Nous Podcast· 24 May 2026· 2:20:50

The Politics of Law | Dr. Nizamuddin Ahmad Siddiqui

“Law is pushed through politics — and politics is validated through law.” This conversation examines the relationship between law, political power, and justice in contemporary democracies. It explores how courts interpret constitutional principles, how precedents are shaped, and why legal decisio…

Chapters

Full Transcript

लॉ को पॉलिटिक्स के थ्रू पुश किया जाता है और पॉलिटिक्स को लॉ के थ्रू वैलिडेट किया जाता है। यह डिमोलिशन हो रहा है। पॉलिटिक्स है वो। वैलिडेशन कैसे है? लॉ के थ्रू वैलिडेशन है। ऑर्डर को लेकर, पावर को लेकर, सोशल कॉम्प्रोमाइज को लेकर भी एक डिबेट है। कॉन्स्टिट्यूशन से पहले कोई स्टेट होता नहीं है। हो सकता है स्टेट ऑफ अ डिफरेंट टाइप हो। और वो ऑर्डर्स स्यूशन ऑफ डिस्प्यूट है। लेकिन [नाक से की जाने वाली आवाज़] अगर आम आदमी उसको जस्टिस नहीं समझ रहा है तो फिर जस्टिस आखिर है क्या? लॉ आल्सो वर्क्स लाइक थियोलॉजी। ठीक है? एंड थियोलॉजी इज स्कॉलरसेंट्रिक। तो क्या हम कह सकते हैं जो डिबेट है ये नेचुरल लॉ ही जस्ट है। शुड बी शुड बी शुड बी अस्यूम दैट अहमदी एंड वरूचा दे डिसेंटेड एंड वेंकटचैया एंड टू अदर्स। दे वर इन मेजोरिटी। इंशा वाहनवती की जो किताब है ना उसमें बहुत क्लियरली उसने बताया है। जजमेंट्स जो होते हैं उसको कैटेगराइज करते हैं अक्सर मोरली करेक्ट जजमेंट में। एक करेक्ट बोलते हैं लीगली साउंड जजमेंट है। किस किसी जजमेंट्स को कहते किसी जजमेंट को कहते हैं कि पॉलिटिकली साउंड जजमेंट है। एक अंडरस्टैंडिंग लोगों की ये है कि प्रेसिडेंट की बेसिस पे ये जजमेंट होता है। दैट्स अ रोंग अंडरस्टैंडिंग। कोर्ट्स पहले ही डिसाइड कर लेती है उनको जज क्या करना है। देन दे लुक फॉर प्रेसिडेंट्स। आपकी आइडेंटिटी कम्युनिटी से बनती है। ठीक है? तो आप अपने आप में कुछ भी नहीं है। जैसे इकबाल का शेर है ना फर्द कायम रब मिल्लत से है तना कुछ नहीं। मौज है दरिया में बैरूने दरिया कुछ नहीं। हेलो सलाम आदाब मैं असद अशरफ आज इस कॉन्वर्सेशन में निजामुद्दीन अहमद सिद्दीकी के साथ हूं जो कि एक लॉ के एक्सपर्ट हैं। आज हम बात करेंगे कानून एक आईडिया के तौर पर क्या है? पावर और जस्टिस के दरमियान क्या रिश्ता है? और इंडिया के पॉलिटिकल और सोशल कॉन्टेक्स्ट में कोर्ट्स का कैसे किरदार समझा जाए। यह बातचीत, जजमेंट्स, सुप्रीम कोर्ट के काम करने का तरीका, जुडिशियल रीजनिंग और लॉ के फ्यूचर पर एक सोच विचार है। एकेडमिक भी और जमीनी हसियत से जुड़ी हुई भी। तो मेरा पहला सवाल आपसे यह है कि लॉ इज एन आईडिया जो है उसको आप कैसे देखते हैं? जस्टिस को हम साइड रख दें। हम अलग-अलग उसके पहलू जो है उसको साइड रख दें। एक आईडिया के फॉर्म में आप लॉ को क्या समझते हैं? बहुत शुक्रिया आपका असद भाई। अ ये बड़ाेंट क्वेश्चन है। ये इंपॉर्टेंट क्वेश्चन इसलिए है क्योंकि इस क्वेश्चन को आंसर करने के लिए यू विल हैव टू अंडरस्टैंड किसकी समझ की बात हो रही है। है ना? लॉ का मतलब फॉर नॉर्मल सिटीजन या फिर एडवोकेट या फिर जज अ या फिर स्टूडेंट ऑफ लॉ या फिर टीचर ऑफ लॉ या फिर गवर्नमेंट जी और अगर आप गवर्नमेंट के सेंस में बात करते हैं तो रूलिंग गवर्नमेंट एंड द अपोजिशन वो भी उसमें आ जाएगा। तो लॉ का अंडरस्टैंडिंग जो है वो इन लोगों के हिसाब से चेंज हो सकती है। तो लेट मी एक्सप्लेन। मैं आपको एक्सप्लेन करता हूं। वी विल स्टार्ट विद द जुडिशरी। ठीक है? जी जुडिशरी के लिए लॉ का मतलब जो है वो है बेसिस जिसके ऊपर हम अपना डिस्प्यूट को सेटल करें। उसके सामने जो भी क्वेश्चन आता है उस क्वेश्चन को सेटल करने का क्या तरीका क्या सोर्स होगा? ठीक है? वो लॉ है जुडिशरी के लिए। तो जुडिशरी लॉ को सोर्स के सेंस में देखती है। ठीक है? एडवोकेट जो जुडिशरी में जाकर आर्ग्यू करता है, वह भी सोर्स के सेंस में देखता है कि साहब जो किस बेसिस पे हम चीजों को सेटल करें कि डिस्प्यूट्स को लेकिन उस वो उससे एक सेंस और आगे जाता है। उसको आर्गुमेंट के सेंस में देखता है। कि मैं इस लॉ को या इस सोर्स को मैं अपने आर्गुमेंट में तब्दील कैसे करूं। सो दैट मैं जज को कन्विंस कर सकूं कि यह मेरी बात सही है [नाक से की जाने वाली आवाज़] और मेरे मुताबिक आप फैसला कीजिए। ठीक है? जुडिशरी क्योंकि आपने जस्टिस कहा था कि ना देखें बट आई विल जस्ट ऐड जुडिशरी के एलिमेंट में एक सेटलमेंट ऑफ डिस्प्यूट फंडामेंटल होता है कि हम डिस्प्यूट को सेटल कैसे करें और दूसरा हम जस्टिस को डिलीवर कैसे करें? वो जुडिशरी का पर्सपेक्टिव है। लॉयर के पर्सपेक्टिव में जस्टिस इंपॉर्टेंट नहीं होता। लॉयर के लॉयर के पर्सेक्टिव में आर्गुममेंट इंपॉर्टेंट होता है और कन्विंस करना जज को इंपॉर्टेंट होता है। जब आप इसी लॉ को क्लास रूम में ले जाते हैं तो टीचर जो आपको पढ़ाता है लॉ वो यह बताना चाहता है कि लॉ का नेचर क्या है? लॉ कहां से आया है? इसको जुडिशरी या इंस्टीटशंस कैसे क्रिएट करते हैं? जैसे टीचर क्लास में यह बताएगा कि भाई पार्लियामेंट के थ्रू लॉ पास कैसे होता है? बिल पास होकर लॉ बनता कैसे है? ठीक है? जुडिशरी के सामने जुडिशरी इंटरप्रेट कैसे करती है? किस बेसिस पे इंटरप्रेट करती है? ठीक है? या फिर आप इन दोनों को ही अगर आप हटा दें तो लॉ की फिलॉसफी क्या है? लॉ की रिलेशनशिप मोरालिटी से क्या है? ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] लॉ की रिलेशनशिप जस्टिस से क्या है? उसको हम कैसे मोल्ड करेंगे? कैसे चेंज करेंगे, कैसे देखेंगे? यह क्लासरूम का पर्सपेक्टिव है। ठीक है? क्लासरूम में टीचर स्टूडेंट दोनों आएगा। है ना? नॉर्मल सिटीजन के सेंस में लॉ जनरली जस्टिस के सेंस में देखा जाता है। नॉर्मल सिटीजन जनरली ये देखते हैं कि साहब सुप्रीम कोर्ट में गया है, हाई कोर्ट में गया है। जस्टिस होगा। साहब जस्टिस नहीं हुआ। हमारा एक्सपेक्टेशन था हुआ होगा नहीं हुआ। तो नॉर्मल लोगों के सेंस में एक्सपेक्टेशन है लॉ। दे लुक एट लॉ एस एन एक्सपेक्टेशन राइट उनका एक्सपेक्टेशन है जस्टिस का है ना उसी को अगर आप ले जाते हैं गवर्नमेंट के हाथ में गवर्नमेंट के हाथ में लॉ का मतलब है अथॉरिटी एंड पावर ठीक है उसको जो काम करना है उस काम को वैलिडेशन कहां से मिले वो लॉ है जी लॉ के थ्रू वैलिडेशन मिलता है उसको है ना तो इसी इसीलिए वो पास करवाना चाहेगा। गवर्नमेंट पास करवाना चाहेगी इसको पार्लियामेंट से कि मैं जो भी करना चाहती हूं वो वैलिडेशन मिल जाए और वो पास हो जाए। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] यहां पावर गेम है। ठीक है? डेमोक्रेसी में फिर वो पावर गेम हो जाता है। अपोजिशन और अपोजिशन का काम जो है वो पावर लॉ के सेंस में अपोजिशन जो है उसका फोकस ये होता है। इसमें खामियां क्या निकाली जाए? इसको हम कैसे रोके? कई बार इंटेंशन बिल्कुल रोकना होता है क्योंकि आईडियोलॉजी बहुत डिफरेंट है। और कई बार जो है वो इंटेंशन रोकना नहीं होता बट बहस करवाना होता है। जी कि हम इसके अगेंस्ट नहीं हो। लेकिन साहब इसमें बहस होनी चाहिए। ठीक है? व्हाई? क्योंकि आप इसको इंट्रोड्यूस कर रहे हैं तो आप इसके फायदे की बात करेंगे। राइट। इसके नुकसान की बात आप नहीं करेंगे। वो नुकसान हमको उजागर करना है। जी। [गला साफ़ करने की आवाज़] तो द आईडिया ऑफ लॉ फॉर डिफरेंट पीपल इज एक्चुअली डिफरेंट। इनफैक्ट अगर मैं इसको थोड़ा सा और आगे ले जाऊं। ये इतना सब्जेक्टिव हो जाता है कि एक लीगल फिलॉसफर है एचएलए हार्ट। एचएलए हार्ट। एचएलए हार्ट है। उसने अपनी किताब में लिखा है। बहुत इंटरेस्टिंग चीज लिखी है उसने। उसने कहा है कि व्हाट इज लॉ? एंड व्हाट इज द नेचर ऑफ लॉ? [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप हर दूसरे लीगल थ्यरिस्ट को इस बात से गैपल करते हुए देखेंगे। यह क्वेश्चन हर दूसरा लीगल थ्योरिस्ट और फिलॉसफर इससे गैपल करता है और डिफाइन करने की कोशिश करता है। यह बहुत यूनिक है। क्योंकि आप कभी भी किसी फिज फिजिसिस्ट को यह नहीं देखेंगे कि वो डिफाइन करे व्हाट इज फिजिक्स। या किसी केमिस्ट्री वाले को ये नहीं डिफाइन करते हुए देखेंगे कि व्हाट इज केमिस्ट्री। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप ये कह सकते हैं कि भ वो साइंस है। लॉ इज सोशल साइंस। तो भाई पॉलिटिकल साइंस में भी लोग डिफाइन करते हैं। पॉलिट पॉलिटिक्स क्या है? लोग नहीं समझ पाते हैं। वो दे आल्सो गैपल विथ दैट थिंग। लेकिन लॉ वर्क्स लाइक अ साइंस। हम तो उसको डिफाइन इनफैक्ट यह डिबेट होना स्टार्ट हो जाती है कि लॉ साइंस है या सोशल या सोशल साइंस है और बल्कि आप इसको और आगे लेवल पे जाएंगे लेके जाएंगे तो मैं इसमें एक चीज और बोलूं आपको कि आप इससे भी गैपल करने लग जाएंगे कि लॉ साइंस है सोशल साइंस है या थियोलॉजी है क्योंकि इट वर्क्स लाइक कैनन क्योंकि थियोलॉजी का जो मेन कोर है वो जस्टिस है जी सारी थियोलॉजीस जस्टिस के एलिमेंट से डील करती हैं राइट। और लॉ इनहेरेंटली जस्टिस से डील करता है। जी। तो हाउ वुड यू अंडरस्टैंड दैट? राइट। तो इट्स इट्स अ वेरी फंडामेंटल क्वेश्चन एक्चुअली। निजाम साहब आपने बताया कि लॉ जो है बड़ा सब्जेक्टिव है और अलग-अलग लॉ के हिसाब से अलग-अलग इंटरप्रिटेशन है। लेकिन एक कॉमन जिसकी आम मर्रा जिंदगी में जो लोग समझते हैं लॉ को एस इंस्ट्रूमेंट ऑफ जस्टिस समझते हैं और लॉ के थ्रू वो जस्टिस अचीव करना चाहते हैं। लेकिन हम देखते हैं कि ऑर्डर को लेकर, पावर को लेकर, सोशल कॉम्प्रोमाइज को लेकर भी एक डिबेट है कि लॉ जो है उन चीजों को भी अचीव करना चाहता है। कहीं पे ऑर्डर को अचीव करना चाहता है, कहीं पे सोशल कॉम्प्रोमाइज को अचीव करना चाहता है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो आप कैसे इस टेंशन को कैसे डिस्क्राइब करेंगे इंडियन कॉन्टेक्स्ट में जो इतने सारे टेंशनंस बने हुए हैं और फिर फंडामेंटल क्या फंडामेंटल नेचर क्या रह जाता है आम आदमी के लिए क्या है लॉ पर? देखिए इसमें दो तीन चीज एक्चुअली असद भाई आपने दो तीन चीज इसमें हाईलाइट की है। देखिए एक तो रिलेशनशिप ऑफ लॉ विद जस्टिस आपने हाईलाइट किया है। दूसरा जो आपने सवाल पूछा है वो लॉ का रिलेशनशिप ऑर्डर और अथॉरिटी जी ये दूसरी चीज है। और तीसरा क्वेश्चन ये है कि साहब इंडियन कॉन्टेक्स्ट में उसको हम कैसे समझें? जब आप इंडियन कॉन्टेक्स्ट लेते हैं तो जाहिर सी बात है आप पॉलिटिक्स ऑफ द डे और डेमोक्रेसी के सेंस में देखेंगे उसको। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो आई विल स्टार्ट विद द फर्स्ट क्वेश्चन। लॉ का जस्टिस से यह जो एक अंडरस्टैंडिंग है कि लॉ के थ्रू जस्टिस डिलीवरी होती है। ठीक है? ये बड़ी इंटरेस्टिंग चीज है। वो इसलिए इंटरेस्टिंग है [नाक से की जाने वाली आवाज़] पहली बात तो वर्ड डिलीवरी अपने आप में इंटरेस्टिंग है। जी। ठीक है? क्योंकि डिलीवरी जो वर्ड यूज़ होता है वो चाइल्ड बर्थ में भी होता है। बच्चे की पैदाइश में। जी। ठीक है? तो ये जो डिलीवरी वर्ड यहां पर यूज़ हो रहा है, बच्चे की पैदाइश होती है एक जेस्टेशन पीरियड के बाद। राइट? [गला साफ़ करने की आवाज़] एक प्रेगनेंसी का एक टाइम होता है। मंथ न मंथ्स है ना? लॉ जो जस्टिस डिलीवर करता है उसका एक प्रोसेस है। व्हिच इज़ देयर इज़ अ प्रोसेस। एंड देयर फॉर जस्टिस को डिलीवरी के सेंस में देखा जाता है। है ना? जेस्टेशन [नाक से की जाने वाली आवाज़] पीरियड होता है उसका एक। तो उसके बाद ही डिलीवरी ऑफ़ जस्टिस होती है। है ना? तो एक चीज तो यह है। दूसरी चीज यह है कि लॉ का जस्टिस के साथ एक बड़ा यूनिक रिलेशनशिप है [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो अक्सर लोग नहीं जानते। एंड एंड आई थिंक दैट दैट कैन बी अंडरस्टुड थ्रू फिलॉसफी ऑफ इट [नाक से की जाने वाली आवाज़] कि जब आप कोर्ट के पास जाते हैं सुप्रीम कोर्ट के पास आप गए आप एक [नाक से की जाने वाली आवाज़] अपना डिस्प्यूट लेके जाते हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] कि साहब हमारे बीच में लड़ाई है हमारे बीच में बहस है इस चीज को लेके [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसको सेटल करना है तो कोर्ट जो है उस डिस्प्यूट को सेटल कर देती है कोई भी डिस्प्यूट आप उठा लीजिए आप निरभया केस उठा लीजिए ठीक है अब बाबरी मस्जिद डिमोलिशन उठा लीजिए। जी। ठीक है। आप जो है वो गवर्नर और प्रेसिडेंट का रेफरेंस उठा लीजिए। ठीक है। वहां डिस्प्यूट नहीं है। वहां क्वेश्चन है कि साहब इस सवाल का जवाब दीजिए। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोर्ट उसका जवाब देती है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन वो जो जवाब है वो एक्चुअली डिस्प्यूट को सेटल करता है। कि साहब ये प्रॉपर्टी इनकी है इनकी नहीं है। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] या फिर वो उस क्वेश्चन का आंसर देता है कि साहब प्रेसिडेंट और गवर्नर को हम इतना डिक्टेट नहीं कर सकते। इनिशियली उन्होंने कहा हम डिक्टेट कर सकते हैं। बाद में कहा नहीं कर सकते। तो क्वेश्चन का आंसर है या डिस्प्यूट का सेटलमेंट है? जस्टिस इसमें कहीं नहीं है। अगर आप इसको हार्ड कोर टेक्निकल सेंस में देखें तो ये जस्टिस नहीं है। ठीक है? तो आखिर जस्टिस क्या है फिर? फिर आखिर जस्टिस क्या है फिर? ठीक है? जस्टिस आपका एजमशन है। कि कोर्ट जब यह सेटल करती है डिस्प्यूट वो जस्टिस है। वो जस्टिस है। ठीक है? वो आपकी अंडरस्टैंडिंग है कि ये डिस्प्यूट सेटल हो रहा है इसलिए जस्टिस हो रहा है। तो जस्टिस डिलीवरी जो है ये फंडामेंटली लिंक्ड है सेटलमेंट ऑफ डिस्प्यूट से। जब तक डिस्प्यूट सेटल नहीं होगा तब तक जस्टिस नहीं हो सकता। ठीक है? उसमें भी एक इंटरेस्टिंग बात बताऊं आपको। एंड आई एम टेकिंग अ लिटिल लॉन्ग टाइम। अ जस्टिस में डिलीवरी में डिस्प्यूट का सेटल होना बहुत जरूरी है। ठीक है? लेकिन डिस्प्यूट के सेटल होने के लिए यह बहुत जरूरी है कि आप उस डिस्प्यूट को फाइनल अथॉरिटी तक ले जाएं। ठीक है? जैसे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने डिसाइड कर दिया। आपके पास पावर ऑफ अपील है। आप हाई कोर्ट गए। पावर ऑफ अपील है, रिवीजन है, रिव्यू है। जी। सुप्रीम कोर्ट गए, अपील, रिव्यू, रिवीजन, क्यूरेटिव पिटीशन तीन चार चीजें हैं। एक लेवल के बाद वो रुक जाएगा। अब उससे आगे आप नहीं बढ़ सकते। दैट इज द एस्टैब्लिशमेंट ऑफ जस्टिस। क्यों? क्योंकि जस्टिस के लिए फाइनलिटी ऑफ डिस्प्यूट, सेटलमेंट फंडामेंटल है। [गला साफ़ करने की आवाज़] ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब इसको आप लिंक कैसे करते हैं? दैट्स व्हाई आई सेड लॉ इज़ वेरी सिमिलर टू थियोलॉजी। फॉर एग्जांपल इस्लामिक डिस्कोर्स में क्या है? जस्टिस कब होता है? जब जब डे ऑफ़ जजमेंट इस्टैब्लिश होगा और उस दिन जब सवालात होंगे लोगों से। सवालात होंगे और अल्लाह जब डिसाइड करेगा। कहने का मतलब व्हेन अल्लाह डिसाइड्स ही डिसाइड्स इट फाइनली [नाक से की जाने वाली आवाज़] एंड देयर फॉर दैट इज़ जस्टिस। तो फाइनलिटी जो है ना वो फंडामेंटल आस्पेक्ट है जस्टिस का। राइट? सेटलमेंट [नाक से की जाने वाली आवाज़] ऑफ़ डिस्प्यूट फंडामेंटल है जस्टिस का। बट नन ऑफ़ दिस इज़ जस्टिस। राइट? इट इज़ एन आउटकम ऑफ इट। इट इज़ एन एजम्पशन। इट इज़ योर अंडरस्टैंडिंग। जस्टिस। इसीलिए कई बार लोग कहते हैं कि साहब डिस्प्यूट तो सेटल हुआ। जस्टिस। जस्टिस नहीं हुआ। ठीक है? क्योंकि ऑटोमेटिक नहीं है वो एजम्पशन है। अंडरस्टैंडिंग है। अब कमिंग टू योर सेकंड क्वेश्चन अथॉरिटी और यू नो लॉज़ रिलेशनशिप विद अथॉरिटी एंड पावर। ठीक है? लॉ का एक नेचर है वो ये है कि लॉ टॉप डाउन होता है। ऊपर से नीचे चलता है लॉ। ठीक है? लॉ के लिए अथॉरिटी का होना फंडामेंटल है। अगर अथॉरिटी नहीं है, लॉ नहीं है। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] बल्कि एक बहुत इंटरेस्टिंग आर्टिकल आई थिंक 1960 और समथिंग का है। काफी बड़ा नाम था लीगल फिलॉसोफी में नोबतो बॉबियो। है ना? तो उसने बहुत इंटरेस्टिंग बात लिखी उसने ये कहा कि वायलेंस या फोर्स फंडामेंटल है लॉ के लिए। क्योंकि अथॉरिटी फोर्स के थ्रू इस्टैब्लिश होती है। आप फोर्स लगाते हैं अपनी। ठीक है? जब तक आप फोर्स नहीं लगाएंगे, अथॉरिटी इस्टैब्लिश नहीं कर सकते। और फोर्स लगा के भी ऑर्डर क्रिएट होता है। और फोर्स हमेशा ऊपर से लगती है। उसके लिए एक सुपीरियर होना चाहिए। एक इनफीरियर होना चाहिए। ठीक है? एक ऊपर बैठा होना चाहिए। एक तो कोई इ्तेदार में होना चाहिए, कोई नीचे होना चाहिए। ठीक है? तो आई एम नॉट सेइंग कि प्रोसेस क्या है लॉ का? इस पे बहुत लोगों का वो है। लेकिन लॉ जो काम करता है ये फंडामेंटल है उसके लिए कि अथॉरिटी होना चाहिए। इसीलिए जब आप बहुत ज्यादा कोर्ट्स को क्रिटिसाइज करते हैं तो फिर सवाल आ जाता है जिसको आप कहते हैं ना कि कोर्ट्स की अथॉरिटी को चैलेंज कर रहे हैं आप। ठीक है? वो क्यों आता है? बिकॉज़ अथॉरिटी इस फंडामेंटल। और इसीलिए कहा जाता है कि कोर्ट्स को चैलेंज मत कीजिए, एक्सेप्ट कीजिए, उसकी बातों को मानिए। बिकॉज़ अथॉरिटी इज़ फंडामेंटल टू द यू नो, द अंडरस्टैंडिंग ऑफ लॉ। ठीक है? नाउ, कमिंग टू योर थर्ड आस्पेक्ट कि आप उसको [नाक से की जाने वाली आवाज़] सिटीजन के सेंस में कैसे देखेंगे? अह पावर पॉलिटिक्स जो हो रही है या डेमोक्रेसी जो हो रही है उसके एब्सेंस में उसको कैसे लोकेट करेंगे? यह समझना जरूरी है कि जो लॉ है क्योंकि वो अथॉरिटी से लिंक्ड है क्योंकि वो पावर से लिंक्ड है तो वो इन्फ्लुएंस भी पावर और अथॉरिटी से होगा। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो कई बार आपको ये लगेगा कि भाई गवर्नमेंट के फेवर की चीजें हो रही हैं। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] या साहब स्टेट के हिसाब से चीजें हो रही हैं। जैसे अरावली को देख लीजिए आप। ठीक है? कि साहब हाइट ऑफ माउंटेन क्या होगा? हिल्स की हाइट क्या? माउंटेन नहीं। हिल्स की हाइट क्या होगी? ठीक है? या स्ट्रे डॉग्स का एलिमेंट ले लीजिए। स्ट्रे डॉग्स होने चाहिए नहीं होने चाहिए। ठीक है? आप कश्मीर का इशू ले लीजिए। ठीक है? 