ऑफ़ मीडिया हैज़ चेंज। तब टेलीविज़ आया था। यू नो या या वाशिंगटन पोस्ट या न्यूयॉर्क टाइम सब कुछ करते थे। न्यूज़ साइकिल वाज़ वैरी स्लो। अब केस टाइम पे विथ दिस एंड एवरीबॉडी इस टॉकिंग अबाउट दिस। मैं तो एक वो कोई चाइनीस एक प्रोफेसर हैं। वो रोज तकरीर कर रहे हैं। ही इज़ आल्सो टॉकिंग एट द सेम लैंग्वेज कि यार ये इस तरह से होगा। सो अवेयरनेस है लोगों में कि भ ऐसा पॉसिबिलिटी कर सकते हैं कि अपने लोगों को मरवा के। सो बट आई डाउट ये दे कैन पुल इट ऑफ। सो फाइनली वी कम टू द सेम ओल्ड थिंग कि भ इजराइल इज द पिवटन हियर नाउ। वहां पर अगर टूटती है अपनी आपकी विल तब जाके ये खत्म होता है जल्दी। अदरवाइज दे आर ऑल दी बैड ऑ एंड फाइनली जो आपकी कहा ना दैट बिब्लिकल सिनेरियोस जब आ जाते हैं आप एंड टाइम्स की बात करते हैं फिर रिमोटली एक न्यूक्लियर एलिमेंट माइनस ऑल दिस ड्राफ्ट और वो सब वो एक वी हैव टू वॉच आउट फॉर दैट और मुझे लगता है कि हमें थोड़ा और डीपर स्टडी करना चाहिए इस इस जंग के जो आइडियोलॉजिकल मोटिवेशनल एलिमेंट्स हैं कोर यू नो सोल टचिंग जो इस तरह से आईडियोलॉजी होती है उसको स्टडी करने क्योंकि वो फैक्टर इन हो रहे हैं मिलिट्री डॉक्ट्रिंस में और कंडक्ट ऑफ़ द वॉर ये एक ज़ोन है आप देखिए की बात की गई अमगडॉन की बात की गई या फिर फाइनल वॉर की बात की जा रही है मसाया की बात की जा रही है या फिर कि इमाम मेहंदी आएंगे इसकी बात यहां ईरान में इसको करना तो चारों तरफ अगर आप देखें तो कहीं ना कहीं इसको एक रिलीजियस वॉर के तरह से इसको कन्वर्ट करने की कोशिश किया है। या तो दे आर आइडियोल लॉजिकली थिंकिंग लाइक दैट और दे वांट दी यू नो पीपल ऑफ देयर कंट्री टू बी इमोशनली अटैच्ड विथ दिस वॉर। दैट इज ट्रू बिकॉज़ अभी जो इजराइल के अंदर जो चेंज आया है ना दैट इज़ वैरी इंटरेस्टिंग। ये इजराइल वो नहीं है जिसमें रेबिन मोशेदयान हु आर बेसिकली ऐशकनाज़।ज़ यू नो जो जूस आए थे यूरोप वगैरह से। यह कैरेक्टर पूरा ही चेंज हो गया है। नेटियाऊ का जो बेस है लिक्विड का यह अफ्रीका से इन जगहों से लोग आए हैं। पूरी दुनिया से रशियन जूस आए हैं। दिस फिर सेटलर्स आ गए हैं। सेटलर्स आर यू नो जो गाजा में हुआ बहुत सारा सेटलर्स ने किया है। और इजराइयली आर्मी में आ गए हैं। ये सो दिस इज़ अ वेरी डिफरेंट काइंड ऑफ़ इजराइल। यह यह 15 साल पहले या 20 साल पहले वाला इजराइल नहीं है। यह बेंगुरियन वाला इज़राइल नहीं है। वी हैव टू बी वेरी क्लियर कि सिक्स डे वॉर जब हुई थी इजिप्ट टुगेदर। इट्स अ डिफरेंट बॉल गेम ऑल टुगेदर। ये भी एलिमेंट आई थिंक वी नीड टू स्टडी फर्दर कि भ कौन व्हाट काइंड ऑफ़ मेंटालिटी इज़ ड्राइविंग इजराइल? टुडे इज़ इजराइल। नेट याहू के बेस के पीछे लोगों की सोच या आईडियोलॉजी क्या है? एंड फैक्टर दैट इन द एनालिसिस। एक शायद अलग सिनेरियो उसमें फिर हमें नजर आते हैं। बिल्कुल आप जीसीसी इस पूरे सिनेरियो में आप जीसी को कहां देख रहे हैं? जो अमेरिकन बेसिस पर अटैक किया गया कल भी Amazon के ऑफिस पर अटैक किया गया। यह कहा जा रहा है कि जो आईटी कंपनीज़ हैं, उनके ऑफिसिसेस हैं क्योंकि वो वो भी इन वॉर में जो है वो इनवॉल्वड हैं कि उनके उनको अटैक किया जाएगा क्योंकि वो जिस तरह की इन दे रहे हैं प्रिसाइज जिस तरह से लीडर्स की शहादत हो रही है ईरान में वो जाहिर सी बात है जो ये कंपनीज़ हैं उनको इसके लिए जिम्मेदार भी ठहरा रहे हैं। तो 18 कंपनियों की लिस्ट जो उन्होंने जारी की है। जीसीसी को इस पूरे उसमें आप कैसे देख रहे हैं? क्योंकि जो ट्रंप की स्पीच थी उसमें उन्होंने सऊदी अरब का नाम लिया है और बहरीन का नाम लिया है। उन्होंने कहा है कि इनको हम अकेला नहीं छोड़ेंगे। सो व्हाई ओनली दी टू कंट्रीज दे ही हैज़ नेम और दूसरा ये जीसीसी को आप कैसे देख रहे हैं? क्या आपको लग रहा है कि एक तरह से जो हेजिमनी है अमेरिका की वो भी क्या यहां से खत्म होते या बेहद कमजोर होते आप देख रहे हैं बिकॉज़ अमेरिका इज नॉट एबल टू यू नो उनको वो सिक्योरिटी नहीं प्रोवाइड कर पा रहा है और ये बात अलग-अलग तरीके से जीसीसी कंट्रीज की तरफ से कही जा रही है। जीसीसी डिवाइडेड हाउस है। हमको कंट्री बाय कंट्री इसको देखना पड़ेगा। ओके। बरेन की आपने बात की 70% शिया पॉपुलेशन रूल रूलिंग रूल बाय सुन्नी ठीक है एक तो ये फैक्टर है बहुत सी रिजेंटमेंट है बहरेन में मैंने तीन साल बिताए हैं मैं यहां से जब मैंने मिडिल ईस्ट पोस्टिंग की तो मैं तीन साल वहां रहा हूं तो मैंने देखा है कि कितनी ज्यादा वहां पर रिेंडनमेंट है अगेंस्ट द गवर्नमेंट उनकी मिलिट्री सर्विस में शियाज़ कोई नहीं इंक्लूड करते 70% पॉपुलेशन है मिस ट्रस्ट इतना ज्यादा है इट्स लाइक अ मिनी अपार्थाइट स्टेट दूसरा दूसरा फिफ्थ फ्लट हेड क्वटर्स पूरा एरिया के लिए पूरा नियंत्रण जो हो रहा है वो बहरेन से हो रहा है। इसीलिए सबसे पहले के जो अटैक है वो एरिया जुफेर करके एक एरिया है और उसके वहां मिलिट्री बेस है बहुत बड़ा और वो एक नर्व सेंटर है। इसलिए बहरेन उसकी वजह से भी इंपॉर्टेंट है। एक बड़ा थर्ड बड़ा इंटरेस्टिंग एलिमेंट है। अगर आप जाते हैं बहरेन का जो बॉर्डर सऊदी से लगता है कॉजवे बनाया है उन्होंने काफी लंबा आई थिंक अबाउट 15 कि.