Nous Podcast· 23 Apr 2026· 2:04:58

Modern Theology (Ilm al-Kalam) in the Indian Subcontinent | Dr. Waris Mazahri

In this in-depth conversation with Waris Mazahri, we explore the evolution of Modern Ilm al-Kalam in the Indian subcontinent—an intellectual tradition shaped by the pressures of modernity, science, and shifting philosophical paradigms.

Full Transcript

हमारी जो किताब है बर सकीर हिंद में जदीद इल्म कलाम इस किताब में हमने खासतौर से जो इंडियन सबक्टिनेंट में जो जदीद इल्म कलाम पे गुफ्तगू हुई है पिछले गोया तकरीबन 150 200 सालों में उस पे हमने गुफ्तगू की है। शाह वली उल्लाह की अहमियत यह है कि उन्होंने इस शरीयत को इल्म कलाम का एक हिस्सा और पार्ट बनाया और उन्होंने कहा कि पूरी इस्लामी शरीयत को भी अब मौजूदा दौर में जदीद दौर में हमें कलामी नुक्त नजर से समझने और सोचने की जरूरत है। सवाल ये उठता है कि ट्रेडिशनल कलाम क्या है? ट्रेडिशनल थियोलॉजी क्या है? और क्यों ट्रेडिशनल थियोलॉजी से हमें मॉडर्न थियोलॉजी की जरूरत महसूस होती है? एक बड़ा गैप रहा हमारे यहां। यानी इबने तैमिया और इबने कयम और इबने [संगीत] रशदिया इब्न खलदून के बाद कोई शख्सियत पैदा नहीं हुई। गजाली के बाद शाह वली उल्लाह वो शख्सियत है कि जब सारा सरमाए इल्म लुट चुका था और बाजार सर्द पड़ गए थे इल्मो फिक्र के तो शाह व्ली उल्लाह जैसी शख्सियत 18वीं सदी में के शुरू में पैदा हुई। एक तरफ मौलाना मौदूदी हैं [संगीत] कि वो इस्लाम इज अ होलिस्टिक सिस्टम। एक तरफ देवबंद स्कूल ऑफ़ थॉट है कि भाई करिकुलम एज अ होलिस्टिक सिस्टम एक तरफ इकबाल है मेटाफिजिक्स एज अ होलिस्टिक सिस्टम कि खासतौर से जो मॉडर्न साइंस ने आकर करके जो एक मॉडर्न वर्ल्ड व्यू बनाया और तय करने की कोशिश की और नए अंदाज में नए सवालात पैदा किए वो सवालात पहले नहीं थे। मोतजला के सामने वो सवालात नहीं थे। यारा के सामने उस तरह के सवालात नहीं थे। शिबली नोमानी को आप कैसे देखते हैं कि वो एक तरीके से ट्रेडिशन और मॉडर्निटी को के बीच में मॉडरेशन करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी मेथोडोलॉजी क्या थी? सर सैयद ने बुनियाद डाली थी। शिबली ने मजीद उसमें इजाफा किया। लेकिन वो वो कंप्लीट नहीं था। लेकिन इकबाल की हैसियत और अहमियत ये है कि इकबाल दोनों ट्रेडिशन को अच्छी तरह से समझने वाले थे। लेकिन अगर मॉडर्निटी को सिर्फ उतना देखा जाए कि स्ट्रक्चर थरी पॉजिटिविज्म तो उसके बाद पोस्ट मॉडर्निटी और क्रिटिकल थरी उसका जो ये थीसिस है वेस्ट का उसका एंटीथीसिस [संगीत] और उसका सिंथेसिस वेस्ट अपने आप में प्रोड्यूस कर रहा है। बकल मनाज़िर हसन गिलानी के उनकी किताब है हिंदुस्तान का [संगीत] निजाम तालीम तरबियत उसमें उन्होंने लिखा है कि पहले तकरीबन 40 किताबें हैं रैशन साइंसेस यानी जिसको हम कहते हैं माकुलात की वो किताबें शामिल थी। तो आज का क्राइसिस अभी क्या आपको लगता है कि इज इकबाल इनफ और वी नीड रीस्ट कंस्ट्रक्शन? आज के पडकास्ट में हमारे [संगीत] साथ हैं डॉक्टर वारिस मजहरी साहब। डॉक्टर मजहरी जामिया हमदर्द दिल्ली में इस्लामिक स्टडीज के असिस्टेंट [संगीत] प्रोफेसर हैं। उनकी रिसर्च का फोकस इस्लामिक थॉट, इल्मल कलाम और इस्लामिक फिलॉसफी जैसे सब्जेक्ट्स पर रहा है। डॉ. मजहरी इस्लामिक स्टडीज के मुख्तलिफ मौजुआत पर कई किताबों के मुसन्निफ हैं। हाल ही में इल्मल कलाम पर उनकी किताब बर्रे सगीर हिंद में [संगीत] जदीद इल्म कलाम के नाम से पब्लिश हुई है। आज हम डॉक्टर मजहरी से इसी किताब के हवाले से गुफ्तगू करेंगे। नाउस एक इंडिपेंडेंट थिंक [संगीत] टैंक मीडिया प्लेटफार्म है जो माइनॉरिटी और ह्यूमन राइट्स के इश्यूज पर रिसर्च और एविडेंस बेस्ड कन्वर्सेशंस को एंपलीफाई करता है। इसे और मजबूत बनाने के लिए नाउस को सब्सक्राइब करें और सपोर्ट करें। आपका खैरमकदम है वारिस मजहरी साहब नाउ के पडकास्ट में। बहुत शुक्रिया। जैसा मैं आपको बता रहा था कि मेरी जो दिलचस्पी रही एक जिंदगी में जब मैं 21 साल का हुआ और उस वक्त मुझे वापस पढ़ने से मेरा इंटरेस्ट पैदा हुआ। बीच में बहुत ज्यादा मेरी दिलचस्पी नहीं रही थी या खेलने, कूदने इस तरह की चीजों में। लेकिन एकदम से दिलचस्पी पैदा हुई। तो मैं इंजीनियरिंग छोड़ के फिलॉसफी पॉलिटिक्स एंड इकोनॉमिक्स मैंने एज अ स्ट्रीम चुनी और जब फिलॉसफी मैंने पढ़ी तो मेरे लिए जो वो आई ओपनर था और जिस तरह से मुझे लगा कि मेरे लिए एक वर्ल्ड ऑफ आइडियाज ओपन हो गया ओपन हो गए और साथ में पॉलिटिक्स इकोनॉमिक्स क्योंकि पढ़ रहे थे तो वो फलसफा किस तरह से पर्टिकुलर फील्ड में उतरता है वो भी मौका मिल रहा था साथ-साथ देखने का क्योंकि वो फील्ड्स भी हमें मान लीजिए जो पॉलिटिकल थ्यरी पढ़ाई जा रही है तो उसमें भी कुछ अजमशंस बताए जाते थे के सोवनिटी ऐसे होगी। सियासत का निजाम ऐसे होता है। इंडिविजुअल को लेके वजूद को लेके कुछ चीजें अस्यूम की जाती हैं। फलसफे में भी बेहतर और डीपर लेवल पे इसी तरह का एनालिसिस किया जाता है। तो लेकिन जब मैं मॉडर्न थिंकर्स को खोजने की कोशिश कर रहा था तो जो अभी क्या फिलॉसफी को, कलाम को, थियोलॉजी को क्या उतने सीरियसली ले रहे रह रहे हैं या नहीं रह रहे हैं। बहुत ज्यादा मुझे अफसोस हुआ कि लोगों को लगा कि या इस तरह से जब भी मेरी बात होती थी कि एज इफ इट इज़ इररेिलेवेंट और हर वक्त हमारी डिबेट्स एथिज्म, लिबरलिज्म, कैपिटलिज्म, कम्युनिज्म ये सब फलसफे हैं। ये उनकी अपनी वर्ल्ड व्यूज के कलाम है। बिल्कुल बिल्कुल। तो बहुत मुझे ऐसा लगा कि शायद हम लोग ऊपरी सतह पर ही ज्यादा फोकस कर रहे हैं। हालांकि उस पे भी फलसफे से मेथोडोलॉजी भी इमर्ज होती है। उससे निजाम भी कायम होता है। उससे रिलेशनशिप्स भी इमर्ज होती हैं। वो सब बातें सही है। लेकिन अगर आप बुनियादी जिसे कहते हैं सवाल या बुनियादी जो उसूल हैं उनके ऊपर अगर आप नजर नहीं डालें तो शायद कंफ्यूजन बढ़ता चला जाता है। उस हवाले से जब आपका काम सामने आया तो मुझे बहुत ही खुशी हुई कि इस वक्त भी हमारे यहां पे ऐसे लोग मौजूद हैं जो कलाम, फलसफे और इन डिबेट्स को अकीदे की, मजहब की इन डिबेट्स को बहुत सीरियसली एंगेज कर रहे हैं। आपकी जब मैं बायोग्राफी भी पढ़ रहा था। आपका एक अपना सफर है। तो बहुत जिसे कहते हैं कि जिसे अगर जल्दी आप यह बता सकें कि आप इस सफर में कलाम और फिलॉसोफी की हिस्टोरिकल इस तरह की डिबेट्स आप एक मदरसे के प्रोडक्ट हैं। वहां पे अक्सर वो बेशतर हमें यह बताया जाता है या हम समझते हैं कि शायद इस तरह के गहरे मुताले अभी मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर में मौजूदा सिस्टम में शायद बहुत ज्यादा प्रमोट नहीं किए जाते। आप इसके बारे में थोड़ा बताइए आपकी जर्नी क्या है? और आपको क्यों लगा कि इन इन मौजुआत पे और इन इन इशूज़ पे फिर से बहुत इंपॉर्टेंट डिस्कशंस होने चाहिए और शायद ये डिस्कशंस जो आने वाला वक्त है उनके लिए बहुत इंपॉर्टेंट रहेंगे। बहुत शुक्रिया। देखिए मेरी भी बुनियादी तालीम मदारिस में हुई है। दाल दुबन से मेरी फरागत है। जहां तक मदारिस के जमाने की बात है, मेरी तालीम की बात है, तो उस दरमियान मेरी बहुत ज्यादा दिलचस्पी यकीनी तौर पे फलसफे या इल्म कलाम में नहीं हम [नाक से की जाने वाली आवाज़] और जैसा कि आपको खुद अंदाजा है और आपने बताया अक्सरियत जो मदारिस के तलबा की ग्रेजुएट्स की है वह ऐसे ही होती है। उसकी एक बहुत बड़ी वजह असल में ये है कि मदारिस में जो इल्म कलाम और फिलॉसफी भी कुछ पढ़ाई जाती है। वो दरअसल उसकी किताबें उसका जो कंटेंट है वो इतना ज्यादा कदीम हो चुका है और ये तो नहीं कह सकते कि बिल्कुल इरिलवेंट हो चुका है। एक तो कि वो किताबें इस तरह से पढ़ाई जाती हैं जो 1000 साल 500 800 साल पहले की लिखी हुई हैं। उसी उसलूब में लिखी हुई हैं। लेकिन दूसरी बात यह है कि असल में उसको पढ़ाने का कुछ ऐसा अंदाज होता है इतना खुश्क और इतना ज्यादा आज की दुनिया से बिल्कुल हटकर करके जो आज के हमारे मसाइल हैं हम फिक्री मसाइल की बात कर रहे हैं। खासतौर से कि उसको वो हमारे जो तलबा होते हैं, स्टूडेंट होते हैं वो बहुत ज्यादा रिलेट नहीं कर पाते आज की मॉडर्न दुनिया से। यानी इस अंदाज में मिसाल के तौर पर फिलॉसफर्स को पढ़ाया जाता है या थियोलॉजियंस को मोतजिला वगैरह जो हैं उनको इस तरह से पढ़ाया जाता है जैसे कोई एक ये थोलज मुतजला एंटी इस्लामिक ग्रुप हो या मुशरिकन का एक एक ग्रोह हो और जो इस्लाम पे ताबड़तोड़ हमले कर रहा है और इसलिए हमें उनका एकतरफा तौर पे रद्द करना है बुनियादी तौर पे उनके आर्गुमेंट को समझना उन्होंने क्या अहम रोल प्ले किया उसको समझना सो ऐसा नहीं है हम इसी तरीके से फ़िलॉलसफर जो हमारे इन लोगों ने यानी हमारे जो मुस्लिम फ़िलॉसफ़र हैं चाहे वह किदी से लेकर करके इबने सीना और फराबी वग़ैरह सारे के एक अहम रोल प्ले किया है हमारे ट्रेडिशन को कंस्ट्रक्ट करने में डेवलपमेंट में। लेकिन उन उनको इस तरह से पढ़ाया जाता है कि जैसे उन्होंने इस्लामिक ट्रेडिशन को फिक्र को डिस्ट्रॉय करने और उसको डीकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश की और फिर गज़ाली या दूसरे लोग आया उन्होंने इसको ये किया वो किया। इस अंदाज में पढ़ाया जाता है तो बहुत दिलचस्पी नहीं हो पाती इसलिए कि उनको लगता है कि बस एक रद्द कर देना काफी है और वो रद्द हो चुका है। किताबें लिखी जा चुकी है। काम हो चुका है। उसमें मौजूदा कोई नई कोई नई चीज नहीं है। नहीं हुआ। फिर उस पर से हम ये देखते हैं कि दरअसल अ वो जिस तरह से हमारी यानी जो मदारिस में पढ़ाया जाता है वो अरिस्टोटीलियन सिर्फ मेटाफिजिक्स की बुनियाद पे और फिजिक्स की बुनियाद पे जो सारी चीजें हैं हम प्री मॉडर्न इसमें देखते हैं एज में देखते हैं। वही चीजें हैं आजकल। आज जो 500 साल में जो डेवलपमेंट हुआ है 300 साल में 400 साल में खासतौर से डेवलपमेंट हुआ है उसका उसमें कोई ताल्लुक नहीं है। सारी किताबें उससे पहले की है तो वो दिलचस्पी नहीं हो पाती। तो फरागत के बाद फिर मुझे बहरहाल आज के जो बुनियाद नजरियात हैं उनको पढ़ने का में दिलचस्पी पैदा हुई। यानी आज के जो दुनिया यानी कैपिटलिज्म है और कम्युनिज्म है और डार्विनिज्म है। इस तरह के जो फिक्री नजरियात या धारे हैं इन चीजों को पढ़ने का ये हुआ शाह वली उल्लाह को खासतौर से बहुत ज्यादा दिलचस्पी पढ़ने की वो इसलिए कि वो तो हमारे जाहिर है हमारी यानी इंडियन सबक्टिनेंट में उनकी जो हैसियत है वो सबों पे वाज़ है। तो इस तरह [गला साफ़ करने की आवाज़] से हमारी दिलचस्पी इन नजरियात के हवाले से मॉडर्न वर्ल्ड व्यू को पढ़ने और समझने की तरफ बढ़ी और जब इनको हमने कुछ पढ़ने की कोशिश की कुछ तो फिर हमने एक्सप्लोर करने की कोशिश की खुद अपने ट्रेडिशन को अपने इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन को फिर हमारी दिलचस्पी गजाली इब्न रुश वगैरह में बहुत ज्यादा बढ़ी फिर इनकी किताबें सब हमने पढ़ी और क्योंकि आज के दौर में सारी चीजें आसानी से अवेलेबल है। हमने पीडीएफ निकाला उसका प्रिंट करवाया और पढ़ लिया। फिर हमने बहुत सारी किताबें खरीदी। तो मकसद मतलब ये हुआ कि जब हम यूनिवर्सिटी में आए और तो उसके पढ़ने के दरमियान फिर पढ़ाने का सिलसिला शुरू हुआ तो उसके साथ-साथ हमारी दिलचस्पी इस तरह के मौजूआत पे बढ़ती हुई चली गई। और जो खासतौर से ये जो फो फतावा की दुनिया है यानी जो मदारिस में जो डिबेट चल रही है जो बहसें चल रही हैं लगता था कि उसमें कोई नई चीज नहीं है काम करने के लिए हमारे पास इसलिए के आज का जमाना जो है अगर आप देखें तो इज्तेहाद के हवाले से यानी फिक के हवाले से इज्तिहाद को आगे बढ़ाने का है और दीन के शरीयत के हवाले से या दीन के हवाले से अपनी फिक्र को इस तरह से रिकंस्ट्रक्ट करने का है। इस्लामिक आईडियोलॉजी को इस तरह रिकंस्ट्रक्ट करने का है कि जो आज की दुनिया में आज के जो फिक्री धारे हैं उनसे वो आंख मिला सके और उनके सामने अपने आप को साबित कर सके। तो ये इस चैलेंज को सामने रखते हुए हमारी दिलचस्पी बढ़ी और फिर हमने पढ़ना शुरू किया। अच्छा आपने जो एक बात की तरफ इशारा किया कि जो मदारिस में ऐसा नहीं है कि उसके करिकुलम में फिलॉसफी या अकीदे के ऊपर जो डिबेट्स हुई हैं वो नहीं पढ़ाई जाती या उनको इंट्रोड्यूस नहीं करवाया जाता। लेकिन वो ऐसी बात है कि जैसे आज अगर वेस्टर्न यूनिवर्सिटीज में सिर्फ एरिस्टोटलल, प्लेटो या न्यूपॉलोटिनस या ऑगस्टीन या एक्वस यहां तक पढ़ा के छोड़ दिया जाए। और बोले कि अब आपको मॉडर्न जियोपॉलिटिक्स, मॉडर्न पॉलिटिकल थ्यरी, मॉडर्न साइंस अब ये सारी चीजों के लिए आपके पास सारा इंटेलेक्चुअल इंफ्रास्ट्रक्चर आ गया है। तो वो जो डिफरेंस है के एक जमाने तक जो बहुत डीप इंटेलेक्चुअल थॉट और ट्रेडिशन चला। हम जब मैं खुद जब गजाली को पढ़ा या इमाम इब्ने अरबी को पढ़ा या इमाम इब्ने तैमिया को पढ़ा इन सबको ये डीपली फिलोसोफिकल बीइंग्स हैं। ये अपने आप में फलसफी भी हैं। ये फखी भी हैं। ये आप समझ रहे हैं किन यकीनन होलिस्टिक पर्सनालिटीज हैं। और इनमें बहुत सारे लोग ऐसे भी हैं जो एक्टिविस्ट भी हैं। सही। तो वो ट्रेडिशन जिसमें इतना ज्यादा डीप इंटेलेक्चुअल हिस्ट्री रही है। यह एंजायटी कब कहां और क्यों पैदा हुई कि जिससे हमें दुनिया से जिस दुनिया को हमारे वर्ल्ड व्यू में अल्लाह सुभाना ताला ने ही बनाया है। उसी की ही क्रिएशन है। उस क्रिएशन को पढ़ने से हमें ये क्यों महसूस होने लगा कि शायद हमारी जो अपनी शख्सियत है, हमारा अपना जो वजूद है एज अ मुस्लिम एज अ बिलीवर इन इस्लाम वो शायद कॉम्प्रोमाइज हो रहा है। कहां पे ये टकराव पैदा हुआ? अगर आप हम हिस्ट्री के लिए देखें तो असल में 14वीं सदी 15वीं सदी तक तो सुरते हाल बहुत बेहतर रही। यानी इब्ने खलदून का जमाना 14वीं सदी का है। वहां तक तो हम देखते हैं कि बड़ी शख्सियात पैदा हुई और उन्होंने इस सिलसिले इस ट्रेडिशन को आगे बढ़ाया। लेकिन हम देखते हैं कि आमतौर से 15वीं सदी के बाद यानी ऑटोमन एंपायर जब कायम हो रहा है और उसकी जो शुरुआत हो रही है तो ये जो पूरा अरसा गुजरा है खासतौर से 16वीं 17वीं 15वीं 16वीं 17वीं 18वीं सदी का ये जो पूरा जो तुर्कों का ऑटोमंस का जमाना है हम ये देखते हैं कि असल में इसमें जो तुर्कों की जो मुस्तकिल जो जंगे रही यूरोप के साथ अपने वजूद का उनके का सवाल रहा। तो एक तो उसमें वो बहुत ज्यादा इंगेज रहे और खिलाफत एक बड़ी थी। आलम इस्लाम पे उनका गलबा था। वही चीजों को लीड कर रहे थे और वही एक तरह से पूरी फजा बना रहे थे। लेकिन वहां हम ये देखते हैं कि एक तो उनकी अपनी एक अपना एक ये इशू था कि वो ज्यादा से ज्यादा हम ये देखते हैं कि वो यूरोप के साथ जंगों में बहुत ज्यादा इंगेज रहे। लेकिन दूसरी तरफ जो है सही बात यह है हमें इसका एतराफ करना चाहिए कि ऑटोमंस को जिस तरह से मेहनत करनी चाहिए थी जो फजा बनानी चाहिए थी जो इल्मी दुनिया फिक्री दुनिया पैदा करनी चाहिए थी वो उसमें उनकी कमी रही तीसरी बात उसमें यह है के ऑटोमंस के खासतौर से उनको एहसास हो गया था बाद में के हम काफी दूर जा चुके हैं और हमें दोबारा अपने अपनी रिवायत को जदीद यानी मटेरियल्स को लेकर के रिकंस्ट्रक्ट करना है, डेवलप करना है, आगे बढ़ाना है। तो हम यह देखते हैं कि खुद हमारे यहां उलमा की एक की क्लास ने जो ट्रेडिशनलिस्ट थे, एक बड़ी तादाद ने इन चीजों की बड़ी मुखालफ़त की। शदीद तरीन तौर पे मुखालफ़त की। इन चीज को अगर आपको देखना हो तो मिसाल के तौर पे मौलाना मौदूदी की तनकीहात में आप देख लें। तनकीहात में जो उन्होंने खालदा अदीब खानम के खुतबे पे गुफ्तगू करते हुए तफसील के साथ इज़ारे ख्याल किया है उन्होंने तो उसमें उन्होंने बताया कि किस तरह से ये जो रिलीजियस क्लास थी वो इन चीजों को बिल्कुल हराम और नाजायज समझती थी वो उसके रास्ते को रोक रही थी कि जो नई दुनिया में हमें किस तरह से अपनी फिक्र की परवरिश करना है और उसको आगे बढ़ाना है एक नई तहजी अपनी तहजीब को आगे बढ़ाना है तो हम ये देखते हैं कि एक फिक्री जुमूद रहाकि शुरू शुरू में 15वीं 16वीं सदी में ये काम नहीं हुआ। तो इसलिए 17वीं 18वीं सदी में काफी इस पे जुमूद हुआ। आलम इस्लाम में जमूद रहा। कुछ तो आप देखें कि शिया सुन्नी भी टकराव बहुत ज्यादा रहा। ऑटोमंस के साथ सब ईरानियों का इनकी किताब है बर्नार्ड लेविस की। व्हाट वेंट रोंग उसको उन्होंने बड़ी तफसील के साथ जो है इसका जिक्र किया है। उन्होंने बड़ी चश्म कुशा बातें उन्होंने लिखी हैं। मुख्तलिफ फैक्टर्स रहे जिसमें हम ये देखते हैं जो हम बताना चाह रहे हैं कि खासतौर से 16वीं, 17वीं, 18वीं सदियां वो हैं जो यूरोप की वो सदियां हैं कि जब यूरोप बिल्कुल एक नई दुनिया बना रहा था। लेकिन हमारी पूरी मुस्लिम दुनिया का कसूर ये है कि वो उस दुनिया के बनाने में शरीक नहीं थे बल्कि वो उससे दूर थे। और इसीलिए हम देखते हैं कि एक बड़ा गैप रहा हमारे यहां यानी इबने तैमिया और इबने कयम और इबने रश या इब्ने खलदून के बाद कोई शख्सियत पैदा