10:47Can Ganga-Jamuni Tehzeeb Survive? nous Clips
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Is India witnessing a rise in hate speech and hate crimes? What are the political, social, and institutional factors behind growing communal polarization, and how can society respond? In this thought-provoking conversation, Bushra Khanum, Senior Journalist, speaks with Irfan Engineer, Director of…
लेकिन मेरा एक सवाल यह है कि हिंदू राष्ट्र है क्या? हिंदू राष्ट्र को किसी ने डिफाइन नहीं किया। अगर यह हिंदू राष्ट्र एक्सप्शनिस्ट राष्ट्र तो हिंदू राष्ट्र का मतलब है के निरंतर फॉर एवर वॉर। 2014 से पहले के जो जो दंगे हुए हैं या इस तरह के जितने कम्युनल हिंसा हुई [संगीत] है तो आप ये देखेंगे कि बिना स्टेट के इनवॉल्वमेंट के वो भी नहीं हुआ था। हम देखते हैं कि जहां भी दंगा होता है वहां विक्टिम्स भी मुसलमान होते हैं। लेकिन पुलिस जिसको अरेस्ट करती है उसमें भी 90% मुसलमान होते हैं। और जब हम ये कहते हैं कि देखिए जो जरूरी मुद्दे हैं उनसे भटकाने के लिए ताकि ये सत्ता में बने रहे तो क्या हम इसकी इंटेंसिटी को कमा के नहीं देख रहे हैं? क्योंकि उनका तो मकसद ही है हिंदू राष्ट्र बनाना। उन्होंने कभी इसको छिपाया नहीं है। वी आर आवर नेशन ऑफ़ डिफाइन ने बहुत क्लियरली लिखा है कि मुसलमान और ईसाई इस देश के दुर्गम नागरिक और जब यह बात कहते हैं कि ₹00 भी हो जाएगा और दो कम रोटी खा लेंगे और महंगाई कितनी भी हो जाए लेकिन हमारा हिंदुत्व बचा रहे जो कैसे जायेंगे जिसमें सिर्फ मुसलमान नहीं क्रिश्चियन को भी बड़े पैमाने पर टारगेट किया जा रहा है। एक कम्युनिटी को दोम दर्जे का सिटीजन बना दिया जाए। उनके वोटिंग राइट जो कि सबसे बेसिक राइट है वो उनसे ले लिया [संगीत] जाए एक तरह से। अभी यही तो हो रहा है। ग्राउंड जीरो के समाज से कल्चरल निकालना होगा तो समाज कोता है। क्या एक कोई खाका तैयार करने की जरूरत है [संगीत] कि अभी फिलहाल किन चीजों पर सबसे ज्यादा काम करने की जरूरत है। हमारा मुल्क सभी की कुर्बानियों से आजाद है। इंडिया गेट में जो मार्केट्स के नाम लिखे गए उसमें [संगीत] 90% मुसलमानों के नाम। तो मेरा सवाल यह है कि ये डॉक्यूमेंटेशन को आप कितना इंपॉर्टेंट मानते हैं कि कम से कम दर्ज तो किया जाए। तो ये देश सभी का है और हमारा आईन भी ये कहता है कि जो भी यहां का नागरिक है सभी का ये देश नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब नाउ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खान फहाद और नाउ नेटवर्क के एक और पडकास्ट में आप सभी का इस्तकबाल है। आज का जो पडकास्ट है वो बेहद खास होने जा रहा है क्योंकि आज के हमारे मेहमान जो हैं वो ऑल द वे फ्रॉम मुंबई हमारे स्टूडियो में आए हैं और उनका लगातार काम है कम्युनल हार्मोनी को लेकर जिस तरह से देश में हिंसा कम्युनल हिंसा जो बढ़ रही है उसको वो लगातार डॉक्यूमेंट करते रहे हैं। दो किताबें उन्होंने इसको लेकर लिखी हैं। और मैं बात कर रही हूं इरफान इंजीनियर साहब की। इरफान इंजीनियर साहब इज दी डायरेक्टर एट सेंटर फॉर स्टडी फॉर सोसाइटी एंड सेकुलरिज्म। अ जो ये सेंटर है वो मॉनिटर करता है डॉक्यूमेंट करता है कम्युनल वायलेंस को और यह काम वो 1993 से लगातार करते जा रहे हैं। द ऑब्जेक्टिव ऑफ दिस सेंटर इज़ टू प्रमोट कम्युनल हार्मोनी। इंजीनियर साहब जो हैं इरफान साहब इज आल्सो को कन्वीनर ऑफ इंटर रिलीजियस सॉलिडेडरिटी काउंसिल व्हिच रिसेंटली ऑर्गेनाइज्ड अ कॉन्क्लेव ऑफ रिलीजंस इन मुंबई। अह प्रोमिनेंट रिलीजियस लीडर्स पार्टिसिपेटेड इन दिस कॉन्क्लेव। इरफान साहब इज आल्सो ऑथर ऑफ द बुक द स्टेट्स ऑफ फ्रीडम ऑफ रिलीजन ऑन और बिलीफ इन इंडिया सिंस 2014 ही हैज़ कोऑथर्ड द बुक वेपनाइजेशन ऑफ हिंदू फेस्टिवल्स इन इंडिया और आज हमारी बातचीत इसी के इर्द-गिर्द होने जा रही है। आपको यह पता है कि बकरा ईद से पहले और बकरी ईद के बाद जिस तरह से कम्युनल वायलेंस के हमें नए इंसिडेंसेस देखने के लिए मिल रहे हैं। इसको कहीं ना कहीं आने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है। गाजियाबाद में एक इंसिडेंट होता है जहां बकरा ईद के मौके पर एक हिंदू युवक की कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा हत्या कर दी जाती है। जाहिर सी बात है कत्ल किसी भी तरह का किसी के भी जरिए किसी का कत्ल किया जाए उसे किसी भी कीमत पर जस्टिफाई करना तो बहुत दूर की बात उसके जितने कड़े अल्फाज में उसकी मजम्मत की जाए, निंदा की जाए वो कम है। और लेकिन हुआ क्या कि इस हत्या के बाद फौरन उस मुस्लिम शख्स का एनकाउंटर पुलिस के जरिए कर दिया जाता है। बाकी लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और अब उसके घर पर बुलडोजर से उसके घर को जमींदोज करने का जो नोटिस है वो लगा दिया गया है। पूरे इलाके में गाजियाबाद के एक बड़े पैमाने पर कम्युनल टेंशन हमें देखने के लिए मिल रही है। जहां हिंदुत्ववादी संगठन ये कह रहे हैं कि इनको यहां पर रहने नहीं देंगे। जुम्मे की नमाज होने नहीं देंगे और लगातार वहां हिंदुत्ववादी संगठनों के पहुंचने का सिलसिला लगातार जारी है। आपने दिल्ली के नॉर्थ ईस्ट इलाके में भी होली के आसपास इसी तरह का आपने वाकया देखा था और वहां पर भी आपने देखा था कि किस तरह की कम्युनल टेंशन हमें देखने के लिए मिली थी। बिल्कुल उसी तरह से हमें अब गाजियाबाद के इस खोड़ा इलाके में हमें देखने के लिए मिल रही है। सेम उसी ईद के इर्द-गिर्द जहांगीरपुरी में भी एक मुस्लिम युवक की इसी तरीके से उसके जान पहचान के जो उसके दोस्त थे उन्होंने इसी तरीके से उसको उसकी हत्या कर दी गई। लेकिन उसको लेकर आप ये देखें ना तो उस शख्स का एनकाउंटर हुआ उस हिंदू शख्स का और ना ही उस हिंदू शख्स के घर के बाहर बुलडोजर का नोटिस जो है वो चसपा किया गया है। गाजियाबाद में भी एक और इंसिडेंट हुआ जहां पर पैरामिलिट्री जो एथलीट है जो कि हिंदू था और उसको एक दूसरे हिंदू शख्स जो कि उसको जानने वाला था उसका दोस्त था उसकी हत्या कर दी जाती है। लेकिन उसको लेकर भी आप किसी तरह का एजिटेशन या हिंदुत्ववादी संगठनों का जो आप फिलहाल विरोध प्रदर्शन देख रहे हैं वो आप नहीं देखेंगे। तो क्या एक हिंदू की जान भी तभी अहमियत रखती है जब उसकी हत्या एक मुस्लिम द्वारा की जाए और अगर एक हिंदू द्वारा हिंदू की हत्या की जाए तो क्या इस हिंदू की जान क्या कम हो जाती है? उसकी अहमियत कम हो जाती है? इससे ही आप समझिए कि इस सबके पीछे का मकसद दरअसल है क्या? उस पर योगी आदित्यनाथ का बयान आप समझ सकते हैं कि उसको किस तमाम चीजों को किस तरह से लेजिटिमाइज करता हुआ नजर आता है। यह सिर्फ मैं एक इंसिडेंट की यहां पर बात कर रही हूं और इससे मैं आपको यह बताने की कोशिश कर रही हूं कि हर रोज एक नया मुद्दा एक नई चीज ढूंढी जा रही है जिससे देश में मुसलमानों को डिमिनाइज किया जाए। उनको टारगेट किया जाए और उनको यह बताया जाए कि कैसे वह देश के लिए एक थ्रेट हैं। यह देश के दुश्मन हैं। खाते यहां के हैं। गाते वहां का है। इस तरह की तमाम बातें फिर से कही जा रही हैं। इरफान साहब से इसी के इर्द-गिर्द में बातचीत करने जा रही हूं। यह भी बातचीत मैं करूंगी कि आखिर इसको लेकर क्या किया जाए? जो एफर्ट्स किए जा रहे हैं वो क्या इनफ हैं? उनका सेंटर किस तरह से काम कर रहा है? इरफान साहब सबसे पहले मेरा सवाल आपसे यह है कि पूरे देश भर में जिस तरह से आप इस कम्युनल टेंशंस को कम्युनल हिंसा को जिस तरह से आप एक बहुत लार्ज स्केल लार्ज पैमाने पर आप जो बढ़ता हुआ देख रहे हैं। इसमें सिर्फ इजाफा होते हुए देख रहे हैं। हम किसी तरह की कमी होते नहीं देख रहे हैं। इसको आप कहां जाता हुआ देख रहे हैं? क्योंकि आपकी एक एक जो बुक है जिसको जिसका एक मैं पूरा तो इसको नहीं पढ़ पाई। ऑफ कोर्स बट इसकी समरी मैं पढ़ पाई जो यह साफ तौर पर कहती है कि वेपनाइजेशन ऑफ हिंदू फेस्टिवल इन इंडिया कि कैसे राम नवमी से लेकर उन तमाम जो फेस्टिवल्स आते हैं इनको किस तरह से वेपनाइज किया जा रहा है। मैं यह भी देखती हूं कि जब मुसलमानों के त्यौहार आते हैं तो उन्हें लॉ एंड ऑर्डर की समस्या बना दिया जाता है। जब हिंदुओं के त्यौहार आते हैं तो यह बताया जाता है कि कैसे हिंदुओं के त्यौहारों पर मुसलमान एक थ्रेट पैदा कर रहे हैं। तो आप कैसे देखते हैं इस सबको? 2014 के पहले और 2014 के बाद बहुत बड़ा फर्क पड़ा है कम्युनल हिंसा को लेकर। 2014 के पहले भी कम्युनल हिंसा होती थी। रायट्स होते थे। रायट्स कुछ साइकिल में चलते थे के पांच साल के बाद सात साल के बाद 10 साल के बाद एक बड़ा रायट हो जाता था। छोटे-मोटे रायट चलते रहते थे। उसमें बड़ी समस्या ये थी कि स्टेट उसका पेट्रोनेज नहीं था उस राय को लेकिन जो दंगा पीड़ित है उसको इंसाफ भी नहीं मिलता था कभी कबभार कोई इक्कादुक्का पुलिस ऑफिसर रायड में पार्टिसिपेट भी करता था जैसे मलियाना में हुआ 1987 के लीगल ट्रायल्स में 40 नौजवानों को निकाल कर 27 लोगों को मार के गोली मार के उनको गंगा कैनाल में फेंक दिया हम्म और उसका तब एसपी एक अच्छे वीए राय साहब थे। उन्होंने पूरा उसका एफआईआर लिखा और उसको इन्वेस्टिगेट करवाया। आज तक उनको भी सजा नहीं मिली है। उसमें जो पुलिस ऑफिसर्स इन्वॉल्व थे जिन्होंने पॉइंट ब्लैंक रेट से 27 लोगों को मार के गंगा के कैनाल में फेंक दिया। हम उसका किसी को इंसाफ नहीं मिल पाया है। उसके लिए तो इंसाफ ना मिलना एक बहुत बड़ी समस्या थी। लेकिन उतनी ही थी। आज हम देखते हैं कि 2014 के बाद जो रस होते हैं वो उसमें स्टेट और मैं जिम्मेदारी से वर्ड यूज़ कर रहा हूं। पुलिस नहीं इक्कादुक्का पुलिस ऑफिसर नहीं स्टेट पार्टिसिपेट करती है। जो पहले दंगाई काम करते थे वो स्टेट अब करती है। दंगाई पहले प्रॉपर्टीज को नुकसान पहुंचाती थी। घरों को जलाती थी। तोड़ती थी। उनके पास लिमिटेड जराए होते थे घरों को तोड़ने के लिए, डेमोलिश करने के लिए। आज दंगा होता है तो स्टेट बुलडोजर लेकर पहुंच जाती है और स्टेट उसको तोड़ती है। आज हम देखते हैं कि जहां भी दंगा होता है वहां विक्टिम्स भी मुसलमान होते हैं दंगों में। 80 से 90% विक्टिम्स मुसलमान होते हैं। लेकिन पुलिस जिसको अरेस्ट करती है दंगों के लिए उसमें भी 90% मुसलमान होते हैं। पहले दंगा करने के लिए अरेस्ट किए जाते थे। अब सेडिशन के नाम पर अरेस्ट करते हैं के एक तो बेगुनाह लोगों को पकड़ते हैं। फिर ऐसे ड्रैकोनियन लॉस में चार्जशीट फाइल करते हैं कि वो बच्चे सालों तक निकल नहीं पाते हैं। 