मी. का कॉजवे है समुंदर के ऊपर जो कनेक्ट कर रहा है सऊदी को और एक तरफ से आप जाते हैं तो सबसे पहले इट्स वै स्ट्रेंज। तो सबसे पहले आप McDonald देखते हैं बारेन से जैसे निकलते हैं और सऊदी साइड पे आते भी सबसे पहले McDonald है। दैट्स दैट्स अ सेपरेट थिंग। बट जो ईस्टर्न एरिया है सऊदी अरेबिया का जो बरेन से लगता है अलखबार तमाम यह ऑयल बेरिंग एरिया एरिया है। यहां पर डोमिनेंट पॉपुलेशन क्या है? शिया पपुलेशन है। इफ बहरेन फॉल्स टू ईरान? विल ईरान देन गो फॉरवर्ड एंड टेक द ईस्टर्न ऑयल ऑयल बेरिंग एरियाज ऑफ़ सऊदी अरेबिया? मतलब सऊदी अरेबिया का एक मेजर भंडार जो है आगे जाकर अरेको की रिफाइनरी वगैरह वो सब आ जाती है वो रियाद याद बट अलकोबा दमाम यहां लोडिंग होती है द शिप्स की और टैंकर्स की एंड यहां पर रिजेंटमेंट रही है ये शिया पपुलेशन की और अब क्या है फिजिकल प्रॉक्सिमिटी कॉजवे के बनने के बाद हो गई है दोनों एरियाज में उदाहरण के तौर पे ये मैं कह रहा हूं कि कई लोग जो है बरेन में नौकरियां करते हैं लेकिन वो शाम को निकल जाते हैं दमाम या अपने घरों पे अलकोबर पे। सो इट्स दैट क्लोज दैट मींस मेजर रिशफल ऑफ द ग्लोबल एनर्जी ऑर्डर अगर बहरेन प्रोटेक्टेड ना रहा ना रहा। राइट ओमान जो है आई थिंक ओमान इज क्वाइट सिंपैथेटिक टू ईरान। तो अगर हम एक पोस्ट वॉर सिनेरियो देखते हैं। मुझे लगता है तीन कंट्रीज। वन इज बहरेन अदर इज कतर ओमान ये ईरान के साथ इनका जाने का ज्यादा है पॉसिबिलिटी इतना से डिवाइड होगी वो एंड हाउ और इराक इज ऑलरेडी श इराक इज अमेजिंग बिकॉज़ इराक में तो वही है इस वक्त क्या हो रहा है बड़ा इंटरेस्टिंग आई थिंक जो स्कूल पे हमने हमला देखा था ना जो शुरू में हुआ था गर्ल्स स्कूल पे वॉर के सेकंड डे पे या फर्स्ट डे पे वो उसकी रिकंस्ट्रक्शन शुरू हो गई है। दोबारा से बनना बनना शुरू हो गया। कौन कर रहा है? ये इराकी आए हैं। बिकॉज़ आयतुल्लाह सिस्तानी जो नजफ में बैठते हैं। ही वाज़ अप्रोच्ड बाय इराकी शियाज़ कि भ हमें वो मदद करनी चाहिए और वेट कर रहे थे ईरान का कि आप आर यू ओके वि दिस? तो वहां से लोग अब जाकर उस स्कूल को रिकंस्ट्रक्ट कर रहे हैं। सो इराक में तो अलग ही यू नो इट्स अ डिफरेंट माइंडसेट। सो इराक इज वेरी वेरीरी क्लोज। और फिर वो शतल अरब वाटर वे है एंड देन यू आर यू आर वहां से। वहां से अमेरिकन ट्रूप्स कंप्लीटली वहां से चले गए। नेटो ने कहा था कि हमने वहां से हम हटा रहे हैं। इससे पहले तो पता भी नहीं था शायद लोगों को कि नेटो के ट्रूप्स भी वहां पर हैं। उन्होंने कहा वो हटा रहे हैं। 24 आवर्स का उन्होंने सीज फायर मांगा अमेरिका ने और जिस तरह से इराक में जो हमला किया गया जो उनकी एंबेसी है वो एंबेसी ने एक तरह का महल आप क्या समझे जो मैंने देखा कि ऐसी भी एंबेसी है कि एक महल की तरह है। और क्या आपको लग रहा है कि वहां से कंप्लीटली क्योंकि ईरान ये ये कह रहा है। ईरान के एक्सपर्ट ये कह रहे हैं कि ईराक हैज़ बिकम द फर्स्ट कंट्री इन जीसीसी और स्पर्शियन गल्फ में जो अमेरिका के पूरे चंगुल से आजाद हुआ है। वो देखिए एंबेसी पे अटैक हुए हैं और बगदाद के साथ जो एयरपोर्ट है जहां पर ये ये रहे हैं अमेरिकन का बेस जो रहा है वहां पर खूब बमबारी हुई है। मोस्ट प्रोबेब्ली अमेरिकनंस हट के वहां से फिर जो होटल्स वगैरह हैं वहां चले जाते हैं। तो हम जो होटल्स के अटैक कहते हैं वो क्यों हो रहे हैं? क्योंकि अमेरिकनंस यहां बेससेस छोड़ के वहां जा रहे हैं। ईरानियंस कह रहे हैं कि यह पहला हो सकता है कि यहां से निकले। दूसरा जो बड़ा बेस है वो वो बगदाद से आपको कोई आई वेंट 6 घंटे का एक ड्राइव है। छ सात घंटे की ड्राइव है बगदाद से वाया नजफ। फिर आप कुर्दिश एरियाज में आ जाते हैं। फिर अर्बिल आ जाते हैं। अर्बिल इज़ अनदर मेजर सेंटर। वहां भी बहुत बड़ी जबरदस्त बमबारी चल रही है ईरानियंस की तरफ से। अब सवाल आता है विल इराक द बी द फर्स्ट जो एक तरह से कोर्ट अनकोट फॉर ईरानियन पर्सेक्टिव के भी लिबरेट हो गया इट्स पॉसिबल और क्योंकि ईरान की इराक की फौज में भी वो पीएमएफ करके एक पैरामिलिट्री ग्रुप है। इट्स पार्ट ऑफ द सिस्टम जो अटैक्स हो रहे हैं ये ग्रुप कर रहा है। सी लेबनीज़ हज़बुल्ला को आपने वीकन किया उधर लेबनन में लेकिन उसी मंशा को लेके यहां पर लोग हैं इराक के अंदर हु आर डूइंग दिस अटैक्स जो फिजिकल वहां पर चल रहे हैं। तो अगर रीजनल की हम शुरू की बात करें कि जीसीसी प्लस इराक तो ये शिफ्टिंग सैंड्स ऑलरेडी है। एक तरफ ये हो गया। फिर आ गया आपका सऊदी अरेबिया। सऊदी अरेबिया माय कट फीलिंग इन द एंड इज कि अमेरिकनंस भी अगर निकले वहां से इस रीजन से वैक्यूम भरने के लिए एक ईरान आएगा और दूसरी तरफ से पॉसिबबली इजराइल विल कम इमेजिन अ सिचुएशन बट यू नो इट्स नॉट अ इजी सेल फॉर द सऊदीज़ टू हैव अ फॉर्मल मिलिट्री अलायंस वि द वि द इजराइलीज़ एंड द ज उनका ग्लोब ग्लोबल इमेज है और फिर यू नो द टू होली मॉस आर इन सऊदी अरेबिया के वो अफोर्ड कर सकता है फिर मुस्लिम उम्मा के ऊपर क्या असर पड़ेगा इट्स डिफिकल्ट फॉर देम बट मुझे लग रहा है कि वैक्यूम में अगर रिजीम सर्वाइवल की बात होगी सऊदी अरेबिया में तो फिर आप ईरान के के तो बिटर एनिमीज़ हैं ही है तो क्या आप उसका रुख करेंगे इजराइल कैन कम एज अ नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर इन दैट रीजन आर वी लुकिंग एट दैट सिनेरियो आई आई डोंट रूल आउट दैट काइंड ऑफ सिनेरियो विद टू अमेरिकन विड्रॉल एंड दीज़ टू काइंड ऑफ रीजनल सुपर पावर्स कमिंग इन चाइनीज़ प्लेइंग इन बिग रोल इंडिया कैन प्ले अ वैरी बिग रोल देयर इज़ नो क्वेश्चन अबाउट इट अगर हम इफ यू प्ले आवर कार्ड्स राइट वी शुड बी देयर ऑयल बेरिंग एरिया है। एनर्जी सिक्योरिटी हिस्टोरिकल टाइज है। आई थिंक वी नीड टू प्ले अ रोल एंड वी कैन प्ले अ रोल। ईरान विल बी हैप्पी टू हैव अस टू प्ले अ रोल इन दैट काइंड ऑफ़ सिनेरियो जो हम बात कर रहे हैं पोस्ट बिकॉज़ अगर हम देखते हैं जो बाहर के देश है जो मल्टीपोलर वर्ल्ड में जैसे आ रहे हैं जैसे चाइना है, इंडिया है, रशिया है। तो चाइना ने अपने संबंध सबके साथ बना के रखे हुए हैं। इजराइल के अंदर हाइफा पोर्ट चाइनीज़ रन कर रहे हैं। टेलवे मेट्रो का कॉन्ट्रैक्ट मोस्ट हो सकता है। उन्होंने बड किया है। 50 बिलियन डॉलर का प्रोजेक्ट है। चाइनीज़ वहां पे। तो उन चाइनीस ने अपनी टांग इजराइल में फसाई हुई है। सऊदी अरेबिया में यांगबू की रिफाइनरी जो है वो चाइनीस ने की हुई है। ईरान की रिकंस्ट्रक्शन हो गई तो चाइनीस कंपनीज़ आएंगी। राइट? सो चाइनीस विल प्ले दैट ब्रिज बिल्डिंग काइंड ऑफ़ रोल इन द रीजन वंस द अमेरिकनंस विड्रॉ। अर्दगान को आप इस पूरे उसमें कैसे देख रहे हैं टर्की को? क्योंकि जी प्रोफेसर मरांडी जो है इन्होंने एक ट्वीट किया था। उन्होंने कहा कि देखिए ये दिखाते हैं कि ये किस तरह से गाजा और फिलिस्तीन के इस इशू के साथ हैं। ये जाइनिस लॉबी जाइनस रिजीम उसको भी जो कहना होता है वो कहते हैं अपनी जो आवाम है उसको खुश करने के लिए। इसके अलावा वो ईरान के साथ भी एक तरह से सिंपैथी कार्ड जो है वो खेलते रहते हैं ऑन एंड ऑफ। एंड आल्सो ही इज़ सेलिंग द ऑयल टू इजराइल। और किस तरह से उनके टायर्स हैं इजराइल के साथ वो भी छिपे नहीं है। कैसे उनके मिलिट्री टायर्स हैं वो भी छिपे नहीं है। सो जो लोग जब अर्दगान आए थे तो लोगों को लगता था कि ओ नाउ यू नो टर्की हैज़ चेंज्ड कंप्लीटली ये अमेरिका के उससे निकल गए हैं। नाउ इट बी अ डिफरेंट टर्की बट वी आर सेइंग कि ये तो शायद और ज्यादा डेंजरस है। क्योंकि ये तो आप दोनों तरफ यू यू आर प्लेइंग। सो हाउ डू यू सी दैट? क्योंकि लोग टर्की को बहुत उस तरह से देखते हैं कि यू नो जब ये कन्वर्सेशन होगी नेगोशिएशन की इस सब की टर्की माइट प्ले अ वेरीेंट रोल। सी टर्की इज़ेंट ज्योग्राफिकली वो ब्रिज है एशिया और यूरोप के बीच में। इट्स वेरी इंपॉर्टेंट अनदर पिवेटल स्टेट। वो बिज़नेस की वाली किताब याद आती है। तो एक वो इंपॉर्टेंट प्लेयर रहेगा। लेकिन ट्रस्ट लेवल विद अदन इज़ आई थिंक एवरीबॉडी इज़ सीन थ्रू देम। मैं रशिया कई बार जाता हूं। दे डोंट ट्रस्ट हिम। क्योंकि जरूरत है इसलिए राब्ता है उसके उनके साथ। फिर बात आती है सीरिया में तो रिजीम चेंज कराने में टर्की का हाथ रहा है। ये जो बशारसा जो एक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस की बात करते हैं। यू नो ये जुलानी वगैरह ये सब टर् टर्क्स का इनके साथ बहुत करीबी संबंध रहा है। तो टर्क्स का लेकिन वो हिस्टोरिक है कि भ ऑटोमन अंपायर को रिवाइव करना चाहते हैं और मक्का एंड मदीना वर पार्ट ऑफ़ द ऑटोमन अंपायर बिफोर वर्ल्ड वॉर वन। तो वो उसको लिवरेज करने की कोशिश करते हैं। बट आई डोंट सी ईरान के अगर कॉन्टेक्स्ट में देखें जीरो ट्रस्ट वो मरांडी वाला इंटरव्यू मैंने भी देखा है। ही नेम दैट ही सेड जो ये गए हैं ना टॉक्स के लिए जिसमें इजिप्ट की पाकिस्तान और व्हिच इज द फोर्थ एक चौथी कंट्री जो है उदय अरब मरांडी आईआरजीसी आई हैव मेट हिम ऑन अ नंबर ऑफ़ ओकेशंस आई मीन ही सपोर्टर ऑफ ह टीचेस इन तेहरान यूनिवर्सिटी हम वो भी है क्योंकि मेरी मुलाकात उनसे तेहरान यूनिवर्सिटी में ही हुई थी उनके चेंबर में कई साल पहले लेकिन ही इज नोन टू बी वेरी क्लोज टू आईआरजीसी राइट? तो मैं तो यही कहूंगा कि आईआरजीसी का व्यू है कि ये जितने भी ये लाइन से लगे हैं ना टॉक्स के लिए ईरान हैज़ जीरो ट्रस्ट टुवर्ड्स ऑल ऑफ़ देम। टर्की इंक्लूडेड और पाकिस्तान के ऊपर उनको दे आर टू कंट्रीज व्हिच अंडरस्टैंड पाकिस्तान। रशियंस डोंट अनफॉर्चूनेटली। मैंने उनसे भी बात की है इसके बारे में। ईरानियंस अंडरस्टैंड द इंडियंस अंडरस्टैंड। यह डुप्लीसिटी डबल गेम्स मिलिट्री इधर जाएगी सिविलियन का द इंट्री केसेस ऑफ़ पाकिस्तान हम लोग जानते हैं और ईरानियंस आर फुल्ली अवेयर ऑफ दिस तो और वो भी उनको पता है कि इस वक्त लेकिन आई मीन जस्ट अ थॉट द द रियल ट्रायंगुलेशन अगर कहें जो हो सकती है पोस्ट सिनेरियो अफगानिस्तान अफगानिस्तान ग्रेट रिलेशंस हालांकि बीच में प्रॉब्लम्स आई थी बट तालीबान के साथ नो इशज़ द ट्रायंगुल इंडिया इंडिया अफगानिस्तान फैंटास्टिक नाउ सो ए ए ट्रायंगुलेशन ऑफ अफगानिस्तान इंडिया ईरान इज समथिंग व्हिच हैज़ दैट पोटेंशियल अब उसको एक्चुअल डिप्लोमेट्स जाके काम करेंगे। लेकिन ऑब्जेक्टिव कंडीशंस जो मैं देख रहा हूं वो एक ये ट्रायंगुलेशन बनने की पोस्ट वॉर सिनेरियो में है। वेदर वी इंटरनलाइज इट एंड सी इट दैट वे और नॉट आई डोंट नो बिकॉज़ ये पॉलिसी में एक ऐसा काम है। एज एज अ एज अ स्ट्रेटेजिक