Nous Podcast· 18 Jun 2026· 50:51

"Political Parties Have Become Private Companies" | Qurban Ali on India's Political Crisis

Is Indian politics facing a deep ideological crisis? In this thought-provoking conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with prominent journalist Qurban Ali about the changing nature of politics, the decline of ideological commitment, and the challenges facing Indian democracy today. …

Full Transcript

जब इस तरह के नुमाइंदों को वो जिताकर पार्लियामेंट में या असेंबली में भेज रहे हैं तो वो कुछ वक्त भी नहीं लगाते और फिर वो बीजेपी के पाले में जा रहे हैं। इसकी एक बड़ी बुनियादी वजह तो आईडियोलॉजी का खत्म होना उससे जो कमिटमेंट था लोगों का वो खत्म हो गया और दूसरे पिटिकल पार्टियां जो है वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन गई हैं। तो यह जो पॉलिटिकल क्राइसिस है इसको आप कैसे देख रहे हैं और क्या अभी सबसे महत्वपूर्ण क्या यह एक आईडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर ही आपको नजर आ रही है? अफसोस की बात यह है कि इसका मुकाबला करने के लिए जो अपोजिशन होना चाहिए वो अपोजिशन हमें नजर नहीं आता और उसकी एक बड़ी वजह यह है कि जो नैरेटिव सेट कर दिया गया है बीजेपी की तरफ से उसी नैरेटिव को हर पिटिकल पार्टी चलाना चाहती है। उसको काउंटर नहीं करना चाहती। अगर जो प्रशासन है उसी तरह से काम कर रहा है। पुलिस उसी तरीके से काम कर रही है तो वो शिनाख तो आपको सबसे आगे रखनी ही होगी क्योंकि उसी के बिना पर तो आपके साथ ये सब कुछ हो रहा है। ये सुरते हाल इमरजेंसी में भी थी जब तुर्कमान गेट का कांड हुआ था। बहुत सारे लोग मारे गए थे। मुजफ्फरनगर और कैराना में गोली चली थी। लेकिन वो वक्त चीजें थी और लोग उसके खिलाफ निकल कर के आए। क्या इन पार्टियों को बी पार्टी ना कहा जाए? फिर कि आप तो आप लड़ी इस तरह से और फिर शामिल भी हो गए आप तो मलियाना और हाशिपुरा के दंगे कवर किए हैं। भागलपुर का दंगा कवर किया है। बहुत सारे नाम मैं गिना सकता हूं कि जिनका डॉक्यूमेंटेशन होना चाहिए था वो नहीं हुआ। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। फिलहाल देश की सियासत एक अजीबोगरीब मरहले पर आकर अटक गई है। ऐसा लग रहा है कि मानो सामने सिर्फ धुंध है और कुछ भी साफ नजर नहीं आ रहा है। राइट विंग का जो इकोसिस्टम है या राइट विंग की जो आईडियोलॉजी है, राइट विंग की जो पॉलिटिक्स है वो जाहिर सी बात है देश के लिए इस वक्त सबसे बड़ा खतरा है। लेकिन क्या उससे बड़ा खतरा वो समाजवादी वो सेकुलर चेहरे हैं जो मौका परस्त फिलहाल नजर आ रहे हैं जिनके लिए सिर्फ हार और जीत सबसे अहम और सबसे जरूरी चीज बनकर रह गई है ना कि आईडियोलॉजी। फिलहाल टीएमसी के की मैं बात कर रही हूं। हमने आपने देखा कि कैसे पश्चिम बंगाल का इलेक्शन हुआ और पश्चिम बंगाल के इलेक्शन के बाद 1 महीने भी जो पार्टी के सांसद हैं और एमएलए हैं वो टीएमसी या ममता बनर्जी के साथ नहीं टिक पाए। उन्होंने एक अलग पार्टी बना ली और उस पार्टी का एक तरह से हम कह दें कि बीजेपी में विलय हो गया है या वह तमाम सांसद बीजेपी में चले गए हैं तो गलत नहीं होगा क्योंकि जो दिखाया जा रहा है वो जाहिर सी बात है सबको पता है कि वो एनडीए को सपोर्ट करने जा रहे हैं यानी कि वो बीजेपी के साथ खड़े हैं। यह वही लोग हैं और उनमें से स्पेशली मैं सयोनी घोष की मैं बात करूंगी जो आंखों में मदीना दिल में काबा की बात करती थी और फिर उसको चैलेंज किया योगी आदित्यनाथ ने। उन्होंने कहा यह काली की धरती है। काबा और मदीना की धरती नहीं है। आज उन्हीं ताकतों के साथ वो खड़ी हुई नजर आ रही हैं। यूसुफ पठान जैसे लोग जिनके वालिद मौजिन रहे। जिन्होंने मस्जिदों में झाड़ू लगाई। वहां पर खिदमत की। बच्चों को पालापसा बड़ा किया। एजुकेशन उनको दी, काबिल बनाया। आज जब वो पॉलिटिक्स में गए हैं तो देखिए चंद दिन भी वो नहीं टिक पाए और बीजेपी का दामन उन्होंने एक तरह से थाम लिया है। देश की सियासत आखिर कहां जा रही है? सवाल ये है जो सेुलर जो बड़ा तबका है देश का जो मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, आदिवासी हैं, जिन्होंने इन पॉलिटिकल पार्टीज पर यकीन किया, इन चेहरों पर यकीन किया, उनके साथ क्या यह गद्दारी नहीं है? क्या उनके साथ यह सबसे बड़ा धोखा नहीं है? और सबसे बड़ा सवाल यहां पर मुसलमानों की की आइडेंटिटी, उनकी सियासत और वो किस पार्टी को चुने, किधर देखें और किधर जाएं इस पर आकर टिक गया है। क्योंकि जुल्मो सितम की तमाम इंतहा फिलहाल मुसलमानों के साथ पार की जा रही है। हर गली नुक्कड़ चौराहे पर वो पीटा जा रहा है। जलील किया जा रहा है। उसे सेकंड क्लास सिटीजन बना दिया गया है। उसके हुकूक उससे छीने जा रहे हैं। और जब वो देखता है दो तरफ वो देखता है। एक सुप्रीम कोर्ट की तरफ और दूसरे इन पॉलिटिकल पार्टीज की तरफ। लेकिन इन पॉलिटिकल यही पॉलिटिकल पार्टीज जो सेकुलरिज्म के नाम पर समाजवाद के नाम पर जो इन लोगों की वोटों की ठगी करती हैं। देखिए वो इलेक्शन जीतने के बाद उन्हीं राइट विंग पार्टीज या उन्हीं ताकतों के साथ खड़ी हुई नजर आती हैं। आज इसी पर हम चर्चा करेंगे। इसी पर हम बात करेंगे और इसलिए भी यह बहुत जरूरी हो जाता है क्योंकि आने वाले वक्त में इलेक्शन है पंजाब का और पंजाब से कहीं ज्यादा जरूरी इलेक्शन है उत्तर प्रदेश का जहां पर बड़ी तादाद है मुसलमानों की जहां से मैं भी आती हूं और जहां से जो मेरे आज के मेहमान हैं वो भी आते हैं। बेहद खास मेहमान मेरे साथ आज जुड़ गए हैं कुर्बान अली साहब जिन्हें इंट्रोडक्शन की कोई जरूरत नहीं है। 40 साल से ज्यादा उनका सहाफत का उनका तजुर्बा है। सहाफत में वो रहे हैं। बीबीसी में रहे हैं। कई बड़े चैनल्स के एडिटर वो रहे हैं और उन्होंने देश की सियासत को बनते बिगड़ते राइट विंग का उरूज होते जवाल होते समाजवाद का उरूज और जवाल होते सबको उन्होंने बहुत बारीकी से देखा है और अभी भी उस पर काम कर रहे हैं। कुर्बान साहब बहुत-बहुत इस्तकबाल आपका नाउज़ नेटवर्क में। बहुत शुक्रिया गुशरा आपका भी। कुर्बान साहब सबसे पहले मैं आपसे ये जानना चाह रही हूं कि इस वक्त की सियासत को आप कैसे देख रहे हैं? कैसे आंक रहे हैं? क्या जो यह लगातार एक एक विश्लेषण एक तजिया यह किया जा रहा है कि अब आखिरी उम्मीद देखिए कांग्रेस ही बची है। यह कहते हुए लोग नजर आ रहे हैं। लेकिन क्या जो फिलहाल देश का हाल है क्या उसके लिए खुद कांग्रेस ही जिम्मेदार नहीं है? मिश्रा अभी आपने अपने इंट्रोडक्शन में जो एक पूरा बैकग्राउंड दिया उसमें असल में ये जो आज सियासत हो रही है ये सिर्फ आज हम इस किसी नतीजे पर पहुंच जाए। उतना नहीं है काफी बल्कि इसके लिए हमें माजी में भी देखना पड़ेगा। कम से कम चार पांच डिकेड की जो सियासत इस मुल्क में हुई है खास करके 1980 के बाद तो इन 40 45 साल की सियासत में उसके पहले तक सियासत में एक आईडियोलॉजी होती थी। विचारधारा होती थी। लोग उसके साथ रहते थे। हालांकि जब दल बदल होता था तो कन्वीनिएंटली वो फिर विचारधारा भी बदल जाती थी। लेकिन इतनी बेशर्मी नहीं थी जितनी आज है। और इसकी वजह यह है कि सियासत में एक जमाना था मुल्क की आजादी के बाद वो लोग थे जिनका नेशनल मूवमेंट की वैल्यूस में यकीन था जो नेशनल मूवमेंट की