10 साल 11 साल जेल में रहते हैं। उनको बेल पर छूटना मुश्किल हो जाता है। और किसको पकड़ते हैं? तो बेचारे दिहाड़ी पर काम करते हैं। ऐसे लोगों को पकड़ते हैं, मजदूरों को पकड़ते हैं। गरीब बस्तियों से पकड़ते हैं। और बेचारे कमाने वाला इंसान जब जेल में रहता है तो एक तो कमाई का जरिया बंद हो जाता है। फिर कोर्ट के खर्चे, वकीलों के खर्चे शुरू हो जाते हैं। तो एक तरीके से एक इकोनॉमिक पनिशमेंट हम स्टेट दे रहा है और पूरी कम्युनिटी को दे रहा है। ये जानते हुए कि वो बेगुनाह लोगों को पकड़ रहा है। तो यह सजा उसको पूरी कम्युनिटी को देनी है। उस तरीके का एक्शन से वो यह बताना चाहते हैं कि कम्युनिटी पूरी जिम्मेदार है रायड के लिए। हम हमने दिल्ली में जामिया में देखा जब एनटीसीए प्रोटेस्ट मुस्लिम महिलाओं ने किया तब नॉर्थ ईस्ट में 2020 में दंगा ओपनली कपिल शर्मा कपिल मिश्रा सॉरी कपिल मिश्रा उन्होंने ओपनली ऑन कैमरा इंस्टीिगेट किया और पुलिस के साथ खड़े होकर पुलिस के साथ खड़े होकर कहा कि ये अगर यहां से जाएंगे नहीं तो दंगा होगा और उसके जिम्मेदार ये होंगे। ओपनली कहने के बाद उस दंगों की कास्परेसी के लिए आज जेल में कौन बंद है? उमर खालिद बिल्कुल और वो पांच सालों से बंद है। उसकी जमानत नहीं हो रही है। और कोर्ट के बाद कोर्ट के बाद कोर्ट उसकी जमानत को रिजेक्ट कर रहे हैं। जी। अभी सुप्रीम कोर्ट के एक बेंच ने कहा है कि ये दोहरा दोहरे नजरिए से देखा गया बेल को उमर खालिद और उनको छोड़ देना चाहिए था बेल पर छोड़ देना चाहिए था एक प्रोसेस को पनिशमेंट बना रहे हैं हम लीगल प्रोसेस को पनिशमेंट बना रहे तो इसलिए मैं कह रहा हूं कि आजकल स्टेट भी दंगों में हिस्सा ले रही है जब बुलडोजर से घरों को तोड़ रही है इनोसेंट और जिसके जिसके घर तोड़ रही है सारे मुसलमान है इक्कादुक्का छोड़कर हम सारे मुसलमान है तो अब स्टेट जो पहले दंगाई करते थे वो स्टेट अब वो काम कर रही है लेकिन मेरा सवाल ये इरफान साहब क्योंकि आप 2014 की आपने शुरू में बात की क्या जब राइट्स होते थे मैं खुद अह जब बाबरी मस्जिद को डिमोलिश किया गया मैं उस वक्त उत्तर प्रदेश में रहती थी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से टाउन में रहती थी बहुत छोटी थी लेकिन मुझे क्लियरली याद है कि किस तरह से वहां पर दंगे भड़के थे और मुझे अपना घर छोड़कर हम पूरे फैमिली को हमें भागना पड़ा था और मैं एक तरह से खुद एक राइट विक्टिम हूं। क्या आपको लगता है कि वो एक ऑर्गेनिक तरीके से यानी के एक कम्युनिटी का गुस्सा दूसरी कम्युनिटी को लेकर फूटा। आपस में हिंसा हुई। उसमें स्टेट का कोई इनवॉल्वमेंट नहीं था। स्टेट ने उसको एक तरह से बढ़ावा नहीं दिया था। स्टेट से मेरा मतलब पॉलिटिकल पार्टी से उस वक्त की जो सत्ता में थी। क्या आपको लगता है कि तब ऐसा नहीं होता था और अब ऐसा होता है? बाबरी मस्जिद का को लेकर जो दंगा हुआ उसमें कहीं एक वाइल्ड पार्टिसिपेशन स्टेट का दिखता है कि स्टेट ने जो सुप्रीम कोर्ट को हलफना हलफनामे पर वचन दिया था कि हम दंगा नहीं होने देंगे। हम उसको कंट्रोल करेंगे। तब के जो चीफ मिनिस्टर थे कल्याण सिंह उन्होंने भी ये वादा दिया था हलफनामे हलफनामे पर सुप्रीम कोर्ट को कि हम दंगा नहीं होने देंगे और दंगा हुआ तो रोकेंगे लेकिन पुलिस को नाकाम कर दिया उस वक्त के जब बाबरी मस्जिद को तोड़ा जाने लगा धाने लगा शहीद करने लगे तब पुलिस नाकाम हो गई उन्होंने कोई एक्शन नहीं लिया जो दंगाई पर एक्शन ले सकते थे। उसको तितर उस भीड़ को तितर-बितर कर सकते थे। तो स्टेट बिकम अ पैसिव पार्टिसिपेंट। क्योंकि आप ये देखेंगे कहीं पर भी चाहे 2002 की बात करें, 6 दिसंबर की बात करें, मलयाना की आप बात करें, हाशिमपुरा की हम बात करें, हम और तमाम जगहों की हम बात करें ये 2014 से पहले के जो जो दंगे हुए हैं या इस तरह के जितने कम्युनल हिंसा हुई है। तो आप यह देखेंगे कि बिना स्टेट के इनवॉल्वमेंट के वो भी नहीं हुआ था क्योंकि पुलिस की मौजूदगी में अगर यह सब कुछ हो रहा है तो सवाल तो तब भी आप उसका इंटेंसिटी को आप शायद अलग तरीके से देख सकते हैं या आप यह देख सकते हैं कि शायद जिस तरीके से किया जा रहा था उन तरीकों में शायद आप बदलाव देख सकते हैं। लेकिन कंप्लीटली क्या हम इसको यह कह सकते हैं कि तब ऐसा नहीं होता था और अब ऐसा होता है? मैं एक फंडामेंटल डिफरेंस जी आपके सामने रख रहा हूं हम कि तब लार्जली स्टेट पैसिव होता था दंगा होते हुए देखता था हम इक्कादुक्का केस में मुस्लिम्स को टारगेट भी किया हम के जब कर्फ्यू डिक्लेअ होता तो मुसलमानों को घर में रहना पड़ता और हिंदू दंगाई सड़क पर होते ये देखा गया है जब कोबिंग ऑपरेशन के नाम पर मुसलमानों के घरों पर जाकर सिक्योरिटी ऑफिसर्स ने सिक्योरिटी पर्सनल ने गोलियां चलाई है। मुसलमानों पर टारगेट किया है। वो मिरर का दंगा हो या मरियाना का दंगा हो या ऐसे और भी इंसिडेंट्स है। इक्कादुक्का पुलिस ऑफिसर मुस्लिम कम्युनिटी को टारगेट करते या सिक्योरिटी फर्सेस को जब भी फायरिंग करना होता क्राउड को तितर-बितर करने के लिए तो फायरिंग राइडिंग मॉक पर ना होकर मुसलमानों पर फायरिंग होती है। पुलिस फायरिंग में बंबई में जो दंगा हुआ 9293 में उसमें 80% विक्टिम्स पुलिस फायरिंग के मुसलमान है। हम जबकि दंगाई हिंदू थे हम हिंदू मॉब्स थे और विक्टिम्स मुसलमान थे तो पुलिस फायरिंग मॉब्स को अगर टारगेट करती दंगा करने वाले मॉब को टारगेट करती तो ज्यादा हिंदू मरते। तो एक पुलिस का पार्टीजन रोल रहा है। पर अब फर्क यह है 2014 के बाद के स्टेट ओपनली हिंदू राइटिंग दंगाइयों के साथ साइट करता है। हम बुलडोजर लेकर पोस्ट रायड ऑपरेशंस को लेकर मुसलमानों को बड़े पैमाने पर अरेस्ट करके और एक तरीके से ऐसा लगता है कि जो दंगाई चाहते थे मुसलमान मुस्लिम कम्युनिटी को नुकसान पहुंचाना इकोनॉमिक नुकसान पहुंचाना माली नुकसान पहुंचाना उनके जान माल और प्रॉपर्टीज को नुकसान पहुंचाना वो अब स्टेट ओपनली करती है हम जो मांग करते हैं उनको पूरा किया जाता है। जो मांग करते हैं उनको पूरा किया जाता है। पहले जो दंगाई काम करते थे अब स्टेट उस दंगे में पार्टिसिपेट करके जो दंगाइयों की इच्छा होती है वो सेटिस्फाई करती है। हम पहले खाली पैसिव रहती थी। दंगाई काम करते जितना नुकसान पहुंचा सकते। नेचुरली दंगाइयों के पास दंगा करने वालों के पास रिसोर्सेज कम होते हैं। वेपन्स या इक्विपमेंट्स कम होते हैं। हम इसलिए उतना ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचा सकते थे जितना स्टेट पहुंचा सकती है। अब स्टेट पहुंचाने लगी। दूसरा एक फर्क पैटर्न में ये हुआ है के छोटे-छोटे दंगे बहुत होते हैं। जैसे पहले गुजरात का दंगा या दिल्ली में 1984 में एंटी सिख दंगा या भागलपुर का 1989 का दंगा। बड़े पैमाने पर साइकिल्स में बड़े दंगे होते थे। आजकल ऐसे बड़े दंगे नहीं होते यानी बड़े दिखाई देने वाले नहीं होते क्योंकि कहीं तो रूलिंग पार्टी को लगता है लगता होगा कि हम लॉ एंड ऑर्डर के लिए जिम्मेदार हैं। ये एक इमेज बनाई हुई है। ये इमेज बनाई हुई है और शांति बाहर का इन्वेस्टमेंट आए। इकोनमी भी चले। इकोनमी में बड़ा डिरप्शन ना हो लेकिन दंगे होते रहे। हम तो छोटे पैमाने पर छोटे दंगे बहुत ज्यादा संख्या में होते हैं और जो नुकसान पहुंचाना होता है वो दंगा ही नहीं स्टेट के पार्टिसिपेशन की वजह से नुकसान ज्यादा होता है और कंट्रोलोल्ड एरिया में होता है। हम दूसरा वायलेंस का तरीका जो बदला है कि एक हिट भी एक प्रकार का वायलेंस ही है। एक कम्युनल वायलेंस है। उसको हम एटीट्यूडनल वायलेंस कह सकते हैं और हम उसको एटीट्यूडनल वायलेंस के तौर पर कवर करते हैं। क्योंकि किसी भी फिजिकल वायलेंस का फाउंडेशन एटीट्यूडनल वायलेंस होता है और ये हेट्रेट बहुत कहीं गुना ज्यादा बढ़ गया है। हम हेट्रेट की इंटेंसिटी जिस प्रकार के शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं। हर कई प्रकार के जिहाद डिस्कवर किए गए हैं। ये वायलेंस हिट स्पीचेस में जमीन पर नहीं है लेकिन हिट स्पीचेस में लव जिहाद और कॉर्पोरेट जिहाद और ये जिहाद वो जिहाद थूक जिहाद सिविल सर्विज से लेकर हर तरीके का इंटेंसिटी और उसकी शिद्दत एकदम बड़ी है। हम ये एक बड़ा चेंज है। उसका फ्रीक्वेंसी बहुत बड़ी है। आए दिन कोई भी सबको लगता है कि हम मुस्लिम कम्युनिटी को टारगेट करने के लिए हिट स्पीचेस में टारगेट करने के लिए हम हम आजाद हैं। कोई हम पर कोई कारवाई नहीं होगी। कारवाई नहीं होगी। और ये हिट स्पीचेस प्राइम मिनिस्टर, होम मिनिस्टर, बीजेपी पार्टी के प्रेसिडेंट से लेकर एकदम टॉप लेवल से जो शुरू होती है तो निचले लेवल पर लगता है कि हम तो ये सारी बातें कर ही सकते हैं। हम पार्लियामेंट के अंदर जब आप इंडिपेंडेंस की स्पीच में लाल किले से जब इस तरह की बातें कही जाए, जब खुद देश के प्रधानमंत्री जो बार-बार कहते हैं कि हम 140 करोड़ का मैं प्रधानमंत्री हूं। बार-बार कहते हैं वो जाकर और फिर उसके बाद वो ये कहें कि ये आपकी बेटी ले जाएंगे, रोटी ले जाएंगे, आपका मंगलसूत्र ले जाएंगे, आपका घर पर कब्जा कर लेंगे। अगर इस तरह की बातें की जाए तो जाहिर सी बात है कि आप इसको एक बिलीवबल बना रहे हैं और जो आपका सपोर्टर है उसको आप यह बता रहे हैं कि ये ऐसे ही होते हैं। यानी कि आपके पड़ोस में रहने वाला कोई मुसलमान हो, आपका कोई कलीग हो, आप के जान पहचान का कोई हो या फिर आप राह चलते किसी मुसलमान को आप देखें तो आपको लगे यह लोग तो इसी तरह से होते हैं। तो आपको लग रहा है कि यह भी एक इसका बहुत बड़ा रीजन है कि किसी भी शख्स को ट्रेन में पीट-पीट कर मार दिया जाता है। उन्होंने वायलेंस को एकदम नॉर्मलाइज कर दिया है कि आप बेझू तरीके से अगर मुस्लिम कम्युनिटी के लोगों को टारगेट करते हैं चाहे हिट स्पीचेस में चाहे फिजिकल वायलेंस में तो हम पर कुछ नहीं होगा और जब देश के प्रधानमंत्री कपड़ों को देखकर पहचानेंगे ऐसी भाषा इस्तेमाल करते हैं तो ये जो दंगाई है जो जिसके मन में मुसलमानों के खिलाफ जहर भरा हुआ है। उसको लगता है कि वो एक देशभक्ति का काम कर रहा है कि जब मुस्लिम कम्युनिटी को टारगेट कर रहे हैं तो देशभक्ति का काम कर रहा है। ऐसा