Nous Podcast· 24 Apr 2026· 30:24

Inside India’s Electoral Map: Delimitation & The Muslim Question

India is the world’s largest democracy — but does every vote carry equal power?

Full Transcript

हिंदुस्तान दुनिया की सबसे बड़ी जम्हूरियत [संगीत] है। यहां हर 5 साल में चुनाव होते हैं। जिसमें करोड़ों लोग अपने नुमाइंदे चुनते हैं। द वर्ल्ड्स बिगेस्ट डेमोक्रेटिक इलेक्शन बिग इलेक्शन बिग स्टेक्स बिग टेक्नोलॉजी ग्रेटेस्ट [संगीत] शो ऑन अर्थ। लेकिन हर चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद एक पुराना सवाल फिर खड़ा होता है। क्या यह वाकई [संगीत] जम्हूरियत है? खासकर जब बात मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी की हो जो बरसों से बहस का मुद्दा बना हुआ है। सर इस ऐवान [संगीत] में ओबीसी समाज के एमपी अब अपर कास्ट एमपी के बराबर हो चुके हैं और 14स मुसलमान सिर्फ 4% जीत [संगीत] कर आते हैं। क्या मुसलमानों को लगातार नजरअंदाज किया गया है? एवरीथिंग दैट आवर कॉन्स्टिट्यूशन स्टैंड्स फॉर इज बेस्ड ऑन द फैक्ट दैट वन पर्सन गेट्स वन वोट। क्या वन पर्सन वन वोट का उसूल यहां सचमुच लागू होता है या फिर सियासत के मैदान में उनकी जगह अब भी महदूद ही है? इस वीडियो में हम इसी सवाल को डीलिमिटेशन के नजरिए से गहराई से समझेंगे। यानी [संगीत] पॉलिटिकल मैप कैसे बनाए जाते हैं? पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसीज की सरहदें कैसे तय होती हैं? और क्या यह प्रोसेस मुस्लिम नुमाइंदगी पर सीधा असर डालता है? नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंप्लीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउस को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। यह सर्कल्स देखिए। यह हिंदुस्तान की लोकसभा के कुल 543 मेंबर्स ऑफ पार्लियामेंट को रिप्रेजेंट कर रहे हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यानी हमारे पार्लियामेंट के लोअर हाउस के मेंबर्स। [संगीत] लेकिन इनमें से सिर्फ 24 मुसलमान हैं। यानी [संगीत] जहां मुल्क की आबादी में मुसलमानों का हिस्सा 14.2% है, वहीं उनका पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन महज 4.4% है। [संगीत] और अगर नजर डालें हिंदुस्तान की हुकूमत की प्रिंसिपल एग्जीक्यूटिव बॉडी यूनियन काउंसिल ऑफ मिनिस्टर्स पर तो [संगीत] यहां एक भी मुस्लिम नुमाइंदा नहीं है। यह कम नुमाइंदगी दरअसल कोई ताज्जुब [संगीत] की बात नहीं क्योंकि मुसलमानों को 2024 जनरल इलेक्शन में टिकट ही बहुत कम दिए गए थे। सबसे पहले देखते हैं रूलिंग पार्टी बीजेपी [संगीत] को जो बिहार में जेडीयू के साथ अलायंस में है। एनडीए अलायंस ने पूरे मुल्क के 17 करोड़ मुसलमानों में से सिर्फ दो मुस्लिम उम्मीदवार खड़े किए। वहीं दूसरी तरफ अपोजिशन अलायंस, इंडी अलायंस जिसमें [संगीत] 28 सेंट्रल और रीजनल पार्टीज शामिल हैं। उन्होंने भी सिर्फ 78 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे। जबकि उनका नारा था जितनी आबादी उतना हक। जिसका मतलब ही है कि वह आबादी के हिसाब से रिप्रेजेंटेशन देने की [संगीत] बात करते हैं। और दिलचस्प बात यह है कि इस अलायंस की कई पार्टियां उन राज्यों से ताल्लुक रखती हैं जहां मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी है। कुछ [संगीत] लोग कह सकते हैं कि मुसलमानों को कम सीटें मिलना भारत में बढ़ती हुई राइट विंग फर्सेस के सामने एक सर्वाइवल टैक्टिक [संगीत] है। लेकिन यहां इस बात पर गौर करना जरूरी है कि यह नतीजा सिर्फ 2024 के चुनावों तक महदूद नहीं है। बल्कि यह लंबे अरसे से चली आ रही उस ट्रेंड का हिस्सा है जिसे हम सालों से देख रहे हैं। अगर हम आजाद हिंदुस्तान के पहले आम चुनाव यानी 1952 से भी देखें तो लोकसभा में मुसलमानों की नुमाइंदगी हमेशा से उनकी आबादी के मुकाबले कम रही है। यह एक ऐसी तस्वीर है जो हमें आजादी के बाद से तकरीबन हर चुनाव में देखने को मिलती है। सिर्फ दो पार्लियामेंट्री इलेक्शंस में उनका हिस्सा कुछ बढ़ा। 1980 में 9% और 1984 में 8% तक यह टेंपरेरी इजाफा तब देखने को मिला जब कांग्रेस पार्टी ने इमरजेंसी के बाद नए समाजी तबकों का सपोर्ट हासिल करने के लिए काफी तादाद में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया। लेकिन यह इजाफा बस थोड़े वक्त के लिए ही था। इसके बाद से मुस्लिम एमपीज का रिप्रेजेंटेशन फिर से नीचे ही रहा और यह पैटर्न सिर्फ जनरल इलेक्शंस ही नहीं बल्कि स्टेट इलेक्शंस में भी साफ नजर आता है। अब सवाल यह है आखिर यह आंकड़े ऊपर क्यों नहीं जाते? अब मुसलमानों की इतनी कम नुमाइंदगी के पीछे की वजूहात को समझने के लिए पहले से हुए कुछ रिसर्च पर एक-एक करके नजर डालते हैं। सबसे पहली वजह यह है कि सियासी पार्टियां अक्सर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने से बचती हैं। उन्हें डर होता है कि ऐसा करने से नॉन मुस्लिम्स वोट नाराज हो सकते हैं और उनसे दूर जा सकते हैं। दूसरी बड़ी वजह है