10:50Why Are Muslim Led Parties Called Communal? | nous Clips
"There is only one effective weapon available for Muslims: the Constitution."
Is Indian politics facing a deep ideological crisis? In this thought-provoking conversation, senior journalist Bushra Khanum speaks with prominent journalist Qurban Ali about the changing nature of politics, the decline of ideological commitment, and the challenges facing Indian democracy today. …
जब इस तरह के नुमाइंदों को वो जिताकरपार्लियामेंट में या असेंबली में भेज रहेहैं तो वो कुछ वक्त भी नहीं लगाते और फिरवो बीजेपी के पाले में जा रहे हैं।इसकी एक बड़ी बुनियादी वजह तो आईडियोलॉजीका खत्म होना उससे जो कमिटमेंट था लोगोंका वो खत्म हो गया और दूसरे पिटिकलपार्टियां जो है वो प्राइवेट लिमिटेडकंपनियां बन गई हैं। तो यह जो पॉलिटिकलक्राइसिस है इसको आप कैसे देख रहे हैं औरक्या अभी सबसे महत्वपूर्ण क्या यह एकआईडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर ही आपको नजर आरही है? अफसोस की बात यह है कि इसकामुकाबला करने के लिए जो अपोजिशन होनाचाहिए वो अपोजिशन हमें नजर नहीं आता औरउसकी एक बड़ी वजह यह है कि जो नैरेटिव सेटकर दिया गया है बीजेपी की तरफ से उसीनैरेटिव को हर पिटिकल पार्टी चलाना चाहतीहै। उसको काउंटर नहीं करना चाहती। अगर जोप्रशासन है उसी तरह से काम कर रहा है।पुलिस उसी तरीके से काम कर रही है तो वोशिनाख तो आपको सबसे आगे रखनी ही होगीक्योंकि उसी के बिना पर तो आपके साथ ये सबकुछ हो रहा है।ये सुरते हाल इमरजेंसी में भी थी जबतुर्कमान गेट का कांड हुआ था। बहुत सारेलोग मारे गए थे। मुजफ्फरनगर और कैराना मेंगोली चली थी। लेकिन वो वक्त चीजें थी औरलोग उसके खिलाफ निकल कर के आए। क्या इनपार्टियों को बी पार्टी ना कहा जाए? फिरकि आप तो आप लड़ी इस तरह से और फिर शामिलभी हो गए आप तोमलियाना और हाशिपुरा के दंगे कवर किए हैं।भागलपुर का दंगा कवर किया है। बहुत सारेनाम मैं गिना सकता हूं कि जिनकाडॉक्यूमेंटेशन होना चाहिए था वो नहीं हुआ।नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज केजरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैंजिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलततरीके से पेश किया जाता है। हम एकइंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारेपीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंगनहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आपचाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीजलगातार आपके सामने आती रहे, तो हमारीवीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयरकरें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगरआपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गएक्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करेंताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लातेरहें और यूं ही काम करते रहें।आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैंहूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद। फिलहाल देशकी सियासत एक अजीबोगरीब मरहले पर आकर अटकगई है। ऐसा लग रहा है कि मानो सामने सिर्फधुंध है और कुछ भी साफ नजर नहीं आ रहा है।राइट विंग का जो इकोसिस्टम है या राइटविंग की जो आईडियोलॉजी है, राइट विंग कीजो पॉलिटिक्स है वो जाहिर सी बात है देशके लिए इस वक्त सबसे बड़ा खतरा है। लेकिनक्या उससे बड़ा खतरा वो समाजवादी वोसेकुलर चेहरे हैं जो मौका परस्त फिलहालनजर आ रहे हैं जिनके लिए सिर्फ हार और जीतसबसे अहम और सबसे जरूरी चीज बनकर रह गई हैना कि आईडियोलॉजी। फिलहाल टीएमसी के कीमैं बात कर रही हूं। हमने आपने देखा किकैसे पश्चिम बंगाल का इलेक्शन हुआ औरपश्चिम बंगाल के इलेक्शन के बाद 1 महीनेभी जो पार्टी के सांसद हैं और एमएलए हैंवो टीएमसी या ममता बनर्जी के साथ नहीं टिकपाए। उन्होंने एक अलग पार्टी बना ली और उसपार्टी का एक तरह से हम कह दें कि बीजेपीमें विलय हो गया है या वह तमाम सांसदबीजेपी में चले गए हैं तो गलत नहीं होगाक्योंकि जो दिखाया जा रहा है वो जाहिर सीबात है सबको पता है कि वो एनडीए को सपोर्टकरने जा रहे हैं यानी कि वो बीजेपी के साथखड़े हैं। यह वही लोग हैं और उनमें सेस्पेशली मैं सयोनी घोष की मैं बात करूंगीजो आंखों में मदीना दिल में काबा की बातकरती थी और फिर उसको चैलेंज किया योगीआदित्यनाथ ने। उन्होंने कहा यह काली कीधरती है। काबा और मदीना की धरती नहीं है।आज उन्हीं ताकतों के साथ वो खड़ी हुई नजरआ रही हैं। यूसुफ पठान जैसे लोग जिनकेवालिद मौजिन रहे। जिन्होंने मस्जिदों मेंझाड़ू लगाई। वहां पर खिदमत की। बच्चों कोपालापसा बड़ा किया। एजुकेशन उनको दी,काबिल बनाया। आज जब वो पॉलिटिक्स में गएहैं तो देखिए चंद दिन भी वो नहीं टिक पाएऔर बीजेपी का दामन उन्होंने एक तरह से थामलिया है। देश की सियासत आखिर कहां जा रहीहै? सवाल ये है जो सेुलर जो बड़ा तबका हैदेश का जो मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़ेहैं, आदिवासी हैं, जिन्होंने इन पॉलिटिकलपार्टीज पर यकीन किया, इन चेहरों पर यकीनकिया, उनके साथ क्या यह गद्दारी नहीं है?क्या उनके साथ यह सबसे बड़ा धोखा नहीं है?और सबसे बड़ा सवाल यहां पर मुसलमानों कीकी आइडेंटिटी, उनकी सियासत और वो किसपार्टी को चुने, किधर देखें और किधर जाएंइस पर आकर टिक गया है। क्योंकि जुल्मोसितम की तमाम इंतहा फिलहाल मुसलमानों केसाथ पार की जा रही है। हर गली नुक्कड़चौराहे पर वो पीटा जा रहा है। जलील कियाजा रहा है। उसे सेकंड क्लास सिटीजन बनादिया गया है। उसके हुकूक उससे छीने जा रहेहैं। और जब वो देखता है दो तरफ वो देखताहै। एक सुप्रीम कोर्ट की तरफ और दूसरे इनपॉलिटिकल पार्टीज की तरफ। लेकिन इनपॉलिटिकल यही पॉलिटिकल पार्टीज जोसेकुलरिज्म के नाम पर समाजवाद के नाम परजो इन लोगों की वोटों की ठगी करती हैं।देखिए वो इलेक्शन जीतने के बाद उन्हींराइट विंग पार्टीज या उन्हीं ताकतों केसाथ खड़ी हुई नजर आती हैं। आज इसी पर हमचर्चा करेंगे। इसी पर हम बात करेंगे औरइसलिए भी यह बहुत जरूरी हो जाता हैक्योंकि आने वाले वक्त में इलेक्शन हैपंजाब का और पंजाब से कहीं ज्यादा जरूरीइलेक्शन है उत्तर प्रदेश का जहां पर बड़ीतादाद है मुसलमानों की जहां से मैं भी आतीहूं और जहां से जो मेरे आज के मेहमान हैंवो भी आते हैं। बेहद खास मेहमान मेरे साथआज जुड़ गए हैं कुर्बान अली साहब जिन्हेंइंट्रोडक्शन की कोई जरूरत नहीं है। 40 सालसे ज्यादा उनका सहाफत का उनका तजुर्बा है।सहाफत में वो रहे हैं। बीबीसी में रहेहैं। कई बड़े चैनल्स के एडिटर वो रहे हैंऔर उन्होंने देश की सियासत को बनतेबिगड़ते राइट विंग का उरूज होते जवाल होतेसमाजवाद का उरूज और जवाल होते सबकोउन्होंने बहुत बारीकी से देखा है और अभीभी उस पर काम कर रहे हैं। कुर्बान साहबबहुत-बहुत इस्तकबाल आपका नाउज़ नेटवर्कमें।बहुत शुक्रिया गुशरा आपका भी।कुर्बान साहब सबसे पहले मैं आपसे ये जाननाचाह रही हूं कि इस वक्त की सियासत को आपकैसे देख रहे हैं? कैसे आंक रहे हैं? क्याजो यह लगातार एक एक विश्लेषण एक तजिया यहकिया जा रहा है कि अब आखिरी उम्मीद देखिएकांग्रेस ही बची है। यह कहते हुए लोग नजरआ रहे हैं। लेकिन क्या जो फिलहाल देश काहाल है क्या उसके लिए खुद कांग्रेस हीजिम्मेदार नहीं है?