उसको यानी जैसे हम फ्रीडम स्ट्रगल में पार्टिसिपेट नहीं कर पाए। ये एक नया फ्रीडम स्ट्रगल है जिसमें हम पार्टिसिपेट कर रहे हैं। और नरेंद्र मोदी हमारे प्राइम मिनिस्टर को हमेशा ये लगता था कि नेशन बिल्डिंग में सिटीजंस का रोल होना चाहिए। ये रोल वो सिटीजंस को देना चाहते हैं। उसके नेशन बिल्डिंग में ताकि अह सरकार की पॉलिसीज़ पर कोई सवाल ना उठे। हम्। उसका क्रिटिसिज्म ना हो। और एक तरीके से अपनी देशभक्ति या लॉयल्टी टू द नेशन कैसे जाहिर करोगे बाय टारगेटिंग माइनॉरिटीज़। जिसमें सिर्फ मुसलमान नहीं क्रिश्चियंस को भी बड़े पैमाने पर टारगेट किया जा रहा है। हम और उन पर भी वायलेंस कई गुना ज्यादा बड़ा। जी। मेरा सवाल लेकिन ये है इरफान साहब कि जब हम इसको इस तरह से देखते हैं जो अभी आपने मेंशन किया कि ताकि जो जरूरी सवाल हैं वो सरकार से ना पूछे जाएं और वो इसी तरीके से एक मेजर पॉपुलेशन को इसी में वो उलझा कर रखें। लेकिन क्या जब हम ये कहते हैं तो क्या हम इसकी इंटेंसिटी को कम आंक नहीं देख रहे होते हैं? क्योंकि अगर हम आरएसएस की आईडियोलॉजी को देखते हैं, आरएसएस जिस जिस आईडियोलॉजी पर खड़ी है, उसका तो बेस ही यह है क्योंकि बीजेपी सत्ता में आए या बीजेपी सत्ता में ना आए। आरएसएस तो थी 100 साल से है और लगातार वो इसी इन्हीं तमाम चीजों पर वो काम भी कर रही है। तो जब हम सिर्फ बीजेपी की बात करते हैं और आरएसएस की बात नहीं करते और जब हम यह कहते हैं कि देखिए जो जरूरी मुद्दे हैं उनसे भटकाने के लिए ताकि ये सत्ता में बने रहे तो क्या हम इसकी इंटेंसिटी को कम आके नहीं देख रहे हैं क्योंकि उनका तो मकसद ही यह है हिंदू राष्ट्र बनाना। उन्होंने कभी इसको छिपाया नहीं है। वो हमेशा से इस बात को कहते रहे और हिंदू राष्ट्र कब बनेगा? जब मुसलमान दोयम दर्जे का सिटीजन बनकर यहां पर रहेगा जब उसके पास उसके कोई हक नहीं होंगे। वो चाहे वोटिंग का हो या फिर किसी भी तरह का उसका जो हक है जो संविधान उसे देता है जब उसे तमाम ले लिए जाएंगे तभी तो हिंदू राष्ट्र एक तरह से अस्तित्व में आएगा। नहीं बिल्कुल मैं आपसे एग्री करता हूं कि इसकी जड़ में हम आरएसएस की आईडियोलॉजी है। हिंदू राष्ट्रवाद की आईडियोलॉजी है। जिस आईडियोलॉजी के चलते जिसमें मुसलमान को सेकंड क्लास सिटीजन बनाना है। गोलवालकर ने अपनी किताब वी और आवर नेशन और डिफाइन में बहुत क्लियरली लिखा है कि मुसलमान और ईसाई इस देश के दुर्यम नागरिक है। ये फॉरेनर्स हैं। यह यहां होने ही नहीं चाहिए और आरएसएस को एक मुस्लिम्स और क्रिश्चियन से पाक राष्ट्र बनाना है। के राष्ट्र का मतलब हिंदू राष्ट्र राष्ट्र का मतलब वह राष्ट्र नहीं जो इंक्लूसिव राष्ट्रह जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़कर जिस नेशनलिज्म की भावना के तहत हमने फ्रीडम हासिल किया और लोगों को प्रॉमिस किया था डेमोक्रेसी सबको आजादी होगी सबको इक्वलिटी होगी डिग्निटी ऑफ़ एव्री लाइफ हर नागरिक की डिग्निटी को प्रोटेक्ट किया जाएगा फ्रेटरनिटी बनाना ये हमारे संविधान के अनु में लिखा है। वो राष्ट्रवाद नहीं वो हिंदू राष्ट्रवाद की बात करते हैं। और हिंदू राष्ट्रवाद में मुसलमानों और ईसाइयों की कोई जगह नहीं है। है तो दुयम नागरिक की तरह है। और ये इस हिंसा के द्वारा वो बार-बार जताना चाहते हैं कि आप दुयम नागरिक हो। बीजेपी इसी आईडियोलॉजी को लेकर चल रही है और ओपनली कह भी रही है। ओपनली इसको कह भी रही है कि हम इस आईडियोलॉजी पर चलते हैं। हम हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं। लेकिन मेरा एक सवाल ये है कि हिंदू राष्ट्र है क्या? हिंदू राष्ट्र को किसी ने डिफाइन नहीं किया। एक हिंदू राष्ट्र का मतलब है अगर आप हिंदू राष्ट्र को देखें तो उसमें पूरा दक्षिण एशिया आ जाता है। अखंड भारत पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, तिबेट आज चाइना के कब्जे में है। तिबेट, श्रीलंका अगर ये हिंदू राष्ट्र है। एक्सपेंशनिस्ट राष्ट्र है। तो हिंदू राष्ट्र का मतलब है के निरंतर फॉर एवर वॉर इजराइल ग्रेटर इजराइल बनाना चाहता है। सब लोग सब देश सब ऐसी जो राइटनिंग आईडियोलॉजीस है वो एक्सपेंशनिस्ट होते हैं। हिटलर ने ग्रेटर जर्मनी का नारा दिया था कि वो पूरा ईस्ट यूरोप लेकर जर्मनी का हिस्सा बनाएगा। वो दूसरे देश जर्मनी के तहत रहेंगे। तो अखंड भारत क्या ये एक्सपशनिस्ट है या अखंड भारत की सीमाएं अभी जो इंडिया की सीमा है वही रहेगी? अगर वही रहेगी तो उसके अंदर जो माइनॉरिटीज है उसको दुयम नागरिक बनाना जरूरी है। या तो उसको देश निकाला करे उसको मजबूर करे कि वो देश छोड़कर चला जाए। कहीं और बस जाए या अगर रहेगा तो यहां मजदूर बनकर रहेगा। स्लेव बनकर रहेगा या नागरिक नहीं होगा। ये तो उसकी असल आईडियोलॉजी है। लेकिन साथसाथ में इस सरकार का एक और पर्पस सर्व होता है इस निरंतर चलने वाली हिंसा से और वो ये है कि जो हिंदू नागरिकों के लाइवलीहुड इशूज़ है वो दरकिनार हो जाते हैं। उस पर कोई तवज्जो नहीं देती। मीडिया तवज्जो नहीं देती। सरकार को तवज्जो देने की जरूरत नहीं है और पीछे से कहीं हिंदू नागरिक और मुस्लिम नागरिक सभी नागरिक हो लेकिन इंक्लूडिंग हिंदू नागरिक उनकी जेब से चोरी हो रही है और ये हम देखते हैं इनकिटीज बढ़ रही है हम इस पर हिंदू प्रोटेस्ट करते नजर नहीं आ रहे मुस्लिम हिंदू क्या आपको लग रहा है कि उनके ज़हन में ये बात डाल दी गई है क्योंकि अक्सर आप देखते होंगे हो सकता है कि कुछ चंद मुट्ठी भरे ही लोग वो ये कहते हैं कि हम ₹500 लीटर जो है पेट्रोल डीजल हम ले लेंगे। हम दो रोटी कम खा लेंगे। लेकिन हमें चाहिए यही सरकार और अब शायद उनको नरेंद्र मोदी भी कम कट्टर लगने लगे हैं। अब उनको योगी आदित्यनाथ में अपने हिंदुत्व का वो चेहरा जो है वो शायद नजर आता है क्योंकि वो सीधे एकदम अभी आपने देखा होगा हाल ही की जो उनकी स्पीच है गाजियाबाद को लेकर। हालांकि ऐसी उनकी ढेर सारी स्पीचेस हैं लेकिन अब वो मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए वो जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल करते हैं जिस तरह से वो स्टेज से सीधे तौर पर मुसलमानों के बारे में जो बात करते हैं वो जाहिर सी बात है उन लोगों को सबको एक पावर देता है कि इनको ना सबक सिखा के रखा हुआ है और ये योगी आदित्यनाथ ही कर सकता है। तो आपको आपको लग रहा है कि यह भी एक तरह से जहन में बिठा दिया गया है या ये ये वो लोग हैं जिन्हें हम मीडिया में या फिर हम वायलेंस के बाद जिनको इस तरह से वोकल होते हुए देखते हैं। लेकिन जो असली उनके अभी भी सवाल हैं महंगाई के, बेरोजगारी के क्योंकि आप ये देखें 80% तो हिंदूज ही हैं। 20% में तमाम माइनॉरिटीज हैं। तो वो उनके सवाल क्या इस हिंसा के बढ़ता हुआ जो ग्राफ है इससे क्या वो सबसाइड हो जाते हैं? क्या वह कम हो जाते हैं? और जब ये बात कहते हैं कि ₹500 भी हो जाएगा और दो कम रोटी खा लेंगे और महंगाई कितनी भी हो जाए लेकिन हमारा हिंदुत्व बचा रहे इसको आप कैसे देखते हैं? जी एक्चुअली शरीर में बहुत बहुत पेन है। हम लेकिन हम पेन किलर खा रहे हैं। उस पेन की वजह को डील नहीं कर रहे। हम उसको उसको एड्रेस नहीं कर रहे। तो कुछ ऐसा ही है कि ये हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं और हिंदू राष्ट्र में मुस्लिम्स और क्रिश्चियंस खास करके उनको मार्जिनलाइज करना चाहते हैं। उससे उनका एक और पपस सर्व होता है के जो इनफ्लेशन का पेन या बेरोजगारी बढ़ रही है उसका जो पेन भारत माता को भारत माता को जो उसका पेन हो रहा है या हमारी इकोनमिक ग्रोथ जिस तरीके से होनी चाहिए थी वो नहीं हो रही है उसका ग्राफ नीचे है उसका पेन ये सारे पेन की एक दवाई है हिंदुत्व के भूखा तो हूं मैं बेरोजगार तो हूं लेकिन हिंदुत्व हमारे जहनों में और खास करके हिंदू कम्युनिटी के कुछ तबके के जहनों में प्राइ देता है कि हम भूखे हैं तो क्या हुआ? हम सबसे हमारा सबसे अच्छा धर्म है या हम हमारा कल्चर सबसे ज्यादा सुपीरियर सिर्फ इसी सुख इसी बात का सुख लेकर इंसान सो जाता है। जैसे मुझे एक एग्जांपल याद आता है कि बच्चे भूखे हैं, रोटी मांग रहे हैं। मां क्या करती है? अनाज नहीं है घर में। मां तवे पर पानी छिड़क छिड़क कर ये बताने की कोशिश कर रही है कि खाना बन रहा है खाना बन रहा है तब तक बच्चे सो जाते हैं भूखे ही सो जाते हैं तो हमारा आर्थिक विकास देश का विकास नेशन बिल्डिंग चाइना देखिए या दूसरे देश देखिए इतनी तेजी से प्रगति कर रहे हैं। हम पिछड़े पिछड़ गए हैं। पहले तो बहुत ज़्यादा अह प्राइड हुआ कि हम टॉप फाइव इकॉनमी में आ गए हैं। हमारा नंबर चौथा आ गया है। अब हम अह [गला साफ़ करने की आवाज़] यूके को हरा के और अह टीम के अंदर शामिल है। आज स्थिति क्या है? वी आर ऑन द सिक्स्थ पोजीशन। इस पर कोई डिबेट नहीं। कोई नहीं हम इसी सुख में गौ माता है गौ माता के लिए हम लड़ रहे हैं मीडिया रिसर्च कर रहा है कि मेलडी कब बनी थी मेलडी कब बनी थी और वो किसने बनाई थी और उसकी बिक्री कितनी बढ़ गई है और अब देखिए तमाम जो ऑनलाइन जो जितने भी पोर्टल्स हैं वहां पर अब मिलनी बंद हो गई है वो तमाम ये बातें बातें करते हुए नजर आ रहे हैं कि कैसे प्रधानमंत्री जो हैं देखिए चीन के प्रधानमंत्री कैसे लड़खड़ा लड़खड़ा के उतर रहे हैं। लेकिन हमारे प्रधानमंत्री को देखिए सीढ़ियों से किस तरह से तो जब मीडिया का मीडिया का यह हाल हो जाए तो जाहिर सी बात है कि सवाल तो कोई पूछता हुआ नजर नहीं आ रहा। हम जैसी कुछ ऑर्गेनाइजेशंस हैं अल्टरनेटिव मीडिया है जो शायद कुछ सवाल पूछते हुए नजर आ रहे हैं। लेकिन एक लोकतंत्र का दिखावा तो है इरफान साहब। कि लोकतंत्र है। हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। जब वो दूसरे देशों में जाते हैं तो बात तो वो लोकतंत्र की, संविधान की, गांधी के आइडियाज की, उनकी वैल्यूस की, उसी सबकी करते हुए नजर आते हैं। तो क्या आपको लग रहा है कि एक अनडिक्लेयर्ड हिंदू राष्ट्र इस ऑलरेडी इन मेकिंग और इट्स ऑलरेडी देर। क्योंकि चाहे एसआईआर के थ्रू हम बात करें एसआईआर में आप देखें कि बड़े पैमाने पर किन के वोट कट रहे हैं वो लोग जाहिर सी बात है जो मार्जिनलाइज सोसाइटी से हैं और बड़े पैमाने पर मुसलमान जिनको लाखों मुसलमानों को बाहर निकाल दिया गया है। जो बाकी कम्युनिटीज हैं उनको बांग्लादेशी या रोहिंग्या बताकर उनको बॉर्डर के पार नहीं धकेला जाएगा या उनको