नहीं हुई। इसीलिए गज़ाल इनको लिखना पड़ा हमारे शबली नोमानी को कि गज़ाली के बाद शाह वली उल्लाह वो शख्सियत है कि जब सारा सरमाए इल्म लुट चुका था और बाजार सर्द पड़ गए थे इल्मो फिक्र के तो शाह वली उ्ला जैसी शख्सियत 18वीं सदी में के शुरू में पैदा हुई। इसलिए कि वाकई उससे पहले आप देखें तो आपको शख्सियत नजर नहीं आती। इंडिया की बात नहीं बल्कि दूसरे हां हमारी मुस्लिम वर्ल्ड के दूसरे हिस्सों में भी देखते हैं कि बिल्कुल शख्सियत पैदा नहीं हुई। तो इसमें अगर हम खुद जरा सा इंट्रोस्पेक्ट कर करके देखें तो हमें अंदाजा होगा के बहसियत कौम बहसियत मिल्लत हमें जो सरमाया इल्मो फिक्र मिला था और जो जिम्मेदारियां हम पे आयद होती थी हमने कई सदियों में अपने ख्वाबनाक जजीरे में बंद रहे और और बदलती हुई दुनिया का इदराक नहीं कर सके और उस बदलती हुई दुनिया को पर्सव ना करने इदराक ना करने की वजह से वक्त के नब्स से हमारा हाथ खिसक गया। एक हदीस है रसूल्लाह की के जो मोमिन होता है वो बसीर बेमान नहीं अपने जबान को अपने वक्त को समझने वाला होता है। उसका इदराक रखने वाला होता है। सही बात ये है कि दुनिया जिस तरह से जा रही थी बदल रही थी। हमने उसका इदराक नहीं किया। हमने इदराक उस वक्त किया जब कॉलोनियल्स कॉलोनियल पावर्स ने हमको जकर लिया और पूरी तरह से हमें तबाह कर दिया। तब हम दोबारा बेदार हुए और बाजाप्ता हमारी बेदारी की सदी और शुरुआत तब हुई जब हम बहुत सब कुछ अपने इदारती सतह पे और अपने ट्रेडिशन की सतह पे हम सब कुछ खो चुके थे। खिलाफत का डाउनफॉल हो गया। आपके वफ के इंस्टीटश कॉलोनियल जो निजाम है उसमें उसके प्रॉपर्टी लॉज़ तब्दील कर दिए गए। आपके पर्सनल लॉज़ को जो आपकी शरीयत थी उसको पहले पर्सनल लॉ बनाया गया। फिर उसको जिसे कह सकते हैं कि सेकुलराइज किया गया। तो आपका जो पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर था जो आपकी सोच से और आपकी फिक्र से और कुरान से और एक पूरा जो ट्रेडिशन है उससे निकल कर आता था वो सारे जो इदारे हैं इंस्टीटशंस हैं जब वो खत्म हो गए बिखर गए जब आपका कहना है कि जब हमने शायद फिर से सोचना आंख खोली कि हमें सोचने की जरूरत है और शायद आज भी हम उतना सोच नहीं पा रहे हैं सिर्फ जरूरत महसूस हुई अब बेशक अच्छा क्योंकि आपकी जो किताब है उसका का जो नाम है वो जदीद इल्म कलाम मॉडर्न थियोलॉजी तो वहां तक पहुंचने से पहले सवाल ये उठता है कि ट्रेडिशनल कलाम क्या है? ट्रेडिशनल थियोलॉजी क्या है? और क्यों ट्रेडिशनल थियोलॉजी से हमें मॉडर्न थियोलॉजी की जरूरत महसूस होती है? हमारी जो किताब है बर्रे सगीरे हिंद में जदीद इल्म कलाम इस किताब में हमने खासतौर से जो इंडियन सबक्टिनेंट में जो जदीद इल्म कलाम पे गुफ्तगू हुई है पिछले गोया तकरीबन 150 200 सालों में उस पे हमने गुफ्तगू की है। तो उस पर्सपेक्टिव में ये सवाल बहुत अहम [नाक से की जाने वाली आवाज़] है कि जदीद इल्म कलाम क्या कदीम इल्म कलाम क्या क्यों इसकी जरूरत है वगैरह वगैरह देखें पहले तो ये इस्तलाह भी नहीं थी लेकिन ये गालिबन सर सैयद अहमद खान थे जिन्होंने जदीद इल्म कलाम की इस्तलाह उन्होंने पैदा की या एक इस्माइल हकी थे मेरे ख्याल से टर्की के उन्होंने ये इस्तलाह बनाई तो बहरहाल उसी को लोगों ने इस्तेमाल किया और सारी दुनिया में जदीद इल्म कलाम का ही लफज़ इस्तेमाल हो रहा है अरब दुनिया में खासतौर से ये हमारा जो कदीम इल्म कलाम है जो कदीम जो थोलॉजी है वो बुनियादी तौर पे जो ग्रीक फिलॉसफी है और जो एरिस्टोटीलियन फिजिक्स और मेटाफिजिक्स है उसकी बुनियाद पे बनी और बनाई हुई है। इसलिए हम ये देखते हैं कि हमारी जो किताबें मदारिस में जो पढ़ाई जाती हैं और सारी दुनिया में जो जो जिनको पढ़ाए जाने का सिलसिला अ 19वीं सदी तकरीबन रहा है वो पूरा इल्म कलाम का जो लिटरेचर है वो पूरा का पूरा लिटरेचर उसी बुनियाद पे उस ग्रीक फिलॉसफी की बुनियाद पे तैयार हुआ। अब जो हम देखते हैं कि 16वीं सदी के बाद जो खासतौर से मॉडर्न साइंस और फिलॉसफी में मॉडर्न साइंस में जो तब्दीलियां पैदा हुई मिसाल के तौर पे अब डेकार ने आकर के चीजों को तब्दील किया। उसने एरिस्टोटीलियन जो आईडियोलॉजी थी उस पे बहुत सारे सवालात उठाए। उस पूरी एरिस्टोटलियन फिजिक्स पे उसने सवालात उठाए। मकसद मुख्तसर सा कहने कहने का यह है कि खासतौर से जो मॉडर्न साइंस ने आकर करके जो एक मॉडर्न वर्ल्ड व्यू बनाया और तय करने की कोशिश की और नए अंदाज में नए सवालात पैदा किए वो सवालात पहले नहीं थे। मोतजला के सामने वो सवालात नहीं थे। जो आगे बढ़ के जिन्होंने इस चैलेंज को कबूल करने की कोशिश की इशारा के सामने उस तरह के सवालात नहीं थे। क्योंकि ये सारे के सारे सवालात हम देखते हैं कि खासतौर से 17वीं और 18वीं सदी में वजूद में आए और उसकी वजह से अब जो है तलाश किया जाने लगा हमारे कुरान और हदीस के जो नसूस थी अब ये देखा जाने लगा कि साहब यहां तो यह कहा जा रहा है तुम्हारे इल्म कलाम के मुताबिक कि या कुरान की बाज आयात में इस तरह की चीज़ें कि ज़मीन मिसाल के तौर पे स्टैटिक है। अब मॉडर्न साइंस कह रही है कि नहीं भाई स्टेटिक नहीं है मुतरिक है वो तो और क्या कहते हैं कि इसी तरीके से या वो जमीन चिपटी है हमारे यहां इस तरह की बहसें हैं आपको दिलचस्प बात लगेगी हमारे यहां जो इल्म कलाम की किताब फिरकों पे लिखी गई अल फर्क बन फिर अब्दुल काहिर अल बगदादी की उन्होंने कहा कि अहले सुन्नत व जमात के अकीदों में इस बात को शामिल किया है कि वो यह बात माने के जमीन जो है वो स्टेटिक है और इसी तरह से वो स्फेरिकल गोल नहीं है बल्कि चिपटी है इस तरह की बात उन्होंने अलफ में लिखी अर्थ थ्योरी जिसे बोला जाता है जीकि हमें टोलेमी को हमारे यहां ज्यादा अहमियत हासिल रही तो उसकी बुनियाद उसके नजरियात हमारे यहां आए इख्तसार के साथ ये के जदीद इल्म कलाम की जो आवाज बुनियादी तौर पे आलम इस्लाम के मुख्तसफ हिस्सों में जो उठी है ये मॉडर्न साइंस ने जब इस्लामिक मेटाफिजिक्स में बोलना शुरू किया इंटरवन करना शुरू किया उस तरह के सवालात नए जो है पैदा किए किए आज के मुख्तलिफ स्कॉलर्स ने एक एक ट्रेंड पैदा हुआ नेचुरलिज्म का साइंटिज्म का उसको आप मजीद इस तरह से समझ सकते हैं कि सर सैयद अहमद खान मिसाल के तौर पे सर सैयद अहमद खान का जो ये था उनके यहां भी वही साइंटिज्म था कि भाई बुनियादी तो हकीकत को अल्टीमेट रियलिटीज को जानने का वाहिद और बुनियादी जरिया हमारी साइंस है हम और इसकी बुनियाद पे साइंस जिस चीज को अप्रूव करती है उसको हम एक्सेप्ट करेंगे जिसको वो नहीं मानती है रिजेक्ट करती है तो हम रिजेक्ट कर देंगे दोद चार की तरह से हमारे सरस खान का भी नजरिया बिल्कुल यही था और जो नेचुरलिज्म की जो पूरी हम देखते हैं कि 16वीं 17वीं 18वीं सदी में पैदा हुई उससे वो मुतासिर थे तो ये सारे के सारे मसाइल थे जिसकी वजह से ये एक शिफ्ट पैदा हुआ जदीद इल्म कलाम का कि नहीं अब खुद सर सैयद ने कहा कि हमारे पास इस सवाल को हम इस पे खत्म करते हैं कि उन्होंने खुद सर सैयद का ने ये बात कही कि अब जो है इस बात की शदीद तरीन जरूरत है कि हमें जदीद इल्म कलाम चाहिए जो इस तरह के बड़े जो है क्वेश्चंस को एड्रेस कर सके। डॉक्टर साहब क्योंकि जदी दिल में कलाम की तरफ बढ़ने से पहले मैं चाहता हूं कि हमारे व्यूअर्स के सामने एक क्लेरिटी आ जाए कि फिलॉसफी कलाम अकीदा मजहब मतलब ब्रॉडली स्पीकिंग जी जी इनमें रिलेशनशिप्स क्या हैं? वजह मैं इसलिए बता रहा हूं कि दिक्कत क्या होती है कि जो क्रिटिक आते हैं और जो अलग-अलग शोबों में ट्रेंड होते हैं या अलग-अलग वर्ल्ड व्यूज में विद इन दी नॉलेज ट्रेडिशंस ट्रेंड होते हैं वो दूसरे जो नॉलेज ट्रेडिशन है उसको नहीं समझते वो क्यों वजूद में आया है उसका इंटरेक्शन क्या है मिसाल के तौर पे अक्सर ये बोला जाता है कि अगर आप हफी हैं तो आप मातुरदी या अशरी जी अगर आप अहले हदीस हैं या आप यू नो मॉडर्न सल्लफी फ्रेमवर्क में है तो बोला जाएगा कि आप अथरी ट्रेडिशन से अथरी ट्रेडिशन टेक्सचुअल ट्रेडिशन कि आपको जो जैसा लिखा गया है वैसे ही इंटरप्रेट करना है। माथुरी ट्रेडिशन और अशुरी ट्रेडिशन में ये कि आप अक्ल का इस्तेमाल कर सकते हैं। आप इंटरप्रेटिव लेयर ला सकते हैं। जब मैं एज अ फिलॉसफी का स्टूडेंट ये डिबेट्स देखता हूं। मुझे तो प्योर फिलॉसफी इंटरेक्टिंग विद इस्लामिक टेक्स्ट जी यह नजर आता है। मुझे यह नजर नहीं आता कि कोई बोले कि ये अपने आप में कंप्लीटली इंडिपेंडेंट फील्ड ऑफ स्टडी है। और फिर जब मैं ये देखता हूं कि फिलॉसोफी के डिबेट्स आपने क्योंकि बोला एरिस्टोटेलियन डिबेट्स। आपने बहुत अच्छे से बताया कि टॉलमी एक डिफरेंट कॉस्मोलॉजी को इमेजिन कर रहे थे। उसमें आपका जियोसेंट्रिसिज्म नहीं था अर्थ के अराउंड अर्थ है जिसके अराउंड सब घूम रहे और अर्थ रुकी हुई है। वहां पे वो इमेजिनेशन थी। लेकिन होता यह है कि जो पावर नॉलेज की नॉलेज और पावर का जो रिलेशन है क्योंकि एरिस्टोटल हमारे उनके गुरु थे एलेग्जेंडर के और एलेक्जेंडर ने एक तरीके से फोरफादर ऑफ रोमन एंपायर हैं। तो वो जो नॉलेज ट्रेडिशन और पावर का रिलेशनशिप है। उससे जो नॉलेज आगे बढ़ती है वो भी रिस्ट्रिक्ट होती है। और डेक आर्ट और बाकी लोगों ने फ्यूचर में आके जब ये महसूस किया कि उस टाइम पे आप टेलीिस्कोप इस्तेमाल कर सकते हैं। आप दूसरी चीजें इस्तेमाल कर सकते हैं और आपकी जो ऑब्जर्व रियलिटी है और जो आपको 1000 साल का ट्रेडिशन उनके ट्रेडिशन में मिला हुआ है उनको मिसमैच लगी और आपका बहुत जो ये ऑब्जरवेशन है जो आप बता रहे हैं ऑफ कोर्स ये पूरी तरह से इस पे बहुत लोगों ने मुताला भी किया है कि जो मुसलमान भी अपने नॉलेज ट्रेडिशंस जो एरिस्टोटेलियन लॉजिक को इस्तेमाल करके या प्लेटोनियन लॉजिक को इस्तेमाल करके जो इंटरप्रिटेशन कर रहे थे जी वो कई बार इंटरप्रिटेशन ज्यादा था और कुरान और इस्लाम कम था क्योंकि बाद में जब वो इंटरप्रिटेशन हो रहा है तो आपको चपटी अर्थ नहीं दिख रही है। बिल्कुल बिल्कुल तो आप मुझे यह बताइए इसलिए मैं ये इस पे बहुत ज्यादा तवज्जो देना चाहता हूं कि हमारे यहां जब भी इस तरह के डिस्कशन होते हैं बहुत रिडक्टिव हो जाते हैं। एज इफ के फिक्र में फलसफे के कोई असर असरात ही नहीं है। या जो उसूलुल फिक्र है वो जो मेथोडोलॉजी है वो एज इफ ह्यूमन नॉलेज सिस्टम से इंडिपेंडेंट है। जी इस पे आप थोड़ा सा अगर फिर हम इससे क्योंकि यहीं से फिर हम बढ़ पाएंगे कि मॉडर्न थियोलॉजी क्या कर रही है और उसमें एक जस्ट एडिशन ये है कि मेरा क्योंकि मॉडर्न जो जो डेकार और उसके बाद हुआ एनलाइटनमेंट पीरियड वो क्योंकि वो ऑब्जरवेशन और इंप्रसिज्म से रिलेटेड क्योंकि साइंस इज़ अबाउट फॉल्सिफायबिलिटी कि आप ऑब्जर्व करके आप थ्यरी बना रहे हैं। तो आपकी ऑब्जर्व रियलिटी से रैशनलिटी इमर्ज हो रही है। रादर देन रैशनलिटी से आप ऑब्जरवेशन को गवर्न करने की कोशिश कर रहे हैं। तो ये सारे रिलेशनशिप्स अगर थोड़ा सा आप ट्रेडिशन के पर्सपेक्टिव से क्लियर करें कि ऐसा क्या रिलेशनशिप है फिलॉसफी अकीदे मजहब में और फिर हम आगे बढ़े कि भ बहुत शुक्रिया। [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारा जो ट्रेडिशन है जो इल्मी रिवायत है हमारी इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन है वो एक समझे कि रस्सी की तरह से है जिसमें मुख्तलिफ तरह के रेशे हैं और वो तमाम रेशे मिलकर कर करके फिर वो एक रस्सी को एक रिवायत और एक ट्रेडिशन को हमारे बनाते हैं। उसमें शुरू से जिस तरह से एक जिसको हम कहते हैं कि रिलीजियस नॉलेज या रिलीजियस साइंसेस का जो रोल रहा है उसी तरह से जो रेशनल साइंसेस हैं उनका भी बुनियादी तौर पर रोल रहा है और ये इब्तदा से रहा है। हम पहली सदी ही में देखते हैं कि इस तरह के फिरके इस तरह के ग्रुप्स इस तरह के वो पैदा हुए जो इस इस्लाम को ज्यादा रैशन अंदाज में सोचने की समझने की कोशिश करते थे। ये बिल्कुल पहली सदी में पैदा हो गया। यानी कदराइट वगैरह जो पैदा हुए जो इन्होंने तकदीर का इंकार किया वो बिल्कुल रैशनली चीजों को सोच रहे थे। तो इसलिए हमारे यहां मदारिस का जो ट्रेडिशन रहा है उसमें भी मदरसे के में यूज़ होने वाले टर्म के मुताबिक के इल्म मनकुलात यानी रिलीजियस साइंसेस और माकुलात रैशन साइंसेस ये दोनों पढ़ाए जाते हैं। हमारा पूरा ट्रेडिशन इसी तरह से रहा है। तो इसलिए हम यह देखते हैं कि जो खासतौर से जिसको हम अपना गोल्डन पीरियड कहते हैं। उस गोल्डन पीरियड में जब ये किताबें लिखी जा रही थी हमारा हमारा इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन परवान चल रहा था और एक बाजाप्ता तौर पे एस्टैब्लिश हो रहा था तो उस वक्त कई ग्रुप थे हमारे व्यूअर्स को ये समझना चाहिए कि मुख्तलिफ तरह के ग्रुप थे एक जो ग्रुप था वो फिलॉसफर्स का था मुस्लिम फिलॉसफर्स का था ये मुस्लिम फिलॉसफर्स वो थे जो खासतौर से अरिस्टलियन लॉजिक से और फिलॉसफी से बहुत ज्यादा मुतासिर थे। ये वो ग्रुप था जिसको हम आमतौर से इब्न सीना और फराबी इबने रुद वगैरह और कदी वगैरह के हवाले से हम जानते हैं। ये जो है वो भी इस्लाम के खादिम ही थे। हमारे यहां दूसरी तरह से इसको देखने की कोशिश की जाती है। सही बात ये है कि उनके सामने ये प्रोजेक्ट था के अ जो उस वक्त की एक रैशन साइंस है जो साइंस है अ किस तरह से इस्लाम और इस्लामिक वर्ल्ड व्यू को इस्लामिक बिलीव को उसके साथ रिकंसाइल करने की कोशिश करें। यही प्रोजेक्ट फराबी का था। इब्ने सीना का था। इबद का सबों का यह प्रोजेक्ट था के हमें जो है जो उस पे एतराजात हो रहे हैं और ऐसा लग रहा है कि रीजन एंड एंड रिवुलेशन या रीजन एंड रिलीजन में एक कंट्राडिक्शन है एक क्लैश है तो उसको समझना उसको बताना कि ऐसा कोई क्लैश नहीं है बल्कि अ हमारा रिलीजन भी जो है वो बिल्कुल रीजन बेस्ड है। तो ये फिलॉसफर्स की एक क्लास पैदा हुई जिन्होंने हर चीज को रशनलाइज करने की कोशिश की। लेकिन हर चीज को रशनलाइज करने की कोशिश में इसमें कोई शक की बात नहीं है कि मसला पेश आया और मसला पेश ये आया कि उन्होंने जिस जो दायरा हम कहते हैं कि एक तरह से इस्लामिक मेटाफिजिक्स का या गैब का दूसरे लफ्ज में कहा जाए उसमें भी उन्होंने अपने अंदाज में उसको रशनलाइज करने की कोशिश की अकल से समझने की कोशिश की वही को जन्नत को आखिरत को खुदा के वजूद को और उससे मसाइल पैदा हुए उससे जो मसाइल पैदा हुए तो हमारी जो दूसरी क्लास थी थियोलॉजियन की क्लास वो पैदा हुई मुतकिमीन की उन्होंने बताया कि भाई ये तो बहुत ही गलत है कि आप जो है वही को हैसियत नहीं दे रहे हैं। वही को आप इस तरह से देख रहे हैं कि जैसे जो है ये एक इंटरनल प्रोसेस है। कोई फरिश्ता जैसी कोई चीज नहीं है कि जो बाहर से कोई या कोई एजेंसी नहीं है। बस एक इंटरनल एक प्रॉफेट का प्रोसेस होता है या वही पैदा हो जाती है। मिसाल के तौर पे या यह है कि आप आखिरत का कह रहे हैं कि आखिरत जो है या रेक्शन जो है वह तो सिर्फ एक एक मेटाफोरिकल सी चीज है। कोई रियल चीज नहीं है। तो इन लोगों ने उसको साबित करने की अपने अंदाज में कोशिश की। फिर यह हुआ कि देखें कि जो दूसरे जो मजाहिब के लोग थे खस्त तौर से क्रिश्चियंस। क्रिश्चियंस के साथ यही मसला पेश आया था। उन्होंने जो है अपने रिलीजन को रैशनलाइज करने के लिए वही टूल्स उन्होंने इख्तियार किए थे जो जो ग्रीक फिलॉसफी के तो अब वही पैराडाइम था फ्रेमवर्क था सोचने का बनने का तो उन्होंने उसी फ्रेमवर्क में इस्लाम को भी रशनलाइज करने की कोशिश की और सारी डिबेट फिर उसी अंदाज में उसी सतह पे पैदा हुई उसी फ्रेमवर्क में पैदा हुई फिर उसमें जो है हम यह देखते हैं कि जो गुलू हुआ मौतजला का की तरफ से जो कमियां और कमजोरियां पैदा हुई यानी ये कमियां कि उन्होंने भी अकल को कुछ ऐसी अहमियत दी कि जिसमें हमारा जो वही का कांसेप्ट है वो दब गया। इस्लामिक टेक्स्ट को वो अहमियत हासिल नहीं रही जो अहमियत हासिल होनी चाहिए। तो अशायरा पैदा हुए। फिर अशायरा ने भी थोड़ा सा उसमें एकजुरेशन किया। उन्होंने अक्ल को फिर जो है कुछ रिटेलिएशन में रिएक्शन में आकर के मोहतजला के उन्होंने कुछ ज्यादा गुलू किया। तो हम देखते हैं कि मातुरीदी पैदा हुए और मातुरीदी ने थोड़ा बैलेंस बनाने की कोशिश की कि ठीक है मोहतजला तो एक बिदती फिरका है। उन्होंने बहुत सारी सारे मसले कुछ पैदा किए हैं। लेकिन जो अशराई हैं अशरा ने अशयरा ने जो जो अकल को जो अहमियत हासिल है उसको भी उन्होंने जरा सा कम कर दिया है। और जो इल्लतो मालूल का जो रिश्ता है कॉजिलिटी की बुनियाद पे जो हम चीजों को समझने और सोचने की कोशिश करते हैं उसको उन्होंने बहुत ज्यादा घटा दिया है। तो इस तरह अंदाज की बातें फिर अबू मंसूर मातुरीदी के सामने थी। तो उन्होंने इन दोनों के दरमियान बैलेंस बनाने की कोशिश की। तो इस तरह से हम ये देखते हैं कि ये जो मुख्तलिफ गिरोह पैदा हुए और उन और ये सारे के सारे गिरोह जो मुस्लिम ग्रोह थे एक तरफ तो खुद आपस में डिबेट कर रहे थे। वो देख रहे थे कि आपस में किस तरह से अ जो मसाइल पैदा हो रहे हैं हमारे इस्लामिक टेस्ट