एनालिस्ट आई कैन ओनली सी दीज़ काइंड ऑफ़ पोटेंशियल न्यू फॉर्मुलेशंस या अलायंसेस कहें या पार्टनरशिप्स कहें ये पॉसिबिलिटी आ रही है। टू लास्ट वै क्विक क्वेश्चंस। आई नो दिस गोइंग वैरी लॉन्ग बट यू नो आई हैव अ लॉट ऑफ़ क्वेश्चंस एंड द कन्वर्सेशन इज़ गोइंग वैरी इंटरेस्टिंगली अहेड। भारत के रोल की मैं बात यहां पर करना चाहूंगी कि भारत के रोल को आप कैसे देख रहे हैं यहां पर आप किस तरह का प्लेयर भारत को इस सब में देख रहे हैं क्योंकि अभी हम ये देख रहे हैं कि गैस की जिस तरह से पूरे देश में किल्लत है ऑयल प्राइसेस को लेकर जो बात की जा रही है ऑफ कोर्स गवर्नमेंट इज नॉट एक्सेप्टिंग इट लेकिन पूरे देश में जो हाल है दिल्ली जैसे जहां मैं रहती हूं इस कैपिटल में हम ये देख रहे हैं कि क्या हाल है मजदूर यहां से छोड़कर जा रहे हैं और लोगों का ये कहना है खासतौर पर जो अपोजिशन पार्टीज हैं कि हम जिस तरह से जो सरकार जिस तरह से मोदी जी जिस तरह से इजराइल के साथ जाकर खड़े हुए और ईरान हमारा ट्रेडिशनल दोस्त रहा। अगर हम ईरान के साथ रहते तो शायद ये परेशानी ना होती। दैट्स अ डिफरेंट थिंग दैट्स पॉलिटिक्स। बट वी आर वी आर टॉकिंग अबाउट यू नो जंग में आप आप हिंदुस्तान के रोल को कैसे देख रहे हैं। वी आर द वी वांटेड टू बी अ लीडर ऑफ ग्लोबल साउथ। लेकिन हम आइडियोलॉजिकली और दूसरी तरीके से हम खड़े नजर आते हैं ग्लोबल नॉर्थ के साथ। हम खड़े नजर आते हैं अमेरिका और इज़राइल के साथ। और तो फिर ये कैसे मतलब आपको लगता है कि पूरी तरीके से ये सारी चीजें एक कंफ्यूजन पैदा करती हैं। कोलैप्स होता हुआ आप इसको देखते हैं। और फिर जब लोग यहां पर कहने लगते हैं कि देखिए पाकिस्तान इज़ प्लेइंग सच एन इंपॉर्टेंट रोल नेगोशिएशन में। वो नेगोशिएशन में आगे बढ़ रहा है और भारत नहीं आ रहा है और फिर जयशंकर कह रहे हैं कि उसको दलाल बोल रहे हैं पाकिस्तान को। देखो एक तो लेट्स कीप द इमोशन आउट ऑफ इट। बहुत ऑब्जेक्टिवली इसको देखें क्या है? जी इंडिया नीड्स इजराइल फॉर वेरियस रीज़ंस टेक्नोलॉजी वगैरह डिफेंस इक्विपमेंट वो एक ट्रैक है ठीक है लेकिन इक्वली इंडिया नीड्स ईरान ए चाबहार पोर्ट नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कैरियर कॉरिडोर एनर्जी एनर्जी सिक्योरिटी एक्सेस टू अफगानिस्तान एंड सेंट्रल एशिया वो कहां से जाएगा वो ईरान से जाएगा प्लस हिस्टोरिकल टाइल्स वेयर आई आई थिंक वी इन दिस केस वी लॉस्ट द प्लॉट वाज़ वी सम हाउ हमारा जो बैलेंस रहना चाहिए था वो बैलेंस बिगड़ा वो कहां पर बिगड़ा आई वुड से इवन ओके आई टू बी विद ओवरलेसली वि ने निठन याू नोइंग के यहां वॉर हो सकती थी पॉसिबबली अवॉयडबल लेकिन उसके बाद की जो बात हुई है यू नो व्हेन खामिनी स्किल्ड उसके बाद एज अ रिस्पांसिबल पोल आप अपनी बात कहो कि दैट सोवरन लीडर ऑफ अ कंट्री व्हिच एक्चुअली हेल्प्ड यू बिकॉज़ इफ यू सी इन द पास्ट वो मैं जाना नहीं चाहता बट खामिनी वाज़ योर फ्रेंड जब बाबरी मस्जिद हुआ किसने रस जानी को किसने भेजा था यहां पर लखनऊ वगैरह में नरसिम्हा राव के टाइम की बात है और कभी देखिए वो विजिट के बारे में तो दे हैव बीन विद यू सॉलिडली तो एक कंडेमिनेशन ऑफ किलिंग ऑफ ए ऑफ ए सोवरन कंट्रीज लीडर वो एक जरूरी था एक तरह से करना। आई थिंक वी मिस द प्लॉट देयर वो बैलेंस उसमें बिगड़ा क्योंकि फिर सिर्फ वो छवि आ रही है कि जो नेतया के साथ हुआ और यहां पर जो हमको ईरान की भी जरूरत है उसके साथ नहीं हो रहा। एंड आई थिंक एक सेकंड पॉइंट वाज़ जब वो शिप जो कैडिट्स को लेके जा रहा था जिसको टॉर्पिडो किया अमेरिकनंस ने। नॉट वी आर नॉट फिजिकली रिस्पांसिबल बट आई थिंक हमारे यहां से जा रहा था एक उसकी कंडेमिनेशन भी बनती थी। आई थिंक दी टू पॉइंट्स वो बैलेंस यहां पर बिगड़ा है। वी नीड टू रिस्टोर दैट बैलेंस। चाइनीस आल्सो डील वि द इजराइली। हमें भी डील करने में कोई दिक्कत नहीं है। बट यू सी इट शुड नॉट बी द इजराइली ड्राइविंग आवर एजेंडा। कंट्रोल हमारे हाथ में है। आप कितने कैलिब्रेट करोगे रिलेशनशिप। इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में आपको सबके साथ जरूरत है। तो मुझे लगता है कि ये रीइंफोर्स करने की जरूरत है। अ एंड थर्ड फैक्टर आई थिंक इज अ कॉमन फैक्टर जो इंडिया ईरान को बाइंड कर सकता है। इज द पाकिस्तान फैक्टर। ये कम्युनलिटी है। तो कोर्स करेक्शन की मुझे लगता है जरूरत है। जीरो सम गेम में जाने की जरूरत नहीं कि सिर्फ ईरान के साथ या सिर्फ इसके साथ गेट योर बैलेंस राइट बेस्ड ऑन योर लॉन्ग टर्म इंटरेस्ट। और उसके साथ जुड़ी है जी। तीसरी बात मुझे लगता है कि एक कोई स्ट्रेटेजिक प्रोजेक्ट नहीं है इंडिया और ईरान का जो इनको स्टेबलाइज करे ये मोमेंट्री जो प्रॉब्लम्स आती है एक टाइम पे क्योंकि शिपिंग की प्रॉब्लम आती थी हमने पाइपलाइन की बात की ईरान से ठीक है आई अंडरस्टैंड वो ईरान पाकिस्तान इंडिया पाइपलाइन का इशू आप छोड़ दीजिए बिकॉज़ देन देयर इज़ अ जेन्युइन फियर कि भ पाकिस्तान इट इज़ स्टॉप्स इट तो आप क्या करोगे यू कांट बी वनरेबल लेकिन पाइपलाइन फ्रॉम ईरान टू ओमान ओमान से अंडर सी एक दिल्ली बेस्ड कंपनी है जिसने पूरी स्टडी की हुई है कि हाउ फ्रॉम ओमान अंडर सी आप निकाल के मुंबई तक निकाल सकते हो पाइपलाइन सो