8:12When Will Muslims Feel Truly Equal in India? nous Clips
This is an excerpt from a longer conversation. Full Video: https://www.youtube.com/watch?v=dMM4eV4JyGs
Why are Indian Muslims facing increasing political marginalisation and social dehumanisation? Is the BJP solely responsible, or have secular parties also failed to protect constitutional values? In this compelling conversation, senior journalist Bushra Khanum joins Raju Parulekar to examine the s…
और मैं बताता हूं आपको 199293 के दंगे उसमें पुलिस प्रोएक्टिवली दंगों में मुसलमानों के खिलाफ शामिल है। कमीशन पे कमीशन आते रहे कांग्रेस के टाइम जिन्होंने पुलिस रिफॉर्म्स के 10 चीजें लिखी उसमें। एक भी पुलिस रिफॉर्म नहीं। इसका मतलब तो ये है कि समाज में ये नफरत [संगीत] ये ये पनप रही थी। यह ऑलरेडी थी। बीजेपी ने बस ये किया कि उसको पावर दे दी। बाबरी मस्जिद गिरना यही मैं अपने आप में यह मानता हूं कि भारत कम्युनल हो गया इसकी निशानी वो रेड वार्निंग रेड बेल माननी चाहिए थी और वहीं से रोकना शुरू करना चाहिए जब हम पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन देखते हैं या जो हम मुसलमानों की फिलहाल की जो जो सिचुएशन देखते हैं बीजेपी उसका एक हिस्सा है और सबसे बड़ा हिस्सा है। लेकिन क्या हम बाकियों को क्लीन चिट दे दें? अभी जो बाहर आ रहे हैं जेल से छूट के 2020 [संगीत] साल सजा काट के निर्दोष वो कांग्रेस के टाइम अंदर गए थे लेकिन वो प्रशासन पे कांग्रेस की आईडियोलॉजिकल नियंत्रण था ही नहीं ना। मुसलमानों के घर तो बुलडोज हो रहे हैं। अभी मुसलमानों के हक उनसे छीने जा रहे हैं। और सबसे बड़ी बात उसका उसका वोट उससे छीना जा रहा है। नमाज कोई पढ़ता है और कोई आरती करता है या गरबा करता है तो सार्वजनिक स्थल पे अगर एक को नहीं करना है तो दोनों को नहीं करना है। क्या आपको लगता है कि इसके लिए वो सोशलिस्ट समाजवादी जो पार्टियां रही क्या आप उनको भी जिम्मेदार मानते हैं? जेपी आंदोलन तब हुआ तब जनसंघ ने उसको सपोर्ट किया था? तो इस मिट्टी के लिए मुसलमानों ने ज्यादा त्याग किया है। लेकिन बताने वाला इतिहास चाहिए। इतिहासकार चाहिए। नाउ में हम डाटा और ग्राउंड रियलिटीज के जरिए वो स्टोरीज आपके सामने लाते हैं जिन्हें अक्सर दबा दिया जाता है या गलत तरीके से पेश किया जाता है। हम एक इंडिपेंडेंट प्लेटफार्म है। यानी हमारे पीछे किसी तरह की कोई कॉर्पोरेट बैकिंग नहीं है। हमारी असली ताकत आप हैं। अगर आप चाहते हैं कि ऐसी सच्ची और जरूरी स्टोरीज लगातार आपके सामने आती रहे तो हमारी वीडियोस को आप ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। चैनल को सब्सक्राइब करें और अगर आपके लिए मुमकिन हो तो स्क्रीन पर दिए गए क्यूआर कोड के जरिए आप हमें सपोर्ट करें ताकि हम यूं ही [संगीत] आपके सामने स्टोरीज लाते रहें और यूं ही काम करते रहें। आदाब न्यूज़ नेटवर्क देख रहे हैं आप। मैं हूं आपके साथ बुशरा खानम फहद। ऐसा लग रहा है फिलहाल मानो देश सवाल पूछना फिर से सीख रहा है। ऐसा मानो लग रहा है कि एक डर एक खौफ का जो माहौल 12 साल में पैदा किया गया था वो डर और खौफ लोगों के दिलों से निकल रहा है। अकाउंटेबिलिटी तय हो रही है। लोग सवाल पूछ रहे हैं। सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछ रहे हैं। अमित शाह से पूछ रहे हैं। प्रधानमंत्री से पूछ रहे हैं। पूछ रहे हैं कि हमारे हुकूक का क्या हुआ? लेकिन इस सब में सबसे महत्वपूर्ण सवाल जो अभी भी जिसका जवाब नहीं मिला है वो यह कि इस सब में मुसलमान कहां है? कौन है मुसलमानों का? आज इन्हीं सवालों का जवाब जानने की हम कोशिश करेंगे और मेरे साथ स्टूडियो में बेहद खास मेहमान जिनको सुनना बहुत पसंद करते हैं। राजू पाल लेकर जी ऑल द वे फ्रॉम मुंबई। नाउ स्टूडियो में मौजूद हैं। राजू जी बहुत स्वागत आपका कार्यक्रम में पडकास्ट में। मैं देख रही थी जब ये पूरा प्रोटेस्ट हो रहा था। युवा सड़कों पर आ रहे थे। सवाल पूछ रहे थे। एक बड़ा दिल को जैसे मिलता है ना एक सुकून सा मिल रहा था देख के कि आखिर कहां थे ये युवा? आखिर कहां थे ये 12 साल से क्यों खामोश थे? क्यों नहीं सरकार को अकाउंटेबल ठहरा रहे थे? क्यों नहीं सवाल पूछ रहे थे? क्यों नहीं डेमोक्रेसी को संविधान को रिक्लेम कर रहे थे? क्यों इतना डराकर इन लोगों को रखा गया था? लेकिन एकदम से हमने देखा कि वो डर वो खौफ एक तरह से दिल से निकल गया। क्या वो डर वो खौफ मुसलमानों के दिल से भी क्या निकल गया है? क्या मुसलमानों के पास भी वो एजेंसी आ गई है कि वो सरकार को अकाउंटेबल ठहरा सके और इसी तरीके से बेखौफ तरीके से किसी प्रोटेस्ट का हिस्सा कहीं पर भी जाकर कुछ भी बोल सके। देखिए यह आर्गुमेंटेटिव हिंदुस्तान जो है जो आपके हर बात को सवाल पूछता है हर बात का विश्लेषण करता है और आप किसी पक्ष में या किसी पक्ष के विपक्ष में खड़े रहते हो तो आपकी जेन्युइन कितनी इरादे हैं वो भी देखता है। यह हिंदुस्तान जो था 2013 तक वो अब फिर से वापस आ रहा है। मुसलमान की जो अभी जो आंदोलन हुए हैं या हो रहे हैं उसमें मुसलमानों की तादाद कुछ भी कम नहीं है। जबकि बुजुर्ग मैं जानता हूं मेरे जो मुसलमान भाई मित्र हैं और फ्रेंड्स हैं यानी लड़कियां और लड़के दोनों हैं परिवार हैं बहुत सारे तो ना उनकी जो पुरानी पीढ़ियां हैं यानी मां-बाप जो वो बोलते हैं नहीं यार बेटा मत जा हम लोग के लिए कोई नहीं आएगा। हम लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरते गए तो उनको समझ में आया कि यह सबका है। यानी हम अपना जो हमारा देश ये इसमें से खो चुके थे वो वापस मिल रहा है। हां हालांकि एक बहुत बड़े समय के लिए बहुत लंबे समय के लिए मुसलमानों को मार मार के मार मार के आरएसएस मोदी सत्ता ने जो अपाहिज बना के रखा था उससे फौरन तो उभरेगा नहीं। यानी कल ही सशक्त होकर खड़ा रहेगा। ऐसा तो नहीं होगा। लेकिन आप बुखार से ठीक हो जाते हो तो जो स्थिति होती है थोड़ा सा वीकनेस है। लेकिन अब मैं खतरे से बाहर आ चुका हूं। यह लेवल पर आ गया है और यह बात सत्ता को बहुत डरावनी लगती है क्योंकि सारी सत्ता मोदी की या आरएसएस की इसी बात पर खड़ी है कि मुसलमान दुश्मन है। तो मुसलमान बिल्कुल दुश्मन नहीं है। यह मैं जानता हूं। आप जानती हैं सारे हिंदू जानते हैं। आरएसएस हिंदू नहीं है। मोदी हिंदू नहीं है और भाजपा हिंदू नहीं है। जिनके अमल में दूसरे का धर्म स्थल बाबरी मस्जिद गिराई गई और वो गिराई जिस मंदिर के लिए गई वो राम मंदिर में भी चोरी कर दी गई और वो भी इन्हीं के सरगनाओं ने की वो हिंदू कहां के? यह बात हिंदू समाज में फैल चुकी है। तो जो थोड़ी बहुत थोड़ी बहुत जो इनकी प्रोपेगेंडा से इन्होंने मुसलमानों के प्रति नफरत फैलाई थी वो खत्म हो गई। एक दूसरी जो परीक्षाओं में जो लीक हो रहा है जो सड़कें टूट रही है। जो ब्रिजेस टूट रहे हैं। मेडिकल जो फैसिलिटीज है वो खत्म हो रही है। गोमूत्र और गोबर पे ही जीना