Nous Podcast· 15 Mar 2026· 1:01:48

Is a New Global Order Emerging From This War? | Ghazala Wahab

In this podcast, senior journalist Bushra Khanum speaks with Ghazala Wahab, Editor of Force magazine, about the geopolitical implications of the ongoing US–Israeli war on Iran. The conversation examines how the conflict reflects a broader shift in global power dynamics, with Russia and China appe…

Full Transcript

इस साल भी वो उम्मीद ये कर रहे थे रशिया इतना खुल के ईरान के सपोर्ट में नहीं आएगा। यही हाल चाइना का है। चाइना भी पिछले साल थोड़ा सा ढके छुपे तरीके से ईरान की मदद कर रहा था। मगर अब खुल के कर रहा है। और जो तीसरा फैक्टर ईरान के फेवर में इस बार चला है वो आया खान की शहादत थी। ओल्ड वर्ल्ड ऑर्डर को कोलैप्स होते एक न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को उभरते हुए आप देख रही हैं इस जंग के बाद। द सो कॉल्ड सिविलाइज्ड वेस्ट में इस बात का लिहाज नहीं किया जाता है। उनकी जितनी भी लड़ाईयां हुई है उन्होंने सिविलियन टारगेट्स को मिलिट्री टारगेट से कभी अलग नहीं माना। चाहे वो हिरशिमा नागासाकी में जो न्यूक्लियर बम उन्होंने गिराए या वियतनाम में उन्होंने जो केमिकल वॉरफेयर का इस्तेमाल किया। हो सकता है एंड ऑफ द वॉर इन अरब कंट्रीज को भी वो एक तरह से आजाद करा दे। आजाद का मेरा मतलब जो अमेरिका के गुलाम वो बने हुए हैं। एक एवरेज मुसलमान डिस्टिंग्विश भी नहीं करता है कि अरेबिया एक अलग मुल्क था और सऊदी एक फैमिली है। हुती और हिजबुल्ला और हवास के रोल को आप इस समय कहां देख रही हैं? रशिया और चाइना नहीं चाहेंगे कि किसी भी तौर पे ये लड़ाई अमेरिका की शर्तों पे खत्म हो। हो सकता है कि बूट्स ऑन ग्राउंड्स के अलावा जो टेिकल न्यूक्लियर वेपन्स है उनका इस्तेमाल भी क्या हो सकता है? बट जो यूनिलटरल मिलिट्री सुपीरियरिटी है कि हम जहां मर्जी है हम दादागिरी कर सकते हैं वो खत्म हो जाएगी। एक्टेंट सवाल जो है कंप्लीटली आई फॉरगॉट इंडिया के रोल को उसमें आप कैसे देख रही हैं? आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। अमेरिका और इजराइल ने मिलकर जिस तरह से ईरान के ऊपर इललीगल वॉर यह छेड़ी है, उसको दो हफ्ते से ज्यादा का वक्त बीत चुका है। इन दो हफ्तों में ईरान पूरी दुनिया में अपना दबदबा कायम करने में कामयाब होता हुआ नजर आ रहा है। वो इस जंग का नैरेटिव भी तय कर रहा है। प्रोस्पेक्टिव भी तय कर रहा है और यह भी बताता हुआ नजर आ रहा है कि भले ही यह जंग अमेरिका और इजराइल ने शुरू की हो, लेकिन यह खत्म कब होगी, यह अब ईरान तय करेगा। कई चैनल्स के थ्रू बातचीत शुरू की गई है। ईरान ने भी रशिया और पाकिस्तान से बात की है और अमेरिका भी अब ये रास्ते ढूंढ रहा है कि कैसे इस जंग से वो बाइज्जत तरीके से बाहर निकल जाए। ईरान ने जो शर्तें रखी हैं उन शर्तों में तीन इंपॉर्टेंट जो पॉइंट्स हैं वो मैं आपको यहां पर रखना चाहूंगी। उसमें उसने कहा है कि जो उसके ऊपर सेंशंस लगे हुए हैं उन सेंशंस को पूरी तरीके से हटाया जाए। दूसरा उसने कहा है कि उसका अब तक जो नुकसान हुआ है उस नुकसान की भरपाई अमेरिका करे और तीसरा उसने कहा है कि जो दादागिरी है अमेरिका और इजराइल की यह हमेशा के लिए खत्म हो उसका इसको यकीन दिलाया जाए कि आइंदा किसी भी तरीके का अग्रेशन जो है वो अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान के ऊपर नहीं करेंगे। तो आप सोचिए कि जंग किस तरह से शुरू हुई थी और 15 दिन में कितना कुछ बदल गया है और जो बदला है वो ईरान के फेवर में जाता हुआ नजर आ रहा है। यहां दो तीन चीजें हैं दो तीन इंपॉर्टेंट पॉइंट्स हैं जो मैं आपको यहां पर रखना चाहूंगी। अपडेट्स हैं जो आपके सामने रखना चाहूंगी वो यह कि अमेरिका ने जो खर् आइलैंड है ईरान का उस पर हमला किया है और यह मैं आपको बता दूं कि ये क्यों इंपॉर्टेंट है जिसके बारे में बात कर रही हूं क्योंकि 90% जो ईरान का कच्चा तेल है वो यहीं से एक्सपोर्ट होता है। अमेरिका का यह कहना है कि उसने यह डिसेंसी दिखाई है कि इस बार उसने जो ऑयल फैसिलिटीज हैं उन पर उसने हमला नहीं किया है। लेकिन अगर स्टेट ऑफ हॉर्मोंस उसके लिए अगर इसी तरीके से बंद रहा तो वह आगे ऑयल फैसिलिटीज पर भी हमला कर सकता है। दूसरी इंपॉर्टेंट अपडेट यह है कि इराक में जिस तरह से यूएस कंसिलेट पर हमला किया गया था और जो हेलीपैड है उसका पूरी उसको पूरी तरीके से बर्बाद कर दिया था ईरान ने। अब अमेरिका की तरफ से जो यूएस सिटीजन है उनको ये एडवाइज़री जारी की गई है इराक में कि वो पूरे तरीके से जो इराक है उसको खाली कर दें अमेरिकन सिटीजन। आप सोचिए यह कितना बड़ा डेवलपमेंट है और उसको इस तरह से भी देखा जा रहा है कि क्या जो जीसीसी मुालिक हैं जो पर्शियन गल्फ के जो कंट्रीज हैं क्या उनमें इराक पहला ऐसा कंट्री होने जा रहा है जो अमेरिका के इस चंगुल से या अमेरिका ने जिस तरह से अपने सैन्य अड्डे वहां पर बना रखे हैं उससे वो आजाद होने जा रहा है। इस जंग के और क्या डिफरेंट आस्पेक्ट हैं? 15 दिन के बाद हम क्या यह कह सकते हैं कि ईरान एक बहुत मजबूत कंडीशन में यहां पर खड़ा हुआ है। यह जंग कितने वक्त तक चलने वाली है? कितनी लंबी चलेगी और इसके क्या नताज होंगे? आज इन्हीं सब पर हम बात करेंगे और इस पर बात करने के लिए मेरे साथ गजाला वहाब साहिबा मेरे साथ जुड़ गई हैं जो कि फोर्स मैगजीन की एडिटर हैं और इसके साथ-साथ वो एक ऑथर भी हैं। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं जिनका जिक्र मैं यहां पर करना चाहूंगी। ड्रैगन ऑन आवर डोर स्टेप मैनेजिंग चाइना थ्रू मिलिट्री पावर कोऑथर्ड बाय प्रवीण साहनी बोर्न अ मुस्लिम सम ट्रुथ्स अबाउट इस्लाम इन इंडिया द पीस मेकर व्हिच वाज़ एडिटेड बाय हर एंड द हिंदी हार्टलैंड अ स्टडी तो ये वो किताबें हैं जिसके लिए गजाला साहिबा जानी जाती हैं और वो एक डिफेंस एक्सपर्ट भी हैं। जानीमानी पत्रकार हैं। गजाला साहिबा बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। थैंक यू सो मच। बहुत-बहुत शुक्रिया आपने मुझे इनवाइट किया। जी गजा साहिबा मेरा पहला सवाल आपसे ये है कि 15 दिन के बाद आपका असेसमेंट क्या कहता है इस जंग को लेकर? देखिए ये जंग जिस तरह से अमेरिका और इजराइल ने सोचा था कि हम इसको अपनी मर्जी से शुरू करके और जल्दी खत्म कर देंगे। ये हो नहीं रहा है। उनको उम्मीद नहीं थी कि ईरान इतना जबरदस्त तरीके से रिटेलिएट करेगा। उन्होंने सोचा था जैसे पहले होता आया है पिछले साल भी हुआ था कि ये यहां से कुछ अटैक्स करेंगे और ईरान में थोड़ी सी अफरातफरी मचेगी और फिर वो टोकन अटैक करेंगे ईरान भी दो तीन मिसाइल्स फेंक देंगे उनका कुछ असर होगा नहीं और मामला रफातफा हो जाएगा फिर सब बात करने शुरू कर देंगे उनका अंदाजा ये था अमेरिका का और इसराइल का उन्होंने अपना इतना बड़ा अरमा अमेरिका ने वहां खड़ा किया एयरक्राफ्ट कैरियर भेजे इतने सारे वॉरशिप्स वहां पर भेजी अपने फाइटर प्लेस चारों तरफ उसके घेर लिया था क्योंकि उनको लग रहा था ये सब मदद करेगा ईरान को और डराने में और ईरान के अंदर जो कुछ रेस्टिव पपुलेशन है जो ईरान की सरकार से खुश नहीं है जो यंग पपुलेशन है जिन्होंने जनवरी में प्रोटेस्ट किए थे डेमोंस्ट्रेशन जो ईरान में हुए थे उनकी सरकार के खिलाफ आया खामिनी के खिलाफ तो वो लोग अमेरिका की इतनी फौजे देखकर कर आसपास उनको और बढ़ावा मिलेगा और वो दोबारा अपनी सरकार के खिलाफ खड़े हो जाएंगे। तो उनका यह ख्याल था कि यह एक तरीके से ट्विन प्रेशर पड़ेगा ईरान के ऊपर। बाहर से हमला होगा। हवाई हमला होगा जो उनकी टॉप लीडरशिप को खत्म कर देगा जिससे कि उनकी जो मिडिल लेवल लीडरशिप है या जूनियर लीडरशिप है पिटिकल और मिलिट्री दोनों वो दोनों हड़बड़ा जाएंगे। कोहेशन उनका यूनिटी ख़ हो जाएगी। आपस में ही वह कन्फ्यूजन हो जाएगा और ऊपर से अंदर से लोग खड़े हो जाएंगे। मेजर प्रोटेस्ट हो जाएंगे। तो ये दो तरफ़ा हमला होगा जिससे इराक ईरान कोलैप्स हो जाएगा और वो चुपचाप दोबारा आ जाएगा अमेरिका से और ईरान इजराइल से बात करने के लिए। इस वक्त अमेरिका ने इसलिए भी यह पूरा अपना फौज वहां तैयार की थी क्योंकि उनका इरादा यही था कि वह ईरान से उनको कोई बात करनी नहीं है। उनको तो ये चाहिए कि हर तौर पे एक तरह से वहां का सरकार बदली जाए। उनकी मुताबिक की सरकार बने जिनको वो चाहते हैं अपॉइंट करना वो अपॉइंट हो। क्योंकि उनका ये ख्याल था कि एक तो ये अफरातफरी मचेगी। ऊपर से इंटरनल प्रोटेस्ट जब शुरू हो जाएंगी तो वहां पर सरकार को पास कोई चारा ही नहीं बचेगा। बल्कि वो अपना बोरिया बिस्तर बांधे और निकल ले। यह सब उनके कैलकुलेशन थे जो कि हुआ नहीं। अब ऐसा क्यों नहीं हुआ? इसके पीछे मेरे हिसाब से तीन बड़ी वजह हैं। पहली वजह ये