370 एब्रोगेशन सही है, गलत है। सीएए ले लीजिए। हियरिंग ही नहीं हुई है। क्या होगा? अपॉइंटमेंट्स ऑफ जजेस ले लीजिए। ठीक है? आप कोई भी इशू उठाइए। आप यह देखेंगे कि साहब इसमें कहीं ना कहीं पावर प्ले है। हम ठीक है? कहीं ना कहीं पॉलिटिक्स है इनवॉल्व। हम ये इसलिए है क्योंकि वो प्रोसेस पॉलिटिकल है। राइट? जैसे आप अगर किसी किंग के टाइम में जाएंगे लॉ बनाने की उस पे। आप मान लीजिए साहब अकबर इज द किंग। ठीक है? या [नाक से की जाने वाली आवाज़] साहब शिवाजी इज द किंग। शिवाजी इज द किंग। व्हाटएवर ही सेज़ इज़ लॉ। अकबर इज़ द किंग व्हाटएवर ही सेज़ इज़ लॉ। सो व्हिच मींस देयर इज़ नो प्रोसेस। जो जॉन ऑस्टिन जिसको कहते हैं कमांड ऑफ़ द सोववरन उसने कमांड किया वो लॉ है। ठीक है? व्हिच इज़ वेरी सिमिलर अगेन टू द थियोलॉजिकल सेंस व्हाटएवर अल्लाह सेज़ ह लॉ। ठीक है? व्हाटएवर गॉड सेज़ ह लॉ। व्हाटएवर गॉड हैज़ ऑर्डेंड ह लॉ। मोज़स को पूरा उठा के देख ला। तो बहरहाल तो कहने का मतलब ये है कि वो वैसा है उसका स्ट्रक्चर। ठीक है? लेकिन जब आप डेमोक्रेसी के सेंस में उसको देखते हैं तो उसका एक प्रोसेस है कि पार्लियामेंट में बिल इंट्रोड्यूस होगा। उस पे बहस होगी, बिल पास होगा, फिर एक हाउस से दूसरे हाउस में जाएगा, फिर प्रेसिडेंट के पास जाएगा। स्टेट लेवल पर वो लेजिस्लेचर में होगा, फिर गवर्नर के पास जाएगा। तो ये जब ये पूरा प्रोसेस उसमें इनवॉल्व है और उस पूरे प्रोसेस में फिर इन्फ्लुएंसेस होंगे। कोई प्रोटेस्ट करने लगेगा स्ट्रीट पे कोई धरना देने लगेगा ठीक है कोई कुछ होने लगेगा तो ये पूरा प्रोसेस पॉलिटिकल है हम तो ये पूरा पॉलिटिकल जब पॉलिटिक्स के थ्रू लॉ बन रहा है तो लॉ तो इनहेरेंटली पॉलिटिकल हो गया ना राइट तो आपको उस सेंस में समझना जरूरी है कि लॉ हैज़ एन इनहेरेंट टेंडेंसी टू बी पॉलिटिकल पोलिटिकल नेचर इट विल बी पॉलिटिकल इन नेचर एंड इट विल बी वेरी इजी फॉर दी पावर और अ पर्सन इन अथॉरिटी टू यूज़ इट मोल्ड इट वाज़ इट इज़ इनहेरेंटली लिंक टू पावर एन अथॉरिटी। राइट? उसका नेचर है वो। हम तो यह जस्टिस के सवाल पे जो आप निजाम साहब बता रहे हैं कि जस्टिस जो है जो दुनियावी जस्टिस हम जिसको कहते हैं मॉडर्न वर्ल्ड में जो जस्टिस का कांसेप्ट है वो बड़ा सब्जेक्टिव है और किसी के लिए जस्टिस हो सकता है किसी फैसले में किसी के लिए फैसले में जस्टिस नहीं हो सकता है और जस्टिस को लोग अलग-अलग तरह से देखते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] देन शुड कैन वी से दैट दिस वर्ल्ड आई मीन इट्स डिफिकल्ट टू अंडरस्टैंड दैट हाउ डू वी आर व्हाट इज व्हाट इज जस्टिस देन यू नो कहां आदमी जस्टिस के लिए जाएगा व्हाट व्हाट इज व्हाट इज दैट जस्टिस इज अबाउट देन इफ इट्स सब्जेक्टिव इफ इफ इट्स नॉट केटरिंग टू मतलब हम हमारा एक आम आदमी ये सोचता है कि हम अदालत जाएंगे उसको जस्टिस मिलेगा उसको एक ऑर्डर मिलता है जो वो आर्डर को जस्टिस कह के कोर्ट कहती है कि वो आर्डर जस्ट है और वो आर्डर स्यूशन ऑफ डिस्प्यूट लेकिन अगर आम आदमी उसको जस्टिस नहीं समझ रहा है जिसको जिसको वो जिसको वो आर्डर मिला है वो उसको जस्टिस नहीं समझ रहा है तो फिर जस्टिस आखिर है क्या? अगेन दिस इज अ वेरी लेयर्ड क्वेश्चन आई विल टेल यू जस्टिस इतना डिफिकल्ट कांसेप्ट है इतना डिफिकल्ट कांसेप्ट है ये कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसको लीगल थ्यरिस्ट्स ने को डिफाइन करने में बहुत डिफिकल्टी हुई है। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] व्हाट इज जस्टिस इज वेरी डिफिकल्ट फॉर देम टू डिफाइन। हम पहली बात तो व्हाट इज लॉ? उनको डिफाइन करना मुश्किल हो रहा है। जी उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह है कि लॉ की जो ट्रेजेक्टरी है वो थियोलॉजी से निकलती है। चाहे हिंदूइज़्म उठा लीजिए चाहे बुद्धिज्म उठा। बुद्धिज्म कह रहा हूं, क्रिश्चियनिटी, जुडिज्म, इस्लाम कुछ भी उठा लीजिए आप इनमें से प्रोमिनेंट जो थियोलॉजीस हैं। लॉ थियोलॉजी से निकल रहा है। लेकिन जब आप उसको थोलॉजी से हटा दे रहे हैं और ये कह रहे हैं लॉ मैनमेड है तो अब वो जो एक कॉनसेप्चुअल प्रॉब्लम है ना उसको गैपल करना मुश्किल होता है। जी कि ह्यूमन बीइंग्स के कॉन्टेक्स्ट को कैसे डिफाइन करें? हालांकि नेचर उसका सेम रहेगा। ठीक है? ये प्रॉब्लम तो क्या हम कह सकते हैं जो डिबेट है कि नेचुरल लॉ ही जस्ट है। शुड बी शुड बी शुड बी अस्यूम दैट नेचुरल लॉस और पॉजिटिविज्म जिसको कहते हैं वही जस्ट है। दोनों चीजें हैं उसमें दोनों चीजें हैं। जैसे मैं आपको बता रहा हूं जैसे मिडिल ईस्टर्न स्टेट्स में अगर आप डेमोक्रेसी लेके आइए दे विल ग्रेपल विद लॉ ऑलवेज लॉ शरिया है या मैनमेड लॉ है? राइट? ठीक है? वो गैपल करते हैं उससे। ठीक है? अब लॉ जो आप कह रहे हैं लॉ जस्टिस अकॉर्डिंग टू व्हाट अकॉर्डिंग टू नेचुरल लॉ, अकॉर्डिंग टू पॉजिटिव लॉ। देखिए नेचुरल लॉ का मतलब होता है वो लॉ जो [नाक से की जाने वाली आवाज़] ह्यूमन नेचर में एंबेड है। जी ठीक है? फॉर एग्जांपल मर्डर इज बैड। राइट? इसके लिए लॉ बनाने की जरूरत नहीं है। एवरीवन नोज़ इट इज बैड। रेप इज बैड। तो दैट इज नेचुरल लॉ। ठीक है? पॉजिटिव लॉ कौन सा लॉ है? पॉजिटिव लॉ वो लॉ है जो मैन बनाता है। जी जो मैंने बताया ना कि अथॉरिटी की जरूरत होती है। जी अथॉरिटी एक्चुअली जी जो इनहेरेंटली लिंक होती है मतलब जो आप आज की डेट में जिसको पढ़ते हैं वो पॉजिटिव लॉ के सेंस में पढ़ते हैं आप उसको। है ना? कि पॉजिटिव लॉ के सेंस में अथॉरिटी होती है। जैसे लेट मी एक्सप्लेन दैट। पॉजिटिविज्म का एक बड़ा इंटरेस्टिंग एग्जांपल है कि एंड दिस कम्स फ्रॉम सोशियोलॉजी एक्चुअली [नाक से की जाने वाली आवाज़] स्टोरी यह है कि सोक्रेटीज जो था [नाक से की जाने वाली आवाज़] ही इनकरेज्ड क्वेश्चनिंग ये बिल्कुल ऐसे ही टीचर क्लास में आया बैठा बताओ तुमने क्या पढ़ा तुम्हारे हिसाब से जस्टिस क्या है चलो तुम बताओ तुम्हारे हिसाब से जस्टिस क्या है सोक्रेटीस कुछ बोल नहीं रहा है। वो नहीं बता रहा है कि क्या है। वो इनकरेज कर रहा है कि तुम सोचो, तुम सोचो, तुम समझो। ठीक है? सो व्हाट ही इज़ डूइंग इज एक्चुअली ही इज़ अलाउंग यू टू क्रिएट मल्टीपल ओपिनियंस। मल्टीपल ओपिनियंस बन जाएंगे चीजों के। हम प्लेटो जब आता है ना हु इज द स्टूडेंट ऑफ सोक्रेटी इज वो कहता है यार यह तो प्रॉब्लम हो रही है क्योंकि अगर सोसाइटी में मल्टीपल ओपिनियन होने लग जाएंगे तो फिर क्या सो जाएगा भाई समझ ही में नहीं आएगा सही क्या है गलत क्या है ही सेज़ नो दैट्स रोंग वी शुड हैव ओनली वन ओपिनियन वी शुड हैव ओनली वन ओपिनियन ठीक है एंड दिस इज़ द जेनेसिस ऑफ़ पॉजिटिविज़्म यू से वन इट्स ओनली कि एट द एंड ऑफ़ व्हाटएवर यू डू डू एट द एंड ऑफ़ द डे इट इज वन। राइट? ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये प्लेटो से चलता है। ये आपका सोशियोलॉजी में द फादर ऑफ सोशियोलॉजी इज ऑगस्ट कॉमटे है ना? तो ये जो पूरा लॉजिक है ये प्लेटो से अगस्त कॉमटे तक आता है। कॉमटेज़ पॉजिटिविज़्म कहा जाता है। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] और यह माना जाता है कि उस पॉजिटिविज्म को अडॉप करता है बेंथम हु इज आल्सो लीगल फिलॉसोफर एंड एन इकोनमिक फिलॉसफर जो भी कहिए वो लॉबी में बात करता है तो कॉमटे का वो पॉजिटिविज्म वो वहां से बोरो करता है वो पॉजिटिविज्म की शुरुआत है लीगल पॉजिटिविज्म जिसको कहा जाता है अब वहां से जब वो निकलता है तो फिर वो पूरा आपस में लोगों को जोड़ते चले जाए ऑस्टिन है और फिर उसके बाद क्या नाम है? एचएलए हार्ट है और आज की डेट तक आप आ जाए। ठीक है? ये जो पूरा ट्रेडिशन है, लेकिन अंडरस्टैंडिंग क्या है? लॉ इज वन सिंगल ओपिनियन। राइट? ठीक है? व्हाट डस दैट मीन? वन सिंगल ओपिनियन कब रहेगा? लॉ? व्हेन इट इज़ बैक्ड बाय अथॉरिटी। ठीक है? एंड यू कैन अंडरस्टैंड दिस इन टर्म्स ऑफ़ यूसीसी डिबेट। राइट। यूसीसी होगा या पर्सनल लॉ होगा। कॉन्स्टिट्यूशन क्या कहता है कि बेहतर है कि अगर यूसीसी हो। ठीक है? अंडरस्टैंडिंग क्यों है ये? क्योंकि अंडरस्टैंडिंग और लॉ एक ही होता है। एक ही ओपिनियन होता है। इसीलिए लॉ को इनफोर्स किया। इसीलिए मैंने कहा फोर्स इज़ फंडामेंटल टू लॉ। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] नाउ कमिंग टू योर क्वेश्चन जो आपका क्वेश्चन था जस्टिस का। जस्टिस को काफी हद तक डिफाइन करने की जिसको आप कहें सबसे पॉपुलर थ्योरी जो है जस्टिस की विद इन दी पॉजिटिविस्ट ट्रेडिशन ठीक है वो है थ्योरी ऑफ जस्टिस बाय जॉन र्स है ना जॉन र्स की थ्योरी पर काम अमर्त्य सेन ने किया है अमर्त्य सेन मार्थन उस बम ने अमर्त्य सेन का जॉन र्स की किताब का नाम है थ्योरी ऑफ जस्टिस अमर्त सेन की किताब का नाम है आईडिया ऑफ जस्टिस और इंटरेस्टिंगली अमर्त्य सेन ने जॉन र्स के साथ को टीच किया है हार्व में। सो ही नोस व्हाट द थ्योरी इज़ ऑल अबाउट। [नाक से की जाने वाली आवाज़] जॉन र्स की जो थ्योरी ऑफ़ जस्टिस है बड़ा इंटरेस्टिंग है वो। एंड दैट्स द मोस्ट एक्सेप्टेबल थ्योरी जनरली स्पीकिंग। एंड द [नाक से की जाने वाली आवाज़] थ्योरी इज़ ऑफ कोर्स देयर आर मेनी फिसिट्स टू इट। इट्स अ कंप्लीट बुक। बट अगर आप मुझे नटशेल में पूछेंगे तो नटशेल में थ्योरी ये है कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपको और मुझे अगर मुझे डिसाइड करना है असद भाई के बारे में कुछ कि साहब इनको ये पनिशमेंट देनी है या नहीं देनी है ठीक है तो आई शुड जिसको कहते हैं अपने आप को कवर कर लेना चाहिए व्हील ऑफ इग्नोरेंस में समथिंग सिमिलर टू यू नो नॉट नोइंग इसको कहते हैं व्हील ऑफ इग्नोरेंस मैं असद भाई के बारे में कुछ भी नहीं जानता। क्या बैकग्राउंड है? क्या एफिलिएशन है? मैं अपने बारे में भी कुछ नहीं जानता। ठीक है? अब जो मैं डिसाइड करूंगा उस बेसिस पे करूंगा। वो डिसीजन होगा बेस्ड ऑन जस्टिस। अगेन वो जस्टिस नहीं है। [हंसी] इट इज लाइक व्हाटएवर आई विल डिसाइड विल बी जस्टिस। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो ये इस तरीके की बात है। है ना? वै कॉम्प्लिकेटेड इट्स अ वेरी कॉम्प्लिकेटेड। लेकिन फिर वहां पे जो है वो अमर्च सेन कम्स एंड ही टॉक्स अबाउट द कैपेबिलिटीज़ अप्रोच। मम्चन मार्थनोस बम एंड दे से नो दैट डजंट वर्क। व्हाई? बिकॉज़ बिना लोगों की कैपेबिलिटी के आप कैसे समझेंगे भाई? ठीक है? जैसे जिस पर पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम डिपेंडेंट बेस्ड है। आपने यह डिसाइड कर दिया कि हर फैमिली को हम 5 किलो चावल हर महीने देंगे। हर गरीब फैमिली को 5 किलो चावल हर महीने देंगे। एक फैमिली में 10 लोग हैं, एक फैमिली में दो लोग हैं। इज दिस जस्टिस? सो व्हिच मींस द जस्टिस इज़ बेस्ड ऑन द कैपेबिलिटीज़ ऑफ़ पीपल। ठीक है? इट हैज़ टू बी बेस्ड ऑन दी कैपेबिलिटी। सो फर्स्ट यू सी वेदर दे आर कैपेबल ऑ नॉट। राइट। यहां से पूरी डिबेट निकलती है एक्सेसिबिलिटी की। जी। कि साहब सीढ़ी से काम नहीं होगा। व्हीलचेयर के लिए भी होना चाहिए। जब तक आप वो नहीं बनाएंगे यू आर नॉट डूइंग जस्टिस फॉर देम। [हंसी] तो ये ये इस तरीके के डिबेट है। आम आदमी ऐसा अस्यूम करता है कि जस्टिस जो है वो न्यूट्रल है। लॉ जो है वो न्यूट्रल है। लेकिन जब लॉ बनाते हैं तो सोशल हियरार्की को कैसे देखते हैं? और जेंडर को कैसे देखते हैं? क्लास को कैसे देखते हैं? कि न्यूट्रलिटी पे हम पहुंच पाए और रिलजन को कैसे देखते हैं कि हम न्यूट्रलिटी पहुंच पाए। आई मीन दैट कैन अगेन बी वेरी सब्जेक्टिव दैट इट्स न्यूट्रल। इट कैन नॉट इट्स नॉट न्यूट्रल। इट समटाइम्स आई मीन मोस्ट ऑफ़ द टाइम इट्स नॉट न्यूट्रल बट देन देयर इज़ अनदर असमशन दैट इट्स न्यूट्रल। तो इतनी सारी डिफरेंसेस है हमारे समाज में। इतने सारे क्लास के क्लास के बीच में डिफरेंसेस हैं। कास्ट के बीच में डिफरेंसेस है, एथिसिटीज है, रेसेस हैं। तो उस बीच में कितना चैलेंजिंग हो जाता है न्यूट्रलिटी पे पहुंचना और न्यूट्रल लॉ को रखना। इसमें कई चीजें हैं। अगेन देयर आर अ नंबर ऑफ़ थिंग्स हियर। देखिए [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेट अस लेट अस लेट अस अंडरस्टैंड द टाइम स्टोरी लाइन। स्टोरी लाइन क्या हो रही है? यू आर रिमूविंग गॉड फ्रॉम पिक्चर। ठीक है? भाई नेशन स्टेट है। ह्यूमन बीइंग्स आर कैपेबल ऑफ रनिंग। ठीक है? गॉड की जरूरत नहीं है। थियोक्रेटिक स्टेट नहीं है। थियोलॉजी की जरूरत नहीं है। थियोलॉजी मस्ट बी डिवोर्स्ड फ्रॉम पॉलिटिक्स। नेशन स्टेट मस्ट बी सेकुलर। ये एक अंडरस्टैंडिंग है। ठीक है? अब जब ये अंडरस्टैंडिंग है तो इस अंडरस्टैंडिंग को मैनिफेस्ट करना कैसे? भी जरूरी है ना। जी। जी अब आप कहेंगे कि ह्यूमन बीइंग को लॉ बनाना है तो ह्यूमन बीइंग को लॉ बनाने के लिए कोई प्रोसेस होगा तभी तो लॉ बनेगा ना तो देन यू ब्रिंग इन डेमोक्रेसी ठीक है सॉरी देन यू ब्रिंग इन पार्लियामेंट अ लेजिसलेटिव अथॉरिटी लेजिसलेटिंग अथॉरिटी व्हिच कैन फ्रेम व्हिच कैन क्रिएट लेकिन अब पार्लियामेंट में बैठेगा कौन [गला साफ़ करने की आवाज़] टू हैव डेमोक्रेसी फॉर दैट यू नीड टू हैव रिप्रेजेंटेशन ठीक है क्योंकि [गला साफ़ करने की आवाज़] अब लड़ाई शुरू हो गई कि हम पहले जाएंगे, आप पहले जाएंगे, हम ज्यादा जाएंगे, तुम कम जाओगे। ठीक है? तो वो रिप्रेजेंटेशन के लिए आपको डेमोक्रेसी चाहिए। और डेमोक्रेसी में फिर अब आपको पॉलिटिक्स अलऊ करना पड़ेगा। तो पॉलिटिक्स ऑफ रिप्रेजेंटेशन जी। द पॉलिटिक्स ऑफ़ आइडेंटिटी। जी। जब तक पॉलिटिक्स ऑफ़ आइडेंटिटी नहीं होगी, पार्लियामेंट में लोग कैसे जाएंगे? जी। और जब तक जाएंगे नहीं, बहस नहीं होगी, तो आपकी बात कैसे होगी? और नहीं होगा तो लॉ कैसे बनेगा? ठीक है? तो दैट्स व्हाट आई सेड कि लॉ और पॉलिटिक्स इनहेरेंटली टाइड है। टुगेदर। ठीक है? वह इनहेरेंटली टाइड है क्योंकि ऐसा नहीं कि डेमोक्रेसी को या इन चीजों को आपने सिर्फ पॉलिटिक्स के सेंस में देखा है। ऑफ कोर्स आपने इसको प्योरली पॉलिटिक्स के सेंस में देखा है। क्योंकि अगर मैं आपसे पूछूं कि व्हाट इज पार्लियामेंट ऑफ इंडिया? इज इट अ लीगल इंस्टीट्यूशन और अ पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशन? एट द एंड ऑफ द डे इट इज़ अ पॉलिटिकल इंस्टीट्यूशन? पॉलिटिक्स हो रही है ना? जी। मैं आपसे पूछूं व्हाट इज द कॉन्स्टिट्यूशन ऑफ इंडिया? इज इट अ पॉलिटिकल डॉक्यूमेंट और अ लीगल डॉक्यूमेंट? द आंसर इज़ इनहेरेंटली इट इज़ अ पॉलिटिकल डॉक्यूमेंट। ठीक है? देन वेयर इज़ लॉ इन इट। इट देयर इज़ लॉ बिकॉज़ आप मान के चल रहे हैं कि इससे लॉ बनेगा। ये इससे वैलिडेशन आएगा। तो लॉ जो है वो एक्चुअली वैलिडेशन क्रिएट कर रहा है हर चीज का। ठीक है? कॉन्स्टिट्यूशन पॉलिटिकल डॉक्यूमेंट है। लेकिन साहब क्योंकि सबने अग्री किया है तो ये वैलिड है। जी और क्योंकि ये वैलिड है तो ये लॉ है। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो पार्लियामेंट बोल रहा है वो सिंगल वॉइस है। उसके ऊपर कुछ नहीं है। उसके हिसाब से सब चीज होगी। एंड देयर फॉर इट इज़ लॉ। राइट? है ना? तो ये इनहेरेंटली क्योंकि टाइड है चीजें। [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपको डिफिकल्टी होती है समझने में या यह पॉलिटिक्स हो रही है, लॉ हो रहा है, क्या हो रहा है? इस तरीके की रिलेशनशिप है और इसीलिए अब जो कहानी होगी वो कहानी होगी रिप्रेजेंटेशन की लॉगजेंस में। जी। ठीक है। अब वो रिप्रेजेंटेशन में अब कहानी होगी। क्या आप अपने राइट्स को पब्लिक स्पेस में चैंपियन कर पा रहे हैं कि नहीं कर पा रहे हैं? क्या आप प्रोटेस्ट कर पा रहे हैं या नहीं कर पा रहे हैं? ठीक है? क्या आप अपनी बात कोर्ट के सामने रख पा रहे हैं यहां रख पा रहे हैं? अगर कोर्ट के सामने आप अपनी बात नहीं रख रहे हैं तो क्या एक्सटर्नली प्रेशर डाल पा रहे हैं? एलजीबीटी क्यू जो केस है पूरा एलजीबीटी क्यू राइट्स जो है एलजीबीटी क्यू राइट्स का जो पूरा जुरिसफुडेंस है वो ऐसा जरिसफुडेंस नहीं है कि जिसने पूरा कंट्री को टेक ओवर कर लिया रेवोल्यूशन ले दिया ऐसा नहीं है। ठीक है? बट वो इस तरीके का मूवमेंट है जिसमें एलट लोग हैं। उसका उन्होंने कल्चर क्रिएट किया है। सो एलजीबीटी क्यू राइट्स का एक अपना कलर है, अपनी लैंग्वेज है, अपना कम्युनिकेशन है, अपना फ्लैग है। तो देयर इज़ अ कल्चर बिल्ट अराउंड इट। म्यूजिक है, लिटरेचर है, डॉक्यूमेंट्री है। ठीक है? अ वे ऑफ़ रिप्रेजेंटेशन है। एंड ऑल ऑफ दिस इज़ हैपनिंग इन पब्लिक स्पेस। जिसको आप कहते हैं प्राइड मार्च। राइट? ऑल ऑफ़ दिस इज़ हैपनिंग इन पब्लिक स्पेस। व्हेन दिस बिकम्स विज़िबल इन पब्लिक स्पेस इट बिकम्स विज़िबल इनसाइड द कोर्ट ऑल्सो। ठीक है? इसीलिए पॉलिटिक्स ऑन द ग्राउंड इज़ फंडामेंटल। फॉर योर रिप्रेजेंटेशन इन द पार्लियामेंट एंड फॉर लॉ फॉर फॉर लॉ टू बी डिक्लेयर्ड इन योर फेवर। आपके फेवर में लॉ होने के लिए पॉलिटिक्स बहुत जरूरी होती है। फंडामेंटली टाइड है ये। जो भी ग्रुप पॉलिटिक्स नहीं कर पा रहा है वो लीगली अपनी बातें ओन करना या अपने लिए उस चीजों को क्रिएट कर पाना करा पाना उसके लिए मुश्किल हो जाता है। इसीलिए अंबेडकर एंड अदर्स दे वर वेरी मच इन फेवर ऑफ दलित पॉलिटिक्स। क्योंकि जब तक दलित पॉलिटिक्स नहीं होगी लॉ में वो ट्रांसलेट नहीं होगी। और यही हुआ है कि जैसे ही मुस्लिम पॉलिटिक्स डाइल्यूट हुई लॉ और मुस्लिम का रिलेशनशिप ए्बगुस होना स्टार्ट हो गया। आप जितना क्लियर हैं अपनी चीजों में जितना क्लियर हैं अपने एजेंडा में जितने क्लियर हैं अपनी अंडरस्टैंडिंग में उतना ही क्लियर होंगे आप अपने रिप्रेजेंटेशन में। दैट्स हाउ इट इज़ ऑल टाइड अप। हम पहले भी बात कर रहे थे इस पडकास्ट से पहले हम आपसे बात कर रहे थे इसके बारे में और हमने इस बात पे काफी तवज्जो दिया था कि बिय्ड लीगल रीजनिंग और जजमेंट को लिखने में जो लीगल रीजनिंग होती है उसके बियों्ड बहुत सारी चीज काम करती है एक जजमेंट पे अराइव करने में और वो इंट्यूशन होता है आइडियोलॉजी होता है [नाक से की जाने वाली आवाज़] सोशल कॉन्टेक्स्ट होता है इंस्टीट्यूशनल प्रेशर होता है तो थोड़ा आप इसको डिस्क्राइब कर पाएंगे क्या हमारे उन लोगों के लिए जो तो लोग इसको समझने की कोशिश करेंगे इस पडकास्ट के जरिए से। देखिए असद भाई होता क्या है ना कि सबसे पहले जो क्वेश्चन होता है कोर्ट के पास लॉजिकली [गला साफ़ करने की आवाज़] जो क्वेश्चन होना चाहिए [नाक से की जाने वाली आवाज़] वो यह होना चाहिए कि क्या कोर्ट के पास जुरिसडिक्शन है या नहीं? इस क्वेश्चन को आप डोमेस्टिक या नेशनल सेंस में आप नहीं समझ पाएंगे। इसको जब आप इंटरनेशनल लॉ के सेंस में जाएंगे तो आप समझ जाएंगे कि जब आप कोर्ट के पास जाते हैं तो सबसे पहला क्वेश्चन यह होना चाहिए कि क्या कोर्ट प्रॉपर फोरम है इस क्वेश्चन को रिजॉल्व करने के लिए? ठीक है? ये फंडामेंटल क्वेश्चन है। जब आप इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में जाते हैं, दो कंट्रीज जाते हैं, तो सबसे पहला क्वेश्चन जो कोर्ट करती है वो यही करती है वेदर आई हैव जुरिसडिक्शन ऑ नॉट। क्योंकि डोमेस्टिक सेंस में यह क्वेश्चन बहुत रेलेवेंट नहीं रहता। वह इसलिए नहीं रहता [नाक से की जाने वाली आवाज़] क्योंकि कोर्ट जुरिसडिक्शन लेती है कॉन्स्टिट्यूशन की बेसिस पे। और कॉन्स्टिट्यूशन यह कहता है कि आप किसी को रोक नहीं सकते कोर्ट के पास आने से। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो ऑटोमेटिकली कोर्ट्स हैव जुरिसडिक्शन। दैट डज नॉट मीन कि क्वेश्चन नहीं है ये। इट इज अ क्वेश्चन बट क्योंकि इसका जवाब बहुत सिंपल है इसलिए यह क्वेश्चन उठता नहीं है। ठीक है? लेकिन ये क्वेश्चन उठ जाता है। जैसे इटालियन मरींस केस था। इटालियन मरींस ने इंडियन फिशरमैन को मारा। ठीक है? और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने या कोस्ट गार्ड्स ने उन मरींस को पकड़ लिया। अब उनको कोर्ट ले आए। अब क्वेश्चन क्या होगा? जुरिसडिक्शन है नहीं कोर्ट का। क्यों? क्योंकि ऑफिशियल्स हैं वो इटली के। चलिए वो है क्रिमिनल एक्शन है। मार दिया, गोली मार दी तो कोई मर गया तो जुरिसडिक्शन है। लेकिन दैट डिस्प्यूट जो है वो डिस्प्यूट जो है वो एग्रवेट हो गया था। इट टर्नड इंटू अ डिस्प्यूट बिटवीन इंडिया एंड इटली। और कोई केस था सुप्रीम कोर्ट में। क्वेश्चन यह है कि क्या इटली सुप्रीम कोर्ट के ऊपर जुरिसडिक्शन है क्या कि वह इटली को [हंसी] के ऊपर डिसाइड करें एस अ नेशन। ठीक है? इटली सोवन इन इटसेल्फ। ठीक है? तो इतना बड़ा डिप्लोमेटसिक क्राइसिस हो गया कि नहीं साहब इसको छोड़ दीजिए। इसको हम इंटरनेशनल फोरम पे ले जाते हैं। इसको खत्म करते हैं। तो ये क्वेश्चन है। कोर्ट के पास जुरिसडिक्शन है या नहीं है। ठीक है? डोमेस्टिक [नाक से की जाने वाली आवाज़] सेंस में नहीं होता क्योंकि वो क्लियर है। ठीक है? कोई कॉम्प्लिकेशन नहीं है। लेकिन ये जो क्वेश्चन जुरिसडिक्शन का है ये हमेशा कोर्ट खुद डिसाइड करती है उसके पास जुरिसडिक्शन है या नहीं। या वो क्वेश्चन रेलेवेंट है या नहीं? जैसे बाबरी मस्जिद अयोध्या केस में जो इस्माइल फारूकी जजमेंट है उसमें यह क्वेश्चन जाता है प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया से। जी। ठीक है कि साहब वो डिस्प्यूटेड साइट पर क्या उसको हम बर्थ प्लेस ऑफ लॉर्ड राम मान सकते हैं या नहीं मान सकते 94 का जजमेंट है वो और वो प्रेसिडेंट का क्वेश्चन है प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है अंडर आर्टिकल 143 ऑफ द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन कोर्ट क्या करती है कोर्ट कहती है साहब वी रिस्पेक्टफुली डिक्लाइन टू आंसर द क्वेश्चन क्या मतलब है? हम इस क्वेश्चन को क्वेश्चन नहीं मानते। ठीक है? हमारे हिसाब से यह लीगल क्वेश्चन नहीं है। पॉलिटिकल हो सकता है देख लीजिए आप। लीगल क्वेश्चन नहीं है। ठीक है? तो पहली स्टेज ये है। क्या ये क्वेश्चन है या नहीं? क्या मेरे पास जुरिसडिक्शन है या नहीं? क्या इसको सेटल करना है या नहीं? सो दैट्स द फर्स्ट स्टेज। [नाक से की जाने वाली आवाज़] उस स्टेज के बाद जो सेकंड स्टेज होती है वो होती है फ्रेमिंग ऑफ इशू। इशू को फ्रेम किया जाता है। जब तक आप क्वेश्चंस को फ्रेम नहीं करेंगे उन क्वेश्चंस का आंसर नहीं दे सकते। आप किसी भी डिस्प्यूट को सॉल्व नहीं कर सकते। जब तक कि आपको मालूम ना हो कि इसका सेंट्रल इशू क्या है? जब आप इशू लेके जाते हैं तो क्वेश्चंस फ्रेम करनाेंट होता है। जब तक आप उस क्वेश्चन को फ्रेम नहीं करेंगे, आप जवाब नहीं दे सकते। बिकॉज़ यू डोंट नो व्हाट इट इज़। राइट। उसका सिंपल सा एग्जांपल है। आप जब किसी एडवोकेट के पास जाएंगे तो एक नॉर्मल इंसान जब अपने डिस्प्यूट को एडवोकेट के पास लेके जाता है तो उसकी पूरी कहानी में से एडवोकेट को सिर्फ 10% रेलेवेंट मिलता है। कि साहब मर्डर का एक केस है तो मैं घर पे थी। मैं खाना बना रही थी तो फिर ऐसे हुआ था। तो फिर मैं वहां गई तो मैंने यह सुना। एडवोकेट कहेगा मुझे इससे कोई मतलब नहीं है। उस चीज पर आइए जो हुआ है। ठीक है? सो व्हाट व्हाट डस दैट मीन? [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोर्ट के सामने आपको बातों को रिफाइन करना है। जब तक बातें रिफाइन नहीं होंगी बहस नहीं हो सकती। इसीलिए कोर्ट उसको क्वेश्चंस फ्रेम करेगी। सबसे पहले ठीक है? बहुत सारी कहानी है। बहुत लंबी-लंबी चार्जशीट है और यह है वो है। सब ठीक है। हजारों पेजेस की चार्जशीट है और सारी चीजें हैं। ठीक है। अपनी जगह है। इश्यूज क्या हैं? लेट अस फ्रेम द इशज़ फर्स्ट। ठीक है? तो कोर्ट उस इश्यूज को फ्रेम करती है। इसको फ्रेमिंग ऑफ चार्जेस कहते हैं आप क्रिमिनल लॉ में। चार्जेस को फ्रेम किया जाता है कि दिस पर्सन इज़ चार्ज्ड अंडर सेक्शन 302 ऑफ द इंडियन पीनल कोड। अब बहस होगी 302 पे। अब बहस होगी कि क्या यह मर्डर है या नहीं है। क्योंकि अब बात रिफाइन हो गई। ठीक है? जब यह इश्यूज फ्रेम हो जाते हैं तो उसके बाद फिर यू स्टार्ट आर्गुममेंट। आप अपनी बात रखते हैं [नाक से की जाने वाली आवाज़] और आप अपनी बात रखते हैं तो उसके बेसिस पे फिर अब एविडेंसेस आना स्टार्ट होते हैं। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप बोल रहे हैं तो भैया एविडेंस दिखाइए। किस बेसिस पे कह रहे हैं आप? आपको सामने वाला काउंटर कर रहा है। तो आप जो काउंटर कर रहे हैं उसका एविडेंसेस दिखाइए। ठीक है? बट नन ऑफ दिस कैन हैपन क्योंकि कोर्ट एक फॉर्मल प्रोसीजर है ना। आप अपने घर से उठ के जाकर ऐसे ही खड़े होकर बोल देंगे ऐसे नहीं होता है। आप उसको डॉक्यूमेंट बनाना पड़ेगा आपको। फॉर्मल प्रोसीजर है। क्योंकि कोर्ट जो होती है हर चीज को रिकॉर्ड करती है। हर चीज रिकॉर्ड होनी है। इसका मतलब पहले डॉक्यूमेंट पे होनी है। जिसको आप मेमो कहते हैं। तो पार्टीज मेमो बनाएंगी। एडवोकेट्स मेमो बनाएंगे। उन मेमो को सबमिट किया जाएगा। मैंने जो बनाया है मैं दूसरी पार्टी को दूंगा क्योंकि उसी के बेसिस पर वो रिस्पांस देगा। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] और उसके बाद फिर आर्गुमेंटेशन की स्टेज आएगी। है ना? तो ये एक पूरा प्रोसेस है। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] इस प्रोसेस में देन यू हैव अ नंबर ऑफ परम्यूटेशन कॉम्बिनेशन। जैसे कौन सा क्राइम हुआ है? कौन डिफाइन करता है? पुलिस एट द फर्स्ट इंस्टेंस। पुलिस जो है वह प्ले कर देगी। फेयर भी हो सकती है, अनफेयर भी हो सकती है। ठीक है? भाई राइटिंग हुई नहीं कभी कि साहब कम्युनल राइट्स हैं। आपने लगा दिया सेक्शन। ठीक है? वहां पे सब्जेक्टिविटी आ जाती है। वहां पे बायसनेस आ जाती है। तो अब अब जो आपने जो जो चार्जेस फ्रेम हो गए अब जो बहस आपकी स्टार्ट हुई वह बहस बहुत सारी कागज पे है ऑलरेडी। ठीक है? अब कागज पर जो बहस हो रही है, कागज पर जो डाला गया है ना, वहां भी सब्जेक्टिविटी आती है। क्यों? क्योंकि आपको इंडियन इंडियन देखिए इंडियन जिसको कहते हैं जुडिशियल प्रोसेस या जुडिशियल सिस्टम लाइक मेनी अदर सिस्टम्स इन इंडिया इट हैज़ लॉट ऑफ़ करप्शन। ठीक है? पीपल हैव टू एक्सेप्ट इट। एडवोकेट्स एटलीस्ट लोअर कोर्ट्स में बहुत इधर-उधर करते हैं। यह सच है। वो क्योंकि बहुत इधर-उधर करते हैं तो कुछ चीजें लिखेंगे, कुछ नहीं लिखेंगे, कुछ उस पार्टी वाले से बात कर लेंगे। ठीक है? उसके [हंसी] फेवर की बात तो ये चीजें इंडिया में चलती हैं और ये रियलिटी है। पीपल नीड टू अंडरस्टैंड दैट। इसीलिए लोगों को समझ में नहीं आता कि मेरा केस आगे क्यों नहीं बढ़ रहा है। क्योंकि एडजनमेंट पे एड्जमेंट ले रहा है। वो आपसे फीस ले रहा है। ये एक प्रिवेलेंट प्रैक्टिस है इंडिया में। ठीक है? आपको नहीं मालूम क्योंकि टेक्निकल प्रोसेस है। आप उस पे रिलाई कर रहे हैं। सो आई एम नॉट सेइंग कि हर इंसान ऐसा करता है। बहुत से लोग बहुत फेयर काम करते हैं। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन आप जो आपने अगर नीचे ए लिख दिया तो अब वो ए ऊपर तक जाएगा। जैसे निठारी वाला जजमेंट आया है। ठीक है? मुनि सिंह पंधेर। ठीक है? और दूसरा भी एक जो था। अब अब लोग ये कहेंगे साहब मुनि सिंह पीर को छोड़ दिया। ये तो इनजस्टिस हो गया। उसको छोड़ना इनजस्टिस नहीं है। सबसे पहले तो यह है कि क्या उसको ही चार्ज करना चाहिए था या नहीं? क्योंकि अगर आपने गलत इंसान को चार्ज किया है तो उसको प्रूफ भी नहीं होगा वो ऊपर जाके। और क्योंकि वह पूरा प्रोसेस हो चुका ऑलरेडी तो अब आप कहेंगे नहीं नहीं साहब इसने किया अब नहीं होता वो कि अब आप फिर से ओपन कीजिए फिर नए एक्यूज़्ड बनाइए फिर नए चार्जेस फ्रेम वो नहीं होता है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो हमारे यहां ये बहुत बड़ा फ्लॉ निकल आ जाता है। है ना? ये प्रोसेस में है। अब इसमें नेक्स्ट स्टेज जो है सब्जेक्टिविटी की वो जुडिशरी इटसेल्फ है। जुडिशरी की खुद की सब्जेक्टिविटी। जी एंड दैट इज व्हाट माय क्वेश्चन वाज़ अबाउट जी जुडिशरी की जो सब्जेक्टिविटी है वो बहुत लेवल पे काम करती है। ठीक है? जो एलिमेंट [नाक से की जाने वाली आवाज़] ऑफ सब्जेक्टिविटी जो हमने देखी एट द लेवल ऑफ फ्रेमिंग ऑफ चार्जेस डोमेस्टिक लेवल पे विद इन कोर्ट रूम प्रोसेस सब्जेक्टिविटी एडवोकेट्स के लेवल पर भी सब्जेक्टिविटी है। आर्गुमेंट्स के लेवल पर भी सब्जेक्टिविटी है। कई बार क्या होता है कि एडवोकेट्स देखिए [नाक से की जाने वाली आवाज़] लोअर कोर्ट्स में तो जल्दी जजेस चेंज नहीं होते क्योंकि टेन्योर लंबा होता है। है ना? ज्यादा ज्यादा चेंज होते हैं ट्रांसफर के थ्रू। लेकिन हायर कोर्ट्स में जब आप जाते हैं क्योंकि टेन्योर छोटा होता है। हमारे यहां रिटायरमेंट एज है। तो बड़ी जल्दी-जल्दी चेंजेस होते हैं जजेस। है ना? और जजेस चेंजेस होते हैं और जितना आप हायर जाएंगे उतना ही केसेस में पॉलिटिक्स होना स्टार्ट होती है। क्योंकि बड़े लोगों के केसेस होते हैं, बड़े वकील होते हैं, बड़ा इशू है, पॉलिटिकल इशू है। बहुत सारी चीजें होती हैं। तो अब वहां पे आर्गुमेंट में सब्जेक्टिविटी स्टार्ट हो जाती है। है ना? एक चीज मैं आपको पहले हाईलाइट कर चुका हूं कि जो मेमो बनाते हैं एडवोकेट्स दोनों साइड [नाक से की जाने वाली आवाज़] के एडवोकेट्स अपना मेमो बना रहे हैं, सबमिट कर रहे हैं। दोनों को एक दूसरे के आर्गुमेंट्स ऑन पेपर मालूम है। जज को ऑन पेपर मालूम है कि मोटा-मोटा इनको क्या कहना है। लेकिन दैट इज नॉटेंट। जब आप कोर्ट रूम में जाते हैं, व्हाट इजेंट इज द डिलीवरी ऑफ द आर्गुमेंट। जिसको आप कहते हैं कि साहब सीनियर एडवोकेट की फीस इतनी ज्यादा क्यों है? है ना? कपिल सिब्बल इतना पैसा क्यों लेते हैं? या फिर साहब हरीश सालवे इतना पैसा क्यों लेते हैं? वह पैसा जो लिया जाता है, वह अपीयरेंस का एंड डिलीवरी का पैसा है। ठीक है? बिकॉज़ दे आर एबल टू आर्ग्यू इन अ मैनर जो जज को कन्विंस करे। ठीक है? अब आप जब आर्गुमेंट पे आएंगे तो आर्गुमेंट हमेशा लॉ का आर्गुमेंट नहीं होता। आर्गुममेंट को कन्विंसिंग बनाने के लिए आप लिटरेचर भी यूज कर सकते हैं। ठीक है? आप फिलॉसफी भी यूज कर सकते हैं। आप आप पोएट्री यूज कर सकते हैं। तो बहुत सारी चीजें कॉम्बिनेशन होता है। प्रेजेंस ऑफ माइंड होता है उसमें। ठीक है? कई बार आप बेंच के चेंज होने पर आर्गुमेंट चेंज कर देते हैं। है ना? बिकॉज़ यू नो कि यार आई नो दिस जज इज वेरी स्ट्रिक्ट विद दिस। आई एम नॉट गोइंग टू स्पीक दैट टू हिम और हर। ठीक है? कई बार आप जो हैं वो बेस्ड ऑन टाइम अपना आर्गुमेंट चेंज करते हैं। पूरी आप तैयारी करके आए हैं। कोर्ट कह रही 2 मिनट है आपके पास बस। आप पूरा तैयारी 2 मिनट में आप क्या डिलीवर कीजिएगा? तो वो जो फीस है वो इस चीज की है कि ऑन द स्पॉट द पर्सन इज एबल टू मैनेज इट। ठीक है? ऑन द स्पॉट मैनेज कर रहा है वो या कर रही है एडवोकेट। ठीक है? आप ये देख रहे हैं कि साहब क्योंकि आप तो पूरा अगर आपने ऑनलाइन देखा हो, लोग देख अब तो ऑनलाइन स्ट्रीमिंग होती है। अगर लोग देखें तो एडवोकेट्स का जमघटा लगा रहता है। ठीक है? स्टॉप कोर्ट्स में। तो आपको मालूम है कि यह चल रहा है इसके बाद मेरा आएगा। तो आप ऑलरेडी देख रहे हैं जज का मिजाज। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] उसका बिहेवियर भी देख रहे हैं आप। अरे यार आज तो बड़े नाराज हैं यार ये। ठीक है? आज तो थोड़ा सा माहौल ठीक-ठाक है। उस पे भी चेंज करते हैं अपने आर्गुमेंट्स। ये कोर्ट रूम थिएट्रिक्स है। ठीक है? तो ऑन पेपर चीजें वही रहेंगी। लेकिन जो कन्विंसिंग का तरीका है वो चेंज हो जाएगा। वो चेंज हो जाता है। ठीक है? वहां भी सब्जेक्टिविटी आ जाती है क्योंकि कोई चीज किसी जज को बहुत पसंद आ जाती है। ठीक है? आई थिंक कुछ दिन पहले एक एनवायरमेंटल लॉ का मैटर था। कुछ था कोई एडवोकेट गए कोर्ट में और वो कहते हैं स्टार्ट करने से पहले [खांसने की आवाज़][गला साफ़ करने की आवाज़] योर लॉर्डशिप आई एम नॉट एबल टू स्पीक। एंड जैसे मिस्टर काउंसल आई अंडरस्टैंड बिकॉज़ ऑफ़ पोल्यूशन। ठीक है? ये कोर्ट रूम थिएट्रिक्स है। है ना? यू हैव सेंड द मैसेज अक्रॉस विदाउट यूजिंग लॉ है ना तो ये एक एलिमेंट है उसमें और फिर सब्जेक्टिविटी जो आती है वो जजेस की आती है और वो जो सब्जेक्टिविटी है उसमें एक हिडन एलिमेंट होता है वो है जजेस की पॉलिटिकल लीनिंग जैसे यूएस में आपको मालूम है कौन सा जज लिबरल है कौन सा कंजर्वेटिव है। ठीक है? यूके में आपको जज के बारे में पूरा मालूम है बिकॉज़ उसकी एक प्रॉपर ट्रेनिंग है। ठीक है? वो एक सब एक जैसे सोचते हैं। ठीक है? तो ये एक इंडिया में क्योंकि हम उसको बहुत ज्यादा सैक्रोसेंट समझते हैं। तो हमारे यहां आईडियोलॉजिकल लीनिंग उजागर नहीं होती। है ना? लेकिन जो कोर्ट रूम में जा रहा है उसको तो मालूम है ना जो हर रोज जा रहा है जो पूरा बैकग्राउंड देख रहा है तो वह जो जजमेंट के एप्रिसिएशन है कि यार जज जो है वो इस आर्गुमेंट को पकड़ेगा इसको नहीं पकड़ेगा वो यह लिखेगा यह नहीं लिखेगा ठीक है जैसे उमर खालिद शजील इमाम और और लोगों का जो यह जो बेल वाला आर्डर है [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप अगर उसमें देखेंगे आई विल जस्ट हाईलाइट वन इंटरेस्टिंग आस्पेक्ट कॉन्स्टिट्यूशन में फेयर हियरिंग का प्रो जिसको कहते हैं ना प्रिंसिपल है कॉन्स्टिट्यूशनल प्रिंसिपल है फेयर हियरिंग है ना और फेयर हियरिंग में एक इंपॉर्टेंट प्रिंसिपल उसका है कि अनड्यू डिले नहीं होना चाहिए क्योंकि अनड्यू डिले इज वायलेशन ऑफ आर्टिकल 21 वायलेशन ऑफ ह्यूमन डिग्निटी। ठीक है? कोर्ट उसमें क्या कर रही है? एक केस साइट किया। इसमें यह कहा गया है कि ह्यूमन डिग्निटी इज इंपॉर्टेंट। अनड्यू डिले इज बैड। लेकिन इस जजमेंट में यह भी एम्फेसाइज किया गया है कि देयर कैन बी अनड्यू डिले। ठीक है? इसमें इंटरेस्टिंग पार्ट क्या है? उस जजमेंट में शायद वो लिखा भी ना हो। बट द कोर्ट इज रीडिंग इट बिकॉज़ इट हैज द अथॉरिटी। तो उसके साथ जोड़ के उसने उसको रीड कर दिया। ये आपको जिसको कहते हैं बाबरी मस्जिद वाले केस में मिल जाएगा। ठीक है? कि साहब आउटर कोर्ट यारार्ड जो है वो हिंदू पज़ेशन में है। इनर [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोर्टयार्ड कंटेस्टेड है। एंड देयर फॉर इट शुड गो टू हिंदू। कंटेस्टेड का मतलब यह नहीं है। ठीक है नाउ व्हाई इट शुड गो टू हिंदू बिकॉज़ आप कोर्टयार्ड को डिवाइड नहीं करना चाहते है ना बट दिस इज रीडिंग मोर देन व्हाट इट इज है ना या फिर ये कहना कि हम सारे जजेस जो है वो एक सुर में बात कर रहे थे इसलिए हमने जो है वो ये नहीं बताया किसने लिखा है जजमेंट ठीक है या फिर जो लास्ट में है एक एक डिफरेंट ओपिनियन ने किसी जज का उसको टाइटल दे दिया एडेंडम का। ठीक है? तो ये जुडिशियल लेवल पे भी है ये चीज व्हिच इज़ वेरी इंटरेस्टिंग। है ना? बिकॉज़ जुडिशरी हैज़ द फाइनल से एंड बिकॉज़ इट हैज़ द अथॉरिटी टू टेल यू व्हाट लॉ इज़। जब हम [गला साफ़ करने की आवाज़] लोग क्लास में पढ़ाते हैं। तो, एक अंडरस्टैंडिंग ऑफ़ लॉ, यह भी है कि लॉ इज़ व्हाट द जजेस से इट इज़। द जजेस टेल यू व्हाट लॉ इज़। ठीक है? हाउ डू दे टेल यू बाय टेलिंग यू द बाउंड्रीज लॉ यह नहीं है, यह नहीं है, यह नहीं। इसका मतलब यह है तो दे डू इट। ठीक है? क्योंकि उनके पास फाइनल से है क्योंकि उनके पास अथॉरिटी है। कोर्ट राइट? हां। नहीं इट इट इट इट इज़ विद रिस्पेक्ट टू हाई कोर्ट एज वेल। ओके। क्योंकि भाई उसको रिएफम कर दिया सुप्रीम कोर्ट ने। या उसको चैलेंज नहीं हुआ। ठीक है? दैट्स द लॉ। दैट्स द लॉ। दीज़ आर सम ऑफ द वेेज इन वि दी सब्जेक्टिविटी कप्स इनू। इस लेवल पर सब्जेक्टिविटी होती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि जजमेंट्स फेयर नहीं होते। सब्जेक्टिविटी के थ्रू भी जजमेंट्स फेयर होते हैं। जैसे आप अगर यह कहें कि आप कॉन्शियस हैं कि कास्ट पॉलिटिक्स इंडिया में है। कास्ट के नाम पर डिस्क्रिमिनेशन होता है। और आप उसको अपने ज़हन में रख के डिसीजन देते हैं तो सब्जेक्टिविटी के थ्रू भी जस्टिस होता है। ठीक है? जिस सब्जेक्टिविटी के थ्रू भी जजमेंट्स होते हैं और फेयर होते हैं। तो दी एकिस्टेंस या किसी चीज में सब्जेक्टिविटी होना इसका मतलब यह नहीं कि वो खराब है। तो यह यह पूरा एक प्रोसेस है जो बहुत ही क्लियर न्यूट्रल बड़ा ऑब्जेक्टिव प्रोसेस नहीं है। बहुत लोगों के स्टेक्स होते हैं। इसमें बहुत तरह की चीजें होती हैं। इट्स अ मिक्सचर ऑफ़ मेनी थिंग्स। इसी हवाले से हम ये भी समझने की कोशिश करेंगे कि जजमेंट्स जो होते हैं उसको कैटेगराइज करते हैं अक्सर मोरली करेक्ट जजमेंट में एक करेक्ट बोलते हैं लीगली साउंड जजमेंट है। किसी जजमेंट्स को किसी जजमेंट को कहते हैं कि पॉलिटिकली साउंड जजमेंट है। तो इन जजमेंट्स के बीच में डिफरेंस क्या है? अगर आम आदमी को इसके बीच में डिफरेंस समझना है कि एक लीगली साउंड जजमेंट में एक मोरली [नाक से की जाने वाली आवाज़] साउंड जजमेंट में, एक पॉलिटिकली साउंड जजमेंट में क्या डिफरेंस है? देखिए एक चीज तो मैंने हाईलाइट की थी हल्की बट ऑफ कोर्स आई एम गोइंग टू गो इनू डिटेल ऑन दैट लेकिन एक चीज थोड़ा हल्के में मैंने हाईलाइट किया था वो ये था कि कि लॉ और पॉलिटिक्स का जो एक इंटरफेरेंस है वो बहुत सॉलिड है। ठीक है? लेकिन बट वी विल डिस्कस दैट इन जजमेंट कॉन्टेक्स्ट। दूसरी चीज जो शायद हमसे मिस हो गई वो लॉ और मोरालिटी का कॉन्टेक्स्ट है। है ना? देखिए लेट अस गो बैक टू द डिस्कशन। