Nous Podcast· 01 Sept 2026· 1:07:40

Is Modi’s Aura Finally in Decline? | Author & Columnist Aakar Patel

In this episode of Nous, author and columnist Aakar Patel joins senior journalist Bushra Khanum for an incisive conversation on the Muslim question under Narendra Modi and the BJP. They examine the growing assault on the rights, security, and dignity of Muslims, the ideological and political logi…

Full Transcript

सबसे बड़ी जो हमारी एसेट है और सबसे बड़ी लायबिलिटी आरएसएस की है वो हमारी असलियतों की पपुलेशन है। यहूदियों की तादाद 1930 के जर्मनी में 1 फीसद से कम थी। क्या आप इसको एक एग्जाजरेशन मानते हैं जब लोग यह कहे कि हिंदू राष्ट्र तो ऑलरेडी है लेकिन इसका बस अब डिक्लेरेशन करना बाकी है। यहां पर आपके 200 मिलियन मुस्लिम्स हैं। आपके राष्ट्र के इतने बड़े पार्ट को डैमेज करना चाहोगे राष्ट्र डैमेज होगा। कैसे आप पिछले आंदोलनों से इस आंदोलन को आप कितना डिफरेंट मानते हैं? हमने किसान आंदोलन देखा। हमने सीए एनआरसी का आंदोलन देखा। भाजपा के लिए खासतौर से मोदी के लिए हिंदुत्व जो है वो एक मीन्स टू एन एंड नहीं वो दिल से मन से मानते हैं आखिर कब तक मुसलमान इसी तरीके से इंतजार करते रहेंगे क्योंकि फॉर ग्रांटेड तो उन्हें लिया जाता ही रहा है ये लोग वहां पर जाकर ये नहीं कह सकते कि हम मुसलमान की दुकान पर बुलडोजर चलाते हैं और वो लोग ढाल किसी और की ले जाते हैं वहां पर गांधी और नेहरू की मुसलमानों के जब हम रिप्रेजेंटेशन की बात करते हैं आकार तो क्या आपको नहीं लगता कि इसमें ना सिर्फ बीजेपी बल्कि जो जो अपोजिशन पार्टीज हैं वो भी मिज़रेबली फेल होती हैं। इतने जुल्म के बाद भी जो धीरज दिखाई है मुस्लिम्स ने 2014 के बाद वो शायद कोई और कम्युनिटी कोई और देश में दिखा ना पाती। जो अभी फिलहाल की हम हिंदुत्व की जो राजनीति हम देख रहे हैं इसमें आपको सबसे ज्यादा फायदा किसको आप होता हुआ देख रहे हैं? नरेंद्र मोदी, आरएसएस या बीजेपी एस अ पार्टी? जब मैं पत्रकार था फुल टाइम 20 साल पहले तो ज्यादातर अखबारात में आरएसएस और कम्युनलिज्म जो है वो नेगेटिव लफ्ज है। अगर मोदी का इतिहास अगर लिखा जाएगा तो कैसा होगा उनका उनका इतिहास क्या होंगे उनके अध्याय? सक्सेसफुल एट कम्युनलिज्म फेलियर एंड डेवलपमेंट। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। सवाल यह उठ रहा है कि जंतरमंतर के जजी प्रोटेस्ट के बाद क्या नरेंद्र मोदी अपने सबसे कमजोर वक्त से गुजर रहे हैं? क्या आरएसएस नरेंद्र मोदी का अल्टरनेटिव ढूंढ रही है? क्या अब राहुल गांधी की पॉलिटिक्स का हम एक उरूज होता हुआ देख रहे हैं और क्या वाकई में 2029 से पहले यानी कि अगले जनरल इलेक्शन से पहले क्या हम नया प्रधानमंत्री देखेंगे जो हिंदुत्व की पूरी पॉलिटिक्स है जिसको 12 साल में हमने परवान चढ़ते हुए देखा क्या ये उसका सबसे कमजोर लम्हा है क्या डर पूरी तरीके से लोगों के बीच से खत्म हो गया है और क्या ये हर किसी के लिए सेम है या फिर मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों और ईसाइयों के लिए इसका मतलब बिल्कुल अलग है। आज इन्हीं तमाम चीजों पर हम बात करेंगे। मोदी के 25 साल चीफ मिनिस्टर रहते हुए और प्रधानमंत्री रहते हुए वो किस तरह के एक नेता रहे। किस तरह से गुजरात मॉडल को उन्होंने देश के सामने पेश किया और बेचा और बेवकूफ बनाया। इस सबके इर्द-गिर्द आरएसएस की पॉलिटिक्स, हिंदुत्व पॉलिटिक्स इस सबके बारे में आज हम बात करने जा रहे हैं डिटेल में। मेरे साथ मौजूद हैं आकार पटेल जी जिनका लगभग 30 साल का पत्रकारिता का अनुभव है। कई किताबें उन्होंने लिखी हैं। करली सर्विंग एस चेयर ऑफ एमस्टी इंटरनेशनल टू। आकार वेलकम टू नाउ नेटवर्क। थैंक यू सो मच फॉर योर टाइम। शुक्रिया आपका। मेरा पहला सवाल आकार आपसे यही होगा कि जजी प्रोटेस्ट को आपने भी बहुत क्लोजली ऑब्जर्व किया। मैं आपका तमाम सोशल मीडिया देख रही थी। अ और क्या आपको भी ये लग रहा है जो बातें कही जा रही है कि अब बहुत होपफुल टाइम्स है हमारे सामने लोगों के दिल से डर निकल गया है ये मोदी का सबसे वीक अभी स्टेज है और क्या आरएसएस उनका कोई अल्टरनेटिव ढूंढ रहा है आपको भी क्या ऐसा लग रहा है कैसे देख रहे हैं आप फिलहाल मोदी के इस एरा को खासतौर पे इस साल को आपका जो आखिरी सवाल है उसको मैं पहले लेता हूं मैं नहीं मानता ये के कि आरएसएस ढूंढ रही है किसी को मोदी की जगह। इसकी वजह यह है कि मोदी की जो ताकत है वो आरएसएस से नहीं निकलती। वो उनकी खुद की जो लोकप्रियता है वहां से आती है और वो शायद एक अकेले भाजपा के नेता हैं जो आरएसएस से बड़े हैं। आप देखें तो उनकी जो आयु है वो मोहन भागवत जितने हैं बड़े। लेकिन उनके जो आरएसएस में आपको जो एक फॉर्मल ट्रेनिंग लेनी होती है उसके लिए आपको आपके सीनियर के घर रहना होता है। तो जो मोदी के जो सीनियर थे मधुकर राव भागवत वो मोहन भागवत के वालिद थे। तो बहुत दशकों से जानते हैं वह आरएसएस नेता को और मेरा यह मानना है कि मोदी के जाने के बाद जो है आरएसएस अपना हाथ दिखाएगी ना कि उनके रहते हुए। जो आपका पहला प्रश्न था उसमें मेरा यह मानना है कि मुझे आपसे सहमति रखनी होगी कि यह मोदी का वीकेस्ट पॉइंट है और इसलिए नहीं कि माजी में कोई मुश्किलात नहीं आई उन पर आई है। लेकिन जैसा कि हमने देखा कि 2024 में उनकी सीटें गिर गई। वो जो उनकी जो जो बहुमत था भाजपा का वो गया लेकिन जो छवि थी उनकी वो इंटैक्ट थी जो 12 साल वहां पर थे वो गुजरात में तब भी जो 12 साल यहां पर रहे हैं दिल्ली में इस वक्त तक इतने खुलेआम जो लफ्जों का इस्तेमाल किया यंगस्टरों ने जेंजी ने मोदी के लिए यह पहली दफा हमें सुनाई दिए यह लफज़। यह इतनी कड़वाहट जो है एक कंटेंप्ट जो है उनके लिए वो दिखाई नहीं दी थी हमें। तो ये मेरा मानना है कि सबसे बड़ी मुश्किलात है उनकी के इस इस ढंग की इस ढंग का ऑपोजिशन जो कि एनर्जेटिक हो जो कि वाइट बेस्ड हो जो कि तैयार हो कि वो रास्ते पर आ जाए। ऐसी चीज उन्होंने पहले नहीं देखी और यही वजह है कि आज जो कोर्ट में जो हुआ आज आज सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह कहा कि जो जो एफआईआर दर्ज हुए थे उस दिन जब कॉकरोच जनता पार्टी और बाकी लोग शामिल होकर पार्लियामेंट की ओर जा रहे थे उन सबको हटाया जाए और मेरा यह नहीं मानना कि और कोई भी पक्ष कोई भी पार्टी कोई भी दूसरा जनरेशन यह कर पाता कि सरकार की एक पीछे हट ह्यूमिलिएटिंग पीछे हट पब्लिक पीछे हट करवा पाती और यही है वजह कि मैं ये मानता हूं कि आपकी बात सही है और ये वीकेस्ट पॉइंट है उनका जी लेकिन आका मेरा सवाल आपसे अगला ये है कि आखिर यहां तक मोदी पहुंचे कैसे? आप देखें इंस्टिट्यूशन उनके कब्जे में है। पूरा मीडिया जिसको सो कॉल्ड मिनिस्ट्री मीडिया कहा जाता है वह उनके कब्जे में है। सोशल मीडिया से लेकर हर जगह वो एक नैरेटिव अपना बना रहे हैं। विष्णु का अवतार 56 इंच विश्व गुरु नॉन बायोलॉजिकल मतलब जितनी उपाधियां हो सकती है वो सब उन्होंने अपने आप को दी हुई है। लेकिन नाउ कम टू यू नो 2026 जुलाई जो जितने जिस तरह के अल्फाज़ का इस्तेमाल उनके लिए किया गया है। मुझे नहीं लगता आजाद हिंदुस्तान में किसी प्रधानमंत्री के लिए इस तरह के अल्फाज का इस्तेमाल किया गया था और एक ऐसे प्रधानमंत्री ने जो अपने आप को नेहरू से इंदिरा गांधी से इन सब से कंपेयर करते रहे और उन्होंने तमाम इंस्टीट्यूशन का इस्तेमाल अगर किया सबसे ज्यादा तो अपनी इमेज बिल्डिंग के लिए किया और ये वो बच्चे हैं जो मिडिल क्लास अपर मिडिल क्लास हिंदू कम्युनिटी से आते हैं जिनके मां-बाप ये माना जाता है कि बेसिकली दे आर ट्रेडिशनली बीजेपी वोटर्स तो क्यों आपको लगता है कि अचानक ये परिस्थितियां कैसे कैसे और क्यों पैदा हुई है और क्या आप इसको मोमेंट्री मान रहे हैं या आप इसको लॉन्ग टर्म मान रहे हैं? यह मोमेंट्री नहीं है। ये रहेगा और वजह इसकी दो है। एक तो पहली ये के अमरसन की एक लाइन है कि एव्री हीरो बिकम्स अ मोर एट लास्ट के जब आप स्क्रीन पर इतने सालों तक रहोगे। एक ऐसा वक्त आएगा कि लोगों को लगेगा कि यह एक ही चीज बार-बार दोहरा रहा है। वह तो वो एक है के उनका बोर होने का समय आ चुका है। दूसरा यह कि प्रधानमंत्री के पद पर 12 सालों तक रहना ये एक बड़ा लंबा अरसा है। आप 12 साल देखें कोई और लीडर को देखें तो हिटलर जो है वो चांसलर बनते हैं जर्मनी के सन 33 में और 12 सालों के बाद जितना भी उन्होंने काम किया दुष्कर्म किया कुकर्म किया सब कुछ हो चुका था तब तक जो जर्मनी के जो हम हाईवे हैं ऑटोबान कहते हैं जिनको वो बनाए उन्होंने जंग की उन्होंने फ्रांस को जीता रूस के ऊपर उन्होंने धावा बोला। जंग हार गए वो और मर गए। 