इन्होंने लोगों का शुरू कर दिया है। ये सारी चीजों का अंतिम अगर विक्टिम है तो हिंदू है ज्यादा। मुसलमान है किधर? तो ओवरऑल पीरियड ऑफ टाइम आप एक आदमी को कई बार मूर्ख बना सकते हो। कई लोगों को एक बार मूर्ख बना सकते हो। लेकिन कई लोगों को कई बार मूर्ख नहीं बना सकते। वो वाली बात थी कि अब लोगों को पता चल गया। यह हिंदू मुसलमान बस भागवत होसबड़े भैया जी जोशी और अन्य जो आरएसएस वाले हैं उनके फायदे के लिए और बजरंग दल और अन्य टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन उनको चलाने के लिए और मोदी की सत्ता कायम रखने के लिए और इजराइल और उनके आकाओं को खुश करने के लिए और इनके क्रोनीस को जल जंगल जमीन बेच डालने के लिए यह मुसलमानों को विलेन बनाया जा रहा है। वास्तविक रूप से हमारे अगर जंग किसी की है तो आम हिंदुस्तानी की मोदी सत्ता जो वोट चोरी करके सत्ता में बैठी है उनसे है। तो मुसलमान इससे देखिए मुसलमान इससे मुक्ति के अपने रास्ते पे वापस आ गया है। लेकिन अब इसके टर्म्स एंड कंडीशंस बदलने पड़ेंगे। जो देखिए ऐसा कि भारत आजाद होने के बाद 2013 तक मुस्लिम्स यह सब मानते रहे कि आजादी हमारी भी है और संविधान है तो उसकी सुरक्षा जो है वो टेकन फॉर ग्रांटेड थी मुसलमानों के मन में अब वैसा नहीं रहना चाहिए। अब गेम के नियम भी होने चाहिए। इतना ही नहीं सिर्फ मुसलमानों की बात नहीं कह रहा हूं। आदिवासियों को, ओबीसीज को, बहुजनों को, दलितों को अब अपने हिसाब से अपना प्रोटेक्शन कर लेना चाहिए। सरकार को बोलना चाहिए कि नई सरकारें आएगी। उनको हमें स्पेसिफिक प्रोटेक्शन देना चाहिए। हमारे एंपावरमेंट, हमारे एजुकेशन, हमारे शिक्षा के लिए, हमारे सृजन के लिए एक अलग सी स्पेस हो। जिस स्पेस से हम एक देश अच्छी तरह से बन सके और इस देश की प्रगति के लिए हम योगदान दे सके ना कि हमारा दमन ही होता रहे और बहुसंख्य लोग जो है वो संसद और अपने विधानसभाओं में अपना रिप्रेजेंटेशन लेते रहे और सबसे पैथेटिक अगर कोई कौम है तो मुसलमानों की जो जिस संख्या में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में लोग रहते हैं जो पावरफुल है जो सेलिब्रिटी है जो कुछ बोल सकते थे उन्होंने इस 12 साल में मुझे इतना घोर निराश किया यानी मेरी तरफ से भी बोल मेरी ऑन बिहाफ ऑफ मी शाहरुख खान बोल सकते हैं क्योंकि शाहरुख से हमने मोहब्बत की थी स्वदेश फिल्म के शाहरुख हमारे हीरो थे आमिर खान बोल सकते थे सलमान खान बोल सकते थे ये ये लोग इतने कायर निकले कि इनको को हीरो की स्टेटस तो नहीं लेकिन इनके ऊपर अलग से काले पन्ने लिख देने चाहिए क्योंकि जो अपने कौम का भी नहीं हो सका वो अपने देश का क्या होगा या अपने धर्म का नहीं हो सकता अपने लोगों का नहीं हो सकता और वो यह नहीं कि उनका नेतृत्व करके आप बगावत करने के लिए कह रहे हो हम लोग कह रहे हैं कि आप इस देश के हो यह आपने प्रूव किया है ना तो उसका फायदा पूरे मुसलमान कौम को देना चाहिए उनका जब लिंचिंग होता है तो शाहरुख को आगे जाना चाहिए। आमिर को आगे जाना चाहिए। सलमान को आगे जाना चाहिए। और 10 लोग हैं। अरे पूरा महाभारत सीरियल राही मासूम रजा ने लिखा था। क्या बात कर रहे हैं लोग? तो आप एक बहुत पॉजिटिव [गला साफ़ करने की आवाज़] पिक्चर जो है आप एक पेंट कर रहे हैं। आप एक बहुत पॉजिटिव पिक्चर पोट्रे कर रहे हैं। आप यह बता रहे हैं कि अब चीजें जो है वो मुसलमानों के लिए बदल रही हैं। लोग रियलाइज कर रहे हैं। नफरत से उभर रहे हैं। आगे निकल रहे हैं। क्या वो नफरत से इतने उभर रहे हैं कि अगर कल किसी मुसलमान की जो कि हर रोज होती है। अगर लिंचिंग हो रही है तो उसके खिलाफ वो आवाज उठाएं? क्या वह इतना उभर रहे हैं कि अगर किसी बेगुनाह मुसलमान को यूएपी में फंसाया जाता है तो वह आवाज उठाएं? क्या वह इतना उभर रहे हैं कि गुंडा एक्ट स्पेशली बंगाल में लाया जाए और जो 14 लड़के छात्र जो हैं जो अरेस्ट किए जाएं उनमें से 12 या 13 जो हैं वो मुसलमान हो उनके लिए वो आवाज उठाएं। क्या इतने उभर रहे हैं कि आसाम में जिस तरह से मुसलमानों को टारगेट किया जा रहा है उनके लिए वो आवाज उठाएं और अगर ऐसा नहीं है तो फिर आपको नहीं लगता कि ये तमाम चीजें फिर बेमानी है क्योंकि मुसलमानों के घर तो बुलडोज हो रहे हैं अभी मुसलमानों के हक उनसे छीने जा रहे हैं। मुसलमान आवाज नहीं उठा सकता है। मुसलमान अब भी लिंच हो रहा है। और सबसे बड़ी बात उसका उसका वोट उससे छीना जा रहा है। 3 साल दीजिए मुझे। हम जो आप बोल रही हो वह सब होगा। नेते को अरेस्ट होगी उसके बाद बहुत तेजी से होगा तो आप समझिए कि इनका इस सब का पतन होने के साथ हम मुसलमान की अपनी जगह उसकी रिस्पेक्ट और उसका जो खोया हुआ हिम्मत है खोई हुई हिम्मत है उसको वापस दिलाना हम सबका फर्ज है तो मैं मेरी तरफ से आपको आश्वासन देता हूं कि यह 3 साल में यह होगा और 3 साल बात हम यही इसी स्टूडियो में बैठ के बात करेंगे। तब आप बोलेगी कि करीब-करीब आपने सब करके दिखाया। इस देश का मुसलमान ये इसके बाद ये 3 साल जाने के बाद कभी यह फील नहीं करेगा कि यह एक बुरा सपना था 12 साल का। लेकिन ये 3 साल जाने के बाद यह मुसलमान कभी फील नहीं करेगा कि यह धरती ये भारत देश उससे बेगाने जैसा व्यवहार कर चुका है 12 साल के लिए ये गारंटी है। आप कह रहे हैं उसके सारे जख्म भर जाएंगे। जख्म कभी भरते नहीं है। घाव तो रहते हैं। वो जख्म भर जाते हैं। निशानियां तो रहेगी। हम देखिए जबजब जिक्र होगा 2014 से 2027 के युग का तब तक मुसलमान अपनी दर्द को बयां करेगा उसको तो मैं अनडू नहीं कर सकता या आप नहीं कर सकते या जो लोग सोच रहे हैं वो नहीं कर सकते लेकिन पहला लिंचिंग जब हुआ विश्वास रखिए मेरा एक दोस्त है सोलापुर का सरफराज अहमद हम उसके पास सारे रिकॉर्ड्स हैं मैं गया तो हम लोग ने एक-एक रिकॉर्ड एक-एक एक एक मैं हम लोग क्या उसी ने एक-एक लिंचिंग का एक-एक बात का रिकॉर्ड रखा है। डॉक्यूमेंटेशन रखा है। एक-एक बात का हिसाब लिया जाएगा। और आप यह मत समझिए कि हिंदू लोग या ओवरऑल हिंदूस इसमें शामिल थे। मैं यह मानता हूं कि एक एक बड़ी तादाद में हिंदू लोग इसमें शामिल थे। आप इसलिए यह मान सकती है या मैं इसलिए मान सकती हूं कि चुप रहना शामिल होना है। लेकिन वो चुप इसलिए थे कि वो भी तो खूब डरे हुए थे। अब आपको पता चला होगा अगर राम को भी ये चोरी कर सकते हैं और सारे विपक्ष के दल के जो हिंदू लोग हैं उनको ईडी लगा सकते हैं या हिंदू बच्चों को लाठी और पैेट गन और AK-47 के आठ राउंड चला सकते हैं अमित शाह। तो आप समझिए वह भी डरे हुए थे। ऐसा नहीं है कि मुसलमानों के नफरत मुसलमानों से नफरत होने से बड़ी तादाद में हिंदू कौम ये चुप बैठी थी। वो नहीं है। डर से चुप बैठे थे। ये चार गुजराती जो देश पर राज कर रहे थे उन लोगों ने यह खौफ इस कदर भर दिया था कि कौन किसका दोस्त है और कौन अरे मैं आपको बताता हूं। मीटिंग में हम गए। एक जमाने के जर्नलिस्ट साथ में है। मैं कुछ बात बोलता हूं। धीरे से बोलो। अरे वो दिल्ली में एक मेरा स्पीच था अपने वो मिश्र