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लॉ के एक्चुअली तीन सोर्स माने गए हैं। ठीक है? थ्री टाइप्स ऑफ लॉज़ माने गए हैं। जिसको आप अगर यह कहें कि ह्यूगोग्रोशस जो वेस्टर्न लीगल ट्रेडिशन में बड़ा नाम है। इंटरनेशनल लॉ में उसको फादर ऑफ इंटरनेशनल लॉ भी मानते हैं। ठीक है? अ अ कुछ ट्रेडिशन में ही वास अ डच लॉयर है ना तो हगो ग्रोशस ने लॉ को डिवाइड किया तीन में थ्री टाइप्स ऑफ लॉज़ [नाक से की जाने वाली आवाज़] वन इज पॉजिटिव लॉ द सेकंड इज़ नेचुरल लॉ एंड द थर्ड इज़ डिवाइन लॉ। ये तीन टाइप्स ऑफ लॉज़ हैं। डिवाइन लॉ कौन सा जो स्क्रिप्चर में है। कुरान है, वेदाज़ है, बाइबल है, ओल्ड टेस्टमेंट, न्यू टेस्टमेंट जो बाकायदा लॉ है वो डिवाइन लॉ है। नेचुरल लॉ कौन सा लॉ है? नेचुरल लॉ वो लॉ है जो स्क्रिप्चर में नहीं है बट ह्यूमन नेचर का पार्ट है। जैसे हमने बात की थी कि मर्डर जो है अब्सोलुटली कि मर्डर रॉन्ग है। ठीक है? प्रॉपर्टी किसी की स्नैच करना गलत है। दैट्स द सेकंड एंड द थर्ड इज द लॉ दैट ह्यूमन बीइंग्स क्रिएट जहां पे आप पार्लियामेंट के थ्रू इंस्टीटश को रख के काम करते हैं आप। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन जब आप स्टेट को क्रिएट करते हैं। अच्छा एक चीज और मैं यू नो क्लियर करता चलूं कि स्टेट का जो कांसेप्ट है कॉन्स्टिट्यूशन का मतलब क्या है? कंसेप्चुअली कॉन्स्टिट्यूशन क्या चीज है? कॉनस्ट्टिट्यूशन एक ऐसा डॉक्यूमेंट है जो स्टेट को कॉन्स्टिट्यूट करता है। इसीलिए उसको कॉन्स्टिट्यूशन कहा जाता है। है ना? इसका मतलब कॉन्स्टिट्यूशन से पहले कोई स्टेट होता नहीं है। हो सकता है स्टेट ऑफ अ डिफरेंट टाइप हो। लेकिन जब कॉन्स्टिट्यूशन बना तो उसने एक पर्टिकुलर टाइप का स्टेट क्रिएट किया। ठीक है? तो वो जो आपने कॉन्स्टिट्यूशन का पर्टिकुलर टाइप ऑफ स्टेट क्रिएट किया उसमें आपने एक पर्टिकुलर टाइप ऑफ अथॉरिटी क्रिएट की और उस अथॉरिटी में पर्टिकुलर टाइप ऑफ वैलिडिटी विद इन लॉ क्रिएट की। ठीक है? जैसे आपको अगर याद होगा कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो 2011 का अरब स्प्रिंग था जी उसके बाद मिडिल ईस्टर्न स्टेट्स में कई जगह गवर्नमेंट गिर गई। जी रेवोल्यूशन आया। ठीक है? इजिप्ट में रेवोल्यूशन आया और मुस्लिम ब्रदरहुड रूल किया। वो गवर्नमेंट बनाई उसने। मोहम्मद अल मुर्शी हेड ऑफ द स्टेट बने। ठीक है? और उस उस इंसान के अंडर में नया कॉन्स्टिट्यूशन ड्राफ्ट हुआ। ठीक है? एंड आई स्टिल रिमेंबर कि किसी प्रोफेसर ने एक आर्टिकल लिखा था फैंटास्टिक यू नो टॉपिक। उसने कहा यह जो नया मुस्लिम कॉन्स्टिट्यूशन बनेगा बिकॉज़ इट्स अ मुस्लिम मेजॉरिटी स्टेट ये मुस्लिम कॉन्स्टिट्यूशन बनेगा इसमें शरीयत जिसको आप कहते हैं इस्लामिक लॉ विल इट बी वन ऑफ दी सोर्सेस ऑफ लॉ और विल इट बी दी ओनली सोर्स ऑफ लॉ? ये एक डिबेट है। ठीक है? इफ इट इज़ वन ऑफ दी सोर्सेस ऑफ़ लॉ, तो फिर पर्सनल लॉ के टाइप से देख लीजिए आप। बट इफ इट इज दी ओनली सोर्स ऑफ लॉ देन इवन कॉन्स्टिट्यूशन कैन बी चैलेंज्ड इफ इट इज़ वायलेटिव ऑफ द शशरिया कॉन्स्टिट्यूशनल अमेंडमेंट भी अगर आप करेंगे ना अगर वो वायलेटिव ऑफ़ शरिया है कैन बी चैलेंज दैट कैन बी चैलेंज्ड जैसे पाकिस्तान में है। पार्लियामेंट कोई लॉ नहीं बना सकता जो कॉन्स्टिट्यूशन को वायलेट करे और शरीयत को वायलेट करे। इसलिए फेडरल शरीयत कोर्ट है। [हंसी] सुप्रीम कोर्ट कॉन्स्टिट्यूशन देख रहा है। फेडरल शरीयत कोर्ट शरीयत के लेवल पे देख रही है। ठीक है? तो अब व्हाट आई एम टॉकिंग अबाउट व्हाट आई एम ट्राइंग टू हाईलाइट हियर इज़ कि आपने ये तो बता दिया कि लॉ पॉजिटिव होगा। लेकिन अब सवाल यह है कि डिवाइन लॉ और नेचुरल लॉ को कैसे अकोमोडेट करेंगे इसमें आप? ठीक है? वो बहुत बड़ा सवाल है। या तो आप ये कहिए कि हमको रिलजन से कोई मतलब नहीं। ठीक है? तो रिलजन से कोई मतलब नहीं तो भी पॉपुलेशन को तो रिलजन से मतलब है ना। [हंसी] डेमोक्रेसी है, रिप्रेजेंटेशन है, पॉलिटिक्स है। ऊपर से नहीं आएगा तो नीचे से पहुंच जाएगा वहां। ठीक है? तो उसको आपको होल्ड करना पड़ेगा और नेचुरल लॉ जो है आप अगर डिवाइन लॉ को इतना एग्जामेंस नहीं देंगे तो नेचुरल लॉ को देनी पड़ेगी क्योंकि मोरालिटी आपके ऊपर कहां से आएगी? अब मोरालिटी क्या है? बहुत सिंपल सी बात है भाई मोरालिटी का एक एग्जांपल यह हो सकता है कि साहब स्टेट को कभी ऐसा लॉ नहीं बनाना चाहिए जो सिटीजंस के इंटरेस्ट के खिलाफ हो। ठीक है? ये बहुत ही एब्स्ट्रैक्ट चीज है ये। सिटीजन के इंटरेस्ट के क्या खिलाफ है? क्या नहीं है। ठीक है? या फिर स्टेट को ऐसा लॉ नहीं बनाना चाहिए जो एनवायरमेंट को डैमेज करे। यह भी अपने आप में एब्स्ट्रैक्ट है। तो अब आप इसको कंक्रीटाइज कैसे करेंगे? तो उसको कंक्रीटाइज करने का एक बहुत फंडामेंटल प्रिंसिपल जो निकाला गया है कॉन्स्टिट्यूशन डेमोक्रेसी में उसको कहते हैं कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी। ठीक है? कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी एक कॉम्बिनेशन है पॉजिटिव लॉ का और मोरल लॉ का। ठीक है? अब क्योंकि आपको मोरालिटी को इधर-उधर नहीं करना कि साहब हमको प्रीस्ट भी आकर समझा रहा है। कोई जिसको कहते हैं बहुत रिस्पेक्टेड इंसान भी आकर समझा रहा है कोर्ट को ये करना चाहिए। ये गलत है वो गलत है। और क्योंकि कंट्री कॉन्स्टिट्यूशन के हिसाब से चल रहा है। तो मोरालिटी भी कॉन्स्टिट्यूशन के थ्रू होगी। है ना? और पॉजिटिव लॉ का नेचर क्या है? हम डिस्कस कर चुके हैं। वन सिंगल अंडरस्टैंडिंग ऑफ लॉ। ठीक है? तो अब जो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी जो आप निकालेंगे वो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी फिर अब बात करेगी इंस्टीटशंस की देन इट बिकम्स मोर कंक्रीटाइज्ड सुप्रीम कोर्ट को क्या नहीं करना चाहिए पार्लियामेंट को क्या नहीं करना चाहिए पार्लियामेंट को जजेस को डिक्टेट नहीं करना चाहिए दैट इज अगेंस्ट कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी जजेस यह ना बताएं कि इस पे लॉ लॉ बनाना है। ठीक है? यह हम डिसाइड करेंगे किस पे लॉ बनाना है। इट इज द मोरल ऑब्लिगेशन ऑफ द जुडिशरी टू प्रोटेक्ट द फंडामेंटल राइट्स ऑफ पीपल। वो कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी का एलिमेंट आ गया। भाई तीन ऑर्गन्स ऑफ स्टेट हैं। पार्लियामेंट, लेजिस्लेचर सॉरी लेजिस्लेचर, एग्जीक्यूटिव, जुडिशरी ये तीनों का बैलेंस होना चाहिए। ठीक है? इस चीज को मेंटेन करना जिसको जुडिशियल रेस्ट्रेंट कहते हैं आप कई बार कि साहब अपने आप को दूर रखिए इन चीजों से। जजेस को बहुत ज्यादा मीडिया में नहीं जाना चाहिए। दैट इज अगेंस्ट कॉन्स्टिट्यूशनल एथिक्स। ठीक है? पब्लिक फिगर नहीं होना चाहिए। तो ये सारी चीजें वहां से निकल के आती हैं। है ना? तो वो जो आपका एलिमेंट है ना कि मोरालिटी एथिक्स ये चीजें कहां से आ रही हैं विद इन अ कॉन्स्टिट्यूशनल फ्रेमवर्क टॉप डाउन जिसको आप कहते हैं टॉप डाउन वो कॉन्स्टिट्यूशन के थ्रू आती है। लेकिन बॉटम अप जो है जो नीचे से वो पॉलिटिक्स के थ्रू आती है। ठीक है? जैसे मैं आपको एक एग्जांपल देता हूं। निर्भया केस निर्भया केस की वजह से वो इतना प्रेशर बना कि आपको अपने क्रिमिनल लॉ को चेंज करना पड़ा। यह मोरालिटी या यह जो न्यूनेस है यह नीचे से आ रही है। इसको आप अगर बहुत एक्सट्रीम में कर दें तो रेवोल्यूशन है जहां पर तख्ता पलट हो जाता है। जैसे ईरानियन रेवोल्यूशन हुआ था जब तख्ता पलट हो जाएगा तो मोरालिटी का नेचर भी चेंज हो जाएगा। पब्लिक मोरालिटी चेंज हो जाएगी। है ना? कॉन्स्टिट्यूशनल मोरालिटी 100% ऑोजिट हो सकती है। ईरान में हिजाब आ गया। है ना? बट दैट इज अ बॉटम ऑफ अप्रोच। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये ये इस तरीके से काम करता है। तो आपने जैसे बात करी कि निर्भया क्रेप के टाइम जिस तरह का पॉलिटिकल प्रेशर बना और पॉलिटिक्स उसके अराउंड हुई। आम आदमी पार्टी बहुत स्ट्रेंथन हुई मूवमेंट के थ्रू। वहां पे आके अमेंडमेंट कर दिया गया क्रिमिनल लॉ में और नए अमेंडेड लॉज़ आ गए। जहां पे पनिशमेंट ज्यादा था। जहां पे और भी बहुत सारे चेंजेस थे। रेप का डेफिनेशन चेंज किया गया था। तो क्या आपको लगता है कि ऐसे पॉलिटिकल प्रेशर के बीच में रिएक्शनरी होकर लॉज़ को बनाना सही होता है? इज इट एज अ एज अ स्टूडेंट ऑफ़ लॉ? डू यू थिंक दैट लॉ मेकर शुड एक्चुअली पे हीट टू दी प्रेशर्स एंड क्रिएट लॉ इन दोज़ सरकमस्ट्ससेस और इट इज मोर ऑफ डिमांड ऑफ़ द टाइम कि वक्त आ चुका है कि अब ऐसे लॉज़ बन जाए जहां पे पॉलिटिकल प्रेशर है तो टाइम को भी डिफाइन करता है वो पॉलिटिकल प्रेशर। इसमें वह चीज़ एक जो हमारी छूट गई आई विल कनेक्ट विद दिस क्वेश्चन आल्सो जो आपने कहा था पॉलिटिकल मोरालिटी और जो लीगल एथिक्स है लीगल एलिमेंट है कई बार जो है जजमेंट्स जो हैं वो [नाक से की जाने वाली आवाज़] सिर्फ डिस्प्यूट को सेटल नहीं करते वो डिस्प्यूट को इस तरीके से सेटल करते हैं कि बैलेंस मेंटेन हो जो हमारे यहां बड़ा बहुत फेमस कहावत है जरूर में जस्टिस शुड नॉट ओनली बी डन इट शुड बी सीन टू बी डन है ना व्हिच मींस जस्टिस आल्सो हैज़ द एलिमेंट ऑफ़ परसेप्शन परसेप्शन बहुत इंपॉर्टेंट है जस्टिस में ठीक है [नाक से की जाने वाली आवाज़] लोगों को लगना चाहिए कि जस्टिस हुआ है कि जस्टिस हुआ है। तो इसका मतलब यह है कि कोर्ट के पास जो केस गया है वह दो पार्टी के बीच में गया है। आप अगर यह समझे कि मैंने डिस्प्यूट सेटल कर दिया तुम्हारा ये तुम्हारा यह है वो जस्टिस हो गया वो नहीं है जस्टिस [गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि उसके सेटलमेंट से एक मैसेज और जानना चाहिए कि देखिए साहब इसको कहते हैं सेटलमेंट और ऐसे होता है। है ना? तो यह जो फिलॉसफी है इसी फिलॉसफी पर प्रेसिडेंट का प्रिंसिपल काम करता है। क्योंकि पहले हमने ऐसा किया था यह सही है। पहले कोर्ट्स ने ऐसा कहा था। हम अब भी वही मानेंगे जिसको डॉक्टिन ऑफ प्रेसिडेंट कहते हैं। स्टेरेडिसाइसेस प्रिंसिपल जो हम पढ़ते हैं क्लास में। तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये वो चीज है। ठीक है? तो ये इतना फंडामेंटल चीज है कि व्हाट इज सीन टू बी डन? यह इतनी फंडामेंटल चीज है क्योंकि इसमें परसेप्शन है और परसेप्शन का मतलब होता है पब्लिक मूड। तो इसका मतलब यह है कि जस्टिस इज नॉट ओनली द प्रोडक्ट ऑफ जुडिशियल एप्रिसिएशन। इट इज आल्सो द प्रोडक्ट ऑफ पब्लिक मूड इन मेनी इंस्टेंसेस। ठीक है? लेकिन ये बड़ा कंटेस्टेड चीज है। क्यों? क्योंकि इसका बड़ा इंटरेस्टिंग एग्जांपल अफजल गुरु केस जिसके बारे में कोर्ट ने लूजली जो याद मुझे आ रहा है [गला साफ़ करने की आवाज़] कोर्ट ने ये कहा कि भाई टू सेटिस्फाई द कंसाइंस ऑफ द पीपल नेशन के या पीपल के कंसाइंस को सेटिस्फाई करने के लिए जजमेंट नहीं दिया जाता। जजमेंट उसकी मेरिट पे होता है। ठीक है? तो क्या आप परसेप्शन को कितना खींच सकते हैं आगे? क्या आप परसेप्शन को इतना खींच देंगे कि कंसाइंस तक ले जाए और जो डिस्प्यूट उसकी बेसिस पर ना करें। द सेम हैपेंड विथ द एवरीथिंग जजमेंट [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप क्यों डिसीजन ऐसा दे रहे हैं? बिकॉज़ यू थिंक दैट इट सेटिस्फाई दी बिलीफ ऑफ अ पर्टिकुलर सेक्शन ऑफ सोसाइटी। ठीक है? यह वहां पर कंटेस्टेड हो जाता है। क्यों? क्योंकि बिलीफ डिसाइड करेगा या टाइटल डिसाइड करेगा। ठीक है? और पूरे जजमेंट में आप कह रहे हैं कि टाइटल डिस्प्यूट है ये। तो अगर ये टाइटल डिस्प्यूट है तो उसमें बिलीफ कहां से आ गया? ठीक है? और अगर बिलीफ की आप बात करते हैं तो बिलीफ जो है उसको आप एस्टैब्लिश कैसे करेंगे? ठीक है? अब जैसे फॉर एग्जांपल किसी की कोई प्रॉपर्टी है। है ना? प्रॉपर्टी का टाइटल किसके पास? किसकी प्रॉपर्टी है? उसके दो ही तरीके हैं। जो बहुत पुराना मतलब आप ये समझिए हजारों साल पुराना प्रिंसिपल है ये। एक्चुअली ये ये बेसिस है कॉमन लॉ का जिसको कॉमन लॉ ऑफ़ इंग्लैंड कहते हैं। उसका बेसिस है प्रॉपर्टी लॉ में। [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप कैसे कहेंगे कि यह प्रॉपर्टी मेरी या तुम्हारी दो ही तरीके हैं। या तो मैं आपको डॉक्यूमेंट दिखाऊं कि साहब यह परचेस डीड है, सेल डीड है, ट्रांसफर है, गिफ्ट है, ग्रांट है जो कहिए कि स्टेट ने मुझे दे दिया था या मैंने अपने भाई से खरीदा है या जिसको कहते हैं मेरे अब्बा का इंतकाल हो गया है तो मुझे इन्हहेरिटेंस में मिला। पेपर टाइटल की जो डीड है उसकी बेसिस पर डिसाइड होता है किसकी जमीन है या फिर जो पज़ेस कर रहा है उसको जो वहां पे रह रहा है जो वहां पर रह रहा है एक पर्टिकुलर पीरियड ऑफ़ टाइम तक उसके बेसिस पे इन दोनों ही चीजों में जमीन की खुदाई नहीं की जाती। ठीक है? क्योंकि वो क्राइटेरिया ही नहीं है। वो क्राइटेरिया नहीं है। क्राइटेरिया या तो डीड है या पजेशन है। जो हाई इलाहाबाद हाईको ने जो कहा था कि भ खुदाई कर दो। ये ये एक्चुअली टाइटल डिसाइड ही नहीं करता खुदाई। है ना? तो अब आपने वो किया और उसको आपने फिर कन्वर्ट किया पजेशन में। जिसको कहते हैं जुडिशियल मैनपुलेशन आप जुडिशियल आर्टिकुलेशन कह मैनपुलेशन जुडिशियल आर्टिकुलेशन है वो एक इस तरीके का कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] आप विद इन बिकॉज़ यू हैव द फाइनल अथॉरिटी टू से कि दैट दिस इज़ व्हाट लॉ इज़ यू आर रीडिंग थिंग्स इन अ वेरी डिफरेंट फैशन है ना तो ये जो एलिमेंट है आपका [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये दिस इज़ दिस इज़ लाइक यू नो दिस इज़ दिस इज़ हाउ इंटरप्रिटेशन ऑफ़ लॉ वर्क्स। है ना? दिस इज़ हाउ यू इंटरप्रेट इट। दिस इज़ हाउ यू रीड इट। तो ये ये वाली सब्जेक्टिविटी वहां पे है। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसमें आपको बहुत क्लेरिटी कई बार मिलेगी। कई बार नहीं मिलेगी। कई बार कोर्ट्स उसको घुमा के करते हैं बिकॉज़ दे हैव द अथॉरिटी। सो इट इट वर्क्स लाइक दैट। समटाइ्स इट वर्क्स बेस्ड ऑन द मूड ऑफ पीपल। है ना? क्यों मूड के हिसाब से क्यों हो रहा है? क्योंकि [नाक से की जाने वाली आवाज़] एट द एंड ऑफ द डे इट इज डेमोक्रेसी। तो डेमोक्रेसी में एक बहुत इंटरेस्टिंग डिबेट है एक्चुअली पीपल हु आर इंटरेस्टेड दे शुड वॉच इट। छोटी सी 15 20 मिनट की। एक्चुअली डिबेट नहीं है वो एक कन्वर्सेशन है [नाक से की जाने वाली आवाज़] इन द कॉन्टेक्स्ट ऑफ इस्लामिक कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म बिटवीन टू प्रोफेसर्स देयर वाज़ अ प्रोफेसर इन इन एमरी लॉ स्कूल ह नेम वाज़ अब्दुल्लाही अहमद नईम वाज़ अ सूडानीज़ प्रोफेसर इन यूएस एमरी लॉ स्कूल ही इज़ नाउ रिटायर्ड एंड द अदर वाज़ तारिक रमदान फ्रॉम यूनिवर्सिटी ऑफ़ ऑक्सफोर्ड है ना इन दोनों का आपस का कन्वर्सेशन है। अब्दुल्लाह अहमद नईम का कहना है कि साहब कॉन्स्टिट्यूशन सेकुलर ही होना चाहिए। ठीक है? ओनली अ सेकुलर कॉन्स्टिट्यूशन कैन बी कॉल्ड एज अ कॉन्स्टिट्यूशन। इट इज़ नॉट पॉसिबल अदरवाइज। चाहे कंट्री इस्लामिक हो, चाहे ना कॉन्स्टिट्यूशन सेुलर होना चाहिए। तारिक रमजान का कहना है आई अंडरस्टैंड। बट यू टेल मी इफ द मेजॉरिटी इज मुस्लिम एंड इफ इट वांट्स अ कॉन्स्टिट्यूशन व्हिच हैज़ द एलिमेंट ऑफ रिलजन हाउ वुड यू स्टॉप इट बिकॉज़ इट्स अ कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी तो टॉप डाउन टॉप बॉटम टॉप अप्रोच है। ठीक है? यह एक बड़ा एलिमेंट है। एंड आई विल जस्ट टेक इट अ लिटिल फदर एंड देन आई विल स्टॉप ऑन दिस क्वेश्चन। [नाक से की जाने वाली आवाज़] यह क्वेश्चन इंडिया में ये आर्गुमेंट इंडिया में लोग दे सकते हैं कि साहब हिंदू मेजॉरिटी कंट्री है। तो हिंदू कॉन्स्टिट्यूशन हो सकता है। जी। ठीक है। बट देन द आर्गुमेंट टू काउंटर दैट इज़ नो इट कैन नॉट बी। व्हाई? बिकॉज़ यू ऑलरेडी हैव अ कॉन्स्टिट्यूशन। हिंदू कॉन्सिट्यूशन। एंड दैट इज़ नॉट अ हिंदू कॉन्सिट्यूशन। दैट इज़ ऑलरेडी एग्रीड अपॉन। ठीक है? इफ यू आस्क मी कि ये इसको कैसे करेंगे चेंज? विद इन द लीगल प्रोसेस, विद इन द डेमोक्रेटिक प्रोसेस, विद इन दी यू नो डिस्कशन दी ओनली ऑप्शन दैट पीपल से। द ओनली ऑप्शन दैट लीगल स्कॉलर्स टॉक अबाउट इज़ रेवोल्यूशन एंड नथिंग एल्स। यू कैन नॉट रिप्लेस अ कॉन्स्टिट्यूशन अनलेस एंड अंटिल देयर इज़ अ रेवोल्यूशन। ठीक है? देयर इज अनदर वे एंड दैट इज डाइल्यूशन ऑफ द कॉन्स्टिट्यूशन बट देन द डाइल्यूशन कैन ओनली हैपन इफ द जुडिशरी अलाउस इट यस बिकॉज़ इट इज़ द जुडिशरी व्हिच टेल्स यू व्हाट लॉ इज़। सो इफ इट अलाउस यू द डाइल्यूशन इट गेट्स डाइलटेड। राइट तो निजाम साहब आजकल सुप्रीम कोर्ट पे बहुत सारी बात चल रही है। स्पेशली अभी उमर खालिद और शजील इमाम के जो बेल आर्डर आए हैं जहां पे पांच लोगों को बेल दिया गया है। दो लोगों को बेल नहीं दिया गया है। उस हवाले से सुप्रीम कोर्ट पे बहुत सारे डिबेट्स चल रहे हैं। बहुत सारे बहस चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के फंक्शनिंग पे किस तरह से फंक्शन करती है सुप्रीम कोर्ट? उनके क्या अपने बायसेस होते हैं जजेस के वहां पे? तो आपको क्या लगता है सुप्रीम कोर्ट हालांकि दोनों तरफ के लोग दोनों तरह की बातें करते हैं। एक तरफ मेजॉरिटी कम्युनिटी के कुछ थिंकर्स हैं जो बोलते हैं कि सुप्रीम कोर्ट एसेंशियली एक एंटी मेजॉरिटी इंस्टिट्यूशन है और बहुत सारे लोग कहते हैं कि वो मेजॉरिटेरियज को पेंडर करती है आज की डेट में। और ये भी कहा जाता है कि एक मेडिएटर ऑफ़ पावर है वो। पावर को मेडिएट करती है। और पॉलिटिकल कॉन्शसनेस का भी एक्सटेंशन है वो। तो आप कैसे असेस करते हैं सुप्रीम कोर्ट के रोल को इन डिबेट्स के बीच में और इन डिबेट्स के हवाले से इट्स ऑल ऑफ इट ओके इट इज ऑल ऑफ इट एट द सेम टाइम लेट मी गिव यू दी एग्जांपल देखिए कोर्ट में आप एक जो चीज हम क्लास में मैं पर्सनली खुद जो क्लास में स्टूडेंट्स को पढ़ाता था जब मैं लॉ की क्लास में पढ़ाता था स्टूडेंट्स को। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो मैं उनको बहुत क्लियरली ये वाज़ करता था। देखिए साहब आप आपको हम एलएलबी की जो डिग्री दे रहे हैं बीए एलएलबी, बी बीए एलएबल, बीएससी एलएलबी व्हाटएवर यू से और प्योर एलएलबी जो भी है। यह डिग्री आपको दी जाती है। इसको डिग्री को लेने के बाद आप बनते हैं लॉयर। ठीक है? आप अगर रजिस्टर करते हैं प्रैक्टिस करने के लिए तो आप बनते हैं एडवोकेट। ठीक है? बट एज समवन विद एमबीबीएस इज अ डॉक्टर, समवन विद एन एलएलबी इज अ लॉयर। ठीक है? सिंपल एज दैट। अब सवाल ये लॉयर करता क्या है? द प्राइमरी फंक्शन ऑफ अ लॉयर इज वन ऑफ द कोर फंक्शनंस ऑफ अ लॉयर इज टू आर्ग्यू। अ लॉयर आर्ग्यूस ठीक है आई एम अ लॉयर आई डोंट प्रैक्टिस बट आई आर्ग्यू ऑन पेपर ठीक है कम हैव हां जो एडवोकेट है वो कोर्ट में आर्ग्यू कर रहा है ठीक है सो वी आर डूइंग दी आर्गुमेंटेशन व्हाट डस दैट मीन लॉ इज फंडामेंटली लिंक्ड टू आर्गुमेंटेशन ठीक है व्हिच एसेंशियली मींस इफ देयर इज़ अ डेमोक्रेसी एंड देयर इज़ अ पब्लिक स्पेस जहां पे लोग एग्ज़िस्ट करते हैं एक दूसरे से मिंगल करते हैं। लॉ विल एक्सिस्ट एज़ एन आर्गुमेंट। ठीक है? पीपल विल आर्ग्यूड ऑन डिफरेंट पॉइंट्स। लॉ विल एक्सिस्ट एस एन आर्गुमेंट इन अ डेमोक्रेसी। है ना? अब वो आर्गुमेंट किस फॉर्म में होगा? जनरली आर्गुमेंट बाइनरी फॉर्म में होता है। जैसे उमर खालिद इज द कल्पेट। उमर खालिद इज इनोसेंट। जनरली आर्गुमेंट बाइनरी में होते हैं। तो आपको दोनों आर्गुमेंट मिलेंगे। ठीक है? वो आपको डेमोक्रेसी में पब्लिक लेवल पर मिलेंगे। वो आपको कोर्ट में भी मिलेगा। जो आर्गुमेंट हो रहा है कोर्ट के सामने। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] और यह जो आर्गुममेंट होंगे यह एट द सेम टाइम पॉलिटिकल भी होंगे क्योंकि लॉ को फोर्स देती है डेमोक्रेसी में पॉलिटिक्स और पॉलिटिक्स को फोर्स देता है डेमोक्रेसी में लॉ लॉ को पॉलिटिक्स के थ्रू पुश किया जाता है। और पॉलिटिक्स को लॉ के थ्रू वैलिडेट किया जाता है। ठीक है? डिमोलिशन हो रहा है। पॉलिटिक्स है वो। वैलिडेशन कैसे है? लॉ के थ्रू वैलिडेशन है। तो पॉलिटिक्स और लॉ इस तरीके से काम करती है और दोनों का आर्गुम और दोनों का नेचर आर्गुमेंटेटिव है। है ना? अब वो जब आर्गुमेंट कोर्ट में पहुंचते हैं तो अब कोर्ट में वो आर्गुमेंट जो हैं वो पॉलिटिकल कंसीडरेशंस के भी हो जाते हैं आर्गुमेंट। है ना? वही आर्गुमेंट आइडियोलॉजी बेस्ड भी हो जाते हैं। क्यों? बिकॉज़ उमर खालिद इज़ लेफ्ट। तो उमर खालिद को का पूरा जो डिफेंस होगा वो लेफ्ट आर्गुमेंट के थ्रू होगा। ठीक है? एंड बिकॉज़ उमर खालिद इज अगेंस्ट द स्टेट। ऑल दी आर्गुममेंट्स अगेंस्ट उमर खालिद विल बी द राइट आर्गुमेंट्स। है ना? अब ऐसा नहीं कि इसके बीच में लोग नहीं लेते पोजीशन। पीपल टेक पोजीशंस इन बिटवीन बट देन दे टेक अ डिफरेंट ग्राउंड। फॉर एग्जांपल आप यह कहिए कि साहब कांग्रेस जो है वह तो ना राइट है ना लेफ्ट है। तो कांग्रेस का क्या आर्गुमेंट होगा? देन कांग्रेस विल टेक एन आर्गुमेंट बेस्ड ऑन कॉन्स्टिट्यूशन [गला साफ़ करने की आवाज़] कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म, ह्यूमन डिग्निटी, इंकार्सरेशन, क्रिमिनल टारगेटिंग वो ग्राउंड दूसरा हो जाएगा। राइट? प्रोबेबबली इट्स अ क्रिमिनल लॉ आर्गुमेंट। कोई जो है वो उसको मोरल आर्गुममेंट बना देगा। आप उमर खालिद या शजील इमाम की मां से पूछेंगे या बाप से या दोस्तों से तो वो मोरल आर्गुमेंट बन जाएगा। जी। ठीक है। कभी कई कई बार वो आइडेंटिटी का आर्गुमेंट बन जाएगा इन केस ऑफ़ शर्जुल इमाम। ठीक है? कि साहब वो मुसलमान है इसलिए टारगेटिंग हो रही है। तो यू विल हैव ऑल सॉर्ट्स ऑफ़ आर्गुमेंट्स इन द पब्लिक स्पेस। ठीक है? एंड नन ऑफ देम इज वैलिड। व्हाई? बिकॉज़ अ वैलिड आर्गुमेंट इज़ ओनली द आर्गुमेंट दैट इज एक्सेप्टेड बाय द कोर्ट। वैलिडिटी [नाक से की जाने वाली आवाज़] कम्स फ्रॉम द लॉ एंड लॉ इज़ व्हाट द कोर्ट्स टेल यू व्हाट लॉ इज। तो ये सब घूमते रहेंगे। दैट्स हाउ इट हैपेंस। सो माय नेक्स्ट क्वेश्चन अगेन इस अगेन फ्रॉम आई मीन सुप्रीम कोर्ट के हवाले से ही है और ये है कि इंटरिम ऑर्डर्स पे जो ओवर रिलायंस है आज की डेट में इंटरिम ऑर्डर्स सील्ड कवर पे जो ओवर रिलायंस है जैसा कि हम इस अभी हमने उमर खालिद के केस की बात की उसप भी हम देख रहे हैं कि प्रोटेक्टेड विटनेस पे और विटनेसेस की प्रोटेक्शन को बहुत ज्यादा ध्यान में दिया जा रहा है। उनको कह रहे हैं कि पर्दे के पीछे से वो अपने बयान को देंगे। तो सील्ड कवर के हवाले से भी जो बात जो बात हो रही है आज की डेट में उसप ओवर अलायंस जो है वो क्या एक जुडिशरी के सुप्रीम कोर्ट के चेंजिंग नेचर को डिपेक्ट कराता है और हैज़ इट ऑलवेज बीन लाइक दिस सी आई वुड नॉट से कि देयर इज़ अ चेंज आई वुड नॉट से देयर इज़ अ चेंज क्योंकि अगेन गोइंग बैक टू द सेम थिंग कि कोर्ट में लॉ होता है लॉ पॉलिट पिटिक्स से टाइड होता है। कोर्ट की अपनी पॉलिटिक्स होती है। ठीक है? और कोर्ट बहुत क्लोजली लिंक्ड होता है एग्जीक्यूटिव से। बहुत क्लोजली लिंक्ड होता है। वो इतना क्लोजली लिंक्ड होता है कि अपॉइंटमेंट ऑफ़ जजेस इज़ अ कंटेस्टेड इशू। ठीक है? जनरली स्पीकिंग इफ यू लुक एट द हिस्ट्री जनरली स्पीकिंग जो मेथड है अपॉइंटमेंट ऑफ जजेस का वो एक्चुअली थ्रू एग्जीक्यूटिव है। इट हैज़ ऑलवेज बीन द केस। ठीक है? इंडिया में जुडिशरी ने अपने को सिक्योर किया कि हम अपॉइंट करेंगे। ठीक है? उसकी एक बहुत बड़ी वजह यह है कि इंडियन जुडिशरी को यह लगा कि साहब हमारा इंस्टीट्यूशन खत्म हो जाएगा। क्योंकि हमारे यहां एग्जीक्यूटिव का जो नेचर है वो बड़ा इंटरवीनिंग नेचर है। यह बड़ा आईडियोलॉजिकल नेचर है। हमारा एक्सिस्टेंस खत्म हो जाएगा। वी नीड टू असर्ट आवरसेल्व्स। वी नीड टू जिसको कहते हैं ना कि वी नीड टू प्रोटेक्ट आवर आइडेंटिटी, डिग्निटी, इंडिपेंडेंस। तो उन्होंने कहा नहीं साहब जजेस अपॉइंट करेंगे। उसका अपना क्रिटिसिज्म है। ठीक है? जुडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन बिल आया उसको उठाकर फेंक दिया कि नहीं साहब कुछ नहीं फालतू की चीज है ये। तो ये एक बड़ा इनहेरेंटली टाइड चीज है। ठीक है? और जनरली क्या होता है [नाक से की जाने वाली आवाज़] कि जो ऑर्गन्स ऑफ द स्टेट हैं जो तीन ऑर्ग्स माने जाते हैं लेजिस्लेचर एग्जीक्यूटिव जुडिशरी इनका आपस में सिमफनी जिसको आप कहते हैं इनका आपस में मेल मिलाप बहुत जरूरी है स्टेट के काम करने में दे ऑल शुड थिंक इन द सेम लाइंस ठीक है तो उसमें क्या होता होता है एक टेट अंडरस्टैंडिंग बनती है। जुडिशरी कहती है वी विल अलऊ द लेजिस्लेचर टू डू एक्सप्रेसली नहीं कहा जाता लेकिन वो टेसिटली अलऊ किया जाता है। ठीक है? कई [नाक से की जाने वाली आवाज़] बार लेजिस्लेचर जुडिशरी की कुछ चीजों को पसंद नहीं करता लेकिन वह अलऊ कर देता है। अरे ठीक है। होने दो। ठीक है? या गवर्नमेंट बहुत सारी चीजों को पसंद नहीं करती लेकिन लेट इट बी। ठीक है? क्यों? क्योंकि वो अपना फ्रिक्शन कम करना चाहता है। क्योंकि जितना फ्रिक्शन होगा उतना फंक्शनिंग में प्रॉब्लम होगी। है ना? [नाक से की जाने वाली आवाज़] अब एग्जांपल देता हूं मैं आपको फ्रिक्शन का। जो प्रेजेंट लॉ मिनिस्टर हैं इनसे पहले लॉ मिनिस्टर थे किरण रिजीजू। इफ यू रिमेंबर किरण रेजी यूज टू क्रिटिसाइज द जुडिशरी ए्री अदर डे जजेस को तो कुछ आता ही नहीं है। जजेस यह करते हैं तो जजेस वो करते हैं और उधर से सुप्रीम कोर्ट का जज चीफ जस्टिस आई आई एक्सक्टली डोंट रिमेंबर कौन था उस वक्त चीफ जस्टिस तो व्हाट व्हाट ही यूज्ड टू से ही यूज्ड टू गिव इट बैक टू हिम्म गवर्नमेंट शुड नॉट इंटरफेयर वी हैव अ रोल टू प्ले अब ये कौन सी सिचुएशन है यह सिचुएशन है फ्रिक्शन [नाक से की जाने वाली आवाज़] की सिचुएशन यह एक ऐसी सिचुएशन है जहां फ्रिक्शन हो रहा है। हर दूसरे दिन जो है वो कह रहे हैं कि साहब ऐसा है जजेस का अपॉइंटमेंट जो है बहुत खराब बात है। जजेस का अपॉइंटमेंट जो है कायदे से होना चाहिए। ठीक है? ये फ्रिक्शन हो रहा है। इस फ्रिक्शन को रिॉल्व कैसे किया? रेजी को हटा के। यू आर रिमूविंग? यू पुट समवन एल्स एस बिलो। ठीक है? भाई इस फ्रिक्शन को खत्म करो। क्योंकि देयर इज़ नथिंग कमिंग आउट ऑफ इट। ठीक है? सिमिलर फ्रिक्शन हैपेंड विद जगदीश धनकड़ व्हेन ही वास द वाइस प्रेसिडेंट ठीक है एंड दिस यूज्ड टू कम फ्रॉम दिस साइड दैट साइड दिस साइड दैट साइड अब क्या वो नहीं हो रहा है ठीक है ना वी डू नॉट नो रीज़ंस फॉर रिजाइनिंग एंड ऑल दोज़ थिंग्स बट ये एक जो बैलेंसिंग एक्ट है ना दे कीप ऑन डूइंग दैट ठीक है जुडिशरी भी अपना बैलेंसिंग करती है नॉट ऑलवेज फ्रॉम द गवर्नमेंट साइड बट आल्सो फ्रॉम अ डिफरेंट सेंस फॉर एग्जांपल स्ट्रे डॉग के केस में चेंज कर दिया जजमेंट ऑर्डर ठीक है अरावली हिल्स में चेंज कर दिया ठीक है कुछ ना कुछ तो वजह होगी ना कुछ ना कुछ तो कंसीडरेशंस होंगे ना ठीक है इट मे बी पॉलिटिकल कंसीडरेशंस इट मे बी मेनी अदर थिंग्स इट मे बी प्रेशर इट मे बी पी पी पी पी पी पी पी पी पी पॉलिटिकल कंसीडरेशन देयर मे बी थाउजेंड्स ऑफ थिंग्स है ना बट यू ट्राई टू कैलिब्रेट योर पोजीशन हमको यह करना है या नहीं करना। अभी इसको रुक जाते हैं। हम इसको अभी करते हैं। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन प्रॉब्लम कब होती है? जब एक दूसरे के फेस टू फेस हो जाते हैं। ठीक है? जैसे जुडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन बिल था। एकदम फेस टू फेस खड़े हो गए आप। जैसे केशव नंदा भारती केस बड़ा फेमस केस है। है ना? फंडामेंटल राइट्स और डायरेक्ट प्रिंसिपल्स ऑफ स्टेट पॉलिसी वाला। जब एकदम फेस टू फेस आप हो जाते हैं तो आप में से कोई ना कोई असर्ट करता है। या जुडिशरी ने एसर्ट कर दिया। एनजीएससी को उठा के फेंक दिया। क्योंकि अब मेरे एक्सिस्टेंस पे बात है। ठीक है? मैंने उठा के फेंक दिया उसको। दैट डस नॉट मीन कि वो दोबारा नहीं आएगा। वो आ सकता है। बट लेट इट बी लाइक दैट। लेट अस ट्राई टू फाइंड अ स्यूशन टू इट है ना तो देयर आर थाउजेंड्स ऑफ कंसीडरेशंस दैट वर्क है ना पॉलिटिक्स विद इन द कोर्ट द रिलेशनशिप बिटवीन जुडिशरी एंड एग्जीक्यूटिव एग्जीक्यूटिव्स वर्क इन द पार्लियामेंट भी पार्लियामेंट में आप देख लीजिए बहुत से ऐसे बिल्स हैं जिस पे बहस भी नहीं हो रही है बट इट डजंट मैटर क्यों क्योंकि बिल के पास होने के लिए वोट चाहिए हमको आप चले जाइए बाहर। हमसे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यों? क्योंकि उतने वोट मिल गए काम हो जाएगा। नाउ दिस इज नॉट हैपनिंग फॉर द फर्स्ट टाइम। दिस हैपेंड ड्यूरिंग कांग्रेस रिजीम आल्सो। ठीक है? कमिंग टू द सील्ड कवर थिंग। ठीक है? सील्ड कवर और ये सारी चीजें। अब यह चीजें जो हैं यह बैलेंसिंग एक्ट का पार्ट है। क्योंकि एविडेंस तो प्रोड्यूस करना है। बट हाउ डू यू मैनेज बैलेंस? बिकॉज़ जुडिशरी हैज़ दी अथॉरिटी टू डिफाइन थिंग्स? यू डू इट इन द सील्ड कवर। ठीक है? समथिंग सिमिलर हैपेंड विद दिस वनरा। है ना? उसमें भी इसी टाइप का इशू है। सील्ड कवर वो एक्चुअली बैलेंसिंग एक्ट है। आप उसको कैसे बैलेंस करेंगे? अब जैसे आप ये वाला केस जो आप बता रहे थे उमर खालिद और शजील इमाम एंड अदर्स है ना मीरान हैदर वाला। अजीब आर्गुमेंट है ये कोर्ट का। अबब्सोलुटली वेरी वेरी मतलब जनरली आर्गुमेंट आपको नहीं मिलेगा। हम एंड दैट्स द रीज़न व्हाई इट्स बीइंग क्रिटिसाइज़ बाय द यू नो बाय द एडवोकेट्स। प्रैक्टिसिंग एडवोकेट्स क्यों क्रिटिसाइज़ कर रहे हैं? आप इसको समझें। आप ये कह रहे हैं कि इनको छोड़ने से विटनेसेस की लाइफ थ्रेटन हो सकती है। यह किस तरह का आर्गुमेंट है? ठीक है? बिकॉज़ यू आर सेइंग वी आर नॉट डिस्कसिंग ऑन मेरिट्स वी डू नॉट नो। वी आर नॉट डिस्कसिंग ऑन कल्पेबिलिटी। आप ये कह नहीं साहब यह अभी क्रिमिनल नहीं है क्योंकि वह डिस्कशन अभी हुआ ही नहीं है। हम वो डिस्कस नहीं कर रहे हैं। एंड देन यू आर सेइंग लेकिन इनको छोड़ने से जो विटनेसेस हैं [गला साफ़ करने की आवाज़] वो उनकी लाइफ थ्रेटन हो सकती है। क्या मतलब है? ये तो फिर इसका मतलब यू हैव अस्यूम कल्पेबिलिटी। ऑफ़ दिस पीपल। यू हैव ऑलरेडी अस्यूम कल्पेबिलिटी ऑफ़ दिस पीपल। ठीक है? तो कहने का मतलब यह है कि आप इसको अगर आपको समझना है तो आप इसको ऐसे समझे [नाक से की जाने वाली आवाज़] कि समवन हु हैज़ द फाइनल अथॉरिटी और जिसके ऊपर कोई नहीं है जिसके ऊपर और जिसका बोलना ही लॉ है वो जो बोलेगा वो लॉ है। तो द कोर्ट हैज़ सेड कि इट विल थ्रेटन द लाइफ ऑफ़ विटनेसेस। एंड देयरफ़ इट इज़ जस्टिफाइड। सो फॉर यू इट इज नॉट इन टर्म्स ऑफ एन आर्गुमेंट इट इज अ बैड आर्गुमेंट इट्स अ रॉन्ग आर्गुमेंट बट दिस इज व्हाट इट इज बिकॉज़ इट इज़ द कोर्ट व्हिच डिसाइड्स। अच्छा आपने ये कहा कि आजकल कोर्ट्स अपने ऑर्डर रिवर्स बहुत कर रिवर्स कर रही है। अरावली के मामले में रिवर्स कर दिया। स्ट्रेन डॉग्स के मामले में रिवर्स कर दिया। तो मैं ये समझ क्योंकि मुझे भी यह पता नहीं है ऑडियंस से पहले शायद मुझे भी ये पता नहीं है कि ये टेक्निकली कितना पॉसिबल है। हाउ इज़ इट टेक्निकली पॉसिबल कि कोर्ट अपने ऑडियो को रिवर्स कर दे विदाउट क्यूरेट विदाउट रिव्यु पिटीशन विदाउट क्यूरेटिव पिटीशन। तो वो कैसे होता है? जो मैंने आपको पहले एक बार चीज हाईलाइट की थी वो ये थी कि जब भी कोई डिस्प्यूट कोर्ट के पास आता है तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] पहली चीज जो कोर्ट डिसाइड करती है वो अपना जुरिसडिक्शन डिसाइड करती है। उसके पास जुरिसडिक्शन है या नहीं। अब सवाल यह है कि उसके पास क्या पैमाना है यह डिसाइड करने का कि उसके पास जुरिसडिक्शन है या नहीं। एंड द आंसर इज देयर इज नो क्राइटेरिया। आपको रीजन जो बनाना है बना लीजिए। ठीक है? जरिसेंशियली स्पीकिंग यू कैन नॉट स्टॉप एनी कोर्ट इन द वर्ल्ड टू टेक कॉग्निजेंस ऑफ एनी मैटर इन द वर्ल्ड डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ऑफ 30 हज़ारी ना डोनल्ड ट्रंप के खिलाफ अरेस्ट वारंट इशू कर सकती है। यह नेचर है कोर्ट का। ठीक है? पहली चीज यह हुआ है। कुछ कंट्रीज में कुछ हेड ऑफ द स्टेट्स के खिलाफ और नीचे की कोर्ट ने निकाल दिया है भाई। इवन यूएस में इफ आई एम नॉट रोंग देयर वाज़ अ केस ऑफ यूनाइटेड स्टेट्स वर्सेस पेन इराला। इफ आई एम नॉट रोंग। इंटरनेशनल लॉ का केस है। टॉर्चर का केस है। टॉर्चर हो कहीं और रहा है। जरिसडिक्शन यूएस की कोर्ट ले रही है कि दिस पर्सन मस्ट बी ट्राइड। प्रॉब्लम क्या है? क्योंकि आप उसको जाके वहां पे पकड़ नहीं सकते। आप पकड़ के पकड़ सकते हैं। पकड़ के लेके आप उसको ट्राई कर दीजिएगा। ठीक है? तो ये एक बड़ा फंडामेंटल आस्पेक्ट है कि जो जुडिशरी का जुरिसडिक्शन है किसी भी जुडिशरी का एंड वी नीड टू अंडरस्टैंड वन मोर थिंग एंड आई थिंक कंसेप्चुअली स्पीकिंग पीपल नीड टू अंडरस्टैंड दिस जो बहुत सारे लॉ ग्रेजुएट्स को भी नहीं मालूम है जो हमारे यहां इस चीज की क्लेरिटी नहीं है अच्छे खासे लोगों को कोर्ट्स में हायरार्की नहीं होती है बाय द वेरी नेचर ऑफ द कोर्ट देयर इज इज़ नो कोर्ट व्हिच इज सुपीरियर और इनफीरियर। एव्री कोर्ट इज 100% फ्री। कहने का मतलब सुप्रीम कोर्ट इज नॉट अबव दी डिस्ट्रिक्ट कोर्ट। जुरिसडिक्शन के सेंस में कह रहा हूं मैं। जी। सुप्रीम कोर्ट भी एमपी के खिलाफ कर सकता है। डिस्ट्रिक्ट कोर्ट भी कर सकता है। बल्कि इंडिया में केस भी हुआ है। वो जो मद्रास हाईकोर्ट का जज था। अगर आपको याद हो द अरेस्ट वारंट वाज इशूड अगेंस्ट सुप्रीम कोर्ट जजेस कैसे वो इसलिए हो रहा है क्योंकि कोई ऊपर नीचे नहीं होताच ऑफ द कोर्ट ठीक है अब सवाल यह है कि ऊपर नीचे कैसे है ये ऊपर नीचे इसलिए है क्योंकि आपके कॉन्स्टिट्यूशन ने उसको ऐसे फ्रेम किया है क्योंकि आपके कॉन्स्टिट्यूशन ने कहा है कि कॉन्स्टिट्यूशनल बेंच ही डिसाइड करेगी कॉन्स्टिट्यूशनल मैटर सुप्रीम कोर्ट एपिलेट कोर्ट है चीजें अपील के थ्रूंगी। तो यह आपकी कॉन्स्टिट्यूशन की उपज है। कोई जरूरी नहीं है कि केसेस जो है वो अपील में हो। कोर्ट जो डिसाइड करेगी वो फाइनल हो सकता है हमेशा के लिए। है ना? तो कमिंग टू योर क्वेश्चन ये कैसे हो रहा है? कि साहब अपना ऑर्डर रिवर्स कर दे रही है। देयर इज नो मेथड। ठीक है? देखिए एक चीज और इंटरेस्टिंग आपको बताऊं। व्हिच व्हिच आई थिंक अगेन लॉ स्टूडेंट्स मस्ट अंडरस्टैंड। [नाक से की जाने वाली आवाज़] हम लोग एक चीज पढ़ते हैं क्लास में बैचलर्स लेवल पे छोटे लेवल पर लीगल मेथड्स पढ़ते हैं बच्चे। एक अलग-अलग मेथड्स हैं लॉ को अंडरस्टैंड करने के। केस लॉ मेथड है। लॉ को का लेटर मेथड है। ठीक है? 