मिश्रा अभी आपने अपने इंट्रोडक्शन में जोएक पूरा बैकग्राउंड दियाउसमें असल में ये जो आज सियासत हो रही हैये सिर्फ आज हम इस किसी नतीजे पर पहुंचजाए।उतना नहीं है काफी बल्कि इसके लिए हमेंमाजी में भी देखना पड़ेगा। कम से कम चारपांच डिकेड की जो सियासत इस मुल्क में हुईहै खास करके 1980 के बाद तो इन 40 45 सालकी सियासत में उसके पहले तक सियासत में एकआईडियोलॉजी होती थी। विचारधारा होती थी।लोग उसके साथ रहते थे। हालांकि जब दल बदलहोता था तो कन्वीनिएंटली वो फिर विचारधाराभी बदल जाती थी। लेकिन इतनी बेशर्मी नहींथी जितनी आज है। और इसकी वजह यह है किसियासत में एक जमाना था मुल्क की आजादी केबाद वो लोग थे जिनका नेशनल मूवमेंट कीवैल्यूस में यकीन था जोनेशनल मूवमेंट की आइडियोलॉजी थी उसमेंयकीन था जिस पर इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन बनाहै। औरथोड़ा सा आंख की शर्म भी थी। लेकिन जब एकटर्म इस्तेमाल होता है सियासत में अक्सरआया राम गया राम वो हरियाणा से शुरू हुआथा और वो जब होने लगा कि आप कन्वीनिएंट केलिए अपनी आईडियोलॉजी बदल ले अपनी सियासीपाला बदलने को आप आईडियोलॉजी का जामा पहनादे या कोई और रीजन दे दे तो वो शुरुआतीदिनों में होते थे लेकिन अब तो यह है किबिल्कुल जैसे बाजार लगता है, पशु मेलालगता है, उसमें खरीदो फरोख्त होती है। उसतरह से हम खरीद फरोख्त होते हुए देख रहेहैं या लोगों को बदलते हुए देख रहे हैं।आप ने जिक्र किया बंगाल का। बंगाल मेंममता बनर्जी ने तीन जनरल इलेक्शन लगातारजीते। थंपिंग मेजॉरिटी के साथ जीते। पहलेइलेक्शन में उनका मुकाबला वहां की लेफ्टफ्रंट हुकूमत से था। लेफ्ट फ्रंट कोउन्होंने शिकस्त दी। लेकिन उसके बाद जो दोइलेक्शन थे उनमें उन्होंने बीजेपी कामुकाबला किया। पुरजोर मुकाबला किया और इसइलेक्शन में भी जिनको मैं तो मानता हूं किवो हारी नहीं है हराया गया है 41स सेज्यादा वोट उन्होंने हासिल किया और येसारे लोग जो आज उनके जहाज से चूहे कूदकरके जा रहे हैं वो एक हफ्ते पहले तक याइलेक्शन नता आने के दिन तक उनको ममताबनर्जी से जो आज शिकायतें हैं वो उस वक्तनहीं थी या उनके अंदर हिम्मत नहीं थी तोनतीजा यह हुआ कि आज ऐसा लगा कि वो ताश केपत्तों की तरह से पूरी पार्टी जो कि पिछले20-25 सालों से ममता बनर्जी ने अपने खूनपसीने से बनाई थी वो खत्म होती हुई नजर आरही है। ये एक मिसाल है। ये सिर्फ बंगालमें नहीं हो रहा है। ये हर जगह हो रहा है।आपने देखा कर्नाटका और मध्य प्रदेश मेंकांग्रेस की चुनी हुई सरकारें थी। उनकेएमएलए को तोड़ करके खरीद करके और वहांसरकारें बदल दी गई। इसके अलावा और कईरियासतों में ये हुआ है। तो ये एक मामूलबन गया है। इसकी एक बड़ी बुनियादी वजह तोआईडियोलॉजी का खत्म होना है। उससे जोकमिटमेंट था लोगों का वो खत्म हो गया। औरदूसरे पिटिकल पार्टियां जो है वो प्राइवेटलिमिटेड कंपनियां बन गई हैं। और उसमें एकही नारा है लव मी एंड लव माय लास्ट।कश्मीर से कन्याकुमारी तक कच्छ से कोहिमातक और उससे कोई पार्टी पहले यह इल्जामसिर्फ कांग्रेस पार्टी पर लगता थानेपोटिज्म का परिवारवाद का। लेकिन आज तोबीजेपी भी उससे अछूती नहीं है। लेफ्टपार्टीज भी अछूती नहीं है। और बाकी जोपार्टियां है चाहे वो लालू प्रसाद कीपार्टी हो, चाहे वो मुलायम सिंह की पार्टीहो, चाहे वो देवीलाल की पार्टी हो या बीजूपटनायक की वो सब प्राइवेट लिमिटेडकंपनियों में एक तरह से तब्दील हो गई हैऔर वहां आप अपने जमीर के साथ में नहीं रहसकते।जी कुर्बान साहब लेकिन ये जो आइडियोलॉजिकलपतन है इसको आप कैसे देख रहे हैं? फिलहालक्या यह अभी देश की सियासत के लिए सबसेबड़ा चैलेंज यही आपको लग रहा है फिर वोलोग जो सेुलर भारत में जिनका यकीन है वोमुसलमान दलित आदिवासीवो क्रिश्चियंस वो सिख जो बीजेपी से अलगउन पार्टियों को चुनना चाहते हैं उन उनकोसत्ता में बने रहना या सत्ता में लानाउनको चाहते हैं तो फिर उनके लिए क्याऑप्शन बचा है वो तो एक तरफ देख रहे हैं किएसआईआर के नाम पर क्या कुछ उनके साथ होरहा है कि सरकार अब चुन रही है कि कौनउनका वोटर होगा और कौन नहीं होगा। एक तोयह उनके साथ हो रहा है। दूसरी तरफ किसी कोभी लिस्ट से बाहर करके उनका वोट जो सबसेमहत्वपूर्ण उनका हक है वो उनसे छीना जारहा है। और तीसरा जब इस तरह के नुमाइंदोंको वो जीताकर पार्लियामेंट में या असेंबलीमें भेज रहे हैं तो वो कुछ वक्त भी नहींलगाते और फिर वो बीजेपी के पाले में जारहे हैं। तो ये जो पॉलिटिकल क्राइसिस हैइसको आप कैसे देख रहे हैं और क्या अभीसबसे महत्वपूर्ण क्या ये एक आईडियोलॉजिकलपॉलिटिकल वॉर ही आपको नजर आ रही है?हां काफी हद तक आपने सही कहा। असल मेंदेखिए 204 का लोकसभा इलेक्शन आप देखें तोउसमें सबसे बड़ा इशू क्या था? मुद्दा क्याथा? मुद्दा था कि इस देश में संविधानबचेगा या नहीं बचेगा? क्योंकि जो करंटडिस्पेंसेशन है जो उस वक्त भी पावर में थाउसके कई नेताओं ने यह बात कही कि अबकी बार400 पार और 400 पार का मतलब ये था कि हम400 पार अगर हो जाएंगे लोकसभा में तो फिरहम इस देश के संविधान को बदलेंगे जो किजिसके बारे में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसलाहै कि इसके बेसिक टेनेंट्स को नहीं बदलाजा सकता। चाहे जितनी बड़ी आप बहुमत लोकसभामें आ जाए, राज्यसभा में आ जाए, आप 100%भी आ जाए तब भी आप जो उसके बेसिकस्ट्रक्चर है केशवानंद भारती मामले मेंउसको स्पष्ट कर दिया गया। लेकिन अफसोस कीबात यह है कि जो पार्टी इस वक्त सत्ता मेंहै उसने ना तो कभी इस देश के संविधान कोदिल से कुूल किया और ना ही डेमोक्रेसी कोसोशलिज्म को सेकुलरिज्म को बल्कि सोशलिज्मऔर सेकुलरिज्म दो ये उनके लिए तो ऐसेस्टिग्मा है कि वो कहते रहे हैं बहुतजमाने से कि इनको कॉन्स्टिट्यूशन केप्रएमबल में जबरदस्ती शामिल किया गया।अंबेडकर ने जो संविधान बनाया था। उसकेप्रबल में ये दोनों शब्द नहीं थे।टेक्निकली ये बात सही है कि ये इंदिरागांधी ने इमरजेंसी में संविधान में संशोधनकर इन दोनों शब्दों को शामिल किया। लेकिनहमारा संविधान है क्या? उसकी बेसिकस्पिरिट क्या है? वो यही है के सबसे पहलेतो डेमोक्रेसी वो सबसे सुप्रीम है। वोहोगी होनी चाहिए। और उसके अलावा अगर आप इनदो शब्दों का भी इस्तेमाल ना करें तोबंधुत्व की बात करते हैं, भाईचारे की बातकरते हैं उसका कॉन्स्टिट्यूशन का प्रबल औरउसी पर ये देश पिछले 80 वर्षों में जब सेआजाद हुआ है तब से चला है। लेकिन जिनलोगों का इसमें यकीन नहीं है जो कांग्रेसपार्टी और इंदिरा गांधी पर ये आरोप लगातेथे जब इमरजेंसी इंदिरा गांधी ने लगाई थीकि साहब उन्होंने तानाशाही थोप दी देश परसेंसरशिप लागू कर दी पिटिकल पार्टीज केवर्कर को जेल में डाल दिया लेकिन अभी तोहम देख रहे हैं कि इंदिरा गांधी ने तो जोकुछ किया वो घोषित तरीके से किया और उसकीसजा भी उन्हें 77 में मिली जब उनको वो खुदचुनाव हार गई और पूरे उत्तर भारत में उनकासफाया हो हो गया। लेकिन जो लोग उस वक्तउनसे लड़ने की बात करते थे और जो आज सत्तामें बैठे हुए हैं वो ना तो डेमोक्रेसी मेंयकीन करते ना सोशलिज्म और सेकुलरिज्म मेंऔर बाकी संविधान के हिस्से में और इसका भीमजा उन्हें खास करके उत्तर प्रदेश केलोकसभा चुनाव में देखने को मिला जब 43सीटें वो