Nous Podcast· 01 Jul 2026· 56:45

Is the Petrodollar Era Coming to an End? | Pravin Sawhney

The US-Israel war on Iran has triggered a major shift in global geopolitics, raising questions about America's credibility, Israel's strategic position, and the emergence of a new world order. In this in-depth conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with Pravin Sawhney, Editor of For…

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टाइम जो है वो ईरान की साइड पर है। टाइम अमेरिका की साइड पे नहीं है। हर दिन जो बीत रहा है उसमें अमेरिका की क्रेडिबिलिटी गिर रही है दुनिया में। जब हम ईरान को अभी देखते हैं तो एक तो यह है कि उसने पूरी दुनिया को यह बताया है कि एसिमिट्रिक वॉर किस तरह से लड़ी जाती है। उसका एक मॉडल पूरा दुनिया के सामने पेश किया है। पाकिस्तान आज एक ऐसा मुल्क है जो मल्टीपोलर वर्ल्ड में तीनों बड़ी ताकतों के साथ उसके रिश्ते अच्छे हैं और वो ऐसा मुल्क है जो कि सब रीजनल पावर समझती है। एक तरफ ईरान के सिग्नेचर, एक तरफ अमेरिका के सिग्नेचर और नीचे मिडिएशन में शाहबाज शरीफ के सिग्नेचर। इससे पाकिस्तान की पोजीशन किस तरह से बदली है? अगर आप देखिएगा जो एमओयू साइन हुआ है जो ईरान ने एमओयू साइन करा है उस पे लिखा हुआ है इस्लामाबाद एमओयू। तो क्या कंप्लीटली भारत सरकार नरेंद्र मोदी ये बता रहे हैं कि हम है तो ग्लोबल साउथ का हिस्सा। लेकिन हम खड़े हैं ग्लोबल नॉर्थ की तरफ और ऐसी क्या मजबूरी है? अमेरिका को नहीं पता है उसके सैनिकों को कि वो क्यों लड़ रहे हैं। इससे बहुत फर्क पड़ता है जो ईरान के जो कमांडर्स हैं उनको मालूम है हम इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि हमारी सर्वाइवल की बात है। अभी कौन सी कौन-कौन सी ऐसी चीजें हैं जो आपको लगता है कि पूरी तरीके से ईरान के फेवर में है। क्या जो कुछ एक्सपर्ट ये कह रहे हैं कि वो जीसी का सबसे ताकतवर मुल्क है हर तरीके से। क्या आप उससे एग्री करते हैं? अच्छा अब सबसे बड़ी एक और प्रॉब्लम जो आती है प्रेसिडेंट ट्रंप के लिए अगर ये बेस यहां से हट जाती है तो उसका मतलब ये है कि पेट्रोल डॉलर जो है वो धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा और कोई ऐसा कंट्री नहीं है दुनिया का जो खुलकर इजराइल के साथ खड़ा होना पसंद करता हो क्योंकि उसके साथ जेनोसाइडल कंट्री का एक तरह से एक टैग लग गया है। तो दो बड़ी ताकतें खड़ी है ईरान के साथ और जीत जो है मैं कहूंगा ना चाइना की है ईरान वॉर में ना रशिया की है। जीत ग्लोबल साउथ कंट्रीज की है क्योंकि वर्ल्ड ऑर्डर बदल रहा है। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। क्या अब ये माना जाए कि ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच जो ये वॉर शुरू हुई थी वो पूरी तरीके से थम गई है। क्या यह भी माना जाए कि इसमें ईरान की जीत हुई है और ईरान उन वर्ल्ड पावर्स की लिस्ट में शुमार हो गया है जिसमें शायद उसका शुमार पहले कभी नहीं किया जाता था या फिर उसका तसवुर भी नहीं किया जा सकता था। अभी आप ये देखें कि अमेरिका और ईरान के बीच में एमओयू साइन हुआ है। लेकिन उसके बाद भी लगातार ये देखने के लिए मिल रहा है कि उधर इजराइल लेबनान पर लगातार बॉमिंग कर रहा है। और इसके अलावा भी अमेरिका और ईरान के बीच में भी ऑन एंड ऑफ ऑन एंड ऑफ हम ये देख रहे हैं कि एक तरह का एक्सचेंज होता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन इस सबके बीच बातचीत भी हो रही है और इस बातचीत में अहम रोल निभाया है पाकिस्तान ने भी। हम ये आज के पडकास्ट में जानने की कोशिश करेंगे कि इस जंग के बाद ईरान कितना पावरफुल हुआ है। क्या अमेरिका आइसोलेट हो गया है? क्या वर्ल्ड पावर का जो सेंटर है वो पूरी तरीके से शिफ्ट हो गया है? भारत का उसमें रोल क्या है? भारत कहां खड़ा नजर आ रहा है? और उसके साथ-साथ जो भारत की फॉरेन पॉलिसी है वो क्या अभी हमें बता रही है? क्योंकि आप ये देखिए कि ईरान के जो सुप्रीम लीडर हैं आयतुल्ला अली खामनाई उनकी जिस तरह से शहादत हुई उसके बाद अब उनकी आखिरी यात्रा निकाली जाएगी जो कि बहुत महत्वपूर्ण मानी जा रही है और उसमें भारत को भी इनवाइट किया गया था। नरेंद्र मोदी को भी इनवाइट किया गया था। लेकिन अब खबर यह है कि गवर्नर जो हैं बिहार के वो और विदेश राज्य मंत्री को भेजा जा रहा है। लेकिन नरेंद्र मोदी भी नहीं जा रहे हैं और यहां तक कि विदेश मंत्री को भी नहीं भेजा गया है। आखिर इसके क्या मायने हैं? इसको किस तरह से देखा जाए? मेरे साथ आज बेहद खास मेहमान जुड़ गए हैं देश और दुनिया के जानेमाने डिफेंस एक्सपर्ट और फोर्स मैगजीन के एडिटर प्रवीण साहनी जी। प्रवीण जी बहुत-बहुत स्वागत। वेलकम टू नाउ नेटवर्क। बहुत-बहुत शुक्रिया मुझे बुलाने का। प्रवीण जी सबसे पहला सवाल जो मेरे जेहन में आ रहा है और शायद हम सबके जेहन में आ रहा है वो यह कि एक तरफ तो हम यह देख रहे हैं कि एमओयू साइन हो गया है। हम ये देख रहे हैं कि बातचीत शुरू हो गई है। 60 दिन का एक वक्त जो है वो तय किया गया है। लेकिन उसके साथ-साथ लेबनान पर अटैक किया गया है। और अगर कल रात की ही बात की जाए तो यह कहा जा रहा है कि ह्यूमन हिस्ट्री का शायद नॉन न्यूक्लियर सबसे भारी बम जो है वो लेबनान पर इजराइल ने गिराया है। जो एमओयू की शर्तें हैं उसमें सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक है कि जितने भी रेजिस्टेंस जो फ्रंट्स हैं उन सब पर भी जो बॉमिंग है या किसी भी तरह का हमला है वो बंद होगा। अब आप इसको आगे किस तरह से देख रहे हैं क्योंकि इजराइल अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। उधर बातचीत भी हो रही है। उधर अमेरिका और इजराइल ईरान के बीच में एक्सचेंज भी हो रहा है। तो कैसे इस सबको आप आगे बढ़ता हुआ देख रहे हैं? जी इसको आप ऐसे समझने की कोशिश करते हैं कि जो एमओयू साइन हुआ है वो अमेरिका और ईरान के बीच में हुआ है। उसमें इजराइल शामिल नहीं है। अमेरिका को जिम्मेदारी दी गई है एमओयू के अंदर कि आप जो है कंट्रोल करेंगे इजराइल को। क्योंकि एमओयू साफ बोलता है कि उसमें हर फ्रंट के ऊपर सीज फायर चाहिए। तो यह जिम्मेदारी ट्रंप की है। पहली बात तो यह है। तो अब कितना वो कंट्रोल कर पा रहे हैं नितिन याू को वो हम देख ही रहे हैं। रोज क्या हो रहा है। तो उनका डायरेक्ट इसमें कोई एंगेजमेंट नहीं है इजराइल का। पहले हमें यह बात समझनी है। दूसरी बात यह है जहां तक ताल्लुक है अमेरिका का और ईरान का उन्होंने एमओयू साइन कर लिया है। उसमें मियाद दी गई है कि 60 दिन के अंदर इसको फाइनल डील में साइन करना है। पर साथ में यह भी लिखा गया है कि दिस इज एक्सटेंडेबल बाय म्यूचुअल कंसेंट। अगर दोनों पार्टी चाहेंग तो इसको एक्सटेंड कर सकती है। आज प्रेसिडेंट ट्रंप की सबसे बड़ी दिक्कत क्या है कि उनको यह जो एमओयू है इसमें सारे फायदे ईरान को है। वो इसलिए है क्योंकि ईरान ये लड़ाई जीता है। देखिए एमओयू जो है वो पीस टाइम में भी हो सकता है। अगर पीस टाइम का एमओयू होता तो दोनों साइड जो थी उनको इक्वल फ़ायदा होता जिसे हम बोलते हैं विनविन सिचुएशन। यहां पे वो हालत नहीं है। यहां पर एमओयू साइन हो रहा है एक जंग के बाद वो जंग जिसमें कि प्रेसिडेंट ट्रंप के पास आज कोई और मिलिट्री ऑप्शन नहीं है। अगर कोई ऑप्शन होता तो वो एमओयू साइन ही नहीं करते। तो इस एमओयू के अंदर जो ईरान को चाहिए है, ईरान की सारी शर्तें वो सारी की सारी मान ली गई है। पर अब क्या हो रहा है अमेरिका के अंदर बहुत दबाव आ रहा है प्रेसिडेंट ट्रंप के ऊपर कि आपने इतना ज्यादा क्यों दे दिया एमओयू में? क्योंकि कोई यह मानने को तैयार नहीं है आज अमेरिका में कि अमेरिका लड़ाई हार सकता है। ईरान वो भी ईरान के साथ। तो इस बात को क्योंकि जहां तक अमेरिकनंस