Nous Podcast· 21 May 2026· 40:18

Senior Journalist Raju Parulekar Exposes the Politics Behind the Anna Movement

In this sharp and wide-ranging conversation, journalist and political commentator Raju Parulekar speaks with Senior Bushra Khanum on the changing nature of Indian politics, the legacy of the 2011 anti-corruption movement, and the rise of new political formations claiming to represent “change”.

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Full Transcript

अन्ना को हम पहचानते बहुत पहले से थे। अन्ना संगी वंगी कुछ नहीं है। अन्ना अपॉर्चुनिस्ट थे। क्या जब आप अन्ना के साथ थे और ये जब अन्ना मूवमेंट चल रहा था। क्या आपको तभी पता था ये आरएसएस बैक्ड है? आम आदमी पार्टी एक ऐसी न्यूसेंस वैल्यू लेकर पैदा हुई है कि जो जिसमें डीएनए बेसिकली आरएसएस का है। अब कॉकरोच जनता पार्टी जो डिजिटल आ गई है वो आम आदमी पार्टी का ही स्पेस ऑक्यूपेशन है। तो ये क्या आप कह रहे हैं आम आदमी पार्टी की बी टीम है। क्योंकि उस वक्त का आप चरम पे जो आंदोलन था आप याद कीजिए। अन्ना अगर यहां पर शहादत दे देते तो प्रधानमंत्री तो केजरीवाल ही बनने थे। ऐसा केजरीवाल का गणित था। अब वो फेल हो गया। लेकिन ये बताइए कि यह स्पेस विपक्ष क्यों नहीं ऑक्यूुपाई कर पा रहा? विपक्ष को बुद्धि कहां है? विपक्ष इतना लेकिन राहुल गांधी तो युवाओं से [गला साफ़ करने की आवाज़] सीधे बात कर देखिए राहुल गांधी अकेले क्या ही कर सकते हैं उनकी लेकिन इतना तो कर सकते हैं इतनी ये स्पेस तो ऑक्यूुपाई कर सकते हैं। देखिए इस देश में अच्छे-अच्छे लोग जो डेमोक्रेसी पे विश्वास रखते हैं सो कॉल्ड उनको भी ना मुसलमानों के प्रति इतना प्यार नहीं है। आप उनको इक्वल सिटीजन हो वो भी नहीं मानते। तो क्या अभी लोग यह रियलाइज कर रहे हैं कि यह [संगीत] एक आईडियोलॉजिकल पिटिकल वॉर है? इट्स दिस इज नॉट द सिंपल थिंग। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहाद और आज हमारे पॉडकास्ट के गेस्ट बेहद अहम हैं। आपको अन्ना आंदोलन तो याद होगा। वही अन्ना आंदोलन जिसने हमेशा के लिए या कहें कि बहुत लंबे वक्त के लिए देश की सियासत को पूरी तरीके से बदल दिया। उसके बाद आम आदमी पार्टी बनी। अरविंद केजरीवाल आए। कांग्रेस पार्टी सत्ता से गई। भारतीय जनता पार्टी सत्ता में आई और अब हम कह सकते हैं कि पिछले 12 साल से वह सत्ता में हैं और अब पता नहीं कि वह सत्ता से कब बेदखल होंगे और उसमें यह कहा जाता है कि एक बड़ा हिस्सा या कहें कि सबसे महत्वपूर्ण रोल अगर किसी ने निभाया तो वो उस आंदोलन ने निभाया जिसको उस वक्त के मीडिया ने किस तरह से दिन रात वहां पर रहकर कवर किया। अब उसी से जुड़े हुए जो लोग हैं वो बाहर आकर कह रहे हैं जो अब उस शायद आईडियोलॉजी में यकीन नहीं रखते या उनके साथ नहीं है। उनका कहना यह है कि दरअसल यह आरएसएस बैग्ड आंदोलन था। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि तब आप उसके साथ थे। अब आप यह कह रहे हैं कुछ लोगों ने माफ़ी भी मांगी है जिसमें प्रशांत भूषण भी हैं। लेकिन तब आपको कांग्रेस पार्टी क्या लग रही थी और अब जब आपकी वजह से एक तरह से हम कह सकते हैं कि बीजेपी सत्ता में आई है और वो क्या कर रही है तब आप इस तरह की बातें करते हुए नजर आ रहे हैं। मेरे साथ स्टूडियो में आज बेहद खास मेहमान हैं। अ वो अन्ना के साथ रहे। अन्ना आंदोलन शायद मैं कहना गलत होगा लेकिन अन्ना के जरूर वो साथ रहे। कुछ मीडिया हाउसेस ने उन्हें अन्ना के ब्लॉगर के तौर पर भी दिखाया। उनकी फोटोस हैं जो हम देखते हैं जहां वो अन्ना के साथ हैं। उनकी गोद में एक तरह से उन्होंने सर रखा हुआ है। वो काफी वायरल हैं। लेकिन अभी के जो हमारे गेस्ट हैं और जो उस वक्त के थे क्या उनका कोई हृदय परिवर्तन हुआ है या फिर उनको उस वक्त उसके बारे में कि वो आरएसएस से जुड़ा हुआ है या आरएसएस का मोहरा है अन्ना भी उनको पता नहीं था। मैं बात कर रही हूं राजीव पारुलेकर की सीनियर जर्नलिस्ट जिनको आप बहुत बेबाकी से अपनी बातों को रखते हुए आप देखते हैं। आप देखते हैं कि सत्ता के खिलाफ वो जिस तरह का स्टैंड लेते हैं बहुत कम लोग हैं जो इस तरह का स्टैंड लेते हैं और उसकी वो भारी कीमत भी चुका चुके हैं और चुका भी रहे हैं। राजू जी वेलकम टू नाउ नेटवर्क। थैंक हो सकता है कुछ चीजें आपको मेरे ओपनिंग की ना पसंद आई हो जो मैंने जो मैंने कही है जी लेकिन मैं आपसे ये पूछना चाहती हूं कि आप क्या अन्ना आंदोलन का हिस्सा थे या फिर सिर्फ आप अन्ना तक लिमिटेड थे और उस वक्त को आपने कैसे देखा और क्या वो अन्ना मूवमेंट आज जो भारत की की दुर्दशा है और जिस तरह से सत्ता पर काबिज होकर बीजेपी है वो तमाम इंस्टीटशंस पे जिस तरह से उसने कब्जा कर रखा है क्या उस आंदोलन को आप उसके लिए जिम्मेदार मानते हैं? 100% देखिए आरएसएस कल्ट का एक महत्वपूर्ण स्वभाव जो रहा है उसमें यह है कि ये लोग स्पेस ऑक्यूुपाई करने में मास्टर है। आपको पता भी नहीं चलता कि ये स्पेस आरएसएस ने ऑक्यूुपाई की क्योंकि आरएसएस का कोई चेहरा नहीं है। वो किसी को भी चेहरा बना सकते हैं। ये पहले हिंदू माइथोलॉजी में राक्षस होते थे ना जो किसी का भी रूप धारण करके आते थे। यानी भगवान का भी रूप धारण करके आते हैं। सन्यासी भी बन के भी आते हैं। वैसे आरएसएस है। तो अन्ना आंदोलन का चेहरा जो था वो अन्ना भले ही हो लेकिन वो बेसिकली उसका नेतृत्व केजरीवाल कर रहे थे और ही वाज़ नॉट अनअवेयर दैट ही इज़ आरएसएस फेस। क्योंकि केजरीवाल जी की शुरुआत ही लाइफ की आंदोलन जिससे हुई वो एंटी रिजर्वेशन आंदोलन था। जो इक्विटी और इक्वलिटी का विरोध करता है। उनकी लाइफ में स्पष्ट है। उनकी बायोडटा आप देखेंगे तो आपको पता चलेगा। आप थोड़ा ढूंढना पड़ेगा। लेकिन आपको पता चलेगा वो एंटी इसलिए उनका जेएनयू में विरोध भी हुआ था। इसी वजह से हां। तो एंटी रिजर्वेशन आंदोलन के