वोटों का बट जाना। जब एक ही कॉन्स्टिट्यूएंसी से [संगीत] कई मुस्लिम उम्मीदवार खड़े होते हैं तो उनके वोट आपस में बंट जाते हैं। इसका असर 2014 के लोकसभा चुनावों में यूपी और बिहार में साफ नजर आया था। तीसरी वजह है हमारा इलेक्टोरल सिस्टम जिसे फर्स्ट [संगीत] पास्ट द पोस्ट कहा जाता है। इसमें जो उम्मीदवार सबसे ज्यादा वोट ले आता है वही जीतता है। भले ही उसे कुल वोटों की बहुमत 50% से ज्यादा ना मिली हो। इन दिस सिचुएशन द गवर्नमेंट वी फॉर्म इज नॉट अ रिप्रेजेंटेटिव गवर्नमेंट। दिस इज वन थिंग। द सेकंड थिंग इज दैट जो भी कमजोर है दोज़ हु आर इन माइनॉरिटी आइदर द रिलीजियस माइनॉरिटी और लिंग्विस्टिक माइनॉरिटी और रीजनल माइनॉरिटीज और स्माल स्मॉल पॉलिटिकल पार्टीज दे डोंट गेट ड्यू शयर। इस सिस्टम में मुसलमानों की आबादी का असर और भी कमजोर हो जाता है। चौथी वजह है कुछ पार्लियामेंट्री सीट्स का रिजर्वेशन। कई ऐसी पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसीज हैं जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। लेकिन उन सीट्स को एससी और एसटी के लिए रिजर्व कर दिया जाता है। यह रिजर्वेशन वैसे तो समाज के मेहरूम तबकों को सियासी ताकत देने के लिए हैं। लेकिन इसका नतीजा यह निकलता है कि मुसलमानों के लिए सियासी रास्ते और तंग हो जाते हैं। जो वजह कम सियासी नुमाइंदगी के मसले को सबसे अच्छे तरीके से एक्सप्लेन करती है वो है उनका ज्योग्राफिकल डिस्ट्रीब्यूशन। यह सिर्फ मुस्लिम पार्लियामेंटेरियंस की तादाद तक महदूद नहीं है बल्कि इस बात को भी दिखाता है कि किसी इलाके में उनका वोट बैंक कितना असर डाल पाता है। मुसलमान अक्सर इस तरह बिखरे हुए होते हैं कि ज्यादातर पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसी में वो माइनॉरिटी में ही रहते हैं। इससे उनका एक मजबूत वोट बैंक के तौर पर असर कम हो जाता है और उनकी सियासी ताकत कमजोर हो जाती है। सीएसडीएस का डाटा यह बताता है कि इस मुल्क में जो वोट बैंक है जो एक मु वोट डालता है वो अपर कास्ट का है। मुसलमान का कभी ना वोट बैंक था ना कभी रहेगा। क्या यह ज्योग्राफिकल डिस्पर्शन वाकई इस बात की तरफ इशारा करता है कि हिंदुस्तान में मुसलमान इलाकाई तौर पर बिखरे हुए हैं? हिंदुस्तान में तकरीबन 60 ऐसे जिले हैं जहां मुसलमानों की आबादी 30% से ज्यादा है। मगर जब इन्हीं जिलों को पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसी के नक्शे पर देखा जाता है तो सिर्फ 40 ऐसी कॉन्स्टिट्यूएंसीज निकलती हैं जहां मुस्लिम वोटर्स की तादाद 30% से ज्यादा है। मसला यहीं खत्म नहीं होता। इन 40 कॉनंस्टीट्यूएंसीज में से करीब आठ [संगीत] ऐसी हैं जो एससी या एसटी के लिए रिजर्व कर दी गई हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कुल मिलाकर सिर्फ 32 ही ऐसी सीटें बचती हैं जहां मुसलमान सही मायनों में अपना सियासी असर दिखा सकते हैं। लेकिन इससे पहले कि हम इस पूरे प्रोसेस की बारीकियों में जाएं। पहले [संगीत] यह समझते हैं कि हिंदुस्तान में ज्योग्राफिकल और पॉलिटिकल टेरिटरीज अलग-अलग होते हैं और इसे सबसे अच्छे से समझने के लिए चलिए हिंदुस्तान की राजधानी दिल्ली के नक्शे पर नजर डालते हैं। देखिए यहां हर जिला कई छोटे इलाकों से मिलकर बना है। इन्हीं सीडी ब्लॉक्स या उनके कुछ हिस्सों को मिलाकर असेंबली कॉन्स्टिट्यूएंसीज बनाई जाती हैं। और फिर इन्हीं असेंबली कॉन्स्टिट्यूएंसी को जोड़कर एक पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसी को तैयार किया जाता है। यहां एक बात पर गौर करना जरूरी है कि [संगीत] एक असेंबली कॉन्स्टिट्यूएंसी को कई पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसी में नहीं बांटा जा सकता। यानी एक असेंबली कॉन्स्टिट्यूएंसी सिर्फ एक ही पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसी का [संगीत] हिस्सा हो सकती है। अब आपके ज़हन में सवाल उठ रहा होगा कि आखिर यह पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसीज हैं क्या? हिंदुस्तान को 543 पार्लियामेंट्री कॉन्स्टिट्यूएंसीज में बांटा गया है। हर कांस्टीट्यूएंसी [संगीत] तकरीबन बराबर आबादी पर बेस्ड होती है और हर कॉन्स्टिट्यूएंसी से एक नुमाइंदा लोकसभा के लिए इ होता है। अब सवाल यह उठता है कि इन कॉन्स्टिट्यूएंसीज की सरहदें कौन तय करता है? इसका जवाब है डीलिमिटेशन कमीशन। डीलिमिटेशन कमीशन का काम यह तय करना होता है कि किस कॉन्स्टिट्यूएंसी में कौन-कौन से इलाके आएंगे। यह काम नेशनल और स्टेट दोनों लेवल्स पर होते हैं। यानी लोकसभा और विधानसभा दोनों के लिए। इसका मकसद यह है कि हर वोट की बराबर कीमत हो। चाहे वह किसी भी कॉन्स्टिट्यूएंसी में डाला गया हो। ऐसा करते वक्त कमीशन कई बातें देखता है। जैसे इलाके कितने पासपास हैं, यहां तक पहुंचना कितना आसान है और उस जगह के लोगों में जबान और तहजीब की कितनी सिमिलरिटी है। और यही कमीशन तय करता है कि किन सीटों को एससी और एसटी के लिए रिजर्व किया