आइडियोलॉजी थी उसमें यकीन था जिस पर इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन बना है। और थोड़ा सा आंख की शर्म भी थी। लेकिन जब एक टर्म इस्तेमाल होता है सियासत में अक्सर आया राम गया राम वो हरियाणा से शुरू हुआ था और वो जब होने लगा कि आप कन्वीनिएंट के लिए अपनी आईडियोलॉजी बदल ले अपनी सियासी पाला बदलने को आप आईडियोलॉजी का जामा पहना दे या कोई और रीजन दे दे तो वो शुरुआती दिनों में होते थे लेकिन अब तो यह है कि बिल्कुल जैसे बाजार लगता है, पशु मेला लगता है, उसमें खरीदो फरोख्त होती है। उस तरह से हम खरीद फरोख्त होते हुए देख रहे हैं या लोगों को बदलते हुए देख रहे हैं। आप ने जिक्र किया बंगाल का। बंगाल में ममता बनर्जी ने तीन जनरल इलेक्शन लगातार जीते। थंपिंग मेजॉरिटी के साथ जीते। पहले इलेक्शन में उनका मुकाबला वहां की लेफ्ट फ्रंट हुकूमत से था। लेफ्ट फ्रंट को उन्होंने शिकस्त दी। लेकिन उसके बाद जो दो इलेक्शन थे उनमें उन्होंने बीजेपी का मुकाबला किया। पुरजोर मुकाबला किया और इस इलेक्शन में भी जिनको मैं तो मानता हूं कि वो हारी नहीं है हराया गया है 41स से ज्यादा वोट उन्होंने हासिल किया और ये सारे लोग जो आज उनके जहाज से चूहे कूद करके जा रहे हैं वो एक हफ्ते पहले तक या इलेक्शन नता आने के दिन तक उनको ममता बनर्जी से जो आज शिकायतें हैं वो उस वक्त नहीं थी या उनके अंदर हिम्मत नहीं थी तो नतीजा यह हुआ कि आज ऐसा लगा कि वो ताश के पत्तों की तरह से पूरी पार्टी जो कि पिछले 20-25 सालों से ममता बनर्जी ने अपने खून पसीने से बनाई थी वो खत्म होती हुई नजर आ रही है। ये एक मिसाल है। ये सिर्फ बंगाल में नहीं हो रहा है। ये हर जगह हो रहा है। आपने देखा कर्नाटका और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की चुनी हुई सरकारें थी। उनके एमएलए को तोड़ करके खरीद करके और वहां सरकारें बदल दी गई। इसके अलावा और कई रियासतों में ये हुआ है। तो ये एक मामूल बन गया है। इसकी एक बड़ी बुनियादी वजह तो आईडियोलॉजी का खत्म होना है। उससे जो कमिटमेंट था लोगों का वो खत्म हो गया। और दूसरे पिटिकल पार्टियां जो है वो प्राइवेट लिमिटेड कंपनियां बन गई हैं। और उसमें एक ही नारा है लव मी एंड लव माय लास्ट। कश्मीर से कन्याकुमारी तक कच्छ से कोहिमा तक और उससे कोई पार्टी पहले यह इल्जाम सिर्फ कांग्रेस पार्टी पर लगता था नेपोटिज्म का परिवारवाद का। लेकिन आज तो बीजेपी भी उससे अछूती नहीं है। लेफ्ट पार्टीज भी अछूती नहीं है। और बाकी जो पार्टियां है चाहे वो लालू प्रसाद की पार्टी हो, चाहे वो मुलायम सिंह की पार्टी हो, चाहे वो देवीलाल की पार्टी हो या बीजू पटनायक की वो सब प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में एक तरह से तब्दील हो गई है और वहां आप अपने जमीर के साथ में नहीं रह सकते। जी कुर्बान साहब लेकिन ये जो आइडियोलॉजिकल पतन है इसको आप कैसे देख रहे हैं? फिलहाल क्या यह अभी देश की सियासत के लिए सबसे बड़ा चैलेंज यही आपको लग रहा है फिर वो लोग जो सेुलर भारत में जिनका यकीन है वो मुसलमान दलित आदिवासी वो क्रिश्चियंस वो सिख जो बीजेपी से अलग उन पार्टियों को चुनना चाहते हैं उन उनको सत्ता में बने रहना या सत्ता में लाना उनको चाहते हैं तो फिर उनके लिए क्या ऑप्शन बचा है वो तो एक तरफ देख रहे हैं कि एसआईआर के नाम पर क्या कुछ उनके साथ हो रहा है कि सरकार अब चुन रही है कि कौन उनका वोटर होगा और कौन नहीं होगा। एक तो यह उनके साथ हो रहा है। दूसरी तरफ किसी को भी लिस्ट से बाहर करके उनका वोट जो सबसे महत्वपूर्ण उनका हक है वो उनसे छीना जा रहा है। और तीसरा जब इस तरह के नुमाइंदों को वो जीताकर पार्लियामेंट में या असेंबली में भेज रहे हैं तो वो कुछ वक्त भी नहीं लगाते और फिर वो बीजेपी के पाले में जा रहे हैं। तो ये जो पॉलिटिकल क्राइसिस है इसको आप कैसे देख रहे हैं और क्या अभी सबसे महत्वपूर्ण क्या ये एक आईडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर ही आपको नजर आ रही है? हां काफी हद तक आपने सही कहा। असल में देखिए 204 का लोकसभा इलेक्शन आप देखें तो उसमें सबसे बड़ा इशू क्या था? मुद्दा क्या था? मुद्दा था कि इस देश में संविधान बचेगा या नहीं बचेगा? क्योंकि जो करंट डिस्पेंसेशन है जो उस वक्त भी पावर में था उसके कई नेताओं ने यह बात कही कि अबकी बार 400 पार और 400 पार का मतलब ये था कि हम 400 पार अगर हो जाएंगे लोकसभा में तो फिर हम इस देश के संविधान को बदलेंगे जो कि जिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला है कि इसके बेसिक टेनेंट्स को नहीं बदला जा सकता। चाहे जितनी बड़ी आप बहुमत लोकसभा में आ जाए, राज्यसभा में आ जाए, आप 100% भी आ जाए तब भी आप जो उसके बेसिक स्ट्रक्चर है केशवानंद भारती मामले में उसको स्पष्ट कर दिया गया। लेकिन अफसोस की बात यह है कि जो पार्टी इस वक्त सत्ता में है उसने ना तो कभी इस देश के संविधान को दिल से कुूल किया और ना ही डेमोक्रेसी को सोशलिज्म को सेकुलरिज्म को बल्कि सोशलिज्म और सेकुलरिज्म दो ये उनके लिए तो ऐसे स्टिग्मा है कि वो कहते रहे हैं बहुत जमाने से कि इनको कॉन्स्टिट्यूशन के प्रएमबल में जबरदस्ती शामिल किया गया। अंबेडकर ने जो संविधान बनाया था। उसके प्रबल में ये दोनों शब्द नहीं थे। टेक्निकली ये बात सही है कि ये इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में संविधान में संशोधन कर इन दोनों शब्दों को शामिल किया। लेकिन हमारा संविधान है क्या? उसकी बेसिक स्पिरिट क्या है? वो यही है के सबसे पहले तो डेमोक्रेसी वो सबसे सुप्रीम है। वो होगी होनी चाहिए। और उसके अलावा अगर आप इन दो शब्दों का भी इस्तेमाल ना करें तो बंधुत्व की बात करते हैं, भाईचारे की बात करते हैं उसका कॉन्स्टिट्यूशन का प्रबल और उसी पर ये देश पिछले 80 वर्षों में जब से आजाद हुआ है तब से चला है। लेकिन जिन लोगों का इसमें यकीन नहीं है जो कांग्रेस पार्टी और इंदिरा गांधी पर ये आरोप लगाते थे जब इमरजेंसी इंदिरा गांधी ने लगाई थी कि साहब उन्होंने तानाशाही थोप दी देश पर सेंसरशिप लागू कर दी पिटिकल पार्टीज के वर्कर को जेल में डाल दिया लेकिन अभी तो हम देख रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने तो जो कुछ किया वो घोषित तरीके से किया और उसकी सजा भी उन्हें 77 में मिली जब उनको वो खुद चुनाव हार गई और पूरे उत्तर भारत में उनका सफाया हो हो गया। लेकिन जो लोग उस वक्त उनसे लड़ने की बात करते थे और जो आज सत्ता में बैठे हुए हैं वो ना तो डेमोक्रेसी में यकीन करते ना सोशलिज्म और सेकुलरिज्म में और बाकी संविधान के हिस्से में और इसका भी मजा उन्हें खास करके उत्तर प्रदेश के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब 43 सीटें वो हारे थे। लेकिन अब हो ये गया है कि लोग इंसल्ट प्रूफ हो जाते हैं जरा खाल मोटी हो जाती है तो वो इन सारी चीजों को जैसे इंग्लैंड में जहां से हमने ये डेमोक्रेसी या कैबिनेट सिस्टम लिया है वहां संविधान लिखा हुआ भी नहीं है लेकिन रिवायतों पे ही चलता है ट्रेडिशन पे ही चलता है इतनी मजबूत वहां की डेमोक्रेसी है लेकिन हम अफसोस कि उस अपनी डेमोक्रेसी को मजबूत नहीं कर पाए और अबकि जब सीधा ये सियासत एक बिजनेस का रूप उसने ले लिया है अब हर हर आदमी जो सियासत में आता है उसकी उसको आप उससे पूछिए कि आपकी आईडियोलॉजी क्या है? तो कहेगा साहब हम तो एमपी एमएलए बनने के लिए आते हैं। मिनिस्टर बनने के लिए आते हैं। आज एसपी में है कल बीएसपी में है। परसों बीजेपी में है उसके बाद कांग्रेस में आ जाएंगे। और कोई पूछने वाला नहीं है कि भाई आप तो यह जैसे जूते बदले जाते हैं या कपड़े बदले जाते हैं उस तरह से अपनी आईडियोलॉजी बदल रहे हो जिसका अभी सामने नमूना हमको बंगाल में देखने को मिल रहा है ताजा तरीन उदाहरण वो हो गया और ये देश के लिए एक बहुत बड़ा गंभीर खतरा है क्योंकि अगर लोकतंत्र नहीं बचा इस देश में तो फिर कुछ नहीं बचेगा संविधान की बैकबोन बुनियाद जो है वो डेमोक्रेसी पर है और डेमोक्रेसी जिस तरह से जिस विकृत रूप में हमारे सामने आ रही है। यानी राज्यसभा इलेक्शन होते हैं उसमें पर्चे खारिज कर दिए जाते हैं या कि खारिज करवा दिए जाते हैं या जो रूलिंग पार्टी से जिनका ताल्लुक होता है उसका खराब पर्चा भी सही पर्चे में तब्दील हो जाता है और फिर खरीदफरोख्त होती है। हमने उत्तर प्रदेश में देखा हमने हिमाचल प्रदेश में देखा। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी सत्ताधारी पार्टी और उसके बड़े नेता अभिषेक मनु सिंह भी चुनाव हार गए वहां क्योंकि बीजेपी ने खरीदफरोख्त की थी और काफी कांग्रेस के एमएलए को तोड़ लिया था वही हमको अभी हाल में मध्य प्रदेश में देखने को मिला जब मीनाक्षी नटराजजन का पर्चा खारिज हुआ और इस तरह की चीजें कोई ये एक दो उदाहरण नहीं है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण है। पिछले 12 सालों में हमने देखा है कि इस मुल्क की सियासत को जिस तरह से चलाया जा रहा है, उसमें यही है कि यह इमर घोषित इमरजेंसी है। उससे बुरे हालात है। जो मेन स्ट्रीम मीडिया है उसमें आप अपनी बात नहीं कर सकते। अदालतों से इंसाफ नहीं मिल रहा है। सिविल सोसाइटी कुछ बहुत ज्यादा अपने हक के लिए आगे नहीं आ पा रही क्योंकि सबको ये डर है कि जेल में डाल दिया जाएगा। ईडी सीबीआई और दूसरी एजेंसियों का जिस तरह से इस्तेमाल हो रहा है तो बहुत ही खतरनाक सूरते हाल है इस वक्त हमारे मुल्क की। जी कुर्बान साहब लेकिन यहां सवाल मुसलमानों का है क्योंकि मुसलमान जिसको देश का एक परमानेंट दुश्मन बना दिया जाता है बना दिया गया है और हर गली नुक्कर चौराहे पर वो पीट-पीट कर मार दिया जाता है या फिर उसको पीटा जाता है। उसके घर बुलडोज हो रहे हैं। उसकी मस्जिदें ढाई जा रही हैं। किसी भी इल्जाम में किसी भी झूठे इल्जाम में उसको जेल में डाल दिया जाता है। मजलूम को ही जालिम बताकर उसके साथ यह सब जो बर्बरता जो है वह की जा रही है। ऐसे में दो चीजें होती हैं। एक तो वो अदालतों से इंसाफ की उम्मीद लगाता है कि अदालतों में हम जाएंगे तो हमें इंसाफ मिलेगा या दूसरा उसे लगता है कि सत्ता परिवर्तन होगा तो हमारे लिए शायद इंसाफ की कोई गुंजाइश बनेगी। अगर कोई सेकुलर पार्टी या समाजवादी या इस तरह के कोई दल जो है वो सत्ता में आते हैं। चाहे राज्य में हो या फिर केंद्र में हो। अभी मुसलमानों के इस पॉलिटिकल सवाल को आप कैसे देख रहे हैं? क्योंकि जिन नुमाइंदों को वो चुनकर भेज रहे हैं, वो अगर बीजेपी में शामिल हो रहे हैं। यानी कि उनकी इंटेंशन कभी भी उनके मुद्दों को लेकर या उनके ऊपर होते हुए जुल्म को लेकर कभी साफ थी ही नहीं। अगर साइं घोष जो काबा और मदीना की जो बात करती थी उनका वो बहुत वीडियो वायरल हुआ। लोगों ने बहुत उन्हें पसंद किया। वो अलग-अलग तरह की बातें करती थी। अगर वह तक भी बीजेपी का दामन थाम ले इनडायरेक्टली तो फिर मुसलमानों के लिए क्या आप फिलहाल पॉलिटिकल ऑप्शंस देखते हैं? इसमें मैं एक और चीज यहां पर ये जोड़ना चाह रही थी कि जब एआईएमएम जैसी पार्टियां अगर वो आती हैं तो उन्हें फौरन बीजेपी की बी पार्टी कह दिया जाता है। कम से कम वो अलग से चुनाव तो लड़ रही हैं। बीजेपी के साथ मिल तो नहीं रही या बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव तो नहीं लड़ रही या जीतने के बाद उसमें शामिल तो नहीं हो रही। क्या इन पार्टियों को बी पार्टी ना कहा जाए? फिर कि आप तो आप लड़ी इस तरह से और फिर शामिल भी हो गए आप। मिश्रा आपके इस सवाल में कई सवाल है। सबसे पहले तो जो सुरते हाल है तो वो इसलिए है कि इस मुल्क में जो रूलिंग पार्टी है उसकी जो आइडियोलॉजी है उसका उसके पीछे जो ऑर्गेनाइजेशन है वो 100 साल से इस कोशिश में लगा हुआ था कि इस मुल्क को हिंदू राष्ट्र बनाना है। वो डीफ्टो उन्होंने बना दिया। डीजरे वो भले ही ना बना पाए हो और उसमें बहुत साफ है खुला एजेंडा है ब्लेटेंट कम्युनल एजेंडा और ये फाशिज्म हैज्म की तरफ मुल्क को ले जा रहा है क्योंकि देखिए हमारी जो हमारा जो मुल्क था और उसने जो कॉन्स्टिट्यूशन अडॉप किया था बंटवारे के बाद पाकिस्तान बन जाने के बावजूद कि हम इस मुल्क को दूसरा पाकिस्तान नहीं बनने देंगे। यहां हर शरी के अख्तियारात बराबर होंगे। हर नागरिक के अधिकार बराबर होंगे। किसी को धर्म, जाति, भाषा और भूषा और खानपान के नाम पर जो है वो आइडेंटिफाई नहीं किया जाएगा और उसके साथ डिस्क्रिमिनेशन नहीं किया जाएगा। लेकिन जो पिछले 12 साल की सियासत है शुरुआती दिनों में तो हमने देखा कि जो गवर्नमेंट बनी थी वो उसमें कुछ मुस्लिम चेहरे भी शाम मिसाल के लिए होते थे कि साहब दो तीन मंत्री बना दिए या दो तीन सांसद। पिछले पांच छ साल से तो आप देखिए कि एक-एक करके उसको हटा दिया गया। आज 240 से ज्यादा सांसद बीजेपी के लोकसभा में है और लगभग 100 से ज्यादा सांसद राज्यसभा में है। उनमें एक भी मुसलमान नहीं, एक भी ईसाई नहीं, एक आध शायद गलती से सिख हो। तो वो जो डेमोक्रेसी की बेसिक रिक्वज़िट है, शर्त है कि ये इंक्लूसिव डेमोक्रेसी होनी चाहिए। पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी होनी चाहिए। वो कहीं नजर नहीं आती। उसकी वजह यही है। वो यह कहते हैं कि साहब मुसलमान हमें वोट नहीं देता और हम जिन मुसलमानों को उम्मीदवार बनाते हैं वो चुनाव नहीं जीत पाते। उनको वोट नहीं मिलता। इसलिए हम उनको टिकट नहीं देते। यह बात बीजेपी कहती है तो बात समझ में आती है कि उनका एक खुला साफ एजेंडा है। उन्होंने पिछले 100 साल से यही बात कही है कि यह देश हिंदुओं का है। वही नंबर एक के शहरी बन के रहेंगे और इसीलिए वो संविधान को भी दिल से नहीं मानते। लेकिन एक मजबूरन उन्होंने कहा दुनिया को दिखाने के लिए इस लवादे को उड़े रखिए। इसमें हर्ज क्या है? हमने डिफेक्टो तो बना ही दिया है जो आपने सारी चीजें गिनाई ना सिर्फ मुसलमान के बारे में बल्कि सारे माइनॉरिटीज के बारे में चाहे वो सिख हो ईसाई हो और जैन बौद्ध तक भी अब बात आने लगी है किसानों का आंदोलन हुआ तो हमने देखा कि किस तरह से सिखों को पाकिस्तानी और खस्तानी और क्या-क्या नहीं कहा गया। तो ये एक ओवरऑल सिचुएशन अफसोस की बात ये है कि इसका मुकाबला करने के लिए जो अपोजिशन होना चाहिए वो अपोजिशन हमें नजर नहीं आता और उसकी एक बड़ी वजह ये है कि जो नरेटिव सेट कर दिया गया है बीजेपी की तरफ से उसी नरेटिव को हर पिटिकल पार्टी चलाना चाहती है। उसको काउंटर नहीं करना चाहती। मिसाल के तौर पे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया अयोध्या के मामले में। सारी सारी पार्टियों ने उसको वेलकम किया और कहा कि अब ये मामला सेटल हो गया। अब कोई बात नहीं होगी। फिर आया मामला आर्टिकल 370 का। उसमें भी सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आ गया और फिर ये हुआ कि नहीं साहब अब इसकी भी कोई बात नहीं होगी। यूनिफ सिविल कोर्ट पर्सनल लॉ के मामले में भी राज्य सरकारें कानून बना रही हैं। माइनॉरिटीज को छोड़ दीजिए। जो आदिवासी हैं उनकी भी बात नहीं सुनी जा रही है और उनके भी जो अपने पर्सनल लॉस है उनको खत्म किया जा रहा है। तो ये हम बढ़ रहे हैं एक फाज्म की तरफ जिसमें कि एक ही धर्म, एक ही जाति का वर्चस्व, एक ही झंडा, एक ही रंग उसमें कोई दूसरी चीज ना हो। और जाहिर है कि उससे चुनाव जीतने में आसानी होती है। हालांकि अभी एक बड़ी उम्मीद यह है कि इस देश की मेजरिटी जो है वो कम्युनल नहीं हुई है और जो कम्युनल लोग हैं उनकी तादाद 40 फीसदी से ज्यादा ऊपर नहीं बढ़ पा रही है। 