12 साल बहुत ही लंबा समय है। हम नेहरू को देखें तो 47 से लेकर 12 साल को हम जोड़े तो हम पहुंचेंगे 1960 तक। तो जितने भी इंस्टिटश हम जोड़ते हैं नेहरू के साथ या वो साइंटिफिक इंस्टीटश हो या फिर वो कल्चरल इंस्टीटश हो या तो फिर वो एजुकेशनल इंस्टीटश हो जो आज भी खड़े हैं वो तब तक वो सब बन चुके थे तो आपने 12 सालों में किया क्या आपने दिखाया क्या वो सामने है हमारे और मुश्किल यह है कि 12 सालों के बाद आप छिप नहीं सकते जो कुछ आपको करना था इसी दौरे में आपको करना था। खासतौर पर उन दो लोकसभाओं में जहां पर आपके पास पूर्ण बहुमत थी जहां जहां पे आपके पास 303 एमपी थे आपके 282 थे एमपी आपके 2014 में तो ये 13वें साल में ये फिर कहना के मैं आगे कुछ करूंगा। आप धैर्य रख रहे यह यह नहीं होगा और क्योंकि मेरा यह भी मानना है कि उनकी जो करतूत है वो हमें इस मुकाम पर लाई है कि जजी आज रास्ते पर खड़ा है कि हमारा फ्यूचर नहीं है कोई। मेरी समझ ये यहां पर यह है कि जो प्रोटेस्ट हुआ ना कि सिर्फ नीट के लिए हुआ। ये उनके मुस्तकबिल के लिए हुआ। वो लोग मानते हैं कि उनका कोई फ्यूचर नहीं है आज। और अगर इतनी बड़ी तादाद में इतने बड़े देश में अगर यह सेंटीमेंट रहे तो फिर पीएम पर तो मुश्किलात आएगी ही और वो आ चुकी है। ये ये रहेगा उन पर ये टेंपरेरी फ नहीं है। ओके। कैसे आप पिछले आंदोलनों से इस आंदोलन को आप कितना डिफरेंट मानते हैं? हमने किसान आंदोलन देखा। हमने सीए एनआरसी का आंदोलन देखा। हमने तमाम वो मैं उन बड़े आंदोलनों की बात कर रही हूं जहां सरकार झुकी है। लेकिन पहली बार सरकार की अकाउंटेबिलिटी तय हुई और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ। क्या आप इसको ये मान रहे हैं कि ये जो हिंदू मुस्लिम की राजनीति की जो कम्युनल हेट्रिड जो 12 सालों में पूरी तरीके से फैलाई गई जो सोशल फैब्रिक देश का खराब किया गया। क्या आप उसको वापस और रिपेयर होता देख रहे हैं इस आंदोलन के बाद या आप उनको दो अलग-अलग खांचों में देखते हैं कि ये चीजें अलग है और ये जो इशूज़ हैं ये अलग हैं। नहीं देखिए ये जो दक्षिण एशिया है अ बरस यहां के पानी में एक्सट्रीमिज्म नहीं है तो अगर आपके ऊपर सरकार कुछ थोपे ना या ठोपना बंद कर दे तो नॉर्मल सी लौट आएगी। यह बात सही है कि इन 12 सालों में जो हुआ है इंस्टीटश के साथ, सुप्रीम कोर्ट के साथ, मीडिया के साथ वह कुछ हद तक रहेगा। लेकिन जो हमारी नेचुरल स्टेट जो जो नेचुरल स्टेट है हमारा बांग्लादेश का, पाकिस्तान का, भारत का, लंका का, नेपाल का वो एक्सट्रीमिस्ट स्टेट नहीं है। और मैं यह मानता हूं कि इनके जाने के बाद इनसे मुराद भाजपा नॉर्मल सी आएगी। जहां तक आपका पहला सवाल है कुछ चीजें ऐसी है जो कॉमन है ये ये तीनों आंदोलन में और कुछ चीजों का फर्क है। कॉमन चीज यह है कि हमें यह दिखाई देता है कि भारत में जभी भी कोई बड़े नंबर लेकर रस्ते पर आते हैं कोई लोग या वो खा मुसलमान औरतें हो जिन्होंने सीए एनआरसी के प्रोटेस्ट में लीड दिखाई या फिर वो सिख हो जो कि फार्मर प्रोटेस्ट के के आगे थे या फिर एजेंसी हो जब आप मोबिलाइज होकर खड़े हो जाते हैं बड़ी तादाद में सरकार को पीछे हट करनी होगी तो आज हमारे साथ एनआरसी इस वजह से नहीं है कि वो जो मुस्लिम औरतों ने किया 2019 2020 में वो सक्सेसफुल रहा। ठीक उसी तरीके से मोदी को फार्म लॉस जो है वो पीछे लेने पड़े। फर्क यहां पर यह है कि यह पहली दफा अकाउंटेबिलिटी का प्रिंसिपल माना है सरकार ने। सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान को निकालकर हम सबसे यह कहा है और खुद माना है कि जब मैं कोई गलती करता हूं मुझे उसको भुगतना होगा। और भुगतान जब आप करते हैं तो आपको याद आएगा फ्यूचर में तो आप शायद वह मिस्टेक फिर से ना करें। अकाउंटेबिलिटी का प्रिंसिपल यह है ना कि सिर्फ किसी को पनिश करना। यह कैबिनेट अपने आप से कह रही है कि हमने भूल की। हम अपने आप को एक कोड़ा मार रहे हैं और इसकी याद रहेगी हमें कि हम फिर से यह काम ना करें। तो अकाउंटेबिलिटी का मोदी ने टीवी पर आकर माफी मांगी थी किसानों से हम और जो एनआरसी का लॉ है वो तो लागू ही नहीं हुआ बाद में। पर यह जो अकाउंटेबिलिटी का मसला है धर्मेंद्र प्रधान कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। वो 2014 से मंत्री रहे। और दूसरा यह कि जब मोदी एक ऐसे लीडर हैं जिनको लोग राजा मानते हैं और वह सरकार यह हमें दिखलाना चाहती है कि यह एक वन मैन शो है और कोई मिनिस्टर का कोई यहां पर कोईेंस नहीं है यहां पर। मेरी 56 इंच की छाती किसकी है? मेरी है ना कि मेरे मंत्रियों की। एक ऐसी शख्सियत राजा से जब आप उसके चमचोई को फोर्सबली फोर्सफुली निकाल दे तो यह एक ठेस पहुंचती है। तो ये एक नई बात है जो पहले के जो दो प्रोटेस्ट थे बड़े सीएए के और फार्म लॉस के ये चीज नहीं कर पाए। पीछे हट हुई लेकिन जो प्रिंसिपल है अकाउंटेबिलिटी का यह हमें यहां पर पहली दफा दिखता है। डर जो खत्म हुआ है लोगों के बीच में पूरे 12 साल और उससे पहले भी मोदी की पूरी राजनीति डर की ही राजनीति रही है। बीजेपी और आरएसएस की भी राजनीति डर की ही राजनीति रही है। डर के लोगों को खामोश कराया जाए। उनको जेलों में डाला जाए। उनके तमाम जरूरी सवाल जो है वो पीछे हट जाए। कोई सरकार की अकाउंटेबिलिटी ना हो। वो डेमोक्रेसी का क्या हाल है वो हम देख रहे हैं। तमाम इंस्टिटशंस का क्या हाल है वो हम देख रहे हैं। ये डर किस तरह से खत्म हुआ है? आकाश जी मेरे मेरे जेहन में ये लगातार यह सवाल आता है कि अचानक से ऐसा क्या हुआ है कि यह डर जो है वो खत्म हुआ है। यह तो वो हैं जिनके पेरेंट्स ने लगातार यह बताया होगा कि मोदी जो है हम प्रजा हैं और मोदी जी राजा है जिस तरह से यू राइटली जस्ट मेंशंड तो ये ये ऐसे अचानक से जो बदलाव है ये अचानक देखते हैं या आपको लगता है ये धीरे-धीरे ये पनप रहा था और अचानक से हमने इसको सरफेस पर देखा है और क्या ये जो कंडीशन फिलहाल आप बदलती देख रहे हैं क्या आप ये मुसलमानों के लिए भी बदलते देख रहे हैं क्या आपको लग रहा है कि मुसलमानों के लिए भी सिचुएशंस बदल रही हैं क्योंकि आप देखें अभी भी सरकार का एजेंडा तो वही है यूसीसी से लेकर घुसपैठियों से लेकर एसआईआर और उनकी नागरिकता बुलडोजर लिंचिंग वो तमाम सवाल तो अभी भी उधर के उधर ही हैं। मेरी समझ मुझे यह कहती है कि यह अचानक सी चीज है। ये एक ऐसा तबका है हमारे समाज का जिसको ना तो सरकार समझती है ना तो मेरे जैसे मेरी अ उम्र के जो लोग हैं वो समझते हैं। जो करना है कर लो। ये ये चीज लेकर मन में जब रास्ते पर निकलते हैं। इतने सारे लोग यह मैं नहीं मानता कि यह धीरे-धीरे से हुआ। यह अचानक सा आ चुका हम पर और यह एक जनरेशनल शिफ्ट है। यह लोग रुकने को नहीं तैयार सरकार को अपने वायदे पूरे करने के लिए। इनको चेंज अभी चाहिए और ये एक जनरेशनल चीज है। क्योंकि हमारे यहां पेशेंस है। इतनी गुर्बत इस देश में सदियों से है। हमने कोई यहां पर रेवोल्यूशन नहीं देखा। लोगों को खाने को नहीं। लेकिन हम उनको रास्ते पर नहीं देखते। यह जनरेशन थमने को नहीं तैयार, रुकने को नहीं तैयार। और इस चीज में धीरज नहीं है उनके पास। तो ये एक एक चीज है। क्या यही चीज मुसलमान या और जो हैं हमारे अकलियतें उनके साथ होगा? मैं नहीं जानता। लेकिन आपने जहां तक कहा कि उनका जो एजेंडा है वह अभी जारी है। यह मैं मानता हूं कि यह जारी रहेगा और क्योंकि हम देखते हैं कि भाजपा के लिए खासतौर से मोदी के लिए हिंदुत्व जो है वो एक मींस टू एन एंड नहीं है। वो उसका इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं कि वो सत्ता में रहे। वो वो दिल से मन से मानते हैं। इसमें जो हिंदुत्व की आईडियोलॉजी है जो कहती है कि जो लोग भारत को अपनी पुण्य भूमि ना माने वो लोग हिंदू नहीं है औरकि हिंदू लफ्ज जो है वो इंडिया सिंधु से जुड़ा है वो लोग भारतीय नहीं है। जो यह जो सावरकर की जो फ्रेमिंग है 1920 की इसमें यह मानते हैं यह लोग यह लोग की मान्यता है कि यहां पे ईसाई और मुसलमान भले ही तुम अजमेर शरीफ क्यों ना जाओ भले ही तुम अपने लोकल नेबरहुड के चर्च में क्यों ना जाओ मैं यही मानकर चलूंगा कि तुम्हारी जो लॉयल्टी है वो मक्का के साथ है या जेरूसलम के साथ है या पोप के साथ है ये सही हो ना हो और जब तक मेरे मेरे मन में ये रहेगा मेरे दिल में ये रहेगा मेरा जो पॉलिटिक्स है वो इसी बुनियाद पर खड़ा होगा देखिए कोई नहीं कहता भारत भाजपा का जो समर्थक है कि इकोनॉमिकली सभी चीजें ठीक है वो कोई भी नहीं कहेगा ये सुरजीत भल्ला भी नहीं कहेगा सारे के सारे जो उनके चमचे हैं जो थे उनके साथ इकोनॉमिक एडवाइज़री कमेटी में एक भी शख्स ये नहीं कहेगा लेकिन सब इस चीज से सेटिस्फाइड है पूर्ण रूप से एक कम्युनल एजेंडा जिस तरीके से मोदी और मोदी की सरकार ने और भाजपा की राज्य सरकार ने इंप्लीमेंट किया है 2014 के बाद लेकिन खासतौर से 2015 के बाद जब पहले बीफ के लॉज़ आए 2018 में लव जिहाद के लॉज़ आए पहली दफा। इन चीजों से वो लोग फुल्ली सेटिस्फाइड और इस वजह से मेरा यह मानना है कि यह चीज जाएगी नहीं। यह बनी रहेगी क्योंकि यह दिल में है उनके। हम तो फिर मोहन भागवत को न्यूयॉर्क में जाकर ये क्यों कहना पड़ रहा है कि जो लोग हिंदू ये मानते हैं कि मुसलमान यहां पर ना रहे वो हिंदू नहीं है। ये क्या वहां मजबूरी थी उनकी कहना या फिर कोई आप शिफ्ट या कोई चेंज देख रहे हैं? नहीं कोई शिफ्ट नहीं है। देखिए एक एक इनफीरियरिटी कॉम्प्लेक्स है बहुत से भारतीयों में लेकिन इन लोगों में खासतौर से ये लोग चाहते हैं कि इनको वैलिडेशन मिले पश्चिम से कि पश्चिम के जो देश हैं वो वैलिडेट करें कि भारत एक विश्वुरु है। हमारे जैसा देश है। गणतंत्र है। एक रिपब्लिक है। अब यह लोग वहां पर जाकर यह नहीं कह सकते कि हम मुसलमान की दुकान पर बुलडोजर चलाते हैं। यह नहीं कहेंगे कि हमने मुसलमानों को सिर्फ अलग रखा है सीएए से। यह नहीं कहेंगे कि हम यहां पर एसआईआर कर रहे हैं। धावा बोल रहे हैं हम लोग मुसलमान के वोटर रोल पर। जो कि सही है ये चीज कर रहे हैं वो लोग। पर वो लोग ढाल किसी और की ले जाते हैं वहां पर गांधी और नेहरू की। ये लोग सावरकर की यहां पर जय जयकार करते हैं। वहां पर जाकर करें। नहीं होगा उनसे क्योंकि यह एक यूनिवर्सल सेंटीमेंट नहीं है जो कि जो हिंदू धर्म की जो सबसे खूबसूरत चीजें हैं वो लेकर वहां पर जाकर बोलते हैं वो सर्वधर्म समभाव वसुधैव कुटुंबकम यहां पर करते नहीं है वो औरकि यह ढकोसला है उनका क्योंकि हिपोक्रेट है वो उनको वहां जाकर कुछ और बोलना पड़ता है यह सिर्फ एक्सेप्टेबिलिटी के लिए क्योंकि वो कॉन्फिडेंस नहीं है उनमें कि वहां जाकर सच बोले कि हम हम जो मानते हैं हम जो चाहते हैं वो ये नहीं है वो वो है और यहां पर वो इतने साफ तरीके से उन्होंने दिखा दिया है कि दुनिया मानने को नहीं तैयार आप जाकर वहां पर कुछ भी बकवास करें लोग ने आपकी करतूतें देखी हैं क्योंकि ये 13वा साल चल रहा है उनका तो जब जो लोग या तो एकेडेमिक हो या तो मीडिया वाले हो फॉरेन कॉरेस्पोंडेंट्स हो और फॉरेन के लीडर तो है ही डिप्लोमेटिक कोर जो है किसी देश का दिल्ली में बेंगलुरु में बंबई में इस वजह से है कि वो रिपोर्ट रिपोर्ट भेजें वहां ना कि सिर्फ वीजा के स्टैंप लगाए। वह अपनी सरकार को रिपोर्ट भेजते हैं कि भारत में हो क्या रहा है। और वो वो रिपोर्ट बिल्कुल साफ है कि वो सीए यहां पर वो लोग सीएए करते हैं। यहां पर वो लोग बुलडोजर करते हैं। वहां जाकर आप कुछ भी जाके बोल दें वसुदेव कुटुंबकम के बारे में। कैसे मानेंगे लोग? लेकिन क्योंकि आपके पास वो कॉन्फिडेंस नहीं है कि आप सच बताएं। आप शर्मनाक है। एक एक हद तक आपको शर्म है कि ये चीजें मैं यहां पर बोल नहीं सकता क्योंकि ये ऑडियंस अलग है। जो भारतीय लोग भागवत के रैली में थे उनके लिए सही था ये लेकिन वहां पर मीडिया भी होगी शायद थोड़ी बहुत हम उनके लिए और अंग्रेजी में क्यों बोले भागवत वहां पर अब यहां पर तो नहीं बोलते हम यहां तो भाषा का ज्ञान देते हैं। बिल्कुल वो इसलिए कि उनका जो संदेशा था वो जो लोकल गुड थे वहां पर भारतीय लोग थे उन उनके लिए नहीं था उतना जो वहां के लोग थे उनके लिए था आपको ये लग रहा है कि जो हिंदुत्व की जो पॉलिटिक्स है आरएसएस की जो आईडियोलॉजी है इट्स अ इट्स अ फेल आईडियोलॉजी क्योंकि अगर आप 100 साल के बाद भी अगर आपको बाहर मुल्कों में जाकर उसको जस्टिफाई करना पड़े आपको बताना पड़े और उसके बाद भी लोग बाहर बाहर खड़े होकर कहे कि नहीं ये तो इंडियन नाटजीस है तो और 100 साल के बाद भी आपको ये बताना पड़ रहा है कि हम वो नहीं है जो आप हमें सोचते हैं। हम तो ये हैं तो क्या आपको नहीं लगता कि ये एक फेल्ड आईडियोलॉजी है और क्या हिंदुस्तान में भी आपको लग रहा है उस तरह की आवाजें उठ रही हैं क्या इन 100 सालों में खासतौर पे 13 सालों में जो मोदी का ये एक काल रहा है क्या लोगों के जहन को वो इस तरह से बदल पाए हैं कि हम ये कहें कि उनके ज़हन में ये आ गया है क्योंकि घर-घर तक आरएसएस पहुंचा हुआ है इसमें तो कोई दो राय नहीं है| क्या वो ज़हन को भी लोगों के बदल पाए हैं? एक तरीके से यह नाकाम रही है आइडियोलॉजी और एक तरीके से सफल हुई है। अ आप देखें तो 2008 तक दुनिया में सिर्फ एक हिंदू राष्ट्र था और वो था नेपाल। नेपाल के आइन में दो ऐसी चीजें थी जो उसे हिंदू राष्ट्र बनाती थी। पहली यह के जो एग्जीक्यूटिव पावर है जो सरकार है उसका सरभरा एक क्षत्रिय राजा होगा जो क्षेत्रीय डायनेस्टी के जो किंग्स थे उनके वो दूसरा ये कि इस राजा के कोर्ट में एक मूल पुरोहित होगा एक ब्राह्मण जो के राजा को बताएगा के ठीक से काम कैसे लेना है तो जैसा कि हमारी अस्मृतियों में लिखा गया है। एक क्षत्रिय जो है राजनेता काम उस वर्ग का है और जो ज्ञान देना है वो इस वर्ग का है। तो ये दो चीजें थी। लेकिन नेपाल के कानूनों में कहीं पर यह नहीं था कि शूद्र जो हैं वो पढ़ और लिख नहीं सकते। औरतें जो हैं वो काम नहीं कर सकती या वो पढ़ लिख नहीं सकती। यह चीजें भी लिखी है हमारी अस्मितियों में। लेकिन 2026 की दुनिया में आप यह काम नहीं कर पाएंगे। तो यहां तक सीमित था वो हिंदू राष्ट्र। अब देखें पाकिस्तान में यही मुश्किलात थी। ईरान जो है वह खाड़ी में एक अकेला देश है जो गणतंत्र है और एक अकेला देश है जो सच के मायने में एक थियोक्रेटिक स्टेट है। कैसे? क्योंकि और कोई कम्युनिटी में वहां पर एक