थी कि ईरान ने तय कर लिया था कि इस बार वो अमेरिका के कोई भी हमले को बर्दाश्त नहीं करेगा। अपने ऊपर अब्सॉर्ब नहीं करेगा बल्कि पूरी ताकत से रिटेलिएट करेगा। ईरान को यह भी समझ में आ गया था पिछले साल की 12 दिन की लड़ाई के बाद कि अमेरिका के अंदर बहुत लंबा लड़ने की और इजराइल के अंदर बहुत लंबा लड़ने की काबिलियत नहीं है। अ तो अगर ईरान धीरे-धीरे लड़ाई को बढ़ाएगा और लंबा खींचेगा उनकी परेशानी उतनी बढ़ती जाएगी। तो एक उनकी स्ट्रेटजी कहें या रणनीति वो ये थी। इसी के चलते उन्होंने ये भी तय कर लिया था कि अगर हमारी टॉप लीडरशिप चली भी जाती है क्योंकि पिछले साल भी वो काफी कोशिश करी थी उन्होंने आयतुल्लाह कामनी को मारने की तो उनको इस बात का अंदेशा था कि अगर ये लीडरशिप हमारी चली भी जाती है तो भी हमारा जो कमांड इन कंट्रोल सिस्टम है वो बरकरार रहेगा और जिसको वो मोजेक वॉर कह रहे हैं अगर हम अपनी हिंदुस्तानी जो हमारी टर्मिनोलॉजी में हम यूज़ करते हैं वो है डिसेंट्रलाइजेशन कि एक सेंट्रल अथॉरिटी नहीं रहती है। आपने सारी अपनी पूरी अथॉरिटी को डिसेंट्रलाइज कर दिया है। तो आपने मिडिल लेवल ऑफिसर्स को काफी हद तक ऑटोनोमी दे रखी है। अपने ऑपरेशंस किस तरह से उनको लड़ाई करनी है? क्या उनके ऑपरेशंस होने वो कैसे उसको कंडक्ट करें? तो ये उन्होंने पिछले एक साल में ये सब करके कर लिया था। तो ये डिसेंट्रलाइजेशन करने की वजह से ये तय करने की वजह से कि हम इस बार उनके अटैक को बर्दाश्त नहीं करेंगे और हम अपनी पूरी ताकत से हिट बैक करेंगे। तो ये ईरान का हम देख रहे हैं और इससे अमेरिका और इजराइल दोनों काफी परेशानी में आ गए। दूसरी वजह ये थी कि पिछले साल रूस और चाइना खुल के ईरान की तरफ नहीं आए थे जो कि इस बार आ गए हैं। पिछले साल रूस के राष्ट्रपति ने प्रेसिडेंट पुतिन ने एक स्टेटमेंट दिया था कि इजराइल की 50% से ज्यादा पपुलेशन रूसी बोलने वाली पपुलेशन है। वो रशियन लैंग्वेज स्पीकर्स हैं। क्योंकि वो जो वहां माइग्रेट हुए थे उसमें से 50% रशिया से माइग्रेट हुए थे इजराइल में ओवर अ पीरियड ऑफ टाइम तो वो डबल वो डुअल पासपोर्ट होल्डर्स है उनके पास रशियन सिटीजनशिप भी है तो वो रशियन सिटीजंस भी है तो उन्होंने कहा था कि हम अपने हमें अपनी रिलेशनशिप ईरान के साथ बैलेंस करनी है अपनी पपुलेशन जो इजराइल में रहती है तो हम ईरान की इतनी मदद नहीं कर सकते हैं कि वो हमारी पपुलेशन को नुकसान पहुंचे जो उनकी पपुलेशन इजराइल में रहती है तो इसलिए पिछले साल उन्होंने ईरान की खुल के इतनी मदद नहीं की थी। इस साल भी वो उम्मीद ये कर रहे थे अमेरिका और इजराइल कि वो रशिया इतना खुल के ईरान के सपोर्ट में नहीं आएगा जो कि नहीं हुआ। ना सिर्फ वो उनकी सपोर्ट में खुलकर आए मिलिटरली उनकी सपोर्ट में आए। उनको मिलिट्री सादो सामान दिए जा रहे हैं। डिप्लोमेटिकली उनकी सपोर्ट में आ गए हैं। ह्यूमैनिटेरियन ग्राउंड्स पे उनकी सपोर्ट में आ गए हैं। यही हाल चाइना का है। चाइना भी पिछले साल थोड़ा सा ढके छुपे तरीके से ईरान की मदद कर रहा था। मगर अब खुल के कर रहा है ना सिर्फ वो उसके साथ इंफॉर्मेशन और इंटेलिजेंस शेयर कर रहा है। उसके साथ हथियार शेयर कर रहा है। वो उसके साथ हथियार को चलाने की साधन शेयर कर रहा है। तो ये दो फैक्टर्स बहुत इंपॉर्टेंट है। और जो तीसरा फैक्टर ईरान के फेवर में इस बार चला है वो आया खामिनी की शहादत थी। उससे क्योंकि आया खामिनी ने जब ये तय कर लिया कि वो नहीं छुपेंगे और चाहे वो शहीद हो जाए वो वहां से नहीं हटेंगे। इसने उनका वकार पूरे दुनिया के मुसलमानों में बहुत ऊंचा कर दिया। तो वो जो शिया सुन्नी का भी फर्क है बीच-बीच में सुन्नियों को परेशानी होती है शियाओं से आपस में मनमुटाव रहता है वो सारा लोगों के तौर पे नेशंस के और बाकी गल्फ स्टेट्स का जो रवैया रहा है वो अलग बात है बट जो ह्यूमन लेवल है इंसानी लेवल पे वो इतना ज्यादा बढ़ गया कि जो वर्ल्ड ओपिनियन है ना सिर्फ मुस्लिम्स में मगर गैर मुसलमानों में भी चाहे वो वेस्टर्न कंट्रीज हो अमेरिका हो उसमें भी ईरान के फेवर में वर्ल्ड ओपिनियन बहुत ज्यादा आ गया है। तो ये ओपिनियन उनके फेवर में होना भी एक बहुत बड़ा मोराल बूस्टर है जो ईरान को ताकत दे रहा है ये लड़ाई को अपने तौर पे आगे बढ़ाने के लिए। जी अभी की अगर हम बात करते हैं अजाला साहिबा तो आप ईरान को कहां खड़ा देखती हैं और अमेरिका इजराइल को कहां खड़ा देखती हैं? इससे मेरी मुराद ये है कि ईरान हमेशा सवाल ये पूछा जाता है क्योंकि वेस्टर्न मीडिया ने एक ये नैरेटिव गढ़ा और हमेशा ये कहने की कोशिश की कि भ ईरान कितने दिन टिक सकता है इस जंग में? क्या आपको लग रहा है इन 15 दिनों में यह नैरेटिव उल्टा हो गया है? अब ये पूछा जा रहा है कि अमेरिका और इजराइल कितने दिन टिक सकता है इस जंग में? और अगर यह ठीक है यह नैरेटिव? अगर आप मेरी बात से एग्री करती हैं तो यह नैरेटिव क्यों बदला है? इसमें चाइना और रशिया के रोल को कितना इंपॉर्टेंट आप मानती हैं और क्या ईरान जो अपने आप को 40 साल से ज्यादा से तैयार कर रहा था क्या अब उसकी तैयारी इस मैदान जंग में देखने के लिए मिल रही है? देखिए जब आप एक एसिमेट्रिक तरह की लड़ाई लड़ते हैं, बराबरी की लड़ाई नहीं लड़ते हैं क्योंकि ईरान जो अमेरिका और इजराइल के साथ लड़ रहा है वो गैर बराबरी की लड़ाई है। ईरान के पास उतने हथियार नहीं है, उतनी सोफिस्टिकेटेड टेक्नोलॉजी नहीं है जो अमेरिका के पास है या इजराइल के पास है। तो जब आप गैर बराबरी की लड़ाई लड़ते हैं तब जो काफी हद तक रिटेलिएशन का जो जवाबदेही का जो इनिशिएटिव होता है वो कमजोर के पास आ जाता है। मतलब आप इसको एक छोटी सी आप मिसाल ले लीजिए। जैसे कि आप जब काउंटर इंसजेंसी ऑपरेशन करते हैं या इंसर्जेंट्स के साथ आप जंगल में लड़ाई कर रहे हैं। जंगल वॉरफेयर हो रहा है होता है तो आप तो अपने आप आप तो खुले सामने आपके सब सब हथियार आपकी तैयारी सामने दिखाई दे रही है। बट अगला छुपा हुआ है। वो आपको उसकी क्या तैयारी है? वो कैसे किन हथियारों से लेस है ये आपको पूरी तरह से पता नहीं होता है। तो ये एक एसिमिट्रिक लड़ाई होती है। यही वजह है कि अमेरिका ने अब तक जितनी लड़ाईयां लड़ी है वो सारी लड़ाईयां में अमेरिका को कामयाबी उस तरह से नहीं मिली जैसे वो सोचता था कि इतनी जबरदस्त पावर के बाद उसको मिल जाएगी। चाहे वो वियतनाम की लड़ाई हो चाहे अफगानिस्तान की लड़ाई हो। अमेरिका ने जो उम्मीद की थी कि हम यह हासिल कर सकते हैं वो ऑब्जेक्टिव्स उनको नहीं मिल पाते हैं। इसके बावजूद भी उन्होंने फिर ये गलती की है कि वो ईरान के साथ पाए। अब ईरान का ये बात पहले से भी तय थी कि अगर ईरान 40 साल से लड़ाई की तैयारी कर रहा है। ईरान का एक ही दुश्मन था। एक अमेरिका और इजराइल। तो ईरान ने अपनी पूरी सोच किस तरह से उसको यह लड़ाई लड़नी है वो तैयारी उसने इस दुश्मनों को दिमाग में रख के तैयारी की थी। उसने इतने सालों से इस पर रिसर्च करी थी कि क्या-क्या अमेरिका की और इजराइल की कमजोरियां हैं। क्या-क्या उनकी ताकतें हैं। हम कैसे इनसे निपट सकते हैं। यही वजह है कि आप देखिए शुरू के दिनों में क्योंकि ये चाहते थे कि अमेरिका और इजराइल के और गल्फ नेशंस के जो एयर डिफेंस सिस्टम्स है जो इंटरसेप्टर्स हैं वो जल्दी से जल्दी खर्च हो जाए। तो इन्होंने अपनी पुरानी मिसाइलें दागी जो एक्यूरेट भी नहीं थी जिनसे कुछ खास नुकसान भी नहीं हुआ। मगर उन मिसाइलों को रोकने के लिए इनको अमेरिकनंस को और इजाइल को और गल्फ स्टेट्स को यूएई को बारेन को अपने बहुत महंगी बहुत सोफिस्टिकेटेड मिसाइलों का इस्तेमाल करना पड़ा। मतलब ये ऐसा हो गया कि आपने एक छोटा सा ₹200 की ड्रोन के लिए अपना ₹1 लाख का मिसाइल दागी। तो एक तो इनसे इनकी माली नुकसान जो हुआ तो हुआ। इनके यह सारे सिस्टम्स ये एयर डिफेंस सिस्टम बहुत जल्दी खर्च हो गए। जब वो एक बार खर्च हो गए और वो एक्सपोज हो गए तब ईरान ने अपनी सेकंड ग्रेड की उससे थोड़ी बेहतर मिसाइल्स दागने शुरू करी और अब जब ये सारे नेशंस ये देश काफी परेशान है काफी नुकसान उठा चुके हैं क्योंकि इन सबका नुकसान उठाने की काबिलियत ईरान से काफी कम है। पूरा ये जो गल्फ का हमारा जिसको आप मिराज कहिए रेगिस्तान में जो मिराज बना हुआ है यूएई है बरेन है कतार है इनका एकिस्टेंस ही एक पॉजिटिव सेंटीमेंट पे है कि यहां पर ये बहुत मजे की जगह है हर तरीके के साजो सामान है। लग्जरियस लाइफ स्टाइल है। सिक्योरिटी है। ये इस पे बेस्ड है कि आप रईस लोग वहां जाके हॉलिडे करते हैं। तो यह सारी जरा भी इसमें डिसरप्शन होता है तो यह पूरा सेंटीमेंट खराब हो जाता है। तो इनका नुकसान सिर्फ यह नहीं हुआ है कि इनके मिलिट्री फैसिलिटीज पे नुकसान हुआ है या इनकी इंफ्रास्ट्रक्चर पे नुकसान हुआ है। इनका सबसे बड़ा नुकसान जिससे ये बहुत परेशान है। वो