का ताल्लुक है उनका जो सिक्योरिटी एस्टैब्लिशमेंट है, पॉलिसी मेकर्स हैं जो उनके एनालिस्ट है, थिंक टैंक्स हैं वो आज भी समझते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत जो है वो अमेरिका है। मिलिट्री टर्म्स के अंदर जो कि नहीं है। वो आज भी मानने को तैयार नहीं है कि दुनिया जो है बदल गई है। मल्टीपोलर दुनिया बन गई है। इसका मतलब उसमें तीन बड़ी ताकतें हैं। एक नहीं है। वो समझते हैं अमेरिका है पर अमेरिका एक ताकत है। चीन दूसरी ताकत है। रशिया तीसरी ताकत है। बड़ी ताकत जिसे हम ग्रेट पावर बोलते हैं। तो कहने का मतलब ये है जब आप इन सब बातों को सामने रखें रखें तो ये बिल्कुल तय समझ में आ जाता है कि प्रेसिडेंट ट्रंप को परेशानी हो रही है कि मैंने इतना ज्यादा क्यों दे दिया है। तो वो कभी तो अपनी सोशल मीडिया से धमकाते रहते हैं ईरान को। अब ईरान को धमकने की मतलब ईरान नीड नॉट बी स्केर्ड अबाउट इट फॉर द सिंपल रीजन ईरान हैज़ वन द वॉर। ईरान के पास हमेशा दो ऑप्शंस हैं। एक ऑप्शन ये है कि जब ईरान का मन करेगा वो स्टेट ऑफ हार्मोनस बंद कर सकता है। और ट्रंप कुछ भी नहीं कर सकते उसमें। और दूसरा ऑप्शन ये है ईरान जब चाहेगा बातचीत जो टॉक्स हो रही है उसमें जाएगा या नहीं जाएगा वो तय करेगा। जीती हुई पार्टी है। आज भी मिलिट्री ऑप्शंस है। आज भी ऑप्शंस है दुनिया को इकोनॉमिक प्रेशर में डालने के बहुत सारे। तो ये आप जब दोनों बातों को सामने रखते हैं। पहली बात ये कि इजराइल जो है वो डायरेक्टली एमओयू का हिस्सा नहीं है। दूसरी बात ये कि जो प्रेसिडेंट ट्रंप है और जो अमेरिका है वो मानने को तैयार नहीं है कि हम लड़ाई हार चुके हैं। कहने का मतलब यह है कि इसमें वक्त लगेगा। जो कहा गया है कि 60 दिन के अंदर फाइनल डील हो जाएगी तो ऐसा कुछ होने वाला है नहीं। पर यह बात तय है कि फिलहाल प्रेसिडेंट ट्रंप के पास कोई भी ऑप्शन नहीं है। इसलिए अभी लगता है कि किसी स्टेज पे जाके फाइनल डील साइन हो जाएगी। क्या आपको यह भी लग रहा है लोगों को भी यह डर है क्योंकि अमेरिका और इजराइल दो एक ऐसे कंट्री है जिन पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता है प्रवीण जी और ये कहा जा रहा है कि बार-बार पीस डील की बात डोनाल्ड ट्रंप ने की अब तक शायद 39 टाइम्स उन्होंने कहा और उसके बाद हमने देखा कि कोई डील नहीं हुई। ये पहली बार हम ये देख रहे हैं कि एक एमओयू बाकायदा तौर पर साइन हुआ है। क्या ये भी ये हो सकता है कि नितिन याू क्योंकि इजराइल में इलेक्शन है अक्टूबर में और उसके साथ-साथ नवंबर में अमेरिका में मिड टर्म पोल्स हैं। मेरे इसमें दो सवाल हैं। जाइनस लॉबी अमेरिका में आपको कितनी पावरफुल नजर आती है? जो ये कहा जाता है कि ऑलमोस्ट ऑल द बिग डिसीजंस आर टेकन बाय दिस लॉबी। डू यू अग्री विद दिस? और दूसरा मेरा सवाल कि क्या वही जाइनस लॉबी ये फर्दर क्या प्रेशर बना सकती है? क्या डोन्ड ट्रंप टाइम बोरो कर रहे हैं कि मिड टर्म पोल्स तक रुक जाया जाए नवंबर तक और फिर उसके बाद हम कुछ कुछ होता देखेंगे ईरान और अमेरिका के साथ या आपको लग रहा है कि ये वॉर रुक गई है थम गई है और ये जो डील है ये 60 दिन से हो सकता है कि और 90 दिन या चार महीने छ महीने भी हो सकता है बढ़ जाए लेकिन फाइनली यही साइन होने जा रहा है। देखिए इसमें कुछ आपने सवाल उठाए हैं जिसके जवाब यह हैं कि जहां तक जाइनेस्ट लॉबी का अमेरिका में ताल्लुक है वो बहुत पावरफुल है। पर उसके साथ-साथ हमें यह भी समझना है कि ट्रंप जो है वो प्रेसिडेंट और कमांडर इन चीफ है। तो प्रेसिडेंट ट्रंप चाहे तो उस पूरी पावरफुल लॉबी के अगेंस्ट खड़े हो सकते हैं। तो यह समझना है कि ऐसी क्या बात है कि वो खड़े नहीं हो पा रहे हैं। कोई पर्सनल कारण है वह जो बात होती रहती है एस्टीन फाइल की कुछ ऐसा मामला है वह हम जानते नहीं है। यह आपकी वाशिंगटन की पॉलिटिक्स है। अमेरिकनंस को पता है अंदर क्या हो रहा है। क्यों प्रेसिडेंट ट्रंप कमांडर इन चीफ अमेरिका के खड़े नहीं हो पा रहे हैं और बता नहीं पा रहे हैं कि मैं जो है आज आपको जो मैं एड देता हूं मिलिट्री एड जैसे आपको याद होगा जो वाइस प्रेसिडेंट है अमेरिका के जेडी व्स उन्होंने परेशान होकर खुलेआम यह एक बयान दिया था इजराइयलीज के लिए कि आप बंद कर दीजिए क्योंकि जो दो तिहाई मिलिट्री का आपके पास सामान है मिलिट्री वेयर है वो अमेरिका का है अमेरिका के पैसे से बना है कहने का मतलब अगर अमेरिका चाहे तो वो विड्रॉ कर सकता है और नितिन याू कुछ भी नहीं कर पाएंगे तो पहली बात तो ये हो गई दूसरी बात ये है जहां तक प्रेसिडेंट ट्रंप का ताल्लुक है देखिए ये उनकी उनकी सेकंड टर्म है और वो जो अगर आप उनकी नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी देखें जो वाइट हाउस निकालता है जब कोई नया प्रेसिडेंट आता है उसके पहले साल में निकाली जाती है वो साफ उसमें लिखा है प्रेसिडेंट ट्रंप वांट्स टू बी रिमेंबर्ड प्रेसिडेंट ट्रंप चाहते हैं कि उनके जाने के बाद उनकी जो प्रेसिडेंसी है उसको ऐसा समझाया समझा जाए दैट ही वास द प्रेसिडेंट फॉर पीस वो अपनी लेगसी छोड़ना चाहते हैं जो अभी नहीं हो पा रही है और वो फंस गए हैं इस पूरे मामले के अंदर। तो कहने का मतलब यह है यह मामला खींच भी सकता है और कोई बड़ी बात नहीं है। ये मामला बहुत भी खींच सकता है। पर उसमें क्या है कि टाइम जो है वो ईरान की साइड पर है। टाइम अमेरिका की साइड पे नहीं है। हर दिन जो बीत रहा है उसमें अमेरिका की क्रेडिबिलिटी गिर रही है दुनिया में। जो ग्लोबल साउथ कंट्रीज है जिसको हम थर्ड वर्ल्ड कंट्रीज है कहते हैं वो देख रही हैं। क्रेडिबिलिटी गिर रही है अमेरिका की। तो टाइम है ईरान के साथ तो ईरान लड़ाई जीत चुका है। टाइम ईरान के साथ है। तो सारे आप देख लीजिए पत्ते जो है वो ईरान के पास है। तो आप दोबारा इस वॉर को ट्रिगर होते हुए नहीं देख रहे हैं। आपको नहीं लग रहा है कि ये वॉर दोबारा ट्रिगर हो सकती है? देखिए प्रेसिडेंट ट्रंप फिर से कोशिश कर सकते हैं। मैं जैसे आपसे कह रहा हूं। जी के पास देखिए मिलिट्री ऑप्शन का मतलब होता है कि आपके पास कुछ ऐसी चीज है जिससे आप लड़ाई के अंदर कुछ नई चीज ला सकते हैं। तो उन्होंने एयर वॉर भी करके देख ली। कुछ नहीं हो पाया। 39 डेज करी। क्यों नहीं हो पाया? क्योंकि ईरानियंस की जो मिलिट्री फैसिलिटीज है वो सब अंडर ग्राउंड है। ग्राउंड ऑपरेशन है नहीं। अभी कई एनालिस्ट यह भी बोल रहे हैं कि ग्राउंड ऑपरेशन का करना चाहते हैं। वो इंतजार करेंगे और हो सकता है अभी देखिए जो मौसम है अभी गल्फ के अंदर उसमें आप लड़ाई नहीं कर सकते क्योंकि जो टेंपरेचर है वो 50 डिग्री सेंटीग्रेड से ज्यादा होते हैं। यह लड़ाई का मौसम नहीं है। यह भी कहा जा रहा है कि ग्राउंड वॉर जो है वो शुरू हो सकती है अगली मार्च को या दिसंबर में शुरू कर देंगे प्रेसिडेंट ट्रंप। देखिए उसके करने के लिए प्रेसिडेंट ट्रंप को पहले तो ग्राउंड ट्रूप्स चाहिए। 