वर्टिकल हायरार्की नहीं है कि जहां पर सबसे ऊपर ग्रैंड आया बैठते हैं। उनके नीचे फिर जो है वो जूनियर आयातला होते हैं वगैरह वगैरह वगैरह। तो आपकी जब जब आपका देश आपके देश के जो कवानीन है वह सिर्फ एक ही चीज से निकलते हैं शिया 12 वर्ष शियाइड थियोलॉजी से तो आप उसको बना पाएंगे। पाकिस्तान में मुश्किलात यह थी कि पाकिस्तान की जो पपुलेशन है वह भारत की तरह एक डवर्स पपुलेशन है। बहुत से लोग ज्यादातर लोग सुन्नी है लेकिन सुन्नियों में भी फर्क है। ईरान की तरह ऐसा वर्टिकल कोई स्ट्रक्चर नहीं था उनका जिसकी टोच के ऊपर सिर्फ एक शख्स हो। जैसा कि खामिनी है यहां पर। तो यही वजह है कि पाकिस्तान भी नेपाल की तरह पूर्ण रूप से एक अह थियोक्रेटिक स्टेट या या फेथ बेस स्टेट नहीं बन पाया। आप लाहौर में जाकर, कराची में जाकर, ढाका में जाकर, पेशावर में जाकर आप बोलोगे 420, 302, 144 लोग जानेंगे कि ये क्या है और इस वजह से जानेंगे ये क्या है कि जो कानून है वहां वहां के बिल्कुल हमारे जैसे ही हैं जो 150 साल में बदले नहीं गए। आरएसएस की मुश्किलात यह है कि नेपाल को देखते हुए जब आप सत्ता में आ गए आप हिंदू राष्ट्र बनाओगे कैसे? राष्ट्र कोई राष्ट्र को कि एक कोई बना हुआ राष्ट्र हो उसको आपको जो बदलना है तो वो सिर्फ कानून के जरिए होता है। कौन से कानून आप लाएंगे जिसकी बुनियाद से यह एक हिंदू राष्ट्र बनेगा। एक चीज हम कर पाएंगे जो कि सुब्रमण्यम स्वामी ने कही थी कुछ सालों पहले कि मुसलमान को हमें डिसेंफ्रेंचाइज कर देना है कि मुसलमानों को वोट नहीं देना यहां पर जो कि आज जो चीज आज एसआईआर के जरिए हो रही है शायद एक छोटे पैमाने पर लेकिन स्वामी चाहते थे कि ये एब्सोल्यूट हो के मुसलमान को वोट ही ना दे तो शायद आपका एक हिंदू राष्ट्र बन पाएगा लेकिन एक तो यह कि आप देखें सबसे बड़ी जो हमारी एसेट है और सबसे बड़ी लायबिलिटी आरएसएस की है वो हमारी असलियतों की पपुलेशन है। यहूदियों की तादाद 1930 के जर्मनी में 1 फीसद से कम थी। यहां पर आपके 200 मिलियन मुस्लिम्स हैं। आपके राष्ट्र के इतने बड़े पार्ट को डैमेज करना चाहोगे राष्ट्र डैमेज होगा। यह सिर्फ कुछ लोगों को पर्सक्यूट करोगे तो वह पर्सक्यूटेड रहेंगे। यह चीज नहीं है। तो यह फेलियर का हिस्सा है। यह सक्सेस जो है कि क्योंकि एक प्योर या परफेक्ट हिंदू राष्ट्र नहीं बन सकता। मकसद यही है कि मैं सब समय लगा रहा हूं मुसलमान के पीछे। या तो एक्सक्लूजनरी तौर पर। आज पहली दफा भारत में देखें आप और कुछ साल हो चुके हैं इसको कि यूनियन के कैबिनेट में कोई मुस्लिम नहीं है। भारत के जो 240 मेंबर हैं जो 303 थे पहले जो 282 थे उससे पहले एक भी मुस्लिम नहीं। भाजपा के जो राज्यसभा के लगभग 95 जितने मेंबर हैं एक भी मुस्लिम नहीं। 1000 जितने उनके जो एमएलए हैं वहां पर भी नहीं। तो यह एक एक चीज यह है कि अबब्सोल्यूट एक्सक्लूजन दूसरा यह कि आए दिन मैं पॉलिसी या कानून लाऊं कि मुसलमान जो है यहां पर रह ना सके वो अपनी चीज खा ना सके जिससे प्यार करे उससे के से शादी ना कर पाए। हम यही चीज में ये लोग अलगे रहे हैं और लगे रहेंगे क्योंकि यही है हिंदू राष्ट्र का अर्थ यही है कि जब आप सत्ता में आ जाए ऐसे कानून लाएं ऐसी पॉलिसियां लाएं जिनकी बुनियाद पर आप सब समय पर्सक्यूशन में लगे रहें तो सक्सेस यहां पर है। ओके। क्या आप इसको एक एग्जाजरेशन मानते हैं जब लोग ये कहें कि हिंदू राष्ट्र तो ऑलरेडी है लेकिन इसका बस अब डिक्लेरेशन करना बाकी है और वो एग्जांपल्स देते हैं कि जैसे दलितों के साथ जो हो रहा है आदिवासियों या फिर क्रिश्चियंस के साथ जो हो रहा है और सबसे बड़े पैमाने पर मुसलमानों के साथ जो हो रहा है उनका डी ह्यूमनाइजेशन उनको एक परमानेंट दुश्मन बना दिया गया है। जहां पर उनका जो पड़ोसी है वो ये मान सकता है कि हां ये आतंकवादी हो सकते हैं। ये इसी तरह के लोग हैं। ये बेटी लेकर भाग सकते हैं। ये हमारे साथ इस तरह की कोई भी हरकत कर सकते हैं। अगर 100 से ज्यादा स्पीचेस ऐसी हो नरेंद्र मोदी की जो हेट स्पीचेस मानी जाए। पार्लियामेंट से अगर हेट नॉर्मल हो जाए। अगर लाल किले इंडिपेंडेंस डे की स्पीच से अगर घुसपैठिए जैसे शब्द का इस्तेमाल किया जाए और सीधे तौर पर मुसलमानों को एक तरह से वहां से दूसरे तरीका का आवाहन किया जाए तो क्या आपको लगता है कि जब जब कुछ एक्सपर्ट्स ये कहते हैं कि हिंदू राष्ट्र इस ऑलरेडी देयर और उसका डिक्लेरेशन होना बाकी है तो आप इसको एकजुरेशन मानते हैं या आपको लगता है इट्स इन दी फाइनल स्टेज। इससे और कोई फाइनल स्टेज आने नहीं वाला जो है वो यही है। ज्यादा होगा पर्सक्यूशन या कम होगा पर जो जो पिछले 12 सालों में किया है भाजपा ने यही है हिंदू राष्ट्र अभी आप ये ये एक नाम है अगर मैं मानूं कि यह हिंदू राष्ट्र है तो सही है मैं यह मानूं कि यह एक बड़ा राष्ट्र है फैला हुआ राष्ट्र है वो भी है सही वो भी है हिंदू राष्ट्र के मायने यह होने चाहिए कि कोई फर्क हो संविधान से संवैधानिक तौर पे कौन से फर्क है? संवैधानिक तौर से ऐसे कौन से कवानीन है जो जो कहते हैं हमें कि यह हिंदू राष्ट्र है? पाकिस्तान में कानूनी तौर से कोई भी गैर मुस्लिम ना तो उसका सदर बन सकता है ना तो उसका पीएम। यह लॉ है वहां का। उसी तरीके से नेपाल में यह था कि सिर्फ जो अ क्षत्रिय राजा है वो ही हो सकता है वहां का असर भरा। हम क्या यह लाने को तैयार है यहां पर? कोई है कोई है ऐसा व्यक्ति हमारे पास कि हम कहें कि ये हिंदू राष्ट्र का जो है वो राजा है। नहीं है हमारे पास। मैं मान के चलूं कि मेरे इर्दगिर्द जो मुझे दिख रहा है जो हो रहा है आज जो छप रहा है अखबारों में इसके मायने ये कि ये हिंदू राष्ट्र हो गया तो ठीक है शायद शायद हो। लेकिन ये सिर्फ मान्यता है। ये हकीकी तौर पे कोई चीज नहीं है। ओके। तो आपने बहुत सारी चीजें जो कही है वो आपस में बहुत ज्यादा मैं कहूंगी कि मेल खाती है क्योंकि आप ये कह रहे हैं कि पाकिस्तान के कानून की आप बात करें कि वहां इस तरह के कोई कवानीन बने हुए हैं कि कोई भी हिंदू नहीं बन सकता है। सेम बात आप नेपाल के लिए कह रहे हैं। लेकिन यहां डिक्लेअ नहीं किया गया। कॉन्सिट्यूशनल बदलाव नहीं किया गया है बट हो तो वही रहा है। अगर आप देख प्रैक्टिकली तो वही चारों तरफ वही हो रहा है। मुसलमानों के जब हम रिप्रेजेंटेशन की बात करते हैं आकार तो क्या आपको नहीं लगता कि इसमें ना सिर्फ बीजेपी बल्कि जो जो अपोजिशन पार्टीज हैं वो भी मिजरेबली फेल होती हैं। जब आप बात सामाजिक न्याय और बराबरी की करते हैं तो जब रिप्रेजेंटेशन की बात आती है तो जो हम प्रेस कॉन्फ्रेंसेस जो हम आंदोलन जो हम बड़ी बातें मैं अभी भी ये कहूंगी मैं इसको डिनाई नहीं कर रही कि दलितों के ऊपर जुल्म नहीं बहुत उनके ऊपर बेतहाशा जुल्म है। हम लगातार ये देखते हैं। आदिवासियों पर ये जुल्म है। हम लगातार देख रहे हैं। क्रिश्चियंस पर है वो भी हम देख रहे हैं क्योंकि उनकी परसेंटेज छोटी है। लेकिन जब हम मुसलमानों के हवाले से हम बात करते हैं तो मैं ये पाती हूं कि उनकी कोई पॉलिटिकल एजेंसी भी नहीं है और यहां मैं विपक्ष को भी कटघरे में खड़ा करती हूं कि वो भी उस तरह से उनको पिटिकल एजेंसी नहीं दे रहे हैं। अगर राहुल गांधी दलितों के मुद्दे पर या दूसरे मुद्दे पर या अखिलेश यादव अगर बात करते हैं जबकि उन्हें पता है कि बड़ी तादाद में मुसलमान उनको वोट करते हैं और आगे भी करेंगे। लेकिन उस तरह का आंदोलन उस तरह का प्रोटेस्ट सिर्फ उन्हीं के ऊपर सेंट्रिक क्यों नहीं होता है? क्यों इतना डर है इन विपक्ष की पार्टियों के 12 साल में कुछ नहीं करके भी तो आपने कुछ नहीं हासिल किया है। नहीं बहुत बहुत सही बात है। और भी ऐसे गुट हैं यहां पर भारत में जिनके