साहब ने राहुल जी के ऊपर किताब लिखी है। उसका विमोचन था तो मैं भी एक वो था। तो वो प्रोग्राम में मैंने जिस अंदाज में भाषण किया YouTube पे आप देखिए। तब दो303 थे बीजेपी के पास। मोदी तो अ विष्णु के अवतार ही थे भारत के लिए और शाह अ नए शाहरुख खान थे यानी शाहरुख शाहरुख नहीं आप समझिए स्टेटस के लिए चाणक्य भी थे सरदार पटेल भी थे शाहरुख खान भी थे तो ऐसी स्थिति में साथी जो थे मेरे या जर्नलिस्ट थे वो भी दबी हुई आवाज में मुझे सलाहें दे रहे एक बार नासिक में भी ऐसा ही भाषण हुआ मेरा कि ये देखो 2014 से पहले अलग था अब अलग है ज्यादा बात मत कर मुसलमानों का वो सब जिक्र मत करना समझिए कि मैंने उनको पूछा कि क्या मुसलमानों के बारे में बात करना गुनाह है बोले बिल्कुल नहीं हम भी चाहते हैं लेकिन देखो हम ही अंदर गए उमर खलीद अंदर है हम भी अंदर गए क्या ये देश एहसान फरामोश है भूल जाता है यह इससे मैं सहमत हूं क्योंकि जब मैं एक क्रोनी ने मेरे ऊपर केस किया और मैं चक्कर लगा रहा था तो एक भी पॉलिटिकल पार्टी आज मुझे एक पॉलिटिकल पार्टी के नेता आप क्या बोलो क्या नहीं बोलो इस पे इसको छोड़ दो इसको करो ये सब बोलते हैं लेकिन तब किसी ने फोन नहीं किया मुझे तो समझिए कि मुसलमान और देखिए पॉलिटिकल पार्टी रीजनल पार्टी छोटी-छोटी पार्टियां थी मस्जिद पे उनको लाउडस्पीकर दिखने लगे अचानक अचानक कल तक जो मुसलमान के साथ उठ बैठ के आप फिल्मों की बातें करते थे। वो मुसलमान आपको अ क्या ही बोलूं अब उनको एक स्पेसिफिक वर्ड यूज़ किया जाता है। वो नाम से बुलाने लगे। हरा ऐसा भी बोलने लगे। वही लोग थे जिनके साथ मैंने मुस्लिम दोस्तों के साथ बैठ के फिल्मों के ऊपर डिस्कशन किए थे। उसमें से फिल्म प्रोड्यूसर मुस्लिम्स थे। और हर क्षेत्र मैं आपको बताता हूं जयपुर के एक डॉक्टर सैफी साहब हैं। डॉक्टर सैफी साहब आपको मैं उनका डिटेल्स दूंगा। आप जरूर फोन कीजिएगा उसको उनको क्योंकि वो हमारे प्रोग्राम्स देखते हैं। वो साहब कौन है मालूम है आपको? उनकी एज है 69। भारत के ओपन हार्ट सर्जरी करने वाले जो महान डॉक्टर्स हैं उनमें से एक वो है जो बायपास सर्जरी कर सकते हैं। उनके हाथ में धनवंतरी है। यानी सुबह उठकर वो जान बचाते हैं लोगों की ऑपरेशन के पीछे ऑपरेशन करके और बाद में हमारे एपिसोड्स देखते हैं। [हंसी] तो मुझे मेल किए फिर मैंने बात की। हम्। जयपुर में उनका बहुत अच्छा घर है। अब मैंने देखा नहीं है। लेकिन उनका कहना कि जयपुर में आप आओगे तो कहीं और रहे तो मुझसे वो फिर बुरा कोई नहीं। तो उन्होंने मुझे बातें बताई कि कैसे हिंदू उनसे दूर हो। अरे डॉक्टर जो जान बचाता है यार। उनकी कितनेों के हार्ट ही उन्होंने चेंज करके रखे हैं। उनका ओपन हार्ट सर्जरी यानी कितना कॉम्प्लिकेटेड चीज कितने लोगों का रोज करते हैं वो उनको नंबर वन नंबर टू होंगे भारत के जिनके पास ब्रिटेन और यूएस का लाइसेंस है। वो चाहते तो देश छोड़ के जा सकते हैं। लेकिन मुझे बोले यहां के लोगों को मेरी जरूरत है। और उनके पेशेंट ज्यादातर हिंदू हैं। लेकिन बोले एक आश्रम का नाम लिया वो उसके लिए किसी एक धार्मिक संस्था उसके लिए मैं करता था ऑपरेशंस फ्री में आधे पैसे में कम पैसे में लेकिन उन लोगों ने मुझे इतनी तकलीफ दी राजू भाई ये 12 साल में ये नफरत ये जहर कहां से आया उन्होंने मुझे पूछा और इतने उनकी सादगी इतनी है आप विश्वास नहीं करेगी मिश्रा जी आपके मेरे आंखों में आंसू आ गए और एक उदाहरण बताऊंगा वो आपको मालूम है मैंने उनको भेजा वो भी डॉक्टर सीतापुर से उन्होंने बोला मेरा मेल मैंने भेजा और आपका फोन किया तो मैंने रात को मेरी वाइफ को बताया तो रात को मेरी वाइफ घर पे इंतजार कर रही थी और मुझे पूछा पाते कि राजू जी ने क्या आपके मेल को जवाब दिया हम तो मैंने बोला जवाब नहीं उन्होंने मुझे फोन ही किया और हम लोग खूब बात किए वो आ रहे हैं तो हम लोग दोनों बहुत खुश हुए हम इस तरह से एक मुस्लिम मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स, मुस्लिम सृजनशील लोग, मुस्लिम डॉक्टर्स, मुस्लिम युवा, मुस्लिम पढ़ने वाले और मुस्लिम गरीब हम जो आपको खाना ला के देता है, ब्रेड लाता है, दूध लाता है, कुछ भी लाता है, खाना खिलाता है। उनको इस तरह से तड़पाया आपने। बस आप आप उनके हो। यह बताने के लिए इतना टाइम लगा आपको। सिर्फ मोदी शाह को डर के और उनके दो क्रोनीस को जान ही ले लेते ना। हम और जेल में ही डाल देते ना तो वह तो डाल ही दिया लोगों को रूपेश कुमार अभी भी जेल में ही है और उमर खलीद कौन सा बाहर आया है इंजीनियर शजली इनाम इमाम कौन से आए कितने संजीव भट्ट भी अंदर ही है तो ना तो पपस के लिए आपको जो भी करना है वो करना चाहिए था देखिए मैं एक चीज से आपसे डिसएग्री कर रही हूं राजू जी एक बात से आपकी कि आप ये कह रहे हैं कि सिर्फ अमित शाह और नरेंद्र नरेंद्र मोदी नहीं नहीं आरएसएस पूरा हां मतलब आप ये कह रहे हैं कि उनकी वजह से ये लोग डरे हुए थे इसीलिए उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ इस तरह की नफरत जो है वो हमने इन 12 सालों में हमने देखी हालांकि हम जब 12 साल इन 12 साल को से हम पहले देखते हैं तो दंगे तब भी मुसलमानों के खिलाफ हुए थे। मैं खुद एक दंगा पीड़ित हूं। और तब भी हमने देखा था कि किस तरह से यूएपीए के तहत या दूसरे मको का और ये तमाम वो लगाकर किस तरह से मुस्लिम यूथ जो हैं उनको जेलों में डाला जाता था और सालों साल 20 साल के बाद 18 साल के बाद 17 साल के बाद वो बाहर निकल रहे हैं और पता चला कि उनका कोई कसूर ही नहीं था लेकिन जिंदगी तो उनकी तबाह बर्बाद हो गई। एक तो यह इसका एक आस्पेक्ट है। दूसरा यह कि जब हम यह कहते हैं कि मुसलमान से नफरत जो है वो इन लोगों के डर की वजह से इन लोगों ने ऐसा नहीं मेरा मैं आपको उसको मैं बस एक सवाल पूरा कर लूं। आप अपनी बात एक्सप्लेन करिएगा। तो एकदम से ऐसा ऐसा तो नहीं हो सकता कि आप मेरे पड़ोसी हैं। मैं मुसलमान हूं। आप हिंदू हैं। आप मेरे पड़ोसी हैं। और 12 साल से पहले ठीक-ठाक हमारी आपस में बात होती थी और सब कुछ ठीक था। था एटलीस्ट सरफेस पे नहीं था। आप दिखा नहीं रहे थे और अचानक से आप मुझसे नफरत करने लगे। इसका मतलब तो यह कि समाज में यह नफरत ये ये पनप रही थी। यह ऑलरेडी थी। बीजेपी ने बस यह किया कि उसको पावर दे दी। उसको लव्ज़ दे दिए। उसको यह कह दिया कि अगर आप ऐसा करेंगे तो आपके खिलाफ कुछ नहीं होगा। इसलिए तमाम लोग खुलकर बड़े शहरों से लेकर छोटे शहर, गांव, कस्बे से लेकर सब जगह बाहर निकलकर आ गए। वरना ऐसे कैसे हो सकता है कि आप एक इंसान की पीट-पीट कर जान ले लें और बाकी लोग तमाशबीन खड़े हुए खड़े रहे और वीडियो बनाए और उसको एंजॉय करें। एक बड़ा तबका जो हिंदू समाज का है वो चुप इसलिए रहा और यह समर्थनीय नहीं है। मैं उसका समर्थन कभी नहीं करता क्योंकि मैं खुद नहीं रहा चुप। तो इसलिए कि वो डरा था। मैंने बहुत लोग देखे हैं जो डरे थे इसलिए चुप रहे। अब इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। एक एक तबका था