उस तरह से इंसल्ट या जलील नहीं किया जाएगा। जैसे अभी हम देख रहे हैं पश्चिम बंगाल में कि 24 परगना से लेकर मालदा तक एक लंबी लाइन है जो लोग बैठे हुए हैं जिनको यह कहा जा रहा है कि हम वहां पर भेज रहे हैं और शिवेंदु अधिकारी ये कहते हुए नजर आ रहे हैं कि जल्दी-जल्दी भागो मेरे पास तुम्हें रखने के लिए या तुम्हें फैसिलिटेट करने के लिए मेरे पास कोई पैसे नहीं है और शिवेंदु अधिकारी वो हैं जो यह कह रहे थे कि वही हाल होना चाहिए जो इजराइल ने गाजा के साथ किया ऐसे लोग सत्ता में हैं मुख्यमंत्री हैं तो क्या इट्स ऑलरेडी देयर यह एक एक दिखावा हमें फिलहाल नजर आ रहा है क्योंकि कोर्ट से जिस तरह के फैसले आते हैं इंसाफ जब एक मजहब के मानने वालों के लिए अलग और दूसरे मजहब के मानने वालों के लिए अलग हो जाए। पुलिस अगर दो तरीके से बिहेव करती हुई नजर आए। स्टेट अगर दो तरह से बिहेव करता हुआ नजर आए। एक कम्युनिटी को दो दर्जे का सिटीजन बना दिया जाए। उनके वोटिंग राइट जो कि सबसे बेसिक राइट है वो उनसे ले लिया जाए एक तरह से। अभी यही तो हो रहा है कि वो है तो वोट भी करते हैं लेकिन उनके वोट की वैल्यू को ऑलमोस्ट खत्म कर दिया गया है। तो मतलब फिर क्या क्या क्या आप देख रहे हैं? आई आई माइट बी साउंडिंग वेरी यू नो डिसहार्टन एंड मे बी एक एक डिप्रेसिंग पिक्चर मैं पोट्रे कर रही हूं। लेकिन हकीकत से ना तो आप आंख मूंद सकते हैं ना ही मैं। हमारी डेमोक्रेसी अभी भी है। हम 2019 के चुनाव में वो जीते बड़ी मेजॉरिटी से जीते। उसके बाद 204 का चुनाव आया। जहां उन्होंने 400 पार का दा दिया। ये कहकर के हमें देश का संविधान बदलना है। तो 200 पर आ गए। यानी उनकी 240 पर आ गए। जी। उनकी मेजरिटी मेजरिटी भी नहीं आ सकी। इसका मतलब यह है कि हमारे देश का संविधान अभी भी नागरिकों में एक वजन रखता है और सबको बांध दे रखा है और हमारे देश के लोग चाहते हैं कि ये संविधान और डेमोक्रेसी टिकी रहे। नागरिक के आगे सरकार लाचार है। वो डेमोक्रेसी को समाप्त नहीं कर पाएगी। लेकिन ये संविधान रहते हुए धीरे-धीरे कैसे बदल करें, क्या चेंजेस लाए जो हमारे कॉन्स्टिट्यूशन के अनुसार नहीं है। एक लिबरल डेमोक्रेसी के तहत नहीं है। मातहत नहीं है। हमारे हमारा जो प्रएमबल है उसको उसको लेकर नहीं है। लेकिन एक दुयम नागरिक जो हिंदू और मुस्लिम नागरिकता में भेद करता है, डिस्क्रिमिनेट करता है। वो सरकार के एक्शन से हमें दिखाई देता है। हिंदू राष्ट्र क्या है? इसकी कोई परिभाषा क्लियर और शार्प नहीं है। अगर लोअर लेवल ऑफ हिंदू राष्ट्र अगर आप कहें जिसमें मुस्लिम्स और ईसाइयों को दुयम दर्जे का नागरिक महसूस कराया जा रहा है। वो हिंदू राष्ट्र वहां कह सकते हैं कि वो आ गया है। डेमोक्रेसी में बहुत सारी अलग-अलग चीजें होती है। डेमोक्रेसी का एक पार्ट है सरकार चुनना। इलेक्शंस फ्री एंड फेयर इलेक्शंस करके सरकार चुनना इलेक्शंस हो रहे हैं फ्री एंड फेयर तो नहीं हो रहे फेयर नहीं हो रहे उस पर सवालिया निशान अपोजिशन ने लगाया है सब लोग खुलकर बोल रहे हैं और दिखाई भी दे रहा है आंकड़ों से दिखाई दे रहा है एसआईआर के आंकड़ों से दिखाई दे रहा है कैसे वोट काटे जा रहे हैं। कैसे बीजेपी के लोग कैसे उनको वोट डालने वाले लोगों को ऐड कर रहे हैं। वोटर्स लिस्ट में हजारों की संख्या में ऐड कर रहे हैं। कैसे हरियाणा से ट्रेन चलाई जाती है। सबको बिहार के वोटिंग बिहार में वोट डालने के लिए ले जाने के लिए। ये तो हमारे इलेक्शन मॉडल कोर्ट के खिलाफ है। फिर भी इलेक्शन सेम पश्चिम बंगाल के इलेक्शन में भी किया जाता है। पश्चिम बंगाल के इलेक्शन में किया गया। फिर भी इलेक्शन कमीशन खामोश है। तो एकदम फ्री एंड फेयर इलेक्शन हो रहे हैं। ऐसा नहीं कह सकते लेकिन इलेक्शन हो रहे हैं। हम डेमोक्रेसी का एक दूसरा और अहम पार्ट है। वो है नॉट ओनली फ्री फ्री एंड फेयर इलेक्शन। नॉट ओनली इंगिंग अ गवर्नमेंट। लेकिन उसका दूसरा पार्ट है कि नागरिकों के हाथ में सत्ता रहे। एक्चुअल सिटीजंस कैन मेक देयर गवर्नमेंट अकाउंटेबल। हम्म हम ये असल डेमोक्रेसी है जिसमें लिबरल वैल्यूस है जिसमें फ्रीडम है जिसमें राइट टू लाइफ है सरकार के अधिकारों को महदूद किया जाता है डेमोक्रेसी में कॉन्स्टिट्यूशन के द्वारा के ऑल राइट्स आर विद द सिटीजंसदर रादर देन विद द गवर्नमेंट महात्मा गांधी ने एक बार कहा जब जिन्ना को प्राइम मिनिस्टर बनाने की बात आई कि जिन्ना को प्राइम प्राइम मिनिस्टर बना देंगे ताकि देश ना टूटे। और कुछ लोगों ने गांधी जी से सवाल पूछा कि क्या आप जिन्ना को प्राइम मिनिस्टर बनाएंगे? क्या फुल मुस्लिम कैबिनेट होगी और उनका मुस्लिम लीग का राज होगा और वो सरकार चलाएगी 1946 में। तो महात्मा गांधी ने बहुत अच्छी बात की थी कि सत्ता किसी के भी हाथ में हो। सरकार कोई भी चलाए। सत्ता निचले लेवल पर लोगों के हाथ में होनी चाहिए। सो दैट इज डेमोक्रेसी वेयर सिटीजंस कैन मेक गवर्नमेंट अकाउंटेबल हम एंड वेयर सिटीजंस आर अलाउड टू पार्टिसिपेट इन डे टू डे गवर्नेंस एंड देयर इंक्लूजन ये इस सेंस में अब अभी तक हम नहीं पहुंचे हैं। लेकिन वहां तक हमारा मार्च शुरू है। हम बहुत पीछे हट गए। ये बीडन का सर्वे अगर आप देखें जो स्केंडिवियन कंट्रीज जो डेमोक्रेसी के हेल्थ को ये करती है तो हमारी इलेक्ट्रोरल डेमोक्रेसी रह गई है। इलेक्टोरल अथॉरिटेरियन डेमोक्रेसी रह गई। जहां डेमोक्रेसी का सिर्फ एक पार्ट है कि इलेक्शन होते हैं। इलेक्शन कराए जाते हैं। बाकी सरकार अथॉरिटेड होती है और सारे अधिकार सरकार के हाथ में आ जाते हैं। फिर सरकार अपने फेवरेट लोगों को फेवर करें। एक कम्युनिटी को फेवर करें। दूसरों के साथ डिस्क्रिमिनेशन करें। इक्वलिटी को भूल जाए। नागरिकता को भूल जाए और सरकार राजा बन जाए। हम जो पहले किंगडम्स में राजा बनती थी। आज कुछ ऐसा सेमी ऐसी स्थिति और लोग एग्जांपल देते हैं ना कि इलेक्शन तो रशिया में भी होते हैं। हां जी जी तो आप ये आप यकीन मानेंगे कि अब पुतिन जो है वो जनता के द्वारा चुनकर आए हुए प्रेसिडेंट है और वो बैठे हुए हैं। तो ऑब्वियसली वो सबको पता है कि किस तरह के इलेक्शंस वहां हो रहे हैं। और अभी भी आप ये देखें कि जैसा आपने कहा कि डेमोक्रेसी तो वो है जहां पर जनता सरकार को चुनती है और उसको अकाउंटेबल बनाती है कि हमने आपको चुनाया। अब आप हमारे लिए काम करिए। लेकिन यहां तो जिस तरह से विपक्ष अपोजिशन का इल्जाम है और ये कहता हुआ नजर आ रहा है और और बाकायदा तौर पर तथ्यों के साथ वो ये बात को ये बता रहा है कि यहां तो उल्टा हो रहा है या तो सरकार चुन रही है कि आप हमारे वोटर होंगे या नहीं होंगे आप हमें वोट करेंगे या आप हमें वोट नहीं करेंगे तो वो चुनते हुए नजर आ रहे हैं और सारे एग्जांपल्स हमारे सामने मौजूद हैं। ब्रेथ ने ये कहा था बहुत अच्छी बात उनकी एक कविता में मुझे एग्जैक्ट वर्ड्स उसके याद नहीं है। लेकिन एक शासक किस तरीके से सोचता है कि अगर कल हम पार्लियामेंट भंग कर देंगे और फिर भी हमारी सरकार चुन कर नहीं आई तो हम जनता को भंग कर देंगे। उसका इशारा इसी तरफ था कि कैसे हम वोटर्स सरकार वोटर को चुनती है। वोटर सरकार को नहीं चुनते। जी बिल्कुल क्योंकि अभी आप देखें कि एक के बाद एक कोई ना कोई एक ऐसा मुद्दा लाकर खड़ा किया जाता है जिसके सेंटर में मुसलमान होते हैं। हमने एसआईआर से लेकर यह सब देखा। यूसीसी की अब बात की जा रही है। डेमोग्राफी चेंज हो रही है। अब अमित शाह ने इसको लेकर एक कमेटी बनाई है कि डेमोग्राफी जो है वो चेंज हो रही है। 12 साल से में पूछा जाना चाहिए कि भ अगर चेंज हो रही है तो आप क्या कर रहे थे? ये बिल्कुल उसी तरीके से है जैसे वो कह रहे हैं कि बड़ी तादाद में घुसपैठ हुई है। घुसपैठियां जो है पश्चिम बंगाल, बिहार जो भी बॉर्डरिंग स्टेट हैं वहां पर आ गए हैं। तो ये सरकार से पूछा जाना चाहिए कि 12 साल से तो आप हैं। ये आपकी जिम्मेदारी है। तो आप क्या कर रहे हैं? और अब फिर से यह कहा जा रहा है कि एक नया बिल जो है वो लाया जा सकता है कि किस तरह से डीलिमिटेशन जो है उसको लेकर दोबारा से एक बिल लाया जा सकता है। तो क्या आपको लग रहा है कि एक के बाद एक ये जो मौजूदा सरकार है वो इस तरह के मुद्दों को लाती रहेगी जिसके सेंटर में मुसलमान होंगे। इलेक्शन दर इलेक्शन इसको इसी तरीके से और ज्यादा बढ़ावा दिया जाएगा। तो फिर यह सवाल है इरफान साहब कि हम प्रॉब्लम्स की बात तो कर रहे हैं कि ये ये हो रहा है और शायद अ हम सबको ये पता है कि इन 12 सालों में कि और ये हालात कितने बद से बदतरीन होते जा रहे हैं लेकिन अब इसका स्यूशन क्या है? क्या किया जाना चाहिए एक सोसाइटी के तौर पर और मैंने पिछले भी अपने एक गेस्ट से सवाल पूछा था और आपसे भी मैं सवाल के दो हिस्से हैं मेरे कि मुसलमानों को क्या करना चाहिए और हिंदूज क्या कर रहे हैं वो हिंदूस जो इस राइट विंग आईडियोलॉजी में इस सरकार में यकीन नहीं करते जिन्होंने इसको नहीं चुना वोट नहीं किया वो क्या कर रहे हैं ये जो इललीगल माइग्रेंट्स का डर बता रहे हैं हम वो बहुत बहुत बहुत बहुतटेड डर है। हम पश्चिम आसाम की बात अगर मैं करूं तो ये कह रहे थे कि 85 लैक्स टू 1 करोड़ हम इललीगल बांग्लादेश आसाम में है। और वो मुसलमान का पपुलेशन था। हम जब एनआरसी हुआ एनआरसी में हिंदू मुस्लिम सबको कितनी परेशानी हुई। खास करके अनडॉक्यूमेंटेड जो थे मजदूर तबके के लोग थे भूमिहीन किसान थे जिनके पास डॉक्यूमेंट्स नहीं थे वो कितने परेशान हुए इसकी बात हम अब यहां नहीं करेंगे लेकिन इतनी परेशानी के बाद इनका जो फिगर था वो एकदम गलत निकला 19 लाख एनआरसी में इंक्लूड नहीं किए गए वो 19 लाख भारत के नागरिक नहीं है ये बात नहीं है हम 19 लाख में से भी बहुत बड़ी संख्या हिंदू बंगालियों की है जो बांग्लादेश से आए और यहां रेफ्यूजी के तौर पर रह गए हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी यहां रह गए जिनके लिए सीएए कानून बना जी तो 19 लाख ऐसा बता रहे थे कि 85 लाख इललीगल बांग्लादेश है। यानी जितने मुसलमान है वो सारे इललीगल बांग्लादेशी हैं। तो ये एकदम एक्सजेटेड फिगर है और ये 19 लाख में भी वो विदेशी है ऐसा नहीं कह सकते। उनके पास डॉक्यूमेंट्स नहीं है अपनी नागरिकता पूर्ण करने के लिए। अभी पश्चिम बंगाल में अगर हम देखें कि ये होल्डिंग सेंटर्स बनाने वाले हैं। हर जिला में होल्डिंग सेंटर्स बनाने वाले हैं। अब तक उसमें 500 लोग आप लाखों