नुकसान इनके इमेज पे हुआ है। ये इतने सालों से बनाई हुई ये रिच एंड फेमस की हॉलिडे डेस्टिनेशन या सेकंड होम डेस्टिनेशन। अ उस उस रेपुटेशन पे असर पड़ा है। तो ये इनका सबसे बड़ा नुकसान है। जहां तक अमेरिका की और इजराइल की बात है तो इजराइल का तो हमें पता नहीं है कितना नुकसान हुआ है। मेरे ख्याल से तो बहुत ज्यादा हुआ है। बट वहां से कोई खबरें बाहर नहीं आ रही है। जो इक्कादुक्का वीडियोस आ रहे हैं तो उससे तो लग रहा है कि ईरान इजराइल का काफी बुरा हाल है। बहुत उनके कई सारे शहर तबाह हो गए हैं। वहां काफी लोगों की जाने भी गई है जिसकी जिसकी खबरें वो बाहर नहीं आने दे रहे हैं। अ मगर अमेरिका को जो नुकसान हुआ है वो उसकी इनविंसिबिलिटी उसकी प्रेस्टीज उसका स्टेचर जो उसने वेस्ट एशिया में बनाया था खाड़े मुल्कों में बनाया था कि वो एक बहुत पावरफुल है और वो दुनिया का यूनपोलर सुपर पावर है कि इससे ज्यादा ताकत वो देश दुनिया में कोई नहीं है। उस रेपुटेशन पे बहुत बड़ा आघात हुआ है और मेरे ख्याल से डेंट पड़ा है। तो मेरे ख्याल से ये अमेरिका के लिए इस रेपुटेशन से बाहर निकल पाना अ मुमकिन नहीं होगा और उसका अब जब भी लड़ाई खत्म होती है उसका वेस्ट एशिया में अपना वही पुराना दबदबा फिर से बनाना अब मुमकिन नहीं होगा। जी। तो क्या ईरान इस बात में कामयाब रहा है कि जो अमेरिकन फर्सेस जो है उनकी जो एक तरह की हेजुमनी थी इन पूरी जीसीसी में उसको खत्म करने में और एक तरह से ना सिर्फ वो अपने लिए लड़ रहा है बल्कि हो सकता है एंड ऑफ द वॉर इन अरब कंट्रीज को भी वो एक तरह से आजाद करा दे। आजाद का मेरा मतलब जो अमेरिका के गुलाम वो बने हुए हैं। हां देखिए आपके मुंह में घी शक्कर जिसे कहा जाता है। मगर मुझे ऐसा लगता नहीं है कि ये जो पुरानी हॉस्टेलिटीज हैं क्योंकि ये हॉस्टलिटीज ने मजहब का जामा ओढ़ा हुआ है कि शिया सुन्नी की का डिबेशन है अरब कंट्रीियों में और ईरान में मगर ये सिर्फ एक जामा है। असली प्रॉब्लम इनकी आपस में पॉलिटिकल प्रॉब्लम है। प्रॉब्लम ये है कि उनका यहां पे इनफ्लुएंस किसका ज्यादा हो? कौन ज्यादा पावरफुल ताकतवर मुल्क इस पूरे रीजन में उभर के आए। और मेरे ख्याल से इसके लिए अगर आप थोड़ी सी मेरे मे बी 150 साल पुरानी हिस्ट्री में भी जाएंगे तो ये जो अरब और ईरान के कॉन्फ्लिक्ट्स है ये बहुत हद तक पिटिकल कॉन्फ्लिक्ट्स रहे हैं। जब फर्स्ट वर्ल्ड वॉर से भी पहले ये सारे एरियाज जो थी अरब कंट्रीज जो थी ये कॉलोनीज थी पहले ऑटोमन एंपायर की कॉलोनीज थी ईरान इंडिपेंडेंट था। ईरान ऑटोमन एंपायर की कॉलोनी नहीं था। चाहे कितना मिलिटरीली कितना पावरफुल हो बहुत ताकतवर देश हो ना हो उसकी अहमियत नहीं है। मगर वो इंडिपेंडेंट था। उससे वो कभी किसी का कॉलोनी की कॉलोनी नहीं बन पाया। कोई उस पे हुकूमत नहीं कर पाया जो कि बाकी मुल्कों के लिए सही नहीं था। अरेबिया भी सऊदी अरेबिया बनने से पहले भी वो कॉलोनी था। पहले ऑटोमस की कॉलोनी था। अगर आपको थोड़ा सा इस्लामिक हिस्ट्री याद होगी तो मक्का मदीना की ये जो हज पी थी ऑटोमन एंपायर टर्की से करते थे। तो अगर आप देखेंगे तो ये एरिया भी ऑटोमन एंपायर के सुजरन था। ऑटोमन एंपायर का इन पे रूल था जो कि परर्शिया के साथ उस वक्त परर्शिया था। उसके साथ ये सिचुएशन नहीं थी। बाद में जब ब्रिटिश और फ्रेंच कॉलोनाइजर्स आए इस पूरे एरिया में तभी भी ऑटोमन को क्योंकि वो हरा के आए थे फर्स्ट वर्ल्ड वॉर के बाद तो ये टेरिटरी उन्होंने आपस में डिवाइड कर ली थी। तो ये अरेबिया की टेरिटरी हो गई जो इराक जिसको हम मॉडर्न प्रेजेंट डे इराक है, सीरिया है ये सब उन्होंने आपस में बांट लिया था। जॉर्डन को क्रिएट किया गया था। अ ईरान फिर भी इंडिपेंडेंट था। तो ईरान पे कब्जे हुए चले जाते थे क्योंकि वो वहां रेजिस्टेंस का जज्बा बहुत ज्यादा था। अभी भी आप देखेंगे तो ईरान में ये इतने अथॉरिटेरियन रूल रेवोल्यूशन के बाद से हुआ है। मगर जितनी प्रोटेस्ट आप ईरान में आपने 1979 के बाद से भी देखी हैं। औरतों की भी प्रोटेस्ट है कि वो अपने अथॉरिटेरियन रिजीम के खिलाफ लड़ रही हैं। रेगुलरली लड़ रही हैं। भी हमने जनवरी में देखा। खुद अपनी जान का नुकसान उठा के भी लड़ते हैं। तो ये एक फियर्स इंडिपेंडेंस का जज्बा है। रिपोर्ट्स आई है कि लड़ाई शुरू होने के बाद बहुत सारे ईरानियन डायस्पोरा जो आसपास के देशों में रहता था टर्की में जैसे रहता था वो ईरान वापस आ गए हैं। क्योंकि वो साथ में ईरान में इस मुसीबत की घड़ी में अपने देश में होना चाहते हैं। ये जज्बा ये इंडिपेंडेंस का जज्बा आपको बाकी गल्फ स्टेट्स में नहीं दिखता है। वहां पे वहां भी रिप्रेसिव रिजीम्स हैं। औरतों को कोई हुकूक नहीं है। मतलब सऊदी अरेबिया में तो सबको मालूम है कितना अब जाके 2017 के बाद जाके उन्होंने थोड़े-थोड़े राइट्स देने शुरू किए कि औरतें गाड़ी चलाता अलऊ किया है। तो ये इतने रिप्रेशन के बाद यहां पे आप प्रोटेस्ट नहीं देखते हैं। यहां पे उनकी आवाम कभी भी अपनी सल्तनत के खिलाफ खड़ी नहीं होती है क्योंकि उतना खौफ सल्तनत का मौजूद है। तो ये एक ब्रीफ आपने देखा होगा अरब स्प्रिंग जो हुआ था। बस वो एक ब्रीफ स्पार्क था रेजिस्टेंस का जो लोगों में आया था। मगर अदरवाइज यहां की जो रया है वो कभी भी उन्होंने हिम्मत नहीं जुटा पाई है या इतनी सख्ती है उन मुल्कों में कि वो खड़ी नहीं हो पाती है लड़ने के लिए अपनी सरकार के खिलाफ। तो ये एक सोशल स्ट्रक्चरिंग है जो बहुत बड़ा फर्क है अरब देशों में और ईरान में। पॉलिटिकल सिस्टम का बहुत फर्क है और इन दोनों फर्क के चलते इन इन दोनों रिजीम्स में एक ये सेंस है कि यहां पे इस एरिया पे सबसे पावरफुल मुल्क कौन सा होगा? कौन एक तरह से इनफॉर्मल लीडरशिप मुस्लिम वर्ल्ड की अस्यूम करेगा। तो मेरे ख्याल से ये कहना कि बाकी मुल्क भी अब ईरान के साथ मिलके वो भी सोचेंगे कि हां हमें भी अब अमेरिका से और इजराइल से निजात चाहिए। अ हो सकता है कुछ मुल्कों में हो जैसे इराक में हमें उसका सबूत अभी दिखाई दे रहा है। बहरेन में बहुत प्रोटेस्ट हुई है। हो सकता है बहरेन में कुछ बदलाव आए। मगर जब तक सऊदी और यूएई एक बड़ा रोल इसमें नहीं प्ले करते हैं जब तक कि वो एक फर्म पोजीशन नहीं लेते हैं तब तक कोई बहुत बड़ा चेंज इसमें होने में मुझे थोड़ा मुश्किल लग रहा है। मैं इससे पहले इसके मिलिट्रली आस्पेक्ट पर आऊं और तमाम चीजों पे आऊं जिसको लोगों को जानने में बहुत इंटरेस्ट होगा और एक और चीज जिसको लोगों में जानने में इंटरेस्ट है बहुत ज्यादा कि नितिन याू इज डेड और अलाइव तो उसके बारे में भी हम हम बात करेंगे लेकिन मेरा सवाल ये है कि आखिर इन ताकतों को ये जीसीसी जो कंट्रीज हैं इनको आखिर कौन सी वो चीजें हैं जो रोक रही हैं? ये तो साफ पता है कि अमेरिका और इजराइल के पिट्ठू बनकर एक तरह से गुलाम बनकर ये काम कर रहे हैं। इनके ऊपर कितनी बड़ी जिम्मेदारियां खासतौर पर सऊदी अरब की मैं बात करूंगी। लेकिन आप ये देखें कि मिलिट्री सजो सामान खरीदने का आई थिंक अमेरिका से नंबर वन पर है वो मुल्क इफ आई एम नॉट रोंग। कि वो सबसे ज्यादा खरीदता है और और अब आप देखिए कि एक गोली नहीं चला सकता। तो वो वो जो आप असल खरीद रहे हैं, एमिनेशन खरीद रहे हैं, उसका फायदा क्या है? क्या करने जा रहे हैं आप उसका? क्या ये एक तरह का मनी लॉन्ड्रिंग कोई सिस्टम है कि हम आपसे खरीद रहे हैं। आप हमारे ऊपर रहम करके रहम करते रहिए। क्या इस तरह की ये एक चीज है? और दूसरा यह कि जब उनको यह पता चला अभी और कई इस तरह के हमने वीडियोस देखे जिसमें साफ तौर पर यह कहा जा रहा है कि हमें आपने बिल्कुल तनो तनो तन्हा छोड़ दिया आपने और सिर्फ आप इजराइल को सिक्योरिटी दे रहे हैं और आपके जो ये सारे सिस्टम यहां आपने लगाए डिफेंस सिस्टम वो तमाम हमारे लिए बेकार साबित हुए। तो ये रियलाइजेशन भी क्या आपको नहीं लग रहा कि इन अरब कंट्रीज में हो रहा है और अरब कंट्रीज से मेरा मतलब सिर्फ रूलर्स से है क्योंकि आवाम में तो दिख रहा है। ये रूलर्स जो है आखिर क्या है ऐसा मतलब आई फेल टू अंडरस्टैंड कि इतनी गुलामी आखिर किस लिए है? देखिए गुलामी यह हमें यहां बैठ के दूर से लगती है कि वो गुलामी है और वो अमेरिका के आगे बिल्कुल घुटनों पर है। मगर जब आप उनके नजरिए से देखें तो अमेरिका के उनके सर पे हाथ होने से वो अपने देश पे पीढ़ी दर पीढ़ी हुकूमत कर पा रहे हैं। ये जो ये जो पावर है क्योंकि यह पावर उनको उनके अपने आवाम ने नहीं दिया है। इनमें से कोई इेड नहीं है। यह पावर उनको अमेरिका से करीबी दोस्ती होने की वजह से मिला है। अगर कल अमेरिका का छत्रछाया इनके ऊपर से हट जाए यह इनका ख्याल है। तो हो सकता है जिस तरीके का रेवोल्यूशन 1979 में ईरान में आया है ये यहां पर भी आ जाए। तो इनका जो सबसे बड़ा खतरा है ये चाहे कुछ भी कहते रहे कि हमें ईरान से खतरा है या