जिसको मौका नहीं मिला इसलिए वह मुसलमानों के साथ दोस्ती बनाया था। उन्होंने अपने नाखून और दांत बाहर निकाले क्योंकि अब मोदी आ गए हैं। अब वो अमर है। इसलिए हाथ निकाली और तीसरा तो आरएसएस और बीजेपी का कल्ट ही था। वो कंप्लीटली टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन है। ये मैं हजार बार कर चुका हूं। कह चुका हूं। और इनकी सजा ट्रायल करके पूरे संवैधानिक रूप से देनी चाहिए इनको। इसमें मेरे मन में कोई शक नहीं है। लेकिन एक और बात है जी। जो पहले के जो हमारे शासक थे या फिर हमारी जो आजादी के बाद में सरकारें आई उन्होंने पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया। एक तो पुलिस रिफॉर्म पुलिस को अ कम्युनल होना ये आम बात होगी। हम तो आपको पालन संविधान की शपथ का करना है। अमित शाह की आर्डर कोई शपथ नहीं है। अमित शाह के आर्डर को आप अपने विवेक से ना कह सकते हो। इतनी ताकत आपको संविधान ने दी है। यह बेसिक प्रिंसिपल है। अमित शाह हो या राजू पुरले करो। कोई भी गृह मंत्री होने से फर्क नहीं पड़ता। आपको वही ऑर्डर्स दी जा सकती है जो संविधान में सही है। तो बात यह है मैडम कि जो चुप रहे वो भी सही नहीं थे। लेकिन बड़ी तादाद में हिंदू इसलिए चुप रहे क्योंकि मैं क्यों पड़ूं? मर तो मुसलमान रहे हैं ना। इसका गिल्ट उन्हें नहीं आया। आप वो मानवतावादी नहीं रह सके। यह बात सारी मैं मानता हूं। एक ऐसा वर्ग था। यह भी मैं मानता हूं कि जिनको मुसलमानों के खिलाफ यह [गला साफ़ करने की आवाज़] जहर था उनके मन में। लेकिन ये एक दिन में नहीं हुआ। मैं आपको बताता हूं कि पहले वाली सरकारें जो सो कॉल्ड सेुलर सरकारें उन्होंने भी कुछ खास किया नहीं। कम्युनल ना होने के लिए। बिल्कुल। धार्मिक होना और कम्युनल होना यानी धार्मिक और सांप्रदायिक होने में जो फर्क है वो किसी सरकार ने हमें नहीं सिखाया। तो सत्यनारायण की पूजा करते हैं। इसका मतलब आप मुसलमान के खिलाफ भी हो सकते हैं। यह दो अलग चीजें हैं। और नमाज कोई पढ़ता है और कोई आरती करता है या गरबा करता है तो सार्वजनिक स्थल पे अगर एक को नहीं करना है तो दोनों को नहीं करना या दोनों को करने के लिए आपको इजाजत देनी चाहिए। ये बातें आपको पुलिस रिफॉर्म द्वारा सिखाई जानी थी। मैं आपको बोलूं कमीशन पर कमीशन आते रहे कांग्रेस के टाइम में जिन्होंने पुलिस रिफॉर्म्स के 10 चीजें लिखी उसमें एक भी पुलिस रिफॉर्म्स नहीं हुए और मैं बताता हूं आपको 1992 93 के दंगे फाइनल वार्निंग थी क्योंकि उस दंगों में मैंने मुंबई में देखा सुलेमान बेकरी केस जिसमें बाल ठाकरे के खिलाफ श्री कृष्ण कमीशन ने रिपोर्ट दिए थे। याद है आपको? उसमें पुलिस प्रोएक्टिवली दंगों में मुसलमानों के खिलाफ शामिल हुई थी। जो वहां तबके पुलिस कमिश्नर थे उनका मुझे नाम याद नहीं आ रहा है। उन पे केस भी हुआ था। जबकि उसके बाद 1995 में सरकार बदल गई और शिवसेना बीजेपी की सरकार आई। उन्होंने वो कमीशन का रिपोर्ट कूड़े में फेंक दिया। पुलिस रिफॉर्म तो कभी हुई नहीं। अब आपको जो पुलिस दिख रही है उसका पूरे आजादी के बाद 75 साल में कोई रिफॉर्म ही नहीं हुआ है। उनको सिखाया ही नहीं गया है कि क्या सही क्या गलत मनुष्य हो आप इंसान हो। आपकी यूनिफार्म ही सर्वोपरि नहीं है। आपकी यूनिफार्म संविधान सर्वोपरि है इसलिए आपके शरीर पे है। आप वो संविधान इसलिए है क्योंकि वि द पीपल यानी सारे लोग सारे लोगों में सारे कौम आती हैं। इसमें मुसलमान भी आते हैं। उनकी रक्षा करना आपका पहला फर्ज है। अमित शाह का सुनना बाद में आता है। ये सारी चीजें उनको सिखाई दी गई। तो चिदंबरम के टाइम में जो हुआ वो माइल्ड था। अमित शाह के टाइम में हुआ। वो स्ट्रांग था। लेकिन हुआ तो वही हम जो आप बोलना चाहती है बराबर ना बिलकुल बिलकुल मैंने बाबरी मस्जिद गिरना यही मैं अपने आप में यह मानता हूं कि भारत कम्युनल हो गया इसकी निशानी थी वो रेड वार्निंग रेड बेल माननी चाहिए थी और वहीं से रोकना शुरू करना चाहिए था और रामकृष्ण आडवाणी ने रथ यात्रा निकाली और तमाम जगह पर वो गए और जिनको इतना ह्यूज सपोर्ट जो है पूरे पूरे देश भर में उनको मिला और उसके बाद फिर हमने बाबरी मस्जिद जो है वो शहीद हुई। वो हमने देखा अपनी आंखों के सामने और मैं खुद उसकी विक्टिम राइट विक्टिम रही हूं और मुझे खुद अपना घर छोड़कर भागना पड़ा था। मेरे फादर खुद अरेस्ट किए गए थे। उनको उनको जेल में भेजा गया था और इतना मारा गया था कि वो कभी फिर अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाए। तो ये ये तमाम चीजें तो मैं आपको बताता हूं कि कैसे होता है। पुलिस प्रशासन में पुलिस में और प्रशासन में यानी ये जो ब्यूरोक्रेसी है एक तो 90% ब्यूरोक्रेसी आजकल यूपीएससी बैठते ही इसलिए क्योंकि पैसे खा सके करप्ट हो सके। पहले दहेज से शुरू करते हैं। तो ये कोई आदर्शवादी तो है नहीं। देश की सेवा वगैरह वो इंटरव्यू में बोलते हैं। ये जो प्रशासन और पुलिस में ना धार्मिक होने का मतलब सांप्रदायिक होना नहीं है। सिखाते नहीं तो धीरे-धीरे ये सांप्रदायिक ही हो जाते हैं। जाति वर्ण व्यवस्था का अलग ही खेल है। वो उस पे भी बात कर सकते हैं। लेकिन आज विषय नहीं है। जी तो बात ये है कि आप जिसके पास सहारे के लिए जाएंगे यानी आप पे हमला हो रहा है या आपके यानी रिलेटिव जो हैं रिश्तेदार हैं उन पे हमला हो रहा है तो आप पुलिस थाने जाएंगे तो दरोगा बोलेगा का नाम है नाम क्या है खान अच्छा शेख अंदर ले लो इनको लगा दो यूएपीए लगा दो गुंडा है बुलडोज कर दो इनका घर अरे आप रपट लिखवाने आए थे आप चोर नहीं थे। ऐसा करके लाखों लोगों की जिंदगी बर्बाद हुई है इस देश में। इसकी मेन वजह शासक पहले के शासक बीजेपी के बीजेपी के अपने उद्देश्यों के प्रति बहुत ही सजग थी। वो उद्देश्य इस्लामोफोबिया भी था। उससे पहले के शासक इस्लामोफोबिक नहीं थे। उनको उद्देश्य मालूम नहीं था। आईडियोलॉजिकल फिलॉसोफिकल उद्देश्यों से उन्होंने काम ही नहीं किया। वो बस फैसिलिटेटर बने रहे। तुमको राशन कार्ड मिल रहा है ना हम मैं देखा मैंने देखा है नेता मुसलमान नेता हर पक्ष पार्टी में हुआ करते थे 2013 तक वो उनकी मुसलमान लोगों की कम्युनिटी की लोग आते थे। हां तेरे क्या है? सर बेटे का एडमिशन हां मैं बात करता हूं। तो आपसी मामला होता था वो। यानी ये आपका हक है। आप मुसलमान हो तो अलग क्या है? आपको वही कर्वेंट में भी एडमिशन मिल सकती है। एक्सट्रीम एलिट है जो उनका छोड़िए। मैं आम मुसलमान की बात तो गेटोस बनते गए। दंगे होते थे तो और गेटो बनते थे। लोगों को और मारा जाता था। अभी जो बाहर आ रहे हैं जेल से छूट के 2020 साल सजा काट के निर्दोष वो कांग्रेस के टाइम अंदर गए थे। वही मैं बोल रही थी। लेकिन वो प्रशासन पे कांग्रेस की आईडियोलॉजिकल नियंत्रण था ही नहीं ना। या या लेफ्ट का लेड गवर्नमेंट था या फिर यूपीए था या फिर ऐसी गवर्नमेंट्स आई कि जिनकी गठबंधन थे जो सेकुलर गठबंधन थे उनके आइडियोलॉजिकल कमिटमेंट में रुचि नहीं थी वो यह मानते थे कि बीजेपी भी अपने जैसा ही