6ाउज के करीब जो अमेरिकन ट्रूप्स हैं वो है वेस्ट एशिया में पर कम से कम 3 लाख से ऊपर चाहिए। देखिए जब ये 1991 की लड़ाई हुई थी जो अमेरिका ने और सबने मिलकर लड़ी थी सदाम हुसैन के खिलाफ। उसमें उन्होंने छ महीने तक वहां पे बनाया था। उनकी ट्रूप्स बिल्ड अप हुआ था और करीबन 3 लाख सोल्जर लाए थे और जो इराक है इराक की अगर आप ज्योग्राफी देखें तो वो खुला एरिया है ईरान की देखें वहां माउंटेंस है फॉरेस्ट है और वो उनकी जमीन है ईरानियंस की उनको पता है वो उस लड़ाई के लिए भी तैयार है तो आप कहां से पहले 3 सा 3 लाख तो आप पहले उनको लाइएगा अपने सोल्जर्स को उसके लिए ड्राफ्ट करिए उसके लिए कांग्रेस की अप्रूवल चाहिए कहने का मतलब यह है आज जो उनके पास ऑप्शन था वो सिर्फ यही है कि मैं नेवल ब्लॉकेड कर दूं। ग्राउंड ऑप्शन है नहीं, एयर ऑप्शन है नहीं। तीसरा है कि मैं नेवल ब्लॉकेड कर दूं। और नेवल ब्लॉकेड भी अगर फिर से ये लड़ाई शुरू करते हैं तो उनके पास काबिलियत है। ईरान के पास ड्रोंस है, मिसाइल्स हैं। बहुत दूर तक मार कर सकते हैं एक्यूरेटली। तो ये जितना भी उन्होंने नेवल ब्लॉकेड बनाया है, जो उनके बड़े-बड़े जहाज हैं वो सब टारगेट होंगे। और एक बड़ा जहाज अगर डूब गया अमेरिका का तो अमेरिका की क्या इज्जत रहेगी दुनिया में? तो कहने का मतलब है बहुत परेशानी का वक्त है प्रेसिडेंट ट्रंप के लिए। अब वो जो करना चाहे उनकी मर्जी है पर हासिल कुछ नहीं होगा। क्योंकि आप मैं कई एक्सपर्ट्स को सुन रही थी। वो यही कह रहे थे कि टाइम बोरो किया जा रहा है दरअसल और जिस तरह से आपने भी जिस तरफ इंडिकेट किया कि वेदर जो है वो अभी फेवरेबल नहीं है। एक तरफ इलेक्शन और दूसरी तरफ वेदर। तो ये इंतजार किया जा रहा है कि थोड़ा ठंड का मौसम आए और उसके बाद शायद कुछ किया जाए क्योंकि इजराइल एक एक ऐसा कंट्री है जिसके अपने अपनी उसकी एस्पिरेशंस हैं जिसमें वो ग्रेटर इसराइल की बात करता है जिसमें वो प्रॉमिस लैंड की बात करता है जिसमें वो सिर्फ ईरान तक नहीं रुकता ईरान में तो उसको मुंह की खानी पड़ी है वो फिर बाद जॉर्डन से लेकर टर्की और आगे तक की बात करता है जो पूरा एक उसने अपना मैप तैयार किया हुआ है तो इसीलिए ये सवाल उठता है कि क्या वाकई में ये जो इतनी शर्म शर्मनाक हार हुई है। ये सिर्फ अमेरिका की नहीं इजराइल की भी है। इजराइल में जब एक पोल किया गया तो उसमें वहां के लोगों ने 92% लोगों ने कहा कि ये ईरान की बड़ी जीत है। तो ये एक तरह से शर्मनाक हार इन दोनों कंट्रीज की है। तो क्या ऐसे ही वो चुप बैठ जाएंगे? दूसरा मेरा सवाल इसी में जुड़ा हुआ ये है प्रवी प्रवीण जी कि जब हम ईरान को अभी देखते हैं तो एक तो ये है कि उसने पूरी दुनिया को ये बताया है कि एसिमिट्रिक वॉर किस तरह से लड़ी जाती है। उसका एक मॉडल पूरा दुनिया के सामने पेश किया है। उसने ये भी बताया कि 40 साल सेंशंस उसके ऊपर लगाए गए। लेकिन 40 दिन में उसने दुनिया को यह बता दिया कि अगर तैयारी की जाए तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी घुटनों पर लाया जा सकता है। अभी कौन सी कौन-कौन सी ऐसी चीजें हैं जो आपको लगता है कि पूरे तरीके से ईरान के फेवर में है। क्या जो कुछ एक्सपर्ट ये कह रहे हैं कि वो जीसीसी का सबसे ताकतवर मुल्क है हर तरीके से। क्या आप उससे एग्री करते हैं? देखिए जहां तक ईरान का ताल्लुक है ईरान आज स्टेट ऑफ हर्बोस कंट्रोल करता है। ईरान रेड सी कंट्रोल करता है। जो हुतीज हैं वो जब भी जाएंगे सो जो केबल्स होती है इंटरनेट केबल्स जो स्टेट ऑफ हर्बोस से जाती है उनको काट सकते हैं। इंटरनेट बंद हो जाएगा पूरा वेस्ट एशिया में। कुछ पार्ट साउथ एशिया के भी अफेक्टेड होंगे। इंडिया भी अफेक्टेड होगा। कुछ पोर्शन यूरोप के भी अफेक्टेड होंगे। उसके बाद आज उनके पास ड्रोंस हैं और उनके पास मिसाइल्स हैं जो 4000 कि.मी. पर भी मार्क कर सकती है। इंडियन ओशन में पूरा मिलिट्रेनियन ओशन सी को मिलिट्रेनियन सी को कवर कर सकते हैं। तो और सबसे बड़ी बात क्या है? ईरान की जो लड़ाई है वो लड़ाई जिसे हम कहते हैं वॉर ऑफ सर्वाइवल। उनके अंदर जो उनको उनको उन जो ईरानी है उसको पता है वो क्यों लड़ रहा है। अमेरिका को नहीं पता है उसके सैनिकों को कि वो क्यों लड़ रहे हैं। इससे बहुत फर्क पड़ता है। जो ईरान के जो कमांडर्स हैं उनको मालूम है हम इसलिए लड़ रहे हैं क्योंकि हमारी सर्वाइवल की बात है। आज अमेरिका में बहुत सारे लोग बोल रहे हैं ये हमारी लड़ाई ही नहीं है। ये लड़ाई इजराइल की है तो हम क्यों लड़ रहे हैं? तो जिसे कहता है ना कि अंदर से जो विल होती है जो जज्बा होता है लड़ाई का वो ईरान के साथ खड़ा हुआ है। तो कहने का मेरा मतलब ये है कि ईरान जो है अब मैं आपको एक बात और बताना चाहूंगा आपके दर्शकों को। ये कहना कि ईरान डोमिनेंट पावर है। ईरान सब पे हावी होगा। ईरान का ऐसा कोई मकसद है नहीं। अगर आप देखिएगा जो ईरान के फॉरेन मिनिस्टर हैं अब्बास अराची उन्होंने बार-बार इस बात को कहा है हम चाहते हैं एक रीजनल फ्रेमवर्क बने। इसका मतलब यह होता है दे आर लुकिंग फॉर अ सॉल्यूशन जो रीजनल स्यूशन हो। अगर आप एमओयू को भी पढ़ेंगी उसमें साफ लिखा हुआ है कि जो बाहर की ताकतें हैं वह रीजन से बाहर जाए मतलब कि अमेरिकन ट्रूप्स और वो सबको लेके एक साथ चलना चाहते हैं तो अगर आपको सबको लेके चलना है सारी ताकतों को जो रीजन में है तो आप यह नहीं कह सकते कि मैं सबसे बड़ी ताकत हूं। आप यह नहीं कह सकते कि आप ये यू हैव टू बिल्ड अ म्यूचुअल ट्रस्ट। अगर सब एक साथ महसूस करेंगे कि हां हमारा फायदा है। हम इसमें इक्वल हैं। तभी आप रीजनल फ्रेमवर्क बना सकते हैं। इसका और कोई तरीका नहीं है। क्या आपको ये लग रहा है कि ये जीसीसी कंट्रीज से जो अमेरिकन बेसिस है क्योंकि इनिशियली ईरान की तरफ से ये कहा गया था कि उनका मकसद ये है कि जो मोनोपोली है अमेरिका की खासतौर पर इस ख्ते में उसको खत्म किया जाए। क्या इस तरफ भी जाता हुआ आप देख रहे हैं कि धीरे-धीरे करके ही सही इस पूरे जीसी से जो अमेरिकन बेसिस है जिससे जिसका इस्तेमाल करके ईरान पर हमला किया गया और एक तरह से ये कहा जाता रहा है उसमें कोई दो राय भी नहीं है कि ये कंट्रीज जो है वो दरअसल अमेरिका के इजराइल के पिट्ठू बनकर काम करती है और यूएई को तो दूसरा इजराइल ही कहा जा रहा है। क्या आपको लग रहा है कि वहां से जो अमेरिकन बेसिस है वो धीरे-धीरे भी खत्म हो सकते हैं। धीरे-धीरे वहां से हटना शुरू हो सकते हैं। क्या इन कंट्रीज को यह कोई रियलाइजेशन हुआ है? किस तरह से देखते हैं? या फिर यह फरी है कि अभी के लिए वॉर रुक जाए। हमारा बहुत नुकसान हो रहा है। तेल हम नहीं बेच पा रहे हैं। कारोबार का नुकसान है। सेफ हेवन की जो एक छवि थी यूएई की वो पूरी तरीके से कोलैप्स हो गई है। देखिए इसमें एमओयू में बिल्कुल साफ लिखा है कि जो ईरान के आसपास जितने भी अमेरिकन बेससेस हैं, ट्रूप्स हैं उनको हटना पड़ेगा। अगर आप देखिएगा आज अमेरिका के 60 थाउज सोल्जर्स वेस्ट एशिया में हैं। 10 कंट्रीज में है। 19 बेससेस में है। उन 10 कंट्रीज में से पांच कंट्रीज हैं जीसीसी जो कि आप जानती हैं सऊदी अरेबिया, कतर, बहरेन, कुवैत, यूएई। तो उन वहां से भी हटना पड़ेगा। यह एमओयू में लिखा है बिल्कुल साफ। जो एमओयू प्रेसिडेंट ट्रंप ने खुद साइन किया है। अगर प्रेसिडेंट ट्रंप खुद साइन कर रहे हैं इसका मतलब जिम्मेदारी ली है प्रेसिडेंट ने खुद कि मैं इसको मुकम्मल करूंगा। मैं इसकी फाइनल डील तक लेके जाऊंगा। तो जहां तक सवाल आपने यूएई का बोला है तो तीन ऐसी जीसीसी कंट्रीज हैं जो एक यूएई है, एक बहरेन है, एक कुवैत है जो अभी भी सोच रही हैं कि हमारे ऑप्शंस हैं। हम यह भी कर ले, वो भी कर लें। तो कहने का मतलब यह है कि वो ऑप्शन आप एक्सरसाइज कर सकते हैं। उससे कोई परेशानी देखिए रीजनल ऑर्डर का मतलब यह होता है कि एक रीजन जो है वो सिक्योरिटी रीजन तय करेगा। उसका मतलब यह नहीं होता कि आप किसके साथ ट्रेड करेंगे वो रीजन रीजनल पार्ट तैयार तय करेंगे। तो जहां तक उनके ट्रेड का ताल्लुक है इजराइल के साथ उसका जो इसका यूएई का ताल्लुक है उसकी बात एमओयू में कोई जिक्र नहीं है। अच्छा अब सबसे बड़ी एक और प्रॉब्लम जो आती है प्रेसिडेंट ट्रंप के लिए अगर ये बेस यहां से हट जाती है। इसका मतलब यह है जो एमओयू में लिखा है। तो उसका मतलब यह है कि पेट्रोल डॉलर जो है वो धीरे-धीरे खत्म हो जाएगा। और अगर पेट्रोल डॉलर खत्म हो जाता है इसका मतलब जो अमेरिका है उसकी इकॉनमी जो है वह बिल्कुल कमजोर पड़ जाएगी। उसका मतलब यह है अगर उसके पास इकॉनमी कमजोर हो जाएगी तो उनकी आज करीबन 750 मिलिट्री बेससेस हैं दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में तो वो उसको कायम नहीं रख पाएंगे। इसका मतलब है अमेरिकन एंपायर डूब जाएगा। एक