हारे थे। लेकिन अब हो ये गया हैकि लोग इंसल्ट प्रूफ हो जाते हैं जरा खालमोटी हो जाती है तो वो इन सारी चीजों कोजैसे इंग्लैंड में जहां से हमने येडेमोक्रेसी या कैबिनेट सिस्टम लिया हैवहां संविधान लिखा हुआ भी नहीं है लेकिनरिवायतों पे ही चलता है ट्रेडिशन पे हीचलता है इतनी मजबूत वहां की डेमोक्रेसी हैलेकिन हम अफसोस कि उस अपनी डेमोक्रेसी कोमजबूत नहीं कर पाए और अबकि जब सीधा येसियासत एक बिजनेस का रूप उसने ले लिया हैअब हर हर आदमी जो सियासत में आता है उसकीउसको आप उससे पूछिए कि आपकी आईडियोलॉजीक्या है? तो कहेगा साहब हम तो एमपी एमएलएबनने के लिए आते हैं। मिनिस्टर बनने केलिए आते हैं। आज एसपी में है कल बीएसपीमें है। परसों बीजेपी में है उसके बादकांग्रेस में आ जाएंगे। और कोई पूछने वालानहीं है कि भाई आप तो यह जैसे जूते बदलेजाते हैं या कपड़े बदले जाते हैं उस तरहसे अपनी आईडियोलॉजी बदल रहे हो जिसका अभीसामने नमूना हमको बंगाल में देखने को मिलरहा है ताजा तरीन उदाहरण वो हो गया और येदेश के लिए एक बहुत बड़ा गंभीर खतरा हैक्योंकि अगर लोकतंत्र नहीं बचा इस देश मेंतो फिर कुछ नहीं बचेगा संविधान की बैकबोनबुनियाद जो है वो डेमोक्रेसी पर है औरडेमोक्रेसी जिस तरह से जिस विकृत रूप मेंहमारे सामने आ रही है। यानी राज्यसभाइलेक्शन होते हैं उसमें पर्चे खारिज करदिए जाते हैं या कि खारिज करवा दिए जातेहैं या जो रूलिंग पार्टी से जिनका ताल्लुकहोता है उसका खराब पर्चा भी सही पर्चे मेंतब्दील हो जाता है और फिर खरीदफरोख्त होतीहै। हमने उत्तर प्रदेश में देखा हमनेहिमाचल प्रदेश में देखा। हिमाचल प्रदेशमें कांग्रेस पार्टी सत्ताधारी पार्टी औरउसके बड़े नेता अभिषेक मनु सिंह भी चुनावहार गए वहां क्योंकि बीजेपी ने खरीदफरोख्तकी थी और काफी कांग्रेस के एमएलए को तोड़लिया था वही हमको अभी हाल में मध्य प्रदेशमें देखने को मिला जब मीनाक्षी नटराजजन कापर्चा खारिज हुआ और इस तरह की चीजें कोईयेएक दो उदाहरण नहीं है। ऐसे सैकड़ों उदाहरणहै। पिछले 12 सालों में हमने देखा है किइस मुल्क की सियासत को जिस तरह से चलायाजा रहा है, उसमें यही है कि यह इमर घोषितइमरजेंसी है। उससे बुरे हालात है। जो मेनस्ट्रीम मीडिया है उसमें आप अपनी बात नहींकर सकते। अदालतों से इंसाफ नहीं मिल रहाहै। सिविल सोसाइटी कुछ बहुत ज्यादा अपनेहक के लिए आगे नहीं आ पा रही क्योंकि सबकोये डर है कि जेल में डाल दिया जाएगा। ईडीसीबीआई और दूसरी एजेंसियों का जिस तरह सेइस्तेमाल हो रहा है तो बहुत ही खतरनाकसूरते हाल है इस वक्त हमारे मुल्क की। जीकुर्बान साहब लेकिन यहां सवाल मुसलमानोंका है क्योंकि मुसलमान जिसको देश का एकपरमानेंट दुश्मन बना दिया जाता है बनादिया गया है और हर गली नुक्कर चौराहे परवो पीट-पीट कर मार दिया जाता है या फिरउसको पीटा जाता है। उसके घर बुलडोज हो रहेहैं। उसकी मस्जिदें ढाई जा रही हैं। किसीभी इल्जाम में किसी भी झूठे इल्जाम मेंउसको जेल में डाल दिया जाता है। मजलूम कोही जालिम बताकर उसके साथ यह सब जो बर्बरताजो है वह की जा रही है। ऐसे में दो चीजेंहोती हैं। एक तो वो अदालतों से इंसाफ कीउम्मीद लगाता है कि अदालतों में हम जाएंगेतो हमें इंसाफ मिलेगा या दूसरा उसे लगताहै कि सत्ता परिवर्तन होगा तो हमारे लिएशायद इंसाफ की कोई गुंजाइश बनेगी। अगर कोईसेकुलर पार्टी या समाजवादी या इस तरह केकोई दल जो है वो सत्ता में आते हैं। चाहेराज्य में हो या फिर केंद्र में हो। अभीमुसलमानों के इस पॉलिटिकल सवाल को आप कैसेदेख रहे हैं? क्योंकि जिन नुमाइंदों को वोचुनकर भेज रहे हैं, वो अगर बीजेपी मेंशामिल हो रहे हैं। यानी कि उनकी इंटेंशनकभी भी उनके मुद्दों को लेकर या उनके ऊपरहोते हुए जुल्म को लेकर कभी साफ थी हीनहीं। अगर साइं घोष जो काबा और मदीना कीजो बात करती थी उनका वो बहुत वीडियो वायरलहुआ। लोगों ने बहुत उन्हें पसंद किया। वोअलग-अलग तरह की बातें करती थी। अगर वह तकभी बीजेपी का दामन थाम ले इनडायरेक्टली तोफिर मुसलमानों के लिए क्या आप फिलहालपॉलिटिकल ऑप्शंस देखते हैं? इसमें मैं एकऔर चीज यहां पर ये जोड़ना चाह रही थी किजब एआईएमएम जैसी पार्टियां अगर वो आती हैंतो उन्हें फौरन बीजेपी की बी पार्टी कहदिया जाता है। कम से कम वो अलग से चुनावतो लड़ रही हैं। बीजेपी के साथ मिल तोनहीं रही या बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव तोनहीं लड़ रही या जीतने के बाद उसमें शामिलतो नहीं हो रही। क्या इन पार्टियों को बीपार्टी ना कहा जाए? फिर कि आप तो आप लड़ीइस तरह से और फिर शामिल भी हो गए आप।मिश्रा आपके इस सवाल में कई सवाल है। सबसेपहले तो जो सुरते हाल है तो वो इसलिए हैकि इस मुल्क में जो रूलिंग पार्टी है उसकीजो आइडियोलॉजी है उसका उसके पीछे जोऑर्गेनाइजेशन है वो 100 साल से इस कोशिशमें लगा हुआ था कि इस मुल्क को हिंदूराष्ट्र बनाना है। वो डीफ्टो उन्होंने बनादिया। डीजरे वो भले ही ना बना पाए हो औरउसमें बहुत साफ है खुला एजेंडा हैब्लेटेंट कम्युनल एजेंडा और ये फाशिज्महैज्म की तरफ मुल्क को ले जा रहा हैक्योंकि देखिए हमारी जोहमारा जो मुल्क था और उसने जोकॉन्स्टिट्यूशन अडॉप किया था बंटवारे केबाद पाकिस्तान बन जाने के बावजूद कि हम इसमुल्क को दूसरा पाकिस्तान नहीं बननेदेंगे। यहां हर शरी के अख्तियारात बराबरहोंगे। हर नागरिक के अधिकार बराबर होंगे।किसी को धर्म, जाति, भाषा और भूषा औरखानपान के नाम पर जो है वो आइडेंटिफाईनहीं किया जाएगा और उसके साथडिस्क्रिमिनेशन नहीं किया जाएगा। लेकिन जोपिछले 12 साल की सियासत है शुरुआती दिनोंमें तो हमने देखा कि जो गवर्नमेंट बनी थीवो उसमें कुछ मुस्लिम चेहरे भी शाम मिसालके लिए होते थे कि साहब दो तीन मंत्री बनादिए या दो तीन सांसद। पिछले पांच छ साल सेतो आप देखिए कि एक-एक करके उसको हटा दियागया। आज 240 से ज्यादा सांसद बीजेपी केलोकसभा में है और लगभग 100 से ज्यादासांसद राज्यसभा में है। उनमें एक भीमुसलमान नहीं, एक भी ईसाई नहीं, एक आधशायद गलती से सिख हो। तो वो जो डेमोक्रेसीकी बेसिक रिक्वज़िट है, शर्त है कि येइंक्लूसिव डेमोक्रेसी होनी चाहिए।पार्टिसिपेटरी डेमोक्रेसी होनी चाहिए। वोकहीं नजर नहीं आती। उसकी वजह यही है। वोयह कहते हैं कि साहब मुसलमान हमें वोटनहीं देता और हम जिन मुसलमानों कोउम्मीदवार बनाते हैं वो चुनाव नहीं जीतपाते। उनको वोट नहीं मिलता। इसलिए हम उनकोटिकट नहीं देते। यह बात बीजेपी कहती है तोबात समझ में आती है कि उनका एक खुला साफएजेंडा है। उन्होंने पिछले 100 साल से यहीबात कही है कि यह देश हिंदुओं का है। वहीनंबर एक के शहरी बन के रहेंगे और इसीलिएवो संविधान को भी दिल से नहीं मानते।लेकिन एक मजबूरन उन्होंने कहा दुनिया कोदिखाने के लिए इस लवादे को उड़े रखिए।इसमें हर्ज क्या है? हमने डिफेक्टो तो बनाही दिया है जो आपने सारी चीजें गिनाई नासिर्फ मुसलमान के बारे में बल्कि सारेमाइनॉरिटीज के बारे में चाहे वो सिख होईसाई हो और जैन बौद्ध तक भी अब बात आनेलगी है किसानों का आंदोलन हुआ तो हमनेदेखा कि किस तरह से सिखों को पाकिस्तानीऔर खस्तानी और क्या-क्या नहीं कहा गया। तोये एक ओवरऑल सिचुएशन अफसोस की बात ये हैकि इसका मुकाबला करने के लिए जो अपोजिशनहोना चाहिए वो अपोजिशन हमें नजर नहीं आताऔर उसकी एक बड़ी वजह ये है कि जो नरेटिवसेट कर दिया गया है बीजेपी की तरफ से उसीनरेटिव को हर पिटिकल पार्टी चलाना चाहतीहै। उसको काउंटर नहीं करना चाहती। मिसालके तौर पे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आयाअयोध्या के मामले में। सारी सारीपार्टियों ने उसको वेलकम किया और कहा किअब ये मामला सेटल हो गया। अब कोई बात नहींहोगी। फिर आया मामला आर्टिकल 370 का।