आदमी को पंजाब में सरकार आने के बाद लोगों को बहकाने के लिए उन्होंने आंबेडकर की तस्वीर लगाई और गांधी की हटा दिया। और जबकि उनके खिलाफ केसेस होने लगे तो दिल्ली में आकर गांधी के समाधि स्थल पे उन्होंने मत्थ टेका। तो उनका कोई फिलॉसफी नहीं है। उनका कोई दर्शन नहीं है। उनका कोई आत्मिक प्रेम यानी ये नहीं है। ये आरएसएस के सारे स्वभाव है। वो उधर आरएसएस ने बीजेपी यानी ए पार्टी ने अगर राम मंदिर बनाने की सोची है तो दिल्ली में इनके सरकार ने बी पार्टी ने हनुमान मंदिर की घोषणा की। उधर भजन चल रहे थे तो इधर भी भजन शुरू हुए थे। और आपको याद होगा सीएए एनआरसी के खिलाफ शाहीन बाग में इतना बड़ा आंदोलन हुआ। दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के बाद भी बावजूद भी केजरीवाल आए नहीं और दूसरी बात मैं आपको बताता हूं दिल्ली में इतने बड़े दंगे हुए जिसमें मुसलमानों को बिना वजह बेवजह पुलिस ने और एनफोर्समेंट एजेंसी ने बहुत सताया उसमें केजरीवाल की भूमिका उसको प्रो रही तो ये सारी जो बातें हैं नहीं मैं ये कह नहीं रहा हूं आप ऑन पेपर देख सकते हैं और वो तब से मुझे मालूम था क्योंकि आईएससी के आंदोलन का सारा सारा जो इंतजाम होता था वो जेटली जी के साथ बैठ के होता था। तो पूरा जेटली जसवंत सिंह ये लोग बैठे जसवंत सिंह तो कभी-कभी बैठे थे लेकिन जेटली तो मेनली बैठे थे और उनके साथ केजरीवाल और ये बाकी सारे बैठे थे। केजरीवाल, किरण बेदी, मनीष सिसोदिया तो 100% बीजेपीियन थे और प्रशांत भूषण एंटी कांग्रेस थे। बीजेपीियन थे नहीं वो। प्रॉब्लम ये थी कि मैं जब अन्ना के अन्ना को हम पहचानते बहुत पहले से थे। अन्ना संघी वंगी कुछ नहीं है। अन्ना अपॉर्चुनिस्ट थे। अन्ना को जो मुख्यमंत्री है उसको और मंत्रियों को चारप मंत्रियों के उन्होंने रेसिग्नेशन ले लिए अनशन का वो करके उम्र उनकी और ये सब कांग्रेस बहुत सॉफ्ट रहती थी इनके प्रति अन्ना के प्रति। तो अनशन किया तो जो भी है वो लेना देना होके वो सेटल हो जाता था। तब से मैं अन्ना को जानता हूं। तो अन्ना का मैंने इंटरव्यू किया था जब उन्होंने शिवसेना के तीन मंत्रियों का रेसिग्नेशन लिया था। उसके ऊपर उन्होंने बात की थी तो मैं मैंने बहुत बाद में उसके 10 साल बाद शायद उनका इंटरव्यू किया था पहली बार तो उसके बाद दो-तीन ऐसे मौके आए जो सार्वजनिक रूप से उनका इंटरव्यू मुझे लेना पड़ा जब किसी ने पूछा तो मैंने ले लिया तो अन्ना की और अपनी दोस्ती हो गई अच्छी रिलेशन थे और मैं अन्ना की या समाजसेवी वो और अन्ना भी जानते थे कि मैं उनके समाजसेवी उसको मानता नहीं हूं। उनकी उम्र को मैं मानता था और उनके यहां वेज खाते हैं अन्ना लेकिन खाना बहुत अच्छा मिलता था। वो तब उस जमाने में मैं स्पाइसी खाता था। 10 साल पहले मैं बहुत स्पाइसी खाता था और राेगंज में इतना बढ़िया खाना बनता था और मैं आपको एक एकमात्र जो फोटो है मेरी अन्ना केजरीवाल बेदी और प्रशांत भूषण उसमें जो मैंने कई बार बोला है जो पकोड़े सामने रखे हुए हैं आलू के वैसे पकोड़े मैंने आज तक उसके बाद नहीं खाए लास्ट खाए 30 अक्टूबर 2011 को। उसके बाद पकोड़े बहुत खाए लेकिन वैसे नहीं खाया तो अन्ना के यहां जाना आना तो मेरा क्या अन्ना तो अन्ना आंदोलन के साथ भी थे आप क्या नहीं नहीं नहीं मैं अन्ना आंदोलन के टाइम था ही नहीं यहां मैं हिंदुस्तान में था नहीं कि कान को अभी लोग जाते हैं ना उस वक्त कोई जाता नहीं था यानी इतना आम नहीं हुआ था कान कान फेस्टिवल तो वहां पर मैं मिपकॉम नाम की एक वो होता है फेस्टिवल कान के हिस्सा ही है वो और टेलीविजन मार्केट पूरा वहां आता है यानी टेलीविजन सीरीज डॉक्यूमेंट फिल्म्स जो बनाते हैं वो सारे दुनिया के इटली के जर्मनी के इंडिया के पाकिस्तान के ईरान के सब लोग वहां आते हैं। उनके स्टॉल्स लगते हैं और वो सब देखने के लिए मैं गया था और मैं साल में दो बार उस जमाने में जाया करता था अपने पैसे खर्च करके चाहे तो या मैं जिनकी कंसलटेंसी करता था जो मीडिया हाउस की उनकी तरफ से तो मैं गया उधर गया था तो वहां से मैं कांग फिस्ट फेस्टिवल होने के बाद हम लोग ब्रिटिश लावा गए स्लोवा वहां पर अन्ना का मोबाइल पे फोन आया कि राज हो [हंसी] तो मैंने समझा तब उनका अनशन जो दिल्ली वाला था जो आप लोगों ने बहुत सराहा रहा था तो वह खत्म हुआ था और अन्ना त्रिहान के हॉस्पिटल से मेधा पाटकर की मदद लेकर भाग गए थे और राग पहुंचे थे क्योंकि केजरीवाल चाहते थे वो शहीद हो जाए यहीं पे और अन्ना डर गए थे कि ये शहादत देके रहे लेके रहेगा मेरी जब उनका आमरण अनशन चला तो उनका मन खट्टा हुआ था केजरीवाल प्रशांत भूषण मनीष सिसोदिया और किरण बेदी के प्रति तो उन्होंने एक्चुअली यह सोच के मुझे बुलाया कि उनको कोर कमेटी को भंग करना है लेकिन वो अन्ना के बुद्धि की बात नहीं थी तो उन्होंने मुझे फोन करके बोला कि तुम यहां हिंदुस्तान आओगे तो फौरन लाड़ेगढ़ आना तो मैं आया तो मुंबई से पुणे आके पुणे रुका फिर पुणे से राग आया राग में उनको मिला तब उन्होंने बोला मेरी आवाज तो पहुंच ही नहीं रही है लोगों को लगता है मैं मैं कर रहा हूं ये सब तो ये कोर कमेटी कर रही है तो उनको ना एक्चुअली अन्ना का प्रॉब्लम क्या था कि धन का बरसात हो रही थी इनके ऊपर केजरीवाल अन्ना इन लोगों देश की आरएसएस को पॉलिटिकल पावर से मतलब था धन की बरसात होती होने दो। जबकि इनके एनजीओस थे केजरीवाल और बेदी साहब के बेदी मैडम के तो वो एनजीओस के एफसीआर रहे थे। कांग्रेस चाहती तो देशद्रोह के मुकदमे लगा सकती थी लेकिन कांग्रेस ने कुछ नहीं किया ये। इनफैक्ट मैंने एक एफआईआर किसी को मारा पीटा गया। तब वो अभी बीजेपी में गई ना वो कौन? स्वाति मालीवाल। तो उसके सामने मारा पीटा गया किसी कार्यकर्ता को। तो उसका एफआईआर करने के लिए हमें डीसीपी साहब तक मिला तो दिल्ली पे उसका एफआईआर लेते नहीं थे केजरीवाल का। जबकि शीला दीक्षित मुख्यमंत्री थी और मुख्यमंत्री जी के खिलाफ उनकी शीला दीक्षित जैसी