की बात कर रहे हैं और उसमें 500 आप लोग ये पकड़ नहीं पा रहे। हम सेकंडली डेमोग्राफी शुड नॉट बी कंसर्न ऑफ एनी गवर्नमेंट। इंडियन स्टेट शुड बी रिलीजियसली न्यूट्रल। मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है या हिंदुओं की आबादी बढ़ रही है या ईसाइयों की आबादी बढ़ रही है या तमिल की आबादी बढ़ रही है या कन्नड़ स्पीकिंग की आबादी बढ़ रही है। दैट शुड नॉट बी कंसर्न। लेकिन जब ये अमित शाह ये बोलते हैं कि डेमोग्राफिक चेंज उसका क्या मतलब है? व्हाट व्हाट इज ही एक्सक्टली सेइंग? निरंतर डराना चाहते हैं हम के ये आज बीजेपी 50 साल राज करेगी ना तब भी बांग्लादेशियों का डर रहेगा ही इललीगल माइग्रेंट्स का डर रहेगा ही ये फिगर को एक्सजेजरेट कर कर के डर डराकर वोट डलवाना चाहती है डराकर हिंसा करवाना चाहती है और जब हिंसा होती है कम्युनल हिंसा होती है तब ये ऐसे कानून बना सकते हैं जो हिंदू राष्ट्र की तरफ तरफ ले जाए। हिंदू राष्ट्र के ऑब्जेक्टिव्स के तरफ ले जाए। अथॉरिटेरियन कानून बनाए। ये उनका ऑब्जेक्टिव है। अब हम लोगों ने क्या करना चाहिए? मुझे लगता है कि हमें ग्राउंड जीरो से शुरुआत करनी पड़ेगी। समाज से शुरुआत करनी पड़ेगी। हम हमारे सारे रिलीजंस में जो कंपैशन की भावना है जो एथिकल मोरालिटी और एथिकल वैल्यूस हर रिलजन में है हम उस एथिकल वैल्यूस को स्ट्रेस करना पड़ेगा। तुकाराम का रिलजन, संत रविदास का रिलजन, कबीर का रिलजन ये समाज को जोड़ने वाला रिलजन है। मर्म है उसमें सबको एक आंखों से एक समान दृष्टि से देखने वाला रिलजन है। और उसमें सबके लिए एक मर्म है। पूरे संसार के लिए हम एक हिंदू रिलजन में वसुदेव कुटुंबकम की वैल्यू रही है। हम इललीगल बांग्लादेशी को जब एक्सक्लूड करते हैं तो इललीगल तो वसुदेव कुटुंब की भावना कहां जाती है? तब कहां हो जाती है? गांधी जी टैगोर इनकी इंसानियत कभी नेशनल बाउंड्रीज पर नहीं होती। हम और इनकी जो वैल्यूस आती थी इनके जो जज्बे एटीट्यूड आते थे वो रिलीजन से आते थे। हमें रिलीजन के एथिकल वैल्यूस को लेकर दोबारा रीइफोर्स करना होगा। इस्लाम में जो एथिकल वैल्यूस है, हिंदूइज़्म में जो एथिकल वैल्यूस है, क्रिश्चियनिटी में जो एथिकल वैल्यूस है वो एक दूसरे के खिलाफ नहीं है। एक दूसरे को कॉम्प्लीमेंट्री है। हम लव द नेबर जो बाइबल में है। जी। आपका पड़ोसी भूखा सो रहा है तो आपको जन्नत नहीं मिलेगी। और आपने उसके लिए भूखे पड़ोसी के लिए कुछ नहीं किया तो आपको जन्नत नहीं मिलेगी। यह कॉम्प्लीमेंट्री है। करुणा की भावना जो बुद्धिज्म में है हम वो कॉम्प्लीमेंट्री है और हमें हमारा संतों का जो लिटरेचर है एक बहुत अच्छी और बड़ी ट्रेडिशन रही है एथिकल वैल्यूस के रिलजन में जिसको हम बुलाते जा रहे हैं। उसको वापस हमें निकालना होगा। हमारे हमारा जो कंपोजिट कल्चर है गंगा जमुनी तहजीब है उस पर ज्यादा स्ट्रेस लेना होगा। उस पर काम करना होगा। उसको ज्यादा बढ़ावा देना होगा। उसको हमारे गानों में लाना होगा। हमारे परफॉर्मिंग आर्ट्स में लाना होगा। कल्चर में लाना होगा। और जब भी ये कल्चरल परफॉर्मेंससेस होते हैं लोगों का दिल जीतती है। जी। लेकिन कैसे होगा ये इरफान साहब? कौन करेगा? 12 साल तो हो गए। हम देख रहे हैं। मैं यह नहीं कह रही कि कोशिशें नहीं है। आपका भी सेंटर है। इस तरह की कोशिशें कर रहा है। इस तरह की और ऑर्गेनाइजेशन हैं जो कोशिशें कर रही हैं। इसके बारे में बात कर रही हैं। आवाज उठा रही हैं। अ लेकिन क्या उससे कुछ बदल पाया है? अ ये भी एक एक सवाल है। और क्या कोशिशें काफी हैं? यह भी एक सवाल है। और क्या वो कोशिशें उतनी इन डेप्थ और वहां तक उन जड़ों तक क्या पहुंच पा रही हैं? जितनी जड़ों तक या जितना इन डेप्थ हिंदुत्व पहुंच रहा है। हम लोग जब इंटररिलजियस सॉलिडेरिटी की बात करते हैं, इस्लाम धर्म के एथिकल वैल्यूस की बात करते हैं। हिंदू धर्म के एथिकल वैल्यूस की बात करते हैं तो बहुत अपीलिंग दिखता है। जो भी लोग आए होते हैं उनको बहुत अपीलिंग दिखता है। जो अगर हिंदू राष्ट्र के भी कुछ सिपाही आ गए वहां उनको भी वो अपीलिंग लगता है। उनको भी लगता है कि यह तो अच्छी बात है। दोनों को जोड़ने वाली बात है। इंसानियत की बात है। इसमें हेट्रेट की बात नहीं है। तो सवाल ये है कि हमारे पास उतने रिसोर्सेज नहीं है। हमारे पास वो प्लेटफॉर्म्स नहीं है कि हम बहुत वाइडली फैला सके। एजुकेशन एजुकेशनल इंस्टीटश ऐसा एक प्लेटफार्म हो सकता है। पर एजुकेशनल इंस्टीटश को हेट फैलाने का प्लेटफार्म बनाया जा रहा है। हम प्यार फैलाने वाला या लोगों को जोड़ने वाला प्लेटफार्म नहीं बनाया जा रहा है। तो यह जो आपकी मीडिया कर रही है, आपका चैनल कर रहा है, ऐसे बहुत सारे चैनल्स को बहुत ज्यादा काम करना होगा। हम कैसे दूसरे लोगों तक पहुंचे और बाउंड्रीज क्रॉस करके हेट्रेट को हमारे हमारे अंदर भी हेट्रेट है। मेरे अंदर भी हेट्रेड है। उस हेट्रेट को मैं निरंतर उस हेट्रेट से लड़ता जाता हूं। कभी कबभार किसी एक कास्ट के प्रति या हेटक फैलाने वालों के प्रति हेट्रेक इससे मुझे लड़ना पड़ता है। तो अगर हम सब मिलकर एक साझा कोशिश करें और इसको बहुत ज्यादा फैलाएं लिमिटेड सक्सेस हमें मिल रहा है। लेकिन बहुत लिमिटेड नाकाफी हम बिल्कुल नाकाफी इससे जमीन पर बदल रहा है। बहुत कम बदल रहा है। हम हमें चाहिए ज्यादा रिसोर्सेज, हमें चाहिए ज्यादा लोग इस काम में जुटे जब तक हम समाज के लेवल पर भाषा के टूल को इस्तेमाल करके अलग-अलग रिलीजन को नहीं जोड़ेंगे क्योंकि तमिल मुस्लिम्स है, तमिल हिंदू है, तमिल क्रिश्चियंस है। वो तमिल भाषा के नाम पर जोड़ते हैं। वो भाषा को जोड़ने का एक फैक्टर बना सकते हैं। वैसे ही कन्नड़, वैसे ही मराठी, वैसे ही गुजराती आपको हर लैंग्वेज में मल्टीपल रिलजंस मिलते हैं। तो एक भाषा को हम कैसे जोड़ सकते हैं? रीजनल कल्चर पर को कैसे बढ़ावा दे सकते हैं? इसके साथ हिंदू मुस्लिम क्रिश्चियंस जैन सब आइडेंटिफाई करते हैं। रिलीजन में कैसे अलग-अलग भाषा के लोगों को जोड़ सकते हैं ताकि भाषा की नफरत को खत्म करने के लिए हम रिलीजन को एक टूल बनाएं। हमें ऐसे कॉमन कल्चरल फैक्टर्स ढूंढ निकालना होगा जो समाज को जोड़ता है और उसको फैला फैलाना पड़ेगा। और मेरे ख्याल से बहुत सारे एक्टर्स बहुत सारे इंस्टटशंस इस काम में जुटेंगे। मुझे लगता है कि इस हेट्रिक की भी एक्सपायरी डेट है। कभी ना कभी भूख लगेगी। कभी ना कभी रियलिटी बिल्कुल आप सही बोल रहे हैं कि इसकी एक एक्सपायरी डेट है। हमने हिटलर को भी देखा कि उसका अंत किस तरह से हुआ और इसी तरह के तमाम तानाशाहों का हमने हश्र देखा है कि वो क्या हुआ है। नफरत बहुत तेजी से पनपती है, बढ़ती है, बहुत तेजी से फैलती है। बहुत नुकसान करके जाती है। लेकिन वो फलती फूलती भी बहुत है। लेकिन उसका अंत बहुत सुखदाई होता है। यह तो हमने कहीं नहीं देखा है। लेकिन फिर भी ये सवाल तो जरूर है कि ये जब अगर कभी हासिल होता है तो किन शर्तों पर हासिल होगा? कितनी जानों की कीमत पर ये हासिल होगा? ये तो ये एक बड़ा सवाल तो जरूर है हमारे ज़हन में और यह भी कि क्या एक कोई खा तैयार करने की जरूरत है कि अभी फिलहाल किन चीजों पर सबसे ज्यादा काम करने की जरूरत है। क्योंकि हमारे अगर हम देखें फिलहाल जिस तरह की नफरत फैल रही है बहुत सारी चीजें हैं काम करने के लिए। लीगल आस्पेक्ट भी है इसका। ह्यूमेनिटेरियन आस्पेक्ट भी है इसका कि आपके अधिकारों का हनन हो रहा है वो भी एक इसका आस्पेक्ट है। लेकिन फिर ये सवाल भी है कि क्या एक खाका इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि अभी टॉप मोस्ट प्रायोरिटी क्या होनी चाहिए कि इन तीन चीजों पर हमें सबसे ज्यादा काम करना है क्योंकि ये बिल्कुल ऐसा है कि ये आपकी जान पर बन रहा है। यू नो जिस तरह से मुसलमानों को ट्रेन पर किसी होमचे वाले को किसी को भी कहीं पर भी टारगेट किया जाता है। जो खासतौर पर विज़िबल मुस्लिम है। हम यह देखते हैं कि जब कोई अपने घर से किसी को खुदा हाफिज कहकर कोई मां अपने बच्चे को भेजती है तो उस डर के साथ भेजती है कि यह जिंदा लौटेगा भी या नहीं। ये डर तो आज मुझे लगता है कि हर मां के ज़हन में होगा क्योंकि हम इस तरह के इंसिडेंट्स हर रोज होता देख रहे हैं। तो क्या आपको लग रहा है कि जो आप काम कर रहे हैं या आप जैसी ऑर्गेनाइजेशन जो काम कर रही हैं, क्या आपको भी इस तरफ अब काम करने की जरूरत है कि प्रायोरटाइज करें कि दीज़ आर द थ्री थिंग्स दैट वी नीड टू वर्क ऑन राइट नाउ। इट्स एन इमरजेंसी सिचुएशन अभी नहीं तो कभी नहीं। जी इसमें मैं एक तो स्टेट के लेवल पर काम करना होगा। जी कि स्टेट पे जो रिफॉर्म्स लाना है ताकि विक्टिम्स को इंसाफ मिले। विक्टिम चाहे हिंदू हो, मुसलमान हो, ईसाई हो, मर्द हो, औरत हो, अपर कास्ट हो, दलित हो या बैकवर्ड क्लास हो, तमिल हो या मराठी हो। हम लोगों को इंसाफ के लेवल पर काम करना होगा क्योंकि हर विक्टिम को इंसाफ दिलाना है। ऐसी व्यवस्था हमें बनानी पड़ेगी। हम ऐसी व्यवस्था के लिए काम करना पड़ेगा हमें। हम और वो कुछ लेवल पर हो रहा है। तो हम लोग जैसे सारे लोग मिलकर बहुत सारे लोग मिलकर हम लोग एक कोशिश ये कर रहे हैं कि अगर कल कोई सरकार आई जो अच्छे सुझाव चाहती है कि क्या रिफॉर्म्स होने चाहिए पॉलिसीज में। तो उसको ड्राफ्ट करने का काम बहुत सारे सिविल सोसाइटी मिलकर कर रहे हैं। अभी जो कानून है उस कानून के अंदर रहकर इंसाफ के लिए कोशिश वो बहुत कम कोशिश हो रही है। उस उन कोशिशों को ज्यादा तेज करने की जरूरत है। ताकि ये हम नफरतों के खिलाफ तो लड़े नफरतों की आग को प्रेम से बुझाए। प्यार की भावना से बुझाएं। इसके ये तो लॉन्ग टर्म है और इसको वक्त लगेगा लेकिन मीन वाइल हमें स्टेट और लॉस में जो रिफॉर्म्स चाहिए और विक्टिम्स को जो जस्टिस चाहिए उसको प्रायोरिटाइज करके आगे कदम बढ़ाना होगा। दोनों लेवल पर करना है के एक हमारा सिविल सोसाइटी में आज से 10 साल पहले एक ये रहा था जब के जो भी नफरतें या झूठ फैलाए जाते थे उनको हम काउंटर करते थे। सच्चाई से, फैक्ट से काउंटर करने की कोशिश करते थे। लेकिन वो समाज में एक्सेप्टेबल नहीं होते थे। क्योंकि जब तक नफरत है किसी कम्युनिटी के खिलाफ तो उस कम्युनिटी को सपोर्ट करते हुए जो फैक्ट्स है आपका दिमाग ऑटोमेटिक रिजेक्ट करेगा। तो हमारी कुछ रिएक्टिव पॉलिटिक्स थी। अब हमको प्रोएक्टिव पॉलिटिक्स करना होगा कि एक शांतिमय न्यायमय