उसमें भी सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आ गयाऔर फिर ये हुआ कि नहीं साहब अब इसकी भीकोई बात नहीं होगी। यूनिफ सिविल कोर्टपर्सनल लॉ के मामले में भी राज्य सरकारेंकानून बना रही हैं।माइनॉरिटीज को छोड़ दीजिए। जो आदिवासी हैंउनकी भी बात नहीं सुनी जा रही है और उनकेभी जो अपने पर्सनल लॉस है उनको खत्म कियाजा रहा है। तो ये हम बढ़ रहे हैं एक फाज्मकी तरफ जिसमें कि एक ही धर्म, एक ही जातिका वर्चस्व, एक ही झंडा, एक ही रंग उसमेंकोई दूसरी चीज ना हो। और जाहिर है कि उससेचुनाव जीतने में आसानी होती है। हालांकिअभी एक बड़ी उम्मीद यह है कि इस देश कीमेजरिटी जो है वो कम्युनल नहीं हुई है औरजो कम्युनल लोग हैं उनकी तादाद 40 फीसदीसे ज्यादा ऊपर नहीं बढ़ पा रही है। 60फीसदी लोग आज भी उनका मुकाबला करते हैं।लेकिन वह सारे लोग बहुत कमजोर हैं। आपनेएआईएमएम का जिक्र किया या और दूसरीपार्टियां यह बहुत छोटी जमातें हैं। इनकाजोएरिया ऑफ इन्फ्लुएंस है वो कुछ असेंबलीसीटों तक या एक दो पार्लियामेंट्री काटसीतक सीमित है। उनका एक्सपेरिमेंट हमनेबिहार में देखा। बंगाल में क्या हुआ अभीपता ही नहीं चला कि चुनावों से पहले तोवहां उन्होंने काफी कोशिश की थी। उत्तरप्रदेश में अभी खबर आई है कि वो खम ठोकनेवाले हैं। लेकिन वो हमेशा एक मैं मानताहूं कि ऐसी पार्टियां ऐसी सियासी जमातेंजो रिलीजन बेस्ड होंगी या कम्युनिटी बेस्डहोंगी वो उनकी ज्यादा एक्सेप्टेंस नहीं होपाती है। वो अपने छोटे से इलाके मेंकामयाब हो के अपनी सियासत चला सकती हैं।लेकिन जो यह जो हमारा सेकुलर फ्रेमवर्क हैकॉन्स्टिट्यूशन का जब तक हमको उसके अंदरसियासत करनी है और उसमें ना मुसलमान अलगहै ना ईसाई अलग है ना सिख अलग है वो उसकेलिए एक बड़ी हिंडरेंस प्रॉब्लम रहेगीलेकिन साथ ही साथ आपके सामने एक दूसरीमिसाल भी है अभी हाल ही में पिछले महीनेही केरला में मुस्लिम लीग के 22 उम्मीदवारजीते लेकिन वो मुस्लिम लीग अपने आप को उसतरह से सियासी नारों में या जज्बाती चीजोंमें नहीं उलझाती है और उसने अपना एकसेकुलर कैरेक्टर बनाया हुआ है। वह लेफ्टफ्रंट की सरकारों में भी वह पार्टी सरकारमें रही है औरये जो कांग्रेस के नेतृत्व वाला मोर्चा हैयूडीएफ उसमें भी वो सरकारों में रहती आईहै। केंद्र में भी वो जब मनमोहन सिंह कीसरकार थी तो उनके प्रतिनिधि थे उस सरकारमें। तो इस तरह का अगर कोई मॉडल एवोल्व होऔर अभी तमिलनाडु में भी एक मंत्री बने हैंउस पार्टी से तो उस तरह की जमातें जिनकीएक क्रेडिबिलिटी हो जिनके बारे में ये होकि साहब ये कम्युनल एजेंडा नहीं चलाती हैइनके लिए जज्बाती नारे नहीं है तब मुसलमानकी सियासत कारगर और कामयाब हो सकती है।लेकिन खालीजज्बाती इारों पे और पोलराइजेशन करने केमकसद से वो मैं समझता हूं कि एक सुसाइडलहोगी आत्मघाती होगी।लेकिन कुर्बान साहब मेरा सवाल यह है कि जबभी इस तरह की जमातें उठ हैं जो मुसलमानोंके हुकूक की बात करती हैं उन्हें फौरनदूसरी तरह से कम्युनल बता दिया जाता है याफिर उनको बीजेपी की बी टीम बता दिया जाताहै। लेकिन अगर मायावती दलितों की बात करतीहैं तो उनके ऊपर इसी तरह के कोई तमगे नहींलगते हैं या इसी तरह की कोई पार्टियां जोअपने समाज या जाति को लेकर जो बनती हैं उनपर इस तरह के तमगे नहीं लगाए जाते हैं।यही समाजवादी सेकुलर पार्टियां उन्हेंउन्हें ना सिर्फ इज्जत से अपने साथ बिठातीहैं बल्कि उन्हें रिप्रेजेंटेशन से ज्यादारिप्रेजेंटेशन जो है वो दिया जाता है। यहीएआईएमएम जो है उन्होंने बिहार मेंउन्होंने कई बार कहा कि हम इंडिया गठबंधनके साथ अलायंस करना चाहते हैं। उन्होंनेकई बार कोशिश भी की लेकिन नहीं हुआ।उन्होंने उत्तर प्रदेश में भी ट्राई किया।यह नहीं हुआ। मैं जाती तौर पर एआईएमएम कीपॉलिटिक्स को जाहिर सी बात है ना तोएंडोर्स करती हूं और ना ही उस तरह से यकीनकरती हूं। लेकिन जो चीजें सामने हैं, जोतथ्य हैं उनसे इंकार भी नहीं किया जा सकताहै। तो अगर कोई पॉलिटिकल पार्टी इवॉल्व होरही है, आप देखें अगर असदुद्दीन ओवैसी कोदेखें तो बेस्ट पार्लियामेंटेरियन का उनकोअवार्ड कितनी बार मिल चुका है। वो संविधानलोकतंत्र की सबसे ज्यादा बात करते हैं। वोहमने देखा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान शायदउनसे बड़ा तो शायद कोई देशभक्त हुआ भीदेखा भी नहीं होगा हमें जिस तरह से वो बातकर रहे थे। तो ये सारी पोजीशनिंग भी तोओवैसी करते हुए नजर आते हैं। फिर उनकोकम्युनल उनको बी टीम इस सब का तमगा क्योंउनके साथ लगाया जाता है? और फिर वही वहीमेरा घूम फिर का सवाल कि जो समाजवादीसोशलिस्ट और जो इस तरह की सेकुलर जमातेंहैं उनके नुमाइंदे अगर जीत के आके सेकुलरवोट के सहारे अगर बीजेपी में शामिल होजाएं तो वो तो सबसे बड़े गद्दार हुए फिर।मिश्रा देखिए यहां दो चीजें हैं। आपनेजिनका जिक्र किया वो जातिवाली पार्टियां है। जातिगत आधारितपार्टियां है और एआईएमएम जो है वो मुसलमानरिलीजन आधारित पार्टी है। वो अगरकम्युनिटी बेस्ड भी अपने आप को कहे तोशायद थोड़ा बेहतर वो उसके बारे मेंओपिनियन बनेगी और उसमें दूसरे लोग भीशामिल हो। जाति का जो सवाल है वो इस मुल्कमें 5000 साल पुरानी बीमारी है और उससे इसमुल्क में क्रिश्चियनिटी इस्लाम औरसिखिज्म जो तीनों धर्म जाति के खिलाफहै बुनियादी तौर पर वो भी इससे अछूते नहींहै। आज ईसाइयों में भी दलित क्रिश्चियंसहैं। दलित मुस्लिम्स हैं। दलित सिख है।लेकिन हमारा कॉन्स्टिट्यूशन दलित सिख कोतो एससी एसटी के राइट्स देता है। लेकिनदलित मुसलमानों को और दलित क्रिश्चियंस कोनहीं दिया जाता। उनके बारे में कहा जाताहै कि ये इस देश के रिलीजन नहीं है। येबाहर के रिलीजन है और इन रिलीजन में जातिव्यवस्था नहीं है। तो मैं इसको कोईकन्विंसिंग आर्गुमेंट के तौर पर इस्तेमालनहीं कर रहा हूं। लेकिन मैं यह बता रहाहूं आपको कि जो 5000 साल से जिन लोगों केसाथ शोषण हुआ है, ज्यादतियां हुई है, जोदलित वंचित समाज के लोग हैं, पिछड़े वर्गके लोग हैं, उनके लिए कॉन्स्टिट्यूशनलप्रोविजन भी है। आपने देखा किपार्लियामेंट में और असेंबलियों में भीउनके लिए रिजर्वेशन है। सरकारी नौकरियोंमें भी उनके लिए रिजर्वेशन है। और मंडलआयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद तोपिछड़ों को सरकारी नौकरियों में भी आरक्षणमिला है। लेकिन उसके पीछे स्पिरिट यही थीकि ये लोग क्योंकि हजारों साल से दबाए गएहैं। कुचले लोग हैं इसलिए वो आगे लाए जाएऔर उसमें फिर जोपिटिकल पार्टीज आती हैं वो जाति की बातकरती हैं। धर्म की बात उनमें नहीं होती।एक इंटरवेंशन मैं कर रही थी। लेकिन अगर हमअकाली दल की बात करते हैं तो वो तो सिखोंकी पार्टी है। पंजाब में है वो पार्टी। तोक्या उसको हम रिलीजन बेस्ड पार्टी बोलेंगेया नहीं कहेंगे? बिल्कुल रिलजन बेस पार्टीहै औरशिवसेना भी इस तरह से काफी समय तक अपने आपको उसमें मुसलमान कोई होता नहीं था। वोअपने आप को सिर्फ हिंदुओं की पार्टी कहतीथी। मेजॉरिटी की पार्टी कहती थी। लेकिनमैं ये आपको बताऊं कि इस देश में राजनीतिकिस तरह से हुई। 