तो उस देखिए अमेरिका की दो ताकतें हैं। एक है उसकी मिलिट्री पावर जो ऑलरेडी यहां हार चुकी है वेस्ट एशिया में और बाकी दुनिया में जो उनकी मिलिट्री बेससेस है हर मुल्क देख रहा है जहां उनकी बेसिस है कि हम अपने लिए अब क्या करें और दूसरी है उनका रिजर्व करेंसी ऑफ द वर्ल्ड जो डॉलर है। अगर पेट्रोल डॉलर बंद हो जाते हैं या इसमें तब्दीली आ जाती है जो उनकी अभी मतलब एग्रीमेंट है तो उसमें उसमें भी उनको प्रॉब्लम होगी। वो रिजर्व करेंसी नहीं रहेगा। अभी आप देखिएगा उनका सबसे करीबी जो एलआई है मिलिट्री एलआई वो है जापान हमारे एरिया रीजन के अंदर वो जापानीज भी जो है वो उनकी जो ट्रेजरी बंड्स है अमेरिकन के उनको बेच रहे हैं। सब मुल्क जो है वो गोल्ड खरीद रहे हैं। क्योंकि क्रेडिबिलिटी जो अमेरिकन डॉलर की है वो गिर गई है। तो ये सब बड़ी-बड़ी तब्दीलियां हो रही है। ये जो चीज है ये सिर्फ लड़ाई से जुड़ी नहीं है। इस लड़ाई में हमको यह समझना है हुआ क्या है? इस लड़ाई में दुनिया की सबसे बड़ी ताकत जो मानी जाती थी उसकी शिकस्त हो गई है बैटल फील्ड पे। उसके साथ-साथ जुड़ी हुई जो उसकी काबिलियत थी वो सब कमजोर पड़ गई है। ये समझना है हमें। जी। बहुत महत्वपूर्ण बात है कि जब ये वॉर शुरू हुई थी उससे पहले शायद किसी ने नहीं सोचा होगा। लोग ये सोच रहे थे कि ईरान कितने दिन टिक पाएगा। अब सवाल ये है कि अब लोग ये देखते हैं कि अमेरिका कितने दिन टिक पाएगा? किस तरह से चीजें जो है वो कंप्लीटली बदल गई है। पूरी दुनिया का नजरिया ईरान और अमेरिका को देखने का ही कंप्लीटली बदल गया है। और उसमें सबसे बड़ा लूजर अगर कोई है तो वो साफ तौर पर देख सकते हैं। हम इजराइल और अमेरिका ये दोनों साफ तौर पर देख सकते हैं कि ये सबसे बड़े लूजर हैं। मैं कुछ और सवाल है उन पर आऊं। उससे पहले प्रवीण जी मैं भारत पर आना चाहती हूं और उससे पहले पाकिस्तान ने जिस तरह से इस पूरे के पूरे मिडिएशन में जो रोल निभाया है पाकिस्तान एक ऐसा कंट्री चीन की उससे दोस्ती है। रशिया से है। सऊदी अरब से है। अमेरिका से भी उसकी दोस्ती है। ईरान भी उसका दोस्त है। यानी कि अगर दो की जगह चारप हाथ भी होते तो तमाम हाथों में उसके लड्डू फिलहाल नजर आ रहे हैं। ये फिलहाल जो उसने मिडिएशन किया है। एक तरफ ईरान के सिग्नेचर, एक तरफ अमेरिका के सिग्नेचर और नीचे मिडिएशन में शाहबाज शरीफ के सिग्नेचर इससे पाकिस्तान की पोजीशन किस तरह से बदली है और क्या आपको लग रहा है कि पहले से ज्यादा पावरफुल क्या पाकिस्तान भी हुआ है और अगर ऐसा है तो ये भारत के लिए कितने खतरे की बात है। देखिए पाकिस्तान की कहानी मैं आपको शुरू करके बताता हूं ऑपरेशन सिंदूर से। ऑपरेशन सुंदर लड़ाई जो थी वह सिर्फ चार दिन की थी। पर उस चार दिन की लड़ाई के बाद अमेरिका ने यह फैसला किया जो उन्होंने लिखा हुआ है अपनी कांग्रेस यूएस कांग्रेस रिपोर्ट में 2025 की कि इन चार दिन की लड़ाई के अंदर जो क्लैश हुआ था पाकिस्तान ने इंडिया से बेहतर किया है। उसी का नतीजा था कि 2025 के एंड में जो पाकिस्तान और सऊदीज हैं उनका डिफेंस एग्रीमेंट हुआ। याद करिएगा। तो ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान और सऊदी अरेबिया के मिलिट्री ताल्लुकात पहले नहीं थे। वो 70 से हैं। पर ये पहली बार हुई कि हुआ कि उनका एक फॉर्मल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ। इसका मतलब ये हुआ कि अब जो है पाकिस्तान के सैनिक होंगे वेस्ट एशिया में। उसके बाद आप देखिएगा कि ये लड़ाई शुरू हो गई। इस लड़ाई के शुरू होते ही क्या हुआ? पाकिस्तान पहले तो फैसिलिटेटर बना। क्यों फैसिलिटेटर बना? क्योंकि पाकिस्तान के सिंदूर के कारण जिसमें सिंदूर ने बहुत बड़ा पार्ट रोल प्ले किया। उनके रिश्ते जो है अमेरिका के साथ बहुत अच्छे हो गए। प्रेसिडेंट ट्रंप के साथ। याद करिएगा प्रेसिडेंट ट्रंप ने जो पाकिस्तान के आर्मी चीफ है फील्ड मार्शल आसिम मुनीर उसको दो जून 2025 में लंच के लिए बुलाया था। वाइट हाउस में वन ऑन वन लंच हुआ था, बातचीत हुई थी। तो जैसे आप बता रही हैं पाकिस्तान आज एक ऐसा मुल्क है जो मल्टीपोलर वर्ल्ड में तीनों बड़ी ताकतों के साथ उसके रिश्ते अच्छे हैं और वो ऐसा मुल्क है जो कि सब रीजनल पावर समझती है अब उनको समझ में आ गया है कि जो मिलिट्री कैपेबिलिटीज है और वो कैसे समझ रही है सिंदूर से कि मिलिट्री कैपेबिलिटीज में पाकिस्तान कम नहीं है। फिर उनके यह भी समझ में आ गया कि पाकिस्तान लड़ाई लड़ने की विल रखता है कि वह लड़ते हैं, लड़ने को तैयार है। वह हमने जितने भी ऑपरेशंस किए हैं पाकिस्तान के साथ पिछले 12 साल में हमने हमेशा उनके टेररिस्ट टारगेट को करा को टारगेट किया है। उन्होंने हमेशा रिटर्न में हमारे मिलिट्री टारगेट्स को टारगेट किया है। मिलिट्री टारगेट का मतलब होता है यू आर शोइंग द विल टू फाइट। फिर वो मुस्लिम कंट्री है। फिर वो वही अकेला मुस्लिम कंट्री है जिसके पास न्यूक्लियर वेपन्स है। फिर वो एक ऐसा मुल्क है जहां पे डिप्लोमेसी बहुत अच्छी वो समझदारी से करते हैं। अगर उनको थोड़ी सी किसी की बढ़ाई भी करनी होती है। वो कर देते हैं। हमने जैसे प्रेसिडेंट ट्रंप को नहीं दिया यह श्रेय कि आपने सीज फायर करवाया है। उन्होंने फौरन दे दिया पाकिस्तान ने और यह भी कह दिया कि साहब जो है आपको पीस प्राइज के लिए हम नोबेल पीस के लिए नॉमिनेट करते हैं। कहने का मतलब यह है पाकिस्तान ने तीन बड़ी-बड़ी चीजें हासिल करी है। पहली बात शुरुआत हुई थी एज अ फैसिलिटेटर। 11th ऑफ अप्रैल को जब यह पहली बार हुआ था कि दोनों साइड बातचीत करेंगी तो इस्लामाबाद में तय हुआ था बातचीत हो गई होगी। आपको याद होगा वो 11 अप्रैल को था। फैसिलिटेटर का मतलब सिर्फ इतना होता है कि आप जगह जो है ऐसी बनाएं दोनों साइड के लिए जो दोनों साइड को लगे कि हां मैं यहां पर सिक्योर हूं। सो दे वर ओनली द फैसिलिटेट। उसके बाद वो मीडिएटर बन गए। मीडिएटर का मतलब होता है कि आप एक दोनों साइड आप बात नहीं कर रही है एक दूसरे से तो आप एक साइड के पास जाइएगा। उसके उसकी प्रॉब्लम समझिए। दूसरी साइड को बताइए। वह बताएगा आपको मेरी क्या प्रॉब्लम है? तो आप मीडिएट कर रहे हैं। उसके बाद अब क्या हुआ है? क्योंकि उन्होंने उनको ये जो उनकी काबिलियत मैंने आपको बताई है इकलौता कंट्री है जो वेस्ट एशिया का कंट्री नहीं है। पर उसको वेस्ट एशिया में शामिल कर लिया गया है। और वो शामिल कैसे हुआ है? अगर आप देखिएगा जो एमओयू साइन हुआ है जो ईरान ने एमओयू साइन करा है उस पर लिखा हुआ है इस्लामाबाद एमओयू। और जो तीन बड़ी-बड़ी और जो ताकतें हैं रीजनल पावर्स दैट मैटर कौन सी है रीजनल पावर्स जैसे कि इजिप्ट है जैसे सऊदी अरेबिया है टर्की है उसमें पाकिस्तान भी शामिल हो गया है तो आज पाकिस्तान जो साउथ एशियन कंट्री है अब वो जुड़ चुका है वेस्ट एशिया के साथ तो अब आप समझ सकती हैं वो कहां से कहां पहुंच चुका है। जी ये तो एक तरह का रेवोल्यूशन है कि किस तरह से कहां से कहां वो पहुंचा है और आपने बेहतरीन तरीके से उसको यहां एक्सप्लेन किया है और इसी इसी में जुड़ा हुआ मेरा सवाल ये था कि आखिर प्रवीण जी ये ये क्या अचानक हम ये होता हुआ देख रहे हैं या फिर ये एक पाकिस्तान की लॉन्ग स्ट्रेटजी थी जिस जिसका हम नतीजा यहां पर हम सामने आता हुआ देख रहे हैं या आप ये देखते हैं कि जो जिस तरह से ज्योग्राफी है उसकी वो उसको बहुत सूट करती है या जो एक मिलिट्री पावर पावर है, न्यूक्लियर पावर है। इसलिए वो वो सूट करता है उसको। क्या आखिर रीज़ है कि चाहे हम अमेरिका की बात करें, चाहे हम ग्लोबल नॉर्थ की बात करें या ग्लोबल साउथ की बात करें। दोनों तरफ की जो पावर्स हैं वो पाकिस्तान से हाथ मिलाना चाहती हैं या या पाकिस्तान के साथ खड़ी हुई हैं। देखिए सब कुछ है। मुस्लिम नेशन है, न्यूक्लियर वेपन है, कनेक्टिविटी है, ज्योग्राफी है। पर सबसे बड़ी