एक पार्टी है। वह मानते थे आरएसएस भी एक ऐसी एनजीओ है। बोलने के लिए कुछ भी बोलते होंगे लेकिन वह सत्ता में आएंगे तो अपने जैसा ही बिहेव करेंगे। तो वो रेशियो जो अचानक यह 12 साल में बदला ना मुसलमानों के लिंचिंग और मुसलमानों का विक्टिमाइजेशन का और एक तरह से जेनोसाइड की तरफ हम पहुंच गए वो अचानक नहीं हुआ लेकिन उसके लिए प्रोएक्टिवली बचाने की कोशिश किसी गवर्नमेंट ने पहले की नहीं लेकिन किसी पहले वाली गवर्नमेंट ने यह भी कोशिश तो नहीं की कि इस तरफ हम जा रहे हैं इसको देखने हम उनको लगता था गवर्नमेंट एक फैसिलिटेटर है। इतना इतने ही नाइव थे क्या ना नहीं थे कि उनको पता नहीं उन्हें उन्हें आइदर मनी कम्स और मनी गोज़ से फुर्सत नहीं थी। नाउ नहीं थे। हम उनको लगता था सात पीढ़ियों तक आबाद कर दूं खुद को और हमारी पार्टी को तो उसके बाद सब ठीक चलेगा। हम मुझे ये बताइए फिर राजू जी कि अभी मुसलमानों की जो जो दुर्दशा है जो उनकी फिलहाल जो उनकी सिचुएशन है इसके लिए आप मोटे तौर पर किसको आप जिम्मेदार आप मानते हैं? क्या आपको लगता है कि इसके लिए वो सोशलिस्ट समाजवादी जो पार्टियां रही क्या आप उनको भी जिम्मेदार मानते हैं? जेपी आंदोलन तब हुआ तब वो जनसंघ ने उसको सपोर्ट किया था और उसके उसके बाद के जो चेहरे निकले जिसमें लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, नीतीश कुमार इस तरह के तमाम लोग लालू प्रसाद यादव को छोड़ दें। लगभग किसी ने भी बीजेपी के साथ जाने में कोई गुरज नहीं किया। इन तमाम दलों को मुसलमान अपनी तमाम उम्र सपोर्ट करते रहे। और मुलायम सिंह यादव को, अखिलेश यादव या मुलायम सिंह यादव को इस यहां तक कि नीतीश कुमार को भी और इसके अलावा भी जो इस दल से निकले हुए जो चीफ मिनिस्टर नहीं बने लेकिन अदरवाइज वह नेता बने उनको मुसलमान सपोर्ट करते रहे लेकिन उसको जनसंघ का समर्थन जो है वह प्राप्त था बिना उसके वो आंदोलन इतना बड़ा ही नहीं हो सकता था तो क्या आपको नहीं लगता कि वो सबसे बड़ा धोखा था मुसलमानों के साथ और अभी भी जब हम पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन देखते हैं या जो हम मुसलमानों की फिलहाल की जो जो सिचुएशन देखते हैं बीजेपी उसका एक हिस्सा है और सबसे बड़ा हिस्सा है। लेकिन क्या हम बाकियों को क्लीन चिट दे दें? बिल्कुल क्लीन चिट नहीं दे सकते। अह देखिए ओपनली जेपी ने कहा कि आरएसएस अगर फैसिस्ट है तो मैं भी फैसिस्ट हूं। लेकिन इस देश में तीन ऐसे नेता थे और प्रधानमंत्री थे जो मुसलमानों की जो मामले थे उसमें रुचि रखते थे और आइडियोलॉजिकल कमिटमेंट थे। फॉर्चूनेटली अनफॉर्चूनेटली वो तीनों गांधी परिवार से थे। एक नेहरू नहीं एक चार थे दूसरे वल्लभ भाई पटेल तीसरी इंदिरा गांधी और चौथे राजीव जी उनको प्रेशराइज किया गया लेकिन मैं आपको एक बात बताना चाहता हूं कि ये चारों के बाद ऐसी कोई आईडियोलॉजिकल कमिटमेंट किसी पार्टी की मुसलमानों के प्रति रही नहीं और सोशलिस्टों के बाद अगर माने तो तो सोशलिस्ट लोहिया से लेकर बाद में जेपी और बाद में ये लोग ये जेलस थे कांग्रेस के ये गांधी फैमिली के नेताओं से या अब राहुल गांधी से नहीं जलस उनको कोई भी सोशलिस्ट नेता बन के आता था तो उस भस में चलता था ओ ये अपने वीपी सिंह हम फिर अब केजरीवाल भी उनको सोशलिस्ट लगता है। देखिए सोशलिस्ट सब सारे जर्नलिस्ट दौड़ते हुए उसके पीछे जाते हैं और बाद में और दूसरी वो इंटीरियर वो उनकी मोटिव्स है वो अलग सी बात अलग लेकिन राजीव गांधी के लिए तो ये कहा जाता है कि उन्होंने बाबरी मस्जिद का ताला तुड़वाया और कांग्रेसी बड़े उससे बोलते हैं जब उन्हें राम मंदिर पर टारगेट किया जाता है तो कांग्रेसी बोलते हैं बैठकर टीवी चैनल्स पर कि भाई हमसे आप पूछेंगे राजीव गांधी ही तो थे जिन्होंने ताला तुड़वाया था। नहीं वो वो एक अलग कहानी है। उन्होंने राहुल राजीव गांधी वो शख्स थे जिन्होंने कोर्ट के निर्णय के बावजूद शाहबानो मामले में अपना ही पुट ह फुट डाउन और उसका प्रेशर उन पे इतना आया क्योंकि कांग्रेस में भी एक आरएसएस बसती है आज भी ऐसा है कि आरएसएस मैदान में कम है मन में ज्यादा है लोगों के तो उसका इतना प्रेशर था और राजीव गांधी को पॉलिटिकली वीपी सिंह और अरुण नेहरू और इन लोगों में घेर लिया था। उस वक्त वो ऐसा कुछ करना चाहते थे जो मेजॉरिटी जो है हम उसको हर्ट नहीं करें। और उन्हें लगा वो ताला खोलने से क्या होगा? बाद में गवर्नमेंट आएगी तो बाकी कदम उठाए जा सकते हैं। बाद में वो जीवित ही नहीं रहे। तो उनके उनका उनका विश्लेषण नहीं किया जा सकता उसके बाद जीवन का। लेकिन मेन तो शाहबानु का वो था ना। उसमें उन्होंने ही पुट उनका अपने करियर का इतना बड़ा दांव खेला था। हम तो बात यह थी वह गलत था सही था छोड़िए लेकिन मुसलमानों के लिए थेट वह आ गई मैदान में इंदिरा जी का तो हमेशा हमने देखा है और नेहरू ने तो कभी उसमें वो नहीं किया और पटेल साहब ने तो आरएसएस को बैन किया था नरसिंहराव वो प्रधानमंत्री थे तो जिन्होंने मुझे ऐसा लगता है उनमें कई गुण थे और नरसिंहराव का कई गुणों का मैं चाहने वाला भी हूं मैं ऐसा ऐसे आइसोलेशन में किसी का नहीं देखता हम लेकिन लेकिन बाबरी का गिरना कितनी गंभीर बात है। इस बात को उतनी गंभीरता से नरसिंह राव ने नहीं लिया। और मुस्लिम आदमी को भारत में होने से खौफ लगता है। यानी अन्यायवन्याय तो होता रहा। अन्याय तो आम आदमी पे हमेशा गरीब आदमी पे होता ही है। लेकिन मुस्लिम होने से खौफ जो है वो नरसीराव के कार्यकाल के बाद लगने लगा। कभी भी उठाओ। हम वह दंगे हुए ना उसके बाद हम वह जो हुआ वह भयानक था। एक उन्मादी वातावरण तैयार हुआ जिसमें हम बाबरी मस्जिद को गिराया इसका मतलब कोई एक बहुत बड़ा विजय एक मुसलमानों पे पाया। यानी ये नैरेटिव ऐसा सेट कर दिया कि हमारे भाई को ही हमने दुश्मन बना दिया। हम इस मैं हमेशा भारत के इतिहास का हम लोग सब लोग उस विरासत को अपना मानते हैं क्योंकि भारत एक देश है जिसकी विरासत हमारी विरासत है। मैं खुद बाबरी मस्जिद का पतन हमारे पूर्वजों के कृतियों में जो हमें धब्बा दिया है उसमें से एक मानता हूं सबसे बड़ा और मुझे इस बात का बहुत संकोच होता है बोलने में कि बाबरी मस्जिद का गिरना बहुसंख्य हिंदुओं को अच्छा लगा। हां यह सबसे खतरनाक है। हम बाबरी मस्जिद का पतन और मुसलमान को विलन एक ही बात है। बड़ी बात आप बोल रहे हैं। बहुत हिम्मत की बात है कि आप आज के इस दौर में ये बात आप बोल पा रहे हैं राजू जी। आज के क्या किसी भी दौर में ये बात सच है तो यही बात बोलनी चाहिए। सूरज ये दौर है इसलिए उगता है और इस दौर है इसलिए उगता नहीं। ऐसा नहीं ना होता। हम आप मुसलमानों के के लिए क्या आप आइडियल सिचुएशन मानेंगे? जब आपको लगेगा कि हां अब जो इस देश का जो मुसलमान है भारत [नाक से की जाने वाली आवाज़] का जो मुसलमान है अब उसके लिए यह एक आइडियल सिचुएशन है। ये अब उसको वो अधिकार मिल रहे हैं। वो बिना खौफ बिना डर के तालीम हासिल कर सकता है। कारोबार कर सकता है। घूम फिर सकता है। अपनी आइडेंटिटी