बेहतरीन मुख्यमंत्री दिल्ली को नहीं मिले आज तक राजू जी क्या जब आप अन्ना के साथ थे या या जिस भी वक्त तक थे आप थोड़े से टाइम के लिए थे और ये जब अन्ना मूवमेंट चल रहा था क्या आपको तब भी पता था ये आरएसएस बैक्ड है क्या जो लोग वहां पर थे क्या उनको पता था ये आरएसएस बैक्ड है जो अब उस आईडियोलॉजी के या उस उस ग्रुप के साथ नहीं आईडियोलॉजी नहीं कहूंगी उस ग्रुप के साथ नहीं है जिसमें प्रशांत भूषण है और दूसरी तरह के जो लोग हैं जब अलग हो गए हैं तो क्या उन लोगों को यह पता था और ये अगर पता था तो फिर वो उसके साथ क्यों थे और क्यों उनको ये लग रहा था कि अगर कांग्रेस जाएगी तो कौन आएगा फिर सत्ता में जाहिर सी बात है बीजेपी आएगी नहीं मैं आपको बताता हूं वही बात बता रहा हूं कि मैं ये तो स्थिति थी कांग्रेस इतना दुर्बल हो चुकी थी कि शीला जी जैसे मुख्यमंत्री होने के बाद यहां एफआईआर नहीं लेते थे अरविंद के खिलाफ समझिए तो यानी सरकारी अधिकारी अंदर से संघी थे जो अभी अभी तो पूरी ओपनली वो जो काम कर रहे हैं दिल्ली पुलिस जिस तरह से वैसे उस टाइम भी कर रही थी जो आरएसएस की जो हुकुम वही सराखों पे थी लेकिन इससे मैं पहले जानता नहीं था यस जब मैं वापस आया और अन्ना के पास गया तो अन्ना से बात की तो अन्ना को अपॉर्चुनिज्म ज्यादा इंपॉर्टेंट था। उसमें पैसे दिख रहे थे अन्ना को शायद कि वो निधि जो आ रहा था उसमें से बंटवारा ठीक से नहीं हो रहा था केजरीवाल की तरफ से क्योंकि इंडिया अगेंस्ट करप्शन नाम की जैसे आरएसएसआई वही स्ट्रेटजी थी केजरीवाल की इंडिया अगेंस्ट करप्शन नाम की कोई संस्था ही नहीं थी कागज पे ओके हां संस्था तो उनकी अपनी एनजीओ थी अलग-अलग उस पे पैसे जाते थे पैसे इंडिया अगेंस्ट करप्शन नाम का कुछ नहीं था तो अण्णा को ये लिखा पीढ़ी में मार खा गए अना तो वो करप्शन के खिलाफ आवाज उठा रहे थे और करप्शन ही कर रहे थे करप्शन हां हां यानी देश के खिलाफ तो एफसीआर एक जब आपको एनजीओ को दी जाती है तो आप पॉलिटिकल मैटर्स में वो धन इस्तेमाल नहीं कर सकते। तो वो करके उन्होंने देशद्रोह किया है। करप्शन ही नहीं मैं ये मानता हूं। लेकिन इसमें से मैं आपको बताऊं कि मुझे प्रशांत जी का एक वो उनका जो मैंने इंटरव्यू देखा उसमें मुझे ये लगा कि कई लोग थे। सोशालिस्ट लोग थे उस मूवमेंट में टॉप लेवल पे नहीं थे। नीचे भी थे। मैं उनको जानता हूं सोशलिस्ट किसी भी एंटी कांग्रेस मूवमेंट पे शामिल हो जाते थे। ये सोचे बिना कि कौन क्या होगा तो लोहिया से लेके यहां तक देखो नितीश आखिर में गए हैं ना वहां पर एक लालू छोड़ के और मधुलिमी ये दो लोग छोड़ के और भाई वैद्य ये तीन लोग छोड़ के तो सभी लोग ऐसे ही हुए कि कैसे गए वो उनके साथ तो लेकिन मैं केजरीवाल के खिलाफ इतना बोलता हूं इसके पर्सनल कुछ नहीं है मेरा उनकी आईडियोलॉजी आरएसएस के थी उनको जानते थे वो बाकी तो मिसगाइड ऐसा कह सकते हैं लेकिन केजरीवाल किरण बेदी किरण बेदी तो बाद में राज्यपाल भी बनी बीजेपी और मनीष सिसोदिया इनको मालूम था कि इसमें उस उनका तर्क क्या देते थे मालूम है मैं अरागंज में उनसे मिला तो तर्क क्या दिया तो विपक्ष ही आएगा ना साथ में हम लोग आंदोलनकारियों के साथ हमारे आंदोलनकारी के साथ सत्ता पक्ष थोड़ी आएगा तो इसका मतलब आईडियोलॉजी आपके लिए कोई मायने नहीं रखती हां ये बात उनके उन्होंने कही थी तो अन्ना को ये उस वक्त अन्ना अपॉर्चुनिस्ट होने के बावजूद उनको लगा हां विपक्ष हमारे साथ है हम तो वो यह मामला हिंदूवादी और देखिए ऐसा है कि पहले वाजपेयी सरकार हो गई थी तो उन्होंने सोचा भी नहीं था 2011 में कि मोदी सरकार आएगी करके वो सोच रहे थे कि बीजेपी की सरकार आएगी मैंने कितना समझाने की कोशिश की अण्णा को कि आरएसएस एक बहुत बड़ा डेंजरस टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन की तरह जाएगा सत्ता में आने के बाद तो उन्होंने माना नहीं और केजरीवाल तो मेरी बात नहीं वो मुझसे वो या फिर उनको मैटर नहीं करती थी ये बात उनको नहीं उनको उनको उनको तानाशाही चाहिए चाहिए थी लेकिन वो खुद की आएगी ऐसा उनको लगा लेकिन वो हो ना सका क्योंकि उस वक्त का आप चरम पे जो आंदोलन था आप याद कीजिए अन्ना अगर यहां पर शहादत दे देते तो प्रधानमंत्री तो केजरीवाल ही बनने थे ऐसा केजरीवाल का गणित था और वो फेल हो गया वो अन्ना ने फेल कर दिया अन्ना भाग गया और वहां से मैंने वो ब्लॉग लिखा ना उसकी वजह से केजरीवाल के सपने सारे धाराशाही हो गए जिस ब्लॉग को ये कहा गया कि वो वो अन्ना ने नहीं कहा है वो आपने अपनी मर्जी के हस्ताक्षर में लिखा हुआ मराठी ब्लॉग मैंने डाल दिया दूसरे दिन जिसमें किशन हजारे की सिग्नेचर है नीचे तो इसलिए अच्छा हुआ कि उन्होंने लिखा था खुद तो उसके ऊपर कोई किसी का आर्गुमेंट ही नहीं रहा लेकिन ये आर्गुमेंट दिया जा सकता है कि तब से अगर अब हम आ जाए कट टू नाउ जब आम आदमी पार्टी बनी और आम आदमी पार्टी से फिर धीरे-धीरे करके लोग गए भी और आए भी वो ये कहेंगे कि देखिए अगर हम आरएसएस के अगर हम बी टीम या बीजेपी की बी टीम अगर हम होते तो हमारे ऊपर इतनी शराब नीति को लेकर जो हमारे ऊपर केसेस लगे हैं। हमें सबको जेल भेजा गया। वो कहते हैं ना केजरीवाल कि कांग्रेस के तो किसी को नहीं भेजा गया। देखिए हमें तो भेजा गया है। हमें जेल भेजा गया है और हमारे ऊपर लगातार हमारी पार्टी को खत्म किया जा रहा है। अब हमारे सांसद जो है राज्यसभा से तोड़ लिए गए हैं। तो वो ये अपना आर्गुमेंट दे सकते हैं और जो दिया जाता है कि कि हम तो आरएसएस या बीजेपी की बी टीम हमें कहा जाता है। लेकिन अगर ऐसा होता तो हमारे साथ यह नहीं हो रहा होता। फिर असली झगड़ा भाई भाइयों में होता है। आप किसी भी कोर्ट में जाइए। अनजान दो लोग एक दूसरे के खिलाफ सिविल वो नहीं करते फाइल की याचिका कि जिसमें संपत्ति का मैटर हो पावर हो मनी हो इसके ऊपर जो झगड़ा करते हैं वो भाई होते हैं ज्यादातर या दोस्त होते हैं या पार्टनर्स होते हैं इन