2:28‘Don’t Identify Me With Religion’: Journalist Recounts Assault
“Yes, I am a Muslim. Hit me as much as you want. But the Constitution doesn’t allow it.”
What happened to journalists Shaheen Khan and Nafisa Khan at Delhi’s Saket Police Station? The two journalists allege that they were manhandled and assaulted by Delhi Police personnel while covering an event in Saket attended by Union Home Minister Amit Shah and Delhi Chief Minister Rekha Gupta. …
सबसे पहली चीज मेरे जेहन में जो चल रही थी कि क्या आज अपनी पहचान पर शक कर लूं? क्या सबसे बड़ा गुनाह मेरा यही है कि मैं मुसलमान हूं। एक नाम पढ़ के जितना गुस्सा सब कुछ उन्हें आया वो कहीं ना कहीं झकझोर देता है कि इतनी नफरत एक पर्टिकुलर कम्युनिटी के खिलाफ। क्या उस पर कोई अगर पूजा नाम आता, शीला नाम आता, दीक्षा नाम आता। क्या तब भी आपका यही रवैया होता? तुम्हें पता है मुसलमानों के साथ क्या होता है? तुम्हें पता है दिल्ली दंगे कहां हुए थे? तुम्हें पता है कि शाहीन बाग के नाम पर क्या हुआ था? देयर वाज अ कॉल वि द नेम मोहम्मद खान। शी जस्ट सो दैट यू नो स्क्रीन। वो तुरंत खड़ी होती है। अच्छा मुस्लिम है मुसलमान है। तब तो तुझे और मारूंगी। मेरे मुंह से सिर्फ कितना शब्द निकला था कि मैम आप मुसलमान पहचान कर कर मार रही है। आप मुसलमान पहचान कर कर कैसे मार सकते हैं? [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो वीडियो जो तुम्हारा वायरल है जहां तुम ये कह रही हो कि खान है मेरा नाम मोहम्मद आता है मेरे नाम के आगे इसलिए [संगीत] मार रहे हो और जिस टाइम यहां मेरे पैर पर लाठी मारी उन्होंने तो मैं बहुत तड़प मछली की तरह मेरी छोटी बहन तड़प तड़प रही थी और मुझे अपनी बहन पे फक्र भी हो रहा था पर फिक्र भी हो रही थी इस देश के लिए हमारे पूर्वजों ने कुर्बानियां दी हैं लहू बहाया जिसका इतिहास आप कभी नहीं मिटा पाएंगे, चाहकर भी नहीं मिटा पाएंगे। सुनने के बाद आप लोगों के साथ ये टीम और यह सब कुछ लगी। एफआईआर दर्ज नहीं हो पा रही। हमारे बाबा हमें बेटा बोलते हैं। बेटा डरने की जरूरत नहीं है। हक की बात जहां पर हो, सच की बात जहां पर हो, अड़ जाना, डट जाना कि हमें नहीं भूलना चाहिए। सिद्दीक कपन जिनको जिनको स्टेट ने किस तरह से सालों उनको जेल में रखा। वो भी रिपोर्टिंग करने जा रहे थे। उस चीज का मुझे सदमा लगा कि ये लोग अगर हमारी पहचान करके मार रहे हैं तो इस देश के आम मुसलमानों के सम्मान की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसके कंधों पर बसती है मां क्या इसलिए कि तुम लोग मुसलमान हो इसलिए इस प्रोसेस को और डिले किया जा रहा है एक कान से मुझे सुनाई दे रहा था कि जामा मस्जिद की मीनारों पर एक वक्त पर आवाज गूंज रही थी कि तुम कहां जा रहे हो मुसलमानों ये देश तुम्हारा है। कभी ऐसा लगा हो कि अभी थोड़ा सा रुक जाते हैं। ऐसा नहीं करते क्योंकि है तो हमारा नाम शाहीन और नफीसा ही। डरो मत नहीं डरे। हमने तो प्रूफ कर दिया कि हम नहीं डरे। मैं प्रियंका गांधी से मदद मांगती हूं। लड़की हूं लड़ सकती हूं। इस स्लोगन ने दीदी हमें लड़की और हम लड़ के दिखा भी दिया। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब nटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद और आज स्टूडियो का माहौल बिल्कुल अलग है क्योंकि आज स्टूडियो में आई हैं वह जांबाज निडर बेखौफ लड़कियां जिन्होंने सत्ता का कॉलर पकड़ कर यह बताया कि हम मुसलमान हैं तो आप हमें इस तरह से टारगेट नहीं कर सकते हैं। आपको याद तो होगी ना वो फिल्म माय नेम इज खान बट आई एम नॉट अ टेररिस्ट। उस टाइम लग रहा था कि एक फिल्म का नाम है। लेकिन राजधानी दिल्ली में दो मुस्लिम महिला पत्रकारों के साथ दिन दहाड़े जो किया गया है, जो बर्बरता की गई है, जिस तरह से उन्हें पीटा गया है, उनका नाम पूछकर उनके नाम के आगे खान लिखा हुआ था इसलिए जो उनके साथ बर्बरता की गई है, वो बहुत सारे और बहुत गंभीर सवाल उठाती है। मैं ज्यादा नहीं बोलूंगी और आपको इंट्रोड्यूस कराऊंगी उन दो बहादुर लड़कियों से जिनकी चर्चा ना सिर्फ देश बल्कि विदेश में हो रही है। कोई ऐसी न्यूज़ एजेंसी नहीं होगी। न्यूज़ प्लेटफार्म नहीं होगा इंटरनेशनलली जिन्होंने उनकी स्टोरीज को कवर नहीं किया और जिस बहादुरी से वो लड़ी हैं। जिस निडरता निडरता से वो लड़ी हैं वो एक तरह से एक मिसाल बन गई हैं। मेरे साथ शाहीन है। मेरे साथ नफीसा हैं। बहुत-बहुत स्वागत आप दोनों लोगों का नाउज़ नेटवर्क में। मैं चाहती थी कि किसी अलग तरीके से आप लोगों का मैं स्वागत करूं। लेकिन मौका ऐसा है कि हमें इस पर इस तरह से बात करनी पड़ रही है। हमने अभी-अभी आजादी का 80वां जश्न मनाया है और इसी राजधानी में लाल किले की प्राचर से प्रधानमंत्री ने बड़ी-बड़ी बातें की थी। लेकिन यह नहीं पता था कि उसके कुछ दिन बाद दो मुस्लिम महिला पत्रकारों के साथ यह होगा। शाहीन और नफीसा मैं सबसे पहले आपसे ये जानना चाहती हूं कि आप लोगों के साथ उस दिन हुआ क्या? शुक्रिया मैम भरी बात कि आपने हमारी आवाज को एक और बड़ा प्लेटफार्म दे दिया। हालांकि देश दुनिया से हमें प्यार मिल रहा है, समर्थन मिल रहा है। क्या हुआ था? ये तो हम दिल्ली पुलिस से जानना चाहते हैं। क्योंकि हमें अभी तक नहीं समझ आ रहा कि हमारे साथ क्या हुआ। हमें किस चीज की सजा मिली? महिला होने की सजा मिली, पत्रकार होने की सजा मिली या मुसलमान होने की सजा मिली? तीनों सवाल मैं इसलिए कर रही हूं क्योंकि इन्हीं तीन आधार पर हमें कहीं ना कहीं शिकार बनाया गया और कमरे में बंद कर पीटा गया। और अगर आप चाहती हैं कि उस शुरुआत कैसे हुई? तमाम चीजें हमें कैसे उस कमरे तक ले जाया गया। तो मैं चाहूंगी कि वो तमाम चीजें शाहीन बताए जो पत्रकार भी है पेशे से और मेरी बड़ी बहन भी है क्योंकि सवाल और जो सेल्फ वीडियो है वो यही बनानी है। मैं बहुत आराम से साइड में बैठी थी क्योंकि मुझे ये अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद मेरे पेशे पर और मेरे धार्मिक पहचान पर सबसे बड़ा हमला होने वाला है। मुझे इसका अंदाजा बिल्कुल नहीं था। और शायद ये हमला मेरे लिए बहुत बोना हो गया। और उन तमाम अधिकारियों के लिए बहुत बड़ा हो गया कि आज वो छिपे फिर रहे हैं। आज वो पता नहीं कहां लापता है। शाहिद मैम आप बताइए कि आप ऐसा क्या कर रही थी? मैं भी अब जानना चाहती हूं क्योंकि हम लोग वॉकआउ कर कर आ रहे थे। जिम से आ रहे थे और जूस पिलाने का वादा मेरी बहन ने मुझसे किया था। क्या हुआ था और क्यों आपने ऐसा क्या किया? मैं भी आज बतौर पत्रकार आपसे पूछ रही हूं कि आपने ऐसा कौन सा क्राइम किया उस वक्त कि पूरा प्रशासन आपके पीछे पड़ गया। मुख्यमंत्री गृह मंत्री की सुरक्षा में कौन सा बड़ा खतरा पैदा कर रही थी वहां पर कि आपकी वजह से मुझे भी लाठियां खानी पड़ी। बिल्कुल देखिए बहुत-बहुत शुक्रिया मैम। आप एक बड़ी बहन की तरह हमारी पहले भी मुलाकात रही है और आज जिस तरीके से आप हर मुद्दे पर बात करते हो बहुत अप्रिशिएबल है और आज यहां से हम जो वही जो हमने देश को पहले ही बताया हम वही बताने की कोशिश करेंगे। कि मैं क्या कर रही थी? मैं राजधानी दिल्ली से दिल्ली की उस सड़कों से जो आम जनता की सड़कें होती हैं। उस सड़क से वही हिमाकत कर रही थी जो पिछले 2014 के बाद से इस हिमाकत को तोड़ने का जिसको दबाने कुचलने की लगातार जो प्रयास है सत्ता में बैठे लोग लगातार कर रहे हैं। मैं सवाल कर रही थी। वो जो सवाल जो आम जनता के हैं हम लगातार आम जनता की आवाज बनते हैं और क्योंकि मैं वहां की स्थानीय हूं। मैं एक पत्रकार भी हूं और जिस तरीके का माहौल उस दिन मुझे नजर आ रहा था मेरा इलाका बहुत चमकाचम नजर आ रहा था जो आम दिनों में बहुत बदहाल स्थिति में होता है जहां पर पैदल चलना मुश्किल होता है और बहुत सवाल आते हैं मन में कि ये कैसे मुमकिन हो रहा है तो पता चलता है हमारे इलाके में बड़े-बड़े लोग आ रहे हैं जिम्मेदार लोग आ रहे हैं जिनको संसद से लेकर सड़क तक लगातार लोग ढूंढ रहे थे कि कहां पर हैं मालूम पड़ता है कि गृह मंत्री अमित शाह वहां पर आ रहे हैं। एक निजी अस्पताल का इनोगेशन करने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री आ रही हैं जो लगातार महिला सुरक्षा को लेकर के सवालों के घेरे में है और हम बिना किसी को डिस्टर्ब किए बकायदा मेरे घर के पास वहां पर कुछ ट्रैफिक पुलिस खड़े थे जो पहले हमें रोकते हैं। फिर हम उन्हें बताते हैं कि हम जिंदा पत्रकार हैं। मैं पाकिस्तानी हूं और क्योंकि मेरे इलाके में कुछ अलग हो रहा है। मुझे इसको वैसे भी देखना चाहिए। एक आम इंसान के तौर पर भी मैं देख सकती हूं सिटीजन पे बकायदा उनको बता करके मैं वहां से निकल के और वो मुझे कोपरेट करते हैं कि अरे आप तो डॉक्टर आपको जरूर जाना चाहिए। हम उनकी समझ को अप्रिशिएट करते हैं। वहां से निकलते हुए स्कूटी पे हम दोनों जाते हैं और नॉर्मल स्थिति में एक चलता हुआ वीडियो कि देखिए मेरा इलाका चमक रहा है। पूरा जो वहां पे एनक्रोचमेंट है वो साफ कर दी गई है। जो आम व्यक्ति का भी अधिकार है। पर ये आज क्यों हो रहा है? आज ये खास क्यों किया जा रहा है? दिस वाय क्वेश्चन जब मैं पूछते हुए चलती हूं थोड़ा आगे जा स्कूटी लगाती हूं जहां पे हमें पत्ती है और हम उनको कोपरेट करते हैं। अच्छा हम यहां नहीं लगा सकते हम साइड में जा के लगाते हैं जो एक रेजिडेंस इलाका जहां से शुरू हो जाता है। फिर हम बिल्कुल साइड में सेल्फ वीडियो बनाने की जो आमतौर पे करते हैं। देखिए पुलिस स्टेशन अस्पताल और इस तरीके का यहां पर माहौल है। हमें पहले वहां पे जो आइडेंटिफाई है एसएचओ वो गलत तरीके से रोकते हैं। हम बार-बार बताते हैं सर पत्रकार है प्लीज हम आपको कोपरेट कर रहे हैं। आगे हमें कोपरेट कीजिए। एक वीडियो बनाने जा रही हूं। लगातार हमें रोका जाता है जिनसे फलाना ये हो रहा है मूवमेंट। हम बिल्कुल ऑब्स्ट्रक्ट नहीं करेंगे। प्लीज डू ट्रस्ट। एक छोटा कुछ मिनट्स भी नहीं होंगे। ये रहा फिर एक फीमेल कॉप को बुला के हमें रोका जो टच कर देते हैं। आप डू नॉट टच मी। आई एम मैं कोई वो नहीं हूं कि आई विल नॉट कोपरेट यू। दिस वास अ स्माल यू नो एक ड्यूरेशन का मोमेंट होता है और हम वहां से अपनी स्कूटी लेकर के जो यू टर्न होता है वहां से हम चलते हैं कि हमें कुछ हमारा हो गया जो करना था और हम चलते हुए क्योंकि घर का मेरा रास्ता वही है स्कूटी से मैं चलती हूं और वो निजी अस्पताल का रास्ता मैं जो है जो रास्ते में है एक्चुअली हम हम कहीं किसी के प्रिमाइससेस में नहीं थे हम बाहर थे बस अपने घर जा रहे थे हम घर जा रहे थे और क्योंकि बैठकर हां और वहां क्योंकि एक कट आउट लगा हुआ था जो रोड के यहां पे और उसका अस्पताल का रास्ता वहीं से बन रहा है जिस पे श्रीमती मुख्यमंत्री और श्रीमान गृह मंत्री पहुंच रहे थे उस कट आउट पे मैं एक छोटा सा स्मॉल वीडियो कि ये कट आउट है देखिए ये इवेंट है और ये ये गेस्ट यहां पर आ रहे हैं जिन जिन पर शायद एक आम व्यक्ति का अधिकार ज्यादा होता है ना कि निजी अस्पतालों का लेकिन वो हमसे भागते हैं हमसे छोटा सा वीडियो कई सवाल थे और ये दिखाने के लिए देखिए अस्पताल भी चमक रहा है। जहां पर आम दिनों पे प्राइवेट अस्पतालों में कूड़े का ढेर रहता है। वहां पर ठेलेवेले लगे रहते हैं जो कि नहीं होने चाहिए। बदबू आ रही होती है। एक प्राइवेट हॉस्पिटल वो सिर्फ अपने वहां तक सफ ये कुछ सवाल है। दो मिनट का मैं वीडियो बनाती हूं जिसमें कुछ जो सिक्योरिटी है मैक्स के वो गेट पे हैं। उनके माइंड से वो रोकते हैं हां आप कट आउट पे नहीं ले सकते। बताती हूं भैया कट आउट का फोटो है। हम कोई गन नहीं निकाल रहे हैं। कुछ नहीं कर रहे हैं। हम ये चीज करते हैं उनके साथ में और दो मिनट का वीडियो नफीसा वहां साइड में आराम से बैठी है। शी हैड नो आईडिया। मैं सेल्फी वीडियो बना रही हूं। देखिए ये कट आउट है और इस तरीके से कुछ क्वेश्चन करती हूं। देखिए प्राइवेट हॉस्पिटल में आई हैं। बहुत अच्छी बात है। आप हमारे इलाके में आई हैं। अस्पतालों को आप प्राइवेट अस्पतालों को बढ़ा रहे हैं। बट सरकारी अस्पतालों की बदहाली पर कौन जवाब देगा? उस पर कौन बात करेगा? आप महिला मुख्यमंत्री आप यहां पर आ रही हैं। अस्पताल के लिए आपके पास टाइम है। लेकिन आप महिला सुरक्षा पर कब बोलेंग? कई घंटों तक बच्ची को चलती बस में उसके साथ असॉल्ट किया जाता है गैंग उस पर आप कब बोलेंगे? दो शब्द आपके पास नहीं है। अमित शाह जिनको लगातार देश की जनता बच्चे पूछ रहे थे कि आप बच्चों पर जो वो टॉर्चर ब्रूटलिटी हुई देश का एलओपी पूछ रहा था। उस पर वो जवाब नहीं दे रहे थे। उनके पास समय क्यों नहीं है इन सब बातों पर बात करने का और वो तो देखिए स्वास्थ्य मंत्री भी नहीं है यहां पर क्या कर रहे हैं तो क्यों प्राइवेट अस्पतालों को इतनी तरजीह दी जा रही है ऐसी कौन सी स्टार्ट करते है दो मिनट का शायद शायद मैं जितना बता और शायद ये ये सब अनमोल ये सब सवाल थे मेरे मन में जो शायद अगर मुझे करते अलाउ होते मैं करती और मैं उस प्रमा उस सड़क के उसमें हम स्कूटी थोड़ा हमने दूर लगाई हो इस प्रिमाइससेस से और हम उसमें हैं जो यू नो जो फुटपाथ हमारे लिए आम जनता के लिए होता है। हम ये होता है दो मिनट की वीडियो बनाते हैं और चलिए नफीसा इतने में चलते हैं कि कुछ पुलिस वाले आते हैं और फोन छीनने की कोशिश करते हैं और इनको चलिए बैठाइए वहां पे वैन खड़ी कर दी जाती जो गाड़ी होती है पुलिस वाले की। हम सवाल करते हैं कि आप हमारा फोन क्यों ले रहे हैं? हमने बताइए क्या किया है? और गाड़ी में क्यों बैठा रहे हैं? मैंने बोला सर मैं जर्नलिस्ट हूं। आप गलत कोई ले रहे हैं। हमने किसी को डिस्टर्ब नहीं किया। कोई माहौल खराब नहीं किया। नहीं नहीं बैठिए नहीं नहीं बैठिए हमें टच और करने हमने कहा आप हमें टच नहीं कर सकते। आप मेल पुलिस वाले हैं। फिर एक फीमेल दो तीन फीमेल कॉप्स को बुलाया जाता है। वो टांग पकड़ के हाथ पकड़ के मानो हम कोई हम कोई कबाड़ है। हम कोई सामान है। हम कोई सभ्य इंसान है। हम नागरिक नहीं है इस देश के। हम कीड़े मकोड़े हैं। इस तरीके से हमें मेरा फोन है। हाथ पकड़ रही है। नोच रही है। मेरे फोन को छीन रही है। मेरे फोन को तोड़ने की कोशिश कर रही है। मैं फिर भी मेरे पास वो सब वीडियो है जिसमें बोल रही देखिए मुझे किस तरह से हमें असॉल्ट कर रहे हैं और जबरदस्ती ले रहे हैं। हम बोल रहे हैं हम पत्रकार हैं। मैं 4 