समाज बनाने के लिए जो जो एक न्याय की व्यवस्था जरूरी है। एक ऐसा स्ट्रक्चर जरूरी है। एक ऐसा स्टेट जरूरी है जो भेदभाव ना कर सके। उसमें कोई चाहते हुए भी कोई इंडिविजुअल अगर चाहता भी है तो भेदभाव ना कर सके। ऐसा ऐसी एक व्यवस्था बनानी है, ऐसा एक स्टेट बनाना है, न्याय के लिए लड़ना है और साथ-साथ में ग्राउंड पर दिलों को जोड़ने के लिए, सबको करीब लाने के लिए, सबको एक इंक्लूसिव समाज बनाने की जरूरत है। एक दो मेरी बस लास्ट सवाल आपसे कि डॉक्यूमेंटेशन को आप कितना इंपॉर्टेंट मानते हैं? क्योंकि हर रोज इस तरह की इतने इंसिडेंट्स हो रहे हैं। इतनी घटनाएं हो रही हैं कि एक मुसलमान की मौत जो है वो शायद एक हेडलाइन भी अब नहीं बन पाती है। और आप देखते हैं सोशल मीडिया पर किसी ने पोस्ट कर दिया आपने देखा और आप स्क्रोल करके उसको आगे बढ़ जाते हैं। हालत अब ये होगी क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर ये वायलेंस जो है वो हो रहा है। हर रोज हो रहा है। हर जगह हो रहा है। हर गली नुक्कड़ चौराहे पर हम यह होता हुआ देख रहे हैं। तो मेरा सवाल यह है कि ये डॉक्यूमेंटेशन को आप कितना इंपॉर्टेंट मानते हैं कि कम से कम दर्ज तो किया जाए। एक जान की कीमत इतनी तो हो कि उसका नाम लिखकर आप यह कहें कि यह शख्स था कि इसकी इस तरह से इस वायलेंस में जान गई ताकि आने वाले वक्त में अगर कोई सरकार बदले या कुछ हो तो उसके पास एक डाटा तो मौजूद हो। तो क्या आपको लग रहा है जो ऑर्गेनाइजेशंस काम कर रही हैं उनका यह भी एक बहुत महत्वपूर्ण और इंपॉर्टेंट काम है कि वो कैसे इन तमाम वायलेंस को इन सबको डॉक्यूमेंट करें एज इट इज। डॉक्यूमेंटेशन के काम को ज्यादा एफेसाइज कर ही नहीं सकते। इतना इंपॉर्टेंट है कैन नॉट एम्फसाइज इनफ कि जो हो रहा है वो कल के लिए एक सच्चाई बनेगी के कल का जो स्टडी करेंगे या हमारे आज के समाज में क्या प्रॉब्लम्स थे उस पर नजर डालेंगे तो उनको सच्चाई मिलनी चाहिए। एक ये हमेशा कोशिश होती है कि दंगों के बाद वायलेंस के बाद उस पर उसको कवर कर दिया जाए। उस पर पर्दा डाल दिया जाए ताकि ज्यादा लोगों तक को पता ना चले। इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स बॉडीज को ना पता चले। हमारे स्टेट के इंस्टीटश को पता ना चले। सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट सारे इससे मरूम है बैक्ट से कि ग्राउंड पर क्या चल रहा है और उनको जो दिखाया जा रहा है सरकार जो पिक्चर दिखाती है वो रियलिटी से बहुत बहुत अलग होता है। इसीलिए डॉक्यूमेंटेशन और फेयर डॉक्यूमेंटेशन जिसमें सच्चाई हो केयर लेकर जो डॉक्यूमेंट बनाए जाते हैं उसका उसकी अहमियत बहुत बहुत ज्यादा है। डॉक्यूमेंट एक पहला कदम है इंसाफ के लिए लड़ने के लिए। हम पहले हम डॉक्यूमेंट तो करें कि क्या क्या खराबी है और क्या हो रहा है। किसको एड्रेस करना है। कल समझो हमारे प्रधानमंत्री के पास डेलीगेशन देकर गए और उनको कहा बहुत वायलेंस हो रहा है तो पूछेंगे एविडेंस बताएं। ये डॉक्यूमेंटेशन एविडेंस बनता है। इसीलिए सरकार भी डॉक्यूमेंटेशन से डरती है। सच्चाई की डॉक्यूमेंटेशन भी एक वेपन है। इस लड़ाई का वेपन है। एक बहुत ही इंपॉर्टेंट वेपन है। सरकार डॉक्यूमेंटेशन से डरती है। तो जो भी सच्चाई डॉक्यूमेंट करता है उसको धमकियां दी जाती है। डिस्क्रिमिनेट किया जा डिस्क्रिमिनेट किया जाता है। हम लोग आसाम में गए थे। वहां जो एिक्शन हो रहे हैं उसको डॉक्यूमेंट करने के लिए आप हमें सरप्राइज हुआ कि हेमंतु विश्वा शर्मा हमारा नाम लेकर बोल रहे हैं कि इरफान इंजीनियर इस एरिया में एिक्शन होने वाले लोगों के साथ बातचीत कर रहे हैं। वो एक देशद्रोह है। हम उनको जेल में पकड़ के डालेंगे। ऐसे अपने अपने चैनल पर वो प्रेस कॉन्फ्रेंस में ऐलान कर रहे हैं। और उसका कवरेज हो रहा है। मुझे आसानी से नहीं आती थी। हम हमारे ड्राइवर ने मुझे बताया कि आपका नाम लेकर चीफ मिनिस्टर बोले पहले तो हमने बिलीव नहीं किया कि चीफ मिनिस्टर ऐसा बोल सकते हैं और हम जैसे इनसिग्निफिकेंट हम बहुत छोटा काम कर रहे हैं डॉक्यूमेंटेशन का तो हम क्या थ्रेट हो सकते हैं उनको और इतना इंपॉर्टेंट थ्रेट के एक चीफ मिनिस्टर प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहे हां आप नाम लेकर कहें उस पर उन्होंने कहा तो ये डॉक्यूमेंटेशन केेंस को भी कहीं बताता कि कितना डरती है इससे सरकार? सरकार डरती है कि ये डॉक्यूमेंट्स अगर रहे और इफ दे सर्वाइव तो उनके काम पर एक काला ढब्बा की तरह देखा जाएगा और पीपल विल वांट चेंज हम हमको रेपरेशंस चाहिए। हमको कंपनसेशन चाहिए। उसके लिए भी डॉक्यूमेंटेशन जरूरी है। हम किसी भी नाइंसाफी के लिए के खिलाफ लड़ने के लिए डॉक्यूमेंट इज द फर्स्ट स्टेप। उसको हम लोग सेंटर अपनी लिमिटेड रिसोर्सेज के बावजूद जितना हो सके हम डॉक्यूमेंट कर रहे हैं और उस डॉक्यूमेंटेशन का असर भी पड़ता है हम और आपको लगता है कि ऐसी और बहुत सारी ऑर्गेनाइजेशंस की जरूरत है जो ताकि बड़े पैमाने पर इससे एक एक तरह की एक एक दूसरे को हिम्मत भी मिलती है और ये भी होता है कि किसी एक को सिंगल आउट करके टारगेट नहीं किया जा सकता क्योंकि ये तमाम ऑर्गेनाइजेशन एक साथ काम कर रही हैं। लास्ट मेरा सवाल अभी आपने हाल ही में देखा होगा बकरी ईद के इर्द-गिर्द मुसलमानों ने एक तरह से एक मैसेजिंग देने की कोशिश की। खासतौर पे पश्चिम बंगाल के हवाले से कि और फिर पूरे देश में हमने देखा कि अलग-अलग रिलीजियस ऑर्गेनाइजेशंस जो हैं मुसलमानों की उन्होंने कहा कि आप जो है काऊ को एक आप नेशनल एनिमल डिक्लेअ आप कर दें। ये मांग की गई और पश्चिम बंगाल में तो यह है कि कहा गया कि 1950 का ये कानून लाया गया कि 1950 के कानून को लाके ये कहा गया कि 14 साल से जो बड़ी हैं गौ माता उनको आप उनकी गौकशी जो है वो आप कर सकते हैं। मुसलमानों ने कहा कि वो 14 साल की हो, बड़ी हो, छोटी हो, अलाउड है वहां पर नहीं अलाउड है। हम नहीं करेंगे। और उन्होंने यह डिक्लेअर किया। खुतबे में बाकायदा तौर पर यह कहा गया। अब योगी आदित्यनाथ कह रहे हैं कि ये मुल्ली मुल्ला मौलवी जो हैं ये हमें ना आकर बताएं उनके लिए वो जानवर होगा। हमारे लिए तो वो गौ माता हैं। तो मेरा सवाल यह है कि अगर इस तरह की कोशिशों को भी मुसलमानों के जहां वो एक पॉजिटिव मैसेज देने की कोशिश कर रहे हैं। जहां वो एक एक हिंदू समाज को बड़े पैमाने पे यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि देखिए हमें इसमें कोई इंटरेस्ट नहीं है। वो आपकी माता है। हम उनकी इज्जत करते हैं और हम तो कह रहे हैं कि उनको नेशनल एनिमल आप बना दें। उसका जवाब भी अगर इस तरह से दिया जाए तो फिर इस तरह की और कोशिशों का भी ऐसे ही कोई ना कोई मुझे लगता है वह निकल जाएगा। या फिर आप कह रहे हैं ये सिर्फ चीफ मिनिस्टर तक महदूद है। एक बड़े लार्ज उस पर हिंदू में इसका असर जाएगा। हाउ डू यू सी दैट? क्योंकि मैं इसको इससे जोड़ रही हूं कि अगर मुसलमान कोई कोशिशें कर रहे हैं, कोशिशें बड़े पैमाने पर कर रहे हैं और बहुत सब्र और तहम्मुल का भी वो मुज़ायरा लगातार कर रहे हैं। बहुत बड़े पैमाने पर आप ये नहीं देखते हैं कि कोई कोई ऐसा प्रदर्शन हो जिसमें किसी हिंसा का सहारा या कुछ इस तरह से लिया जाता हो। तो फिर व्हाट इज अ सलूशन अराउंड? दैट इज माय क्वेश्चन। ये बहुत अच्छी पहल की है मुस्लिम रिलीजियस लीडरशिप ने ये डिमांड करके कि गाय को आप नेशनल एनिमल डिक्लेअ कर दो। गाय को नेशनल एनिमल डिक्लेअर करने के बाद गाय नहीं कटेगी। ऐसा नहीं है। मुसलमान नहीं काटेंगे। मुसलमान डेफिनेटली नहीं काटेंगे। लेकिन हमारा इंडिया में इतनी डायवर्सिटी है के राम को पूजने वाला भी हिंदू है और रावण को पूजने वाला भी हिंदू है इस देश में। तो आप नॉर्थ ईस्ट में चले जाइए, साउथ में चले जाइए। वहां गाय कटती है और लोग बीफ खाते हैं। लोग यानी हिंदू बीफ खाते हैं। केरला में, तमिलनाडु में, पश्चिम बंगाल में या दूसरे नॉर्थ ईस्ट के स्टेट में और गाय प्रोटीन का एक चीप सोर्स भी है। तो गाय को नेशनल एनिमल डिक्लेअर कर दिया तो सभी हिंदू कोई हिंदू नहीं काटेगा। ऐसा नहीं है। ऐसा मुझे ऐसा हो तो बहुत अच्छा है। मुसलमान तो नहीं काटेंगे लेकिन अगर गाय का हिंदू का एक तबका सभी हिंदू उसको माता नहीं मानते। लेकिन हिंदू का एक तबका भी उसको अगर माता मानता है तो मुझे लगता है कि हम सब लोगों ने सबके रिलीजन और रिलीजियस बिलीव्स का आदर करना चाहिए और उसको किसी तरीके से वायलेट नहीं करना चाहिए। किसी को किसी तरीके से दुख नहीं पहुंचाना चाहिए। यह बेसिक इंसानी इंसानियत है और इंसानी रिलजन है। मैं यहां आपको याद दिलाना चाहूंगा के 1919 में जो असहकार आंदोलन हुआ था। जहां गांधी जी ने खिलाफत मूवमेंट को सपोर्ट दिया था। तो गांधी जी ने गांधी जी को पूछा गया आप खिलाफत मूवमेंट को क्यों सपोर्ट दे रहे हैं? ये तो मुसलमानों का सवाल है। गांधी जी ने कहा मुसलमानों की जब धार्मिक भावनाएं दुखती है या उसका उसको चोट पहुंचाई जाती है तो हिंदू का फर्ज है उसके साथ खड़ा होना। और मैं चाहूंगा के गाय को लेकर जो हिंदुओं की भावना दुखती है उसमें मुस्लिम कम्युनिटी हमारा साथ देगी। खिलाफत आंदोलन के दौरान 1919 से 1922 तक जब तक वो असकार आंदोलन रहा तब तक हिंदुस्तान में एक भी गाय नहीं कटी। ऐसा कहना संभव है। हम और बड़े पैमाने पर मुसलमानों ने गाय ना कानून की जरूरत थी, ना किसी चीज की जरूरत थी। जरूरत थी हमदर्दी की। हम के आप हमारी धार्मिक भावनाओं को रिस्पेक्ट करें। खिलाफत आंदोलन में उसको सपोर्ट करें। हम आपकी धार्मिक भावनाओं को सपोर्ट करेंगे। तो ये जो सेंसिटिविटी इस सेंसिटिविटी को निर्माण करने की जरूरत है और रीजन से चलने की जरूरत है। रीज़नेबलनेस से चलने की जरूरत है। मेरा हक है। हां भाई हक है लेकिन हक पर समाज नहीं बनता। सैक्रिफाइसेस से समाज बनता है। सेंसिटिविटी से समाज बनता है। तो हमें वो समाज बनाने की जरूरत है। समाज को जोड़ने की जरूरत है। गाय मैं जिम्मेदारी से कहता हूं के कुछ हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए एक सेक्शन के लिए गाय सिर्फ वेपन है। हम्म पॉलिटिक्स का पॉलिटिक्स उनके लिए वो धार्मिक भावना का आदर करना ये नहीं है। या फिर एक जरिया है मुसलमानों को टारगेट करके उनको मारने का। एक जरिया है मुसलमानों को विलन बनाकर पेश करने का। ये कितने ये हमारी माता को खाते हैं तो इसीलिए हमें