बात यह है जो हमें समझनी है कि उनके जो जनरल्स हैं आर्मी के वो फॉरेन पॉलिसी में बहुत ज्यादा अच्छे हो गए हैं। इसकी मैं आपको मिसाल देता हूं कि 1998 में जब हिंदुस्तान ने न्यूक्लियर टेस्ट किए थे तब अमेरिका क्लिंटन एडमिनिस्ट्रेशन थी वो कोशिश कर रहे थे कि पाकिस्तान टेस्ट ना करें। तो जो उनके एक बहुत रिप्रेजेंटेटिव थे स्ट्रोप डालबर्ट अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट थे वो कोशिश कर रहे थे कि उस समय जो उनके प्राइम मिनिस्टर है नवाज शरीफ उनको कांटेक्ट करें। तो नवाज शरीफ के दफ्तर में कोई फोन ही नहीं उठा रहा था। फिर उन्होंने जो आर्मी चीफ थे जनरल जहांगीर करामत वहां फोन किया। उन्होंने कहा आ जाइए हमसे बात करिए। तो बात हुई उसमें जहांगीर करामत ने दो टूक बोल दिया अमेरिकनंस को ये हमारी नेशनल सिक्योरिटी है। हम कॉम्प्रोमाइज नहीं करेंगे। आप जाइए। तो उन्होंने उसके बाद उन्होंने भी टेस्ट किए। हम जानते हैं। उसके बाद एक नोट भेजा जनरल जहांगीर करामत ने फॉरेन ऑफिस में। कि देखिए अब जो पाकिस्तान है न्यूक्लियर वेपन स्टेट हो गया है। तो अब हमारा भी रोल बन गया है डिप्लोमेसी में फॉरेन पॉलिसी में। और अब आप अगर जो देख रही हैं तो जो फील्ड मार्शल आसिफ मुनीर है जो रास्ता शुरू किया था जनरल जहांगीर करामत ने वो आसिफ मुनीर आगे ले गए हैं। ये जो बात हो रही है जो ट्रंप भी बात करते हैं वो कहते हैं माय फेवरेट फील्ड मार्शल तो सारी देखिए यह मैं यह नहीं कह रहा हूं कि उनके जो प्राइम मिनिस्टर है उनको नहीं मिलना चाहिए मतलब कामयाबी का वो ही शुड आल्सो गेट द थिंग बट द पॉइंट इज़ दैट मोर एंड मोर कंट्रीज दे वांट टू टॉक टू फील्ड मार्शल आसिए मुनीर बिकॉज़ दे नो दैट दीज़ पीपल अंडरस्टैंड डिप्लोमेसी दे अंडरस्टैंड हाउ टू टॉक टू देम बिकॉज़ दिस इज़ समथिंग दे हैव वर्क वेरी वेल एंड दे आर द पीपल हु आर इन पॉवर इन द जीएचक्यू तो आप ये सब चीजों को सामने रख के फिर एक फोटो देखिए तो आपको समझ में आ जाएगा कि डिप्लोमेसी में और स्पेशली अभी जैसे दुनिया बदल रही है। हमारे जो डिप्लोमेट्स हैं जो फॉरेन पॉलिसी जो हमारी बनाते हैं पहली तो बात ये है कि सरकार फॉरेन पॉलिसी बनाती है हमारी। डिप्लोमेट्स तो बनाते नहीं। उनका काम है उसको आगे ले जाना। पर आज भी मैं समझता हूं हमारी जो सबसे बड़ी खामी है शॉर्ट कमिंग है हमारे डिप्लोमेट्स की उनको मिलिट्री पावर समझ में नहीं आती जो कि केस नहीं है पाकिस्तानी जनरल्स के साथ क्योंकि वो सिक्योरिटी तो शुरू से ही देख रहे थे मिलिट्री लाइन लाइन ऑफ कंट्रोल जब बनी थी फर्स्ट जनवरी 49 से तो वो उनकी जिम्मेदारी बन गई सीज फायर लाइन तो उनको वो भी समझ में आता है उनको ये भी समझ में आता है और वो पीछे नहीं हटते किसी को थोड़ा सा बताने में कि हां साहब आपने सीज फायर कराया। यू सी इन टर्म्स ऑफ वो ये भी झिझकते नहीं है कि मैं ही सारा क्रेडिट ले लूं। वो दूसरे को क्रेडिट दे देते हैं अगर उनका फायदा हो रहा है। तो ये सब बातें होती है जिनको समझना पड़ता है। बिल्कुल प्रवीण जी आई थिंक यू आर द ओनली वन इन इंडिया एंड खास तौर पे एस अ डिफेंस एक्सपर्ट जो पाकिस्तान को लेकर जो है वो आप बिल्कुल खुल के बात करते हैं। प्रो पाकिस्तानी होने के भी आपके ऊपर टैग्स जो है वो लगते रहे हैं कि आप जो है पाकिस्तान के एप्पल ऑफ द आए हैं। तो वो भी आपके साथ होता रहा है। बट जो है हकीकत वो हकीकत आप यहां पर रख रहे हैं। सवाल मेरा यह है प्रवीण जी लेकिन आपसे कि भारत की फॉरेन पॉलिसी को आप कैसे देख रहे हैं? अभी हमने देखा कि राजनाथ सिंह जिन्होंने संसद में झूठ बोला कि ये पूछिए हमसे कि क्या हमारा कोई जवान शहीद हुआ है? कोई मारा गया है तो मेरा जवाब है नहीं। और उसके इतने दिनों के बाद हम ये देख रहे हैं कि छह जो जवान हैं जो हमारे ऑफिसर्स थे जवानी ऑफिसर्स थे उनकी शहादत हुई और उनके नाम हमें अब पता चल रहे हैं। ये कितना बड़ा धोखा है देश के साथ ये एक तरह से आप ये देखें कि वो लोग जिन्होंने अपनी जान गवा दी देश के लिए उनके नाम तक भी आप सामने नहीं लेकर आए। ये किस तरह का ढोंग है? एक तो ये मेरा सवाल और दूसरा हमारी फॉरेन पॉलिसी आखिर जा कहां रही है? एक ऐसा मौका जो नरेंद्र मोदी को मिला जो उन्होंने गलतियां की जब ईरान के ऊपर ये इललीगल वॉर छेड़ी गई और उसके बाद उन्होंने ना श्रद्धांजलि दी ना सही से उन्होंने कंडेम किया बल्कि जीसीसी कंट्रीज जितने भी है उनको फोन कर करके वो बाकायदा तौर पर उसको कंडेम कर रहे थे इजराइल के लिए तो वो उन्होंने क्या-क्या किया वो पूरी दुनिया को अभी पता है अमेरिका के आगे वो कैसे नतमस्तक है ये भी पता है लेकिन एक मौका था कि वो इस हिस्टोरिक डे जो था उसमें वो शिरकत कर सकते थे शायद पुरानी गलतियों को सुधार सुधार सकते थे लेकिन वो भी उन्होंने गवारा नहीं किया। तो क्या कंप्लीटली भारत सरकार नरेंद्र मोदी ये बता रहे हैं कि हम है तो ग्लोबल साउथ का हिस्सा लेकिन हम खड़े हैं ग्लोबल नॉर्थ की तरफ और ऐसी क्या मजबूरी है? क्या वो समझ नहीं पा रहे हैं कि ये दुनिया जो है वो बदल गई है इस वॉर के बाद। देखिए आपने इसमें दो-तीन सवाल उठाए हैं जिसके जवाब मैं देता हूं। पहली बात आपने फॉरेन पॉलिसी की बात करी है। देखिए मैं तो तकरीबन चार साल से कह रहा हूं। कम से कम चार साल से कह रहा हूं कि हमारी फॉरेन पॉलिसी गलत है और उसमें गलती क्या है कि दुनिया बदल गई है। आज एक बड़ी ताकत नहीं है। आज तीन बड़ी ताकतें हैं। दो बड़ी ताकतें हमारे साथ ज्योग्राफिकली हमारे से नजदीक है। ये आप समझिएगा। रशिया है और वो है, चाइना है। हमारे से बिल्कुल जुड़े पड़े हैं। फिर क्या हुआ है कि जो पूरी जिओपॉलिटिक्स है जिसको हम बोलते हैं ट्रेड कनेक्टिविटी पावर वो और कंटेस्टेशन ग्रेट पास का वो सब हमारे रीजन में आ गया है। तो हमें उसका फायदा उठाना चाहिए। हमें क्या देखिए अमेरिका एक बड़ी ताकत है। पर अमेरिका हमारे से 12,000 कि.मी. दूर है आज और वर्ल्ड मल्टीपोलर है। तो मैं कह ही रहा हूं कि हमारे को अगर अपने देखिए फॉरेन पॉलिसी का मतलब होता है कि जो हमारे गरीब लोग हैं बहुत गरीब मुल्क है ये हिंदुस्तान। उसके लिए आप कुछ ऐसा करिएगा कि आपको उन लोगों की मदद हो सके। उनकी बेहतरी हो सके उनकी जिंदगी के अंदर। तो उसमें तो मुझे कोई शक नहीं है। फॉरेन पॉलिसी गलत है। अच्छा अब आपने बात करी डिफेंस मिनिस्टर के बारे में। देखिए ये बातें होती हैं जो याद रहती हैं लोगों को। अब मैं आपको याद दिलाता हूं 2019 की। 2019 को जब बालाकोट अटैक किया गया था। उस समय अगर आप याद करिएगा तो क्या हुआ था? हमने खुद अपने एक हमारा जो था हेलीकॉप्टर हमारी ही मिसाइल से उसको गिरा दिया था। याद करिएगा छह और छह या सात लोग हमारे उस मारे गए थे। एयर फोर्स ने अपनी मिसाइल से अपने ही हेलीकॉप्टर को गिरा दिया था। उस पूरे कन्फ्यूजन में जो जब उन्होंने हमारे पे वो काउंटर अटैक किया जिसको बोलते हैं ऑपरेशन स्वफ्ट रिकॉर्ड जो पाकिस्तान ने किया था हमारे ऊपर वंस वी हैड डन द बालाकोट अटैक्स तो उसके बाद सरकार ने उस रिपोर्ट को जाहिर ही नहीं किया जब तक कि 2019 के इलेक्शन नहीं हो गए वहां तक रुके रहे पहली बात इन बातों को आप समझने की कोशिश करिए दूसरी बात क्या है जो अब यह बात हो रही है कि छह शहीद हो गए और बयान दे दिया राजनाथ सिंह ने पार्लियामेंट में। यह बात इतनी नहीं है। इसके आगे भी है। क्योंकि अभी तक यह नहीं हमको पता है कि जो एयर वॉर हुई थी सिक्स्थ और सेवंथ मई की नाइट को क्या हमारा कोई जहाज गिरा था? क्या हमारा कोई पायलट जो जहाज में था वो जख्मी हुआ था या क्या हुआ था उसका? वो तो हमें मालूम ही नहीं है। तो ऐसी बात नहीं है। यह बात कुछ और भी खुलेगी। आगे चलके सच सामने आएगा। कहने का मतलब यह है कि ये सरकार की जिम्मेदारी है कि आपका जो हुआ है। अब जैसे अमेरिका है पता चल जाता है कि अमेरिका की इतने लोग मारे