पी.m. की रिपोर्टर हूं। मैं आपको मेरा कार्ड दिखा सकती हूं। मेरा फोन का एक्सेस करने दीजिए। नहीं हाथ पकड़ लिए, जकड़ लिए। तमाम फोर्स का इस्तेमाल जिनको पता नहीं कौन सा कानून इनको ज्यादा दिया जाता है कि आम आदमी पर आप हर तरीके का जो फोर्स है वो इस्तेमाल कर लेते हैं। हम कहते हैं हमें जाने हम इस बीच मैम हमने बोला उनको कि सर हम तो घर ही जा रहे हैं। हमारी स्कूटी वहां खड़ी है। हमें जाने दीजिएगा प्लीज। हमें हमारे घर जाने दीजिए। आप ये जो कर रहे हैं ठीक नहीं कर रहे हैं। तो हमें धमकाते हैं चिल्लाते हैं हम पर और अचानक से महिला पुलिसकर्मी पुलिस की गाड़ी कब में आई हमें पता भी नहीं चला। और वो लिटरली हमें हमारे पैरों को पकड़ कर बुरी तरीके से डिटेन ऐसे करती हैं जैसे कि पता नहीं हम कौन सा बड़ा क्राइम वहां पर कर रहे थे और जब उस चीज के खिलाफ हम आवाज उठा रहे थे और बोल रहे थे कि आप ऐसे नहीं कर सकते आप हमारे घर जाने दीजिए सिर्फ अगर हमने वीडियो बनाया तो हमारे घर जाने दीजिए तो मुझे याद है नवीन मुझे पूरा नहीं बस मैंने नेम प्लेट नवीन क्योंकि आधा शाहीन मैम को गाड़ी के अंदर जबरदस्ती बाहर बाहर की साइड बाहर और मैं गाड़ी का गेट पकड़ कर ऐसे खड़ी थी। मुझे नहीं पता शक्ति कहां से आई क्योंकि मैंने कभी ये चीज एक्सपीरियंस नहीं खड़ी थी कि नहीं बैठने दूंगी और नहीं बैठूंगी। मैंने उनको बोला हमारे घर जाने दीजिए। तो जो नवीन जो भी क्या है वो किस पोस्ट पर इन्हें नहीं पता। बहुत गंदे तरीके से चिल्ला कर आते हैं पहले धमकाते हैं। उसके बाद वो देखते हैं कि ये बैठते भी डर नहीं। तो फिर अपनी महिला पुलिसकर्मियों से हमें जबरन बैठाया जाता है। लेकिन उस वक्त हमें ये आश्वासन दिया जाता है। बोला जाता है हमसे कि आपको आपके घर छुड़वा रहे हैं। डरो मत। हमने बोला कि हमारी स्कूटी खड़ी है हम चले जाएंगे। बट बोला कि हम दिल्ली पुलिस की सेफ्टी में आपको घर बैठना है। बिल्कुल हमें झूठ बोलकर यानी कि बिल्कुल। इससे पहले लेकिन जो जिस पुलिस वाले का जिक्र कर रहे हैं जब वो उन्हें बताती हूं कि मैं 4 पी.m. की जर्नलिस्ट हूं। और मैं किस स्थान हूं तो तुरंत अच्छा तू वही पत्रकार बहुत सवाल करती रहती है क्योंकि वहां पर मेरा तीन महीने पहले का ही एक वायरल वीडियो है जिस तरीके से मेरे क्षेत्र में जो इललीगल होटल चल रहे थे प्रशासन की साठ घाट से उसमें 23 लोग जिंदा जल के मर जाते हैं और प्रशासन को थोड़ा सा भी फर्क नहीं पड़ता। उसमें पहली रिपोर्टिंग मैंने की थी। मेरा रोते हुए वीडियो आया था क्योंकि वो मेरा पहला एक्सपीरियंस था। मुझे शर्म आ रही थी कि मेरे क्षेत्र में जहां पर मेहमानों को सुरक्षित होना चाहिए। 23 लोग मेरी आंखों के सामने वो मदद मांग रहे थे। चिल्ला रहे थे। मैंने वो विटनेस किया था। वो रोता वीडियो मेरा इंटरनेट पे वायरल हुआ था। मैंने दिल्ली पुलिस को वहां पे ललकारा था कि कैसी दिल्ली पुलिस कैसा प्रशासन 23 लोग जो इमरजेंसी सर्विज है वो नहीं। ये तमाम मेरा एक वहां पर रहा है। शायद जिनको मालूम रहा होगा। क्योंकि मालवीय नगर वो सब आसपास थोड़ा सा जरिसिक्शन का फर्क होता है वो इस तरीके की बात कहते हैं और करते हैं और क्योंकि अब जब हम पे इतना फोर्स बना लिया और हम पर अब कोई ऑप्शन कोई चॉइस नहीं बची है। फोन का इस्तेमाल नहीं करने दे रहे तो ना चाहते हुए भी हमें बोलते हैं कि आपको घर ही ड्रॉप कर रहे हैं। दिल्ली पुलिस इस समय विश्वास के काबिल बची नहीं है। और क्यों नहीं बची इस सबके बारे में हम सब आप बखूबी जानते हैं। जिस तरीके की लगातार दिल्ली पुलिस की कायराना हरकतें सामने आ रही है। हमारे हम ट्रस्ट नहीं करना चाहते थे बट वी हैड नो चॉइस और ना चाहते हुए अपने सरेंडर करते हुए हमें उसमें बैठना पड़ता है कि शायद इस बार सच साबित हो जाए और चलते हैं वहां से। हमारे हाथों को इस तरीके से फीमेल पकड़ लेती है जैसे हम कोई क्रिमिनल्स अंदर हाथों रिलैक्स नहीं होने दिया जा रहा है। फ़ ले रही हूं कि घर पे बात करने दीजिए। इट्स ओके। हम ठीक है अब आपने करा है घर ही तो लेकर के जा रहे हैं ये तमाम चीजें मतलब वैन में हमें पहले करे जाए वैन में ऐसे नोच रहे मैम देखिए आप नोच क्यों रही हैं आप ऐसे क्यों कर रही हैं आप भी तो फीमेल है ना ठीक है आप ड्यूटी कर रहे हैं पर ऐसा कौन सा प्रेशर है कि आप इतनी शिद्दत से ड्यूटी कर रही हैं तमाम हमारे फिर भी सवाल जो है वहां पर रहते हैं बहरहाल हमें लेकर के जाया जाता है उसी सड़क पर हमारा घर इस सड़क पर आता है यानी रास्ता हमारा उतरते तुकड़ा हम देखते हैं हमारे घर पर हमें नहीं रबर हमारा घर यहीं से आ जाएगा रोक दीजिए आगे लेते हैं कुछ नहीं बोलते। हमें लगता है शायद दिल्ली पुलिस बहुत सेंसिटिव है महिलाओं के प्रति। वो उनकी चिंता करती है, सुरक्षा करती है। शायद डोर स्टॉप पे हमें जो ड्रॉप देंगे ये हमारा गलतफहमी रहती है। मोड़ते हैं लेकिन वहां से भी हमारा घर निकल जाता है। और तब हमें लगता है कि हमें कहां फिर मैं स्थानीय तो मुझे कि मालवीय नगर तो पीछे रह गया है। इस तरफ साकेत पुलिस तो ये हमें शायद वहां ले जा रहे हैं। और इवेंचुअली वही हुआ। आप देखिए साकेत पुलिस स्टेशन भी हमें लेकर के जाया जाता है। हमें एक सामान्य स्थिति हम तब तक ठीक है अब ले आए हम डर नहीं रहे थे कोई बात नहीं हमने गलत नहीं कहा हमने उनको कोपरेट किया मैं खुद चल के पुलिस स्टेशन में एंट्री कर रही हूं सीसीटीवी फुटेज होगी अपनी कोई ऐसे मुझे फ़ बोले जाती हूं और कि मुझे लगा ठीक है अब ले आए हैं वहां इवेंट भी खत्म हो गया कुछ पूछताछ करेंगे आई विल कोपरेट हम पढ़े लिखे लोग हैं हम जर्नलिस्ट हैं मां के इलाके के हम कोपरेट करेंगे सवाल और हमें छोड़ देंगे इस बार इस बीच मेरे घर से और मेरे यूनिट से फोन आता है कि मैम क्या हो क्योंकि मैं बता चुकी थी तो वो मैंने उनको बोला कुछ नहीं ये लोग हमें साकेत में लेकर के आए हैं और शायद पूछताछ करेंगे और विल बी फाइन और हम जल्दी मिलते हैं उनसे रिलैक्स हो जाते हैं मैं भी रिलैक्स हो जाती हूं लेकिन जब मैं रिसेप्शन पे पहुंचती हूं जाते ही पहली कोशिश वहां पर उनको बोला गया था क्या था फ़ छीनने दो अपना फोन हमें दो रिसेप्शन पे एक लेडी बोल रही बोलती फ़ क्यों दूं किस कानून के तहत किस एक्ट के तहत किस अधिकार के तहत आप फ़ मांग रहे हो फ़ दो मैंने बोला फ़ नहीं देंगे हम लगातार बोलते हैं फोन नहीं देंगे। हमें इस बीच कहा लॉकअप रूम में बैठिए। हमने कहा लॉकअप रूम में हम क्यों बैठेंगे? हम क्रिमिनल्स नहीं है। वहां पे क्रिमिनल्स बैठते हैं जो गलत करते हैं। हम पत्रकार हैं। हम कुछ हम नहीं बैठे। हम यहीं पे चलो नहीं हमने बोला नहीं है। हम इसी प्रमाइससेस में रहे। दिस इज़ आल्सो पुलिस स्टेशन पार्ट। ऐसे होता है और कि अभी हमने बोला आप प्लीज अब जाने दीजिए। जो था हो गया। आपको कुछ पूछना है कुछ नंबर कुछ ले लीजिए अपना नाम। ये चीज होती है। एसएओ आएंगे वो बताएंगे। ठीक है। हम होपफुली थे कि एसएओ आएंगे। थाना इंचार्ज होते हैं। उनकी जिम्मेदारी है हमें सुरक्षा हमें अच्छा महसूस कराना। लेकिन जब एसएओ सर आते हैं द मोमेंट हम उनकी तरफ उम्मीद से देख ही रहे होते हैं कि वो आते ही हमारे इतने नजदीक हमारे पर्सनल स्पेस में मतलब वो उनको कोई अधिकार नहीं देता। इस तरीके से आकर के वो जो जिस अंदाज में वो हमें घूरते हैं करने के लिए जो उनकी नजरें थी मिसमिसा रहे थे दांत से मानो उनका बस नहीं चल रहा अभी हमारा गला दबा दे इतने अग्रेशन के साथ इतने गुस्से में नीचे से ऊपर तक देखते हैं डालो लॉकअप में लगाओ एफआईआर इतनी एफआईआर कि बचा नहीं पाएगा कोई मैं देखता हूं किस किन धाराओं में इस तरीके से लिटरली ये बोलते हुए अपने प्रिमाइससेस की तरफ अपने कैबिन की तरफ जाते हैं और हम अभी बोलते हैं कि सर बहुत पत्रकार बन रही थी। आप देखता हूं बहुत वीडियो नफीसा इस तरीके से हमें डराया था। मैं एक एक पल के लिए घबरा गई क्योंकि घर का मुखिया थाने के वो मुखिया थे। वो हमें ऐसे जिनसे हम उम्मीद कर रहे थे कि वो बोलेंगे बेटा आप चले जाओ दोबारा गलती मत करना। उन्होंने सीधा विदिन अ मिनट हमें सीधा धमकाया। लुक आउट करते हुए पूरा ऊपर से नीचे जिस अंदाज में उन्होंने धमकाया। एक पल के लिए मैं घबराई कि क्या हो रहा है? तो कुछ गलत तो नहीं हो जाएंगे। फिर भी मैंने हिम्मत करके उनसे पूछा कि आप हमें डरा रहे हैं? धमका रहे हैं आप हमें। क्या करें? ये कहा मैंने को बोला था उसी वक्त कि आप हमें डरा रहे हैं सर। धमका रहे हैं। तो इतने में एक और पुलिस वाला जिसका चेहरे से हम पहचान लेंगे। एसएओ हमें धमका के कि लॉकअप में इनको बंद करो। उन पर एफआईआर ठोको और वो चले जाते हैं अपने कैबिन में। वहां से बहुत किलर स्माइल कर रहे थे। इतने में एक दो पुलिस अधिकारी जो मेल थे वो आके धमकाते हैं कि पता भी है पत्रकारिता क्या होती है कुछ पता भी है ए बी सी डी पता है कुछ उठाओ चल दो इस तरीके से आप सोचिए कितना डिग्रेड किया जा रहा है एक नागरिक भी फोन उठा करके उसके जो सवाल है वो जो कहना चाहता है उसके लिए पत्रकार होने की जरूरत नहीं है इतना डिग्रेड पीटी उषा बन रही थी बहुत पीटी उषा जो हमारे आइकॉन है महिला सशक्तिकरण के सिंबल्स है आप सोचिए पीटी उषा जैसे से आपको तो हमें पीटी उषा बोल के मोटिवेट करना चाहिए। आप हमें डिग्रेड फील करा रहे हैं। दीज़ वर द वर्ड्स और हमें डराते हैं और फिर भी हम यही पूछते हैं। हम डर नहीं रहे। हमने कुछ गलत नहीं किया। हम कोपरेट करेंगे। उसी टाइम मैम एसएओ हो या जितने भी पुलिस अधिकारी वो किस पोस्ट पर थे मुझे नहीं पता। जितने भी चेहरे वहां पर थे सब ने पहला शब्द जो हमसे बोला था वो चीजें होने के बाद पावर है हमारे पास। अच्छा पावर है। सबसे बड़ी पावर ये है कि पुलिस के काम में बाधा डाल रही बहुत ये हमसे लिटली यही शब्द बोले गए और ये मतलब आप सोच सकते हो कि कोई आपके आपको ऐसे धमका दे और पावर होने का रुबाब दिखाए वर्दी का रुबाब पावर का रुआब हम तब भी कुछ नहीं कर रहे हमने कहा ठीक है सर आप क्यों धमका रहे हैं क्यों डरा रहे हैं ठीक है इतने में मैम शायद कोशिश कर रहे हां बिल्कुल जब हमें फिर हमें क्योंकि जिस तरीके का चरित्र पिछले कुछ दिन में हमने दिल्ली पुलिस का देख रहे हैं कि एफआईआर बाहर और ऐसे डरा के जा रहा है और फिर खुश रह हां फॉर अ मोमेंट मुझे लगा दिस इज नॉट अ फेवरेबल सिचुएशन। मतलब चीजें हो रही हैं। हम बतौर पत्रकार वो कवर करते आ रहे हैं, सुनते आ रहे हैं, देखते आ रहे हैं। और मुझे लगा शायद ये एक नॉर्मल पुलिस या रवैया से कुछ अलग है। एंड आई शुड इनफॉर्म टू माय फैमिली टू माय इंस्टीट्यूशन अबाउट इट। और कैमरे में देखा जा सकता होगा। हम थोड़ा सा इधर-उधर अपने फोन को एक्सेस करने की कोशिश करते हैं कि इतने में ही जहां तक नफीस और मैच्योर है और जिस महिला को हम पहले देख चुके थे पर हमें नहीं पता था वो कौन है यहां पर क्या है ड्रेस में हम शायद देख चुके थे वैसे सच रूम से निकल कर के आती है और हम जहां पर स्क्रीन लगी हुई है कैमरा जहां पर डिस्प्ले किए जाते हैं सीसीटीवी कैमरा उसके ठीक नीचे रिसेप्शन व्हिच इज द मोस्ट ओपन स्पेस ऑफ़ एनी पुलिस स्टेशन बाहर से आपको आपको लोग देख सकते हैं। सबसे ज्यादा कैमरा शायद वहीं रहते होंगे क्योंकि एंट्रेंस वही है और हमें एकदम आके कि अपना फ़ दे दे फ़ दे ये जबान वो इस्तेमाल हम फिर वही सवाल कि हम फ़ दे और ऊपर चल। हां फ़ दे और ऊपर चल। हां। हम वही बोलते हैं कि हम फ़ क्यों दें? फ़ देने से पहले मैंने उनको ये पूछा कि मैम बात करनी है। आप यहीं कर लीजिए। ये जगह है बात कर लीजिए। सवाल जवाब जो पूछेंगे कर लीजिए। तो उन्होंने यह बोला कि मेरे बात करने का तरीका कुछ अलग है जो मुझे अब समझ जो हमें अब समझ में आ गया व्हेन शी सेड दोज़ वर्ड्स उनका क्या मतलब था मतलब हिंदुस्तान देश दुनिया सब समझ चुके हैं जब उन्होंने हमसे फाद हमें नहीं पता था हमारा कोई हिस्ट्री नहीं रही है पुलिस स्टेशनों में जाने की कि जब पुलिस इस तरह की जुबान इस्तेमाल कर चुकी है तो क्या मतलब होता है फिर हम रेिस्ट करते हैं ना ही आपके पास कोई अधिकार नहीं हमारा फोन लेने का और ना ही आप हमें कहीं और ले जा सकते हैं। आप यही पे हम रेिस्ट करते हैं अपने बेस्ट वे में और इससे पहले कि हम कुछ ज्यादा रेिस्ट या विरोध कर पाते हैं। अचानक मतलब कुछ समझ ही नहीं आता है। फ़ छीन लिया जाता है विद द फुल फर्सेस और एक दो फीमेल और जो हमें पूरा चेक कर लेते हैं और मैम फ़ छीनने के सिर्फ खुद ही सेकंड के अंदर थप्पड़ और वो थप्पड़ इतनी तेज मेरे मारा। मेरी बहन के मारा। दैट वाज़ माय मतलब हार्ट ब्रोकेन मोमेंट फॉर मी कि मेरे सामने मेरी छोटी बहन पे मेरे लिए फूल की तरह मेरी बहन है। उसको थप्पड़ मारा जा रहा है। एंड वी वर लाइक ऑन मतलब समझ में नहीं आ रहा था यार कि हम एक पुलिस स्टेशन में है। व्हिच इज द मोस्ट सेफेस्ट प्लेस फॉर एनी सिटीजन। उसमें हम पहुंच रहे हैं और हमें कुछ पता ही नहीं क्या क्राइम हमने किया है। कुछ नहीं किया। हम लगातार कोपरेट कर रहे हैं। सभ्य इंसान का बर्ताव हम कर रहे हैं। जिस पुलिस जिस दिल्ली पुलिस को प्रोफेशनल कहा जा रहा है वो एक तरफ गुंडे की तरह बिहेव कर रही है। मारे मैम कितने थप्पड़ मारे होंगे मुझे याद नहीं मारती रही होंगी। हमारा मुंह लाल है। वो थप्पड़ वही थप्पड़ों से। अब देखिए वो सब सीसीटीवी कैमरा में अगर कुछ छेड़खान कुछ पहले से प्लानिंग नहीं की होगी दिल्ली पुलिस ने नहीं की होगी तो सब कुछ उसमें रिकॉर्ड हुआ होगा। फिर भी हम हार नहीं मानते। हम लगातार विरोध कर रहे हैं लेकिन हमारे शरीर को पकड़ के कपड़ों को जिस भी तरीके से हमें फोर्सली वहां से ड्रैग करके घसीट करके ले जाया जा सकता है वो हमसे किया जा रहा है और हमारी बॉडी उनका बॉडी का फोर्स सहने के लिए कैपेबल नहीं है बट हम फिर भी डटे रहते हैं बट किसी तरह जब हम खींच कर ले जा रहे हैं मैं अपनी उनसे ग्रिप छुड़ा पाती हूं और मैं वहीं जो एसएचओ का रूम उस रास्ते में आ रहा है जिस कॉरिडोर से हमें ड्रैग कर उनके एसएचओ के रूम में जा पाती हूं। रोते बिलकते हुए अंदर जाती हूं। यह भी सीसीटीवी कैमरा में रिकॉर्ड हुआ होगा। उनसे मदद मांगती हूं। सर ये क्या हो रहा है? एक कैमरा उठाने के लिए कुछ साल आपके लोग पीट रहे हैं। वो लोग कौन है? वो लोग मार रहे हैं। मेरी छोटी बहन को मार रहे हैं। प्लीज हेल्प। बट वो एक केयर फ्री अंदाज में वहां बैठे रहते हैं। उनके बॉडी लैंग्वेज में कुछ चेंज नहीं आते और वो मुझे सुनने के बजाय जो कॉप मुझे फॉलो करती वापस अपनी