60 फीसदी लोग आज भी उनका मुकाबला करते हैं। लेकिन वह सारे लोग बहुत कमजोर हैं। आपने एआईएमएम का जिक्र किया या और दूसरी पार्टियां यह बहुत छोटी जमातें हैं। इनका जो एरिया ऑफ इन्फ्लुएंस है वो कुछ असेंबली सीटों तक या एक दो पार्लियामेंट्री काटसी तक सीमित है। उनका एक्सपेरिमेंट हमने बिहार में देखा। बंगाल में क्या हुआ अभी पता ही नहीं चला कि चुनावों से पहले तो वहां उन्होंने काफी कोशिश की थी। उत्तर प्रदेश में अभी खबर आई है कि वो खम ठोकने वाले हैं। लेकिन वो हमेशा एक मैं मानता हूं कि ऐसी पार्टियां ऐसी सियासी जमातें जो रिलीजन बेस्ड होंगी या कम्युनिटी बेस्ड होंगी वो उनकी ज्यादा एक्सेप्टेंस नहीं हो पाती है। वो अपने छोटे से इलाके में कामयाब हो के अपनी सियासत चला सकती हैं। लेकिन जो यह जो हमारा सेकुलर फ्रेमवर्क है कॉन्स्टिट्यूशन का जब तक हमको उसके अंदर सियासत करनी है और उसमें ना मुसलमान अलग है ना ईसाई अलग है ना सिख अलग है वो उसके लिए एक बड़ी हिंडरेंस प्रॉब्लम रहेगी लेकिन साथ ही साथ आपके सामने एक दूसरी मिसाल भी है अभी हाल ही में पिछले महीने ही केरला में मुस्लिम लीग के 22 उम्मीदवार जीते लेकिन वो मुस्लिम लीग अपने आप को उस तरह से सियासी नारों में या जज्बाती चीजों में नहीं उलझाती है और उसने अपना एक सेकुलर कैरेक्टर बनाया हुआ है। वह लेफ्ट फ्रंट की सरकारों में भी वह पार्टी सरकार में रही है और ये जो कांग्रेस के नेतृत्व वाला मोर्चा है यूडीएफ उसमें भी वो सरकारों में रहती आई है। केंद्र में भी वो जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तो उनके प्रतिनिधि थे उस सरकार में। तो इस तरह का अगर कोई मॉडल एवोल्व हो और अभी तमिलनाडु में भी एक मंत्री बने हैं उस पार्टी से तो उस तरह की जमातें जिनकी एक क्रेडिबिलिटी हो जिनके बारे में ये हो कि साहब ये कम्युनल एजेंडा नहीं चलाती है इनके लिए जज्बाती नारे नहीं है तब मुसलमान की सियासत कारगर और कामयाब हो सकती है। लेकिन खाली जज्बाती इारों पे और पोलराइजेशन करने के मकसद से वो मैं समझता हूं कि एक सुसाइडल होगी आत्मघाती होगी। लेकिन कुर्बान साहब मेरा सवाल यह है कि जब भी इस तरह की जमातें उठ हैं जो मुसलमानों के हुकूक की बात करती हैं उन्हें फौरन दूसरी तरह से कम्युनल बता दिया जाता है या फिर उनको बीजेपी की बी टीम बता दिया जाता है। लेकिन अगर मायावती दलितों की बात करती हैं तो उनके ऊपर इसी तरह के कोई तमगे नहीं लगते हैं या इसी तरह की कोई पार्टियां जो अपने समाज या जाति को लेकर जो बनती हैं उन पर इस तरह के तमगे नहीं लगाए जाते हैं। यही समाजवादी सेकुलर पार्टियां उन्हें उन्हें ना सिर्फ इज्जत से अपने साथ बिठाती हैं बल्कि उन्हें रिप्रेजेंटेशन से ज्यादा रिप्रेजेंटेशन जो है वो दिया जाता है। यही एआईएमएम जो है उन्होंने बिहार में उन्होंने कई बार कहा कि हम इंडिया गठबंधन के साथ अलायंस करना चाहते हैं। उन्होंने कई बार कोशिश भी की लेकिन नहीं हुआ। उन्होंने उत्तर प्रदेश में भी ट्राई किया। यह नहीं हुआ। मैं जाती तौर पर एआईएमएम की पॉलिटिक्स को जाहिर सी बात है ना तो एंडोर्स करती हूं और ना ही उस तरह से यकीन करती हूं। लेकिन जो चीजें सामने हैं, जो तथ्य हैं उनसे इंकार भी नहीं किया जा सकता है। तो अगर कोई पॉलिटिकल पार्टी इवॉल्व हो रही है, आप देखें अगर असदुद्दीन ओवैसी को देखें तो बेस्ट पार्लियामेंटेरियन का उनको अवार्ड कितनी बार मिल चुका है। वो संविधान लोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करते हैं। वो हमने देखा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शायद उनसे बड़ा तो शायद कोई देशभक्त हुआ भी देखा भी नहीं होगा हमें जिस तरह से वो बात कर रहे थे। तो ये सारी पोजीशनिंग भी तो ओवैसी करते हुए नजर आते हैं। फिर उनको कम्युनल उनको बी टीम इस सब का तमगा क्यों उनके साथ लगाया जाता है? और फिर वही वही मेरा घूम फिर का सवाल कि जो समाजवादी सोशलिस्ट और जो इस तरह की सेकुलर जमातें हैं उनके नुमाइंदे अगर जीत के आके सेकुलर वोट के सहारे अगर बीजेपी में शामिल हो जाएं तो वो तो सबसे बड़े गद्दार हुए फिर। मिश्रा देखिए यहां दो चीजें हैं। आपने जिनका जिक्र किया वो जाति वाली पार्टियां है। जातिगत आधारित पार्टियां है और एआईएमएम जो है वो मुसलमान रिलीजन आधारित पार्टी है। वो अगर कम्युनिटी बेस्ड भी अपने आप को कहे तो शायद थोड़ा बेहतर वो उसके बारे में ओपिनियन बनेगी और उसमें दूसरे लोग भी शामिल हो। जाति का जो सवाल है वो इस मुल्क में 5000 साल पुरानी बीमारी है और उससे इस मुल्क में क्रिश्चियनिटी इस्लाम और सिखिज्म जो तीनों धर्म जाति के खिलाफ है बुनियादी तौर पर वो भी इससे अछूते नहीं है। आज ईसाइयों में भी दलित क्रिश्चियंस हैं। दलित मुस्लिम्स हैं। दलित सिख है। लेकिन हमारा कॉन्स्टिट्यूशन दलित सिख को तो एससी एसटी के राइट्स देता है। लेकिन दलित मुसलमानों को और दलित क्रिश्चियंस को नहीं दिया जाता। उनके बारे में कहा जाता है कि ये इस देश के रिलीजन नहीं है। ये बाहर के रिलीजन है और इन रिलीजन में जाति व्यवस्था नहीं है। तो मैं इसको कोई कन्विंसिंग आर्गुमेंट के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहा हूं। लेकिन मैं यह बता रहा हूं आपको कि जो 5000 साल से जिन लोगों के साथ शोषण हुआ है, ज्यादतियां हुई है, जो दलित वंचित समाज के लोग हैं, पिछड़े वर्ग के लोग हैं, उनके लिए कॉन्स्टिट्यूशनल प्रोविजन भी है। आपने देखा कि पार्लियामेंट में और असेंबलियों में भी उनके लिए रिजर्वेशन है। सरकारी नौकरियों में भी उनके लिए रिजर्वेशन है। और मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद तो पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में भी आरक्षण मिला है। लेकिन उसके पीछे स्पिरिट यही थी कि ये लोग क्योंकि हजारों साल से दबाए गए हैं। कुचले लोग हैं इसलिए वो आगे लाए जाए और उसमें फिर जो पिटिकल पार्टीज आती हैं वो जाति की बात करती हैं। धर्म की बात उनमें नहीं होती। एक इंटरवेंशन मैं कर रही थी। लेकिन अगर हम अकाली दल की बात करते हैं तो वो तो सिखों की पार्टी है। पंजाब में है वो पार्टी। तो क्या उसको हम रिलीजन बेस्ड पार्टी बोलेंगे या नहीं कहेंगे? बिल्कुल रिलजन बेस पार्टी है और शिवसेना भी इस तरह से काफी समय तक अपने आप को उसमें मुसलमान कोई होता नहीं था। वो अपने आप को सिर्फ हिंदुओं की पार्टी कहती थी। मेजॉरिटी की पार्टी कहती थी। लेकिन मैं ये आपको बताऊं कि इस देश में राजनीति किस तरह से हुई। 