ऊपर अत्याचार होता है। लेकिन किसी व्यक्ति या किसी गुट के ऊपर तशद्दुद होना इसके बराबर नहीं कि सरकार अपनी राह से निकल कर हटकर नए ऐसे कानून बनाएं जो कि टारगेट करें आपको। ये एक चीज सिर्फ मुसलमान के लिए रिजर्व है। ये बात आपकी बिल्कुल सही है कि सिर्फ एक तबक्का नहीं भारत के समाज का जिनके ऊपर ये अ अत्याचार हो रहे हैं। लेकिन एक ही तबका है जिनके लिए लॉ एंड पॉलिसी की टारगेटिंग होती है और 2014 के बाद ये ये हुआ है। जहां तक नहीं देखिए मेरा यह मानना है कि जितना करना था इंस्टीट्यूशनली भारत को जुडिशरी को मीडिया को अपोजिशन को सिविल सोसाइटी को वो नहीं कर पाई। इसकी एक वजह यह है कि कुछ ऐसी संस्थाएं हैं जो करना नहीं चाहती। मीडिया को देखें आज तो कुछ लोगों को छोड़कर ज्यादातर मीडिया में ये रस ही नहीं है कि हम इस चीज को पकड़े। ये सेकुलरिज्म, लिबरलिज्म, बंधुता हमारे संविधान के पहले पन्ने पर फ्रेटरनिटी है के लोगों के अंदर बंधुता बनाना यह फर्ज है। हमारा कहां पर दिखता है हमें? पर यह ऑोजिशन मीडिया जुडिशरी की की एक फेलिंग है कि या तो जितना उनको करना था इस मुद्दे पर वो नहीं कर पाई या वो नहीं करना चाहती। अब मेरे जैसे लोग शायद यह माने कि अच्छा इन इन लोगों के जाने के बाद शायद चीजें अब सुधर जाएंगी। लेकिन यह एक थकी हुई सोच है। हमको बदलाव आज लाना है और इसमें जो है जजी के पहले के जो जनरेशन हैं वह निष्फल रहे और शायद यही वजह है कि हमें इन लोगों में इन युवकों में कुछ नई चीज दिखाई देती है कि वो रुकने को नहीं थे कि उनके पास जो जो पेशेंस हम में थी जो नहीं होनी चाहिए थी कि शायद अब जो फ्यूचर में चीजें सुधर जाएंगी इस सोच से हम चुप रहे हैं। यह यह नहीं है इन लोगों में। और और यह एक बड़ी अच्छी बात है क्योंकि जो जनरेशंस उनसे पहले आए हैं उन्होंने फेल किया है इंडिया को ना कि सिर्फ कम्युनलिज्म के मुद्दे पर लेकिन डेवलपमेंट में बहुत सी चीजों में और यह हमें सुनना होगा और यह जानना होगा हमें इन इन जनरेशंस को के जो जो हमारे नीचे हुआ। यही वजह है कि भारत आज जहां पहुंचा है कि यहां से ना तो गरीबी गई है यहां की स्कूल में बच्चों को जो खाना देते हैं वो आए दिन हम देखते हैं वीडियो पे कि क्या के क्या हो रहा है। बाथरूम उनके कैसे हैं। बहुत कम देश हैं जो के 80 साल की इंडिपेंडेंस के बाद स्वतंत्रता का मतलब एक यह है कि आप अपने हाथ में पावर लेकर अपनी जिंदगी को सुधार पाए। कहां पर हुआ है यह? सबसे छोटी चीज है। हम एक फुटपाथ नहीं बना पाते ठीक से। अब जो एयरपोर्ट है हमारे बेंगलुरु में तीन है एयरपोर्ट। अमीरों के लिए जो सुविधाएं हैं वो जो 90% लोगों के लिए हम जो जो लोग साइकिल चलाते हैं, जो लोग बस में जाते हैं, जो लोग पैदल चलते हैं, उन लोगों के लिए नहीं है यह भारत। सिर्फ यह अमीर लोगों के लिए है। और यह यह जो फेलियर है यह मैं मानता हूं कि यह एक जनरेशनल चेंज की वजह से ये आए दिन हमें देखने को मिलेगा कि छोटे-मोटे रेवोलशंस हो रहे हैं। क्योंकि यह लोग यह जो नई जनरेशन है यह मानने को नहीं तैयार कि उनकी जिंदगियां जो है वह ऐसी ही बीते जैसी कि हमारी थी। क्या आप इसको एक पॉलिटिकल चेंज की तरफ देखते हैं कि एक तो गुस्सा है गुस्सा है उसके बाद गुस्सा कुछ दिन के बाद ठंडा हो गया या फिर हमने कुछ बदलाव किए कुछ एक्शंस लिए सरकार ने और उसके बाद लोगों को लगा कि ठीक है आगे बढ़ते हैं या फिर आपको लग रहा है कि नहीं एक पॉलिटिकल बदलाव क्योंकि कोई भी जब तक सत्ता परिवर्तन नहीं होगा तब तक आप कोई भी उस तरह का बदलाव का कोई मतलब नहीं है क्योंकि अभी और जो पिछला वाला एक सवाल भी था मेरा आकाश कि जो विपक्ष हैं। अ वो वो भी क्यों एक तरह से मुसलमानों के सवाल को उठाने में उनकी जो हिच है उसको आप कैसे देखते हैं कि अगर सिर्फ ये कहा जाए कह दिया जाए कि माइनॉरिटीज नहीं अब मुसलमान कहा जाएगा। मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है। सो वी विल कॉल इट एज इट इज वी विल कॉल इट मुस्लिम्स। हम माइनॉरिटी का शब्द नहीं इस्तेमाल करेंगे। मतलब मैं ताज्जुब ये कर रही थी कि ये कहने में भी आपको बाकायदा तौर पर वहां नेता इकट्ठे होते हैं। आपको उसका अनाउंसमेंट करना पड़ता है। ये जैसे कोई एक अजीब सा वर्ड है जो आप इस्तेमाल करने के लिए जा रहे हैं। एक तो मेरा ये सवाल और ये जो एक हिच है उसको आप कैसे देखते हैं और इसीलिए इस सवाल को भी आप ये जोड़ें कि क्या पॉलिटिकल बदलाव आप देख रहे हैं क्योंकि अभी जनरल इलेक्शन दूर है। 2029 अभी दूर है। यह मोमेंटम क्या तब तक बना रहेगा और क्या 20 27 जो इलेक्शन है उत्तर प्रदेश का क्या वो शिक्षा रोजगार सड़क और जो हालात है फिलहाल क्या उस पर लड़ा जाएगा पॉलिटिकल बदलाव मुख्य तौर से दो ढंग के होते हैं एक तो सत्ता में कौन है लाल बत्ती किसके पास है वगैरह दूसरा ये कि वो वहां पर बैठकर करते क्या हैं कॉकरोच जनता पार्टी और जो जो युवक हैं बाकी उन्होंने यह दिखाया कि कोई भी रहे सत्ता में बदलाव हम लाएंगे। तो पॉलिटिकल चेंज एक यह भी होती है। तो मेरा यह मानना है कि हमको यह देखने को मिलेगा कि बहुत से बहुत से ऐसे एरियाज हैं शिक्षा तो है ही लेकिन और भी होंगे जहां पर नौकरियां भी है शायद जहां पर हमें चेंज देखने को मिलेगा। शायद सत्ता में कोई बदलाव ना आए तो भी विपक्ष के लोग ज्यादा अग्रेसिवली क्यों नहीं उठा रहे हैं मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचारों के शायद वजह यह है देखिए पॉलिटिशियन वो व्यक्ति होता है या वो व्यक्ति होती है जो फिज फिजिकल कांटेक्ट में लोगों से सबसे ज्यादा होते हैं। फिर आए दिन उनको 50 और 75 100 लोग अब मिलते हैं। इन 100 लोगों में से बहुत से नए लोग हैं। और शायद वजह यह है कि उनका यह मानना है कि मुस्लिम इश्यूज को को उठाने का कोई पॉलिटिकल फायदा नहीं है। या फ़ायदा है भी तो सीमित है कुछ अह वर्गों में। यह एक वजह हो सकती है। हम लोग जो लोग सिविल सोसाइटी में हैं, हमारे जो मकासिद हैं, हमारे जो वैल्यूस हैं, एथिक्स हैं, ये ना तो कॉर्पोरेट के साथ आप तुलना कर सकते हैं ना तो नेताओं से क्योंकि अ जो एक मोटिवेशन है उनका कि मैं सत्ता में आकर बदलाव लाऊंगा। तो सत्ता में आना पहले यह शायद उनके लिए एक ज्यादा इंपॉर्टेंट चीज है कि आखिर मैं करूंगा क्या उससे यही एक वजह हो सकती है बड़ा कठोर दिल आपको रखना पड़ता होगा ये काम करने के लिए मुझसे तो नहीं होगा ये के पॉलिटिक्स में रहे और जो सबसे मुख्य मुद्दा है आज भारत का उसके बारे में हम बात ना करें। वही मैं सोच रही थी आगा क्योंकि आप देखें कि दलितों को लेकर या आदिवासियों को लेकर तो वो सवाल नहीं है। आप उनकी बात करते हैं। आप उनके मुद्दे उठाते हैं। आप मनुस्मृति की बात कर रहे हैं। आप कह रहे हैं ये आईडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर है। ये लगातार कहा जा रहा है कि ये कोई नॉर्मल सियासी लड़ाई नहीं है कि भ एक पार्टी आई वो सत्ता में थी। वो चली गई। अब इलेक्शंस होंगे। दूसरी पार्टी आ जाएगी। अब उसका वो सत्ता में आ जाएगी। 