1000 चीजें हैं। लैंग्वेज है मेथड। बहुत सारी चीजें हैं। मास्टर्स [नाक से की जाने वाली आवाज़] में आप रिसर्च पढ़ते हैं। रिसर्च मेथोडोलॉजी एक सब्जेक्ट होता है रिसर्च मेथोडोलॉजी। है ना? लॉ में एक सब्जेक्ट होता है लीगल रिसर्च मेथोडोलॉजी। है ना? पीपल नीड टू अंडरस्टैंड कि मेथोडोलॉजी किसी भी साइंस को पढ़ने के लिए तब इंपॉर्टेंट होती है जब इस साइंस को डेवलप करता है प्रोफेसर या एकेडमिक। जैसे हिस्ट्री बिलोंग्स टू हिस्टोरियंस। ठीक है? पॉलिटिकल साइंस बिलोंग्स टू पॉलिटिकल साइंटिस्ट्स। फिजिक्स बिलोंग्स टू फिजिसिस्ट। फिजिक्स को कैसे पढ़ा जाएगा? कौन बताएगा? फिजिसिस्ट मेथड बताएंगे। हिस्टोरियन आपको मेथड बताएगा कि हिस्ट्री को कैसे पढ़ा जाता है। आर्कियोलॉजिस्ट आपको बताएगा कि आर्कियोलॉजी को कैसे पढ़ना है। तो कोई भी डिसिप्लिन को पढ़ने का मेथड होता है तब जब उस डिसिप्लिन को स्कॉलरशिप डिसाइड करे। लेकिन जहां पे अथॉरिटी डिसाइड करे वहां पे मेथड कुछ नहीं होता। जो अथॉरिटी बोलती है वही मेथड होता है। व्हाट दे यस उनका कोई मेथड नहीं होता। वो जो बोलेंगे वो मेथड है। ठीक है? अब क्या है उसमें? उसमें एक एक दो चीज और ऐड कर दूं। व्हाट इज फिर आप ये कहेंगे फिर तो अथॉरिटी कुछ भी कर सकती है। द आर्गुमेंट इज़ यस पोटेंशियली कुछ भी कर सकती है। बट दैट्स नॉट द केस। इट डजंट डू दैट। क्योंकि वैलिडिटी का एलिमेंट है ना। लॉ जो मैंने आपसे पहले कहा था लॉ में साइंटिफिक एलिमेंट है। वैलिडिटी, सर्टेनिटी इसको भी मेंटेन करना है आपको। तो आप क्या करते हैं? पिछले केसेस को देखते हैं प्रेसिडेंट्स को कि पिछले केसेस जो डिसाइड हुए थे उन्हीं केसेस को हम फॉलो करेंगे और उसके हिसाब से काम करेंगे। ठीक है? दैट डज नॉट मीन कि पिछला कोई केस नहीं है तो आप कुछ नहीं कर सकते। अगर कुछ नहीं तो नया तब भी नया कर सकते हैं आप। ठीक है? वो जो आप कह रहे हैं रिवर्स करना। हम बिना रिव्यू बिना क्यूरेटिव के भी मैं कर सकता हूं क्योंकि कहीं नहीं लिखा कि गलत है ये। ठीक है? [हंसी] कहीं नहीं लिखा क्या मेथड है। मैं कर सकता हूं भाई कुछ भी कर सकता हूं टू गो बाय दैट लॉजिक है ना। बट प्रेसिडेंट के सेंस में एक प्रोफेसर हैं शिव प्रसाद स्वामीनाथन जो जिंदल यूनिवर्सिटी में आप शिवनादर यूनिवर्सिटी में डीन है। ही वर्क्स ऑन लॉ ऑफ़ कॉन्ट्रैक्ट स्टडीड फ्रॉम ऑक्सफोर्ड एंड ऑल। ही रोट एन इंटरेस्टिंग आर्टिकल जो आई गॉट टू नो अबाउट इट फ्रॉम वन ऑफ़ माय फ्रेंड्स व्हेन ही मेक्स अ वेरी इंटरेस्टिंग आर्गुमेंट। वेरी वेरीरी इंटरेस्टिंग आर्गुमेंट। ही सेज़ देखिए एक एक अंडरस्टैंडिंग लोगों की यह है कि प्रेसिडेंट की बेसिस पे ये जजमेंट होता है। दैट्स अ रॉन्ग अंडरस्टैंडिंग। कोर्ट्स पहले ही डिसाइड कर लेती है उनको जज क्या करना है। देन दे लुक फॉर प्रेसिडेंट्स। मेथड वाइज दैट्स व्हाट व्हाट हैपेंस। एक्चुअली जुडिसिडेंशियल इज स्पीकिंग जी सर हम पहले भी इसके बारे में बात कर चुके हैं। हालांकि थोड़ा शली पॉलिटिक्स एंड पावर एंड जजमेंट्स के बारे में और क्या रोल प्ले करता है पॉलिटिक्स जजमेंट्स को कैसे इन्फ्लुएंस करता है। नॉट जस्ट जज की पॉलिटिक्स। लेकिन अब हम ये समझने की कोशिश करेंगे कि जिस पॉलिटिकल कंडीशन में हम रह रहे हैं जैसे आज के देश में आज के देश में जिसमें हम हिंदुस्तान में रह रहे हैं जहां एक तरह की मेजोरिटी पॉलिटिक्स चल रही है और चाहे वो कोई और कंट्री हो अगर हिंदुस्तान से बाहर हट के हम देखें तो साउथ एशिया में किसी और कंट्री को उठा ले जो वहां पे जिस तरह की पॉलिटिक्स चल रही है जजमेंट उस पॉलिटिक्स के से कैसे आउट जजमेंट का आउटकम जो होता है उस पॉलिटिक्स से कैसे डिटरमाइन होता है और लगातार हम कह रहे हिंदुस्तान में खास करके जो जजमेंट्स आ रहे हैं वो किसी एक तरह की पॉलिटिक्स को पेंडर करते हुए आ रहे हैं। उस तरह की पॉलिटिक्स को खुश करने की कोशिश की जा रही है हिंदुस्तान में। तो ये कैसे डिटरमाइन करता है जजमेंट्स में कि उस टाइम की पॉलिटिक्स को सूट करे। जस्ट एस आई सेड ना कि आपको इसको पूरी कंप्लीट पिक्चर एक देखना पड़ेगा। कंप्लीट पिक्चर क्या है? इसमें देखिए तीन चार इसमें आप ये मान के चलें कि एलिमेंट्स हैं। ठीक है? कि [गला साफ़ करने की आवाज़] जिनके जिनके कॉम्बिनेशन से या जिनके आपस में इंटरेक्शन से चीजें रिजल्ट निकल रहा है। जैसे फॉर एग्जांपल [नाक से की जाने वाली आवाज़] ग्लोबलाइजेशन ठीक है? ग्लोबलाइजेशन की एक सबसे बड़ी प्रॉब्लम जो थी वो यह थी एक बेनिफिट ग्लोबलाइजेशन का यह था कि भ आप ग्लोबल सिटीजन हैं। आप आप यूएस के बारे में भी सोच सकते हैं। यूएस की इकॉनमी में भी कंट्रीब्यूट कर सकते हैं। जर्मनी जर्मन प्रोडक्शन जो हो रहा है वो यहां भी इन्फ्लुएंस हो सकता है। मतलब सारी चीजें कनेक्टेड है। द आइडियाज आर कनेक्टेड। द इकॉनमी इज़ कनेक्टेड। एवरीथिंग इज़ कनेक्टेड। लेकिन इसका जो एक अंडरस्टैंडिंग है अपोजिट वह यह है कि लोकलाइजेशन खत्म हो जाता है। ठीक है? इसका मतलब क्या है? जो यहां शाहीन बाग में हो रहा है इट कैन एक्चुअली बी अंडरस्टुड एस एन इंटरनेशनल इशू। इवन दो दिस इज़ अ नेशनल इशू। ये दोनों चीज हो जाएगी। तो ग्लोबलाइजेशन एक्चुअली डीलोकलाइजेशन करता है चीजों का। चीजें लोकल नहीं हर चीज इंटरनेशनल हो जाती है। जब हर चीज इंटरनेशनल हो जाती है तो सेल्फ ऑफ लोकल एंड सेल्फ ऑफ आइडेंटिटी खत्म होने लगता है। ठीक है? आप ये कहें मैं ग्लोबल सिटीजन हूं। ग्लोबल सिटीजन होने से काम नहीं होता है। क्यों? क्योंकि [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपकी आइडेंटिटी डिफाइन करती है हु यू आर। और आपकी आइडेंटिटी आपकी लोकालिटी से निकलती है। कहां रहे? आपकी हिस्ट्री क्या थी? कल्चर क्या है? आपके वालदेन क्या काम करते थे? क्या जॉब थी? आपका क्या एक्सपोज़र था? [नाक से की जाने वाली आवाज़] आपकी रिलीजियस इंक्लिनेशन क्या है? कल्चरल प्रोहिबिशंस क्या है? उससे आपकी आइडेंटिटी डिफाइन होती है। ठीक है? और आप जैसे ही उसको ग्लोबल बोलते हैं ये प्रॉब्लम हो जाती है। बहुत बड़ा गैप हो जाता है। तो बहुत सारा दुनिया में जो राइट विंग मूवमेंट हो रहा है वो इसकी वजह से हो रहा है। क्योंकि सेल्फ सेल्फ ऑफ आइडेंटिटी जी। द सेंस ऑफ़ आइडेंटिटी इज लूजिंग। पीपल आर लूजिंग इट। [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठीक है? आई एम अ ग्लोबल सिटीजन। व्हाट डस दैट मीन? फॉर अ फ्रेंच पर्सन? ठीक है? अ फ्रेंच पर्सन इज नॉट इक्वल टू अ बांग्लादेशी पर्सन। राइट? ठीक है? दोनों की एक जैसे पॉलिटिक्स नहीं है। जी। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] ईरान में जो हो रहा है वो इसी टाइप की चीज हो रही है। जी। व्हाट इज ईरान? व्हाट इज ग्लोबल? व्हाट इज नेशनल? व्हाट इज इंटरनेशनल? ये पूरा का पूरा एकदम कॉम्प्लेक्स बन गया है वो। ठीक है? तो एक तो रीजन यह है। दूसरा रीजन जो है वो यह है कि [नाक से की जाने वाली आवाज़] जो लिबरल फिलॉसफी है। ठीक है? लिबरल फिलॉसफी का अपना जिसको बहुत फेमसली लोग अब फिलॉसफी में कहने लगे हैं। रप्चर जिसको लोग एक एक टर्म है उसके लिए एपिस्टेमिक रप्चर। ठीक है? लिबरल फिलॉसफी भी आपको आपकी आइडेंटिटी नहीं दे पा रही है। क्यों? क्योंकि लिबरलिज्म इंडिविजुअल आइडेंटिटी पर बेस्ड है। ठीक है? इंडिविजुअल ऑटोनमी पर बेस्ड है। लेकिन आपकी आइडेंटिटी जो है वो आपके सोशल सरकमस्ट्ससेस से बनती है। आपकी आइडेंटिटी कम्युनिटी से बनती है। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो आप अपने आप में कुछ भी नहीं है। जैसे इकबाल का शेर है ना फर्द कायम रब मिल्लत से है। तना कुछ नहीं। मौज है दरिया में बैरून दरिया कुछ नहीं। ठीक है? आप अगर इंडिविजुअल हैं तो आपकी आइडेंटिटी क्या है? ठीक है? तो आपकी सेल्फ ऑफ सेल्फ अंडरस्टैंडिंग आपकी लूज हो रही है। तो वो सेकंड लेवल की प्रॉब्लम है। मैं समझूं क्या हूं मैं? मेरी चॉइससेस क्या हैं? मोरालिटी में सही क्या है? गलत क्या है? ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] और लिबरलिज्म और डेमोक्रेसी में जिसको आप लिबरल डेमोक्रेसी कहते हैं। उसको आप एक साथ रीड कीजिए। लेकिन उसमें फंडामेंटल तजाद भी है। ऑोजिट है वो फंडामेंटली। इट्स अ डिफरेंट थिंग दैट पीपल हैव सेड कि नहीं लिबरल डेमोक्रेसी कैन एकिस्ट एंड ऑल दोज़ थिंग्स बट इन मेनी सेंसेस लिबरल डेमोक्रेसी मेनी पीपल हैव बिलीव्ड इट कैन नॉट एकिस्ट इन देयर सेल्व्स। क्योंकि लिबरलिज्म इंडिविजुअल की बात करता है। इंडिविजुअल बिहेवियर की मेजॉरिटी ग्रुप बिहेवियर की बात करती है। ठीक है? तो वो वहां पर प्रॉब्लम हो रही है। जी है ना? मेजॉरिटी जब डेमोक्रेसी की बात है तो डेमोक्रेसी में मेजॉरिटेरियन डेमोक्रेसी भी हो सकती है। भ डेमोक्रेसी का मतलब यह होता है कि हु हैज़ मोर शेयर। हुज़ रिप्रेजेंटेशन इज़ मोर। इसी को कहते हैं ना डेमोक्रेसी। उसको आप कॉन्स्टिट्यूशन से जोड़ देंगे तो कॉन्स्टिट्यूशनल डेमोक्रेसी है। है ना? तो डेमोक्रेसी का मतलब किसके पास कितना शेयर है? वो किसके पास कितना शेयर वोट का भी हो सकता है। आप चार दोस्त बैठे हैं। कौन सा खाना खाना है वो भी हो सकता है कि कौन मेजॉरिटी में है वोटिंग के थ्रू। [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो जब वोटिंग के थ्रू चीजें हो रही हैं। 100 लोगों में क्या यह नहीं हो सकता कि 90 लोग एक बात माने? जब वो 90 लोग एक बात मानेंगे तो ऑटोमेटिकली मेजॉरिटी एंड डेमोक्रेसी हो जाएगी। ठीक है? फॉर यू इट्स अ बैड थिंग। यू मे से कि नहीं साहब गलत है ये है वो। आप कहिए जो कहना है आपको। लेकिन डज़ इट नॉट हैव दी टेंडेंसी टू बिकम मेजोरिटेरियन। अबब्सोलुटली इट हैज़ दी टेंडेंसी टू बिकम मेजोरिटेरियन। अगर आपके पास कोई ऐसा फिगर आता है जो इतना पोलराइजिंग फिगर है। जैसे हिटलर है। बहुत पोलराइजिंग फिगर था भाई वो। ठीक है? पुतिन है वे पोलराइजिंग फिगर। ठीक है? अर्दान है। पोलराइजिंग फिगर है ये। अगर इतना पोलराइजिंग फिगर आ जाएगा तो तो वो शिफ्ट हो जाएगा ना। तो दैट्स अनदर रीज़ व्हाई दीज़ शिफ्ट्स आर हैपनिंग। सो ये दो और इसमें एक रीज़ और है एंड दैट पीपल आर सेइंग इज़ बिकॉज़ ऑफ द इनफिशिएंसी ऑफ द लेफ्ट टू काउंटर द लिबरल वर्ल्ड व्यू। डाइल्यूशन ऑफ द लेफ्ट जो है ना क्योंकि लेफ्ट का आर्गुममेंट में वह रोबस्टनेस नहीं है। ठीक है? इट देयर मे बी एन नंबर ऑफ रीज़ंस। या तो वो साथ में आ नहीं पा रहे हैं या बहुत टाइप के लेफ्ट बन गए हैं। या उनके पास वो टूल नहीं है या सारी दुनिया कैपिटलिज्म से चलती है। तो अब सोशलिज्म कम्युनिज्म की बात नहीं हो सकती। तो इट मे बी एनी रीज़। बट एन आर्गुमेंट वि वास काउंटर टू दिस इज नॉट वर्किंग। तो अब यह जो पूरा सिनेरियो है इस पूरे सिनेरियो में द क्वेश्चन इज़ अ लॉजिकल क्वेश्चन वुड बी वुड इट नॉट अफेक्ट द नेचर ऑफ़ लॉ? इट वुड बिकॉज़ लॉ इज़ इनहेरेंटली पॉलिटिकल पिटिकल नेचर इन अ डेमोक्रेसी ठीक है? इट वुड अफेक्ट द नेचर ऑफ लॉ। एंड नेचर ऑफ लॉ के अफेक्ट होने का मतलब क्या है? इट एक्चुअली इज अफेक्टिंग जुडिशरी। दैट इज व्हाई इट इज अफेक्टिंग द नेचर ऑफ़ लॉ ना। राइट? बिकॉज़ इट इज़ द जुडिशरी व्हिच इज़ टेलिंग यू व्हाट इट इज़। राइट? ठीक है भाई? जो पॉलिटिकल पार्टी मेजॉरिटेरियन गवर्नमेंट जो बना रही है जिसकी पॉलिटिक्स डोमिनेट कर रही है। तो क्या उस पॉलिटिक्स का डोमिनेशन आपको इंस्टीटशंस [नाक से की जाने वाली आवाज़] में नहीं मिलेगा क्या? आपको मिलेगा इंस्टीटश में उसको उसका उसका आपको रिप्रेजेंटेशन मिलेगा। ठीक है? और इंस्टीटशंस में अगर उसका रिप्रेजेंटेशन मिलेगा तो क्या इंस्टीट्यूशन आइडियोलॉजिकल नहीं होंगे? दे विल बी। ठीक है? [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो वो वैसे उसका उसका इट विल इंपैक्ट। ठीक है? हमने अन्ना हजारे मूवमेंट की बात की। हमने जो है वो उसकी बात की। क्या नाम है? निर्भया की बात की सोशल स्मॉल स्मॉल सोशल मूवमेंट्स आर इंपैक्टिंग द वे जुडिशरी फंक्शनंस इतना प्रेशर होता है ठीक है इतना बाबरी हमने बाबरी मस्जिद देखा हमने क्या नाम है अफजल गुरु केस देखा आप ये उमर खालिद वाला देख लीजिए आप ठीक है आप ये कह दे रहे हैं कि एक साल के बाद आप आइए क्या देयर इज नो क्राइटेरिया टू से दैट ठीक है तो ये जो आप हो रहा है दिस इज ऑल हैपनिंग है ना? एंड इफ दिस इज ऑल हैपनिंग एट द लेवल ऑफ 1 2 3 4 5 6 इंस्टेंसेस कैन नॉट इट हैपन एट द लेवल ऑफ द इंस्टीट्यूशन इटसेल्फ इन द लार्जर इंटरेस्ट। फॉर एग्जांपल जो जो केस था जहां पे जज के रेजिडेंस पे बहुत पैसे मिले। कैश? द क्वेश्चन इज़ व्हाई वाज़ देयर नो एफआईआर? ठीक है? अब बहुत इंटरेस्टिंग बात देखिए आप। एंड आई विल टेल यू आई आई विल टेल यू द द कनेक्ट बिटवीन द लॉ एंड द पॉलिटिक्स कितना डीप कनेक्शन है इसमें क्या वो चार्ज ऑफ करप्शन नहीं हो सकता द आंसर इज़ यस हो सकता है इट कैन बी फ्रेम्ड दैट वे ठीक है क्या उस पे एफआईआर नहीं होनी चाहिए बिल्कुल हो सकती है ठीक है अब सवाल यह है कि उस पूरे इंस्टेंस को आप फ्रेम कैसे करेंगे? ठीक है? इंडियन जुडिशरी ने सुप्रीम कोर्ट ने उसको कैसे फ्रेम किया? सुप्रीम कोर्ट ने उसमें एफआईआर नहीं होने दिया। दे दे फ्रेम्ड इट एज द कंडक्ट ऑफ अ जज। और कंडक्ट ऑफ अ जज पे एग्जीक्यूटिव नहीं बोल सकता। सुप्रीम कोर्ट खुद बोलेगी जो बोलेगी। अब क्योंकि सुप्रीम कोर्ट खुद बोलेगी तो अब वो अपना प्रोसीजर बनाएगी। तो उन्होंने एक इंटरनल इंक्वायरी बनाई। जब आप इंटरनल इंक्वायरी बना रहे हैं तो रिपोर्ट बनाएंगे आप। जब आपने रिपोर्ट बनाई। अब सवाल ये है क्या रिपोर्ट पब्लिकली नहीं होनी चाहिए? वहां आप क्या कहेंगे? इट इज दी जुडिशियल प्रोसेस। जुडिशियल मेथड। ठीक है? इसकी कोई जरूरत नहीं है कि ये रिपोर्ट पब्लिक हो। वो एक अलग बात है। वो लीक हुई और बहुत सारी चीजें बाद में हुई। ठीक है? दैट्स अ डिफरेंट केस। बट इंपीचमेंट तक की बात हुई। वह क्यों नहीं हुआ? वो प्रोसेस क्यों नहीं हुआ? मैंने आपको बताया कि जब दो एग्जीक्यूटिव जुडिशरी जब लॉगर हेड्स पर होते हैं या कभी-कभी आमने सामने होने लगते हैं तो एक दूसरे को स्पेस देना स्टार्ट कर देते हैं वो। क्योंकि दैट इज हाउ द स्टेट वर्क्स। जी। यार ऐसा है कि ठीक है। वी विल अलाउ यू टू डू दिस। डू दिस बिट। लेट अस डू इट दिस वे ऑन द अदर साइड। ये रिकैलिब्रेशन है। दैट इज हाउ इट हैपेंस। उसका बहुत इंटरेस्टिंग एग्जांपल है कपिल सिब्बल का आर्गुमेंट। ठीक है? कपिल सिब्बल ही इज अ पार्लियामेंटेरियन एंड ही वाज़ आल्सो दी चेयरमैन ऑफ सॉरी प्रेसिडेंट ऑफ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ही आर्ग्यूड एज द चेयरमैन ऑफ़ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन। सॉरी प्रेसिडेंट ऑफ़ सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन। ही सेड दिस इज नॉट फॉर द पार्लियामेंट टू डिसाइड बिकॉज़ व्हाई यू आर डूइंग दैट बिकॉज़ यू आर ट्राइंग टू सेफ गार्ड द टफ द जुडिशियल टफ होल्डिंग द ग्राउंड और जुडिशियल टफ में बार इज पार्ट ऑफ [नाक से की जाने वाली आवाज़] द जुडिशरी बार एंड बेंच दोनों मिलके जुडिशरी बनती है है ना तो सुप्रीम कोर्ट कोर्ट बार एसोसिएशन का जो प्रेसिडेंट है वो उस टर्फ को उस ग्राउंड को होल्ड करेगा क्योंकि वो उसका एथिकल पोजीशन उसकी वो है तो ही ही वुड डू दैट सो ये ये इस तरीके से कैलिबेटिंग रिकैलबेटिंग एंड ऑल दोज़ थिंग्स दैट्स हाउ इट हैपेंस निजाम साहब अगला सवाल मेरे से मेरा आपसे ये है कि जो डिसेंट में शिफ्ट देख रहा है बोथ सोशल और जुडिशियल तो कैसे ट्रीट कर रहे हैं सोशल डिसेंट को जुडिशियल डिसेंट को कॉन्स्टिट्यूशन जुरिसडेंस में आज की डेट में देखिए कॉन्स्टिट्यूशनल जुरिसफुडेंस में पहली बात तो जुडिशियल डिसेंट जो है उसमें भी मैं एक थोड़ा सा बैकग्राउंड बता दूं सो दैट यू अंडरस्टैंड यू नो एटलीस्ट व्यूअर्स अंडरस्टैंड डिसेंट का मतलब क्या है जब कोर्ट बैठता है किसी चीज को सुनने के लिए स्पेशली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जो अपील के कोर्ट कहते हैं आप वो बैठता है जिस कंपोजशन में बैठता है उसको कहते हैं बेंच। दो जज बैठे हैं तो डिवीजन बेंच। ठीक है? फाइव जज बैचे बैठे हैं तो कॉन्स्टिट्यूशन बेंच। तो इस तरीके से उसका नाम है। कोशिश ये होती है कि जनरली देखिए जनरली दो जजेस बैठते हैं। हर मैटर में दो जजेस तो बैठते ही हैं। लेकिन जैसे आप उसको थोड़ा सा अपग्रेड करना चाहते हैं। अपग्रेड इन द सेंस कि भ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया को लगता है कि यार यह इंपॉर्टेंट मैटर है। तो दो के बजाय वह तीन कर देगा। ठीक है? कॉन्स्टिट्यूशनल मैटर है तो वह पांच कर देगा। जैसे सुप्रीम कोर्ट में गोगोई के अंडर में जो बाबरी मस्जिद का केस था इट वाज़ अंडर थ्री बेंच। थ्री जज बेंच। ठीक है? उन्होंने कहा भ इसको और बड़ी बेंच के लिए दीजिए। तो ही डिड नॉट एग्री। आई थिंक इट वाज़ गोइंग। बट आई एम नॉट श्योर। बट देन आफ्टर हिज़ रिटायरमेंट द चीफ जस्टिस द न्यू चीफ जस्टिस ही सेड ठीक है। लेट्स मेक इट कॉन्स्टिट्यूशन बेंच। तो देन इट इज फाइव जजेस बेंच। तो कहने का मतलब यह जज ये बेंच का कॉन्स्टिट्यूशन है, कंपोजशन है। कोशिश जनरली ये की जाती है कि जैसे ही दो से ज्यादा हो वो ऑड हो। सो दैट समथिंग कम्स आउट। है ना? क्योंकि ऑड में 4 + थ्री होगा। जी। थ्री और टू ऐसे ही होगा तो उसमें मेजॉरिटी माइनॉरिटी ऑटोमेटिकली बन जाएगी। ठीक है? एक चीज तो ये है। दूसरी [नाक से की जाने वाली आवाज़] चीज यह है कि हर जज अपने आप में इंडिपेंडेंट होता है। ठीक है? कोई ऐसा रूल नहीं है जो यह कहे कि साहब आप सबको मिलके जजमेंट साथ में लिखना है। ऐसा कुछ नहीं होता। पांच जजेस पांच अलग-अलग राय रख सकते हैं। ठीक है? सो इफ दे थिंक दे हैव फाइव डिफरेंट ओपिनियंस दे कैन राइट फाइव डिफरेंट जजमेंट्स। ठीक है? ये पांच डिफरेंट जजमेंट्स फाइव डिफरेंट ओपिनियंस हो सकते हैं। लेकिन एट द एंड ऑफ द डे लाइक द लॉजिक ऑफ द कंप्यूटर बाइनरी लॉजिक जीरो वन। बाइनरी लॉजिक होता है कंप्यूटर का ना ज़ीरो और वन। आपको बाइनरी में जवाब देना होता है कि साहब इनका टाइटल है इनका नहीं है। रीज़ंस आप कोई भी दे सकते हैं। तो जनरली जजेस जो अलग-अलग ओपिनियन लिखते हैं वो इसलिए लिखते हैं कि साहब मैं भी उसी कंक्लूजन पे पहुंच रहा हूं। लेकिन मेरे रीज़ अलग हैं। तो आई विल फ्लैश आउट माय रीज़ंस। इवन दो ऑन दी ऑन दी पॉइंट ऑफ जजमेंट वी ऑल अग्री। बट द बट द रूट्स आर डिफरेंट। तो एक तरीका यह है जैसे इलाहाबाद हाईको का बाबली का जो जजमेंट था उसमें तीन जजेस हैं। तीनों ने अलग-अलग लिखा है। अब कई बार यह होता है कि पांच जजेस में तीन जजेस जो हैं वो एक ही चीज को मानते हैं। तो उनमें से एक जज लिखता है ऑन बिहाफ ऑफ टू अदर्स। और ऑन बिहाफ ऑफ़ ऑल थ्री। तो एक लिख रहा है बाकी दो उससे कनकर कर रहा है। वो वो जजमेंट बताता है कि जजमेंट इज रिटेन बाय जस्टिस ए ऑन बिहाफ ऑफ हिमसेल्फ एंड बी एंड सी और उस जजमेंट पे फिर साइन होता है तीनों लोगों का। तो जाहिर सी बात है जब एक इंसान दो के बिहाफ पे लिख रहा है इसका मतलब उसको पहले डिस्कस किया तभी लिख रहे हैं ना राइट दे ऑल अग्री ऑन दैट एंड देयर फॉर दे राइट ऑन इट है ना [नाक से की जाने वाली आवाज़] तो एक तरीका ये है कई बार ये होता है कि साहब चार जजेस जो है वो अग्री करते हैं पांचवा जज कहता है आई डू नॉट अग्री आई डू नॉट अग्री विद योर ओपिनियन देन दैट इज कॉल्ड एस डिसेंटिंग ओपिनियन आई डिसेंट तो जब आप डिसेंट कर रहे हैं तो जाहिर सी बात है आप क्या करेंगे? आप अपना एक अलग ओपिनियन लिखेंगे। ठीक है? सो इट वुड बी फोर राइटिंग टुगेदर एंड वन राइटिंग एंड वन राइटिंग सेपरेट। ठीक है? कई बार ये होगा कि थ्री राइटिंग टुगेदर एंड देन टू राइटिंग टुगेदर। सो दिस इज़ मेजॉरिटी ओपिनियन। दैट इज़ माइनॉरिटी ओपिनियन। ठीक है? लेकिन मेजॉरिटी ओपिनियन इज दी जजमेंट। हम माइनॉरिटी ओपिनियन इज दी डिसेंट। बट हाउ डस हाउ डस डिसेंट मैटर? इट मैटर्स अ लॉट। इट मैटर्स अ लॉट। सी इट इज नॉट इट डज नॉट मैटर इन टर्म्स ऑफ इंप्लीमेंटेशन। उसको इंप्लीमेंट नहीं किया जाता क्योंकि वो जजमेंट नहीं है। वो ऑपरेटिव नहीं है। लेकिन इट इज़ फंडामेंटल समटाइ्स टू अंडरस्टैंड व्हाट इट इज ऑल अबाउट। [गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि कई बार जजेस जो हैं वो दे मेक श्योर। क्योंकि देखिए एक बड़ी इंपॉर्टेंट चीज है कि पीपल नीड टू अंडरस्टैंड कि आपको अगर फॉर्मल सेटअप में इंस्टिट्यूशनल सेटअप में बोलना है। व्हाट इज दी फोरम दैट यू हैव? ठीक है? फॉर एग्जांपल आप अगर ये कहें कि अरुंधति रॉय अपने आप को कैसे एक्सप्रेस करेगी? वो अपने आप को