क्राइम हम और आपको यह मालूम होगा ये ये अगर केजरीवाल का सत्य माने तो संजय जोशी के लिए क्या कहेंगे आप वो तो आरएसएस के हैं प्रचारक रहे हैं मोदी जी के साथ जब झगड़ा हुआ तो सत्ता से सबसे दूर गुरु संजय जोशी हुए तो सबसे करीबी है उसी से झगड़ा होता है। उसी को जेल में कांग्रेस को क्यों नहीं डालते? क्योंकि हमेशा दुश्मन ही रहे वो तो कांग्रेस का कोई लेना देना नहीं है। ये तो अपना है। तो केजरीवाल का जो गणित था उसके हिसाब से उनको अपना तानाशाह खुद की तानाशाही लानी थी। वो ना ला सके तो फिर उन्होंने कहा कि देश में मोदी दिल्ली में अरविंद देश में नरेंद्र दिल्ली में अरविंद ये कहा। हम फिर दिल्ली में पेट नहीं भरा तो पंजाब पंजाब का इलेक्शन एक स्टडी केस है। केस स्टडी है क्योंकि वह केस स्टडी इसलिए है क्योंकि पंजाब से उन्होंने पगड इंडिया खोल डाली इलेक्शन तंत्र का यूज़ करा बीजेपी ने वो खुद के पास सत्ता लेके नहीं किया वो टाइप नया बदला जो इलेक्शन चोरी तो पहले से कर रही है बीजेपी लेकिन पंजाब का टाइप है वो अलग है उन्होंने खोल दिया पगडंडी खोल दी अब नेक्स्ट में वो उसका हाईवे बना के खुद आएंगे ऐसे कई राज्यों में उन्होंने तो आपको ये लगता है कि आम आदमी पार्टी अस्तित्व में इसलिए आई है आरएसएस बीजेपी उसको इसलिए लेके आए खास तौर पे आए बीजेपी अगर मैं ना कहूं कि जहां-जहां कांग्रेस मजबूत है वहांजहां बीजेपी नहीं आ सकती है डायरेक्टली वहां आम आदमी पार्टी आए और फिर उससे सत्ता सत्ता ली जाए और फिर वहां से ऐसा पहले था लेकिन बाद में मोदी आने के बाद सारे इक्वेशन बदल गए। मोदी जी को इजराइल का सपोर्ट था। एक डीप स्टेट का सपोर्ट था और उन्होंने अलग अपने हाईवेज ओपन किए थे। लेकिन उसमें एक दिक्कत थी कि उसके लिए आपको देश की देश के इंटरेस्ट जो आज बिक रहे हैं जैसे तेल सामरिक ताकत रशिया आपको टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करता है जिसकी हथियारों की वो सारी कॉम्प्रोमाइज करके आप वेस्ट से लेना शुरू करो अमेरिका से लेना ये कॉम्प्रोमाइज देश का करना है तो आपको ये मदद करेंगे तो ये कॉम्प्रोमाइज करने के लिए मोदी तैयार थे तो उनको केजरीवाल की कोई जरूरत ही नहीं थी और फिर एक बार सत्ता और संपत्ति आ जाती है आपको देश की तो फिर आरएसएस भी मोदी के साथ खींचती चली गई। लेकिन बीजेपी आरएसएस को क्यों जरूरत होगी अरविंद केजरीवाल की? नहीं नहीं वो खत्म हो गई ना। मैंने कहा कि उसकी खत्म हो गई। लेकिन अब उनको जैसे केजरीवाल ने कई लोगों को यूज़ एंड ट्रो किया वैसे ही जो बड़ी ताकत देखिए ऐसे लोगों में अपॉर्चुनिस्ट और राइट विंग पावरफुल जो फंडामेंटलिस्ट होते हैं। चाहे वो केजरीवाल हो, चाहे मोदी हो, चाहे आरएसएस हो। वो लोग अपने से पावरफुल होते हैं। उनके पैर छूते हैं और अपने से दुर्बल होते हैं। उनको कुचल डालते हैं। जो केजरीवाल ने अपने से दुर्बलों के साथ किया और अपने पावरफुलों के साथ किया वही मोदी जी ने अपने दुर्बलों के साथ किया और अपने पावरफुलों के साथ कर रहे हैं। तो केजरीवाल दुर्बल हो गए मोदी के सामने। तो उनको कुचल जाना ही था। तो आप क्या फ्यूचर देख रहे हैं आम आदमी पार्टी का? आम आदमी पार्टी एक ऐसी न्यूसेंस वैल्यू लेकर पैदा हुई है कि जो जिसमें डीएनए बेसिकली आरएसएस का है। अब कॉकरोच जनता पार्टी जो डिजिटल आ गई है वो आम आदमी पार्टी का ही स्पेस ऑक्यूपेशन है जो आज यूथ जो निरा आप देखिए वो जो उसके जो मेन है दीप के साहब उनकी बायो देखिए उन्होंने गायब कर दिया लेकिन उसमें बायो आपको मैंने भेज दिया है उसमें उन्होंने सारा काम जो लाइफ में किया है वो आम आदमी पार्टी के साथ किया है वो दिल्ली के मुख्यमंत्री के कंसलटेंट है। फिर आम आदमी पार्टी के साथ काम किया है। फिर उन्होंने सारे काम आम आदमी एजुकेशन डिपार्टमेंट के साथ काम किया है। तो यह क्या आप कह रहे हैं आम आदमी पार्टी की बी टीम है? हां हां आप मैं आपको लोगों को यह चेतावनी फिर एक बार देना चाहता हूं। 2011 के बाद ऐसी स्थिति में देश में कोई बड़ा आंदोलन अगर खड़ा हो सकता है तो वो कॉकरोच जनता पार्टी नहीं है। क्योंकि उसको एक फिलॉसफी होनी चाहिए। देखिए उनकी जो मांगे हैं उसमें मुसलमानों के लिए क्या है? जबकि सबसे ज्यादा भुगत भोगी मुसलमान है। क्या है? वो सेम राइट विंग स्टाइल जरा आज से हटके यानी आपने कोलगेट में वो स्वाद नहीं है इसलिए क्लोज अप हिंदुस्तान लीवर ही ला रही है। तो क्रॉकरोच जनता पार्टी आज की आम आदमी पार्टी है। आम आदमी पार्टी हमेशा जैसे आरएसएस ना आम आदमी पार्टी हो या और कोई हो या विश्व हिंदू परिषद हो फिर बजरंग दल हो फिर हिंदू युवा वाहिनी हो फिर हिंदू जागरण मंच हो फिर हिंदू हिंदू हो राष्ट्र प्रथम हो ऐसे कोई ऑर्गेनाइजेशन करके अपनी स्पेस ऑक्यूुपाई करती रहती है। वैसे आम आदमी पार्टी की भी है कि वो अपने एक अमीबिक वो है वो डिसेंट्री देश को वो नया अमीबा फैलाती रहेगी। तो कॉकरोच जनता पार्टी उसी का हिस्सा है और वो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है। मैं इतना मंच पे बोल रहा हूं तो उनका बायोडटा डिक्लेअर करें और मैं यहां पर अपनेप जो ऑडियंस है उसको यही बता दूं कि जिनको नहीं पता है कि ये कॉकरोच पार्टी क्या है? जब सीजी ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है। कि सीजीआई ने जब कॉकरोच वाला जो कमेंट किया कि ये जो देश के युवा हैं बेरोजगार युवा वो दरअसल कॉकरोच है। कुछ मीडिया में चले जाते हैं। कुछ सोशल मीडिया में चले जाते हैं। कुछ आरटीआई एक्टिविस्ट बन जाते हैं। तो उसके बाद एक तरह का एक एक मुहिम चलाई गई। उसके बाद भारतीय कॉकरोच पार्टी जनता पार्टी बनाई गई। उसका Twitter हैंडल है। उसका Instagram हैंडल है। बाकायदा तौर पर दो लोग हैं जिनके नाम हमारे सामने हैं जो इसको रन कर रहे हैं। उन्होंने एक एजेंडा बाकायदा तौर पर अपने देश के सामने रखा है। बड़े-बड़े लोग मेंबरशिप लेकर उसको ज्वाइन कर रहे हैं। जॉइ करने के लिए कह