67 में तक पिछड़ों का कोईसे नहीं था पॉलिटिक्स में। तो उस वक्त केसोशलिस्ट लीडर राम मनोहर लोहिया ने एकनारा गढ़ा। सोशलिस्टों ने बांधी गांठपिछड़े पावे 100 में 60 अब 100 में 60 काजो मामला था उसमें पिछड़े भी थे दलित भीथे आदिवासी भी थे महिलाएं भी थी औरमुसलमान भी थे स्पष्ट रूप से लिखा गया इनसारी चीजों को और उसके आधार पर नौ राज्योंमें गैर कांग्रेसी सरकारें 67 में बनी औरकेंद्र में भी इंदिरा गांधी की पार्टीकांग्रेस पार्टी चुनाव हारते हारते बचीबहुत बेयर मेंबर मेजॉरिटी उनको मिल पाई औरउस वक्त से ये और उसी का उभार था जिसकीवजह से मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद,मायावती, राम विलास, शरद यादव, नीतीशकुमार ये कर्पुरी ठाकुर ये लोगपैदा हुए पिटिकल लीडर्स और इन्होंने येअपने राज्यों में मुख्यमंत्री भी बने औरउनमें से एक चौधरी चरण सिंह छ महीने केलिए सही प्रधानमंत्री भी बन गए। लेकिनधर्म के आधार पर राजनीति आज होना इस मुल्कमें बिल्कुल असंभव है। और मैं मानता हूंकि वो होनी भी नहीं चाहिए। क्योंकि जब आपउसकी बात करते हैं तो एक तरह से बीजेपी कोजस्टिफिकेशन देते हैं कि अगर धर्म के आधारपर ही राजनीति होनी है और पॉलिटिकलपार्टियां बननी है तो फिर बीजेपी काजस्टिफिकेशन जरूरी है जो किकॉन्स्टिट्यूशन के तहत लीगल नहीं है। वोबातें करना ये सारी बातें और जो हेट स्पीचहेट क्राइम जो आपने अपने इंट्रोडक्शन मेंजिन बातों का जिक्र किया वो करके तो आपनहीं कर सकते। तो इसलिए जरूरत इस बात कीहै कि मुसलमान को ये आइडेंटिफाई करनापड़ेगा कि उसका हमदर्द कौन है? उसका मसीहाकौन है? क्या वो लोग उसको वोट के तौर पेइस्तेमाल करते हैं या उनका कोई कमिटमेंटभी है। इसमें ये मैं किसी उस पपस से नहींकह रहा हूं। लेकिन ये मैं ट्रैक रिकॉर्डदेखने के लिए के मनमोहन सिंह की जब सरकारथी 10 साल तो मुल्क का कम्युनल टेंपरेचरऑल टाइम लो था। कोई बड़े फसाद नहीं हुएथे। बड़ी इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थी जोपिछले 12 साल से अब देखने को मिल रही हैऔर उन्होंने दो बड़े काम किए। एक सच कमेटीबनाई कि ये पता चले कि भाई मुसलमानों कीइस मुल्क में सुरते हाल क्या है? पहली बारहुआ था कि यही कहा जाता था कि साहब नहींअल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे मेंबातचीत होनी चाहिए। मुसलमानों के बारे मेंनहीं। और दूसरी तरफ जो संघ परिवार और उसकेसमर्थक दल है वो ये कहते थे कि मुसलमानोंका तुष्टीरण हो रहा है। अपीसमेंट हो रहाहै। इन्हें सब कुछ मिल गया। लेकिन उससच्चन कमेटी ने जो पार्लियामेंट में जबटेबल की गई तो उसने सारी सुरते हाल बयानकी। उसने कम्युनिस्ट पार्टियों को भीएक्सपोज किया कि बंगाल में सबसे ज्यादाबुरी हालत मुसलमानों की है वो बंगाल मेंहै। जहां 30स से ज्यादा मुसलमान है। तोउसने फिर एक्सपोज कर दिया उस पूरेप्रोपगेंडे को अपीजमेंट को और फिर दूसराबड़ा काम ये हुआ कि मिनिस्ट्री ऑफमाइनॉरिटी अफेयर्स बनी। हालांकि वो मेरेकई मेरे नजदीक वो नॉन स्टार्टर ही रही है।बन गई है लेकिन उसको खत्म करने की हिम्मतनरेंद्र मोदी हुकूमत में भी नहीं थी औरवहां थोड़ा बहुत जो भी कहिए कुछ काम होरहा है। माइनॉरिटी डेवलपमेंट कॉरपोरेशनबना है। व से रिलेटेड कुछ चीजें हैं।लेकिन उसमें कम्युनिटी भी का भी एक रोलहोना चाहिए। वो नहीं होता है। वो अपनेघरों में बैठे हुए हैं कि हम इसमें क्याकरें? जो भी सारी चीजें आती है सारी चीजेंहम पिटिकल पार्टी सरकार और दूसरे लोगों परनहीं थोप सकते कि साहब इनकी वजह से हमारेसाथ ज्यादती होती है। मेरा सवाल ये है किआप बहसियत कम्युनिटी क्या कर रहे हैं औरअपने राइट्स के लिए लड़ने को आप को किसनेरोका? इस मुल्क का आईन आपको ये हक देता हैकि आप निचली अदालत से ले सुप्रीम कोर्ट तकजाए। एक बार दो बार तीन बार 10 बार आपकीये अपीलें खारिज होंगी। लेकिन वो रिकॉर्डपर तो आएगा मामला। कभी ना कभी तो यह बातहोगी कि इस तरह की चीजें होनी चाहिए। आपनेजो बात की कि लिंचिंग हो रही है, बुलडोजरचल रहा है। बुलडोजर के खिलाफ सुप्रीमकोर्ट ने फैसला दिया। अब उस पर इंप्लीमेंटइंप्लीमेंटेशन हो पाता है कि नहीं येदेखने का काम तो आपकी सिविल सोसाइटी का भीहै। आपके जो लोग मीडिया में है या जिस भीतरह से हैं कंसर्न सिटीजन के तौर पे उनकोभी तो आगे आकर के इन बातों को करना चाहिए।हम ये अपने घर में बैठ जाते हैं कि येसारी चीजें दूसरे जो ह्यूमन राइट्स केऑर्गेनाइजेशन है वो हमारी बात करें।पिटिकल पार्टीज हमारी बात करें और हम खुदकुछ ना करें। डर और खौफ के हिरास में घरबैठ जाए। ये सुरते हाल इमरजेंसी में भीथी। जब तुर्कमान गेट का कांड हुआ था। बहुतसारे लोग मारे गए थे। मुजफ्फरनगर औरकैराना में गोली चली थी। लेकिन वो वक्तचीजें थी और लोग उसके खिलाफ निकल कर केआए। आज अनफॉर्चूनेटली मुस्लिम कम्युनिटीने ये मान लिया है कि भाई अगर हम कोई भीबात करेंगे तो हमें जेल में डाल दियाजाएगा या हमारे साथ जुल्म ज्यादती कीजाएगी। मैं इससे इंकार नहीं करता कि वो होरही है और बहुत बड़े पैमाने पर हो रही है।लेकिन उससे लड़ने का तरीका वाहिद आपके पासएक हथियार है। वो इस मुल्क काकॉन्स्टिट्यूशन है। वो आपको देता है। आपपिटिकली तरीके से लड़ाई लड़िए। ओवैसी साहबजो लड़ रहे हैं वो लड़ाई किस तरह से लड़रहे? कॉन्सिट्यूशन के तहत ही लड़ रहे।दूसरी चीज ये कि आपको एनजीओ बना के याह्यूमन राइट्स ऑ्गेनाइजेशन बना करके या जोहै उनके साथ जोड़ के अदालतों में जाने सेकौन रोक रहा है? मैं हेट स्पीच के खिलाफसुप्रीम कोर्ट में गया और वो लोग जो धर्मसंसद के नाम पर तूफान बदतमीजी कर रहे थेवो जेल गए। उनको उनके ऊपर पाबंदी लगी।अंकुश लगा और फिर मेरे ही मामले मेंकुर्बान अली वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया मेंसुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि पुलिस औरएडमिनिस्ट्रेशन इस बात का इंतजार ना करेंके एफआईआर दर्ज होगी बल्कि सो मोटोकॉग्निजेंस ले कहीं भी कोई चीज होती है।तो अभी आपके साथ पास सिवाय इसके और कोईदूसरा हथियार नहीं है। वो कॉन्स्टिट्यूशनलराइट्स का मामला है। उसी को लेकर के आपअपनी बात कह सकते हैं। आप अपनी बात मीडियातक पहुंचाएं। मीडिया जो सो कॉल्ड सरकारीमीडिया है या गोदी मीडिया है वो आपकी बातनहीं सुन रहा है तो आजकल तो सोशल मीडियाका जमाना है उसप बहुत सारी चीजें आ रही हैउसप आप जाए और अदालती लड़ाई लड़े जोराइट्स आपको मिले हुए हैं एक शहरी के नामपर मैं एक भारतीय नागरिक हूं इसका अधिकारमुझे मिला हुआ है उसके तहत मुझे अपनी बातहर उस फोरम पर कहनी चाहिए जहां सुनी जासकती हो या अगर नहीं भी सुनी जा रही है तबभी अपनी बात कहते रहनाजी क्या आपको ये लग रहा है कि मुसलमानोंने अपनी किस्मत मानकर बैठ गए हैं? क्योंकिजब मैं कई अलग-अलग इस तरह की ह्यूमनराइट्स ऑर्गेनाइजेशन जो हैं उनमें उनकोहेड करने वाले या उनमें काम करने वालेलोगों से जब मैं बातचीत करती हूं और मैंनेएक एग्जांपल उनको दिया कि अभी हमने मैंदिल्ली राइट्स में के को लेकर मैंने एकडॉक्यूमेंट्री बनाई है विडोस ऑफ दिल्लीराइट्स और जब मैंने वहां पर देखा तो मुझेलगा कि इतना पुअर डॉक्यूमेंटेशन है किएक-एक विडो को हम बात करने के के लिए उनतक पहुंचने के लिए हमें कितनी मशक्कत करनीपड़ी और उसके बाद भी अभी तक भी टोटल काउंटभी नहीं है हमारे पास कि आखिर कितनी विडोसहैं और जब इस और जब आप जाते हैं 1984 कीजब हम बात करें और सिख दंगों की जब हम बातकरते हैं आप उन कॉलोनी में आप वहां पर चलेजाएं तो उनकी पॉलिटिकल एजेंसी भी है। उनकेपास सारा डॉक्यूमेंटेशन भी है। वहां परजाकर अभी भी उनको लेकर डॉक्यूमेंट्रीजबनाई जाती है। उनको लेकर बातचीत होती है।