एक्सप्रेस करेगी थ्रू हर नवेल और थ्रू हर एस्स राइटिंग के थ्रू। ठीक है? पॉलिटिशियन का टर्फ है पार्लियामेंट। सो इवन इफ इट डस नॉट मैटर दे विल एक्सप्रेस इट दे विल एक्सप्रेस इटसेल्फ देयर राइट। है ना? दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे वि दे एक्सप्रेस देमसेल्व्स इन द पार्लियामेंट जनरली स्पीक नोइंग दैट दे आर द मेजोरिटी इज़ नॉट टू देम एंड द बिल इस गोइंग टू बी पास्ड एनीवे अब्सोलुटली बट दैट इज देयर टफ उनको तो जजेस भी यही करते हैं जी है ना कि उनको अपनी बात करनी है तो कहां करेंगे वो जी जजमेंट में करेंगे वो तो जजमेंट इज देयर टफ अक्सर जजेस ये कहते हैं मैं कुछ नहीं बोलूंगा जो लिखना था मैंने लिख दिया जी आप पढ़ लीजिए जाके उसको व्हिच हैपेंड विद अगेन कमिंग बैक टू द बाबरी जजमेंट व्हिच इज़ इज़ वैरी इंटरेस्टिंग अहमदी एंड बरूजाचा दे डिसेंटेड एंड वेंकटचलैया एंड टू अदर्स दे वर इन मेजोरिटी इंसिया वाहनवती की जो किताब है ना उसमें बहुत क्लियरली उसने बताया है पूरा इंसिडेंट लिखा है इंसिया वाहनवती ने शी हैज़ मेंशंड द मीटिंग व्हेन एंड ऑफ कोर्स दैट इज़ कमिंग फ्रॉम जस्टिस अहमदीस पर्सनल राइटिंग्स एंड ऑल दोज़ थिंग्स [नाक से की जाने वाली आवाज़] द मीटिंग व्हेन दी थ्री अदर्स दे कॉल्ड अहमदी सेइंग दैट सी दिस इज़ व्हाट वी वांट टू डू ठीक है एंड वी वांट यू टू साइन इट एंड देन ही सेज़ वेयर इज़ भरूचा एंड दे से यू साइन ही विल आल्सो कम ही सेड नो लेट मी रीड एंड देन ही सेड नो आई डू नॉट अग्री टू दैट दे सेड नो प्लीज डू दैट ही सेड नो आई डोंट वांट टू आई अब्सोलुटली डोंट एग्री टू दैट एंड देन ही गोज़ ऑन टू राइट विद भरूचा अ डिसेंडिंग ओपिनियन एंड देन इंसिया भानवती ट्रेसेस द एंटायर स्टोरी शी सेज़ वी आर इन द हाउस अ कॉल कम्स ही सेस ट्रांसफर इट टू माय बेडरूम वी आर ऑल ईटिंग फूड ही लेफ्ट्स एंड गोज़ टू द बेडरूम एंड ही शाउट्स फ्रॉम देर आई डोंट वांट टू बी द चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ये बाकायदा लिखा है किताब में उसने एंड शी सेस ऑब्वियसली वी नो कि व्हाट हैज़ हैपेंड वी कैन अंडरस्टैंड बट ऑब्वियसली वी डू नॉट नो हु द कॉल वास फ्रॉम व्हाट वास द कन्वर्सेशन बट वी हैव अ सेंस व्हाट इट वाज एंड लेटर शी आस्क्ड जस्टिस भरूचा कि व्हाट वास इट? ही सेस [गला साफ़ करने की आवाज़] व्हाटएवर वी हैड टू से वी रोट इट इन द डिसेंट लेट इट पुट लेट इट बी पुट टू रेस्ट है ना वो जो डिसेंडिंग ओपिनियन है आप उसमें पढ़िए। दे हैव डेमोलिश्ड द आर्गुमेंट। अब्सोलुटली डिमोलिश्ड दी आर्गुमेंट। दे आर सेइंग दी कोर्ट कैन नॉट डिसाइड ऑन द बेसिस ऑफ फेथ ठीक है इट इज रोंग इट्स अ बायस्ड थिंग दे आर राइटिंग इट है ना जाहिर सी बात है वो इंप्लीमेंट नहीं हो सकता राइट माइनॉरिटी माइनॉरिटी बट इट इज़ फंडामेंटली इंपॉर्टेंट व्हाट दैट टेल्स यू व्हाट इज़ द अल्टरनेट जुरिसूडेंस राइट एंड समटाइम्स व्हाट हैपेंस समटाइ्स एस [नाक से की जाने वाली आवाज़] एस वी डिस्कस्ड अर्लियर ना कि कोर्ट्स अपना ओपिनियन बनाने के लिए दे पिक फ्रॉम द पास्ट प्रेसिडेंट फ्रॉम द प्रेसिडेंट्स समटाइ्स द इट इट माइट हैपन दैट अ फ्यूचर केस इज़ डिसाइडेड अकॉर्डिंग टू दी माइनॉरिटी ओपिनियन ओके ओके सो डिसेंट इज़ेंट दैट अब्सोलुटली द कोर्ट कैन से द मेजॉरिटी हेल्ड इट दैट वेट देयर वाज़ अ डिसेंट देयर वाज़ अ डिसेंट एंड वी थिंक डिसेंट इज़ वेरी वेरीरीेंट ऑफ कोर्स जनरल रूल इज बिगर बेंच के जो डिसीजंस हैं वो छोटी बेंच को बाइंडिंग होते हैं। जी ये एक ट्रेडिशन है। जुडिशियल ट्रेडिशन है। लेकिन अगर इक्वली बेंच की पांच जज की बेंच बैठ गई तो वो डिसेंडिंग को बना देगी लॉ। इट हैज़ द कैपेसिटी टू टर्न डिसेंट टू लॉ नाउ। लीगल एजुकेशन पे लेकर और स्कॉलरशिप को लेकर भी बहुत सारे सवाल हैं। हालांकि बहुत ज्यादा डेप्थ में नहीं जाऊंगा लेकिन मैं यह समझने की कोशिश करूंगा आपसे कि एक लॉ स्कूल में जो पढ़ाया जाता है बच्चे को और जो एडवोकेसी होती है वो अपने आप में कैसे डिफरेंट होती है और क्या लॉ स्कूल में एडवोकेसी पढ़ाई जाती है बच्चों को या लॉ को बहुत ब्रॉडली बताया जाता है? आप खुद एक टीचर रह चुके हैं। इसके लिए भी आई विल गिव यू कॉन्टक्स्ट एंड देन कम टुडे। हार्व लॉ स्कूल में एक डीन बने 1800 समथिंग में बहुत फेमस डीन एंड आई थिंक इन वन ऑफ़ माय प्रीवियस कॉन्वर्सेशन प्रोबेब्ली आई आई आई हैव मेंशंड इट बट अगेन टू प्रोवाइड दिस कॉन्टेक्स्ट ही वाज़ हिज़ नेम वाज़ क्रिस्टफर कोलंबस लैंगडेल। उनके साथ परेशानी क्या थी? उनको चैलेंज क्या था? उनके साथ परेशानी चैलेंज क्या था? उनसे कहा गया यार तुम लॉ स्कूल को हेड करो। लेकिन यार चल नहीं रहा है ये। कुछ करो इसमें समझ में नहीं आ रहा। करें क्या इसका? और हार्व लॉ स्कूल की उस वक्त सिचुएशन यह है कि क्लासवॉस करने कोई आता नहीं है। शाम में क्लास हो रही है। कुछ है। इंटरेस्ट विंटरेस्ट किसी को नहीं है। क्यों नहीं है? बिकॉज़ द अंडरस्टैंडिंग इज [नाक से की जाने वाली आवाज़] लॉ मींस कोर्ट। लॉ तो कोर्ट में प्रैक्टिस होता है ना। जी। तो लॉ को सीखने के लिए क्या करना चाहिए? अप्रेंटिसशिप करनी चाहिए। ठीक है? पढ़ाई वखाई कर लो। फिर जाके यार किसी वकील के साथ दो ढाई महीना, 6 महीना बैठ जाओ। धीरे-धीरे क्लर्कशिप करके सीख जाओगे। तो क्लासरूम की क्या जरूरत है उसमें? ठीक है? जी। दैट इज द अंडरस्टैंडिंग। जैसे हमारे आज भी कुछ छोटे लॉ स्कूल्स में यही होता है कि क्लास में जाने की क्या डिग्री ले लो यार जाके प्रैक्टिस ही तो करना है। डिग्री लेके किसी के साथ बैठ जाएंगे सीख जाएंगे। ठीक है? लैंगल सेड नो दैट्स नॉट गोइंग टू वर्क। दैट्स नाउ हाउ लॉ स्कूल विल बी इस्टैब्लिश्ड। ही सेड नो लेट्स नॉट डू दैट। लेट्स डू समथिंग डिफरेंट। ही डिज़ अ मेथड ऑफ़ लर्निंग लॉ। एंड दैट मेथड वास कॉल्ड एस केस लॉ स्टडी मेथड। ही सेड नो लेट अस ब्रिंग द केसेस टू द क्लास रूम जिसको हम प्रेसिडेंट बोल रहे हैं। जी लेट अस स्टडी लॉ थ्रू केसेस। सो प्रिपेयर किया बड़े-बड़े बलकी बलकी कोर्स मैनुअल्स 50 केस 50 केसेस ऑन कॉन्ट्रैक्ट। 100 केसेस ऑन क्रिमिनल लॉ ऑन मर्डर। ठीक है? जो फंडामेंटल केसेस हैं जो बिल्कुल इस्टैब्लिश कर दिया जिन्होंने प्रिंसिपल उनको पढ़िए आप उनको मेमोराइज कीजिए और तब आपको समझ में आएगा लॉ क्या है। क्यों? गो बैक टू द सेम थिंग। लॉ इज़ व्हाट द जजेस से इट इज़। उसको पढ़िए। आपको पता चल जाएगा लॉ क्या है। लेट अस ब्रिंग दैट टू द क्लासरूम। दैट मेथड वाज़ कॉल्ड एज लैंगडेलियन मेथड। इट बिकम सो फेमस। सो फेमस। इट इज प्रैक्टिस्ड इन ऑल द नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज इन इंडिया। ठीक है? इट इज प्रैक्टिस थ्रू आउट द यूएस। द ललियन मेथड, द केस लॉ स्टडी मेथड। है ना? केसेस के थ्रू लॉ को पढ़ना। ठीक है? एंड दैट्स हाउ हारवर्ड लॉ स्कूल गॉट पॉपुलराइज्ड। दे द फर्स्ट इंप्लीमेंटेड। दे इंट्रोड्यूस्ड इट। लंगडेडल इंट्रोड्यूस्ड इट। ही वाज़ अ डीन। है ना? इनफैक्ट वो इतना इंपैक्टफुल मेथड था जिससे निकला केस लॉ मेथड जिसको हार्व बिजनेस स्कूल ने स्टार्ट किया। इट टूक इट एज केस लॉ मेथड सॉरी केस स्टडी केस केस स्टडी मेथड तो अब केस स्टडीज जो होती है बिनेस स्कूल्स में जो हमारे आईएम्स वगैरह में होती हैं। द मेथड इज द सेम। ठीक है? तो ये एक उसकी ट्रेजेक्टरी है। है ना? क्लास रूम में आप यह पढ़ाते हैं। लेकिन अब इंटरेस्टिंग बात यह है कि आप क्लास रूम में सिर्फ यह नहीं पढ़ा सकते। आप क्लासरूम में इसलिए नहीं पढ़ा सकते जो हमने अभी तक डिस्कस किया। लॉ हैज़ एन एलिमेंट ऑफ सब्जेक्टिविटी। लॉ इज़ इनहेरेंटली टाइड टू पॉलिटिक्स। देयर इज एन एलिमेंट ऑफ अंडरस्टैंडिंग लॉ। अब जैसे मैं एग्जांपल दूं आपको। केस लॉ से आप साइंटिफिकली डिसाइड कर सकते हैं यह चार केसेस पढ़ के प्रिंसिपल्स को जोड़ के कि साहब यह है लॉ। ठीक है? बट रिमेंबर वन थिंग दैट आई टोल्ड यू यू नो दैट वी डिस्कस्ड अर्लियर लॉ आल्सो वर्क्स लाइक थियोलॉजी। ठीक है? एंड थियोलॉजी इज स्कॉलरसेंट्रिक। आप लॉ की लर्निंग को सिर्फ कोर्ट के थ्रू नहीं समझ सकते। [गला साफ़ करने की आवाज़] जो लोग लिखते और पढ़ते हैं लॉ को उनको भी पढ़ना पड़ेगा आपको। ठीक है? एंड दैट इज वेयर अ वेरी वेरीेंट आस्पेक्ट कम्स एंड दैट इज कॉल्ड एज जरिसप्रुडेंस। जरिसप्रुडेंस एक ओवर आर्चिंग वर्ड है। ठीक है? जरिसप्रुडेंस में सिर्फ केसेस नहीं होते। उसमें लॉजिक भी होता है। ठीक है? उसमें इंटरप्रिटेशन का मेथड भी होता है। ठीक है? उसमें जिसको कहते हैं आप डिडक्शन, इंडक्शन ये सारी चीजें आप पढ़ते हैं उसमें। यू यू अंडरस्टैंड द टेक्निक ऑफ रीडिंग इट। एंड देन व्हाट इज जरिसडेंस? जरिसप्रडेंस अगर बहुत आसान अल्फाज़ में आपको मैं बताऊं, तो जरिसडेंस का मतलब होता है द प्रूडेंस ऑफ अंडरस्टैंडिंग लॉ। द वे लॉ शुड बी अंडरस्टुड। द मेथड द द मेथड थ्रू व्हिच अल्लाह शुड बी अंडरस्टुड हुस मेथड द मेथड ऑफ द स्कॉलर्स जैसे आप कहते हैं ना हफी फिक में जी जी हफी उलमा बताएंगे समथिंग लाइक दैट तो दी अंडरस्टैंडिंग ऑफ लॉ अकॉर्डिंग टू जे एस मिल द अंडरस्टैंडिंग ऑफ लॉ अकॉर्डिंग टू जॉन रो्स है ना उसको भी आप इंटीग्रेट करते हैं नाउ दिस डज नॉट नॉट हैपन विद इन द कोर्ट। दिस कैन नॉट हैपन विद इन द कोर्ट। द रीज़न इज बिकॉज़ इन द कोर्ट यू लुक एट द डिस्प्यूट। राइट? एंड यू मेक एन आर्गुमेंट दैट कैन दैट यू कैन कन्विंस द जज विद एंड यू विन द केस। राइट? सो एसेंशियली आप कह रहे हैं कि कोर्ट रूम में और जो कोर्ट रूम में होता है और जो क्लास रूम में होता है वो बहुत ज्यादा फर्क है उसके बीच में। यस मेनी टाइम्स अ लॉट। अ लॉट ऑफ इट। बिकॉज़ इफ यू आस्क मी एज अ टीचर [गला साफ़ करने की आवाज़] व्हाट इज माय माय फोकस? हम माय फोकस इज टू गिव द स्टूडेंट द प्रिंसिपल। हाउ वुड यू डिफरशिएट योरसेल्फ विथ एन एडवोकेट? देयर इज़ लॉट ऑफ़ डिफरेंस। लॉट ऑफ़ डिफरेंस। फॉर एग्जांपल [नाक से की जाने वाली आवाज़] टीचिंग इज़ मोर प्रिंसिपल सेंट्रिक। ठीक है? टीचिंग इज़ मोर कासेप्ट सेंट्रिक। इट इज मोर आई वुड से अंडरस्टैंडिंग सेंट्रिक। मैं लॉ को बिना आप आप यह कहिए मैं लॉ को बिना किसी केस को टच किए भी समझा सकता हूं। ठीक है? इनफैक्ट आई डीड माय पीएचडी ऑन थ्योरी ऑफ़ लॉ। जी एंड इट्स सम 230 टू 40 पेजेस आई हैव नॉट साइटेड अ सिंगल केस। अ सिंगल केस ए वर्सेस बी जिसको आप कोर्ट रूम में ले जाते हैं। बिकॉज़ दैट इज़ आल्सो वन ऑफ़ द वेज़ ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग लॉ। जी। ठीक है। थ्योरी ऑफ़ लॉ, फिलॉसफी ऑफ़ लॉ है ना? लीगल थ्योरी जिसको आप कहते हैं लीगल थ्योरी, जरिसूडेंस दोनों में डिफरेंस भी है। जरिसेंस इज़ डिफरेंट, लीगल थ्योरी इज़ डिफरेंट। ठीक है? एंड [नाक से की जाने वाली आवाज़] देन प्रेसिडेंट एंड तो एक तो चीज ये है। दूसरी चीज ये है उसका मेथड भी डिफरेंट है। उसका मेथड क्या है? जैसे जैसे हम क्लास में जब बच्चों को पढ़ाते हैं तो हम यह बताते हैं कि देखिए साहब एटलीस्ट एक चीज पर हम और आप अग्री कर रहे हैं दैट आई मेंशंड अर्लियर दैट अ लॉयर मेक्स आर्गुमेंट्स दैट वी अग्री ऑन बट व्हेन यू गो टू द कोर्ट यू हैव टू अंडरस्टैंड अ नंबर ऑफ थिंग्स। नंबर वन इट्स एन इंस्टीट्यूशन द इंस्टीट्यूशन एज अ प्रोसीजर। फाइलिंग का एक प्रोसीजर होता है। रिटन स्टेटमेंट का एक प्रोसीजर होता है। अपीयरेंस का एक डेकोरम होता है। ड्रेसिंग सेंस होता है। एटिकेट होता है। क्लास में नहीं सीख सकते आप ये। आपको इंस्टीट्यूशन में रहना पड़ेगा। दैट इज व्हाई यू हैव टू हैव इंटर्नशिप। अप्रेंटिसशिप। उसके थ्रू आप इंस्टिट्यूशन को समझेंगे। जी। एटीिकेट्स एंड ऑल दोज़ थिंग्स। ओके? द [नाक से की जाने वाली आवाज़] अदर थिंग इज कि आपको कोर्ट रोम मैनरिज्म के साथ-साथ आपको यह भी समझना पड़ेगा कि आपको एक आर्गुमेंट देना है और वो आर्गुमेंट ऐसा होना चाहिए जो जज को कन्विंस करे एंड देयर फॉर योर ऑल आर्गुमेंट्स विल बिगिन विद योर ऑनर योर लॉर्डशिप सर योर योर हाईनेस मैडम एक रिस्पेक्ट हम ह्यूमिलिटी सबमिशन ठीक है उसको कन्विंस करना है इन द क्लासरूम आई डोंट डू दैट व्हेन आई टीच यू प्रिंसिपल्स आई डू नॉट टीच यू द आर्ट ऑफ चेंजिंग द आर्गुमेंट प्रिंसिपल्स आर यू नो एस्टैब्लिश्ड दे गिव यू स्टेबिलिटी ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग प्रिंसिपल्स गिव यू स्टेबिलिटी ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग एंड देयर फॉर एंड दैट इज आल्सो वन ऑफ़ द रीज़ंस व्हाई दी टू प्रोफेशनल पीपल दे टेंड टू बी क्रिटिकल ऑफ ईच अदर देन टीचर्स दे बिकम क्रिटिकल एट टाइम्स एडवोकेट कहते हैं आप पढ़ाते क्या हैं आप? ठीक है। सर लॉ मतलब कोर्ट है ना भाई। और आप जो पढ़ा रहे हो कोर्ट में उसकी रेलेवेंस नहीं है। तो आप पढ़ा क्या रहे हैं? दैट्स अ क्रिटिकल एलिमेंट। आप [गला साफ़ करने की आवाज़] मुझसे पूछिए। आप कर क्या रहे हैं भाई? आप हर दो मिनट में तो आर्गुमेंट चेंज कर रहे हैं। पढ़ा क्या रहे हैं? अब वो आपका स्टैंड क्या है? बच्चों को समझ में आएगा कि बच्चों को समझ में नहीं आएगा कि लॉ क्या है? क्योंकि हर दो मिनट पे तो आर्गुमेंट चेंज कर रहे हैं आप। एंड ऑल ऑफ योर आर्गुमेंट आर प्लीजिंग आर्गुमेंट्स। जी। एंड दैट इज द रीज़न यू नीड टू हैव बोथ। दोनों का कॉम्बिनेशन आप करते हैं। इसलिए लॉ स्कूल की एजुकेशन में आप इंटर्नशिप का एलिमेंट काफी है। जैसे जिंदल में मैं पढ़ाता था। जी दो महीना समर दो महीना विंटर इंटर्नशिप इंटर्नशिप्स सो दैट दे आल्सो गेट नो कोर्ट के प्रोसीजर्स क्या कोर्ट है लॉ फर्म के प्रोसीजर्स सब या किसी नॉट ऑफ प्रॉफिट के आगे [गला साफ़ करने की आवाज़] कैसे काम करेंगे? यस वो फंडामेंटल है। जी आप उसके अलावा नहीं कर पाएंगे। जी जी तो निजाम साहब एक आखरी क्वेश्चन उससे पहले कि हम इसको खत्म करें इस इंटरव्यू को और पडकास्ट को खत्म करें। एक आखरी सवाल ये है कि और ये बड़ा अगेन मोरली मोरल सा सवाल है कि आपको लगता है क्या कि आज की डेट में जो हिंदुस्तान में निजाम है जिस तरह से हिंदुस्तान में कोर्ट्स फंक्शन कर रही है। तो लॉ क्या इमसिमेशन के प्रॉमिस को लेके साथ चलता है या सिर्फ एक ऑब्जेक्ट ऑफ कंट्रोल बन गया है और बनके रहेगा? नहीं ये डिपेंड करता है ये बड़ा बड़ा सब्जेक्टिव सवाल है क्योंकि [नाक से की जाने वाली आवाज़] देखिए कोर्ट का बिहेवियर एक जैसा नहीं होता जी है ना आपको अगर कोर्ट का बिहेवियर समझना जैसे एक हमारे यहां इंटरनेशनल लॉ में एक कहावत है जी लोग कहते हैं कि साहब इंटरनेशनल लॉ एक्सिस्ट ही नहीं करता फॉलो ही नहीं होता गाजा में देखिए ये हो रहा है ईरान में यूएस इंटरवीन करने वाला है कहां है इंटरनेशनल लॉ तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] इंटरनेशनल लॉ स्कॉलर्स जो है वो एक आर्गुम मेंट देते हैं। वो यह कहते हैं कि इंटरनेशनल लॉ इज फॉललोड बाय मोस्ट ऑफ द कंट्रीज मोस्ट ऑफ द टाइम्स। यह जो एबरेशन है आप उस पर फोकस करके देख रहे हैं। तो ज्यादातर फॉलो होते हैं। इंटरनेशनल ट्रेड बिना इंटरनेशनल लॉ के थोड़ी हो रही है। सही बात है। लोगों को जो इमीग्रेशन हो रहा है वो बिना पासपोर्ट रिजीम उसके थ्रू हो रही है। ठीक है? ट्रेड एंड पूरा कॉमर्स हो रहा है। ठीक है? लेकिन आपको सिर्फ पे ध्यान है। क्योंकि आप उसको देख रहे हैं तो आपको लगता है काम नहीं कर रहा है। काम नहीं कर रहा है। फिर भी ठीक है? तो सिमिलर इज द केस हियर। [नाक से की जाने वाली आवाज़] कोर्ट को यस कोर्ट को आपको अगर आप केस टू केस बेसिस पर देखेंगे ना तो आपको बड़े अबेशंस मिलेंगे। इस केस [गला साफ़ करने की आवाज़] में देखो ये कर दिया उसने इस केस में देखो ये कर दिया ये बट यू डू नॉट अंडरस्टैंड कि 90% ऑफ द केसेस जो है [हंसी] क्योंकि वो ग्रे एरिया भी नहीं है और वो पॉलिटिकल भी नहीं है। हम [गला साफ़ करने की आवाज़] भाई कंपनी लॉ के केसेस जाते हैं, एनवायरमेंटल लॉ के केसेस जाते हैं। लेबर लॉ के केसेस जाते हैं। [नाक से की जाने वाली आवाज़] ठीक है? जी सर्विस मैटर्स जाते हैं। ठीक है? इमीग्रेशन के मैटर्स जाते हैं। कोर्ट ये सारे मैटर्स डिसाइड करती हैं। बट सिंस दीज़ आर नॉट ग्रे एरियाज सिंस [नाक से की जाने वाली आवाज़] दीज़ आर नॉट पॉलिटिकल इशूज़ दे डोंट गेट हाईलाइटेड। द वे द वे है ना। तो इसलिए आप अगर आपको पूरा कोर्ट का कैरेक्टर को डिफाइन करना है। आप ये नहीं कह सकते कि इट्स नॉट फंक्शनिंग प्रॉपर्ली या स्लिपरी है या ये है। आप पर्टिकुलर एरियाज प्रोबेब्ली पकड़ सकते हैं। जैसे इंटरनेशनल लॉ में यूज़ ऑफ़ फोर्स को पकड़ते हैं लोग। कि यूज़ ऑफ़ फोर्स जो है बड़ा प्रॉब्लमेटिक चीज है। कभी मानता नहीं है कोई। इंटरवेंशन को लोग पकड़ते हैं। कि इंटरवेंशन के क्या क्राइटेरिया हैं। ठीक है? यह समझ में नहीं आ रहा है। लॉ है, पॉलिसी है, पॉलिटिक्स है। समझ में नहीं आ रहा है क्या? वो यहां आप कह सकते हैं कि नेशनल सिक्योरिटी का थ्रेट क्या है? क्या नहीं है? समझ में नहीं आ रहा है। ठीक है? कुछ [नाक से की जाने वाली आवाज़] आइडेंटिटी के इश्यूज ट्रांसलेट लॉ में होते हैं। कुछ नहीं होते हैं। नहीं समझ में आ रहा है क्या हो रहा है। है ना? बट दैट डज़ नॉट मीन बिकॉज़ फेमिनिज्म इज़ ट्रांसलेटिंग वेल। राइट? कास्ट जरिसूडेंस गेट्स ट्रांसलेटेड वेल। वर्कर्स राइट्स गेट्स ट्रांसलेटेड वेल एनवायरमेंटल इश्यूज एनिमल राइट्स तो मेनी डिसेबिलिटी राइट्स मेनी ऑफ़ थिंग्स आर दी थिंग्स आर ट्रांसलेटिंग वेल डिसेबिलिटी राइट्स पे जो सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा जबरदस्त कंट्रीब्यूशन किया है स्पेशली एंड द चंद्रचूड चंद्रचूड वाज़ वेरी मच एप्रिशिएटेड फॉर दैट यू नो व्हेन ही वाज़ आल्सो क्रिटिसाइज्ड फॉर ज्ञानवापी एंड अदर्स ज्ञानवापी एंड अयोध्या जजमेंट एंड ऑल ही वाज़ वेरी मच एप्रिशिएटेड फॉर दी इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट है ना कि ऑनलाइन स्ट्रीमिंग भी कर दिया डॉकेटिंग बहुत स्मूथ कर दिया एक यून एक एक यूनिफार्म साइटेशन स्टाइल बना दिया दीज़ आर ऑल गुड कंट्रीबशंस बट देन दीज़ आर सम बैड कंट्रीब्यूशन एज वेल जी तो इफ इफ यू आर लुकिंग एट इट दैट वे देन यू हैव टू लुक एट इट इन अ वै कॉन्टेक्स्ट स्पेसिफिक अब्सोलुटली ठीक है बहुत-बहुत शुक्रिया आपका निजाम साहब कि आपने हमें टाइम दिया और बहुत ही अहम गुफ्तगू को अंजाम दिया। मुझे लगता है कि ऑडियंस के साथ-साथ मुझे भी बहुत सारी चीजें इससे क्लियर हुई है और बहुत-बहुत शुक्रिया आपका फिर से कि आपने हमें टाइम दिया। थैंक यू सो मच।