रहे हैं और लाखों से सीधे मिलियंस में हजारों से लाखों लाखों से मिलियन में उनको बहुत जाने में जो है वो वक्त नहीं लगा। हम उसी की बात कर रहे हैं कि क्या ये एक और ट्रैप है। जी। अरे मिलियन फॉलोअर्स इतने छोटे अवधि में होना यह अपने आप में समझ में आता है कि आरएसएस का वो हैंड है या आप पार्टी क्योंकि ये मिलियन जिन लोगों के हैं जो विदेश में रहते हैं ये एक तो संस्थापक विदेश में रहते हैं एक दो यूबर भी हैं जो अच्छा काम करते हैं। मैं ये नहीं कहूंगा मैं ये नहीं कहता कि ये अच्छा है बुरा है। आपको आम आदमी पार्टी के साथ जाना है। आपको केजरीवाल के साथ जाना है। आपको आरएसएस को सॉफ्ट बनना है। सॉफ्ट आरएसएस बनना है। तो आप जाइए इनके साथ। लेकिन आपके नसीब में अलग कुछ नहीं आएगा। यही आएगा जो मोदी काल में आया। हम तो आप समझिए कि यह भी एक ट्रैप है विदेश से संचालन करने वाले लोग हैं जो आम आदमी पार्टी के साथ हमेशा जुड़े हुए हैं। और भी है मुझे अन्य नाम नहीं लेना है लेकिन और भी हैं। यूरोप में है या यूएस में है। तो अगर आप देखो आप अंधे बनकर मत दौड़ो। हम आप जागृत हो जाइए और उनके साथ जा उनके साथ जाना मैं यह नहीं कहूंगा कि किसी पॉलिटिकल पार्टी के साथ जाना या मैं मैं बीजेपी या नहीं हूं तो आपको किसी भी पॉलिटिकल पार्टी के साथ अन्य पार्टी के साथ जाना या किसी अ गुट के साथ जाना जब तक उस पे बैन नहीं होता या संवैधानिक ढांचे के अंडर उसको पूरी तरह से उसको बाहर नहीं किया जाता देश से तब तक आप जा सकते हैं उसमें लेकिन आपको मालूम होना चाहिए क्या है हम्म तो आप जनता पार्टी यह समझे कि नया स्वतंत्रता संग्राम है। तो 2011 में जो समझा था इंडिया अगेंस्ट करप्शन वही यह नए नाम से आए। यह कोई रजिस्टर ऑर्गेनाइजेशन नहीं है। ये सारे के सारे सर्वदेव नमस्कारा केशवं प्रतिगच्छति। तो अंततः ये केशव के पास जाएगा या केशव बेराम हेडगेवार। ओ बहुत इंपॉर्टेंट बात बड़ा इंटरेस्टिंग है ये। लेकिन ये बताइए कि ये स्पेस विपक्ष क्यों नहीं ऑक्यूुपाई कर पा रहा? विपक्ष को बुद्धि कहां है? विपक्ष इतना लेकिन राहुल गांधी तो युवाओं से सीधे बात कर देखिए राहुल गांधी अकेले क्या ही कर सकते हैं उनकी लेकिन इतना तो कर सकते हैं इतनी स्पेस तो ऑक्यूुपाई कर सकते देखिए एक बात मैं आपको बताता हूं कि राहुल गांधी रियल आंदोलन करने के पीछे हैं हम क्योंकि प्रियंका ने भी ऐलान कर दिया है डिजिटल आंदोलन के पीछे उनको वो मुझे मालूम मुझे या मालूम है कि डिजिटल ऐसा आंदोलन करना आसान भी है और मुश्किल भी है। उसकी दो मुश्किलें हैं। कोई भी हाईजैक कर सकता है। यह मिलियन है ना यह आरएसएस के और या बड़ी ताकतों की मदद के सिवाय आ ही नहीं सकते इतने दिनों में क्या वो लोग जो पहले इस इंडिया अगेंस्ट करप्शन मुहिम का हिस्सा थे उस वक्त उन्हें लगा कि कांग्रेस से बुरा कोई नहीं हो सकता और उसका हिस्सा रहे कांग्रेस सत्ता से गई अब वो लोग उसी भारतीय जनता पार्टी को क्रिटिसाइज कर रहे हैं जो मुसलमानों के साथ दलितों के साथ इनके साथ हो रहा है कि एजेंसीज का पे कब्जा कर लिया क्या उन लोगों की आप हिपोक्रेसी नहीं मानते हैं इसको? देखिए इस देश में अच्छे-अच्छे लोग जो डेमोक्रेसी पे विश्वास रखते हैं। सो कॉल्ड सो कॉल्ड संविधान पे रखते हैं उनको भी ना मुसलमानों के प्रति इतना प्यार नहीं है। आप उनको इक्वल सिटीजन वो भी नहीं मानते। आप समझ जाइए कि कांग्रेस के मैं बड़े नेता, बड़े वकील कांग्रेस में काम करते हैं। वो भी ऐसे सनातनी है। कट्टर सनातनी है कि वो मुसलमानों को आज भी मिलेंच वगैरह ऐसे शब्दों से वो करते हैं। तो कांग्रेस में अंतर्विरोध इतने हैं क्योंकि कांग्रेस इज़ अ डेमोक्रेटिक पार्टी। बेसिकली वो वो ऐसी कैडर बेस पार्टी तो है नहीं। हम् हम् कि राहुल जी खुद भी चाहे तो कांग्रेस को एकदम न्यूबरल एकदम यूथ सेंट्रिक या ऐसी पार्टी नहीं बना सकते। हम् आप समझिए उनको दो मालगाड़ियां पांच ट्रक दो Maruti 800 और एक कैडलैग लेके आगे जाना है। कैडलैग उनकी है भले लेकिन ये सब सामान कैसे जाएगा? लेकिन राजू जी ये तो इस तरह से हुआ ना कि तब आपको वहां से कुछ मिल रहा था। वहां से ओपोरर्चुनिटी मिल रही थी तो आपने उसको गैब किया। उसका फायदा उठाया। फिर आप 2014 में सत्ता बदली और शायद आपको लगा कि उसमें आप उतने कंफर्टेबल नहीं हो पा रहे हैं तो आप उनके अगेंस्ट हो गए। अब आप दूसरे तरीके से उसका फायदा ले रहे हैं। तो मतलब फायदा सिर्फ आपका हो। इधर भी रहकर हो इधर भी रहकर हो। आप सारा विपक्ष आप सारा स्पेस तो आप ही ऑक्यूुपाई कर रहे हैं कि तब भी हमारा था स्पेस और अब भी हमारा है स्पेस। देखिए विरोधी लोगों की स्पेस ऑक्यूुपाई करने वाले कई लोग सत्ता पक्षी फैला देता है। आप Twitter पे भी वगैरह देखते होंगे कि कहीं एक एक घर में दो भाई है। एक बीजेपी में एक विरोधी में होने का नाटक कर रहा है। जो दोनों उद्योग यानी एंटरप्रेन्योर है। एक्चुअली उनका एम ऑब्जेक्ट अचीवमेंट एंड गोल पैसा ही है। तो यह सारी जो चीजें हैं ना यह अंतत आप समझिए कि अपॉर्चुनिज्म पे आती है और मैं यह मानता हूं कि उस वक्त 2011 में बीजेपी को विपक्ष मानना कोई बड़ा गलत नहीं था कदम क्योंकि बहुत सारे विपक्ष थे वो भी साथ थे क्योंकि चाहते थे कांग्रेस को बोर हो गए थे 10 साल में लोग किस चीज के बोर हो गए थे मैं समझा नहीं आप समझ में मैं आया है लोगों को कई लोगों को लेकिन उन्होंने यह नहीं समझा यह नहीं उनको लगा कि बीजेपी की सत्ता का मतलब एक सत्ता परिवर्तन। उसके बाद फिर सत्ता परिवर्तन होगा। उसके बाद फिर उन्होंने यह समझा ही नहीं कि बहुमत में मोदी जैसे व्यक्ति वो सत्ता में आएंगे जो बाहरी ताकतों को हिंदुस्तान में एंट्री देंगे और बाद में हिंदुस्तान का ऐसा भट्टा बैठेगा कि कोई कुछ नहीं कर पाएगा। तो ये सब इतना फोर्स ही कोई 2011 में कर ही नहीं पा रहा था। समझिए आप। हम तो 2000 अभी मैं देख रहा हूं कि 2019 तक लोगों को लग रहा था कि ये सत्ता परिवर्तन होगा। तो