गए हैं उस लड़ाई के अंदर। इतने इनके हवाई जहाज गिर गए हैं। हमारा पता नहीं चल पा रहा है इन सब चीजों का। तो मेरे कहने का ये दूसरी बात है। अब मैं बात करता हूं आपने पाकिस्तान जो मुझे थोड़ा सा आई स्टार्टेड स्माइलिंग कि आई एम द एप्पल ऑफ द आई ऑफ़ पाकिस्तान। ये गलत बात है बोलना। दैट इज नॉट ट्रू। व्हाट इज ट्रू इज दैट आई आई मीन दैट्स दैट्स नॉट माय क्लेम। आई आई जस्ट से कि आपको सोशल मीडिया पे इसी तरह से कहा जाता है। जी दैट्स नॉट द पॉइंट फॉर मी मोस्टेंट कंट्री इज इंडिया। दिस इज माय कंट्री। दिस इज माय मदरलैंड। बट मैं जानता हूं कनेक्टिविटी का क्या मतलब होता है। मैं जानता हूं जिओपॉलिटिक्स क्या होती है और मैं यह भी जानता हूं कि पाकिस्तान और हम एक सिविलाइजेशन के हैं। मैं ये भी जानता हूं कि आज अगर हमें किसी मुल्क के साथ बात करनी है, उससे दोस्ती करनी है तो वो पाकिस्तान है। इसका मतलब ये नहीं है कि अब पाकिस्तानी मेरे क्या बारे में सोचते हैं वो दूसरी बात है। पर मैं समझता हूं कि पाकिस्तान इज एक्सट्रीमलीेंट फॉर इंडिया। पाकिस्तानीज आर दे शुड बी आर स्टंग वी शुड हैव स्ट्रांग टाई वि देम हम एक ही लोग हैं दो मुल्कों में हमें इस बात को समझना है ये मैं कहना चाहता हूं जी तो क्या इसीलिए ये ट्रैक टू डिप्लोमेसी कहें कॉन्वर्सेशन कहें क्या ये शुरू हुई है जिसको सरकार ने कंप्लीटली ये कहा कि हमारे से कोई मतलब नहीं है कोई एक्स ऑफिसर क्या बात कर रहे हैं और ये कोई ऑफिशियल नहीं है इस तरह की बातें कही गई हालांकि उसमें राम माधव भी भी थे। उसमें एमएम नरवनी भी थे और यह मुलाकात कोलंबिया में हुई है। तो क्या इसको इस तरह से देखा जाए और आरएसएस ने भी अब से कुछ दिन पहले पैरवी की थी कि बातचीत होनी चाहिए। तो ये जो एक तरह का सॉफ्ट कॉर्नर खास तौर पे आरएसएस की तरफ से जो देखने के लिए मिल रहा है। ये क्या आपको लगता है कि बिना सरकार की रजामंदी के ये हो रहा है और इसको आप फिर किस तरह से देख रहे हैं? क्योंकि एक बार फिर से आपने पाकिस्तान की बात की तो आई थॉट आई शुड ब्रिंग दिस टू। देखिए जहां तक मोदी सरकार का ताल्लुक है मुझे कोई शक नहीं है। आप ट्रैक टू कर लीजिए, ट्रैक थ्री कर लीजिए, फोर कर लीजिए, बाहर के मुल्क बुला के बातचीत करवा लें। पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते नॉर्मल नहीं होंगे। जब तक ये सरकार है इसमें कोई शक नहीं है। और मैं आपको और आगे भी बता दूं कई लोग मेरे से ये पूछते रहते हैं कि देखिए चीन के साथ रिश्ते कैसे नॉर्मल होंगे। तो मैं उन्हें कहता हूं देखिए फॉरेन पॉलिसी जो तय हुई है इस सरकार ने जो की है कि हम कमट हमको वी शुड लुक इन कंपटीशन वि चाइना हम चाइना के साथ पार्टनरशिप नहीं करेंगे तो वो नहीं करेगी और जहां तक पाकिस्तान का ताल्लुक है मैं पहला इंसान हूं जो बहुत खुश होगा अगर पाकिस्तान के साथ हमारे रिलेशंस नॉर्मल हो नॉर्मल का मतलब ये होता है कि हमारी जो दोनों हाई कमीशन है उसको आप पहले फुल स्ट्रेंथ में लाइए गा वह पहली रिक्वायरमेंट है। यह ट्रैक टू और ट्रैक थ्री का कोई मतलब ही नहीं है। जहां तक यह सरकार का ताल्लुक है। तो अभी आरएसएस क्या कह रही है? जहां तक राम माधव का ताल्लुक है। उन्होंने खुद क्लेरिफाई कर दिया है कि मैं जो है ट्रैक टू में नहीं था। वो एक कॉम्पोजिट डायलॉग था। जहां और भी मुल्क के लोग थे। मुझे पता नहीं वो कोलंबो में या कहां हुआ है। तो वहां पर ही जस्ट ही सेड क्लियर किया उन्होंने कि एक सेशन था जिसमें मैंने जाकर टॉक दी है और मैं वापस आ गया हूं। और जहां तक ताल्लुक है आरएसएस के जनरल सेक्रेटरी का देखिए वो हटसन इंस्टट्यूट से आए थे वापस अमेरिका से दौरा करके आए थे और अमेरिकनंस चाहते हैं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान जो है उन दोनों की बातचीत शुरू हो और प्राइम मिनिस्टर मोदी को आरएसएस की क्लीयरेंस नहीं चाहिए उसके लिए कितना भी दबाव डाल ले अमेरिकनंस मैं नहीं समझता हूं कि प्राइम मिनिस्टर मोदी नॉर्मल रिलेशंस करेंगे पाकिस्तान के साथ कि वही बात है जैसे कि कितना दबाव डाला प्रेसिडेंट ट्रंप ने कि उनको क्रेडिट मिले कि मैंने सीज फायर करवाया जिसमें उसका योगदान है। उनका योगदान है। देयर इज एविडेंस फॉर दैट बट हम नहीं माने। हम तो ये सरकार की फॉरेन पॉलिसी बिल्कुल तय है। उसके अंदर पाकिस्तान के साथ नॉर्मल रिलेशंस बिल्कुल शामिल नहीं है। इसमें कोई शक नहीं होना चाहिए। अब ठीक है आप कपड़े चलाते रहिए और नॉर्मल रिलेशंस नॉर्मलाइज करना रिलेशंस को चाइना के साथ वो भी शामिल नहीं है बिकॉज़ वी विल नॉट बी जो वोंग ही बोलते रहते हैं उनके फॉरेन मिनिस्टर बार-बार कि इंडिया एंड चाइना शुड नॉट बी राइवल्स वी शुड बी पार्टनर्स बट वी वांट टू बी सीन एस द राइवल्स ऑफ चाइना इन द रीजन तो वो नॉर्मलाइज रिलेशंस नहीं होंगे अब हमारी फ्लाइट्स चालू हो गई है इकोनमिक रिलेशंस चालू हो गए हैं पर वहां से इन्वेस्ट मेंट नहीं आएगी क्योंकि म्यूचुअल ट्रस्ट ही नहीं है। जो अनफॉर्चूनेट है ये फॉरेन पॉलिसी गलत है। मैं तो बहुत वक्त से बोल रहा हूं। तो ये लेकिन इजराइल और अमेरिका के साथ जो इतनी नजदीकियां है खासतौर पर इजराइल के साथ हम तो उस देश के तौर पर जाने जाते थे जो गाजा के सवाल पर जो सबसे पहले टू नेशन थरी की जिन्होंने बात की जिसने वकालत की। अभी जो रिपोर्ट आई है यूएन की वो ये साफ तौर पर बताती है कि 20,000 बच्चों को टारगेटेड क्लीन जो है वो इजराइल ने की है। तो हम ऐसे जेनुसाइडल जो कंट्री है या उनका जो हेड है नितिन याहू उसके साथ इतनी दोस्तियां उसके साथ इतनी गलबियां आखिर करते हुए हम क्यों नजर आ रहे हैं? क्या है हमारी ऐसी मजबूरी? क्या हमारे आईडियोलॉजिकल जो आरएसएस और बीजेपी की जो आईडियोलॉजी है वो इजराइल के साथ मैच करती है? ये इसका एक रीज़ है या इसके पीछे कुछ और रीज़ भी आप देखते हैं। ऐसे वक्त में जब अमेरिका खुद ये कहता हुआ नजर आता है कि वी आर द ओनली कंट्री जो आपके साथ खड़े इजराइल के साथ अगर हमने हाथ आपके खींच लिया तो यू आर नथिंग और कोई ऐसा कंट्री नहीं है दुनिया का जो खुलकर इजराइल के साथ खड़ा होना पसंद करता हो। क्योंकि उसके साथ जेनोसाइडल कंट्री का एक तरह से एक टैग लग गया है। तो भारत क्यों उसके साथ खड़ा है? नरेंद्र मोदी क्यों उसके साथ खड़े हैं? ये एक बड़ा सवाल तो जरूर है। देखिए आइडियोलॉजी की जो प्रॉब्लम हमारी पाकिस्तान के साथ है वही आईडियोलॉजिकल अलाइनमेंट की प्रॉब्लम हमारी इजराइल के साथ है। ये आईडियोलॉजी की बात है। बिकॉज़ जो बीजेपी है इट इज अ आईडियोलॉजिकल पार्टी। तो वो आईडियोलॉजी पर चलती है और जो प्राइम मिनिस्टर खुद है वह जो है वह पूरे आरएसएस की जो सीढ़ियां है वो चढ़कर आए हैं। तो आप भी जानती है मैं जानता हूं इसीलिए पाकिस्तान से ताल्लुक नॉर्मल नहीं हो सकते। इसीलिए हम इजराइल के साथ अपनी जो दोस्ती है उसको और मजबूत करेंगे। हम कमजोर नहीं करेंगे। और जहां तक मेरा ताल्लुक है पर्सनल जो है जो जेडी वस ने साफ कहा था वी आर द ओनली कंट्री हु स्टैंडिंग बाय यू तो ही फॉरगॉट टू मेंशन इंडिया इन दैट एस फ एस नितिन याहू इस कंसर्न एंड द जाइनिस्ट आर कंसर्न दीज़ आर द पीपल हु आर डूइंग अ जेनोसाइड दीज़ आर द पीपल हु आर क्रिमिनल्स लोगों को मार रहे हैं बच्चों को मार रहे हैं औरतों को मार रहे हैं और जो मेडिसिंस है वहां तक नहीं पहुंच रही है अच्छा आज जो गाज़ा है वह उस वहां 2 मिलियन लोग हैं जो ओपन प्रज़न में है और लास्ट ईयर सीज फायर हुआ था तब से लेके अब तक इजराइल ने 1000 से ज्यादा लोगों को मार दिया है ये सब रिकॉर्ड है क्या बताता है आपको इन लोगों के बारे में जाइनिस्ट के बारे में ये इनकी सोच है उसका आप कुछ नहीं कर सकते मैं कहीं देख रहा था कोई किसी ने ठीक कहा है ये मुझे मालूम नहीं किसने बोला है कि आपको अगर इजराइल का हल ढूंढना है इजराइल को कहिए आप ग्रीनलैंड