को लेकर कर कर के हमारे इस्लामिक वर्ल्ड व्यू और हमारे बिलीफ को लेकर कर कर के वो आपस में एक डिबेट चल रही थी और उसकी वजह कुछ बाहर भी थी कि जो हमने देखा कि जो खासतौर से जस यहूदियों की तरफ से तो कम लेकिन क्रिश्चियन जो हमारे बॉर्डर पे मुस्लिम मुस्लिम जो एरियाज हैं यानी जो हम देखते हैं इजिप्ट हैं और यहां जो सीरिया वगैरह में ये तो हमेशा वो फिलोसोफिकल स्कूल वगैरह रहे अलेक्जेंडर के वक्त से और फिर क्रिश्चियंस ये सारे क्रिश्चियंस का इलाका है तो उनके सवालात और वो लोग बहुत बड़ी तादाद में मुसलमान भी हो गए थे ये पूरा ईरान के लोग मुसलमान हो गए थे उन्होंने ये सारे के सारे सवालात अपने अंदाज में पैदा करने की कोशिश की थी तो ये सब वजह हुई इल्म कलाम के इमर्ज करने की ताकि वो बाहर भी जवाब दे सके जो इस्लाम पे डायरेक्ट ऐतराज कर रहे हैं और फिर भी जो अंदर जो हमारे मुस्लिम मुस्लिम फिलॉसफर्स का गुरु गुरु है जो न्यू प्लेटोनिज्म से मिसाल के तौर पे मुतासिर हो करके दुनिया को बिल्कुल उसी फ्रेमवर्क में देखने की कोशिश करना कर रहा है न्यू प्लेटोनिस्ट फ्रेमवर्क में उसका जवाब दे सकें तो इस तो इस बुनियाद पे ये एक इंटरनल डिबेट पैदा हुई और हम ये देखते हैं कि शानदार तरीके से इल्म कलाम की एक रिवायत पैदा हुई। लेकिन यहां पे ये भी वाज़ रहना चाहिए कि खुद हमारे ओलमा और स्कॉलर्स का एक ग्रुप इन तमाम चीजों का शदीद तरीन मुखालिफ था। हम वह कहता था कि इस तरह से हमें खालिस अकली बुनियादों पे इस्लाम को इस्लामिक टेस्ट को और बिलीफ को समझने और समझाने की कोशिश ही बिल्कुल फजूल है। मिसाल के तौर पे इमाम शाफी कहते हैं कि जो इल्म कलाम को पढ़ता है, पढ़ाता है उसको दर्रे उसको कोड़े लगाए जाने चाहिए और उसको शहर में घुमाना चाहिए और उसको बताना चाहिए लोगों को कि देखो इल्म कलाम पढ़ने वाले के का ये हश्र होता है और ये इस तरह से उनको जो है बेइज्जत किया जाए। या इमाम अबू युसुफ कहते हैं जो इमाम हनीफा के शागिर्द हैं। मन ताल्लम कलामत कि जो इल्म कलाम पढ़ता है वो जिंदक या हेरेटिक हो जाता है। इस्लाम से फिर जाता है। तो बहुत शदीद तरीन मुखालफत रही। वो इसलिए मुखालफत रही कि इस के ये एक रैशन यानी फ्रेमवर्क था इस्लाम को समझने का और समझाने का। और जब आप किसी चीज को प्योर रैशन अंदाज में सोचने समझने की कोशिश करते हैं तो यह जरूर होता है कि आप बहुत सारी चीजों में आप सही तरह से जस्टिस नहीं कर पाते और कुछ ना कुछ आपकी तरफ से वो अपडेविएट कर जाते हैं। मसाइल पैदा होते हैं। लेकिन लेकिन बकल इबने रुद के या और दूसरों को कि यही चीज़ फका में भी होती है। चीज़ तो फका में भी होती है कि बहुत सारी आप गलतियां करते हैं। यानी इज्तहाद में रसूल्लाह ससल्लम ने कहा कि भाई जब इत्तेहाद में गलतियां तो होना ही होना है लेकिन इज्तहाद करने वाले को फिर भी एक नेकी का अजर और नेकी का वो मुस्तहिक होता है। यही बात हमारे इब्न रोशद ने कही है फसुल मुकाल में। तो बहरहाल हमारे ट्रेडिशन में हमने ये देखा कि ये मुख्तलिफ तरह की चीजें रही। ये प्रॉब्लम्स रही जिससे ये सारी चीजें इमर्ज हो करके सामने आई। मुझे आपकी बात सुनते हुए एक कांसेप्ट है। साइकोलॉजी में मैंने पढ़ा। फिर उसको इकोनॉमिक्स में भी इस्तेमाल किया जाता है बाउंडेड रैशनलिटी का कि जो आपकी रीजन जो अकल है जब आप इस्तेमाल करते हैं तो वो आप अपने लिमिटेड जो आपकी जिसे कहते हैं कि एक्सपीरियंसेस हैं। अब कोई इंसान है जो डेजर्ट में पैदा हुआ। डेजर्ट में ही उसने जिंदगी देखी। उसे पता ही नहीं है पानी क्या होता है। तो उसने जो अपनी रैशन साइंस को इस्तेमाल करके रैशनलिटी को इस्तेमाल करके जो वर्ल्ड कंस्ट्रक्ट किया और उसको आइडियलाइज किया उसमें पानी का उस तरह का तसवुर ही नहीं है कि वो एक लैंडस्केप भी हो सकता है। बिल्कुल अलग। उनके यहां वो डिफरेंट फ्लोरा फौना उसका तसवुर नहीं है। जिस तरह यू नो जो पहाड़ों में रहा होगा। जी तो रैशनालिटी भी बाउंडेड है आपके एक्सपीरियंशियल स्पेस आप बिल्कुल जिस वर्ल्ड को आप एक्सपीरियंस कर रहे हैं उससे बाउंडेड है वो और जब आप रैशनलिटी को जिसे कहते [नाक से की जाने वाली आवाज़] हैं कि प्योर उस लेवल पर ले जाएं कि जहां पे उसका टेक्स्ट से और एक्सपीरियंस से दोनों से डिफरेंस नहीं भी प्रोड्यूस हो रहा है और लोग यह बोले कि नहीं जो अक्ल की जो रीजनिंग है वो ही सबसे आला है और हो सकता है। मतलब यह होता है कि जब लोग एंपेरिकल साइंसेस में, साइंटिज्म में, एंपेरिकल ऑब्जरवेशन को ही वो मकाम दे देते हैं। बेशक तो वहां पे ये होता है कि क्या वो रीज़नेबल है भी या नहीं? तब भी आप हालांकि वो एक लिमिटेड एक्सपीरियंस हो सकता है। और रेवोलेशन में वो होता है कि जो रिवील्ड नॉलेज है उसमें खुद सूर इमरान में अल्लाह सुभाना ताला बोल रहे हैं कि बेशक जो तीन से सात आयत हैं के आपको सेक्रेड रिवील्ड नॉलेज को समझने के लिए अकल की नॉलेज की कितनी ज्यादा अहमियत है और उसको सबसे इंपॉर्टेंट टूल बोला गया इंटैक्ट वो करने के लिए तो वो जो डिबेट्स में आपके यानी होता ये है जरा सा बीच में इंटक्ट करते हुए होता ये है कि जो ह्यूमन स है जो उसके सोच जो उसके अंदर खुदा ने एक माद्दा अकल का रखा है वो किसी एक हद पे ठहरना नहीं चाहता हम वो हर हाल में यह चाहता है कि आगे बढ़कर करके हम चीजों को सोचे। हर चीज को समझने की कोशिश करें और तो ये एक बिल्कुल नेचुरल चीज है। इसको रोका नहीं जा सकता। और हम ये देखते हैं कि आज की जो मॉडर्न दुनिया है जिसमें वो उसी का एक अचीवमेंट है कि इस तरह से। लेकिन कुरान जो है वो ये कहता है कि तुम अपनी जो फिजिकल रियलिटीज हैं अ जो जो तुम्हारा इमिनेंट गोया वर्ल्ड है उसमें तो जिस तरह से तुम चाहो सोचो जो भी है तुम्हारी अपने एक्सपीरियंसेस की बुनियाद पे ऑब्जरवेशन की बुनियाद पे तुम चीजों को समझने कोशिश करो लेकिन इल्म का दायरा या रियलिटी का दायरा इससे बियों्ड है वहां पे तुम्हारी अक्ल महदूद हो जाती है इसलिए इसलिए वहां से एक तरह से वही का दायरा शुरू होता है। रिवुलेशन का दायरा शुरू होता है। उसको सिर्फ रेवोलेशन और वही के जरिए ही समझने की कोशिश की जा सकती है और उस हकीकत को समझा जा सकता है। लेकिन होता ये है और हमेशा ऐसा ही होता रहा है और आगे भी होता रहेगा के इंसानी अक्ल जो है वो किसी एक जगह पे ठहरने के लिए तैयार नहीं होती। वो चाहती है कि उसके बियों्ड जाकर करके हम देखने समझने की कोशिश करें। यही चीज हमारे फिलॉसफर ने किया। ये चीज हमारे मोहतजला ने किया। तो इसलिए आप यह तो नहीं कह सकते कि पाबंदियां नहीं लगा सकते आप बिल्कुल कि तुम सोच ही नहीं सकते हो। बिल्कुल पाबंदियां आप नहीं लगा सकते। कुरान खुद कह रहा है सोचने के लिए। कुरान खुद कह कह रहा है और सैकड़ों जगहों पे कह रहा है यानी याकलून ताकि ततफक्करून और तदब्बरून की बात कर रहा है कि हम तदबुर करो तफक्कुर करो। हां एक जगह जाकर करके वो कहता है कि देखो ये वाली जो हकीकत हैं वहां वो दायरा वो है कि जिसमें तुम्हारी अक्ल का काम नहीं है। वह अपना काम नहीं करेगी। वहां पे जो प्रोफेट यानी प्रोफेटिक नॉलेज है उससे तुम काम लो और उसकी बुनियाद पे चीजों को समझने की कोशिश करो। तो अब तक जहां हम पहुंचे हैं मुझे जो ये समझ आ रहा है कि दो एक्सट्रीम्स और फिर उसमें जो मिडिल वेज़ भी है एक वो है कि आप प्योरली जो टेक्सचुअल जो इंटरप्रिटेशन है आप नहीं कर सकते जो एग्जैक्टली हालांकि कुरान बोल रहा है कि आपकी इंटरप्रेटिव लेयर होती है आप इंटरेक्ट करते हैं। दूसरी तरफ ये कि आप इतना इंटरप्रेट कर लें कि उसका कुरान की जो क्लेम्स है उससे भी अगर कंट्राडिक्शन पैदा हो रहा है तो उसके बावजूद आप अक्ल को तरजीह दे रहे हैं और जिसकी वजह से आपके लिव्ड कंट्राडिकशंस पैदा हो रहे हैं तो ये जो डिबेट पूरी हुई और इमाम गजाली को जब हम देखते हैं उन्होंने हालांकि उनको ये बोला जाता है वेस्ट में कि भ ही इज़ द सिंगल पर्सन हु डिस्ट्रयड फिलॉसफी और रीज़ इन द मुस्लिम वर्ल्ड बट मैं उनको बहुत मैं भी एग्री नहीं करता ये गलतफहमी है। मिसकसेप्शन है। गलतफहमी है। बल्कि उनका ये भी एक वो था कि आप अगर कोई अल्लाह कोई खुदा है अल्लाह सुभाना ताला मतलब वो एज अ थॉट एक्सपेरिमेंट। जी जी जी तो उसी ने इस दुनिया को बनाया है। उसी ने इस दुनिया के लॉस को बनाया है। उसी ने इस दुनिया में इंसान को बनाया। उसकी रीजनिंग को बनाया। उसकी एक्सपीरियंसेस को बनाया है। तो उसका अगर सेक्रेट रिवील लॉ होगा तो वो एक ही वक्त में रिवील्ड भी होगा, रीज़नेबल भी होगा और प्रूवेबल भी होगा। बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल। तो उन्होंने एक्चुअली बहुत जिसे कहते हैं डिफिकल्ट कंडीशंस लगा दी ट्रुथ और सर्टेनिटी के लिए। एक तरीके से उन्होंने पुश किया कि यू हैव टू वर्क हार्डर फॉर बोथ एप्लीकेशन ऑफ इस्लाम शरीयत एप्लीकेशन एंड देन कलाम इस द डिफेंस ऑफ दैट एप्लीकेशन और इंटरप्रिटेशन और आपको वो तीनों को कंटीन्यूअसली आपको ये साबित करना पड़ेगा ये कंट्राडिक्शन में नहीं है। पूरा गजालियन प्रोजेक्ट भी यही था। गजालियन प्रोजेक्ट भी यही था। इसीलिए उन्होंने उनके सामने जो बड़ा चैलेंज था जो और उन चैलेंजेस को सामने रखकर करके जो उन्होंने अपना एक प्रोजेक्ट बनाया और उसने बड़ी तब्दीलियां गोया हम देखते हैं कि हमारे इसमें पैदा की बहुत बड़ा इंपैक्ट डाला वो यही है कि उन्होंने देखा कि यानी ये एक तरफ ये सारे एक फिलॉसफर्स की क्लास है जो अपने अंदाज में एक रिकंसिलेशन की कोशिश कर रही है और उसमें में बहुत सारी चीजें पैदा हो रही हैं जिससे प्रॉब्लम आ रही है। दूसरी तरफ जो है और मुख्तलिफ दूसरे ग्रुप ग्रुप्स थे। खुद वो अशरी थे। लेकिन वो देख रहे थे कि अशरियों में भी कुछ में कुछ ऐसा मुबालगा पैदा हुआ है जिसका मैंने पहले जिक्र किया के एक रिएक्शनरी सोच कि जिसकी बुनियाद पे वो रीजन या अकल को ही बहुत ज्यादा कमजोर कर देते हैं। इसलिए गज़ाली ने पूरी इस बात पे मेहनत की। इसीलिए हम ये समझते हैं कि इल्म कलाम को गजाली ने अपने जमाने में जो जो डेवलप किया जिस तरह से आगे का पूरा इंपैक्ट दरअसल इल्म कलाम पे गजाली का है। यानी राज़ आए और इब्न तैमिया वगैरह लोगों ने काम किया। लेकिन असल इंपैक्ट असल जो एक रुख गजाली ने दिया गैर मामूली पूरे इल्म कलाम पे वो उनका इंपैक्ट और वो रुख बिल्कुल पाया जाता है। तो गजाली ने ये सारे अपने उसूल बनाए। मुतादद जो किताबें लिखी एक तरफ उन्होंने यह करने की कोशिश की रैशनलिटी को या एक इस्लामिक रैशनलिटी को परवान चराने डेवलप करने और उसका एक मयार तय करने की कोशिश की जाए। यानी ऐसा नहीं कि जिस तरह से अ शायरा ने जिस तरह से अकल को थोड़ा सा अस लाइन कर दिया था और उससे मसाइल पैदा हो रहे थे। तो इस तरह से एक थीसिस उन्होंने बनाने की कोशिश की जिसमें अकल को भी एक अहमियत हासिल है और दूसरी तरफ जो हमारा जो कुरान और हदीस का जो हमारा जो रिलीजियस टेक्स्ट है उसकी जो अपने जो उसके अपने उसूल जवाबत हैं और उसका अपना जो फ्रेमवर्क है वो भी उससे मुतासिर ना हो। मिसाल के तौर पर उनकी किताब है कानून तावील तो बड़ी छोटी छोटा सा रिसाला है लेकिन बहुत ही गैर मामूली है बहुत ही अहम है। उन्होंने उसमें बताने की कोशिश की है कि किस तरह से अकल और नकल रीज़न एंड रेवोलेशन वह कहते हैं कि साहब पांच ग्रोह हैं इस वक्त पाए जाते हैं जो इन चीजों को जो देखने की कोशिश करते हैं रिलीजियस टेक्स्ट को और फिर मॉडर्न नॉलेज से उसको की बुनियाद पे उसको समझने की कोशिश करते हैं और उन दोनों के दरमियान एक तरह से ततबीक देने या रिकंसिलेशन की कोशिश करते हैं। तो वो कहते हैं कि कोई ग्रुप सिर्फ अक्ल को अहमियत देता है। कोई बिल्कुल नकल को यानी सिर्फ रिलीजियस टेक्स्ट को अहमियत देता है। उन वो कहते हैं कि पांचवा ग्रुप यानी जिसमें वो खुद अपने आप को शामिल करते हैं कि जो अकल और नकल इन दोनों को अहमियत देता है। इन दोनों को समझता है कि ये दोनों लेवल बहुत ज्यादा अहम है और [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारा हमारा जो यानी हमारा जो गोया कि रिलीजियस परसेप्शन है हम वो जो बेस करता है वो इन दोनों पे बुनियादी तौर पे है और इन दोनों से अपना मवादखज़ करता है। ये बात वो ताबीर [गला साफ़ करने की आवाज़] में इस तरह से लिखने की कोशिश करते हैं। तो ये वो दुनिया है कि जिस वक्त तक फिजिकल साइंसेस ने अपनी एपिस्टमोलॉजी नहीं बनाई है। फिजिकल साइंसेस को एक तरीके से इन्हीं साइंस इन्हीं फिलोसोफिकल प्रोजेक्ट्स के विदिन देखा जा रहा है। चाहे वो ऑप्टिक्स हो, चाहे वो ज्योमेट्री हो, चाहे वो मैथमेटिक्स हो वो अक्ल के फ्रेमवर्क से आप जिसे कहते हैं डेवलप हो रही हैं। बेशक और फिर ये जो पीरियड बोला जाता है जो 15 16 सेंचुरी 17 सेंचुरी के बाद अह जो वेस्ट में जिसको बहुत ज्यादा स्पेस मिला वो फिजिकल साइंसेस एज अ प्रोजेक्ट इन इटसेल्फ जैसे न्यूटोनियन फिजिक्स है उससे पहले केप्लर है आपकी गैलीलियो है कि आप लॉज़ ऑफ़ फिजिक्स को एक्चुअली इस व इस तरह से आप उनको बना रहे हैं कि वो जो ऑब्ज़र्वेबल रियलिटी है जो आप ऑब्जर्व कर रहे हैं उसी को लॉ में तब्दील कर रहे हैं रादर देन के जो आपकी अक्ल बता रही है उसको खोजने की कोशिश कर रहे हैं। तो प्रोसेस रिवर्स हो गया। हम लेकिन इस प्रोसेस तक पहुंचने से पहले भी इससे पहले भी कि जब मुस्लिम वर्ल्ड का इससे इंटरेक्शन हो रहा है शाह वली उल्लाह गुजर रहे हैं। शाह वली उल्लाह जिस तरह से गजाली की बात हो रही है सिंथेसिस थिंकर और आपसे पिछली बार भी जो बात हो रही थी अक्सर वो बेशतर जो सिंथेसिस थिंकर्स के साथ होता है जैसे इमैनुअल कांट वेस्ट में होता ये है कि वो जो सिंथेसाइज कर रहे होते हैं उसमें जो कंट्राडिक्शंस वो सामने रखते हैं कि सिंथेसिस के बावजूद ये वो कंट्राडिक्शंस हैं जो सॉल्व नहीं होते ये आपकी नॉन सिंथेटिक फ्रेमवर्क से भी नहीं हो रहे हैं हम लेकिन सिंथेसिस में वही फिर वो जो वही और नकल का या जो रेवोलेशन का जो रोल होता है जो अल्लाह सुभाना ताला कुरान में वो जो बाउंड्री कंडीशंस बता रहे हैं तो हमेशा से ये रहा है कि प्लॉटिनस हो बाद में लोग हो हमेशा से जैसे जो सिंथेसिस का सिलसिला रहा है उसमें हुदूद सामने उभर कर आते हैं कि कहां तक आप चीजों को अक्ल और ऑब्जरवेशन के फ्रेमवर्क से इंसान कहां तक पहुंचा सकता है। तो एक तो यह है और वो रियलिटी यह है कि अभी तक जो क्योंकि मुगल सल्तनत हिंदुस्तान में बरे सगीर में शाह वलीला है अभी ये लार्जर वर्ल्ड के साथ इंटरेक्शन नहीं कर नहीं कर रहे हैं बिल्कुल जो उनका फ्रेम ऑफ रेफरेंस ये है वो ये देख रहे हैं कि ये ऑलरेडी जो इंटरेक्शन ग्रीक फिलॉसफी से और बाकी जो पर्शियन व्यू इजिप्शियन व्यू जो भी उससे उभर के जो कलाम और फेयर और मदाहिब उभर कर आते हैं उनके बीच के भी डिफरेंसेस हैं। जी। उनके लिए जो सबसे इंपॉर्टेंट प्रोजेक्ट है कि वो इन डिफरेंसेस को कैसे समझें और कैसे यूनिफाई करें। आप शाह वली उल्लाह को किस तरह देखते हैं इन द प्रोजेक्ट ऑफ बिल्डिंग ऑफ कलाम। ही इज़ अ ट्रांजिशन मे बी बिटवीन द कदीम इल्म कलाम एंड द जदीद इल्म कलाम। वो एक ट्रांजिशनिंग फिगर हैं। बेशक। आप उनको किस तरह देखते हां यह बहुत अहम है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए एक बात तो क्लियर है के शाह वली उल्लाह यानी उनका जो 18वीं सदी का जमाना है उसमें अ इंडिया समेत आलम इस्लाम का बेश्त हिस्सा अभी पूरी तरह से यूरोप से इंटैक्ट नहीं कर रहा था। इसलिए और इस तरह से जो मॉडर्न जो चैलेंजेस थे उसको उसके अपने फ्रेमवर्क में समझना अभी मुश्किल था। वो चीजें यानी मिसाल के तौर पे शाह वलीला के हम असर हैं कांट लेकिन ऐसा उनकी तहरीरों से नहीं लगता कि कांट क्या कर रहा है और हेगल क्या कर रहा है उनको इन चीजों का अभी ऐसा वो नहीं है लेकिन शाह वलीला के का की जो सबसे बड़ी अहमियत है वो वो अहमियत यही है कि वो एक ऐसे माहौल में और एक ऐसे दौर के एक ऐसे मरहले में खड़े हैं और एक ऐसा दिमाग लेकर के खड़े हैं कि जिस आपने सिंथेसिस की बात की वो उनके सामने एक प्रोजेक्ट की शक्ल में इस तरह से आता है कि वो यह चाहते हैं कि इस एहसास के साथ कि एक नए दौर की शुरुआत है और हमारे पास जो एक तरह से मटेरियल है हमारे पास जो सारी जो चीजें हैं यानी मदारिस में जिस तरह के निसाब को पढ़ाया जा रहा है जो किताबें हैं और जिसकी बुनियाद पे बना बनी हुई हमारी पूरी फिक्र है। वो आज इसको आज के फिक्री चैलेंज को रिसेस्ट करने की सलाहियत गोया कि नहीं रखती। और इसीलिए वो पूरी हुज्जतुल्लाह बालगा जो शाह वली उल्लाह की है वो पूरी हुज्जतुल्लाह बालगा एक देखा जाए तो एक रशनलाइजेशन ऑफ इस्लामिक थॉट के एक प्रोजेक्ट के तौर पे है। वो चुनांचे उसके प्रीफेस उसके मुकदमे में ही उन्होंने यह बात लिखी है। के कि इस्लामी शरीयत जो है इस्लामी शरीयत वो ये चाहती है कि अब मौजूदा दौर में अक्ल और रीजन और अक्ल के पैराए में अपने आप को जाहिर करें एक्सप्रेस करें। हम यह बात उन्होंने हुजतुल्लाह बालगा में मुताद जगह पे एक तो यहां पे लिखा है और फिर वह कहते हैं कि देखिए यह