मैं यह मानता हूं कि अपॉर्चुनिज्म तो है लेकिन नाइविटी भी थी हम कि ये हमेशा यानी जबकि मनमोहन सिंह ने बोला था एक इंटरव्यू में मनमोहन सिंह जी ने बोला था कि आप नहीं वो नहीं उन्होंने ये बोला था कि आप हमेशा डेमोक्रेसी को ग्रांटेड मत लीजिए। हम हमेशा नहीं रहती डेमोक्रेसी और अच्छे दिन ये जो चल रहे हैं यानी स्पॉरेस्ट रिजर्व है डॉलर 60 में है तो यह सब हमेशा नहीं रहेगा अगर आप उसकी रक्षा करेंगे तो रहेगा तो हमने रक्षा करना छोड़ दिया हम उन्हीं के हाथ मिलाएं जो इसको लूटना चाहते थे कारवा लूट गया अब बैठो लेकिन आप ये देखें कि अगर दिल्ली की ही बात करते हैं तो जो लोग जो मुसलमान कांग्रेस से जिनका दिल खट्टा हुआ या जो उसको एक ऑप्शन के तौर पर नहीं देखते थे। बीजेपी में वोट नहीं कर सकते थे। उन्होंने भर-भर के वोट किया केजरीवाल को और एक बार नहीं दो-दो बार उन्होंने वोट किया अरविंद केजरीवाल। एक बात बताता हूं। केजरीवाल के पर्दे के पीछे रह के एक कॉकरोच जनता पार्टी भी दिल्ली में आए हैं तो भी लोग वोटिंग करेंगे। आशा में लोग इस स्थिति में पहुंच गए हैं। जिस स्थिति में एक पंगू ही पहुंचता है। यानी उसको हाथ, पैर, आंख, कान कुछ भी वो नहीं करता। दे आर अब अब मतलब वो लोग वो सिटीजंस जो हैं जो इसको सपोर्ट कर रहे हैं ऐसी ऐसे जो बेतुके आंदोलन है उनको वो रियल आंदोलन को मारना चाहते हैं तो आप समझिए कि इस तरह से ही ये होता है बार-बार तो क्या अभी लोग ये रियलाइज कर रहे हैं कि ये एक आइडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर है। इट्स दिस इज नॉट द सिंपल थिंग। ये आप ये लड़ाई ऐसी नहीं है कि कौन विपक्ष में है, कौन सत्ता में है, कौन यह है बल्कि ये एक आईडियोलॉजी की जो है वो लड़ाई है। या आइडियोलॉजिकल पॉलिटिकल वॉर है। क्या इस तरीके से इस मजबूती से जब तक विपक्ष अपनी बात को नहीं रखेगा तब तक वो बीजेपी के खिलाफ एक जो अल्टरनेटिव बनने की वो कोशिश कर रहा है या सत्ता में आने की वो बात कर रहा है वो तब तक नहीं कर पाएगा। तीन बातें हैं। मैं यह मानता हूं कि एक बात तो यह है कि जब तक विपक्ष केजरीवाल और शरद पवार साहब की पार्टी दोनों को बाहर करके इंडिया गठबंधन पूरा अलाइन नहीं होता। अब ममता का हार होने के बाद आप उसको ताने मार रहे हो। क्या ही मिलेगा आपको? ममता के पास तो है ही नहीं कुछ देने के लिए। जो था वो लूट लिया गया। समझे? तो अब उसको ताने नहीं मारी। वो उनकी गलती उनको मान वो समझ गई होगी। यानी समझा दो उसको बंद कमरे में। आप चौराहे पे क्यों ताने मार रहे हो? आपने भी बहुत गलतियां की। 2004 से 14 तक गुजरात को बरकरार किसने रखा? तो ये सारी गलतियां निकालने का वक्त नहीं है। आपको अलाइन करना चाहिए सारे विपक्ष को। ये दोनों को बाहर करके शरद पवार साहब की पार्टी और केजरीवाल क्योंकि ये मोल है बेसिकली बीजेपी के मोदी साहब के और ये और ये अगर मैं यह कहूं कि केजरीवाल मोल नहीं है क्योंकि उनके सारे जेल में गए हैं। तो लार्जर पर्सपेक्टिव में मोल है ही। आरएसएस उसकी थॉट प्रोसेस जो है सारी वो आरएसएससीएन है वो थॉट प्रोसेस एंटी रिजर्वेशन अ सॉफ्ट हिंदुत्व हम माय ऑटोक्रेसी और नो ऑटोक्रेसी माय वे और हाईवे हम ये सारा जो है वो आपको अलग बॉटल में सेम लिक्विड मिल रहा है बराबर तो उसको अंदर रखने का कोई मतलब नहीं है आप डेमोक्रेटिक आई में और केजरीवाल को अपना खुद को करने दो ऑटोक्रेसी तो संजय सिंह को कैसे देखते हैं संजय सिंह तो मुझे लगता है ओनली लीडर देखिए जिसमें जो आम आदमी पार्टी पावर में एक संघ नहीं आया था तो उनको भी शाहनवाज हुसैन और अन्य लोगों को आगे रखना पड़ता था मुसलमानों को वैसे संजय सिंह जैसा एक यूटिलिटी के लिए लिबरल को रखना पड़ता है आप पार्टी को तो आप उसी तरह से उसको देखिए उससे ज्यादा ना देखिए उसमें तो मैं ये कहता हूं कि ये जो अलाइनमेंट है ये एक बात हो गई उसके बाद लोगों का आंदोलन हम और तीसरी बात ऐसे जो भोपु आंदोलन है क्रॉकरोच जनता पार्टी वगैरह उसको जवाब देने के लिए एक सशक्त अल्टरनेटिव डार्शन यानी आईडियोलॉजी तैयार करना ये तीन चीजें बहुत जरूरी है। ये पांच पॉइंट क्या लिखे उन्होंने तो यूथ कांग्रेस के लोग ही उसमें घुस रहे हैं। मतलब तो कांग्रेस के लोगों को ये समझाना नेतृत्व हाईकमांड की तरफ से समझाना जरूरी है। कि हमारी अपनी पार्टी है। हम आंदोलन करेंगे तो हम आपको बता देंगे। हम् यह हमारा आंदोलन नहीं है। कृपया इससे दूर रहे। ऐसे हर पार्टी को बताना जरूरी है। तो अपने आप अपना आंदोलन जब शुरू हो जाएगा तो पावर में वह आ जाएगा। तो आपको यह जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर जो हो रही है उसमें नई-नई एलाइनमेंट्स जो इंटरनेशनल लेवल पे हो रहे हैं उसका प्रतिबिंब जो है वो देश में भी हो रहा है। हम तो उसमें आपको बहुत सजग रहने की आवश्यकता है क्योंकि डिजिटली आपको कोई भी बना के जा सकता है। हम जैसे डिजिटल अरेस्ट करते हैं ना वैसे कॉकरोच जनता पार्टी डिजिटल अरेस्ट कर रही है आपको पॉलिटिकली। हम तो उसमें मत पढ़िए आप। आप उसको ऑफ कर दीजिए। बहुत मुश्किल एक तरह से दौर है कि आप किसको सही माने, किसको सही नहीं माने, किस तरह से देखें, किस तरह से नहीं देखें। अब आप यह देखिए कि उन्होंने कहा कि कोई भी गोदी एंकर्स जो हैं या गोदी चैनल जो हैं हमें कांटेक्ट ना करें। हम उनके साथ किसी भी तरह का कोई इंटरव्यू जो है वो नहीं देंगे। उसके स्क्रीनशॉट लगा रहे हैं। बाय हाथ हाई मोरल ग्राउंड वो लेते हुए नजर आ रहे हैं। आई एम श्योर इसमें भी अक्रॉस रिलीजन और कास्ट लोगों ने जाकर इस कॉकरोच पार्टी को जितने भी अगर ऑर्गेनिक है तो जॉइन किया होगा। तो ये क्या अनदर ट्रैप आप इसको मान रहे हैं? आप पार्टी हो। मैं बच्चों की कसम खाता हूं। हम लोग गाड़ी नहीं लेंगे। हम लोग एक वक्त खाना खाएंगे। एक वक्त खाना नहीं खाएंगे। लेकिन हम कांग्रेस के साथ कभी नहीं जाएंगे। हम बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे। हम