देन यू हैव फिर आपके होरमोस में क्या हुआ किधर हुआ आपकी अगर पाइपलाइन आएगी राइट अप टू मुंबई एंड यू कैन एक्सटेंड इट एक्चुअली उसकी एक्सटेंशन अब नॉर्थ ईस्ट तक कर सकते हैं एंड लिंक इट अप विद अदर वो मैंने एक टाइम पे इंटरव्यू किया था इनको व्हाट्स ह नेम? रहीम आजकल बहुत आ रहे हैं आईआईजीसी की यूनिफार्म पहन के। जी जी जी जी जो स्पोक्सपर्सन है उनके नहीं स्पोक्सपर्सन नहीं है। वो एक और है शख्स रहीम मशाई। ही सन इन लॉ ऑफ अहमद निजाद जिनको मैंने बहुत साल पहले इंटरव्यू किया था। तो ही इन दैट इंटरव्यू टोल्ड मी कि आप यह पाइपलाइन करिए। हम एग्रेबल है पाकिस्तान को बाईपास करें। बट ही सेड कि उसको ह आईडिया वास ग्रैंडर। ही कहते कि आप इंडिया से लेके उसको चाइना तक कनेक्ट कर दो। लेट चाइना बी द एंड यूजर। यू ही वास सेइंग समथिंग लाइक दैट। मैं बात कर रहा हूं बहुत साल पहले की। जी। 2006 की तो बट आई डू थिंक दैट एक एंकर देने की जरूरत है इंडिया ईरान रिलेशनशिप को। व्हाइल यू बैलेंस इट विद एवरीबॉडी एल्स। लेकिन एक एंकरेज नहीं है हमारे पास। तो अगर ये वॉर खत्म होती है और दी टू वेक्टर्स वन इज अ पाकिस्तान वेक्टर अदर इज अ एनर्जी सिक्योरिटी वेक्टर आप ईरान से एक रिलेशनशिप बना सकते हैं। अब व्हाई इज इट दैट ईरानियंस डिस्पाइट ऑल दैट हैव नॉट टर्नड अगेंस्ट यू हमारे शिप्स आ रहे हैं हरमोस्ट के बीच में से। बिकॉज़ आई थिंक ईरानियंस हैव गॉट द पिक्चर कि इंपोर्टेंस ऑफ़ इंडिया क्या है इन द लॉन्ग रन? एंड दे अंडरस्टैंड पाकिस्तान आल्सो विद प्रोपेगेंडा कैसे होगा। सो आई थिंक यह कोर्स करेक्शन करना जरूरी है और बैलेंस करना जरूरी है। और एक साइड पे वन साइडेड रिलेशनशिप इज नॉट गुड फॉर एनी कंट्री टू पुट ऑल योर एग्स इन वन बास्केट। सो समवेयर दैट नीड्स करेक्शन। इस जो घटनाक्रम और ये भी कि अमेरिका और ये सब डिक्टेट जो टर्म्स करते हुए नजर आ रहे हैं। चाहे हमने ट्रेड डील के दौरान देखा या अभी जब ये वॉर शुरू हुई कि हां ठीक है यू कैन बाय ऑयल फ्रॉम रशिया फॉर 30 डेज और बार-बार आकर ये कहा गया कि हमने अलव कर दिया है। हमने परमिशन दे दी है। तो आप एक सोवरन कंट्री को उसकी डिग्निटी को सबके सामने आकर एक तरह से आप तार-तार कर रहे हैं और 140 करोड़ का देश और उसके बाद इसको लेकर कोई कंडेमिनेशन नहीं होता। किसी तरह की कोई बात नहीं होती है। तो ये तमाम सवाल तो यह पैदा हो ही रहे हैं कि फॉरेन पॉलिसी आखिर हमारी कहां जा रही है? एंड आई एम नॉट टॉकिंग अबाउट इमोशंस। आई एम जस्ट टॉकिंग अबाउट कि जो हो रहा है जो प्रैक्टिकली हमें सामने नजर आ रहा है और जिस तरह की बातें कही जाती है निर्मला सीतारमण का राज्यसभा में आकर ये कहना कि नहीं रुपए पे कोई असर नहीं पड़ रहा है। तमाम चीजों को जो सामने नजर आ रही है उसको डिनाई कर देना ये भी एक एक बड़ी बात है। आई एम नॉट कमिंग टू दैट क्योंकि आई जस्ट वांट टू ब्रीफली कमेंट ऑन दिस। आई थिंक यह जो ईरान वाला इशू है ना दैट इज़ अ फर्स्ट टाइम व्हेन आई एम सीइंग दे हैव कंप्लीटली लॉस्ट द प्लॉट इन दिस इशू। राइट? इसके पहले जब टेरिफ हो रहा था हम हमारी नेगोशिएशन चल रही थी और हमने यूरोपियन यूनियन से किया एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट। जैसे ही यूरोपियन यूनियन के साथ किया बारगेनिंग पावर आई तो ट्रंप महाशय और अमेरिकनंस वर ऑनलाइन फॉर अ एग्रीमेंट टेरिफ एग्रीमेंट विथ अस। आई थॉट वी आर डूइंग ओके बैलेंस कर रहे हो आप। तो तब तक मुझे कोई कोई शिकायत नहीं है और रशिया से भी आप ऑयल खरीद रहे थे यू नो डिस्पाइट एवरीथिंग आपने स्लोली कम करना शुरू किया बट अमेरिकनंस एट यू तो एक तरह से मुझे लग रहा था कि स्ट्रेटेजिक ऑटोनमी ये एक्सरसाइज हो रही है सी आई एम नॉट लुकिंग फ्रॉम ए पिटिकल एंगल हियर आई एम जस्ट लुकिंग एज एन इंडियन फॉर इंडिया तो ये बैलेंस हो रहा था लेकिन जब बात आ रही है ये ईरान इशू की ये क्रिटिकली वर्ल्ड को डिफाइन करने वाला इशू एंड इंडियन आई थिंक वी शुड अलाइन आवरसेल्व्स पोजीशन आवरसेल्व्स करेक्टली इन द राइट वे पोजीशनिंग में कोर्स करेक्शन की जरूरत है एंड देयर इज़ नो हार्म इन एडमिटिंग हियर वी गूफ्ड अप हियर वी इसमें हम हमने ठीक नहीं किया इसको हमको कोर्स करेक्शन करना है एंड यू रिस्टार्ट यू कैन लेकिन इसको डिनाई या डिफाई या डिफेंड करना बिय्ड अ पॉइंट आई थिंक इट्स नॉट इट डजंट सर्वर आवर इंटरेस्ट तो इसलिए माय व्यू ओके लास्ट क्वेश्चन फाइनल क्वेश्चन अतुल जी कि दो-तीन हफ्ते की जो बात कर रहे हैं ट्रंप आपको क्या लग रहा है कि दो-तीन हफ्ते में बड़ा अटैक व्हाट इट कुड बी और लेबनान और जब हम हुतीज की बात करते हैं हिजबुल्ला और हुतीज की हम बात करते हैं ईरान उनको अपना अलाय कहता है प्रॉक्सी नहीं कहता तो मेरा सवाल आपसे ये है कि उनके रोल को आप कितना इंपॉर्टेंट देख रहे हैं क्योंकि बैरूत पे बहुत बड़ा हमला इजराइल की तरफ से किया गया लेकिन जिस तरह से हिजबुल्ला को ये कहा गया था कि वह कंप्लीटली बहुत कमजोर हो गए हैं। लेकिन देखिए दे आर फाइटिंग बैक हुथज़ की बात। हुथज़ ने भी अपना मोर्चा खोल दिया है और बाबल मंदब जो है वो अक्सर कहते रहते हैं कि रेड सी को वो बंद कर देंगे और ऐसा हुआ तो यूरोप पूरा पूरी तरीके से कोलैप्स कर जाएगा जो ऑलरेडी कर रहा