जमाना अब ऐसा आ गया है कि अब इस्लामिक वर्ल्ड व्यू पे इस्लामी अकायद पे अकीदे पे एक ग्रोह है जो वो कहते हैं मुतशकीन का इग्नोस्टिक्स का ग्रोह है जो शक का इज़हार करता है या जो एतराजात करता है इसलिए इस बात की जरूरत है कि हमें दोबारा इन चीजों पे गौर करना चाहिए और दोबारा अपनी फिक्र को इस तरह से रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश करना चाहिए। खास तौर से हुज्जतुल्लाह बालगा में लेकिन उनके अलावा और मुताद किताबों में तो शाह साहब का एक बहुत बड़ा कारनामा अगर देखा जाए तो हुज्जतुल्लाह बालगा इस तरह से सामने आता है कारनामे की शक्ल में के उन्होंने यह एहसास पैदा करने की कोशिश की कि अब पुराने टूल्स काम में नहीं आ सकते बल्कि अब हमें नए टूल्स की जरूरत है और इस तरह से नए टूल्स हमारे नए एक्सपेरिमेंट नए ऑब्जरवेशन और नई चीजों की बुनियाद पे बनेंगे। इसीलिए वो शुरू ही में बालगा के वो कहते हैं कि पुराने जो मुख्तलिफ जो हमारे असलाफ के ख्यालात रहे हैं मैं उनसे बहुत सारी चीजों में इख्तलाफ करूंगा और मैं इसकी परवाह नहीं करूंगा कि मैंने अपने प्रिडससेस से अपने असलाफ से इख्तलाफ किया है। तो बहुत सारी चीजों में उन्होंने इख्तलाफ किया। हमने अपनी किताब में भी उसका जिक्र किया है और उन्होंने एक एक तरह से बिल्कुल फ्री हो के उनका कहना है कि हां इल्म कलाम के हवाले से वो ये कहते हैं कि मैं बिल्कुल फ्री हो के सोचता हूं। जैसे उन्होंने कहा कि भाई वर्ल्ड ऑफ इमेज की बात उन्होंने की जो वर्ल्ड ऑफ आईडिया यानी उनका आलम मिसाल उनकी जो इस्तलाह है आलम मिसाल अ तो वो कहते हैं कि देखिए मैं इस तरह की बात बिल्कुल अ मैं ऐसा कहता हूं और मैं इसकी परवाह नहीं करता हमारे असलाफ में इस तरह की बात लोग कहने वाले नहीं थे। इस तरह की बात वो करते हैं कि मैं क्यों? इसलिए कि उन्होंने शुरू ही में वो ये बताते हैं कि मैं दरअसल इल्म कलाम के मामले में खासतौर से मैं तकलीद का कायल नहीं हूं। हम मैं इल्म कलाम में अपनी क्यों के इल्म कलाम को वह कहते हैं किक क्योंकि यह आसार से सुन्नतों से कुरान से साबित नहीं है। ये प्योरली एक रैशन प्रोजेक्ट है जिसका ताल्लुक नकल से नहीं अक्ल से है। तो इस बुनियाद पे हम हमारा मामला ये है कि हम एक इंडिपेंडेंट सोच इत्तहादी सोच के तह के तौर पे हम अपनी सारी चीजें बनाने की कोशिश करेंगे। एज इट इज़ डिफेंडिंग द रेवोल्यूशन। मतलब जो उसका प्रोजेक्ट है वो रेवोलेशन को डिफेंड करने का को ही डिफेंड करने का यह प्रोजेक्ट है। तो उसमें डिस्क उसमें ये जरूरत नहीं है कि ट्रेडिशन में आप में रहते हुए आपको करना है। बल्कि उसे आप डिफर कर सकते हैं। में ये हो सकता है। फिक में ये हो सकता है। जरूरी है। यानी उनका कहना है कि फिक्र तो बुनियादी तौर पे खड़ी हुई है। कुरानो हदीस से जो उसूल ड्राइव किए गए हैं और बुनियादी तौर पे कुरान और हदीस के टेक्स्ट पे ही वो पूरी तरह बेस्ड करती है। लेकिन इल्म कलाम उस पे बेस नहीं करता। तो इसलिए इसमें तो हमारा हमारी यानी जो है इल्म कलाम में तो हमें किसी तकलीद की जरूरत नहीं है। लेकिन हां उसमें जरूरत है। उस पे जो उन्होंने किताबें लिखी है उसमें तकलीदी पे जोर देते हैं वो अगर इत्तहाद की भी बात करते हैं तकलीद पे लेकिन इल्म कलाम को बिल्कुल इंडिपेंडेंट होकर प्योरली फिलोसोफिकल फ्रेमवर्क में वो बनाने की कोशिश करते हैं और बहुत सारे ऐसे नजरियात वो इख्तियार करते हैं जो वाकई में जैसे इटरर्निटी ऑफ़ द वर्ल्ड या आलम के कदीम होने का नजरिया है। ये फिलॉसफर से उन्होंने अखज़ कर जिसको जो है इस तरह की बात अगरचे इसमें बहुत ज्यादा तफसील है। वो किस मायने में वो इस तरह की इस तरह की बात कहते हैं। यानी एक हद तक वो इबने सीना और फराबी की चीजों को भी मुल्ला सदरा की चीजों को वो इख्तियार कर लेते हैं। यानी इबने अरबी के हवाले से बहुत सारी चीजों से वो मुतासिर होते हैं। इबने खासतौर से सदुद्दीन शियाजी के हवाले से तो बहरहाल लेकिन इतना देखने में ये आता है कि शाह वली उल्लाह चकि उनके सामने ये जो यूरोपियन फिलॉसफर्स की ये जो पूरी टीम अब पैदा हो रही थी खरी हो रही थी जो 16वीं 17वीं 18वीं सदी में और वो जिस तरह से नॉलेज क्रिएशन में लगी हुई थी जिस तरह के सवालात और जिस तरह की एक एपिस्टमोलॉजी डेवलप कर रही थी और जिस तरह की चीजें हो रही शाह वली उल्लाह के पेशज़ वो नहीं था। तो उन्होंने एक तो खुद अपनी अकली सलाहियतों की बुनियाद पे और दूसरे उनका भी जो पूरा फ्रेमवर्क है वो उसी अरिस्टोटीलियन फिलॉसफी के बुनियाद पे उन्होंने अपना एक अकली प्रोजेक्ट बनाने की उन्होंने कोशिश की और उसके तहत इस्लामिक मेटाफिजिक्स पे उन्होंने बात की। यानी हश्रो नश्र है और रूह है और नफ़्स की हकीकतें हैं और खुदा का वजूद है और खुदा किस तरह से इस पूरे आलम को चलाता है और जजा और और सजा का जो पूरा का पूरा निजाम जो खुदा ने पैदा किया है वो क्या है? तकदीर क्या है? खुदा किस तरह से यानी ह्यूमन इससे बीइंग से अपना रिलेशन कायम करता है? ये सारी बहसें फिलॉसफी और इसमें रही हैं। इन तमाम चीजों जब्र और कद्र का जो नजरिया है इन तमाम को अपने रैशन फ्रेमवर्क में वह सोचने और समझने की कोशिश करते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन अगर देखा जाए तो एक तो काम उनका यह है लेकिन जो दूसरा काम हमारे शबली नमानी कहते हैं कि वो शाह वली उल्लाह का इजाफा है इस्लामी इल्म कलाम में इल्म कलाम में जो मॉडर्न दौर में वो ये के उन्होंने जो इस्लामी शरीयत है पूरी की पूरी वो इस्लाम एक तो ये दीन का मामला है कि दीन बिलीफ हकायद को उन्होंने समझने समझाने के लिए इस तरह की सारी वो की हक़यक को लेकिन जो दूसरा हिस्सा शरीयत या इस्लामी कानून का है। शाह वली उल्लाह की अहमियत यह है कि उन्होंने इस शरीयत को इल्म कलाम का एक हिस्सा और पार्ट बनाया और उन्होंने कहा कि पूरी इस्लामी शरीयत को भी अब मौजूदा दौर में जदीद दौर में हमें कलामी नुक्त नजर से समझने और सोचने की जरूरत है। तो हमारे शिवली नोमानी कहते हैं कि शरीयत को उन्होंने इल्म कलाम में पूरी शरीयत को उसका पार्ट या हिस्सा बना के सोचने समझने की एक तरह से बुनियाद शाह वली उल्लाह से पड़ती है। वरना अब तक जो इल्म कलाम का मामला था वो ये समझा जाता था कि जो इस्लामिक बिलीव हैं जो अकायद हैं सिर्फ उसको इल्म कलाम के तहत सोचने समझने की कोशिश की जाए। ये रोजा, नमाज और हज और जकात और ये जो सारे के सारे अहकामात हैं इस्लामी कानून है या शरीयत है उसको कलाम के तहत नहीं सोचा जाता था। लेकिन शाह उ्लाह ने जो पूरा उनका जो इज्जत बालगा का जो एक पार्ट में ये सारी चीजें हैं। दूसरे पार्ट में उन्होंने जो बुनियादी अहकामात हैं उसकी एक एक अकली इंटरप्रिटेशन प्योरली एक रैशन इंटरप्रिटेशन देने की उन्होंने कोशिश की है। क्योंकि ये समझते थे कि अब जो है जमाना ये आ गया है कि इस पे भी इंसानी ज़हन चाहता है कि हम नमाज क्यों पढ़ रहे हैं और रोजा क्यों रख रहे हैं? इसकी विज़डम इसकी हिकमत क्या है? ये भी अकली तौर पे हमको बताने या समझाने की कोशिश की जाए। अच्छा शाफीलुल्लाह वो भी हैं कि जो इस्लामिक इकोनॉमिक थॉट इस्लामिक सोशलॉजी इस तरह के जो मौजात हैं सिस्टम्स के पर्सपेक्टिव से के पूरा निजाम के पर्सपेक्टिव एक तो यह है कि नमाज रोजा इंडिविजुअल लेवल पे या फिर बिलीफ इन गॉड ये भी अल्टीमेटली कि आपका जो डिफरेंट एक्सपीरियंसेस डिफरेंट वर्ल्ड व्यूज डिफरेंट वेज़ ऑफ़ नोइंग के साथ जो आपका रिलेशन है उसको लेकिन एक है कि आपकी आपकी सोसाइटी कैसे कंस्ट्रक्ट हो रही है? एक ये है कि आप और दूसरा जब आप ये बोल रहे हैं कि कलाम और शरीयत में पहले जो शरिया है या शरीयत है वो इंडिपेंडेंटली फंक्शन कर रही है और जो कलाम है वो बेसिकली जो ब्रॉडर प्रिंसिपल्स हैं सिर्फ उस पे रिसर्च कर रहा है। तो आज की डेट में ये वैसी बात हो गई कि कोई सोशल वेलफेयर अगर स्टेट है तो ये हैं अमर्त्य सेन है। फॉर एग्जांपल अगर अमर्त्या सेन उस सोशल वेलफेयर पॉलिसी को कि रिस्ट्रीब्यूशन कैसे होगा? इक्विटी कैसे होगी? तो वो उसको भी फिलोसोफाइज करते हैं। बिल्कुल। इसी तरह से शाली इसको भी थोलजाइज करते हैं। गोया अपनी इस्लामिक थियोलॉजी में शामिल करते हैं इस तरह की चीजों को। हां। तो इससे इससे ये भी मुझे समझ आ रही है बात मेरे लिए बहुत इंटरेस्टिंग ये चीज है इसलिए क्योंकि जैसे लास्ट टाइम बात हो रही थी कि जो आज का जो हिंदुत्व का गिरोह है यंग पब्लिक इंटेलेक्चुअल्स हैं जो जैसे हमने बोला कि भ एक जमाने में क्रिश्चियंस की तरफ से आपको क्रिटिक हो रहा है। आपको दूसरे जो ग्रुप्स हैं उनकी तरफ जस की तरफ से क्रिटिक हो रहा है। तो इंडियन कॉन्टेक्स्ट में जो क्रिटिक हो रहा है वो इंडियन इस्लाम जिसको वो कहते हैं कि इंडिया में जो इस्लाम की जो इंटरेक्शन हुआ उसमें उनका टारगेट शाह वली उल्लाह दहलवी होते हैं। उनका ये बोलना है और उसमें हम लोग का भी लिटरेचर है कि शाह साहब से इंस्पायर होके जो जदीद इल्म कलाम जिसको आप बोल रहे हैं जो मॉडर्न थियोलॉजी वो एक तरीके से कुछ ना कुछ हिस्सा या जो उनकी जो एफर्ट है सिंथेसिस की उसको सामने रखते हुए तो वहां पे सिस्टम्स अप्रोच एक तरफ मौलाना मौदूदी हैं कि वो इस्लाम इज अ होलिस्टिक सिस्टम एक तरफ देवबन स्कूल ऑफ थॉट है कि भ करिकुलम एज अ होलिस्टिक सिस्टम कि आपकी एक समझ रहे हैं आपके एक तरफ इकबाल है मेटाफिजिक्स होलिस्टिक सिस्टम तो वो जो बुनियाद आपने जो सामने बताई कि कलाम एक तरीके से नॉट जस्ट फॉर सम सेट ऑफ बिलीव्स बिल्कुल द होल सिविलाइजेशन एज अ प्रोजेक्ट प्रोजेक्ट बिल्कुल वो शाह साहब का एक बड़ा कंट्रीब्यूशन है आप बताइए ये बड़ा कंट्रीब्यूशन है बेशक यही बात हमने बताया कि जब शिवली नमानी ने अपने जदीद इल्म कलाम का जो एक तरह से उनकी जो किताब है अल कलाम तो उसमें उन्होंने तफसील के साथ लिखा है तो [गला साफ़ करने की आवाज़] वह भी शाह साहब के इस कार काम या कारनामे को इस अंदाज में पेश करने की कोशिश करते हैं। और वाकई अगर आप देखें तो माज़ में जो हमारे थियोलॉजियन की जो एक लंबी लाइन लगी हुई है उन्होंने इस सतह पे काम नहीं किया। लेकिन अब जो जदी दिल में कलाम यानी इस वक्त 20वीं सदी में खासतौर से पिछले निस्फ सदी से आधी सदी से इस पे बहुत ज्यादा काम हुआ है। पिछले 60 70 साल में यानी नॉर्थ अफ्रीकन कंट्रीज में मोरक्को में उस तरफ अल जजाय अलजय अलजीरिया में और मिस्र वगैरह में फिर आपके ईरान वगैरह में तो अब जो इल्म कलाम का जो तसवुर है वो तसवुर बिल्कुल वो महदूद तसवुर नहीं है बल्कि वो वो आप जिस होलिस्टिक प्रोजेक्ट की बात कर रहे हैं एक ये पूरी एक तहजीबी प्रोजेक्ट है जिसमें हमारी हमारे तमाम नजरिए त हमारे तमाम आमाल, हमारी तहजीब, हमारी सोसाइटी, सोसाइटी के चैलेंजेस वो सारी की सारी चीजें इसमें आ जाती है। क्यों? क्योंकि हमारा दावा है अगर ये कि इस्लाम जो है मुकम्मल है, एक निजाम हयात है तो जाहिर है उसके किसी एक गोशे को उसके से खाली नहीं होना चाहिए। इंक्लूडिंग साइंस। बेशक। तो इसी से क्योंकि साइंस की बात हो रही है। 100 साल गुजर जा रहे हैं ऑलमोस्ट हिंदुस्तान में मुगलिया जो सल्तनत है मुगल सल्तनत है जो वो डाउनफॉल है। 1857 1857 हो चुका है। इस बरसगीर जिसे कहा जा रहा है उसमें जो ब्रिटिश कॉलोनियलिज्म है वो अब गलबा है उसका। वो इंस्टीटश को कैप्चर कर रहा है। मुगल सल्तनत एक शेल की तरह रह गई है। और इस कॉन्टेक्स्ट में अब जो ब्रिटिश या फिर कॉलोनियल साइंसेस हैं या फिर जो वर्ल्ड व्यू वेस्ट में इस्टैब्लिश हो रहा है। मगरबी जो तहजीब है वो भी इंपोर्ट हो रही है। वो एक्सपोर्ट कर रहे हैं। हम इंपोर्ट कर रहे हैं। कर रहे हैं। वो जो इदारे बना रहे हैं, वो कॉलेजेस बना रहे हैं, स्कूल्स बना रहे हैं, मिशनरीज हो रहे हैं। वो पूरा का पूरा जो पिछले 300 साल का उनका प्रोजेक्ट है। हम उससे इन्फ्लुएंस हो रहे हैं। हम इन चीजों को ले रहे हैं। वो पूरा इंपोर्ट हो रहा है और हमारी जो इलीट क्लास है वो भी जाके पढ़ रही है। वो ऑक्सफोर्ड में पढ़ रही है। कैमब्रिजेस में पढ़ रही है और वो इन चैलेंजेस को अब फेस कर रहे हैं। और ये वो वक्त है कि जब सर सैयद अहमद खान सामने आते हैं। सामने आते हैं। मौलाना नानोतवी सामने आते हैं। और सर सैयद अहमद खान जब सामने आते हैं तो उनको यह भी बोला जाता है कि आज इवन ग्लोबल कॉन्टेक्स्ट में मुस्लिम के ही माइट बी द फर्स्ट इस्लामिक मॉडर्निस्ट मतलब सिर्फ यहां के कॉन्टेक्स्ट में नहीं वो लेट यू नो लेट 19th सेंचुरी है। मॉडर्निज्म अब जस्ट लोगों ने सोचना शुरू करा है। एंड ही इज़ वन ऑफ़ द फर्स्ट थिंकर्स टू थिंक अबाउट इट। उनका क्या प्रोजेक्ट है? हम हमारे अगर यानी इंडियन इस्लामिक इंटेलेक्चुअल ट्रेडिशन को अगर हम देखें तो उसमें सर सैयद खासतौर से मौजूदा दौर में एक बड़ा नाम है। इसमें कोई शक की बात नहीं है। उनके अफ़कार ने और अफ़कार के साथ फ़िक्र के साथ उनके गोया के अमल और उनके अमली कारनामों ने भी एक बड़ा इंपैक्ट डाला है और ना सिर्फ इंडियन सब्टिनेंट पे डाला है बल्कि उनके असरात इससे ज्यादा दूरदराज तक बलाबा पहुंचे हैं। तो सर सैयद का जो बुनियादी जो प्रोजेक्ट था और बुनियादी जो फिक्र थी उसकी एक अहमियत को अ उसकी एक अहमियत तो यही है कि वो खुद जो है शाह वली उल्लाह से बहुत ज्यादा इनफ्लुएंस थे। हम्। इसीलिए वह अपनी किताबों में, अपनी चीज़ों में शाह वली उल्लाह को बहुत ज़्यादा कोट करते हैं। वह तो इसमें कोई शक की बात नहीं है कि वह उसी सिलसिले से अह बिलोंग करते हैं और अपनी बहुत सारी चीजें वो शाह वली उल्लाह से अखज़ करते हैं। तो यानी हम दूसरे लफज़ में कह सकते हैं कि उन्होंने अ शाह साहब ने जो बुनियाद डाली थी उसको आगे बढ़ाने उस पे मज़द इमारत खड़ी करने के लिए शाह वली उल्लाह ने कोशिश की। हमें उसी अंदाज में देखने की कोशिश करना चाहिए। इसलिए हमने भी अपनी किताब में शाह वली उल्लाह को इस अंदाज में देखने की कोशिश की है, बताने की कोशिश की है कि उन्होंने एक फन फाउंडेशन रखी और फिर उसको मजबूत किया सरद अहमद खान ने। कुछ इमारत उन्होंने बनाने की कोशिश की। फिर शिबली ने उस इमारत में मजीद इजाफा किया। और फिर उसमें बहुत सारी कमियां या कमजोरियां रह गई थी। फिर इकबाल ने अपने प्रोजेक्ट के तहत उसको जो है ज्यादा वसी शक्ल उन्होंने दी। बहुत सारी चीजों को बल्कि इरिलवेंट समझते हुए उन्होंने उसको हजफ किया और एक नई तामीर करने की कोशिश की। तो लेकिन हम ये देखते हैं कि शाह सर सैयद अहमद खान जो हैं उनके साथ उनके अखलास में तो कोई शको शुभा नहीं है। उनके काम में कोई शको शुबा नहीं है कि वह काम और वह प्रोजेक्ट अपने इसमें बहुत बड़ा था और उन्होंने एक तरह की फिक्री बेदारी पैदा की। लोगों को मुतवज्जा किया इस काम की तरफ खासतौर से कि जो हमारे इस्लामिक वर्ल्ड व्यू को हमारी इस्लामिक थॉट को जो दरपेश हैं उसके पेश नजर उसको किस तरह से रिकंस्ट्रक्ट करने रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश की जाए। लेकिन एक तरफ तो यह मसला था सर सैयद अहमद खान का के वो बराहेरा जो जो जिससे वो मुतासिर थे जिस वेस्टर्न थॉट से जदीद साइंस से मॉडर्न साइंस से वो बहुत ज्यादा मुतासिर थे और उसकी बुनियाद पे यूरोप में पैदा होने वाली जो मुख्तलिफ तहरीकात थी मूवमेंट थी उनसे बहुत ज्यादा इन्फ्लुएंस थे। लेकिन बराहेरा उन्होंने उसको जिस तरह से समझना चाहिए था जिस तरह से पढ़ना चाहिए था कुछ तो लैंग्वेज का भी मसला था उनके साथ उस तरह से उन्होंने बहुत ज्यादा अ समझा नहीं था हम कह सकते हैं और इसलिए थोड़ा इफरात तफरीत उनकी फिक्र में पैदा हुई जिसकी वजह से बड़ी बड़े पैमाने पे उनकी मुखालफतें की गई उनकी मुखालफत करने वालों की एक बड़ी तादाद पैदा हो गई अ वो इस वजह से कि उनके यहां इस फिक्र में जो है जो हमारी जो एक जो प्योर हमारी एक ट्रेडिशनल या ऑर्थोडॉक्स थॉट है हमारी उनकी जो फिक्र थी वो उससे कहीं टकरा रही थी और इसकी वजह से एग्जांपल मसाइल पैदा हो रहे थे। यानी उनकी फिक्र बुनियादी तौर पे देखा जाए तो सर सैयद के फिक्र हमारे जो मुस्लिम फिलॉसफर्स हैं यानी इबने सीना फराबी वगैरह उनसे मुतासिर थे। इसलिए उन्होंने इस्लामी जो हमारी फिक्र है, हमारे जो अकायद हैं, उनकी अहम चीजों को उन्होंने इसी अंदाज में देखने की कोशिश की और उसको इस तरह से रीइटरप्रेट करने की कोशिश की कि जिससे बहुत सारे नुसूस का बहुत सारे अकायद का एक तरह से इंकार सामने आ गया। उनका कहना था कि असल के वर्क ऑफ गॉड एंड वर्ड ऑफ गॉड में कंट्राडिक्शन नहीं हो सकता। तो इसकी बुनियाद पे वो ये समझते हैं कि उनका जो जो तसवुर है नेचुरलिज्म का या फितरत का के जो न्यूटोनियन साइंस के तहत आगे बढ़ी थी कि वो ये समझते थे कि मोजातजात वगैरह सिरे से मुमकिन ही नहीं है। कोई पैगंबर किसी तरह का कोई मोजजा वजूद में नहीं ला सक ला सकता। इसलिए के ये फिक्स हैं। जिस जिस चीज को हमारी न्यूटोनियन साइंस ने खासतौर से डेकार के फिलॉसफी ने आगे बढ़ाया। तो उसके तहत वो ये समझते थे कि मिरेक्स वगैरह या करामात वगैरह या मोजात वगैरह का सिरे से कोई वजूद नहीं