हमें रूस से खतरा है या इजराइल से खतरा है। ये जितनी भी हुकूमते हैं इनको सबसे बड़ा खतरा अपनी खुद आवाम अपनी आवाम से खतरा है। अब आपने देखा बहरेन में जब ये प्रोटेस्ट हुए हैं वहां की जनता ने प्रोटेस्ट किए हैं अपने रूलर्स के खिलाफ तो उनको सऊदी से ट्रूप्स बुलानी पड़ी अपने उस प्रोटेस्ट को खत्म करवाने के लिए। अपने लोगों के खिलाफ उन्होंने सऊदी से कहा कि आप आके प्लीज इसको शांत कराइए। तो उनको खतरा इन सबको अपनीप आवाम से है क्योंकि इनको लगता है कि अगर यह अथॉरिटेरियम जरा भी कम पड़ा जरा भी उनका दबाव लोगों पे कम हुआ तो लोग कभी भी उनके खिलाफ खड़े हो सकते हैं। तो ये इसीलिए ये जो जिसको हम हमें गुलामी हम कह रहे हैं और मैं खुद आपकी बात से सहमत हूं। गुलामी है। मगर ये उनके नजरिए से ये अपने खानदान की को इंश्योर कर रहे हैं कि वो इनपरपचुटी पावर में रहे। तो यह पावर ये पूरा जो जिसे कहा जाएगा गेम जो है यह अपने अपने पावर को ही रीइंफोर्स करना है और उसको लोगों के ऊपर परमानेंटली थोपना है। अब आप देखिए एक्चुअली मैं मुझे सऊदी अरेबिया से काफी परेशानी है और मैंने सऊदी अरेबिया को काफी क्रिटिसाइज भी किया है अपनी किताब बनना मुस्लिम में। मैंने तो यहां तक लिखा है कि एक्चुअली शुरू से ये होता था कि जो हज पग्रमेज है ये जो खलीफा जहां पर जिनके पास खिलाफत होती थी वो रन करते थे वो ज्योग्राफिकली लिमिटेड नहीं था तो ऐसा नहीं था कि जहां क्योंकि वो अरेबिया में है तो वहीं की रिजीम उसको कंट्रोल करेगी जब ऑटोमन पावरफुल थे तो वो वो कंडक्ट करते थे वो उसके कस्टोडियन थे होली मॉस्क से तो मैं मैंने तो अपनी किताब में ये भी प्रपोज किया है कि एक ट्रस्ट होना चाहिए मुस्लिम कंट्रीज का और उन्हें जैसे वेटिकन है तो उन्हें यह कस्टोडियन होना चाहिए इसका फायदा इसका मुनाफा सऊदी सरकार क्यों उठाए कंसीडरिंग उन्होंने मुस्लिम के लिए दुनिया में सिवाय बर्बादी के और कुछ भी नहीं किया है। जो भी इस्लामिक ये जो टेररिज्म की अब हर कोई बात करता है कि ऑल मुस्लिम्स आर नॉट टेररिस्ट बट ऑल टेररिस्ट आर मुस्लिम्स। इसकी जड़ कहां है? इसकी जड़ सऊदी में है। ये सऊदी ने अमेरिका और पाकिस्तान के साथ मिलके मुजाहिद क्रिएट किए अफगानिस्तान में रशिया के साथ लड़ने के लिए। इन्होंने अलकायदा क्रिएट किया। तो जितना नुकसान मुस्लिम कम्युनिटी वर्ल्ड वाइड में सऊदी अरेबिया ने पहुंचाया है किसी किसी भी मुल्क ने नहीं पहुंचाया है। और ये सिर्फ इसलिए पहुंचाया है कि उनका अपना इस फैमिली का ये जो साउथ फैमिली है इनका कंट्रोल ना सिर्फ अपने मुल्क पे बना रहा है मगर मुस्लिम सोच पे बना रहा है। एक एवरेज मुसलमान डिस्टिंग्विश भी नहीं करता है कि अरेबिया एक अलग मुल्क था और सऊदी एक फैमिली है। एक फैमिली एक मुल्क चला रही है। इसलिए उसने उस मुल्क का नाम ही सऊदी अरेबिया रख दिया है। मुल्क का नाम तो सऊदी अरेबिया नहीं था ना। ये तो 18वीं सदी में बना है। उससे पहले तो अरेबिया था। अरेबियन पेनसुला था। तो ये हमने हम इसमें कभी इस कदर उनका इन्फ्लुएंस आया है लोगों की सोच पे। और ये अह इस अनहोली अलायंस जो अमेरिका के साथ उन्होंने किया है। पेट्रोल डॉलर का अलायंस किया है कि हम पेट्रोल सिर्फ डॉलर्स में बेचेंगे दुनिया को। ये जो अलायंस किया है इसी से ये अपना पावर बरकरार रख पाए हैं। तो मेरे ख्याल से जब तक इनकी सोच में बदलाव नहीं आएगा इन रियासतों की सोच में बदलाव नहीं आएगा। यह कहना बहुत मुश्किल है कि क्या पूरे वेस्ट एशिया में एक नया माहौल, एक अमन शांति का एक नया माहौल पैदा होगा। एक नया कोऑपरेटिव डेवलपमेंट मॉडल क्रिएट होगा कि सब मुल्क आपस में एक दूसरे के साथ कोऑपरेट करें। मिलके अपनीपनी आवाम के लिए काम करें। ये कहना मुश्किल होगा। जी बिल्कुल। बहुत इंपॉर्टेंट आपने बातें कही है और आई ओपनर्स की तरह हैं। एक तरह से जो आपकी बातें हैं और बहुत कुछ सीखने के लिए भी मिल रहा है। मेरा सवाल आपसे ये है गजाला साहिबा कि अब हम थोड़े मिलिट्री आस्पेक्ट पे आ जाते हैं। खर्ग आइलैंड पे जिस तरह से हमला किया है अमेरिका ने। क्या आपको लगता है ये इस जंग का एक टर्निंग पॉइंट बन सकता है? क्योंकि वो ये कह रहा है कि अगर आपने स्ट्रेट ऑफ हार्मोस नहीं खोला तो हम आपके जो ऑयल फैसिलिटी है उस पर हमला करेंगे। या फिर आपको ये लगता है कि ईरान इसके लिए वेल प्रिपयर्ड है। क्योंकि जब ईरान इराक वॉर हुई थी तब भी इस खर्ग आइलैंड पे बहुत हमले हुए थे और उसने अल्टरनेटिव रास्ते जो हैं तेल को वहां से गुजारने के वो तैयार किए थे और उसको यह पता ही होगा कि यह उसका वीक पॉइंट है और इस पर अमेरिका जरूर जब फ्रस्ट्रेटेड होगा तो इस पर हमला जरूर करेगा। तो क्या आपको लगता है कि ईरान इज वेल प्रिपयर्ड फॉर इट या अभी भी आप उसका इसको वीकेस्ट पॉइंट मानती हैं और स्टेट ऑफ हॉर्मोस को लेकर भी क्या आपको लगता है कि आने वाले दिनों में स्टेट ऑफ हॉर्मोस जो है वो भी इसके लिए एक इस वॉर का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट होता है। अगर ईरान उसी तरीके से शर्तें रखता है कि या तो आप अपनी यूएस काउंसलेट बंद कर दें और अपने जहाज ले जाएं या फिर जो आप जहाज लेकर जा रहे हैं तो युवान में पेमेंट होगा या फिर हम उन्हीं मुल्कों को करेंगे जो जाहिर सी बात है हमारे साथ फ्रेंडली हैं। देखिए आपने जो लास्ट बात की है ये बात बहुत इंपॉर्टेंट है। ये कहना कि उसने स्टेट ऑफ हॉर्मोस बंद कर दिया। ये सही बात नहीं है। बेसिकली उसने स्टेट ऑफ हॉर्मोंस पे जैसे टोल होता है उसने टोल प्लाजा खोल दिया है। तो जिसको वो अलव कर रहा है जाने के लिए वो वहां से आराम से निकल पा रहे हैं। जिनको नहीं अलऊ कर रहा है वो नहीं निकल पा रहे हैं। मेरे ख्याल से धीरे-धीरे जिनको वो अलऊ कर रहा है उन देशों की तादाद बढ़ती जाएगी। अ और सिर्फ मेन नुकसान जो पहुंचेगा इन द लॉन्ग रन वो अमेरिका और अमेरिकन अलय को पहुंचेगा। तो जैसे पहले खबर आई थी कि वो इंडिया को नहीं अलऊ कर रहे हैं। हालांकि प्रधानमंत्री ने उनसे बात भी की थी पेशिया से प्रेसिडेंट प्रशिया से मगर उन्होंने नहीं अलऊ किया था। बट कुछ घंटों के बाद फिर उन्होंने दो वेसल्स को आने अलव कर दिया वहां से निकलना। तो मेरे ख्याल से ये धीरे-धीरे काफी सारी और कंट्रीज को अलव करते जाएंगे। जहां तक उनकी वनेबिलिटी का सवाल है, ये बात सही है कि वो उनकी काफी बड़ी वनेबिलिटी है। मगर आई एम श्योर वो उसके लिए तैयार हैं। उनकी क्या तैयारी है ये मुझे नहीं मालूम है। मगर उन्होंने एक तो अगर यहां अटैक हो उनकी फैसिलिटीज पे होगा। अभी तक अटैक जो है टोकन अटैक हुआ है। अमेरिका ने कहा है कि हम आप दिखा रहे हैं कि हम इस पर हमला कर सकते हैं। मगर उसके रिटालिएशन में उन्होंने कहा है कि वो बाकी सारी फैसिलिटीज जो गल्फ रीजन में है उन सब पर अटैक करेंगे और ये फैसिलिटीज बनना में बहुत टाइम लगता है। बहुत खर्चा होता है। तो एक प्रेशर गल्फ कंट्रीज का भी बनेगा अमेरिका के ऊपर कि आप एनर्जी को इस लड़ाई से दूर रखें। आप एनर्जी इसको एनर्जी में एक्सटेंड ना करें इस लड़ाई को। मगर अमेरिका के ऊपर भी अंदरूनी दबाव भी है। क्योंकि ट्रंप लड़ाई को एक ऐसे नोट पे खत्म करना चाहते हैं जहां पे वो खुलेआम जीत का ऐलान कर सके। जहां पे उनकी जीत पे कोई शक ना हो किसी को। तो इसीलिए मुझे लगता है कि हो सकता है ये लड़ाई थोड़ी और ज्यादा ज्यादा विशियस हो जाए। अमेरिका और ज्यादा इन ह्यूमन ह्यूमन अटैक्स लोगों पे करेगा। मेरे ख्याल से उसको लग रहा है कि अगर वो एनर्जी पे अटैक ना करे, खर्च पे और ज्यादा अटैक ना करे किसी अगर वो दबाव में आ जाता है अपने गल्फ पार्टनर्स के तो फिर वो सिविलियन अटैक्स ज्यादा होंगे। जैसे आज भी सुबह एक अटैक हुआ है इस पा में जहां मेरे ख्याल से 15 लोगों की डेथ हो गई है। सिविलियन टारगेट पे उन्होंने अटैक किया है। तो मेरे ख्याल से इस तरीके के अटैक्स वो और करेगा उनको। बिकॉज़ हिस्टोरिकली अमेरिका ने कभी भी सिविलियन टारगेट्स पे हमला करने से गुरेज नहीं किया है। अ उनकी जितनी भी लड़ाईयां हुई हैं उनका उनका एक प्रिंसिपल ही लड़ाई का ये है कि ऑल टारगेट्स आर वैलिड टारगेट्स। मतलब वो मतलब हम हमारे जैसे हम डेवलपिंग वर्ल्ड हैं। इंडिया पाकिस्तान की लड़ाई में भी हम सिविलियन टारगेट्स नहीं अटैक करते हैं। हम लिहाज करते हैं कि दोनों मुल्कों की आवाम को नुकसान ना पहुंचे। जितनी हमारी लड़ाईयां हुई है। मगर द सो कॉल्ड सिविलाइज्ड वेस्ट में इस बात का लिहाज नहीं किया जाता है। उनकी जितनी भी लड़ाईयां हुई हैं उन्होंने सिविलियन टारगेट्स को मिलिट्री टारगेट से कभी अलग नहीं माना। चाहे वो हिरशिमा नागासाकी में जो न्यूक्लियर बम उन्होंने गिराए या वियतनाम में उन्होंने जो केमिकल वॉरफेयर का इस्तेमाल किया या जो काफिट बॉम्बिंग उन्होंने इराक के पहली लड़ाई में की फिर दूसरी लड़ाई में