12 साल में जो कुछ हुआ है वो हमने देखा है वो बिल्कुल मुख्तलिफ है उन तमाम सालों से जो हमने पहले देखे हैं। एक नए नए तरह का भारत एक नई तरह की पॉलिटिक्स एक बिल्कुल नए मुख्तलिफ किस्म से हम ये देख रहे हैं कि जो पूरा का पूरा स्टाइल ऑफ पॉलिटिक्स है वो चेंज हो गया है। लेकिन उसमें सिर्फ पीछे क्यों मुसलमानों के मुद्दे हटते हैं और क्यों दलितों के या फिर आदिवासियों के कुछ हद तक क्रिश्चियंस और सिख्स के भी मुद्दे वो वहीं के वहीं रहते हैं। उनके ऊपर बात करने में उतनी परेशानी नहीं होती है। तो मेरा सवाल ये है कि आखिर कब तक मुसलमान इसी तरीके से इंतजार करते रहेंगे? क्योंकि फॉर ग्रांटेड तो उन्हें लिया जाता ही रहा है। उनके रिप्रेजेंटेशन जो है लगातार वो घट ही नहीं रहा है बल्कि खत्म होता जा रहा है। और अभी अगर आजादी के 80 साल के बाद भी उनका मुद्दा सिर्फ ये है कि हमें जिंदा रहने दीजिए। हमें वोट डालने दीजिए। बाकी हम खुद कर लेंगे। तो इससे बड़ी आयरनी इस देश की और क्या हो सकती है? और फिर वो ढकोसला नहीं है जब आप आइडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर की बात करते हैं या दलितों के दूसरों के मुद्दों पर आप एक स्ट्रांग स्टैंड लेते हैं। आप उनके घरों पर जाकर खाना खाकर पानी पीकर आप एक एक मैसेज देते हैं। बट सेम चीज यू डोंट डू विद मुस्लिम्स। जो धीरज दिखाई है मुस्लिम्स ने 2014 के बाद वो शायद कोई और कम्युनिटी कोई और देश में दिखा ना पाती। इतने जुल्म के बाद भी पेशेंटली आप सह रहे हैं। ये जानते हुए कि दुनिया जानती है कि उमर खालिद या शजील इमाम को जेल में इस वजह से रखा जा रहा है कि वो मुस्लिम है। ना कि इस वजह से कि उन्होंने कोई गुनाह किया है। तो, अह यह जो पेशेंस है एक अ स्ट्रटेजिक पेशेंस शायद अह कह सके हम कब तक रहेगा यह मैं नहीं जानता। पर मेरा यह मानना है कि जो हालात 2014 के बाद आए हैं कि आपको बिल्कुल ही सत्ता से अलग रखा गया है। ये लंबे अरसे तक चल नहीं सकता। यह इसको तो टूटना ही है क्योंकि कोई इसका कोई फायदा नहीं है कहीं पर भी। तो मेरा यह मानना है और यह यह बात मैं फिर से दोहरा रहा हूं कि मेरी मेरी उम्र के लोग जो है वो बैठे-बैठे मुंतजिर रहे के हालात सुधरेंगे लेकिन नहीं सुधरे। लेकिन ये एक ये शायद एक मेंटालिटी है हमारी कि दूर का देखें और जो जो चीजें दूर अह अह दिखाई दे वह आपको लगे के अह असही हो। आप अपनी गाड़ी से निकलकर उस शख्स से बात करें जो आपकी खिड़की के जो 10 या 12 साल की लड़की आपसे पैसे मांग रही है ट्रैफिक सिग्नल पे। आप खुले दिमाग से सच्चाई से अपने आप से पूछे कि इसका कोई फ्यूचर है तो जवाब यही होगा कि नहीं है कि जैसा कि वो जी रही है आज वैसे ही वो मरेगी। लेकिन मेरी जनरेशन की मेरे मेरे पहले जो जो आए थे लोग उनका यही मानना था ये शायद कोई इंडिपेंडेंस मूवमेंट की चीज हो कि कि ये फ्यूचर अच्छा ही होगा हमारा। लेकिन कब तक रुकेंगे लोग जब आप उनको पूर्ण तरीके से आप उनका बहिष्कार करते हैं सियासी तौर पर और ना कि सिर्फ उनका बहिष्कार होता है। आप आए दिन जुल्म लाते हैं या तो कानून से या तो कोई पॉलिसीज से और जो कि जो लोग को खड़ा होना चाहिए आपके साथ वो नहीं खड़े हैं। कब तक ये चीजें चलेगी चल पाएगी मैं नहीं जानता। मेरा यह मानना है कि ये ये लंबे अरसे तक नहीं चलेगा। क्या आप 2029 में एक सत्ता परिवर्तन आप देख रहे हैं? क्या उसका चेहरा आप राहुल गांधी को मानते हैं? क्या आपको लगता है जो आरएसएस ने 100 साल तक ख्वाब देखा? और आज क्योंकि आपका इसके ही इर्द-गिर्द आपका तमाम काम है और इसीलिए इस सबके जरिए में मैं खुद समझना चाहती हूं और हमारे जो तमाम ऑडियंस फिलहाल एक तरह के एक कंफ्यूजन के स्टेट में है कि आखिर हो क्या रहा है? क्या हम एक नए तरह के किसी और दौर से हम गुजर रहे हैं तो वो मैं आपसे समझना चाहती हूं आकाश। तो क्या वो चेहरा आप राहुल गांधी को देखते हैं और क्या आपको लग रहा है जो ख्वाब लगातार 100 साल से पाल पाला आरएसएस ने और उसके बाद अब जबकि 13 साल से वो सत्ता में है क्योंकि बीजेपी और आरएसएस को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। क्या ऐसे ही वो अपने हाथ से सत्ता को जाने देंगे? ये तीन साल जो है अभी 20 26 है 27 से लेकर 29 आप उनको किस तरह से देख रहे हैं और कैसे आप आगे अनफोल्ड होता हुआ देख रहे हैं? मैं नहीं जानता और इतनी दूर देख भी नहीं सकता मैं। लेकिन मैं यह एक चीज कह सकता हूं कि मुझे नहीं लगा था 2000 24 में के इनकी जो बहुमत है वो छूट जाएगी। लेकिन वो हुआ। क्या कोई ऐसी चीजें वह आज से लेकर 29 तक कर पाएंगे जिसकी बुनियाद से वो लौटे शायद। लेकिन एक और भी चीज है कि भारत में कई ऐसे हिस्से हैं जहां पर फर्स्ट पास पोस्ट सिस्टम होते हुए भी एक वन पार्टी सिस्टम बन चुका है। जैसा कि गुजरात में जहां पर बाबरी मस्जिद को गिराने के बाद कांग्रेस एक भी दफा सत्ता में नहीं आई। और एक जनता दल की सरकार को छोड़कर सिर्फ भाजपा ही रही है वहां पर। तो ऐसी जगह हैं जहां पर 3035 सालों से भाजपा है। क्या यह मुमकिन है कि वह हार जाए और कोई और लोग आ जाए? हां। क्या यह भी मुमकिन है कि वो चिपके रहे और 240, 230, 220 सीट की बुनियाद पर सत्ता में रहे। यह भी है मुमकिन। पर मुमकिन यह चीज नहीं है कि कोई बदलाव ना हो। जो भी सत्ता में होगा जो पॉलिसी जो लिखी जाएंगी जी जिनकी बुनियाद पर भाषण ये दिए जाएंगे वो जो माजी में हुआ था वो नहीं होगा मुझे यह लगता है कि ये जो रेवोलशंस आए हैं यहां पर 2019 के बाद 2019 में एक 2000 21 में एक 2020 में एक और इस साल एक वो हमें यह कहते हैं कि भारतीय लोग जो है वो अब रुकने को नहीं तैयार उनको बदलाव चाहिए उनकीयों में और उस वजह से मैं यह मानता हूं कि जो वायदे किए गए थे 2014 से लेकर आज तक ये डेवलप नेशन सुपर पावर वगैरह वो सब नहीं होगा आगे स्पेसिफिक चीजें होंगी जो कि टारगेट करेंगी उन लोगों को जिन जिनका समर्थन चाहिए अ सरकार को और मेरा यह भी मानना कि शायद कम्युनल एजेंडा शायद थोड़ा कम हो जाए। भागवत का जो भाषण था न्यूयॉर्क में हमको एक एक दृष्टि ये भी है के इसको इस लाइट में उसको देखा जाए। यह जो यह होगा तो यह बड़ी अच्छी बात है। लेकिन मैंने आपको जैसे कहा इन लोगों के लिए यह कोई मीन्स टू एन एंड नहीं है। ये लोग छोड़ेंगे नहीं क्योंकि सच्चे दिल से मानते हैं ये लोग पर्सक्यूशन में। जब इतनी बड़ी हार के बाद जो कि एक मंत्री को जाना पड़ा। क्या वो एक सबक सीखेंगे के इस रास्ते को छोड़कर हमें कहीं और जाना है। देखते हैं आगे। हम तो वही मेरा सवाल भी था आपसे कि कि क्या चाल चरित्र और डीएनए क्या वो अपना बदल देंगे? फिलहाल मोदी जी बहुत कूल दिखने की कोशिश कर रहे हैं। कभी टीशर्ट पहनकर नजर आते हैं तो कभी सेल्फी से अपनी वीडियोस बनाते हुए नजर आते हैं। तो नई टीम उन्होंने बीजेपी आईटी सेल की सब बनाई है। जहां पर और नफरती लोगों को उन्होंने घुसाया है और जिस तरह के ट्वीट्स वगैरह किए जा रहे हैं वो सीधे तौर पर जेनोसाइडल है। और वो एक पर्टिकुलर कम्युनिटी के लिए नहीं है बल्कि दिमागी नक्सल के नाम से वो ये सब कुछ करते हुए नजर आ रहे हैं। तो मेरा वही आपसे सवाल है कि चाल, चरित्र और क्या डीएनए बदल जाएगा? हो सकता है कुछ दिन के लिए कम्युनल एजेंडा वो ठंडे बस्ते में डाल दें कि अभी रोजगार की और इस सब की बात करनी होगी। लेकिन वाकई में क्या आपको लग रहा है कि एक थोड़ा सा उनको एक एक ठंडी हवा का झोंका अगर बीच में मिले तो आपको नहीं लगता कि ये और पावर के साथ इट विल कम बैक और वो अपने अल्टीमेट गोल पर उनको पहुंचना ही है। नहीं कोई कुछ नया करना होगा उनको जो के सिर्फ लव्स नहीं होंगे। कुछ ऐसी चीजें दिखानी होंगी जिससे लोगों को लगे के उनकी में कोई फर्क आने वाला है या आ चुका है। और यह करना मुश्किल है जब आप 75 साल के हो आपको बदलने में बड़ी ही मुश्किलात होती है। कुछ सीखने में मुश्किलात होती है। तो बदलेंगे तो नहीं वो लेकिन तो जहां तक चरित्र का सवाल है वो तो सामने है हमारे वो तो चेंज नहीं हो पाएगा। लेकिन जो करतूतें हैं उनकी हम उसमें फर्क आएगा यह लगता है मुझे। अगर मैं मेरे जेहन में एक सवाल ये आ रहा था कि अभी 12 साल की जो आप राजनीति को देख रहे हैं या फिर हम नरेंद्र मोदी को एक सीएम के तौर पर जब हम देखते हैं तो मेरे दो सवाल हैं इसमें कि एक तो सीएम से जो पीएम की उनकी जो छवि है उसको आप कितना डिफरेंट आप मानते हैं और