जाएगा। कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकल 82 के मुताबिक हर 10 साल बाद होने वाले सेंसस के बाद एक कमीशन लोकसभा की सीटों के नंबर को नए सेंसस के आंकड़ों के हिसाब से तय करता है। यह एक्सरसाइज 1952, [संगीत] 494 सीटें, 1962, 522 सीटें, 1972, 543 सीटें और 2002 में हुई। जिससे लोकसभा सीटें 494 से बढ़कर 543 हो गई। इसी दौरान [संगीत] कुछ स्टेट्स जैसे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु ने आबादी पर काबू पाने के कदम कामयाबी से उठाए थे। जिसकी वजह से उनकी पार्लियामेंट की [संगीत] सीटें कम हो सकती थी। इसीलिए 1977 में इस एक्सरसाइज को 2001 की जनगणना तक टाल दिया गया। फिर 2002 में दोबारा इलेक्टोरल कॉन्स्टीट्यूएंसीज की सरहद तय की गई। लेकिन इस बार यह फैसला किया गया कि राज्यों में सीटों की संख्या नहीं बदलेगी ताकि उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों को ज्यादा आबादी बढ़ाने का फायदा ना मिले। इस बार डीलिमिटेशन के दो मकसद थे। पहला सभी कॉन्स्टिट्यूएंसीज में आबादी लगभग बराबर हो सके। जिससे किसी इलाके में बहुत ज्यादा और किसी में बहुत कम आबादी ना हो। दूसरा, रिजर्व्ड सीटों का सही बंटवारा हो ताकि एससी एसटी समुदाय की बढ़ती आबादी के मुताबिक उनके लिए तय सीटों को सही से बढ़ाया जा सके। अब हमारे सामने कुछ बड़े सवाल हैं। क्या डीलिमिटेशन मुस्लिम डोमिनेटेड इलाकों में मुस्लिम वोटों का असर कम कर सकता है? शॉर्ट में इसका जवाब है हां यह जेरी मेंडरिंग के जरिए मुमकिन है जो अमेरिकन पॉलिटिक्स में बहुत आम है। थ्री स्टेट्स जेरी जेरी मैडरिंग स्प्री रिपब्लिकन्स एंड डेमोक्रेट्स ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन अग्रेसिव कैंपेनरी इस लफ्ज की बुनियाद एल्ब्रिज जेरी ने रखी जिन्होंने 1800 की शुरुआत में मैसच्यूसेस की कॉन्स्टिट्यूएंसी [संगीत] की सरहद अपने दोबारा चुनाव जीतने के लिए बदल दी थी। तो आखिर जेरी मैडरिंग क्या है? यह एक सियासी स्ट्रेटजी है जिसमें कॉनस्टीट्यूएंसीज की सरहदें इस तरह बदली जाती हैं कि किसी एक खास पार्टी या तबके को फायदा मिले और दूसरों को नुकसान हो। हिंदुस्तान में जहां फेडरल स्ट्रक्चर और मल्टी पार्टी सिस्टम है, वहां यह मालूम करना मुश्किल हो सकता है कि इसका फायदा किसे हो [संगीत] रहा है। लेकिन कुछ मिसाले ऐसी हैं जो बताती हैं कि कॉन्स्टिट्यूएंसी की सरहदें मुस्लिम नुमाइंदगी को महदूद कर रही हैं। जेरी [संगीत] मेंडरिंग में खासतौर से तीन तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है। जिसमें क्रैकिंग, स्टकिंग और पैकिंग शामिल है। पहला तरीका है क्रैकिंग का। इसमें ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को तोड़कर अलग-अलग कॉनंस्टीट्यूएंसीज में बांट दिया जाता है ताकि उनके वोट इकट्ठा ना हो सके और उनकी वोट की ताकत तकसीम हो जाए। दूसरा तरीका है स्टकिंग। इसमें क्रैकिंग के बाद बचे हुए हिस्सों को या तो ऐसी कॉन्स्टिट्यूएंसीज में शामिल कर दिया जाता है जहां मुसलमान कम तादाद में होते हैं या फिर उन्हें ऐसी कॉन्स्टिट्यूएंसी से मिला दिया जाता है जहां पहले से ही मुस्लिम आबादी ज्यादा है। पहले मामले में उनका असर कमजोर हो जाता है और दूसरे में उनके वोटों को एक जगह इस तरह से इकट्ठा कर दिया जाता है कि उसे आसानी से कंट्रोल किया जा सके और उन वोटों के असरात सीमित रह जाए। तीसरा तरीका है पैकिंग। यह क्रैकिंग के बिल्कुल ऑोजिट होता है। इसमें मुस्लिम वोटर्स को गिनती की चंद कांस्टीट्यूएंसीज में समेट दिया जाता है। नतीजा यह निकलता है कि जहां दो सीटें हो सकती थी, वहां बस एक मिलती है या कभी एक सीट भी नहीं। हिंदुस्तान के कई सूबों में जेरी मेंडरिंग की काफी मिसालें मिलती हैं। अब एक क्लासिक केस देखते हैं कि क्रैकिंग और पैकिंग कैसे काम करती है। बिहार के पूर्णिया जिले में करीब 38% मुस्लिम आबादी है। जबकि किशनगंज जिले में यह 68% के करीब है। पूर्णिया के ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाके अमोर और बाईसी जिन्हें 60% से ज्यादा मुस्लिम आबादी की वजह से मजबूत माना जाता था अब किशनगंज में मिला दिए गए हैं। इसका नतीजा पूर्णिया सीट में मुस्लिम वोटर्स की तादाद 38% से घटकर 23% रह गई। इसकी वजह से पूर्णिया में मुस्लिम वोट कम डिसाइसिव हो जाता [संगीत] है। अब उत्तर प्रदेश पर नजर डालते हैं। बरेली जिले की कुल आबादी 40 लाख से ज्यादा है। जिसमें करीब 35% मुस्लिम है। यह आबादी तीन लोकसभा सीटों में बांट दी गई है। आंवला, पीलीभीत और बरेली। इनमें से किसी भी सीट पर मुस्लिम वोटर्स 30% से ज्यादा नहीं है। क्यों? क्योंकि ज्यादा मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को उन जगहों में मिला दिया गया जहां मुसलमानों की आबादी कम है। जरा नंबर्स को समझते हैं। आंवला सीट का 44% हिस्सा बदायूं से आता है। जहां मुस्लिम आबादी सिर्फ 22% है। इससे आंवला में मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी घटकर सिर्फ 29% रह जाती है। ऐसे ही बहेरी ब्लॉक जहां 