जकड़ में लेने आती है उनको इशारा करके ऊपर ले जाने का आदेश पूरी सहमति अपनी देते हैं और वहां से असॉल्ट और बढ़ना शुरू हो जाता है। हमें घसीट करके ले जा रहा है। हम लगातार रेिस्ट कर रहे हैं। आप यहीं पे बात करिए। हमें नहीं पता कहां लेकर के जा रहे हो। क्यों लेकर के जा रहे हो। लेके जा रहे हैं मैम। सांस नहीं आ रही है। मैंने जैसे कहा उनका उनके बॉडी का फोर्स हम नहीं उनके जो जिस तरीके का फ़ वो हम पे इस्तेमाल कर रही थी वो अनबरेबल था। लेकिन इट सीढ़ियों पे घसीट रहे हैं मैम। सीढ़ियां चढ़ ही जाती है। घसीट नहीं जाता है। सांस नहीं आ रही है। रुकिए सेट आवाज नहीं निकल। रुकिए हम चल रहे हैं। रुक घसीटे जा रही है। चल ऊपर। चल अभी मान पूरा वर्क करे जा रही है। हम भी घसीट रहे थे बुरी तरीके से। हम अलग-अलग हो गए थे क्योंकि शायद आप एस सच रूम में गई होंगे और मैं उस टाइम पड़ी थी जमीन पर दो तीन लोगों के बीच में उस टाइम हम बोल रहे थे कि रुक जाइए हम खुद चल रहे हैं आप जिस रूम के लिए जाना है रुक जाइए इतने में वही महिला पुलिसकर्मी जो गुलाबी कपड़ों में नीचे थप्पड़ मार के गई थी वो उस कमरे से बाहर निकल कर जीने पर उतर कर आती है गाली बक कर कहती है कि नहीं अरे लात घूसे पेट में मारती है बाल पकड़ के खुद ले जाने का प्रयास करती है और सीधा उस कमरे में फेंका जाता है। फ्लोर पे पटका जाता है। लात घुसे जिस भी बेस्ट दरवाजा बंद हो चुका और जिस भी वे में वो हमें असॉल्ट कमजोर करने की कोशिश करती है। हम लगातार यही पूछते हैं हम मार तो रहे हैं पर बताइए तू क्यों मार रहे हैं। तब तब तुम दोनों को डंडे से मारा जा रहा था। अभी हम दैट विल कम लेटर। अभी अभी तक वो जो जो लोगों के सामने वो आया ही नहीं है। अभी अभी तक तुम्हारा इस तरह का पूरा साल्ट चल रहा है। चल रहा है। अभी तो उन्होंने फ्लोर पे प्रोटेक्ट करके हम हम मिनटों में बता रहे हैं ना मैम कई घंटे की घंटे 30 से 40 मिनट इस तरह से हम जो है वहां पर रहे और फ्लोर पे करती है मारती है। लात घुसा गाली बक कर बड़ी पत्रकार बन गई। बताती हूं इस तरीके के अल्फाज़ गाली। जैसे ही वो अंदर कमरे में ले गई और कमरे का गेट बंद करके हमें धकेला गया। उस टाइम उन्होंने बहुत ताबड़तोड़ थप्पड़ थप्पड़ मारनी शुरू कर दी थी। लाते मारो। हम ऐसे पड़े थे दोनों। मैं अपनी बड़ी बहन को बचाने का प्रयास कर रही थी। बड़ी बहन मुझे बचाने का प्रयास कर रही थी। हम खुद को जैसे भी बचा सकते थे। हम कोशिश कर रहे थे। उनके अल्फाज़ ये थे कि पत्रकार बनोगी। वीडियो बनाओगी। सवाल पूछोगी। मैं बताती हूं कि कैसे सवाल पूछते। पत्रकारिता निकालते हुए मारी जाती थी। मारी जाती। और जब मैं अपनी बहन को बचाने के क्योंकि हम ऐसे गिरे हुए थे मैंने पैर से मैं उनको दूर करने का प्रयास कर रही थी हाथ से तो मेरे पैर को पूरा से मोड़ दिया गया कि तू ज्यादा मतलब बचा रही है कुछ बाल खींच रहे थे जिस तरीके से हमें असॉल्ट किया गया मारा गया तब तक सिर्फ और सिर्फ हमारे पेशे पर मारा जाता वही वही हम बता रहे हैं कि सोफे पे सर पकड़ के बाल नोच रही है ना खून मारने की कोशिश और हमारा सर सर पीछे जो दीवार थी सोफी पे उस पे मारा गया और बिना ये सोचे कि शरीर का एक बहुत सेंसिटिव हिस्सा हमें कुछ सीरियस इंजरी कुछ हो सकती है और सांस नहीं आ रहा है हम पे लगातार साल्ट हो रहा है हम पे कोई मर्सी नहीं की जा रही है मर्सी होती है तो खुद पे खुद जो है एक इससे पहले हमें जो है ड हां इस बीच डंडा मंगा के डंडा लेकर आओ वो डंडा बाहर से आया था वो भी रिकॉर्ड हुआ होगा आई एम श्योर अगर सीसीटीवी काम कर रहे होंगे तो उस डंडे से मारना शुरू कर देती है और मैम तब तक मतलब इस तरह से मारते हैं कि वो हमारे लिए अनबरेबल है। हमने कभी डंडे नहीं खाए। जो डंडा मुझे लगता है कि एक नागरिक की सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस को दिया जाता है। महिलाओं की सुरक्षा के लिए दिया जाता है। आज उस डंडे का इस्तेमाल उन्हीं नागरिक के खिलाफ उसी महिला के खिलाफ किया जा रहा था। हमें समझ नहीं आ रहा था। हमने ऐसा क्या कर दिया? डंडे से मार रही है। उनका मन नहीं भर रहा है। इतनी इतना गुस्सा क्यों निकाल रही है? हमारे लिए भी समझ नहीं आ रहा है। वो नहीं हम पर कोई तरस खाती है। ना ही हम बोलते मैम हम तो आपके बच्चे जैसे हैं। आपकी बहन है छोटी जैसी। आप भी महिला भी महिला आप अपना काम करती है। हम अपना काम सब कुछ बोल रहे हैं पिटते हुए। सहते हुए सब कुछ बोल रहे हैं। लेकिन वो नहीं रुकती। वो अपने लिए ब्रेक लेती हैं। और जो जहां जहां मैं सब करके वो थक गई तो उन्होंने अपने लिए अपने लिए ब्रेक लिया है। लेकिन ब्रेक भी कुछ ही सेकंड। वही कुछ सेकंड का वो ब्रेक लेती हैं और इस तरह से कुर्सी पे बैठती है कि तभी जो फोन उन्होंने लिटरली हमसे स्नैच किया जो क्राइम है एक पुलिस स्टेशन के अंदर बाहर कोई फोन अगर छीनता है तो इट्स अ क्राइम अकॉर्डिंग टू डे येलो पुलिस स्टेशन के अंदर पुलिस वाले लोग आपके बिना मर्जी आपके फोन को जो है ये भी क्राइम है उस फोन को जो वो ऐसे बैठती है और तभी वो फोन मेरा बचता है इस तरह मेरा पर्सनल फोन जिसको खींचा उस पर एक नंबर से कॉल आती है। उसका नाम होता है मोहम्मद खान। डायलर का नाम होता है जो कॉलर होता है ऑन योर फोन। हमारे फोन पे अभी तक हमारा हमने उनको अपना कोई नाम नहीं बताया। हमने कोई पहचान नहीं पूछा जा रहा था। लेकिन तुम लोग नहीं बताया था। नहीं एड्रेस पूछा जा रहा था। नाम पूछा जा रहा था। एड्रेस पूछा जा रहा था और हम उनसे सिर्फ यही पूछ रहे थे कि आप मार क्यों रहे हो? आप नाम मारो मत। आप मारो मत। बातचीत कीजिए मारो मत। और जब उन्हें पता चला उन्हें यह भी श्योरिटी नहीं थी कि हम मुसलमान है नाम से अंदाजा। सिर्फ आप सोचिए कितनी कॉल हो सकती है। तो सोचिए जो मैम अपने रेस्ट के लिए इतनी मेहनत कर के वो सेकंड के लिए बैठती है। एंड देयर वास अ कॉल विथ द नेम मोहम्मद खान। शी जस्ट शो दैट यू इन स्क्रीन। आई रियली डिडंट अंडरस्टैंड टिल नाउ कि उनकी बॉडी में करंट जो गुस्सा जो नफरत बॉडी लैंग्वेज एंटायरली डिफरेंट। मैंने शायद ही किसी महिला को इतने इतने वर्स्ट मतलब बॉडी लैंग्वेज में महिला को कहा एक सेंसिटिव खूबसूरत इस तरह की एक शायद लग नहीं रहता है कि वो महिला है और ऊपर से एक पुलिस प्रशासन का हिस्सा है। वो तुरंत खड़ी होती है। अच्छा मुस्लिम है मुसलमान है। तब तो तुझे और मारूंगी। तब तो तुझे और और यह बोलते हुए बोल रही है और फिर जो हम पर असॉल्ट शुरू करती हैं और सिर्फ खुद असॉल्ट नहीं करती हैं। जो कास्टेबल जिन जिनकी मदद से वो हम पर अपनी शक्ति दिखा पा रही थी उनको फोर्स करती है मारो इनको और फिर मजबूरन उन लोगों को भी अपनी ड्यूटी आदेश और उनको हमें मारना पड़ता है। इस बीच मारते हुए नफीसा उसको जवाब देती है कि हां मैं हूं मुसलमान। क्या ये कोई क्राइम है? आप तो एक पुलिस वाली है। हिंदू मुसलमान आपका काम नहीं है। आपके लिए सब नागरिक बराबर ये बोलती है ये। तुम ये बोल रही थी पिटते में भी नफीसा पिटते हुए मैम जिस टाइम मैम उन्होंने फोन देखकर बोला ना हमें कोने पे दीवार पे डांट कर खड़ा किया गया था कि खड़ी हो। बोलने नहीं दिया जाता। मैं तब भी बोल रही थी। जैसे ही उन्हें पता चला मुसलमान हो तो अच्छा मुसलमान हो तो अब डंडे ज्यादा पड़ेंगे। अब ज्यादा पीटा जाएगा। गालियां शुरू हो गई और उन्होंने जिस तेजी के साथ पूरी ताकत के साथ पूरी नफरत के साथ जो डंडा मेरे पैर पर मारा जिसके निशान शायद तड़प गई थी मेरी छोटी बहन और सोचिए जब उन्हें मारा तो मेरे मुंह से सिर्फ इतना शब्द निकला था कि मैम आप मुसलमान पहचान कर कर मार रही हैं आप मुसलमान पहचान कर कर कैसे मार सकते हैं? संविधान इस चीज की इजाजत नहीं देता मां। आपने संविधान की शपथ लेकर उस कुर्सी तक बैठी हैं आप। आपको यह कतई इजाजत नहीं है कि आप पहली बात तो आप किसी को मारे हैं। बिना एफआईआर दर्ज किए बिना कानूनी प्रक्रिया के आप मार रही हैं। वो भी धार्मिक पहचान करके मार रही हैं। इसकी इजाजत आपको संविधान नहीं देता। मैम मत मारिए। मैम ये ठीक नहीं है। मैम मत मारिए। मैम मेरी पहचान धर्म से मत कीजिए। मैं उनको बोल रही थी बार-बार कि मैम मत पहचान कीजिए। मत मारिए। जब उन्होंने एक और डंडा मारा तो मैंने कहा कि मैम मारिए। हां मैं मुसलमान हूं। यहां मारिए यहां मारिए जहां दिल कीजिए मारिए मैम। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जितना मारना है मारिए। आप जितनी नफरत निकाल सकते हैं निकालिए। लेकिन संविधान इसकी इजाजत नहीं देता आपको। आप महिला हैं। आप मां है। हम आपके बच्चे जैसे हैं। हम महिला हैं। हमें इस तरीके से मत मारो। भरभरता हम पर मत करो मां मत मारो उन्होंने और तेजी के साथ मारना शुक्र और जिस टाइम यहां मेरे पैर पर लाठी मारी उन्होंने तो मैं बहुत तड़प मछली की तरह मेरी छोटी बहन तड़प चुकी तड़प रही थी और मुझे अपनी बहन पे फक्र भी हो रहा था पर फिक्र भी हो रही थी क्योंकि वो शरीर से पहले ही टूट गई थी पर उसके अंदर की हिम्मत लगातार बोल रही थी और मैं नहीं चाहती थी कि वो वो बोल है मुझे इसकी फिक्र कि ये और कहीं ना कहीं उसके ईगो पे ये हर्ट कर रहा है और वो ये ये प्रोसेस नहीं कर पा रही है कि एक महिला कैसे बोल रही है एक यंग लड़की कैसे बोल पा रही है हमने तो अभी 20 जुलाई को इनको डराया था हमने तो धमकाया था ये कैसे बोल पा रहे हैं उनको ये उनको बर्दाश्त नहीं हो रहा था मुझे इसकी फिक्र हो रही थी मैं सम ये बोल रही थी क्योंकि मुझे उसको संभालना भी था मेरी जिम्मेदारी भी थी मेरा बहन के तौर तौर पर और ये सब कुछ मतलब बोलती है मैम लेकिन बोलती है लेकिन उसके बावजूद तो तड़पती है इसकी मुझे दिख रहा है इसकी हालत खराब हो रही है पर हिम्मत करके बोल रही है फिर भी पानी मांगते हैं सांस नहीं आ रही है मैम पानी लिटरली ऐसे मैम लिटरली हम ऐसे थे [हंसी] कि पानी तो दीजिए पर पानी तो दीजिए ये भी बोल रही थी पानी तुम्हें तो प्यासा मारूंगी तुम्हें में तो देखो अभी क्या-क्या करती हूं। ये बोलते हुए मैं जो असॉल्ट और बढ़ता है। जब उनको लगता है इसकी तबीयत और खराब हो रही है तब वो वाली पुलिस वाली अन्य कांस्टेबल [नाक से की जाने वाली आवाज़] कुछ देर बाद पानी वगैरह में पिलाती है। ये सब चल रहा होता है। इस बीच दरवाजा खुलता है थोड़ा सा। इस दरवाजे पे एक व्यक्ति आते हैं जिनकी कट काटी पुलिस जैसी लगती है। मुझे नहीं पता वो कौन है। किस पौधे पे है। बट एक वहां पे जो सॉल्व जिस तरीके का किया जा रहा था मुझे लगा शायद ये सब तो मिले हुए हैं। शायद ये हमारी मदद कर पाएंगे। उनसे हम बोलते हैं सर मुझे नहीं पता आप कौन है। प्लीज हमारी मदद कीजिए। ये लोग हमें मार रहे हैं। दरवाजा बंद कमरे में बंद कर लिया। घर नहीं जाने दिए। फोन पे बात नहीं करने दिया। मेरा बेसिक राइट वो केयरफुली सुनते हैं, सुन नहीं लेते, कमरे में नहीं झांकते। वो कुछ इस तरीके का कि हां अभी छोड़ देंगे थोड़ा बहुत इस तरीके का व्यवहार और मैं उनकी तरफ देखती रहती हूं। वो वहां से निकल जाते हैं। ये तमाम चीजें होती है जब उनको लगता है कि अब नफीसा की हालत बिगड़ रही है। उनको या एसएचओ के एसएचओ उस रूम में आते हैं। जिन्होंने पूरी खुली छूट अपने लोगों को दी। जिनके आदेश पे हुआ। जब सब कुछ हो गया उनको उनको खबर दी होगी कि हां जो हम वो करना चाहते हैं वो हो चुका है। ये तड़प रही है। मैं छोटी बहन के लिए लगातार रो रही हूं। वो आते हैं हां हां आप कमरे में आके हमें कंसोल कर हम तुम हम आपके साथ हैं। फिक्र मत कीजिए हम आपके। हम हम आपको घर पहुंचाते हैं। हमारे बच्चे हैं। बच्चे हैं आप हमारे। एसएओ कुर्सी पर बैठ के बोलते बच्चों आप हमारे बच्चों बैठ जाइए। पानी पीजिए। चाय मंगाओ, कोल्ड ड्रिंक मंगाओ। और मैंने उनको बोला क्योंकि मैं ऐसे करके खड़ी थी उस जख्म को देख रही थी। उस वक़्त मेरे जहन में बहुत सारी चीज़ें एक साथ चल रही थी। सबसे पहली चीज़ मेरे जहन में जो चल रही थी कि क्या आज अपनी पहचान पर शक कर लूं? क्या सबसे बड़ा गुनाह मेरा यही है कि मैं मुसलमान हूं। क्या इसी बर्बरता आज चार दीवारों के भीतर हम पर हो रही है और दूसरा बीइंग अप जर्नलिस्ट वो 20 जुलाई का मंजर मेरी आंखों के सामने फिर घूम गया जब दिल्ली पुलिस ने तमाम सीमाओं को लांघ दिया और बर्बरता के सारे प्रमाण दे दिए कि उनके अंदर कितनी ताकत है और उन्होंने वो ताकत देश के युवा और छात्रों पर साबित की। वो तमाम चीजें मेरी आंखों में जहन में घूम रही थी और मैं अंदर अंदर उस ट्रोमा में जा रही थी धीरे-धीरे जब एस जो बोले कि आप हमारे बच्चे बैठ जाइए तो मैंने उनको बोला वो दिखाते हुए कि सर अगर हम आपके बच्चे होते पिटवाते आप धर्म के नाम पर पहचान कर पिटवा दिया और तब आप अच्छे बोल रहे तब आप पानी पिला रहे तब आप कोल्ड ड्रिंक कोल्ड ड्रिंक दे रहे बोला अभी तो हमें पानी भी नहीं आप दे रहे थे। अब आप कोल्ड ड्रिंक दे रहे हैं। हमने क्या गुनाह किया था? अब हम हमने उनकी कोल्ड ड्रिंक नहीं पी। हमने उनका पानी नहीं पीना स्वीकार किया। हमने उनके चाय सब चीज को मना करा। हमने उनको बोला कि सिर्फ सचो अब हमें घर जाने दीजिए। अब जाने दीजिए सर। अब हमें घर जाने दीजिए। जो करना चाहते हो जाने दीजिए। उन्होंने बोला मैंने कहा सर बहुत गलत हुआ। हमारी पहचान पर जो हमला आज हुआ ना उन्होंने वो उस टाइम सोफे पर बैठे। जिस सोफे पर हमें पीटा जाता है उस सोफे पर ऐसे बैठे थे और मैंने उनकी तरफ इशारा कर बोला कि सर इन्होंने हमारी पहचान कर कर पहले पेशे पर मारा फिर पहचान कर कर मारा आज बहुत गलत हुआ है सर बहुत गलत है एसएओ ने उस वक्त बोला कि हम गलती मानते हैं मानते मानते मानते ठीक है ठीक है अच्छा ठीक है ठीक है ठीक है वो कुछ बोलने नहीं दे रहे थे ठीक है ठीक है ठीक है ठीक है चाय पियो कोल्ड ड्रिंक पियो ऐसे हम भेजते घर मेरा नंबर लीजिए कोई भी हेल्प चाहिए मदद चाहिए ये सारा ड्रामा ड्रामा चल रहा है मुझे पता है ये चल रहा है मैं समझ पा रही हूं बट मेरी बहन थी मुझे पता है हमें इन लोगों ने यहां पर किडनैप कर लिया मुझे इनकी हां मैं हां इनको इनको महसूस कराना पड़ेगा हां ठीक है आपकी सर ठीक है अब मेरी बहन को इसको मेडिकल एड की जरूरत है ये बोल रहे है बट शी इज नॉट फाइन राइट नाउ हम बोलते हैं डॉक्टर केस में बाहर नहीं हां हम देखते हैं मदद करते हैं वो लोग बाहर निकलते हैं अपनी मीटिंग िंग करने के लिए या फिर वो आगे क्या किस तरीके से लीप अप होती करने की कोशिश करते हैं और हम पे एक वहां पर फीमेल कॉप को छोड़ के हमारी