की आप वेबसाइट है एक जहां जो अमेरिकन कैजुअल्टीज को अमेरिकन लड़ाईयों में हुई ह्यूमेनिटेरियन कैजुअल्टीज को कंपाइल करता है। आप देखिएगा उसमें किस कितनी क्या तादाद में उन्होंने लोग सिविलियंस मारे हैं अपने एयर अटैक्स में अफगानिस्तान में मारे हैं। इराक में दोनों वार मारे हैं। तो ये उनके जो भी उनकी वॉर डॉक्ट्रिन है उसमें और यही डॉक्ट्रिन इजराइल की भी है कि वो सिविलियंस में और मिलिट्री पर्सनल में फर्क नहीं करते हैं। तो मेरे ख्याल से ये लड़ाई जो विशियसनेस इसकी है सिविलियन टारगेटिंग की ये और बढ़ेगी। क्या आप यह देख रही हैं कि फ्रस्ट्रेशन में आगे और खासतौर पर नितिन याू का प्रेशर और जस लॉबी जो जाइनेस लॉबी है उसका प्रेशर इतना आगे हो सकता है कि बूट्स ऑन ग्राउंड्स के अलावा जो टेक्टिकल न्यूक्लियर वेपन्स हैं उनका इस्तेमाल भी क्या हो सकता है? क्या आप इस खतरे की तरफ बढ़ते हुए उसको देख रही हैं? देखिए अ ये एक बहुत इंपॉर्टेंट सवाल है और मैं इसका जवाब देने में सक्षम नहीं हूं क्योंकि देखने में तो लगता है कि अगर वो बहुत डेस्परेट है तो वो इस्तेमाल कर सकता है और ट्रंप ने एक तरीके से ढके छुपे तरीके से इसकी चेतावनी भी दे दी है कि मैं चाहूं तो आधे घंटे में लड़ाई खत्म कर सकता हूं। तो वो ऑब्वियसली आधे घंटे में लड़ाई खत्म करने का मतलब यही है कि वो न्यूक्लियर वेपन की बात कर रहे हैं और अमेरिका देश का दुनिया का इकलौता मुल्क है जिसने न्यूक्लियर वेपन पहले इस्तेमाल किए हैं तो उनकी तो हिस्ट्री भी है तो ये कर सकते हैं मगर क्या ये कर करेंगे ये एक बहुत बड़ा सवाल है क्योंकि जिस वक्त उन्होंने पहले न्यूक्लियर वेपन का इस्तेमाल किया था दुनिया में किसी के पास न्यूक्लियर वेपन्स नहीं थे अभी दुनिया में कई सारे देश हैं और उनमें से तीन देश जो है न्यूक्लियर वेपन पावर्स है वो ईरान के साथ हैं। रूस, चाइना और नॉर्थ कोरिया। तो क्या अमेरिका इस वक्त इस तरीके का जोखम उठाएगा कि वो न्यूक्लियर वेपन वॉर का लेवल न्यूक्लियर वॉर तक ले जाए? अ जबकि जो अपोनेंट्स हैं उनके पास भी न्यूक्लियर वेपन्स हैं। तो मतलब पूरे लड़ाई का एक तो लड़ाई खत्म हो जाएगी। न्यूक्लियर वेपन इस्तेमाल करना कोई आमतम बात तो है नहीं। पूरा ये रीजन बर्बाद हो जाएगा सिर्फ अकेला और क्योंकि उसका जो इमिशंस है जो जो उसका सर्कल होता है अटैक का वो सिर्फ ईरान तक महदूद नहीं रहेगा तो ये सारी चीजें क्या यूएस एडमिनिस्ट्रेशन में कोई इस बारे में सोच रहा है कोई इस बारे में एडमिनिस्ट्रेशन को बता रहा है प्रेसिडेंट को और प्रेसिडेंट के जो मेरे हिसाब से काफी ब्रेनलेस सेक्रेटरी ऑफ बोर है। क्या कोई उन्हें इस बातें बता रहा है? मुझे पता नहीं। और अगर कोई बता रहा है तो क्या वो उस बात को कितने ध्यान से सोच रहे हैं? क्या उनके अंदर इतनी काबिलियत है कि इस बात को वो समझ सके? इसके कॉन्सिक्वेंसेस को समझ सके? तो ये सब कहना बहुत मुश्किल है। और बूट्स एंड ग्राउंड की आप क्या पॉसिबिलिटी देख रही हैं? क्या आपको लग रहा है हाल फिलहाल में ऐसा हो सकता है? नहीं बूट्स एंड ग्राउंड्स नहीं हो सकता है। बूट्स एंड ग्राउंड्स कहां से होगा? मतलब आप इतने दूर से कहां से लाएंगे? ईरान अमेरिका के बराबर में तो है नहीं। उन्होंने कोशिश की थी कर्स को कुड्स को थोड़ा सा प्रोवोक करने की। उन्होंने मना कर दिया उनका साथ देने के लिए। मेरे ख्याल से फ्रांस ने कुछ घुसपैठ करने की कोशिश की थी जिसमें उनका एक अफसर मारा गया है। वो भी मेरे ख्याल से कुछ ग्राउंड इन्वजन की थोड़ी बहुत उन्होंने लेबान में कोशिश करने की मतलब बेवकूफी की थी। तो वहां ये एक अफसर उनका मारा गया। वो उन्होंने मिशन खत्म कर दिया। तो ये करना बहुत मुश्किल है। बूट्स एंड ग्राउंड आपके या तो आपने किसी भी देश को कंप्लीटली क्रश कर दिया हो कि अब वहां रेजिस्टेंस ही नहीं बचा है जो कि इराक में हुआ था जब इराक पे सेकंड वॉर हुई इराक में सन को जब डिपोज किया गया था तो वहां पर कुछ बचा ही नहीं था क्योंकि वो 45 डे तक नॉनस्टॉप उन्होंने एरियल अटैक किए थे तो वो बिल्कुल ही देश ही खत्म कर दिया था तो फिर एयर ड्रॉप करा बूट्स एंड ग्राउंड्स आ गए अ तो कुछ रेजिस्टेंस ही नहीं था ऐसे ही अफगानिस्तान में जब आए तो अफगानिस्तान में कुछ बचा ही नहीं था जब उन्होंने अपने फौजी जमीन पे उतारे बट उतारने के बाद दलदल में फंस गए क्योंकि उनको लगा था कि कोई रेजिस्टेंस नहीं है बट धीरे-धीरे रेजिस्टेंस आता रहा और अमेरिकन कैजुअल्टी अफगानिस्तान में बढ़ती गई। यही रेजिस्टेंस सब्सिक्वेंटली उन्होंने इराक में भी फेस किया कि अमेरिकन कैजुअल्टीज इराक में भी बढ़ी। तो यहां पे अमेरिका इतनी बड़ी मतलब अगर चाहे भी करना बेवकूफी फिजिकली पॉसिबल नहीं है क्योंकि एक तो ईरान बहुत बड़ी कंट्री है और ये जाहिर हो गया है अभी जिस तरह से ये लड़ाई अमेरिका ने शुरू की है इजराइल के साथ कि उनको ईरान के बारे में उसकी मिलिट्री काबिलियत के बारे में उसकी मिलिट्री थिंकिंग के बारे में उसकी कमांड एंड कंट्रोल के बारे में कुछ नहीं पता वो बिल्कुल ब्लाइंड फोल्डेड इस लड़ाई में गए थे तो ये भी इमेजिन करना कि उसको ईरान की ज्योग्राफी और उसके टेरेन के बारे में पता होगा। थोड़ा फारफेश्ड है। मुझे नहीं लगता है उनके जितने भी इनफॉर्मर्स हैं या एजेंट्स हैं उन्होंने एकदम क्लियर साफ पिक्चर ईरान के बारे में उनको दी है और अब वो रियलाइज कर रहे हैं कि उनको ईरान के बारे में एक्चुअली बहुत कम पता है। तो वो अपनी ट्रूप्स यहां पे लाना तो बिल्कुल भी नहीं चाहेंगे। इसलिए वो आसपास लोगों को भड़का रहे हैं कि तुम जाओ तुम जाओ। वो अभी भी बीच-बीच में कह रहे हैं कि पीपल ऑफ ईरान यू राइज अप विल सपोर्ट यू। वो यही सब कर रहे हैं। अपने ट्रूप्स वो कमिट नहीं कर सकते। जी दो तीन मेरे लास्ट क्वेश्चंस हैं और मैं कल खबर देख रही थी कि उन्होंने 10 मिलियन का एक रिवॉर्ड रखा है अमेरिका के डिपार्टमेंट की तरफ से और ये कहा गया है कि मुस्तबा खामनाई से लेकर लारी जानी और पिशियान से लेकर सबके उसमें नाम है और कुछ ऐसे भी उन्होंने चेहरे नाम लिखे हैं जिनके चेहरे भी उन्हें नहीं पता है कि 10 लाख का नाम उन्होंने रखा है कि अगर कोई इनके बारे में बताएगा 10 मिलियन डॉलर्स की मैं बात कर रही हूं। अगर उनके बारे में कोई बताएगा तो हम यह अवार्ड जो है वो देंगे। तो ये दिखा रहा है कि कितने फ्रस्ट्रेटेड है वो कि दे आर ट्राइंग एवरीथिंग बट उसके बाद भी दे आर फेलिंग मिज़रेबली। मेरा आपसे सवाल यह है कि हुती और हिजबुल्ला और हमास के रोल को आप इस समय कहां देख रही हैं? खासतौर पर अभी ये लग रहा है कि आईआरजीसी के साथ मिलकर कम से कम हम ये देख रहे हैं कि हिजबुल्ला तो शाना बशाना लड़ रहा है और एक तो ये लड़ाई है जो मैदान में लड़ रहा है। क्या आपको लग रहा है कि आने वाले वक्त में अगर ये वॉर और ज्यादा अग्रेसिव होती है तो क्या होती का भी इस्तेमाल हो सकता है और क्या बाबर मंदब जो है जो रेड सी है क्या उसको भी बंद करने की तरफ ईरान जा सकता है और हिजबुल्ला से इनसे बात कर सकता है? देखिए अगर सऊदी से उनके रिश्ते ठीक नहीं हुए सऊदी से अभी ईरान काफी नाराज है। अगर सऊदी का यही रवैया रहा सऊदी अ सामने से कुछ बोल रहा है और पीठ पीछे कुछ और कर रहा है। अभी जब उन्होंने अमेरिकन रिफ्यूलर को गिराया है ईरानियन फोर्सेस ने तो सऊदी टेरिटरी में क्योंकि वो सऊदी टेरिटरी से ऑपरेट कर रहे थे। तो अगर ये डबल स्पीक चलती रही तो बहुत मुमकिन है कि वो फिर हुतीस को भी बोलेंगे कि आप शामिल हो जाए। खुद ही आइडियोलॉजिकली उनसे जुड़े हुए हैं। उन्होंने मोरल सपोर्ट उनको दे रहे हैं। बट अभी फिजिकली लड़ाई के मैदान में नहीं है क्योंकि उनकी जरूरत नहीं है। बट अगर ईरान को लगता है कि सऊदी को थोड़ा और सबक सिखाने की जरूरत पड़ रही है क्योंकि सऊदी अभी अपनी डबल स्पीच से बाज नहीं आ रहा है तो हो सकता है कि वो बाबर देव को भी ब्लॉक करने की कोशिश करें और हुदीस को करने में काबिल है। वो कर सकते हैं। तो ये हो सकता है। हिजबुल्लाह इसलिए एक्टिव और भी है क्योंकि हिजबुल्ला लेबनान में है और इजराइली इंक्रोचमेंट जो है वो सदर्न लेबनान में हो रहा था। तो हिजबुल्ला को उसको ग्राउंड पे जाके फिजिकली रेिस्ट करना बहुत जरूरी था क्योंकि वो साउथ सदर्न लेबनान में वो वो कपिन वाली अपनी पॉलिसी इ्तियार कर रहा हुआ था। जहां तक हमस का सवाल है, आई थिंक हमस अभी इसमें थोड़ा सा शांत इसलिए भी है क्योंकि एक तो हमस ने काफी नुकसान उठाया है पिछले दो साल में। उनकी लीडरशिप भी थोड़ी सी डिसारे में है और मेरे ख्याल से ईरान भी नहीं चाहता है कि हमस अपने आप को बहुत ज्यादा अभी एक्सपोज करे क्योंकि जब भी लड़ाई खत्म होती है और जैसे भी जो भी उसके कॉन्टर्स होंगे उस वक्त तो फिर जब नेगो नेगोशिएशन शुरू होगा तो मेरे मुझे लगता है कि हमस