43% मुस्लिम हैं, उसे पीलीभीत में जोड़ दिया गया। जहां मुस्लिम सिर्फ 24% है और ऐसे ही बरेली जिले के बाकी हिस्सों को मिलाकर बरेली सीट बनाई गई। जिससे यहां मुस्लिम वोट 28% ही रह गया। नतीजा बरेली में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी होने के बावजूद पिछले चुनावों में बरेली और पीलीभीत सीटों पर बीजेपी सांसद ही जीतकर आए थे। अब आते हैं बलरामपुर पर। यहां की 38.4% मुस्लिम आबादी वाले इलाकों को श्रावस्ती सीट में मिला दिया गया। जहां पहले से 30.79% मुस्लिम थे। इसके अलावा अतरौला ब्लॉक जहां 44% मुस्लिम हैं उसे गोंडा सीट में शामिल कर दिया गया। जहां मुस्लिम सिर्फ 19% हैं। नतीजा मुस्लिम वोट दोनों ही सीटों में बंट गया। यही सिलसिला बहराइच जिले में भी जारी [संगीत] रहा। जहां करीब 34% मुस्लिम हैं। इस जिले को दो लोकसभा सीटों में बांट दिया गया। बहराइच और कैसरगंज। लेकिन कैसरगंज की 60% आबादी गोंडा जिले से ली गई। जहां मुस्लिम आबादी कम है। जिससे यहां मुस्लिम वोटों की हिस्सेदारी सिर्फ 25% रह गई। अब आते हैं बिजनौर पर। यहां की कुल आबादी 36 लाख से ज्यादा है और यहां 43% मुस्लिम है। इस जिले को तीन लोकसभा सीटों में बांटा गया बिजनौर, मुरादाबाद और नगीना। देखने में लगता है कि यहां मुसलमानों की सही नुमाइंदगी है। लेकिन सवाल यह उठता है कि मुस्लिम वोटों को सिर्फ उन्हीं सीटों में क्यों समेट दिया गया है जहां उनकी आबादी पहले से ही ज्यादा है। इससे यह सवाल उठता है कि बिजनौर की अपनी अलग सीट क्यों नहीं बनाई गई? असल में यहां नगीना सीट मौजूद है। जहां 46% मुस्लिम आबादी है। लेकिन इसमें एक कैच है जिस पर हम वीडियो में आगे बात करेंगे। तो सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं आसाम और वेस्ट बंगाल में भी मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी है। तो सवाल उठता है क्या इन राज्यों का पॉलिटिकल मैप भी ऐसे ही कुछ दिखाता है? चलिए देखते हैं। शुरुआत करते हैं वेस्ट बंगाल के उत्तर दीनाजपुर जिले से। यहां की 50% आबादी मुस्लिम है। लेकिन इसे तीन लोकसभा सीटों में बांट दिया गया है। रायगंज, दार्जिलिंग और बालूर घाट। वही पुरानी कहानी मुस्लिम मेजॉरिटी एरियाज को ऐसे इलाकों में मिला दिया गया जहां मुस्लिम आबादी कम है। नतीजा तीनों सीटों पर मुस्लिम नुमाइंदगी कम हो गई। कैसे? पहला। 50% से ज्यादा मुसलमान आबादी वाले चोपड़ा ब्लॉक को दार्जिलिंग जिले और कलीमपोंग जहां सिर्फ 4.27% मुस्लिम हैं के साथ मिला दिया गया। इससे दार्जिलिंग सीट पर मुस्लिम आबादी सिर्फ 14.4% रह गई। दूसरा इतहर ब्लॉक और साउथ दिनाजपुर जिले को मिलाकर बालूर घाट सीट बनाई गई। जहां मुस्लिम आबादी 29.5% ही रह गई। और तीसरा उत्तर दिनाजपुर जिले के बाकी हिस्सों को मिलाकर रायगंज सीट बनाई गई जहां 41.7% मुस्लिम हैं और तीनों सीटों पर बीजेपी के सांसद हैं। अब आते हैं असम पर जहां करीब 3.5 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं और उनमें तकरीबन 34% मुसलमान हैं। असम में लोकसभा की 14 सीटें हैं। लेकिन इन सब में सिर्फ एक ही मुसलमान सांसद है। मुसलमान यहां बड़ी तादाद में मौजूद हैं। मगर ज्यादातर अलग-अलग कॉन्स्टिट्यूएंसीज़ में बिखरे हुए हैं। अब नज़र डालते हैं गुवाहाटी लोकसभा सीट पर जो चार जिलों से बनी है। गोलपारा, नलबारी, कामरूप और कामरूप मेट्रोपॉलिटन। देखिए नलबरी से बलखेतरी और तीन कामरूप विधानसभा सीटें बोको, चायगांव, हाजो में 45 से 55% मुस्लिम वोटर हैं। लेकिन इसे कामरूप मेट्रोपॉलिटन जिले के साथ मिला दिया गया। जहां मुस्लिम सिर्फ 12% हैं। गुवाहाटी सीट का कुल वोटर बेस 22 लाख है जो एवरेज 16 लाख से कहीं ज्यादा है। 580 मुस्लिम वोटर्स होने के बावजूद उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 26.9% रह जाती है। मंगलदोई सीट पर भी यही हाल है। यह चार जिलों से बनी है। कामरूप, नलवारी और पूरी दर्रांग और उदलगुड़ी डिस्ट्रिक्ट। इसे तीन हिस्सों में बांटे तो पहले हिस्से कामरूप और नलबारी में करीब 20 से 30% मुस्लिम वोटर हैं। ऐसे ही दूसरे हिस्से दर्रांग डिस्ट्रिक्ट में तकरीबन 64.3% मुस्लिम हैं और तीसरे हिस्से उदलगुड़ी में सिर्फ 12.6% मुस्लिम हैं। और जब इन तीनों हिस्सों को मिला दिया गया तो मुस्लिम आबादी घटकर सिर्फ 32.8% रह गई। तो सवाल यह है आखिर मुसलमान अक्सरियत वाले जिलों को इस तरह क्रैक यानी तोड़कर मुस्लिम माइनॉरिटी कॉन्स्टिट्यूएंसीज में स्टक यानी शामिल क्यों कर दिया जाता है? जबकि जिन जिलों में मुसलमान पहले से माइनॉरिटी में हैं, वहां ऐसा कभी भी नहीं किया जाता। यह जेरीडरिंग का पूरा मामला एक और बात से जुड़ा है जिसे एक्सपर्ट्स अफमेटिव जेरीडरिंग कहते हैं। कई ब्यूरोक्रेट्स, एक्टिविस्ट्स और स्कॉलर्स यह बात उठाते रहे हैं कि जो सीटें एससी या एसटी के लिए रिजर्व की जाती हैं, उनमें अक्सर ऐसे इलाके शामिल कर लिए जाते हैं जहां मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी होती है। अब सवाल यह है क्या रिजर्वेशन की वजह से