है। इसलिए हम देखते हैं कि जो भी कुरान में इस तरह की आयात आई हैं हजरत ईसा वगैरह के मुतालिक मूसा से मुतालिक अंबिया से मुालिक इन तमाम चीजों का उन्होंने एक तरह से इंकार किया और इसी तरह से फरिश्ता वगैरह की जो हकायक थे कि यानी उसको वो इस अंदाज में नहीं मानते थे कि फरिश्ता कोई ऐसी चीज होती है कि जो वही लाती है जिब्रील को वो ये समझते थे कि वो रसूल्लाह की अंदरूनी ही एक सलाहियत एक फैकल्टी है वही है जो वही नाज़िल वही वही उससे वही क्रिएट होती है। अच्छा ये सारी की सारी चीजें हमारे यहां जो हमारे थिंकर्स थे, हमारे फिलॉसफर्स थे, उनके यहां ये चीज पाई जाती थी। उसी को उन्होंने एक तरह से रिपीट करने और थोड़े बहुत इजाफे के साथ उन्होंने उसको करने की कोशिश की। इसलिए इसमें ये सब मसाइल पैदा हुए और इसलिए शिबली नोमानी मिसाल के तौर पे अगर देखें तो वह तो खुद उनसे बहुत इंस्पायर्ड थे। काफी वक्त उन्होंने सरयद के पास गुजारा उन्होंने लेकिन उन्होंने इन चीजों का इंकार किया और उनको इस बात की जरूरत महसूस हुई कि अब बैलेंस बनाने की जरूरत है। तो फिर उन्होंने इल्म कलाम और इल्मुल कला इल्मुल कलाम और अल कलाम ये दो किताबें शिबली नोमानी ने लिखी। खुलासा ये है कि सर सैयद का असल बुनियादी कारनामा और काम अल्लामा इकबाल के बकल ये है कि ये सर सैयद वो पहली शख्सियत है। उन्होंने मकातिब इकबाल में इस तरह की बात कही है उन्होंने कि इकबाल ने गालिबन सैयद सुलेमान नदवी को लिखते हुए या किसी और को के सर सैयद का यह बुनियादी कारनामा है कि उन्होंने इसका एहसास पैदा किया। इसकी जरूरत का एहसास लोगों ने को दिलाया। एक तरह की मूवमेंट पैदा की। लोगों के शोर को झंझोड़ा कि हमें यह करने की जरूरत है, करने की जरूरत है। तो यह असल बड़ा कारनामा उनका है। क्योंकि इससे पहले हम ये देखते हैं कि कि जिस जमाने में सर सैयद ने ये काम किया है, उस जमाने में दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी अहस पैदा नहीं हुआ था। जो सर सैयद ने जो एहसास पैदा करने की कोशिश की। उसके बाद हम ये देखते हैं के मुफ्ती मोहम्मद अबू वगैरह ने किताबें लिखी रिसालत तौहीद अली सलाम इल्म मदनिया मैंने इन दोनों किताबों का तर्जमा भी कर दिया है उर्दू में इस तरह की किताबें जो है सामने आई जमालुद्दीन अफगारी ने सर सैयद के रद में लिखा अरिसाला अल दन सरसयद के रद में उन्होंने लिखा उससे कुछ बहस पैदा हुई लेकिन पहला जो खामोश इसमें जो पत्थर फेंकने वाला जो आदमी था जो शख्सियत थी वो दरअसल सर सैयद हैं उसने उनको को माइल किया और फिर जो हम [गला साफ़ करने की आवाज़] देखते हैं कि रिकंस्ट्रक्शन जो इकबाल का एक बड़ा प्रोजेक्ट जिसका की शक्ल में सामने आया वो कहीं ना कहीं वो सर सैयद ने जो एक माहौल पैदा कर दिया था जिसको शिवली ने हमने कहा कि बहुत आगे बढ़ाया तो खुद इकबाल के बगल के अखबार के इखबाल की का जो काम है वो इन चीजों से इन्फ्लुएंस्ड है। तो अपनी कुछ कमजोरियों के साथ के साथ बिलाशबा सर सैयद का काम अपनी गैर मामूली है अहमियत और हैसियत रखता है। अच्छा मैं जिस तरह से इस चीज को देख रहा हूं आपसे बात करते हुए तो एक तो वो प्रोजेक्ट है जो कॉलोनियल मॉडर्निटी का मुस्लिम वर्ल्ड पे इंटरेक्शन होने से पहले अगर हम वही रेवोलेशन रीजन और इंपेरसिज्म ऑब्जरवेशन को देखें तो इनके ओवरलैप्स में दो तरह की साइंसेस या वर्ल्ड व्यूज निकलते हैं। एक ऑब्जेक्टिव साइंसेस और एक सब्जेक्टिव साइंसेस। तो इससे पहले कि वेस्ट में पूरा जो फिजिक्स और फिजिकलिज्म का जो पूरा सिस्टम पैदा हुआ पैदा हुआ उससे पहले जो सब्जेक्टिव साइंसेस थी आप का इवन सोशल स्ट्रक्चर है आपकी इकोनमी है वो सबको सब्जेक्टिव पॉइंट ऑफ व्यू से देखा जा रहा था आप हो सकता है कुछ और देख रहे हैं हम कुछ और देख रहे हैं तो उसका जो प्रूफ है उसके लिए आपको ऑब्जेक्टिव रियलिटीज को बहुत ज्यादा रेफर करने की जरूरत नहीं ये पिरामिड उल्टा हो साइंटिज्म में कि आपकी ऑब्जेक्टिव साइंसेस आप ऑब्जेक्टिवली प्रूव करें। जिस [गला साफ़ करने की आवाज़] सर सैयद अहमद खान अपने को नेचर नेचुरलिज्म के पर्सेक्टिव से देख रहे हैं कि अब आप मूव कर रहे हैं ऑब्जेक्टिव से सब्जेक्टिव ऑब्जेक्टिविटी की तरफ रेवोलेशन की तरफ और पहले था रेवोलेशन से सब्जेक्टिविटी और ऑब्जेक्टिविटी अस्यूम्ड हो गई थी जिसकी पावर है उसका निजाम है और जिसका निजाम है वो ऑब्जेक्टिव है तो उस पे बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं थी कि वो क्या सक्सेसफुल है नहीं है वो सिर्फ एसोसिएटेड था पावर से कि आपका सिस्टम है या किसी और का सिस्टम है। तो वेस्ट ने पहली बार ऐसा हुआ कि फ्रॉम दी होलिस्टिक सिविलाइजेशनल पर्सपेक्टिव ग्रीक सिविलाइजेशन को सामने रखते हुए और उनकी जो ऑब्जेक्टिव साइंसेस की जो ग्रोथ हो रही थी इसी वजह से क्रिश्चियनिटी को भी क्रिटिक हुआ। ऐसा नहीं है कि मतलब वहां पे क्रिश्चियनिटी को क्रिटिक नहीं हुआ। हालांकि वो उसकी सबसे ज्यादा तो उसी पे सबसे ज्यादा हुआ बल्कि उसी ने उसकी सबसे ज्यादा मार खाई। बिल्कुल मार खाई सबसे ज्यादा। बिल्कुल। तो उसको मैं इस तरह मिसाल देखता हूं कि इवन नेचर के पर्सपेक्टिव से जो बात कही जा रही है कि उस जमाने में क्योंकि न्यूटोनियन फिजिक्स और ये सारी चीजें बिल्कुल ऐसा लग रहा था कि ये अब यही यही आखरी चीज है जिससे डिफर नहीं किया जा सकता किसी भी हालत में। और ये वो वक्त था कि जब तक आइंस्टाइन या बाकी लोग नहीं आए थे पिक्चर में कि जिन्होंने न्यूटोनियन मैकेनिक्स को चैलेंज कर दिया कि नहीं साइंस अपने आप में मोबिलिटी है एक तरफ। तो वहां से फिर यह तसवुर पैदा हुआ कि नहीं साइंस भी अल्टीमेटली एक प्रोसेस है। एक प्रोसीजर है। तो वो जो वो रियलिटी तब्दीलियां उसमें भी तब्दीलियां हो सकती है। सर सैयद जो रियलिटी फेस कर रहे हैं वो ये देख रहे हैं कि नहीं न्यूटोनियन मैकेनिक्स ही एंड एंड इन इटसेल्फ है। बिल्कुल और उसके बाद जब तक इकबाल आ रहे हैं जब तक आइंस्टीनियन रियलिटीज आपका जो रिकंस्ट्रक्शन में वो वाइट हेड से भी एंगेज कर रहे हैं। रसेल के जो यू नो टीचर हैं वो बरगसन से भी खासतौर से बहुत इन्फ्लुएंस है। बहुत इन्फ्लुएंस हैं। तो ये वफा जो है इसमें साइंस अपने आप में इवॉल्व कर रहा है। बिल्कुल यानी जो बिल्कुल आपने सही कहा कि जो सरसय का जमाना है वो सिर्फ सर सैयद के साथ खास नहीं है बल्कि दूसरे लोग दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी इस अंदाज में सोचने की कोशिश कर रहे थे। यानी उससे ज्यादा मुतासिर थे। वो जो जिसको हम कहते हैं साइंटिज्म के साइंस को ही एक बुनियादी हकीकत का जरिया समझ लेना। यह सिर्फ सरसयत के अंदर नहीं था। एक क्लास थी पूरी की पूरी जो वो ये देख रही थी कि हमें जो रियलिटीज हैं उनको हमें बिल्कुल खारिज में उसको ऑब्जेक्टिवली हमें प्रूफ करना है, अंडरस्टैंड करना है और समझना है। उसको वो सर सैयद ने बिल्कुल मजहबी बुनियादी हकीकतों पे भी उसको बिल्कुल अप्लाई करने की कोशिश की। उसकी वजह से उसका नतीजा यही निकलना था कि उसकी वजह से बहुत सारी कंट्राडिक्शन और बड़े प्रॉब्लम्स इशज़ पैदा हुए। लेकिन बहरहाल ये उस वक्त का एक तकाजा था उस वक्त की सुरते हाल का हां गुड फथ के गुड फथ आहिस्ताआहिस्ता फिर जो है एक तरह से सजा साफ होनी शुरू हुई। हम हम यानी हमेशा यह देखना चाहिए हमें के कोई आदमी जो सोच रहा है यानी जिस तरह से गजाली या उनसे पहले इब्न सीना फराबी जब सोच रहे थे तो वो उन जो जिस टाइम एंड स्पेस में वो सोच रहे हैं उनके आइडियाज डेवलप हो रहे हैं उनके साथ उनको सही तरह से जब तक हम उनके उस टाइम एंड स्पेस में देख के समझने की कोशिश ना करें हम जस्टिस नहीं कर सकते यही बात सर सैयद पे ही है। यानी जिस तरह से हम अब 21वीं सदी में या 20वीं सदी में खुद जैसा कि आप कह रहे हैं कि इकबाल के आते-आते तक जिस तरह से मतला साफ हुआ जिस तरह से गोया के वो धुंध छटी, धूल छटी और महसूस हुआ कि नहीं साहब ये सारी चीजें प्रोसेस में है और खुद उस खुद जो है बहुत सारे इस तरह के नजरियात आए दिन रद्द हो रहे हैं। नजरियात बन रहे हैं और इतनी ज्यादा डिटरमिनिस्टी का इतना ज्यादा फिक्स नहीं है। बिल्कुल कि जिन की बुनियाद पे दो-दो चार की तरह से चीजें की जाए। इसकी बुनियाद पे खुद जो है वो आने वाले लोगों ने खुद इकबाल ने और फिर इकबाल के साथ और दुनिया के दूसरे लोगों ने एक नई फिक्र बनाने की कोशिश की। शायद सर सैयद इस जमाने में होते तो फिर वो भी इसी तरह से कर रहे होते। उनके पास जो लैंडस्केप ऑफ ऑब्जरवेशंस होती एक्सपीरियंस होता वो एक वाइड होता। तो इसी से क्योंकि आपने डिस्कशन में ये बात भी मल्टीपल बार बोली के पहली बार ये जो जो यह फ्रेज है या वर्ड है इस्तेमाल करना जदी दिल में एस अ मेथोडोलॉजी वो सर सैयद ने किया शिबली नोमानी क्योंकि उनके स्टूडेंट उनके साथ उनके उससे इंस्पायर्ड भी और एक तरीके से एएमयू एज अ प्रोजेक्ट में भी काफी इनवॉल्व रहे तो उन्होंने भी शायद किताब लिखी तो डिफरेंस क्या आया उनकी अंडरस्टैंडिंग में शिवली नोमानी के कॉन्टेक्स्ट में मैं कहीं पढ़ रहा था कि कोई एएमयू में ही एक टीचर थे अंग्रेज तो वो उनके साथ भी इंटरेक्शन ओरिएंटलिस्ट थे और इस तरह से उनका थॉम्स आर्नल थॉम्स आर्नल जो है वो शिवली और इकबाल दोनों के उस्ताद थे इकबाल के भी इकबाल के भी फायदा उठाया तो शिबली नोमानी को आप कैसे देखते हैं कि वो एक तरीके से ट्रेडिशन और मॉडर्निटी को के बीच में मॉडरेशन करने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी मेथोडोलॉजी क्या थी? उनके अजमशंस क्या थे? उनके चैलेंजेस क्या थे? हम देखें एक तरफ जो उन्होंने जदीद इल्म कलाम का एक प्रोजेक्ट बनाने और आगे बढ़ाने की कोशिश की उसका एक रुख तो हम ये देखते हैं कि खुद यही सर सैयद का इल्म कलाम था। वो ये देख रहे थे कि यानी एक तरफ एक पहलू उसका ये है पूरे जो शिबली के प्रोजेक्ट का कि वो सर सैयद और सर सैयद के तहत जो एक एक ग्रुप एक क्लास पैदा हुई है जो इस तरीके से चीजों को समझने की कोशिश कर रही है कि जिसमें इस्लाम की बुनियादी हकीकतें जो है या बुनियादी अकीदे जो हैं उस पे असर पड़ता है और उस पे उसकी ज़द पड़ती है। तो एक तरफ तो उन्होंने ये चाहा कि कुछ ऐसे उसूल बनाए जाएं के जिसकी बुनियाद पे ये क्रिटिक की जा सके ये दोद चार की तरह से क्योंकि कई जगह वो फिरका जदीदा फिरका जदीदा कह कर करके रद्द करने की कोशिश वो करते हैं। दूसरी तरफ शिबली नुमानी का जो पूरा रुख था काम करने का जो पहलू था वो ये कि वो जदीद इल्म कलाम जदीद थोलॉजी मॉडर्न और जो कदीम थोलॉजी है उन दोनों के दरमियान एक तरह का कि रिकंसिलिएशन की कोशिश करें। उन्होंने जो पूरा कुछ पढ़ा था उनके सामने वो पूरा ट्रेडिशन था। उन्होंने गज़ाली पे किताबें लिखी हैं। जलालुद्दीन रूमी पे किताबें लिखी हैं और फिर ये सब लिखा है। जिसमें लगता है कि उन्होंने शायद अपने इस दौर में उनसे ज्यादा यानी ग्रीक फिलॉसफी को पढ़ने वाला या इल्म कलाम वगैरह की रिवायत पे निगाह रखने वाला शिबली से ज्यादा यकीनन कोई नहीं था। इसमें तो ये सारी की सारी चीजें उनके सामने थी। को एक तरफ उनका यह एहसास था कि अब जदीद इल्म कलाम की तरतीब और तशकील की जरूरत है। लेकिन दूसरी तरफ वो ये समझ रहे थे कि जो कदीम इल्म कलाम है कदीम इल्म कलाम के ढांचे को भी बरकरार रखना जरूरी है। उसको जिस तरीके से यह समझा जा रहा है या सर सैयद कह रहे हैं या दूसरे लोग कि बिल्कुल इरिलवेंट हो गया या हटा दिया गया है। सो ऐसा नहीं है। अगर हम कदीम इल्म कलाम से हम कट जाते हैं तो हमारे लिए प्रॉब्लम पैदा होगी। हमारी [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो उसूल फिक की जो किताबें हैं मिसाल के तौर पे उसूल फिक की किताबों का जिस पे सारी शरीयत और इ्तहाद की सारी बहसें हैं उसमें जो शुरू की बहसें हैं वो हर जगह आप देखेंगे कि वो अकल की की बहसें होती हैं। यानी प्योरली इल्म कलाम की बहसें होती हैं। अकल क्या है? इल्म कैसे हासिल किया जाता है? इल्म को कैसे क्या-क्या सोर्सेस हैं? और कैसे उसको ऑथेंटिकेट किया जाता है? समझा जाता है वगैरह वगैरह ये सारी की सारी चीजें हमारे इल्म कलाम कलाम पूरी हां एक हिस्सा है इल्म कलाम का और वो शुरू में समझने वही मैं ये इंपॉर्टेंट इसलिए मैं वापस इसको कनेक्ट करना चाह रहा हूं कि वो जो इल्मो कलाम का और जो इसका जो मजहब में और फिक्र के प्रोडक्शन का जो पूरा सिलसिला है वो शुरू से अच्छा खासा इंटर है। हालांकि इंटरनइंड है। बिल्कुल बिल्कुल इसलिए हमने बताया कि जो उसूल फिक है जिसकी बुनियाद पे हम अपने इस्लामी शरीयत को समझने समझाने और उसको इस्तेमाबाद करने की सारे अहकाम को डिडक्ट करने की कोशिश करते हैं। तो उस की जो पहली बुनियाद या मुकदमा जो होता है वो यही होता है कि इल्म कैसे हासिल किया जाए यानी जो एक एपिस्टोमोलॉजिकल जो पूरी जो बेस है फाउंडेशन है पहले वो बनाई जाती है। और फिर क्योंकि अगर आप यह सारी की सारी चीज़ जो इ्तहाद कर रहे हैं और शरीयत को समझने की कोशिश कर रहे हैं तो जाहिर है यह किसी वैक्यूम किसी खला में तो नहीं होगा। उसकी आपकी फाउंडेशन आपकी की बुनियाद क्या है? हम तो आप देखेंगे अलकाम अलकाम उसका आमदी की या गजाली की अल मुस्तफा गजाली ने तो पूरी अल मुस्तफा का शुरू ही पूरा का पूरा ही इसी पे लिखा है। पूरी फाउंडेशन पहले बनाई है। प्योरली जिसको हम कहते हैं एक तरह से प्योर रीजन उन्होंने एक तय करने की कोशिश की है। तो इस बुनियाद पे ये ये वो बुनियाद है जिसमें हम यह देखते हैं कि फका और इल्म कलाम मिल जाता है। दोनों की फाउंडेशन इस तरह से मिल जाती है। तो खैर तो शिवली नोमानी ने यह कोशिश करने की यह कोशिश की के यह जो पूरा इल्म कलाम का जो पूरा सरमाया हमारा चला आ रहा है उसको उसका वो हिस्सा जो बिल्कुल रेलेवेंट है हमारे लिए यूज़फुल है करामद है उसको रखने की कोशिश की जाए और फिर जो कुछ नए सवालात हैं एक जदीद जो जदीद बहसें चल रही हैं उनकी बुनियाद पे इल्म कलाम को नए इजाफों के साथ एक तरह से कंपाइल करने की कोशिश की जाए। हम इसलिए वह बार-बार अपने इसमें कहते हैं कि हम इन दोनों चीजों को दोनों पहलुओं को लेकर के आगे बढ़ने की हम कोशिश कर रहे हैं और लेकिन शिवली का भी मसला यह है ये प्रोजेक्ट तो उनके सामने है जिसको उन्होंने अल कलाम में बिल्कुल वाज़ तौर पे हमने कहा कि दोनों प्रोजेक्ट सिंथेसिस का है लेकिन क्या वो सिंथेसिस कर पा रहे हैं? वो कर पा रहे हैं। वह कामयाब हो पा रहे हैं। शिबली के साथ एक मसला यह है कि शिबली भी जदीद साइंस को मॉडर्न साइंस को पूरी तरह से समझ नहीं रहे हैं। उनके हम देखते हैं कि उन्होंने मुख्तलिफ अपने लेटर्स में मिसाल के तौर पे मौलाना हमीदुद्दीन गलिबन फराही साहब को या और हैं। वो लिखते हैं कि भाई ये जो वेस्ट में जो नए नजरियात पैदा हो रहे हैं मुझे उनसे मुतालिक कुछ बना बताओ। मैं आजकल इल्म कलाम की किताब लिखने में मशगूल हूं। लेकिन कुछ पता नहीं चल रहा है कि वहां क्या हो रहा है। कुछ तुम बताते तो ऐसे करते। ये सब चीज़ उनके लेटर्स में खुद मौजूद है। अच्छा तो वो अरबी और फारसी वगैरह तो जानते थे लेकिन जाहिर है इंग्लिश नहीं जानते थे। कुछ फ्रेंच उन्होंने सीखी थी ज्यादा लेकिन वेस्टर्न लैंग्वेज से पूरी तरह से वो वाकिफ नहीं थे। तो उन्होंने अपने अपने तौर पे एक बड़ी बुनियाद तो बहुत बड़ी डाली कि हमें ऐसा करना है। लेकिन हम ये देखते हैं कि उस बुनियाद पे जो तामीर उन्होंने खड़ी की वो तामीर नामुक्मल है। वो मुकम्मल नहीं है। इनकंप्लीट है। तो शिबली नुमानी के हवाले से आप ये अर्ज कर रहे थे कि उन्होंने जो फाउंडेशन रखी उस पे इमारत शायद वो नहीं उस तरह की तामीर कर पाए। यहां पे आप रुक गए थे। हां मैं यह कह रहा था कि शिबली नोमानी ने एक बड़ा प्रोजेक्ट तो यकीनन बनाया और इस तरह से सिंथेसाइज करने की कोशिश की जो उन्होंने बताया कदीम और जदीद की बुनियाद को दोनों को मिलाने की कोशिश की जाए और एक नई थीसिस बनाने की कोशिश की जाए। लेकिन उन्हीं की तहरीरों से ऐसा लगता है के उनको एक तो पहलू हमने बताया कि उन्होंने जदीद जो दुनिया थी और जो बहसें थी खासतौर से जो वेस्टर्न इसमें दुनिया में जो बहसें चल रही थी फिलॉसफी और इल्म कलाम के मैदान में उससे बहुत ज्यादा वाकिफ नहीं थे। दूसरी बात ऐसा लगता है कि इस काम को उन्होंने बीच में छोड़ दिया। और ये बात उनके जो उनकी बायोग्राफी लिखी है सैयद सुलेमान नदवी ने हयात शिबली इसमें सैयद उसमें इसका जिक्र सैयद सुलेमान नदवी ने भी किया है। उन्हें लगा कि हमने एक बहुत बड़ी बुनियाद तो डाल दी है लेकिन उसके तमाम तकाजों को पूरा करना मुश्किल हो रहा है बहुत। तो उनका पूरा प्रोजेक्ट खुद उनके अल्फाज़ में जुबान में लगता है कि वो नामुक्मल रहा। वो पूरा नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ के उन्होंने फिर शिफ्ट करके वह दूसरी तरफ वो दूसरे कामों में लग गए। यानी वक्त तो उनको मिला वो 2000 सॉरी 1900 चार या पांच की चीज है ये और 1914 में उनका इंतकाल हुआ है। हां 14 में इंतकाल हुआ। टाइम तो मिला लेकिन उन्होंने