हमारे देश में और समाज में ये नहीं चाहिए। या इसीलिए हम उन पर हिंसा करना जायज है। हम तो उनके लिए एक वेपन है। उनके लिए एक पॉलिटिक्स है। उनके लिए एक बिलीफ नहीं है। हम ये जो एक सेंस ऑफ पावर दिया जा रहा है हिंदुओं को खासतौर पर मैं देख रही थी कि कोई भी किसी से भी जब बात की जाती है और खासतौर पर आजकल जो इस तरह के छोटे-छोटे YouTube चैनल्स जो बन गए हैं नफरत फैलाने का एक और एक जरिया और एक अड्डा बने हुए हैं। वो जाकर किसी के भी आगे मुंह के आगे माइक लगा देते हैं और कुछ भी पूछते हैं। तो एक महिला से पूछा जा रहा था कि भाई मुसलमानों के हवाले से सवाल पूछा जा रहा था। तो उन्होंने मैं सोच रही थी कि कि कैसे ये एक तरह से उनके अंदर ये पावर और ये ये कहने की हिम्मत आती है कि वो कह रहे हैं कि देखिए रहते तो यहीं पर हैं ये लोग। खाते भी यहां का हैं और सारी जो पॉलिसीज हैं इन सबका फायदा भी लेते हैं। वोट नहीं करते बीजेपी को। मतलब उनसे सारा फायदा ले रहे हैं। वोट नहीं करते बीजेपी को। और इस तरह की बहुत बातें कि खाते यहां का है, गाते वहां का है। या इस तरह से कह देना कि भ अच्छा तुम्हें यह नहीं पता कि तुम्हारे पड़ोस में क्या हो रहा है। लेकिन ये तुम्हें पता है कि गाजा में और ईरान में क्या हो रहा है। या फिर किसी भी कोई भी किसी भी हिंदू को यह कह देना मुसलमानों को लेकर कि रहने तो इन्हें दिया जा रहा है ना यहां पर। ये ये कम से कम यह सरकार के जो ये फायदे हैं सिलेंडर भी लेते हैं यह भी लेते हैं वो भी लेते हैं। तो यह जो एक सेंस ऑफ सिक्योरिटी है और उसको आप आई डोंट नो आई एम नॉट एबल टू आर्टिकुलेट इट द वे आई शुड बट आप इसको कैसे कैसे देख रहे हैं इसको क्या आपको यह भी लगता है कि यह कहना कि देखिए पहले मुगलों ने किया हमारे साथ और फिर हम पार्टीशन हुआ तो उनको अलग देश हमने दे दिया हमने दे दिया उनको अलग देश फिर भी यहां पर रहते हैं और इस तरह का क्या यह भी एक एक तरह की एक पूरी एक पॉलिटिक्स का एक साइकोलॉजी जी का या इस सबका यह पूरा हिस्सा है कि उन्हें एक वो सेंस ऑफ पावर देना कि इन्होंने आपके मंदिर तोड़े या इन्होंने आपके साथ यह सब कुछ किया। अब आपका चांस है मैं जहां तक मेरी समझ है हम आम हिंदू में ये भावना नहीं है एक बहुत छोटे वर्ग में ये भावना है कि मुसलमान हमारे मुल्क का हिस्सा नहीं है और वो इसलिए कि बार-बार प्रचार हम जो हो रहा है गोदी मीडिया से फिल्मों से परफॉर्मिंग आर्ट से एक सेक्शन बार-बार बार-बार केरला स्टोरी और ऐसी फिल्म कश्मीर फाइल्स ऐसी फिल्मों से बनाते हैं। बार-बार ये जताया जा रहा है कि मुसलमान हमारे देश का हिस्सा नहीं है। हमारे राष्ट्र का हिस्सा नहीं है। हिस्सा नहीं है उतना ही नहीं। हमारे राष्ट्र को एक थ्रेट है। ऐसा बार-बार ये झूठ फैलाकर छोटे-छोटे इंसिडेंट्स को एक्साजरेट करके या नए जो इंसिडेंट्स नए हुए ऐसे चीजों को निर्माण करके फिल्मों से, परफॉर्मिंग आर्ट से, टेक्स्ट बुक से, मीडिया से, बार-बार एक एसोसिएशन तैयार किया जा रहा है। एक एटीट्यूड तैयार किया जा रहा है कि मुसलमान हमारे देश का एक हिस्सा नहीं है। उतना ही नहीं वो हमारे राष्ट्र को एक थ्रेट है। हम तो इसीलिए और एक भावना तैयार की जा रही है तो कुछ एक सेक्शन में वो घर कर गई है कि राष्ट्र यानी हिंदू राष्ट्र हम जब कहते हैं तो इसका मतलब हिंदू राष्ट्र हम तो मुस्लिम्स आर एन आउटसाइडर दे आर सीन एज आउटसाइडर। इसीलिए यानी इस तरीके से कि आप हमारी मेहरबानी पर रहते हैं। हम हिंदू राष्ट्र तो हम हैं। आप हमारे राष्ट्र का हमारा मुल्क है ये। आप हां ये हमारा मुल्क है। हम ये हमारे कल्चर से चलेगा। हम तो आप को हम रहने दे रहे हैं यहां। पर वो गलत है। हमारा मुल्क सभी की कुर्बानियों से आजाद हुआ। इंडिया गेट में जो मार्टिस के नाम लिखे गए उसमें 90% मुसलमानों के नाम लिखे गए। तो ये देश जो आजाद हुआ वो मुसलमानों से मुसलमान हिंदू ईसाई सभी कम्युनिटी का कंट्रीब्यूशन है। सिर्फ आजादी के संग स्ट्रगल में नहीं सिर्फ वो स्ट्रगल में नहीं। सभी का कंट्रीब्यूशन यहां के आर्ट, कल्चर, इस्लाम रिलीजन का जो कंट्रीब्यूशन है, कल्चर में जो कंट्रीब्यूशन है, मुस्लिम कम्युनिटी का, इस्लामिक कम्युनिटी का वो उस पर एक अलग पडकास्ट हो सकता है। यहां की गंगा, जमुनी, तहजीब जो कंट्रीब्यूशन है, तो ये देश सभी का है। हम् और हमारा आइन भी यह कहता है कि जो भी यहां का नागरिक है सभी का यह देश है। वो किसी एक कम्युनिटी का या किसी अच्छा ये जो है कि ये हमारा देश है उस उस हमारा फिर जब थोड़ा और संकीर्ण होता है तो नॉर्थ इंडिया पर आ जाता है। और साउथ इंडिया उससे बाहर निकल जाता है। तो बहुत सारे हिंदू उसके साथ निकल जाते। हमारे हम में क्या नॉर्थ ईस्ट है? हम क्या मणिपुर है? मणिपुर में जब दंगे हुए तो क्या ऐसी ही फीलिंग हुई वहां क्या वैसा ही दर्द हुआ जैसे यहां के हिंदुओं को होता होना चाहिए था। ये हमारे हम में नॉर्थ ईस्ट भी नहीं है। बहुत सारे एथनिक ट्राइब्स बाहर हो जाते हैं। तो हमें इफ वी वांट यूनाइटेड इंडिया वी हैव टू इंक्लूड ऑल इंडियंस एस पार्ट ऑफ अस। बिल्कुल ये तो आप एक आइडियल सिचुएशन की बात कर रहे हैं। लेकिन जाहिर सी बात है कि ये तो वो है जो हमारा आईन कहता है। ये तो वो है जो हमेशा से कहा जाता रहा लेकिन जो हो रहा है वो इससे बिल्कुल मुख्तलिफ है। वो भी हमारे सामने है और बहुत-बहुत जी बिल्कुल आप कुछ मेंशन करें। छोटे से छोटे सेक्शन को लगता है। मैं जब सारे हिंदुओं से मिलता हूं तो मुझे लगता है कि वो इस इस एटीट्यूड से नहीं चलते हैं। हम या फिर इरफान साहब हम हम एक तरह के एक बबल में रहते हैं कि हम अपनी तरह के लोगों से मिलते हैं और हमें लगता है कि इसी तरह का शायद तमाम हिंदू या या या क्रिश्चियन या से किसी तरह से सोचते हैं जिनसे हम मिलते हैं। ये भी मैं एक तरह से देख रही हूं कि सबने अपने-अपने एक बबल्स जो है बना लिए। मैं अपने आप को भी उसमें शामिल कर रही हूं। और फिर शायद हम दूसरे हिस्से को शायद नहीं देख पाते और उसको देखकर हम खुश होते रहते हैं। नहीं नहीं एवरीथिंग इज ऑल राइट या जैसे हम कंटेंट को भी देखें तो हम अपनी तरह का जो हमें सूट करता है हम वो देखते हैं। लेकिन जो अलग से जो किया जा रहा है हम शायद उसको नहीं देखते हैं और उसको देखकर हम खुश हो जाते हैं। मैं एग्री करता हूं तो इन बबल्स को तोड़ने की भी जरूरत है। जी बिल्कुल मुझे लगता है कि अभी वक्त है कि शायद हर तरह के इसीलिए मैंने आपसे वो सवाल किया था कि क्या प्रायोरिटाइज हमें करने की जरूरत है कि यह इमरजेंसी सिचुएशन है। वी विल हैव टू वर्क राइट नाउ ऑन दोज़ इशूज़ एंड देन लेटर ऑन वी कैन वर्क मे बी साइमलटेनियसली और मे बी लेटर। बहुत-बहुत शुक्रिया इरफान साहब स्टूडियो में आने के लिए, अपना वक्त देने के लिए। बहुत-बहुत शुक्रिया। इट वास वंडरफुल टू हैव यू हियर। थैंक यू। थैंक यू।
Companion article
A Hindu man is killed by Muslim youths in Ghaziabad's Khoda area around Bakra Eid. Within hours, police kill the accused in an encounter, arrest the rest, and paste a bulldozer demolition notice on his family home. Hindutva organizations descend on the neighborhood declaring Muslims will not be allowed to hold Friday prayers there. Around the same time, in Jahangirpuri, a Muslim youth is killed by Hindu acquaintances — but there is no encounter, no bulldozer, no mobilization. In a third Ghaziabad case, a Hindu paramilitary athlete is killed by a Hindu friend, and it draws no protest at all. Put together for Nous Podcast host Bushra Khanam Fahad by Irfan Engineer — director of Mumbai's Centre for Study of Society and Secularism, who has documented communal violence in India since 1993 — the pattern raises an uncomfortable question: does a Hindu life only become a cause when a Muslim is the accused? Over an hour-long conversation, Engineer — who also convenes the Inter-Religious Solidarity Council, which recently organized a conclave of religious leaders in Mumbai — laid out how he believes the state's own conduct during communal incidents has fundamentally changed since 2014, why he thinks the underlying ideology has never truly hidden its aims, and what he sees as the narrow, difficult path back toward a more inclusive society.
Engineer, author of "The States of Freedom of Religion and Belief in India Since 2014" and co-author of "Weaponisation of Hindu Festivals in India," draws a sharp line between the communal riots of decades past and those since 2014. Riots occurred before too — Bombay 1992-93, Bhagalpur 1989, the anti-Sikh violence of 1984, Maliana in 1987, where a PAC unit pulled 40 young Muslim men from their homes, shot 27 of them, and dumped the bodies in the Ganga canal. The superintendent of police at the time filed an honest FIR and pushed for investigation; no one has ever been convicted. But in Engineer's telling, the state in that era was a passive bystander at worst, occasionally represented by a rogue officer — never the primary actor. In the Bombay riots of 1992-93, he notes, 80% of those killed in police firing were Muslim, even though the mobs doing the rioting were predominantly Hindu — evidence, he argues, of institutional bias within a police force, but not the state programmatically executing the violence itself.