मुस्लिम नुमाइंदगी में यह गिरावट अनअवॉयडेबल है? जवाब है नहीं। ऐसा जरूरी नहीं है। सीटें रिजर्व करने का क्राइटेरिया क्या होता है? किसी भी सीट को रिजर्व करने का बुनियादी पैमाना यह है कि उस इलाके में एससीस और एसटीज की कितनी तादाद है। लेकिन एससीस के लिए एक और शर्त रखी गई है। उसे कहते हैं ज्योग्राफिकल डिस्पर्सल ऑफ सीट्स। यानी ज्योग्राफी के हिसाब से सीटों का बिखराव। इसकी वजह यह है कि एसटी आबादी आमतौर पर कुछ खास इलाकों में होती है। जबकि एससी समुदाय पूरे राज्य में फैले होते हैं। इसलिए यह शर्त यह इंश्योर करने के लिए है कि उन इलाकों में रहने वाले एससी कम्युनिटी के लोगों को भी नुमाइंदगी मिले। जहां उनकी आबादी बाकी कम्युनिटीज के मुकाबले में कम है। लेकिन यही ज्योग्राफिकल डिस्पर्सल वाला नियम डीलिमिटेशन कमीशन को यह ताकत देता है कि वो अपनी मर्जी से एससी एसटी रिजर्वेशन वाली सीटें तय करें। और इसी वजह से मुसलमानों की आबादी वाले इलाकों पर भी सीधा असर पड़ सकता है। ऐसी कई लोकसभा कास्टीट्यूएंसीज हैं जहां मुस्लिम आबादी काफी है। लेकिन वहां की सीटें एससी और एसटी के लिए रिजर्व की गई हैं। आइए इन सीट्स के बारे में जानते हैं। आपको वीडियो के पिछले हिस्से से नगीना याद होगा। यह उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट है। यहां मुसलमान 43% और एससी 21% हैं। लेकिन फिर [संगीत] भी यह सीट एससी के लिए रिजर्व कर दी गई। उत्तर प्रदेश में ही बहराइच का हाल भी कुछ ऐसा ही है। यहां मुसलमान 33% और एससी सिर्फ 15% हैं। फिर भी यह सीट एससी के लिए रिजर्व रखी गई। अब झारखंड पर नजर डालते हैं। यहां मुसलमानों की कुल आबादी 14% है। लेकिन वो मुख्य रूप से पाकुड़ और साहिबगंज जिलों में रहते हैं। यह दोनों जिले मिलकर राजमहल लोकसभा सीट बनाते हैं। जहां मुसलमान वोटर्स 33% हैं और एससी 29% हैं। इसके बावजूद यह सीट एसटी के लिए रिजर्व कर दी गई। कुछ ऐसा ही मामला वेस्ट बंगाल के साउथ 24 परगना जिले का है। यहां की आबादी 80 लाख से ज्यादा और तकरीबन [संगीत] 35% मुस्लिम है। इस जिले में डायमंड हार्बर और जॉय नगर जैसी सीटें आती हैं। जहां मुस्लिम वोटर 30% से ज्यादा हैं। लेकिन जॉय नगर सीट जिसमें लगभग 36% मुस्लिम वोटर हैं और एससी 30% हैं उसे एससी के लिए रिजर्व कर दिया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इस जिले में दो सीटें जयनगर और मथुरापुर एससी के लिए रिजर्व हैं। जबकि मुस्लिम वोटरों की मजबूत मौजूदगी केवल एक सीट तक ही सीमित कर दी गई। इसी तरह बोलपुर है जो बिरभूम और बर्धमन जिलों का हिस्सा है। वहां मुसलमानों की आबादी करीब 30% है और एससी 31% मगर यह सीट भी एससी के लिए रिजर्व कर दी गई। आखिर में आसाम का करीमगंज यहां 50% से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। फिर भी यह सीट पिछले साल तक एससी के लिए रिजर्व थी। तो क्या मार्जिनलाइज्ड कास्ट ग्रुप्स को सियासी तौर पर मजबूत बनाने के लिए मुसलमानों की नुमाइंदगी को कुर्बान करना जरूरी है? देखिए डिस्पर्शन रिक्वायरमेंट खुद ब खुद इस नाइंसाफी की वजह नहीं है। असल मसला सियासी चालबाजियों और डीलिमिटेशन के अमल में बायसनेस का है। एससी के लिए रिजर्व सीटें सिर्फ उन इलाकों में रखने की कोई मजबूरी नहीं है। जहां उनकी आबादी सबसे ज्यादा हो। ऐसी बहुत सी कॉन्स्टिट्यूएंसीज हैं जहां एससी आबादी अच्छी खासी है मगर मुस्लिम आबादी कम है। वो आज भी अनरिजर्व हैं। मिसाल के तौर पर आजमगढ़, धौरहरा, मिर्जापुर, उन्नाव और बांकुड़ा इसलिए सोचना चाहिए कि क्या कास्ट डिस्पैरिटीज को खत्म करने का अमल किसी और मेहरूम तबके के सियासी हुकूक कुर्बान करके ही किया जा सकता है। डीलिमिटेशन कोई पुराना मसला नहीं है। हाल ही में 2023 में आसाम और जम्मू कश्मीर में की गई डीलिमिटेशन को बायस्ड और डिस्क्रिमिनेटरी करार दिया गया है। असम में इस नई डीलिमिटेशन एक्सरसाइज ने कई मुस्लिम आबादी वाली असेंबली कॉन्स्टिट्यूएंसीज की कंपोजिशन को बदल दिया है। और इलेक्शन कमीशन पर इल्जाम लगे हैं कि उसने कॉन्स्टिट्यूएंसी का बंटवारा मुस्लिम बनाम गैर मुस्लिम और बंगाली बनाम गैर बंगाली की बुनियाद पर अंजाम दिया है। 2023 की डीलिमिटेशन के बाद आसाम में रिजर्व सीटों की तादाद 24 से बढ़कर 28 हो गई और करीमगंज सीट अब रिजर्व नहीं रही। इसी तरह बरपेटा कॉन्स्टिट्यूएंसी को तब्दील कर दिया गया और उसकी मुस्लिम आबादी को ढुबरी कॉन्स्टिट्यूएंसी में शामिल कर दिया गया। यह तब्दीली बरपेटा को अब एक मुस्लिम माइनॉरिटी सीट बना देती है। बरपेटा जिले के इन गांवों को देखिए। यह भी डुबरी कॉन्स्टिट्यूएंसी में शामिल कर दिए गए जो कि ज्योग्राफिकली काफी दूर हैं। यह डीलिमिटेशन एक्सरसाइज सिर्फ इस बात को उजागर करती है कि यह [संगीत] किस कदर सियासी मकसद को ध्यान में रखकर किया गया है। यह सिर्फ मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी को ही कमजोर नहीं करता है बल्कि सिस्टेमिक डिस्क्रिमिनेशन का एक नया रास्ता भी खोलता है और देखने में यह लग सकता है कि