क्या आपको लगता है जो गुजरात मॉडल की जो बात की गई नरेंद्र मोदी की तरफ से 2014 में वो गुजरात मॉडल क्या लोगों ने डेवलपमेंट के नाम पर वोट किया या फिर 2002 के नाम पर लोगों ने वोट किया और अगर और 2002 के नाम पर वोट किया तो जाहिर सी बात है कि जो कुछ हो रहा है वो लोगों ने खुद चुना है। और दूसरा मेरा सवाल कि इस जो अभी फिलहाल के हम हिंदुत्व की जो राजनीति हम देख रहे हैं इसमें आपको सबसे ज्यादा फायदा किसको आप होता हुआ देख रहे हैं? नरेंद्र मोदी, आरएसएस या बीजेपी एस अ पार्टी। उनको वोट देने वाले जो लोग हैं उनके दो तबके हैं। पहला तो यह कि जो लोग हिंदुत्ववादी हैं जो जो आईडियोलॉजी की बुनियाद पर उनको वोट देते हैं वो लोग बदलेंगे नहीं क्योंकि भाजपा के सामने और कोई अल्टरनेटिव नहीं है। आप अगर सेकुलर माइंडेड हैं। आप नॉर्मल हैं। आप एक नॉर्मल इंसान हैं। जहां पर भी हो आप भारत में आप वोट देंगे जो जो पार्टी वहां पर होगी टीडीपी हो टीएमसी हो डीएमके हो नेशनल कॉन्फ्रेंस हो जो भी हो अगर आप यह चाहते हैं कि सियासत की बुनियाद अ कम्युनलिज्म हो तो आपके लिए पूरे भारत में एक ही पार्टी है और कोई पार्टी नहीं तो दुकान एक ही खुली है इस चीज की तो ये जो वोटर एक आइडियोलॉजिकल फ्रेम के साथ आता है कि मुझे मुझे ईसाई और क्रिश्चियन और मुस्लिम एंटी रिजर्वेशन रुख है मेरा तो आपके लिए एक ही पार्टी है। दूसरा एक ऐसा तबक्का था जो शायद आज छोटा हो चुका है जिसका ये मानना था कि भारत की जो खामियां हैं या वो डायनेस्टिक पॉलिटिक्स हो या वो करप्शन हो या वो एक लैक ऑफ एंबिशन हो वगैरह-वगैरह वो एक जो ये जो खामी है वो एक सिस्टम की खामी है और इस सिस्टम को ठीक करने वाला यह शख्स है। यह शख्स आकर इसको ठीक कर देगा क्योंकि भारत के जो लोग हैं वो बहुत ही टैलेंटेड हैं। वो कहीं और जाते हैं दुनिया में तो वो माइक्रोसॉफ्ट Google के सीईओ बनते हैं। यहां पर उनको जो है ठीक तरीके से लीडरी उनकी नहीं होती और मोदी आकर यह काम करेगा। एक ये दूसरा है यह तबका। ये ग्रुप छोटा हो चुका है क्योंकि 12 सालों के बाद जो उनका तजुर्बा है वो ये कहता है उनके उनसे के आज उन्हीं के वर्ग के जो लोग हैं जो युवा हैं वो आज रास्ते पर हैं कि जो हो रहा है देश में ये ठीक नहीं तो ये जो छवि उनकी थी वो कुछ हद तक डैमेज हुई है इस दूसरे तबके में उनके के जाने के बाद और उनके जो सत्ता में जो साल रहे हैं उससे सबसे बड़ा फायदा हुआ है आरएसएस को। उसकी वजह ये है कि आरएसएस को लेजिटिमेसी मिली है। जब मैं एक अ पत्रकार था फुल टाइम 20 साल पहले जी। तो ज्यादातर अखबारात में आरएसएस और कम्युनलिज्म जो है वो नेगेटिव लव्स थे। ये पॉजिटिव शब्द नहीं थे। सेकुलरिज्म जो है उस पर लोग थूकते नहीं थे जैसा कि आज अथूकते हैं। तो ये जो सक्सेस आया है आरएसएस को ये ये मोदी ने दिया है उनको जो लेजिटमाइज किया है कम्युनलिज्म को कि आप एब्सोल्यूट एक्सक्लूजन रखें। मिले सुर मेरा तुम्हारा जैसे गीत जहां पर होते थे उस देश में आज एक भी मुस्लिम मंत्री ना हो एक भी मुस्लिम लोकसभा एमपी ना हो सत्ता की पार्टी का हम और और ये चीज नॉर्मलाइज हो चुकी है तो इसको नॉर्मलाइज करने में हाथ जो है वो मोदी का है लेकिन फायदा जो है वो संघ को है ये चीज संघ को के बारे में और इनके जाने के बाद होगा क्या कि एक लड़ाई होगी पार्टी में और कोई भी एक्सट्रीमिस्ट पार्टी में जब कोई बदलाव आता है तो जो लोग ज्यादा एक्सट्रीम होते हैं। लड़ाई उनके बेस पर होती है। तो जो अगला शख्स आएगा हम वो और भी जो है तीखी और कड़वी जुबान के साथ आएगा। क्या वो योग्य होंगे? देखिए जो मैंने जो दो तबकों के बारे में आपसे बात की जी उनको साथ लाने में मोदी को छोड़कर और कोई है नहीं भाजपा में। ओके आइडियोलॉजिकली जो के अपना हाथ ऊपर करके बोले कि मैं ज्यादा कम्युनल हूं या मेरा बैकग्राउंड वैसे बहुत से लोग हैं हम लेकिन जो मॉडर्निटी डेवलपमेंट इकोनॉमिक्स डायनेस्टिक पॉलिटिक्स नेपोटिज्म वगैरह वगैरह की बात करने वाले अक्रेडिबली बात करने वाले लोग हैं वो बहुत कम है और या शायद है ही नहीं हम मोदी थे तो ये जो दूसरा जो है तबक्का जो कि कम्युनल नहीं है लेकिन मानता था कि मोदी डेवलपमेंट लाएगा जो कि वो नहीं ला पाया वो लोग योगी के साथ नहीं जाएंगे और मोदी के जी अमित शाह के को क्या देख रहे हैं आप क्योंकि लोगों को ये लगता रहा कि मोदी के बाद अमित शाह के चाणक्य हैं। वो उनका सब कुछ है वही सब कुछ देखते हैं। मोदी हैं। उनकी खुद की कोई पॉपुलैरिटी नहीं है। हम वो खुद ऐसे व्यक्ति नहीं है जो कि रैली कर पाए भाजपा के बाहर और 20 लोग आए वहां पर तो भाजपा के अंदर एक कौन ज्यादा एक्सट्रीम है कौन ज्यादा हिंदुत्ववादी है ये एक डिबेट चलेगी मोदी के जाने के बाद लेकिन जो 90 के दशक में हुआ था वही होगा कि आरएसएस अपना हाथ दिखाएगी लोगों को बैठ जाने को कहेगी और फिर यह निर्णय होगा कि कौन आएगा आगे वाजपेय आएंगे या लालकृष्ण आडवाणी आएंगे वगैरह तो जो नागपुर के पास जो एक रेफरी की सीटी थी वो वो फिर से आ जाएगी उनके हाथों में और आप इसको मानते हैं कि आरएसएस कमजोर हुआ है और अब तमाम कमान जो है वो मोदी और अमित शाह के हाथ में है या फिर इसको आप वापस होता रिवर्स होता हुआ देख रहे हैं और उसके साथ-साथ क्या आपको लग रहा है जो ये कहा जा रहा है कि पार्टी में आपस में ही बहुत ज्यादा जो एक शब्द का इस्तेमाल आई डोंट वांट टू यूज़ बट सर पुटवल जो हो रहा है मतलब आपस में एक कॉन्फ्लिक्ट है और अभी कैबिनेट रीशफल होना होना था लेकिन कुछ मंत्रियों ने कहा कि नहीं आप हमारी मिनिस्ट्री हमसे नहीं ले सकते हैं। इस तरह की खबरें सामने आई है तो मोदी के सामने सर उठाकर लोग बोल रहे हैं क्योंकि मोदी कमजोर हो रहे हैं। ये सारी चीजों को क्या आप डू यू बाय ऑल ऑफ दैट? और या आपको लगता है कि ये अभी कुछ ये खबरें हैं जो हेडलाइंस मैनेजमेंट की जा रही हैं। कैसे देखते हैं आप? शख्स और संस्था में फर्क होता है। शख्स को एक दिन जाना होता है। या तो वो हार जाए या तो वो मर जाए। संस्था आरएसएस जैसी संस्था और कोई सानी नहीं है। उनका 100 साल के बाद बाद भी ना तो उनका विभाजन हुआ है ना तो टूटी है वो ना तो कोई गुट बने हैं बाहर उनके अकेली संस्था है ये कि 100 साल तक यहां पर टिकी हुई है एक ही रूप में तो वो तो रहेगी ही जो भी हो यहां पर तो अब आप अब लॉन्ग लॉन्ग व्यू रखें आप तो आरएसएस ही है ये अमित वगैरह तो आएंगे और जाएंगे एक छोटा सा रैपिड फायर आपके साथ और एक लास्ट क्वेश्चन देन आई विल मेक यू फ्री। आई नो काफी लंबा ये पडकास्ट हो गया है। मोदी की सबसे बड़ी कमजोरी ईगो क्या मोदी 2029 का चुनाव लड़ेंगे? हां। मोदी के बाद भाजपा का चेहरा कौन? आरएसएस। क्या हिंदुत्व बिना मोदी के टिकेगा? हां। क्या आप राहुल गांधी को अगला लीडर देखते हैं। अगला पीएम शायद नहीं लेकिन मैं नहीं जानता कि नताइज क्या होंगे। क्या कम्युनलिज्म को आप इस देश में खत्म होता देख रहे हैं? जी ओके ओके फेयर इनफ। मेरा आखिरी क्वेश्चन आपसे ये है आकार कि अगर आज से 25 साल के बाद 25 मैं थोड़ा लंबा कह रही हूं। मैं कहूं कि 10 साल के बाद अगर मोदी का इतिहास अगर लिखा जाएगा या आप जैसे लोग उनके बारे में अगर किताब लिखेंगे तो कैसा होगा उनका उनका इतिहास क्या होंगे उनके अध्याय सक्सेसफुल एट कम्युनलिज्म फेलियर एट डेवलपमेंट ओके ओके बहुत-बहुत शुक्रिया आकार आपने बहुत अपना कीमती वक्त दिया थैंक यू सो मच इट वास वंडरफुल टू हैव यू एट नाउ और आई एम श्योर कि बहुत सारे ऐसे सवाल थे जो मेरे ज़हन में भी थे और लोगों के ज़हन में उस पे क्फ्यूजन क्लियर हुआ होगा। और इस वादे के साथ मैं आपसे अभी के लिए अलविदा लेती हूं कि जल्द हम फिर मिलेंगे। शुक्रिया। थैंक यू। थैंक यू सो मच।