67 में तक पिछड़ों का कोई से नहीं था पॉलिटिक्स में। तो उस वक्त के सोशलिस्ट लीडर राम मनोहर लोहिया ने एक नारा गढ़ा। सोशलिस्टों ने बांधी गांठ पिछड़े पावे 100 में 60 अब 100 में 60 का जो मामला था उसमें पिछड़े भी थे दलित भी थे आदिवासी भी थे महिलाएं भी थी और मुसलमान भी थे स्पष्ट रूप से लिखा गया इन सारी चीजों को और उसके आधार पर नौ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें 67 में बनी और केंद्र में भी इंदिरा गांधी की पार्टी कांग्रेस पार्टी चुनाव हारते हारते बची बहुत बेयर मेंबर मेजॉरिटी उनको मिल पाई और उस वक्त से ये और उसी का उभार था जिसकी वजह से मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद, मायावती, राम विलास, शरद यादव, नीतीश कुमार ये कर्पुरी ठाकुर ये लोग पैदा हुए पिटिकल लीडर्स और इन्होंने ये अपने राज्यों में मुख्यमंत्री भी बने और उनमें से एक चौधरी चरण सिंह छ महीने के लिए सही प्रधानमंत्री भी बन गए। लेकिन धर्म के आधार पर राजनीति आज होना इस मुल्क में बिल्कुल असंभव है। और मैं मानता हूं कि वो होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि जब आप उसकी बात करते हैं तो एक तरह से बीजेपी को जस्टिफिकेशन देते हैं कि अगर धर्म के आधार पर ही राजनीति होनी है और पॉलिटिकल पार्टियां बननी है तो फिर बीजेपी का जस्टिफिकेशन जरूरी है जो कि कॉन्स्टिट्यूशन के तहत लीगल नहीं है। वो बातें करना ये सारी बातें और जो हेट स्पीच हेट क्राइम जो आपने अपने इंट्रोडक्शन में जिन बातों का जिक्र किया वो करके तो आप नहीं कर सकते। तो इसलिए जरूरत इस बात की है कि मुसलमान को ये आइडेंटिफाई करना पड़ेगा कि उसका हमदर्द कौन है? उसका मसीहा कौन है? क्या वो लोग उसको वोट के तौर पे इस्तेमाल करते हैं या उनका कोई कमिटमेंट भी है। इसमें ये मैं किसी उस पपस से नहीं कह रहा हूं। लेकिन ये मैं ट्रैक रिकॉर्ड देखने के लिए के मनमोहन सिंह की जब सरकार थी 10 साल तो मुल्क का कम्युनल टेंपरेचर ऑल टाइम लो था। कोई बड़े फसाद नहीं हुए थे। बड़ी इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थी जो पिछले 12 साल से अब देखने को मिल रही है और उन्होंने दो बड़े काम किए। एक सच कमेटी बनाई कि ये पता चले कि भाई मुसलमानों की इस मुल्क में सुरते हाल क्या है? पहली बार हुआ था कि यही कहा जाता था कि साहब नहीं अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में बातचीत होनी चाहिए। मुसलमानों के बारे में नहीं। और दूसरी तरफ जो संघ परिवार और उसके समर्थक दल है वो ये कहते थे कि मुसलमानों का तुष्टीरण हो रहा है। अपीसमेंट हो रहा है। इन्हें सब कुछ मिल गया। लेकिन उस सच्चन कमेटी ने जो पार्लियामेंट में जब टेबल की गई तो उसने सारी सुरते हाल बयान की। उसने कम्युनिस्ट पार्टियों को भी एक्सपोज किया कि बंगाल में सबसे ज्यादा बुरी हालत मुसलमानों की है वो बंगाल में है। जहां 30स से ज्यादा मुसलमान है। तो उसने फिर एक्सपोज कर दिया उस पूरे प्रोपगेंडे को अपीजमेंट को और फिर दूसरा बड़ा काम ये हुआ कि मिनिस्ट्री ऑफ माइनॉरिटी अफेयर्स बनी। हालांकि वो मेरे कई मेरे नजदीक वो नॉन स्टार्टर ही रही है। बन गई है लेकिन उसको खत्म करने की हिम्मत नरेंद्र मोदी हुकूमत में भी नहीं थी और वहां थोड़ा बहुत जो भी कहिए कुछ काम हो रहा है। माइनॉरिटी डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बना है। व से रिलेटेड कुछ चीजें हैं। लेकिन उसमें कम्युनिटी भी का भी एक रोल होना चाहिए। वो नहीं होता है। वो अपने घरों में बैठे हुए हैं कि हम इसमें क्या करें? जो भी सारी चीजें आती है सारी चीजें हम पिटिकल पार्टी सरकार और दूसरे लोगों पर नहीं थोप सकते कि साहब इनकी वजह से हमारे साथ ज्यादती होती है। मेरा सवाल ये है कि आप बहसियत कम्युनिटी क्या कर रहे हैं और अपने राइट्स के लिए लड़ने को आप को किसने रोका? इस मुल्क का आईन आपको ये हक देता है कि आप निचली अदालत से ले सुप्रीम कोर्ट तक जाए। एक बार दो बार तीन बार 10 बार आपकी ये अपीलें खारिज होंगी। लेकिन वो रिकॉर्ड पर तो आएगा मामला। कभी ना कभी तो यह बात होगी कि इस तरह की चीजें होनी चाहिए। आपने जो बात की कि लिंचिंग हो रही है, बुलडोजर चल रहा है। बुलडोजर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया। अब उस पर इंप्लीमेंट इंप्लीमेंटेशन हो पाता है कि नहीं ये देखने का काम तो आपकी सिविल सोसाइटी का भी है। आपके जो लोग मीडिया में है या जिस भी तरह से हैं कंसर्न सिटीजन के तौर पे उनको भी तो आगे आकर के इन बातों को करना चाहिए। हम ये अपने घर में बैठ जाते हैं कि ये सारी चीजें दूसरे जो ह्यूमन राइट्स के ऑर्गेनाइजेशन है वो हमारी बात करें। पिटिकल पार्टीज हमारी बात करें और हम खुद कुछ ना करें। डर और खौफ के हिरास में घर बैठ जाए। ये सुरते हाल इमरजेंसी में भी थी। जब तुर्कमान गेट का कांड हुआ था। बहुत सारे लोग मारे गए थे। मुजफ्फरनगर और कैराना में गोली चली थी। लेकिन वो वक्त चीजें थी और लोग उसके खिलाफ निकल कर के आए। आज अनफॉर्चूनेटली मुस्लिम कम्युनिटी ने ये मान लिया है कि भाई अगर हम कोई भी बात करेंगे तो हमें जेल में डाल दिया जाएगा या हमारे साथ जुल्म ज्यादती की जाएगी। मैं इससे इंकार नहीं करता कि वो हो रही है और बहुत बड़े पैमाने पर हो रही है। लेकिन उससे लड़ने का तरीका वाहिद आपके पास एक हथियार है। वो इस मुल्क का कॉन्स्टिट्यूशन है। वो आपको देता है। आप पिटिकली तरीके से लड़ाई लड़िए। ओवैसी साहब जो लड़ रहे हैं वो लड़ाई किस तरह से लड़ रहे? कॉन्सिट्यूशन के तहत ही लड़ रहे। दूसरी चीज ये कि आपको एनजीओ बना के या ह्यूमन राइट्स ऑ्गेनाइजेशन बना करके या जो है उनके साथ जोड़ के अदालतों में जाने से कौन रोक रहा है? मैं हेट स्पीच के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में गया और वो लोग जो धर्म संसद के नाम पर तूफान बदतमीजी कर रहे थे वो जेल गए। उनको उनके ऊपर पाबंदी लगी। अंकुश लगा और फिर मेरे ही मामले में कुर्बान अली वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि पुलिस और एडमिनिस्ट्रेशन इस बात का इंतजार ना करें के एफआईआर दर्ज होगी बल्कि सो मोटो कॉग्निजेंस ले कहीं भी कोई चीज होती है। तो अभी आपके साथ पास सिवाय इसके और कोई दूसरा हथियार नहीं है। वो कॉन्स्टिट्यूशनल राइट्स का मामला है। उसी को लेकर के आप अपनी बात कह सकते हैं। आप अपनी बात मीडिया तक पहुंचाएं। मीडिया जो सो कॉल्ड सरकारी मीडिया है या गोदी मीडिया है वो आपकी बात नहीं सुन रहा है तो आजकल तो सोशल मीडिया का जमाना है उसप बहुत सारी चीजें आ रही है उसप आप जाए और अदालती लड़ाई लड़े जो राइट्स आपको मिले हुए हैं एक शहरी के नाम पर मैं एक भारतीय नागरिक हूं इसका अधिकार मुझे मिला हुआ है उसके तहत मुझे अपनी बात हर उस फोरम पर कहनी चाहिए जहां सुनी जा सकती हो या अगर नहीं भी सुनी जा रही है तब भी अपनी बात कहते रहना जी क्या आपको ये लग रहा है कि मुसलमानों ने अपनी किस्मत मानकर बैठ गए हैं? क्योंकि जब मैं कई अलग-अलग इस तरह की ह्यूमन राइट्स ऑर्गेनाइजेशन जो हैं उनमें उनको हेड करने वाले या उनमें काम करने वाले लोगों से जब मैं बातचीत करती हूं और मैंने एक एग्जांपल उनको दिया कि अभी हमने मैं दिल्ली राइट्स में के को लेकर मैंने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई है विडोस ऑफ दिल्ली राइट्स और जब मैंने वहां पर देखा तो मुझे लगा कि इतना पुअर डॉक्यूमेंटेशन है कि एक-एक विडो को हम बात