बंगला नहीं लेंगे। हम सादगी भरा जीवन बिताएंगे। ये आपने केजरीवाल से सुना था। यही आपने संघ के साथ सुना था। संघ से सुना था। सुना था कि नहीं? संघ का प्रचारक हो। फटी चड्डी पहनता है, भीख मांग के खाता है। यह वो सब हाई मोरल ग्राउंड पे जो बात करता है वो देश का दुश्मन है। यह पता चला। आप कभी भी ना ये इसमें बुद्ध ने बहुत अच्छा कहा है। आपको हमेशा मध्यम निकाय मध्यम मार्गी जो है उसी के साथ रहो। क्योंकि वीणा की तार ना टाइट कर सकते हैं आप ना लूज छोड़ सकते हैं। वीणा तभी बचती है जब मध्यम में रहती है। तो जीवन का भी ऐसे ही है। कोई भी पॉलिटिशियन हाई मोरल ग्राउंड पे बात नहीं करता है जो रियल पॉलिटिशियन है और वो जो तानाशाह नहीं है। तो ये दे बेसिकली अंडरवर्ड की डॉन जो होते हैं उनकी जो अपनी गिरोह होते हैं उसके ऐसे नियम होते हैं। हाई मोरल। हम जो काम क्योंकि गलत कर रहे हैं इसके मोरल हाई होना चाहिए। यह है आप काम ही ठीक कर रहे हैं तो आप हाई मोरल आपको कबीर ने कभी कहा हाई मोरल कुछ आपको याद है बुद्धा ने कहा कभी हाई मोरल ग्राउंड पे कोई भी महान रियल महान है या जो आपका भला करने वाला है नानक साहब ने कहा कभी ना हुसैन साहब ने कहा हाई मोरल हाई मोरल ग्राउंड का क्या मतलब आपका जीवन ही आपका मोरल ग्राउंड है हम आपके जीवन में जो आप कर नहीं सकेंगे वो बकबक करना ये हाई मोरल ग्राउंड पार्टी का ये होता है वो केजरीवाल ने आपको करके दिखाया आप फिर भी दूसरा टाइम क्यों नहीं हिस्ट्री रिपीट्स इटसेल्फ फर्स्ट टाइम इट्स अ ट्रेजडी एंड सेकंड टाइम इट्स फार्स तो कॉकरोच जनता पार्टी एक फार्स है आप उससे बच के रहिए आपके जीवन का कॉमेडी में ट्रेजडी हो जाएगी बहुत बहुत इंपॉर्टेंट बात आप कह रहे हैं और जाहिर सी बात है कि इससे पहले इट्स टू लेट पीपल शुड अंडरस्टैंड क्योंकि मुझे लगता है कि शायद आम आदमी पार्टी और इन सबको लेकर आम आदमी पार्टी बी है ये आम आदमी पार्टी बी है आप ये तो बहुत सारी बी बी पार्टीज जो हैं टीम्स आम आदमी पार्टी का डीएनए वही है ना जो रजिस्टर्ड कुछ करना नहीं सकता। विजय को भी आप इस कैटेगरी में रखते? नहीं मैं विजय का अलग पकड़ता हूं। विजय की देखिए हां वो बात तो अलग ही है। मैं तो बेसिकली ये मानता हूं। आप एक मोरल एक स्टैंड लिया आपने कि इलेक्शन लूट रहे हैं। हम चुनाव आयोग और भाजपा और अन्य लोग मिलके ईवीएम वगैरह सब। तो क्या ही बंगाल, क्या ही आसाम, क्या ही तमिलनाडु और क्या ही केरला ऐसा मैं मानता हूं। यह चारों जगह की जीत झूठ है क्योंकि मैं मानता हूं कि स्टिन का पराजय ही इसीलिए हुआ क्योंकि एसआईआर में लोग उनका नाम काटा गया उनकी कॉन्स्टिट्यूएंसी उनकी पार्टी की हार ये ऑर्गेनिक हार नहीं है। हम वो भी इतने बड़े पैमाना विजय जीते क्योंकि वो खड़े रहे हम वरना बीजेपी डायरेक्ट जीत नहीं सकती। वही बात मैंने बोली थी आपको कांग्रेस और एक छोटी प्रादेशिक पार्टी को जिताएंगे पगडंडी बनाएंगे और खुद घुस जाएंगे। वही बात हमेशा याद रखिएगा देश का सबसे बड़ा नुकसान हम मैं लेफ्टिस्ट नहीं हूं। मैं गांधीियन हूं लेकिन इस देश में शक अब्सॉर्बर का पॉलिटिकली काम हमेशा लेफ्ट ने किया है। जहां-जहां आपने लेफ्ट को कुचल डाला वहां बीजेपी घुस गई। बंगाल उसका बहुत लेकिन यह तो बड़ा बड़ा अजीब है कि लेफ्ट में थे और फिर उसके बाद चेंज हुए तो सीधा राइट में चले गए। यानी कि जो उनके कार्यकर्ता नेता मैं आपको बताता हूं कि लेफ्ट पार्टीज जो है जैसे केरल से दूर कर गई हम लेफ्ट को जिंदा रखना जरूरी है। ट्रेड यूनियंस लेफ्ट पार्टी मजदूर किसान एकता ये सारी चीजें जो है ना वो आरएसएस और उनकी सत्ता उसके बीच में एक रोड़ा बनके रह जाती है। भले वो सत्ता में ना हो। उनका जिंदा रहना जरूरी है। कांग्रेस ने जब परम चरम पे थी सत्ता में तो राइट को उन्होंने हवा दी। यानी आरएसएस का ऐसा कोई नुकसान नहीं किया। उनके स्मारक बने, उनके ऑफिसिसेस बने, उनकी स्कूलें बनी जो आज हमारे गले गर्दन काट रही है। लेकिन लेफ्ट के यूनियन खत्म किए, लेफ्ट का सारा ऑफिस खत्म किया। लेफ्ट के पीछे 10 एजेंसीज लगाई। ये कांग्रेस ने किया। तो कांग्रेस ने अपने आप के पैरों पे कुल्हाड़ी मार दी। जबकि पहली यूपीआई गवर्नमेंट सबसे कामयाब गवर्नमेंट मानी जाती है देश के इतिहास में। उसमें 83 सांसद यू लेफ्ट के थे। हम तो पूरी योजना और पॉलिसीज पे उनका प्रभाव था। बिल्कुल बहुत इसलिए वेलफेयर स्टेट बन सका। पहले ही यूपीए गवर्नमेंट फर्स्ट तो आप वेलफेयर स्टेट बनाने के लेफ्ट होना नेचुरल है। लेफ्ट कोई ऐसी बाहरी वो नहीं है शब्द। मैं बोलता हूं कि वेलफेयर स्टेट को लेफ्ट कहिए। गांधी जी भी एक तरह से लेफ्ट ही थे। अंत्योदय की कल्पना ही लेफ्ट की कल्पना। अंत्योदय और प्लोरियन में क्या फर्क है? अंत्योदय का मतलब आखिरी आदमी का उदय। हम तो पुरुत्रियन का उदय का क्या मतलब है? वही है ना सेम कोई फर्क नहीं है। बिल्कुल तो बहुत ही जाहिर सी बात है एक अजीब बड़े इंटरेस्टिंग से टाइम्स हैं। यहां पर कुछ भी हो रहा है और शायद कांग्रेस कोई बात और मैं कुछ भी बोल रहा हूं। नहीं नहीं ये मेकिंग अ लॉट ऑफ सेंस। मुझे लगता है कि एक तरह से आंखें खोलने वाला ये मैं कह सकती हूं कि ये पॉडकास्ट रहा। आपने आप यहां आए स्टूडियो में आए आपने बहुत वक्त दिया। थैंक यू सो मच राजू जी। इट वास वंडरफुल टू हैव यू हियर एंड नाउ थैंक यू मैं एक लास्ट बताना चाहता हूं कि आज जो सबसे ज्यादा पीसते पीसे जा रहे हैं मुस्लिम्स दलित आदिवासी किसान और मजदूर उनको ऐसी डिजिटल पार्टीज में लॉगिन भी नहीं करना चाहिए। उससे 10 हाथ 10 कदम दूर रहना चाहिए। जो जमीन पर खड़े हैं उनके साथ कंधे को कंधा मिलाकर खड़े हैं। वह भले ही बहुत ज्यादा मायावी मैजिशियन ना हो उनके उस नेतृत्व के साथ उनको खड़ा रहना चाहिए। क्योंकि उनसे इस इस अंद अंधे युग से बाहर आने का रास्ता जमीन से निकलता है। ना सात समंदर पर के पार जो आसमान है वहां से नहीं निकलता। जी बिल्कुल थैंक यू।