आई नो इन दोनों का कंपैरिजन नहीं किया जासकता क्योंकि वो इससे कहीं ज्यादा बड़ेसाने था। लेकिन इसी तरह के बहुत सारे जोराइट्स हैं, प्रोग्राम है वो मुसलमानों कोलेकर हुए हैं। तो क्या आपको लगता है कि येजो ऑर्गेनाइजेशंस हैं या ह्यूमन राइट्स जोऑर्गेनाइजेशंस हैं या इस तरह के एनजीओसहैं या फिर जो मिली जमातें हैं या फिर जोइसी तरह के जो रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशंस हैंक्या वो भी अपना काम उस तरह से नहीं कर पारही हैं? अगर आप एक इंडिविजुअल की केहैसियत को अगर आप साइड में रख भी दे तोबिल्कुल सही कहा आपने और आपने अपने सवालमें ही जवाब भी दे दिया कि 84 का एक वाकयाहै सानिया है सिकों का लेकिन वो आज तकरीबन40 साल हो गए हैं वो इस बात को भूले नहींहै और हर जब 31 अक्टूबर और 1 नवंबर आता हैतो प्रदर्शन होते हैं धरने होते हैं याकिसी भी तरह से उस बात को लाया जाता है किइतना बड़ा कांड हुआ था।इसी तरह से गुजरात राइट्स गुजरात राइट्सके वक्त में तीसरा सीटल वार्ड और उनका जोऑ्गेनाइजेशन है सीजेपी उसने जितना बड़ाकाम किया उसमें बीियों मुकदमों में सजाएंहुई मिनिस्टर रैंक के लोग जेलों में रहेमहीनों और सालों रहे तो ये एक ऐसी चीज हैके ये आपको कुछ पेशर खुद भी करनी पड़ेगीमायूस हो के घर बैठ जाए और इस उम्मीद पेकि दूसरे लोग आपका काम करें दूसरे लोगआपके कॉज को उठाएं वो वो अब बहुत ज्यादाचलने वाला नहीं है। उसके लिए खुद आपको भीआगे आना पड़ेगा। बिल्कुल आपने सही मिसालदी दिल्ली दंगों की। लेकिन एक दिल दंगा आपपिछले 40 45 सालों में मैंने तो मलियानाऔर हाशिमपुरा के दंगे कवर किए हैं।भागलपुर का दंगा कवर किया है। उस जमानेमें और मुल्क के बहुत सारे हिस्सों मेंदंगे हुए। सूरत में हुआ, अहमदाबाद मेंहुआ।बहुत सारे नाम मैं गिना सकता हूं कि जिनकाडॉक्यूमेंटेशन होना चाहिए था वो नहीं हुआ।उसकी वजह से कोई मुकदमे दर्ज नहीं हुए। जोकंपनसेशन का प्रोसीजर है वो नहीं हुआ।लेकिन एक मिसाल मैं आपको दूंगा। दो बहादुरमहिलाएं दिल्ली की वकील वृंदा ग्रोवर औररिबेका जॉन उन्होंने हाशिमपुरा के मामलेको पिलर टू पोस्ट लड़ा और उसमें उन्होंनेसजाएं भी दिलवाई उन दोषी पुलिसकर्मियों कोजिन्होंने 50 मुस्लिम यूथ को घरों से पकड़के मारा था और नहर में फेंक दिया था औरउनको 2020 लाख का कंपनसेशन मिला। वही कामवही बराबर के मलियाना गांव में नहीं हुआजहां एक दिन बाद 70 मुसलमान मारे गए थेक्योंकि उसका कोई डॉक्यूमेंटेशन नहीं हुआकोई मुकदमा नहीं हुआ उसकी कोई पैरवी नहींहुई और यही भागलपुर का है कि जहां 3000 सेज्यादा लोगों को जिंदा जला दिया गया यानेली का मसे का तो मैं ये कह रहा हूं किये तो आपकी सोशल रिस्पसिबिलिटी भी है।आपकी जो जो मिल्ली इदारे क्या कर रहे हैंमैं नहीं जानता लेकिन आपको सोशली ये कामकरने से कौन रोक रहा है क्यों नहीं लोगआते हैं ये सारी चीजों का डॉक्यूमेंटेशनकरते हैं और उसमें डॉक्यूमेंटेशन कभीरायगा नहीं जाता हमेशा उसका फायदा होता हैउससे चीजें रहती है और कम से कम रिकॉर्डपर रहती है और कुछ भी ना हो तो ये बतानेके लिए कि ये जुल्म हुए हैं ये ज्यादतियांहुई हैबिल्कुल आप इंपॉर्टेंट बात कह रहे हैं इसपर बहुत सारे लोगों को बहुत ऐतराज भी होसकता है कि आप आप जो है जिम्मेदारी जोसरकारों की है, जिम्मेदारी जो पिटिकलपार्टीज की है, जो इस सिस्टम की है, जो एकलोकतंत्र का पूरा निजाम है, आप वोजिम्मेदारी एक सिटीजन के ऊपर ही डाल रहेहैं। नहीं नहीं है ऑन मिश्रा मैं ये नहींकह रहा हूं कि मैं बरी उस जमा नहीं कर रहाहूं हुकूमतों को या सियासी जमातों को।उनका काम है उनको करना चाहिए और नहीं कररहे हैं। इसीलिए तो हम और आप यह डिस्कशनकर रहे हैं। लेकिन हम खुद भी क्या कर रहेहैं? हमारी भी कहीं कोई अकाउंटेबिलिटीहोगी या कोई एतसाब होगा कि हम भी कुछहमारा क्या कंट्रीब्यूशन है इस कम्युनिटीके लिए या इस देश के लिए और बात ये है किआप किसी रिलजन की बात मत करिए आप इस मुल्कके शहरी के होने के नाते से जो आपको मिलेहुए हैं उसकी बात कीजिए और उसकी जो उसकोजो एनक्रोच किया जा रहा है उसकी बात कीजिएतब आप मुल्क की भी बात करेंगे और कोईस्टिग्मा ये नहीं लगेगा आपके ऊपर कि आपकोई कम्युनल एजेंडा ंडा चला रहे हैं।लेकिन लेकिन कुर्बान साहब अगर आपकीआइडेंटिटी को ही टारगेट करके सब कुछ आपकेसाथ किया जा रहा हो तो तब कैसे आप सिर्फअपनी शनाख्त यानी कि आप मुसलमान हैं या आपकिस-किस मजहब से हैं उसको साइड में रख केआप ये कैसे कर सकते हैं? क्योंकि जब आपकोइंसाफ इसी बिना पर मिल रहा है। अगरअदालतें इस तरह से इंसाफ करें। अगर पिटिकलसिस्टम इसी तरह से काम कर रहा है। अगर जोप्रशासन है उसी तरह से काम कर रहा है।पुलिस उसी तरीके से काम कर रही है तो वोशिनाख तो आपको सबसे आगे रखनी ही होगीक्योंकि उसी के बिना पर तो आपके साथ ये सबकुछ हो रहा है।आप सही कह रही है लेकिन ये हमेशा रहनेवाला नहीं है। ऐसा नहीं है कि ये येहुकूमत या ये जो सिस्टम है ये हमेशा हमेशाके लिए आ गया है। ये एक अंधेरी रात है। एकबड़ी टनल है। जाहिर है कि इसमें आपकोजुल्म और ज्यादतियों का सामना करनापड़ेगा। लेकिन फिर वही फैज की बात के हैजुल्म की रात मगर रात ही तो है तो कोईसवेरा तो होगा ऐसा तो नहीं है कि सब कुछखत्म हो जाएगा और फिर मैं कोई मिसाल केलिए नहीं लेकिन जो गजा में या फस्तीन मेंहो रहा है कितने साल से हो रहा है पूरीदुनिया के सामने हो रहा है और नहीं कर पारहे लेकिन उसके बावजूद सरेंडर तो नहींकिया है ना अभी आपने देखा के ईरान इतनाकमजोर मुल्क दो महीने उसको बिल्कुल खत्मकर दिया गया लेकिन अमेरिका को उसके साथसमझौता करना पड़ा ना तो यह जब तक स्पिरिटआप अपने अंदर पैदा नहीं करेंगे अगर यहआपने मान लिया डिफिट टेंडेंसी कि नहींसाहब हमारे ऊपर तो जुल्म हो रहा है और हमको तो कोई इंसाफ मिलेगा ही नहीं मेरासिर्फ इतना कहना है कि इंसाफ के दरवाजे हरआदमी के लिए हर जगह बंद नहीं हुए हैं।इंसाफ अभी लोगों को मिल रहा है। हां उसमेंकमी जरूर आई है। लेकिन हमें कोशिश ये करनीचाहिए कि हमें इंसाफ की लड़ाई लड़नी है औरकॉन्स्टिट्यूशनली लड़नी है। जी इंपॉर्टेंटबात कह रहे हैं और यही बात रेजिस्टेंस कीबात राहुल गांधी ने भी कही है कि अब येरेजिस्टेंस का दौर है और हमें सबकोरेजिस्टेंस जो है वो दिखाना होगा। हम येदेख रहे हैं कि पूरी दुनिया में जोरेजिस्टेंस ताकतें हैं वो जाहिर सी बात हैउन पर जुल्म तो हो रहा है लेकिन वही ये भीदिखा रही है कि अगर आप हिम्मत और ताकत केसाथ कुत के साथ अगर आप लड़ते हैं झुकतेनहीं है भले ही आप कमजोर हो तो वो फरीवक्त के लिए आपकी शिकस्त हो सकती है लेकिनलंबे वक्त में आपको जीत जरूर मिलेगी औरईरान का एग्जांपल आपने बहुत राइटली यहांपर रखा है लेकिन उस ईरान ने सालों अपने आपको तैयार किया है। सवाल यही है कि क्याहमारे देश की जो मुस्लिम मुस्लिमकम्युनिटी है या वो कम्युनिटी जिसके ऊपरजुल्म हो रहे हैं क्या उसने अपने ऊपरसालों काम किया है या सालों आगे अपने ऊपरकाम करने के लिए वो तैयार हैं ताकि वो इसतरह के कोई रिजल्ट देख सके ये एक बड़ासवाल है लेकिन एक सवाल लास्ट मैं आपसेपूछना चाह रही हूं| आने वाले वक्त मेंउत्तर प्रदेश में चुनाव हैं। अभी मैंनेदेखा कि अह कांग्रेस पार्टी ने एक मीटिंगकी और उस मीटिंग में वह मीटिंग थी उनकीमाइनॉरिटी डिपार्टमेंट की जिसमें राहुलगांधी भी मौजूद थे। उसमें सबसे ज्यादाचर्चा एक चीज की हुई और जिससे मुझे हंसीऔर अफसोस दोनों हुए कि माइनॉरिटी नहीं अबमुसलमान शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा औरउसको लेकर बड़ी तारीफें की गई। अब ऐसा लगाकि ना जाने कोई एलियन है जिनको आप इंसानकहने की बात कर रहे हैं कि अब इनको इंसानकहा जाएगा। बिल्कुल उसी तरीके से मुझे लगाएक कंपैरिजन किया जा रहा है। लेकिन फिर भीअभी अगर हम माने तो राहुल गांधी एक शख्सहैं जो लड़ते हुए नजर आ रहे हैं।