मुसलमानों को एक सीट मिल रही है और दूसरी सीट जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि हालिया डीलिमिटेशन के बाद उन्हें कई कॉन्स्टिट्यूएंसीज़ में खासतौर पर अपर आसाम में सियासी नुमाइंदगी में कमी का सामना करना पड़ रहा है। और यही तरीका कश्मीर में भी दोहराया गया। सर ये कौन सा कानून है जब आपने ड्यूमिनेटेशन कश्मीर में किया जेएनके में तो कश्मीर में आपने सिर्फ एक सीट बढ़ा दी। झूम खेते में पांच बढ़ाई। लड़ा दिया कुट्टू को एक दूसरे से। अनंतनागंटएंसी में अब मुस्लिम मेजॉरिटी वाले जिले रजौरी और पुंज को शामिल कर दिया गया है। जो पहले जम्मू हल्के का हिस्सा थे। इस तब्दीली से जम्मू कॉन्स्टिट्यूएंसी में हिंदू आबादी 61% से बढ़कर 84% हो गई। जबकि मुसलमानों की आबादी 32% से गिरकर सिर्फ 7% रह गई। अनंतनाग कॉनंस्टीट्यूएंसी अब 100 किलोमीटर से भी ज्यादा के इलाके पर फैला हुआ है और बेशक इस कॉन्स्टिट्यूएंसी की आबादी एवरेज से कहीं ज्यादा होगी। यह डीलिमिटेशन एक्सरसाइज मजहबी और नस्ली बुनियादों पर की गई मालूम होती है। जिससे गैर मुस्लिम वोटों को ज्यादा कॉन्स्टिट्यूएंसीज में जोड़कर मजबूत किया जा सके और मुस्लिम वोटों की सियासी ताकत को कमजोर किया जा सके। इसके साथ ही यहां अलाकाई मुश्किलात, अलग-अलग जमीनी हालात और कल्चरल कॉन्फ्लिक्ट्स को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। अब एक बड़ा सवाल यह उठता है क्या डीलिमिटेशन की यह एक्सरसाइज रूलिंग पार्टी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल कर सकती है? मशहूर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट जॉन ड्रेस का मानना है कि 2021 की जनगणना में देरी शायद सरकार की स्ट्रेटजी का पार्ट है ताकि डीलिमिटेशन को तेज किया जा सके क्योंकि अगली डीलिमिटेशन एक्सरसाइज 20231 की जनगणना के बाद तय होगी। इसीलिए हुकूमत के लिए फायदे की बात होगी कि वह 202 की जनगणना को टालकर 2026 में करें और पावर में रहते हुए उसी दौरान डीलिमिटेशन का प्रोसेस पूरा [संगीत] करें। आबादी का हिस्सा उत्तर भारत खासकर हिंदी पट्टी में बढ़ने का अंदाजा है और इस बदलाव से बीजेपी को फायदा हो सकता है। लेकिन यह भी याद रखना जरूरी है कि भारत में सियासी सरहदें खींचने की प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह न्यूट्रल नहीं रही। यह भी साफ है कि मौजूदा डीलिमिटेशन मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी को नुकसान पहुंचाती [संगीत] है। लेकिन यह स्टडी किसी एक फायदा उठाने वाले की साफ पहचान नहीं कर पाता। मुसलमान वोटों की मोबिलाइजेशन सेकुलर पार्टियों के लिए फायदेमंद हो सकती हैं या फिर नए पार्टियों और आजाद कैंडिडेट्स के लिए मौके खुल सकती हैं। मुसलमान वोटों का बंटवारा या इकट्ठा होना राइट विंग पार्टीज को नुकसान पहुंचा सकता है या सेुलर पार्टियों के लिए फायदा बना सकता है। इसके अलावा मुसलमानों का वोटिंग प्रेफरेंस गैर मुस्लिमों के वोटिंग प्रेफरेंस पर भी असर डालता है। जिससे सटीक एनालिसिस और भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए जरूरी है कि और इन डेप्थ स्टडी [संगीत] की जाए ताकि यह पता चल सके कि हिंदुस्तान में डीलिमिटेशन की प्रक्रिया वाकई जेरी मेंडरिंग का हिस्सा रही है या नहीं। तो क्या डीलिमिटेशन की इस प्रोसेस ने मुसलमानों की सियासी नुमाइंदगी पर नेगेटिव असर डाला है? जवाब हां है। 18वीं लोकसभा में सिर्फ 24 मुस्लिम सांसद चुने गए जो कुल सीटों का 5% से भी कम है। इन 24 सांसदों में से तीन ऐसे इलाकों से चुने गए जहां मुसलमानों की आबादी 15% से भी कम है। जबकि बाकी 21 सांसद उन कॉन्स्टिट्यूएंसी से आए हैं जहां मुसलमानों की आबादी तकरीबन 30% या उससे ज्यादा है। दिलचस्प बात यह है कि इन 21 में से कम से कम 15 कॉन्स्टिट्यूएंसी ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी 50% से भी ज्यादा [संगीत] है। हिंदुस्तान में करीब 32 ऐसी अनरिजर्व्ड कॉन्स्टिट्यूएंसी मौजूद हैं जहां मुस्लिम वोटरों का हिस्सा 30% से ज्यादा है। लेकिन इसके बावजूद मुसलमानों की इफेक्टिव रिप्रेजेंटेशन महज 21 [संगीत] सीटों तक सिमट गई है। मगर यह सिर्फ मुस्लिम सांसदों की तादाद का मसला नहीं है। [संगीत] यह मुसलमानों की पॉलिटिकल मार्जिनलाइजेशन का मसला भी है। अगर मुसलमानों को सियासी ताकत हासिल करनी है तो उनको अपनी इलेक्टोरल इन्फ्लुएंस को मजबूत करना होगा। मगर डीलिमिटेशन की मौजूदा शक्ल उनकी बारगेनिंग पावर को कमजोर कर रही है। जिससे उनकी [संगीत] पॉलिटिकल एजेंसी पर नेगेटिव असर पड़ रहा है। इसका नतीजा यह निकलता है कि सियासी पार्टियां अपने इलेक्शन मेनिफेस्टो से लेकर पार्लियामेंट में होने वाली डिबेट्स तक में मुसलमानों के मुद्दों को नजरअंदाज कर देती हैं। इससे ना सिर्फ उनका पॉलिटिकल प्रेजेंस कम होता जा रहा है बल्कि वह पॉलिटिकल डिस्कोर्स से भी बाहर हो रहे हैं। जब तक मुसलमानों को बराबरी का इलेक्टोरल स्पेस नहीं मिलेगा उनका वोट [संगीत] महज एक सिंबॉलिक एक्ट बनकर रह जाएगा।