करने के के लिए उन तक पहुंचने के लिए हमें कितनी मशक्कत करनी पड़ी और उसके बाद भी अभी तक भी टोटल काउंट भी नहीं है हमारे पास कि आखिर कितनी विडोस हैं और जब इस और जब आप जाते हैं 1984 की जब हम बात करें और सिख दंगों की जब हम बात करते हैं आप उन कॉलोनी में आप वहां पर चले जाएं तो उनकी पॉलिटिकल एजेंसी भी है। उनके पास सारा डॉक्यूमेंटेशन भी है। वहां पर जाकर अभी भी उनको लेकर डॉक्यूमेंट्रीज बनाई जाती है। उनको लेकर बातचीत होती है। आई नो इन दोनों का कंपैरिजन नहीं किया जा सकता क्योंकि वो इससे कहीं ज्यादा बड़े साने था। लेकिन इसी तरह के बहुत सारे जो राइट्स हैं, प्रोग्राम है वो मुसलमानों को लेकर हुए हैं। तो क्या आपको लगता है कि ये जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं या ह्यूमन राइट्स जो ऑर्गेनाइजेशंस हैं या इस तरह के एनजीओस हैं या फिर जो मिली जमातें हैं या फिर जो इसी तरह के जो रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशंस हैं क्या वो भी अपना काम उस तरह से नहीं कर पा रही हैं? अगर आप एक इंडिविजुअल की के हैसियत को अगर आप साइड में रख भी दे तो बिल्कुल सही कहा आपने और आपने अपने सवाल में ही जवाब भी दे दिया कि 84 का एक वाकया है सानिया है सिकों का लेकिन वो आज तकरीबन 40 साल हो गए हैं वो इस बात को भूले नहीं है और हर जब 31 अक्टूबर और 1 नवंबर आता है तो प्रदर्शन होते हैं धरने होते हैं या किसी भी तरह से उस बात को लाया जाता है कि इतना बड़ा कांड हुआ था। इसी तरह से गुजरात राइट्स गुजरात राइट्स के वक्त में तीसरा सीटल वार्ड और उनका जो ऑ्गेनाइजेशन है सीजेपी उसने जितना बड़ा काम किया उसमें बीियों मुकदमों में सजाएं हुई मिनिस्टर रैंक के लोग जेलों में रहे महीनों और सालों रहे तो ये एक ऐसी चीज है के ये आपको कुछ पेशर खुद भी करनी पड़ेगी मायूस हो के घर बैठ जाए और इस उम्मीद पे कि दूसरे लोग आपका काम करें दूसरे लोग आपके कॉज को उठाएं वो वो अब बहुत ज्यादा चलने वाला नहीं है। उसके लिए खुद आपको भी आगे आना पड़ेगा। बिल्कुल आपने सही मिसाल दी दिल्ली दंगों की। लेकिन एक दिल दंगा आप पिछले 40 45 सालों में मैंने तो मलियाना और हाशिमपुरा के दंगे कवर किए हैं। भागलपुर का दंगा कवर किया है। उस जमाने में और मुल्क के बहुत सारे हिस्सों में दंगे हुए। सूरत में हुआ, अहमदाबाद में हुआ। बहुत सारे नाम मैं गिना सकता हूं कि जिनका डॉक्यूमेंटेशन होना चाहिए था वो नहीं हुआ। उसकी वजह से कोई मुकदमे दर्ज नहीं हुए। जो कंपनसेशन का प्रोसीजर है वो नहीं हुआ। लेकिन एक मिसाल मैं आपको दूंगा। दो बहादुर महिलाएं दिल्ली की वकील वृंदा ग्रोवर और रिबेका जॉन उन्होंने हाशिमपुरा के मामले को पिलर टू पोस्ट लड़ा और उसमें उन्होंने सजाएं भी दिलवाई उन दोषी पुलिसकर्मियों को जिन्होंने 50 मुस्लिम यूथ को घरों से पकड़ के मारा था और नहर में फेंक दिया था और उनको 2020 लाख का कंपनसेशन मिला। वही काम वही बराबर के मलियाना गांव में नहीं हुआ जहां एक दिन बाद 70 मुसलमान मारे गए थे क्योंकि उसका कोई डॉक्यूमेंटेशन नहीं हुआ कोई मुकदमा नहीं हुआ उसकी कोई पैरवी नहीं हुई और यही भागलपुर का है कि जहां 3000 से ज्यादा लोगों को जिंदा जला दिया गया या नेली का मसे का तो मैं ये कह रहा हूं कि ये तो आपकी सोशल रिस्पसिबिलिटी भी है। आपकी जो जो मिल्ली इदारे क्या कर रहे हैं मैं नहीं जानता लेकिन आपको सोशली ये काम करने से कौन रोक रहा है क्यों नहीं लोग आते हैं ये सारी चीजों का डॉक्यूमेंटेशन करते हैं और उसमें डॉक्यूमेंटेशन कभी रायगा नहीं जाता हमेशा उसका फायदा होता है उससे चीजें रहती है और कम से कम रिकॉर्ड पर रहती है और कुछ भी ना हो तो ये बताने के लिए कि ये जुल्म हुए हैं ये ज्यादतियां हुई है बिल्कुल आप इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं इस पर बहुत सारे लोगों को बहुत ऐतराज भी हो सकता है कि आप आप जो है जिम्मेदारी जो सरकारों की है, जिम्मेदारी जो पिटिकल पार्टीज की है, जो इस सिस्टम की है, जो एक लोकतंत्र का पूरा निजाम है, आप वो जिम्मेदारी एक सिटीजन के ऊपर ही डाल रहे हैं। नहीं नहीं है ऑन मिश्रा मैं ये नहीं कह रहा हूं कि मैं बरी उस जमा नहीं कर रहा हूं हुकूमतों को या सियासी जमातों को। उनका काम है उनको करना चाहिए और नहीं कर रहे हैं। इसीलिए तो हम और आप यह डिस्कशन कर रहे हैं। लेकिन हम खुद भी क्या कर रहे हैं? हमारी भी कहीं कोई अकाउंटेबिलिटी होगी या कोई एतसाब होगा कि हम भी कुछ हमारा क्या कंट्रीब्यूशन है इस कम्युनिटी के लिए या इस देश के लिए और बात ये है कि आप किसी रिलजन की बात मत करिए आप इस मुल्क के शहरी के होने के नाते से जो आपको मिले हुए हैं उसकी बात कीजिए और उसकी जो उसको जो एनक्रोच किया जा रहा है उसकी बात कीजिए तब आप मुल्क की भी बात करेंगे और कोई स्टिग्मा ये नहीं लगेगा आपके ऊपर कि आप कोई कम्युनल एजेंडा ंडा चला रहे हैं। लेकिन लेकिन कुर्बान साहब अगर आपकी आइडेंटिटी को ही टारगेट करके सब कुछ आपके साथ किया जा रहा हो तो तब कैसे आप सिर्फ अपनी शनाख्त यानी कि आप मुसलमान हैं या आप किस-किस मजहब से हैं उसको साइड में रख के आप ये कैसे कर सकते हैं? क्योंकि जब आपको इंसाफ इसी बिना पर मिल रहा है। अगर अदालतें इस तरह से इंसाफ करें। अगर पिटिकल सिस्टम इसी तरह से काम कर रहा है। अगर जो प्रशासन है उसी तरह से काम कर रहा है। पुलिस उसी तरीके से काम कर रही है तो वो शिनाख तो आपको सबसे आगे रखनी ही होगी क्योंकि उसी के बिना पर तो आपके साथ ये सब कुछ हो रहा है। आप सही कह रही है लेकिन ये हमेशा रहने वाला नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये ये हुकूमत या ये जो सिस्टम है ये हमेशा हमेशा के लिए आ गया है। ये एक अंधेरी रात है। एक बड़ी टनल है। जाहिर है कि इसमें आपको जुल्म और ज्यादतियों का सामना करना पड़ेगा। लेकिन फिर वही फैज की बात के है जुल्म की रात मगर रात ही तो है तो कोई सवेरा तो होगा ऐसा तो नहीं है कि सब कुछ खत्म हो जाएगा और फिर मैं कोई मिसाल के लिए नहीं लेकिन जो गजा में या फस्तीन में हो रहा है कितने साल से हो रहा है पूरी दुनिया के सामने हो रहा है और नहीं कर पा रहे लेकिन उसके बावजूद सरेंडर तो नहीं किया है ना अभी आपने देखा के ईरान इतना कमजोर मुल्क दो महीने उसको बिल्कुल खत्म कर दिया गया लेकिन अमेरिका को उसके साथ समझौता करना पड़ा ना तो यह जब तक स्पिरिट आप अपने अंदर पैदा नहीं करेंगे अगर यह आपने मान लिया डिफिट टेंडेंसी कि नहीं साहब हमारे ऊपर तो जुल्म हो रहा है और हम को तो कोई इंसाफ मिलेगा ही नहीं मेरा सिर्फ इतना कहना है कि इंसाफ के दरवाजे हर आदमी के लिए हर जगह बंद नहीं हुए हैं। इंसाफ अभी लोगों को मिल रहा है। हां उसमें कमी जरूर आई है। लेकिन हमें कोशिश ये करनी चाहिए कि हमें इंसाफ की लड़ाई लड़नी है और कॉन्स्टिट्यूशनली लड़नी है। जी इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं और यही बात रेजिस्टेंस की बात राहुल गांधी ने भी कही है कि अब ये रेजिस्टेंस का दौर है और हमें सबको रेजिस्टेंस जो है वो दिखाना होगा। हम ये देख रहे हैं कि पूरी दुनिया में जो रेजिस्टेंस ताकतें हैं वो जाहिर सी बात है उन पर जुल्म तो हो रहा है लेकिन वही ये भी दिखा रही है कि अगर आप हिम्मत और ताकत के साथ कुत के साथ अगर आप लड़ते हैं झुकते नहीं है भले ही आप कमजोर हो तो वो फरी वक्त के लिए