निगरानी निकले कि लोग रूम से ना निकल पाए इसलिए फोन लेकर वहां से हमारा चले जाते हैं और ये जब होता है वो फीमेल वहां पर कांस्टेबल वहां पर रहती है। उसको एक फोन आता है। फोन आता है दरवाजा क्योंकि खुला हुआ था। वो लोग जब भी निकल कर के गए थे कुछ कुछ मिनट या सेकंड में उसको फोन आ जाता है और वो फोन पे लग जाती है थोड़ा ध्यान उसको दैट वास द मोमेंट आई फेल्ट कि अगर अभी नहीं तो मुझे नहीं लगता अभी और हमारे साथ में क्या होगा ये चल नहीं पा रही है उठ नहीं पा रही जबरदस्त इसको दर्द हो रहा है पर हिम्मत नहीं आ रही है मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था मैं इसको नफीसा हमें निकलना पड़ेगा और मैं इसको पकड़ते जो चल मैं चल नहीं पा रही हूं मेरा भी शरीर टूटा हुआ है इतनी देर थप्पड़ और मार के किया जा रहा है हमारे साथ में नफीसा मैं समझ रही हूं उसका दर्द हो रहा है मैंने कहा बट हम वहां से उतर कर के जाते हैं खींच मुझे अपनी बहन को खींचना पड़ रहा है जो चल नहीं पा रही है क्योंकि मुझे लग रहा है कि अभी पता नहीं कब पीछे से आ के हमारे साथ क्या करेंगे हमें फिर से वहां पे उस कमरे में बंद करेंगे या क्या करेंगे और इसकी भी फिक्र हो रही है बहुत ज्यादा लगातार वहां से किसी तरीके से उन सीढ़ियों से इतनी सारी सीढ़ियां उसको खींचते हुए उतर कर वहां से हम लिटरली अपनी जान बचा के भागे हैं। हमने अपने आप को रेस्क्यू किया है। जहां पर दिल्ली पुलिस के पुलिस स्टेशन में दिल्ली पुलिस वालों ने हमें किडनैप कर लिया था। मैं भागती हूं और ये चल नहीं पाती। और ये इतनी क्योंकि अब तक तो हिम्मत थी। अब इसकी हिम्मत टूट रही थी और ये वहां रिसेप्शन पर जाकर के बेहोश हो जाती है। और मेरे लिए फिर अब और एज अ बहन मेरे लिए एक चिंता बढ़ जाती है। मैं पैनिकिक कि बेहोश मुझे नहीं पता ना क्या हूं। मैं मैं चिल्ला रही हूं उसकी इसको हॉस्पिटल लेके जाना है ये सब रिकॉर्ड हुआ होगा प्लीज मदद कीजिए फिर कही फिर मैं उस फीमेल को देखती हूं वो इसी फ्लोर पे अरे इनको नीचे कैसे लेके आओ इधर कमरे में एसएचओ को देखती हूं मैंने नहीं सर अब हम नहीं आएंगे प्लीज हमारा फोन दीजिए मुझे अपने घर पे इन्फॉर्म करना है और देते मुझे फोन नहीं दिया जा रहा है मैं वहां पे सबसे लोगों से हेल्प मांग रही हूं प्लीज एक कॉल करवा दीजिए मुझे मेरे घर पे बताना है मेरी बहन की तबीयत वो रिसेप्शन के फोन का इस्तेमाल पहले नहीं करने दिया जा रहा है। जब मैं बहुत हिम्मत करके कि अगर इसको कुछ हो जाएगा तो आप इसका जिम्मेदार कौन होगा? तब मैं कुछ सेकंड के रिसेप्शन के फोन से कॉल करती हूं। कुछ सेकंड की रही होगी अपने घर पे कॉल करती हूं और वहां पे बोलती हूं भाई प्लीज पुलिस को कॉल करो। हमें मारा गया है। मेरा भाई समझ चुका था। वो इन सब चीजों का जानकारी उसे पता है वो वहां से सुनते हैं हमारे उसकी आवाज में समझ क्या मारा है वो वहां से तुरंत फिक्र मत करो इसे बोलते हो में रख दो फिर मैं इसकी चिंता में कहीं ना कहीं वो जाती हूं इसको पानी दे दो ये सब चीजें मैं करती हूं वहीं पर पड़ी रहती है इतनी देर में फोन मांग रही हूं कोई मदद नहीं कर रहा है वहां पे हेल्प डेस्क है कोई नहीं वुमेन हेल्प डेस्क वहां पर जो मुझे दिख नहीं रहा था हेल्प मांगती हूं फिर कुछ देर बाद के हमारे फैमिली वाले हमारे जिस भी सर्कुलेट जैसी भी चीजें हुई होंगी वो लोग वहां पर पहुंचते हैं। नफीसा को वो वहीं पे पड़ी है। मेरे फैमिली के लोग मेरे परिचित लोग हम लोग इसको उठा के फिर वहीं जो रिसेप्शन के पास रूम था शायद वहां पर पहले से एक कैदी बैठा हुआ था। अगर हम गलत नहीं है। मैं जहां तक हूं पहले आया था बाद में आया था जो नफीसा को सोफा जो आप देख पा रहे होंगे वायरल वहां पर वो बैठा था वहां पर क्योंकि मुझे ये इसलिए याद है क्योंकि जब असॉल्ट ये बर्बरता होने से पहले हमें कमरे में बैठाने के लिए बोला जा रहा था तो तब मैं वहां देखा मैंने कहा मैम मैं यहां नहीं बैठूंगी यहां कोई बैठा है हथकड़ी हथकड़ी पहने ये बात मैंने उनको बोली थी इसलिए मुझे हमें कोई स्पेस इसको थी इसको उस रूम में जो है यह बहुत देर तक रही है जो वीडियो सिस्टर ये हम जब बात कर रहे हैं तो मैं यह बताना चाहती हूं लोगों को कि ये देखें कि कितना मुश्किल हो रहा है नफीसा के लिए यह पडकास्ट करना भी कि वो बार-बार अपनी टांग को वो एक तरह से सीधा करते हुए वो जो है आप देख रहे हैं कि वो सीधा करते हुए अपनी टांग को यहां पर नजर आ रही है। उससे बैठा नहीं जा रहा। इतनी तकलीफ है और मुझे ही पता है कि हमारे स्टूडियो तक वो कितनी मुश्किल से ऊपर तक चढ़कर आई है और आज जब हम यह कार्यक्रम रिकॉर्ड कर रहे हैं तो उस दिन 5 सितंबर है। यानी कि दो दिन का वक्त बीत गया है तब ये हाल है तो उस दिन जिस दिन तुम्हारे साथ ये हुआ होगा नफीसा मैं तो शायद सोच भी नहीं सकती कि मैम मुझे जितना याद है क्योंकि मैं पूरी तरीके से सेंस खो चुकी थी। मैं बेसुध थी। बस मुझे एक ही चीज थी। शायद तमाम लोगों ने सुनी होगी जो मैं ऊपर सीढ़ियों से जिस तरीके से मुझे मेरी बहन जा रही है। हॉस्पिटल तक हॉस्पिटल से जब हमें लाया गया होगा थाने तब तक सिर्फ मैं एक ही शब्द बोल रही। कई घंटों सिर्फ मैंने एक ही शब्द बोला था। मुस्लिम मुस्लिम मुस्लिम हूं तो ये सब बार-बार ये बोल रही थी। ये बार-बार मैं बोल रही थी। मुस्लिम मुस्लिम मुस्लिम क्योंकि जितना मुस्लिम कह कर मारा था। मारा गया, गालियां दी गई, डराया, धमकाया गया और पावर एक शब्द, एक वर्ड जो बार-बार बोला जा रहा था कि पावर है, पावर है। वो चीजें घूम रही थी। तो जो मेरे शरीर पर चोट लगी वो दर्द मुझे उस वक्त महसूस हो रहा था, नहीं हो रहा था मुझे नहीं मालूम क्योंकि सिर्फ एक दर्द उस वक्त सबसे बड़ा था कि मुसलमान मुसलमान होना तो इतनी गुनाह हो गया। इतना बड़ा गुनाह मुसलमान मुस्लिम मुस्लिम मुस्लिम ये सवाल मैं पूछ रही थी। बोल रही थी मुझे नहीं पता कि क्या हो रहा था और क्यों हो रहा था। बहरहाल [नाक से की जाने वाली आवाज़] हमने आपको बहुत डीपली ये सब कुछ बताया। शायद अभी तक किसी चीज किसी किसी को नहीं बताया कि सेक हमारे साथ क्या हुआ था वहां पर। अब मैम सवाल बहुत आगे जा चुके हैं। सवाल क्योंकि तीन दिन बीत चुके हैं। जो पूरा शासन प्रशासन जो साकेत थाने की कोशिश थी कि उस चार दीवारी जो अभी भी शायद मैं इस कमरे में बैठी हूं तो मेरे ज़हन में वो दीवारें चल रही हैं। वो चार दीवारी जिस तरीके से बंद कर कर हमें बर्बरता पूर्वक हमारे पेशे महिला और मुसलमान पहचान होने पर मारा जा रहा था, बर्बरता की जा रही थी। [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोशिश उनकी यही थी कि यह सीमित रह जाए। इन चार दीवारों तक बंद कमरे तक नहीं जाए। बंद कैमरा, बंद कमरा, बंद आवाजें जो बार-बार हमारी आवाज को कुचला जा रहा था, बंद किया जा रहा था। अपनी तेज आवाज के सामने संविधान ने आज उसी आवाज को उन चार दीवारों से बाहर निकालकर देश दुनिया तक पहुंचा दिया। इससे बड़ा तमाचा शायद दिल्ली पुलिस पर कोई और नहीं हो सकता क्योंकि वह जिस वर्दी में जिस शपथ के साथ हमारी सुरक्षा के लिए तैनात किए जाते हैं उस पद पर स्थापित किए जाते हैं उन्होंने उसका उल्लंघन किया। संविधान का उल्लंघन किया। कानून का उल्लंघन किया। उस कमरे में केवल हमारे शरीर को नहीं पीटा जा रहा था। मैम मैं बार-बार ये बात बोल रही हूं क्योंकि मेरे ज़हन में तमाम चीजें उस वक्त चल रही थी कि उस वक्त मेरी बहन मेरे सहयोगी पत्रकार या मुझे हमारे शरीर को नहीं पीटा जा रहा था बल्कि उस वक्त संविधान को खुलेआम वही लोग ललकार रहे थे जिन्होंने उसकी कसम खाई थी। उसी लोकतंत्र को उस चार दीवारों के कमरे में कुचला जा रहा था जिसकी दीवारों को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि आप इस देश के नागरिकों की सुरक्षा के लिए तैनात किए जा रहे हैं। उनको शायद ये अंदाजा नहीं था। उनको लगा था कि संविधान पर हमला करना बहुत आसान हो गया। बहुत आसान है लोकतंत्र को कुचल देना, अधिकारों को मार देना, आवाजों को खामोश कर देना। लेकिन आज या वो आवाज इतनी तेजी के साथ उठ रही है कि उनको जवाब देना मुश्किल होगा कि मुझे लगता है कि मैं यह बोलना चाहूंगी आपके माध्यम से कि अब मुझसे ना पूछा जाए कि मेरी तकलीफ क्या है? मेरे कहां शरीर में दर्द हो रहा है? या मेरे ज़हनी कहां दर्द हो रहा है? अब दिल्ली पुलिस से पूछा जाए कि उनकी तकलीफ क्या है? अब साकेत थाने के एसएओ दिनेश कुमार से पूछा जाए कि उनको कितनी तकलीफ है? उन तमाम आला अधिकारियों से पूछा जाए कि उनको कितनी बड़े स्तर पर तकलीफ हो रही है कि अभी तक 48 घंटे बीत जाने के बाद भी वो एफआईआर दर्ज नहीं कर रहे। वो सामने नहीं आ रहे। वो थाना छोड़कर चले जाते हैं और हमें एफआईआर के इंतजार में 3:30 बजे तक रात वहां बैठे रहते हैं कि हमारी गुहार सुनी जाएगी। हमारी शिकायत सुनी जाएगी। कम से कम हमें मारने पीटने पहचान करने के बाद वो अधिकार तो मिलेगा जो संविधान देता है कि हमारे साथ ये क्राइम हमारे साथ ये घटना हमारे साथ इस तरीके का हुआ है तो वो कागजों में आ जाएगा कुछ नहीं हुआ कुछ भी नहीं हुआ माम आज मैं सीधे तौर पर देश के प्रधानमंत्री से गृह मंत्री से जिनके अंडर ही अधीन ये तमाम अधिकारी आते हैं। मैं दिल्ली की मुख्यमंत्री महिला मुख्यमंत्री से सिर्फ एक सीधा सवाल कर रही हूं। आप की राजधानी में जहां से आप पूरे देश को चलाते हैं। डबल इंजन सरकार विकास के दावे को प्रचंड तरीके से बताते हैं। वहां राजधानी में साकेतपश थाना माना जाता है। उस थाने के अंदर दो भारतीय मुस्लिम महिला पत्रकारों को बर्बरता के साथ पीटा जा रहा था। उनके लिए निष्पक्ष जांच कारवाही कब होगी? अब सवाल सिर्फ इतना है। हमारा दर्द, हमारा वो सब कुछ ट्रोमा अब बहुत पीछे छूट चुका है। क्या हुआ? क्या नहीं हुआ? वो सवाल अब बहुत दूर जा चुके है। अब सवाल सिर्फ इतना है कि एफआईआर दर्ज कब होगी? कब कानूनी कार्रवाही शुरू होगी? कब हमें इंसाफ मिलेगा? कब हमें बताया जाएगा कि हमने कौन सा इस देश का सबसे बड़ा क्राइम कर दिया कि संविधान के तमाम आर्टिकल उसके सामने बोने हो गए कि दो महिलाओं को बंद कमरे में नीचे का सारा स्पेस छोड़कर ऊपर ले जाकर पीटा गया। पीटा गया। इसका जवाब तो देना पड़ेगा। ये तुम्हारे बहुत बहुत ज्यादा नफीसा वाजिब सवाल है और जाहिर सी बात है ये सवाल उठते भी हैं। आप ये सोचे कि आपके साथ इतनी सारी टीम सुनने के बाद आप लोगों के साथ ये टीम और ये सब कुछ लगी। एफआईआर दर्ज नहीं हो पा रही है। मतलब एफआईआर दर्ज करना यानी कि उनका कबूलनामा एक तरह से कि मैम उनका थाने से भाग जाना मुझे लगता है कबूलनामा है। उनका ट्वीट करके डिलीट कर देना कबूलनामा। अच्छा ट्वीट किया उन्होंने। ट्वीट जो हमने नहीं पढ़ा ना ही हमने देखा हमें तमाम उस घटना के बाद तमाम लोगों ने जब शाम को हम पहुंचते हैं कि ट्वीट किया गया है कि हमने कुछ कानूनों का उल्लंघन किया हमने कुछ वीआईपी प्रोटोकॉल हमने तोड़ दिए तमाम हम पर चीजें बोली गई है हम सम्मान करते हैं। हम दिल्ली पुलिस के उस पक्ष का सम्मान करते हैं। हम नहीं डर रहे हैं। हम दिल्ली पुलिस को कमिश्नर सर मैं आपसे कह रही हूं। हम नहीं डर रहे हैं। हम आपसे सेवक करेंगे। आप हमसे बात कीजिए। आपके पक्ष का हम सम्मान कर रहे हैं। लेकिन मैं यह पूछती हूं आपसे सर कि मैंने इस देश के कानून के हिसाब से मैंने और मेरी बहन ने इस देश के कानून के हिसाब से सबसे बड़ा गुनाह सबसे बड़ा क्राइम किया था। लेकिन आप यह जवाब दीजिए कि कौन सा संविधान कौन सा देश का कानून आपको और आपकी पुलिस को अधिकार देता है कि आप झूठ बोल के इललीगली उनको डिटेन कर करके और मेरा एक सवाल ये है तुमसे कि व्हेन यू व्हेन यू टेलिंग मी कि ये सारा सब कुछ हुआ वो वीडियो जो तुम्हारा वायरल है जहां तुम ये कह रही हो कि खान है मेरा नाम मोहम्मद आता है मेरे नाम के आगे इसलिए मार रहे हो और फिर तुम 4 पीm का माइक जो उठाते हो जो तुम्हारा सबसे ज्यादा वायरल वीडियो है उसके अलावा अलावा जब सोफे पे यह अपना लोअर जो है ऊपर हुआ हुआ है तुम्हारा जब तुम वहां पर लेटी हुई हो और इनफैक्ट तुम्हारा एक एक पिक्चर है जहां तुम जमीन पर एक तरह से बेहोशी की हालत में वहां पड़ी हुई हो ये बताओ कि वो वो कैसे हुआ कि जब तुम वहां पर अपना माइक उठाकर और वो कुछ पुलिस इंस्पेक्टर है या जो भी पोजीशन पे मुझे नहीं पता है जो पुलिस वाला है वहां पर वो कुछ लिख रहे हैं और तुम बार-बार कह रही हो कि खान हूं मोहम्मद हूं इसलिए करे तो वो यकीनन यकीनन आज से फिर से आपकी पहचान पूछी हालांकि मैं बेसुद थी लेकिन मैं यकीन से कह सकती हूं कि आपसे फिर पूछा गया होगा कि आपका नाम आपकी पहचान क्या? देखिए जो चार दीवारी में उस दिन हुआ रक्षक की शक्ल में भक्षक हमने देखे। गुंडे अब तक सुनते थे। दिल्ली पुलिस गुंडा गुंडई करती है। सब हमने विटनेस किया था। बहन की जिम्मेदारी थी। बहुत कुछ जिम्मेदारी थी। मेरे से ज्यादा इसको असर्ट किया गया क्योंकि उसने कहीं ना कहीं उनकी ईगो को हर्ट किया गया। तमाम चीज़ हम आपको बता चुके हैं। अपने को असर्ट किया होगा तुमने। जाहिर सी बात है। हम बता चुके हैं। सवाल पूछता है पिटे डरे या मारे सवाल पूछ रहे थे। हम पिटते हुए पूछ रहे थे। [गला साफ़ करने की आवाज़] हां बिल्कुल। तो देखिए जब ये हुआ उससे पहले हम एक वीडियो रिकॉर्ड कर चुके थे। बता चुके थे। लेकिन जब क्या हुआ क्योंकि बहन सब कुछ देखने के बाद मुझे भी बहुत मारा पीटा गया था। मेरा शरीर ने बहुत कुछ सहा था जो उतना कैपेबल नहीं है। अब क्योंकि मेरे लोग सब कुछ वहां आ गए थे। मेरा यूनिट जो मेरे पास मेरी आईडी नहीं थी वो मेरे तक पहुंच चुकी थी। और अब हमने 112 पर किसी ने कॉल या जो भी है 112 पर वहां वो लोग शायद 112 से आए थे और क्योंकि जो हुआ वो हुआ हिम्मत सब कुछ शरीर टूट रहा था। लेकिन मेरे कानों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। मुझे बताना था इस इस चार दीवारी में पुलिस स्टेशन में जो हमारी सुरक्षा के लिए हमारी सुनवाई की। यहां पर बहुत बड़ा हीनियस क्राइम किया गया है दिल्ली पुलिस के लोगों ने और यह मैं देश तक पहुंचाना चाहती थी। अब मारा पीटा उससे कहीं ज्यादा बुरा लगा कि पहचान एक नाम पढ़ के जितना गुस्सा सब कुछ उन्हें आया वो कहीं ना कहीं झकझोर देता है कि इतनी नफरत एक पर्टिकुलर कम्युनिटी के खिलाफ। क्या उस पर कोई अगर पूजा नाम आता, शीला नाम आता, दीक्षा नाम आता क्या तब भी आपका यही रवैया होता? ये मेरे सवाल हैं। ये सवाल थे अब तक सब सामान