है। तो इस सब को आप आप कैसे देख रहे हैं? और जो नेटो कंट्रीज हैं अगर ब्रिटेन के प्राइम मिनिस्टर फ्रांस के प्राइम मिनिस्टर जो बिल्कुल एकदम अलाय रहे हैं एकदम अमेरिका के साथ वो आके कहते हैं कि दिस इज नॉट आवर वॉर वी आर नॉट गोइंग टू फाइट दिस इसको ऐसे ही लिया जाए फेस वैल्यू पे या आपको लग रहा है कि ये अपनी अपनी आवाम को दिखाने के लिए एंड दे आर मे बी कुकिंग अप समथिंग एल्स कैन दे डेयर टू डू दैट इन फ्रंट ऑफ़ अमेरिका सी टू थ्री थिंग्स सबसे पहले हम बात करते हैं हुतीज़ की राइट और सबसे क्रिटिकल जो लिवरेज ईरान के पास है दैट इज हुतीज़ और हुतीज़ से बाबल मंदाब क्योंकि आपने अगर स्वेज़ कैनाल रूट को ब्लॉक किया या पार्शियली ब्लॉक किया देन अगेन ईरान्स होल गेम कि अभी प्रेशर इतना आएगा ग्लोबल इकॉनमी इतनी डाउन जाएगी कि अमेरिकनंस विल हैव टू तो ये एक ऑप्शन मेरे को लगता है ये शॉर्ट टर्म में ही शुरू हो जाना चाहिए अभी तक नहीं हुआ लेकिन ये हो सकता है पर ये सबसे ज्यादा पॉसिबिलिटी है। दूसरी बात है हिजबुल्लाह की। हिजबुल्ला को यू नो दे शुड नॉट हैव टेकन देम लाइटली। इतनी पनिशमेंट ली है बिकॉज़ आई हैव सीन लेबनन। मैंने वहां पर 2006 की वॉर कवर की थी और हिज़बुल्ला को आप क्लोज देखा था कि कैसे हाउ दे फाइट। दे आर एक्सट्रीमली मोटिवेटेड लॉट। तो वो भी क्योंकि वो ग्राउंड वॉरफेयर की तरफ जा रहा है। इट्स नॉट गोइंग टू बी प्रीटी फॉर इजराइल। तो एक तरह से वह फ्रंट भी वो कह रहे हैं कि लिटानी रिवर तक एक अपना एरिया बफर जोन बना लेंगे। मुझे डाउट है कि वो कर पाएंगे। हिजबुल्ला इज अ डिफरेंट कैटल ऑफ़ फिश। यहां पर लोग उनको टेररिस्ट कहते। आई थिंक दैट वाज़ एब्सोल्यूट मिसनर बिकॉज़ सबसे ज्यादा टेररिज्म को किसी ने फाइट किया। ये अलसरा फ्रंट वगैरह जो सीरिया में ये लोग आए थे वो हिज़बुल्ला ने किया था। सो आई थिंक देयर नीड टू बी कैटेगराइज़्ड डिफरेंटली। या हम सोच अलग होनी चाहिए। बट कमिंग टू फाइटिंग पोटेंशियल वो एक इंपॉर्टेंट एलिमेंट आ रहा है। तो ये बेसिकली इंटैक्ट है। फिर आपने बात की यूरोप की या नेटो कंट्रीज की। आई डोंट थिंक कि जो सेंटीमेंट है इस वक्त और एक्चुअली डेमोग्राफिक प्रोफाइल भी जो वोटर्स की है ना यूके वगैरह में बदल चुकी है। आई डाउट स्टारमर कैन जस्ट यू नो बेस बदल गया है वहां के एमपीस के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स में कौन से एरियाज में क्योंकि मेनली बिकॉज़ जिस तरह की इमीग्रेशन वगैरह वहां हुई है कंप्लीटली डिफरेंट डेमोग्राफिक प्रोफाइल है। और इसलिए आई डाउट वो कर सकते हैं। फ्रांस का तो यह रहा कि अब तो फ्रांस के प्रेसिडेंट की एस बुरी तरह से पर्सनल लेवल पे इंसल्ट हुई है। कल की जो बात हुई है। आई वेरी मच डाउट दैट द यूरोपियंस वांट टू गेट इंटू इट बिकॉज़ यूरोपियंस को पता है कि अगर गए भी अंदर तो सक्सेस के चांसेस बहुत कम है। क्योंकि पूरी तरह से अगेन गो बैक टू द सेम पॉइंट जो हमने पहले कहे। सो मुझे नहीं लगता कि यूरोपियंस इसमें जॉइन करेंगे। एंड थर्ड एलिमेंट इज़ ट्रंप फैक्टर। अगर कोई और होता तो शायद करते यू हैव टू अंडरस्टैंड कि यह इंडिपेंडेंट एक एक वेक्टर है ट्रंप शैल वी गो विद हिम दे विल वॉच के इंटरनल क्या चल रहा है अमेरिका के सो आई डोंट सी देम जॉइनिंग द वॉर सो फाइनल एनालिसिस में वही है कि या तो ट्रंप जस्ट लीव्स अफगान स्टाइल एंड बेयर्स व्हाटएवर कॉन्सिक्वेंसेस अगर जश लॉबी को भी आपको नाराज करना हो दैट इज़ पिटिकल सुसाइड बट ही सेज़ लेट मी गेट आउट ऑफ इट एक ट्रंप ट्रंप कैन डू इट। बिकॉज़ हम सारी आर्गुमेंट्स रैशन बिहेवियर पे कर रहे हैं। परहैप्स लोग बहुत लोग सस्पेक्ट कर रहे हैं कि ये रैशन बिहेवियर होएगा। बट मोर लाइकली इज़ अ कंसेंसस एग्रीमेंट रीच्ड बिटवीन इजराइल एंड यूएस के अभी हम निकलते हैं बाद में देख लेंगे। वी विल सी व्हाट टू। तो वो विड्रॉल का भी एलिमेंट आई थिंक वो ज्यादा है। और जो सबसे कम गुंजाइश है वो थर्ड पॉसिबिलिटी आई विल नॉट रूल इट आउट इज ये जो बूट्स ऑन द ग्राउंड वाली कि लेट्स सी उसमें उस साइकिल में चले जाते हैं बॉडी बैग्स के नेशनलिज्म को बढ़ाने के एक पूरा नया ही वर्टिकल आ सकता है। मेरे को लगता है ये तीन पॉसिबिलिटीज आज की स्थिति में हम विजुअलाइज कर सकते हैं। ओके बहुत इंटरेस्टिंग और देखना होगा मुझे लगता है कि आने वाले टू थ्री वीक्स आर गोइंग टू बी वेरी इंटरेस्टिंग टू सी कि यहां से ये वॉर किस तरफ जा रही है और जाहिर सी बात है कि अगर वुड एंड ग्राउंड की कोई पॉसिबिलिटी होती है उसके बाद तो पूरा सिनेरियो इस वॉर का चेंज हो जाएगा और आगे फिर क्या होता है अमेरिका इसको कैसे लेता है वहां के लोग कैसे लेते हैं ईरान किस तरह से फाइट बैक करता है वो सब देखना बहुत इंटरेस्टिंग होगा और उसके साथ-साथ डेंजरस भी होगा मतलब इट्स नॉट अ मूवी दैट आई एम सेइंग दैट इट्स गोइंग टू बी इंटरेस्टिंग आई एम जस्ट सेइंग कि कैसे पूरा जो वर्ल्ड सिनेरियो है वो किस तरह से चेंज होगा वो देखना बहुत इंपॉर्टेंट होगा। बहुत-बहुत शुक्रिया। थैंक यू सो मच अतुल जी। बहुत लंबा वक्त आपका लिया बट इट वास इट वास अमेजिंग टॉकिंग टू यू एंड इट वास वंडरफुल टू हैव यू ऑन द शो। थैंक यू सो मच। आई एनजॉय इट थरली विशाल जी। थैंक यू। थैंक थैंक यू