इसको फिर बहुत ज्यादा क्योंकि ये प्रॉब्लम थी। ये मसाइल थे। ये मुश्किलात थी जिसको वो पूरी तरह से नहीं समझ पा रहे थे के वो पूरी तरह से इसको हल कर पाएंगे। कंप्लीट कर पाएंगे। वो इसीलिए हम यह देखते हैं कि जब शिबली के बाद इकबाल आते हैं तो सही मायने में इकबाल इसके अहल थे। हम हर आदमी अपने हिस्से का एक काम करके जाता है। असल होता यह है। हर आदमी अपने एक हिस्से का काम करके जाता है। आने वाला एक दूसरा काम करता है। फिर उसके आने वाला दूसरा काम करता है। किंदी ने एक थोड़ी सी बुनियाद बनाई है। उस पर से फराबी ने उस बुनियाद को बहुत मजबूत कर करके वो किया। और इबने सीना ने एक पूरी इस्लामिक जो है फिलॉसफी एक बिल्कुल तैयार कर दी। हम तो होता ऐसे इसी तरह से यहां हम हम देखते हैं कि सर सैयद ने बुनियाद डाली थी। शिबली ने मजीद उसमें इजाफा किया। लेकिन वो वो कंप्लीट नहीं था। लेकिन इकबाल की हैसियत और अहमियत यह है कि इकबाल दोनों ट्रेडिशन को अच्छी तरह से समझने वाले थे। यानी हमारे इस्लामिक ट्रेडिशन और वेस्टर्न ट्रेडिशन इन दोनों को उनके असल सोर्सेस से उन्होंने पढ़ा और समझा था। एक बड़ा फिलोसोफिकल दिमाग रखते थे। उनकी एमफिल या पीएचडी शायद मेटाफिजिक्स ही में ईरानियन मेटाफिजिक्स में ही उनकी पीएचडी है और जर्मनी में जर्मनी में हां लेकिन जो जो उन्होंने उनकी पीएचडी की थीसिस है वो ईरानियन मेटाफिजिक्स पे है जो उन्होंने जर्मन में की थीम वाले में तो इस वजह से देखा जाए तो वो इसके अहल थे और इसीलिए आप रिकंस्ट्रक्शन जब आप पढ़ते हैं तो [गला साफ़ करने की आवाज़] आप ये देखते हैं कि जिस तरह से फ्रीक्वेंटली वो स्टर्न फिलॉसफर्स को साइंटिस्ट को को कोट करते हैं आइंस्टाइन वाइट हेड विलियम जेम्स और बटन रसल और फला फला फला इसी तरह से गजाली और इबने रुद इब्न तैमिया इन तमाम को वो जमालुद्दीन अफगानी तक कोट करते हुए चले जाते हैं क्योंकि इन दोनों पे उनकी बहुत वसी तरीन निगाह थी और इसलिए रिकंस्ट्रक्शन ने सही मायने में इल्म कलाम यानी या जदीद इल्म कलाम को एक तरह से उूज अता किया यानी आप इकबाल की बहुत सारी चीजों से आप इख्तलाफ कर सकते हैं। खुद इकबाल ने शुरू ही में यह बात साफ कर दी है कि मैंने जो कुछ भी लिखा है यह कोई फाइनल नहीं है। आने वाली नस्लों को बिल्कुल इसका हक है कि वो इससे इख्तलाफ करें और इसको कुबूल ना करें। लेकिन इल्म का प्रोसेस ऐसे ही बढ़ता है और इसी तरीके से एक रिवायत बनती है और आगे बढ़ती है। हमें अपने हिस्से का काम कर देना चाहिए। तकरीबन इकबाल का जुमला है कि हमें अपने हिस्से का काम कर करके मुतम हो जाना चाहिए। तो इस मामले में जो इकबाल का काम है वह बहुत ही ज्यादा अहमियत रखता है। इसलिए हम देखते हैं कि इकबाल के काम का जो इंपैक्ट पड़ा है पूरी मुस्लिम दुनिया पे वो किसी और का नहीं हुआ। एक तो यह कि वो इंग्लिश में लिखी गई। इसलिए बराहेरास्त वो उसका जो ऑडियंस जो थे वो सारे ईस्ट वेस्ट सबके एक बड़ा हलका था जो उसको पढ़ने और समझने की सलाहियत रखता था। ये सब उर्दू की चीजें थी। इसको बहुत वक्त लगा फिर इंग्लिश में या अरबी में ट्रांसलेशन होने में। लेकिन यह के खासतौर से यह कि उन्होंने एक खालिस मॉडर्न साइंस और फिलॉसफी को सामने रखते हुए उसी फ्रेमवर्क में गुफ्तगू करने की कोशिश की। इसलिए जदीद इल्म कलाम पे जो बहसें चाहे वो इंडिया में पैदा हुई हो, इंडियन सबक्टिनेंट में पैदा हुई हो या अरब वर्ल्ड में पैदा हुई हो। पूरे मुस्लिम वर्ल्ड में जो पैदा हुई है उसमें इकबाल की इस रिकंस्ट्रक्शन का बुनियादी दखल है। उसके बाद जो पूरी खेप पैदा हुई है मॉडर्न मॉडर्निस्ट क्लास की के जो अपने इस्लामिक मॉडर्निटी के प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रहे हैं। इल्म कलाम को इंगेज कर रहे हैं। हसन हफी हैं। नसर हामिद अबू ज़ैद हैं। उस तरफ आबिद अल जाबरी वगैरह हैं। और मोहम्मद अरकोन वगैरह हैं। हम बहुत सारी चीजों से उनको इख्तलाफ कर सकते हैं। लेकिन इन तमाम उधर अब्दुल करीम सरोजश या वो यानी ईरान में जो मुख्तलिफ लोग हैं इल्म जदीद इल्म कलाम पे काम करने वाले लोग इन तमाम पे इकबाल के रिकंस्ट्रक्शन का काफी इंपैक्ट पाया जाता है। अच्छा क्योंकि अल्लामा इकबाल की बात हो रही है तो अल्लामा इकबाल की जो फ्रेमवर्क है क्योंकि वो अब मेटाफिजिक्स को रिकंस्ट्रक्ट कर रहे हैं। अभी जो बातें हो रही हैं वह मुझे लगता है कि इवन चाहे वह सर सैयद हो चाहे शिवली नोमानी हो जितना मुझे समझ आया वो इमर्जेंट या इमिनेंट पैराडाइम में बात कर रहे हैं वो कहां से जो उसका जो उसका फाउंडेशनल बेड है कि जहां से आप अस्यूम करते हैं कि वजूद क्या है? नफ्स क्या है? इंसान वो जो बिल्डिंग ब्लक्स होते हैं बिल्कुल जिसे कहते हैं बिल्डिंग ब्लक्स के ऊपर जब आप रिकंस्ट्रक्ट करते हैं मेटाफिजिक्स को तो आपके पास ज्यादा स्पेस होता है चीजों को सिंथेसाइज करना कहां हुदूद पैदा करने हैं कहां पे तो इकबाल का प्रोजेक्ट ज्यादा फाउंडेशनल है जी तो क्या है वो प्रोजेक्ट एट मतलब उसमें किस तरह की उन्होंने आर्गुमेंट्स किए जो डिफरेंट है मुख्तलिफ हैं इन द अप्रोच जो पिछले लोग मॉडर्न थियोलॉजी की तरफ बढ़ रहे थे और उसको ट्रेडिशन के साथ वो क्या ऑड्स पे है या ट्रेडिशन को भी वो जो आपने बोला कि जो शाह वली उल्लाह का प्रोजेक्ट है कि आपको ट्रेडिशन को भी कलाम से इंटरेक्ट करते हुए आपको कलाम ऑफ दी होलिस्टिक फिक डेवलप करना पड़ेगा। क्या इकबाल उस तरह का फ्रेमवर्क ला पा रहे हैं? उनकी क्या जिसे कहते हैं अजमशनंस हैं? क्या उनके क्लेम्स हैं? देखिए इकबाल का सबसे पहले तो बुनियादी तौर पर यह सवाल एक तरह से उन्होंने उठाया है कि क्या जिस जो रिलीजन है रिलीजियस जो रियलिटी या हकीकत है वो पॉसिबल है? क्या उसको क्या उसकी कोई रशनल बेसिस है? क्योंकि जो फिलॉसफी ऑफ रिलीजन के तहत सबसे पहला सवाल तो यही उठाया जा रहा था खासतौर से 19वीं सदी में कि मजहब जो है बुनियादी तौर पे वो एक जो सोशल डेवलपमेंट [गला साफ़ करने की आवाज़] के नतीजे में वजूद में आया है। जैसे-जैसे इंसान ने अपनी तहजीब बनाई है, अपनी सोसाइटी बनाई है। उसकी बुनियाद पे अ जो खासतौर से जो हमारे अगस्त कॉम्ट वगैरह का नजरिया है के अ पहले तो असातीर यानी माइथोलॉजी थी मिथ था फिर मिथ के बाद मजहब आया और अब साइंटिफिक दौर है तो इकबाल ने सबसे पहले जो है इस बात की कोशिश की है कि वो ये बताने की कोशिश करें और ये बात पहले भी जाहिर है हमारे हमारे इल्म कलाम की शुरुआत भी इससे होती है के नॉलेज क्या है यानी एक एपिस्टोमोलॉजिकल डिबेट और बहस उन्होंने शुरू की है और उसकी बुनियाद पे उन्होंने प्योरली साइंटिफिक बुनियाद पे ये देखने दिखाने की कोशिश की है कि जिस तरह से रियलिटी को पर्सव करने का एक जरिया यह ऑब्जरर्वेशन है और हम ह्यूमन एक्सपेरिमेंट है एक्सपीरियंसेस हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] और उस बुनियाद पे हम एक रियलिटी को समझते हैं और समझने का दावा करते हैं। मजहब के लिए भी इसी तरीके से से एक अ एक प्योरली एक एपिस्टमोलॉजिकल बुनियाद है जिसकी बुनियाद पे मजहबी हकीकत को समझा जा सकता है। प्रूफ किया जा सकता है। ये पहले इसमें वो इसकी बात करते हैं। फिर उस पर जो सवालात पैदा होते हैं उन सवालात को वह बताते हैं कि उसकी जो है किस तरह से हम जांच कर सकते हैं, परख कर सकते हैं और यह हम बता सकते हैं कि जिस मजहबी रियलिटी की यानी खुदा के वजूद की जब वो वजूद से अपनी बात जाहिर है जिस तरह से फिलॉसफर शुरू करते हैं तो जिस तरह से वजूद और मेटाफिजिक्स में जिस तरह से गुफ्तगू हमारे ट्रेडिशन में मौजूद रही है वो उसी तरह से अपनी गुफ्तगू को शुरू करते हैं। लेकिन उसका जो फ्रेमवर्क है वो आज के का साइंटिफिक फ्रेमवर्क है। उस साइंटिफिक फ्रेमवर्क में अ को इंगेज कर करके उसको बुनियाद बना करके उसी हकीकत को वो साबित करने की कोशिश करते हैं। और फिर उस पे सवालात जो पैदा होते हैं अ कि अगर आप यह कहते हैं जैसे वो इंट्यूशन की बुनियाद पे कहते हैं कि जो असल बुनियादी वो इंस्पायर्ड हैं। काफी मुतासिर हैं विलियम जेम्स से जेम्स से तो उस तो वो ये कहते हैं कि हम अपने इंट्यूशन की बुनियाद पे एक चीज यानी जो असल इंट अल्टीमेट रियलिटी को समझने का जो एक बड़ा जरिया है वो खुद हमारा विजान है और इस विजान के तहत हम जो है खुदा की हकीकत को हम समझने हम समझते हैं। फिर उस पे जो सवालात पैदा होते हैं उसको उन्होंने प्योरली साइंटिफिक अंदाज में जवाब देने की कोशिश की है। तो मजहब क्यों जरूरी है? मजहब की बुनियाद आया सिर्फ और सिर्फ जो है एक मिथ पे खड़ी हुई है या जो उसकी बुनियाद जिस मेटाफिजिक्स पे है वह उसको हम रशनलाइज कर सकते हैं। रशनली प्रूफ कर सकते हैं। उसकी कोई रशनल बुनियाद है। इन तमाम चीजों को उन्हें समझने और समझाने की कोशिश की है और इस तरह से अपने ट्रेडिशन को भी उन्होंने पूरी तरह से यूज़ किया है। आप देखते हैं कि गजाली को वो बार-बार कोट करते हैं फिर गजाली को लेकिन वो एतराज भी करते हैं गजाली का वो कहते हैं कि उन्होंने ज्यादा जो गजाली का रुझान जो है इस तरह हो गया कि वो उन्होंने कश वगैरह को ज्यादा अहमियत दी है और अक्ल की अहमियत गजाली के यहां एक तरह से उस लिहाज से कम हो जाती है या वो यह कहते हैं कि विजान जो है या इंट्यूशन जो है वो यह समझते हैं कि अक्ल से कोई अलग सी चीज है। जबकि इकबाल कहते हैं कि विजदान या इंट्यूशन जो वो दरअसल अक्ल ही का एक हिस्सा या पार्ट है। और इस तरह से जो है वो जो आपने जो सवाल किया है कि एक तरफ वो ट्रेडिशन को भी अपने साथ रखते हैं और दूसरी तरफ मॉडर्न साइंस को भी साथ रखते हैं। मॉडर्न फिलॉसफी को भी साथ रखते हैं। और फिर इस बुनियाद पे वो मजहब की बुनियादी हकीकतों को समझने और समझाने की कोशिश करते हैं। फिर उसके ज़रिए जो है फिर वह आखिरत के हक़य तकदीर इन तमाम चीज़ों पे उन्होंने अगले चैप्टर्स में जो है उन्होंने ज़्यादा तफसील के साथ जो बात की है यानी ईगो जो खुद ही जिसको उन्होंने जो है अपने उर्दू शायरी में भी बहुत ज्यादा गुफ्तगू की है। उसी को बुनियाद बनाकर करके के आखिरत की बात उन्होंने शुरू की। तो इस तरह से खुदा यानी तौहीद रिसालत आखिरत वगैरह के जो या तकदीर वगैरह के जो बुनियादी हकायक हैं उसको उन्होंने प्योरली रेशनल फ्रेमवर्क में समझने और समझाने की कोशिश की है। एक बात जो मुझे समझ आ रही है कि एक जमाना वो गुजरा जब अल्लाह के रसूल ससल्लम ने के ऊपर वही आनी शुरू हुई। 23 साल का पूरा जिसे कहते हैं कि अरसा था। उस उस टाइम पीरियड में उन्होंने उसको एक निजाम के तौर पर भी पेश किया। इंस्टिटशंस बिल्ड किए और इंडिविजुअल्स भी बिल्ड किए। वो जो वक्त था पूरा उसमें भी जब आप मदीना में आए, मदीना में आपको यहूदियों से इंटरेक्शन हुआ, ईसाइयों से इंटरेक्शन हुआ तो हजरत ईसा के ऊपर बाकी चीजों के ऊपर भी डिबेट्स हुई। और वो कहीं ना कहीं अगर आप देखें अगर उनको आप इंटेलेक्चुअलाइज करें तो वो एक लेवल पे वजूदी डिबेट्स भी है मेटाफिजिकल डिबेट्स भी हैं। हजरत ईसा की जो जो वजूद के ऊपर जो बात हो रही है ये सारी चीजें तो एक उमई जो दौर आया या उसके बाद एबसिट दौर आया अब्बासी दौर में ये जो पूरा गोल्डन पीरियड हुआ उसमें के अब फिर से क्योंकि रोमन एंपायर और पर्शियन एंपायर के साथ एक्सपेंशन हो रहा है। इंटरेक्शन हो रहा है। जब भी इस्लाम इंटरेक्ट करता है, एक्सपेंड करता है तो उसको या कोई भी एक आईडियोलॉजी होती है, उसको डिफरेंट आईडियोलॉजीस के साथ इंटैक्ट करना पड़ता है और उस इंटरेक्शन में वहां के भी जो वर्ल्ड व्यूज होते हैं उससे कुछ सवालात आते हैं और उनको सिंथेसाइज करना पड़ता है आपके अपने पर्सपेक्टिव से जो आपका पैराडाइम है जो आपका निजाम है या जो आपका जो वर्ल्ड व्यू है आप उसको दूसरों को समझाने के लिए बल्कि अगर आप मक्कन दौर को भी देखें अल्लाह के रसूल सल्लल् की पूरी जिंदगी को भी देखें तो अरब में जो वोकैबलरी थी ऐसा नहीं है कि पूरी वोकैबलरी कंप्लीटली 100% क्रिएट की जा रही है। बहुत कम ऐसी चीजें हैं जो आपको लगेगा कि बिल्कुल नए अल्फाज़ हैं। बल्कि ड्राइव किया गया। उन्हीं को यूज़ किया। उन्हीं को यूज़ किया गया। उनमें तीन चीजें हैं। एक उसको कंप्लीटली डिनाई कर दो। एक उसको प्यूरिफाई कर दो। एक अल्टरनेटिव दे दो। और ज्यादातर चीजों में प्यूरिकेशन प्लस एक्सेप्टेंस है और कुछ ऐसी चीज़ हैं कि जहां पे डिनाई किया गया है। बिल्कुल जिसे वो कहते हैं। तो अगर आप जी जी तो उसी में मैं जब ये देख रहा हूं कि जब आपका एक्सपेंशन हो रहा है सिविलाइजेशन का। अब अब क्या हो रहा है कि अल्लाह के रसूल के बाद वो एक्सपेंशन हुआ। उसमें ये हुआ उसमें स्टेबिलिटी है। जब भी आप एक्सपेंड करते हैं नए गिरोह आते हैं। उनके अपने क्वेश्चंस होते हैं। उनके अपने जिसे कहते हैं एक्सपीरियंसेस होते हैं। वहां पे फिर वो ग्रीक फिलॉसफी क्योंकि उस टाइम पे सबसे बड़ा पैराडाइम था जो फिलोसोफिकली मैच्योर था। उसको आपने सिंथेसाइज कर दिया। पूरा सिविलाइजेशन ने उसके बरस एक इल्मुल कलाम डेवलप कर दिया। लेकिन पैरेलली दुनिया चेंज हो गई। ऑब्जेक्टिव साइंसेस ज्यादा डेवलप हो गए। और ऑब्जेक्टिविटी से सब्जेक्टिविटी को रिकंस्ट्रक्ट करने की कोशिश की जाने लगी रादर देन सब्जेक्टिविटी से ऑब्जेक्टिविटी को इंटरप्रेट करने की और वहां पे अब जाके ये पूरा जो सिलसिला हुआ शाह साहब तो उस डिबेट में नहीं है। शाह साहब तो एक इंटरनल फ्रैक्चर को और एक तरीके से वो फ्यूचरिस्ट भी हैं। मतलब वो वही फ्रेमवर्क वो कहां पे आगे जाके प्रॉब्लम क्रिएट कर सकता है वो उसको पहले से ही देख रहे हैं। तो उसमें सर सैयद फिर शिबली और भी लोग होंगे और हैं जो बिल्कुल हम तो कुछ लोगों पे फोकस कर रहे हैं। इकबाल पर आते-आते ऐसा समझ आ रहा है कि एटलीस्ट उस वक्त तक जो वेस्टर्न सिविलाइजेशन सामने आई थी हम उसका सिंथेसाइजेशन इस तरह से कि इस्लाम की जो सुपीरियरिटी है फ्रॉम द पर्सपेक्टिव ऑफ व्हाट इट इंटेंड्स टू डू वो क्या करना चाहता है दुनिया के साथ लोगों के साथ सिस्टम के साथ इंस्टीटशंस के साथ वो उस लैंग्वेज में जो लैंग्वेज अब दुनिया समझ रही थी। इकबाल ने उस लैंग्वेज में इसको रिकंस्ट्रक्ट किया। करने की कोशिश की। बिल्कुल। लेकिन अब फिर 100 साल गुजर गए हैं। और हम बिल्कुल एक नई जनरेशन है। आप इस चीज को देख रहे हैं पूरा। मैं क्योंकि फिलॉसफी बहुत ज्यादा दिलचस्पी से पढ़ता हूं और भी सारी चीजों में वो मॉडर्निटी थी। मॉडर्निटी को वाइडली प्रोजेक्ट भी देखा जाता है कि उसमें मॉडर्निटी, पोस्ट मॉडर्निटी क्रिटिकल थी। लेकिन अगर मॉडर्निटी को सिर्फ उतना देखा जाए कि स्ट्रक्चरलिस्ट थ्यरी, पॉजिटिविज्म तो उसके बाद पोस्ट मॉडर्निटी और क्रिटिकल थ्यरी उसका जो ये थीसिस है वेस्ट का उसका एंटीथीसिस और उसका सिंथेसिस वेस्ट अपने आप में प्रोड्यूस कर रहा है। और कहीं ना कहीं इकबाल और बाकी लोग जो हैं वो उस एक थीसिस को रिसोंड कर रहे हैं। हम हम और अब जो यह 100 साल गुजरे हैं उसमें वेस्ट अपने आप में एक चर्निंग अपने आप में उनका जो एक कलाम का ट्रेडिशन है मतलब उनकी एक अपनी जो इंटरनल रीजनिंग का ट्रेडिशन है वो उससे गुजर के अल्टरनेटिव रियलिटीज आ गई और हम जितना फास्ट वो हुआ 100 साल में यूजली क्या होता है कि कई सौ साल लग जाते हैं चीजों को डेवलप होने में जैसे टेक्नोलॉजी और सब बढ़ी एक्सेस तो वो वो भी मल्टीप्लाई हुआ कि टाइम टू इंटेलेक्चुअलाइज भी रिड्यूस हुआ ज्यादा लोग एजुकेट हो पा रहे हैं ज्यादा से 100 साल में ज्यादा तब्दीलियां आई हैं। ज्यादा लोग एजुकेट हो रहे हैं। ज्यादा दिमाग जो है वो प्रोसेसिंग पावर अपना लगा रहे हैं डिबेट्स में। सही बात है। सही है। सही सही। तो आज का क्राइसिस अभी क्या आपको लगता है कि इज इकबाल इनफ? और वी नीड री कंस्ट्रक्शन? क्या हमें इस प्रोजेक्ट को और इस बीच में इस प्रोजेक्ट को आफ्टर इकबाल किस तरह लेते चले गए? बिल्कुल। देखें खुद [गला साफ़ करने की आवाज़] इकबाल को इस बात का एहसास था कि वो कोई फाइनल प्रोजेक्ट नहीं दे रहे हैं और किसी भी स्कॉलर को ऐसा एहसास जेनुइन स्कॉलर को ये एहसास नहीं होता है ना होना चाहिए और वैसे भी हम देखते हैं कि यानी पिछले 100 साल में दुनिया इतनी ज्यादा बदल चुकी है यानी इल्मो फिक्र की दुनिया इतनी ज्यादा तरक्की कर चुकी है अपना उसका एक फ्रेमवर्क है अपने चैलेंजेस हैं अपनी चीजें हैं तो खुद इस्लाम का तकाजा हम देखते हैं के हमारे ट्रेडिशन में भी हम देखते हैं कि इसी तरह की सुरते हाल हमेशा बनती बिगड़ती आगे बढ़ती रही है और हमने मुख्तलिफ हवाल में मुख्तलिफ तरह से कोशिशें की हैं। तो अब 100 साल के बाद इकबाल के बाद जो मंजरनामा जो सिनेरियो सामने आता है इसमें कोई शक की बात नहीं है के मुख्तलिफ हिस्सों में खुद इस्ला मुस्लिम वर्ल्ड के काम हुए हैं और हो रहे हैं। मुख्तलिफ स्कॉलर्स की एक खेप सामने आई है जो कर रही है। लेकिन ऐसा लगता है कि एक उसमें एक क्राइसिस पाया जाता है बहुत बड़ा। वो क्राइसिस यह पाया जाता है कि जो इस वक्त जो मुस्लिम मॉडर्निस्ट मुस्लिम स्कॉलर्स की एक जो जो डोमिनेंट क्लास है वो जिस तरह