मेरी बहन को सुरक्षित हाथों में मैंने वहां पर दे दिया था और मैं वहां पर अब क्योंकि इससे पहले हो गया था। हम अपने आप अपनी हिम्मत को वापस से गैदर कर रहे हैं। और इससे पहले मैं अपनी बात रख चुकी थी। माइक आईडी मैं वहां रखी थी। हम कुछ लोगों को मदद के लिए नंबर सब हमारे लोग कर रहे हैं। वो मेरी माइक आईडी वहां पर रहेगा। वो कहते हैं मैम अब हम आपके आपके लिए हैं यहां पर आपका नाम और बताइए। तब मुझे गुस्सा आता है मेरा नाम और जो क्योंकि सवाल थे सबसे ज्यादा दुख की बात यही लगी। इतना पिटने का हमें नहीं लगा। हमने सहा सब कुछ हुआ। निडरता से डटे रहे। लेकिन दिल्ली पुलिस जो किसी पक्षपात के बगैर उसको काम करना चाहिए। भेदभाव के बगैर वो गूंज रहे थे। मैंने बोला मेरा नाम मेरा नाम वही है जिसको लेकर के हम पर डबल असॉल्ट किया गया। हां मैं मुसलमान हूं। मेरे नाम के बाद खान आता है और मेरे नाम से पहले मोहम्मद आता है। टॉर्चर मेंटल सब कुछ करके अब आप पूछ रहे हैं अपना नाम बताइए। ये ये मेरे सवाल थे और वायरल वीडियो मैं रो रही हूं क्योंकि उससे पहले मेरा असॉल्ट है। लेकिन पूरी कोशिश की है। हिम्मत कर रही हूं। ये उस टाइम की वीडियो है। मैं दिखाती हूं कि कैसे देखिए पूरा पीसा के साथ शरीर उसका जो है लेकिन मैं ये पूछना चाहती हूं तुम दोनों से मैं तुम दोनों को पहले से जानती हूं और जब मैंने वो वीडियो देखा तो मैं बहुत देर तक तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि वो तुम दोनों हो और उसके बाद मुझे मतलब जो तुम लोगों की हिम्मत थी और अब जो पूरा इंसिडेंट तुमने तफसील से यहां बताया है उसके बाद मुझे यह बताओ शाहीन इतनी हिम्मत कैसे आई? कोई और होता तो शायद ये सोचता भाग लो बस यहां से। यू नो सेफली घर चले जाओ। ऐसे ज़हन में आ सकता है और ये भी आ सकता है कि 12 साल से ये देख रहे हो तुम लोग जब से तुमने पत्रकारिता शुरू उसके काफी दिनों बाद की है। लेकिन फिर भी जब से भी तुम देख रहे हो तब से तुमने मोदी सरकार को ही देखा है। पत्रकारिता जब से शुरू की है। तुम्हें पता है मुसलमानों के साथ क्या होता है। तुम्हें पता है दिल्ली दंगे कहां हुए थे। तुम्हें पता है कि शाहीन बाग के नाम पर क्या हुआ था। उसके बाद भी तुम्हें डर नहीं लगा कि तुम वहां से चली जाओ। यह रिकॉर्ड ना करो। रिकॉर्ड किया तो हो सकता है कुछ और धाराएं तुम्हारे ऊपर लगा दे। बिल्कुल देखिए मैम जिस कम्युनिटी से बिलोंग करती हूं हम हमें संविधान से वो पावर मिलती है। हम भारत देश हिंदुस्तान इंडिया जहां पे संविधान का राज चलता है। कहीं ना कहीं ये पावर वहां से पहले आती है कि संविधान बाबा साहब के अंबेडकर बाबा अंबेडकर की जो संविधान है उसमें महिलाओं को जो ताकत दी गई है। मुसलमानों को जो ताकत दी गई है यह वहां से आती है और उसके बाद मेरे परिवार से मेरे मां-बाप से जो इतने हिम्मत वाले हैं। हम एक आप समझ सकते हैं मुस्लिम कम्युनिटी हम कोई बहुत ऐसे मुस्लिम परिवार से नहीं आते हैं। वहां पर एक छोटी सोच है। लेकिन हमारे मां-बाप हैं जो बहुत सपोर्टिव है। प्रोग्रेसिव माइंडसेट के हैं। ब्रॉड माइंडेड उनका सपोर्ट हमारे साथ है। मुझे याद है मेरी मां इतनी पढ़ी लिखी नहीं है। बट वो शेरनी जैसी बात करती है। हमेशा हमें सपोर्ट करती है कि तुम्हारी बैग पे मैं खड़ी हूं। मेरे पापा जो मुस्लिम समाज में हमें पता है महिलाओं की क्या स्थिति है। बेटियों को इतने ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है। पर हमारी हमारे बाबा हमें बेटा बोलते हैं। बेटा डरने की जरूरत नहीं है। हक की बात जहां पर हो, सच की बात जहां पर हो, अड़ जाना, डट जाना, डरना मत। सामने चाहे कितना भी मजबूत कद्दावर नेता हो। और इस बात का परिचय मैं और मेरी बहन ने और मेरे और भी फैमिली में जो हमने पहले कई बार दे चुके हैं। वो भले इतना लोगों तक ना पहुंचा हो। डर ये ये निडरता वहां से आती है। मेरे मेरे सिबलिंग्स जो लगातार अच्छे बुरे समय पर हमारे साथ खड़े होते हैं। सिर्फ मेरे पेरेंट्स वहां पे आती है और उसके बाद जिस तरीके से जिस जिस तरीके से लगातार वो वहां पर वो चीजें हो रही हैं। मेरे मेरे कई वायरल वीडियो हैं जिसमें दिल्ली पुलिस बार-बार करती है। हम फिर वही सवाल करते हैं। इसके बाद ये हिम्मत वहीं से आती है कि आप कुछ गलत नहीं कर रहे। आप इस देश के कानून संविधान के साथ में चल रहे हैं। वो लोग गलत कर रहे हैं। वो लोग जानते हैं वो गलत कर रहे हैं। जब आप सच से पूरी तरह के आपके अंदर पूरा सच भरा होता है ना आपको वहां से कॉन्फिडेंस मिलता है कि जो पीछे लोग हैं वहां पे भरोसा करते हैं। वो जानते हैं कि आप कुछ गलत क्या अभी ऐसा लग रहा है कि आइंदा जब तुम रिपोर्टिंग पर जाओगी अपना काम अपना प्रोफेशन जब आगे बढ़ाओगी। आई एम श्योर बढ़ाओगी। और क्या कोई मन में कोई डर खौफ लेकर या और ज्यादा हिम्मत लेकर क्योंकि हमने देखा है दोनों से ही मैं कहूंगी कि हमें नहीं भूलना चाहिए सिद्दीक कपन जिनको जिनको स्टेट ने किस तरह से सालों उनको जेल में रखा वो भी रिपोर्टिंग करने जा रहे थे उनका भी कोई ऐसा कोई कसूर नहीं था इसके अलावा हम देखें कि उमर खालिद शजील इमाम इस तरह के गुलफिशा फातिमा वो भी तो एक लड़की थी उनके ऊपर जिस तरह तरह के तमाम उन लोगों को जेल में तो मुसलमानों के साथ जो हो रहा है वो तो हो ही हो ही रहा है। पूरा देश उनको देख रहा है। तुम लोगों ने कभी कभी ज़हन में ऐसा आया कि भाई अभी तो हम काम कर रहे हैं। एक पत्रकार के तौर पर हम काम कर रहे हैं। लेकिन हमारी पहचान की वजह से कभी हमें कोई टारगेट या कभी ऐसा लगा हो कि अभी थोड़ा सा रुक जाते हैं। ऐसा नहीं करते हैं क्योंकि है तो हमारा नाम शाहीन और नफीसा ही। मैं इसका जवाब शायद शाहीन मैम से ज्यादा बेहतर दे पाऊं। मैंने अलग-अलग प्लेटफार्म पर काम किया है मैम। सबसे पहले मैं अपने पेरेंट्स का जिक्र कर दूं क्योंकि आपने पूछा ये हौसला ये हिम्मत हिम्मत कहां से आई? डरे हुए हैं क्या पेरेंट्स आप? नहीं कुछ कहा उन्होंने दे आर नॉट इवन दिस यू नो टाउन। वो लोग नहीं है। वो पहले से ही बाहर थे। और आप सोचिए अभी भी बाहर है। उन्होंने हमें बचपन से ही हौसला दिया है। ये ताकत दी है कि सच को सच कहना। और अड़े रहना, डटे रहना। कोई भी ताकत कितनी भी बड़ी क्यों ना हो जो ताकत सच में होती है वो आपको कभी हारने नहीं देती। और वही हिम्मत हम पिट रहे थे। हम मुस्लिम वो ट्रॉमा चल रहा था। सब चल रहा था। लेकिन जब हम दोबारा थाने में पहुंचे तो मेरे ज़हन में मेरे मां-बाप की बीवी वो ताकत वो हौसला फिर से मेरे शरीर को और बूस्ट करता है कि अभी लड़ना है डरना नहीं है तो मैं संविधान तमाम चीजों का तो है लेकिन मैं सबसे पहले अपने मां-बाप का दिल से शुक्रिया मौका बहुत कम मिलता है हमें शायद हो सकता है हम बच्चे हैं तो बहुत नादानियां करते होंगे मैं आज कैमरे के माध्यम से बहुत दिल से अपने मां-बाप का शुक्रिया अदा करती हूं कि जिस बाप ने कभी एहसास नहीं दिलाया कि हम बेटी हैं। उन्होंने हमेशा बेटा कह कर बुलाया है। जो मां मेरी पढ़ी लिखी नहीं है। लेकिन बावजूद इसके उनके जो अल्फाज़ होते हैं जिस तरीके से वो हमें शेरनी कहती है जिस तरीके से वो कहती है कि बहादुर मां-बाप की बहादुर औलाद हो। वह ताकत आज हमारे साथ खड़ी है। हमारे मां-बाप यहां पर नहीं है। कई किलोमीटर दूर बैठे हैं। यह तीन दिन से तमाम चीजें जो हो रही है उनका कलेजा शायद बहुत बेचैन है कि वो कैसे भी हमारे पास आ जाए लेकिन वो आ नहीं पा रहे लेकिन कॉल कर वो इतना जरूर कह रहे हैं। अभी भी उन्होंने नहीं पूछा कि बेटा कहां लगी? क्या लगी दर्द हो रहा है। घबराना मत। ये हुआ वो कुछ नहीं बोला। उन्होंने अभी भी यह बोला चाहे वो मेरे पापा हो मेरी मम्मी हो बेटा बहादुरी से लड़ना डरना मत चोट लगी होगी मैं उनको बोल रही थी कि मम्मी सूच शायद बहुत बोल रही है क्या बात कर सोचता ही तो है डंडे ही तो पड़े होंगे कोई [नाक से की जाने वाली आवाज़] बात नहीं बाहर देखा दुनिया में क्या ये देखो तुम ये कह रही हो तुम दोनों ने कहा कि हमारी जो वालदा है जो हमारी अम्मी है वो उतनी पढ़ी लिखी नहीं है लेकिन उन्होंने तो तुम्हें जिंदगी के सबसे इंपॉर्टेंट लेसन तुम लोगों को सिखाए हैं जो शायद हो सकता है कि कोई बहुत एजुकेटेड मां ना सिखा पाए। हो सकता है तो वो जो तुम लोग आज हो और मैं अपने आपको भी उसमें शामिल करती हूं। हम सब जो आज हैं हमारी मांओं ने जो हमें हिम्मत दी है हम उसी की वजह से हैं जो कहती है कि जाओ लड़ो देखो और वही कि बिल्कुल निडर हो के बिल्कुल सच के सच के आगे और और कुछ नहीं तुम्हें देखना है हक के आगे और कुछ नहीं देखना है मैं तुम्हें ये ये यहां से दो तीन और सवाल है आई नो तुम लोग भी थके हुए हो सारे दिन के आपको इंटरप्ट करें क्योंकि इस मैं धन्यवाद अपने मां-बाप का कर दिया मैंने उसके बाद जो आपका अहम सवाल था कि मुस्लिम है आप कंटिन्यू करेंगे नहीं करेंगे तो मैं आपको बताऊं जब मैंने करियर की शुरुआत की थी शायद मुझे कुछ ही समय हुआ होगा साल दो साल हुआ होगा मेरी पहचान कर कर मुझे कई बार दिल्ली की अलग-अलग जगह पर घेरा गया कई बार मेरे साथ मारपीट की गई लेकिन वो आम क्षमता थी वो कुछ पत्रकार थे जो सत्ता की चाटुकारिता करते हो जो अपनी पत्रकारिता का धर्म नहीं निभाते थी। वो कुछ भगवाधारी लोग थे। वो कुछ समर्थक थे। हिंदूवादी संगठन के लोग थे। तमाम वीडियो तब भी वायरल हुई थी। तब भी हम नहीं डरे थे। तब भी हमने उनको बोला था कि हां मेरा नाम खान है। मैं भारतीय मुस्लिम महिला पत्रकार हूं। अब बताइए कि आप क्या करेंगे? तो मैं तब नहीं डरी। मैं अब कैसे डर सकती हूं? हां, मैं सदमे में जरूर हुई। मैम एक दिन के लिए सदमा था। सदमा सिर्फ एक चीज का था ना घसीटने का था ना मारने का था ना बर्बरता का था और जो शरीर पर निशान पड़े चोट के उन किसी चीज का डर नहीं था ना खौफ था ना सदमा था सिर्फ एक चीज का सदमा था मुझे कि आम जनता नहीं थी वो जो पहचान कर कर मार पुलिस थी वो पुलिस स्टेशन था वो कोई रोड नहीं था वो पुलिस स्टेशन की दीवारें थी बंद कमरा था और मारने वाले के शरीर पर वर्दी थी वो वर्दी जो बच बचपन से हमें पहचान कराई जाती है कि आपकी सुरक्षा के लिए, आपकी सेवा के लिए है। जिससे आपको खतरा नहीं होगा। वो आपके साथ खड़ी होगी। उस चीज का मुझे सदमा लगा कि ये लोग अगर हमारी पहचान कर कर मार रहे हैं। इस तरीके से इस नफरत अंदाज में बर्बरता कर रहे हैं तो इस देश के आम मुसलमानों के सम्मान की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसके कंधों पर बचती है माम? मैं ये सवाल खुद यहां से कर रही हूं कि कौन इस चीज की जिम्मेदारी आज लेगा कि इस देश के तमाम जो अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं उनके सम्मान और सुरक्षा की गारंटी चाहे वो थाने की दीवारें हो चाहे वो सड़क हो या कोई और महकमा हो वहां वो खुद को सुरक्षित महसूस करता है। और रही बात डरने की या पत्रकारिता छोड़ने की तो जब लाठियां पड़ रही थी मैम जब मेरा पैर सूझ गया पीला पड़ गया खून रुक गया मैं तड़प रही थी पानी सामने रखा तब पानी मांग रही थी मेरे सवाल तब नहीं रुके तो मुझे नहीं लगता कि आप सवाल रुक पाएंगे और मैं अब मैंने अभी तक वो सवाल नहीं पूछा मैं बहुत खामोशी से वहां बैठी थी क्योंकि मैं उस वक्त सिर्फ एक आम व्यक्ति थी पत्रकार वाली अपने अंदाज में नहीं थी लेकिन मैं अब सवाल जरूर जरूर करूंगी। वो एक निजी अस्पताल था। मुख्यमंत्री आए चलिए उनका आना बनता है। लेकिन गृह मंत्री अमित शाह किस हैसियत से उस अस्पताल के इनोगेशन के लिए पहुंचते हैं। क्या वो स्वास्थ्य मंत्री थे? क्या उनका जाना इतना जरूरी था कि वो तमाम कामकाज छोड़कर वो ये छोड़कर के कुछ ही दूरी पर क्या आपके अधीन आने वाला कानून प्रशासन कर क्या रहा है। वो तमाम चीजें छोड़कर आप एक फीता काटने गए थे। और अब मैं सवाल प्रधानमंत्री से करना चाहती हूं क्योंकि मैं बार-बार ये पूछ रही हूं हम जो हम तमाम पत्रकार के तौर पर एक नागरिक के तौर पर सब देख रहे हैं। हमें पता है उमर खाली तमाम लोग चेहरे वो नाम पता है जो सालों से जेल के अंदर बंद है जिनका ट्रायल भी अभी शुरू नहीं हुआ है और कितनी आवाज ऐसी जो अभी तक हमारे सामने नहीं आई है। लेकिन प्रधानमंत्री जी अब यह वक्त है आपका दिया गया नारा सबका साहस सबका विकास सबका विश्वास का उस नारे को नारा नहीं न्याय में बदलने का उसको न्याय में साबित कीजिए अब आपको जरूरत है कि आप खुलकर हिंदुस्तान के मुसलमानों के साथ खड़े हो और उनको यह विश्वास दिलाएं कि उनके कार्यकाल में यह भेदभाव ये जातिवाद ये धर्म धर्मवाद नहीं चलेगा। आपको इस तरीके से नहीं जाएगा। लेकिन ये मैं अभी भी कहूंगी कि नफीसा ये तुम्हारी मासूमियत है। ये बिल्कुल मैं कहूंगी कि तुम्हारी मासूमियत है कि तुम 12 साल के बाद भी उन प्रधानमंत्री से जो कपड़ों से पहचानते हैं जो कहते हैं आपकी बेटी ले जाएंगे। आपके घर से आपकी भैंस ले जाएंगे, चुरा कर ले जाएंगे। जो हम और वे करके बात करते हैं जो तुम्हें और मुझे घुसपैठिया कहते हैं। ठीक है? और जो नफरत है वो पार्लियामेंट से होकर निकलती है और लाल किले की प्राचर तक होती है। तो क्या उन प्रधानमंत्री से 12 साल में क्या ही तुम उम्मीद करोगी लेकिन मैं ये जरूर कहूंगी कि तीन तलाक के नाम पर कि मुस्लिम महिलाओं का उत्थान इसके बाद स्मृति ईरानी से लेकर तमाम जो महिला उनकी बीजेपी की नेता हैं वो सब कहते हैं खुद प्रधानमंत्री कहते हैं कि देखिए जब उनके पास कुछ नहीं होता देखिए हमने उनके साथ ये किया है। अब उनको जवाब देना चाहिए। तुम लोगों का एग्जांपल मैं सामने रख रही हूं। बिलकीज़ बानो से लेकर और तमाम जिन लोगों की लिंचिंग होती है उनकी बीवियां, उनकी मां या फिर उमर खालिद की भी जो मां है या उनकी बहन हैं कि मतलब इंसाफ का मतलब क्या सिर्फ यह है कि आप एक ढकोसला करें। उसके नाम पर आप तीन तलाक के नाम पर आप सिर्फ एक कानून लेकर आए और बाकी एक जनरल आम जो मुस्लिम महिलाएं हैं उनके साथ क्या हुआ? तुम लोग को तो लगता होगा कि तुम एक पत्रकार होने के नाते मुझे लगता है कहीं ना कहीं मैं प्रिविलेज्ड हूं। मैं मैं पत्रकार हूं, मुसलमान हूं लेकिन एक प्रिविलेज भी हूं। और मेरे पास प्रिविलेज ये है कि मैं दूसरे जो हाशिए पे खड़े मुसलमान है या दूसरे हाशिय पे खड़ा जो भी समाज का वर्ग है उसकी मैं आवाज उठाऊं। तुम लोगों को ये सब मतलब अब अब उसके बाद क्या लग रहा है? तुम लोग लग रहा है कि हमें खुद अपनी आवाज बनना पड़ रहा है और इसके साथ-साथ मैं ये भी पूछना चाह रही हूं