में जाके रहिएगा। ये छोड़ दीजिए। दिस इस पैलेस्टाइन लैंड। और जब तक देखिए आपने ये बात करी थी शुरू हमारी शुरुआत इसी से हुई थी। जब तक जो है पैलेस्टाइन का मसला हल नहीं होगा इजराइलीज और जो इजाइलिस्ट है वो अपनी इजराइल ड्रीम को नहीं छोड़ेंगे। और जहां तक ईरान का ताल्लुक है, ईरान आज उस सिचुएशन में है। दुनिया मल्टीपोलर बन चुकी है। अमेरिका लड़ाई हार चुका है। और दोनों बड़ी ताकतें भी चाहती है कि पैलेस्टाइन का मसला हल हो। तो ये हो सकता है। देयर इज होप। ओके। दो तीन मेरे लास्ट क्विकली आपसे क्वेश्चंस। एक तो ये कि लोग ये भी जानने में बहुत इंटरेस्टेड हैं कि इस पूरी वॉर में चाइना और रशिया का जो रोल रहा है वो कितना महत्वपूर्ण आप मानते हैं और दूसरा अभी मैं देख रही थी कि जो मोंगला पोर्ट है जो भारत को जो मिला था 112 एकड़ आई थिंक वो जमीन है लैंड है जो मिली थी वो जब अभी बांग्लादेश के जो प्राइम मिनिस्टर है उन्होंने मुलाकात की अभी चाइना जाकर और वो जो प्रोजेक्ट है वो पूरा का पूरा चाइना को दे दिया गया है। तो इस तरह से आप ये देखिए कि जो ना सिर्फ पाकिस्तान से तो एक दुश्मन देश की तरह व्यवहार होता है। एक दुश्मन देश समझा जाता है। लेकिन बांग्लादेश के साथ भी बांग्लादेश और पाकिस्तान के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। बांग्लादेश और चाइना के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। और बांग्लादेश और भारत के रिश्ते किस तरह से वीक ही नहीं पड़े बल्कि प्रोजेक्ट्स भी जो काफी एस्पिरेशनल प्रोजेक्ट था जिसपे कोई काम शुरू ही नहीं किया गया। इसलिए उसे लेकर चीन को दे दिया गया। वो सब भी हो रहा है। तो चीन जो है वो लगातार जो मजबूत हो रहा है वो भारत के लिए कितनी बड़ी फिक्र की बात हो सकती है और और वही जो मेरा पहला सवाल था कि चाइना और रशिया के रोल को इस वॉर के इर्द-गिर्द आप कैसे देख रहे हैं? क्या उसकी ताकत भी पहले से ज्यादा बड़ी है? देखिए जहां तक चाइना और रशिया का ताल्लुक है और ईरान वॉर का ताल्लुक है उनका रोल बहुत बड़ा रहा है। उनका रोल बहुत बड़ा रहा है। यूएन में यूएन के हवाले से उन्होंने जो रोल प्ले किया है उसके साथ-साथ इन टर्म्स ऑफ मिलिट्री इन टर्म्स ऑफ इकॉनमी द अमाउंट दे हैव कंट्रीब्यूटेड टू ईरान। देखिए जीत ईरान की हुई है। पर आप यह भी समझिएगा कि जो अराक्षी है वो मई के महीने में याद करिएगा वो पहले गए थे रशिया। वहां डेढ़ घंटे उनकी प्रेसिडेंट पुतिन से बात हुई। वहां से वो सीधा गए चाइना और वहां पर उनकी अपने काउंटरपार्ट वोंग ही से बात हुई और वापस तैहरान में आके उन्होंने यह ऐलान किया कि हम क्या करेंगे? पोस्ट वॉर रीजनल फ्रेमवर्क बनाएंगे। तो दो बड़ी ताकतें खड़ी है ईरान के साथ और जीत जो है मैं कहूंगा ना चाइना की है ईरान वॉर में ना रशिया की है। जीत ग्लोबल साउथ कंट्रीज की है क्योंकि वर्ल्ड ऑर्डर बदल रहा है। आप ये समझिएगा ये तो एक बात है। दूसरी बात ये है कि जैसे मैं आपसे कह रहा था दुनिया बदल गई है। हिंदुस्तान की फॉरेन पॉलिसी को ये समझ में नहीं आ रहा है। देखिए दुनिया बदली है करीबन 2017 में। कुछ बोलते हैं जॉन मेयर शबर जैसे अमेरिका के मैं कहता हूं 2013 में बदली है पर वो एक अलग बहस है। कहने का मतलब यह है कि जब मोदी सरकार पावर में आई थी मई 2014 में उसके बाद दुनिया मल्टीपोलर हो गई। तो अभी तक जेहन में यह है कि हम जो हैं अन्नदाता हैं वियादा हेजीम सबसे बड़ी ताकत है साउथ एशिया की। जो हमें नहीं दिख रहा है वो यह है कि साउथ एशिया में हिंदुस्तान और भूटान को छोड़ के बाकी जितने भी मुल्क हैं वो सब बेल्टन रोड से जुड़े हुए हैं। तो चाइना आज साउथ इंडिया एशिया के बाहर की ताकत नहीं है। चाइना इज पार्ट ऑफ साउथ एशिया। आप समझिएगा इसीलिए जो अभी ये जो बांग्लादेश के प्राइम मिनिस्टर है प्रेसिडेंट सॉरी प्राइम मिनिस्टर ही वास देयर वो शीजी पिंग को मिले और उन्होंने बताया कि हम ये तीस्ता बॉर्डर की भी बातचीत होगी इसको भी हम सॉर्ट आउट करेंगे तो कहने का मतलब ये है हमें ये जो हेजीमोनिक सोच है कि हम कनोलियल पावर है हमें ब्रिटिश इंडिया ने यह दिया था कि साउथ एशिया हमारी मल्लकियत है आपकी मल्लकियत नहीं है। दुनिया बदल गई है। चाइना आम ताम ताकत नहीं है। हमें चाइना के साथ काम करना है। पाकिस्तान के साथ काम करना है कि किस तरीके से हम अपने मुल्क को मजबूत बनाएं। मजबूत बनाएं इन टर्म्स ऑफ प्रोस्पेरिटी एंड डेवलपमेंट। मजबूत बनाएं इन टर्म्स ऑफ मिलिट्री डिटरेंस। उसके लिए आपको शांति चाहिए। शांति तभी आएगी अगर आप इन दो बड़ी जो कंट्रीज है जिनके साथ हमारी मिलिट्री लाइंस है उनको आप सीरियसली सोचे और उसका हल निकाले। जी क्या ये भी आप देख रहे हैं कि इजराइल की भारत से दोस्ती खासतौर पर अमेरिका अमेरिका के हवाले से अगर बात करूं कि वो पीठ में छुरा घोंपते हैं और उसके बाद फिर दोस्ती का गुणगान भी गाते हैं क्योंकि कोई भी एक ऐसी चीज नहीं है अगर हाल फिलहाल में हम देखें कि यूएस ने भारत के लिए की हो जिसके लिए हम ये कह सके कि दोस्ती निभाई है। दोस्ती ऐसा लग रहा है कि एक तरफ़ा इश्क है और आशिक दीवाना हुआ चला है और उसका और वो आशिकी जो है वो साफ तौर पे देखने के लिए मिल रही है। वो है नरेंद्र मोदी की डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिका के लिए। देखिए जहां तक अमेरिका का ताल्लुक है, अमेरिका ऐसा मुल्क है जिसने कोल्ड वॉर जीती, जिसने सेकंड वर्ल्ड वॉर जीती, जो यूनपोलर वर्ल्ड का अन्नदाता था, सोल पावर था। उनको पार्टनरशिप नहीं समझ में आती है। वह आज भी मानने को तैयार नहीं है कि दुनिया बदल चुकी है। तो वह कहते हैं कि हम बराबर हैं इंडिया के पर वो इंडिया को नौकर की तरह ट्रीट करते हैं। हमें कोई दिक्कत नहीं है उसमें। प्रॉब्लम तो दिक्कत तो सारी ये हो रही है। जब हमारे पास ऑप्शन है जो मैं आपसे कह रहा था हम उनको क्यों नहीं एक्सरसाइज कर रहे हैं? इंस्टेड ऑफ़ बीइंग उनकी वो नौकर व्हाटएवर वर्ड यू वांट टू यूज़ एस अ वेसल स्टेट। हम उनके जो भी कर रहे हैं उनकी खिदमत कर रहे हैं अमेरिका की हर चीज में क्योंकि हमारे बराबरों वो हमें अपने बराबर समझते ही नहीं है। हम जो है चाइना रशिया साउथ एश ग्लोबल साउथ कंट्रीज न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यहां पे हम बहुत बड़ा रोल प्ले कर सकते हैं। वो हम नहीं करना चाहते। उसकी मिसाल अभी देख लीजिए आप। यह जो आपके सुप्रीम लीडर थे जिनको अससनेट कर दिया गया खामेनी साहब अब उन्होंने तो जो उनके प्रेसिडेंट है उन्होंने पर्सनल इनविटेशन दिया है प्राइम मिनिस्टर को बट प्राइम मिनिस्टर इस नॉट गोइंग देयर इसीलिए कि वो अमेरिका नाराज हो जाएगा इजराइल नाराज हो जाएगा तो हम नहीं जाते तो हमारी फॉरेन पॉलिसी मैं बता रहा था ना आपसे जैसे ये बदलेगी नहीं ये बदलेगी नहीं कुछ लोगों को उम्मीद लगी रहती है कि साहब बदल जाएगी ये नहीं बदलेगी की क्योंकि यह आईडियोलॉजिकली यह फिक्स्ड है। इसमें आईडियोलॉजी आ गई है। जब आईडियोलॉजी आती है तो उससे जो होता है देश की ओवरऑल डेवलपमेंट जो है वो सेकंड स्टेप पर आ जाती है। वो पीछे रह जाती है। जी लास्ट मेरा क्वेश्चन क्या इस फॉरेन पॉलिसी का खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है और आगे और बड़ा भुगतना पड़ सकता है ऐसे सिटीजन के तौर पर एक कंट्री के तौर पर? वो तो बिल्कुल जाहिर है। वो तो जाहिर ही है। हम जब तक यह सरकार रहेगी, यह फॉरेन पॉलिसी रहेगी, इस फॉरेन पॉलिसी से अगर हम उम्मीद कर रहे हैं कि दुनिया हम तरक्की कर जाएंगे या हमारी बात सुनी जाएगी, ऐसा कुछ नहीं होने वाला है। जी बहुत-बहुत शुक्रिया प्रवीण जी आपका। इस पडकास्ट का हिस्सा बनने के लिए, अपना वक्त देने के लिए। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। थैंक यू सो मच फॉर जॉइनिंग। थैंक यू वेरी मच। थैंक्स अ लॉट फॉर हैविंग मी।