आपकी शिकस्त हो सकती है लेकिन लंबे वक्त में आपको जीत जरूर मिलेगी और ईरान का एग्जांपल आपने बहुत राइटली यहां पर रखा है लेकिन उस ईरान ने सालों अपने आप को तैयार किया है। सवाल यही है कि क्या हमारे देश की जो मुस्लिम मुस्लिम कम्युनिटी है या वो कम्युनिटी जिसके ऊपर जुल्म हो रहे हैं क्या उसने अपने ऊपर सालों काम किया है या सालों आगे अपने ऊपर काम करने के लिए वो तैयार हैं ताकि वो इस तरह के कोई रिजल्ट देख सके ये एक बड़ा सवाल है लेकिन एक सवाल लास्ट मैं आपसे पूछना चाह रही हूं| आने वाले वक्त में उत्तर प्रदेश में चुनाव हैं। अभी मैंने देखा कि अह कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंग की और उस मीटिंग में वह मीटिंग थी उनकी माइनॉरिटी डिपार्टमेंट की जिसमें राहुल गांधी भी मौजूद थे। उसमें सबसे ज्यादा चर्चा एक चीज की हुई और जिससे मुझे हंसी और अफसोस दोनों हुए कि माइनॉरिटी नहीं अब मुसलमान शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा और उसको लेकर बड़ी तारीफें की गई। अब ऐसा लगा कि ना जाने कोई एलियन है जिनको आप इंसान कहने की बात कर रहे हैं कि अब इनको इंसान कहा जाएगा। बिल्कुल उसी तरीके से मुझे लगा एक कंपैरिजन किया जा रहा है। लेकिन फिर भी अभी अगर हम माने तो राहुल गांधी एक शख्स हैं जो लड़ते हुए नजर आ रहे हैं। जिन्होंने मोहब्बत की बात की एटलीस्ट उन्होंने नफरत के इस दौर में वो दिखाया। क्या आप उनको किसी तरीके से एक उम्मीद के तौर पर देख रहे हैं? क्या आपको लग रहा है कि फिलहाल अगर किसी ने आइडियोलॉजिकल कोई स्टैंड लिया हुआ है तो वह राहुल गांधी हैं। मैं पूरी कांग्रेस की बात नहीं कर रही और आने वाले उत्तर प्रदेश के इलेक्शन में मुसलमानों को किस हिकमते अमली के साथ अपनी पॉलिटिकल एजेंसी को चूज़ करना चाहिए। देखिए जहां तक कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी का सवाल है उन्हें यह समझना चाहिए कि जब कांग्रेस पार्टी ने हिंदू मुसलमान की सियासत शुरू की थी जब उन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला खोला गया था उनके जमाने में जब डिस्प्यूटेड साइड पर शिलान्यास हुआ था और उस वक्त के कांग्रेस के नेता राजीव गांधी ने कहा था कि हम रामराज लाएंगे तो उस चुनाव में ना तो उन्हें हिंदू का वोट मिल पाया ना मुसलमान का वोट मिल पाया वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने थे और 89 के बाद इतना अरसा हो गया 36 37 साल कांग्रेस पार्टी ना यूपी में कभी सत्ता में आ पाई ना बिहार में और अन करीब आने के इमकानात भी दिखाई नहीं दे रहे वजह क्या थी कि वो जो गांधी नेहरू और मौलाना आजाद की कांग्रेस थी या सरदार पटेल की कांग्रेस थी उसने कम्युनल इश्यूज पर कॉम्प्रोमाइज किए या के कम्युनल कार्ड खेल के चुनाव जीतने की कोशिश की। तो उनसे दूसरे बड़े लोग आ गए मैदान में। उन्होंने कहा अच्छा आप हमें इस इस फील्ड में हराना चाहते हैं तो हम तो इस मामले में बहुत माहिर हैं। हम तो बहुत आगे चले जाएंगे। तो चुनांचे बीजेपी ने उसी वक्त अयोध्या के राम मंदिर को अब ऑफिशियली अपना इशू बनाया। मेनिफेस्टो में शामिल किया और उसकी फसल उन्होंने काटी। राहुल गांधी को बहसियत एक इंडिविजुअल मैं ये कहूंगा कि वो जो भी कुछ कर रहे हैं कर रहे हैं कर अच्छा कर रहे हैं। लेकिन उनसे यही उम्मीद की जाती है और ये उनका फर्ज भी बनता है ड्यूटी भी बनती है क्योंकि वो लीडर फॉर अपोजिशन है और एक उस पार्टी के जो जिसका सवा सौ साल का 150 साल का इतिहास है कम्युनलिज्म और डेमोक्रेसी पर और सोशलिज्म और सेकुलरिज्म पर स्टैंड लेने का वो उस पार्टी की तर्जुमानी कर रहे हैं। जहां तक दूसरा आपका सवाल था कि मुसलमान को क्या करना चाहिए? क्या था? अगर आप दोबारा रिपीट जी उत्तर प्रदेश आने वाले उत्तर प्रदेश के इलेक्शन में क्या सुरते रहेगी? जी जी तो वो देखिए मुसलमान के वोट से सरकारें बनती और बिगड़ती तो है लेकिन खालिस उसी के वोट पे हो जाएगा। ऐसा कुछ नहीं है। यूपी में 20स वोट है। बिहार में तकरीबन इतना ही है। बंगाल में 30सदी आसाम में 35सदी लेकिन उसका वोट तब रेलेवेंट होता है जब उसके लिए दूसरी सियासी जमाते जो है जिनके साथ दूसरा वोट बैंक भी है वो मिलता है। तब मुसलमान का वोट रेलेवेंट होता है। यह हमने देखा है। जब चाहे एसपी की सरकार हो, बीएसपी की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो, आरएलडी की सरकार आरजेडी की सरकार हो तो उस वक्त में वह हो जाता है। लेकिन जहां जिस मुद्दे पर आपने बातचीत शुरू की थी कि जब आपका एजेंडा ही इस पूरी कम्युनिटी को 20 फीसदी से ज्यादा तबके को आइसोलेट कर देना हो इरिलेवेंट बनाना हो और आपको एक मेजरिटेरियन कमिनल एजेंडा चला करके चुनाव जीतना हो तो फिर यही सूरत बन के आती है जो फिलहाल बनी हुई है। लेकिन मुझे लगता है कि अगर जिस तरह से पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 43 से ज्यादा सीटों पर सेकुलर उम्मीदवार जीते और उन्होंने सोशल जस्टिस के नाम पर कम्युनल फोर्सेस को हराया। अगर उस तरह का कुछ माहौल बनता है तो मुश्किल नहीं है कि यूपी में भी वो बीजेपी को हराया जा सके। अब इसके लिए वोट किस तरह से करना है? टैक्टिकल वोटिंग के लिए मुसलमान बहुत मशहूर है। वो कितना टैक्टिकल कर पाता है या जज्बाती तौर पर जाता है। देखिए वहां आज अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी एक बड़ी फोर्स है। तो उसके साथ रहते हुए आप एक बदलाव की उम्मीद कर सकते हैं। लेकिन अगर खाली कांग्रेस चुनाव लड़े और वो इस बलबूते पर कि मुसलमान का वोट मिल जाएगा और बीजेपी को हरा दिया जाएगा वो संभव नहीं है। तो जरूरत इस बात की है कि एक सेकुलर पार्टियों का महाज बने और उसमें फिर मुसलमान भी उसी तरह से सेुलर तरीके से वोट करें और अपनी से सरकार में भी लाए और पिटिकल पार्टीज में भी लाए तब कुछ बात बन सकती है। जी बिल्कुल देखना होगा कि कितने किस तरह से किस टेक्टिकल वोटिंग जो है वो करता है क्योंकि हमने पश्चिम बंगाल में देखा कुछ नाउदी जरूर हुई क्योंकि जिस तरह से उन्होंने बाबरी मस्जिद की जो बात की दो सीटें वो जीत गए और इसके अलावा भी हमने देखा कि कई जगहों पर बट भी मुसलमानों ने वोट किया ये भी एक बात है कि मुसलमान कोई गाय बकरी भेड़ नहीं है कि हर बस एक ही पार्टी की तरफ उनको पीछे हाक दिया जाए। उनकी भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। उनके लिए भी अलग-अलग चीजें इंपॉर्टेंट होती हैं। लेकिन फिलहाल उनको भी यह समझना बहुत जरूरी है कि उनके लिए जो मसला सारा बनकर रह गया है वो है उनकी जान और माल का मसला कि वो बचेगा तो बाकी तमाम चीजें वो बाद में देख लेंगे। लेकिन ये भी है कि ये जो समाजवादी पार्टी हो चाहे आरजेडी हो ये तमाम पार्टियां भी कहां मुसलमानों के हुकूक के लिए एक लफ्ज या एक लाइन बोलती हुई या उनके लिए कभी कोई आवाज उठाती हुई भी तो नजर नहीं आती हैं। तो मुसलमान भी फिर यह सोचता है कि आखिर कब तक वो इन्हीं पार्टियों पर रिलाई करता रहे और इन्हीं को ही वोट करता रहे और इन्हीं को सत्ता में बिठाए और फिर यही लोग उनकी कभी आवाज ना उठाएं। बहुत-बहुत शुक्रिया कुर्बान साहब। आपने बहुत वक्त दिया और बहुत इंटरेस्टिंग ये कन्वर्सेशन रही। आई एम श्योर कि जो ऑडियंस है उसे काफी कुछ सीखने के लिए मिला होगा। बहुत-बहुत शुक्रिया। आपका भी कुछ थैंक यू सो मच। थैंक यू।