Companion article

A Democracy of Uneven Votes

India holds the largest elections on earth, with hundreds of millions of voters choosing 543 members of the Lok Sabha every five years. But the result, election after election, raises an uncomfortable question about whether "one person, one vote" holds for all of India's citizens equally. Muslims are roughly 14.2 percent of the population, yet hold only 4.4 percent of seats in the 18th Lok Sabha, just 24 of 543. The Union Council of Ministers, the body that runs the government, currently has no Muslim member at all.

That shortfall begins before votes are counted. In the 2024 general election, the ruling BJP and its NDA allies fielded only two Muslim candidates nationwide out of a Muslim population of roughly 170 million. The opposition INDIA bloc, a coalition of 28 national and regional parties, did only somewhat better, nominating 78 Muslim candidates — despite campaigning on "jitni aabadi, utna haq" (representation in proportion to population).

This is not a one-election anomaly. Since 1952, Muslim representation in the Lok Sabha has consistently trailed the community's population share. The only real exceptions came in 1980 and 1984, when Muslim MPs briefly made up 9 and 8 percent of the house, after Congress handed out more tickets to Muslim candidates while rebuilding support after the Emergency. That bump did not last, and the pattern resumed, visible in state assemblies as well as Parliament.

Why the Numbers Don't Add Up

Several structural forces compound to keep the numbers where they are. Parties often avoid fielding Muslim candidates, calculating that doing so could alienate non-Muslim voters. Where multiple Muslim candidates do contest the same seat, their votes tend to split — a dynamic visible in Uttar Pradesh and Bihar in the 2014 general election. India's first-past-the-post system compounds this: a candidate can win with a plurality rather than a majority, so the government that emerges is not always strictly representative of how people voted. Religious and linguistic minorities, regional communities and smaller parties routinely fail to receive their due share of seats under this system, and Muslims are especially exposed given how the community is spread across the country. Reservation for Scheduled Castes and Tribes plays a role too, since many constituencies with substantial Muslim populations have been designated SC or ST reserved, narrowing the field realistically open to Muslim candidates.

But the single biggest factor, according to the analysis, is geographic distribution: Muslims are dispersed across constituencies in a way that dilutes their electoral weight even where their raw numbers are large. Data from the Centre for the Study of Developing Societies is invoked to make the point, summarised by one contributor to the discussion as: "Muslims never were, and never will be, a vote bank," unlike upper-caste voters. India has roughly 60 districts where Muslims exceed 30 percent of the population, but mapped onto parliamentary constituencies, only 40 seats clear that same threshold — and of those, roughly eight are reserved for SC or ST candidates, leaving just 32 constituencies where Muslim voters can realistically exercise decisive influence.

How India Draws Its Political Map

To see why the geography works out this way, it helps to understand how constituencies are built. Districts are made up of smaller CD blocks, combined into assembly constituencies, which are in turn combined into parliamentary constituencies; an assembly constituency can never be split across two parliamentary seats. The Delimitation Commission decides which areas fall into which constituency, guided by geographic contiguity, accessibility, and linguistic or cultural similarity — and it is this commission that also decides which seats are reserved for Scheduled Castes and Scheduled Tribes.

Under Article 82 of the Constitution, Lok Sabha seats and their boundaries are meant to be revised after every decennial census, as happened in 1952, 1962, 1972 and 2002. Because states such as Andhra Pradesh and Tamil Nadu had successfully controlled population growth by the 1970s and stood to lose seats as a result, the exercise was frozen in 1976 and postponed until after the 2001 census. When it resumed in 2002, boundaries were redrawn, but the number of seats allotted to each state was left unchanged — a deliberate choice to prevent high-fertility states like Uttar Pradesh, Bihar, Madhya Pradesh and Rajasthan from being rewarded with extra seats for outpacing others in population growth. That round had two aims: equalising population across constituencies, and adjusting reserved seats to reflect the growing SC and ST population.