को असर्ट कर सकता है। अपने रिलीजंस को प्रीच और प्रोफेस कर सकता है। हिजाब पहन के भी लड़कियां बाहर निकल सकती हैं। अगर वो चाहे अगर उनकी वो चॉइस है। एक मुसलमान एक वीसी भी हो सकता है तो एक मुसलमान एक चीफ मिनिस्टर भी हो सकता है क्या मुसलमान प्रधानमंत्री भी हो सकता है क्या प्रेसिडेंट भी हो सकता है क्या आपको लगता है कि जब इस तरह के सवाल खत्म हो जाएंगे देन यू थिंक दैट दिस इज गोइंग टू बी एन आइडियल सिचुएशन फॉर मुस्लिम्स दैट यू नो उसके लिए सोशल एंड पॉलिटिकल रिफॉर्मेशन जरूरी है। हम सोशल रिफेशन मुसलमानों को खुद के अंदर खुद करना चाहिए। रेनासंस धार्मिक कट्टर धार्मिकता से कोई समाज जीत नहीं सकता। ये बात अपनी है। लेकिन उसके लिए एक वातावरण की जरूरत है जो एक वातावरण प्रोटेक्टिव हो। हम जिसमें मुसलमानों को यह डर नहीं है कि बाहर से कोई हमला नहीं होगा। मैं यह मानता हूं कि राजनैतिक सुधार आने की जरूरत है और 50% मुस्लिम महिलाओं मुस्लिम महिलाओं को संसद में और विधानसभाओं में या सारी स्थानिक स्वराज्य संस्थाओं में 50% आरक्षण मिलना चाहिए। मतलब जो महिलाओं का आरक्षण है उसमें आप 50% आरक्षण बोल रहे हैं। हां महिलाओं का जो आरक्षण है उसमें 50% मिलना चाहिए और अ इस पे एक संशोधन होना चाहिए कि मुसलमानों के लिए चुनाव क्षेत्र जो है वो कुछ लेवल तक आरक्षित रहना चाहिए नॉर्थ इंडिया में क्योंकि नॉर्थ इंडिया ने वो जेनोसाइड देखा है ज्यादातर साउथ इंडिया में लिबरल वातावरण रहा जो लखनऊ पैक्ट हुआ था लोकमान्य तिलक ने किया था उसमें उन्होंने मुसलमानों के लिए आरक्षण आरक्षण को स्वीकार किया था। उन्होंने खुद साइन किया था। गांधी थे नहीं तो मुझे लगता है मुसलमानों के लिए चुनाव क्षेत्र रिजर्व होने चाहिए। कुछ ऐसे जो सेंसिटिव इलाके हैं जहां पर मुसलमान वीक हैं और संख्या में कम है। दबंग हिंदूवादी संगठन वहां पर उनका दमन कर चुके हैं। अब आप अब आपके पास डाटा भी है। लिंचिंग कहां हुई है? कैसे हुई है? केरला में तो कोई लिंचिंग नहीं हुई है। है ना? महाराष्ट्र में हुई कहां? तो वहां पर मुसलमानों को रिजर्वेशन मिलना चाहिए और उस रिजर्वेशन में भी 50% महिलाओं को होना चाहिए। तो मुझे लगता है कि और मुसलमानों में जो जाति व्यवस्था है उसमें जो दमन हुआ है, दबी कुचली जातियां है, उनकी मान्यता उनको मिलनी चाहिए। उसका भी रिजर्वेशन होना चाहिए। लोग मुझ पे बहुत खौफ रखेंगे, खफा हो जाएंगे कि यह रिजर्वेशन कितना और क्या रिजर्वेशन मांगेगा। लेकिन यह पॉलिटिकल रिजर्वेशन जरूरी है क्योंकि मैं यह मानता हूं कि हम उन्हें प्रोटेक्ट करने में नाकामयाब रहे। तो लेट उनको प्रोटेक्ट करने दो उनको अपने आप को। तो इतना तो संवैधानिक कवच उनको चाहिए। आप अगर कल कहेंगे कि नहीं ऐसे गेटो बनते हैं तो आपने कौन सा कसर छोड़ा है गेटो बनाने में और कुछ चीजें हैं उसके लिए अ रिगरस लाइफ इंप्रजनमेंट होनी चाहिए जैसे कटुआ हरा मुल्ला और ऐसे अपमानजनक शब्द मुसलमानों के लिए जो प्रयोग करता है सार्वजनिक जीवन में उस व्यक्ति को लाइफ इंप्रेजन मेंट रिगरस लाइफ इंप्रज़मेंट होनी चाहिए और इमीडिएटली फास्ट ट्रैक कोर्ट में होनी चाहिए। ये तो ये तो एक्सट्रीम स्टेप हो जाएगा। वो कहेंगे कि किसी को सिर्फ आप एक लफ्ज़ कहने पे लाइफ इंप्रज़मेंट कैसे आप बोल देखिए ऐसा है कि ये जो शेड्यूल कास्ट को जो हम प्रोविजन है लॉ में कि आप उनके लिए अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल करते हो तो नॉन बेलेबल वारंट निकलता है। तो प्रोविजन है ना बोलने के लिए। हम तो ये शब्द के लिए लाइफ इंप्रजनमेंट एक अ एक प्रोविजन होनी चाहिए। हो सकता है ऐसी स्थिति में उसने बोला हो कि जहां पर दोनों तरफ से झगड़ा हुआ तो हो सकता है सजा कम लेकिन नॉन बेलेबल वारंट तो निकलेगा लेकिन आप झगड़ा अन्य तरीके से भी तो कर सकते हैं ना हम लेकिन आज के इस दौर में राजू जी नहीं नहीं खान एक आदमी शेख है हम या खान है तो खान तू 50 गालियां जो है जो हिंदू को देते हैं वो खान को दे दे शेख को दे दे उसको स्पेसिफिकली आप उसको रेशियल वो मत करो। डिस्क्रिमिनेशन कर रहे हो तो सजा आपको लेकिन ऐसे एक ऐसे दौर में राजू जी जहां पर मुसलमान कहलवाना यानी कि राहुल गांधी ने कहा कि मैं माइनॉरिटी नहीं मुसलमान कहूंगा। अगर मुसलमानों पर जुल्म हो रहा है तो मुसलमान शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा। यह कहने में अगर इतने साल लग जाए और इसको भी सेलिब्रेट किया जाए कि देखिए राहुल गांधी ये कह रहे हैं कि वो मुसलमानों को मुसलमान बोलेंगे। यानी कि इस टेबल को अब मैं टेबल बोलूंगी। इसको मैं सेलिब्रेट करूं क्या? क्योंकि मुसलमान ज्यादातर गरीब है और ज्यादा शिक्षित नहीं है। सबसे माइनॉरिटी बड़ी है हिंदुस्तान में वो जैन है। लेकिन वो खुद टर्म्स कंडीशन डिक्टेट करते हैं हिंदुओं पे। हम नॉनवेज नहीं खा सकते जैन बिल्डिंग में। उनका वो मंदिर होता है तो उसमें हमें फ्लैट ही नहीं देते। वो हमसे यानी आपको मछुआरे जो है कोली वो मुंबई की ओरिजिनल कम्युनिटी है। लेकिन वहां मुंबई में बसे हुए जैन अब कोड़ी लोगों को या मछुआरों को निकालना चाहते हैं। पूरा एलिमिनेट करते हैं। उनके हाथ में हो तो जेनोसाइड भी कर दे। तो ये क्यों कर सकते हैं? क्योंकि जैनों के हाथ में पूरा एक्यूमुलेशन ऑफ वेल्थ है। मुसलमानों को भी यह समझना चाहिए शिक्षा, हम संगठना और पैसा ये चीजें मायने रखती है। और ये सिस्टम में आपको ये तीनों क्रिएट करना उसके लिए आपको ये सारी चीजें दी जाए तो आप वो क्रिएट करो ना कि आप आज अगर ये 3 साल बाद ये आपको मिले हम तो 30 साल बाद आपको सशक्त हो जाना चाहिए। या 30 साल बाद भी वही विक्टिम रोना रो तो फिर आपको वही प्रॉब्लम आ जाएगी क्योंकि प्रॉब्लम यह है कि ये मुसलमान और हिंदू के संघर्ष नहीं है। ये जहरीला बीज बोया गया है ब्रिटिशों की तरफ से। वो जो इजराइल का बीज है ना वो भी ब्रिटिशों ने ही किया है। बालफोर एग्रीमेंट हम तो वहां पिस्ती था और वो सब खुशी से रह रहे थे। वैसे यहां हिंदू अब आप सोच समझिए कि 1857 में ज्यादातर मुसलमान जो सल्तनतें थी उन्होंने बलिदान दिया। हिंदू जो सल्तनतें थी उन्हें ब्रिटिशों के पैर पकड़ के चाटुकारिता करके अपनी करोड़ों की संपत्ति कायम रखी। अभी सिंधिया का जो पैसे का बंटवारा हुआ अरबों रुपयों का वो इसलिए हुआ क्योंकि उन्होंने ब्रिटिशों के साथ हाथ मिलाया या वाजिद अली शाह का नहीं हुआ। टीपू सुल्तान का नहीं हुआ क्योंकि वो खत्म कर दिए गए क्योंकि ब्रिटिशों के साथ वो लड़े तो इस मिट्टी के लिए मुसलमानों ने ज्यादा त्याग किया है लेकिन बताने वाला इतिहास चाहिए इतिहासकार चाहिए और रिजीम चाहिए सरकार चाहिए जो ये आपको खुलकर बोले लास्ट मेरा सवाल आपसे बस कि अब से अगर आपको ये लग रहा है कि मुसलमानों के लिए हालात बेहतर होने की तरफ बढ़ रहे हैं आपको यह लग रहा है कि मुसलमानों के हालात बेहतर आने वाले वक्त में हो सकते हैं। अभी से क्या लगता है आपको कि मुसलमानों को किस तरह की बारगेनिंग शुरू करनी चाहिए? अभी तो अभी