कि कैसा लग रहा है तुम दोनों को कि पूरा देश जो हक पसंद लोग हैं वो पूरा देश तुम लोगों के बारे में है ना जो न्याय पसंद लोग हैं वो तुम्हारे बारे में आवाज उठा रहे हैं पूछ रहे हैं पॉलिटिकल पार्टीज के लोग भी उन्होंने भी तुम लोगों को बुलाया है इसके अलावा इंटरनेशनलली तुम्हें इतना बड़ा कवरेज तुम लोगों का तो ख्वाब रहा होगा सबका होता है एक पत्रकार के तौर पे लेकिन ऐसे कवरेज होगी ये तो जाहिर सी बात है ये तो किसी ने नहीं सोचा होगा। बिल्कुल आपकी बात का जवाब दूंगी। हमारे साथसाथ वो साकेत थाने के अधिकारियों ने भी नहीं सोचा होगा। मैम उनका नाम इतना शुमार हो जाएगा। वो भी फेमस हो जाएंगे। फेमस हो जाएंगे। उनके शायद यू नो करियर का बहुत अच्छा काम रहा होगा। उनको भी कहीं ना कहीं लग रहा होगा। खैर इससे पहले मैं इस बात का जवाब दूं। एक छोटा सा मैं इस चीज को नहीं भुला सकती क्योंकि मैं लगभग तीन साल होने वाले हैं 4K. न्यूज़ नेटवर्क के साथ जुड़े हुए। और जो ताकत मुझे मेरा संस्थान और मेरे बॉस देते हैं शुरू पहले दिन से रहा था क्योंकि उस चैनल को जॉइ करने के कुछ दिन बाद या शायद कुछ ही दिन रहे होंगे और ऐसी ही घटना चांदनी चौक पर होती है जिसका मैं बिना डरे बिना खौफ के विरोध करती हूं और साफ बोलती हूं वहां पर मुझे पाकिस्तान जाने की सलाह दी जाती है तुम मुसलमान हो इस तरह की पहचान के हम तब भी विरोध करते यह आपका सिर्फ देश नहीं जितना आपका अधिकार है मेरा भी अधिकार है आपको कोई राइट नहीं है। विरोध करती हूं अपनी और ये सब रिपोर्टिंग के दौरान रिपोर्टिंग के दौरान हुआ और वो वीडियो भी वायरल होती है और मेरे बॉस मेरे साथ खड़े होते हैं संजय शर्मा और उस वीडियो को पूरा वहां पे जो है शेयर करते हैं और वहां पर फिर से जो है तमाम लोगों से सवाल करते हैं जो जिम्मेदार है उस नफरत को फैलाने के लिए और संजय शर्मा जी का बहुत-बहुत शुक्रिया। वो हमेशा पावर देते हैं। उन्होंने उन्हीं से सीखा है कि सत्ता जो छिपाती है असली खबर वही होती है। वो खबर नहीं आप आम कैसे खाते हैं, बटवा रखते हैं। तमाम उनसे हम सीखते हैं और शायद ये एक बड़ी वजह रही है। जिस तरीके से नाम सुनते ही वो होते हैं। तो मुझे लगता है कि एक बहुत बड़ी तमाम वजहों में से एक बड़ी वजह उनको रही है कि ये चैनल तो बैन और सरकार के खिलाफ और शायद इसीलिए उन्होंने टारगेट किया पर हम डरते नहीं है। हम 4 पी.m. के एंप्लॉय है 4 पीएम लगातार मजबूती से बात रखता है उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस जिस तरीके से मजबूती से और साफ कहा है कि ये बर्दाश्त नहीं किया जाएगा इसे 4 पीएम या 4 पीएम की एम्प्लई के ये महिलाओं पर पत्रकारों पर हमला है एक माइनॉरिटी पर हमला है और ये सब कहते हैं। अब जब से आप कह रही हैं बहुत जब वो वीडियो मैंने शेयर करी थी मुझे नहीं पता था। हमें लगा था शायद हमारे लोग जो हमारी ऑडियंस है 4:00 पी.m. की उन तक ही पूरी कुछ इतना सोचना ही नहीं था। बस मेरा यह था यहां पे जो गलत हुआ है इसको मुझे डॉक्यूमेंट करना है। ऐसे ये देश दुनिया को पता होना चाहिए और मैं करती हूं। मुझे नहीं पता था। हमें नहीं पता था। हम उस यू नो माइंड से नहीं थे। थे ऑफ़ माइंड कि लेकिन अब जब पता चल रहा है कि जो हिंदुस्तान की जो हिंदुस्तान की जो रूह है हिंदू मुसलमान की एकता खूबसूरती वो पसंद लोग न्याय पसंद लोग शांतिप्रिय लोग महिला समर्थक लोग, जर्नलिस्ट समर्थक लोग पूरे देश से ही नहीं बल्कि दुनिया से बिना किसी भेदभाव के सपोर्ट कर रहे हैं और कह रहे हैं कि हम आपके साथ हैं। आपने बिल्कुल सही किया। आप अपने को अकेला मत महसूस कीजिए। ये हमें और ताकत देता है। हमें बताता है कि हम शायद सही जा रहे हैं। हमने कोई गलत नहीं किया है सवाल करके। हमने उस दुनिया को दिखा के देखिए चार दीवारी में दिल्ली पुलिस क्या करती है। कितनी काली है दिल्ली पुलिस। कितनी डरपोक है, कितनी कायर है, किस तरीके से दो यंग लड़कियों से डरती हैं? कैमरे से, सवाल से मतलब ये तमाम चीजें हम पूछते हैं और ये चीजें आती है। बड़ा अच्छा लगा कि सिर्फ देश नहीं दुनिया से प्यार मिल रहा है। हमें नहीं पता था। हम सब उनके शुक्रगुजार हैं कि आप सच को पसंद कर रहे हैं। हक की बात को पसंद कर रहे हैं और काफी अच्छा लग रहा है। उन लोगों का भी शुक्रिया जो कई सवाल उठा रहे हैं कि कुछ लोग कह रहे हैं थोड़ा कम पीटा है। ऐसे ही पीटना चाहिए। ये इन्हीं लायक है। आपका भी सम्मान है। वही संविधान आपको भी अधिकार देता है। आप उस अधिकार का इस्तेमाल कीजिए। हम सम्मान करते हैं। आपको लगता है हमारे साथ कम पिटाई हुए ज्यादा। आप उसके लिए प्रदर्शन करिए अगर आपको लगता है आप दिल्ली पुलिस से बोलिए जरा दो चार और लाठियां इन पे मारिए गाली वाली दीजिए इनके परिवार को भी जैसे वो कहते हैं ना दिल्ली पुलिस तुम लठ बजाओ हम तुम्हारे साथ हम तो कहते हैं वही नारा लगाते अब हम भी कह रहे हैं मैम कि हम दिल्ली पुलिस के साथ हैं सीसीटीवी फुटेज को मिलाइए पूरी दुनिया को दिखाइए क्योंकि आज सिर्फ भारत की नजर आप पर नहीं पूरी दुनिया की नजर आप पर है कि दो महिला पत्रकारों ने ऐसा कौन सा क्राइम करा जिसको लेकर आपने इतनी बर्बादी अब तुम लोगों की क्या डिमांड है? क्या तुम लोग चाहते हो? एफआईआर हुई नहीं है? यू मैंने तुम लोगों को देखा था प्रेस कॉन्फ्रेंस तुम लोग बोल रहे हो कि यू वांट सस्पेंशन ऑफ दोज़ ऑफिसर्स जिन लोगों ने तुम लोगों के ऊपर असॉल्ट किया है। तो एक एफआईआर दूसरा सस्पेंशन। तुम लोगों की और क्या मांग है? और क्या वाकई में लग रहा है कि तुम लोगों के साथ लीगल टीम है? अह ये मैं पूछना चाहती हूं और लीगल टीम है तो क्या उसके भरोसे तुम लोगों को लग रहा है कि एफआईआर होगी? क्या तुम्हें लग रहा है सस्पेंशन होगा? एक ऐसे दौर में जहां नेता प्रतिपक्ष को जिसके ऊपर पैेट गन जो चलाई जाती है उसको लेकर 8 घंटे बैठना पड़ता है और उसके बाद फिर एफआईआर होती है जिसके ऊपर पैेट गंस मतलब प्रूफ है जिसको एक्सेप्ट नहीं किया जा रहा है ऐसे दौर में जहां एफआईआर करने के लिए घंटों प्रदर्शन करना पड़ता हो तो तुम लोगों को क्या उम्मीद है और क्या तुम लोगों की मांगे भी हो इसका जवाब फिर उसी मासूमियत के साथ दूंगी जिसका जिक्र आपने किया एफआईआर तो होगी यह शब्द राहुल गांधी के थे। देश के लीडर ऑफ अपोजिशन जो संसद थाने में बोलते हैं एफआईआर तो होगी आज नहीं तो कल होगी 50 दिन बाद होगी। मैं उनके अल्फाजों पर भरोसा करती हूं कि एफआईआर तो होगी। चाहे वो लीडर ऑफ अपोजिशन मेरे साथ खड़े होकर करवाएं। चाहे उन्हें हम दो देश की बेटों के लिए धरना क्यों ना देना पड़े एक बार। एफआईआर तो करेंगे ही। हम उनसे उम्मीद करते हैं राहुल गांधी से कि उनको भी खुलकर अब आना चाहिए। जब वो इतनी मजबूती के साथ तमाम लोगों की आवाज उठा रहे हैं, बन रहे हैं और सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन रहे हैं। तमाम मुद्दों को बाखूबी उठा रहे हैं तो एक मुद्दा और उनके तमाम कांग्रेस पार्टियों का समर्थन मिल रहा है। लेकिन राहुल गांधी के संज्ञान में जाना चाहिए। उनका एक ट्वीट सामने आना चाहिए। उनका समर्थन बल्कि हमारे बीच अगर वो खड़े मिलेंगे तो हमें लगेगा कि हां हमने जो किया वो डरो मत। नहीं डरे हम। हमने तो प्रूफ कर दिया कि हम नहीं डरे। अब आपकी बारी है कि आप अपनी जिम्मेदारी को निभाए क्योंकि भरोसा हमने आप पर भी किया है। आप लीडर ऑफ़ अपोजिशन हैं। उसके साथ उसी मासूमियत के साथ हालांकि कपड़ों से पहचान लीजिए। तमाम चीजें हमने देखी गई। बतौर पत्रकार तमाम चीजें हमने उठाई है। फिर भी मैं प्रधानमंत्री से फिर भी उम्मीद करती हूं कि शायद जिस पद पर वो बैठे हैं वो संवधानिक पद है। शायद उन्हें अब तो यह ख्याल आ जाएगा कि अब इस पद की गरिमा को मैं रख दूं। इस पद की जो कर्तव्य जो जिम्मेदारी बनती है उसको निभा दूं। राहुल गांधी नहीं आ रहे तो आप आ जाइए। हमें एफआईआर चाहिए। हमें इंसाफ चाहिए। सस्पेंड किया। उनको अभी तक सस्पेंड नहीं किया जा रहा। तमाम वो उस कुर्सी पर बैठने लायक नहीं है। वो एसएओ वो महिला पत्रकार जो गुलाबी कपड़ों में थी जो मेरे पेशे मेरे धर्म से पहचान कर रही थी वो पद पर बैठने लायक नहीं उनको अभी तक बर्खास्त क्यों नहीं किया जा रहा अभी तक क्यों नहीं हमारा गुनाह बताया जा रहा मैम क्यों एफआईआर में इतने घंटे लग रहे हैं और फिर और तरह-तरह का प्रेशर देखने को मिल रहा है हमें आश्वासन तमाम पॉलिटिकल पार्टियों से मिल रहा है विपक्षी तमाम पार्टियों से मिल रहा है फिर भी हम चाहते हैं सामाजिक संस्थाएं महिला संस्थाएं और सब लोग सपोर्ट कर रहे हैं जैसा आप लोगों की मुलाकात मैंने देखा कि इमरान प्रतापगढ़ से भी आप लोगों की मुलाकात हुई है। मैंने ये भी देखा कि निशु का जो मामला है उस उस लड़की के फादर के साथ जो किया गया उसके बाद उस लड़के को गिरफ्तार किया गया और उसके बाद एफआईआर भी हुई है। संगीन धाराओं में एफआईआर हुई है। मैं सिर्फ इसको एक एग्जांपल के तौर पर यहां पर रख रही हूं। तुम लोगों को भी लगता है कि क्या इसलिए कि तुम लोग मुसलमान हो इसलिए इस प्रोसेस को और डिले किया जा रहा है? क्या तुम्हें लगता है ऐसा? क्या तुम्हें लगता है? क्योंकि ये सिर्फ ये नहीं है कि तुम दो लोग हो। तुम दो लोगों से तुम्हारी जो पूरी कम्युनिटी है उसकी एजेंसी है। एक इसी तरीके से वो एक दलित लड़की वो एक नहीं है बल्कि उसके जरिए पूरी जो दलित कम्युनिटी है उसको एक मैसेज है। बिल्कुल मैम जैसे आपने कहा देखिए एज अ यंग हम हर कोई किसी लीडर को एडमायर करता है और मेरी पत्रकारिता से पहले और कोई इस पे मेरी निष्पक्षता पे सवाल ना करे। बिल्कुल निष्पक्ष हूं। लेकिन हर कोई किसी को एडमायर करता है। मैं राहुल गांधी को एडमायर करती हूं। मैं अपनी पत्रकार था जब वो उन्होंने वो वर्ड कहे थे डरो मत। मैं इंस्पायर हुई थी उससे और शायद फैमिली के साथ संविधान के साथ वो भी मुझे कहीं ना कहीं ताकत देता है जिसके बाद मैं डरती नहीं हूं। और अभी हाल फिलहाल में जो मेरी खुद की एक सोच रही है जो में उससे मैंने ताकत ली कि स्मैश द पट्रार की। हम हमने उसको तोड़ा। हमने बताया कि महिला पत्रकार बात कर सकती है, सवाल कर सकती है। सत्ता में बैठा हो कितना मजबूत इंसान क्यों ना हो। हमने आपको फॉलो किया सर। आपने यही तो मैसेज दिया था ना। हम आपको फॉलो कर रहे हैं। हम हम आप पर भरोसा करते हैं कि आप देश की बेटियों के साथ, देश की महिलाओं के साथ और इंसाफ के साथ में हैं। लेकिन अब राहुल गांधी जी का समय है। राहुल गांधी सर इस तरीके का आश्वासन हम राहुल गांधी सर से बोलना चाहते हैं। सर हम हमें धर्म के चश्मे से ना देखा जाए। हम सबसे पहले इस देश की बेटी हैं। फिर हम एक पत्रकार हैं और उसके बाद हमने अपनी पहचान पर बात नहीं करी। सत्ता में पावर में बैठे लोगों ने पहचान कर करके बोला है और आपके लिए हो सकता है मुश्किल हो या मुझे नहीं पता क्या वजह है लेकिन आप एक बेटी के तौर पर एक महिला के तौर पर एटलीस्ट अगर आप हमारे साथ नहीं खड़े हो सकते नहीं पर हमारे समर्थन में हमारे साथ जो ब्रूटिटी हुई पुलिस प्रशासन के खिलाफ और हमारे हम हमें कहीं ना कहीं एक करज देते हुए हमारे लिए एक पोस्ट करें और हमें इमरान सर की तरफ से आश्वासन दिया गया है। माइनॉरिटी के वो समाज है डिपार्टमेंट है। उसका सम्मान हम करते हैं। एक भाई की तरह हालांकि उन्होंने पहले क्योंकि हम वो हमें एक लंबे समय से जानते हैं। पत्रकारिता से पहले हमारे परिवार के बारे में जानते हैं कि हम कितना संघर्ष भरा और कितना मजबूत परिवार है। उन्होंने इस बात को कही है एक भाई की तरह वो साथ में सब कुछ हैं। और उन्होंने कहा उनका माइनॉरिटी डिपार्टमेंट सब कुछ ऐसे ही नहीं जाना पा जाएगा। संसद से सड़ तक वो लड़ाई लड़ेंगे और राहुल गांधी तक भी इस बात को मैं प्रियंका गांधी से मदद मांगती हूं। लड़की हूं लड़ सकती हूं। इस स्लोगन में दीदी हमें लड़के और हम लड़ भी दिखा भी दिया। प्रियंका गांधी का हम साथ चाहते हैं। हम चाहते हैं कि अब हम लड़कियां लड़े। एक साथ खड़े हो के लड़े उस पावर से जो हमें बार-बार वहां पर हमारे कानों में गूंजा जा रहा था कि पावर है पावर है। अब लड़ना है उस पावर से। आइए राहुल गांधी आइए प्रियंका दीदी आपको सब दीदी कहते हैं आज मैं भी दीदी कह रही हूं आइए साथ दीजिए और इसके साथ हम हम इन्हीं से नहीं बल्कि उन तमाम एमपी से जो शायद उस साइड में खड़ी हुई है वो एक महिला हैं मुत्रा है इकरा हसन है इसके अलावा एक लंबी फहरिस्त बिल्कुल और एक बहुत हमारे देश की चर्चिता जो है एमपी है जो इन दिनों गाली वाली पर बात कर रही थी कि ऐसे कैसे हम उनसे भी बोल मैं नाम लेकर के बोलती हूं। मुझे कोई गुरज नहीं है। मैं कंगना रनौत से बोलती हूं। आप पहले एक महिला है। आप हम पर कब बात करेंगी? आप इसको कब अपोज करेंगी? मैं स्मृति ईरानी से बोलती हूं जो महिला का अपने आप को एक मजबूत सिंबल मानती हैं। आपको नहीं लगता हमारे साथ गलत हुआ है। आपको इस पे बात करनी चाहिए। धर्म के चश्मे से देखकर या हम कौन है? कोई इस पहचान को पूछ के एक महिला के तौर पे एक पत्रकार को सॉलिडेरी देनी चाहिए। और उससे भी अहम मैम कहीं ना कहीं देश का वो पत्रकार तबका जो कहीं ना कहीं अपने आप को इस पूरी घटना से दूर कर रहा है। उसको लग रहा है हम एक अलग जो है पहचान से उनको लग रहा है ये किसी एक खेमे के पत्रकार की बात है। वो लोग कहां पर हैं जो बड़े-बड़े डिबेट करते हैं। वह कब महिला के महिलाओं के मुद्दे पर पत्रकार के मुद्दे पर कब वह डिबेट करेंगे उन्होंने एक ट्वीट तक नहीं किया है। बोले आप ये कहें कि अंजना ओम कश्यप रूबिका लियाकतित त्रिपाठी जो जो बात करती है ना महिलाओं की महिलाओं की बात करती है ना तुम लोग भी तो महिला पत्रकार ही हो उन्हीं की बिरादरी से आती हो उनकी कलीग्स हो उनके कैमरे अब क्यों बंद है उनके सवाल क्यों गायब खामोश हो गए क्यों नहीं उनकी आवाज ये भी ट्वीट किया उन्होंने तुम्हारे लिए चलो मजबूरी होगी कि वो कार्यक्रम नहीं कर सकती है ना आप एक पद से संस्थान से हटकर तो हमारे साथ खड़ी हो सकती हैं कि पत्रकारों पर यह हमला नहीं सहा जाएगा। मुझे याद है शायद अब से कुछ पहले वो यूनिवर्सिटी वाला जो किस्सा हुआ था जब वो पत्रकार दूसरे पक्ष से थी तो देखिए किस तरीके से प्रोग्राम चलाए गए थे। उस पर पूरा-पूरा कार्यक्रम हुआ था। न्याय की मांग की गई थी और कार्यक्रम के अलग से भी उस पर समर्थन सॉलिड तो ये ये चश्मे ही लेकर उतारने पड़े। बिल्कुल लेकिन मैं ये भी कहूंगी कि तुम्हें सिर्फ उन लोगों से ही