Cracking, Stacking, Packing

Could delimitation be used to dilute the Muslim vote deliberately? The analysis argues yes, pointing to gerrymandering — a term coined after Elbridge Gerry redrew a Massachusetts constituency to help his own re-election in the early 1800s. It works through three techniques: cracking, which splits a concentrated population across multiple constituencies so its vote never consolidates; stacking, which folds the leftover pieces into constituencies where the group is already a small minority, or merges them into seats it already dominates, limiting its influence either way; and packing, the inverse of cracking, which crowds a population into as few seats as possible so a group that could plausibly win two wins only one, or none.

The case studies are numerous. In Bihar, Purnia district is roughly 38 percent Muslim, while neighbouring Kishanganj is around 68 percent; blocks over 60 percent Muslim have been folded into Kishanganj, dropping Purnia's Muslim voter share to about 23 percent. In Uttar Pradesh, Bareilly district — more than four million people, roughly 35 percent Muslim — has been split across three Lok Sabha seats, none of which exceeds 30 percent Muslim voters, each high-Muslim block merged with a lower-Muslim neighbouring area; BJP MPs have gone on to win both resulting seats. Similar splits recur in Balrampur, Bahraich and Bijnor, where large Muslim populations are consistently divided among seats where the community ends up short of a decisive share.

West Bengal and Assam show the same design at work. Uttar Dinajpur district, 50 percent Muslim, has been split across three seats, its most heavily Muslim block merged into Darjeeling and Kalimpong, where Muslims are under 5 percent — leaving all three resulting seats, now held by BJP MPs, well below the district's real Muslim share. In Assam, roughly 34 percent Muslim overall, only one of 14 Lok Sabha MPs is Muslim; the Guwahati seat absorbs Muslim-majority assembly segments into a much larger, mostly non-Muslim district, producing an oversized constituency where Muslims are just 26.9 percent of the electorate.

When Reservation Becomes a Lever

Reservation for Scheduled Castes carries a further requirement known as the geographical dispersal of seats, intended to ensure SC communities — spread across a state rather than concentrated the way many Scheduled Tribes are — get representation even where they form a small share of any one constituency. That dispersal rule, the analysis argues, hands the Delimitation Commission real discretion over which seats become SC-reserved, discretion that can just as easily fall on constituencies with large Muslim populations.

Nagina in Uttar Pradesh is 43 percent Muslim and only 21 percent SC, yet reserved for Scheduled Castes; Bahraich, also in Uttar Pradesh, is 33 percent Muslim against 15 percent SC, and likewise reserved. Jharkhand's Rajmahal seat is 33 percent Muslim and 29 percent SC but reserved for Scheduled Tribes, and in West Bengal's South 24 Parganas district, Jaynagar — 36 percent Muslim, 30 percent SC — is SC-reserved alongside a second reserved seat in the same district, confining meaningful Muslim electoral weight there to a single unreserved seat. Assam's Karimganj, over 50 percent Muslim, was SC-reserved until as recently as last year. The dispersal rule is not inherently unfair — seats with large SC and low Muslim populations, such as Azamgarh and Unnao, remain unreserved — so the analysis frames the deeper issue as bias in how delimitation is carried out, while asking whether closing caste disparities should cost another marginalised community its political rights.

Assam and Kashmir, 2023

Delimitation is not settled history. The exercises carried out in Assam and Jammu & Kashmir in 2023 have both been described as biased and discriminatory. In Assam, the redrawing altered numerous Muslim-populated assembly constituencies, and the Election Commission has faced accusations of drawing boundaries along Muslim-versus-non-Muslim and Bengali-versus-non-Bengali lines. Reserved seats in the state rose from 24 to 28, Karimganj lost its SC-reserved status, and Barpeta was reconstituted so that its Muslim population shifted into neighbouring Dhubri, turning Barpeta into a Muslim-minority seat.

The same pattern played out in Jammu and Kashmir, where the 2023 exercise added only one seat in the Kashmir region against five in Jammu. The Anantnag constituency absorbed the Muslim-majority districts of Rajouri and Poonch, previously part of Jammu's territory, pushing the Hindu share of the Jammu constituency from 61 to 84 percent while the Muslim share fell from 32 to 7 percent. Anantnag itself now stretches more than 100 kilometres, folding together areas of distinct terrain and culture.

Who Gains, and What Comes Next

Whether the ruling party can use delimitation to its own advantage going forward is an open question the analysis does not fully resolve. It cites development economist Jean Drèze's view that the delay in conducting the 2021 census may itself be strategic, since the next delimitation exercise is tied to it; pushing the census to 2026 would let the government complete a fresh round of delimitation while still in power, at a moment when population share is expected to grow fastest in the Hindi-speaking north — a shift widely expected to favour the BJP.

The analysis stops short of naming a single, certain beneficiary. Muslim vote mobilisation could just as easily help secular parties or create openings for new parties and independents, while the splitting or concentration of the Muslim vote could hurt right-wing parties in some seats even as it helps them in others — and Muslim voting preferences shape how non-Muslim voters behave too, complicating any precise reading of the effect.

What is not in dispute is the outcome: 24 Muslim MPs in the 18th Lok Sabha, under 5 percent of the House, of whom only three come from constituencies where Muslims are less than 15 percent of the population. The other 21 were elected from constituencies that are roughly 30 percent or more Muslim, and at least 15 of those are Muslim-majority, exceeding 50 percent. Nationally, there are roughly 32 unreserved constituencies where Muslim voters exceed 30 percent of the electorate, yet effective representation is confined to just 21 seats.

The consequence, the analysis argues, goes beyond seat counts: it is political marginalisation. As delimitation weakens the Muslim electorate's bargaining power, parties have less incentive to address Muslim concerns in manifestos or parliamentary debate, pushing the community further from the centre of political discourse. Until Muslims have equal electoral space, their vote risks becoming little more than a symbolic act.

No individual guest is named on camera beyond a passing reference to economist Jean Drèze; claims not attributed to him above are Nous's own analysis, drawn from the discussion in the video.

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