जिन्होंने मोहब्बत की बात की एटलीस्टउन्होंने नफरत के इस दौर में वो दिखाया।क्या आप उनको किसी तरीके से एक उम्मीद केतौर पर देख रहे हैं? क्या आपको लग रहा हैकि फिलहाल अगर किसी ने आइडियोलॉजिकल कोईस्टैंड लिया हुआ है तो वह राहुल गांधीहैं। मैं पूरी कांग्रेस की बात नहीं कररही और आने वाले उत्तर प्रदेश के इलेक्शनमें मुसलमानों को किस हिकमते अमली के साथअपनी पॉलिटिकल एजेंसी को चूज़ करना चाहिए।देखिए जहां तक कांग्रेस पार्टी और राहुलगांधी का सवाल है उन्हें यह समझना चाहिएकि जब कांग्रेस पार्टी ने हिंदू मुसलमानकी सियासत शुरू की थी जब उन्होंने बाबरीमस्जिद का ताला खोला गया था उनके जमानेमें जब डिस्प्यूटेड साइड पर शिलान्यास हुआथा और उस वक्त के कांग्रेस के नेता राजीवगांधी ने कहा था कि हम रामराज लाएंगे तोउस चुनाव में ना तो उन्हें हिंदू का वोटमिल पाया ना मुसलमान का वोट मिल पाया वीपीसिंह प्रधानमंत्री बने थे और 89 के बादइतना अरसा हो गया 36 37 साल कांग्रेसपार्टी ना यूपी में कभी सत्ता में आ पाईना बिहार में और अन करीब आने के इमकानातभी दिखाई नहीं दे रहे वजह क्या थी कि वोजो गांधी नेहरू और मौलाना आजाद कीकांग्रेस थी या सरदार पटेल की कांग्रेस थीउसने कम्युनलइश्यूज पर कॉम्प्रोमाइज किए या के कम्युनलकार्ड खेल के चुनाव जीतने की कोशिश की। तोउनसे दूसरे बड़े लोग आ गए मैदान में।उन्होंने कहा अच्छा आप हमें इस इस फील्डमें हराना चाहते हैं तो हम तो इस मामलेमें बहुत माहिर हैं। हम तो बहुत आगे चलेजाएंगे। तो चुनांचे बीजेपी ने उसी वक्तअयोध्या के राम मंदिर को अब ऑफिशियली अपनाइशू बनाया। मेनिफेस्टो में शामिल किया औरउसकी फसल उन्होंने काटी। राहुल गांधी कोबहसियत एक इंडिविजुअल मैं ये कहूंगा कि वोजो भी कुछ कर रहे हैं कर रहे हैं कर अच्छाकर रहे हैं। लेकिन उनसे यही उम्मीद कीजाती है और ये उनका फर्ज भी बनता हैड्यूटी भी बनती है क्योंकि वो लीडर फॉरअपोजिशन है और एक उस पार्टी के जो जिसकासवा सौ साल का 150 साल का इतिहास हैकम्युनलिज्म और डेमोक्रेसी पर और सोशलिज्मऔर सेकुलरिज्म पर स्टैंड लेने का वो उसपार्टी की तर्जुमानी कर रहे हैं। जहां तकदूसरा आपका सवाल था किमुसलमान को क्या करना चाहिए? क्या था? अगरआप दोबारा रिपीटजी उत्तर प्रदेश आने वाले उत्तर प्रदेश केइलेक्शन मेंक्या सुरते रहेगी?जीजी तो वो देखिए मुसलमान के वोट से सरकारेंबनती और बिगड़ती तो है लेकिन खालिस उसी केवोट पे हो जाएगा। ऐसा कुछ नहीं है। यूपीमें 20स वोट है। बिहार में तकरीबन इतना हीहै। बंगाल में 30सदी आसाम में 35सदीलेकिन उसका वोट तब रेलेवेंट होता है जबउसके लिए दूसरी सियासी जमाते जो है जिनकेसाथ दूसरा वोट बैंक भी है वो मिलता है। तबमुसलमान का वोट रेलेवेंट होता है। यह हमनेदेखा है। जब चाहे एसपी की सरकार हो,बीएसपी की सरकार हो, जनता दल की सरकार हो,आरएलडी की सरकार आरजेडी की सरकार हो तो उसवक्त में वह हो जाता है। लेकिन जहां जिसमुद्दे पर आपने बातचीत शुरू की थी कि जबआपका एजेंडा ही इस पूरी कम्युनिटी को 20फीसदी से ज्यादा तबके को आइसोलेट कर देनाहो इरिलेवेंट बनाना हो और आपको एकमेजरिटेरियन कमिनल एजेंडा चला करके चुनावजीतना हो तो फिर यही सूरत बन के आती है जोफिलहाल बनी हुई है। लेकिन मुझे लगता है किअगर जिस तरह से पिछले लोकसभा चुनाव मेंउत्तर प्रदेश में 43 से ज्यादा सीटों परसेकुलर उम्मीदवार जीते और उन्होंने सोशलजस्टिस के नाम पर कम्युनल फोर्सेस कोहराया। अगर उस तरह का कुछ माहौल बनता हैतोमुश्किल नहीं है कि यूपी में भी वो बीजेपीको हराया जा सके। अब इसके लिए वोट किस तरहसे करना है? टैक्टिकल वोटिंग के लिएमुसलमान बहुत मशहूर है। वो कितना टैक्टिकलकर पाता है या जज्बाती तौर पर जाता है।देखिए वहां आज अखिलेश यादव और समाजवादीपार्टी एक बड़ी फोर्स है। तो उसके साथरहते हुए आप एक बदलाव की उम्मीद कर सकतेहैं। लेकिन अगर खाली कांग्रेस चुनाव लड़ेऔर वो इस बलबूते पर कि मुसलमान का वोट मिलजाएगा और बीजेपी को हरा दिया जाएगा वोसंभव नहीं है। तो जरूरत इस बात की है किएक सेकुलर पार्टियों का महाज बने और उसमेंफिर मुसलमान भी उसी तरह से सेुलर तरीके सेवोट करें और अपनी से सरकार में भी लाए औरपिटिकल पार्टीज में भी लाए तब कुछ बात बनसकती है। जी बिल्कुल देखना होगा कि कितनेकिस तरह से किस टेक्टिकल वोटिंग जो है वोकरता है क्योंकि हमने पश्चिम बंगाल मेंदेखा कुछ नाउदी जरूर हुई क्योंकि जिस तरहसे उन्होंने बाबरी मस्जिद की जो बात की दोसीटें वो जीत गए और इसके अलावा भी हमनेदेखा कि कई जगहों पर बट भी मुसलमानों नेवोट किया ये भी एक बात है कि मुसलमान कोईगाय बकरी भेड़ नहीं है कि हर बस एक हीपार्टी की तरफ उनको पीछे हाक दिया जाए।उनकी भी अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं। उनकेलिए भी अलग-अलग चीजें इंपॉर्टेंट होतीहैं। लेकिन फिलहाल उनको भी यह समझना बहुतजरूरी है कि उनके लिए जो मसला सारा बनकररह गया है वो है उनकी जान और माल का मसलाकि वो बचेगा तो बाकी तमाम चीजें वो बादमें देख लेंगे। लेकिन ये भी है कि ये जोसमाजवादी पार्टी हो चाहे आरजेडी हो येतमाम पार्टियां भी कहां मुसलमानों केहुकूक के लिए एक लफ्ज या एक लाइन बोलतीहुई या उनके लिए कभी कोई आवाज उठाती हुईभी तो नजर नहीं आती हैं। तो मुसलमान भीफिर यह सोचता है कि आखिर कब तक वो इन्हींपार्टियों पर रिलाई करता रहे और इन्हीं कोही वोट करता रहे और इन्हीं को सत्ता मेंबिठाए और फिर यही लोग उनकी कभी आवाज नाउठाएं। बहुत-बहुत शुक्रिया कुर्बान साहब।आपने बहुत वक्त दिया और बहुत इंटरेस्टिंगये कन्वर्सेशन रही। आई एम श्योर कि जोऑडियंस है उसे काफी कुछ सीखने के लिए मिलाहोगा। बहुत-बहुत शुक्रिया।आपका भी कुछथैंक यू सो मच। थैंक यू।
Companion article
The conversation opened with a question the host, Bushra Khanum Fahad, framed around West Bengal: within weeks of the state election, she noted, legislators and MPs elected on the Trinamool ticket had broken away and drifted toward the BJP. Is defection now a bigger threat to secular politics than the right wing itself? Qurban Ali, a journalist with more than 40 years in the profession, including a stint at the BBC and editorships at several channels, said the Bengal case is one example of something happening everywhere.