Companion article

A Speech That Changed Nothing

A month into the US-Israel war on Iran, Donald Trump addressed his nation for the first time since the fighting began, and the world tuned in expecting something new. What it got, in the assessment of senior journalist Atul Aneja, was "a rambling speech" from which little could be directionally derived. Trump repeated familiar lines: that Iran's navy and army had been destroyed, that American objectives had "almost" been achieved, and that Washington did not want to get further entangled in the Strait of Hormuz — whoever had an interest in keeping it open should see to reopening it themselves. He also warned that if Iran did not come to the negotiating table, a big attack would follow within two to three weeks.

What was missing was as telling as what was said. There was no mention of American troops on the ground, no mention of nuclear weapons, and — despite rising oil and gas prices and inflation pressure worldwide — no mention of the economic fallout, a contrast, it was noted, with how the British and Australian prime ministers had addressed their own citizens during the same crisis, laying out concrete measures. Markets, Aneja said, reacted anyway: oil prices moved up almost immediately after the address. His reading is that markets have stopped waiting on Trump's rhetoric and are now pricing in only concrete action. The shifting deadlines — two days, then five, then ten, now two to three weeks — look to him less like control of the situation and more like "a desperate attempt" to find a way out of a war that is not going as planned.

Two Vetoes, One War

Any concrete American move, Aneja argues, has to clear two separate vetoes — what he calls the American "theatre" and the Israeli "theatre" — because neither Washington nor Tel Aviv can act without the other's consent. Inside the American theatre, he points to the domestic Israel lobby as the decisive constraint: its reach into Senate and House composition, election financing, media and Wall Street is, in his words, strong enough that defying it amounts to political suicide. Inside the Israeli theatre, the constraint is that Israel's own war aims have not been met — Iran, he notes, still has missiles with roughly a 2,000-kilometre range and its uranium-enrichment programme intact — which leaves Israel little incentive to agree to stop.

That double bind, in Aneja's account, is what makes an American exit so costly. Simply leaving the way the United States left Afghanistan in 2021 would make Trump's own political survival harder given the lobby's reaction; it would also burn Washington's credibility with the Gulf states it left behind, and open a vacuum that China, Russia and Iran itself would move to fill. Underneath this sits a financial fear he raises independently: American funding structures — Wall Street financing for technology companies, and US debt servicing broadly — run on oil trade settled in dollars. Any disruption to that "petrodollar" pipeline, such as Hormuz-linked trade shifting into another currency, risks what he bluntly calls a dollar collapse and, with it, a wider economic collapse in the United States. "They are all bad options," he said of the choices now facing Washington.

Why "Boots on the Ground" Isn't a Real Option

Trump's own reference points in his address — Vietnam and the eight-year Iraq war — struck Aneja as a signal that the administration expects this could become a long, drawn-out conflict. But a long war, in his assessment, does not translate into American ground troops, for practical reasons. He compares any prospective landing to the slow amphibious exercises he has observed: landing craft approaching gradually, soldiers disembarking, a beachhead secured only after a lengthy operation — while, on the Iranian side, forces are dug in behind the Zagros mountains near islands such as Kharg, simply waiting. Air-dropped alternatives fare no better in his view: helicopters are slow-moving and vulnerable to Russian-supplied shoulder-fired systems such as the Igla, ruling out anything resembling a clean, surgical insertion.

The consequence of trying anyway, he argues, would be body bags — and given how strong anti-war sentiment already runs in the United States, that risks a backlash severe enough that, in his words, "we'd then be talking not about regime change in Iran, but regime change in the US." A second front through Pakistan, which has a defence pact with Saudi Arabia and a border near Zahedan, is equally unworkable in his reading: roughly 30 percent of the Pakistan army, including the Northern Light Infantry drawn from Gilgit-Baltistan, is Shia, and dragging the army into a war against Iran risks internal revolt. "You are actually caught," he summarised — which is why he places the real decision with Israel: a small country that absorbed roughly 200 missiles in a single barrage, holds no strategic oil reserves, depends on a single working refinery at Haifa already struck twice, and is simultaneously bleeding soldiers in an unrelated war in Lebanon. "Somewhere, Israel will have to give way and buy time," he said.

Iran's Staying Power: Missiles, Morale and a Battle-Hardened Regime

On the immediate military balance, Aneja's assessment is that the cards, for now, sit with Iran. Israel's air defence — Iron Dome, the Arrow system, and a third American system — depends on intercepting Iranian fire with expensive stock that is not easily replaced; he cites the US Patriot programme's declared production capacity of only six batteries and 600 missiles a year as evidence that "America is getting exposed" on industrial capacity, forcing Washington to reportedly draw Patriot missiles from South Korea and Ukraine into this theatre. Iran, by his estimate, holds underground missile stocks sufficient to sustain current firing rates for roughly two to three months, with Iranian experts suggesting parallel wartime production is also under way, because, as he put it, "Iran knew they were going to come back, and come back with more power" after an earlier, shorter round of fighting.

He is careful to note the uncertainty: intelligence agencies such as Mossad will keep locating buried stockpiles over time, and bunker-buster munitions can only reach a certain depth, meaning anything dug in deeper "is probably completely safe" — a genuine unknown rather than a settled fact. What he is more confident about is Iran's capacity to absorb pain. Having covered the eight-year Iran-Iraq war and visited the country repeatedly since, he points to physical scars still visible in daily life — his own example is a taxi driver missing a limb from that war — and Tehran's vast Behesht-e Zahra cemetery as evidence of a societal familiarity with sacrifice. He also rejects the American-Israeli assumption that removing Ali Khamenei would trigger a popular revolt, calling it "a complete myth": Iranians once unhappy with aspects of the regime, he argues — including many women, whose high employment contradicts a Western media picture built around the headscarf requirement — mostly want reform within the system, not its overthrow, and the war itself has consolidated a previously divided population behind the state, with a battle-hardened Revolutionary Guard leadership now at the helm.

The Economic Arrows in Iran's Quiver

Beyond the battlefield, Aneja lays out economic pressure points that make this, in his words, no longer a localised war. Undersea cables through the Strait of Hormuz carry a substantial share of global internet traffic — by the figure raised in conversation, roughly a quarter of it worldwide — and mining them would be felt far beyond the region. He expects a food-security crisis around September or October, since fertiliser inputs and related chemicals move through Hormuz, and a squeeze on helium — used in artificial-intelligence hardware and pharmaceutical manufacturing — could disrupt medicine supply chains. Iran, in his assessment, will hesitate to reach for its most destructive options, but they exist: chief among them, held for an existential threat, is retaliation against desalination plants, given how dependent the Gulf is on desalinated water.