का भी उसमें कुछ रोल होगा। चाहे वो नेगोशिएटिंग टेबल पे बैठे या ना बैठे। आई डोंट थिंक वो बैठेगा। मगर पैलेस्तीनियन सवाल भी इस डिस्कशन का हिस्सा बनेगा। यह जो गाजा में जेनोसाइड हो रहा है, यह भी डिस्कशन का हिस्सा बनेगा। क्योंकि ईरान कंसिस्टेंटली पैलेस्तीनियंस को सपोर्ट कर रहा है। ये जो अभी उन्होंने यौमे गु्स मनाया है। इतनी लड़ाई के बावजूद उनके तमाम लीडरशिप अली लारीजानी भी और पेशकिया भी और अराची फॉरेन मिनिस्टर ये सब सड़कों पे उतर के आए हैं। तो ये पैलेस्तीन के साथ सॉलिडेरिटी मार्च में तो ये इस कॉज को वो छोड़ेंगे नहीं। तो जभी भी बातचीत शुरू होगी तो ये एक फैक्टर बातचीत का रहेगा। जी मेरे दो लास्ट क्वेश्चन आपसे और एक तो यह कि जो लगातार जाहिर सी बात है कि इजराइल में पूरी तरीके से सेंशंस लगे हुए हैं तो हमें नहीं पता है कि वहां कितने नुकसान और किस तरह का नुकसान हुआ है। उसकी इंटेंसिटी क्या है? लेकिन फिर भी जो तस्वीरें आ रही हैं जो कुछ वहां से निकल कर आ पा रहा है उसमें दिख रहा है कि नुकसान तो बहुत भारी हुआ है और एयरपोर्ट्स पर भी एक तरह से एक उहापोह की पूरी हम सिचुएशन वहां पर हमने देखी कि जहां लोग लड़ रहे हैं बकायदा तौर पर कि हमें टिकट से हमें जाना है। क्या आप ये देख रही हैं कि जो नितिन याू के घर पर जो ये क्लेम किया जा रहा है कि मिसाइल दागी गई और नितिन याू के भाई एडू नितिन याू उनका अससिनेशन हो गया है। वन गिविर की बात की जा रही है। या तो बहुत पूरी तरीके से जख्मी है या भी इस आल्सो बीइंग एलिमिनेटेड। नितिन याू की भी बात की जा रही है और उसको लेकर तो पूरा इंटरनेट जो है वो एक तरह से दीवाना हुआ पड़ा है और अलग-अलग तरह की चीजें निकल कर आ रही है। खासतौर पर जब वो अभी मीडिया के सामने आए थे ढके छुपे ही सही जब वो मीडिया के सामने आए यह बताया जा रहा है कि वो एआई जनरेटेड वीडियो आई डोंट नो कि उसमें कितना सच है और नहीं है। क्या और यह भी कि जो उनके बेटे हैं नितिन याू के वो एक दिन में 30 से 40 ट्वीट कर रहे थे और वो पिछले एक हफ्ते से पूरी तरीके से गायब हैं। क्या ये आपस में ये डॉट्स कहीं कनेक्ट होते हैं। क्या हम इसे पूरी तरीके से रोल आउट कर दें या आपको इसकी कोई पॉसिबिलिटी नजर आती है? काफी सारे लोगों के नाम जैसे आज किसी और का भी नाम आया है स्मोटच या ऐसे ही कुछ नाम है तो काफी सारे नाम आ रहे हैं जो ईरान क्लेम कर रहा है कि वो लोग मारे गए हैं हो सकता है मारे गए हो ये जब तक इजराइल इसको वेरीफाई नहीं करेगा ये कहना मुश्किल है। मेरा ख्याल है पर्सनल मेरा ख्याल है कि इनमें से काफी सारे लोग मारे गए होंगे क्योंकि इजराइल ईरान भी उनको टारगेट कर ही रहा होगा ईरान को जब उसके इजराइल के एयर डिफेंसेस काफी कमजोर पड़ गए हैं। अब उतना मैसिव अगर बम्बार्टमेंट हो रहा है और ईरान इतनी हाइपरसोनिक मिसाइल्स का अब इस्तेमाल कर रहा है तो ये कहना कि वहां पे हाई लेवल कैजुअल्टीज नहीं हुई होंगी। ये थोड़ा मुश्किल है। तो हो सकता है कि काफी सारी उनकी टॉप लीडरशिप खत्म हो गई हो। अ इसके एक वजह ये भी मैं बोल रही हूं क्यों मैं ऐसा मान मतलब मैं इंक्लाइंड हूं ये मानने के लिए क्योंकि बहुत दिनों से अ वो लीडरशिप दिख नहीं रही है जैसे ईरानियन लीडरशिप आपको जो है सही सलामत है वो सब आपको रोज दिख जा रहे हैं ना सिर्फ Twitter पे उनके वीडियोस भी आ जा रहे हैं। अब जैसे खामनी मुस्तबा का नहीं विजुअल आ रहे हैं। सिर्फ ओरल ऑडियो स्पीच आई है। तो ठीक है। ये माना जा सकता है कि वो जख्मी है। इसके भी चर्चे हो रहे हैं। तो अगर इजराइल के इतने सारे लीडर्स जो अब तक इतने एक्टिव थे और अब दिखाई नहीं दे रहे हैं तो अचानक से तो वो सब बंकर्स में बैठे हुए नहीं हो सकते ना। कहीं ना कहीं तो कुछ कम्युनिकेशंस होगा। कोई मैसेजिंग होगी, कोई डायरेक्शंस इशू हो रहे होंगे। अभी कुछ मीटिंग का उनके टॉप कमांडर की मीटिंग का विजुअल रिलीज हुआ है जिसमें उनके टॉप जिन आप लोगों की बात कर रही हैं वेनेवर की बात कर रहे हैं नितन याू ये सब उसमें नहीं थे उस फोटोग्राफ में तो हो सकता है ये मारे गए हो मतलब इसमें ये हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए कि अगर वो मारे जाएंगे ये लड़ाई नो होल्ड बार लड़ाई हो रही है अगर आप उनके लीडरशिप को कास्टेंटली अटैक कर रहे हैं तो वो भी आपकी लीडरशिप को अटैक करेंगे जी बिल्कुल यही है कि यही एक नैरेटिव भी है कि लोगों को यह यकीन करना बहुत मुश्किल हो रहा है और जब एक बार नहीं कई बार जो टॉप लीडरशिप है आयतुल्लाह अली खामनाई के अलावा इससे हमने पहली पिछली बार भी देखा था कि किस तरह से उनकी टॉप लीडरशिप को एलिमिनेट किया गया था। आयतुल्लाह अली खामनाई की शहादत हो गई। 40 से ज्यादा उनके जो टॉप लीडरशिप थी वो चली गई। तो यहां तो हमें पूरी तरीके से यकीन हो जाता है एकदम से। लेकिन जब वहां की बात होती है तो यकीन कर पाना जो है वो मुश्किल होता है। तो ये भी एक बात है कि शायद ये जंग जो है वो जो पर्सपेक्टिव है नैरेटिव है वो भी अराउंड द वर्ल्ड शायद वो चेंज करने में कामयाब हो पा रही है। मेरा लास्ट क्वेश्चन आपसे जो लोगों को जानने में बहुत इंटरेस्ट होगा। शायद आप उसका जवाब भी बीच में दे चुकी हैं कि यह जंग आपको कितनी लंबी जाती हुई नजर आ रही है और इसी से जुड़ा मेरा एक और सवाल कि चाइना और रशिया के रोल को इस जंग को कितना लंबा और कितनी ताकत से ईरान लड़ पाएगा उस रोल को आप कितना महत्वपूर्ण देखती हैं? देखिए ये लड़ाई काफी लंबी जा सकती है। अगर ईरान को और चाइना और रशिया को जो चाहिए वो नहीं मिलता है। क्योंकि अभी ईरान के अंदर तकलीफ सहने की काबिलियत काफी ज्यादा है और वो सह रहा है। तो वो जब तक ऐसे मुकाम पे लड़ाई नहीं पहुंचती है कि जब ईरान बातचीत करे नेगोशिएशन करे अमेरिका के साथ तो वो इस पोजीशन में हो कि वो अपनी शर्तों पे बात कर सके तो तब तक ये लड़ाई नहीं खत्म होगी। और रशिया और चाइना भी यही चाहेंगे कि ये लड़ाई उस मुकाम पर खत्म हो जब अमेरिका का इनफ्लुएंस इस पूरे वेस्ट एशिया में खत्म हो जाए। ये लड़ाई का इन लोगों ने लड़ाई शुरू नहीं की थी। ईरान ने शुरू नहीं की थी। लड़ाई ईरान तो काफी डेस्परेट था कि लड़ाई शुरू ना हो। तो लास्ट मिनट तक भी काफी सारी अमेरिका की शर्तें और वो मानने को तैयार था। मगर अब जब शुरू हो गई है और जब उन्होंने इतना नुकसान उठा लिया है तो उनकी सोच ये है कि अगर थोड़ा और नुकसान भी उठाना पड़ता है मगर हम इस मोड़ पर लड़ाई को ले जाए कि जहां पे हम अपनी शर्तों पे लड़ाई खत्म करवा सके और अब वो स्कोप उनका बढ़ गया है। पहले तो शायद यही स्कोप था कि हमारे ऊपर दोबारा अटैक ना हो। मगर मेरे ख्याल से रशिया चाइना ने भी रियलाइज कर लिया है कि ये अमेरिका ने उनको ऐसा मौका दे दिया है उनके हाथ में कि वो जो दुनिया में बदलाव लाने के लिए ग्लोबल ऑर्डर में जो बदलाव लाने की बात हो रही चाइना और रशिया बातें कर रहे थे एक नया वर्ल्ड ऑर्डर क्रिएट करने की बातें कर रहे थे शायद वो अब इस लड़ाई के वजह से मुमकिन हो सके तो ये इनका जो है कि यूएन की का स्टेटस वापस बरकरार किया जाए यूएन केेंस वापस बरकरार की जाए। अमेरिका का यूनिलटरलिज्म वो जो अब मनमानी करता है वो बहुत हद तक कम हो जाए। मेरे ख्याल से वो बहुत हद तक कम हो जाएगी। क्योंकि अब देखिए रशिया के दबाव में आके वेस्टर्न यूरोपियन कंट्रीज भी जो अमेरिका के साथ खड़े हुए थे और शुरू शुरू में बड़े बहादुरी की स्टेटमेंट दे रहे थे कि हम अमेरिका के साथ लड़ाई करेंगे ईरान के खिलाफ। और ईरान के अगेंस्ट इतने स्टेटमेंट्स दिए थे कास्टेंट वेरिफिकेशन के कि ईविल रिजीम है और रिजीम चेंज होनी है। वी स्टैंड वि द पीपल ऑफ ईरान। उन सबके आवाजों में भी बदलाव आ गया है। स्पेन तो बहुत ही ज्यादा स्ट्रांग पोजीशन उसने ली है। मगर अब आप देखिए बाकी और देशों की आवाजों में जर्मनी को छोड़ के सबकी आवाजें अब ईरान की तरफ नरम पड़ गई हैं। तो इसमें भी रशिया का बहुत बड़ा हाथ है जो अश ने उनको धमकाया है कि हम गैस सप्लाई रूम देंगे। प्लस उन्होंने भी ये देख लिया है कि ये शायद ऐसा टर्निंग पॉइंट है दुनिया में एक जो वंस इन अ लाइफ टाइम मोमेंट्स आते हैं जब दुनिया बदल जाती है। सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद एक ऐसा फ्रेज़ आया था कि दुनिया बिल्कुल बदल गई। तो उन्होंने वो भी शायद अब ये महसूस कर पा रहे हैं कि ऐसा यह टर्निंग पॉइंट है जिसमें अगर हम बहुत स्ट्रांगली एक तरफ खड़े हुए दिखाई दिए तो हमें नुकसान उठाना पड़ सकता है। तो अब ज्यादा से ज्यादा देश जो है वो बीच की पोजीशन अख्तियार कर रहे हैं क्योंकि वो देखना चाहते हैं कि ये इसका अल्टीमेटली नतीजा क्या निकलता है। ये बात सबको समझ में आ गई है कि ट्रंप के अंडर अमेरिका की जो सुप्रीमेसी थी वो खत्म होती जा रही है। अमेरिका की जो मिलिट्री