His explanation was that ideology has drained out of Indian politics. Until roughly 1980, he said, parties had a philosophy and people stayed with it, and even those who switched sides felt some shame. The term "Aaya Ram, Gaya Ram" dates from Haryana, but what was once an embarrassing exception has become a marketplace: buying and selling of legislators, as in Karnataka and Madhya Pradesh, where elected Congress governments were toppled, and, in his telling, in Rajya Sabha contests in Himachal Pradesh, where nominations are rejected or reversed and votes are bought. Political parties, he said, have turned into private limited companies with one slogan, love me and love my lot, and dynastic control is no longer a Congress-only charge. Anyone entering politics today, he said, will admit he came to become an MP or minister, and may be in the SP today, the BSP tomorrow and the BJP the day after.
He was emphatic that he did not think Mamata Banerjee was beaten fairly. She won more than 41 percent of the vote, he said, and those now leaving were, until a week earlier, silent about grievances they now voice.
Qurban Ali described the 2024 general election as being fought over whether the Constitution would survive. He recalled the "400 paar" slogan and the implication, as he read it, that a large enough majority would allow the ruling party to rewrite the Constitution, though the Supreme Court held in the Kesavananda Bharati case that its basic structure cannot be changed. He said the party in power has never embraced the Constitution, democracy, socialism or secularism wholeheartedly, and treats the words "socialist" and "secular" in the Preamble as a stigma because Indira Gandhi added them during the Emergency. Technically that is correct, he acknowledged, but the spirit of the Constitution, he said, was always fraternity and democracy.
Comparing the Emergency with the present, he argued that Indira Gandhi at least acted openly and paid for it in 1977, when she lost her own seat. What exists now, in his words, is what he called an emergency in all but name, and a worse one: mainstream media that cannot speak, courts that do not deliver justice, a civil society frightened of jail, and investigative agencies used against opponents. He also noted that the party in power lost 43 seats in Uttar Pradesh in 2024, evidence to him that voters could still be reached.
The host turned to what she called the Muslim question. Muslims are beaten, their homes bulldozed and their mosques demolished, she said, and they look to two places for relief: the courts and a change of government. If the representatives they elect end up in the BJP, where does that leave them? Qurban Ali answered in stages. The organisation behind the ruling party, he said, has worked for a century toward a Hindu nation and, in his view, has largely achieved one in practice if not in law. He noted that the BJP's more than 240 Lok Sabha MPs and roughly 100 Rajya Sabha members include no Muslim and no Christian, and said the party's explanation is that Muslims do not vote for it and its Muslim candidates lose.
But his sharper criticism was aimed at the opposition. Every party, he said, has adopted the narrative set by the BJP instead of countering it. When the Supreme Court decided the Ayodhya case, all parties welcomed it and declared the matter settled; the same happened with Article 370. Meanwhile state governments are legislating on a uniform civil code and even adivasi personal laws are being dismantled. In this account, the country is drifting toward a system with one religion, one flag and one colour, which also makes elections easier to win. His consolation was that the majority has not become communal: those who are, he said, have not grown beyond about 40 percent, though the other 60 percent is weak and disorganised.
The host asked why parties such as the AIMIM are quickly dismissed as the BJP's B-team when nobody says so of Mayawati's party, which speaks for Dalits, and why leaders who fight the BJP and then join it escape the label. She added that the AIMIM has repeatedly asked to join the INDIA bloc without success, and that its leader Asaduddin Owaisi has won awards as a parliamentarian and spoken constantly about the Constitution.
Qurban Ali distinguished caste-based parties from religion-based ones. Caste, he said, is a five-thousand-year-old affliction, and the Constitution offers redress through reservations; the Sikh, Christian and Muslim communities are not free of it either, though Dalit Muslims and Dalit Christians are denied Scheduled Caste benefits. A party organised around a religion, in his view, has limited acceptance beyond a few seats, and it gives the BJP a justification for its own religion-based politics. He offered the Indian Union Muslim League in Kerala as a different model. Its candidates won 22 seats in the state, he noted, and it has been in governments led by both the Left and the Congress and even sent a representative to the Manmohan Singh cabinet, because it avoids emotional slogans and has built a secular character. Politics built on such slogans and polarisation, he said, would be suicidal. The host responded that the label is applied unevenly, and that she does not endorse the AIMIM's politics but cannot dismiss the record.
On the wider history, he recalled Ram Manohar Lohia's slogan of the late 1960s, that the backward castes should get 60 in every 100, and the non-Congress governments in nine states it helped produce in 1967. His point was that Indian politics has organised around caste and class, not religion, and that Muslims need to work out who their real friends are and whether they are being treated as a vote bank. He cited the ten years of the Manmohan Singh government as a period when communal temperature was at an all-time low, with the Sachar Committee putting facts about Muslim conditions on record and challenging the appeasement narrative. He called the Ministry of Minority Affairs a non-starter in practice but noted that even the present government has not dared abolish it.
The most contested part of the conversation was Qurban Ali's insistence that the community has a responsibility as well. He said he was not absolving governments or parties, which are failing, but that Muslims cannot leave everything to them. The Constitution allows people to go from the lowest court to the Supreme Court, and even repeated dismissals put a matter on record. He said Muslims have come to believe that speaking up invites jail, and that this fear did not stop people from protesting during the Emergency.
He pointed to what has worked. He said he himself went to the Supreme Court over hate speech, and that a ruling in Qurban Ali v. Union of India directed police and administrators to act on their own instead of waiting for FIRs. He credited the lawyers Vrinda Grover and Rebecca John with pursuing the Hashimpura case to convictions, contrasting it with the killings at Maliana a day later, in which some 70 people died and where, he said, nothing was documented and no case was pressed. Documentation, he argued, is never wasted, and he said Muslim organisations and NGOs could do far more of it.
The host disputed the burden. When her team made a documentary on the widows of the Delhi riots, she said, it was hard to reach them, and there was no complete count; Sikhs, by contrast, still hold annual protests for 1984 and have documented their cases. She also asked how a community can set its identity aside when its identity is why it is targeted. Qurban Ali agreed she had a point, and did not deny the scale of the oppression, but said this is not permanent: a "dark night" and a long tunnel, in the spirit of Faiz's line that the night of oppression is still only a night. He cited Gaza and Iran as evidence that refusal to surrender counts for something, and said that the doors of justice have not closed for everyone, though they have narrowed.
Asked about the coming Uttar Pradesh election, the host also mentioned Congress's new emphasis on using the word "Muslim" instead of "minority" and Rahul Gandhi's visible stand. Qurban Ali was direct with the Congress. When it played a Hindu-Muslim card in the 1980s, opening the Babri Masjid lock and allowing the shilanyas, and Rajiv Gandhi spoke of Ram Rajya, it lost both communities' votes, he said, and it has not governed in Uttar Pradesh or Bihar since 1989. The BJP then took the issue up as its own. Rahul Gandhi is doing well as an individual, he said, but as Leader of the Opposition he is expected to take a firm stand on communalism, democracy and secularism.
On how Muslims should vote, he said Muslim votes make or break governments only when they combine with another party's own base. Uttar Pradesh is about 20 percent Muslim, Bihar similar, Bengal near 30 and Assam around 35, but no party can win on that alone. If secular candidates could win 43 seats in Uttar Pradesh in 2024 under the banner of social justice, he said, a repeat is possible, but it requires a broad secular front, with the Samajwadi Party under Akhilesh Yadav as the main force, and tactical voting. The host closed with a reminder that Muslims are not sheep to be herded toward one party, and that the Samajwadi Party and RJD have seldom spoken up for Muslim rights, which raises the question of how long they can go on relying on the same parties.
56:39In the first episode of Emerging Perspectives, Sania Ismailee joins Wardah Beg for a conversation about the philosophical questions that lie beneath India’s debate on the Uniform Civil Code. For eight years, through her PhD research, Sania examined the UCC through the questions of secularism and …
1:13:08How independent is the judiciary in India today? And what happens when citizens begin to lose confidence in the institutions meant to protect their rights?
2:44:36In this conversation, Dr. Harish S. Wankhede joins Ali Javed to examine the political and cultural legacy of Dr. B.R. Ambedkar and the evolution of the Dalit movement. They discuss how Ambedkar imagined Dalits as political subjects at a time when they were denied even basic human dignity, and how…
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