He points to a roughly 500-kilometre Saudi pipeline carrying water from the Gulf coast into the desert interior — a line whose disruption would threaten basic survival in Saudi Arabia, Kuwait and the UAE alike — as well as Iran's own desalination plants, including on Qeshm island, which Israel could target if the war escalates that far, with what he describes as potential mass displacement and chaos following. Aneja frames Iran's conduct so far as reactive rather than initiating — "an eye for an eye" — but warns that strikes on Iran's power plants, oil wells or desalination facilities would draw an equivalent response against Gulf infrastructure. Underlying all of it is the petrodollar system: were Hormuz-linked oil trade to move away from dollar settlement, the shock would ripple into how Wall Street funds itself and how Washington services its debt.

The Nuclear Shadow and the Russia-China Calculus

Aneja, who says he has studied Iran's nuclear programme closely, is confident Iran possesses nuclear capability but not a bomb. He traces this to a 2007 US National Intelligence Estimate, which found that Iran halted its weapons-related work in 2003 — a decision he links to the fall of Saddam Hussein's regime removing an immediate threat — after which Ayatollah Khamenei issued a religious ruling permitting civilian nuclear power while prohibiting weapons or attacks. Israel's calculation, in his reading, rests precisely on that restraint: without a warhead, there is no retaliatory "second strike" to fear. He does not, however, rule out the Revolutionary Guard Corps, rather than Khamenei himself, reviving a weapons track once this war is over.

The scenario he actually fears is not Iran going nuclear but Israel doing so out of desperation if its conventional options run out — a point at which, in his view, Russia's calculus changes. Drawing on Zbigniew Brzezinski's concept of "pivotal states" whose geography matters disproportionately to global power, he names Iran and Ukraine as the two clearest examples: Iran sits astride the Eurasian heartland and the International North-South Transport Corridor, making it, as he puts it, Russia's "first line of defence" — a line already pushed back once when Syria fell. On that basis, he expects Russia, rather than China, to extend some form of deterrent backing, even a nuclear umbrella, to Iran if an existential threshold were approached, pointing to an existing Russia-Iran defence framework under which he says S-300 and reportedly S-400 systems, along with heavy-lift military aircraft, have already reached Iran.

China's role, in his account, has been consistently indirect: heavy pre-war investment in Iran's fibre-optic backbone by Huawei and in networking hardware by ZTE, and — a suspicion rather than a confirmed fact — the possible re-export of chips into Iran embedded in laptops, which face no export ban, and are then "cannibalised" for drones and missiles, alongside possible navigational help from China's BeiDou satellite system. China, he believes, will supply money and machinery but not troops; Russia, in an extreme scenario, might go further. He also flags a separate danger: both sides invoking end-times religious framing — a final, Armageddon-style war on the Israeli side, the return of the Hidden Imam on the Iranian side — as an ideological accelerant that could push escalation onto irrational ground. Domestically, he does not dismiss the theoretical possibility of American casualties being used to build sympathy for harsher measures, even tactical nuclear use, but doubts such a narrative could be controlled in a social-media era so different from Vietnam, especially with a war-weary MAGA base — he cites Trump ally Alex Jones publicly declaring "Trump is finished" — that could as easily produce pressure for new Republican leadership as support for wider war.

A Region Realigning: Gulf Cracks, Iraq's Drift, Turkey's Double Game

Aneja describes the Gulf Cooperation Council as "a divided house" that has to be read country by country. Bahrain, roughly 70 percent Shia but ruled by a Sunni monarchy that excludes Shia citizens from military service, hosts the US Fifth Fleet and is linked to Saudi Arabia's own Shia-majority, oil-producing Eastern Province by a roughly 15-kilometre causeway — a proximity close enough that many Bahrain-based workers commute home each evening to towns such as Dammam or Al-Khobar. Were Bahrain to drift out of the American orbit, he suggests, the same currents could reach into Saudi Arabia's own oil-bearing east; Oman, in his assessment, is already sympathetic to Iran, and he expects Bahrain, Qatar and Oman to be the countries most likely to tilt toward Iran in a post-war Gulf.

Iraq, in his account, is moving furthest and fastest. The US embassy and airbases there have been struck, NATO has announced its own troop withdrawal, a school damaged early in the war is being rebuilt with the backing of Najaf's senior cleric Ayatollah Sistani and Iraqi Shia volunteers, and Iranian-aligned Popular Mobilisation Forces are behind continuing strikes near Erbil — all of which, Iranian commentary already frames as Iraq becoming the first Gulf-region country "liberated" from American influence. Saudi Arabia faces the starkest dilemma: if the US withdraws and Iran fills the vacuum, Riyadh's obvious alternative — a formal security relationship with Israel — is, in his words, "not an easy sell" for a country custodian of Islam's two holiest sites, even though he does not rule it out.

Turkey, in his reading, deserves particular scepticism: despite President Recep Tayyip Erdogan's rhetoric on Gaza and Palestine, Ankara continues selling oil to Israel and maintains military ties with it, which Aneja reads as playing both sides rather than a genuine break from the American-aligned order — a scepticism he says is shared inside Iran's own Revolutionary Guard Corps, which he describes as having "zero trust" toward Turkey, Egypt and the UAE as mediators, trusting only India, and to a real degree Pakistan, to genuinely understand the region. Beyond the Gulf, he treats the Houthis and Hezbollah — which Iran calls allies rather than proxies — as Tehran's most significant remaining leverage: a full or partial Houthi blockade of the Bab-el-Mandeb strait, he argues, is the option most likely to force American de-escalation by damaging the global economy, and could plausibly begin soon. Hezbollah, despite a heavy strike on Beirut and other losses, is "fighting back" in a ground war he — drawing on his own coverage of the group in 2006 — expects will not go well for Israel. He does not expect European NATO members such as Britain and France to join the fighting despite supportive rhetoric, citing shifted voter demographics in Britain, personal humiliation suffered by the French president, and a broader European sense that the odds of success are poor.

Where This Leaves India — and Three Ways the War Could End

On India, Aneja is direct: New Delhi needs both Israel, for technology and defence equipment, and Iran, for the Chabahar port, the International North-South Transport Corridor, energy security and land access to Afghanistan and Central Asia — alongside a longer history that included Iranian support for India during the Babri Masjid period in the early 1990s. He argues India "lost the plot" and its usual sense of balance specifically on the Iran question, even while crediting New Delhi, in the same period, with genuine strategic autonomy elsewhere — a free-trade agreement with the European Union, and continued, if gradually reduced, Russian oil purchases despite American pressure. His specific complaint is that India failed to publicly condemn the killing of a foreign leader on Iranian soil during this war, and separately failed to condemn the torpedoing, reportedly by American forces, of a training vessel carrying naval cadets that had sailed from India — omissions he says broke with the basic responsibility owed to a sovereign country that has historically stood by India.

His prescription is not to abandon the Israel relationship but to stop letting it "drive our agenda," anchoring the India-Iran relationship instead around two shared interests: a common wariness of Pakistan, and energy security — reviving, for instance, a previously studied undersea pipeline route from Iran via Oman to Mumbai that bypasses Pakistan entirely, an idea first pitched to him years ago by an official close to former president Mahmoud Ahmadinejad. He sees the outlines of a possible India-Afghanistan-Iran triangulation taking shape once the war ends, alongside a genuine "course correction" in how India balances its ties.

Asked to project forward, Aneja lays out three possibilities for how the war ends. Trump could simply exit "Afghanistan style" and accept whatever political fallout follows, including with the Israel lobby. More likely, in his assessment, is a negotiated pause reached through consensus between Israel and the United States, worked out largely away from public view. Least likely, but not ruled out, is the boots-on-the-ground scenario — one he believes would trigger American casualties, rising nationalism, and an entirely new and more dangerous phase of the conflict. "It's not a movie," he said, in closing. "It's going to be very interesting to watch how the whole world scenario changes from here — and it's going to be dangerous too."

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