Companion article

"Anna Was Never a Fellow Traveller"

Raju Parulekar, the senior journalist known for confronting power directly, opens his conversation with Nous host Bushra Khanam by rejecting the idea that Anna Hazare's 2011 anti-corruption movement was ever the ideologically neutral, grassroots uprising it was widely taken to be. "We knew Anna long before this," he said. "Anna was never RSS-aligned in name — Anna was an opportunist." Parulekar says he first interviewed Hazare a decade before the movement, after Hazare forced the resignation of three Shiv Sena ministers through a hunger strike, and knew him well enough, he says, to recognise that Hazare's fasts had long been effective precisely because the Congress governments of the time treated him gently, settling matters quietly rather than confronting him.

What troubles Parulekar in hindsight is not that people joined the movement, but who was actually directing it. He alleges that Arvind Kejriwal's political instincts trace back to an anti-reservation movement he was involved with early in his career — one Parulekar says put Kejriwal at odds with India's reservation policy from the outset — and that the core team coordinating movement strategy, in his account, met regularly with the late BJP leader Arun Jaitley. He describes Kejriwal, Kiran Bedi and Manish Sisodia as functionally aligned with the BJP even then, while distinguishing Prashant Bhushan as anti-Congress without being pro-BJP.

An Anti-Reservation Past

Parulekar traces what he calls the RSS's fingerprints on Kejriwal's politics well before the Anna movement began. He points to Kejriwal's early opposition to caste-based reservation — a position, he says, that also drew protest during Kejriwal's time at IIT and later — as evidence of an ideological continuity rather than coincidence, noting that Kejriwal replaced a portrait of Gandhi with one of Ambedkar to court voters in Punjab, then reversed course to pay respects at Gandhi's memorial once legal troubles mounted, evidence, in Parulekar's telling, that Kejriwal has "no philosophy of his own" beyond expedience. He also recalls a specific incident in which activist Swati Maliwal was assaulted and police in Delhi, then under Chief Minister Sheila Dikshit, allegedly refused to register an FIR against Kejriwal's associates — a reluctance Parulekar attributes to sympathetic officials already embedded within the administration.

A Hospital, a Phone Call, and a Blog That Changed the Outcome

The interview's most vivid anecdote concerns the movement's own internal rupture. Parulekar says that during Hazare's climactic fast in Delhi, Kejriwal wanted Hazare to become a "martyr" — to die during the fast — believing, in Parulekar's account, that Hazare's death would clear his own path to national leadership. Frightened, Hazare allegedly slipped out of Delhi's hospital with activist Medha Patkar's help and phoned Parulekar, who was in Europe at the time, asking him to return to India immediately and help dissolve the movement's "core committee." Parulekar says he met Hazare in Ralegan Siddhi, where Hazare told him his own voice was no longer reaching the public — that the core committee had effectively taken over the movement in his name. Parulekar attributes the falling-out partly to disputes over how movement funds were being allocated, noting that "India Against Corruption" was, in his telling, not a registered organisation at all, with donations instead flowing through the separate NGOs Kejriwal and Bedi ran — an arrangement he argues violated the terms of their foreign-funding registration. Parulekar says he then published a Marathi blog under Hazare's own signature that publicly ended the standoff and, in his account, dismantled Kejriwal's political ambitions of the moment.

"If We Were the BJP's B-Team, Why Are We in Jail?"

Parulekar addresses head-on the argument the Aam Aadmi Party now makes in its own defence — that a party facing prosecution and imprisonment over the Delhi liquor policy case, and the unseating of its Rajya Sabha MPs, cannot plausibly be a BJP proxy. He rejects this reasoning entirely, comparing it to the real dynamics of organised crime: "the real fights happen between brothers," he argues — between partners, not strangers — pointing to the BJP's own falling-out with former RSS pracharak Sanjay Joshi as a parallel case where proximity, not distance, produced conflict. Kejriwal's political mathematics, in his telling, always required manufacturing his own path to power — "Modi in the nation, Kejriwal in Delhi" — expanding from Delhi into Punjab, where he argues the AAP's rise served as a "test case" for displacing Congress in states the BJP could not win directly, opening a path the BJP could ultimately walk through itself.

The "Cockroach Janata Party" and a New Digital Trap

Much of the conversation turns to what Parulekar identifies as history threatening to repeat itself: a newly viral, self-styled "Cockroach Janata Party," an online movement whose name references a dismissive comment likening unemployed youth to cockroaches. Parulekar warns his audience against joining it, arguing its leadership — some of it based abroad — shares the same organisational DNA as the original India Against Corruption campaign: unregistered, unaccountable and rapidly amplified to millions of followers in an implausibly short span. He notes that one of its central figures previously worked as a consultant to Delhi's chief minister's office and within AAP's education department, calling the new outfit "AAP's B-team" and cautioning that its platform, in his reading, offers nothing concrete for Muslims despite claiming to speak for India's most disenfranchised. "This is another trap," he said, urging listeners not to mistake viral growth for authenticity.

An Ideological War, Not an Ordinary Election

Parulekar frames India's current politics as what he calls "an ideological political war" rather than a contest between parties. He argues the opposition will remain unable to occupy the space vacated by such movements until it accomplishes three things: aligning the India bloc by excluding what he calls BJP "moles" — naming both Kejriwal and Sharad Pawar's faction of the NCP — building genuine grassroots movements rather than relying on digital mobilisation alone, and constructing a coherent alternative ideology capable of directly countering Hindutva's messaging rather than merely reacting to it. He is critical of secular parties and civil society more broadly for a hypocrisy he sees running through Indian public life: even self-described democrats and constitutionalists, he argues, do not genuinely regard Muslims as equal citizens.

Reviving the Left as a "Shock Absorber"

Describing himself as a Gandhian rather than a leftist, Parulekar nonetheless argues that only the political left has historically functioned as a check on the RSS's advance — a "shock absorber," in his words — and that wherever the left has been weakened, the BJP has moved directly into the vacated space, citing West Bengal as the clearest example. He faults the Congress for actively hastening that decline, arguing that during its years in power it starved Left trade unions and organisations of support while doing comparatively little to check the RSS's own institution-building — memorials, offices, schools — even as, in his account, the first UPA government's welfare achievements owed much to the parliamentary weight of 83 Left MPs. He draws an explicit line between the Congress's own idea of "antyodaya," or the upliftment of the last person, and the left's traditional emphasis on the working class, arguing the two are functionally the same idea by different names.

The Trap of "High Moral Ground" Politics

Parulekar is dismissive of the "Cockroach Janata Party's" pledge to refuse interviews with pro-government television and to live modestly without official cars or bungalows, arguing he has heard this script before — from Kejriwal at the outset of his career, and from RSS pracharaks long trained to present frugality and self-denial as proof of virtue. Invoking a teaching he attributes to the Buddha, he argues that no genuine leader governs from the "high moral ground": life itself, not a performance of austerity, is the only real moral ground a person has, and politicians who most loudly claim moral superiority are typically, in his framing, disguising something else. He also notes, in passing, that Kejriwal's government was conspicuously absent during the Shaheen Bagh protests against the CAA and NRC and during the 2020 Delhi riots that followed, despite being the sitting government of the capital — evidence, he argues, of where the party's real sympathies lay even at moments of direct communal crisis in its own city.

A Closing Word to India's Most Vulnerable

Parulekar ends with a direct appeal to Muslims, Dalits, Adivasis, farmers and labourers, urging them to stay well clear of digital-only movements run by distant, unaccountable leadership, and instead to stand with grounded, local leaders "shoulder to shoulder" — even leaders he concedes are imperfect. The way out of what he calls this "blind age," he argues, runs through the ground beneath people's feet, not through whatever appears, however dazzlingly, on a screen.

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