सुपसी को बहुत लोग पहले उसका दबदबा मानते थे वो अब क्वेश्चनेबल हो गई है। इतनी बड़ी मिलिट्री ताकत होने के बावजूद भी अगर अमेरिका को अपनी ताकत का ही इस्तेमाल करना नहीं आ रहा है। उनके जो थिंकर्स हैं, उनके जो प्लानर्स हैं, जो स्ट्रेटेजिस्ट्स हैं अगर उस ताकत का इस्तेमाल करना ही नहीं जानते हैं और एक इतने छोटे और कमजोर मुल्क के आगे बराबरी की लड़ाई लड़ रहे हैं। मतलब उन्होंने एक मिसाल दागी। इन्होंने भी एक दाग दी। उन्होंने वहां से धमका दिया। इन्होंने यहां से धमका दिया। इस तरह का अगर वो करने पे मतलब उतारू हो गए हैं तो ये छोटा जो कमजोर पार्टी है वो तो ऑलरेडी लड़ाई जीत गई है ना। अगर कोई बड़ा आदमी अपने से कमजोर से हाथापाई पे उतर आता है तो कमजोर तो वैसे ही जीत गया ना कि उसने अपने बड़े आदमी को हाथापाई करने पे मजबूर कर दिया। तो ये बहुत बदलाव बड़ा बदलाव है। इसीलिए मेरे ख्याल से इसमें रशिया और चाइना नहीं चाहेंगे कि किसी भी तौर पे ये लड़ाई अमेरिका की शर्तों पे खत्म हो। वो यही चाहेंगे कि ये लड़ाई अब उनकी कलेक्टिव शर्तों पे खत्म हो। जी। बहुत छोटा सा एक जो आप बात कर रही थी उससे कयोसिटी जनरेट हुई कि क्या आप ये देख रही हैं कि ओ ओल्ड वर्ल्ड ऑर्डर को कोलैप्स होते एक न्यू वर्ल्ड ऑर्डर को उभरते हुए आप देख रही हैं इस जंग के बाद क्योंकि ईरान का तो यह पूरा मूड है डू एंड डाई वाला और करो या मरो वाला और उनका फाइनल एक तरह से उनको लग रहा है कि बार-बार जो गुंडागर्दी है कि आप आते हैं हमारे दरवाजे पर मार कर चले जाते हैं और फिर उसके बाद कहते हैं नेगोशिएशन हम इस मूड में फिलहाल नहीं है। सेंशंस हटाइए हमारे ऊपर से। हमारा जो नुकसान हुआ है उसका मुआवजा दीजिए और यह मेक श्योर करिए कि आइंदा कभी जिंदगी में ऐसा नहीं होगा। ये तो तीन शर्तें वो है जो पूरी तरीके से ईरान और जो अमेरिका और इजराइल को एक तरह से धराशाही करने की वाली है। तो क्या आपको ये लग रहा है कि इन शर्तों पर कभी मानेगा अमेरिका इतना मजबूर कर पाएगा ईरान और क्या आपको ये लग रहा है कि ओल्ड वर्ल्ड ऑर्डर कोलैप्स होते हुए और न्यू वर्ल्ड ऑर्डर उभरते हुए आप आप देख रही हैं और एक इंपॉर्टेंट सवाल जो है कंप्लीटली आई फॉरगॉट इंडिया के रोल को उसमें आप कैसे देख रही हैं? सबसे पहले मैं इंडिया का जवाब दे देती हूं। देखिए इंडिया का रोल इसमें काफी जैसे कि उनके प्रोफेसर है मोहम्मद मरानी उन्होंने कहा है बहुत फुलिश रोल रहा है। इंडिया का रोल काफी शॉर्ट साइटेड रहा है और जो लफ्जों का इस्तेमाल मैंने अमेरिकन पॉलिसी मेकर्स के लिए किया कि उनके अंदर सोचने की काबिलियत ही नहीं है कि हम कैसे अपना पावर का इस्तेमाल करें। इतने ही सख्त लफ्ज मैं इंडियन पॉलिसी मेकर्स इंडियन डिप्लोमेट्स के लिए इस्तेमाल करूंगी कि उनको दिखाई नहीं दे रहा है कि दुनिया कैसे बदल रही है। वो इंडिया एससी शघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन और ब्रिक्स दोनों के फाउंडिंग मेंबर है। उसके बावजूद इंडिया को ब्रिक्स की अहमियत दिखाई नहीं दे रही है। आप देखिए ब्रिक्स की अहमियत प्रेसिडेंट ट्रंप को जो कि जिसको कोई भी नहीं बहुत समझदार मानता है। खुद अमेरिकनंस भी उनको समझदार नहीं मानते। उन तक को दिखाई दे रही है कि ब्रिक्स एक अल्टरनेट वर्ल्ड ऑर्डर का विज़ लेकर आ रहा है और वो अमेरिकन वर्चस्व को या अमेरिकन पावर को चैलेंज कर रहा है। इसीलिए वो कास्टेंटली पिछले दो साल से जब से उनका एक साल से वो ब्रिक्स को कास्टेंटली रिडिक्यूल कर रहे हैं। उसका मजाक बना रहे हैं। और ब्रिक्स थमका रहे हैं ब्रिक्स नेशंस को कि मैं 100% टैरिफ लगा दूंगा जो भी ब्रिक्स में है और ब्रिक्स के थ्रू ट्रेड करने की बात कर रहे हैं। तो ये उनको भी नजर आ रहा है। बट इंडिया को ये बात नजर नहीं आ रही। एंड इंडिया ने इतनी ओपनली अपनी पोजीशन लड़ाई से पहले दिखा दी कि हम किसकी तरफ हैं। ये करने की उसको जरूरत नहीं थी। उसको चाहे इजराइल से कितने भी अच्छे संबंध बनाने हैं और कितने भी डीप संबंध बनाने हैं। मगर इस मौके पे अगर वो अपनी पोजीशन को थोड़ा ढका छुपा तरीके से रख लेता। देख लेता है लड़ाई किस तरफ जा रही है। फिर अपनी पोजीशन दिखाता है। वो थोड़ी ज्यादा समझदारी होती है। इंडिया की फॉरेन पॉलिसी कैसे चलती है? क्या उसमें सरकार की सोच है? क्या उसमें उनका अपना इनबिल्ट प्रेजडिस है? इनबिल्ट कन्वर्जेंस है इजराइल के साथ। आइडियोलॉजिकल अलाइनमेंट है इजराइल के साथ वो एक अलग बात है। बट इस सबके बावजूद भी अगर आप अपने देश के हित में सोचते तो आपको ये समझ में आ जाता कि इस मौके पे हम किसी भी एक पार्टी के साथ दिखाई नहीं देने चाहिए। हमें एक न्यूट्रल पोजीशन इख्तियार करनी चाहिए क्योंकि ये हमारी लड़ाई नहीं है। ये अमेरिका, इजराइल और ईरान की लड़ाई है। हमारा इससे क्या लेना देना है? हमारे ईरान से भी संबंध अच्छे हैं और हिस्टोरिकली अच्छे संबंध रहे हैं। खुद प्राइम मिनिस्टर नरेंद्र मोदी की टेन्योर में अच्छे संबंध रहे हैं। तभी तो हमने इन्वेस्ट किया है चाहब में। तो हमें ये अगर हमने ये बैलेंस पोजीशन रखी होती तो जो भी हमारी अंदरूनी पॉलिटिक्स है। एंटी मुस्लिम सेंटीमेंट है। हम चलो ईरान इजराइल और हम मिलते हैं। हम दोनों मुसलमानों को कुचलना चाहते हैं। जो भी है आप की जो भी पर्सनल प्रेजिडेंस है वो आप एक किनार रखते आप और पूरे तमीज से थोड़ा सोच समझ के देश के बारे में सोचते तो इस पोजीशन पे इस ऑकवर्ड पोजीशन पे नहीं आते कि अभी आपके खुद के लोग भी आपका मजाक उड़ा रहे हैं। आप देखिए पिछले कुछ हफ्तों में जिस कदर इंडियन लीडरशिप का इंडियंस मजाक उड़ा रहे हैं जिस तरीके के मीम्स इंडियन लीडरशिप पे आ रहे हैं ये पिछले 10 सालों में कभी नहीं आए। तो ये हशर नहीं होता। अब जहां तक ये बात आप जो कह रही है वर्ल्ड ऑर्डर की ये वर्ल्ड ऑर्डर बहुत क्लियरली दिखाई दे रहा है। मैं तो यहां तक कहूंगी कि ये लड़ाई अकेले सिर्फ यहां खत्म नहीं होगी। जब भी ये लड़ाई खत्म होती है ये लड़ाई यूक्रेन में भी खत्म होगी क्योंकि रशिया उसको भी टेबल पे लाएगा बात करने के लिए। रशिया यूक्रेन की लड़ाई पिछले साल खत्म होते होते रह गई थी। पुतिन ट्रंप को मिले भी थे बट फिर ट्रंप ने बैक ट्रैक कर लिया। मगर अब जब बातें होंगी तो ये सारी बातें टेबल पर होंगी और ये इसमें सबसे बड़ा जो सम टोटल होगा वो ये है कि अमेरिका का यूनिलटरलिज्म खत्म हो जाएगा 100% अमेरिका फिर भी एक बहुत बड़ा पावर रहेगा ऐसा नहीं है कि अमेरिका पावर नहीं रहेगा अमेरिका के पास बहुत अच्छी टेक्नोलॉजी है ये जितनी काफी बड़े इनोवेशंस जो फ्यूचरिस्टिक टेक्नोलॉजीस है एआई ड्रिवन टेक्नोलॉजीस में हो रहे हैं अमेरिका में अभी भी बहुत अच्छी अच्छा रिसर्च अच्छा काम हो रहा है इस एरिया में तो ये सुपीरिटी उसकी रहेगी पर जो यूनिलटरल मिलिट्री सुपरिटी है कि हम जहां मर्जी है हम दादागिरी कर सकते हैं वो खत्म हो जाएगी और उसको रिप्लेस करेगा ये एक नया जो सिस्टम बनके आएगा वेस्ट एशिया में जिसमें ईरान के साथसाथ रशिया और चाइना खड़े हैं और अगर वेस्ट एशियन के रियासतों को भी सऊदी है, यूएई है इनको ये जब दिखाई देना शुरू हो जाएगा तो वो भी एक नया सिक्योरिटी स्ट्रक्चर ढूंढने की कोशिश कोशिश करेंगे अमेरिका के से हटकर और हो सकता है ये जो एक कलेक्टिव सिक्योरिटी का मैकेनिज्म जो ब्रिक्स में ब्रिक्स प्रपोज कर रहा है ग्लोबल सिक्योरिटी इनिशिएटिव के तहत जो ये प्रपोज किया जा रहा है। हो सकता है वह इसका हिस्सा बनना चाहे और उनको लगेगा कि बजाय बगैर किसी फॉरेन ट्रूप्स के हमारे हमारे जमीन पे होने के भी हम एक दूसरे के साथ मिलके भी अपनी सिक्योरिटी को रीइंफोर्स कर सकते हैं। तो ये बिल्कुल एक नई तरीके की दुनिया बनेगी। जी बिल्कुल आई होप कि हम ये सब कुछ अपनी खुली नंगी आंखों से सब कुछ हम ये देख पाए और यह सब कुछ हम होता देखें ऐसी में दिली ख्वाहिश मैं यहां पर जाहिर करना चाहती हूं। हालांकि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए एक जर्नलिस्ट के तौर पर लेकिन हमने देखा है कि जिस तरह से जुल्म पूरी दुनिया में हो रहा है खासतौर पर जब हम फिलिस्तीन की बात करते हैं वहां पर जिस तरह से मासूम बच्चों का कत्ल किया गया और जिस तरह का जेनोसाइड वहां पर चल रहा है और अभी भी जो जुल्मो सितम वहां पर हो रहा है तो जाहिर सी बात है कि अगर एक हक पसंद इंसाफ पसंद इंसान होगा तो वो जालिमीन के साथ नहीं मजलूमों के साथ खड़ा नजर आएगा और वही शायद हम जैसे लोग शायद वही सोच रहे हैं। बहुत-बहुत शुक्रिया गजाला साहिबा। आपने इतना वक्त दिया और बहुत दिलचस्प ये पूरी बातचीत रही। बहुत-बहुत शुक्रिया वक्त देने के लिए आपका और हाउस नेटवर्क के साथ जुड़ने के लिए। बहुत-बहुत शुक्रिया आपने मुझे बुलाया एंड ऑल द बेस्ट टू यू एंड योर प्रोग्राम। थैंक यू सो मच। थैंक यू। थैंक यू।