उम्मीद होनी चाहिए जिन्हें तुम्हें लगता है कि हां उम्मीद के लायक हैं। उन लोगों ने जिन्होंने अपना जमीर बेच दिया जिन जो लोग लगातार किस तरह की पत्रकारिता कर रहे हैं वो हमें बताने की जरूरत नहीं है। तो उन लोगों से तुम्हें क्या उम्मीद करनी? लेकिन मैं यही कहूंगी कि बहुत-बहुत शुक्रिया पहले तुम दोनों का कि तुम यहां तक आई और अब तक मुझे ये लगता था कि मैं किसी को यू नो हिम्मत दे रही हूं या हो सकता है मुझे देख के किसी को हिम्मत आती हो लेकिन अब तुम दोनों को देखकर मुझे वाकई में हिम्मत आई है। मैं ये जरूर कह सकती हूं कि अगर खुदा ना खास्ता कभी मेरे साथ कुछ हो तो मुझे लगता है कि मुझे तुम दोनों की तरह ही बिहेव करना चाहिए। नहीं अल्लाह ना भगवान अल्लाह ना करे आपके साथ इस तरीके की किसी भी पत्रकार महिला के साथ इस तरीके की चीज हो हम कंडेम करते हैं और जहांजहां पत्रकार हम नहीं देखेंगे कौन किधर का है किसी का हम पत्रकार बिरादरी के साथ खड़े हैं और उसको कंडेम करेंगे महिलाओं के साथ खड़े हैं और यही किसी भी हक पसंद और न्याय पसंद इंसान का जो अप्रोच है जो इच्छा है वो होनी चाहिए नहीं और मैं मैं ये भी कहूंगी देखो ऐसे वक्त में क्या होता है कि आप जिस संस्थान से जुड़े होते हैं उसका क्या रोल रोल है उसका क्या बिहेवियर है वो बहुत इंपॉर्टेंट होता है और मैंने देखा कि संजय शर्मा जी जो हैं उन लोगों ने उन्होंने वो वीडियो भी तुम्हारा कि एकदम वो हाथ ऐसे करके आए हैं ऑल द वे तुमसे तुम लोगों से मिलने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस उन्होंने की सॉलिडरिटी साथ और अलग-अलग मंचों पर जाकर वो तुम्हारे तुम लोगों के लिए बात कर रहे हैं उन्हें ये भी पता है कि हो सकता है इसकी भी कोई उन्हें कीमत चुकानी पड़े लेकिन उसके बाद भी वो तुम लोगों के साथ खड़े हैं तो मुझे लगता है कि एक संस्थान के तौर पर उन लोगों ने तुम्हारा जो साथ दिया है वो भी काबिले तारीफ बिल्कुल मैम चोटिल थे वो और गिर गए थे बट वो आए कि मेरी पत्रकार के साथ ऐसा हुआ है संस्थान पर हमला है और वो खड़े और उसके साथ उन्होंने तमाम उन लोगों का कहीं ना कहीं किया कि पत्रकारिता पर ये हमला नहीं सहा जाएगा तो मैं बिल्कुल आपने इस बारे में कहा है बिल्कुल संस्थान से एक पत्रकार मजबूत होता है संस्थान शायद वैसा है और आप देख रहे हैं शायद वो इसीलिए नहीं बोल रहे हैं मैम एक बात मैं क्लियर कर रही हूं क्योंकि अभी भी काफी लोग ये चला रहे हालांकि मैंने प्रेस कॉन्फ्रेंस में ये बहुत साफ कर दिया था। फिर भी वो साफ आपके थ्रू करना चाहती हूं। मैं 4 पी.m. का हिस्सा रही हूं। मैंने दो साल लगभग उसमें काम किया है। और मैं वहां खड़ी थी और संजय शर्मा जी हमारे साथ खड़े थे। बात और मेरे बॉस वहां खड़े थे। लेकिन मैं अब 4 पी.m. का हिस्सा नहीं हूं। कुछ लोग अभी भी ये चला रहे हैं कि 4 पी.m. की पत्रकारों के साथ। मैं अब इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट हूं। मैं फ्रीलांस काम कर रही हूं। मैं अपना अमन संदेश नामक एक YouTube न्यूज़ चैनल चला रही हूं और अंत में वो बात जो मुझे सबसे ज्यादा पैनिकिक कर गई क्योंकि बार-बार पहचान पूछी जा रही थी तो जो लोग हमसे हमारी पहचान पूछ रहे थे या हमसे पहचान जानकर मार रहे थे तो शायद आप लोगों ने इस देश का आजादी का इतिहास नहीं पढ़ा। एक बार इस देश की आजादी का इतिहास जरूर पढ़िएगा तो आपको मालूम पड़ेगा कि इस देश के लिए कुर्बानियां इस देश के लिए लहू किसी एक धर्म ने नहीं बहाया उसमें मुसलमानों का योगदान उसमें मुसलमानों की कुर्बानियां भी बराबर है और जिस टाइम महिला पुलिसकर्मी मुझे मुसलमान कह कर मार रही थी तो मुझे फिर से मैं उस बात को कोट कर रही हूं मुझे क्योंकि याद आ गया उस वक्त मैंने जो सुना जो पढ़ा मुझे वो याद आ रहा था। मेरे ज़हन में आंखें बंद थी। मुसलमान मुस्लिम मुस्लिम मैं कर रही थी। एक कान से मुझे सुनाई दे रहा था कि जामा मस्जिद की मीनारों पर एक वक्त पर आवाज गूंज रही थी कि तुम कहां जा रहे हो? मुसलमानों ये देश तुम्हारा है। ये देश तुम्हारा है। तुम्हें यहीं रहना है। तुम्हें सुरक्षित महसूस करना है। तुम्हें इसे छोड़कर नहीं जाना। एक तरफ मेरे कान में वो आवाज गूंज रही थी जिससे मुझे ताकत मिल रही थी और एक कान में वो आवाज गूंज रही थी जो बार-बार ये कह रही थी कि मुसलमान है तो और मारो और पीटो मैं इस जो कंट्रास्ट था उसमें थी कि मैं क्या करूं किसको सुनूं और अंत में मैंने उसी आवाज को चुना उसी गूंज को सुना कि हम इस देश के मुसलमान हैं। इस देश के लिए हमारे पूर्वजों ने कुर्बानियां दी है, लहू बहाया जिसका इतिहास आप कभी नहीं मिटा पाएंगे, चाहकर भी नहीं मिटा पाएंगे। इसीलिए फिर उन्हें बता देना चाहती हूं कि मैं और मेरे सहयोगी जिसको थाने के अंदर बर्बरता से पीटा गया वो भारतीय मुस्लिम महिला पत्रकार हमें फक्र है इस चीज पर गर्व है इस चीज पर ना पहचान कल छुपाई थी ना आज छुपाएंगे और ना ही आने वाले समय में छुपाएंगे क्योंकि ये ताकत हमें हमारे संविधान में दी है। बहुत शानदार, बहुत शानदार। अह मुझे लगता है कि जितना आर्टिकुलेशन के साथ जिस बेहतरीन तरीक़े से के साथ तुम दोनों बोलती हो, मुझे लगता है कि तुम बहुत सारी जो आने वाली नई पीढ़ी है जो पत्रकारिता में आना चाहती है। खासतौर पे मुसलमान लड़कियां मैं कहूंगी क्योंकि वही अब तुम लोगों की पहचान बना दी गई है। तो मैं कहूंगी उनके लिए तुम तुम अब तक किसी और को तुम इंस्पिरेशन के तौर पर देखती होगी। लेकिन अब मैं ये कहूंगी पूरे दावे के साथ मैं कह सकती हूं कि तुम उन लोगों के लिए इंस्पिरेशन हो। हम तुम लोगों का बहुत-बहुत शुक्रिया। हम आपको देखती थी आपको सुना आपसे सीखा और आपसे हिम्मत मिली कि हां पत्रकारिता में इस तरीके से सवाल होते हैं। तमाम चीजें बिल्कुल छोटा सा मुझे पता है समय सीमा एक्सटेंड हो रही है। मैं मेंशन करना चाहूंगी। जब ये सब कुछ हुआ और मेरा वीडियो वायरल जिसमें मैंने वो पेन जो हमारे साथ किया हमारे स्कूल से लेकर कॉलेज मोहल्ला अड़ोस पड़ोस कभी हमें इस आइडेंटिटी पर कभी टारगेट नहीं हुआ मेरा बहुत अच्छा हमारा एक सेकुलर परिवार है हम सेकुलर सोच के लोग हैं कभी ऐसा महसूस नहीं किया जो जिन लोगों के साथ होता था मैं अब तक वो होती थी यार कैसे होता होगा मेरे दोस्तों के कॉल मुझे मेरे मुस्लिम दोस्तों से ज्यादा हिंदू दोस्तों के कॉल आए हैं जब पता चला है मैं उन सबको सबको बताना चाहती हूं। तुम लोगों ने मुझे हमेशा सेफ फील कराया है। ये पहले कैसे गंदे लोग मिले हैं। जिन जिन जो संविधान लगा के पुलिस स्टेशन में कर रहे थे। उन्हें खुद नहीं पता था वो क्या कर रहे थे। कितनी घटिया चीज उन्होंने की। उन्हें खुद पर शर्म आनी चाहिए। इस चीज को मैं कह रही थी। मेरे देश के तमाम अमन पसंद लोगों का, न्याय पसंद लोगों का जो हमारे साथ खड़े हैं जो हर तरीके से हमें समर्थन दे रहे हैं। उन सभी का तहे दिल से धन्यवाद। दुनिया से जो समर्थन हमें मिल रहा है पत्रकार बिरादरी से जो हमारी है उसे समर्थनों से धन्यवाद करती हूं और एक आखरी धन्यवाद जो उन्होंने अभी तक नहीं किया जो मुझे लगता है कि सबसे पहला हक उस इंसान का बनता है इस पर जो तीन दिन में जो कुछ मेरे पर बीता मैं अभी सिर्फ अपनी बात कर रही थी क्योंकि मैं उस सेंस में नहीं थी तो वो धन्यवाद मैं अपने दिल से अपने भाई का करती हूं क्योंकि मेरे भाई ने मुझे उस वक्त की कमी महसूस नहीं होने दी इस वक्त तक भी कि मेरे पापा दिल्ली से बाहर हैं। मेरे भाई ने निभाई और वो अभी भी खड़ा है और उसने कहा बेटा मैं उनको दिखा रही थी भाई क्या शाबाश बेटा क्या चल हट आम कैसे आमतौर पे मुस्लिम समाज में इतने सपोर्टिव भाई मुझे कोई इसमें शर्म नहीं है कि नहीं होते हैं मुस्लिम समाज में इतने सपोर्टिव केयरिंग भाई बट हमारा भाई ही स्टूड बाय अस ही डिड नॉट इवन लेट अस यू नो फील फॉर अ सिंगल मोमेंट कि यू आर ऑल अलोन योर पापा इज नॉट देयर। मैं हूं तुम्हारा गाइस। यस डट करके लड़ो। तुमने कुछ गलत नहीं। मुझे शायद लगा कि शायद लेकिन थैंक्स एवरीवन जिन तमाम उन पत्रकारों ने एक सेकंड का तमाम उन वकील बिरादरी और जो लोग वहां रात में तमाम उन पॉलिटिकल पार्टीज के विंग्स का आईवासी तमाम वहां पर लोग थे। सामाजिक संस्था के लोग बहुत थे। महिलाओं महिला संस्था के लोग सपोर्ट कर रहे हैं। हमारे साथ पूरी तरीके से कंधे से कंधे लगा के। आप सबका दिल से बहुत-बहुत शुक्रिया। और सबसेेंट बात मैं कहना चाहती हूं तुम्हारे YouTube का चैनल का नाम क्या है? अमन संदेश। तो आप लोग अमन संदेश को जरूर सब्सक्राइब करें। धन्यवाद मैम। नाम भी अमन संदेश है। अमन संदेश है। तो इससे पहले वो अमन अमन पसंद लोग हैं। अमन और चैन सुकून ही ये वो फैला रही थी। तो और वो इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट के तौर पर काम करती हैं। तो ये भी है कि शी इस ओपन टू वर्क। अभी जब वो ठीक हो जाए, सेहतमंद हो जाएं, सब कुछ सारी चीजें उनको न्याय है जब मिल जाए तो ओपन टू वर्क भी है। तो ये जो सपोर्ट है वो सपोर्ट से वर्बली ना हो बल्कि सपोर्ट इस तरह से भी हो क्योंकि जब कैमरे बंद हो जाते हैं, जब लाइट्स ऑफ हो जाती हैं, जब तमाम लोग चले जाते हैं तो फिर आप अकेले भी रह जाते हैं। तो उस अकेलेपन में सबसे ज्यादा जरूरत होती है सपोर्ट की। तो तब तक आप दोनों का सपोर्ट जो है वो सब लोग करें। मैं ये जरूर कहूंगी। दिल से धन्यवाद। थैंक यू सो मच। गुस्सा मैम नहीं गुस्सा अब कहूं या ये कहूं कि इस वक्त मेरी ताकत मेरी आवाज को और बुलंद करने वाली आस वो नाम वो चेहरा है क्योंकि अभी तक हम बाइट तो हमने बहुत दी लेकिन इतनी बारीकी से ये पहला पॉडकास्ट हम कर रहे हैं जिसमें हम बता पा रहे हैं कि हमने उस वक्त क्या फील किया था। इट वास अब्सोलुटली माय प्लेजर मुझे बहुत खुशी हुई। थैंक यू सो मच फॉर कमिंग और जब तक आप लोगों को इंसाफ नहीं मिलता है तब तक हम सब लड़ते रहेंगे। बिल्कुल। जय संविधान। जय संविधान। जय संविधान।
Companion article
It was not the beating that broke something in Shaheen Khan. It was a phone call. Inside a room on the upper floor of Saket police station in south Delhi, an officer who had just wrenched a phone out of her hand sat down to catch her breath. A call lit up the screen. The caller had been saved in the contacts as Mohammed Khan. Shaheen Khan says the officer's body changed before she said a word: she stood up, looked at the screen, and declared that the woman in front of her was Muslim, and that she would now be beaten harder. What had been, until that point, an unlawful detention escalated, in the sisters' telling, into a targeted assault carried out with religious slurs and a police baton sent for specifically for the purpose.
Shaheen Khan and her younger sister Nafeesa Khan, both journalists, gave their first detailed account of the incident on Naaz Network, a show hosted by Bushra Khanam Fahad, days after India's Independence Day celebrations in mid-August and roughly 48 hours after the episode itself. Their allegation is straightforward and severe: that Delhi Police officers detained them without cause, assaulted them inside a police station, and intensified the violence once they established, from a name on a screen, that the two women were Muslim. No FIR had been registered against any officer by the time the interview was recorded. What follows is drawn entirely from the sisters' own account, given at length and under emotional strain, of a day that began with a scooter ride home and ended in a locked room.
Shaheen Khan is a local reporter who covers Malviya Nagar, the south Delhi neighborhood where she and Nafeesa live. On the day in question, the two were riding back from the gym on a scooter, Nafeesa having promised her sister juice on the way home, when Shaheen noticed something odd: streets that were usually chaotic and poorly maintained had been suddenly cleaned and decorated. Asking around, she learned that the Delhi chief minister and Union Home Minister Amit Shah were arriving nearby to inaugurate a private facility, Max Hospital. As a local journalist, she felt the contrast was worth recording. Why, she asked in her video, could roads be cleared and hospitals dressed up only when senior officials were due, while government hospitals a few streets away sat in permanent neglect. She also raised, on camera, questions about women's safety, referencing an assault case then in the news, and asked why the Home Minister was not answering questions being pressed on him nationally about earlier police violence against young people.
Shaheen says she coordinated with traffic police as she recorded, explaining that she was a working journalist and being told, by officers who recognized her, to go ahead. She parked the scooter to the side of the road, away from the hospital premises, and shot a short video beside a cutout advertising the event, questioning why a private hospital was receiving so much official attention. Security guards at the hospital gate objected and tried to stop her from filming near the hoarding. Nafeesa, who had no idea what was about to happen, was sitting nearby. Shaheen insists neither of them ever entered the hospital grounds or obstructed the VIP movement; they were, in her words, standing on a public footpath doing a piece to camera, the way she does most days.