Companion article

A Weakness Without Precedent

In a wide-ranging conversation with Nous, the author and columnist Aakar Patel was asked the question hanging over Indian politics this year: after the youth-led protests that followed the National Eligibility cum Entrance Test (NEET) controversy and gathered at Delhi's Jantar Mantar, is Narendra Modi passing through the weakest moment of his political life? Patel's answer was a qualified yes. Not because Modi has never faced trouble before — the Bharatiya Janata Party lost its parliamentary majority in the 2024 general election — but because, until now, his personal image had survived every setback intact. What changed this year, Patel said, was the language. For the first time since Modi became prime minister, he heard young people, including Generation Z voters from the very middle-class and upper-middle-class Hindu households that have traditionally backed the BJP, speak about him with open contempt. That, in Patel's reading, is new.

Twelve Years Leave No Place to Hide

Patel offered two reasons why he believes this moment will not simply pass. The first is almost literary: he quoted Ralph Waldo Emerson's observation that "every hero becomes a bore at last," arguing that after so many years on the same stage, repetition breeds fatigue. The second is structural. Twelve years, he said, is an extraordinarily long time to hold the office of prime minister, and it leaves nowhere to hide. He compared the record unfavourably: Adolf Hitler's twelve years as German chancellor were long enough to build the autobahns, invade France, march on Russia, lose the war and die; Jawaharlal Nehru's first twelve years as prime minister, ending around 1960, were long enough to establish many of the scientific, cultural and educational institutions that still stand in India today. Modi, Patel argued, has held two back-to-back parliamentary majorities — 282 seats in 2014, 303 in 2019 — and still, in his thirteenth year in office, promises that the big changes are yet to come. That excuse, he said, no longer holds.

What Made the NEET Protests Different

Asked how this year's unrest compares with the anti-Citizenship Amendment Act (CAA) protests and the farm-law agitation, Patel said the underlying pattern is familiar: whenever a large enough number of Indians take to the streets — Muslim women leading the CAA-NRC protests, Sikh farmers camped at Delhi's borders, or now a generation of students and young professionals — governments have eventually been forced to retreat. What is different this time, he argued, is that for the first time a principle of accountability was established. The resignation of a serving Union minister, Dharmendra Pradhan — a minister since 2014, not a junior figure — marked a genuine departure. Modi had apologised on television to farmers in 2021, and the CAA itself was never actually implemented; but forcing out a sitting minister is something no earlier protest movement achieved. Patel argued that a government built around the idea that only Modi's own popularity and image deserve credit for its successes found it especially damaging to be seen publicly discarding a loyalist.

The Politics of Fear, Ending Ungracefully

For Patel, the deeper story is the disappearance of fear itself. He described Modi's twelve years, and BJP-RSS politics more broadly, as fundamentally a politics of fear — silencing critics, jailing dissenters, suppressing any demand for accountability. What struck him was how suddenly that fear seemed to lift. He does not think it built up gradually and only surfaced this year; he called it an abrupt, generational break, driven by young Indians unwilling to keep waiting for a government to make good on its promises. That impatience, he suggested, is itself a verdict on the country's own record over eighty years of independence — from viral videos exposing substandard school meals to Bengaluru building three airports for the wealthy while the majority who cycle, take buses or walk see no comparable public investment.

Hindutva as Belief, Not Strategy

The host pressed Patel on whether these shifts extend to how Muslims and other minorities are treated, given that the government's core agenda — the Uniform Civil Code, the rhetoric of "infiltrators," the Special Intensive Revision (SIR) of electoral rolls, questions over citizenship, bulldozer demolitions, mob lynching — remains unchanged. Patel was blunt: he expects that agenda to continue, because for Modi and the BJP, Hindutva is not a means to an end but a sincerely held conviction. He traced it to the 1920s ideological framing associated with Vinayak Damodar Savarkar, under which Muslims and Christians are treated as suspect because their spiritual loyalty is presumed to lie with Mecca, Jerusalem or the Vatican rather than with India as a "holy land." No serious BJP-aligned economist, Patel noted — not even sympathetic voices such as Surjit Bhalla — claims the economy is performing as promised. Yet the base remains satisfied, he argued, because of how thoroughly the communal agenda has been carried out since 2014, particularly after the 2015 beef-related laws and the "love jihad" laws that began in 2018. That satisfaction, in his view, is precisely why the agenda will not be abandoned.

Why a "Pure" Hindu Rashtra Cannot Be Built

Is India already a Hindu Rashtra in all but name? Patel answered with comparative history. Before 2008, he noted, Nepal was the world's only constitutional Hindu state, resting on two pillars: an executive headed by a Kshatriya king, and a Brahmin priest to advise him — though even Nepalese law never went so far as to bar Shudras from education or women from work, because the modern world would not tolerate it. Pakistan, despite being founded as a Muslim homeland, never became a true theocracy either, he argued, because its Sunni-majority population is too internally varied to submit to a single religious hierarchy, unlike Iran's vertically ordered clergy under a Supreme Leader. The RSS faces a comparable structural problem in India: there is no single law that could formally convert a plural, constitutional republic into a Hindu Rashtra, and no individual who could plausibly be crowned its king. Patel recalled that the politician Subramanian Swamy once proposed disenfranchising Muslims outright — an idea he sees now unfolding in miniature through the SIR process.

Two Hundred Million Reasons Persecution Never Ends

What the RSS possesses instead, Patel argued, is India's Muslim population itself — at once, in his words, the movement's greatest asset and its greatest liability. He pointed out that Germany's Jewish population in 1930 was under one percent, compared with roughly 200 million Muslims in India today; a population that large cannot be excised without damaging the nation itself. That, in his account, is why the practical form of Hindu Rashtra has become permanent, low-grade persecution rather than outright expulsion: near-total exclusion from formal power — no Muslim in the Union Cabinet, none among the BJP's Lok Sabha MPs, its roughly 95 Rajya Sabha members or its roughly 1,000 state legislators — paired with a steady stream of laws and policies designed to make daily life harder. That, he said, is what success looks like for this project: not a finished Hindu Rashtra with a constitutional basis, but an unfinished one sustained by continuous targeting. On Mohan Bhagwat's recent remarks in New York — that Hindus who want Muslims expelled are not true Hindus — Patel saw no real shift, only what he called an inferiority complex seeking Western validation, since RSS leaders cannot admit abroad, in English, what domestic policy already does in practice.

The Opposition's Muslim Silence

Patel was equally critical of the opposition. Asked why parties that depend on Muslim votes hesitate even to name Muslims directly — preferring the vaguer term "minorities" — while speaking forthrightly about Dalit and Adivasi grievances, he agreed the criticism was fair. Muslims, he said, are the one community targeted specifically by law and policy since 2014, yet the judiciary, media, opposition and civil society have all largely failed to defend them, whether from an inability or an unwillingness to engage. He was equally candid about his own generation's failure: for years, people like him assumed conditions would improve once the BJP eventually left office — a comfortable, "tired" assumption, in his phrase, that events have not borne out.

A Patience Nearing Its Limit

Patel offered unusual praise for how Muslims have absorbed the pressure of the past decade, saying the patience shown since 2014 might not have been matched by any other community in any other country, and pointing to the continued imprisonment of activists such as Umar Khalid and Sharjeel Imam as cases the world understands to be about religious identity rather than any proven offence. He described a private test he sets himself: honestly asking whether a child begging at a Delhi traffic signal has any real future, and concluding that she will likely live out her life exactly as she is living it now. Earlier generations, including his own, assumed things would eventually improve, much as independence-era optimists once did; he no longer believes that assumption was justified, and he does not think a community excluded this completely from power can remain politically passive indefinitely.

After Modi, the RSS Picks the Referee

On succession, Patel was candid about the limits of prediction but offered a structural view. He does not think the RSS is searching for a Modi alternative now, precisely because Modi's authority does not derive from the organisation — it comes from a personal popularity that makes him, in Patel's assessment, the only BJP leader bigger than the RSS itself. He noted that Modi is roughly the same age as RSS chief Mohan Bhagwat, and trained decades ago under Bhagwat's own father, Madhukarrao Bhagwat, giving him a long personal history with the organisation's leadership. Only once Modi departs, Patel argued, will the RSS visibly assert itself, much as it did in the succession contest between Atal Bihari Vajpayee and Lal Krishna Advani in the 1990s. He predicted that whoever follows Modi is likely to be more openly hardline, since internal battles in an ideologically driven party tend to be won by its more extreme wing, and that Amit Shah, often described as Modi's strategist, lacks any independent capacity to draw crowds on his own. Institutionally, he argued, the RSS's century-long durability — an organisation that has never split or fractured — will outlast any individual leader, including Modi. He pointed to Gujarat, where Congress has not won a state election since the demolition of the Babri Masjid in 1992, aside from one brief Janata Dal interlude, as proof that India's first-past-the-post system can sustain one-party dominance for decades regardless of underlying discontent; the BJP, he suggested, could plausibly hold on nationally with a reduced tally even if support keeps eroding. What he considers inevitable is not necessarily a change of government but a change in what any government can credibly promise: he does not expect the grand pledges of a "developed nation" or "superpower" status to survive contact with three consecutive youth uprisings — the CAA protests of 2019-20, the farm-law protests of 2020-21, and the unrest of this year — which he reads as evidence that Indians, across the political spectrum, have simply stopped being willing to wait. Asked directly in a closing rapid-fire round, Patel said he expects Modi to contest the 2029 election, named ego as Modi's biggest weakness, identified the RSS as the organisation that will define the BJP's face after Modi eventually departs, and said he expects Hindutva to survive Modi's exit. On Rahul Gandhi, his answer was more guarded: not necessarily the next prime minister, he said — he does not know what the results will actually be.

The Verdict

Pressed to imagine how history might eventually judge Modi, the interview closed on a framing that the conversation had circled around throughout: a leader who reshaped Indian politics decisively, but along two very different axes. Across the hour, Patel's own account traced exactly that split — an extraordinary, durable success at embedding a communal, exclusionary politics into the machinery of the state, alongside a persistent, unresolved failure to deliver the development, jobs and institutional strength promised since 2014. It is a split he expects only to widen, not because Modi himself will change — at 75, Patel said, deep personal change is unlikely — but because the country underneath him, especially its young, has stopped being willing to wait.

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