Companion article

Fifteen days into a war that the United States and Israel launched against Iran, the question dominating the conversation had inverted itself, says Ghazala Wahab, editor of Force magazine, defence commentator and author of books including Dragon on Our Doorstep and Born a Muslim. Where Western coverage once asked how long Iran could hold out, she told host Bushra Khanam Fahad on Nous News Network, it is now Washington and Tel Aviv being asked how long they can sustain the fight — and, in her assessment, the shift is not just rhetorical. Tehran, she argues, is setting the war's narrative, its pace, and increasingly the terms on which it will end, having tabled three conditions for any negotiation: a complete lifting of sanctions, American compensation for the damage Iran has suffered, and a binding guarantee that Washington and Tel Aviv will never again jointly attack it.

A War That Didn't Go to Plan

Wahab's central argument is that the US and Israel badly misjudged what this war would look like, extrapolating from a shorter, twelve-day clash the previous year in which Iran largely absorbed strikes rather than answering them in kind. This time, she says, Tehran had already decided it would not absorb another attack — it would retaliate at full strength — and had spent the intervening year preparing accordingly. Anticipating renewed attempts on its top leadership (Washington and Israel tried and failed to kill Supreme Leader Ali Khamenei in the previous round too, she notes), Iran deliberately decentralised its command structure, pushing real operational autonomy down to mid-level officers so that the loss of senior leadership would not fracture the chain of command — what she calls, borrowing the American term, a “mosaic” defence built around deliberate decentralisation rather than a single, decapitable centre.

The Israeli-American calculation, as she reconstructs it, was that an external air assault on the top leadership combined with internal unrest — capitalising on the anti-government protests Iran saw as recently as this past January — would create a pincer effect: political and military leadership thrown into confusion from outside while ordinary Iranians rose up from inside, forcing the regime to collapse and come, in her words, “quietly” back to the table on American and Israeli terms, or hand over to a government Washington found more agreeable. None of that materialised.

Russia, China and the Symbolism of a Supreme Leader's Death

Two structural shifts and one symbolic one explain the reversal, in Wahab's account. First, Russia and China, which had stayed relatively cautious the previous year — Vladimir Putin had explicitly noted that Israel's population is more than half Russian-speaking, a demographic Moscow was reluctant to endanger — have this time backed Iran openly: militarily, diplomatically and on humanitarian grounds, sharing intelligence, weaponry, and the means to operate it, rather than helping quietly as before. Second, and consequentially, the killing of Ayatollah Khamenei during the fighting — after he made clear he would not go into hiding even at the cost of martyrdom — sharply raised Iran's standing across the Muslim world, cutting through routine Sunni-Shia friction and shifting global opinion, including in Western countries and even the United States, in Iran's favour. That shift in sentiment, she argues, has functioned as a genuine morale boost sustaining Iran's ability to keep fighting.

An Asymmetric War, Read Correctly by Only One Side

Asked to assess where each side now stands, Wahab frames this as a classically asymmetric conflict — Iran does not have the weaponry or sophistication of its opponents, but asymmetry shifts initiative toward the weaker party precisely because its capabilities stay hidden, the way an insurgent force in a jungle war does. She points to the pattern of America's post-war-era conflicts, from Vietnam to Afghanistan, as evidence that overwhelming firepower has rarely translated into the outcomes Washington expected — and argues Iran studied that history for forty years with the US and Israel specifically in mind. In the war's opening days, Iran deliberately fired older, less accurate missiles at Israeli, American and Gulf state air-defence systems simply to exhaust their interceptors — trading a cheap drone-grade missile for the enemy's far costlier interceptor rounds — before switching to its more capable second-tier missiles once those defences were already depleted and exposed.

The Gulf states hosting American military infrastructure — the UAE, Bahrain and Qatar among them — have taken a different kind of damage, in her telling: not primarily to hardware, but to the image of stability, luxury and security their entire economic model is built on. Israel's own losses remain opaque, since almost no independent reporting is emerging, but the scattered footage that has surfaced suggests, she believes, considerable damage to multiple cities and loss of life the country is keeping out of the news. America's deeper loss, in her view, is reputational: the image of invincibility and unipolar dominance it built over decades in West Asia has taken what she calls “a dent” that will outlast the war itself, making a full return to its old regional primacy unlikely.

Kharg Island, the Strait of Hormuz, and the Nuclear Question

On the American strike on Iran's Kharg Island — the export point for roughly 90 percent of Iranian crude — and Washington's threat to hit oil facilities directly if the Strait of Hormuz stays disrupted, Wahab pushes back on the framing that Iran has “closed” the strait at all. What Tehran has actually done, she says, is open something closer to a toll plaza: vessels it chooses to allow pass through, and the list of countries being allowed through is steadily growing, including — after early reports that India's ships were being blocked despite a direct call from the prime minister — two Indian vessels cleared to leave within hours. The lasting damage, she argues, will fall mainly on America and its allies rather than on the wider flow of oil.

She takes seriously the risk that America extends its strikes into more overtly inhuman territory against civilians rather than energy infrastructure, given historical American and Israeli war doctrine of treating civilian and military targets as equally valid — citing the atomic bombings of Hiroshima and Nagasaki, chemical warfare in Vietnam, and carpet-bombing across both Gulf wars in Iraq as precedent, and contrasting it with India and Pakistan's comparative restraint on civilian targeting in their own conflicts. On whether pressure from figures like Netanyahu and the pro-Israel lobby in Washington could push the US toward tactical nuclear weapons, she is candid that she cannot answer with confidence, noting only that Donald Trump has cryptically threatened he could end the war “in half an hour” — a remark she reads as implicitly nuclear — while also noting that, unlike in 1945, three nuclear powers, Russia, China and North Korea, now stand aligned with Iran, which should give Washington pause given that the fallout from any nuclear strike would not stay confined to Iranian territory.

Why Boots on the Ground Isn't Coming

A ground invasion, she argues, is simply not physically feasible: Iran is too large a country, the US clearly went into this war with limited understanding of Iran's military capability, command structure or strategic thinking — evident, she says, from how blindly it appears to have entered the conflict — and Washington's own attempts to provoke proxies (including reported outreach to the Kurds, who refused, and a French incursion attempt into Lebanon that cost an officer's life before it was abandoned) have already failed. Historically, US ground deployments have followed near-total aerial destruction of a country's capacity to resist, as in Iraq after weeks of continuous bombing, or Afghanistan — and even then, both wars became quagmires once residual resistance regrouped and American casualties mounted. Absent Iran being reduced to that state first, which she considers implausible, Washington's rhetoric urging Iranians to “rise up” is, in her reading, a substitute for troop commitments it cannot actually make.

The Gulf Rulers' Real Fear Isn't Iran

Asked why Gulf monarchies continue acting as junior partners to Washington despite being, in her words, treated as vassals, Wahab offers a structural explanation rather than a moral one: these rulers hold power not through any mandate from their own people but through American backing, and what they fear most is not Iran, Russia or Israel but their own populations — the same fear that led Bahrain to call in Saudi troops to suppress its own domestic protests. Removing the American security umbrella, in their calculation, risks a 1979-style revolution at home. She is sharply critical of Saudi Arabia specifically, arguing in her book Born a Muslim that the custodianship of Islam's holiest sites should not be the exclusive preserve of one ruling family but held in a trust resembling the Vatican model — and holds Riyadh responsible, through its role in creating the Mujahideen alongside the US and Pakistan during the Soviet-Afghan war and later al-Qaeda, for more damage to the global Muslim community's image than any other single country, cemented by the political and economic architecture of the petrodollar alliance with Washington.

Hezbollah, the Houthis, Hamas — and a Cooling Saudi Relationship

On the wider network of Iran-aligned actors, Wahab notes Hezbollah is already fighting shoulder to shoulder with Iran's forces, having needed to physically resist Israeli encroachment into southern Lebanon regardless of the wider war. The Houthis remain ideologically aligned and vocally supportive but have not yet entered direct combat, in her reading because Iran hasn't required it — though if Iran's patience with what she calls Saudi Arabia's “double-speak” (public statements of restraint alongside, for instance, allowing an American refuelling aircraft that Iranian forces later shot down to operate from Saudi territory) runs out, she considers it plausible Tehran could ask the Houthis to move against shipping through the Bab-el-Mandeb strait too. Hamas, by contrast, she reads as deliberately subdued, having taken heavy losses over the past two years and facing leadership disarray, with Iran itself reportedly discouraging further exposure — though she expects the Palestinian question, including what she calls the genocide in Gaza, to remain part of any eventual negotiating table, pointing to senior Iranian officials publicly marking Quds Day even mid-war as evidence Tehran will not abandon the cause.

Unverifiable Claims From Inside Israel

Pressed on viral claims circulating about the Israeli leadership — that a missile strike hit Netanyahu's house, that his brother was assassinated, that Netanyahu himself may be dead, badly wounded, or that a recent video of him was AI-generated, and that his son's normally prolific social media activity has gone dark for a week — Wahab declines to confirm any of it but says she is personally inclined to believe a significant number of senior Israeli figures have likely been killed, given how degraded Israel's air defences have become and the scale and sophistication of the missiles now being used against it. She notes the pattern is suggestive: Iran's own top leadership losses were confirmed almost immediately and visibly, while Israeli leaders who were constantly publicly visible have simply stopped appearing, with only audio statements surfacing from some. In a war being fought, as she puts it, with no holds barred, she argues it would be more surprising if senior leadership on both sides hadn't been targeted and hit.

A New World Order — and India's Place in It

Asked directly whether she sees an old world order collapsing and a new one emerging, Wahab answers unambiguously yes — and predicts the war's effects will not stay confined to West Asia. Whenever this conflict ends, she expects Russia to bring the unresolved Ukraine war back to the table as part of the same reckoning. The larger outcome, in her view, is the erosion of American unilateralism: Washington will remain a major power, with continuing strength in areas like AI-driven technology, but its ability to act with impunity anywhere in the world — what she bluntly calls “dadagiri,” or bullying — is ending, to be replaced by a new security architecture in West Asia built around Iran, Russia and China, one that other regional states may eventually look to join, possibly through the collective security mechanisms BRICS has been proposing, rather than continuing to rely on Washington. She notes that even Western European governments that initially made bold statements standing with Israel against Iran have visibly softened their tone as the war has dragged on, partly under pressure from Russia's leverage over gas supplies — with Spain taking the firmest pro-Iran position and Germany the most notable holdout.

It is on India that Wahab is most unsparing. She calls India's conduct in the run-up to the war “foolish” and “short-sighted,” arguing that Indian policymakers and diplomats — unlike US policymakers, whom she also criticises for lacking the sophistication to use American power wisely — have failed to see how the world is changing, despite India being a founding member of both the Shanghai Cooperation Organisation and BRICS. She points out that even Donald Trump, a figure she says few consider strategically astute, recognises BRICS as a genuine challenge to American dominance, which is why he has repeatedly mocked the bloc and threatened 100 percent tariffs on any country trading through it. India, in her assessment, missed what Trump did not.

Her sharpest criticism is that India revealed its alignment with Israel and the US too openly, too early, before the war's trajectory was even clear — a needless move given that deepening ties with Israel did not require public, one-sided positioning at this particular moment. She argues that had India's diplomats genuinely thought in terms of the national interest rather than domestic ideological convenience, they would have recognised that this was fundamentally not India's war, that India has historically maintained good relations with Iran across administrations including Prime Minister Modi's own tenure — reflected in Indian investment at Chabahar — and that a neutral, balanced position would have served India far better than one shaped, as she suggests, by an ideological convergence with Israel and domestic anti-Muslim sentiment. The costs of that miscalculation, she says, are now visible in how openly Indian leadership is being mocked at home, including in a wave of memes unlike anything seen in the past decade.

Closing the conversation, Wahab allows herself what she calls an admittedly unjournalistic hope: that this shift plays out to its conclusion in full view of the world, given what she describes as the scale of injustice visited on Palestinians, including the killing of children amid what she calls an ongoing genocide — a cause, she says, that anyone committed to justice has to stand against, regardless of professional detachment.

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