What has changed since 2014, in his account, is that the state has taken over the rioters' own role. Where mobs once burned and demolished homes with whatever limited means they had, bulldozers now arrive under government authority to do the job more thoroughly. And while 80-90% of riot victims remain Muslim, roughly 90% of those arrested after a riot are also Muslim — increasingly not on ordinary charges but under sedition and terrorism statutes that keep the accused, largely daily-wage laborers from poor neighborhoods, in jail for a decade or more without bail, draining what income and savings their families have on lawyers and lost wages. Engineer calls this a form of collective economic punishment against an entire community, deployed with full knowledge that most of those detained are innocent. He points to Umar Khalid, held for five years and repeatedly denied bail in the conspiracy case tied to the 2020 Delhi riots, even after a Supreme Court bench observed his case had been judged by a double standard — while Kapil Mishra, who was filmed openly threatening violence alongside police officers before the riots broke out, has faced no such consequence.
Engineer describes a second, less visible shift: what his organization tracks as "attitudinal violence" — the hate speech that precedes and legitimizes physical violence. He points to an explosion in coinages like "love jihad" and "corporate jihad," and to a normalization effect that runs from the top down: when the Prime Minister invokes imagery of mangalsutras being seized or daughters being taken in a campaign speech, or a Chief Minister singles out clerics by name over a religious dispute, it signals to sympathizers lower down that targeting Muslims — in speech or in the street — carries no consequence, and can even be framed as a patriotic act. "It's as if they couldn't take part in the freedom struggle," he says, "so this becomes their new one."
Asked whether describing all this as merely a distraction from unemployment and inflation understates the seriousness of an ideology that predates the BJP's electoral fortunes by a century, Engineer agrees the roots run deeper — into the RSS's own foundational texts. He cites M.S. Golwalkar's "We, or Our Nationhood Defined," which explicitly describes Muslims and Christians as foreign, second-class inhabitants of India. But he insists the concept of "Hindu Rashtra" itself has never been precisely defined by its proponents: pushed to its logical territorial conclusion — an "Akhand Bharat" encompassing Pakistan, Bangladesh, Nepal, Tibet and Sri Lanka — it becomes an expansionist project no different in structure from Hitler's Greater Germany or the project of a Greater Israel, implying, in his words, "permanent war." If instead its scope stays within India's current borders, its internal logic still requires reducing religious minorities to second-class status, stripped incrementally of constitutional protections — including, ultimately, the right to vote.
Engineer offers a pointed metaphor for why this serves the ruling party beyond ideology alone: like a mother sprinkling water on a dry pan to convince hungry children that dinner is coming so they fall asleep without eating, communal mobilization lets Hindu citizens absorb real economic pain — inflation, unemployment, an economy that slipped from the world's fourth-largest back to sixth without public debate — through the compensating pride of religious and cultural superiority. He points to the disproportionate media attention given to trivialities, like the discontinuation of a toffee brand or a Prime Minister's gait compared to a foreign counterpart's, as symptomatic of a media environment where almost no one is left asking the government hard questions — a role he says has fallen mostly to a handful of independent, alternative platforms.
Pressed on whether an undeclared Hindu Rashtra already exists, Engineer points to West Bengal's ongoing Special Intensive Revision of electoral rolls, where he says voters are being purged en masse in districts from 24 Parganas to Malda, with residents branded Bangladeshi or Rohingya migrants — and to Suvendu Adhikari, an opposition leader in the state, publicly declaring that Bengal should treat such populations the way Israel has treated Gaza. He is skeptical of the scale of the underlying claim: exhaustive citizenship verification in Assam identified 1.9 million people, many of them Hindu Bengali refugees, whose paperwork could not confirm citizenship — a small fraction of the eight to ten million illegal Bangladeshi migrants that had been alleged beforehand, and West Bengal's newly built detention centers currently hold roughly 500 people against much larger claimed numbers. He argues demography should never be the concern of a state that claims religious neutrality, and that repeatedly invoking undocumented migration serves less to solve a real problem than to keep a climate of fear alive indefinitely — durable enough to justify authoritarian legislation regardless of who is actually in power.
Yet he resists the idea that the project is complete. The BJP's landslide in 2019 gave way, in 2024, to a party that had campaigned on winning more than 400 seats and instead fell to 240 — short of a majority on its own. For Engineer, that outcome shows India's constitutional order still carries real weight with voters who want it preserved, even as India's own democratic ranking has slipped, by his account, from a functioning electoral democracy toward what Scandinavian democracy indices now describe as "electoral authoritarianism" — a system where elections still occur, but where the ruling party increasingly appears to select its voters rather than the other way around, through mechanisms like the SIR rolls and irregularities alleged in state elections.
Asked what should actually be done, Engineer resists offering a purely legal or political answer. His first instinct is toward what he calls ground-zero work in society itself: reviving the shared ethical core across religious traditions — the compassion of Kabir, Ravidas and Tukaram's devotional traditions, the Quranic and Biblical injunctions to feed one's hungry neighbor, the Buddhist principle of karuna — arguing these values are complementary across faiths rather than competing, and that India's composite Ganga-Jamuni culture needs deliberate reinforcement through music, performing arts and regional-language identity, which routinely unites Hindus, Muslims and Christians who share a mother tongue — Tamil, Kannada, Marathi, Gujarati — even when it fails to unite them across other lines.
He is candid that this work remains badly under-resourced against the scale and institutional reach of Hindutva messaging, and that interfaith platforms like his own reach only a fraction of the audience that hate-driven content commands. Alongside this cultural work, he argues for two more concrete priorities: pushing civil society's own draft proposals for legal and institutional reform, ready for whichever government is willing to adopt them, so that justice for riot victims — regardless of religion, caste or gender — no longer depends on which community holds power; and treating documentation of violence as, in his words, a weapon in its own right. He recounts being singled out by Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma in a press conference, accused of "sedition" simply for documenting the state's citizenship-verification detentions — proof, he argues, that the state fears written, evidence-based records of what it does far more than it fears public criticism, because documentation is what survives to be used in courts, human rights bodies and eventually in demands for reparations.
Engineer closes on a recent episode he sees as instructive: Muslim religious leaders, particularly in West Bengal, publicly called for the cow to be declared India's national animal and pledged to forgo lawful cow slaughter under a 1950s-era exemption for animals over fourteen years old — a good-faith, unforced gesture of religious accommodation. Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath dismissed it outright, saying clerics had no standing to tell Hindus what the cow means to them. Engineer argues the episode exposes how, for a section of Hindu nationalists, the cow functions less as a genuine object of devotion — India's own religious diversity includes states where Hindus themselves eat beef — than as a ready-made political weapon against Muslims. He invokes Gandhi's support for the Khilafat movement between 1919 and 1922, when, he says, cow slaughter virtually ceased across India — not through law, but because Muslims voluntarily reciprocated Hindu religious sentiment once Hindus had shown solidarity with a Muslim cause. "Society isn't built on asserting your rights," he says. "It's built on sacrifice, and on sensitivity to what hurts someone else." Whether Indian society finds its way back to that kind of reciprocity, he suggests, will matter more than any single election.
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