Companion article

The interview opens on a scene from West Bengal. Weeks after Mamata Banerjee's Trinamool Congress won a third straight state election against the BJP, a clutch of its own MPs and MLAs abandoned the party and are widely understood to be headed into the BJP-led NDA. Among them, journalist and Nous Podcast host Bushra Khanam Fahad notes, is the actor-politician Sayoni Ghosh, once celebrated for a viral line about carrying "Mecca and Medina" in her heart, and Yusuf Pathan, the cricketer whose father served as a mosque muezzin. Both, within weeks of an election Trinamool did not so much lose as have taken from it, are aligning with the very political forces that built their campaigns on hostility to India's Muslim minority.

For Qurban Ali, a journalist with more than four decades of experience across the BBC and several national news channels, this is not an aberration but the logic of a political system that has hollowed itself out from within.

A Marketplace, Not a Movement

Ali traces the decay back roughly four to five decades, to the point when Indian politics still ran, however imperfectly, on ideological commitment inherited from the freedom movement and encoded in the Constitution. Defections happened even then — the phrase "Aaya Ram Gaya Ram" was coined in Haryana precisely to describe them — but they came with at least a pretence of principle. "Now it is like a cattle market where people are bought and sold," he said.

The evidence, in his telling, is not confined to one party or one state. Elected Congress governments in Karnataka and Madhya Pradesh were toppled after their MLAs were bought out. In Himachal Pradesh, Congress's own Rajya Sabha candidate lost after BJP engineered defections within his party. In Madhya Pradesh, a Congress candidate's nomination was disqualified on technical grounds while a ruling-party rival's flawed papers were quietly cleared. What was once an accusation levelled only at the Congress — dynastic capture, a politics of personal loyalty over ideology — now describes the BJP, the Left parties, and the regional formations built by figures like Lalu Prasad, Mulayam Singh Yadav and Biju Patnaik alike. "Every party has become a private limited company," Ali said, "and the only slogan left is: love me, love my last."

Whose Emergency Is It

Fahad pressed Ali on whether the current climate — bulldozed homes, demolished mosques, lynchings, and what she called the criminalisation of being Muslim in public space — constitutes an undeclared Emergency worse than the one Indira Gandhi imposed in 1975. Ali agreed substantially, but located the deeper danger in the ruling party's relationship to the Constitution itself. He pointed to the 2024 election slogan "400 paar" — an ambition, made explicit by several BJP leaders, to secure the two-thirds majority needed to rewrite the Constitution's basic structure, a doctrine the Supreme Court fixed in the Kesavananda Bharati case as unamendable regardless of numbers in Parliament.

Unlike Indira Gandhi's Emergency, which was declared and eventually punished at the ballot box in 1977, Ali argued that today's erosion proceeds undeclared: media captured, courts slow to act, civil society intimidated by the threat of prosecution, and investigative agencies deployed selectively. Of the more than 240 BJP MPs in the Lok Sabha and over 100 in the Rajya Sabha, he noted, not one is Muslim, not one is Christian, and perhaps one, by his estimate, is Sikh. "That is not an accident," he said. "It is the design."

Congress's Own Reckoning

Fahad's line of questioning kept returning to whether opposition parties bear responsibility for the vacuum Ali describes, given how readily they abandon secular commitments once elected. Ali did not exempt the Congress. He walked through the party's own history of communal compromise: the reopening of the locked Babri Masjid site under Rajiv Gandhi's government, the shilanyas ceremony at the disputed site, and Rajiv Gandhi's own promise to deliver "Ram Rajya" — a strategy that won Congress neither Hindu nor Muslim votes and cost it power in Uttar Pradesh and Bihar for the subsequent thirty-six years. Having conceded that religious symbolism could win elections, Ali argued, Congress effectively handed the BJP a justification to compete more aggressively on the same terrain, culminating in the Ayodhya movement becoming an official manifesto commitment.

He drew a sharper contrast with the Congress-led government of Manmohan Singh, under which, he said, communal temperatures were at "an all-time low," the Sachar Committee produced the first rigorous official accounting of Muslim socio-economic conditions, and a Ministry of Minority Affairs was created — one that survives, if underpowered, even under the current government.

The "B-Team" Charge, and Its Double Standard

Much of the conversation turned on the political fate of Muslim-interest parties like Asaduddin Owaisi's AIMIM, routinely branded a BJP "B-team" for splitting the anti-BJP vote. Ali resisted the label while declining to endorse AIMIM's politics personally. His argument was one of consistency: AIMIM contests elections independently and has never allied with or joined the BJP, unlike the Trinamool defectors under discussion. Owaisi, he pointed out, has been recognised repeatedly as an outstanding parliamentarian and was among the most vocal defenders of the Indian state during the recent military confrontation invoked as "Operation Sindoor" — a record, Ali argued, that sits uneasily with the communal label attached to him.

He also noted an asymmetry: caste-based parties — Mayawati's politics for Dalits, the Akali Dal for Sikhs, historically even Shiv Sena's explicitly Hindu appeal — are rarely stigmatised the way a Muslim-interest party is, even though caste and religion are, in his account, comparably foundational to Indian social organisation. At the same time, Ali maintained that religion-based politics is neither constitutionally sustainable nor strategically wise for Muslims, since it hands the BJP a rhetorical justification for its own project. What has scaled successfully, he argued, is the Indian Union Muslim League in Kerala, which has governed within secular coalitions — under the Left, under the Congress-led UDF, and in Manmohan Singh's central government — precisely because it built a "secular character" rather than campaigning on emotive religious appeals.

Documentation as a Weapon

One of the interview's more concrete arguments concerned the uneven historical record of anti-Muslim violence. Ali, who reported on the Maliana and Hashimpura massacres and the Bhagalpur riots as a young journalist, contrasted two cases from the same 1987 period. The Hashimpura massacre — in which security personnel abducted and killed Muslim youths, dumping bodies in a canal — was pursued for decades by lawyers Vrinda Grover and Rebecca John, ultimately securing convictions of the accused policemen and compensation for victims' families. The Maliana massacre, in which around seventy Muslims were killed roughly a day later, produced no comparable prosecution, because it was never adequately documented or litigated. The same gap, he said, applies to Bhagalpur, where thousands were killed, and to the 1983 Nellie massacre in Assam.

Ali's point was not to absolve the state of responsibility but to insist that documentation, litigation and organised civil-society pressure are not optional extras — they are what converts injustice into a legal and historical record capable of eventually producing accountability, as his own petition before the Supreme Court did, resulting in a ruling that police and administration must take suo motu cognisance of hate crimes rather than waiting for complaints to be filed.

What Is Left to Do

Toward the close, Fahad asked whether India's Muslims have simply resigned themselves to their circumstances. Ali's answer combined sympathy with challenge. He invoked Faiz Ahmed Faiz's line that a "night of tyranny is still just a night" — implying a dawn will come — while cautioning that resistance requires sustained self-preparation, pointing to Iran's decades of endurance as an example, without endorsing Iran's politics.

Practically, his prescription centred on the courts and the Constitution as the only instruments actually available: pursuing cases up to the Supreme Court regardless of repeated setbacks, building NGOs and human-rights documentation infrastructure, and using social media where mainstream and "godi" (pliant) media will not carry the story. On the coming Uttar Pradesh election, Ali was specific: given that Muslims form roughly 20 percent of the state's electorate and cannot deliver a government alone, their vote becomes relevant only in coalition with a party carrying a substantial additional vote bank — pointing to Akhilesh Yadav's Samajwadi Party rather than Congress contesting alone. He credited Rahul Gandhi personally for standing on constitutional and pluralist ground during what Ali called "the era of hatred," while noting this was an individual judgment rather than confidence in Congress as an institution, given the party had, at a recent internal meeting, congratulated itself simply for deciding to use the word "Muslim" rather than the euphemism "minority."

His closing point returned to the interview's opening theme: Muslims, Dalits and other secular-minded voters cannot outsource their political future entirely to parties that have shown themselves willing to defect the moment power beckons. A durable secular front, built on issues rather than sentiment, remains — in his account — the only viable path back from what he calls this "long, dark tunnel."

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