से इनफ्लुएंस्ड है वो जो वेस्ट की जो मटेरियलिस्ट जो आईडियोलॉजी है उससे जितनी ज्यादा इन्फ्लुएंस्ड है अ उसकी बुनियाद पे उसने ने जो जो नॉलेज क्रिएट कर रही है और वो जिस तरह के अपनी आइडियोलॉजीस डेवलप कर रही है उसको बुनियाद बना कर करके उसके काउंटर में जो काम हमारे मुस्लिम स्कॉलर्स को जो अपने ट्रेडिशंस को भी सामने रखें और इस मॉडर्न नॉलेज को भी सामने रखें और उसकी बुनियाद पे एक सिंथेसिस बनाएं वो काम बहुत ज्यादा अभी भी बहुत ज्यादा स्लो है। वो काम अभी भी उस लिहाज से स्लो है और असल डोमिनेंस जो है वो उन्हीं का है कि जो ज्यादा वजाहत के साथ कहा जाए तो उनकी नजर में यह है कि प्योरली सेकुलर अप्रोच मटेरियलिस्ट एप्रोच जिसको जिस तरह से वेस्ट में हम यह देखते हैं कि क्रिश्चियनिटी के साथ जो कुछ भी हुआ वो यह हुआ कि उन्होंने उसको इस तरह सेशन लाइज किया के उसकी जो असल जो उसकी स्पिरिट या उसका जो असल रूह बल्कि उसका ढांचा वो सारा का सारा कोलैप्स कर गया। [अचानक ज़ोर से सांस लेने की आवाज़] तो ये जो पूरी की पूरी क्लास अभी 20वीं सदी में सामने आई है खासतौर से इकबाल के बाद उसके सामने मॉडल बुनियादी तौर पे अपने वेस्ट का इस तरह से है कि वो उसी पैटर्न पे रिकंस्ट्रक्शन रिकंस्ट्रक्ट करना चाहती है जिसमें मजहब को बिल्कुल एक हाशिय पे बिल्कुल रखा जाए और इस तरह से हाशिया पे रखा जाए कि हमारी एक जिंदगी से हमारे समाज से उसका कोई भी ताल्लुक ना हो जो एक प्योरली सेुलर सेुलर प्रोजेक्ट जो है उसके अगेंस्ट में हमारे सामने एक बहुत बड़ा चैलेंज है कि हम किस तरह से अपनी इस्लामिक थॉट को पेश करने की कोशिश करें कि जो यह महसूस हो कि इस्लाम हमारी इस्लामिक एक हमारी इस्लामी फिक्र आज के मसाइल का अपना हल सामने रखती है। आज जिस मॉडर्न सोसाइटी के जो तकाजे हैं उसको वो पूरा कर सकती है। उसके डेवलपमेंट में एक बड़ा किरदार अदा कर सकती है। और फिर उसके अंदर यह ओपननेस भी है कि वो आज के जो मॉडर्न सोर्सेस हैं उससे भी बिल्कुल इस्तफादा कर सकती है। दूसरी तरफ उसको वो ट्रेडिशन को भी अपने हाथ से जाने नहीं देना चाहती। इन दोनों को सामने रखते हुए और गोया वो जो एक रीजन और रिवुलेशन का जो एक टकराव शुरू से चला आ रहा है उसमें बैलेंस बनाते हुए अपनी तहजीब को आगे बढ़ाने का शूर रखती है और अपना एक हिस्सा अदा कर सकती है। ये चीज जो हम देखते हैं तो इसमें कोई शक की बात नहीं है। एक मायूसी सी महसूस होती है कि इस सतह पे काम हमारे यहां नहीं हो रहा है। यानी मिस्र में, ईरान में, अल्जीरिया में हमने जिन चंद लोगों का नाम भी बताया वो लोग जिस अंदाज से यही काम कर रहे हैं, बहुत बड़े पैमाने पे काम कर रहे हैं। हमारे यहां तो कुछ खामोशी सी है। इकबाल के बाद जिन लोगों ने हमारे यहां काम किया है वो बेलाशुबा काम किया है। लेकिन उस दर्जे का काम नहीं है। हां, लेकिन उस बड़ी सतह पे काम वहां हो रहे हैं। लेकिन उनमें जो अक्सरियत जो है वह वह मिसाल के तौर पे पूरा इस्लामिक हेरिटेज जो है हमारा तरास जिसको हम कहते हैं या पूरा नॉलेज ट्रेडिशन जो है उसी पे सवालिया निशान कायम कर करके बिल्कुल उसको हटा देने की कोशिश करती है। अच्छा हमारा पूरी इस्लामिक जो हमारे जो पूरे नजरियात हैं चाहे इस्लामी पॉलिटिक्स के हमारे इकोनॉमिक्स के या जिस चीज की जो हमारी तहजीबी बुनियाद है जिसकी बुनियाद पे हम एक अपनी तहजीब की तशकील की बात करते हैं उन पूरे को वो इसी से एक सवाल में छूट गया इकबाल के हवाले से इश्तहाद जो कि ये एक तरीके से जो मुझे समझ आ रहा है कि जो मॉडर्न लोग करने की कोशिश कर रहे हैं वो इत्तहाद को एक तरीके से देख रहे हैं और वो इश्तहाद के नाम पे शायद ट्रेडिशन को कंप्लीटली ये समझ रहे हैं कि वो उस वक्त के लिए था। उसकी इंटरप्रिटेशन तो इश्तहाद को किस तरह से देखना चाहिए फ्रॉम जदीद इल्म कलाम या कलाम पर्सेक्टिव या किस तरह से देखा गया या फिर इकबाल ने किस तरह से इकबाल का जो छठा खुदबा है जो उनके जो एड्रेस है रिकंस्ट्रक्शन का जो सिक्स सिक्स चैप्टर है वो इत्तेहाद पे है और सही मायने में यह है कि कोई इत्तेफाक करे या ना करे लेकिन कम से कम मैं अपने तौर पे ये कह सकता हूं के इ्तेहाद पे जो चैप्टर इकबाल ने लिखा है। एक तो रिकंस्ट्रक्शन का सबसे अहम बाप वो है चैप्टर वो है और इस पे जो गुफ्तगू 20वीं सदी में हुई है उसमें ये बहुत ही अ अपनी यानी ये कहा जा सकता है कि इस तरह की गुफ्तगू नजर नहीं आती और दूसरी जगह पे जिस अंदाज में बात की है वो पढ़ने के लायक है। जो लोग भी इस्लामिक थॉट को एक तरह से रिप्रेजेंट करते हैं और उससे और उसको आगे बढ़ाने की बात करते हैं तो उनको इकबाल के इस प्रोजेक्ट उस चैप्टर को देखना चाहिए जो इ्तहाद के पे उन्होंने लिखा है। इकबाल का का बुनियादी कंसर्न ही यही है बुनियादी तौर पे यानी इल्म कलाम के हवाले से भी शरीयत के हवाले से फिक के हवाले से भी के इज्तिहादी जो सोच है जो एप्रोच है वो बुनियादी तौर पे मौजूदा दौर में बिल्कुल मार्जिनलाइज्ड हो गई है। वो बिल्कुल हाशिय पे आ गई है। इसलिए इस्लाम में उसको वह कहते हैं इस्लाम में अह हरकत का एक उसूल है। इस्लाम इस्लामिक थॉट को के मूवमेंट का जो बुनियादी प्रिंसिपल है वो वो इज्तिहाद को करार देते हैं। तो इ्तेहाद के डाउनफॉल की वजह से या उसके डिक्लाइन की वजह से वो ये समझते हैं कि पूरी इस्लामी थॉट जो है वो डिक्लाइन का शिकार हो गई है। इश्तहाद क्या है आपके हिसाब से? इश्तहाद यह है जिसको हम एक लफ्ज हम हम कह सकते हैं कि इ्त्तिहाद नाम है एक इंडिपेंडेंट रीजनिंग का ऐसी इंडिपेंडेंट रीजनिंग के जिसमें आप खुद इकबाल के लफज़ में अपने पीडीसेसर से अपने असलाफ से इख्तलाफ करते हुए अपने असलाफ से पहले की जनरेशन से इख्तलाफ करते हुए आप बिल्कुल इंडिपेंडेंटली अपनी एक आइडियाज को कुरान सुन्नत की बुनियाद पे, इस्लामिक वर्ल्ड व्यू की बुनियाद पे कि बुनियादी उसूलों की बुनियाद पे आप जो है डेवलप करने की कोशिश करते हैं। उसके मुकाबले में तकलीद है। तकलीद में यह है कि साहब आपको हर हाल में जो शुरू की जो जनरेशंस हैं उनके हर हाल में आपको पैरवी करनी है और चाहे आप उसको प्रूफ कर सकें ना प्रूफ कर सकें लेकिन आपको हर हाल में उसको ब्लाइंडली एक्सेप्ट कर करके आपको आगे बढ़ना है। इकबाल यह समझते हैं कि हमें इस्लाम के बुनियादी उसूलों को रिथिंक करने की जरूरत है। और इसमें जब हम ऐसी बात कहते हैं तो इसमें हमें बहुत सारी चीजों में हमें अपने पहले की जनरेशन के साथ इख्तलाफ करना पड़ेगा और और इसके बगैर यह चारा नहीं है। हमारे यहां सुरते हाल यह हुई है कि खुद शाह वलीला कहते हैं कि चौथी सदी के बाद जो है इज्तहाद का दरवा यानी एक तरह से चला हुआ लफज़ है कि दरवाजा बंद कर दिया। यानी किसने बंद किया? क्यों बंद किया? कैसे और किस पॉइंट ऑफ टाइम पे हुआ यह तो नहीं। लेकिन इतनी बात तो बिलाशबा है कि चौथी सदी के बाद की जो सदी है वो दरअसल तकलीद की सदी है। जब कुछ एस्टैब्लिश स्कूल बन गए और वो फका के हवाले से भी और देखा जाए तो इल्म कलाम वगैरह के हवाले से भी। और अब जो आने वाली नस्लों के लिए यह है कि अब बनाए बनाए स्कूल्स हैं। उनका अपना फ्रेमवर्क है। उनके अपने उसूल हैं जिससे आप डिफर नहीं कर सकते। उसी में रहते हुए आपको सोचना है और इस्लाम को समझना है। उनके तमाम चीजों को समझना है और अपनी एक अपनी एक रीजनिंग देनी है और अपना एक वो बनाना है। इकबाल इससे डिफर करते हैं। वो ये समझते हैं कि नहीं इस बात की जरूरत है कि हमें आगे बढ़कर कर करके जिस तरह से पहली नस्लों ने बिल्कुल इन तमाम चीजों से हटकर करके सोचने और समझने की कोशिश की है। हमें भी इस बात का हक है कि इसको समझने की कोशिश की जाए। हमने पूरा एक तरीके से अगर देखा जाए तो ऑलमोस्ट 1000 साल की मोटा-मोटा जो हिस्टोरिकल इंटेलेक्चुअल मूवमेंट हुआ है मुस्लिम सिविलाइजेशन में इस्लामिक सिविलाइजेशन कहें मुस्लिम सिविलाइजेशन कहें उसमें हमने उसको मैक विज़न से और देन उसमें स्पेशली इंडियन कॉन्टेक्स्ट को सामने रखा और उसका जो न्यू मेथड जैसे इमर्ज हो रहा है और ऑफकोर्स आप बता रहे हैं वो अरब में भी हो रहा है। दूसरी जगह पे भी हो रहा है। उस पे भी नजर डाली और यह भी बात कि भाई अभी भी जिस तरह से एक बात सर सैयद का जो क्रिटिक है के नेचुरलिज्म उन पे हावी हो गया तो आज की जो इस्लामिक मॉडर्निस्ट थिंकर्स हैं वो भी कहीं ना कहीं जो वेस्ट का जो एपिस्टमोलॉजिकल पैराडाइम है वो उसको मरकज बना के फिर उससे इस्लाम की जो बुनियादी उसूल हैं या बुनियादी फ्रेमवर्क परखने देखने की कोशिश कोशिश करते हैं तो वो क्या है कि इस्लाम अगर बड़ा पैराडाइम है और ये अगर छोटा है मान लीजिए तो आप छोटे पैराडाइम से बड़े पैराडाइम को परखने की कोशिश कर रहे हैं तो उसमें बड़ा पैराडाइम भी ऑटोमेटिकली रिड्यूस हो जाएगा क्योंकि आपके जो चश्मे की सलाहियत होगी आप उसी हिसाब से उसको देख पाएंगे को देख पाएंगे तो अब सवाल आगे ये है कि एंड में के पहले मदरसे इस तरह के प्रोडक्ट बनाते थे गजाली भी मदरसे के प्रोडक्ट हैं। रबी भी मदरसे के मुल्ला सदरा भी ये सब उसमें बीच में क्या हुआ कि मदरसे के प्रोडक्ट प्लस एक्सपोज़र टू न्यू साइंसेस का कॉम्बिनेशन चल रहा था। बिल्कुल। अब यह हो रहा है कि मदरसा एक तरीके से रिडंडेंट रियलिटी हो गई है फ्रॉम दी कलाम पर्सपेक्टिव। अभी भी शरीयत में एप्लीकेशन वो एक डिफरेंट डोमेन है। उसको कंटेस्ट नहीं कर रहे हैं कि नॉलेज सिस्टम्स में नॉलेज प्रोडक्शन में और जो नॉलेज इंस्टीटशंस लाइक यूनिवर्सिटीज में प्रोड्यूस हो रही है उसको ट्रेडिशन का अंदाजा नहीं है। तो ट्रेडिशन से जुड़े हुए लोग कैपेबल नहीं है नॉलेज प्रोड्यूस करने के लिए पूरी दुनिया के लिए। और जो लोग पूरी दुनिया के लिए प्रोड्यूस करने के लिए नॉलेज ट्रेन हो रहे हैं उनको ट्रेडिशन का अंदाजा नहीं है। तो वो जो नॉलेज प्रोड्यूस कर रहे हैं वो ट्रेडिशन को ही चैलेंज कर रही है। तो अब हमारे सामने अगला 20 साल 50 साल का रोड मैप मोटा-मोटा क्या होना चाहिए? इंस्टीट्यूशनली स्पीकिंग इंडिविजुअली नहीं कि हम किस तरह के इदारे बनाने चाहिए। हमारा क्या प्रोजेक्ट होना चाहिए? देखिए एक तो यह है कि जो हमारे [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारा जो ट्रेडिशन रहा है मद मदारिस का जैसा कि आपने खुद बताया उसमें ये दोनों स्ट्रीम साथ-साथ चल रही थी यानी रिलीजियस साइंसेस की और रेशनल साइंसेस की। यानी हम ये देखते हैं कि इंडिया में बकल मनाज़िर हसन गिलानी के उनकी किताब हिंदुस्तान का निजाम तालीम तरबियत उसमें उन्होंने लिखा है कि पहले तकरीबन 40 किताबें हैं। रैशन साइंसे यानी जिसको हम कहते हैं माकुलात की उलूम अकलिया की वो किताबें शामिल थी। अब यह हुआ कि मौजूदा दौर में उसके खिलाफ जो एक रुझान बना तो उसको इतना कम किया गया कितना कम किया गया कि बिल्कुल रिड्यूस करके दो चार चीजें अच्छा बिल्कुल रह गई। अब वो जो दो चार चीजें हैं उनको भी अपडेट नहीं किया गया। बिल्कुल अपडेट नहीं किया। अब डिटेंशन नहीं ना होने की वजह से हम यह देखते हैं कि जो चीजें मदारिस में पढ़ाई जाती हैं वो ज्यादा से ज्यादा हम अपनी रिवायत के एक हिस्से में एक खास वक्त में जो बहसो मुबासे चलते रहे हैं उसको जान लेते हैं। अपनी तारीख को जान लेते हैं। बस फ्रोजन इन टाइम हो गए हम। फ्रोजन इन टाइम बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल उससे ज्यादा कुछ नहीं समझ में आ क्योंकि आज की दुनिया से उसको रिलेट करके नहीं पढ़ाया जाता। और आज की दुनिया से रिलेट करके पढ़ाने के लिए जरूरत होगी कि खासतौर से जिसको हम उलूम में अकली अकली उलूम का कोर्स निसाब कहते हैं उसमें नई चीजों को शामिल करने की जरूरत है। खासतौर से इंडियन सबक्टिनेंट में इस ताल्लुक से बहुत ज्यादा जरूरत है। इसी की कमी यहां पाई जाती है। बाहर मुालिक में हम देखते हैं कि चीजें शामिल हुई हैं। वहां पैरेलली मॉडर्न साइंस को भी चाहे मबादियात की सतह पे बुनियादी सतह पे उनको पढ़ाया जाता है ताकि उसका एक शूर पैदा हो जाए।कि वहां जो है एक हमेशा इल्म यानी निसाब जो मदरसे का है उसमें तब्दीली आती रही है। हम दूसरे पार्ट की बात कर रहे हैं मुस्लिम वर्ल्ड के वहां ये सब होता रहा है। तो वहां बहरहाल एक वाकिफियत जो है इन चीजों से है। ईरान ही की मिसाल है। मैं कई दफा ईरान गया हूं। मुझे इन चीजों का बरास्त अंदाजा भी है। हमारे यहां बिल्कुल ऐसा नहीं है। बल्कि पूरा निसा बहुत ही रिडंडेंट बहुत ही जामिद, बहुत ही इस अंदाज में है कि आप जो है आज की दुनिया को समझने समझाने की कोशिश करते हैं। आज से हजार साल पहले के हालात के और उसकी बुनियाद पे उस फ्रेमवर्क में तो आज के चैलेंजेस को समझना उसको रिसोंड करना आपके लिए मुमकिन नहीं रहता। तो हम तो ये समझते हैं कि आज जो हमारे मदारिस के जो जिम्मेदार हैं उनको संजीदगी के साथ इस बात पे कोशिश की कोशिश करना चाहिए कि किस तरह से एक निसाब के अंदर एक बैलेंस बनाने की कोशिश की जाए। हम और यह हमारे ही ट्रेडिशन का एक बहुत ही ब्राइट पहलू है जो आज हम देखते हैं कि इतना कमजोर हो गया है। तो फिर जो है अ हम आज के चैलेंजेस को सही तरह से समझ भी पाएंगे और उसका जवाब भी दे पाएंगे। मिसाल के तौर पे आजकल बहुत ज्यादा बहस जो मदारिसका में हो रही है वो हो रही है एथिज्म को लेकर के। एथइज़्म पे आजकल सबसे ज्यादा डिबेट है के और वो जो एक जो आज वो हुआ था पिछले पिछले चंद महीना पहले जो जावेद अख्तर साहब उनके साथ जो डिबेट हुई थी उसके तो एथ्म एथ्म का बहुत ज्यादा चर्चा है और ये मटेरियलिज्म का और फला का फटना का लेकिन सही मायने में यह है कि हमारी जो मदारिस की जो जदीद नस्ल है जो जनरेशन है वो इन चीजों को समझ नहीं रही है क्योंकि उनको ऐसी चीजें निसाब का हिस्सा नहीं है। या मदारिस का माहौल भी ऐसा नहीं है कि जहां उनका ज़हन इस तरफ आता हो और इन चीजों को वो समझें। तो जब तक हम अकली उलूम जिसका एक हिस्सा इल्म कलाम है। अकली उलूम को मॉडर्न साइंस को अपने मदरसे में कुछ समझने समझाने की कोशिश ना करें। अ जब तक सही मायने में एक जदीद इल्म कलाम डेवलप हो के ऐसा सामने नहीं आ सकता कि जो अपनी रिवायत के अंदर रहते हुए मौजूदा दुनिया में अपना किरदार अदा कर सके। बहुत शुक्रिया डॉक्टर वारिस मजरी साहब। [गला साफ़ करने की आवाज़] एक लंबे अरसे से ये कोशिश थी कि आपके साथ ये पडकास्ट हो। बट ये मेरी ही सलाहियत में कुछ कमी है कि मैं उर्दू नहीं पढ़ पाता सही से। तो आपकी क्योंकि किताबें उर्दू में ज्यादा है तो मुझे वक्त लगा चीजों को देखने में समझने में लेकिन आपसे जितना भी डिस्कशन हुआ दो बार मुझे इस चीज का एहसास है कि बहुत सारी और चीजें आपकी जो है वो बाहर आनी चाहिए और नाउ इसी वजह से हम लोगों ने सोचा भी था कि जो डिस्कशंस हैं ट्रेडिशन और मॉडर्निटी के बीच के और सो कॉल्ड हालांकि मैं तो मॉडर्निटी और ट्रेडिशन के पर्सपेक्टिव से सब चीजों को नहीं देखने की कोशिश करता। मुझे लगता है कि कंप्लीट फाउंडेशनल रिकंस्ट्रक्शन में मॉडर्निटी खुद सब्सम हो जाएगी। जो भी उसकी अच्छाइयां हैं और जो उसकी लिमिटेशंस हैं वो ऑलरेडी हमारे सामने वाज़ हैं। वो तो हमें जो सिंथेसिस करना है उसकी अचीवमेंट्स का करना है जो ऑलरेडी हमारे सिस्टम में है और क्योंकि मैंने आपको जिक्र भी किया था। हमारे वालिद साहब भी लिखते हैं। तो उनका जो काम है उसमें एप्लीकेशन ऑफ़ इस्लाम के पर्सपेक्टिव से जो बहुत सारी चीज़ जो मॉडर्न साइंसेस की हैं वह जब कुरान को एज अ ट्रेंड मेडिकल डॉक्टर या जो फिजिक्स में इंटरेस्ट है तो वहां से बहुत सारी ऐसी चीजें हैं जो कुरान का ही डायरेक्ट इंटरप्रिटेशन में जो सीधासीधा निकल के आती हैं और जिससे आप एक्चुअल रिकंस्ट्रक्शन कर पाएंगे क्योंकि कुरान जब तक आप कुरान का और हदीस का हवाला नहीं देंगे तो फिर वही डिबेट हो जाएगी जो मौत लाइट में उती है तो वो हमारा जो गज़ाली ने ने जो प्रोजेक्ट दिया कि भ आपका रेवोलेशन आपकी अकल और आपकी जो मेथोडोलॉजी है पिस्टमोलॉजी है प्रूव करने की वो तीनों को अलाइन होना पड़ेगा और मुझे लगता है ये हमारा सबसे बड़ा चैलेंज है और फ्यूचर में भी आपसे ये डिस्कशन होते रहेंगे क्योंकि नई जनरेशन को इस नॉलेज का इस ट्रेडिशन की जो गुफ्तगू हुई है और जो मॉडर्न चीजें हो रही हैं इस वक्त जो हो रही हैं उन उनको हमें मुझे लगता है कि इंट्रोड्यूस करवाने की जरूरत है वो सारी चीजें वो ज उन लोगों का रुझान इस तरफ बढ़ेगा। वो इन चीजों में पीएचडीस करेंगे, मास्टर्स करेंगे और हमेशा यह होता है कि हिस्टोरिकली कि जैसे इकोनॉमिक्स जब मैं पढ़ रहा था तो कोई फिजिक्स का आदमी वो फिजिक्स छोड़ के इकोनॉमिक्स करने आता था तो वो फिजिक्स की जो मैथमेटिकल टूल्स है उसको इकोनॉमिक्स में लिया और उससे मैथमेटिकल इकोनॉमिक्स डेवलप हुई। तो यूजली जो होता है कि आप एक फील्ड से दूसरी फील्ड की तरफ जब आते हैं और फिर आप उस फील्ड को समझते हैं या उसमें ट्रेन होने की कोशिश करते हैं प्रॉपर्ली जब जाके ये सिंथेसाइजेशन रिकंस्ट्रशंस पॉसिबल होते हैं। बेशक बेशक बेशक बहुत शुक्रिया डॉक्टर बहुत-बहुत शुक्रिया।