तो वो इस कंडीशन में है मुसलमान कि उसको ये लग रहा है कि वो जिंदा है। वो सांस ले पा रहा है। अपने बच्चों को स्कूल भेज पा रहा है। घर में रह पा रहा है। यह उसके लिए बहुत है। उससे आगे वह सोच भी नहीं रहा। उससे आगे वो मांग भी नहीं [गला साफ़ करने की आवाज़] रहा है। तो मेरा सवाल आपसे यह है कि अगर आपको यह लग रहा है कि आने वाली परिस्थितियां बेहतर होने वाली हैं, आने वाले हालात जो है वो बेहतर होने वाले हैं तो मुसलमानों को फिर आपको क्या लगता है कि किस तरह की बारगेनिंग जो है वो शुरू करनी चाहिए और बार्गेनिंग से मेरा मतलब है समाज से। बारगेनिंग से मेरा मतलब है इस पॉलिटिकल सिस्टम से, इस निजाम से। पहली तो बार्गेनिंग के लिए कम्युनिटी खड़ी होनी चाहिए। बारगेनिंग किसी नेता के हाथ में नहीं देनी चाहिए। नहीं तो वो क्या होता है? हिंदू नेता और मुसलमान नेताओं में फर्क नहीं है। वो अपनी कम्युनिटी को बेच के अपनी संपत्ति कमा लेता है या अपनी पावर कमा लेता है। हां मेरे पास इतने सारे कॉन्स्टिट्यूएंसी है तो बस मुझे ये पद चाहिए। मुसलमान बिक गया है ना आम आदमी को क्या मिलता है? तो बारगेनिंग पहले तो हमारा कोई नेता नहीं। हम कम्युनिटी के तौर पे हमें ये चाहिए। ये बारगेनिंग इस तरह से होनी चाहिए। और एक जियोपॉलिटिकल सिचुएशन में ईरान का जीतना बहुत जरूरी है। ईरान जीतेगा तो बारगेनिंग पावर बढ़ेगी। मैं और ईरान हमारा दोस्त है। ईरान हमारा दुश्मन नहीं है। ईरान ने हमेशा अंतरराष्ट्रीय मंच पर हमारा साथ दिया है। मैं यह मानता हूं कि मुसलमानों को जो टर्म्स एंड कंडीशन पे बारगेनिंग करनी चाहिए वो ये कि हम एक समाज हमारी रिजीम से हमारी गवर्नमेंट से रिजीम से नहीं गवर्नमेंट से बात करना चाहते हैं। और हम शान से और सम्मान से रहना चाहते हैं। जो हमारे साथ हुआ वह फिर से ना तो आप समझिए कि नाजियों ने जूस के साथ जो किया यहूदियों के साथ उसके बाद यहूदियों ने कैसे बातचीत की जर्मनी में यूरोप में वैसे मुसलमानों को बातचीत करनी चाहिए क्योंकि आपको गिल्ट देना चाहिए इस सरकार को आने वाली हम कि आपके होते हुए हमारे साथ एक-एक बच्चा हमारे घर का मरता रहा। हम एक-एक घर का जो हमको कमाने वाला था वो मरता रहा। एक-एक लड़का जो मेधावी था जेल में चढ़ता रहा। आप कुछ नहीं किए। तो उसके बदले में हमें अपनी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक और एजुकेशनल यानी जो बाकी संवैधानिक जो चीजें मिलनी चाहिए उसकी उन्नति करने के हक चाहिए। तो ये है चार्टर हमारी पूरी करो। तो प्रोटेक्ट आवरसेल्व्स एंड प्रोटेक्ट इंडिया। हम हमें इंडियननेस या भारत को प्रोटेक्ट करना है तो मुसलमान को प्रोटेक्ट करना पड़ेगा। बड़ी बात आप बोल रहे हैं। आई होप कि ऐसे [गला साफ़ करने की आवाज़] वो दिन आए। आई होप कि आप और मैं उस उस नए भारत में हालांकि आई हेट दिस टर्म नया भारत और पुराना भारत मैं कभी भी ना वो दिन आने का इंतजार नहीं करता। हम मैं मानता हूं कि वो दिन लाने वाला मैं ही हूं और आएगा तो मेरी वजह से ही आएगा। [हंसी] यानी मैं राजू पुरकर हां बिलकुल मैं समझ रही हूं आप मैं जनता की तरफ से बिल्कुल बिल्कुल आई एम गेटिंग योर पॉइंट कि यहां से ही शुरुआत होगी ये नहीं कि आप इंतजार करें और फिर आप देखें उसका एक कल्पना जब दिमाग में आती है तो बस वो अमल में आती है हम ऐसा मानने वाला मैं हूं बिल्कुल बिल्कुल बहुत-बहुत शुक्रिया राजू जी बहुत ही जटिल ये एक तरह का हम कहें कि टॉपिक था जो हमने चुना है बट मुझे लगता है कि वक्त [गला साफ़ करने की आवाज़] की जरूरत थी और आप जैसे लोगों से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि आप खुलकर सवाल पूछ सकें और खुलकर उसके जवाब भी आप हासिल कर सकें। यह जटिल था थोड़ा कॉम्प्लेक्स था लेकिन जब भी इस देश का मुसलमान इससे आगे हम क्या होना चाहिए इस सवाल पर लेकर बैठेगा। इस सवाल को लेकर बैठेगा तो यह एपिसोड देखे बिना वो कुछ नहीं कर पाएगा। आई होप आई होप थैंक यू सो मच। थैंक यू फॉर गिविंग दैट विज़ एंड थैंक यू फॉर कमिंग टू नाउ। थैंक यू।
Companion article
Host Bushra Khanam opened the conversation with a question hanging over India's recent wave of protest: as young people confront power and demand accountability from the prime minister and home minister directly, where do Muslims stand in all this? Has the same fear that gripped the country for twelve years lifted from them too? Her guest, the Mumbai-based political commentator Raju Parulekar, answered with a medical metaphor: recovering from a long fever doesn't mean you're strong the next morning — you're out of danger, but still weak. Muslims, he argued, have reached that stage: no longer at existential risk, but far from empowered. That shift unsettles the ruling establishment, he said, because its entire political project rests on treating Muslims as the enemy — a claim he rejected outright, arguing that the RSS, Modi and the BJP do not represent authentic Hinduism, and that ordinary Hindu society is increasingly seeing through the propaganda, especially as reports of financial irregularities have touched even the Ram temple project the movement was built around.
Parulekar's broader claim was that Hindus, too, have been victims of twelve years of governance failures — leaked exam papers, collapsing roads and bridges, deteriorating healthcare — and that repeated disappointment eventually breaks even a well-propagandised trust. He argued that communal hostility was never really about religion but a tool serving a narrower set of interests: RSS leadership, groups he did not hesitate to call “terrorist organisations,” and a ruling party keen to protect its own power and its patrons. Khanam pressed him hard on whether the shift he described was real: are Muslims emboldened enough to protest publicly when a lynching happens, when young men are booked under the UAPA, when Bengal's Gunda Act sweeps up mostly Muslim students, when Assam singles out Muslim residents for targeting? Parulekar's answer was a promise rather than a defence: “Give me three years,” he said, predicting swift accountability once the current leadership falls, and describing a friend in Solapur, Sarfaraz Ahmed, who has kept a private, ongoing documentation of lynchings that Parulekar said would eventually be reckoned with, case by case.