As the sisters were preparing to leave, police officers approached and tried to seize their phones. When the sisters asked what they had done wrong, they were told to get into a police vehicle. Shaheen says she repeatedly identified herself as a journalist and explained they were simply riding home; the police, she says, then called in female constables who grabbed the sisters' arms and legs and forced them into the van, touching them in a way Nafeesa objected to on the spot. What troubled Shaheen most, she says, was what happened next: the van did not head toward their home, despite passing directly by it. Twice, she recalls, their house came into view and she asked to be let out, and twice the vehicle continued on. Assured that they were being taken home "under Delhi Police's safety," the sisters instead found themselves outside Saket police station, a station that is not the one that covers their own neighborhood.
Shaheen says she initially stayed calm, reasoning that the police would ask a few questions, check the CCTV footage of the street, and let them go, given that as journalists they intended to cooperate fully. That calculation changed within minutes of walking into the station.
At the reception desk, an officer demanded the sisters hand over their phones. Shaheen refused, asking under what law or authority the demand was being made, and was told to wait in the lockup room, a request she also refused, pointing out that lockups are for people accused of crimes, not for journalists. The station's SHO, identified by the sisters as Dinesh Kumar, arrived and, in Shaheen's account, stared them down with open contempt before ordering that they be locked up and that enough FIR sections be applied against them that neither would recover. Other male officers reportedly mocked their profession, telling the sisters they had no idea what journalism even meant. One jab stung in particular: an officer sarcastically likened Nafeesa to P. T. Usha, the Olympic sprinter and a symbol of Indian women's achievement, as an insult rather than a compliment.
The confrontation escalated when a woman constable, whom the sisters describe as being dressed in pink, forcibly snatched Shaheen's phone at the open reception area, in view of the station's own CCTV cameras, and slapped both sisters in quick succession. Even then, according to Shaheen, the sisters kept resisting verbally, refusing to be intimidated, until the same officer sat down for a brief rest with the seized phone in hand. That was when the call from a contact saved as Mohammed Khan appeared on the screen. Shaheen Khan recalls the shift in a phrase she has repeated since: "Accha Muslim hai, Musalman hai." She says the officer immediately declared she would now hit them harder, and did.
Nafeesa Khan, even as blows continued to land, told the officer plainly that her religion was not a crime. "Main Musalman hoon. Kya yeh koi crime hai?" she says she asked. Her point, made repeatedly through the encounter, was that a police officer's duty under the Constitution makes no distinction between citizens on the basis of faith.
What the sisters describe next is a sustained assault lasting, by their estimate, between thirty and forty minutes. They say they were dragged up a staircase, thrown to the floor of an upper-floor room, and beaten with hands, feet and, eventually, a wooden baton that the assaulting officer sent a constable outside to fetch. Shaheen says the baton was brought down repeatedly on her legs, leaving visible swelling and discoloration, while Nafeesa was struck across her back and legs and had her hair pulled. Both allege they were called by communal slurs during the beating and repeatedly told that their profession and their questions had brought this on themselves. Requests for water were initially refused, with the officer reportedly telling them she would let them go thirsty instead, before a fellow constable eventually intervened with a glass of water partway through.
Shaheen recounts trying, at one point, to break free and reach the room of the officer she believed was in charge, only to find him unmoved by her pleas for help; he neither called off the assault nor asked questions, she says, and gestured for the constable holding her to take her back inside. Throughout the ordeal, she says, one line was repeated to them by several officers: that Delhi Police had "power," and that filming a minister and asking questions amounted to obstruction. As her own strength gave out, Shaheen says the only words she could form for hours afterward, in the police van, the hospital, and back at the station, were three: Muslim, Muslim, Muslim.
The assault eased only once Nafeesa's condition visibly worsened. According to the sisters, the SHO then reappeared, this time addressing them as "beta," offering them water, tea and a cold drink, and telling them not to worry, that they would be dropped home safely. Shaheen says she refused every offer and pointed to her sister's injuries, asking how a father figure could watch his children beaten over their religion and then offer refreshments minutes later. The SHO, in her account, responded only with repeated, noncommittal apologies, saying the department accepted it had erred, without committing to any accountability.
Left largely alone in the room with a single constable guarding the door, the sisters seized their moment when that officer was distracted by an incoming phone call. Nafeesa, unable to walk unaided, was half-carried by Shaheen down several flights of stairs. By the time they reached the reception area, Nafeesa collapsed. Shaheen says she was still denied use of a station phone to call home, and only after warning staff that they would be held responsible if her sister's condition worsened was she allowed a brief call. Family members and colleagues, alerted through the emergency helpline and word of mouth, began arriving at the station soon after.
Both sisters situated the incident within a longer pattern rather than treating it as an isolated failure. Shaheen recalled the anguish of watching, months earlier, Delhi Police crack down on young people and students on July 20, an episode she says came back to her vividly as she was being dragged up the station stairs. Nafeesa described being told, years earlier while reporting near Chandni Chowk, to go to Pakistan because of her name, an incident her former employer, 4 PM News Network, publicly backed her over at the time. Both invoked the state's continued detention of the journalist Siddique Kappan, who spent years in jail before his release, as well as the prolonged incarceration of the activists Umar Khalid, Sharjeel Imam and Gulfisha Fatima, as evidence that Muslim citizens who report or protest face disproportionate legal jeopardy in Delhi.
Shaheen also drew a direct line to an earlier professional milestone that, she believes, made her recognizable to at least one officer at the scene. Three months before the assault, she was the first reporter at the site of a fire in an illegal hotel in her area that killed 23 people, an episode during which her visibly distressed, on-camera criticism of the administration's slow emergency response went viral. She believes that reputation, as a reporter unafraid to confront local authorities, made her a known and disliked figure well before the day of the assault.
By the time of the interview, the sisters said, no First Information Report had been registered against any of the officers involved, despite Delhi Police having reportedly posted, and then deleted, a tweet describing the sisters as having violated VIP protocol and broken the law. Shaheen calls that deleted post a kind of confession: an acknowledgment, made and then hastily withdrawn, that officers were aware their conduct required a public justification. She and Nafeesa are demanding two concrete steps, an FIR against the officers involved and the immediate suspension of the SHO and the constable they say led the beating, arguing that the department's public statements of regret mean nothing without both.
The sisters used the interview to appeal directly up India's political chain: to Prime Minister Narendra Modi and Home Minister Amit Shah, under whose authority the Delhi force operates; to the Delhi chief minister, whom they noted governs a capital that promotes itself as a model of development while unable to secure basic accountability inside one of its own police stations; and to opposition leaders Rahul Gandhi and Priyanka Gandhi, whose past statements on standing up to power the sisters said had shaped their own resolve not to be intimidated. Congress MP Imran Pratapgarhi, who heads the party's minority affairs wing, met the sisters and pledged support, which they welcomed. They were notably sharper toward prominent women on the other side of the aisle, naming BJP leaders Smriti Irani and the actor-turned-parliamentarian Kangana Ranaut and asking why women who have positioned themselves as champions of women's dignity had said nothing. They leveled a similar charge at well-known television anchors Anjana Om Kashyap and Rubika Liyaquat, pointing out that fellow women journalists who regularly debate women's issues on air had not so much as acknowledged the assault.
The sisters come from what they describe as a progressive, education-minded Muslim family that never treated them differently for being daughters rather than sons; their father, they said, has always called them "beta," the term more commonly reserved for sons, and their mother, though not highly educated herself, is remembered by both as the source of their refusal to back down. Shaheen has worked as a reporter with 4 PM News Network for close to three years, covering her own neighborhood's civic failures, and says her editor, Sanjay Sharma, arrived at the police station still recovering from a fall himself and has since spoken publicly, including at a press conference, describing the assault as an attack on the profession and on a religious minority. Nafeesa previously worked at the same outlet before going independent; she now runs her own YouTube news channel, Aman Sandesh, meaning "message of peace," and describes herself, half in jest amid the interview's heavier moments, as open to work once she has recovered and received justice.
Two days after the assault, when the interview was recorded, Nafeesa was still visibly struggling to sit through the conversation, repeatedly straightening an injured leg on camera. Shaheen, describing her sister's composure throughout the ordeal, said watching Nafeesa in pain and still refusing to be silent was the moment she felt proudest and most afraid at once.
Stripped of its individual details, the sisters' account raises a question that goes well beyond one police station: whether officers of the state can, in practice, treat a citizen's religious identity as grounds for harsher treatment, and whether the political and media establishment will treat that as a scandal or as background noise. Shaheen Khan framed her own defiance in constitutional terms throughout the interview, insisting that no officer swearing an oath to the Constitution has the authority to identify a citizen's faith before deciding how much force to use. Both sisters said the viral videos of their ordeal, and the international press attention that followed, had already achieved something the assault was meant to prevent: pulling an episode designed to stay behind closed doors and locked cameras out into public view.
As the episode closed, host and guests together repeated a single phrase three times: Jai Samvidhan, hail the Constitution. It was less a slogan than a statement of the terms on which Shaheen Khan and Nafeesa Khan say they intend to keep working: as journalists, as sisters, and, they were each careful to say, without ever hiding being Muslim again.
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
3:25:59What does it mean to renew Islamic thought in an age of modernity? In this conversation, Dr. Waris Mazhari discusses his new book, Fikr-e-Islami Ki Tajdeed (Renewal/ Reconstruction of Islamic Thought), with Ali Javed. The conversation explores the diversity within the Islamic intellectual traditi…
Discussion
0Readers only · Comments are reviewed by the desk before they appear
The journalism is free for everyone — create a free account to join the discussion.