Companion article

A memorandum written by the winner

Speaking to host Bushra Khanam Fahad on the Nous Podcast, defence expert and Force magazine editor Pravin Sawhney argued that the memorandum of understanding signed between the United States and Iran should be read for what it is: an agreement drafted overwhelmingly on Iran's terms. "If this were peacetime, both sides would gain equally — a win-win," Sawhney said. "This is not that. This MoU is being signed after a war Iran won, and it shows: every condition Iran wanted has been granted." He noted that Israel is not itself a signatory — Washington has taken on the responsibility, under the agreement, of restraining Israeli action, a commitment its ability to enforce is already being tested by continuing Israeli strikes on Lebanon.

Sawhney said pressure is mounting on President Trump domestically precisely because so much of the deal favours Tehran, since much of the American security establishment remains unwilling to accept that the United States could lose a war, let alone to Iran. That establishment, he argued, still thinks in terms of a unipolar world with America as the sole superpower, rather than recognising a multipolar order with three great powers — the US, China and Russia.

Why Iran doesn't need to fear Trump's threats

Asked whether renewed fighting was likely, Sawhney was blunt: "Iran need not be scared, for the simple reason that Iran has won the war." He argued Tehran holds two options regardless of what Washington does — it can end the current state of calm ("state of harmonious control," as he put it) whenever it chooses, and it decides independently whether or not to continue talks. Iran, he said, still has both military and economic options available; the same cannot confidently be said of Washington. A ground invasion, he noted, would require some 300,000 US troops built up over months, as in the 1991 Gulf War against Iraq — a very different, mountainous, forested terrain that favours Iranian defenders on their own soil, and a troop mobilisation that would require Congressional approval America's political climate makes difficult. That leaves Washington, in Sawhney's assessment, with only a naval blockade as a remaining option — one Iran's drones and long-range, accurate missiles could make extremely costly, including by threatening large American vessels.

He was careful to note Iran does not seek regional dominance for its own sake: citing repeated statements from Iranian Foreign Minister Abbas Araghchi calling for a "regional framework" that includes the withdrawal of external powers' forces, Sawhney said the shape of the deal — which explicitly requires American bases and troops to leave the region — reflects an aspiration for a security order built on mutual trust among regional states, not Iranian hegemony.

The petrodollar question

This is where Sawhney turned to the memorandum's furthest-reaching implication. The document requires American forces to withdraw from bases across ten countries in West Asia, five of them Gulf Cooperation Council states — Saudi Arabia, Qatar, Bahrain, Kuwait and the UAE — where some 60,000 US troops are currently stationed across 19 bases. "If that withdrawal happens as written," Sawhney said, "it means the petrodollar system will gradually come to an end. And if the petrodollar ends, the American economy weakens substantially." A weaker economy, in his analysis, cannot indefinitely sustain the roughly 750 military bases the US maintains worldwide — meaning, in his words, "the American empire will sink." He pointed to corroborating signals already visible: Japan, Washington's closest regional military ally, has been selling US Treasury bonds, and countries worldwide have been buying gold as confidence in the dollar as reserve currency erodes. "This isn't only about the war," he said. "It's about the credibility of what was considered the world's greatest power being defeated on the battlefield, and the capabilities tied to that status weakening with it."

Pakistan's leap into West Asia

Sawhney devoted considerable attention to what he called a geopolitical transformation for Pakistan. He traced its origin to the four-day India-Pakistan clash of May 2025 (referenced in India as "Operation Sindoor"), after which — he noted — a US Congressional report concluded that Pakistan had performed better than India in that clash. That assessment, in his telling, preceded a formal defence agreement between Pakistan and Saudi Arabia by the end of 2025 — the first formal defence pact between the two countries despite decades of informal military ties dating to the 1970s. Field Marshal Asim Munir was hosted for a one-on-one lunch at the White House by President Trump in June 2025.

From there, Sawhney said, Pakistan moved from facilitator to mediator in the Iran-US crisis, hosting the first round of contact between the sides in Islamabad on April 11, and ultimately becoming a formal signatory to the ceasefire memorandum — signed, he noted, as the "Islamabad MoU," with Iranian and American signatures alongside that of Pakistani Prime Minister Shehbaz Sharif as mediator. This, Sawhney argued, has effectively pulled Pakistan — a South Asian country — into the club of West Asian regional powers alongside Egypt, Saudi Arabia and Turkey. He credited this partly to Pakistan's military leadership: unlike Indian diplomats, he argued, Pakistani generals have long understood the diplomatic value of demonstrated military capability and are willing to publicly credit others — such as crediting Trump for the ceasefire and even proposing him for a Nobel Peace Prize — when doing so serves their interests, a pattern he traced back to General Jehangir Karamat's direct dealings with Washington after Pakistan's 1998 nuclear tests.

A foreign policy Sawhney calls broken

Turning to India, Sawhney argued the country's foreign policy has been mistaken for at least four years, rooted in a failure to recognise the shift to a multipolar world. Two great powers, Russia and China, sit on India's immediate periphery, he noted, and the geopolitics of trade, connectivity and power contestation now runs directly through the region — an opportunity he believes India is not exploiting. He was sharply critical of the government's handling of casualty disclosures from the 2025 clash with Pakistan, contrasting Defence Minister Rajnath Singh's parliamentary assurance that no soldiers had died with the subsequent, delayed emergence of names of six personnel killed — a pattern, he said, that echoed the delayed disclosure of an Indian helicopter downed by its own missile after the 2019 Balakot strikes.

On the question of why Narendra Modi did not attend Khamenei's funeral despite a personal invitation, sending instead the Bihar governor and a junior minister, Sawhney was direct: "because it would upset America, upset Israel." He argued India's foreign policy remains ideologically fixed — unable to normalise relations with either Pakistan or China because the ruling party's ideology treats both as adversaries by definition, and unable to reassess its closeness to Israel for the same reason. He noted the irony that India, once among the earliest votaries of a two-state solution for Palestine, now maintains close ties with a government the UN Commission's own report accuses of a "targeted killing" of over 20,000 Palestinian children — a friendship, he argued, less reciprocated than one-sided, given the US has offered India little of substance in return in recent years, even as figures like Vice-President JD Vance publicly praised Israel while omitting any mention of India as a comparable ally.

What China's rise means for the neighbourhood

Sawhney also flagged Bangladesh's decision to hand a stalled port infrastructure project to China after New Delhi failed to advance it, alongside deepening China-Pakistan and China-Bangladesh ties, as evidence that Beijing is becoming, in effect, a South Asian power in its own right rather than an outside actor — a reality he said India's foreign policy establishment still resists acknowledging, clinging instead to an inherited, colonial-era assumption of regional primacy. Both Russia and China, he added, played substantial roles — diplomatic and material — in backing Iran through the war, even as he insisted the war's victory belongs to Iran itself, and the broader shift in the global order to the Global South.

Asked whether India's citizens would bear the cost of this approach, Sawhney did not equivocate: "That's obvious. As long as this government and this foreign policy remain in place, expecting either prosperity or a greater voice for India in the world is not realistic."

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