He reserved particular scorn for Bollywood's biggest Muslim stars — Shah Rukh Khan, Aamir Khan, Salman Khan — arguing that men with genuine public standing and reach chose silence through the worst of the lynching years, and that history should record it starkly. He balanced this, when pushed, by acknowledging Hindu silence too, breaking it into three groups: a large number who stayed quiet out of the same fear gripping everyone, including many who watched the state move against dissenting Hindus — opposition leaders hit with Enforcement Directorate cases, or protesters, in his account, met with lathi charges and pellet guns; a smaller, opportunistic group that had always harboured hostility and simply seized the licence Modi's rise gave it; and a hardcore ideological base within the RSS and BJP that he said deserves formal constitutional trial for what he considers terrorism.
Asked how the country arrived here, Parulekar located the real turning point decades earlier: the demolition of the Babri Masjid in December 1992, and the Mumbai riots of 1992–93 that followed. He cited the Srikrishna Commission's findings on the Suleman Bakery case as evidence that police in Mumbai had acted proactively against Muslims during the riots — findings, he said, that a subsequent Shiv Sena-BJP government simply discarded. He argued that despite repeated commissions during Congress rule recommending police reforms, not one of roughly ten specific recommendations was ever implemented, leaving a police force that, seventy-five years after independence, has never been formally trained to place its constitutional oath above a minister's order. That failure, in his account, is what let a pre-existing social prejudice calcify into policy. The conversation turned personal here: Khanam disclosed that she was herself a survivor of communal violence, forced to flee her home as a child, and that her father was arrested and beaten so severely he never fully recovered his ability to walk — grounding, for her, a broader argument that the hatred she and Parulekar were describing did not appear only after 2014, but was already present and simply handed power.
Pressed on responsibility beyond the BJP, Parulekar named names. He argued that only four Indian leaders held genuine ideological commitment to Muslim welfare, and noted pointedly that all four came from the same family: Jawaharlal Nehru, Sardar Patel — who banned the RSS after Gandhi's assassination — Indira Gandhi, and Rajiv Gandhi. Every other party, he argued, including the socialist lineage running from Ram Manohar Lohia and Jayaprakash Narayan through Mulayam Singh Yadav, Lalu Prasad Yadav and Nitish Kumar, took Muslim votes for decades without ever risking a real break with Hindu nationalism — he noted that the Jana Sangh itself backed the JP movement in the 1970s. He offered a complicated verdict on Rajiv Gandhi, who ordered the Babri Masjid's locks reopened for Hindu worship, seemingly to offset the political cost of reversing a Supreme Court ruling in the Shah Bano case under pressure from conservative Muslim opinion — a decision Parulekar said reflected fear of alienating the Hindu majority more than any coherent principle, and one Rajiv Gandhi did not live long enough to be judged on further. He was harder on P.V. Narasimha Rao, saying that whatever his other qualities, he failed to treat the Babri demolition with the gravity it demanded — and that a specific, ordinary fear of simply being Muslim in India, as distinct from the general injustice the poor face everywhere, set in only after his tenure.
Parulekar's proposals for the future were concrete and, by his own admission, likely to provoke controversy: 50 percent of India's existing women's political reservation quota set aside specifically for Muslim women; reserved constituencies for Muslims in parts of northern India, where he argued communal violence has been concentrated and where Kerala, by contrast, has seen none — invoking the 1916 Lucknow Pact, in which even Lokmanya Tilak accepted electoral reservation for Muslims; and reservation within the Muslim community for its own oppressed, Pasmanda castes. He also floated rigorous, fast-tracked life imprisonment for public use of anti-Muslim slurs, a proposal Khanam pushed back on as extreme. More than legal fixes, though, he argued Muslims need to build education, organisation and wealth deliberately, pointing — not entirely approvingly — to how India's Jain community, though smaller than India's Muslim population, wields outsized influence through accumulated wealth, including, he said, excluding Mumbai's original Koli fishing community from housing in some areas.
Parulekar's larger historical claim, offered near the end, was that Hindu-Muslim conflict in India is not organic but a colonial graft, comparable to Britain's role in the Balfour Declaration: princely states that were Muslim-ruled, he argued, sacrificed the most resisting the British in 1857, while many Hindu ruling houses secured their fortunes through collaboration — contrasting the wealth retained by houses like Scindia's with the destruction of Tipu Sultan's and Wajid Ali Shah's kingdoms. “Muslims sacrificed more for this soil,” he said, “but it takes a historian willing to say so.” On what Muslims should now demand, he argued bargaining power must sit with an organised community rather than individual leaders, whom he accused of selling out their communities for personal power on both sides of the divide, and pointed to a stronger Iran, historically supportive of India on international platforms, as a geopolitical factor that could strengthen Indian Muslims' hand. His closing formulation was blunt: India owes its Muslims an accounting for what was allowed to happen to them, comparable to Germany's postwar reckoning with its Jewish community, and correcting it — he said — is not a favour to Muslims but a condition for protecting India itself.
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