Companion article

A Book About an Unfinished Project

Dr Waris Mazahri, an assistant professor of Islamic Studies at Jamia Hamdard in Delhi, has spent his career on a question most religious scholars would rather not ask: does Islamic theology as it has been taught for a thousand years still have the tools to answer the modern world? His recent book, Barre Sagheer Hind mein Jadeed Ilm-e-Kalam ("Modern Ilm al-Kalam in the Indian Subcontinent"), surveys roughly the last 150 to 200 years of attempts by South Asian Muslim thinkers to answer that question. In conversation with Nous, Mazahri walked through that history in detail — not as a tour of dead debates, but as the story of an intellectual project started several times over by the subcontinent's most consequential thinkers, and never quite finished.

Ilm al-Kalam is usually translated as Islamic scholastic or dialectical theology: the discipline devoted to defending the articles of Muslim belief through structured argument, rather than through fiqh's legal reasoning or tasawwuf's mystical experience. Mazahri's case is that classical kalam was built almost entirely on the scaffolding of Greek philosophy — specifically Aristotelian physics and metaphysics — and that this scaffolding began to buckle the moment modern science offered a different picture of the universe. What he calls "jadeed ilm-e-kalam," or modern kalam, is the accumulated, incomplete effort of the last two centuries to build new scaffolding. Mazahri traces the term itself to Sir Syed Ahmad Khan, or possibly the Turkish scholar Ismail Hakki, and notes it is now standard usage across the Muslim world.

Why the Old Theology Stopped Fitting

The problem, as Mazahri lays it out, is concrete rather than abstract. Classical kalam texts inherited a Ptolemaic cosmology: the earth was treated as static and, in some formulations, as flat rather than spherical. Mazahri points to Abd al-Qahir al-Baghdadi's Al-Farq bayn al-Firaq, a foundational heresiographical text, which folds a static earth into the creedal positions of Ahl al-Sunnah wal-Jama'ah. For centuries this caused no friction, because the reigning natural philosophy agreed with it. But from the sixteenth and seventeenth centuries onward, Descartes and the wider current of modern science began dismantling Aristotelian physics altogether, and suddenly the old kalam texts and the new picture of nature were making incompatible claims about the same physical world.

This, Mazahri argues, is the actual origin of the crisis modern kalam exists to address. "Those questions were not in front of the Mu'tazila," he says of the early rationalist school, noting that not even the Ash'aris confronted a worldview built on telescopes, falsifiability and observation-driven law rather than reason-driven speculation. The direction of inquiry had reversed: classical thought moved from reason toward objective reality, while modern science moved from observation toward law, treating reality as something to be measured before it was theorised. Sir Syed Ahmad Khan, faced with this reversal, adopted what Mazahri calls scientism — the conviction that science is the sole and final arbiter of what is real, so that whatever it could not verify had to be rejected. That commitment would define, and eventually distort, one of the most influential modernist projects in Indian Islam.

Philosophers, Theologians and a Rope of Many Strands

Before getting to the modern period, Mazahri insists on a point he considers widely misunderstood: kalam, falsafa (philosophy) and fiqh were never separate, self-contained tracks running in parallel. He describes the Islamic intellectual tradition as a rope of interwoven strands — religious sciences (manqulat) and rational sciences (maqulat) — present together from the first century of Islam onward. Groups like the Qadariyya, who denied predestination on largely rational grounds, appeared almost immediately. Even usul al-fiqh, the methodology for deriving Islamic law, opens its classical texts with what is essentially a kalam debate: what is reason, and how is knowledge obtained and authenticated.

Within this tradition, Mazahri identifies several distinct camps. Muslim philosophers — al-Kindi, al-Farabi, Ibn Sina, and later Ibn Rushd — were steeped in Aristotelian logic and worked to reconcile Islamic belief with the rational science of their day; Mazahri is insistent that they were not, as some retellings suggest, enemies of the tradition but rather its "servants." But in rationalising everything, including matters of ghaib (the unseen) — prophecy, the afterlife, revelation itself — some philosophers drained these categories of their literal reality, treating revelation as a purely internal psychological process and resurrection as metaphor rather than event. This provoked the mutakallimun, the theologians proper, who accused the philosophers of stripping wahy (revelation) of any real external agency.

Out of that argument came the Mu'tazila, who Mazahri says over-elevated reason to the point that revelation lost its due weight, and then the Ash'aris, who over-corrected in the opposite direction, curbing reason and weakening the causal reasoning by which people make sense of the world. Abu Mansur al-Maturidi, in Mazahri's account, tried to strike the balance the Ash'aris had missed. All of this, he stresses, unfolded alongside genuine hostility to the entire enterprise of kalam from within the tradition: Imam al-Shafi'i is reported to have said that anyone who studies or teaches kalam should be flogged and paraded through the streets, while Abu Yusuf, the student of Imam Abu Hanifa, held that "whoever learns kalam becomes a heretic." Suspicion of rationalist theology, in other words, is not a modern import — it is as old as kalam itself.

Al-Ghazali, and the Gap That Followed

Mazahri devotes considerable attention to correcting what he sees as a Western misreading of Abu Hamid al-Ghazali — the idea that Ghazali single-handedly "destroyed" philosophy and reason in the Muslim world. He rejects this outright. Ghazali's actual project, in works like Kanun al-Ta'wil, was to hold reason and revelation together without letting either side capture too much ground: he catalogued five positions on the relationship between aql (reason) and naql (transmitted text), placing himself in the fifth, which treats both as necessary and mutually informing. If God created both the world and human reason, Ghazali argued, a genuine revealed law would necessarily be revealed, reasonable and provable all at once — a synthesis Mazahri describes as one of the most consequential moves in the history of kalam, shaping everyone who came after, including Fakhr al-Din al-Razi and Ibn Taymiyyah.

But then, in Mazahri's telling, something goes quiet. After Ibn Taymiyyah, Ibn al-Qayyim, Ibn Rushd and Ibn Khaldun — broadly, by the fourteenth and fifteenth centuries — no comparably major intellectual figure emerges anywhere in the Muslim world for several hundred years. He attributes this partly to the Ottomans' near-constant wars with Europe and defence of the caliphate, which consumed attention that might have gone into sustained scholarship; partly to a failure, which the Ottomans themselves later recognised, to build the intellectual infrastructure earlier centuries had sustained; and partly to a broader civilisational insularity toward the new world Europe was constructing across the sixteenth to eighteenth centuries. He cites Bernard Lewis's What Went Wrong as a useful account of the same drought. The Muslim world, in Mazahri's phrase, lost its grip on "the pulse of time" precisely when Europe was remaking its understanding of nature, and by the time colonial powers arrived, the reckoning came too late to prevent institutional collapse — the caliphate's fall, and the absorption and eventual secularisation of Islamic personal law under colonial legal categories.

Shah Waliullah's Innovation

Into that gap steps the eighteenth-century Delhi scholar Shah Waliullah, whom Mazahri treats as the pivotal transitional figure between classical and modern kalam — someone who, in his phrase, appears "when the treasury of learning had been plundered and the markets of scholarship had gone cold." Shah Waliullah was not yet in contact with the European Enlightenment; nothing in his writing shows he had encountered Kant or Hegel. His importance lies instead in recognising, from within his own tradition, that the old intellectual tools were no longer sufficient. His major work, Hujjat Allah al-Baligha, is essentially a rationalisation project: he states explicitly, in its preface, that Islamic shariah must now be understood and expressed through reason, in the idiom of aql.

That claim is, in Mazahri's account, Shah Waliullah's most distinctive move — one the historian Shibli Nomani himself flagged as his central contribution: Shah Waliullah made shariah, and not merely doctrinal belief, a part of kalam. Before him, kalam had confined itself to core articles of belief — God's existence, prophecy, the afterlife — while Islam's legal and ritual apparatus operated as an independent, unphilosophised domain. Shah Waliullah insisted that the "why" behind ritual obligations — why one prays, why one fasts — deserved the same rational elaboration as theology's core doctrines, treating shariah itself as a theologised, holistic system rather than a set of self-justifying rules. He was also candid about breaking from taqlid within kalam specifically, since he considered kalam a purely rational project rather than one anchored in Quran and Sunnah — freely absorbing ideas from Ibn Sina, al-Farabi, Mulla Sadra, Ibn Arabi and Suhrawardi, including concepts like alam-e-misal, the "world of images," while still insisting on taqlid in matters of fiqh proper.

Sir Syed's Naturalism and Its Costs

If Shah Waliullah supplied the foundation, Sir Syed Ahmad Khan supplied the first sustained modern building on top of it — and, in Mazahri's reading, the first major modern collapse. Sir Syed was deeply influenced by Shah Waliullah and quotes him extensively; his originality lay not in inventing the need for modern kalam but in forcing it into public consciousness, "shaking people's minds," as Mazahri puts it, at a moment when almost nowhere else in the Muslim world had this urgency been felt. Iqbal himself, in a letter, credited Sir Syed with exactly this: creating the awareness before anyone had produced the answers.

The cost of that urgency was Sir Syed's near-total absorption of Newtonian scientism — the belief that whatever science could not verify should be rejected outright. Applied to Quranic material, this produced conclusions that alarmed even sympathetic readers: Sir Syed held that a genuine miracle was categorically impossible, since it would violate fixed natural law, and reinterpreted Quranic references to the miracles of Musa and Isa as figurative. He treated the angel Jibril not as an external agent delivering revelation but as an internal faculty of the Prophet's own mind. Mazahri notes that Sir Syed did not invent these positions from nothing — earlier Muslim philosophers had entertained versions of them — but that he pushed further than his intellectual resources, including limited exposure to Western-language scholarship, could properly support.

Shibli Nomani's Incomplete Synthesis

The corrective came from Shibli Nomani, who had studied under Sir Syed at Aligarh but broke from his naturalism, writing two books — Ilm al-Kalam and Al-Kalam — that attempted to hold classical and modern kalam together rather than discarding the old for the new. Mazahri suggests few scholars of that generation had read as widely in Greek philosophy and classical kalam as Shibli had; his ambition was to preserve whatever in the old tradition remained useful while compiling new answers to new questions. But his own letters — to figures like Hamiduddin Farahi — reveal the limits of the project: he repeatedly asks correspondents to explain what new ideas were emerging in the West, admitting he could not follow the debates himself, hampered by a lack of English at a moment when the crucial scholarship was appearing in European languages. Shibli died in 1914 with the project, by his own later admission recorded in Sayyid Sulaiman Nadwi's biography Hayat-e-Shibli, left incomplete — the foundation laid, the building unfinished.

Iqbal's Reconstruction and the Ijtihad Question

It is Muhammad Iqbal, in Mazahri's account, who finally possessed the equipment the project required: fluency in both traditions from their original sources, a doctorate on Persian metaphysics completed in Germany, and a mind capable of moving between Ghazali, Ibn Rushd, Ibn Taymiyyah and Jamal al-Din al-Afghani on one side, and Einstein, Whitehead, William James and Bertrand Russell on the other. His Reconstruction of Religious Thought in Islam, composed in English and therefore accessible to a global audience in a way the Urdu works of Sir Syed and Shibli were not, opens with a question nineteenth-century philosophy of religion had already posed sharply, largely following Auguste Comte's schema of religion as a stage of social development destined to be superseded by science: is religious reality even rationally possible? Iqbal's answer draws on William James's account of intuition, arguing — against Ghazali, whom he otherwise reveres — that wijdan (intuition) is not separate from reason but a part of it, and that the ultimate reality science and religion both investigate is accessible through this unified rational faculty.

Mazahri singles out the sixth chapter of Reconstruction, on ijtihad, as the book's most important contribution — a chapter, he says, that nothing written on the subject since has matched. Iqbal's central diagnosis is that the "principle of movement in Islam," which he identifies with ijtihad, had become almost entirely marginalised, ossified into taqlid somewhere after the fourth Islamic century — the traditional marker for "the closing of the gates of ijtihad." For Iqbal, recovering the right to independent reasoning, even where it meant disagreeing openly with earlier generations, was the mechanism by which Islamic thought had always renewed itself, and its absence explained the intellectual decline he diagnosed in his own time. Iqbal's influence on later kalam scholarship — Hasan Hanafi, Nasr Hamid Abu Zayd, Mohammed Abed al-Jabri, Mohammed Arkoun in the Arab world, Abdolkarim Soroush in Iran — is, in Mazahri's view, difficult to overstate, even where he disagrees sharply with where some of them took the project.

Three Ideas of Islam as a "Holistic System"

One of the more striking threads in the conversation is Mazahri's observation that twentieth-century South Asian Islam produced at least three distinct but related responses to a totalising modern scientific worldview, each casting Islam as a comprehensive system in a different register. Maulana Maududi framed Islam itself as a holistic system — a complete socio-political order. The Deoband school of thought, in Mazahri's account, effectively reframed the madrasa curriculum as a holistic system, treating the coherence of the tradition as something embedded in how it is taught rather than argued. Iqbal, by contrast, cast metaphysics itself as the holistic system, building the case at the most foundational level — first questions about existence, self and reality — rather than at the level of law or curriculum. Mazahri sees this trio as evidence that Shah Waliullah's original insight, that Islam's claim to completeness leaves no legitimate space unaddressed, science included, was inherited and pursued along genuinely different paths.

The Unfinished Curriculum, a Century On

Mazahri is unsentimental about where this leaves the present moment. A century after Iqbal, he argues, the dominant class of Muslim modernist scholars remains too captured by the very materialist ideology of the modern West it claims to answer, producing an approach to Islamic reform that — much as happened with Christianity, in his account, after its own confrontation with modern science — risks secularising belief until only an outward shell remains, evacuated of its spirit. Meanwhile, the harder work of building a genuine synthesis, one that takes both the Islamic tradition and modern knowledge fully seriously rather than judging the larger paradigm by the standards of the smaller one, proceeds at real scale in Egypt, Morocco, Algeria and Iran, but has produced comparatively little in the Indian subcontinent.

He locates the institutional root of this gap in the madrasa curriculum. He cites the scholar Manazir Ahsan Gilani's Hindustan ka Nizam-e-Talim-o-Tarbiyat for the claim that roughly forty books of rational sciences (maqulat) were once part of the standard course of study; that number has since been reduced to a handful, and even those few have not been meaningfully updated. The consequence, he says, is a student body "frozen in time" — able to recite the historical positions of past controversies but unequipped for live ones, including the resurgent debates over atheism now circulating in Indian public life, of the kind that produced the widely discussed exchange between religious scholars and the writer Javed Akhtar. Rebuilding modern kalam, in Mazahri's closing formulation, requires reintroducing the rational sciences and contemporary scientific literacy into the madrasa curriculum itself, so a new generation trained inside the tradition can also produce serious scholarship for the world outside it.

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