Companion article

The Question That Never Gets a Final Answer

"What is law?" is the kind of question, Dr. Nizamuddin Ahmad Siddiqui tells his host Asad Ashraf, that most disciplines never have to ask about themselves. No physicist opens a textbook by defining physics; no chemist agonises over what chemistry is. Law is different — every serious legal theorist eventually wrestles with defining its own subject, because the answer depends entirely on who is asking. For a judge, Siddiqui explains, law is a source: the basis on which a dispute gets settled. For a lawyer, it is raw material for argument — a tool to convince a judge, not an abstract pursuit of justice. For a teacher, it is a body of concepts to be explained: where law comes from, how institutions create it, how courts interpret it. For an ordinary citizen, law is mostly an expectation, one frequently disappointed. And for a government, law is authority — validation for whatever it wishes to do, which is precisely why governments work so hard to have legislatures pass what they want into law rather than simply decreeing it.

That plurality of meanings, Siddiqui argues, is why law resembles theology more than it resembles science. Every major theological tradition treats justice as its central concern, and law, likewise, is inherently about justice — yet, like theology, it remains "scholar-centric," dependent on interpretation rather than settled by observation.

Justice Is Not a Fact. It Is an Assumption.

Perhaps the conversation's sharpest turn comes when Siddiqui interrogates the word "delivery" in the phrase "delivery of justice" — a phrase, he notes, that borrows the language of childbirth, implying a gestation period before an outcome arrives. But what actually gets delivered, he argues, is not justice itself; it is the settlement of a dispute. When the Supreme Court decides who owns a piece of property, or answers a presidential reference on a constitutional question, there is no dispute in any metaphysical sense — only a question requiring an answer, and a court settling it. "If you look at it in the hard, technical sense, that is not justice," he said. "So what is justice, then? Justice is your assumption" — the understanding that because a dispute has been settled by a final authority, justice must have occurred. This is why finality matters so much to the idea of justice: an endless chain of appeals would never produce it, so legal systems cap the process — district court, high court, Supreme Court, review, curative petition — and treat that endpoint as justice achieved, in the same way, Siddiqui notes, that Islamic theology locates ultimate justice in the finality of Allah's judgment on the Day of Judgment.

Why Law Needs Authority — and Why Authority Needs Force

Law, in Siddiqui's account, is inherently "top-down": without authority, there is no law, and authority itself, as the twentieth-century legal philosopher Norberto Bobbio argued, is ultimately established through force. This is why criticising the judiciary so often collapses into accusations of "challenging the court's authority" — because authority is genuinely foundational to how law functions, not incidental to it. Historically, this took its purest form under monarchy: whatever the king said was law, a position formalised by the jurist John Austin as the "command of the sovereign" — a structure, Siddiqui notes, strikingly similar to theological reasoning in which whatever God has ordained simply is the law.

Democracy complicates this picture without eliminating it. A bill must pass through parliament, one house to another, then to the president or governor — a process saturated with protest, lobbying and negotiation at every stage. Because law is produced by a political process, Siddiqui argues, it is "inherently political" in nature, whether the subject is the height permitted for construction in the Aravalli hills, the treatment of stray dogs, Kashmir's Article 370, the Citizenship Amendment Act, or the appointment of judges. This is also, he argues, why identity politics is not a distortion of democratic life but a precondition for it: representation in parliament requires groups to organise around identity in order to be heard at all, which is why B.R. Ambedkar so strongly championed Dalit political organisation — without it, Dalit concerns could never be translated into law. Siddiqui extends the point pointedly to the present: as Muslim political organisation has diluted, he argues, the relationship between law and Muslims has grown correspondingly ambiguous.

Where the Subjectivity Actually Lives

Asked to describe how, concretely, non-legal factors shape a judgment, Siddiqui walks through the entire pipeline of a case. It begins with the police, who frame the initial charges — a stage he says is often neither fair nor neutral. It continues through lower courts, where, he says bluntly, corruption and delay are a documented reality that litigants must reckon with. It continues into advocacy itself: senior counsel command extraordinary fees not for legal knowledge alone but for the ability to read a bench's mood in real time and adapt an argument accordingly — sensing that a particular judge dislikes a particular line of reasoning, or that only two minutes remain to make a point meant to take twenty. Siddiqui calls this "courtroom theatrics," recalling an environmental lawyer who reportedly told a bench he could barely speak "because of the pollution" — a way of making an argument without technically making one.

Beneath all of this sits the judiciary's own subjectivity, including judges' political leanings — a factor Siddiqui says is far more openly acknowledged in the United States and Britain, where judicial ideology is discussed as a matter of course, than in India, where the judiciary is treated as too sacrosanct for such scrutiny even though frequent courtroom observers understand it perfectly well. He illustrates judicial interpretation's capacity to stretch a record with the Ayodhya title dispute, where an Allahabad High Court order calling for excavation beneath the disputed site — despite excavation having no bearing on legal title, which under both English and Indian common law rests only on documentary deed or long possession — was later folded into the reasoning that ultimately awarded the site.

Politics Inside the Judgment: The Bail Order as Case Study

Siddiqui uses the much-debated bail proceedings involving Umar Khalid, Sharjeel Imam and others charged in the 2020 Delhi riots case to illustrate how reasoning itself can carry an outcome pre-installed. He notes the striking argument that releasing the accused could endanger the lives of protected witnesses — an argument that, properly read, already assumes the guilt the trial has not yet even begun to establish. "You have already assumed culpability," he said, adding that this is precisely why the reasoning has drawn sustained criticism from practising advocates: it does not behave like an ordinary legal argument, yet remains binding because, in Siddiqui's account of how law ultimately works, "law is what the courts tell you it is" — full stop, regardless of whether outside observers find the reasoning persuasive.

Constitutional Morality, Sealed Covers, and the Physics of Friction

Siddiqui distinguishes three sources courts must reconcile: positive law (what legislatures enact), natural law (norms — murder is wrong — embedded in human nature independent of scripture), and divine law (the Quran, the Vedas, the Bible). Because a secular constitutional democracy formally sets divine law aside, the vacuum has to be filled from somewhere, and India's answer, he argues, is "constitutional morality" — a doctrine combining positive law's structure with a moral compass derived not from priests or public sentiment but from the constitutional text itself, used to police boundaries such as when courts should exercise judicial restraint or when legislatures should not dictate to judges.

He describes recent controversies over the collegium system, the abandoned National Judicial Appointments Commission, sealed-cover evidence, and courts reversing their own earlier orders — as in disputes over Aravalli hill heights or the treatment of stray dogs — not as anomalies but as an ordinary "balancing act" between institutions that both depend on each other's cooperation to function. When executive and judiciary come into direct, face-to-face confrontation, he notes — as happened over the judicial appointments commission — one side typically asserts itself and the other, however reluctantly, cedes ground, precisely because "that is how the state works." He points to the removal of law minister Kiren Rijiju amid sustained public friction with the judiciary as one visible resolution of such a standoff.

When Dissent Becomes Law

One of the conversation's most striking passages concerns judicial dissent — illustrated through the account of the 1994 Ismail Faruqui judgment on the Ayodhya dispute, where Justices A.M. Ahmadi and S.P. Bharucha dissented from the majority. Citing a documented account of the deliberations, Siddiqui recounts Ahmadi refusing to sign the majority's position even under pressure, retreating to write a separate dissenting opinion instead — one that, in Siddiqui's reading, thoroughly dismantled the majority's reasoning on the basis that a court cannot decide a title dispute according to religious faith. A dissenting opinion is never binding, he notes, but it is far from meaningless: it preserves an alternative jurisprudence that later, differently composed benches can — and sometimes do — elevate into binding law.

Why Global Anxiety Is Reshaping the Nature of Law

Siddiqui situates India's judicial and political turbulence within a wider global pattern. Globalisation, he argues, dissolved the sense of local, rooted identity — a Shaheen Bagh protest becomes as legible as an international human-rights story as a domestic one — leaving people without the "self of identity" that community and locality once supplied, a gap that liberal individualism, focused on individual autonomy rather than communal belonging, has failed to fill. Into that vacuum, majoritarian politics rushes in easily, since democracy's basic logic — whoever commands the larger share prevails — always carries the latent capacity to tip into majoritarianism, especially around a sufficiently polarising figure. Compounding this, he argues, is the diminished capacity of the political left globally to offer a competing framework. None of this bypasses the judiciary, in his account, precisely because law's political nature means that whichever politics dominates a society's institutions will inevitably find representation within them, including the courts.

A Verdict That Refuses to Be a Verdict

Asked, finally, whether Indian courts today advance the promise of justice or function purely as an instrument of control, Siddiqui declines to deliver a single verdict on the judiciary as a whole. Courts, he argues, must be judged issue by issue rather than as a monolith: disability rights jurisprudence, environmental law, labour law and much of company law, he notes, "translate well" through India's courts and rarely make headlines precisely because they are neither politically charged nor legally ambiguous. It is the genuinely contested terrain — identity, national security, religious dispute — where reasoning grows most visibly strained. Even former Chief Justice D.Y. Chandrachud, criticised over the Ayodhya and Gyanvapi rulings, deserves credit, in Siddiqui's account, for expanding disability-rights jurisprudence and modernising court infrastructure. "You have to look at it context-specific," he said — a fittingly unresolved conclusion for a discipline he has spent the conversation arguing can never quite resolve what it fundamentally is.

Discussion

0

Readers only · Comments are reviewed by the desk before they appear

Readers only

The journalism is free for everyone — create a free account to join the discussion.

More from Nous Podcast